शिक्षक दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के सभी शिक्षक-शिक्षिकाओं को शुभकामनाएँ दी हैं। पीएम ने शिक्षकों के समर्पण और परिश्रम की प्रशंसा की। प्रधानमंत्री ने पूर्व राष्ट्रपति और शिक्षक डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जयंती पर उनको याद किया। इससे पहले गुरुवार (04 सितंबर 2025) को पीएम मोदी ने शिक्षकों को संबोधित कर होमवर्क भी दिया था।
पीएम मोदी ने 5 सितंबर 2025 को शिक्षक दिवस के अवसर पर एक्स पर पोस्ट कर लिखा, “सभी शिक्षकों को शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ! शिक्षकों का बच्चों के मन को संवारने के प्रति समर्पण ही मजबूत और उज्ज्वल भविष्य की नींव है। उनकी प्रतिबद्धता और करुणा सचमुच उल्लेखनीय है। हम डॉ. एस. राधाकृष्णन के जीवन और विचारों को भी उनकी जयंती पर याद करते हैं, जो एक महान विद्वान और शिक्षक थे।”
Wishing everyone, particularly all hardworking teachers, a very happy #TeachersDay! The dedication of teachers to nurturing minds is the foundation of a stronger and brighter future. Their commitment and compassion are noteworthy. We also remember the life and thoughts of Dr. S.…
इससे पहले शिक्षक दिवस की पूर्व संध्या पर गुरुवार (04 सितंबर 2025) को पीएम नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार से सम्मानित 45 शिक्षक-शिक्षिकाओं से मुलाकात भी की। इस दौरान पीएम ने शिक्षकों को होमवर्क दिया कि वे स्कूलों में स्वदेशी वस्तुओं को बच्चों के बीच गतिविधि और प्रोजेक्ट शुरू कर प्रचार करें।
स्कूलों में Make in India प्रोजक्ट्स और एक्टिविटी
पीएम मोदी ने कहा कि लोकल फॉ वोकल अभियान में शिक्षकों की अहम भूमिका हो सकती है। स्कूलों में इससे संबंधित गतिविधियाँ और प्रोजेक्ट्स बनवाएँ। इसमें बच्चों को Make in India वस्तुओं की पहचान करा सकते हैं। खेल-खेल में स्वदेशी वस्तुओं को घर से कम कराएँ।
पीएम ने कहा, “मान लीजिए दस क्लास हैं, हर क्लास सुबह एक-आधा घंटा प्लेकार्ड लेकर के गाँव में जुलूस निकाले, स्वदेशी अपनाओ। दूसरे दिन दूसरी क्लास, तीसरे दिन तीसरी क्लास। तो लगातार गाँव में वातावरण बना रहेगा, स्वदेशी… स्वदेशी… स्वदेशी।”
इसके अलावा स्कूलों में स्वदेशी के महत्व पर उत्सव मनाया जाए और आर्ट-क्राफ्ट क्लास में स्वदेशी सामग्री से साज-सज्जा का सामान बनाया जाए। पीएम ने कहा कि इससे बच्चों में बचपन से ही स्वदेशी की भावना बढ़ेगी।
स्वदेशी उत्सव मनाकर बच्चों को जोड़ें
पीएम ने कहा कि स्कूलों में स्वदेशी डे, स्वदेशी वीक और लोकल प्रोडक्ट डे मनाए जाने चाहिए। इसे अभियान के रूप में जोड़कर समाज को नए रंग-रूप में सजने के लिए योगदान दें। इसके तहत बच्चे परिवार से लोकल वस्तु लाकर उनकी कहानी बताएँ, जिससे एक वातावरण भी बन सकता है।
पीएम ने कहा कि लोकल मैन्युफैक्चरर्स को बच्चों से मिलवाएँ। पीएम ने कहा, “कुल मिलाकर मेड इन इंडिया को हमें अपने जीवन का आधार बनाना है, अपना दायित्व समझकर आगे बढ़ाना है और इससे युवाओं में देशभक्ति, आत्मविश्वास और डिग्निटी ऑफ लेबर के मूल्य को बढ़ाकर जीवन का हिस्सा बनाना है।”
प्रधानमंत्री का शिक्षकों को होमवर्क
पीएम मोदी ने कहा, “मुझे विश्वास है कि आप सभी एक शिक्षक के रूप में राष्ट्र निर्माण के इस बड़े मिशन को कर्तव्य भाव से जोड़ेंगे और इस देश को सामर्थ्यवान बनाने के काम को आप भी अपने कंधे पर उठाएँगे तो निश्चित ही हमें परिणाम मिलेगा।”
पीएम ने आगे कहा, “जो काम आप लोग हमेशा करते हैं, वो काम आज मैं कर रहा हूँ। आप लोग काम करते हैं होमवर्क देने का तो आज होमवर्क मैंने दिया है। मुझे पूरा विश्वास है कि आप उसको पूरा करेंगे।”
पिछले तीन दशकों से कश्मीर की कब्रगाहें सिर्फ शोक और मातम का स्थान नहीं रहीं बल्कि इन्हें एक तरह से सूचना युद्ध का हथियार भी बनाया गया है। पश्चिमी एनजीओ, अलगाववादी लॉबी और पाकिस्तान की प्रोपेगेंडा मशीन लगातार एक ही कहानी दुनिया के सामने पेश करती रही कि कश्मीर की अनचिह्नित कब्रें भारतीय सुरक्षा बलों द्वारा किए गए सामूहिक अत्याचार का ‘सबूत’ हैं।
एसोसिएशन ऑफ पेरेंट्स ऑफ डिसअपीयर्ड पर्सन्स (APDP) और इंटरनेशनल पीपल्स ट्रिब्यूनल ऑन ह्यूमन राइट्स एंड जस्टिस इन कश्मीर (IPTK) की 2009 में आई रिपोर्ट Buried Evidence में यहाँ तक दावा किया कि इन कब्रों में ‘जबरन गायब किए गए’ लोगों के शव हैं।
कम्युनिटी ह्यूमन राइट्स एंड एडवोकेसी सेंटर (CHRAC), एमनेस्टी इंटरनेशनल, लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स एंड पॉलिटिकल साइंस और ह्यूमन राइट्स वॉच जैसी संस्थाएँ भी बार-बार ‘अंतरराष्ट्रीय जाँच’ की माँग करती रहीं हैं और यह इशारा देती रहीं कि भारतीय सेना और सुरक्षा बल इन गुमशुदगियों के लिए जिम्मेदार हैं।
हालाँकि, अब ‘सेव यूथ, सेव फ्यूचर’ (SYSF) फाउंडेशन की Unraveling the Truth: A Critical Study of Unmarked and Unidentified Graves in Kashmir Valley (2025) नामक रिपोर्ट ने इन तमाम दावों को झूठा साबित कर दिया है। कई सालों तक चले फील्डवर्क के बाद SYSF ने बारामूला, कुपवाड़ा, बांदीपोरा और गंदेरबल जिलों में 373 कब्रिस्तानों का सर्वे किया और अपनी रिपोर्ट में कुल 4,056 कब्रें दर्ज की हैं।
इस रिपोर्ट के नतीजे साफ बताते हैं कि दशकों से फैलाया जा रहा प्रोपेगेंडा पूरी तरह गलत है, इनमें: – 2,493 कब्रें विदेशी आतंकियों की हैं इनमें ज्यादातर पाकिस्तान, अफगानिस्तान और LoC के पास से भेजे गए घुसपैठिए हैं। – 1,208 कब्रें स्थानीय आतंकियों की हैं यानी कश्मीरी युवक जिन्हें आतंकवाद में भर्ती किया गया। – 70 कब्रें 1947 के कबायली हमलावरों की हैं। – 276 कब्रें अनचिह्नित (unmarked) हैं।
इसका मतलब यह हुआ कि कुल कब्रों में से 93.2% की पहचान हो चुकी है और दस्तावेज मौजूद हैं। यह दावा कि यहाँ ‘निर्दोष नागरिकों की सामूहिक कब्रें’ हैं, पूरी तरह झूठा हैं और असलियत यह है कि ये कब्रें ज्यादातर आतंकवादियों की हैं, जिन्हें सुरक्षा बलों ने काउंटर-इंसर्जेंसी ऑपरेशनों में मारा।
आँकड़े जो तोड़ते हैं मिथक
SYSF की रिपोर्ट साफ कहती है, “कब्रों की एक बड़ी संख्या में ऐसे लोग दफन हैं जिनकी पहचान नहीं हो पाई और इनमें से ज्यादातर विदेशी आतंकवादी थे जो LoC पार करके घुसे और सुरक्षा बलों की कार्रवाई में मारे गए।”
यह एक लाइन ही उस पुराने प्रचार को ध्वस्त कर देती है, जिसमें दशकों से कहा जा रहा था कि यहाँ ‘निर्दोष नागरिकों का जनसंहार’ हुआ है। असलियत यह है कि ये लोग किसी ‘राज्य नीति के शिकार’ नहीं थे बल्कि हथियार उठाने वाले आतंकवादी थे, जो मुठभेड़ों में मारे गए हैं। इनमें से कई लावारिस हैं क्योंकि रावलपिंडी बैठे उनके आकाओं ने मानने से ही इंकार कर दिया कि ये कभी अस्तित्व में थे।
स्टडी में आगे दावा किया गया है, “पहचान ना हो पाने वाले शवों को दफनाना एक व्यावहारिक मजबूरी थी, ना कि किसी तरह की छिपाने की सरकारी साजिश।” मतलब साफ है कि जो आतंकी बिना किसी पहचान पत्र के पकड़े गए या मारे गए, उन्हें गाँव वाले या मस्जिद कमेटियाँ जल्दी से दफना देती थीं।
जब 93.2% कब्रों की पहचान साफ तौर पर आतंकियों और घुसपैठियों के रूप में हो चुकी है, तो यह हंगामा करना कि ‘हजारों कश्मीरी गायब हैं’ का कोई मतलब नहीं बचता है।
कब्रों के पीछे पाकिस्तान का हाथ
SYSF की रिपोर्ट कब्रों को सीधे पाकिस्तान के प्रॉक्सी युद्ध से जोड़ती है। सोवियत सेना के अफगानिस्तान से जाने के बाद 1989 में ISI ने अपनी जिहादी मशीनरी को कश्मीर में भेजना शुरू किया था। पाकिस्तान ने कश्मीरी और पाकिस्तानी आतंकियों को Loc के पार लॉजिस्टिक सपोर्ट, पैसा, हथियार पहुँचाने में हर तरह की मदद दी थी।
हिजबुल मुजाहिद्दीन, लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे संगठनों ने घाटी को जंग का मैदान बना दिया। विदेशी आतंकी बिना किसी दस्तावेज के आते थे और मारे जाने पर ‘अनजान आतंकवादी’ के तौर पर दफना दिए जाते थे।
रिपोर्ट साफ लिखती है कि कश्मीर में स्थानीय राजनीतिक असहमति से लेकर पार सीमा जिहादी आतंकवाद के बदलाव ने ही संघर्ष की पूरी तस्वीर को बदल दिया है। असल में ये कब्रिस्तान पाकिस्तान के उस खूनी खेल की गवाही हैं, जिन पर उसकी छाप दिखती है।
कैसे प्रोपेगेंडा ने पूरी बहस को हाइजैक किया
कथित ‘ह्यूमन राइट्स’ इंडस्ट्री ने इन कब्रों को आधार बनाकर भारत के खिलाफ कहानी गढ़ी। APDP, IPTK और एमनेस्टी ने दावा किया कि इनमें ‘गायब हुए नागरिक’ दफन हैं। लेकिन SYSF ने इनकी कार्यप्रणाली की सच्चाई सामने ले दी है।
रिपोर्ट साफ कहती है, “फॉरेंसिक जाँच जैसे DNA टेस्टिंग ना होने के चलते इन रिपोर्टों ने मृतकों की अलग-अलग श्रेणियों को एक ही माना और स्थानीय नागरिक, स्थानीय आतंकी और विदेशी आतंकी के बीच कोई साफ-साफ अंतर नहीं किया।”
यही असली धोखा था। आतंकियों और आम नागरिकों को मिलाकर पहले की रिपोर्टों ने आंकड़े बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए और भारत को ‘जनसंहार करने वाले देश’ के तौर पर पेश किया। SYSF ने इसकी आलोचना करते हुए कहा, “इन शुरुआती जांचों में कई सीमाएँ थीं… और इन्हें बनाने वालों की वैचारिक सोच ने ही इन्हें प्रभावित किया।”
यहाँ तक कि जम्मू-कश्मीर राज्य मानवाधिकार आयोग (SHRC) ने भी 2011 की अपनी जाँच में कहा था कि इन कब्रों में से कई विदेशी आतंकियों की थीं, जो मुठभेड़ों में मारे गए। फिर भी प्रोपेगेंडा मशीन ने इस सच्चाई को नजरअंदाज कर दिया क्योंकि मकसद सच नहीं बल्कि भारत को बदनाम करना था।
भुला दिए गए असली पीड़ित
जिन वैश्विक रिपोर्टों में ‘अनचिह्नित कब्रों’ को लेकर इतना शोर मचाया, उन्होंने 1989-90 में हुए कश्मीरी पंडितों के नरसंहार पर लगभग चुप्पी साध ली थी। उन्होंने उन मुसलमानों के नरसंहारों को भी कम करके आँका जिन्होंने आतंकियों का विरोध किया था, जैसे वंधामा (1998), चित्तीसिंहपोरा (2000) और नादीमार्ग (2003)।
SYSF रिपोर्ट मानती है कि आतंकियों ने कश्मीर में बर्बर हिंसा फैलाई थी। रिपोर्ट कहती है, “आतंकी संगठनों ने लोगों को जबरन गायब किया, राजनीतिक कार्यकर्ताओं की टार्गेटेड हत्याएँ कीं, अल्पसंख्यक समुदायों (खासकर कश्मीरी पंडित और उदारवादी मुसलमानों) को डराया-धमकाया और विरोध की हर आवाज को व्यवस्थित रूप से कुचल दिया।”
यहाँ उनकी कब्र भी हैं लेकिन एमनेस्टी की चमकदार रिपोर्टों में उनका जिक्र नहीं है। इस दोहरे रवैये की भी अपनी एक कहानी है।
जवाबदेही: भारत बनाम पाकिस्तान
आलोचक अक्सर 3 घटनाओं का जिक्र करते हैं, पठरीबल (2000), माछिल (2010) और अम्शीपोरा (2020) जहाँ निर्दोष नागरिक कथित फर्जी मुठभेड़ों में मारे गए। SYSF की रिपोर्ट में इनका सच भी नहीं छिपाया गया है। रिपोर्ट बताती है कि CBI ने पठरीबल को ‘नृशंस हत्या’ कहा, माछिल में पाँच जवानों को सजा मिली और अम्शीपोरा मामले में अफसर का कोर्ट-मार्शल हुआ।
यानी भारत ने गलती होने पर अपने ही लोगों को सजा दी। यही जवाबदेही है।
अब पाकिस्तान से तुलना कीजिए। SYSF बताती है कि बलूचिस्तान में ‘सामूहिक कब्रें’ मिली हैं, जहाँ लोगों को जबरन गायब किए जाने की घटनाओं की भरमार है। लेकिन हर बार जाँच रोक दी जाती है।
फर्क साफ है कि भारत अपनी गलतियों की जांच करता है, पाकिस्तान उन्हें संस्थागत प्रणाली का हिस्सा बना देता है।
प्रोपेगेंडा का क्या होता है फायदा
तो फिर यह नैरेटिव क्यों चलता रहा कि अनचिह्नित कब्रें ही भारत के अत्याचार की गवाही हैं? क्योंकि यह प्रोपेगेंडा का सबसे बड़ा हथियार था।
SYSF ने दावा किया है, “आतंकी और अलगाववादी नेटवर्क ने इन कब्रों की तस्वीरों का इस्तेमाल प्रचार के लिए किया। बिना पुख्ता सबूतों के बड़े-बड़े आरोप लगाए गए।”
पश्चिमी एनजीओ सुर्खियाँ बटोरने के लिए इन्हें दोहराते रहे। पाकिस्तानी डिप्लोमैट इस रिपोर्ट्स को UN में दिखाते रहे और अलगाववादी इनसे गुस्साए कश्मीरी युवाओं को और भड़काते रहे। इन कब्रों को मानसिक हथियार बना दिया गया।
अब सच सामने है कि ये कब्रें ज्यादातर पाकिस्तान से भेजे गए आतंकियों की हैं।
वैश्विक संदर्भ: बोस्निया या रवांडा नहीं है कश्मीर
सबसे खतरनाक चाल यह रही कि कश्मीर की कब्रों की तुलना बोस्निया के ‘जनसंहार’ वाली कब्रों से की गई। SYSF रिपोर्ट साफ बताती है, “जैसा ईरान, बोस्निया या रवांडा में हुआ, जहाँ राज्य दमन कारण था, वैसा कश्मीर में नहीं है।”
रिपोर्ट दावा करती है कि यहाँ कब्रें सीमा-पार आतंकियों के खिलाफ ऑपरेशन की वजह से बनीं, ना कि किसी एथनिक क्लीनजिंग की वजह से। इन दोनों को बराबरी पर रखना ही बेईमानी है।
क्यों अहम है यह रिपोर्ट
SYSF रिपोर्ट कोई भी सच्चाई नहीं छिपाती है। यह रिपोर्ट बताती है कि कहीं-कहीं गलतियाँ हुईं, अपने गायब लोगों की तलाश कर रहे परिवारों की बात करती है और जरूरत पड़े तो डीएनए टेस्टिंग की माँग भी करती है। असल मायने यह हैं कि रिपोर्ट ने कब्रों का सही संदर्भ सामने लाती है जिसमें आतंकवाद, पाकिस्तान का प्रॉक्सी वॉर और सुरक्षा बलों के ऑपरेशनल हालात शामिल हैं।
यह एक महत्वपूर्ण स्थानीय प्रयास है, जिससे दशकों से झूठ फैलाने वाली रिपोर्टों का सच सामने लाया जा सके। 93.2% कब्रों को दस्तावेजों के साथ दर्ज करके SYSF ने इस प्रोपेगेंडा की जड़ ही काट दी।
कब्रें बताती हैं असली कहानी
इस रिपोर्ट में सामने आए तथ्यों ने प्रोपेगेंडा को पूरा तरह ध्वस्त कर दिया है, अब- – 93.2% कब्रों की पहचान हो चुकी है। – इनमें से ज्यादातर कब्रें विदेशी और स्थानीय आतंकियों की हैं, जो मुठभेड़ों में मारे गए। – अब केवल 276 कब्रें अनचिह्नित हैं, जो कुल कब्रों का सिर्फ 6.8% है।
SYSF का निष्कर्ष है कि ये कब्रें किसी सुनियोजित भारतीय अत्याचार का सबूत नहीं हैं, बल्कि ‘एक मौजूदा और जारी संघर्ष की जटिल हकीकत हैं, जिसमें ऑपरेशनल जरूरतें और मानवीय त्रासदी दोनों शामिल हैं’।
एमनेस्टी, ह्यूमन राइट्स वॉच और अलगाववादी समूहों के गढ़े हुए झूठ की अब इन आँकड़ों के सामने पोल खुल गई है। ये कब्रें भारत की क्रूरता का नहीं बल्कि पाकिस्तान की ‘जिहादी आतंकवाद की राजनीति’ का सबूत हैं।
कश्मीरियों को सच जानने का हक है कि इन कब्रिस्तानों में दफन लोग भारत के शिकार नहीं थे बल्कि रावलपिंडी की चाल के मोहरे थे। भारतीय सेना ने इस खूनी खेल नहीं खेला बल्कि उसने इसे संभालने की कोशिश की। पाकिस्तान से निर्यात किया गया आतंकवाद ही उनके परिजनों की मौत और घाटी की दुर्दशा के लिए जिम्मेदार है। भारतीय सुरक्षा बलों ने इसे नियंत्रित करने की कोशिश की और इसी के चलते आज कश्मीरी खुली हवा में साँस ले रहे हैं।
(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है, जिसे आप यहाँ क्लिक कर पढ़ सकते हैं)
कॉन्ग्रेस नेता सोनिया गाँधी के खिलाफ दिल्ली की एक अदालत में FIR दर्ज करने की माँग की गई है। इस संबंध में याचिका दायर की गई है, जिसमें कहा गया है कि सोनिया गाँधी का नाम भारतीय नागरिक बनने से तीन साल पहले तक मतदाता सूची में जुड़ा था।
बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, शिकायतकर्ता एडवोकेट विकास त्रिपाठी ने दिल्ली की राउज एवेन्यु कोर्ट में एक याचिका दायर की है। मामले में सीनियर एडवोकेट अनिल सोनी और पवन नारंग ने ACJM वैभव चौरसिया के समक्ष दलील दी। नारंग ने कहा कि सोनिया गाँधी का नाम 1980 में नई दिल्ली निर्वाचन क्षेत्र की मतदाता सूची में शामिल किया गया था।
उन्होंने बताया कि 1982 में सोनिया गाँधी का नाम मतदाता सूची से हटा लिया था। नारंग ने आगे कहा कि सोनिया गाँधी मूलरूप से इटली की नागरिक हैं, 30 अप्रैल 1983 में भारत की नागरिक बनी थीं, इसका अर्थ है कि कुछ फर्जी दस्तावेज जमा किए गए थे जो कि संगीन अपराध का मामला है।
नारंग ने कहा कि इस मामले में दिल्ली पुलिस से भी शिकायत की गई थी लेकिन कोई कार्ऱवाई नहीं हुई, जिसके चलते उन्हें कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि यह मामला राजनीति नहीं बल्कि कानून के दायरे में आता है, जिसके लिए पुलिस की जाँच जरूरी है।
गुरुवार (4 सितंबर 2025) को कोर्ट में ACJM वैभव चौरसिया ने मामले में कुछ देर सुनवाई की। ACJM ने पाया कि शिकायतकर्ता ने मामले में पर्याप्त दस्तावेज उपलब्ध किए हैं। इसके आधार पर मामले में सुनवाई की अगली तारीख 10 सितंबर 2025 तय कर दी है।
बीजेपी नेता ने सोनिया गाँधी पर उठाया सवाल
इससे पहले बीजेपी सांसद अनुराग ठाकुर ने एक प्रेस वार्ता में सवाल उठाया था कि इटली में जन्मीं सोनिया गाँधी का नाम 1980 में मतदाता सूची में जुड़ गया था जबकि वह 1983 में भारतीय नागरिक बनी थीं।
वहीं, बीजेपी नेता अमित मालवीय ने भी एक्स पर 1980 की मतदाता सूची की कॉपी शेयर की थी, जिसमें नई दिल्ली संसदीय क्षेत्र के सफदरजंग रोड स्थित पोलिंग स्टेशन नंबर 145 की मतदाता सूची में इंदिरा गाँधी, राजीव गाँधी, संजय गाँधी, सोनिया गाँधी और मेनका गाँधी का नाम शामिल था।
Sonia Gandhi’s tryst with India’s voters’ list is riddled with glaring violations of electoral law. This perhaps explains Rahul Gandhi’s fondness for regularising ineligible and illegal voters, and his opposition to the Special Intensive Revision (SIR).
अमित मालवीय ने कहा था कि भारत की मतदाता सूची के साथ सोनिया गाँधी का रिश्ता चुनावी कानूनों के घोर उल्लंघनों से भरा पड़ा है, शायद यही कारण है कि राहुल गाँधी अयोग्य और अवैध मतदाताओं को नियमित करने के पक्षधर हैं और SIR का विरोध करते हैं।
दिल्ली उच्च न्यायालय ने 2020 में हुए पूर्वोत्तर दिल्ली में हिंदू विरोधी दंगों को लेकर साजिशकर्ता उमर खालिद और शरजील इमाम समेत कई लोगों को बेल देने से मना कर दिया। 2 सितंबर को हाईकोर्ट के फैसले के तीन अहम वजह बताए गए। अपराध की गंभीरता, खुद को पाक साफ साबित करने में असमर्थता और मुकदमे में देरी के आधार पर बेल नहीं दी जा सकती।
बचाव पक्ष ने दावा किया कि खालिद और इमाम शांतिपूर्ण विरोध में शामिल थे
बहस के दौरान, उमर खालिद और शरजील इमाम दोनों के बचाव पक्ष ने दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष तर्क दिया कि वे केवल शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन में शामिल थे। उन्होंने कहा कि ऐसा कोई सबूत नहीं है, जिससे यह साबित हो सके कि वे उस जगह पर मौजूद थे, जहाँ दंगे भड़के थे। ये भी साबित नहीं हो रहा है कि ये लोग उन बैठकों में शामिल थे, जहाँ हिंसा की साजिश रची गई थी।
उमर खालिद को लेकर बचाव पक्ष ने ये भी दावा किया कि 17 फरवरी 2020 के अमरावती भाषण में उन्होंने ‘शांतिपूर्ण गांधीवादी तरीकों से विरोध’ का आह्वान किया था। हिंसा के लिए कोई उकसावे वाली बात नहीं कही गई थी। शरजील इमाम के वकीलों ने जोर देकर कहा कि उन्हें पहले ही पुलिस ने हिरासत में ले लिया था। मुख्य दंगों से कई हफ्ते पहले, 28 जनवरी 2020 से वह हिरासत में था। इसलिए दंगों की योजना बनाने या अंजाम देने से उसे नहीं जोड़ा जा सकता। उन्होंने गवाहों की विश्वसनीयता को भी चुनौती दी और उनके बयानों को ‘मनगढ़ंत, जबरदस्ती से लिया गया और दोहराया गया’ बताया।
बचाव पक्ष ने आगे तर्क दिया कि अगर कुछ बातों को मान भी लिया जाए, तो यह केवल यूएपीए की धारा 13 के अंतर्गत आएगी, न कि अध्याय IV के गंभीर आतंकवादी अपराधों के अंतर्गत, जिनके लिए धारा 43डी(5) के तहत सख्त प्रतिबंध लागू होते हैं। उन्होंने कई उदाहरणों का हवाला देते कहा कि जब कारावास लंबा हो और मुकदमे का कोई अंत नजर न आए, तो बेल दी जा सकती है।
अभियोजन पक्ष की दलीलें
सॉलिसिटर जनरल और विशेष लोक अभियोजक (Special Public Prosecutor) ने इन दलीलों का कड़ा विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि यह न तो आकस्मिक थी और न ही स्वतःस्फूर्त। बल्कि दंगे ‘सुनियोजित और रणनीतिक रूप से अमेरिका के राष्ट्रपति की राजकीय यात्रा के समय रची गई थी।”
उन्होंने दिसंबर 2019 में नागरिक संशोधन विधेयक (सीएबी) पारित होने के बाद इमाम और खालिद द्वारा कई व्हाट्सएप ग्रुप बनाने की बात भी कही। इनमें विरोध करने के लिए पर्चे बाँटने, चक्का जाम करने और हिंसा फैलाने का आह्वान किया गया था। साथ ही उन भाषणों का भी जिक्र किया गया, जिनमें हिंसा की बात कही गई थी।
सरकार के मुताबिक, खालिद एक ‘देशद्रोही’ था, जिसने इमाम को विश्वविद्यालयों और मुस्लिम बहुल इलाकों में लोगों को संगठित करने का निर्देश दिया था। 13 दिसंबर 2019 को इमाम के अपने पर्चे में साफ तौर पर मुसलमानों के मताधिकार से वंचित करने की बात कही थी। उसने चक्का जाम करने का आह्वान करते हुए कहा था, “हजारों मुस्लिम युवा दिल्ली को जाम करने के लिए तैयार हैं। इससे अंतर्राष्ट्रीय मीडिया का ध्यान हमारे मुद्दों की ओर आएगा।”
सरकार ने कई गवाहों का हवाला देते हुए कहा कि खालिद और इमाम ने सरकार को ‘मुस्लिम विरोधी’ करार दिया और प्रदर्शनकारियों से सरकार को झुकाने के लिए ‘खून बहाने’ का आग्रह किया।
न्यायालय की अहम टिप्पणियाँ
अपने फैसले में, न्यायमूर्ति नवीन चावला और न्यायमूर्ति शैलिंदर कौर की खंडपीठ ने कहा कि खालिद और इमाम के खिलाफ आरोप प्रथम दृष्टया सही थे। फैसले में इस बात पर जोर दिया गया कि “प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि दिसंबर 2019 की शुरुआत में नागरिकता संशोधन विधेयक पारित होने के बाद, आरोपितों ने सबसे पहले कार्रवाई की, व्हाट्सएप ग्रुप बना कर और पर्चे बाँटकर… आवश्यक आपूर्ति बाधित करने सहित”।
इसके अलावा, फैसले में कहा गया कि बेल की अर्जी देने वालों ने कथित ‘भड़काऊ और उत्तेजक भाषण’ दिए, जो ‘कथित साजिश में उनकी भूमिका’ की ओर इशारा करते हैं।
दंगों से पहले हिरासत में होने के इमाम के दावे और दंगा स्थलों से खालिद की अनुपस्थिति को लेकर भी टिप्पणी की गई। अदालत ने कहा, “केवल अनुपस्थिति उनकी भूमिका को कम करने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकती है, क्योंकि उन पर घटनाओं की योजना बनाने और उसे तैयार करने में मुख्य साजिशकर्ता होने का आरोप लगाया गया है।”
फैसले में यूएपीए की धारा 43डी(5) का भी हवाला दिया गया, जिसमें याद दिलाया गया कि एक बार प्रथम दृष्टया आरोप सही लगने पर जमानत पर रोक लग जाती है।
फोरम शॉपिंग और जमानत में देरी में कपिल सिब्बल की भूमिका
दिल्ली उच्च न्यायालय में खालिद की टीम ने तर्क दिया कि उनकी लंबी कैद अक्टूबर 2022 में दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा बेल देने से इनकार करने के बाद विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) पर सर्वोच्च न्यायालय में हुई देरी के कारण हुई। उन्होंने दावा किया कि बार-बार स्थगन और अंततः फरवरी 2023 में एसएलपी वापस लेना कार्यवाही की धीमी गति और परिस्थितियों में बदलाव के कारण हुआ था। उस समय, वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने सर्वोच्च न्यायालय में कहा था कि अब खालिद निचली अदालत में अपनी किस्मत आज़माएँगे।
बचाव पक्ष ने ये साबित करने की कोशिश की कि खालिद देरी के लिए जिम्मेदार नहीं थे, बल्कि अदालती रवैये का शिकार हुए। मुकदमा अभी पूरा नहीं हुआ है, इसलिए जमानत दी जानी चाहिए।
जानबूझकर देरी करने में लगा रहा बचाव पक्ष
अभियोजन पक्ष ने तारीखों और तथ्यों के आधार पर बचाव पक्ष के तर्क को खारिज कर दिया। विशेष लोक अभियोजक अमित प्रसाद ने कहा कि 2023-24 में चौदह में से सात बार सुनवाई बचाव पक्ष के कारण रुकी। अमित प्रसाद ने कहा कि खालिद पक्ष रणनीतिक रूप से स्थगन की माँग करके व्यवस्था का दुरुपयोग कर रहा था।
यह भी बताया गया कि अक्टूबर 2022 में उच्च न्यायालय द्वारा उसकी ज़मानत याचिका खारिज करने के बाद, खालिद ने अप्रैल 2023 में सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाने से पहले लगभग छह महीने तक इंतज़ार किया। सवाल यह भी उठा कि अगर वह वास्तव में देरी से व्यथित था, तो इतना लंबा इंतज़ार क्यों किया?
एसएलपी ने कहा कि वापस लेना देरी के कारण नहीं, बल्कि फोरम शॉपिंग के कारण था। अक्टूबर 2022 से फरवरी 2024 तक, खालिद के वकील कपिल सिब्बल ने बार-बार स्थगन की माँग की और फिर जब यह स्पष्ट हो गया कि न्यायिक माहौल उनके मुवक्किल के पक्ष में नहीं है, तो उन्होंने अपना फैसला वापस ले लिया। इसके अलावा, खालिद के वकील ने सुप्रीम कोर्ट से ज़मानत याचिका वापस लेने के पीछे ‘परिस्थितियों में बदलाव’ को एक कारण बताया।
परिस्थितियों में यह तथाकथित बदलाव दो घटनाओं के साथ हुआ। पहला, न्यायमूर्ति अनिरुद्ध बोस के पद छोड़ने के बाद पीठ में बदलाव हुआ। मामला न्यायमूर्ति बेला त्रिवेदी के बैंच में चला गया। खालिद के वकीलों ने इसका विरोध किया और बार-बार मामलों को डी-टैग और पुनः सूचीबद्ध करने की माँग की।
दूसरा, जनवरी 2024 में यूएपीए के तहत गुरविंदर सिंह मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद कानून में बदलाव आया। इसमें साफ किया गया कि ऐसे मामलों में, ‘जेल सामान्य है और बेल अपवाद।’
अदालत की अहम टिप्पणियाँ
2 सितंबर 2025 के अपने फैसले में दिल्ली उच्च न्यायालय ने उमर खालिद की ज़मानत पर फिर से विचार किया। पीठ ने याद दिलाया कि अक्टूबर 2022 में उच्च न्यायालय ने उनकी ज़मानत याचिका खारिज कर दी थी, जहाँ अदालत ने, सामग्री की जाँच के बाद, उनके खिलाफ प्रथम दृष्टया मामला पाया था। न्यायाधीशों ने जोर देकर कहा कि उनके समक्ष प्रस्तुत तर्क पहले भी उठाए जा चुके हैं और उन पर पहले भी विचार किया जा चुका है और पहले का निष्कर्ष अभी भी सही है।
फैसले में यह भी उल्लेख किया गया है कि खालिद ने सर्वोच्च न्यायालय में एक विशेष अनुमति याचिका दायर की थी, जिसे बाद में उनके वकील के अनुरोध पर ‘परिस्थितियों में बदलाव’ के आधार पर वापस ले लिया गया था। इस वापसी के बाद, उन्होंने निचली अदालत में एक नई ज़मानत याचिका दायर की, जिसमें उन्होंने फिर से देरी और कानून में कथित बदलावों को आधार बनाया।
हालाँकि फैसले में यह स्पष्ट रूप से नहीं कहा गया था कि विशेष अनुमति याचिका वापस लेने का पहले के फैसले पर कोई असर नहीं पड़ा, लेकिन इसके तर्क ने इस प्रभाव को स्पष्ट कर दिया। एक बार फिर यह पुष्टि करते हुए कि खालिद के खिलाफ मामला प्रथम दृष्टया सही था, उच्च न्यायालय ने संकेत दिया कि मंच बदलने या परिस्थितियों में कथित बदलावों का हवाला देकर उसके पहले के फैसले के सार को पलटा नहीं जा सकता।
जेल से बाहर सह-आरोपी द्वारा की गई देरी
ज़मानत की माँग करते हुए, बचाव पक्ष ने बार-बार अनुच्छेद 21 और शीघ्र सुनवाई के अधिकार का हवाला दिया। उन्होंने केए नजीब और अन्य फैसलों का हवाला देते हुए तर्क दिया कि मुकदमे के निष्कर्ष के बिना पाँच साल की कैद अत्यधिक है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि आरोप अभी तय नहीं हुए हैं और 700 गवाहों से पूछताछ होनी है। बचाव पक्ष ने दलील दी, “निकट भविष्य में मुकदमे के समाप्त होने की कोई संभावना नहीं है, इसलिए खालिद को बेल दी जानी चाहिए “
हालाँकि, अभियोजन पक्ष ने अपना विरोध जताया और मुकदमे के रिकॉर्ड का हवाला दिया। तस्लीम अहमद के फैसले में यह कहा गया कि 5 अगस्त 2023 को, धारा 207 सीआरपीसी के तहत अनुपालन पूरा हो गया था और निचली अदालत ने 11 सितंबर 2023 से आरोपों पर दिन-प्रतिदिन सुनवाई का आदेश दिया था। लेकिन जब वह दिन आया, तो ज़मानत पर बाहर आरोपी देवांगना कलिता, नताशा नरवाल और अन्य ने यह कहते हुए आपत्ति जताई कि जाँच अभी भी जारी है।
ट्रायल कोर्ट में कहा गया था कि, “आरोपों पर बहस शुरू करने के लिए पर्याप्त समय दिए जाने के बावजूद, समय पर कोई स्थगन आवेदन दायर नहीं किया गया। अभियुक्तगण बाद में मुकदमे में देरी के आधार पर ज़मानत का दावा करेंगे।” एक हफ़्ते के भीतर, 18 सितंबर 2023 को, मीरान हैदर, अतहर खान, खालिद सैफी, फैजान खान, इशरत जहाँ, शरजील इमाम, सफूरा ज़रगर, सलीम मलिक, शिफा-उर-रहमान, शादाब अहमद और गुलफिशा फातिमा सहित एक ग्रुप ने भी स्थगन की माँग की। इसका मतलब यह था कि अभियोजन पक्ष आरोपों पर बहस करने के लिए तैयार था, फिर भी बचाव पक्ष ने जानबूझकर प्रक्रिया को अवरुद्ध कर दिया।
अभियोजन पक्ष ने जोर देकर कहा कि उमर खालिद और ताहिर हुसैन सहित कुछ अभियुक्तों ने वास्तव में कहा था कि वे 18 सितंबर 2023 को आगे बढ़ने के लिए तैयार हैं। लेकिन देवांगना और नताशा द्वारा दायर आवेदनों ने प्रक्रिया को पटरी से उतार दिया।
मई 2024 में खालिद की ज़मानत खारिज करने वाले सत्र न्यायालय और सितंबर 2025 में दिल्ली उच्च न्यायालय, दोनों ने ही कहा कि देरी की कहानी खोखली थी। उसी दिन आए तस्लीम अहमद मामले के फैसले ने ट्रायल कोर्ट के आदेश पत्रों को फिर से प्रस्तुत करके इस मुद्दे को संदेह से परे कर दिया। 11 सितंबर 2023 और 18 सितंबर 2023 को, देवांगना कलिता और नताशा नरवाल सहित अन्य ने आरोपों पर बहस को रोकने पर आपत्ति जताई। जनवरी से अगस्त 2024 तक, “ज़मानत पाने वाले अभियुक्त इस आधार पर आरोपों पर बहस शुरू नहीं होने दे रहे थे कि जाँच पूरी नहीं हुई है।” 4 अक्टूबर 2024 को, ट्रायल कोर्ट ने कहा, “सहमति से तय कार्यक्रम के बावजूद, कोई भी वकील तैयार नहीं है… किसी भी देरी को अदालत गंभीरता से लेगी।”
इसलिए उच्च न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि बेल पर रहे अभियुक्तों ने ही देरी कराई। तस्लीम अहमद के मामले में, न्यायालय ने कहा, “रिकॉर्ड में मौजूद सामग्री से पता चलता है कि कुछ अभियुक्तों को ज़मानत मिल गई है और कुछ जेल में हैं। जिन अभियुक्तों को ज़मानत मिल गई है, वे इस आधार पर आरोप-पत्र पर बहस में देरी करने की कोशिश कर रहे हैं कि जाँच अभी लंबित है। जमानत पर बाहर आए अभियुक्तों द्वारा जेल में बंद अभियुक्तों की कीमत पर आरोप-पत्र पर बहस में देरी की जा रही है। न्यायालय द्वारा अभियुक्तों के वकीलों को आपस में यह तय करने का निर्देश देने के बावजूद कि अभियुक्तों द्वारा आरोप-पत्र पर बहस कैसे और किस क्रम में आगे बढ़ाई जाएगी, इसको लेकर कोई आम सहमति नहीं दिखती।”
Source: Delhi High Court
ये पूरा घटनाक्रम जानबूझकर किए गए देरी के पैटर्न को उजागर करता है। बेल पर रिहा लोगों ने जाँच पर सवाल उठाते हुए आवेदन दायर करके कार्यवाही में देरी की। उमर खालिद जैसे जेल में बंद लोगों ने उसी देरी को बेल के लिए आधार बनाने की कोशिश की। उच्च न्यायालय ने सभी दलीलें खारिज करते हुए और कहा कि धारा 43डी(5) के तहत प्रतिबंध बरकरार है क्योंकि आरोप प्रथम दृष्टया सत्य थे।
दस्तावेज- उमर खालिद, शरजील इमाम और अन्य की ज़मानत याचिकाओं पर फैसला।
तस्लीम अहमद की ज़मानत याचिका पर फैसला।
(यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)
केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर एवं सीमा शुल्क बोर्ड (सीबीआईसी) ने पॉपकॉर्न पर लागू संशोधित GST को लेकर स्पष्टीकरण जारी किया है। कई रिपोर्टों और सोशल मीडिया पोस्ट में दावा किया गया था कि नमकीन या मसालेदार पॉपकॉर्न पर 5% GST लगेगा, जबकि शुगर-कोटेड या कैरेमल पॉपकॉर्न पर 18% टैक्स लगेगा, क्योंकि यह कन्फेक्शनरी श्रेणी में आता है।
इस दावे पर प्रतिक्रिया देते हुए सीबीआईसी ने स्पष्ट किया कि अब चीनी युक्त कन्फेक्शनरी उत्पादों पर भी केवल 5% GST ही लागू है, 18% नहीं। यानी कैरेमल पॉपकॉर्न पर भी 5% GST ही लगेगा।
यह स्पष्टीकरण पत्रकार राजदीप सरदेसाई की एक पोस्ट के जवाब में दिया गया, जिसमें उन्होंने लिखा था कि नमकीन पॉपकॉर्न पर 5% और कैरेमल पॉपकॉर्न पर 18% टैक्स लगेगा। सीबीआईसी ने उनकी पोस्ट को गलत बताते हुए कहा कि सभी प्रकार के पॉपकॉर्न पर अब एक समान 5% GST ही लागू होगा।
केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर एवं सीमा शुल्क बोर्ड (सीबीआईसी) ने स्पष्ट किया है कि अब सभी शुगर कन्फेक्शनरी वस्तुओं पर केवल 5% GST ही लगेगा। बोर्ड ने पत्रकार राजदीप सरदेसाई की पोस्ट का जवाब देते हुए लिखा “प्रिय @sardesairajdeep, सभी शुगर कन्फेक्शनरी वस्तुओं पर अब 5% टैक्स लगेगा। कृपया गलत जानकारी साझा न करें।”
सीबीआईसी ने नई GST दरों की सूची का लिंक भी साझा किया। सूची के अनुसार, शुगर बॉयल्ड कन्फेक्शनरी पर टैक्स 12% से घटाकर 5% कर दिया गया है, जबकि शुगर कन्फेक्शनरी पर टैक्स 18% से घटाकर 5% कर दिया गया है। यानी अब चीनी युक्त सभी उत्पादों पर केवल 5% GST ही लगेगा।
पहले, नमकीन पॉपकॉर्न पर खुला बेचने पर 5% और पैक्ड/ब्रांडेड रूप में बेचने पर 12% टैक्स लगता था। वहीं, कैरेमल पॉपकॉर्न पर पैकेजिंग चाहे जैसी हो, 18% टैक्स लागू था। पॉपकॉर्न पर इन अलग-अलग दरों को लेकर पहले बड़ी बहस भी हुई थी।
पंजाब विश्वविद्यालय परिसर छात्र परिषद (PUCSC) चुनाव में इस बार बड़ा उलटफेर देखने को मिला। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की छात्र शाखा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) ने पाँच दशकों में पहली बार अध्यक्ष पद पर जीत हासिल कर इतिहास रच दिया।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यूनिवर्सिटी इंस्टीट्यूट ऑफ लीगल स्टडीज (UILS) के शोध छात्र गौरव वीर सोहल ने अध्यक्ष पद पर अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी सुमित शर्मा (छात्र मोर्चा) को 500 से अधिक मतों से हराया। गौरव को 3,148 वोट मिले, जबकि सुमित को 2,660 वोट मिले।
Historic Victory!
For the very first time, ABVP has created history in Panjab University!
Gauravveer Sohal has been elected as the President, marking a new beginning.
This victory is not just of one candidate, but of ideology, nationalism, and student power.
हालांकि, गठबंधन के अन्य तीन उम्मीदवार उपाध्यक्ष, महासचिव और संयुक्त सचिव पद पर जीत दर्ज नहीं कर सके। कॉन्ग्रेस की छात्र शाखा NSUI के उम्मीदवार प्रभजोत सिंह गिल 1,359 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे। आम आदमी पार्टी की छात्र इकाई ASAP के मनकीरत मान चौथे स्थान पर रहे।
यह पहली बार है जब 1977 में प्रत्यक्ष मतदान व्यवस्था लागू होने के बाद ABVP ने अध्यक्ष पद अपने नाम किया है। पिछले साल ABVP के उम्मीदवार तीसरे स्थान पर रहे थे, जबकि 2023 में जसविंदर राणा ने संयुक्त सचिव पद पर जीत दर्ज की थी।
अन्य पदों के नतीजे
अध्यक्ष पद पर जीत के बावजूद उपाध्यक्ष पद साथ संगठन के उम्मीदवार अश्मीत सिंह ने अपने नाम किया। उन्होंने ABVP फ्रंट के नवीन कुमार को 650 मतों से हराया। महासचिव पद सोपू (PUSU) गुट के अभिषेक डागर ने जीता, जबकि संयुक्त सचिव पद स्वतंत्र उम्मीदवार मोहित मंडेराना ने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी आर्यन वर्मा को हराकर हासिल किया। दिलचस्प बात यह रही कि मोहित को NSUI का समर्थन प्राप्त था।
राजनीतिक महत्व
ABVP ने यह चुनाव भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन (INSO) और हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) के साथ गठबंधन में लड़ा। दूसरी ओर छात्र मोर्चा ने ABVP से अलग हुए गुट, HIMSU, SOPU और PUSU के साथ गठबंधन किया था। भाजपा नेताओं ने ABVP की इस जीत को ऐतिहासिक बताते हुए इसे पंजाब की राजनीति में आने वाले बदलाव का संकेत माना।
भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव तरुण चुघ और प्रदेश अध्यक्ष सुनील जाखड़ ने जीत पर बधाई दी, जबकि वरिष्ठ नेता विनीत जोशी ने कहा कि यह 2027 के विधानसभा चुनावों में भाजपा के लिए सकारात्मक संकेत है।
देश के कई राज्य लगातार हो रही बारिश से बाढ़ की चपेट में हैं। एक तरफ जहाँ पहाड़ी इलाकों से भूस्खलन से भारी तबाही की भयावह तस्वीरें सामने आ रही हैं तो वहीं मैदानी इलाकों में फैले बाढ़ के पानी से परेशान लोग अपने घरों से पलायन करने को मजबूर हैं। वहीं दिल्ली में यमुना का पानी खतरे के निशान से ऊपर बह रहा है। इसी के चलते दिल्ली के कई इलाके बाढ़ की चपेट में हैं। इस बीच गढ़ी माडू गाँव से दो लोग लापता हैं जिनकी तलाश में NDRF की टीमें जुटीं हैं।
बाढ़ग्रस्त इलाकों से हजारों लोग बेघर हो चुके हैं। इस बीच ऑपइंडिया की टीम दिल्ली के उस बाढ़ग्रस्त इलाके में पहुँची, जहाँ लोग राहत शिविरों में अपनी रात बिता रहे हैं। हम बृहस्पतिवार (4 सितंबर 2025) सुबह को डीएनडी होते हुए यमुना पुल पहुँचे। यहाँ यमुना का वर्षों बाद विशाल रूप दिखाई दे रहा है।
पुल पर खड़े कुछ लोग इस दृश्य को अपने मोबाइल में कैद कर रहे हैं तो कुछ अपनी आँखों में समेटने की कोशिश कर रहे हैं। इससे आगे मयूर विहार की ओर बढ़ने पर देखा कि एमसीडी के बंद पड़े टोल के दोनों ओर बड़ी संख्या में डूब क्षेत्र से निकाले गए पालतू पशु बंधे हैं।
इससे आगे लाल बत्ती पर जाकर देखा कि चौराहे से लेकर मयूर विहार वन के मेट्रो स्टेशन तक सड़क के दोनों ओर बड़ी संख्या में सरकार द्वारा राहत शिविर के तहत टेंट लगाए गए हैं, जिसमें बाढ़ से प्रभावित हजारों लोग अपने दिन-रात काट रहे हैं। राहत शिविर के एक टेंट में रह रहे कासगंज निवासी चरन सिंह बताते हैं कि वह पिछले करीब 18 वर्षों से यहीं खादर के डूबा क्षेत्र में रहते हैं।
यहाँ करीब 4 बीधा खेत में सब्जी उगाते हैं और मेहनत मजदूरी करके परिवार का पालन पोषण करते हैं। हमारे खेत में भिंडी, तोरई और गोभी की फसल थी, लेकिन बाढ़ ने सारी फसल को बर्बाद कर दिया। अब तो सब्जी की फसल से ज्यादा अपने परिवार की चिंता है। सरकार ने टेंट तो दे दिया है, लेकिन पीने का पानी और खाना पर्याप्त नहीं मिल पा रहा है। सरकार को इस पर ध्यान देना चाहिए।
झुग्गियों में वापस जाने में लगेगा एक माह का समय
7 साल से अपने परिवार के साथ डूब क्षेत्र में रहने वाले बदायूँ निवासी ओमपाल बताते हैं कि मैंने आठ बीघा खेत में सब्जी लगा रखी थी। बाढ़ से सब कुछ बर्बाद हो गया। सरकार ने सुरक्षित रहने और खाने का इंतजाम तो कर दिया है, लेकिन हम कब तक दूसरों के भरोसे रहेंगे। अगर आज भी पानी उतर जाता है को हमें फिर से अपनी झुग्गी जमाने और वापस उसी स्थान पर जाने में एक महीने से अधिक का समय लगेगा।
यहीं रहने वाली बुलंदशहर की लाली नाम की महिला बताती है कि वह करीब 20 वर्षों से डूब क्षेत्र में रहती है पहले खेतों में मजदूरी करती थी लेकिन अब वह अपनी नर्सरी चलाती है लेकिन बाढ़ के पानी से नर्सरी में बड़ा नुकसान हुआ है। पता नहीं कब तक पहले जैसी स्थिति होगी सब कुछ भगवान भरोसे है। उन्होंने सरकार से स्थाई समाधान की माँग की।
इस बीच एक बिस्किट का कार्टून लिए चल रही ऊषा नाम की महिला खुद को एनिमल लवर बताते हुए यहाँ कुत्तों को बिस्किट खिला रही है और बच्चों को पानी से दूर रहने और लोगों से सुरक्षित स्थान पर जाने की अपील कर रही है। वह कहती हैं कि हर एक-दो साल बाद दिल्ली में इस तरह की बाढ़ आती है और अस्थाई समाधान के तौर पर सरकार राहत शिविर लगाती है, लेकिन कभी स्थाई समाधान नहीं निकालती। ये हाल देश की राजधानी दिल्ली का है।
राहत शिविरों में खाना-पानी पहुँचा रही सरकार
दिल्ली में बाढ़ के बीच सरकार द्वारा सैकड़ों राहत शिविर लगाए गए हैं। इसी कड़ी में मयूर विहार पर भी बड़ी संख्या में टेंट लगाकर बाढ़ पीड़ितों को रहने की जगह मुहैया कराई गई है। मौके पर एनडीआरएफ की रेस्क्यू टीम भी तैनात की गई हैं। साथ ही सरकार उनको भोजन, पानी और दवा भी पहुँचा रही है। अस्थाई शौचालय लगाए गए हैं। यहाँ तक कि रात्रि के लिए प्रकाश की भी व्यवस्था की गई है। जगह-जगह पुलिस चौकियाँ बनाई गई हैं।
वर्तमान हालात की बात करें तो दिल्ली के यमुना बाजार, बुराड़ी, एमनेस्टी मार्केट, तिब्बती बाजार आदि इलाकों की सड़कों पर बाढ़ का पानी घूम रहा है। आईटीओ का छठ घाट और बासुदेव घाट पूरी तरह पानी से डूब गए हैं और यमुना खादर, यमुना वाटिका, आसिता जैसे रिवर फ्रंट से जुड़े पार्कों में भी पानी भर गया है। बड़े पैमाने पर झुग्गियाँ खाली करा दी गईं हैं। साथ ही हजारों लोगों को राहत शिविरों में शिफ्ट किया जा रहा है।
ऑस्ट्रिया का अर्थशास्त्री, नेता और इन्फ्लुएंसर गुंथर फेलिंगर ने भारत को टुकड़ों में बाँटने की बात कही है। खालिस्तानी समर्थक हैंडल पर उसने आतंकवादियों को भारत को काटकर अलग देश बनाने का तरीका बताया। वह भारत और पीएम मोदी के खिलाफ जहर उगलता रहा है।
फेलिंगर ने एक्स पर लिखा कि उसने खालिस्तान नैरिटिव एक्स हैंडल के साथ 2 घंटे तक चर्चा की कि खालिस्तान की आजादी के लिए क्या किया जाए और रूस समर्थक भारतीय नेता नरेन्द्र मोदी के चंगुल से कैसे आजाद किया जाए। फेलिंगर ने आगे लिखा है कि उसने आज के ब्रिक्स और भारत की भयावह स्थिति और नरसंहार की प्रकृति से बहुत कुछ सीखा है। हालाँकि भारत में उसका पोस्ट प्रतिबंधित कर दिया गया है।
कौन है गुंथर फेलिंगर
गुंथर फेलिंगर एक ऑस्ट्रियन लॉबिस्ट है। वह इन्फ्लुएंसर, अर्थशास्त्री है और नाटो के विस्तार के लिए यूरोपीय कमेटी फॉर नाटो इनलार्जमेंट नाम से लॉबी ग्रुप चलाता है। उसका ये ग्रुप ऑस्ट्रिया, कोसोवो, यूक्रेन, आर्मेनिया, अल्बानिया, मोल्दोवो समेत कई यूरोपीय देशों में एक्टिव है। इन देशों को नाटो में शामिल करने की मुहिम इसने चला रखी है। वह नाटो का अधिकारी नहीं है और नाटो से सीधा कोई रिश्ता है। वह राजनेता नहीं हैं। लेकिन राजनेता की तरह व्यवहार करता है। वह दक्षिणी बाल्कन क्षेत्रीय आर्थिक एकीकरण ग्रुप समेत कई मल्टीनेशनल संगठन का सदस्य है। यूरोप के देशों की यात्रा कर वह सोशल मीडिया पर सेल्फी पोस्ट करता है। नाटो और यूरोपीय संघ के पक्ष में संदेश पोस्ट करता है। उसके बयान विश्वनेताओं के बयानों जैसे होते हैं।
यूक्रेन को नाटो का सदस्य बनाने की मुहिम में शामिल गुंथर रूस के खिलाफ जहर उगलता रहा है। उसने सोशल मीडिया पर लिखा कि कोसोवो 100 फीसदी नाटो का सदस्य बनने के लिए तैयार है। साथ ही रूस को चेतावनी देते हुए कहा कि रूस अब यूक्रेन से बाहर जाए। यहाँ तक कि उसने ब्राजील के राष्ट्रपति सिल्वा को रूस के साथ काम करने धमकी देते हुए कहा, “मैं यह बिल्कुल स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि अगर आप @LulaOficial नरसंहार करने वालों के साथ शामिल हो गए, तो मैं ब्राजील को तहस-नहस करने का आह्वान करूँगा।” उसने पीएम मोदी और भारत को भी रूस समर्थक बताते हुए कई बार आलोचना की है। नए विवाद में भी उसने पीएम मोदी को ‘रशियन मैन’ बताया है।
दरअसल ये ऑस्ट्रिया का डीप स्टेट के साथ रिश्ता काफी गहरा है। यहाँ की दो अहम पार्टियाँ फ्रीडम पार्टी यानी एफपीओ और ऑस्ट्रियाई पीपुल्स पार्टी पर डीप स्टेट से संबंधित होने के आरोप लगते रहे हैं।
क्या है डीप स्टेट?
डीप स्टेट खुफिया तंत्रों सीआईए, एफबीआई जैसे अमेरिकन इंटेलिजेंस एजेंसी का नेटवर्क है। इनमें दुनिया के सरकारी और गैर सरकारी अभिजात्य वर्ग शामिल हैं, जो लोकत्रांतिक रूप से चुनी गई सरकार से ज्यादा ताकतवर है। ये दुनिया के किसी भी कोने में सरकारों को बनाने- गिराने का माद्दा रखती है।
उत्तर प्रदेश के कौशांबी जिले में 19 साल की हिंदू लड़की से गैंगरेप और जबरन धर्म परिवर्तन कराने का मामला सामने आया है। पीड़िता की माँ की शिकायत पर पुलिस ने सैफ खान और अनुज अहमद समेत सात लोगों के खिलाफ मामला दर्ज कर कार्रवाई शुरू कर दी है।
मामला कौशांबी थाना क्षेत्र के एक गाँव का है। पीड़िता की माँ ने पुलिस अधीक्षक को दी गई तहरीर में आरोप लगाया कि रविवार (31 अगस्त 2025) की रात आठ बजे गाँव की महिला नेहा बानो उसकी बेटी को बहाने से अपने घर बुला लाई।
वहाँ पहुँचने पर नेहा के भाई सैफ खान और अनुज अहमद ने युवती से दुष्कर्म किया। इस दौरान आरोपितों ने पीड़िता पर जबरन निकाह करने का दबाव भी डाला और जान से मारने की धमकी भी दी।
शिकायत के अनुसार, इसी दौरान गाँव के ही मस्जिद के मौलाना ने महिला और उसकी बेटी से दबाव डालकर कलमा पढ़वाया और जबरन धर्म परिवर्तन कराया। इस कृत्य में गाँव के अतीक अहमद, इसरार अहमद और छोटू खान भी मौजूद रहे और सक्रिय रूप से शामिल हुए।
घटना के बाद पीड़िता और उसकी माँ घर लौटीं और परिवार को पूरी जानकारी दी। परिजनों ने जब आरोपितों का विरोध किया तो महिला के बेटे की सार्वजनिक रूप से पिटाई कर दी गई और पूरे परिवार को जान से मारने की धमकी दी गई।
घटना की शिकायत मिलने के बाद पुलिस अधीक्षक राजेश कुमार सिंह के निर्देश पर सैफ खान, अनुज अहमद, नेहा बानो, छोटू खान, अतीक अहमद, इसरार अहमद और मौलाना समेत सात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया।
पुलिस अधिकारियों के मुताबिक, पीड़िता का मेडिकल परीक्षण कराया गया है और अदालत में उसका बयान भी दर्ज कराया गया है। पुलिस ने कुछ आरोपितों को हिरासत में लेकर पूछताछ शुरू कर दी है और आगे की कार्रवाई जारी है।
लिपुलेख दर्रे को लेकर विवाद एक बार फिर गरमा गया है। दिल्ली और बीजिंग लिपुलेख दर्रे के जरिए व्यापार को एक बार फिर शुरू करने पर सहमत हो गए हैं। इस पर नेपाल ने आपत्ति जताई है। नेपाल इसे ‘अपना क्षेत्र’ कह रहा है। लेकिन इसका न तो कोई ऐतिहासिक आधार है और न ही औचित्य।
दरअसल इसके पीछे अमेरिका है। नेपाल ने लिपुलेख विवाद को हाल ही में बढ़ाया है। अमेरिका ने हाल के वर्षों में उसे विदेशी सहायता उपलब्ध कराई है। नेपाल में उसका बोलबाला है।
Long shadow of Lipulekh: Questions over upcoming visit of Nepal PM Oli to India.
लिपुलेख दर्रा एक त्रि-संधि क्षेत्र में स्थित है। यहाँ भारत, चीन और नेपाल की सीमा जुड़ी हैं। इस पर नेपाल और भारत दोनों अपना दावा करते हैं। नेपाल, लिपुलेख के साथ-साथ आस-पास के कालापानी और लिंपियाधुरा क्षेत्रों को अपने आधिकारिक मानचित्रों और संविधान में शामिल करता है और सुगौली संधि के अनुसार काली नदी को सीमांत क्षेत्र घोषित करता है।
2020 में, नेपाल ने एक राजनीतिक मानचित्र जारी करके कालापानी, लिंपियाधुरा और लिपुलेख को देश का हिस्सा दिखाया सीमा विवाद को पैदा किया था। भारत उस वक्त भी नेपाल के दावे का खंडन किया था और दावा किया था कि नदी का उद्गम नीचे की ओर है। इसलिए यह भूमि उत्तराखंड की है।
लिपुलेख को लेकर भारत और चीन के बीच ऐतिहासिक द्विपक्षीय समझौता है, जिसे हाल ही में नेपाल की आपत्तियों के बावजूद एक बार फिर सहमति बनी है। भारत का तर्क है कि नेपाल के दावों का कोई ऐतिहासिक और तथ्यात्मक आधार नहीं है। वह इस भूमि पर नियंत्रण बनाए रखते हुए बातचीत करना चाहता है।
यह समस्या अगस्त 2025 में फिर से शुरू हुई, क्योंकि भारत ने चीन के साथ लिपुलेख के माध्यम से व्यापार फिर से शुरू करने की घोषणा की। नेपाल ने उसी दिन आपत्ति जताई और इस क्षेत्र पर दावा किया।
भारत के तत्काल खंडन करते हुए इस बात पर जोर दिया कि ये दावे मनगढ़ंत और निराधार हैं। भारत और चीन को लिपुलेख मार्ग जोड़ता है, जो रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है।
अमेरिकी आर्थिक मदद का नेपाल पर असर
लिपुलेख मुद्दे पर नेपाल के दावों के पीछे संयुक्त राज्य अमेरिका से जुड़े राजनयिक और वित्तीय सहायता को माना जा रहा है।
हालाँकि 2025 की शुरुआत में, संयुक्त राज्य अमेरिका ने नेपाल में USAID की मदद से चल रही प्रमुख विकास कार्यों को निलंबित कर दिया। इनमें करोड़ों डॉलर के स्वास्थ्य, कृषि और शिक्षा से जुड़े कार्यक्रम शामिल थे।
राष्ट्रपति ट्रम्प के पदभार ग्रहण करने के बाद इस सहायता राशि पर 90 दिनों के लिए रोक लगा दी थी, जिससे नेपाल में संचालित विभिन्न मानवीय कार्यक्रम और गैर-सरकारी संगठन प्रभावित हुए।
हालाँकि मिलेनियम चैलेंज कॉरपोरेशन (MCC) की करोड़ों डॉलर की परियोजनाएँ जारी रही। इस मदद को अमेरिका ने शर्तें लगा कर कूटनीतिक उपकरण की तरह इस्तेमाल किया और नेपाल को विवश किया।
लिपुलेख में तनाव बढ़ने के साथ ही, उसी महीने विकसित हो रहा रणनीतिक आर्थिक गठबंधन इन घटनाक्रमों पर भारी पड़ रहा था। हाल ही में अमेरिका की वित्तीय प्रौद्योगिकी कंपनी सुनो (Suno) ने नेपाल के सिद्धार्थ बैंक के साथ मिलकर बॉर्डरलेस बैंकिंग नामक एक अभिनव परियोजना की शुरुआत की है। इससे नेपाल-अमेरिका के आर्थिक रिश्ते और मजबूत हुए हैं।
अमेरिकी राजदूत डीन आर.थॉम्पसन भी इस मौके पर वहाँ मौजूद थे। इस परियोजना का फायदा अमेरिका में रहने वाले नेपालियों को भी होगा। अमेरिका में रहने वाले नेपाली बिना उड़ान भरे नेपाल में खाते खोल सकते हैं, और वे सुरक्षित और अधिक किफायती तरीके से पैसे भेज सकते हैं।
राजदूत थॉम्पसन के अनुसार, बॉर्डरलेस बैंकिंग कार्यक्रम से अमेरिका-नेपाल संबंध को मजबूती मिली है। साथ ही दुनिया भर में नेपाली समुदायों का फायदा हुआ है। वास्तव में ये डिजिटल बैंकिंग को “वास्तव में सीमा-रहित” बना रहा है। उन्होंने आशा व्यक्त की कि अमेरिकी फिनटेक कंपनियाँ और नेपाली बैंक साइबर सुरक्षा और फिनटेक के क्षेत्रों में और अधिक मजबूती से मिलकर काम कर सकते हैं, जिससे उनके द्विपक्षीय आर्थिक संबंध और मजबूत होंगे।
एनएमबी बैंक के साथ मिलकर, नेपाल ने अप्रैल 2025 में अमेरिका से संबद्ध संगठनों इंटरनेशनल फाइनेंस कॉरपोरेशन (आईएफसी), ब्रिटिश इंटरनेशनल इन्वेस्टमेंट (बीआईआई) और मेटलाइफ के साथ 60 मिलियन डॉलर का ऐतिहासिक ग्रीन बॉन्ड समझौता किया।
इस समझौते का उद्देश्य नेपाल में निजी क्षेत्र का विकास और निरंतर विकास पर केन्द्रित है। इससे रोजगार पैदा करने और ग्रीन टेक्नोलॉजी को बढ़ावा मिलेगा।
क्षेत्रीय कूटनीति के साथ समन्वय
नेपाल विदेश व्यापार संघ के एक प्रतिनिधिमंडल ने 28 अगस्त 2025 को द्विपक्षीय व्यापार और आर्थिक संबंधों को बेहतर बनाने के तरीकों पर चर्चा करने के लिए बांग्लादेश के दूत से मुलाकात की। यह मुलाकात नेपाल में बांग्लादेश के राजदूत द्वारा नेपाल के प्रमुख नीतिगत थिंक टैंक, नेपाल आर्थिक मंच के अध्यक्ष सुजीव शाक्य से मुलाकात के एक दिन बाद हुई थी। यह दक्षिण एशियाई आर्थिक माहौल में सीमा विवाद के बावजूद क्षेत्रीय संपर्क बढ़ाने के लिए काठमांडू की सक्रिय भूमिका को दर्शाता है।
इसके अलावा इसी समय पेकिंग विश्वविद्यालय के शैक्षणिक प्रतिनिधिमंडलों ने बेल्ट एंड रोड पहल पर सहयोग को बढ़ाने के लिए बांग्लादेश और नेपाल की यात्रा की। यह इस क्षेत्र में चीन के निरंतर रणनीतिक, सांस्कृतिक और आर्थिक प्रभाव को दर्शाता है, जो अमेरिका और भारत के संबंध में नेपाल के कार्यों को आंशिक रूप से प्रभावित करता है।
अमेरिका से प्रभावित है नेपाल की नीति
इन घटनाओं के क्रम और समय से ये समझा जा सकता है कि लिपुलेख के मुद्दे पर नेपाल का रुख अमेरिका से प्रभावित है। वाशिंगटन, यूएसएआईडी पहलों को रोकने और फिर से शुरू करने के दौरान बारगेन कर नेपाल के राजनीतिक और कूटनीतिक रुख को प्रभावित कर रहा है।
साथ ही, बांग्लादेश और चीन के साथ नेपाल के क्षेत्रीय कूटनीतिक जुड़ाव उसके रणनीतिक संबंधों में विविधता लाने के एक सुनियोजित प्रयास का संकेत देते हैं, जिसका उद्देश्य आंशिक रूप से भारत और चीन के क्षेत्रीय प्रभुत्व को संतुलित करना है।
ऐसा लगता है कि अमेरिका सामरिक रूप से अहम नेपाल में अपनी उपस्थिति को मजबूत कर रहा है और उसकी शह पर नेपाल लिपुलेख जैसी भारत से जुड़े विवाद पर आक्रामक रुख अपना रहा है।
नेपाल की बढ़ती बाहरी सहायता के विपरीत, जिसे संभवतः अमेरिकी कूटनीतिक और आर्थिक सहयोग से सुगम या प्रोत्साहित किया गया है, भारत द्विपक्षीय वार्ता के माध्यम से सीमा विवादों को सुलझाने पर जोर देता है।
नेपाल के लिपुलेख पर किए दावों को अमेरिका मजबूत कर रहा है, ताकि चीन, भारत और नेपाल से जुड़े इस सीमा क्षेत्र को विवादित बनाया जा सके और भारत-नेपाल संबंधों को तनावपूर्ण बनाया जा सके।
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