चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में एक बड़ा दावा किया है। आयोग ने एक हलफनामा दायर कर कहा है कि किसी भी चुनाव से पहले मतदाता सूचियों में सुधार (Revision) करने का पूरा अधिकार सिर्फ EC के पास है। यह चाहे विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) हो या सामान्य पुनरीक्षण, इसका निर्णय चुनाव आयोग ही करेगा, कोई और नहीं। आयोग ने कहा कि अगर कोर्ट इस मामले में दखल देता है तो यह उसकी कानूनी शक्तियों का उल्लंघन होगा।
क्यों दाखिल किया गया हलफनामा?
यह हलफनामा (Affidavit) सुप्रीम कोर्ट में एडवोकेट अश्विनी उपाध्याय की एक जनहित याचिका (PIL) के जवाब में दायर किया गया है। उपाध्याय ने अपनी याचिका में सुप्रीम कोर्ट से माँग की थी कि वह चुनाव आयोग को सभी राज्यों में, खासकर जहाँ बांग्लादेशी घुसपैठ ज्यादा होती है, नियमित रूप से मतदाता सूचियों में सुधार करने का निर्देश दे।
इसके जवाब में चुनाव आयोग ने कहा कि समय-समय पर मतदाता सूची में सुधार करने का अधिकार सिर्फ उसके पास है और इस मामले में कोर्ट का कोई भी निर्देश उसकी विशेष शक्तियों में दखल होगा। आयोग ने बताया कि मतदाता सूचियों में सुधार करना उसका दायित्व है और यह हर आम चुनाव, विधानसभा चुनाव या उपचुनाव से पहले पूरा किया जाता है।
मतदाता सूची में सुधार का अधिकार और कानून
चुनाव आयोग ने अपने हलफनामे में लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21 और मतदाता पंजीकरण नियम, 1960 के नियम 25 का हवाला दिया। आयोग ने कहा कि इन नियमों के तहत, उसे यह तय करने का पूरा अधिकार है कि वोटर लिस्ट में गहन या सामान्य सुधार कब और कैसे किया जाए।
आयोग ने यह भी बताया कि 1 जुलाई 2025 को उसने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य चुनाव अधिकारियों को वोटर लिस्ट में सुधार की तैयारी शुरू करने का निर्देश दिया है, जिसमें 1 जनवरी 2026 को कट-ऑफ तारीख माना गया है।
आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि वह वोटर लिस्ट की शुद्धता और अखंडता बनाए रखने के अपने दायित्व को लेकर पूरी तरह से जागरूक है और इस दिशा में लगातार काम कर रहा है।
चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट से यह भी कहा कि उसकी याचिका खारिज की जाए, क्योंकि नियमित समय-समय पर वोटर लिस्ट में सुधार करने का निर्देश देना उसके अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन होगा।


