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दिल्ली के हिंदू विरोधी दंगों में अतहर खान, शादाब अहमद, अब्दुल खालिद सैफी, सलीम खान को भी नहीं मिली जमानत, प्रोटेस्ट साइट्स बनाने में थे शामिल: पढ़ें – HC ने क्या कहा

दिल्ली हाई कोर्ट ने मंगलवार (2 सितंबर 2025) को दिल्ली में हुए हिंदू विरोधी दंगों के आरोपितों अतहर खान, शादाब अहमद, अब्दुल खालिद सैफी और सलीम खान की जमानत याचिकाएँ खारिज कर दीं। कोर्ट ने कहा कि पहली नजर में ऐसा लगता है कि इन चारों आरोपितों (अपीलकर्ताओं) ने दंगों की साजिश में सक्रिय भूमिका निभाई।

प्रदर्शन स्थलों के निर्माण में शामिल थे आरोपित

जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस शालिंदर कौर की बेंच ने अपने आदेश में कहा कि आरोपित दिल्ली में कई जगहों जैसे खुरेजी, चाँद बाग, करावल नगर, करदम नगर और निजामुद्दीन में प्रदर्शन स्थल बनाने में शामिल थे। इसके अलावा उन्होंने लाठी, टूटे शीशे, तेजाब, रॉड आदि का इस्तेमाल करके हिंसा को बढ़ाने की योजना बनाई।

दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश का स्क्रीनशॉट

अभियोजन पक्ष के सबूतों और गवाहों के बयानों की समीक्षा के बाद कोर्ट ने कहा कि पहली नजर में सबूत हैं कि आरोपितों ने कई बैठकों में हिस्सा लिया, जहाँ उन्होंने पुलिस और गैर-मुस्लिमों के खिलाफ हिंसा की साजिश रची।

अतहर खान और शादाब खान ने तोड़े सीसीटीवी कैमरे

हाई कोर्ट के मुताबिक, अतहर खान और शादाब खान ने सरकारी सीसीटीवी कैमरों को तोड़ने या ढकने का फैसला किया ताकि वे बिना डर के काम कर सकें। सीसीटीवी कैमरे तोड़ने के निर्देश सलीम खान और एक अन्य सह-आरोपी सलीम मलिक को भी दिए गए। सलीम खान को एक सीसीटीवी फुटेज में लाठी जैसे सामान से कैमरा हटाते हुए देखा गया।

दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश का स्क्रीनशॉट

अब्दुल खालिद सैफी ने प्रदर्शनों के लिए फंड जुटाए

कोर्ट ने कहा कि अब्दुल खालिद सैफी कई व्हाट्सएप ग्रुप और साजिश भरी बैठकों का हिस्सा था। उसने बंदूकें जुटाने और प्रोटेस्ट वाली जगहों को मैनेज करने के लिए फंड इकट्ठा किया। कोर्ट ने सबूतों और गवाहों के बयानों का विस्तार से परीक्षण करने से बचते हुए कहा कि हिंदू विरोधी दंगों की साजिश में शामिल इन चारों आरोपितों समेत सभी लोगों को साजिश को आगे बढ़ाने के लिए खास भूमिकाएँ दी गई थीं।

दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश का स्क्रीनशॉट

कोर्ट ने कहा, “जमानत याचिका पर विचार के दौरान अभियोजन पक्ष के सबूतों की खूबियों या खामियों में जाना कानूनन सही नहीं है, यह केवल ट्रायल के दौरान परखा जा सकता है।”

आरोपितों के खिलाफ कई FIR को कोर्ट ने अलग माना

आरोपित सलीम खान ने दावा किया कि उनके खिलाफ एक ही सबूत और कहानी के आधार पर कई FIR में कार्रवाई हो रही है। कोर्ट ने इसे खारिज करते हुए कहा कि अलग-अलग FIR अलग आधार पर हैं और इस मामले की FIR एक बड़ी साजिश से जुड़ी है।

समानता का दावा कोर्ट ने किया खारिज

आरोपितों ने दावा किया कि उन्हें अन्य आरोपितों जैसे देवांगना कलिता, नताशा नरवाल और आसिफ इकबाल तन्हा के समान माना जाए, जिन्हें हाई कोर्ट से जमानत मिली थी। कोर्ट ने कहा कि इन अपीलकर्ताओं की भूमिका उन सह-आरोपितों से अलग है, जिन्हें जमानत दी गई थी। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा, “हमारे सावधानीपूर्वक विचार के बाद तथ्यों और परिस्थितियों को मद्देनजर रखते हुए ये अपीलें खारिज की जाती हैं।”

गौरतलब है कि दिल्ली में 2020 की फरवरी में हिंदू विरोधी दंगे भड़क उठे थे। ये दंगे CAA और NRC को लेकर शुरू हुए विवाद के बाद भड़के। शरजील इमाम और उमर खालिद, गुलफिशा फातिमा जैसे लोग शामिल थे। आरोप है कि उनके उकसावे से दंगे हुए। इस मामले में UAPA के तहत कार्रवाई हुई और अब कोर्ट इसकी जाँच कर रही है। फिलहाल आरोपितों की जमानत याचिका खारिज कर दी गई है।

मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में अदिति ने लिखी है, इस लिंक पर क्लिक कर विस्तार से पढ़ सकते है।

फर्जी बिल बनाए, हिंदू विरोधी दंगों में शामिल… जामिया मिल्लिया के शिफा-उर-रहमान और RJD के यूथ लीडर मीरान हैदर को भी नहीं मिली जमानत: पढ़ें – दिल्ली HC ने क्या कहा

दिल्ली हाई कोर्ट ने मंगलवार (2 सितंबर 2025) को जामिया मिलिया इस्लामिया के Alumni Association के अध्यक्ष शिफा-उर-रहमान और जामिया के पीएचडी स्कॉलर और आरजेडी यूथ लीडर मीरान हैदर की जमानत याचिकाएँ खारिज कर दीं। दोनों पर 2020 के दिल्ली हिंदू विरोधी दंगों की बड़ी साजिश में शामिल होने का आरोप है।

जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस शालिंदर कौर की बेंच ने आदेश दिया। कोर्ट ने कहा कि दोनों के खिलाफ आरोप बहुत गंभीर हैं, खासकर फंड जुटाने, प्रदर्शन आयोजित करने और साजिश के मुख्य लोगों से नजदीकी की बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

शिफा-उर-रहमान के खिलाफ आरोप बेहद गंभीर

पुलिस का कहना है कि शिफा-उर-रहमान ने Alumni Association के अध्यक्ष के तौर पर गलत तरीके से पैसा जुटाया। जाँच में पता चला कि करीब 8.90 लाख रुपये प्रदर्शन स्थलों के लिए इस्तेमाल हुए और खर्च छिपाने के लिए फर्जी बिल बनाए गए।

पुलिस ने कहा कि रहमान ने महिलाओं और बच्चों को प्रदर्शन में लाने के लिए पैसे बाँटे ताकि पुलिस कार्रवाई न करे। 28 अप्रैल 2020 को Alumni Association के ऑफिस से फर्जी बिल बरामद हुए, जिसमें 7-8 लाख रुपये नकद मिलने की बात सामने आई। रहमान ने कहा कि वे अपने बड़े परिवार के इकलौते कमाने वाले हैं, लेकिन कोर्ट ने कहा कि सबूतों से उनकी साजिश में शामिल होने की बात गंभीर है।

बेंच ने कहा, “हमने गवाहों के बयान और सबूत देखे। अभियोजन का कहना है कि शिफा-उर-रहमान और मीरान हैदर ने साजिश में अपनी-अपनी भूमिका निभाई। दोनों दिल्ली में कई प्रदर्शन स्थलों को मैनेज कर रहे थे और जामिया Alumni Association ऑफिस व अन्य जगहों पर जामिया कोऑर्डिनेशन कमेटी की बैठकों में शामिल थे।”

दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश का हिस्सा

कोर्ट ने माना कि पैसा दंगों और सीएए-एनआरसी विरोधी प्रदर्शनों को चलाने के लिए था और इसके लिए फर्जी बिल बनाए गए।

मीरान हैदर ने दंगों और प्रदर्शनों पर 2.33 लाख रुपए खर्च किए

मीरान हैदर पर भी साजिश में शामिल होने का आरोप है। उन पर प्रदर्शन स्थलों के लिए बड़ी रकम जुटाने और खर्च करने का इल्जाम है। अभियोजन के मुताबिक, हैदर ने Alumni Association को पैसा दिया, जहाँ जामिया कोऑर्डिनेशन कमेटी की कई बैठकें हुईं।

दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा, “मीरान हैदर ने दंगों और प्रदर्शन स्थलों पर 2.33 लाख रुपए खर्च किए। शिफा-उर-रहमान ने Alumni Association के अध्यक्ष के तौर पर अहम भूमिका निभाई। दोनों ने साजिश को आगे बढ़ाने के लिए पैसा जुटाया।” कोर्ट ने यह भी कहा कि हैदर ने मुख्य आरोपित उमर खालिद के कहने पर भड़काऊ भाषण दिए।

आरोपितों के वकील के तर्क खारिज

दोनों आरोपितों ने मानवीय और कानूनी आधार पर जमानत माँगी। शिफा-उर-रहमान के वकील ने कहा कि वे अपनी बूढ़ी माँ, दिव्यांग भाई, दो अविवाहित बहनों, पत्नी और दो बच्चों के इकलौते कमाने वाले हैं। उनकी लंबी हिरासत से परिवार को मुश्किल हो रही है।

वकीलों ने यह भी कहा कि उनके खिलाफ यूएपीए के तहत ‘आतंकी कृत्य’ या ‘साजिश’ का मामला नहीं बनता, क्योंकि कोई हथियार नहीं मिला, चार्जशीट फाइल नहीं हुई और आसिफ इकबाल तन्हा, देवांगना कलिता, नताशा नरवाल जैसे अन्य आरोपियों को जमानत मिल चुकी है। लेकिन कोर्ट ने इन दलीलों को नहीं माना। कोर्ट ने कहा कि शिफा और मीरान की साजिश में फंड जुटाने की भूमिका थी, जो दूसरों से अलग थी।

कोर्ट ने कहा, “हमारा मानना है कि शिफा-उर-रहमान ने Alumni Association के अध्यक्ष के तौर पर अपनी पोजीशन का गलत इस्तेमाल किया, जिसकी संभावना को अभी खारिज नहीं किया जा सकता। Alumni Association के ऑफिस से फर्जी बिल मिले और संगठन को 7-8 लाख रुपये नकद मिले। दोनों दिल्ली-एनसीआर में आठ से ज्यादा प्रदर्शन स्थलों के इंचार्ज थे। मीरान हैदर ने भी दंगों और प्रदर्शनों पर 2.33 लाख रुपये खर्च किए।”

हाई कोर्ट के आदेश का हिस्सा

कोर्ट ने कहा कि पहली नजर में शिफा-उर-रहमान और मीरान हैदर एक साथ मिलकर काम कर रहे थे और फंडिंग के आरोप इतने गंभीर हैं कि उन्हें अभी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

फंडिंग जुटाना गंभीर मामला, समानता का दावा खारिज

दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि शिफा और मीरान की साजिश में भूमिका दूसरों से अलग थी। वे फंड जुटाने वालों में थे, इसलिए उनकी तुलना जमानत पाने वाले अन्य आरोपितों से नहीं की जा सकती।

साल 2020 के दिल्ली हिंदू विरोधी दंगे 23 से 26 फरवरी को उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए, जिसमें 53 लोग मारे गए और 200 से ज्यादा घायल हुए। इस्लामिक भीड़ ने सीएए के खिलाफ प्रदर्शन की आड़ में हिंदुओं पर हमला किया। ये दंगे अचानक नहीं हुए, बल्कि पहले से प्लान की गई साजिश का नतीजा थे। दिल्ली पुलिस के एक हेड कांस्टेबल और इंटेलिजेंस ब्यूरो के एक कांस्टेबल की हत्या हुई।

दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने FIR 59/2020 दर्ज की, जिसमें कई लोगों के नाम हैं। शिफा उर-रहमान और मीरान हैदर पर यूएपीए और आपराधिक साजिश, दुश्मनी फैलाने, दंगा करने, हत्या जैसे भारतीय दंड संहिता के तहत आरोप हैं। उनके अलावा उमर खालिद, शरजील इमाम, ताहिर हुसैन, खालिद सैफी, इशरत जहाँ, गुलफिशा फातिमा जैसे 17 लोग भी इस मामले में आरोपित हैं।

मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में शृति सागर ने लिखी है, इस लिंक पर क्लिक कर विस्तार से पढ़ सकते है।

शाहरुख खान की बेटी सुहाना ने किसान बन कर खरीदी करोड़ों की जमीन, बिना इजाजत लेन-देन की होगी जाँच: जानें – भारत में खेती की जमीन को खरीदने के क्या हैं नियम

बॉलीवुड स्टार शाहरुख खान की बेटी और उभरती हुई अभिनेत्री सुहाना खान हाल ही में महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले में एक जमीन की खरीद को लेकर विवादों में आ गई हैं। उन्होंने 30 मई 2023 को अलीबाग के थल गाँव में एक कृषि भूमि (agricultural land) खरीदी, जिसकी कीमत लगभग 12.91 करोड़ थी। यह जमीन मुंबई के खोटे परिवार (कफ परेड निवासी) से खरीदी गई थी और 77.46 लाख की स्टाम्प ड्यूटी भी भरी गई।

मामला इस बात को लेकर उठ रहा है कि क्या जमीन खरीदते समय सभी जरूरी कानूनी अनुमति और दस्तावेज पूरे किए गए थे या नहीं। महाराष्ट्र में कृषि भूमि केवल उन्हीं लोगों को बेची जा सकती है, जो किसान माने जाते हैं। अब अलीबाग के तहसीलदार से इस जमीन की जाँच कर रिपोर्ट माँगी गई है, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि नियमों का पालन हुआ या नहीं।

भारत में कृषि भूमि खरीदने के क्या हैं नियम

भारत में कृषि भूमि खरीदने के नियम अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग हैं। कुछ राज्यों में नियम सख्त हैं, जबकि कुछ राज्यों में यह आसान होता है। किसी व्यक्ति के पास पहले से कृषि भूमि होनी चाहिए। इसका रिकॉर्ड 7/12 उतरा (जिसे 7/12 एक्सट्रैक्ट या नकाशा भी कहते हैं) जैसे दस्तावेजों में होना चाहिए।

कुछ राज्यों में आप ‘किसान प्रमाण पत्र’ भी बना सकते हैं। यह प्रमाण पत्र स्थानीय राजस्व विभाग से मिलता है, जिसके लिए पहचान पत्र और जमीन से जुड़े दस्तावेज देने होते हैं। कई बार अगर परिवार में कोई सदस्य किसान है, तो उस आधार पर भी कृषि भूमि खरीदी जा सकती है।

कौन नहीं खरीद सकता?

कई राज्यों में गैर-किसानों को कृषि भूमि खरीदने की अनुमति नहीं होती, जब तक वे किसान का दर्जा साबित न करें। वहीं कुछ राज्यों में यह जरूरी होता है कि खरीदार स्थानीय निवासी हो या राज्य सरकार से विशेष अनुमति ले।

जहाँ एक तरफ तमिलनाडु में केवल वे किसान, जिनके पास वैध कृषि की कमाई का सबूत है, वे ही कृषि भूमि खरीद सकते हैं। गैर-किसानों को इसके लिए विशेष सरकारी मंजूरी की जरूरत होती है। वहीं महाराष्ट्र में इसके लिए सख्त नियम हैं। केवल किसान ही कृषि भूमि खरीद सकते हैं।

जमीन खरीदने के लिए जरूरी दस्तावेजों में टाइटल डीड (Title Deed) होना अति आवश्यक होता है। यह जमीन पर मालिकाना हक साबित करता है। दूसरा जरूरी दस्तावेज सेल एग्रीमेंट (Sale Agreement) है, जो सौदे की शर्तें बताता है। वहीं स्टाम्प ड्यूटी और रजिस्ट्रेशन, सौदे को कानूनी रूप से मान्यता देते हैं।

अहम दस्तावेजों में शामिल टैक्स रसीदें, यह दिखाती हैं कि जमीन पर कोई बकाया नहीं है। एनकम्ब्रेंस सर्टिफिकेट (Encumbrance Certificate) यह प्रमाणित करता है कि जमीन पर कोई कानूनी या वित्तीय झगड़ा नहीं है।

भूमि मापन प्रमाणपत्र (Land Measurement Certificate) जमीन का सही आकार दर्शाता है। वही पॉवर ऑफ अटॉर्नी (अगर लागू हो) तब जरूरी होता है, जब कोई व्यक्ति किसी और की ओर से सौदा कर रहा हो।

बात करें टैक्स की तो कृषि आय भारत में आम तौर पर इनकम टैक्स से मुक्त है। ग्रामीण कृषि भूमि की बिक्री पर कैपिटल गेन टैक्स नहीं लगता (अगर वह नगरपालिका क्षेत्र से बाहर है)। वहीं शहरी कृषि भूमि पर टैक्स से छूट Section 54B के तहत मिलती है, अगर बिक्री की राशि से दो साल के भीतर फिर से कृषि भूमि खरीदी जाए।

सुहाना खान के मामले में जाँच इस बात की हो रही है कि क्या कृषि भूमि खरीदने के सभी कानूनी नियमों का सही से पालन किया गया था या नहीं। यह मामला एक बार फिर यह सवाल उठाता है कि भारत में कृषि भूमि खरीदने से पहले नियमों को अच्छी तरह से समझना और आवश्यक कानूनी दस्तावेज तैयार करना कितना जरूरी है।

मौत का सौदागर से मोदी माद@#द तक, लिबरल-इस्लामी गैंग की घृणा से निकली 111वीं गाली: बंद से कॉन्ग्रेस-RJD के पाप का ‘पश्चाताप’ करेगा बिहार

पीएम मोदी को अपने राजनीतिक करियर में अब तक 111वीं गाली पड़ चुकी है। बिहार के दरभंगा में कॉन्ग्रेस-आरजेडी के मंच से उनकी माँ को गाली दी गई। इस पर पीएम मोदी भावुक भी नजर आए। गालियों की इस फेहरिस्त की शुरुआत कॉन्ग्रेस नेता सोनिया गाँधी की ‘मौत के सौदागर’ से शुरू होती है।

पीएम मोदी की माँ हीराबेन मोदी को गाली दिए जाने के मुद्दे पर एनडीए ने 4 सितंबर को ‘बिहार बंद’ का ऐलान किया है। सुबह 7 बजे से दोपहर 12 बजे तक यानी 5 घंटे के लिए ये बंद बुलाया गया है। बंद के दौरान अस्पताल, एंबुलेंस जैसी इमरजेंसी सेवाएँ चालू रहेंगी। एनडीए का कहना है कि ये विरोध लोकतंत्र की गरिमा बचाने के लिए है।

दरअसल दरभंगा में आरजेडी-कॉन्ग्रेस के मंच से पीएम मोदी की माँ को गाली दी गई थी। राहुल गाँधी की वोटर अधिकार यात्रा के दौरान कुछ कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं ने मंच से पीएम और उनकी माँ के खिलाफ अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया। इसका वीडियो वायरल हो गया था। मंच पर राहुल गाँधी, प्रियंका गाँधी और तेजस्वी यादव के पोस्टर लगे थे। गाली देने वाले शख्स मोहम्मद रिजवी उर्फ राजा को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है।

पीएम मोदी ने चीन दौरे से लौटने के बाद सार्वजनिक तौर पर इस पर दुख जताते हुए भावुक नजर आए। उन्होंने कहा, “माँ के अपमान के लिए मैं आरजेडी-कॉन्ग्रेस को क्षमा कर सकता हूँ, लेकिन बिहार की जनता कभी माफ नहीं करेगी।” पीएम मोदी ने कहा कि बिहार में आरजेडी-कॉन्ग्रेस के मंच से मेरी माँ को गालियाँ दी गईं। ये गालियाँ सिर्फ मेरी माँ का अपमान नहीं है। ये देश की माँ-बहन-बेटी का अपमान है।

पीएम मोदी को पड़ी 111 गालियाँ

ये कोई पहला मामला नहीं है, जब पीएम मोदी को कॉन्ग्रेस ने गाली दी हो। एनडीटीवी के मुताबिक, ‘मौत का सौदागर’ से लेकर ‘माँ की गाली’ तक पीएम मोदी को 111वीं बार गाली दी गई है। बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने सितंबर 2024 में कॉन्ग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को उस वक्त तक दी गई गालियों और अपमानजनक शब्दों की सूची उन्हें पकड़ाई थी।

इनमें ‘मौत का सौदागर’, ‘मोदी तेरी कब्र खुदेगी’, ‘नीच’, ‘कमीना’, ‘ज़हरीला सांप’, ‘बिच्छु’, ‘चूहा’, ‘रावण’, ‘भस्मासुर’,‘नालायक’,‘कुत्ते की मौत मरेगा’,‘मोदी को ज़मीन में गाड़ देंगे’, ‘राक्षस’, ‘दुष्ट’, ‘कातिल’, ‘हिंदू जिन्ना’, ‘जनरल डायर’,‘जेबकतरा’, ‘गंदी नाली का कीड़ा’, ‘काला अंग्रेज़’,‘कायर’, ‘औरंगज़ेब का आधुनिक अवतार’,‘दुर्योधन’,‘हिंदू आतंकवादी’,‘गदहा’, ‘नामर्द’, ‘चौकीदार चोर है’,‘तुगलक’, ‘मोदी की बोटी-बोटी काट देंगे’,‘साला मोदी’,‘नमक हराम’, ‘गंवार’,‘निकम्मा’ ‘पागल कुत्ता’, ‘भष्मासूर’ शामिल हैं।

सोनिया गाँधी ने कहा था ‘मौत का सौदागर’

पीएम मोदी को अपशब्द करने की शुरुआत कॉन्ग्रेस नेता सोनिया गाँधी ने शुरू की थी। 2007 के गुजरात विधानसभा चुनाव के दौरान उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को ‘झूठे, बेईमान और मौत का सौदागर’ कहा था। इसके बाद गुजरात की जनता ने नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में लड़ रही बीजेपी को 182 में से 117 सीटें देकर इस गाली का जवाब दिया था।

लोकसभा चुनाव 2014 के दौरान पड़ी गालियाँ

2014 के लोकसभा चुनाव से पहले कॉन्ग्रेस नेताओं में पहली बार केन्द्र की राजनीति में आए नरेन्द्र मोदी को गाली देने की जैसे प्रतियोगिता ही लग गई। कॉन्ग्रेस नेता बेनी प्रसाद वर्मा ने मोदी को ‘पागल कुत्ता’ कहा, वहीं गुलाम नबी आजाद ने गंगूतेली कह कर संबोधित किया। जयराम रमेश ने ‘भस्मासुर’, रेणुका चौधरी ने ‘वायरस’, सलमान खुर्शीद ने ‘बंदर’, संजय निरुपम ने ‘अनपढ़-गंवार’ तो जिग्नेश मेवाणी ने ‘नमक हराम’ कहा था। इमरान मसूद ने ‘ बोटी-बोटी काट देंगे’ कहा।

‘नीच आदमी’ से लेकर ‘चायवाला’ तक

2017 गुजरात विधानसभा चुनाव के दौरान मणिशंकर अय्यर ने पीएम मोदी को ‘नीच आदमी’ कहा था। इससे पहले उन्होंने ‘चायवाला’ भी कहा था। मणिशंकर अय्यर ने ‘चाय बेचने’ को लेकर तंज कसते हुए कहा था कि कॉन्ग्रेस मुख्यालय के सामने टपरी खुलवा देंगे।

राहुल गाँधी ने कहा ‘चौकीदार चोर है।’

2019 के लोकसभा चुनाव से पहले राहुल गाँधी ने रफाल सौदे को लेकर पीएम मोदी को ‘चौकीदार चोर है’ कहना शुरू किया। इस दौरान अधीर रंजन चौधरी ने ‘गंदी नाली का कीड़ा’ कहा था. यहाँ तक कि मल्लिकार्जुन खरगे ने भी पीएम मोदी की तुलना ‘रावण’ से की थी।

बिहार में ‘वोट चोर’ और माँ को दी गाली

बिहार विधानसभा चुनाव में दमखम लगा रहे राहुल गाँधी ने पीएम मोदी को ‘वोट चोर’ कहा। हर मंच, हर रैली में ‘वोट चोर’ का नारा बुलंद कर रही कॉन्ग्रेस अब मोदी की माँ को गाली देने पर उतर आई है। इसका जवाब तो विधानसभा चुनाव में बिहार की जनता देगी।

एसिड, मिर्च पाउडर… पिंजरा तोड़ की फातिमा खातून ने हिंदू विरोधी दंगों के लिए जुटाए ‘हथियार’, ताहिर हुसैन का लगा पैसा: जानिए- दिल्ली HC ने क्यों नहीं दी जमानत

दिल्ली हाई कोर्ट ने साल 2020 के हिंदू विरोधी दंगों के मामले में उमर खालिद – शरजील इमाम समेत 9 आरोपितों की जमानत याचिका खारिज कर दी। इनमें एक नाम गुलफिशा फातिमा का भी है, जिसे गुल या गुलफिशा खातून के नाम से भी जाना जाता है। इस मामले में गुलफिशा फातिमा की तरफ से वकीलों ने जमानत के लिए पूरा जोर लगा दिया, लेकिन हाई कोर्ट ने उनकी दलीलों को खारिज कर दिया।

दिल्ली हाई कोर्ट ने पाया कि गुलफिशा फातिमा एक ऐसे गिरोह का हिस्सा थी और मुख्य षड़यंत्रकारी भी, जो शासकीय व्यवस्था को ठप कर अव्यवस्था और हिंसा फैलाने में जुटा था। दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले की कॉपी ऑपइंडिया के पास मौजूद है, जिसके आधार पर गुलफिशा फातिमा के सारे कारनामों को आपके सामने रखा जा रहा है।

दिल्ली 2020 के हिंदू विरोधी दंगों में गुलफिशा फातिमा मुख्य आरोपितों में से एक है। जिस केस में उसकी जमानत याचिका खारिज हुई, उसका FIR नंबर 59/2020 है। ये केस मार्च 2020 में दिल्ली क्राइम ब्रांच में दर्ज हुआ था। ये मामला फरवरी 2020 का है, जब दिल्ली में CAA (सिटीजनशिप अमेंडमेंट एक्ट) और NRC (नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजन) के खिलाफ प्रोटेस्ट चल रहे थे। प्रॉसिक्यूशन (सरकार की तरफ से) का कहना है कि ये दंगे एक बड़ी साजिश का हिस्सा थे, जिसमें कई लोग शामिल थे और गुलफिशा भी उनमें से एक हैं।

कौन है गुलफिशा फातिमा, जो महिलाओं-बच्चों को बना रही थी हिंसा का हथियार

गुलफिशा फातिमा (उर्फ गुल उर्फ गुलफिशा खातून) दिल्ली के सीलमपुर इलाके की रहने वाली है। वो 26 साल की थी, जब उसे गिरफ्तार किया गया। पुलिस का आरोप है कि वो दंगों की साजिश में सक्रिय थी। वो पिंजरा तोड़ ग्रुप से जुड़ी हुई बताई जाती हैं, जो महिलाओं के अधिकारों के लिए काम करता है। पुलिस कहती है कि गुलफिशा ने प्रोटेस्ट साइट्स को मैनेज किया, मीटिंग्स में हिस्सा लिया और हिंसा भड़काने में मदद की। उसे अप्रैल 2020 में गिरफ्तार किया गया और तब से वो जेल में हैं – अब 5 साल हो चुके हैं।

दिल्ली हाईकोर्ट ने 2 सितंबर 2025 को उनके बेल की अपील खारिज कर दी। ये जजमेंट (CRL.A. 211/2022) पेज 120 से शुरू होता है, जहाँ कोर्ट ने गुलफिशा के रोल पर चर्चा की।

दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले की कॉपी

प्रॉसिक्यूशन ने क्या कहा और कोर्ट ने क्या देखा

दिल्ली हाई कोर्ट ने गुलफिशा के केस पर पेज 120 से 130 तक चर्चा की। प्रॉसिक्यूशन का कहना है कि गुलफिशा साजिश का एक्टिव पार्ट थीं। उन्होंने सीलमपुर-जाफराबाद में प्रोटेस्ट साइट्स को मैनेज किया, जहाँ उनका घर पास में है। 15 जनवरी 2020 को उन्होंने मदीना मस्जिद में 24×7 प्रोटेस्ट शुरू किया। उसके साथ DPSG (दिल्ली प्रोटेस्ट सपोर्ट ग्रुप) की मेंबर नताशा नरवाल और देवांगना कलिता भी थी। इस दौरान गुलफिशा ने फ्रूट मार्केट, गली अखाड़े वाली जैसी जगहों पर और प्रोटेस्ट साइट्स बनाईं।

सरकारी वकील ने बताया कि गुलफिशा पिंजरा तोड़ की मेंबर हैं और लोकल लेवल पर लोगों को मोबिलाइज किया। पिंजरा तोड़ का ऑफिस E-1/13, सीलमपुर में था, जहाँ मीटिंग्स होती थीं। गुलफिशा ने ‘वारियर्स’ (26 दिसंबर 2019) और ‘औरतों का इंकलाब’ व्हाट्सऐप ग्रुप बनाए, जहाँ प्रोटेस्ट की प्लानिंग होती थी। 23 जनवरी 2020 को पिंजरा तोड़ ऑफिस में मीटिंग हुई, जहाँ उमर खालिद ने लाल मिर्च पाउडर, एसिड, बोतलें, डंडे जमा करने के निर्देश दिए और गुलफिशा ने वो इकट्ठा किए।

16-17 फरवरी 2020 की रात चाँद बाग में एक और मीटिंग हुई। यहाँ गुलफिशा अथर खान, शादाब अहमद, नताशा, देवांगना और दूसरे के साथ थी। प्रॉसिक्यूशन ने कोर्ट को बताया कि यहाँ चक्का जाम का प्लान बना और अमेरिकी प्रेसिडेंट की विजिट के दौरान हिंसा फैलाने की साजिश रची गई।

गुलफिशा ने कोड वर्ड्स इस्तेमाल किए – ‘कल ईद है’ मतलब रोड ब्लॉक करो, ‘आज चाँद रात है’ मतलब ब्लॉकेज का दिन। गवाह ब्रावो ने कोर्ट में कहा कि मीटिंग में हिंसा भड़काने के तरीके पर चर्चा हुई और गुलफिशा ने इसमें एक्टिव रोल निभाया। कोर्ट ने इन बयानों को प्राइमा फेसी सही माना।

दंगाइयों ने बनाए थे कोड वर्ड्स

प्रॉसिक्यूशन ने कहा कि गुलफिशा ने स्पीच दीं और स्पीकर्स चुने। 22 फरवरी 2020 को जाफराबाद मेट्रो स्टेशन के नीचे रोड ब्लॉक किया और महिलाओं को पुलिस पर हमला करने के लिए उकसाया, जिसके लिए FIR 48/2020 दर्ज हुई। 23 फरवरी को 300 महिलाओं को मोबिलाइज किया और लाल मिर्च, पत्थर, डंडों से पुलिस पर हमला करवाया। साथ ही ताहिर हुसैन से दंगों के लिए फंड लिए गए।

दिल्ली हाई कोर्ट (जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस शालिंदर कौर की बेंच) ने कहा कि प्रॉसिक्यूशन के आरोप प्राइमा फेसी (पहली नजर में) सही लगते हैं। कोर्ट ने गवाहों के बयानों (बेटा, गामा, आर्गन, जूपिटर, इको, स्मिथ, ब्रावो, जोनी, हेलियम, सैटर्न, डेल्टा, सिएरा) को देखा, जो गुलफिशा के रोल को सपोर्ट करते हैं।

कोर्ट ने कहा, “हमने साजिश पर पहले ही चर्चा की है… गुलफिशा के खिलाफ आरोपों को देखते हुए बेल नहीं दी जा सकती।”

कोर्ट ने सभी गवाहों की गवाही, घटनाक्रम को ध्यान में रखते हुए ट्रायल कोर्ट के फैसले को रखा बरकरार

साजिश में पैसों का भी रोल था। कोर्ट के मुताबिक, गुलफिशा ने ताहिर हुसैन से फंड्स लिए, जो दंगों में इस्तेमाल हुए। गवाह सैटर्न ने कहा कि ताहिर हुसैन सीलमपुर प्रोटेस्ट साइट पर आया और गुलफिशा को नोटों का बंडल दिया। ये पैसा अवैध काम के लिए था। कोर्ट ने ये आरोप प्राइमा फेसी सही पाया।

ताहिर हुसैन से पैसे लिए

गुलफिशा ने लोकल लेवल पर मॉबलाइजेशन किया, महिलाओं को ट्रेन किया और साजिश को अमल में लाया। कोर्ट कहता है कि ये सब एक बड़ी प्लानिंग का हिस्सा था, जो दिसंबर 2019 से शुरू हुई थी – MSJ, DPSG, JCC, JACT, SOJ जैसे ग्रुप्स बनाए गए, 24×7 प्रोटेस्ट साइट्स सेटअप किए गए। गुलफिशा इन सबकी लोकल मैनेजर थी।

कोर्ट ने पैरिटी (दूसरों से तुलना) को खारिज किया, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने पहले कहा था कि नताशा और देवांगना को बेल प्रेसिडेंट नहीं माना जाएगा। कोर्ट ने देखा कि गुलफिशा का रोल गंभीर है – प्रोटेस्ट मैनेजमेंट, मीटिंग्स, फंडिंग। उन्होंने UAPA की सेक्शन 43D(5) का बार लगाया। यहाँ दिल्ली हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को सही माना और जमानत याचिका खारिज कर दी।

गौरतलब है कि दिल्ली में फरवरी 2020 में हिंदू विरोधी दंगे भड़के थे। दंगों में 54 लोग मारे गए। कोर्ट के मुताबिक, ये सब CAA और NRC के खिलाफ प्रोटेस्ट के नाम पर एक बड़ी साजिश का नतीजा था। इस साजिश की मुख्य किरदारों में उमर खालिद, शरजील इमाम के साथ गुलफिशा फातिमा भी थी, जिसे कोर्ट ने गुलफिशा खातून के नाम से भी लिखा है। ट्रायल कोर्ट ने उसकी जमानत खारिज की और हाईकोर्ट ने भी 2 सितंबर 2025 को अपील ठुकरा दी।

हिंदू, बौद्ध, जैन, पारसी… CAA में मोदी सरकार ने किया बड़ा बदलाव, पाकिस्तान-बांग्लादेश-अफगानिस्तान से 2024 तक आए धार्मिक अल्पसंख्यक भारत में रह सकेंगे

केंद्र सरकार ने एक बड़ा फैसला लेते हुए पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए उन अल्पसंख्यकों को बड़ी राहत दी है, जो धार्मिक उत्पीड़न के कारण भारत आए हैं। गृह मंत्रालय ने घोषणा की है कि जो हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई 31 दिसंबर 2024 तक भारत में शरण लेने आए हैं, उन्हें बिना पासपोर्ट या अन्य यात्रा दस्तावेजों के भी देश में रहने की अनुमति होगी।

यह फैसला नागरिकता (संशोधन) अधिनियम (CAA) के तहत आया है, जिसके अनुसार, 31 दिसंबर 2014 तक भारत आए इन समुदायों के लोगों को पहले ही नागरिकता देने का प्रावधान था। सरकार के इस नए कदम से उन हजारों लोगों को फायदा होगा, जो 2014 के बाद भारत आए थे और अपने भविष्य को लेकर चिंतित थे। अब उनके लिए स्थायी रूप से भारत में रहने का रास्ता खुल गया है।

CAA लागू करनी की वजह

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने लोकसभा चुनाव 2024 से पहले ही ऐलान कर दिया था कि नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, यानी CAA को जल्द ही लागू किया जाएगा। उन्होंने साफ कहा था कि यह कानून किसी भी भारतीय नागरिक के अधिकारों को नहीं छीनेगा, बल्कि यह उन लोगों को नागरिकता देगा जो धार्मिक उत्पीड़न के कारण भारत में शरण लेने आए हैं।

इस कानून का मकसद पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के प्रताड़ित अल्पसंख्यकों को भारत में सम्मानपूर्वक जीवन देना है।

बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर हुए थे अत्याचार, अब भारत में मिलेगी राहत

बांग्लादेश में पिछले कुछ समय से अल्पसंख्यकों पर अत्याचार की खबरें लगातार आती रही हैं। शेख हसीना की सत्ता जाने के बाद से वहाँ की हिंदू और बौद्ध आबादी पर हमले बढ़ गए थे। 19 सितंबर, 2024 को चटगाँव में हुई हिंसा में 200 से ज़्यादा घरों और दुकानों को जला दिया गया था।

वहाँ की युनूस सरकार इन घटनाओं को धार्मिक हिंसा मानने से इनकार कर रही थी, लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और ही थी। इन अत्याचारों से परेशान होकर कई लोग अपनी जान बचाने के लिए भारत में शरण लेने को मजबूर हुए थे। अब, भारत सरकार के इस फैसले के बाद, इन लोगों को उम्मीद की एक नई किरण मिली है कि उन्हें यहाँ सुरक्षा और एक बेहतर जीवन मिलेगा।

अफगानिस्तान में तालिबान की सत्ता के बाद अल्पसंख्यक पलायन को मजबूर

अफगानिस्तान में तालिबान के सत्ता में आने के बाद से वहाँ के हिंदू और सिख समुदायों की स्थिति बेहद खराब हो गई थी। इस्लामी चरमपंथ के कारण उनकी आबादी 2.5 लाख से घटकर सिर्फ 700 रह गई थी। मार्च 2024 में एक हमले में 25 सिखों की मौत हो गई थी, जिसके बाद कई परिवारों को अपनी जान बचाने के लिए मुल्क छोड़ना पड़ा था।

भारत ने इन लोगों को विशेष वीजा देकर शरण दी थी। उस समय वहाँ के अल्पसंख्यक नेताओं ने अफगानिस्तान सरकार से भी सुरक्षा की माँग की थी, लेकिन उन्हें कोई खास मदद नहीं मिल पाई थी। अब केंद्र सरकार के इस फैसले से ऐसे और लोगों को भारत में सुरक्षित ठिकाना मिल पाएगा।

पाकिस्तान में भी बदतर थी अल्पसंख्यकों की हालत, अब भारत में सुरक्षा मिलेगी

पाकिस्तान में भी धार्मिक अल्पसंख्यकों, खासकर हिंदुओं की स्थिति हमेशा से खराब रही है। वहाँ जबरन धर्म परिवर्तन और अपहरण के मामले आम हैं। हाल ही में 1000 अल्पसंख्यक लड़कियों का अपहरण कर जबरन धर्मांतरण कराया गया था, जिनकी उम्र महज 12 से 25 साल के बीच की थी। ऐसे कारनामों के बाद भी वहाँ के अपराधी खुलेआम घुमते थे, क्योंकि वहाँ का कोर्ट ने इसे अपनी मर्जी से इस्लाम कबूल करना बताया था।

इसके अलावा, 13 जुलाई 2025 को भी सिंध प्रांत में तीन नाबालिग हिंदू लड़कियों का अपहरण कर जबरन निकाह कराया गया था। और तो और सिंध प्रांत में ही चार भाई-बहनों के कंप्यूटर टीचर फरहान ने अपहरण कर जबरन धर्मांतरण कराया था। लेकिन वहाँ की मीडिया ने इस मसले को इस्लाम के हित में बताया। इन अत्याचारों से पीड़ित होकर बड़ी संख्या में लोग भारत आए थे। केंद्र सरकार के नए फैसले से इन लोगों को भी अब भारत में कानूनी रूप से रहने का अधिकार मिल जाएगा। यह फैसला उन सभी प्रताड़ित लोगों के लिए एक बड़ी उम्मीद है, जो अपने देशों में धार्मिक भेदभाव के कारण पीड़ित थे।

जाकर मोदी को बता देना… कहकर जिस TRF के आतंकियों ने पहलगाम में हिंदुओं को मारी गोली, मलेशिया के रास्ते उसकी फंडिंग: श्रीनगर के यासिर हयात के मोबाइल से मिला सुराग

नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (NIA) को 22 अप्रैल 2025 को हुए पहलगाम आतंकी हमले की जाँच में नए सुराग मिले हैं। इस हमले की जिम्मेदारी शुरू में द रेजिस्टेंस फ्रंट (TRF) नामक आतंकी संगठन ने ली थी, जो लश्कर-ए-तैयबा का मुखौटा संगठन माना जाता है, लेकिन बाद में इसने दावा वापस ले लिया।

जाँच के दौरान NIA को श्रीनगर के यासिर हयात नाम के एक व्यक्ति का मोबाइल मिला, जिसमें 450 से ज्यादा कॉन्टैक्ट्स थे। इसी मोबाइल की मदद से TRF को फंडिंग देने वालों की पहचान में मदद मिली। इन संपर्कों में कुछ लोग पहले से ही अन्य आतंकी मामलों में जाँच के घेरे में हैं।

NIA को संदेह है कि TRF को फंडिंग के लिए मलेशिया के रास्ते हवाला नेटवर्क का इस्तेमाल किया गया। जाँच में सजाद अहमद मीर नामक एक व्यक्ति का नाम सामने आया है, जो मलेशिया में रहता है। यासिर हयात की कॉल डिटेल्स से पता चला कि वह सजाद मीर से लगातार संपर्क में था और पैसे की व्यवस्था कर रहा था।

रिपोर्ट के अनुसार, हयात कई बार मलेशिया गया और मीर की मदद से करीब 9 लाख रुपए इकट्ठे किए, जो बाद में शफात वानी नामक TRF ऑपरेटिव को दिए गए। शफात वानी TRF का एक अहम सदस्य है और उसने भी मलेशिया की यात्रा की थी, लेकिन यह यात्रा ‘यूनिवर्सिटी कॉन्फ्रेंस’ के बहाने की गई थी, जबकि यूनिवर्सिटी ने ऐसी किसी स्पॉन्सरशिप की पुष्टि नहीं की।

NIA को यह भी पता चला कि हयात सिर्फ मीर से ही नहीं, बल्कि दो पाकिस्तानी नागरिकों से भी संपर्क में था। उसका मुख्य काम विदेशों से पैसे जुटाना और TRF के लिए फंडिंग की व्यवस्था करना था। NIA ने 13 अगस्त 2025 को बताया था कि उसे TRF की फंडिंग में विदेशी लिंक मिले हैं, जिसकी गहन जाँच की जा रही है।

TRF की स्थापना 2019 में हुई थी। पाकिस्तान और लश्कर-ए-तैयबा ने हिजबुल मुजाहिदीन की जगह एक नया ‘स्थानीय’ चेहरा देने के लिए इसे खड़ा किया था। इसका मकसद था कि कश्मीर में आतंक को स्थानीय आंदोलन की तरह पेश किया जाए और पाकिस्तान Financial Action Task Force (FATF) की निगरानी से बच सके।

भारत पहले ही TRF को आतंकी संगठन घोषित कर चुका है और पाकिस्तान पर इसे समर्थन देने का आरोप लगाता है। अब पहलगाम हमले के बाद अमेरिका ने भी TRF को ‘विदेशी आतंकी संगठन’ और ‘स्पेशली डेजिग्नेटेड ग्लोबल टेररिस्ट’ घोषित कर दिया, जो पाकिस्तान के लिए एक बड़ा झटका था। इससे पाकिस्तान की आतंक से जुड़े दोहरे रवैये का पर्दाफाश हुआ।

गौरतलब है कि भारत का भगोड़ा इस्लामिक प्रचारक जाकिर नाइक भी मलेशिया में ही है। जुलाई 2016 में बांग्लादेश के ढाका में बम धमाके के बाद जाकिर नाइक भारत से भाग गया था। इस धमाके में 29 लोगों की मौत हुई थी। हमले में शामिल आतंकियों ने कहा था कि वो नाइक के भाषणों से प्रभावित थे।

भारत में भगोड़ा घोषित होने के बाद से उसने मलेशिया में शरण ली हुई है। भारत सरकार मलेशिया की सरकार से उसके प्रत्यर्पण के लिए लगातार बातचीत कर रही है, लेकिन अभी तक उसका कोई परिणाम नहीं आया है।

1.19 करोड़ उद्योग, ₹3.68 लाख, 6% ही NPA… क्या है ECLGS जो ‘ट्रंप टैरिफ’ की हो सकती है काट, चुनौतियों से निपटने के लिए मोदी सरकार ने तैयार किए 4 प्लान

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 50 फीसदी टैरिफ भारत पर लाद दिया है। इसका असर निर्यातकों और लोगों की नौकरियों पर पड़ सकता है। इसको देखते हुए भारत सरकार कोरोना काल की तरह योजना बना कर बढ़ी हुई टैरिफ का मुकाबला करने की तैयारी कर रही है।

कोरोना काल में लॉकडाउन के दौरान जिस तरह की योजनाएँ लागू की गई थी, उसी तरह की योजनाएँ लागू कर लोगों को राहत दी जाएगी। इसके अलावा अमेरिका से इतर ग्लोबल बाजार तलाशने और सप्लाई चेन को लेकर रणनीति बनाई जा रही है।

नकदी बाजार में बनाए रखने पर जोर

हिन्दुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, अधिकारियों ने बताया है कि सरकार सबसे पहले नकदी की समस्या का समाधान निकालेगी। माना जा रहा है कि अमेरिकी टैरिफ की वजह से नकदी की दिक्कत, सामान पहुँचने में देरी, ऑर्डर रद्द होना जैसी समस्याएँ आ सकती हैं।

निर्यातकों को जब तक नई ग्लोबल बाजार नहीं मिलती है, तब तक राहत देना जरूरी है। इसके लिए सरकार तुरंत राहत देने के साथ-साथ चरणबद्ध तरीके से योजनाएं लागू करेगी ताकि लंबी अवधि की रणनीति भी तैयार हो सके। नकदी उपलब्ध कराने के अलावा, मौजूदा व्यापार समझौतों को मजबूत करना और नई मार्केट में अवसर तलाशने का काम भी तेजी से किया जाएगा।

राहत पैकेज का ऐलान कर सकती है सरकार

कोरोना लॉकडाउन के दौरान जिस तरह आम लोगों के साथ-साथ लघु और मध्यम उद्योगों के लिए स्कीम लाए गए थे, उन्हें फिर से दोहराया जा सकता है। सरकार इमरजैंसी क्रेडिट लाइन गारंटी स्कीम यानी ECLGS जैसी योजनाओं को लागू कर सकती है। इसके तहत उद्योगों को बगैर गारंटी के 100 फीसदी लोन उपलब्ध कराया जाएगा। सरकार का पूरा फोकस लघु और मध्यम उद्योगों पर है। इन्हें बचाने के लिए लॉकडाउन के 68 दिनों में ये स्कीम लागू किए गए थे। हालाँकि वर्तमान परिस्थितियों के हिसाब से इसमें कुछ बदलाव लाए जा सकते हैं। इसके अलावा लंबी अवधि की रणनीति तैयार की जा रही है, ताकि नकदी की उपलब्धता बनी रहे। दूसरे देशों से व्यापार समझौते को मजबूत करने और नए बाजार की तलाश का काम और तेज हो।

प्लान1: ECLGS योजना

सरकार जीएसटी रिफॉर्म कर छोटे और मझोले उद्योगों को कई तरह के राहत देने जा रही है। अधिकारियों ने मुताबिक घरेलू माँग की वजह से भारतीय अर्थव्यवस्था अभी मजबूत है। लेकिन निर्यात में गिरावट का असर पड़ सकता है, क्योंकि आर्थिक विकास में निर्यात अहम भूमिका निभाता है। हालाँकि कुल 4.12 ट्रिलियन डॉलर जीडीपी में इसका योगदान मात्र 10 फीसदी यानी 438 बिलियन डॉलर ही है। यही वजह है कि जून तिमाही में भी भारत की आर्थिक वृद्धि दर 7.8% दर्ज की गई।

क्या है ECLGS

इमरजैंसी क्रेडिट लाइन गारंटी योजना ( ECLGS)’आत्मनिर्भर भारत अभियान’ के तहत शुरू की गई भारत सरकार की एक योजना है। इसे मई 2020 में लागू की गई थी। इसका मकसद कोविड काल से प्रभावित सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs) और दूसरे व्यवसायों को राहत देना है। इसके तहत उद्योगों को बगैर गारंटी के 100 फीसदी लोन दिया जाता है, ताकि उद्योगों को चलाने में दिक्कत न आए।

इसके तहत 1.19 करोड़ उद्योगों को ₹3.68 लाख करोड़ लोन दिए गए। जिसका मात्र 6 फीसदी हिस्सा ही एनपीए हुआ यानी ₹22,000 करोड़। सरकार का मानना है कि ये अनुमान से काफी कम था।

एनपीए ऐसी स्थिति होती है, जब ऋणकर्ता अपने लोन के ब्याज या मूलधन के किश्त को 90 दिनों या उससे अधिक दिनों तक नहीं दे पाता है।

प्लान2: डायरेक्ट इनकम सपोर्ट योजना पर विचार

सरकार एमएसएमई में काम कर रहे कर्मचारियों और दूसरे अस्थाई कर्मचारियों की मदद के लिए (Direct Income Support) प्रत्यक्ष आय योजना लागू करने पर विचार कर रही है। इसका मकसद एमएसएमई के क्षेत्र में काम कर रहे कर्मचारियों की नौकरी जाने की स्थिति में उन्हें आर्थिक मदद करना है। मनी कंट्रोल के मुताबिक योजना का प्रारूप तैयार कर लिया गया है और इसे जल्द लागू किया जा सकता है।

प्लान3: कोलेट्रल फ्री लोन की सीमा बढ़ सकती है

आरबीआई क्रेडिट गारंटी योजना यानी CGS के तहत एमएसएमई के अंतर्गत आने वाले उद्योगों को बिना गिरवी के ऋण देने की सीमा 10 लाख रुपए से बढ़ा कर 20 लाख रुपए कर सकती है। CGS को 2010 में शुरू किया गया था। इसका संचालन क्रेडिट गारंटी फंड ट्रस्ट फॉर माइक्रो एंड स्मॉल एंटरप्राइजेज करता है। ये ट्रस्ट बैंकों और वित्तीय संस्थानों को ये गारंटी देता है कि अगर एमएसएमई कंपनी लोन नहीं चुका पाती है तो ट्रस्ट बकाया राशि का 75 से 90 फीसदी हिस्सा चुकाएगा।

प्लान4: एक्सपोर्ट प्रमोशन मिशन के तहत सस्ता कर्ज देने की योजना

यूनियन बजट 2025-26 के तहत मोदी सरकार ने एक्सपोर्ट प्रमोशन मिशन की बात कही थी। इसके तहत 25000 करोड़ रुपए के पैकेज का ऐलान किया गया था। पैकेज के तहत एक्सपोर्टर्स को सस्ता कर्ज और बेहतर मार्केट एक्सेस उपलब्ध कराने की योजना है। इससे ट्रंप के टैरिफ के निगेटिव असर से भी एक्सपोर्ट्स को बचाने में मदद मिलेगी। इस पर तेजी से काम किया जा रहा है।

दिल्ली के हिंदू विरोधी दंगों की सुनवाई में देरी के लिए शरजील इमाम-उमर खालिद जैसे ही जिम्मेदार: ‘मुस्लिम विक्टिम’ वाली थ्योरी फुस्स, हाई कोर्ट ने कहा- जल्दबाजी से आरोपितों को भी नुकसान

दिल्ली हाई कोर्ट ने मंगलवार (3 सितंबर 2025) को शरजील इमाम और उमर खालिद जैसे लोगों की जमानत याचिका को खारिज कर दिया। दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि इन दंगों की साजिश पहले से बनाई गई थी और शरजील इमाम व उमर खालिद जैसे लोग इसके मुख्य षड़यंत्रकारी (Intellectual Architects) थे। कोर्ट ने आरोपितों की उस दलील को भी नहीं माना कि बिना सुनवाई के वो लोग लंबे समय से जेल में हैं, ऐसे में उन्हें जमानत दी जाए।

स्वाभाविक तरीके से चलनी चाहिए सुनवाई, सही दिशा में आगे बढ़ रहा केस

उमर खालिद, शरजील इमाम और अन्य को दिल्ली दंगों के बड़े षड्यंत्र मामले में जमानत न देते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि ट्रायल को अपने स्वाभाविक तरीके से आगे बढ़ना चाहिए। जल्दबाजी में ट्रायल करना न तो आरोपितों के हक में होगा और न ही सरकार के। ये लोग पाँच साल से ज्यादा समय से गैरकानूनी गतिविधियाँ रोकथाम अधिनियम (UAPA) के तहत जेल में बंद हैं।

जस्टिस शैलेंद्र कौर और जस्टिस नवीन चावला की बेंच ने कहा, “ट्रायल की गति स्वाभाविक रूप से आगे बढ़ेगी। जल्दबाजी में ट्रायल दोनों पक्षों के अधिकारों के लिए नुकसानदायक होगा।”

कोर्ट को बताया गया कि मामला अभी चार्ज तय करने के लिए तर्क सुने जाने के चरण में है, यानी केस आगे बढ़ रहा है। उमर खालिद और शरजील इमाम के बारे में कोर्ट ने कहा कि पहली नजर में उनकी भूमिका इस षड्यंत्र में ‘गंभीर’ लगती है, क्योंकि उन्होंने सांप्रदायिक आधार पर भड़काऊ भाषण दिए, जिससे मुस्लिम समुदाय के लोगों को उकसाकर भीड़ जुटाने की कोशिश की।

ये आम दंगा नहीं, बल्कि देश को खतरे में डालने वाली साजिश

दिल्ली हाई कोर्ट ने देखा कि दिल्ली पुलिस ने इस कथित गहरे षड्यंत्र को उजागर करने की पूरी कोशिश की है। इसका सबूत ये है कि चार्जशीट 3,000 पेज से ज्यादा की है और 30,000 पेज का इलेक्ट्रॉनिक सबूत भी है। कोर्ट ने कहा, “सरकार ने विस्तार से जाँच की, जिसके बाद कई लोगों को गिरफ्तार किया गया और चार अतिरिक्त चार्जशीट दाखिल की गईं। कई आरोपितों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल हुई और 58 गवाहों के बयान, जिनमें कुछ संरक्षित गवाह भी हैं, मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज किए गए।”

कोर्ट ने आगे कहा कि आरोपों की गंभीरता को देखते हुए, खासकर सॉलिसिटर जनरल और विशेष लोक अभियोजक के इस दावे को कि ये कोई साधारण विरोध या दंगा नहीं, बल्कि भारत की एकता, अखंडता और संप्रभुता को खतरे में डालने वाला सोचा-समझा षड्यंत्र है।

आरोपित खुद ही मुकदमे की सुनवाई में देरी के जिम्मेदार

दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि दिल्ली दंगों के बड़े षड्यंत्र मामले में आरोपित खुद ही अलग-अलग समय पर मुकदमे में देरी के लिए जिम्मेदार हैं, न कि दिल्ली पुलिस या ट्रायल कोर्ट। जस्टिस सुब्रह्मण्यम प्रसाद और जस्टिस हरीश वैद्यनाथन शंकर की बेंच ने कहा कि जमानत पर बाहर आए आरोपित आसिफ इकबाल तन्हा, देवांगना कलिता और नताशा नरवाल चार्ज पर बहस में देरी कर रहे हैं, जिसका नुकसान जेल में बंद बाकी आरोपितों को हो रहा है।

कोर्ट ने कहा, “बेशक केस जल्दी सुनवाई भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 का एक हिस्सा है। लेकिन अगर आरोपित खुद ही सुनवाई में बार-बार देरी करता है और फिर जमानत माँगता है, तो ये ठीक नहीं है। अगर ऐसा हुआ तो कानून जो सुनवाई में देरी के आधार पर जमानत देने को सीमित करता है, उसे आसानी से तोड़ा जा सकता है। एक तरफ सुनवाई में देरी करो और दूसरी तरफ जमानत के लिए अर्जी डालो।”

कोर्ट ने उमर-शरजील के भाषणों की टाइमिंग पर भी दिया ध्यान

दिल्ली हाई कोर्ट ने माना कि शरजील और उमर ने अपने भाषणों के जरिए मुस्लिम समुदाय को ये बात मनवाने की कोशिश की कि CAA और NRC उनके खिलाफ हैं। ये भाषण ऐसे वक्त दिए गए, जब देश में तनाव का माहौल था। सॉलिसिटर जनरल ने दलील दी कि ये भाषण सिर्फ राजनीतिक विरोध नहीं, बल्कि दंगे भड़काने की साजिश का हिस्सा थे। कोर्ट ने भी माना कि इन भाषणों की टाइमिंग गलत नहीं थी – ये उसी वक्त आए जब साजिश को अंजाम देने की तैयारी चल रही थी।

दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले की कॉपी का अंश

भाषणों का असर साफ दिखा। कोर्ट ने कहा कि ये भाषण पर्चों और मीटिंग्स के जरिए लोगों तक पहुँचे, जिससे भीड़ जुटाई गई और दंगों की योजना बनी।

हालाँकि शरजील जनवरी 2020 से हिरासत में था और उमर दंगा वाले दिन मौजूद नहीं था, लेकिन कोर्ट ने साफ किया कि उनकी गैरमौजूदगी मायने नहीं रखती। कोर्ट का कहना था कि अगर कोई पहले से योजना बनाए, लोगों को उकसाए और ग्रुप तैयार करे, तो उसकी जिम्मेदारी खत्म नहीं होती। इनके भाषणों ने माहौल को इतना गरम किया कि दंगे होना तय हो गए।

इसके अलावा दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि इन भाषणों को अलग-अलग नहीं, बल्कि पूरे घटनाक्रम के साथ जोड़कर देखना चाहिए। अभियोजन पक्ष का दावा है कि ये भाषण साजिश, संगठन, और व्यवस्था को ठप करने की कोशिशों का हिस्सा थे। साफ है कि ये सिर्फ राजनीतिक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि गंभीर अपराध की ओर इशारा करते हैं। UAPA जैसे गंभीर कानून के तहत ये मामला अब और पेचीदा हो गया है।

हालाँकि कोर्ट ने अभी अंतिम फैसला नहीं दिया, लेकिन प्रथम दृष्टया (prima facie) इनके भाषणों को साजिश से जोड़ा गया है। बचाव पक्ष का तर्क था कि हिरासत या गैरमौजूदगी से इनकी भूमिका कम नहीं होती, लेकिन कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया।

दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले की कॉपी का अंश

गौरतलब है कि दिल्ली में 2020 की फरवरी में हिंदू विरोधी दंगे भड़क उठे थे। ये दंगे CAA और NRC को लेकर शुरू हुए विवाद के बाद भड़के। शरजील इमाम और उमर खालिद जैसे लोग इन दंगों से पहले कई सभाओं में शामिल हुए और भाषण दिए। आरोप है कि उनके उकसावे से दंगे हुए। इस मामले में UAPA के तहत कार्रवाई हुई और अब कोर्ट इसकी जाँच कर रही है। फिलहाल आरोपितों की जमानत याचिका खारिज कर दी गई है।

भीड़ जुटाने से लेकर हमलों तक दिल्ली के हिंदू विरोधी दंगों की हर साजिश में शामिल था उमर खालिद और शरजील इमाम: जानिए दिल्ली HC ने क्या कहा

दिल्ली हाईकोर्ट ने मंगलवार (2 सितंबर 2025) को 2020 के हिंदू विरोधी दिल्ली दंगे के आरोपित उमर खालिद और शरजील इमाम समेत 9 आरोपितों की जमानत याचिका खारिज कर दी। यह फैसला जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस शालिंदर कौर की बेंच ने सुनाया।

कोर्ट ने कहा कि इस स्टेज पर यह साफ तौर पर दिखाई देता है कि उमर खालिद और शरजील इमाम ने CAA और NRC के खिलाफ विरोध प्रदर्शन की योजना बनाने और उसे फैलाने में अहम भूमिका निभाई। कोर्ट ने यह भी कहा कि हम अभी केस के पूरे तथ्यों में नहीं जा रहे, लेकिन इस समय उनके खिलाफ जो सबूत हैं, वो उनकी भूमिका को बाकी आरोपितों से अलग और ज्यादा गंभीर दिखाते हैं।

CAB के बाद शीघ्र लामबंदी पर कोर्ट

दिल्ली हाई कोर्ट ने पाया कि दिसंबर 2019 में नागरिकता संशोधन विधेयक पारित होने के तुरंत बाद घटित घटनाओं में, खालिद और इमाम ने लोगों को भड़काने की पहल की थी।

दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा, “पहली नजर में ये साफ होता है कि जैसे ही दिसंबर 2019 की शुरुआत में नागरिकता संशोधन विधेयक पारित हुई, ये लोग (अपीलकर्ता) सक्रिय हो गए। इन्होंने तुरंत वॉट्सऐप ग्रुप बनाया और मुस्लिम बहुल इलाकों में पर्चे बाँटें, जिसमें लोगों से कानून का विरोध करने और तुरंत चक्काजाम जैसी कार्रवाई में भाग लेने की अपील थी। इन पर्चों में लोगों से पूरी व्यवस्था, जिसमें इमरजेंसी सेवाएँ भी शामिल हैं, उन्हें भी ठप कर देने को कहा गया।”

कोर्ट के मुताबिक, शरजील-उमर जैसे लोगों का मकसद सिर्फ राजनीतिक विरोध नहीं था, बल्कि लोगों को खासकर मुस्लिम समुदाय को ये विश्वास दिलाना था कि CAA और NRC उनके खिलाफ हैं, ताकि जानबूझकर गड़बड़ी फैलाई जा सके।

कोर्ट ने खालिद और इमाम को माना दंगों के पीछे का दिमाग

कोर्ट ने खालिद और शरजील इमाम के भड़काऊँ भाषणों की टाइमिंग पर भी ध्यान दिया। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि इन लोगों ने तब भड़काऊँ भाषण दिए, जब एक खास माहौल बना हुआ था। ऐसे में परिस्थितियों के साथ इन चीजों को जोड़ें, तो ये मामला सिर्फ राजनीतिक अभिव्यक्ति से अधिक आगे बढ़ जाता है।

साफ है, कोर्ट ने इन बात को माना कि इन दंगों के पीछे इनके भड़काऊँ भाषणों का भी हाथ रहा। ऐसे में ये मामला राजनीतिक बदले की कार्रवाई से कहीं अधिक गंभीर है। फिर, शरजील और उमर जैसे लोगों को UAPA जैसे गंभीर मामले हैं, ऐसे में इनके भाषणों को सिर्फ राजनीतिक मानना बड़ी भूल साबित हो सकती है।

सुनवाई के दौरान, सॉलिसिटर जनरल ने तर्क दिया कि इमाम और खालिद इस पूरी साजिश के मुख्य षड़यंत्रकारी (बौद्धिक शिल्पकार – Intelluctual Architects) थे, जो अपने सहयोगियों के साथ तन-मन-धन से इस काम में लगे हुए थे।

हालाँकि कोर्ट ने मामले के अंतिम निष्कर्षों पर कोई टिप्पणी नहीं की, लेकिन उसने यह माना कि पहली नजर में (prima facie) यह कहा जा सकता है कि अपीलकर्ताओं द्वारा दिए गए भड़काऊ और उकसावे वाले भाषण कथित साजिश में उनकी भूमिका की ओर इशारा करते हैं।

कोर्ट ने माना कि इन भाषणों को अलग- थलग कर के नहीं बल्कि उस व्यापक परिप्रेक्ष्य में समझना जरूरी है, जिसमें अभियोजन पक्ष ने आरोप लगाया है कि इन लोगों के भाषण … इस पूरी साजिश को अंजाम देने के लिए आपसी सहयोग, भीड़ को जुटाने और व्यवस्था को ठप करने देने की कोशिशों का हिस्सा थे।

शारीरिक मौजूदगी न होने पर भी भूमिका वही

बचाव पक्ष ने इस बात पर जोर दिया कि शरजील इलाम जनवरी 2020 से हिरासत में था और इसलिए दंगों में उसकी कोई भूमिका नहीं हो सकती। उमर खालिद के मामले में कहा गया कि वह दंगों के दिन विरोध स्थलों पर मौजूद भी नहीं था। लेकिन कोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया।

दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा, “ये जरूरी नहीं कि आरोपित उस दिन मौके पर मौजूद हो। अगर उसने पहले से योजना बनाई, ग्रुप बनाए, लोगों को उकसाया तो उसकी भूमिका बनी रहती है।”

अलग-अलग भूमिकाओं के आधार पर जमानत खारिज

कोर्ट ने साफ किया कि इस वक्त सबूतों से लगता है कि उमर और शरजील की भूमिका लीडरशिप की रही, इसलिए अन्य आरोपितों जैसे देवांगना कलिता और नताशा नरवाल (जिन्हें पहले जमानत मिल चुकी है) के साथ उनकी तुलना नहीं की जा सकती।

कोर्ट ने कहा कि केवल यह तर्क देना कि आरोपित उस समय दंगों में मौजूद नहीं थे, काफी नहीं है। आरोपितों द्वारा जो योजना बनाई गई और जिस तरह संगठन और उकसावे का काम पहले ही कर दिया गया, वही इस मामले का मुख्य हिस्सा है। इस वजह से जमानत नहीं दी जा सकती।

यह रिपोर्ट मुख्य रूप से अंग्रेजी में अनुराग ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।