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पहले पवन खेड़ा, अब पत्नी कोटा नीलिमा के मिले दो वोटर कार्ड: BJP ने कहा- कॉन्ग्रेस कर रही असली ‘वोट चोरी’

कॉन्ग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा पर दो वोटर आईडी रखने का मामला अभी थमा भी नहीं था कि अब उनकी पत्नी को लेकर भी ऐसा ही आरोप सामने आया है। पवन खेड़ा को चुनाव आयोग ने नोटिस भी भेजा था। पवन खेड़ा की पत्नी कोटा नीलिमा के पास भी दो वोटर ID हैं, एक तेलंगाना की खैरताबाद सीट से और दूसरी काका नगर नई दिल्ली सीट से।

यह आरोप बीजेपी आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने सार्वजनिक किया है। उनका कहना है कि कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी दूसरों पर ‘वोट चोरी’ का आरोप लगाते हैं, लेकिन उनके करीबी सहयोगी खुद इस गड़बड़ी में लिप्त हैं।

पवन खेड़ा की पत्नी कोटा नीलिमा पर भी दो वोटर ID

बीजेपी का आरोप है कि कोटा नीलिमा के नाम से भी दो एक्टिव वोटर ID हैं। एक ID तेलंगाना के खैरताबाद विधानसभा क्षेत्र में है। यह ID उनके चुनावी हलफनामे में भी दर्ज है।

लेकिन दूसरा EPIC नंबर दिल्ली की काका नगर नई दिल्ली विधानसभा में भी एक्टिव है। यहीं पवन खेड़ा का नाम भी दर्ज है। यानी दोनों पति-पत्नी के नाम दो-दो जगहों पर वोटर लिस्ट में मौजूद हैं।

बीजेपी नेता अमित मालवीय का कहना है कि यह अकेला मामला नहीं है। उन्होंने इसे कॉन्ग्रेस की ‘वोट बैंक’ राजनीति का हिस्सा बताया है।

पवन खेड़ा पर दो वोटर ID

पवन खेड़ा का नाम दिल्ली की दो विधानसभा सीटों ‘जंगपुरा और काका नगर नई दिल्ली’ की वोटर लिस्ट में पाया गया। दोनों जगहों पर उनके नाम से अलग-अलग EPIC नंबर एक्टिव हैं।

इस आधार पर चुनाव आयोग ने उन्हें नोटिस भेजा। आयोग ने कहा है कि एक व्यक्ति दो जगहों पर वोटर लिस्ट में शामिल नहीं हो सकता। इसलिए पवन खेड़ा से 8 सितंबर 2025 तक जवाब माँगा गया है।

वहीं, पवन खेड़ा का कहना है कि उन्होंने 2016 में एक जगह से नाम हटाने के लिए आवेदन किया था। लेकिन चुनाव आयोग ने उसे समय पर हटाया नहीं। उन्होंने जाँच की माँग की है और कहा है कि अगर उन्होंने दो बार वोट डाला है तो CCTV फुटेज पेश किया जाए।

मामले पर बीजेपी का रुख

बीजेपी ने इस मुद्दे को कॉन्ग्रेस के ‘दोहरे रवैये’ से जोड़ा है। बीजेपी का कहना है कि कॉन्ग्रेस पार्टी खुद ‘वोट चोरी’ के आरोप लगाती है, लेकिन उसके अपने नेता ऐसे कृत्यों में शामिल हैं। बीजेपी ने राहुल गाँधी से सवाल किया है कि वे अपनी ही पार्टी के नेताओं के खिलाफ लगे इन आरोपों पर क्यों चुप हैं।

PAK की मिसाइलें गिराने वाले S-400 सिस्टम की बड़ी खेप आएगी भारत: रूस के साथ डील पर चर्चा, तेल की कीमत भी घटी

भारत और रूस के बीच S-400 मिसाइल सिस्टम की अतिरिक्त आपूर्ति को लेकर बातचीत चल रही है। यह विश्व के सबसे बेहतरीन हवाई रक्षा सिस्टम्स में से एक है।

रूसी समाचार एजेंसी TASS के अनुसार, रूस की फेडरल सर्विस फॉर मिलिट्री-टेक्निकल कोऑपरेशन के प्रमुख दिमित्री शुगायेव ने कहा, “भारत के पास पहले से ही हमारा S-400 सिस्टम है और इस क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने की संभावना है। अभी हम बातचीत के स्तर पर हैं।”

भारत ने ऑपरेशन सिंदूर में भी इसका इस्तेमाल किया था और पाकिस्तान और PoK में आतंकी ठिकानों पर हमला किया। यह सिस्टम भारत को हवाई हमलों से बचाने के लिहाज से काफी अहम है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत ने 2018 में रूस के साथ 5.5 अरब (लगभग 45,000 करोड़) की डील की थी, जिसके तहत पाँच S-400 ट्रायम्फ मिसाइल सिस्टम मिलने थे। भारत का कहना है कि यह सिस्टम चीन से खतरे का मुकाबला करने के लिए जरूरी हैं। हालाँकि इस डील की डिलीवरी में कई बार देरी हो चुकी है। अब माना जा रहा है कि अंतिम दो सिस्टम 2026 और 2027 में भारत को मिलेंगे।

हाल ही में शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गनाइजेशन (SCO) की बैठक के दौरान रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘प्रिय मित्र’ कहा। इसके जवाब में मोदी ने कहा, “भारत और रूस ने मुश्किल समय में भी एक-दूसरे का साथ निभाया है।”

रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने भी कहा कि भारत ने अमेरिका के दबाव में आकर रूस से संसाधन (जैसे कि हथियार और तेल) खरीदना बंद नहीं किया, रूस इसकी सराहना करता है। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट के मुताबिक, 2020 से 2024 के बीच भारत के कुल हथियार आयात में 36% हिस्सा रूस का था, जबकि फ्रांस से 33% और इजराइल से 13% हथियार भारत ने खरीदे।

एक तरफ अमेरिका ने बढ़ाया टैरिफ तो दूसरी तरफ भारत को रूसी कच्चे तेल पर मिली छूट

रूसी कच्चे तेल की कीमत भारत के लिए और घट गई है। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, ‘यूराल्स ग्रेड’ तेल की कीमत अब सितंबर-अक्टूबर की डिलीवरी के लिए 3-4 डॉलर प्रति बैरल की छूट पर मिल रही है। यह छूट तब दी गई है, जब अमेरिका ने भारत पर रूसी तेल खरीदने को लेकर टैरिफ दोगुना कर 50% कर दिया है।

2022 से भारत, रूस से सस्ता कच्चा तेल खरीदने वाला एक बड़ा ग्राहक बन गया है, हालाँकि अमेरिका ने इसे लेकर कई बार नाराजगी जताई है। व्हाइट हाउस के सलाहकार पीटर नवारो ने कहा कि भारत सस्ता रूसी तेल खरीदकर उसे रिफाइन करता है और विदेशों में बेचता है, जिससे ‘पुतिन की युद्ध मशीन’ को फायदा हो रहा है।

भारत ने इस आलोचना का जवाब देते हुए कहा है कि ऐसी खरीद पर कोई अंतरराष्ट्रीय पाबंदी नहीं है, यहाँ तक कि अमेरिकी रिफाइनर भी अप्रत्यक्ष रूप से रूसी तेल का फायदा उठाते हैं।

बता दें कि अगस्त में थोड़े समय के लिए खरीदारी रुकी थी, लेकिन अब भारत के रिफाइनर फिर से रूस से तेल खरीदना शुरू कर चुके हैं, क्योंकि यह अमेरिका के तेल के मुकाबले काफी सस्ता है, जो 3 डॉलर (लगभग 264.52 भारतीय रुपए) प्रीमियम पर कारोबार कर रहा है।

कलावा काटो, बाइबिल पढ़कर ईसाई बनो… आगरा में महिला पुलिसकर्मियों से कहा, मुंबई से आया पास्टर चला रहा था धर्मांतरण गैंग: कहता था- घरों से मूर्ति हटाओ, खुशहाली आएगी

आगरा के शाहगंज थाना क्षेत्र के केदार नगर में चल रहे एक धर्मांतरण गिरोह का खुलासा हुआ है। इस पूरे मामले का भंडाफोड़ दो महिला पुलिसकर्मियों ने किया। वे सादे कपड़ों में पीड़ित बनकर हर रविवार को होने वाली सभा में शामिल होती थीं।

इस दौरान महिला पुलिसकर्मियों को सभा में बुलाकर बाइबिल पढ़ने को कहा गया। उनके हाथ में बँधे कलावे को कटवाया गया और हिंदू धर्म छोड़ने का दबाव बनाया गया। कहा गया कि अगर वे ईसाई बन जाएँ तो उनकी बीमारियाँ दूर हो जाएँगी और सारी समस्याएँ खत्म हो जाएँगी।

एक महीने की जाँच के बाद पुलिस ने 3 महिलाओं सहित 8 लोगों को गिरफ्तार किया। गिरोह का मुख्य आरोपित राजकुमार लालवानी है। वह पहले हिंदू था, लेकिन चार साल पहले मुंबई में ईसाई बन गया और उसने अपना नाम बदलकर पास्टर राजकुमार रख लिया। राजकुमार की टीम के लोग खुद को बीमार बताकर लोगों को भरोसे में लेते थे और फिर उन्हें सभा में लाकर ब्रेनवॉश करते थे।

बीमार और गरीबों को किया जाता था टारगेट

राजकुमार केदारनगर में स्थित अपने घर में हर रविवार को सभा करता था। इसमें बीमार और गरीब लोगों को टारगेट किया जाता था। उनसे कहा जाता था कि मूर्तियाँ हटा दो, कलावा काट दो, सिंदूर और बिछुए उतार दो, तभी खुशहाली आएगी। सभा में शामिल होने वालों से वादा किया जाता था कि ईसाई बनने पर उनकी जिंदगी सुधर जाएगी और सरकारी नौकरी भी मिल सकती है।

धर्म सभा में बाहर से कुछ लोग आते थे और आसपास के हिंदुओं को बुलाकर उनसे समस्याएँ पूछते थे। इसके बाद समस्या के निराकरण का दावा कर उनका धर्म परिवर्तन करा देते थे। मामले की भनक लगते ही पुलिस आयुक्त दीपक कुमार और शाहगंज पुलिस ने जाँच शुरु की। इस दौरान दो महिला पुलिसकर्मियों को सादे कपड़े में सबूत जुटाने के उद्देश्य से भेजा गया।

डीसीपी सिटी सोनम कुमार ने बताया, “मामले के खुलासे के लिए महिला पुलिस को सादी कपड़ों में भेजा गया। उन्होंने धर्म सभा अटेंड की। राजकुमार और अन्य लोगों ने महिला पुलिसकर्मियों पर हिंदू धर्म छोड़कर ईसाई धर्म अपनाने का दबाव बनाया। पुलिस ने उनके खिलाफ सबूत जुटाए। इसके बाद छापा मारकर 8 लोगों को गिरफ्तार कर लिया। इसमें राजकुमार लालवानी, अनूप कुमार, कमल कुंडलानी, जयकुमार, अरुण और तीन महिलाएँ शामिल हैं।”

स्पेन और दुबई से भी जुड़े हैं धर्मांतरण के तार

इस गिरोह के स्पेन और दुबई से भी संबंध पाए गए हैं। जूम मीटिंग्स के जरिए स्पेन और दुबई से भी लोग जुड़ते थे और लोगों को धर्मांतरण के लिए प्रेरित करते थे। राजकुमार ने एक यूट्यूब चैनल भी बना रखा था, जिसका नाम है ‘Church of God Agra,’ इस पर हर रविवार की सभाओं के वीडियो डाले जाते थे।

इसके 176 सबस्क्राइबर हैं और 93 वीडियो अपलोड हैं। सभी वीडियो प्रार्थना सभा या उसके द्वारा दिए गए उपचार के हैं। इनमें से कुछ वीडियो ऐसे भी हैं जो मतांतरित होने वाले लोगों के हैं। इसमें वे कह रहे हैं कि प्रार्थना सभा में शामिल होने से उनकी बीमारी ठीक हो गई।

घुसपैठियों के लिए बनाओ डिटेंशन सेंटर: राज्यों/UT को निर्देश, पाकिस्तान-अफगानिस्तान-बांग्लादेश से आए हिंदू सहित अन्य अल्पसंख्यक पीड़ित बिना दस्तावेज के भी रह सकेंगे

भारत सरकार ने देश में अवैध विदेशी घुसपैठियों को लेकर गजट नोटिफिकेशन जारी किया है। अब ऐसे सभी लोगों को डिपोर्ट करने से पहले डिटेंशन सेंटरों में रखा जाएगा। इसके लिए सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को आदेश दे दिए गए हैं। नेपाल और भूटान के नागरिकों को पासपोर्ट और वीजा की अनिवार्यता से छूट दी गई है। साथ ही 31 दिसंबर 2024 तक पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से धार्मिक कारणों से भारत आए अल्पसंख्यकों को विशेष छूट दी गई है। ये नए नियम ‘इमिग्रेशन एंड फॉरेनर्स (एक्सेम्प्शन) ऑर्डर, 2025’ के तहत लागू किए गए हैं।

अवैध विदेशी घुसपैठियों के लिए डिटेंशन सेंटर अनिवार्य

केंद्र सरकार ने साफ कहा है कि जो भी व्यक्ति भारत में अवैध रूप से रह रहा है और खुद को भारतीय नागरिक साबित नहीं कर पाता, उसे डिटेंशन सेंटर में रखा जाएगा। इसके लिए विदेशी न्यायाधिकरण (Foreigners Tribunal) बनाए जाएँगे, जो तय करेंगे कि कोई व्यक्ति विदेशी है या नहीं। यह न्यायाधिकरण तीन सदस्यों वाला होगा जिनके पास न्यायिक अनुभव होगा।

अगर कोई घुसपैठी अपनी नागरिकता के सबूत नहीं दिखा पाता और जमानत की व्यवस्था भी नहीं कर सकता तो उसे तुरंत हिरासत में लिया जाएगा और डिपोर्ट होने तक डिटेंशन सेंटर में रखा जाएगा।

नेपाल और भूटान के नागरिकों को वीजा-पासपोर्ट से छूट

नई अधिसूचना में नेपाल और भूटान के नागरिकों को विशेष छूट दी गई है। अब वे भारत में जमीन या हवाई मार्ग से बिना पासपोर्ट और वीजा के प्रवेश या निकास कर सकते हैं, जब तक वे चीन, मकाऊ, हांगकांग या पाकिस्तान से नहीं आ रहे हों।

यही नियम भारतीय नागरिकों पर भी लागू होता है जो नेपाल या भूटान के जरिए भारत में आ रहे हैं। साथ ही तिब्बती नागरिक जो 1959 के बाद और 30 मई 2003 से पहले भारत में आए और जिनके पास पंजीकरण प्रमाणपत्र हैं, उन्हें भी यह छूट दी गई है।

पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के अल्पसंख्यकों को राहत

जो हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई समुदाय के लोग पाकिस्तान, बांग्लादेश या अफगानिस्तान से धार्मिक उत्पीड़न के चलते भारत में 31 दिसंबर 2024 तक आए हैं, उन्हें वीजा या पासपोर्ट की अनिवार्यता से छूट दी गई है। इसका मतलब यह है कि अगर ऐसे लोगों के पास कोई वैध दस्तावेज नहीं है, या दस्तावेज की वैधता खत्म हो चुकी है तो भी उन्हें भारत में रहने की अनुमति दी जाएगी।

इस प्रावधान को नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) से भी जोड़ा जा सकता है, जिसमें पहले ही 31 दिसंबर 2014 तक आए शरणार्थियों को नागरिकता देने की बात कही गई थी। अब यह सीमा 31 दिसंबर 2024 तक बढ़ा दी गई है। हालाँकि यह सिर्फ रहने की अनुमति से संबंधित है, न कि सीधी नागरिकता से।

यह अधिसूचना 2025 के नए कानून ‘इमिग्रेशन एंड फॉरेनर्स एक्ट, 2025’ के तहत जारी की गई है। इसमें विदेशी नागरिकों की भारत में आवाजाही, रोजगार, पहचान, और कानूनी प्रक्रिया से जुड़े सभी पुराने नियमों को संशोधित किया गया है।

डोनाल्ड ट्रंप की भारत विरोधी नीति ने अमेरिका में ही मचाया बवाल, मीडिया और विशेषज्ञों ने उठाए सवाल : जानें – कैसे अपने ही घर में घिर गए US राष्ट्रपति

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की भारत के खिलाफ लगाई गई 50% टैरिफ (आयात कर) की नीति अब उनके अपने देश में ही सवालों के घेरे में है। ट्रंप ने भारत पर रूसी तेल खरीदने के लिए यह भारी-भरकम टैरिफ लगाया, लेकिन ट्रंप की नीति ने न सिर्फ भारत को रूस और चीन के करीब ला दिया, बल्कि अमेरिका के भीतर भी ट्रंप प्रशासन के खिलाफ तीखी आलोचना शुरू हो गई है।

अमेरिकी मीडिया, विशेषज्ञ और यूट्यूबर से लेकर पॉडकास्टर तक सभी इस नीति को ‘बेतुका’ और ‘खुद के पैरों पर कुल्हाड़ी मारने’ वाला कदम बता रहे हैं। भारत ने न केवल डोनाल्ड ट्रंप की नीति को ठेंगा दिखाते हुए रूसी तेल खरीदना जारी रखा, बल्कि उसने रूस-भारत-चीन (RIC) त्रिकोण को मजबूत किया और BRICS समूह को एकजुट करने में भी अहम भूमिका निभाई। आइए, इस पूरी कहानी को विस्तार से समझते हैं कि कैसे ट्रंप की नीति ने उनके अपने घर में हंगामा मचा दिया।

डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीति: भारत को निशाना बनाने की गलती

डोनाल्ड ट्रंप ने भारत पर 50% टैरिफ इसलिए लगाया क्योंकि भारत रूस से तेल खरीद रहा है। लेकिन यह बात अमेरिकी मीडिया और विशेषज्ञों को हजम नहीं हो रही कि आखिर भारत को ही क्यों निशाना बनाया गया, जबकि रूस से कहीं ज्यादा तेल खरीदने वाले चीन को कोई सजा नहीं मिली।

CNBC टीवी के शो ‘Squawk Box‘ में पूर्व अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि माइकल फ्रॉनमैन ने इस मुद्दे पर खुलकर बात की। उन्होंने कहा, “क्लिंटन प्रशासन से लेकर अब तक अमेरिका ने भारत के साथ रिश्तों को मजबूत करने की कोशिश की थी। लेकिन ट्रंप के इस टैरिफ ने भारत को हैरान कर दिया। भारत अब अमेरिका को भरोसेमंद रणनीतिक साझेदार नहीं मान रहा।”

फ्रॉनमैन ने बताया कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सात साल बाद चीन यात्रा ट्रंप के इस टैरिफ का सीधा जवाब है। भारत और चीन के बीच कई मुद्दे हैं, लेकिन ट्रंप की नीति ने दोनों देशों को करीब ला दिया। फ्रॉनमैन ने कहा, “भारत यह संदेश दे रहा है कि वह अमेरिका के सामने झुकेगा नहीं। वह चीन और शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के अन्य देशों के साथ नए रास्ते तलाश रहा है।”

अमेरिकी विशेषज्ञों ने डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीति को बताया मूर्खता

अमेरिकी अर्थशास्त्री रिचर्ड डी. वोल्फ और माइकल हडसन ने एक यूट्यूब चर्चा में ट्रंप प्रशासन की भारत नीति को ‘मूर्खतापूर्ण’ और ‘हताश’ करार दिया। इस चर्चा को 3 लाख से ज्यादा लोग देख चुके हैं। वोल्फ ने व्हाइट हाउस के व्यापार सलाहकार पीटर नवारो के उस बयान की कड़ी आलोचना की, जिसमें उन्होंने रूस-यूक्रेन युद्ध को ‘मोदी का युद्ध’ कहा था।

वोल्फ ने कहा, “नवारो कोई तेज दिमाग नहीं हैं। अगर भारत को रूस के साथ व्यापार के लिए सजा दी जा रही है, तो रूस के साथ व्यापार करने वाले 100 से ज्यादा देशों को भी सजा मिलनी चाहिए। लेकिन सिर्फ भारत को क्यों निशाना बनाया गया?”

वोल्फ ने यह भी कहा कि ट्रंप प्रशासन भारत और मोदी को रूस-यूक्रेन युद्ध के लिए जिम्मेदार ठहरा रहा है, जबकि असल में यह युद्ध वाशिंगटन डीसी की नीतियों का नतीजा है, जिसने नाटो को रूस की सीमा तक बढ़ाने की कोशिश की। उन्होंने चेतावनी दी कि भारत, कनाडा और मैक्सिको जैसे देशों को सजा देकर अमेरिका खुद को अलग-थलग कर रहा है।

माइकल हडसन ने भी ट्रंप की नीति को भारत की संप्रभुता पर हमला बताया। उन्होंने कहा कि भारत के प्रधानमंत्री मोदी और विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने साफ कर दिया है कि भारत अपनी मर्जी से किसी भी देश के साथ व्यापार करेगा। हडसन ने कहा, “1945 से अमेरिका ने खाद्य निर्यात को हथियार बनाया और कई देशों में अपनी मर्जी से सत्ता परिवर्तन करवाया। लेकिन मोदी ट्रंप की माँगों के सामने नहीं झुकेंगे।” उन्होंने यह भी कहा कि ट्रंप की नीति ने भारत को चीन और रूस के और करीब ला दिया, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए एक बड़ा बदलाव होगा।

पाकिस्तान के साथ ‘दोस्ती’ और भारत के साथ दुश्मनी पर भड़के अमेरिकी पॉडकास्टर

अमेरिकी पॉडकास्टर ‘Speaknsee‘ ने डोनाल्ड ट्रंप की भारत विरोधी नीति पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि ट्रंप का पाकिस्तान के साथ ‘ब्रोमांस’ (दोस्ताना रवैया) और भारत के खिलाफ टैरिफ लगाना समझ से परे है। पॉडकास्टर ने कहा, “पाकिस्तान ने ट्रंप को नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकित करके रिश्वत देने की कोशिश की, लेकिन मोदी ने कभी ऐसा नहीं किया।”

पॉडकास्टर ने मोदी की तारीफ करते हुए उन्हें ‘सर्वकालिक महान’ (GOAT) कहा और बताया कि जहां ट्रंप की लोकप्रियता 45% है, वहीं मोदी की भारत में 72% अप्रूवल रेटिंग है। उन्होंने ट्रंप को सलाह दी कि वह नोबेल पुरस्कार का सपना छोड़ दें, क्योंकि एक फोन कॉल से भारत-पाकिस्तान जैसे जटिल मुद्दे हल नहीं हो सकते।

अमेरिकी मीडिया बोली – ट्रंप ने भारत के साथ रिश्ते बर्बाद किए

अमेरिकी मीडिया में भी ट्रंप की भारत नीति की कड़ी आलोचना हो रही है। आमतौर पर मोदी की आलोचना करने वाले CNN के पत्रकार फरीद जकारिया ने कहा कि ट्रंप ने भारत के साथ रिश्तों को अपूरणीय नुकसान पहुँचाया है। जकारिया ने कहा, “ट्रंप की भारत के प्रति अचानक दुश्मनी ने पिछले पाँच प्रशासनों की नीतियों को उलट दिया, जिसमें उनकी पहली सरकार भी शामिल थी। यह ट्रंप की सबसे बड़ी रणनीतिक गलती हो सकती है।”

जकारिया ने बताया कि भारत ने धीरे-धीरे अमेरिका के साथ करीबी रिश्ते बनाए थे, लेकिन ट्रंप ने भारत को सीरिया और म्यांमार जैसे देशों की श्रेणी में डालकर अपमानित किया। उन्होंने यह भी कहा कि ट्रंप ने पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर के साथ लंच किया और पाकिस्तान के साथ क्रिप्टो डील की, जबकि भारत की अर्थव्यवस्था को ‘मृत’ कहकर तंज कसा। जकारिया ने चेतावनी दी कि भारत इस अपमान को लंबे समय तक याद रखेगा।

‘The Daily Show’ ने भी एक वीडियो में ट्रंप की टैरिफ नीति की खिल्ली उड़ाई। वीडियो का शीर्षक था, “ट्रंप की टैरिफ नीति ने अमेरिका की साख बर्बाद कर दी। क्या कोई अब भी हमारा सम्मान करता है?” इसमें बताया गया कि ट्रंप ने अपनी चुनावी रैलियों में कहा था कि उनकी सरकार में अमेरिका फिर से सम्मानित होगा, लेकिन उनकी नीतियों की वजह से चीन, फ्रांस, इटली, कनाडा, पोलैंड, सिंगापुर, जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन जैसे देशों में अमेरिका की साख गिरी है।

BRICS और RIC का उभार: ट्रंप की नीति का उल्टा असर

ट्रंप की टैरिफ नीति ने BRICS (ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका) और RIC (रूस-भारत-चीन) त्रिकोण को और मजबूत कर दिया। अमेरिकी विशेषज्ञों का कहना है कि ट्रंप की नीति ने भारत को चीन और रूस के करीब धकेल दिया, जो अमेरिका के लिए रणनीतिक रूप से नुकसानदायक है। माइकल हडसन ने कहा, “ट्रंप ने भारत को BRICS का सबसे कमजोर कड़ी मान लिया था, लेकिन उनकी नीति ने भारत और चीन को एक साथ ला दिया। दोनों देश मिलकर सिलिकॉन वैली को चुनौती दे सकते हैं।”

अमेरिकी के परंपरावादी टिप्पणीकार विक्टर डेविस हैनसन ने भी कहा कि भारत और अमेरिका के बीच अच्छे रिश्ते थे, क्योंकि भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था और भौगोलिक स्थिति इसे चीन के खिलाफ एक आदर्श सहयोगी बनाती थी। लेकिन ट्रंप के टैरिफ ने भारत को रूस और चीन के करीब ला दिया, जो पहले से ही भारत का पुराना दोस्त है। हैनसन ने कहा, “ऐतिहासिक रूप से भी अमेरिका ने इस्लामिक पाकिस्तान का समर्थन करके गलती की, जबकि रूस ने भारत का साथ दिया।”

डोनाल्ड ट्रंप की अपनी ही पार्टी में नाराजगी

डोनाल्ड ट्रंप की नीति की आलोचना सिर्फ मीडिया और विशेषज्ञों तक सीमित नहीं है। उनकी अपनी पार्टी और समर्थकों में भी नाराजगी बढ़ रही है। मशहूर रेडियो होस्ट और ट्रंप समर्थक एलेक्स जोन्स ने ट्रंप की आलोचना की, क्योंकि उन्होंने अपने वादे के मुताबिक एपस्टीन फाइल्स को सार्वजनिक नहीं किया। जोन्स ने कहा कि ट्रंप का MAGA (मेक अमेरिका ग्रेट अगेन) अभियान अब एक ‘पंथ’ बनता जा रहा है।

यूट्यूबर मैलन बेकर ने भी ट्रंप की टैरिफ नीति को ‘राजनीतिक हथियार’ बताते हुए कहा कि यह भारत और ब्राजील के खिलाफ राजनीतिक कारणों से लगाया गया। उन्होंने बताया कि अमेरिकी अदालत ने ट्रंप के इस कदम को गैरकानूनी ठहराया है, और अगर यह फैसला बरकरार रहा, तो ट्रंप की सरकार को भारी शर्मिंदगी झेलनी पड़ेगी।

क्या होगा भविष्य में?

डोनाल्ड ट्रंप की भारत विरोधी नीति ने न सिर्फ भारत-अमेरिका रिश्तों को नुकसान पहुँचाया, बल्कि उनके अपने देश में भी उनकी साख को ठेस पहुँचाई है। अमेरिकी मीडिया और विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप ने भारत को गलत निशाना बनाकर एक ऐसी गलती की है, जिसका खामियाजा अमेरिका को लंबे समय तक भुगतना पड़ सकता है। भारत अब रूस और चीन के साथ मिलकर BRICS और RIC को मजबूत कर रहा है, जो वैश्विक व्यापार और कूटनीति में एक नया समीकरण बना सकता है।

ट्रंप ने ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ का नारा दिया था, लेकिन उनकी नीतियों ने उल्टा असर दिखाया। जैसा कि कई विशेषज्ञों ने कहा, ट्रंप की नीति ने ‘मेक एशिया ग्रेट अगेन’ का रास्ता खोल दिया है। भारत के साथ रिश्तों में आई इस दरार को ठीक करना आसान नहीं होगा, और ट्रंप प्रशासन को अब अपने ही घर में बढ़ते विरोध का सामना करना पड़ रहा है।

मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में श्रद्धा पाण्डेय ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

‘द बंगाल फाइल्स’ की स्क्रीनिंग मुस्लिम लीग के मेंबर ही रोकेंगे… विवेक अग्निहोत्री ने बंगाल में फिल्म की रोक पर उठाए सवाल: ममता बनर्जी से पूछा- जब सेंसर बोर्ड ने पास कर दिया, तो TMC को आपत्ति क्यों?

फिल्म द बंगाल फाइल्स को लेकर बंगाल की सियासत में उबाल आ गया है। फिल्म के डायरेक्टर विवेक अग्निहोत्री ने हाल ही में X (पहले ट्विटर) पर एक वीडियो शेयर करके हुए पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को खुला संदेश दिया है। वीडियो में उन्होंने आरोप लगाया कि उनकी फिल्म ‘द बंगाल फाइल्स’ को बंगाल में जानबूझकर बैन करने या दबाने की कोशिश की जा रही है। उनका कहना है कि थिएटर मालिकों पर इतना ज़्यादा पॉलिटिकल प्रेशर डाला जा रहा है कि वो डर के मारे फिल्म दिखाने को तैयार नहीं हैं।

फिल्म 5 सितंबर 2025 को पूरे देश और दुनिया में रिलीज होनी है। डायरेक्टर विवेक अग्निहोत्री ने दावा किया कि 16 अगस्त 2025 को जब फिल्म का ट्रेलर कोलकाता के एक होटल में प्राइवेट तौर पर दिखाया जा रहा था, तब पुलिस ने आकर रोक दिया।

फिल्म पर बन रही है बैन की स्क्रिप्ट?

विवेक अग्निहोत्री ने वीडियो में बताया कि TMC कार्यकर्ता लगातार फिल्म को बैन करने की माँग कर रहे हैं और उनके खिलाफ कई बेबुनियाद FIR दर्ज करवाई गई हैं। उन्होंने ममता बनर्जी से हाथ जोड़कर अपील की कि इस फिल्म को बगैर किसी रोक-टोक के बंगाल में रिलीज़ होने दिया जाए, क्योंकि यह भारत के संविधान और फ्री स्पीच के अधिकारों का सम्मान होगा। विवेक अग्निहोत्री ने कहा कि सेंसर बोर्ड (CBFC) ने फिल्म पास कर दी है, तो फिर अब इसे रोकना संविधान के खिलाफ होगा।

बंगाल का इतिहास क्यों छुपाया जा रहा है?– अग्निहोत्री का सवाल

डायरेक्टर विवेक अग्निहोत्री का कहना है कि डायरेक्ट एक्शन डे और नोआखाली नरसंहार जैसे बड़े ऐतिहासिक सचों को भारत की नई पीढ़ी से छुपाया जा रहा है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे दुनिया में हर बच्चा होलोकॉस्ट, स्लेवरी या हिरोशिमा के बारे में जानता है, वैसे ही भारत के बच्चों को भी अपने इतिहास के काले पन्नों को जानने का हक है। उन्होंने पूछा – क्या हिन्दुओं के दर्द पर फिल्म बनाना गुनाह है? विवेक अग्निहोत्री ने आगे कहा कि डायरेक्ट एक्शन डे और नोआखाली के हिंदू जैनोसाइट के सत्य को कोई बेंगोली कभी बैन कर ही नहीं सकता। अगर वो मुस्लिम लीग का मेंबर नहीं है तो।

यह फिल्म किसी समुदाय के खिलाफ नहीं, सिर्फ सच्चाई के साथ

डायरेक्टर विवेक अग्निहोत्री ने ज़ोर देकर कहा कि ‘द बंगाल फाइल्स’ किसी धर्म या समुदाय के खिलाफ नहीं है, बल्कि उन लोगों के खिलाफ है जिन्होंने इंसानियत को कुचलना चाहते हैं और अब भी सच को दबाना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि अगर इस फिल्म को बैन किया गया, तो यह उन हजारों पीड़ितों की आत्मा-पीड़ा का अपमान होगा। विवेक अग्निहोत्री ने कहा कि घावों को छुपाने से नफरत बढ़ती है, लेकिन जब सच्चाई सामने आती है तो हीलिंग शुरू होती है।

फिल्म का विषय – 1946 के नरसंहार की अनसुनी दास्तान

‘द बंगाल फाइल्स’ फिल्म 1946 में अविभाजित बंगाल में हुए हिंदू नरसंहार पर आधारित है। फिल्म में डायरेक्ट एक्शन डे, कलकत्ता दंगे और नोआखाली जैसे घटनाओं को दिखाया गया है, जहाँ हजारों हिंदुओं की हत्या, महिलाओं के साथ बलात्कार और लाखों का पलायन हुआ था। विवेक अग्निहोत्री का दावा है कि यह इतिहास अब तक दबा कर रखा गया था और उनकी फिल्म उसी सच को सामने लाने की कोशिश है।

फिल्म का प्रीमियर अमेरिका में हो चुका है, जहाँ खासकर बंगाली समुदाय और उनके युवाओं ने फिल्म को सराहा। विवेक अग्निहोत्री ने बताया कि कई लोगों ने उन्हें कहा कि ‘इस फिल्म से उनकी हीलिंग शुरू होती है।’ अब विवेक अग्निहोत्री चाहते हैं कि भारत में भी लोग इस सच को जानें और फिल्म बिना किसी रुकावट के रिलीज हो।

क्या है स्वदेशी ‘विक्रम 3201’ जो PM मोदी को सौंपा गया, जानिए पहले ‘मेड इन भारत’ चिप के बारे में सब कुछ: देश में लग रहे है 5 सेमीकंडक्टर प्लांट

केन्द्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने सेमीकॉन इंडिया 2025 के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भारत का पहला ‘मेड इन इंडिया’ चिप विक्रम 32 बिट प्रोसेसर (Vikram-32 bit processor chip)और चार सेमीकंडक्टर टेस्ट चिप सौंपा। भारत अभी तक विदेशों से चिप आयात करता रहा है। अब विदेशी चिप पर भारत की निर्भरता कम करने के प्रयासों में यह एक मील का पत्थर साबित होगा।

इसरो ने बनाया स्वदेशी विक्रम-3201 चिप

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) की सेमीकंडक्टर लैब (एससीएल) में इसे विकसित किया गया है। विक्रम चिप देश का पहला स्वदेशी 32-बिट माइक्रोप्रोसेसर है, जिसे विशेष रूप से स्पेस लॉन्च व्हीकल्स के लिए डिजाइन किया गया है। किसी भी डिवाइस के लिए चिप ‘ब्रेन’ की तरह काम करता है।

‘विक्रम’ के शुरुआती बैच का पीएसएलवी-सी 60 मिशन के दौरान सफलता पूर्वक इस्तेमाल किया गया था। इसलिए अंतरिक्ष के क्षेत्र में भविष्य में भी इसके इस्तेमाल की काफी संभावना है।

2021 में भारत में सेमीकंडक्टर मिशन की शुरुआत हुई थी। इसके सिर्फ 3.5 वर्षों में भारत एक प्रमुख उपभोक्ता से चिप निर्माता के रूप में उभरकर सामने आया है। ये अनुसंधान एवं विकास को लेकर सरकारी नीतियों और मजबूत आर्थिक विकास को दर्शाता है। विक्रम का निर्माण और पैकेजिंग पंजाब के मोहाली में SCL की 180nm CMOS में किया गया है।

विक्रम 32-बिट चिप की खासियत

विक्रम-32 एक कंप्यूटर चिप है, जो कई अलग-अलग काम एक साथ कर सकती है। यह दशमलव संख्याओं (जैसे 3.14) के साथ काम करती है और इसे 32-बिट डिजाइन का उपयोग करके बनाया गया है। इसका मतलब है कि चिप एक बार में 32 बिट्स के टुकड़ों में डेटा संसाधित करती है। अंतरिक्ष में प्रक्षेपण के दौरान यान के अत्यधिक तापमान और दूसरी दिक्कतों के हिसाब से इसे डिजाइन किया गया है।

इसरो के अनुसार, इसमें पर्याप्त मेमोरी है और उपग्रहों और अंतरिक्ष यानों को प्रक्षेपित करने के लिए जरूरी निर्देशों का पालन करने में ये सक्षम है। आने वाले वक्त में रक्षा, एयरोस्पेस, ऑटोमोटिव और ऊर्जा क्षेत्रों में इसका इस्तेमाल किया जा सकता है। इसलिए इस चिप का रणनीतिक महत्वपूर्ण भी है।

क्या होता है सेमीकंडक्टर चिप

सेमीकंडक्टर चिप असल में सिलिकॉन सर्किट बोर्ड होता है। ये डेटा प्रोसेसिंग, स्टोरेज, कंट्रोल्स और कम्युनिकेशन्स समेत कई काम करता है। दरअसल ये किसी भी डिवाइस या गैजेट का ब्रेन होता है।

सेमिकॉन इंडिया 2025 में प्रधानमंत्री को पहली “मेड-इन-इंडिया” चिप सौंपते हुए, केन्द्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने भारत की प्रगति में सेमीकंडक्टर के विकास की बात भी कही। उन्होंने कहा कि पाँच नई सेमीकंडक्टर इकाइयों का निर्माण कार्य चल रहा है। साथ ही 6 राज्यों में 1.60 लाख करोड़ रुपए से अधिक के निवेश वाली 10 प्रमुख परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है।

पीएम मोदी ने नई दिल्ली की यशोभूमि में मंगलवार (2 सितंबर 2025) को सेमीकॉन इंडिया 2025 (Semicon India 2025) का उद्घाटन किया। इस मौके पर चिप को भी लॉन्च किया गया। इस सबसे बड़े सेमीकंडक्टर इलेक्ट्रोनिक्स शो में 33 देशों से आए करीब 350 से अधिक कंपनियाँ शामिल हुई।

छोटे से चिप में दुनिया सिमटी- पीएम

इस मौके पर पीएम ने कहा कि पहले दुनिया का भाग्य तेल की कुओं से तय होता था, इस आधार पर ग्लोबल इकोनॉमी ऊपर नीचे होती रहती थी। लेकिन 21वीं शताब्दी की इकोनॉमी छोटे से चिप में सिमट कर रह गयी है। ये चिप भले छोटी सी है लेकिन इसमें दुनिया की प्रगति को गति देने की ताकत है। इसीलिए आज सेमीकंडक्टर का वैश्विक बाजार 600 अरब डॉलर तक पहुँच रहा है और अगले कुछ वर्षों में यह 1 ट्रिलियन डॉलर को भी पार कर जाएगा, इसमें अहम हिस्सा भारत का होगा।

16 दिन, 23 जिले, 1300 किमी, 67 विधानसभा… ‘वोटर अधिकार यात्रा’ से पहाड़ (बिहार) खोदने निकले थे राहुल गाँधी, चुहिया ने तेजस्वी यादव को कुतरा: न एजेंडा चला, न जन समर्थन मिला

बिहार में राहुल गाँधी की वोटर अधिकार यात्रा 16 दिन तक चली और अब खत्म हो चुकी है। ये यात्रा बिहार के 23 जिलों, 1300 किलोमीटर और 67 विधानसभा सीटों से होकर गुजरी। वैसे तो इस यात्रा का मकसद था बिहार विधानसभा चुनाव से पहले वोट चोरी का मुद्दा उठाकर जनता का समर्थन हासिल करना और इंडी गठबंधन को मजबूत करना। लेकिन नतीजा उल्टा रहा।

इस यात्रा की अगुवाई करने वाली कॉन्ग्रेस पार्टी न तो जनता का भरोसा जीत पाई गया, न ही गठबंधन के भीतर एकजुटता दिख पाई। यात्रा के दौरान विवाद, आपसी मतभेद और स्थानीय लोगों की उदासीनता ने इसे चर्चा का विषय बना दिया। आइए, इस यात्रा के हर पहलू को विस्तार से समझते हैं।

वोटर अधिकार यात्रा का मकसद और उसकी विफलता

राहुल गाँधी ने वोटर अधिकार यात्रा की शुरुआत सासाराम से की थी, जिसमें आरजेडी नेता तेजस्वी यादव उनके साथ थे। इसका लक्ष्य था वोट चोरी को बड़ा मुद्दा बनाना और बिहार की जनता को यह बताना कि उनके वोटिंग अधिकार खतरे में हैं। साथ ही इंडी गठबंधन को एकजुट दिखाकर तेजस्वी यादव को बिहार में मुख्यमंत्री पद का चेहरा बनाना भी इसका उद्देश्य था। लेकिन ये दोनों ही लक्ष्य पूरे नहीं हो सके।

स्थानीय लोगों ने इस यात्रा को ज्यादा तवज्जो नहीं दी। दैनिक भास्कर से बातचीत में सीनियर जर्नलिस्ट संजय कौशिक कहते हैं, “यात्रा का सबसे बड़ा नुकसान मुद्दे के चयन में हुआ। वोट चोरी का मुद्दा बिहार की जनता के बीच गूँज नहीं सका। लोग SIR (स्पेशल इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन) को जरूरी मानते हैं, क्योंकि उनका मानना है कि वोटर लिस्ट में बाहरी लोग, घुसपैठिए और मृत वोटरों के नाम हटाए जाने चाहिए।” इस वजह से राहुल गाँधी को स्थानीय समर्थन नहीं मिला।

राहुल गाँधी की वोटर अधिकार यात्रा की कवरेज ऑपइंडिया ने भी की। इस दौरान हमारी टीम ने लोगों से बातचीत की। लोगों ने राहुल गाँधी की इस यात्रा तो न सिर्फ खारिज किया, बल्कि उन्होंने बिहार SIR को बेहद जरूरी बताया। स्थानीय लोग तो घुसपैठियों की समस्या से परेशान भी दिखे।

यात्रा का रूट मैप भी मुस्लिम बहुल इलाकों को ध्यान में रखकर बनाया गया था, ताकि इस समुदाय को इंडी गठबंधन की ओर आकर्षित किया जा सके। सासाराम, रोहतास से निकली यात्रा औरंगाबाद, गया, वजीरगंज, शेखपुरा, मुंगेर से होकर भागलपुर, कटिहार, पूर्णिया, सुपौल होते हुए दरभंगा, सीतामढ़ी, बेतिया, फिर गोपालगंज, छपरा, भोजपुर होते हुए पटना में खत्म हुई। लेकिन यह रणनीति भी कारगर नहीं रही। आरा जैसे इलाकों में वामपंथी दलों को जोड़ा गया, लेकिन वहाँ भी भीड़ जुटाने में नाकामी मिली।

गठबंधन में खटास और तेजस्वी की छवि पर असर

इंडी गठबंधन में शामिल आरजेडी को उम्मीद थी कि यह यात्रा तेजस्वी यादव को बिहार में मुख्यमंत्री पद का चेहरा बनाएगी। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। यात्रा के दौरान राहुल गाँधी ने सारा ध्यान अपनी ओर खींच लिया, जिससे तेजस्वी की छवि को नुकसान हुआ। दैनिक भास्कर से बातचीत में सीनियर जर्नलिस्ट नचिकेता नारायण कहते हैं, “राहुल गाँधी ने तेजस्वी को मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करने से बचकर गठबंधन की अंदरूनी खटास को उजागर कर दिया।”

इसके अलावा आरजेडी और कॉन्ग्रेस के बीच सीट बँटवारे को लेकर भी तनाव सामने आया। यात्रा से पहले चर्चा थी कि कॉन्ग्रेस को महागठबंधन में 40 सीटें भी नहीं मिलेंगी। लेकिन यात्रा के बाद लगता है कि कॉन्ग्रेस कुछ ज्यादा सीटें हासिल कर सकती है। फिर भी जमीनी स्तर पर इसका कोई खास फायदा नहीं दिखता।

विवादों ने डुबोई वोटर अधिकार यात्रा की नैया

यात्रा के दौरान कई विवादों ने इसे और कमजोर किया। सबसे बड़ा विवाद तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के शामिल होने पर हुआ। स्टालिन 27 अगस्त को मुजफ्फरपुर में यात्रा में शामिल हुए। लेकिन उनकी पार्टी डीएमके के नेताओं के पुराने बयान लोगों को याद आ गए।

डीएमके सांसद दयानिधि मारन ने बिहार और यूपी के लोगों को ‘टॉयलेट साफ करने वाला’ कहा था, जबकि स्टालिन के बेटे उदयनिधि ने सनातन धर्म को बीमारी बताया था। बीजेपी प्रवक्ता प्रभात मालाकार ने कहा, “यह यात्रा बिहार और बिहारियों के अपमान की यात्रा थी। राहुल और तेजस्वी उन लोगों के साथ घूमे, जिन्होंने बिहार के डीएनए पर सवाल उठाए।”

दूसरा बड़ा विवाद दरभंगा में हुआ, जहाँ मंच से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपशब्द कहे गए। मोहम्मद रिजवी को इस मामले में गिरफ्तार किया गया। इस घटना का वीडियो वायरल हो गया और बीजेपी ने इसे पूरे देश में मुद्दा बनाया।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने असम दौरे में कहा, “राहुल गाँधी को पीएम मोदी और उनकी दिवंगत माँ के लिए कहे गए अपशब्दों पर माफी माँगनी चाहिए।” खुद पीएम मोदी ने भी इस मुद्दे को जनता के सामने रखा। ऐसे में इस विवाद ने यात्रा की साख को और नुकसान पहुँचाया।

पप्पू यादव और कन्हैया कुमार का रोल सीमित, बैकफुट पर रहे

यात्रा में पप्पू यादव और कन्हैया कुमार जैसे नेताओं को भी शामिल किया गया, लेकिन इनका रोल भी विवादों से अछूता नहीं रहा। पप्पू यादव को पूर्णिया में इस्तेमाल किया गया, लेकिन बाद में उन्हें मंच पर जगह तक नहीं दी गई। पटना में वे मंच के पीछे बैठे दिखे, जबकि उन्होंने तेजस्वी यादव को ‘जननायक’ तक कह दिया था। कन्हैया कुमार शुरुआत में यात्रा में दिखे, लेकिन बाद में गायब हो गए।

पप्पू यादव और कन्हैया कुमार जैसों को अभी भी आरजेडी कबूल करने को तैयार नहीं है। ऐसे में आरजेडी ने इन दोनों को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया, जिससे गठबंधन में आपसी अविश्वास की खाई और गहरी हो गई।

तेजस्वी के मुद्दों का गायब होना

आरजेडी को उम्मीद थी कि इस यात्रा से तेजस्वी यादव को बिहार में इंडी गठबंधन का फ्रंट चेहरा बनाया जाएगा, लेकिन हुआ उल्टा। सारा फुटेज खा गए राहुल गाँधी। इसकी वजह से कॉन्ग्रेस और आरजेडी के बीच मतभेद भी सामने आ गई कि राहुल गाँधी तेजस्वी यादव पर हावी हो गए। इसकी वजह से यात्रा के समापन को बदल दिया गया और बेहद निराशा भरे माहौल में पटना में यात्रा को खत्म कर दिया गया।

बिहार में एक वर्ग है- जिसने सिर्फ जंगल राज की कहानियों को पढ़ा है, उस समय के बारे में सिर्फ सुना है, उन्होंने जंगलराज को जिया नहीं है। मतदाताओं के ऐसे वर्ग ने 20 सालों से नीतीश कुमार को ही सत्ता में बने देखा है। जंगलराज को न जानने वाले इस मतदाता वर्ग में एंटी इन्कमबेंसी फैक्टर बना हुआ था। यही वर्ग मजबूरी के विकल्प के तौर पर तेजस्वी यादव की तरफ भी देख रहे थे। 2020 में भी देख रहे थे, अभी भी देख रहे हैं।

यही वजह है कि तेजस्वी यादव कलम, रोजगार इन सब चीजों की बात भी करते थे। लेकिन कॉन्ग्रेस ने अपने वोट चोरी का जो फर्जी एजेंडा थोप दिया। उससे तेजस्वी यादव के मुद्दे खो गए। साफ है – कॉन्ग्रेस के वोट चोरी के एजेंडे ने तेजस्वी के इन मुद्दों को दबा दिया।

इन सब की वजह से जो नए मतदाताओं के बीच कलम-रोजगार जैसे मजबूरी के मुद्दों के बीत तेजस्वी उभर रहे थे, वो सब भी तेजस्वी और इंडी गठबंधन के हाथों से फिसल गए। नचिकेता नारायण कहते हैं, “कॉन्ग्रेस खुद को RJD के बराबर खड़ा करने में कामयाब रही। इसके अलावा उसे बहुत ज्यादा फायदा नहीं हुआ। वोट चोरी का मुद्दा लोगों ने नकार दिया। यात्रा के दौरान दिखाए गए सबूत या तो गलत निकले या जनता ने उन्हें स्वीकार नहीं किया।”

क्या मिला इंडी गठबंधन को?

यात्रा से इंडी गठबंधन को मिला-जुला फायदा हुआ। कॉन्ग्रेस के लिए यह संगठन को मजबूत करने का मौका था। संजय कौशिक कहते हैं, “बिहार में कॉन्ग्रेस का संगठन लगभग खत्म हो चुका था। इस यात्रा ने कार्यकर्ताओं में नई जान फूँकी।” लेकिन वोटों में इसका कितना फायदा होगा, यह साफ नहीं है।

आरजेडी के लिए यात्रा फायदे का सौदा नहीं रही। दैनिक भास्कर से बातचीत में सीनियर जर्नलिस्ट मणिकांत ठाकुर कहते हैं, “RJD के लिए यह यात्रा फायदे का सौदा साबित नहीं हुई। उसे इकलौता फायदा मुस्लिम वोटों का बंटवारा रोकने का मिला। रणनीतिक रूप से उसे नुकसान ही हुआ।” हालाँकि, नचिकेता नारायण का मानना है कि राहुल और तेजस्वी की केमिस्ट्री से सीट बँटवारे और वोट ट्रांसफर में आसानी हो सकती है।

भाकपा (माले) जैसी छोटी पार्टियों को इस यात्रा से कुछ फायदा हुआ। पार्टी के जनरल सेक्रेटरी दीपांकर भट्टाचार्य पूरे 16 दिन राहुल के साथ दिखे, जिससे उनकी पार्टी की अहमियत बढ़ी।

क्या बदला बिहार का सियासी माहौल?

यात्रा के रूट में शामिल 67 विधानसभा सीटों में से 2020 में एनडीए ने 39 सीटें जीती थीं, जबकि कॉन्ग्रेस को सिर्फ 9 सीटें मिली थीं। राहुल गाँधी के सामने इन सीटों पर एनडीए की मजबूती को तोड़ने की चुनौती थी, लेकिन ऐसा हो नहीं सका। यात्रा के समापन में पटना के गाँधी मैदान में बड़ी रैली की योजना थी, लेकिन भीड़ न जुटने की वजह से इसे रोडशो में बदल दिया गया। राहुल गाँधी जल्दी ही बिहार से निकल गए।

खोया ज्यादा, पाया कम

कुल मिलाकर इस यात्रा से पहले जो चर्चा थी कि इंडी गठबंधन में कॉन्ग्रेस को 40 सीटें भी नहीं मिलेंगी, वो इस यात्रा के बाद बदल गया है। अब लगता है कि शायद कॉन्ग्रेस कुछ ज्यादा सीट झटक ले। हालाँकि इस यात्रा से ये भी साफ हो गया है कि कॉन्ग्रेस भले ही कुछ सीटें इंडी गठबंधन में ज्यादा ले ले, लेकिन जमीन पर उसका कोई फायदा नहीं मिलने वाला। क्योंकि सालों तक विपक्ष में रहने के बावजूद न तो कॉन्ग्रेस के पास कोई मुद्दा है और न ही आरजेडी के पास। ऐसे में राहुल गाँधी की वोटर अधिकार यात्रा का जमीन पर कोई खास फर्क पड़ा हो, ऐसा बिल्कुल भी नहीं दिखता है।

क्या है RTE जिससे अल्पसंख्यक संस्थानों को छूट देने के अपने ही फैसले पर फिर से विचार करेगा सुप्रीम कोर्ट, 2 जजों की बेंच ने संविधान पीठ के फैसले पर उठाए सवाल

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (1 सितंबर 2025) को अपने ही 2014 के उस फैसले पर दोबारा विचार करने को कहा है जिसमें अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों को शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE) से छूट दी गई थी। कोर्ट का कहना है कि कई संस्थान केवल इस कानून से बचने के लिए अल्पसंख्यक दर्जा प्राप्त करने की कोशिश कर रहे हैं।

यह टिप्पणी न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति मनमोहन की पीठ ने की। यह छूट समान शिक्षा व्यवस्था और सामाजिक समावेशिता के सिद्धांतों के खिलाफ हो सकती है।

जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने अंजुमन इशात-ए-तालीम ट्रस्ट (Anjuman Ishaat-e-Taleem Trust) बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले की सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की।

उन्होंने इस मामले को बड़ी पीठ के पास भेजते हुए कहा कि 2014 का निर्णय संविधान के अनुच्छेद 21A (शिक्षा का अधिकार) और अनुच्छेद 30(1) (अल्पसंख्यकों को संस्थान स्थापित करने का अधिकार) के बीच संतुलन स्थापित नहीं कर रहा है। हालाँकि कोर्ट ने यह भी कहा कि दोनों अनुच्छेद एक-दूसरे के विरोध में नहीं हैं और इन्हें समन्वय के साथ लागू किया जा सकता है।

पीठ ने अपनी टिप्पणी में ये भी कहा कि RTE की जिम्मेदारियों से बचने के लिए संस्थानों का खुद को अल्पसंख्यक घोषित करना कमजोर वर्गों के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से वंचित कर रहा है।

साथ ही RTE के तहत शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) जैसी गुणवत्ता सुनिश्चित करने वाली शर्तें भी इन संस्थानों पर लागू नहीं होतीं। इसके कारण शिक्षा की गुणवत्ता पर भी असर पड़ता है।

शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE) क्या है?

शिक्षा का अधिकार अधिनियम-2009 (Right to Education Act) भारत सरकार की ओर से पारित एक कानून है, जिसके तहत 6 से 14 वर्ष की उम्र के बच्चों को नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार दिया गया है।

इस कानून की धारा 12(1)(c) के तहत निजी स्कूलों को अपनी 25% सीटें आर्थिक रूप से कमजोर और वंचित वर्गों के बच्चों के लिए आरक्षित करनी होती हैं। इसका उद्देश्य शिक्षा में सभी वर्गों के लिए समानता और सामाजिक समावेश सुनिश्चित करना है।

जजमेंट की कॉपी का स्क्रीनशॉट

2014 के फैसले पर उठे सवाल

पीठ ने 2014 में संविधान पीठ द्वारा दिए गए प्रमति एजुकेशनल एंड कल्चरल ट्रस्ट (Pramati Educational and Cultural Trust) बनाम भारत संघ के फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा कि यह निर्णय सार्वभौमिक प्राथमिक शिक्षा की नींव को कमजोर कर सकता है। साथ ही इससे समाज में अलग-अलग वर्गों में बँटवारा हो सकता है और असमानता की जड़ और गहरी हो सकती है।

कोर्ट ने यह चिंता जताई कि कई अल्पसंख्यक स्कूल RTE अधिनियम द्वारा निर्धारित सुविधाएँ नहीं दे रहे हैं। इसके कारण वहाँ पर पढ़ रहे विद्यार्थी समानता और पहचान की भावना से वंचित हो रहे हैं।

कोर्ट ने कहा, “RTE अधिनियम से अल्पसंख्यक संस्थानों को छूट देना समान शिक्षा की कल्पना को खत्म करता है और अनुच्छेद 21A की समावेशिता और सार्वभौमिकता की भावना को कमजोर करता है। यह बच्चों को जाति, वर्ग, धर्म और समुदाय के आधार पर जोड़ने के बजाय विभाजन को बढ़ाता है और साझा शिक्षण स्थानों की बेहतर क्षमता को कम करता है।”

कोर्ट ने यह भी कहा कि शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) RTE अधिनियम के तहत एक अनिवार्य शर्त है।गैर-अल्पसंख्यक स्कूलों में कार्यरत शिक्षकों को इसे उत्तीर्ण करना जरूरी होगा।

प्रमति मामले के फैसले का संदर्भ लेते हुए उन्होंने कहा कि इससे सार्वभौमिक प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता से समझौता हो सकता है और इसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि संविधान के अनुच्छेद 30(1) का उद्देश्य अल्पसंख्यकों की भाषाई और सांस्कृतिक पहचान को संरक्षित करना है, न कि उन्हें सार्वभौमिक मानकों से अलग कर एक अलग प्रणाली में चलाना।

मान्यता मिली तो समानता भी दें शिक्षण संस्थान

कोर्ट ने यह भी कहा कि अल्पसंख्यक संस्थानों को उनकी सांस्कृतिक और भाषाई पहचान के मामलों में स्वायत्तता दी जानी चाहिए, लेकिन जब वे औपचारिक शिक्षा प्रणाली में प्रवेश करते हैं और राज्य से मान्यता, संबद्धता या सहायता प्राप्त करते हैं तो उन्हें समावेशी और शिक्षित समाज के निर्माण के लिए भी एक समान व्यवहार करना चाहिए और व्यापक संवैधानिक परियोजना में भाग लेना चाहिए।

कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि प्रमति का निर्णय केवल RTE की धारा 12(1)(c) पर आधारित था। इसमें कमजोर वर्गों के बच्चों के लिए 25% सीट आरक्षित करने की बात शामिल की गई है। जबकि शिक्षक योग्यता, संरचनात्मक मानक और बाल सुरक्षा उपायों जैसे मानकों पर इस फैसले में कोई चर्चा नहीं की गई।

कोर्ट के अनुसार, धारा 12(1)(c) का मतलब ये बिल्कुल नहीं है कि 25% कोटा के तहत प्रवेश पाने वाले बच्चे किसी विशेष या अन्य धर्म या भाषा वाले हों। यदि अल्पसंख्यक समुदाय के आर्थिक रूप से कमजोर या सामाजिक रूप से वंचित बच्चे इस कोटे के तहत प्रवेश लेते हैं तो क्या वास्तव में इसकी संख्या पर प्रश्न उठता है?

कोर्ट ने यह भी कहा कि अल्पसंख्यक छात्रों के न्यूनतम नामांकन पर स्पष्ट दिशानिर्देश न होने के कारण ही संस्थान बेरोकटोक अल्पसंख्यक दर्जा लेने में आगे बढ़ गए हैं।

4 सवालों पर होगा विचार

सुप्रीम कोर्ट ने चार अहम सवालों को बड़ी पीठ के समक्ष रखा है, जिनमें यह शामिल है कि क्या RTE की धारा 12(1)(c) को इस तरह पढ़ा जा सकता है कि वह अल्पसंख्यक समुदाय के भीतर भी वंचित वर्गों को लाभ पहुँचाए। कोर्ट ने यह भी पूछा है कि क्या 2014 का फैसला संविधान की मूल भावना के अनुरूप है?

इसके अलावा इसमें प्रमति फैसले से जुड़े दो सवाल भी हैं। कोर्ट ने पूछा कि क्या प्रमति मामले में लिया गया फैसला RTE अधिनियम को अल्पसंख्यक अधिकारों के खिलाफ घोषित किया जाना उचित था? साथ ही क्या संस्थानों के RTE की छूट के फैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए?

यह मामला अब संविधान पीठ के समक्ष जाएगा, जो यह तय करेगी कि क्या अल्पसंख्यक संस्थानों को RTE से पूरी तरह छूट देना न्यायसंगत है या नहीं। इस फैसले का असर देश भर के लाखों बच्चों की शिक्षा और सामाजिक समावेशिता पर पड़ सकता है।

मुस्लिम बनो, 3 बीवी पाओ… बरेली में अब्दुल मजीद का जो मदरसा था ‘धर्मांतरण का मरकज’, वह भी निकला अवैध: व्हाट्सएप ग्रुप में अश्लील तस्वीर-वीडियो पोस्ट कर फँसाते थे

बरेली में धर्मांतरण के बड़े गिरोह का खुलासा होने के बाद अब रोज़ नई परतें खुल रही हैं। ताजा जानकारी ये है कि गिरोह जिस मदरसे से हिंदुओं का धर्मांतरण करता था, वो मदरसा अवैध निकला है। इस मदरसे पर बुलडोजर चलाने की कार्यवाही के भी आदेश दिए जा चुके हैं।

धर्मांतरण गिरोह ने हिंदू युवकों को फँसाने के लिए 20+ व्हाट्सएप ग्रुप बनाए थे। इनमें अश्लील तस्वीरें और वीडियो भेजे जाते थे। इसके बाद लड़कों को शादी, जन्नत और ‘तीन बीवियाँ’ मिलने का लालच दिया जाता था। जो युवक दिलचस्पी दिखाते थे, उन्हें मदरसे में बुलाकर ब्रेनवॉश किया जाता था। अब तक कई युवक इस जाल में फँस चुके हैं।

किस तरह चलता था व्हाट्सएप वाला जाल

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक, गिरोह ने अलग-अलग नामों से कई व्हाट्सएप ग्रुप बना रखे थे। शुरू में इनमें सामान्य बातें होती थीं। फिर धीरे-धीरे ग्रुप में अश्लील वीडियो और लड़कियों की फोटो डाली जाती थीं। हिंदू लड़कों को शादी का झाँसा दिया जाता था। कहा जाता, ‘अगर मुस्लिम बन जाओगे तो तीन-चार बीवियाँ भी मिलेंगी और जन्नत भी।’ जो लड़के इस लालच में आ जाते, उन्हें मदरसे में बुलाकर लड़कियों और मौलानाओं के जरिए मानसिक रूप से तोड़ा जाता था।

मदरसे के अंदर युवकों को बताया जाता कि इस्लाम अपनाने से सारी परेशानियाँ खत्म हो जाएँगी। उन्हें कहा जाता कि मुस्लिम बनने पर नौकरी, घर, पैसा और खूबसूरत बीवी जैसी चीजें आसानी से मिलेंगी। कुछ युवकों को उर्दू सिखाई जाती थी। कुरान और हदीस पढ़ने को दी जाती थी। जब कोई युवक थोड़ा बहुत मजहबी जानकारी सीख जाता, तो उसे मौलवी बनने का सपना दिखाया जाता।

फैजनगर का मदरसा बना था धर्मांतरण की फैक्ट्री

बरेली से 30 किलोमीटर दूर फैजनगर का यह मदरसा 2014 में शुरू हुआ था। लेकिन असलियत में यह कोई शिक्षा देने वाली जगह नहीं थी। यह एक धर्मांतरण की फैक्ट्री बन चुका था, जहाँ युवकों का मानसिक रूप से ब्रेनवॉश किया जाता था।

इस मदरसे का कोई सरकारी रिकॉर्ड भी नहीं मिला है। यानी यह अवैध रूप से चलाया जा रहा था। यहाँ से बरामद हुआ अब्दुल मजीद का पैन कार्ड भी फर्जी निकला है।

कैसे टारगेट किए जाते थे युवक

गिरोह का टारगेट वे युवक होते थे जो अकेले रहते थे, आर्थिक रूप से कमजोर थे या फिर तलाकशुदा थे। गाँव-शहरों में ऐसे युवकों पर निगरानी रखी जाती थी। फिर धीरे-धीरे उन्हें जाल में फँसाया जाता था। गिरोह का संचालन अब्दुल मजीद करता था। सलमान, आरिफ और फहीम जैसे लोग उसका साथ देते थे।

पुलिस ने कुछ दिन पहले प्रोफेसर प्रभात उपाध्याय को एक मदरसे से बंधक बना कर छुड़ाया। वो नेत्रहीन हैं और उनका जबरन धर्मांतरण करवाया जा रहा था। प्रभात का नाम बदलकर ‘हामिद’ रख दिया गया था और उनका खतना किया जा रहा था। इसी कार्रवाई के दौरान चार आरोपितों को गिरफ्तार किया गया, जिनमें अब्दुल मजीद भी शामिल था।

पुलिस को आरोपितों के पास से ज़ाकिर नाइक की किताबें और 21 से ज़्यादा बैंक खातों का पता चला है, जिनमें ₹13 लाख से ज़्यादा का लेनदेन हुआ है। पुलिस का मानना है कि इस गिरोह का नेटवर्क सिर्फ बरेली तक सीमित नहीं, बल्कि देश के 13 राज्यों तक फैला है और इसमें 200 से ज़्यादा मौलाना भी शामिल हो सकते हैं।