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अकाउंट: 56.16 करोड़, डिपॉजिट: ₹2.68 लाख करोड़, महिला खाताधारक: 31.31 करोड़… जानिए कैसे 11 साल में ‘प्रधानमंत्री जन धन’ से आम आदमी की मुट्ठी में आए बैंक

प्रधानमंत्री जन धन योजना के 11 साल पूरे हो गए। अब से ग्यारह साल पहले भारत आर्थिक रूप से बहुत अलग था। करोड़ों लोग ऐसे थे जिनके पास न तो कोई बैंक खाता था और न ही औपचारिक वित्तीय सेवाओं तक पहुँच। खासकर ग्रामीण और पिछड़े इलाकों में आम लोग अपनी मेहनत की कमाई घर में रखते थे या फिर ऊँचे ब्याज पर साहूकारों से कर्ज लेते थे। नतीजा यह होता कि गरीबी और कर्ज का बोझ कभी कम नहीं होता। आर्थिक सुरक्षा तो उन परिवारों के लिए दूर का सपना था।  

ऐसे माहौल में 28 अगस्त 2014 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री जन धन योजना (PMJDY) की शुरुआत की। इसका मकसद सीधा था, ‘हर भारतीय को बैंकिंग से जोड़ना, हर परिवार को वित्तीय पहचान देना और हर नागरिक को आर्थिक सुरक्षा दिलाना।’

इस योजना ने बैंकिंग की दुनिया को आम आदमी के दरवाजे तक पहुँचा दिया। जीरो बैलेंस खाते, आसान केवाईसी प्रक्रिया, रुपे डेबिट कार्ड और बीमा जैसी सुविधाओं ने गरीबों के लिए बैंक को सहज और सुलभ बना दिया।

ग्यारह साल का सफर और उपलब्धियाँ

ग्यारह साल के इस सफर में जन धन योजना ने जो बदलाव किए, वे अपने आप में ऐतिहासिक हैं। आज 56 करोड़ से ज्यादा जन धन खाते खोले जा चुके हैं। इन खातों में जमा राशि बढ़कर 2.67 लाख करोड़ रुपए तक पहुँच गई है, जबकि 2015 में यह महज़ 15,670 करोड़ रुपए थी।

इस योजना की सबसे अहम खासियत यह रही कि इसका सबसे बड़ा फायदा गरीब और ग्रामीण भारत को मिला। करीब 67% खाते गाँव और अर्ध-शहरी इलाकों में खुले और खास बात यह है कि कुल खातों में 56% महिलाओं के नाम पर हैं।

यानी पहली बार लाखों महिलाएँ अपनी आर्थिक पहचान के साथ बैंकिंग सिस्टम का हिस्सा बनीं। इन खातों के साथ सरकार ने सीधे लाभ पहुँचाने की व्यवस्था भी खड़ी की। अब मनरेगा की मजदूरी हो, गैस सब्सिडी हो या किसी अन्य योजना का लाभ सारा पैसा सीधे लाभार्थी के खाते में जाता है। बिचौलियों की भूमिका खत्म हो गई और लोगों का विश्वास भी बैंकिंग व्यवस्था में बढ़ा है।

महिलाओं और गरीबों के जीवन में बदलाव

जन धन योजना सिर्फ आँकड़ों तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसने करोड़ों परिवारों की जिंदगी बदल दी। गाँव की महिलाएँ, जो पहले नकद बचत रखती थीं, अब अपने खाते में पैसा जमा करती हैं।

दिहाड़ी मजदूरों और छोटे किसानों को सीधे खातों में मजदूरी और सब्सिडी मिलती है। दुर्घटना बीमा और ओवरड्राफ्ट सुविधा ने गरीब परिवारों को आकस्मिक हालात में सहारा दिया।

इस योजना ने डिजिटल भुगतान को भी नई गति दी है। अब तक 38 करोड़ से ज्यादा रुपे कार्ड जारी हो चुके हैं। यूपीआई और डिजिटल लेन-देन में भारत ने दुनिया में नेतृत्व हासिल किया है और इसमें जन धन योजना की बड़ी भूमिका रही है।

बने नए रेकॉर्ड और विश्व पहचान

जन धन योजना ने दुनिया में भी भारत का नाम रोशन किया। गिनीज वर्ल्ड रेकॉर्ड्स में इसका नाम शामिल हुआ जब सिर्फ एक हफ्ते में 1.8 करोड़ खाते खोले गए। यह किसी भी देश में अब तक की सबसे बड़ी वित्तीय समावेशन पहल साबित हुई।

ग्यारह सालों में औसत जमा राशि भी कई गुना बढ़ी है। 2015 में एक खाते में औसतन 1,300 रुपए रहते थे, जो अब बढ़कर लगभग 4,768 रुपए हो गए हैं। इसका मतलब है कि लोग न सिर्फ खाते खोल रहे हैं बल्कि नियमित रूप से उनमें बचत भी कर रहे हैं।

साल 2024-25 में ही करीब 6.9 लाख करोड़ रुपए विभिन्न सरकारी योजनाओं के तहत सीधे खातों में ट्रांसफर किए गए। यह सरकार की पारदर्शिता और जन धन योजना की सफलता का जीता-जागता सबूत है।

वित्तीय आजादी की ओर कदम

ग्यारह साल बाद आज साफ दिखता है कि प्रधानमंत्री जन धन योजना ने गरीब और वंचित तबकों की जिंदगी में वास्तविक बदलाव लाया है। यह केवल बैंक खाता खोलने की योजना नहीं रही, बल्कि सम्मान और आत्मनिर्भरता देने की एक राष्ट्रीय मुहिम बन चुकी है।

महिलाओं को आर्थिक ताकत मिली है, ग्रामीण इलाकों तक बैंकिंग की पहुँच हुई है और सरकारी योजनाओं का लाभ सीधे जनता तक पहुँचने लगा है। इस योजना ने भारत में वित्तीय समावेशन की परिभाषा बदल दी है।

रूस-यूक्रेन युद्ध तो असल में ‘मोदी का वॉर’… जहर उगलने से बाज नहीं आ रहा डोनाल्ड ट्रंप का सलाहकार पीटर नवारो: हर चीज के लिए बता रहा भारत को जिम्मेदार

अमेरिका आजकल भारत को नसीहत दे रहा है, उसकी बुराई कर रहा है और रूस-यूक्रेन युद्ध के लिए भारत को जिम्मेदार ठहरा रहा है। ये ट्रंप प्रशासन के अधिकारियों का रोज का काम बन गया है और भारतीयों के लिए मीम मटेरियल। मगर अब ट्रंप के व्यापार सलाहकार पीटर नवारो ने दावा किया कि यूक्रेन-रूस युद्ध किसी तरह ‘मोदी का युद्ध’ है, सिर्फ इसलिए क्योंकि भारत रूस से तेल खरीदता है।

ब्लूमबर्ग को दिए इंटरव्यू में व्हाइट हाउस के व्यापार सलाहकार पीटर नवारो ने भारत को इस बात के लिए जिम्मेदार ठहराया कि अमेरिका और यूरोप को यूक्रेन को रूस के हमले के खिलाफ फंडिंग करनी पड़ रही है।

नवारो ने गुस्से में कहा, “यूक्रेन हमसे और यूरोप से कहता है कि हमें और पैसे दो (युद्ध के लिए)। भारत जो कर रहा है, उसकी वजह से अमेरिका में सब हार रहे हैं। ग्राहक और कारोबारी हार रहे हैं; मजदूर हार रहे हैं क्योंकि भारत के ऊँचे टैरिफ की वजह से नौकरियाँ, कमाई और ज्यादा तनख्वाह का नुकसान हो रहा है। टैक्स देने वाले हार रहे हैं क्योंकि हमें मोदी के युद्ध को फंड करना पड़ रहा है।”

नवारो ने आगे कहा, “शांति का रास्ता कम से कम कुछ हद तक नई दिल्ली से होकर गुजरता है।” व्हाइट हाउस के व्यापार सलाहकार ने भारत को ‘घमंडी’ करार दिया क्योंकि वो अपनी ऊर्जा जरूरतों को प्राथमिकता देता है और सलाह दी कि उसे ‘लोकतंत्रों का साथ देना चाहिए।’

नवारो ने कहा, “भारतीय लोग इस बारे में बहुत घमंडी हैं। वो कहते हैं हमारे टैरिफ ऊँचे नहीं हैं। ये हमारा हक है। हम जिससे चाहें तेल खरीद सकते हैं। भारत तुम दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र हो। ठीक है? तो वैसे ही बर्ताव भी करो। लोकतंत्रों का साथ दो।”

नवारो ने भारत पर चीन के साथ रिश्ते सुधारने के लिए भी हमला बोला, मॉस्को और बीजिंग के साथ भारत के बढ़ते रिश्तों पर गुस्सा जाहिर किया, जिन्हें उन्होंने ‘तानाशाह’ बताया।

नवारो ने कहा, “तुम तानाशाहों के साथ जा रहे हो। चीन, तुम दशकों से उनके साथ चुपके-चुपके जंग लड़ रहे हो। उसने अक्साई चिन और तुम्हारी जमीन पर कब्जा किया। ये तुम्हारे दोस्त नहीं हैं, दोस्तों। ठीक है? और रूस.. अरे, चलो न।”

नवारो के बयान तब आए जब डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन द्वारा भारतीय सामान पर 50 फीसदी टैरिफ लागू हुआ, जो बुधवार (27 अगस्त 2025) से शुरू हो गया। 50 फीसदी टैरिफ में से 25 फीसदी इसलिए लगाया गया क्योंकि भारत रूस से तेल और सैन्य उपकरण खरीद रहा है, जिसे विदेश मंत्रालय ने ‘बेहद दुर्भाग्यपूर्ण’ बताया और अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने की बात दोहराई।

नवारो ने कितनी आसानी से रूस-यूक्रेन युद्ध को ‘मोदी का युद्ध’ कह दिया, जैसे कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दोनों देशों को लड़ने के लिए कहा हो ताकि भारत उससे पैसे कमा सके। अगर ये रूस और यूक्रेन के अलावा किसी का युद्ध है, तो वो अमेरिका का है। रूस-यूक्रेन युद्ध से किसी ने ज्यादा फायदा नहीं उठाया जितना अमेरिका ने।

भारत पर ‘रूसी युद्ध मशीन’ को बढ़ावा देने का आरोप लगाने से लेकर अब बिना सोचे-समझे रूस-यूक्रेन युद्ध को ‘मोदी का युद्ध’ कहने तक, अमेरिका ने अपने कामों पर गौर करना छोड़ दिया। जब नवारो भारत पर हमला बोल रहे हैं, तब 16 अगस्त को अलास्का में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ मुलाकात में पता चला कि पिछले कुछ महीनों में अमेरिका-रूस का द्विपक्षीय व्यापार 20 फीसदी से ज्यादा बढ़ गया है, जिससे ट्रंप के उन दावों की पोल खुलती है कि अमेरिका मॉस्को पर युद्ध खत्म करने का दबाव डाल रहा है।

खास बात ये है कि 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से अमेरिकी तेल कंपनियों ने रिकॉर्ड मुनाफा कमाया है। लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) निर्यात, हथियार बिक्री और युद्ध से जुड़े कई मौकों से अमेरिका इस युद्ध का सबसे बड़ा फायदा उठाने वाला है।

अमेरिका ने यूरोप को अपना सस्ता LNG घरेलू कीमत से चार गुना ज्यादा कीमत पर बेचा, जिसे ‘युद्ध की वजह से आपूर्ति में रुकावट’ बताया गया और यूरोप की वैकल्पिक जरूरतों का फायदा उठाया। 2022 में अमेरिकी तेल और गैस कंपनियों जैसे शेवरॉन और एक्सॉनमोबिल ने युद्ध से पहले 2021 की तुलना में 125 फीसदी ज्यादा मुनाफा कमाया।

हाल ही में एक्सॉन मोबिल रूस के सखालिन-1 तेल और गैस प्रोजेक्ट में वापसी की योजना बना रहा है। अलास्का में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और उनके अमेरिकी समकक्ष के बीच मुलाकात में रूस को अपने लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) प्रोजेक्ट्स, जैसे आर्कटिक LNG 2 के लिए अमेरिकी उपकरण खरीदने की इजाजत देने पर बात हुई, भले ही ये अभी प्रतिबंधों के तहत है। रूस को ‘सजा’ देने और पुतिन की ‘युद्ध मशीन’ को रोकने की बात तो दूर की है।

ऊर्जा के अलावा अमेरिका ने रूस-यूक्रेन युद्ध से अपनी रक्षा निर्यात के जरिए भी फायदा उठाया। अमेरिका ने यूक्रेन को 19 अरब डॉलर से ज्यादा के सैन्य उपकरण दिए, जिससे लॉकहीड मार्टिन और रेथियॉन जैसी अमेरिकी रक्षा कंपनियों के शेयरों की कीमत बढ़ गई।

ये भी नहीं भूलना चाहिए कि अमेरिका ने बेशर्मी से दावा किया कि यूक्रेन को दी जाने वाली रक्षा आपूर्ति अमेरिकी अर्थव्यवस्था को मजबूत कर रही है। पहले अमेरिका 95 अरब डॉलर का एक अतिरिक्त रक्षा बिल लाया, जिसमें यूक्रेन के लिए 60.7 अरब डॉलर रखे गए और वादा किया कि इसके 64 फीसदी फंड अमेरिकी रक्षा उद्योग को ‘पुनर्जीवित’ करेंगे।

अब डोनाल्ड ट्रंप यूरोपीय देशों के जरिए यूक्रेन को हथियार बेच रहे हैं, वो भी 10 फीसदी ज्यादा कीमत पर, ताकि अमेरिका का खजाना भरे, जबकि रूस और यूक्रेन के लोग अपनी जान गँवा रहे हैं। ट्रंप ने यूक्रेन को सुरक्षा गारंटी देने की अमेरिकी भागीदारी की कीमत भी तय कर दी है।

जब अमेरिका यूक्रेन के लिए यूरोप को 10 फीसदी ज्यादा कीमत पर हथियार बेचता है, तो ये ठीक है। लेकिन जब भारत अपनी जरूरतों के लिए रूसी तेल खरीदता है और अपने पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स यूरोप और अमेरिका को बेचता है, तो भारत रूसी युद्ध मशीन को बढ़ावा दे रहा है और ये अचानक मोदी का युद्ध बन जाता है।

अमेरिका ने रूस-यूक्रेन युद्ध से मुनाफा कमाया और अब शांति की दलाली करके भी मुनाफा कमाने की कोशिश कर रहा है। अगर रूस-यूक्रेन युद्ध को खत्म करने की शांति वार्ता में युद्धविराम, क्षेत्रीय वापसी या स्थायी शांति की गारंटी से ज्यादा अमेरिका को रूस और यूक्रेन से लाभकारी व्यापार सौदे मिल रहे हैं, तो साफ है कि अमेरिका को शांति नहीं, सिर्फ मुनाफा चाहिए।

रूस-यूक्रेन युद्ध से मुनाफा कमाने के अलावा अमेरिका ने मॉस्को के साथ अपने व्यापारिक रिश्ते भी जारी रखे हैं। गैर-लौह धातु, उर्वरक, अकार्बनिक रसायन, परमाणु रिएक्टर और मशीनरी, तैयार पशु चारा, लोहा और इस्पात और तिलहन आदि में अमेरिका का रूस से आयात लगातार बना हुआ है और कुछ मामलों में बढ़ा भी है। ये सब तब हो रहा है जब पश्चिम ने रूस पर कई प्रतिबंध लगाए हैं और उसकी अर्थव्यवस्था को कमजोर करने का दावा करता है।

यूरोप और अमेरिका को भारत के रूसी तेल खरीदने से दिक्कत है, लेकिन रूसी कच्चे तेल से बने पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स खरीदने में उन्हें कोई परेशानी नहीं है। बात सीधी है, अगर पसंद नहीं तो मत खरीदो। लेकिन अमेरिका खरीदता है, यूरोप खरीदता है। अगर पश्चिम को रूसी तेल से बने पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स खरीदने में खुद से नफरत नहीं है, तो भारत को उसी के लिए विलेन नहीं बनाना चाहिए।

अगर भारत नहीं होता, तो वैश्विक ऊर्जा की कीमतें आसमान छूतीं, जिससे संकट पैदा होता, लेकिन भारत रूसी युद्ध मशीन को बढ़ावा दे रहा है।

अमेरिका रूस के साथ व्यापार कर रहा है। यूक्रेन को हथियार बेचकर अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत कर रहा है। रूस को बाजार से बाहर करके यूरोप को अपने प्रोडक्ट्स बेच रहा है। लेकिन भारत रूस-यूक्रेन युद्ध से मुनाफा कमा रहा है, उसका जोर इसी झूठ को जोर-शोर से फैलाने पर है, ताकि वो खुद का चेहरा बचा सके और भारत को विलेन साबित कर सके।

मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में श्रद्धा पाण्डेय ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

आंतकी संगठनों का अड्डा बना संभल, सिर्फ 15% बचे हिंदू और मस्जिद में मिले हरिहर मंदिर के सबूत: पढ़ें CM योगी को सौंपी गई आयोग की रिपोर्ट की बड़ी बातें

उत्तर प्रदेश के संभल में पिछले साल हुई हिंसा के बाद गठित समिति ने गुरुवार (28 अगस्त 2025) को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को अपनी रिपोर्ट सौंप दी है। करीब 450 पन्नों की इस रिपोर्ट में कई अहम दावे किए गए हैं। रिपोर्ट में बताया गया है कि आजादी के वक्त यहाँ पर करीब 45% हिंदू थे जो अब घटकर 15-20% फीसदी रह गए हैं। रिपोर्ट में मस्जिद में हरिहर मंदिर के साक्ष्य मिलने का भी जिक्र है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस रिपोर्ट में 24 नवंबर 2024 को संभल में हुई हिंसा के बारे में बताए जाने के साथ ही संभल के इतिहास में कब-कब कितने दंगे हुए और उन दंगों में क्या-क्या हुआ, इसके बारे में भी विस्तार से जानकारी दी गई है।

बदल गई संभल की डेमोग्राफी

इस रिपोर्ट में डेमोग्राफी में आए बदलाव को लेकर भी बड़ा खुलासा किया गया है। रिपोर्ट में बताया गया है कि संभल नगरपालिका में आजादी के समय 45% हिंदू थे, जो आज घटकर 15% से 20% ही रह गए हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक, दंगे और तुष्टीकरण की राजनीति की वजह से हिंदू आबादी ने यहाँ से पलायन किया। यही वजह है कि डेमोग्राफी में बदलाव देखा गया। संभल में जिस तरह से मुस्लिमों ने हिंदुओं पर अत्याचार किया और दंगे भड़काए, यह हिंदुओं के पलायन की एक मुख्य वजह बनी। स्थानीय लोगों का भी यहीं कहना है कि आज की अपेक्षा संभल में पहले हिंदुओं की आबादी अधिक थी।

आजादी के बाद संभल में हुए 15 बड़े दंगे

इस रिपोर्ट में दावा किया गया है कि आजादी के बाद संभल में 15 बड़े दंगे हुए हैं। इसमें बताया गया है कि संभल में 1947, 1948, 1953, 1958, 1962, 1976, 1978, 1980, 1990, 1992, 1995, 2001, 2019 में दंगे हुए थे।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, 2019 में सीएए उपद्रव के दौरान चार दिन का कर्फ्यू लगा था। इसके अलावा 1948 में 20 दिन, 1958 में 2 दिन, 1976 में 7 दिन, 1978 में 30 दिन, 1992 में 8 दिन, 2019 में करीब 6 दिन बाजार बंद रहे थे।

आतंकी संगठनों का बना अड्डा, विदेशी हथियार मिले

रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस रिपोर्ट में दावा किया गया है कि संभल कई सारे आतंकवादी संगठनों का अड्डा बन चुका है। इसमें अलकायदा, हरकत उल मुजाहिद्दीन जैसे आतंकवादी संगठन शामिल हैं।

संभल में हुए दंगों में विदेशी हथियारों का इस्तेमाल होने की जानकारी भी सामने आई है। इस मामले के लिए बनाए गए न्यायिक आयोग को इस बात के साक्ष्य मिले हैं कि संभल में अमेरिका में बने हथियारों का इस्तेमाल किया गया था।

पूर्व नियोजित थी 24 नवंबर की हिंसा

24 नवंबर 2024 की हिंसा को लेकर रिपोर्ट में दावा किया गया है कि यह हिंसा पूर्वनियोजित और षड्यंत्र का नतीजा थी। सांसद जिया-उर-रहमान बर्क ने नमाजियों को उकसाने के लिए कहा था कि हम इस देश के मालिक हैं। संभल जामा मस्जिदकी इंतेजामिया कमेटी पर इसकी साजिश रचने का आरोप है। हिंसा से पहले बर्क ने भड़काऊ भाषण दिया था।

बर्क ने कहा था, “हम पुलिस प्रशासन सरकार से दबने वाले थोड़ी हैं, अरे हम इस देश के मालिक है नौकर, गुलाम नहीं हैं’। मैं खुले रूप से कह रहा हूं कि मस्जिद थी, मस्जिद है, इंशा-अल्ला मस्जिद रहेगी कयामत तक। जिस तरह अयोध्या में हमारी मस्जिद ले ली गई, वैसा यहां नहीं होने देंगे।”

गौरतलब है कि मामले में उतर प्रदेश सरकार द्वारा तीन सदस्यीय जाँच टीम बनाई गई थी। इसमें हाईकोर्ट के पूर्व सेवानिवृत्त जज देवेंद्र अरोड़ा को अध्यक्ष बनाया गया था। इसके अलावा कमेटी में रिटायर्ड आईपीएस एके जैन और अमित प्रसाद सदस्य के रूप में शामिल किए गए थे।

‘राहुल गाँधी चु@$या, जिनके मन में ह$मी है वो वोट चोर बोलता है’: जिस SIR का विरोध कर रहा INDI गठबंधन उसे जरूरी बता रही बिहार की जनता, कहा- 100 में से 30 अवैध

INDI गठबंधन भले विशेष गहन पुनरीक्षण (Bihar SIR) का विरोध करते हुए ‘वोट चोरी’ का प्रोपेगेंडा चला रहा है, लेकिन बिहार की जनता इसे जरूरी बता रही है। ऑपइंडिया की ग्राउंड रिपोर्टिंग के दौरान आम लोगों ने इसके विरोध में चल रही राहुल गाँधी-तेजस्वी यादव की ‘वोटर अधिकार यात्रा’ की मंशा पर भी सवाल उठाए हैं।

बिहार के कटिहार जिले के कदवा प्रखंड के कदवा कुम्हरी गाँव के लोगों ने यह भी बताया कि उनके इलाके में बांग्लादेश से आकर लोग अवैध तरीके से बस गए हैं। वे स्थानीय लोगों की जमीनों, काम-धंधा पर कब्जा कर रहे हैं। ऐसे लोगों को मतदाता सूची से हटाना जरूरी है।

स्थानीय लोग का दावा है कि उनके इलाके में 100 में से करीब 30 लोग ऐसे हैं जो अवैध तरीके से बसे हैं। उल्लेखनीय है कि कदवा कुम्हरी से 23 अगस्त 2025 को राहुल गाँधी की यात्रा गुजरी थी। वहीं SIR का मकसद बिहार की मतदाता सूची से मृत, डुप्लीकेट और राज्य में अवैध तरीके से आकर बसे लोगों को हटाना है।

‘जिनके मन में ह$मी है, वो वोट चोर बोलता है’

कदवा प्रखंड में ऑपइंडिया की टीम ने कुछ महिलाओं से बात की। नित्या देवी नाम की एक महिला ने बताया कि वोटर लिस्ट में उनका नाम बिना किसी दिक्कत के जुड़ गया है। उन्होंने कहा कि उनके घर पर BLO (बूथ लेवल ऑफिसर) आए थे और सारा काम आसानी से हो गया।

जब हमारे रिपोर्टर मिथुन मिश्रा ने नित्या देवी से राहुल गाँधी और तेजस्वी के ‘वोट चोरी’ आरोपों के बारे में पूछा, तो उन्होंने कहा कि जिसके मन में ह$मी है वो वोट चोर बोलता है। नित्या देवी ने मोदी-नीतीश की सरकार को बहुत अच्छा बताया है और उन्हें कोई दिक्कत नहीं हुई। महिला ने यह भी बताया कि पहले उन्हें ₹400 पेंशन मिलती थी, जो अब बढ़कर ₹1100 हो गई है। एक और महिला ने भी मोदी-नीतीश की सरकार की तारीफ करते हुए कहा कि वे गरीबों का ध्यान रखते हैं और विकास करते हैं।

‘SIR जरुरी, अवैध बांग्लादेशी आकर बसे’

एक और महिला, अरुणा देवी ने तो राहुल गाँधी और तेजस्वी यादव को ही चोर बताया दिया। महिला ने कहा कि ‘चोर वही है जो दूसरे को चोर कहता है।’ महिला ने मोदी-नीतीश सरकार की कई योजनाओं की तारीफ की, जैसे मुफ्त गैस, बिजली और पेंशन। उनका कहना है कि सरकार ने हर चीज में सुधार किया है। आगे भी हम उन्हीं को वोट देंगे।

वहीं, एक स्थानीय व्यक्ति ने वोटर सर्वेक्षण के बारे में अपनी राय रखी। उनका कहना था कि यह एक बहुत अच्छा कदम है क्योंकि इससे उन लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हट जाएँगे जो अवैध रूप से आकर बस गए हैं। जब हमारे रिपोर्टर ने स्थानीय व्यक्ति से पूछा कि अवैध लोग कहा से आए है, तो उन्होंने कहा कि बगल में ही बांग्लादेश है, वहीं से ये लोग अवैध रुप से घुसे हैं।

स्थानीय व्यक्ति ने आरोप लगाया कि ऐसे लोग बिहार के मूल निवासियों के अधिकार छीन रहे हैं और हमसे दोगुना पैसा देकर यहाँ की जमीन खरीदकर रह रहे हैं। इसके अलावा स्थानीय निवासी का कहना है कि 100 में से 30 प्रतिशत अवैध लोग बसे हुए है, जो हमारा रोजगार छीन रहे हैं। और ऐसे लोगों का नाम वोटर लिस्ट से जरूर हटना चाहिए।

राहुल गाँधी ‘चु@$या’… कॉन्ग्रेस काल में बहन-बेटियाँ नहीं थी सुरक्षित

वहीं, स्थानीय व्यक्ति ने आरोप लगाते हुए कहा कि कॉन्ग्रेस काल के दौरान बहन-बेटियाँ घर से बाहर नहीं निकल पाती थी। लेकिन आज मोदी-नीतीश सरकार के राज में सड़कें, बिजली और कानून-व्यवस्था में काफी सुधार हुआ है, जिससे महिलाएँ रात में भी सुरक्षित महसूस करती हैं।

हमारे रिपोर्टर ने जब और लोगों से बात की तो उसमें से एक व्यक्ति पहले वार्ड मेंबर था और उन्होंने राहुल गाँधी को ‘चु@$या’ बताय। उन्होंने आगे कहा कि राहुल गाँधी अपनी यात्रा के लिए गरीबों के पेट पर लात मार रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि शकील अहमद जैसे नेता सिर्फ मुस्लिमों का वोट चाहते हैं और वोटर लिस्ट में उनके नाम हिंदुओं से आगे कर देते हैं। स्थानीय व्यक्ति ने कहा कि राहुल गाँधी और तेजस्वी यादव के खिलाफ काला झंडा लहराएँगे।

इसके अलावा एक स्थानीय व्यक्ति ने तेजस्वी यादव पर भी हमला बोलते हुए कहा कि उसका बाप चोर है, घोटाले में जेल जाकर आ चुका है और वे कभी मुख्यमंत्री नहीं बन सकता। स्थानीय व्यक्ति आगे कहता है कि ना तो नीतीश कुमार कभी जेल गया और ना ही उनका बेटा निशांत कुमार कभी जेल गया। मोदी जी हिंदू राष्ट्र के लिए काम कर रहे हैं और अमित शाह घुसपैठियों को बाहर निकालने का जो काम कर रहे हैं, वो बहुत बढ़िया है।

जमीनी हकीकत बताती है कि कदवा के ग्रामीणों में SIR सर्वे को लेकर कोई नाराजगी नहीं है। वोटर लिस्ट से नाम कटने की बात को उन्होंने नकारा और सरकार की योजनाओं से लाभ मिलने की बात दोहराई। यहाँ के लोग ‘वोट चोरी’ के आरोपों को राजनीति मानते हैं और भरोसा मोदी-नीतीश की जोड़ी पर जताते हैं।

भारत ही नहीं पूरे दक्षिण एशिया में घूमते थे विशाल हाथी, 140 किलो तक भारी होते थे दाँत: स्टेगोडॉन गणेश के बारे में जानिए सबकुछ

गणेशोत्सव की इस वक्त हर तरफ धूम है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि 25000 साल पहले भारत समेत दक्षिण एशिया के जंगलों में ‘हाथियों के पूर्वज’ थे, जिनका नाम स्टेगोडोन गणेशा (Stegodon Ganesa) था। इनके बड़े-बड़े दाँत हुआ करते थे, बिलकुल हमारे गणपति की तरह।

गणपति उत्सव में लीन हैं भक्त

हाथी के सिर वाले देवता भगवान गणेश को हर शुभ कार्य से पहले पूजा जाता है। उन्हें ‘विघ्नहर्ता’ यानी बाधाओं को दूर करने वाला कहा जाता है। उनका नाम दो अर्थों में बहुत खास है: ‘गणों के स्वामी’ और ‘जनता के प्रभु’।

गणेश जी ज्ञान, बल, और संकल्प के प्रतीक माने जाते हैं। हर साल पूरे देश में गणेश चतुर्थी बड़े धूमधाम से मनाई जाती है। इस साल यह उत्सव बुधवार (27 अगस्त 2025) से शुरू हुआ है और 6 सितंबर 2025 को गणपति विसर्जन के साथ इसका समापन होगा।

इन दिनों देशभर में सड़कों, मंदिरों और घरों में भक्तिमय माहौल है। हर तरफ बस गणपति की चर्चा है।

आधुनिक हाथियों के मिलता-जुलता था ‘गणेशा’

गणपति बप्पा के नाम पर ही इस प्राचीन विशाल जानवर का नाम स्टेगोडोन गणेशा (Stegodon Ganesa) रखा गया। यह एक ऐसा हाथी जैसा जीव था जो आज से करीब 25,000 साल पहले अस्तित्व में आया।

पहले इसे हाथियों का प्रत्यक्ष पूर्वज माना जाता था, लेकिन अब वैज्ञानिक इसे विलुप्त हो चुके प्रोबोसिडियन जीवों का ही रुप मानते हैं। बाद के शोध के आधार पर इस विशाल हाथी को स्टेगोडोन्टिडे परिवार में रखा गया, जो मैस्टोडॉन की तुलना में आधुनिक हाथियों (एलिफेंटिडे परिवार) से ज्यादा निकट है।

यह आज के हाथियों से भी बड़ा, लगभग 3 से 4 मीटर ऊँचा और 8 मीटर लंबा होता था। इसके बेहद लंबे और भारी दाँत (दाँतों की लंबाई 3.89 मीटर तक और वजन करीब 140 किलो तक) भी आज के हाथियों से कहीं ज्यादा बड़े थे।

इस विशाल जीव के अवशेष भारत के शिवालिक पहाड़ियों और हाल ही में 2025 में महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले के वर्धा और पेनगंगा नदियों के किनारे भी मिले हैं। इससे पता चलता है कि यह जीव प्राचीन भारत में बड़ी संख्या में मौजूद था।

इतिहास में इसकी खास जगह तब बनी जब 1928 में डॉ डी एन वाडिया ने एक 3 मीटर लंबा दाँत खोजा। वह अब जम्मू विश्वविद्यालय में रखा गया है। इस जीव की इतनी अहमियत थी कि 1951 में भारत सरकार ने इसके ऊपर डाक टिकट भी जारी किया था। बाद में नेपाल ने 2015 में एक और डाक टिकट जारी किया।

पहले वैज्ञानिक मानते थे कि स्टेगोडोन हाथियों का पूर्वज था, लेकिन अब यह माना जाता है कि यह अलग है। यह Elephantidae (आधुनिक हाथियों) का करीबी माना जा सकता है पर सीधे पूर्वज नहीं। हैरानी की बात ये है कि कुछ वैज्ञानिकों के अनुसार, यह विशाल जीव आज से सिर्फ 4,100 साल पहले तक जिंदा था, यानी हो सकता है कि यह मानव सभ्यता के शुरुआती दौर में इंसानों के साथ भी रहा हो।

स्टेगोडोन की कई प्रजातियाँ भारत के अलावा चीन, दक्षिण-पूर्व एशिया और जापान तक फैली थीं। आज जब हम गणेश चतुर्थी पर गणेश जी की पूजा कर रहे हैं, तो यह जानना और भी रोचक है कि हमारे इतिहास में एक ऐसा असली जीव भी था जिसे हमारे प्रिय गणपति के नाम से जोड़ा गया। एक ओर आस्था की शक्ति है और दूसरी ओर धरती पर जीवन की अद्भुत कहानी, ये दोनों मिलकर इस त्योहार को और भी खास बना देते हैं।

यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में श्रीति सागर ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें। इसका अनुवाद सौम्या सिंह ने किया है।

नेपाल के रास्ते भारत में घुसे जैश के 3 पाकिस्तानी आतंकी, बिहार में हाई अलर्ट पर सुरक्षा एजेंसियाँ: पड़ोसी देश बना घुसपैठ का ठिकाना

भारत में पाकिस्तानी आतंकियों के घुसपैठ के रास्ते बदलते दिख रहे हैं। ताजी जानकारी के मुताबिक, 3 पाकिस्तानी आतंकियों के नेपाल के रास्ते बिहार में दाखिल होने की सूचना मिली है। ये आतंकी प्रतिबंधित आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद से जुड़े हैं। पुलिस मुख्यालय (PHQ) को मिली अहम खुफिया जानकारी के बाद पूरे बिहार में हाई अलर्ट जारी कर दिया गया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इनकी पहचान रावलपिंडी निवासी हसनैन अली, उमरकोट निवासी आदिल हुसैन और बहावलपुर का रहने वाला मोहम्मद उस्मान के रूप में हुई है। बताया जा रहा है कि ये तीनों अगस्त 2025 के दूसरे हफ्ते में नेपाल के काठमांडू पहुँचे और पिछले हफ्ते नेपाल-बिहार बॉर्डर पार कर भारत में दाखिल हुए हैं।

इस इनपुट को गंभीरता से लेते हुए पुलिस मुख्यालय ने आतंकियों के पासपोर्ट और दूसरी जानकारियाँ सीमावर्ती जिलों के प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियों के साथ साझा कर दी हैं। खास तौर पर नेपाल से सटे इलाकों में सुरक्षा भी कड़ी कर दी गई है।

खुफिया एजेंसियों का मानना है कि ये आतंकी देश के किसी भी हिस्से में बड़ी आतंकी वारदात को अंजाम दे सकते हैं। चूँकि राज्य में विधानसभा चुनाव नजदीक हैं, इसलिए आशंका है कि आतंकी किसी भीड़-भाड़ वाले या राजनीतिक कार्यक्रम को निशाना बना सकते हैं।

PHQ ने राज्य के सभी जिलों की पुलिस और खुफिया विभाग को सतर्क रहने का आदेश दिया है। सभी को संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रखने का आदेश दिया गया है।

फिलहाल बिहार पुलिस पूरी तरह अलर्ट पर है और सीमावर्ती इलाकों में सर्च ऑपरेशन तेज कर दिए गए हैं। सुरक्षा एजेंसियाँ यह सुनिश्चित करने में लगी हैं कि राज्य में किसी भी तरह की आतंकी घटना न होने पाए। मोतिहारी पुलिस ने तीनों आतंकियों पर 50-50 हजार रुपए का इनाम भी घोषित कर दिया है।

बता दें कि इससे पहले मई 2025 में सुरक्षा एजेंसियों को सूचना मिली थी कि करीब 37 पाकिस्तानी और बांग्लादेशी आतंकी नेपाल में मौजूद हैं और भारत में घुसपैठ करने की ताक में हैं। जिसके बाद सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए बहराइच से बलरामपुर तक की नेपाल सीमा पर एसएसबी के 1500 अतिरिक्त जवानों को तैनात किया गया था।

37 लोगों में 10 बांग्लादेशी और 27 पाकिस्तानी बताए गए थे। सूचना के बाद नेपाल से लगते उत्तर प्रदेश के महराजगंज, सिद्धार्थनगर, बलरामपुर, बहराइच, श्रावस्ती, पीलीभीत व लखीमपुर खीरी में अलर्ट भी जारी कर दिया गया था।

वहीं उसके बाद जुलाई 2025 में पाकिस्तान में मौजूद हाफिज सईद और मसूद अजहर जैसे आतंकियों के नेपाल के रास्ते भारत में आतंकी गतिविधियों को अंजाम देने की कोशिशों का भी पता चला था।

इस खतरे की जानकारी खुद नेपाल के राष्ट्रपति राम चंद्र पौडेल के सलाहकार सुनील बहादुर थापा ने दी थी। उन्होंने बताया था कि हाफिज सईद का संगठन लश्कर ए तैयबा और मसूद अजहर का जैश के मोहम्मद पाकिस्तान-भारत की सीमा को पार करने के बजाए अब नेपाल के रास्ते भारत में आने की कोशिश कर रहा है।

बता दें कि भारत और नेपाल के बीच 1751 किलोमीटर लंबी खुली सीमा रेखा है। यहाँ चौकसी काफी कम होती है। आतंकवादियों के लिए दूसरी जगहों की तुलना में अपनी पहचान छिपा कर इससे आना आसान है। जम्मू कश्मीर में आतंकियों की एंट्री पर कड़ा पहरा होने के बाद आतंकी दूसरे दरवाजे की तलाश कर रहे हैं इसलिए हाल के वर्षों में नेपाल में आतंकी गतिविधियाँ बढ़ गई हैं।

US के कैथोलिक स्कूल में ट्रांस शूटर रॉबिन वेस्टमैन ने की 2 बच्चों की हत्या-17 घायल, हथियारों पर लिखे ‘माशाल्लाह’ और ‘न्यूक इंडिया’ जैसे नारे: भारत-इजरायल विरोधी नफरत से भरा था हत्यारा

अमेरिका के मिनियापोलिस में 23 साल के ट्रांसजेंडर रॉबिन वेस्टमैन ने एक कैथोलिक चर्च और स्कूल में गोलीबारी कर दी। इस हमले में दो बच्चों की मौत हो गई और 17 लोग घायल हुए, जिनमें 14 बच्चे और 3 बड़े शामिल हैं। रॉबिन वेस्टमैन ने अपने हथियारों पर ‘माशाल्लाह’ और ‘न्यूक इंडिया’ लिखा था।

इस्लामी शब्द और भारत को परमाणु हथियारों से खत्म करने की बात के अलावा, रॉबिन ने इजरायल को बर्बाद करने की कसम भी खाई थी। उसने अपनी बंदूक पर ‘इजरायल को खत्म करना होगा’ लिखा था।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह घटना बुधवार (27 अगस्त 2025) सुबह करीब 8:30 बजे हुई, जब बच्चे चर्च में प्रार्थना सभा में शामिल थे। रॉबिन ने चर्च की खिड़कियों के बाहर से गोलियाँ चलाईं, जिससे वहाँ मौजूद लोग दहशत में आ गए। मिनियापोलिस पुलिस प्रमुख ब्रायन ओ’हारा ने बताया कि यह हमला एक सुनियोजित ‘घरेलू आतंकवाद’ और ‘कैथोलिक समुदाय के खिलाफ हेट क्राइम’ के तौर पर जाँचा जा रहा है। रॉबिन ने हमले के बाद खुद को गोली मारकर आत्महत्या कर ली।

भारत और यहूदी विरोधी नफरत से भरा था हत्यारा

रॉबिन वेस्टमैन ने अपने हथियारों पर कुछ चौंकाने वाले नारे लिखे थे। उसकी राइफल, शॉटगन और पिस्तौल पर ‘माशाल्लाह’, ‘न्यूक इंडिया’ और ‘इजरायल को खत्म करना होगा’ जैसे शब्द लिखे थे। उसने अपने हथियारों पर ‘बच्चों के लिए’, ‘तुम्हारा भगवान कहाँ है?’ और ‘डोनाल्ड ट्रंप को मारो’ जैसे नारे भी लिखे थे। इसके अलावा, एक गोला-बारूद की मैगजीन पर ‘स्किबिडी’ शब्द लिखा था, जो एक ऑनलाइन चरमपंथी मंच से जुड़ा हो सकता है।

रॉबिन ने अपने हथियारों पर दो अन्य हत्यारों के नाम भी लिखे थे – ‘रुपनो’ और ‘ब्रेविक’। ‘रुपनो’ का जिक्र संभवतः नटाली रुपनो से है, जिसेने पिछले साल विस्कॉन्सिन में एक स्कूल में गोलीबारी की थी। वहीं ‘ब्रेविक’ का संबंध नॉर्वे के कुख्यात हत्यारे एंडर्स ब्रेविक से हो सकता है, जिसने 2011 में 77 लोगों की हत्या की थी।

रॉबिन ने हमले से पहले यूट्यूब पर दो वीडियो पोस्ट किए थे, जिन्हें अब हटा दिया गया है। पहले वीडियो में उसने सिरिलिक अक्षरों में लिखा एक दस्तावेज़ दिखाया, जो अंग्रेजी में था। दूसरे वीडियो में उसने चार पेज का एक पत्र दिखाया, जिसमें उसने अपने परिवार और दोस्तों से माफी माँगी और अपने दर्द और पीड़ा की बात की।

इन वीडियो में उसने अपने हथियारों का जखीरा भी दिखाया, जिसमें राइफल, पिस्तौल, शॉटगन और कई मैगजीन शामिल थे। हथियारों पर सिल्वर रंग मार्कर से लिखे गए राजनीतिक और नफरत भरे नारे साफ दिख रहे थे। पुलिस ने बताया कि रॉबिन ने ये हथियार पूरी तरह कानूनी तौर पर खरीदे थे।

एफबीआई निदेशक काश पटेल ने इस हमले को कैथोलिक समुदाय के खिलाफ हेट क्राइम बताया है। जाँच में पता चला कि रॉबिन पहले इसी चर्च और स्कूल का छात्र रह चुका था, लेकिन यह साफ नहीं है कि उसने इस जगह को निशाना क्यों बनाया।

एंटी-डिफेमेशन लीग के विश्लेषण के मुताबिक, रॉबिन के लेखन में कैथोलिक, यहूदी, अश्वेत, एलजीबीटीक्यू+ समुदाय, मुस्लिम और हिस्पैनिक लोगों के खिलाफ नफरत भरे संदेश थे। उसने अपने हथियारों पर ‘बच्चों के लिए’, ‘तुम्हारा भगवान कहाँ है?’ और ‘डोनाल्ड ट्रंप को मारो’ जैसे नारे भी लिखे थे।

रॉबिन की माँ मैरी वेस्टमैन ने 2019 में कोर्ट में याचिका दायर कर अपने बच्चे का नाम बदलवाया था, क्योंकि रॉबिन खुद को महिला के रूप में पहचानता था। 2020 में जब रॉबिन 17 साल का था, जज ने इस बदलाव को मँजूरी दी थी। रॉबिन का आखिरी पता साउथ सेंट पॉल इलाके का एक अपार्टमेंट था।

पुलिस ने बताया कि हमले के दौरान स्कूल में पहली हफ्ते की प्रार्थना सभा चल रही थी। बच्चे और शिक्षक नए स्कूल साल की शुरुआत कर रहे थे।

सेंट क्लाउड के बिशप पैट्रिक एम. नियरी ने कहा, “यह एक बेगुनाह लोगों पर किया गया क्रूर हमला है। बच्चे प्रार्थना कर रहे थे, जब गोलियाँ चलीं। हम इस दुख से उबरने की कोशिश कर रहे हैं।” घायलों में दो बच्चे गंभीर हालत में हैं और तीन बुजुर्ग पैरिशनर भी गोलीबारी में घायल हुए हैं।

रॉबिन की ऑनलाइन गतिविधियों से पता चलता है कि वह नफरत फैलाने वाले ऑनलाइन समुदायों से जुड़ा था। जाँचकर्ता अभी यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि उसकी इस हिंसा के पीछे की वजह क्या थी।

साउदर्न पॉवर्टी लॉ सेंटर की रेचल कैरोल-रिवास ने कहा, “यह समझना मुश्किल है कि इस हिंसा की जड़ में क्या था। रॉबिन के विचारों में कई तरह की विचारधाराएँ और नफरत थी, जो किसी एक बॉक्स में फिट नहीं होती।”

यह घटना न केवल मिनियापोलिस बल्कि पूरे अमेरिका के लिए एक बड़ा झटका है। लोग इस बात से दुखी और गुस्से में हैं कि मासूम बच्चों को निशाना बनाया गया। यूएस होमलैंड सिक्योरिटी सेक्रेटरी क्रिस्टी नोएम ने कहा, “हम उन परिवारों के साथ हैं, जिन्होंने अपने बच्चों को खोया। हम उनके लिए प्रार्थना करते हैं।”

खूबसूरत मुस्लिम युवतियों से निकाह, नशा और पैसे के लालच में हिंदू युवकों का धर्मांतरण कर रहा बरेली का अब्दुल मजीद गिरोह: बृजपाल को बनाया अब्दुल्ला तो प्रभात को हामिद, जाकिर नाइक के दिखाए जाते थे वीडियो

उत्तर प्रदेश के बरेली में धर्मांतरण कराने वाले गिरोह को लेकर पुलिस ने कई बड़े खुलासे किए हैं। यह गिरोह हिंदू युवकों के धर्मांतरण के लिए आर्थिक मदद से लेकर मुस्लिम युवतियों से निकाह तक के लालच दे रहा था। गिरोह पहले किसी ऐसे व्यक्ति को ढूंढता जो आर्थिक तौर पर कमजोर होता और उसे आर्थिक मदद दी जाती।

इस गिरोह का षड्यंत्र था कि आर्थिक मदद के बाद शख्स को सुंदर मुस्लिम युवतियों से निकाह का लालच दिया जाए और फिर धीरे-धीरे उसका ब्रेनवाश करके इस्लाम कबूल करवाया जाए। इसके बाद उस शख्स के जरिए उसके परिवार को भी मुस्लिम बना दिया जाता था।

बृजपाल को बनाया अब्दुल्ला तो प्रभात को हामिद

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, सुभाष नगर के बृजपाल के साथ भी इस गैंग ने यहीं किया था। वे करेली के रहने वाले हैं और एक प्राइवेट स्कूल में गणित के शिक्षक हैं। 2014 में उनका एक्सीडेंट हो गया था और इलाज के दौरान परिवार की आर्थिक हालत बिगड़ गई। इसी दौरान करेली के ही निवासी सलमान और आरिफ नाम के दो युवकों ने उनको मदद शुरू कर दी।

दोनों युवकों ने इलाज का खर्चा उठाया और आर्थिक मदद दी। फिर धीरे-धीरे बृजपाल को समझाना शुरू किया कि अगर वह इस्लाम धर्म अपना लेगा तो उसे और भी फायदे मिलेंगे, साथ ही एक मुस्लिम युवती से निकाह भी करा दिया जाएगा।

लगातार संपर्क और बहलाने-फुसलाने के बाद बृजपाल ने इस्लाम कबूल कर लिया और उसका नाम बदलकर अब्दुल्ला रख दिया गया। इसके बाद उसकी बहन का निकाह एक मुस्लिम युवक से करा दिया गया और माँ का नाम भी ऊषा रानी से बदलकर अमीना रख दिया गया।

एक अन्य शख्स प्रभात भी इस गिरोह का शिकार हुआ है। प्रभात मूल रूप से अलीगढ़ के महुआ खेड़ा का रहने वाला है। उसने एएमयू से एमफिल, बीएड किया और फिर हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी से पीएचडी की। साल 2019 में उसकी नौकरी राजकीय इंटर कॉलेज अलीगढ़ में लगी। शादी के कुछ समय बाद उसकी पत्नी ने तलाक की अर्जी डाल दी और उसके खिलाफ FIR भी कर दी।

इसके बाद उसका तबादला बरेली के इंटर कॉलेज में हो गया। यहाँ पर वह गिरोह के निशाने पर आया। गिरोह के लोगों ने उसका मानसिक रूप से शोषण करना शुरू कर दिया। उसे कहा गया कि अब तुम्हारे साथ कोई शादी नहीं करेगा लेकिन इस्लाम कबूल कर लोगे तो मुस्लिम युवती से निकाह हो जाएगा और तलाक भी आसान रहेगा। कई मुस्लिम लड़कियों की तस्वीरें दिखाकर उसे लालच दिया गया।

प्रभात ने जब धर्म परिवर्तन किया तो उसका नाम हामिद रख दिया गया। गिरोह उसका खतना करने की तैयारी कर रहा था लेकिन उसकी माँ को शक हुआ और उन्होंने समय रहते पुलिस को सूचना दे दी। इसी वजह से उसका खतना रुक गया।

नशा देकर भी बनाते थे दबाव

इज्जतनगर का रहने वाला एक किशोर बी-कॉम की पढ़ाई कर रहा था। वह भी गिरोह का शिकार बना। पहले गिरोह के लोगों ने उससे दोस्ती की और उसे नशे की लत लगा दी। शुरुआत में उसे नशा फ्री में दिया जाता था। जब वह इसकी लत में पूरी तरह फँस गया, तब उस पर धर्म परिवर्तन का दबाव बनाया जाने लगा। अब उस किशोर की मानसिक और शारीरिक हालत बहुत खराब हो चुकी है।

पुलिस ने गिरोह के मोबाइल फोन से कई मुस्लिम युवतियों की तस्वीरें बरामद की हैं, जो लोगों को फँसाने के लिए इस्तेमाल की जाती थीं। इसके अलावा पुलिस ने यह भी खुलासा किया है कि जिस मदरसे में ये जबरन खतना कराते थे, उस मदरसे का संचालक अब्दुल मजीद था। ये दिव्यांग और पिछड़े वर्ग के लड़कों को खासतौर पर निशाना बनाते थे।

उसकी ट्रैवल हिस्ट्री पूरे देश के 27 से अधिक जिलों से जुड़ी है। वह जगह-जगह से चंदा इकट्ठा करता था। पुलिस को उसके बैंक अकाउंट से 13 लाख रुपए मिले हैं और 21 अलग-अलग बैंक खातों का खुलासा हुआ है। वहीं, गिरोह सोशल मीडिया पर भी लोगों का ब्रेनवॉश करता थे।

आरोपितों ने कई वॉट्सऐप ग्रुप बनाए थे, जिनमें जाकिर नाइक की वीडियो और पाकिस्तानी स्कॉलर्स के ऑडियो शेयर किए जाते थे। सलमान, आरिफ और फहीम अब्दुल मजीद के ही अंडर में काम करते थे। सलमान धर्मग्रंथ, सीडी और किताबें उपलब्ध कराता था और आरिफ उसकी मदद करता था।

दूसरी तरफ फहीम लोगों की जानकारी इकट्ठा कर गैंग तक पहुँचाता था। पुलिस को इनके विदेशी फंडिंग की भी आशंका है। फिलहाल पुलिस गिरोह के बाकी सदस्यों की तलाश में जुटी हुई है।

बाहरी हो या NGO अब असम में आसानी से नहीं खरीद पाएँगे जमीन, हिमंता सरकार ने बनाई नई SOP: अलग धर्म के लोग भी नहीं कर पाएँगे लैंड ट्रांसफर डील

असम में जनसांख्यिकीय बदलाव और संभावित सुरक्षा खतरों को लेकर चिंताओं को देखते हुए असम कैबिनेट ने एक नई स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) को मंजूरी दी है। यह SOP अलग-अलग धर्मों के लोगों के बीच भूमि हस्तांतरण की जाँच के लिए बनाई गई है। इसके अलावा असम के बाहर से आने वाले गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) द्वारा जमीन खरीदने की प्रक्रिया को भी इस SOP के तहत जाँचा जाएगा।

बुधवार (27 अगस्त 2025) को कैबिनेट बैठक के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस में मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने इस नीति के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने कहा कि असम जैसे संवेदनशील राज्य में जमीन के लेन-देन को बहुत सावधानी से संभालना जरूरी है, ताकि कोई धोखाधड़ी न हो और समाज में शांति बनी रहे।

मुख्यमंत्री ने बताया कि अगर जमीन का ट्रांसफर (खरीद-बिक्री, दान) एक ही धर्म के लोगों के बीच हो रहा है, तो इस SOP का कोई असर नहीं होगा और ऐसे सौदे बिना किसी अतिरिक्त रुकावट के हो सकेंगे। लेकिन अगर यह ट्रांसफर अलग-अलग धर्मों के बीच हो, जैसे हिंदू और मुस्लिम या इसके उलट, तो इसके लिए कई स्तरों पर जाँच होगी।

हिमंता बिस्वा सरमा ने कहा, “जब कोई प्रस्ताव सब-डिविजनल ऑफिसर के पास आएगा, तो अगर यह एक ही धर्म के लोगों के बीच का सौदा है, तो कोई दिक्कत नहीं। लेकिन अगर यह इंटर-रिलीजन सौदा है, जैसे हिंदू और मुस्लिम के बीच तो पहले यह जाँचा जाएगा कि जमीन का मालिक असली है या नहीं, जमीन असली है या नहीं। इसके बाद प्रस्ताव डिप्टी कमिश्नर के पास जाएगा।”

मुख्यमंत्री ने आगे बताया, “डिप्टी कमिश्नर इस प्रस्ताव को राजस्व विभाग को भेजेगा। वहाँ से यह असम पुलिस की स्पेशल ब्रांच को जाएगा। स्पेशल ब्रांच यह देखेगी कि कहीं यह सौदा जबरदस्ती, धोखाधड़ी या गैरकानूनी तो नहीं है। साथ ही खरीदार के पैसे का स्रोत भी जाँचा जाएगा कि वह काला धन तो नहीं है।”

इसके अलावा स्थानीय लोगों की राय भी ली जाएगी कि वे इस सौदे से सहमत हैं या नहीं, खासकर जब जमीन किसी अलग धर्म के व्यक्ति को बेची जा रही हो। मुख्यमंत्री ने कहा, “स्पेशल ब्रांच यह भी देखेगी कि इस सौदे से स्थानीय सामाजिक ढाँचे पर कोई बुरा असर तो नहीं पड़ रहा या इससे राष्ट्रीय सुरक्षा को कोई खतरा तो नहीं है। उनकी रिपोर्ट डिप्टी कमिश्नर को वापस भेजी जाएगी, जो अंतिम फैसला लेगा कि सौदा मंजूर करना है या नहीं।”

स्पेशल ब्रांच की रिपोर्ट सरकार को भेजी जाएगी, जो डिप्टी कमिश्नर को अंतिम फैसला लेने के लिए कहेगी। सरमा ने जोर देकर कहा कि यह सख्त जाँच जरूरी है ताकि धोखाधड़ी या गैरकानूनी काम, पैसे के स्रोत, स्थानीय सामाजिक ढाँचे पर प्रभाव और राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों को ठीक से देखा जा सके। उन्होंने कहा, “SOP के तहत, असम पुलिस की स्पेशल ब्रांच यह जाँचेगी कि क्या भूमि हस्तांतरण में कोई धोखाधड़ी या गैरकानूनी काम है, खरीदार के पैसे का स्रोत क्या है, जमीन के आसपास के सामाजिक ढाँचे पर क्या असर होगा और राष्ट्रीय सुरक्षा का कोई मुद्दा तो नहीं है।”

हिमंता ने यह भी बताया कि पिछले छह महीनों से रुके हुए कई भूमि हस्तांतरण के मामलों का अब इस नए ढाँचे के तहत जल्दी निपटारा किया जाएगा।

यह SOP सिर्फ व्यक्तिगत सौदों तक सीमित नहीं है। असम के बाहर से आने वाले NGOs जो जमीन खरीदकर स्कूल, कॉलेज या अन्य संस्थान बनाना चाहते हैं, उन्हें भी इस SOP के तहत जाँच से गुजरना होगा।

सरमा ने हाल के रुझानों पर चिंता जताई, जहाँ कुछ NGOs ने असम में जमीन खरीदी है। उन्होंने कहा, “हाल ही में हमने देखा कि केरल से कुछ NGOs ने यहाँ जमीन खरीदी। उन्होंने कुछ आयोजन किए, जो भविष्य में राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बन सकते हैं। अगर कोई बाहरी NGO शिक्षण संस्थान, मेडिकल कॉलेज या नर्सिंग कॉलेज के लिए जमीन खरीदना चाहता है, तो उसे भी इस SOP की प्रक्रिया से गुजरना होगा।”

असम के मुख्यमंत्री ने खास तौर पर बराक वैली, श्रीभूमि और बरपेटा जैसे इलाकों का जिक्र किया, जहाँ बाहरी NGOs, जो अक्सर किसी खास धर्म से जुड़े होते हैं, स्कूल या अन्य सुविधाओं के नाम पर बड़ी मात्रा में जमीन खरीद रहे हैं। उन्होंने कहा, “वे कहते हैं कि वे स्कूल बनाना चाहते हैं, लेकिन उनका असली मकसद कुछ और हो सकता है। पुलिस इन सभी पहलुओं की जाँच करेगी।”

मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि यह SOP असम में रजिस्टर्ड NGOs पर लागू नहीं होगी। यह सिर्फ बाहरी NGOs पर लागू होगी, ताकि किसी भी अनुचित प्रभाव या छिपे मकसद को रोका जा सके। उन्होंने दोहराया, “असम जैसे संवेदनशील राज्य में भूमि हस्तांतरण के मुद्दे को बहुत सावधानी से संभालना जरूरी है।” इस नीति का मकसद राज्य के जनसांख्यिकीय संतुलन को बनाए रखना और राष्ट्रीय सुरक्षा को किसी भी खतरे से बचाना है।

पीएम मोदी 13-14 सितंबर को करेंगे असम का दौरा

प्रेस कॉन्फ्रेंस में हिमंता बिस्वा सरमा ने यह भी घोषणा की कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की असम यात्रा, जो पहले 8 सितंबर को होने वाली थी, अब उप-राष्ट्रपति चुनाव के कारण टल गई है। चुनाव आयोग ने 9 सितंबर को उप-राष्ट्रपति चुनाव की तारीख तय की है, इसलिए अब पीएम मोदी 13 सितंबर को असम आएँगे और 14 सितंबर को वापस जाएँगे। इस वजह से 8 सितंबर को होने वाले सभी कार्यक्रम अब 13 और 14 सितंबर को होंगे।

पीएम मोदी डॉ. भूपेन हजारिका की जन्म शताब्दी समारोह का उद्घाटन करेंगे और कई बड़े बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं की आधारशिला रखेंगे।

पूछा- भगवा गमछा क्यों पहना है और सुरेंद्र को पीटने लगे तबरेज-इमरान-अजीज: कॉन्ग्रेस के शासन वाले कर्नाटक का मामला, निशाना बना बिहार का मजदूर

कर्नाटक के बेंगलुरु शहर में कॉन्ग्रेस सरकार के राज में भगवा पहनना अब खतरनाक होता जा रहा है। 24 अगस्त 2025 की रात कलासिपाल्या इलाके में एक बिहारी मजदूर सुरेंद्र कुमार को सिर्फ इसलिए पीटा गया क्योंकि उसने भगवा रंग का गमछा सिर पर बाँध रखा था। जब कंपनी के मैनेजर हरिकृष्णा ने बीच-बचाव करने की कोशिश की तो मुस्लिम हमलावरों ने उन्हें भी पीटा और शर्ट फाड़ दी।

शुरू में पुलिस ने मामूली रिपोर्ट दर्ज कर मामले को दबाने की कोशिश की, लेकिन जैसे ही वीडियो वायरल हुआ और हिंदू संगठनों ने दबाव बनाया, तब जाकर FIR दर्ज हुई और तीन आरोपितों तबरेज, इमरान खान, अजीज खान को गिरफ्तार किया गया।

कहाँ और कब हुई घटना?

ये घटना बेंगलुरु के भीड़भाड़ वाले इलाके कलासिपाल्या में 24 अगस्त 2025 को रात करीब 9:30 बजे हुई। रॉयल ट्रेवलर्स नाम की एक ट्रांसपोर्ट कंपनी के बाहर मजदूर सुरेंद्र कुमार अपने रोज के काम में लगा हुआ था। बिहार से आए इस 26 साल के युवक ने काम के दौरान सिर पर भगवा रंग का गमछा बाँध रखा था।

जैसे ही वो काम में व्यस्त था, तीन मुस्लिम युवक वहाँ आए। पहले उन्होंने गाली-गलौच की, फिर बोले- “ये भगवा क्यों पहना है? उतार इसे।” शिलेंद्र कुछ समझ पाता, इससे पहले उसे धक्का देकर गिरा दिया गया और मारने-पीटने लगे। भगवा रंग की वजह से गुस्सा जताना और उसपर हमला करना – ये बात घटना को सांप्रदायिक रंग दे रही थी।

पिछले 15 साल से वहीं काम करने वाले कंपनी के मैनेजर हरिकृष्णा शोर सुनकर मौके पर पहुँचे। उन्होंने बीच-बचाव की कोशिश की लेकिन मुस्लिम हमलावरों ने उन्हें भी नहीं बख्शा। उनके साथ भी मारपीट हुई, गालियाँ दी गईं और उनकी शर्ट तक फाड़ दी गई।

जानकारी के अनुसार, एम तबरेज (30) मैकेनिक का काम करता है। इमरान खान (35) रेडियम कटिंग का काम करता है और ए अजीज खान (37) रियल एस्टेट का काम करता है।

गिरफ्तार मुस्लिम हमलावर

शुरुआत में पुलिस ने इस घटना को एक मामूली झगड़ा मानते हुए ‘नॉन-कॉग्निजेबल रिपोर्ट’ दर्ज की थी। लेकिन जैसे ही इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ और हिंदू संगठनों ने विरोध किया, उसके बाद पुलिस की कार्रवाई शुरु हुई। पुलिस ने मामला दर्ज किया और तीन आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि इस मामले में आगे की जाँच जारी है और दोषियों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाएगी।