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पूर्वोतर की जिस तलवार से टकराने के बाद जान बचाकर भागा खिलजी, कामरूप के उस हिंदू शासक के नाम होगा गुवाहाटी का सबसे लंबा फ्लाईओवर: जानिए राजा पृथु को

भारत के 79वें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने एक बड़ी घोषणा की है। इसके तहत गुवाहाटी में बन रहा सबसे लंबा फ्लाईओवर (दीघलीपुखुरी से नूनमाटी तक) अब महाराजा पृथु के नाम पर रखा जाएगा।

मुख्यमंत्री ने कहा कि यह फैसला असम की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने और आने वाली पीढ़ियों को हमारे वीरतापूर्ण इतिहास से प्रेरित करने के उद्देश्य से लिया गया है।

मुस्लिम आक्रांता मोहम्मद बिन खिलजी को हराने वाले महाराजा पृथु

महाराजा पृथु को राजा पृथु या विश्वसुंदर देव के नाम से भी जाना जाता है। वे 12वीं और 13वीं सदी में प्राचीन कामरूप (वर्तमान असम) के शासक थे। राजा पृथु ने 1206 ईस्वी में दिल्ली सल्तनत के सिपहसालार मोहम्मद बिन बख्तियार खिलजी को हराया था।

बख्तियार खिलजी वही आक्रांता था, जिसने नालंदा और विक्रमशिला जैसे शिक्षा के बड़े केंद्रों को नष्ट कर दिया था और 10,000 से ज्यादा बौद्ध भिक्षुओं की हत्या की थी। बिना किसी खास प्रतिरोध के पूर्व की ओर बढ़ने के बाद, जब खिलजी की फौज ने कामरूप में प्रवेश करने का प्रयास किया, तो उसे भयंकर प्रतिरोध का सामना करना पड़ा।

मिनहाज सिराज-अल-दीन द्वारा लिखित फ़ारसी इतिहास ‘तबाकत-ए-नासिरी’ सहित ऐतिहासिक स्रोतों और कनाई बसासी और कन्हाई बोरोक्सी बुआ जिल जैसे स्थलों के शिलालेखों में उल्लेख है कि आक्रमणकारी फौज का पूरी तरह से सफाया कर दिया गया था और असम की संप्रभुता सुरक्षित रही। कई फौजी पीछे हटने से पहले ही दुर्गम इलाकों में मारे गए थे।

उसने बिना किसी युद्ध के बंगाल पर कब्जा कर लिया था। इसके बाद उसने 1206 ईस्वी में तिब्बत पर आक्रमण करने की योजना बनाई, ताकि बौद्ध मठों के खजाने को लूट सके। वह दक्षिण पूर्व एशिया के साथ कामरूप और सिक्किम से होकर जाने वाले पारंपरिक व्यापार मार्ग पर भी कब्जा करना चाहता था।

खिलजी ने राजा पृथु और उनकी सेना की वीरता के बारे में सुना था और जानता था कि उनके राज्य से होकर गुजरना असंभव होगा। अतः उसने कामरूप के विरुद्ध लड़ने के बजाय, तिब्बत पर आक्रमण करने के लिए राजा पृथु के पास हाथ मिलाने का पैगाम भेजा।

कामरूप राजा ने खिलजी के साथ सहमति जताते हुए कहा कि वह भी रेशम मार्ग पर नियंत्रण के लिए दक्षिणी तिब्बत पर भी आक्रमण करना चाहते हैं। इसके बाद खिलजी और राजा पृथु संयुक्त आक्रमण के लिए सहमत हो गए, लेकिन राजा पृथु ने सलाह दी कि मॉनसून के मौसम में पहाड़ों से होकर जाना खतरनाक होगा, इसलिए कुछ समय इंतजार करना चाहिए।

जब तक खिलजी के आदमी राजा पृथु का संदेश लेकर लौटे, तब तक वह काफी आगे बढ़ चुका था और वर्तमान सिलीगुड़ी के पास डेरा डाले हुए था। खिलजी ने उनकी सलाह को नजरअंदाज कर दिया और एक स्थानीय गाइड ‘मेच’ के जरिए भूटान के रास्ते से तिब्बत जाने की कोशिश की। यात्रा शुरू होने से पहले खिलजी ने मेच का धर्मांतरण करा दिया था।

रास्ते में तिब्बती गुरिल्ला सेनाओं ने उसकी फौज पर हमला कर दिया। भारी बारिश और बीमारियों के चलते उसकी फौज कमजोर हो गई। कई फौजी बीमारी से मर गए। हालात इतने खराब थे कि बख्तियार खिलजी की फौज ने घोड़ों को खाने के लिए मार डाला। उसी रास्ते से वापस लौटने में असमर्थ, खिलजी ने कामरूप के रास्ते लौटने का फैसला किया।

राजा पृथु की युद्धनीति

राजा पृथु को इस घटनाक्रम की जानकारी थी क्योंकि उनके जासूस नियमित रूप से जानकारी दे रहे थे। वह अपनी सलाह की अनदेखी करने के लिए खिलजी से पहले से ही क्रोधित थे और उन्हें अंदेशा था कि आक्रमणकारी उनके राज्य को लूटकर अपनी आपूर्ति बढ़ाएँगे। 

जब खिलजी लौटने के लिए कामरूप की ओर बढ़ा, तो राजा पृथु ने पहले ही सारी तैयारी कर रखी थी। उन्होंने स्कॉर्च्ड अर्थ रणनीति अपनाई और यानी रास्ते में सभी संसाधनों को नष्ट कर दिया, ताकि दुश्मन को कोई मदद न मिल सके। पुलों को तोड़ दिया गया और राशन समेत रास्तों को जला दिया गया।

युद्ध में लगभग 12,000 घुड़सवार और 20,000 पैदल पौजी मारे गए। खिलजी किसी तरह जान बचाकर कुछ सौ फौजियों के साथ भाग निकला। इसके बाद खिलजी ने नए क्षेत्रों पर विजय पाने का उत्साह खो दिया और फिर कभी किसी युद्ध में नहीं गया। अंत में खिलजी अपने ही एक सिपहसालार अली मर्दान खिलजी के हाथों मारा गया।

राजा पृथु ने असम की भूमि को बाहरी आक्रमणों से बचाया। हालाँकि 1228 में दिल्ली सल्तनत के शासक इल्तुतमिश के बेटे नासिरुद्दीन महमूद से युद्ध में उन्हें हार का सामना करना पड़ा। हार स्वीकारने के बजाय उन्होंने अपने किले के एक जलकुंड में कूदकर स्वाभिमानपूर्वक जीवन त्याग दिया।

आज भी 27 मार्च को असम में ‘महाविजय दिवस’ मनाया जाता है। यह वही दिन है जब पृथु ने बख्तियार खिलजी की फौज को हराया था। महाविजय दिवस मध्यकालीन भारत के सबसे आक्रामक सैन्य अभियानों में से एक के विरुद्ध राज्य के प्रतिरोध और उत्तरजीविता का स्मरणोत्सव है।

सीएम ने कहा- राजा पृथु ने असम को दिल्ली सल्तनत का हिस्सा होने से बचाया

मुख्यमंत्री शर्मा ने कहा कि राजा पृथु का योगदान बहुत कम जाना जाता है, जबकि उन्होंने असम को दिल्ली सल्तनत का हिस्सा बनने से बचाया। उन्होंने कहा कि जैसे अहोम साम्राज्य के सेनापति लाचित बरफुकन को मुगलों के खिलाफ जीत के लिए जाना जाता है, वैसे ही पृथु को भी उनके साहस और रणनीति के लिए याद किया जाना चाहिए।

नए फ्लाईओवर का नाम महाराजा पृथु के नाम पर रखने से पहले हेमंत बिस्वा शर्मा सरकार द्वारा गुवाहाटी में एक नए फ्लाईओवर का नाम महाभारत कालीन राजा भगदत्त के नाम पर रखने का निर्णय लिया गया था। भगदत्त असुर राजा नरकासुर के पुत्र थे और कुरुक्षेत्र महायुद्ध में कौरवों की ओर से भाग लिया था। उन्होंने हाथियों के एक बड़े दल सहित एक अक्षौहिणी सेना का योगदान दिया था।

अब दिघलीपुखुरी–नूनमाटी फ्लाईओवर को महाराजा पृथु फ्लाईओवर नाम देकर सरकार उनके अदम्य साहस को सम्मान दे रही है, साथ ही नई पीढ़ी को उनके बारे में जागरूक करने का प्रयास कर रही है।

(यह रिपोर्ट मूल रुप से अंग्रेजी में राजू दास ने लिखी है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें। इसका अनुवाद सौम्या सिंह ने किया है। )

जिस ‘तलाक-ए-हसन’ की वैधता की SC के पास पहुँची जाँच, उसे इस्लाम में माना जाता है सबसे ‘माकूल’: जानें क्या है ये, जिसे मुस्लिम औरतों ने दी है चुनौती

‘तलाक-ए-हसन’ इस्लाम में तलाक देने की वो प्रक्रिया है, जिसमें शौहर अपनी बीवी को तीन महीने में हर महीने में एक बार ‘तलाक’ कहने से निकाह तोड़ सकता है। लेकिन यह ‘तीन तलाक’ से अलग है, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 2017 में असंवैधानिक घोषित करते हुए तीन साल की सजा का प्रावधान दिया था। अब यही सुप्रीम कोर्ट ‘तलाक-ए-हसन’ की वैधता की जाँच कर रही है।

लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, यह जाँच सुप्रीम कोर्ट में ‘तलाक-ए-हसन’ मामले में दाखिल की गई 9 याचिकाओं पर विचार करते हुए शुरू की गई है। मामले में तीन राष्ट्रीय आयोगों से जवाब माँगा गया है, जिसमें मानवाधिकार आयोग (NHRC), राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) और राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) शामिल हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने आयोगों को इस्लाम की प्रमाणिक पुस्तकों और मजहबी किताबों समेत अन्य किसी भी सामग्री से तर्क प्रस्तुत करने की अनुमति भी दी है। कोर्ट ने मामले में सुनवाई को 19 नवंबर तक टालते हुए आयोगों को 4 महीने का समय दिया है।

गाजियाबाद की पत्रकार बेनजीर हिना ने दी थी चुनौती

सुप्रीम कोर्ट में ‘तलाक-ए-हसन’ से संबंधित सभी दायर याचिकाओं में मुख्य याचिका गाजियाबाद की पत्रकार बेनजीर हिना की है, जिनके शौहर ने इस प्रक्रिया के तहत उन्हें तलाक दे दिया था। साल 2022 में पहले महीने में तलाक के बाद ही बेनजीर ने कोर्ट का रुख किया था।

कोर्ट में याचिका दायर कर हिना ने इस प्रक्रिया को ‘भेदभावपूर्ण’ बताया था। उन्होंने कहा था कि यह एकतरफा तलाक की प्रक्रिया ‘महिलाओं की गरिमा पर घोर आघात’ है। ये औरतों के अधिकार को कमजोर करती है। उन्होंने कोर्ट से माँग की कि यह संविधान के अनुच्छेद 14,15, 21 और 25 का उल्लंघन है, इसीलिए ‘असंवैधानिक’ घोषित किया जाए।

तब सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई करते इस्लाम में ‘तलाक-ए-हसन’ के जरिए तलाक की प्रक्रिया को तीन तलाक से अलग बताया था और कहा था कि महिलाओं के पास भी ‘खुला’ का विकल्प है।

लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट में ‘तलाक-ए-हसन’ मामले में दायर याचिकाओं में एक याचिका क्रिकेटर मोहम्मदी शमी की बीवी हसीन जहाँ की भी है।

इस्लाम में तलाक-ए-हसन कितना वैध ?

शरिया लॉ में तलाक-ए-हसन को तलाक-उल-सुन्नत का रूप माना गया है। तलाक-उल-सुन्नत के दो रूप हैं, जिनमें अन्य रूप तलाक-ए-अहसन है। तलाक-उल-सुन्नत का अर्थ है ‘सुन्नत के मुताबिक’ तलाक, जिसमें समय दिया जाता है। इस तरीके को पैगंबर मुहम्मद ने भी कबूल किया है।

तलाक-ए-हसन में शौहर तीन महीने में हर महीने एक बार ‘तलाक’ कहकर निकाह खत्म कर सकता है। इस्लाम में इस प्रक्रिया को सबसे माकूल और काबिले गौर तरीका माना जाता है। इस प्रक्रिया में मियाँ और बीवी को सुलह का समय दिया जाता है।

इस पर नोएडा के मौलवी मुफ्ती मुबारक कहते हैं कि तलाक-ए-हसन या तीन तलाक इस्लाम और कुरान में जायज नहीं है, केवल दो तलाक कहना ही मान्य है। तलाक-ए-हसन पर बोलते हुए कहते हैं कि इसमें पहले महीने में तलाक बोलने के बाद भी मियाँ-बीवी को दोबारा एकसाथ रहने का मौका मिलता है। लेकिन दूसरे महीने में ऐसा नहीं है, तब मियाँ-बीवी को दोबारा निकाह करना होगा।

वहीं, तीसरे महीने के तीसरे तलाक के बाद हलाला लागू हो जाएगा। इसके तहत औरत को नए शख्स के साथ निकाह कर संबंध बनाने होंगे, फिर उसे तलाक देकर अपने पहले शौहर से निकाह किया जा सकता है।

तलाक-ए-हसन की प्रक्रिया

तलाक-ए-हसन में शौहर तभी ‘तलाक’ कह सकता है, जब बीवी तुहर (मासिक धर्म से मुक्त) में नहीं होती है। अगर औरत तुहर में नहीं है, तो पहले महीने पर ‘तलाक’ कहकर प्रक्रिया शुरू हो जाती है। इसके बाद एक महीने तक औरत इद्दत (एक अवधि तक किसी भी मर्द से निकाह या शारीरिक संबंध नहीं बना सकती) में रहती है।

एक महीने के इंतजार पर शौहर अगला ‘तलाक’ भी तभी दे सकता है, जब औरत हैज (मासिक धर्म) में नहीं है। इस एक महीने के बीच अगर सुलह हो जाती है तो ‘तलाक’ की प्रक्रिया रुक जाती है। अगर ऐसा नहीं होता तो तीसरे महीने के हैज में तलाक को दोहराया जाता है। तीसरी बार ‘तलाक’ कहने पर तलाक-ए-हसन की प्रक्रिया पूरी होने के साथ निकाह खत्म हो जाता है।

शौहर के तलाक देते ही औरत अब ‘इद्दत’ शुरू कर देती है। शरिया लॉ में तलाक के बाद औरत को तीन महीने तक ‘इद्दत’ पूरी करनी होगी। हालाँकि, औरत अगर गर्भवती है तो इस ‘इद्दत’ को पूरा नहीं माना जाता है। ये बच्चा पैदा होने के बाद ही लागू होगी।

इस्लाम ने किया बेटियों का दिमाग खराब, दोनों अब भी इसके चंगुल में: आगरा में धर्मांतरण गिरोह का निशाना बनीं हिंदू बहनों के रेस्क्यू के बाद भी माता-पिता परेशान, ऑपइंडिया के आगे बयां किया दर्द

आगरा पुलिस ने देश के सबसे बड़े धर्मांतरण गिरोह का पर्दाफाश करने के साथ कोलकाता के मुस्लिम बाहुल्य इलाके से रेस्क्यू की गईं दो बहनों को उनके माता-पिता को सौंप दिया है। उन अभिवावकों का दर्द अब सामने आ रहा है। आगरा पुलिस दोनों बरामद बहनों की लगातार काउंसलिंग कर रही है। इस बीच पीड़ित माता-पिता से ऑपइंडिया ने बातचीत की।

पीड़ित माँ ने ऑपइंडिया को बताया कि बेटियाँ अचानक 24 मार्च को बिना किसी को बताए घर छोड़कर चली गईं थीं। वह अपने साथ घर से कुछ कपड़े, कुछ कैश और अपना जरूरी सामान लेकर गई थीं। माँ ने कहा, “उस दिन हम दोनों (माता-पिता) एक सत्संग के कार्यक्रम में गए हुए थे। वह हमसे नाराज नहीं थीं, लेकिन इस्लाम ने ही उनका दिमाग खराब कर रखा था।”

माँ ने कहा, “इस्लाम हमें पसंद नहीं था। हम नहीं चाहते थे कि हमारी बेटी किसी भी तरह से इस्लाम के प्रभाव में आएँ, लेकिन ये हो गया। आगरा पुलिस ने हमारी बेटियों को सकुशल वापस लाकर बहादुरी का काम किया है।” पीड़ित पिता ने भी आगरा पुलिस कमिश्नर दीपक कुमार और सीएम योगी का आभार जताया है।

साथ पढ़ने वाली सायमा ने किया था ब्रेनवॉश

पीड़ित माँ ने बताया कि बड़ी बेटी पीएचडी करने के लिए एक कोचिंग सेंटर से नेट की तैयारी कर रही थी। इस बीच कश्मीर से सायमा नाम की एक लड़की भी वहाँ कोचिंग ले रही थी। सायमा ने ही बड़ी बेटी में हिंदू पूजा पद्धति के खिलाफ जहर घोला और धीरे-धीरे उसने बड़ी बेटी को अपने प्रभाव में ले लिया। एक दिन सायमा बेटी के साथ घर भी आई थी।

इसके बाद ही 26 फरवरी 2021 को सायमा दोनों बहनों को लेकर आगरा से फरार हो गई थी। उस समय छोटी बेटी की उम्र महज 14 वर्ष (नाबालिग) थी। इसके बाद सायमा ने दोनों बहनों को जम्मू में अपनी शादीशुदा बड़ी बहन के घर ठहराया था और वहाँ से अगली सुबह खाना खाकर 170 किलोमीटर दूर कश्मीर के लिए रवाना हो गईं थी।

हालाँकि रास्ते में लैंडस्लाइड होने के कारण रास्ता जाम हो गया और पुलिस ने कश्मीर जाने से पहले ही सायमा को दोनों बेटियों के साथ दबोच लिया।

पिता बताते हैं कि सायमा की मानसिकता का अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि उसने बेटी के कहने पर भी मुझसे बात नहीं कराई थी और सिम को भी तोड़कर फेंक दिया था। फिर भी हमने सायमा के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं कराई थी, ये हमारी गलती थी। अगर हमने पहले ही सायमा के खिलाफ शिकायत की होती तो आज फिर से हमारी बेटियाँ घर से नहीं गई होतीं।

घर पर नमाज पढ़ने व रोजा रखने की जिद करती थीं बेटियाँ

पीड़ित माँ का दावा है कि जम्मू-कश्मीर से लौटने के शुरूआती दिनों में बेटियाँ इस्लाम की ही तारीफ करती थीं। यहाँ तक कि वह घर पर नमाज पढ़ने और रोजे रखने की बात करती थी।

माँ ने कहा, “ये सब 8-10 दिन तक चला लेकिन हमारे (माता-पिता) के विरोध के बाद बेटियाँ शांत हो गईं और फिर पहले की तरह सामान्य तरीके से रहने लगीं।” लेकिन इस घटना के बाद परिजनों ने दोनों बेटियों के घर से बाहर जाने पर पाबंदी लगा दी थी, जिससे सायमा बेहद परेशान थी।

माँ कहती हैं कि बेटियाँ अब भी इस्लाम के प्रभाव में हैं। बेटियों का कहना है कि आप लोगों में तो बुत परस्ती होती है इस्लाम में तो एक ही है। माँ बताती हैं कि पहले वह हमारी बात मानती थीं, लेकिन अब वह गुस्सा करतीं हैं। हम उनके भविष्य को लेकर बहुत चिंतित हैं, जो आए दिन हम घटना टीवी मीडिया में देख रहे हैं और लोगों से सुन रहे हैं। इन सब को देखकर बहुत डर लगता है, लेकिन मुझे भगवान पर पूरा भरोसा है कि सब ठीक हो जाएगा।

सनातन धर्म में वापस आ जाएँ बेटियाँ: माँ

पीड़ित माँ हैरानी के साथ कहती हैं कि हमने कभी सोचा नहीं था कि हमारी पढ़ी-लिखी बेटी ऐसा करेंगी। हमारा परिवार आर्यसमाजी है। हम वैदिक सनातन धर्म से जुड़े हुए हैं। ऑपइंडिया से बात करते हुए पीड़ित माता-पिता भावुक हो उठे। माँ ने कहा, “हम भगवान से प्रार्थना करते हैं कि कैसे भी हमारी बेटियाँ सनातन धर्म में वापस आ जाएँ।”

वहीं, पीड़ित पिता हिंदू समाज से अपील करते हुए कहते हैं कि बच्चों को धर्म की बात सिखाएँ ताकि उनका कोई ब्रेनवॉश न कर सके।

बहरहाल, दो बहनों की गुमशुदगी और आगरा पुलिस की सतर्कता इस धर्मांतरण गिरोह के भंडाफोड़ की सबसे बड़ी वजह बनी है। आगरा पुलिस ने ‘ऑपरेशन अस्मिता’ के तहत 7 लड़कियों को रेस्क्यू किया है। साथ ही, गैंग के 14 आरोपितों को गिरफ्तार कर जेल भेजा है।

यह गिरोह भले ही सबसे बड़े धर्मांतरण गिरोह के रूप में देश के सामने आया हो लेकिन यह धर्मांतरण गैंग पहला या आखिरी नहीं हो सकता। अब भी देश के कई हिस्सों में ऐसे लोग सक्रिय हैं जो सनातन धर्म को कमजोर करने और हमारी बेटियों को बरगलाने के लिए लगातार सक्रिय हैं।

पहले 58 साल पुराना कॉन्ग्रेसी प्रतिबंध हटाया, अब लाल किले से कहा- मुझे गर्व है: जिस RSS का स्वयंसेवक होने पर छीन लेते थे नौकरी, उसकी राष्ट्र सेवा को PM ने किया नमन

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) 2025 में अपनी स्थापना का शताब्दी वर्ष मना रहा है।79वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने RSS की सेवाओं का जिक्र करते हुए इसे विश्व का सबसे बड़ा गैर-सरकारी संगठन (NGO) बताया है। पीएम ने कहा, “यह संगठन देश के अलग-अलग हिस्सों में योगदान दे रहा है।” हालाँकि RSS के विश्व का सबसे बड़ा NGO बनने की यात्रा में कॉन्ग्रेस हमेशा बाधक बनती रही है।

पीएम ने कहा, ”आज मैं गर्व के साथ एक बात का जिक्र करना चाहता हूँ। आज से 100 साल पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का जन्म हुआ। संघ के लोग 100 साल से राष्ट्र की सेवा कर रहे हैं। व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण के संकल्प को लेकर 100 साल तक माँ भारती के कल्याण का लक्ष्य लेकर संघ के लोगों ने मातृभूमि के कल्याण के लिए अपना जीवन समर्पित किया है। ऐसा RSS दुनिया का सबसे बड़ा NGO है। बीते 100 साल के दौरान देश की यात्रा में संघ का अहम योगदान है।”

प्रधानमंत्री ने कहा, “मैं आज यहाँ लाल किले के प्राचीर से 100 साल की इस राष्ट्र सेवा की यात्रा में योगदान करने वाले सभी स्वयंसेवकों को आदरपूर्वक स्मरण करता हूँ। देश राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की इस 100 साल की भव्‍य, समर्पित यात्रा पर गर्व करता है और यह हमें प्रेरणा देता रहेगा।”

जानिए कैसे RSS को रोकने के लिए कॉन्ग्रेस ने चली चालें

बता दें कि जिस RSS को पीएम ने विश्व का सबसे बड़ा NGO कहा है, उसे रोकने के लिए कॉन्ग्रेस ने कम चालें नहीं चली हैं। कॉन्ग्रेस की सरकार ने 3 बार RSS पर प्रतिबंध लगाया। 60 के दशक में कॉन्ग्रेस ने सरकारी कर्मचारियों के RSS की गतिविधियों में शामिल होने पर बैन ही लगा दिया था।

महात्मा गाँधी की हत्या के बाद कॉन्ग्रेस ने RSS को खुलेआम टारगेट करना शुरू किया। कॉन्ग्रेस ने मौके का फायदा उठाते हुए संघ पर बैन लगा दिया था। हालाँकि बाद में गृहमंत्री सरदार पटेल ने इसके खिलाफ आवाज उठाई, जिसके बाद इस बैन को हटाया गया। RSS कॉन्ग्रेस की आँखों में हमेशा ही खटकता रहा है। 1966 में सरकारी कर्मचारियों को इस संगठन की गतिविधियों में भाग लेने से रोक दिया गया।

1975 में जब इमरजेंसी लागू हुई तो फिर RSS को बैन किया गया। 1977 के चुनावों में RSS ने इसके खिलाफ आवाज उठाते हुए विरोध प्रदर्शन किया। इसका असर इतना प्रभावी हुआ कि न सिर्फ पार्टी हारी, बल्कि इंदिरा गाँधी और उनके बेटे संजय गाँधी तक अपनी सीटों से हाथ धो बैठे। इसके बाद RSS से फिर से बैन हटाया गया।

कॉन्ग्रेस को RSS की ये जीत कहाँ सुहाने वाली थी। 1992 में जब अयोध्या में कारसेवा के बाद बाबरी ढाँचा गिरा तो फिर कॉन्ग्रेस को RSS पर बैन लगाने का मौका मिला गया। इस बार UAPA 1967 के प्रावधानों के तहत बैन लगाया गया।

कॉन्ग्रेस ने ढाँचा गिरने का सारा इल्जाम RSS पर लगा दिया। मामला ट्रिब्यूनल कोर्ट तक गया, हालाँकि कोर्ट को RSS के विरुद्ध पर्याप्त सबूत नहीं मिले और RSS से बैन एक बार फिर हटा दिया गया।

कुछ भी हासिल नहीं हुआ तो संघ से जुड़े लोगों की छीन ली नौकरी

RSS पर प्रतिबंध नहीं लग सका तो कॉन्ग्रेस ने संघ के सरकारी कर्मचारियों को इस संगठन की गतिविधियों में शामिल होने से रोकने का प्रयास किया। पुलिस को आदेश दिया गया कि वे सत्यापित करें कि केंद्र में काम करने वाले लोग RSS से तो नहीं जुड़े, अगर जुड़े हैं तो उनकी नियुक्ति रद्द कर दी जाए। कॉन्ग्रेस ने स्पष्ट रूप से निर्देश दिया कि उन्हें नौकरी देने से मना कर दो और नौकरी से हटा दो।

कॉन्ग्रेस की इस तानाशाही का भुक्तभोगी रामशंकर रघुवंशी को भी बताया जाता है। रिपोर्ट के अनुसार रघुवंशी स्कूल शिक्षक थे। रघुवंशी को पहले पूर्व में हुए सत्यापन पर स्कूल में शामिल कर लिया गया। हालाँकि बाद में पुलिस ने सरकार को बताया कि वो एक समय में RSS और जनसंघ की गतिविधियों में शामिल थे तो उन्हें नौकरी से हटा दिया गया।

इसी तरह, रंगनाथाचार्य अग्निहोत्री को कर्नाटक में मुंसिफ के पद के लिए चुना गया था। पुलिस सत्यापन में पता चला कि वे पहले येलबुर्गा में RSS से जुड़े रहे थे। जिसका फायदा उठाते हुए सरकार ने उन्हें नौकरी में प्रवेश देने से मना कर दिया।

उदाहरण के तौर पर नागपुर के चिंतामणि की भी कहानी सामने आई। वे उप पोस्ट मास्टर थे। उन पर आरोप लगाया गया था कि वे RSS के सदस्य हैं और संक्रांति के अवसर पर RSS कार्यालय गए थे। इतनी सी बात के लिए चिंतामणि को सेवा से हटा दिया गया था।

हालाँकि चिंतामणी ने हार नहीं मानी वो इंसाफ के लिए मैसूर हाई कोर्ट पहुँचे। मामले की सुनवाई करते हुए कोर्ट ने कहा, “प्रथम दृष्टया RSS एक गैर-राजनीतिक सांस्कृतिक संगठन है। इसमें गैर-हिंदुओं के प्रति कोई घृणा या दुर्भावना नहीं है। देश के कई प्रतिष्ठित और सम्मानित व्यक्तियों ने इसके कार्यों की अध्यक्षता करने या इसके स्वयंसेवकों के काम की सराहना करने में संकोच नहीं किया है।”

कोर्ट ने कहा, “हमारे जैसे देश में जहाँ लोकतंत्र है (जैसा कि संविधान द्वारा सुनिश्चित किया गया है), यह प्रस्ताव स्वीकार करना उचित नहीं होगा कि ऐसे शांतिपूर्ण या अहिंसक संघ की सदस्यता और उसकी गतिविधियों में भागीदारी मात्र से कोई व्यक्ति (जिसके चरित्र और पूर्ववृत्त में कोई अन्य दोष नहीं है) मुंसिफ के पद पर नियुक्त होने के लिए अनुपयुक्त हो जाएगा।”

बाद में उन्होंने विशेष सिविल अपील संख्या 22/52 में बॉम्बे (नागपुर बेंच) में हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। मामले में कोर्ट ने कहा, “याचिकाकर्ता चिंतामणि के मामले में पहला आरोप यह है कि वह RSS की गतिविधियों से जुड़े हुए हैं और उसमें सक्रिय रूप से भाग ले रहे है।

हालाँकि चिंतामणि ने इस आरोप से इनकार किया है, मगर हम मान सकते हैं कि प्रतिवादी के अनुसार आरोप सत्य है… लेकिन ये भी गौर हो RSS ऐसा संगठन नहीं है जिसे गैरकानूनी घोषित किया गया हो। आरोप में यह भी नहीं बताया गया है कि RSS की कौन सी गतिविधियाँ हैं, जिनमें भागीदारी या जिनसे जुड़ाव को विध्वंसक माना जाता है।”

कोर्ट ने चिंतामणि पर लगाए गए आरोपों को लेकर कहा कि सरकार बेहद अस्पष्ट है। जब तक किसी व्यक्ति पर उचित रूप से यह संदेह न हो कि वह कुछ गैरकानूनी काम कर रहा है या सार्वजनिक सुरक्षा के लिए हानिकारक है, तब तक यह कहना मुश्किल है कि किसी ऐसी संस्था से जुड़ाव मात्र, जिसे न तो गैरकानूनी घोषित किया गया है और न ही किसी असामाजिक या देशद्रोही गतिविधियों या शांति भंग करने वाली गतिविधियों में लिप्त होने का आरोप या दिखाया गया है, नियम 3 के तहत कार्रवाई का आधार बन सकता है।

आँकड़े और भी हैं। कहा जाता है कि RSS के सदस्यों के मामलों की सुनवाई कई हाई कोर्ट्स में की गई। सभी मामलों में ऐसे ही शिकायतें सामने आईं कि केवल संगठन से जुड़ने पर नौकरी से निकाले जाने के प्रयास हुए। प्रधानमंत्री मोदी ने RSS के ‘स्वयंसेवकों’ पर लगा यह प्रतिबंध 2024 में हटा दिया था।

प्रधानमंत्री ने स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से जिस तरह RSS की सेवाओं का उल्लेख किया है, उसकी सेवा को मान दिया है, वह कॉन्ग्रेस को अपने मुँह पर चाँटे की तरह महसूस हो रहा होगा, क्योंकि यह सम्मान संघ ने कॉन्ग्रेस के जुल्म को सहते हुए लगातार देश सेवा कर अर्जित किया है।

बलूचिस्तान में ‘अमेरिकी खुदाई’ का बनाया जा रहा रास्ता, सोना निकालने वाली कनाडाई कंपनी ने G7 देशों से माँगे ₹29050 करोड़: सऊदी अरब ने फंडिंग से कर दिया है इनकार

बलूचिस्तान एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में है। इस बार कारण है इसके प्राकृतिक संसाधनों को लेकर बढ़ती वैश्विक दिलचस्पी। कनाडा की कंपनी बैरिक माइनिंग ने विवादित रेको दिक तांबा-सोना परियोजना के लिए 3.5 अरब डॉलर (29,050 करोड़ रुपए) की फंडिंग की माँग की है।

सऊदी अरब ने इस परियोजना में निवेश से इनकार कर दिया है। अब कंपनी अमेरिकी नेतृत्व में G7 फाइनेंसिंग पैकेज तैयार कर रही है, जिससे 2028 तक खदान से उत्पादन शुरू होने की उम्मीद है।

बैरिक माइनिंग के सीईओ मार्क ब्रिस्टो के अनुसार, अमेरिकी सरकार, एशियाई विकास बैंक, अंतर्राष्ट्रीय वित्त निगम (IFC), अमेरिकी अंतर्राष्ट्रीय विकास वित्त निगम, कनाडा, जापान और जर्मनी के वित्तीय संस्थान इस परियोजना में गहरी रुचि दिखा रहे हैं।

उन्होंने फाइनेंशियल टाइम्स को बताया कि अमेरिका के समर्थन से पाकिस्तान को कॉपर कॉन्सन्ट्रेट (तांबे का कच्चा रूप) तक पहुँच मिलेगी, हालाँकि इसके लिए अभी और प्रोसेसिंग की आवश्यकता है। यह परियोजना न केवल पाकिस्तान के आर्थिक भविष्य के लिए अहम मानी जा रही है, बल्कि यह भी दिखाती है कि कैसे वैश्विक ताकतें बलूचिस्तान जैसे संवेदनशील क्षेत्र में संसाधनों को लेकर सक्रिय भूमिका निभा रही हैं।

बलूचिस्तान की सबसे बड़ी खनिज परियोजना

रेको दिक खदान को दुनिया की सबसे बड़ी और अब तक अविकसित तांबा-सोना परियोजनाओं में से एक माना जाता है। अनुमान है कि अगले 37 वर्षों के खनन काल में यह परियोजना लगभग 70 अरब डॉलर (5.81 लाख करोड़ रुपए) का फ्री कैश फ्लो (Free Cash Flow) और करीब 90 अरब डॉलर (7.47 लाख करोड़ रुपए) का कुल ऑपरेटिंग कैश फ्लो (Operating Cash Flow) उत्पन्न कर सकती है।

इस महत्वाकांक्षी परियोजना की मालिकाना हिस्सेदारी तीन पक्षों के बीच साझा है। जिसमें कनाडा की बैरिक गोल्ड कंपनी, पाकिस्तान की संघीय सरकार और बलूचिस्तान की प्रांतीय सरकार शामिल है।

इसकी फंडिंग के लिए कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से बातचीत चल रही है। इस साल की शुरुआत में टिम क्रिब ने बताया था कि रेको दिक परियोजना को अंतरराष्ट्रीय विकास संघ (IDA) और अंतरराष्ट्रीय वित्त निगम (IFC) से लगभग 650 मिलियन डॉलर (5,395 करोड़ रुपए) की सहायता मिलने की उम्मीद है।

वहीं, अमेरिकी निर्यात-आयात बैंक (US EXIM Bank) से 500 मिलियन से 1 अरब डॉलर (4,150 करोड़ रुपए से 8,300 करोड़ रुपए) तक की फंडिंग की संभावना जताई गई है। इसके अलावा, परियोजना जापान बैंक फॉर इंटरनेशनल को ऑपरेशन, एक्सपोर्ट डेवलपमेंट कनाडा और एशियाई विकास बैंक जैसे अन्य वित्तीय संगठनों से भी 500 मिलियन डॉलर (4,150 करोड़ रुपए) की अतिरिक्त राशि जुटाने का प्रयास कर रही है।

यह परियोजना पाकिस्तान के आर्थिक विकास के लिए एक बड़ा अवसर मानी जा रही है और इसमें वैश्विक स्तर पर बढ़ती दिलचस्पी बलूचिस्तान के प्राकृतिक संसाधनों की अहमियत को भी दिखाती है।

भारत के साथ टैरिफ युद्ध के बीच ट्रंप के करीब आने की कोशिश कर रहा पाक

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत पर रूस से तेल खरीदने को लेकर टैरिफ वॉर छेड़ दिया है। इससे भारत-अमेरिका के बीच तनाव बढ़ गया है। इसी दौरान पाकिस्तान ने अमेरिका और ट्रंप से नजदीकियाँ बढ़ा ली हैं। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और असली ताकत रखने वाले सेना प्रमुख फील्ड मार्शल असीम मुनीर ने ट्रंप की खुलकर चमचागिरी की है, जिससे अमेरिका से उनके रिश्ते मजबूत हुए हैं।

पाकिस्तानी फौज समर्थित सरकार ने कई बार ट्रंप को इस ‘दावे’ के लिए धन्यवाद दिया है कि उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्षविराम (सीजफायर) समझौते में कोई भूमिका निभाई। हालाँकि, असलियत यह है कि भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के तहत पाकिस्तान को सैन्य रूप से करारी हार दी थी। यह ऑपरेशन पाकिस्तान-प्रायोजित पहलगाम आतंकवादी हमले के बाद किया गया था, जिसमें 26 लोग मारे गए थे।

इस शर्मनाक हार के बाद पाकिस्तान ने खुद भारत से संघर्षविराम की अपील की थी, जिसे भारत ने रणनीतिक रूप से मान लिया। इसके बाद से पाकिस्तान की फौज के प्रमुख असीम मुनीर दो बार अमेरिका का दौरा कर चुके हैं।

पाकिस्तान की खुशामदी नीति से प्रभावित होकर ट्रंप प्रशासन ने हाल ही में बलूचिस्तान की आज़ादी के लिए लड़ रही बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) और उसकी मजीद ब्रिगेड को ‘विदेशी आतंकी संगठन’ घोषित कर दिया है। इससे बलूच स्वतंत्रता सेनानियों को अब अमेरिका की नजर में आतंकवादी बताया गया है।

बलूचिस्तान में पाकिस्तान का विरोध

बलूचिस्तान, जो पाकिस्तान का सबसे उपेक्षित और शोषित प्रांत माना जाता है, लंबे समय से प्राकृतिक संसाधनों के दोहन और स्थानीय लोगों के दमन का शिकार रहा है। बलूच लिबरेशन आर्मी (BLA) ने वर्षों से पाकिस्तानी फौज, चीनी कर्मियों और चीन की उन परियोजनाओं पर हमले किए हैं, जो बलूच संसाधनों का दोहन करती हैं।

बलूच समुदाय का आरोप है कि पाकिस्तान और चीन मिलकर उनके खनिज और ऊर्जा संसाधनों का फायदा उठा रहे हैं, लेकिन स्थानीय लोगों को उसका कोई लाभ नहीं मिलता। इस बीच, अमेरिका की भूमिका भी इस क्षेत्र में तेजी से बढ़ रही है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने हाल ही में पाकिस्तान के कथित विशाल तेल भंडार को संयुक्त रूप से विकसित करने के लिए एक नया व्यापार समझौता पेश किया था। यह ऐलान उस समय हुआ जब अमेरिका ने भारत से आयात होने वाले सामान पर भारी टैरिफ और दंडात्मक शुल्क लगाने की घोषणा की थी।

ट्रम्प ने यहाँ तक कह दिया कि एक दिन पाकिस्तान भारत को तेल बेच सकता है। इसी दौरान अमेरिका ने BLA को आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया, जो ट्रम्प के पाकिस्तान समर्थक रुख और बलूचिस्तान के खनिज संसाधनों में बढ़ती अमेरिकी दिलचस्पी को और भी संदिग्ध बना देता है। बलूच स्वतंत्रता सेनानियों ने चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) के तहत ग्वादर बंदरगाह में चीनी प्रभाव का लगातार विरोध किया है।

अब कनाडा की कंपनी बैरिक माइनिंग रेको डिक तांबा-सोना परियोजना के लिए 3.5 अरब डॉलर की फंडिंग जुटाने में लगी है, जिसमें अमेरिकी संस्थानों की भी भागीदारी है। इससे यह साफ झलकता है कि पाकिस्तानी सेना बलूचिस्तान के बहुमूल्य संसाधनों को डॉलर के बदले विदेशी कंपनियों को सौंप रही है, जबकि बलूच जनता दमन और हिंसा का शिकार बनी हुई है।

इतिहास गवाह है कि बलूचिस्तान से मिलने वाली गैस और बिजली हमेशा पंजाब और पाकिस्तान के अन्य प्रांतों को दी जाती रही है, जबकि बलूच लोग खुद मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं। अब विदेशी कंपनियाँ, जिनमें अमेरिकी समर्थन वाली कंपनियाँ भी शामिल हैं, बलूचिस्तान के खनिजों से अरबों का मुनाफा कमाएँगी। यह स्थिति इस ओर इशारा करती है कि बलूचिस्तान आने वाले समय में अमेरिका के लिए एक नया तेल युद्ध स्थल बन सकता है।

सैन्य ठिकाने ही नहीं, अब अस्पतालों से लेकर मंदिरों की भी सुरक्षा में ‘सुदर्शन कवच’ रहेगा तैनात: PM मोदी ने कहा- श्रीकृष्ण के सुदर्शन से मिली प्रेरणा, जानें 2035 तक कैसे बदलेगी तस्वीर

आज स्वतंत्रता दिवस के मौके पर लाल किले से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश की सुरक्षा को लेकर एक ऐतिहासिक घोषणा की। उन्होंने कहा कि अगले दस साल, यानी 2035 तक, भारत के हर अहम सामरिक और नागरिक ठिकाने को ‘मिशन सुदर्शन चक्र’ के तहत हाई-टेक सुरक्षा कवच से लैस किया जाएगा।

यह सिर्फ सैन्य ठिकानों तक सीमित नहीं होगा, बल्कि अस्पताल, रेलवे स्टेशन, धार्मिक स्थल, बड़े बाजार और सार्वजनिक भीड़-भाड़ वाले सभी प्रमुख स्थान इसमें शामिल होंगे। पीएम मोदी ने कहा कि इस मिशन की प्रेरणा भगवान श्रीकृष्ण के सुदर्शन चक्र से ली गई है। जैसे वह चक्र दुश्मन के वार को रोककर तुरंत पलटवार करता था, वैसे ही यह आधुनिक सुरक्षा कवच भी काम करेगा।

क्या है मिशन सुदर्शन चक्र और कैसे करेगा काम

मिशन सुदर्शन चक्र एक अत्याधुनिक बहु-स्तरीय सुरक्षा प्रणाली है, जिसका उद्देश्य किसी भी हवाई, ड्रोन, मिसाइल या रॉकेट हमले को पहले ही पहचानकर उसे निष्क्रिय करना है। इसकी खासियत यह होगी कि यह ‘डिटेक्ट डिफेंड काउंटर अटैक’ के सिद्धांत पर काम करेगा।

इस सिद्धांत के तहत पहले खतरे का पता लगेगा, फिर उसे नष्ट किया जाएगा और जरूरत पड़ने पर हमलावर पर जवाबी कार्रवाई भी होगी। इसमें रडार नेटवर्क, हाई-स्पीड डेटा प्रोसेसिंग, इंटरसेप्टर मिसाइलें और लेजर डिफेंस सिस्टम शामिल होंगे।

मिशन के तहत देश भर में एकीकृत सुरक्षा ग्रिड बनाया जाएगा, जो सभी बड़े शहरों, संवेदनशील क्षेत्रों और सीमा इलाकों को आपस में जोड़ेगा। जैसे ही किसी भी दिशा से हमला करने वाली मिसाइल, ड्रोन या हवाई जहाज का संकेत मिलेगा, यह ग्रिड तुरंत सक्रिय हो जाएगी।

सेकंडों में खतरे की पहचान होगी, लक्ष्य का ट्रैकिंग होगा और फिर उसे नष्ट करने के आदेश जारी होंगे। इस पूरी प्रक्रिया में AI और मशीन लर्निंग तकनीक का बड़ा योगदान होगा, जो पिछले हमलों के पैटर्न के आधार पर भविष्य के खतरों को भी भांप लेगी।

एस-400 – सुदर्शन से मिली प्रेरणा

इस मिशन की अवधारणा भारतीय वायुसेना के पास मौजूद एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम के अनुभव से आई है। भारत ने रूस से 2018-19 में 35,000 करोड़ रुपए  में पाँच एस-400 स्क्वाड्रन खरीदने का समझौता किया था।

अब तक तीन स्क्वाड्रन भारत को मिल चुके हैं और बाकी दो 2026 तक आ जाएँगे। इस सिस्टम को भारतीय वायुसेना ने ‘सुदर्शन’ नाम दिया है। एस-400 की ताकत का सबसे बड़ा प्रदर्शन मई 2025 में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान हुआ, जब भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान के कई ठिकानों को निशाना बनाया।

इस ऑपरेशन में सुदर्शन ने 300 किलोमीटर दूर से पाँच पाकिस्तानी लड़ाकू विमान और एक AEW&C की निगरानी विमान को मार गिराया। यह सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल का अब तक का सबसे लंबी दूरी का सफल हमला था।

इसके अलावा, इस सिस्टम ने दर्जनों ड्रोन और मिसाइल हमलों को भी नाकाम किया। पाकिस्तान के कई कमांड सेंटर, रडार स्टेशन और आतंकी ठिकाने तबाह हुए। इस घटना ने साबित कर दिया कि लंबी दूरी की और तेज प्रतिक्रिया देने वाली एयर डिफेंस प्रणाली देश की सुरक्षा के लिए कितनी अहम है।

2035 तक का लक्ष्य

पीएम मोदी के अनुसार, मिशन सुदर्शन चक्र का लक्ष्य अगले दस सालों में पूरा होगा। इस अवधि में देश के सभी रणनीतिक और संवेदनशील स्थानों पर यह सुरक्षा कवच लगाया जाएगा।

पहले चरण में सेना के ठिकाने, वायुसेना स्टेशन, नौसेना के बेस, परमाणु संयंत्र, रॉकेट लॉन्च स्टेशन और रक्षा उद्योग केंद्रों को जोड़ा जाएगा। इसके बाद रेलवे स्टेशन, मेट्रो स्टेशन, एयरपोर्ट, अस्पताल, धार्मिक स्थल, बड़े स्टेडियम और भीड़-भाड़ वाले बाजारों को भी इस प्रणाली से कवर किया जाएगा।

इस मिशन के लिए बड़े पैमाने पर घरेलू रिसर्च और मैन्युफैक्चरिंग की जाएगी। इसके लिए सरकार ने ‘प्लस वन नीति’ अपनाने का फैसला किया है, जिसमें हर विदेशी तकनीक के साथ एक भारतीय तकनीक का विकास अनिवार्य होगा।

यानी अगर कोई उपकरण बाहर से खरीदा जाएगा, तो उसका एक स्वदेशी संस्करण भी तैयार किया जाएगा। इससे तकनीकी आत्मनिर्भरता के साथ-साथ निर्यात की संभावनाएँ भी बढ़ेंगी।

क्यों जरूरी है यह मिशन

भारत की भौगोलिक स्थिति और सुरक्षा चुनौतियाँ इस मिशन को बेहद अहम बनाती हैं। एक ओर पाकिस्तान और चीन जैसे पड़ोसी देश हैं, जिनसे सैन्य तनाव बना रहता है, वहीं दूसरी ओर ड्रोन और मिसाइल तकनीक का प्रसार आतंकवादी संगठनों तक भी पहुँच चुका है।

हाल के वर्षों में पाकिस्तान की ओर से कई बार ड्रोन के जरिये हथियार और विस्फोटक भेजे गए हैं। 2021 में जम्मू एयरफोर्स स्टेशन पर ड्रोन हमला इसका उदाहरण है। इसके अलावा, देश के भीतर भीड़-भाड़ वाले सार्वजनिक स्थलों पर सुरक्षा खतरे बढ़ते जा रहे हैं।

ऐसे में सिर्फ फिजिकल सुरक्षा इंतजाम काफी नहीं हैं। एक ऐसी ऑल-इन-वन तकनीक की जरूरत है जो खतरे को दूर से भांपकर तुरंत प्रतिक्रिया दे सके। मिशन सुदर्शन चक्र इस कमी को पूरा करेगा और देश को एक आधुनिक सुरक्षा कवच प्रदान करेगा।

पहली बार प्राइवेट नौकरी पर सरकार भी देगी पैसा: ‘प्रधानमंत्री विकसित भारत रोजगार योजना’ पर ₹1 लाख करोड़ होंगे खर्च, जानिए कैसे मिलेगा लाभ

79वें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर प्रधानमंत्री मोदी ने लाल किले की प्राचीर से करीब 1 लाख करोड़ की ‘प्रधानमंत्री विकसित भारत रोजगार योजना’की घोषणा की। इस योजना का लाभ अगले दो सालों में करीब 3.5 करोड़ लोगों को होगा, जिनमें से 1.92 करोड़ लोग पहली बार नौकरी करने वाले होंगे।

ये योजना 15 अगस्त 2025 को लागू हो गई है। इसका फायदा नौकरी पाने वाले युवाओं के साथ-साथ नौकरी देने वाली कंपनियों को भी होगा। यह 23 जुलाई को पेश किए गए 2024-25 के केंद्रीय बजट का भी हिस्सा था। इसका नाम पहले रोजगार इंसेंटिव रखा गया था, इसे ही बदल कर विकसित भारत रोजगार योजना कर दिया गया है।

योजना के मुताबिक, पहली बार प्राइवेट क्षेत्र में नौकरी हासिल करने वाले युवाओं को 15000 रुपए दिए जाएँगे, ताकि उन्हें आगे बढ़ने में आसानी हो। साथ ही जो कंपनियाँ नए कर्मचारियों को नियुक्त करेगी, उन्हें आर्थिक मदद की जाएगी। ये मदद 3000 रुपए हर कर्मचारी के हिसाब से हर महीने मिलेंगे।

योजना 31 जुलाई 2027 तक लागू रहेगी। इसके लिए कुल ₹99,446 करोड़ का बजट आवंटित किया गया है। श्रम और रोजगार मंत्रालय के साथ कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) इसके कार्यान्वयन की देखरेख करेंगे। इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य युवाओं, लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSME) के साथ-साथ विनिर्माण, सेवा और प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में रोजगार को बढ़ावा देना है।

क्या है मानदंड

  1. ईपीएफओ में पहली बार रजिस्ट्रेशन कराने वाले युवा इस योजना के पात्र हैं।
  2. 1 अगस्त 2025 से पहले ईपीएफओ या किसी दूसरे ट्रस्ट से संबद्ध नहीं होना चाहिए।
  3. कर्मचारी की सैलरी ₹1,00000 या उससे कम होना चाहिए।
  4. ईपीएफ (कर्मचारी भविष्य निधि) में योगदान अगस्त 2025 या उसके बाद से शुरू होना चाहिए।
  5. कर्मचारी को कम से कम 6 महीने तक उसी कंपनी में कार्यरत रहना होगा।

मासिक आय के आधार पर आवंटन

  • यदि मासिक आय ₹10,000 है, तो व्यक्ति को अधिकतम ₹1,000 प्राप्त होंगे।
  • ₹10,000 से ₹20,000 तक के वेतन वालों को ₹2,000 मिलेंगे।
  • ₹20,000 से ₹1,00,000 के बीच के आय वालों को ₹3,000 मिलेंगे।

योजना कैसे काम करती है

प्रधानमंत्री विकास भारत रोज़गार योजना दो भागों में विभाजित है। भाग A में पहली बार नौकरी करने वालों के लिए प्रावधान है, जबकि भाग B में रोजगार देने वाली कंपनियों के लिए नियम बनाए गए हैं।

भाग A: यह उन लोगों के लिए है जो पहली बार नौकरी की तलाश में हैं और EPFO में पंजीकृत हैं। इसका फायदा दो साल में करीब 3.5 करोड़ युवाओं को होगा। इसके तहत अधिकतम सीमा ₹15,000 है, दो किश्तों में (पहली 6 महीने बाद और दूसरी 12 महीने बाद) मिलेगी। यह लाभ उन लोगों पर लागू होता है जिनकी सालाना आय ₹100000 तक है। दूसरी किश्त बचत या जमा खाते में डाली जाएगी, जिसे कर्मचारी बाद में निकाल सकते हैं, ताकि बचत की आदत को बढ़ावा मिले।

भाग B: यह हर क्षेत्र में रोजगार के अधिक अवसर पैदा करने पर केंद्रित है। कंपनियों को उन कर्मचारियों के लिए प्रोत्साहन दिया जाएगा जिनका वेतन ₹100000 से कम है। सरकार प्रत्येक व्यक्ति के लिए कंपनियों को दो वर्षों के लिए ₹3,000 प्रति माह आवंटित करेगी, बशर्ते वह कम से कम 6 महीने तक अपनी भूमिका में बना रहे। विनिर्माण उद्योग को तीसरे और चौथे वर्ष के दौरान भी यही राशि दी जाएगी।

भुगतान छह, बारह, अठारह और चौबीस महीने के लगातार रोजगार के बाद किया जाएगा। ये पैसा उस बैंक खाते में जाएगा, जो पैन से जुड़ा हो। ईपीएफओ में पंजीकृत कंपनियों को 6 महीने की अवधि के लिए कम से कम 2 नए व्यक्तियों (50 से कम कर्मचारियों वाली कंपनियों के लिए) या 5 नए व्यक्तियों (50 या अधिक कर्मचारियों वाली कंपनियों के लिए) को नियुक्त करना आवश्यक है।

कैसे उठाएँ योजना का लाभ

  1. श्रम सुविधा पोर्टल के माध्यम से ईपीएफओ कोड प्राप्त करें।
  2. ईपीएफओ नियोक्ता लॉगिन पोर्टल पर एक खाता बनाएँ।
  3. ₹1 लाख तक के मासिक वेतन वाले नए कर्मचारियों की भर्ती करें।
  4. मासिक इलेक्ट्रॉनिक चालान सह रिटर्न (ईसीआर) रिटर्न के साथ भविष्य निधि (पीएफ) अंशदान जमा करें।
  5. कम से कम 6 महीने की अवधि के लिए अतिरिक्त कर्मचारियों को बनाए रखें।
  6. इस कार्यक्रम के लिए अलग से आवेदन करने की कोई आवश्यकता नहीं है। कर्मचारी द्वारा पहली बार अपना पीएफ खाता खोलने पर, वे इसके लिए पात्र होंगे। लेकिन उनका वेतन ₹100000 या उससे कम होना चाहिए। सरकार केवल यूनिवर्सल अकाउंट नंबर (यूएएन) के आधार पर पैसे देगी।

इस कार्यक्रम का लाभ उठाने के लिए ईपीएफओ का यूएएन नंबर, कंपनी का नियुक्ति पत्र, शैक्षिक प्रमाण पत्र, आधार कार्ड, बैंक खाते का विवरण, मोबाइल नंबर, निवास प्रमाण पत्र और एक पासपोर्ट आकार का फोटोग्राफ आवश्यक है।

कैसे मिलेगा पैसा

  • कंपनी में छह महीने पूरे होने पर प्रारंभिक भुगतान कर्मचारी के खाते में जमा किया जाएगा।
  • इसके बाद का भुगतान 12 महीने काम करने के बाद या वित्तीय साक्षरता कार्यक्रम के समापन के बाद किया जाएगा।
  • युवाओं में बचत की आदत को बढ़ावा देने के लिए धनराशि का एक हिस्सा भविष्य निधि खाते में भेजा जाएगा।
  • कुछ धनराशि सीधे कर्मचारी के खाते में जमा की जाएगी।
  • कंपनी का हिस्सा DBT के माध्यम से सीधे खाते में स्थानांतरित किया जाएगा।

( मूल रूप से अंग्रेजी में ये लेख है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

लाल किले से सुकमा तक ‘वामपंथी आतंक’ पर एक साथ प्रहार, जिन गाँवों में चलता था ‘लाल सलाम’ वहाँ पहली बार 15 अगस्त पर लहराया तिरंगा: जानिए 125 से 20 जिलों में कैसे सिमटे नक्सली

जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लाल किले की प्राचीर से यह बता रहे थे कि कभी 125 जिलों में फैला नक्सलवाद अब केवल 20 जिलों तक सिमट गया है। उसी समय वामपंथी आतंकियों का गढ़ रहे बस्तर के सुकमा, बीजापुर और नारायणपुर जिले के 29 गाँवों में एक नया अध्याय लिखा जा रहा था।

इन 29 गाँवों में देश की आजादी के बाद पहली बार स्वतंत्रता दिवस पर तिरंगा फहराया गया है। बस्तर के संभागीय मुख्यालय जगदलपुर के लाल बाग मैदान में केंद्रीय राज्यमंत्री तोखन साहू और दंतेवाड़ा में BJP प्रदेश अध्यक्ष व जगदलपुर के विधायक किरण सिंहदेव ने तिरंगा फहराया है।

नक्सलवाद पर क्या बोले पीएम मोदी?

पीएम मोदी ने लाल किले से अपने संबोधन के दौरान नक्सलवाद की समस्या को लेकर विस्तार से बात की है। पीएम मोदी ने कहा, “भारत के नक्शे में जिन क्षेत्रों को लहूलुहान कर लाल रंग से रंग दिया गया था, हमने वहां संविधान, कानून और विकास का तिरंगा फहरा दिया है।”

उन्होंने कहा, “देश का बहुत बड़ा जनजातीय क्षेत्र नक्सलवाद की चपेट में पिछले कई दशकों से लहूलुहान हो चुका था। सबसे ज्यादा नुकसान जनजातीय परिवारों को हुआ।” पीएम मोदी ने कहा कि जनजातीय माताओं-बहनों ने अपने सपने के होनहार बच्चों को खो दिया।

बस्तर को लेकर पीएम मोदी ने कहा, “एक जमाना था जब बस्तर को याद करते ही नक्सलवाद बम-बंदूक की आवाज सुनाई देती थी। उसी बस्तर को नक्सलवाद से मुक्त होने के बाद जब बस्तर के नौजवान ओलंपिक करते हैं, हजारों नौजवान भारत माता के जय बोलकर के खेल के मैदान में उतरते हैं, पूरा वातावरण उत्साह से भर जाता है। जो क्षेत्र कभी रेड कॉरिडोर के रूप में जाने जाते थे, वह आज विकास के ग्रीन कॉरिडोर बन रहे हैं।”

पीएम ने कहा, “कभी 125 से अधिक जिलों में नक्सलवाद अपनी जड़े जमा चुका था, आज कम करते-करते हम इसे 20 पर ले आए हैं। जनजातीय क्षेत्रों को नक्सल से मुक्त कर, जनजातीय परिवार के नौजवानों की जिंदगी बचा कर, हमने भगवान बिरसा मुंडा को एक सच्ची श्रद्धांजलि दी है।”

नक्सलवाद के खात्मे के लिए शाह की मार्च 2026 की डेडलाइन

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने नक्सलवाद के खात्मे के लिए 31 मार्च 2026 की डेडलाइन तय की है। इसका असर भी जमीन पर साफ नजर आने लगा है। दूरदराज के इलाकों और जनजातीय गाँवों के विकास की इस बाधा को हटाने के लिए लगातार नक्सलियों को मुख्य धारा में लौटने के लिए कहा जा रहा है और एनकाउंटर में ढेर किया जा रहा है।

केंद्र सरकार ने नक्सल प्रभावित इलाकों को मुक्त करने और लाल आतंक को खत्म करने के उद्देश्य से ऑपरेशन कगार (ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट) शुरू किया है। इसके चलते जिन इलाकों में अब तक नक्सलियों का नियंत्रण था, वो अब मुक्त हो रहे हैं और विकास के बाद बाकी हिस्सों के साथ मिलकर देश की भागीदारी में हिस्सा बन रहे हैं।

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने शुक्रवार (15 अगस्त) को बताया है कि पिछले 20 महीनों में सुरक्षाबलों ने 450 नक्सलियों को ढेर कर दिया है और 1,578 को गिरफ्तार किया गया है। उन्होंने बताया कि इस दौरान 1,589 नक्सलियों ने पुलिस या सुरक्षाबलों के सामने आत्मसमर्पण किया है।

नक्सलवादी हिंसा की घटनाओं में भी बीते वर्षों में भारी कमी आई है। 2010 में नक्सली हिंसा की 1,936 घटनाएँ हुई थीं। 2024 में यह संख्या 81% की कमी के साथ 374 रह गई है। इसके अलावा इस दौरान कुल मौतों (नागरिक + सुरक्षा बल) की संख्या में भी 85% की कमी हुई है। यह संख्या 2010 में 1,005 से घटकर 2024 में 150 रह गई है।

2004 से 2014 के बीच नक्सली हिंसा की कुल 16,463 घटनाएँ हुईं जबकि 2014 से 2024 के दौरान हिंसक घटनाओं की संख्या में 53% की कमी आई है और यह संख्या घटकर 7,744 रह गई है।

विकास की राह पर नक्सल प्रभावित रहे क्षेत्र

नक्सलवाद से प्रभावित रहे क्षेत्र अब विकास के रास्ते पर बढ़ रहे हैं और मुख्य धारा से जुड़ रहे हैं। सरकार ने नक्सलवाद से प्रभावित क्षेत्रों में सड़कों के विस्तार के लिए सड़क आवश्यकता योजना (RRP) और वामपंथी उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों के लिए सड़क संपर्क परियोजना (RCPLWEA) जैसी योजनाएँ शुरू की गई हैं।

नक्सलवाद से प्रभावित क्षेत्रों में कनेक्टिविटी बढ़ाने के उद्देश्य से 2014-15 से 8,640 मोबाइल टावर स्थापित किए गए हैं। साथ ही, कौशल विकास के लिए 46 औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान (ITI) और 49 कौशल विकास केंद्र (SDC) खोले गए हैं। इसके अलावा, जनजातीय क्षेत्रों में बहेतर शिक्षा के उद्देश्य से 179 एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय (EMRS) बनाए गए हैं।

डाक विभाग ने नक्सलवाद से प्रभावित जिलों में बैंकिंग सेवाओं के साथ 5,899 डाकघर खोले हैं। नक्सलवाद से सर्वाधिक प्रभावित जिलों में 1,007 बैंक शाखाएँ और 937 एटीएम खोले गए हैं। 2017 के बाद से नक्सलवाद प्रभावित जिलों में बुनियादी ढांचे के विकास के लिए विशेष केंद्रीय सहायता (एससीए) योजना के तहत 3,769.44 करोड़ रुपए जारी किए गए हैं।

भारत के मुस्लिमों को साथ नहीं ले जाना चाहता था जिन्ना, अनशन और RSS को रोक कर गाँधी-नेहरू ने सफल किया उसका प्लान: पाकिस्तानी विश्लेषक से सुनिए मजहब के नाम पर बना मुल्क कैसे बचा

भारत के 79वें स्वतंत्रता दिवस से ठीक पहले एक पुराना वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें पाकिस्तानी-स्वीडिश लेखक और राजनीतिक विश्लेषक इश्तियाक अहमद यह दावा कर रहे हैं कि 1947 में भारत के बंटवारे के समय महात्मा गाँधी और पंडित जवाहरलाल नेहरू ने न केवल पाकिस्तान को बचाया, बल्कि गाँधी  ने इसके लिए अपनी जान तक गंवा दी।

वीडियो में अहमद कहते हैं कि अगर गाँधी और नेहरू ने हस्तक्षेप न किया होता तो भारत से करीब 3.5 करोड़ मुस्लिम पाकिस्तान चले जाते, जिससे नव-निर्मित पाकिस्तान पूरी तरह ढह सकता था क्योंकि उस समय पाकिस्तान की कुल आबादी ही सिर्फ 3.39 करोड़ थी और हालात इतने खराब थे कि लिखने के लिए कागज तक नहीं था, संसाधनों की तो बात ही छोड़ दीजिए।

उनका कहना है कि गाँधी ने दिल्ली में दंगे रोकने के लिए आमरण अनशन किया और मुस्लिमों की सुरक्षा सुनिश्चित की, जबकि नेहरू ने आरएसएस और हिंदू महासभा जैसी ताकतों को मुस्लिमों को जबरन निकालने से रोका। इस वजह से करोड़ों मुस्लिम भारत में ही रुक गए।

अहमद ने यह भी कहा कि जिन्ना खुद नहीं चाहते थे कि भारत के मुस्लिम पाकिस्तान आएँ, बल्कि वे चाहते थे कि पाकिस्तान में रहने वाले हिंदू और सिख भारत चले जाएँ, लेकिन पाकिस्तान ने उन्हें वहाँ टिकने नहीं दिया और जबरन निकाला, जिससे भयंकर हिंसा हुई, खासकर पंजाब, सिंध और बंगाल जैसे इलाकों में।

अहमद ने आगे बताया कि बिहार से लगभग 50 लाख मुस्लिम पूर्वी पाकिस्तान यानी आज के बांग्लादेश चले गए, लेकिन इसके बावजूद करीब 3 करोड़ मुस्लिम भारत में ही रह गए, जो गाँधी और नेहरू की नीतियों के बिना संभव नहीं था।

उन्होंने कहा कि अगर ये 3 करोड़ लोग भी पाकिस्तान चले जाते तो देश एक गंभीर जनसंख्या संकट में घिर जाता और संभवतः बिखर जाता। अहमद ने डॉ भीमराव अंबेडकर का भी ज़िक्र किया, जिन्होंने उस समय जनसंख्या की पूरी अदला-बदली की वकालत की थी और चेतावनी दी थी कि अगर ऐसा नहीं हुआ तो पाकिस्तान को भविष्य में समस्याएँ झेलनी पड़ेंगी।

अहमद का साफ कहना है कि गाँधी और नेहरू ने जो किया, उससे न सिर्फ भारत में मुस्लिमों को सुरक्षा मिली, बल्कि पाकिस्तान को भी उस वक्त की सबसे बड़ी मानवीय और प्रशासनिक तबाही से बचा लिया गया।

गाँधी और नेहरू ने पाकिस्तान को बचाए रखा, लेकिन भारत को सांप्रदायिक जख्मों के साथ छोड़ गए

इश्तियाक अहमद की यह टिप्पणी एक ऐसी विडंबना को सामने लाती है जिसे इतिहास में अक्सर नजरअंदाज किया गया है। आमतौर पर पाकिस्तान की स्थापना की कहानी गाँधी , नेहरू और कॉन्ग्रेस के विरोध के रूप में पेश की जाती है, लेकिन इस वीडियो में खुद एक पाकिस्तानी विद्वान यह बात कबूल करते हैं कि अगर महात्मा गाँधी और पंडित नेहरू ने 1947 के समय कुछ अहम फैसले न लिए होते, तो पाकिस्तान अपनी शुरुआत में ही बिखर सकता था।

गाँधी और नेहरू ने उस समय भारत में रहने वाले करोड़ों मुस्लिमों को पाकिस्तान जाने से रोकने की कोशिश की थी। अगर ये सभी मुस्लिम पाकिस्तान चले जाते, तो पाकिस्तान पर जनसंख्या का इतना भारी बोझ पड़ता कि वह उसे संभाल नहीं पाता। उस वक्त पाकिस्तान के पास न तो ज़रूरी संसाधन थे, न प्रशासनिक ढाँचा, और न ही हालात इतने मजबूत थे कि वो इतनी बड़ी संख्या को संभाल सके।

भारत के नेताओं ने यह फैसला लेकर कि भारत के मुस्लिम यहीं रहें, एक तरह से पाकिस्तान की मदद ही की और उसका जनसंख्या संतुलन बिगड़ने से बचा लिया। वहीं दूसरी ओर, पाकिस्तान में हिंदुओं और सिखों को जबरदस्ती निकाला गया, उन पर हिंसा हुई और उन्हें वहां टिकने नहीं दिया गया।

आज पाकिस्तान के आधिकारिक इतिहास में यह बात शायद ही कभी मानी जाती है कि उसका शुरुआती अस्तित्व भारत के संयम और गाँधी -नेहरू की नीतियों से भी जुड़ा था। वहां बंटवारे को पूरी तरह जिन्ना की दूरदर्शिता और जीत के रूप में दिखाया जाता है।

दूसरी तरफ, भारत में भी इस सच्चाई पर ज्यादा चर्चा नहीं होती। आजादी के बाद की कई सरकारों ने गाँधी और नेहरू को स्वतंत्रता आंदोलन के सबसे बड़े नेता के रूप में सामने रखा, लेकिन इस बात पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया कि जैसा डॉ भीमराव अंबेडकर ने कहा था, ‘सांप्रदायिक समस्या’ को अगर उस समय पूरी तरह हल किया गया होता, तो शायद आज 80 साल बाद भी ये मुद्दा देश को परेशान न कर रहा होता।

इस तरह यह पूरी कहानी हमें दिखाती है कि इतिहास सिर्फ दो तरफा नहीं होता, बल्कि उसके कई पहलू होते हैं, जिन्हें समझना और स्वीकार करना जरूरी है।

पुश्तैनी हवेली से शरणार्थी शिविर तक… विभाजन ने कैसे बदली मेरे परिवार की किस्मत, जीवनभर नहीं बना पाए अपना आशियाना

ये कहानी है मेरे नाना-नानी की, जिनकी पुश्तैनी हवेली बंटवारे के वक्त बांग्लादेश में रह गई और उन्हें शरणार्थी शिविर में शरण लेना पड़ा। पूरा जीवन संघर्ष करने के बावजूद वे लोग न तो घर बना पाए और न ही जमीन का टुकड़ा खरीद पाए।

मेरे नाना जी यानी नरेश रंजन गुप्ता रॉय विभाजन के वक्त बांग्लादेश के सिलहट डिवीजन के सुनामगंज में शिक्षक थे। उनकी पुश्तैनी हवेली ‘रॉय भिट्टा बारी’ में वह अपने परिवार के साथ रहते थे। उनकी हवेली के प्रांगण में हर साल दुर्गा पूजा का आयोजन होता था और आसपास के इलाकों से हिन्दू श्रद्धालु आते थे।

कलकत्ता के प्रतिष्ठित प्रेसीडेंसी कॉलेज में उन्होंने अपनी शिक्षा-दीक्षा ग्रहण की थी और अपने गृहनगर में जीवन बिताने की इच्छा उनकी रही। 1946 में उन्होंने मेरी नानी यानी उषा गुप्ता से शादी की।

उस वक्त तक मजहबी आधार पर पाकिस्तान बनाने की माँग मुस्लिम लीग ने तेज कर दी थी। मोहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व में पार्टी ने कलकत्ता और नोआखली में हिन्दुओं का नरसंहार करवाया। इस दौरान पूर्वी बंगाल के हिन्दू इस मुस्लिम बहुल क्षेत्र में काफी परेशान थे।

जुलाई 1947 में सिलहट के अन्य क्षेत्रों की तरह सुनामगंज में भी जनमत संग्रह हुआ और अधिकांश लोगों ने पूर्वी पाकिस्तान में शामिल होने के पक्ष में मतदान किया ।

सिलहट में हुआ रेफरेंडम

उस इलाके के हिन्दुओं को मुस्लिम भीड़ से बचने के लिए घर- बार छोड़ना पड़ा। मेरे नाना-नानी भी उनमें से एक थे। किसी तरह अपनी जान बचाकर और पुश्तैनी घर-बार छोड़कर ये लोग वहाँ से भागे। इस दौरान मेरी नानी अपने साथ महज कुछ सोने के गहने और साड़ी साथ ले आई थीं। इनलोगों ने शरणार्थी शिविर में आश्रय लिया। रातों रात इनकी जिंदगी बदल चुकी थी।

मुस्लिम लीग की भड़काई आग में अंग्रेजों द्वारा किए गए ‘भारत विभाजन’ को कॉन्ग्रेस का साथ मिला। इसने मेरे नाना-नानी समेत लाखों लोगों का सब कुछ छीन लिया।

दादाजी की डायरी: 1 फरवरी 1961, जब उन्होंने बतौर शिक्षक बच्चों को पढ़ाई थी मैकबेथ

कुछ महीनों बाद नाना नरेश रंजन गुप्ता रॉय असम में शिक्षक बने , फिर तीन महीने बाद त्रिपुरा जाकर शिक्षक के रूप में काम करने लगे। पूरा जीवन संघर्ष करने के बाद भी वो न तो जमीन का एक टुकड़ा खरीद पाए और न ही अपना घर बना सके। रॉय दंपति की तीन बेटियाँ बड़ी हो रही थीं। उनकी जिम्मेदारी, पढ़ाई-लिखाई भी काफी अहम था।

असम और त्रिपुरा में उस वक्त की जातीय हिंसा और भ्रष्टाचार की वजह से समय पर उन्हें वेतन भी नहीं मिलता था। इसलिए पूरा जीवन गरीबी में बीता।

नरेश रॉय ने हार नहीं मानी। उनका मानना था कि शिक्षा की वह माध्यम है जिसके दम पर अपने पैरों पर खड़ा हुआ जा सकता है। पुश्तैनी संपत्ति तो नहीं मिल सकती लेकिन आगे जीवन आसान बनाया जा सकता है। ये सही बात थीं

आज उनके नाती-नातिन के पास घर है। वे आगे बढ़ गए हैं। नरेश गुप्ता रॉय 1975 में सेवानिवृत हुए और 28 जून 1981 में उनका निधन हुआ। उनसे पढ़ने वाले छात्र आज काफी आगे बढ़ गए हैं। वे रॉय सर के पुस्तक प्रेम को याद करते हैं। मेरी माँ के मुताबिक हर दिन कम से कम दो घंटे वो पढ़ते थे। अपने निधन से एक सप्ताह पहले तक उन्होंने दिनचर्या में कोई बदलाव नहीं किया। उनके सिखाए रास्ते पर चल कर ही परिवार की किस्मत बदली

भारत विभाजन खूनों से सना ऐसा दर्द है जिसने लाखों परिवारों को कभी न भूलने वाला दर्द दिया। इसमें लाखों लोग मारे गए और करीब 2 करोड़ लोग स्थायी तौर पर विस्थापित हो गए।

14 अगस्त को ‘विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस’ ऐसे ही लोगों को याद करने का दिन है जिनका सब कुछ विभाजन की आग में जल गया। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और अपने लिए एक नया रास्ता तलाशा।

नोट: इस दर्दनाक कहानी को आप मूल रूप से यहाँ पढ़ सकते हैं।