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धर्मस्थल मामले में कसा SIT का शिकंजा, कर्नाटक के साथ पड़ोसी राज्यों में बढ़ेगा छानबीन का दायरा: सफाईकर्मी ने गढ़ी थी झूठी कहानी, BJP ने की NIA जाँच की माँग

कर्नाटक के धर्मस्थल में सामूहिक दफन के मामले की जाँच का दायरा बढ़ने वाला है। विशेष जाँच दल (SIT) 7 साल पुरानी पैनल रिपोर्ट की जाँच करेगी, जिसमें धर्मस्थल के आसपास हुई महिलाओं और बच्चों की संदिग्ध मौत की जानकारी दी गई है। SIT ने कहा कि सफाईकर्मी की सारी बातें झूठी नहीं है इसीलिए जाँच के दायरे को बढ़ाया जा रहा है।

Deccan Herald की रिपोर्ट के अनुसार, SIT कर्नाटक और उसके पड़ोसी राज्यों जैसे केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, तेलंगाना और गोवा में धर्मस्थल आने वाले तीर्थयात्रियों के लापता होने के बारे में दर्ज FIR की भी जाँच करेगी। SIT ने उन खबरों को भी खारिज कर दिया, जिसमें दावा किया जा रहा था कि सफाईकर्मी की गिरफ्तारी के बाद जाँच खत्म होने का दावा किया गया था।

ये 5000 पन्नों की रिपोर्ट महिलाओं के खिलाफ यौन उत्पीड़न रोकने के मामले में साल 2018 में प्रस्तुत की गई थी, जिसमें कर्नाटक में महिलाओं के अचानक गायब होने के भी कई मामले उल्लेख किए गए हैं। यह मामले धर्मस्थल क्षेत्र से भी जुड़े थे।

इसके साथ SIT 1995 से 2014 के बीच अचानक लापता हुए धर्मस्थल के श्रद्धालुओं के मामले को भी खंगाल रही है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सफाईकर्मी की शिकायतों के अलावा भी कई ऐसे आरोप सामने आए हैं कि बिना पोस्टमार्टम के बगैर शवों को संदिग्ध तरीके से दफनाया गया।

टीम ने कई जगह खुदाई की है और अवशेष भी मिले हैं, जिनकी फॉरेंसिक जाँच रिपोर्ट का इंतजार है। शव की पहचान करने के लिए कर्नाटक के धर्मस्थल में सामूहिक दफन के मामले की जाँच का दायरा बढ़ने वाला है।ने एक तकनीकी तौर बहुआयामी फॉरेंसिक जाँच भी शुरू कर दी है।

सफाईकर्मी पर झूठे गवाही के भी लगे आरोप

धर्मस्थल में सामूहिक दफन मामले में गवाही देने वाले सफाईकर्मी पर गिरफ्तारी के कुछ दिन बाद ही झूठे सबूत पेश करने और झूठी गवाही देने के नए आरोप लगाए गए हैं।

अब तक की जाँच के बाद सफाईकर्मी पर BNS की कई धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है, जिनमें धारा 227 (झूठी गवाही देना), धारा 228 (झूठी गवाही गढ़ना), धारा 229 (झूठी गवाही के लिए दंड), धारा 336 (जालसाजी), धारा 230 (मृत्युदंड की सज़ा दिलाने के इरादे से झूठी गवाही गढ़ना), धारा 231 (आजीवन कारावास की सज़ा दिलाने के इरादे से झूठी गवाही गढ़ना), धारा 236 (झूठी घोषणा), धारा 240 (झूठी जानकारी देना) और धारा 248 (झूठा आरोप) शामिल हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, सफाईकर्मी को 18 अगस्त 2025 को गिरफ्तार किया गया था। जब मामले की जाँच कर रही SIT ने सफाईकर्मी पर सबूत के तौर पर एक मानव खोपड़ी पेश करने का आरोप लगाया था। तब SIT ने दावा किया कि यह खोपड़ी धर्मस्थल से खोदकर निकाली गई है।

हालाँकि, जाँच के दौरान SIT ने पाया कि यह खोपड़ी सफाईकर्मी को किसी व्यक्ति ने सौंपी थी। पुलिस अब इस बात की जाँच कर रही है कि खोपड़ी किसी चिकित्सा प्रयोगशाला से आई थी या किसी दूसरी जगह से।

कर्नाटक BJP की NIA जाँच की माँग

धर्मस्थल मामले में कर्नाटक बीजेपी लगातार NIA जाँच की माँग कर रही है। कर्नाटक बीजेपी अध्यक्ष बीवाई विजयेंद्र ने धर्मस्थल के खिलाफ ‘झूठे प्रचार’ के चलते जनता का विश्वास खोने का हवाला देते हुए NIA या CBI जाँच की माँग की।

कर्नाटक बीजेपी ने धर्मस्थल मामले में विरोध प्रदर्शन के लिए 01 सितंबर 2025 को ‘धर्म जागृति समावेश’ आयोजित करने की भी योजना बनाई है। इसमें 50 हजार से 1 लाख हिंदू लोग शामिल होंगे।

जानें पूरा मामला

यह मामला तब सामने आया जब एक सफाईकर्मी ने चौंकाने वाला दावा किया कि उसे 1998 से 2014 के बीच धर्मस्थल में कई जगहों पर सैकड़ों शव दफनाने के लिए मजबूर किया गया था। यह सफाईकर्मी भगवान मंजूनाथ मंदिर में काम करता था और उसने 3 जून 2025 को पुलिस में शिकायत दर्ज कराई।

उसके आरोपों की गंभीरता को देखते हुए, राज्य सरकार ने 19 जुलाई को इस मामले की जाँच के लिए SIT  का गठन किया। इसके बाद SIT उसे धर्मस्थल के स्नान घाट लेकर गई, जहाँ उसने 13 जगहों की पहचान की, जहाँ कथित रूप से शव दफनाए गए थे।

सफाईकर्मी ने अपनी शिकायत में बताया कि जिन शवों को वह दफनाता था, उनमें कई महिलाएँ और नाबालिग लड़कियाँ थीं, जिनका यौन शोषण किया गया था।

उसकी शिकायत के कुछ समय बाद, सुजाता नाम की 60 साल की एक महिला ने भी पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई। उसने बताया कि उसकी बेटी धर्मस्थल की तीर्थ यात्रा के दौरान लापता हो गई थी। हालाँकि, बाद में महिला अपनी बात से पलट गई और सामने आया कि उसकी कोई बेटी नहीं है।

गायत्री मंत्र से जापान में PM मोदी का स्वागत, दोस्ताने अंदाज में मिले प्रधानमंत्री शिगेरु इशिबा: 15वें शिखर सम्मेलन में AI-सेमीकंडक्टर्स और वैश्विक साझेदारी पर होगी बात

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शुक्रवार (29 अगस्त 2025) को दो दिन की जापान यात्रा पर टोक्यो पहुँचे। हानेडा अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर प्रधानमंत्री मोदी का जोरदार स्वागत किया गया। इसके बाद टोक्यो में जापानी समुदाय के लोगों ने गायत्री मंत्र गाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का स्वागत किया।

इस दौरे में पीएम मोदी जापान के प्रधानमंत्री शिगेरु इशिबा से मिलकर आर्थिक और तकनीकी सहयोग को आगे बढ़ाने पर चर्चा करेंगे। पीएम मोदी ने तस्वीरें साझा करते हुए एक्स पर लिखा, “टोक्यो पहुँच गया हूँ। भारत और जापान अपने विकासात्मक सहयोग को निरंतर मज़बूत कर रहे हैं, और मैं इस यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री इशिबा और अन्य लोगों से मिलने के लिए उत्सुक हूँ, जिससे मौजूदा साझेदारियों को और मजबूत करने और सहयोग के नए रास्ते तलाशने का अवसर मिलेगा।”

यात्रा से पहले जारी एक बयान में पीएम मोदी ने कहा कि यह दौरा भारत और जापान के बीच ‘सभ्यतागत संबंधों और सांस्कृतिक जुड़ाव’ को गहरा करने का अवसर है। उन्होंने बताया कि बातचीत का मुख्य उद्देश्य ‘स्पेशल स्ट्रैटेजिक और ग्लोबल पार्टनरशिप’ को अगले स्तर पर ले जाना है, जो पिछले 11 सालों में लगातार मजबूत हुई है।

प्रधानमंत्री ने कहा कि इस यात्रा में दोनों देश अपनी साझेदारी को नए पंख देने, आर्थिक और निवेश संबंधों को और विस्तार देने और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) व सेमीकंडक्टर्स जैसी नई और उभरती तकनीकों में सहयोग बढ़ाने की कोशिश करेंगे।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पीएम मोदी का सुबह 10:30 से 10:50 बजे तक व्यावसायिक कार्यक्रम है। उसके बाद वे 11:30 से 1:10 बजे तक जापान के गणमान्य व्यक्तियों से मुलाकात करेंगे। दोपहर 1:15 से 1:20 बजे के बीच शोरिनजान दारुमा जी मंदिर के मुख्य पुजारी द्वारा पीएम मोदी को दारुमा गुड़िया भेंट की जाएगी। इसके बाद दोपहर 2:30 से 5:15 बजे तक 15वें भारत-जापान वार्षिक शिखर सम्मेलन में पीएम मोदी शामिल होंगे।

बता दें कि जापान में पीएम मोदी का दौरा शनिवार (30 अगस्त 2025) तक चलेगा, इसके बाद पीएम मोदी चीन के शहर तिआनजिन जाएँगे। वहाँ वे 31 अगस्त और 1 सितंबर को शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के वार्षिक सम्मेलन में हिस्सा लेंगे। इस दौरान उनकी चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से द्विपक्षीय बैठक भी होने की संभावना है।

हर परिवार में हो 3 बच्चे, धर्मांतरण-घुसपैठ से बदल रही डेमोग्राफी: मोहन भागवत, 75 की उम्र में रिटायरमेंट, आरक्षण से लेकर BJP-RSS रिश्तों पर हर सवाल का दिया जवाब

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की शताब्दी वर्ष व्याख्यान शृंखला के तहत दिल्ली के विज्ञान भवन में तीन दिवसीय कार्यक्रम का गुरुवार (28 अगस्त 2025) को समापन हुआ। समापन सत्र में सरसंघचालक मोहन भागवत ने लोगों के संघ और उसकी कार्यशैली से जुड़े सवालों के जवाब दिए हैं। इस कार्यक्रम में 50 से अधिक देशों के राजदूतों, उद्योगपतियों, न्यायाधीशों, राजनीतिक नेताओं और विभिन्न क्षेत्रों से जुड़ी हस्तियों सहित लगभग 2,000 लोगों को आमंत्रित किया गया है।

कार्यक्रम के दौरान आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत से पूछे गए कुछ सवाल और उनके जवाब –

प्रश्न:  देश में जनसांख्यिकीय असंतुलन की वजह क्या है?
मोहन भागवत:  धर्मांतरण और अवैध प्रवास इसके बड़े कारण हैं। धर्म व्यक्ति की व्यक्तिगत पसंद होनी चाहिए, उसमें किसी तरह का दबाव या प्रलोभन नहीं होना चाहिए।

प्रश्न: अवैध प्रवास पर सरकार की कोशिशों को आप कैसे देखते हैं?
भागवत: सरकार रोकने की कोशिश कर रही है, लेकिन समाज को भी अपनी भूमिका निभानी होगी। हमें अवैध प्रवासियों को नौकरी नहीं देनी चाहिए। पहले अपने लोगों को, चाहे वे मुसलमान ही क्यों न हों, रोजगार देना चाहिए।

प्रश्न: नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) पर आपका क्या विचार है?
भागवत: यह सही दिशा में कदम है। हमारी शिक्षा व्यवस्था विदेशी आक्रांताओं के समय नष्ट हो चुकी थी। वे देश पर शासन करना चाहते थे, विकास नहीं। अब जब हम स्वतंत्र हैं तो हमें जनता को आगे बढ़ाना है।

प्रश्न: आरएसएस और भाजपा के रिश्तों को लेकर हमेशा सवाल उठते हैं। क्या भाजपा अध्यक्ष चुनने में संघ का हाथ होता है?
भागवत: यह पूरी तरह गलत धारणा है। अगर हम तय करते तो इतना समय क्यों लगता? सुझाव दिए जा सकते हैं लेकिन फैसला उनका ही होता है।

प्रश्न: प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री को हटाने वाले हालिया विधेयकों पर आपकी राय?
भागवत: नेतृत्व पारदर्शी और बेदाग होना चाहिए, यही मूल आधार है। संसद सर्वोच्च संस्था है, वही जो भी निर्णय लेगी, लागू होगा। अभी चर्चा चल रही है, देखते हैं आगे क्या होता है।

प्रश्न: भाजपा अध्यक्ष के नाम को लेकर चर्चा है, क्या संघ इसमें कोई भूमिका निभा रहा है?
भागवत: हमने कभी ऐसा फैसला नहीं किया और न करना चाहते हैं। यह पार्टी का अधिकार है। हम सिर्फ वैचारिक मार्गदर्शन देते हैं।

प्रश्न: क्या 75 साल की उम्र होते ही नेताओं को पद छोड़ देना चाहिए?
मोहन भागवत: मैंने कभी नहीं कहा कि मुझे पद छोड़ना चाहिए या किसी और को पद छोड़ देना चाहिए। जिस दिन मुझसे कहा जाएगा, “जाओ, शाखा चलाओ,” मैं चला जाऊँगा।

उन्होंने आगे कहा, “संघ में हमें काम दिया जाता है, चाहे हम चाहें या न चाहें। अगर मैं 80 साल का भी हो जाऊँ और मुझे शाखा संचालित करने के लिए कहा जाए, तो मुझे जाना ही पड़ेगा। हम वही करते हैं जो संघ कहता है। मैं सरसंघचालक हूँ लेकिन क्या आपको लगता है कि सिर्फ मैं ही सरसंघचालक हो सकता हूँ? यह किसी के लिए रिटायरमेंट का मामला नहीं है।”

वहीं, मोहन भागवत ने जनसंख्या नियंत्रण को लेकर कहा, “भारत की जनसंख्या नीति 2.1 बच्चों की है। एक परिवार में तीन बच्चे हों, हर नागरिक को यह देखना चाहिए कि उसके परिवार में तीन बच्चे होने चाहिए।” उन्होंने कहा, “जनसंख्या बोझ भी हो सकती है। इसलिए जनसंख्या नीति भी है। जनसंख्या नियंत्रित रहे इसलिए तीन से बहुत ज्यादा आगे नहीं बढ़ना चाहिए। जन्मदर कम होने की अगर बात है तो वह सबका कम हो रहा है।”

कार्यक्रम के अंतिम दिन मोहन भागवत ने इस मंच से साफ किया कि संघ की विचारधारा भारत की परंपराओं से जुड़ी है और विकास की राह पर सभी को साथ लेकर चलने का लक्ष्य है। तीन दिन चली इस व्याख्यान शृंखला में दुनिया भर से आए मेहमानों और देश के अलग-अलग तबकों की मौजूदगी ने इसे खास बना दिया। 100 वर्ष पूरे होने पर संघ कई विशेष कार्यक्रम चला रहा है जिसमें यह व्याख्यान शृंखला भी शामिल है।

फायर गन से फूँक दिया कुरान, कहा- अमेरिका से खत्म कर दूँगी इस्लाम: कौन है ट्रंप की पार्टी की महिला नेता वेलेंटीना गोमेज, LGBT+ से लेकर अश्वेतों के खिलाफ भी मुखर

अमेरिका में टेक्सास की 31वीं संसदीय सीट से चुनाव लड़ रही रिपब्लिकन उम्मीदवार वेलेंटीना गोमेज (Valentina Gomez) एक वीडियो वायरल हो रहा है। इसमें वह फ्लेमथ्रोवर गन से कुरान जलाती हुई दिख रही हैं। हालाँकि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर इसे बैन कर दिया गया है, लेकिन ट्विटर पर ये वीडियो अभी भी वायरल है।

कौन हैं वेलेंटीना गोमेज

रिपब्लिकन उम्मीदवार गोमेज राष्ट्रपति ट्रंप और उनकी मेक अमेरिका ग्रेट अगेन (MAGA) कैम्पेन की समर्थक हैं। उनका आरोप है कि मुस्लिम हमेशा ईसाई देशों में हिंसा फैलाते हैं। उन्होंने लोगों से अपील की कि सब लोग उनके मिशन में उनका साथ दें।

वेलेंटीना गोमेज का जन्म 8 मई 1999 को कोलंबिया के मेडेलिन शहर में हुआ था। 2009 में वह परिवार के साथ अमेरिका आ कर बस गईं। पढ़ाई-लिखाई के बाद रियल एस्टेट और फाइनेंस सेक्टर में हाथ आजमाया। वह नेस्ले से भी जुड़ी रही हैं।

राजनीति में आते ही गोमेज का करियर विवादों से घिर गया। सार्वजनिक तौर पर मुसलमानों, LGBT+ कम्युनिटी, अश्वेतों और इमिग्रेंट्स के खिलाफ उन्होंने विवादित बयान दिए।

अमेरिका से इस्लाम खत्म करना चाहती हैं गोमेज

नए वीडियो में गोमेज कहती हैं कि उनका उद्देश्य ‘टेक्सास से इस्लाम को खत्म करना है।’ इसके बाद उन्होंने गालियाँ दीं। उन्होंने कहा कि अमेरिका के मुस्लिम दुनिया के 57 मुस्लिम देशों में से किसी में भी जा सकते हैं।

गोमेज के मुताबिक, “अगर हम इस्लाम को हमेशा के लिए खत्म नहीं कर देते, तो आपकी बेटियों का बलात्कार होगा और आपके बेटों का सिर कलम कर दिया जाएगा।” फिर वह कैमरे पर कुरान जलाती हैं और कहती हैं, “अमेरिका एक ईसाई राष्ट्र है, इसलिए वे आतंकवादी मुसलमान 57 मुस्लिम देशों में से किसी में भी जा सकते हैं।”

वीडियो के अंत में गोमेज कहती हैं कि ईसा मसीह के बताए रास्ते पर वह चलती हैं। गोमेज ने एक और पोस्ट शेयर किया है, जिसमें वह कहती हैं, “मैं अपनी बातों पर कायम हूँ और मैं उस किताब के आगे कभी घुटने नहीं टेकूँगी, जो 7 अक्टूबर के नरसंहार के लिए जिम्मेदार है। उस दिन एबी गेट पर 13 अमेरिकी सैनिकों की हत्या कर दी गई थी।”

यह पहली बार नहीं है जब गोमेज ने मुस्लिमों के खिलाफ खुल कर बोला हो। मई 2025 में, उन्होंने टेक्सास में एक मुस्लिम सहभागिता कार्यक्रम में बाधा डालने की कोशिश की थी। माइक्रोफोन छीन कर जबरदस्ती अपनी बात की। उन्होंने कहा था कि टेक्सास में इस्लाम के लिए कोई जगह नहीं है। कॉन्ग्रेस उनकी मदद करे, ताकि अमेरिका के इस्लामीकरण को रोक जा सके। उन्होंने कहा कि वह सिर्फ गॉड से डरती हैं।

आज हुए लोकसभा चुनाव तो NDA को मिलेंगी 324 सीटें, मोदी सरकार के कामकाज से 58% लोग संतुष्ट: INDI गठबंधन की घटेंगी सीटें, LoP के तौर पर भी राहुल गाँधी फेल

2024 के लोकसभा चुनावों के साल भर बाद BJP के नेतृत्व वाली NDA की लोकप्रियता बढ़ी है। नरेंद्र मोदी सरकार के कामकाज से लोग संतुष्ट हैं। यदि आज चुनाव हुए तो एनडीए लोकसभा की 324 सीटें जीत सकती है। अकेले बीजेपी की सीटें भी 2024 के 240 से बढ़कर 260 होने का अनुमान है। वहीं, विपक्ष के तौर पर राहुल गाँधी की भूमिका लोगों को प्रभावित नहीं कर रही है और INDI गठबंधन की सीटें 2024 के 234 से घटकर 208 हो सकती है।

जनता का यह मिजाज इंडिया टुडे और सी-वोटर के ‘मूड ऑफ द नेशन’ सर्वे से सामने आया है। इस सर्वे के आँकड़े ऐसे समय में सामने आए हैं, जब INDI गठबंधन ‘वोट चोरी’ का प्रोपेगेंडा रचकर जनादेश को खारिज करने की कोशिश में जुटा है।

प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी आज भी देश के लोगों की पहली पसंद हैं। 52 प्रतिशत लोगों का मानना है कि पीएम के तौर पर वे सबसे बेहतर हैं। वहीं, 25% लोग ही राहुल गाँधी को पीएम के तौर पर देखना चाहते हैं। एनडीए में नरेंद्र मोदी के बाद प्रधानमंत्री पद के लिए 28% लोगों की पसंद अमित शाह, 26% लोगों की पसंद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और 7% लोगों की पसंद केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी हैं।

सर्वे के दौरान लोगों से प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी के प्रदर्शन को लेकर भी सवाल किया गया। 34 प्रतिशत लोगों ने उनके कार्यकाल को ‘बहुत अच्छा’ और 24 प्रतिशत लोगों ने ‘अच्छा’ बताया। यानी 58 प्रतिशत लोग उनके काम से संतुष्ट हैं। वहीं विपक्ष के नेता के तौर पर राहुल गाँधी के प्रदर्शन को 15% लोगों ने ‘खराब’ और 12% लोगों ने ‘बहुत खराब’ बताया है।

17 प्रतिशत लोग अयोध्या में राम मंदिर और वाराणसी में काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के निर्माण को एनडीए सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि मानते हैं। 12 प्रतिशत लोगों ने ऑपरेशन सिंदूर, 10 प्रतिशत लोगों ने बुनियादी ढाँचे के विकास, 9 प्रतिशत लोगों ने अनुच्छेद 370 के खात्मे, 7 प्रतिशत लोगों ने लोक कल्याणकारी योजनाओं और 6 प्रतिशत लोगों ने भ्रष्टाचार मुक्त सरकार को बड़ी उपलब्धि बताया है।

यह सर्वे 1 जुलाई 2025 से 14 अगस्त 2025 के बीच किया गया। 2 लाख 6 हजार 826 लोगों से रायशुमारी की गई। इसमें हर जाति, धर्म, मजहब के लोग शामिल हैं। आज तक की रिपोर्ट में इन आँकड़ों में मोटे तौर पर 3 प्रतिशत का मार्जिन एरर होने की बात कही गई है।

इन आँकडों से यह स्पष्ट है कि 11 साल से लगातार सत्ता में बने रहने के बावजूद देश के आमलोगों के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की साख बरकरार है। लोग उनके सरकार के कामकाज से संतुष्ट हैं। साथ ही विपक्षी प्रोपेगेंडा के झाँसे में लोग नहीं आ रहे हैं।

संभल हिंसा के पीछे सपा सांसद जियाउर रहमान बर्क, हिंदू बस्तियों पर हमले-तीर्थ स्थलों पर कब्जे की थी साजिश: बाहर से बुलाए गए थे गुंडे, CM योगी को सौंपी 450 पन्ने की रिपोर्ट

उत्तर प्रदेश के संभल में 24 नवंबर 2024 को हुई हिंसा पर आई 450 पन्नों की 3 सदस्यीय समिति की रिपोर्ट में बड़ा खुलासा हुआ है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि यह दंगा अचानक नहीं भड़का बल्कि इसे पूर्वनियोजित साजिश के तहत अंजाम दिया गया था। इसमें कई राजनीतिक और मजहबी किरदारों की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं, जो अब कठघरे में खड़े नजर आ रहे हैं।

सपा सांसद के बयान के बाद भड़की हिंसा

रिपोर्ट के अनुसार, 22 नवंबर को समाजवादी पार्टी के सांसद जियाउर रहमान बर्क ने नमाजियों को संबोधित करते हुए विवादित बयान देते हुए कहा था, “हम इस देश के मालिक हैं, नौकर-गुलाम नहीं। मस्जिद थी है और कयामत तक रहेगी। अयोध्या में हमारी मस्जिद ले ली गई, यहाँ ऐसा नहीं होने देंगे।”

इस भाषण का कन्वर्टेड हिंदू पठानों ने विरोध किया, जिससे तुर्क और पठान समुदाय आमने-सामने आ गए। 24 नवंबर को यही तनाव हिंसा में बदल गया। रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि इस साजिश में सांसद बर्क, विधायक के बेटे सुहैल इकबाल और जामा मस्जिद की इंतजामिया कमेटी की बड़ी भूमिका रही थी।

हिंदुओं पर हमले और तीर्थ स्थलों पर कब्जे की थी साजिश

रिपोर्ट में यह भी दर्ज है कि दंगे की आड़ में 68 तीर्थ स्थलों और 19 पावन कूपों पर कब्जे की कोशिश की गई। हरिहर मंदिर को भी निशाना बनाया गया, जिसने बाबर काल की यादें ताजा कर दीं।

इसके बाद योगी सरकार ने इन स्थलों के पुनरुद्धार की योजना बनाई और 30 मई 2025 को इसका शिलान्यास किया। दंगे को बढ़ाने के लिए बाहरी उपद्रवियों को बुलाया गया और हिंदू मोहल्लों को निशाना बनाने की योजना बनाई गई लेकिन पुलिस की कड़ी तैनाती से इनका यह मंसूबा विफल हो गया। फिर भी, तुर्क और पठान समुदायों के बीच हुई क्रॉस फायरिंग में चार लोगों की मौत हुई।

रिपोर्ट के मुताबिक 1936 से 2019 तक यहाँ 73 दिन कर्फ्यू लगा, जिसमें 1948 में 20 दिन, 1978 में 30 दिन और 2019 में सीएए हिंसा के दौरान 6 दिन शामिल हैं। रिपोर्ट में संभल को आतंकी संगठनों और अवैध हथियारों का अड्डा बताया गया है। अलकायदा और हरकत-उल-मुजाहिद्दीन की गतिविधियों का जिक्र है और अमेरिका द्वारा आतंकी घोषित मौलाना आसिम का कनेक्शन भी संभल से जुड़ा बताया गया।

डेमोग्राफी में भी बड़ा बदलाव हुआ है, आजादी के समय 55% मुस्लिम और 45% हिंदू थे लेकिन अब हिंदू घटकर 15% और मुस्लिम बढ़कर 85% हो गए हैं। 1947 से 2019 तक यहाँ 15 बड़े दंगे हुए जिनका सबसे ज्यादा असर हिंदू समाज पर पड़ा है।

अब AI भी हुआ ‘हलाल’, अरबी-अंग्रेजी में करता है बात: जानिए सऊदी अरब की कंपनी ने क्यों किया लॉन्च, कैसे इस्लामी रवायतों को करेगा प्रमोट

सऊदी एआई कंपनी हुमैन (Humain) ने एक अरबी भाषा का एआई चैटबॉट लॉन्च किया है। कंपनी ने इसे दुनिया का पहला ‘हलाल एआई’ होने का दावा किया है। कंपनी का कहना है कि यह अरबी भाषा, इस्लामी रिवायत, मूल्यों और विरासत को लेकर संवेदनशील है।

क्या है हलाल एआई ( Halal AI)

अरबी भाषा में तैयार किए गए चैटबॉट हुमैन चैट (Humain Chat) यानी हलाल एआई अंग्रेजी और अरबी, दोनों भाषाओं में आसानी से स्विच कर सकता है। इसके अलावा मिस्र, लेबनानी सहित कई बोलियों को भी आसानी से समझ सकता है और जवाब दे सकता है। यूजर्स टेक्स्ट या वॉइस के जरिए इससे सवाल पूछ सकते हैं। इसमें रियल टाइम सर्च बेस्ड जवाब मिल जाते हैं। इतना ही नहीं बातचीत को शेयर भी किया जा सकता है।

Humain Chat चैटबॉट की तकनीक का आधार ‘ALLAM 34B’ है। यह एक लार्ज लैंग्वेज मॉडल (LLM) है, जिसे आठ पेटाबाइट से ज्यादा डेटा पर प्रशिक्षित किया गया है। इसे सबसे बड़ा अरबी डेटासेट माना जा रहा है।

कंपनी के मुताबिक, हुमैन चैट कंपनी के अल्लाम लार्ज लैंग्वेज मॉडल (Allam model) पर आधारित है, जिसे अब तक के सबसे बड़े अरबी डेटासेट पर तैयार किया गया है।

यह चैटबॉट सबसे पहले सऊदी अरब में उपलब्ध कराया जाएगा। ये वेब, IOS, Android तीनों पर उपलब्ध होगा। उसके बाद इसे मध्य पूर्व और दुनिया के बाकी हिस्सों में भी लॉन्च किया जाएगा।

इस्लाम की बारीकियाँ ह्यूमेन चैट को पता है- कंपनी

कंपनी का कहना है कि अल्लाम मॉडल को ‘इस्लामी, मध्य पूर्वी और सांस्कृतिक बारीकियों’ वाले डेटा सेट पर प्रशिक्षित किया गया है। यह दुनिया के अग्रणी चैटबॉट ChatGPT जैसा ही है, जिसके डेवलपर OpenAI का कहना है कि इसे पश्चिमी मूल्यों के अनुरूप बनाया गया है। ह्यूमेन चैट ऐसे समय में लॉन्च हुआ है, जब स्टार्टअप और दूसरी कंपनियाँ एआई तकनीक में आगे निकलने की होड़ में हैं।

सऊदी अरब की पब्लिक फंड के पैसे से बना ह्यूमेन चैट

सऊदी सॉवरेन वेल्थ फंड के स्वामित्व वाली ह्यूमेन चैट को सऊदी पब्लिक इनवेस्टमेंट फंड से मदद मिली है। कंपनी एआई इकोसिस्टम, इंफ्रास्ट्रक्चर, क्लाउड, डाटा और एप्लिकेशन पर फोकस कर रही है। इसको अबू धाबी सरकार की फाल्कन अरेबिक मॉडल से चुनौती मिल सकती है। अबु धाबी की सरकारी अनुसंधान संस्थान ने साल 2025 की शुरुआत में इसे लॉन्च किया था।

ह्यूमेन चैट की घोषणा मई में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की सऊदी अरब यात्रा से एक दिन पहले की गई थी। सऊदी अरब ने इस दौरान एआई की बुनियादी ढाँचा बनाने के लिए अमेरिकी प्रौद्योगिकी कंपनियों के साथ अरबों डॉलर के समझौते किए थे।

सऊदी अरब में स्टोर होगा यूजर्स का डाटा

कंपनी का कहना है कि ह्यूमेन चैट पूरी तरह से सऊदी अरब के पर्सनल डाटा प्रोटेक्शन लॉ को मानने वाला है। इसके यूजर्स की सारी जानकारी देश में ही स्टोर किया जाता है, ताकि प्राइवेसी बनी रहे।

उद्योगों में अंग्रेजी भाषा के वर्चस्व के बीच ह्यूमेन चैट दुनिया के 38 करोड़ अरबी-भाषियों को उनकी मूल भाषा में सेवाएँ प्रदान करने में सक्षम होगी।

कंपनी का मानना है कि अनुवाद में सक्षम होने के बावजूद, दुनिया की अग्रणी एआई कंपनियों के चैटबॉट डिफ़ॉल्ट रूप से अंग्रेजी में ही काम करते हैं, क्योंकि इनके डेटासेट अंग्रेजी में होते हैं।

चैटजीपीटी, गूगल जेमिनी और चीन के डीपसीक की तुलना में अल्लाम और फाल्कन जैसे मॉडल अरबी भाषा में विस्तार से आउटपुट देने में ज्यादा सक्षम हैं।

ब्रिटेन के 85 इलाकों में पसरा है पाकिस्तानी बलात्कारियों का गैंग, ड्रग्स-गिफ्ट से फँसाते हैं: ब्रिटिश MP की रिपोर्ट से खुलासा, बताया- 60 के दशक से एक्टिव हैं ‘ग्रूमिंग गैंग्स’

ब्रिटेन के सांसद रूपर्ट लोव की अगुवाई में हुई एक निजी जाँच में हैरान करने वाले खुलासे हुए हैं। जाँच में ब्रिटेन के कम से कम 85 इलाकों में गैंग बनाकर बच्चों का यौन शोषण किए जाने के मामलों का पता चला है।

शोषण की ये घटनाएँ ना केवल मौजूदा वक्त में हो रही हैं बल्कि कई घटनाएँ 1960 के दशक से चली आ रही हैं। जाँच रिपोर्ट का दावा है कि इस घिनौने कांड में शामिल अधिकतर आरोपी पाकिस्तानी मूल के युवक हैं।

इस रिपोर्ट में कहा गया है कि सैकड़ों पीड़ित, उनके परिजन और व्हिसलब्लोअर्स सामने आए हैं, जिन्होंने अपनी दर्दनाक कहानियाँ बताई है। कई पीड़िताएँ बचपन में ही गैंग्स के निशाने पर आ गईं, उन्हें गिफ्ट्स और झूठे वादों से फँसाया गया, नशा दिया गया और फिर बार-बार बलात्कार का शिकार बनाया गया।

इन मामलों में हैरानी की बात ये रही कि अक्सर पुलिस और प्रशासन ने इन घटनाओं के संकेतों को नजरअंदाज किया और पीड़ितों को गंभीरता से नहीं लिया गया।

रूपर्ट लोव की जाँच और सरकार पर दबाव

सांसद रूपर्ट लोव ने अपनी जाँच टीम के साथ देशभर में सफर किया और सबूत जुटाए। उन्होंने हजारों ‘फ्रीडम ऑफ इन्फॉर्मेशन’ (सूचना अधिकार जैसी व्यवस्था) के तहत माँगी गई रिपोर्टों और सैकड़ों गवाहों के बयानों के आधार पर यह खुलासा किया है।

लोव का कहना है ‘सड़ी-गली सच्चाई’ पहले से सोची गई तुलना में कहीं ज्यादा गहरी है। उनके अनुसार, “‘”सैकड़ों, हजारों जिंदगियाँ इन पाकिस्तानी गैंग्स के हाथों बर्बाद हो चुकी हैं।”

उन्होंने लेबर सरकार पर भी तीखा हमला बोला और आरोप लगाया कि सरकार ने अब तक कोई  ठोस कदम नहीं उठाए हैं। लोव ने कहा, “दो महीने से ज्यादा हो गए, लेबर ने पूरे देश में एक्शन लेने का वादा किया था, लेकिन अब तक कुछ नहीं हुआ। पीड़ितों का संदेश साफ है, बस बहुत हो चुका। अब समय है सख्त कदम उठाने का।”

लोव ने यह भी ऐलान किया कि उनकी जाँच समिति संसद में एक रिपोर्ट पेश करेगी, जिसमें पारदर्शिता, जवाबदेही और पीड़ितों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए उचित कदम सुझाए जाएँगे।

उन्होंने यहाँ तक कहा कि अगर कोई विदेशी नागरिक ऐसे अपराधों में शामिल पाया जाता है या चुपचाप जानकर भी कुछ नहीं करता, तो उसे तुरंत ब्रिटेन से बाहर निकाला जाना चाहिए।

रोदरहैम से अब तक का काला सच

ब्रिटेन में ग्रूमिंग गैंग्स की समस्या कोई नई नहीं है। साल 2014 में प्रोफेसर एलेक्सिस जे की रिपोर्ट ने रोदरहैम इलाके में 1997 से 2013 के बीच कम से कम 1400 बच्चियों के यौन शोषण का पर्दाफाश किया था।

उस रिपोर्ट में साफ कहा गया था कि स्थानीय प्रशासन और पुलिस ने जानबूझकर इन घटनाओं को दबाया, क्योंकि उन्हें डर था कि कहीं उन पर नस्लभेदी होने का ठप्पा न लग जाए। यह रवैया ही अपराधियों को खुली छूट देता रहा।

अब नई जाँचों में और भी चौंकाने वाले तथ्य सामने आ रहे हैं। कुछ पीड़िताओं ने तो यह तक आरोप लगाया कि साउथ यॉर्कशायर पुलिस के कुछ अधिकारी भी पाकिस्तानी गैंग्स के साथ मिलकर उनका शोषण करते रहे। कई पीड़िताओं के बयान फाड़कर कूड़े में फेंक दिए गए, ताकि अपराध कभी दर्ज ही न हो सके।

एक पीड़िता ने बताया कि उसे 12 साल की उम्र में ही पुलिस की गाड़ी में बलात्कार का शिकार बनाया गया। वहीं, कई बच्चियों को नशा देकर गर्भपात के लिए मजबूर किया गया। इन घटनाओं ने पीड़िताओं का पुलिस और कानूनी व्यवस्था से पूरा भरोसा तोड़ दिया। हालांकि हाल के वर्षों में कुछ पूर्व पुलिस अधिकारी गिरफ्तार किए गए हैं, लेकिन सजा का इंतजार अब भी लंबा है।

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अकाउंट: 56.16 करोड़, डिपॉजिट: ₹2.68 लाख करोड़, महिला खाताधारक: 31.31 करोड़… जानिए कैसे 11 साल में ‘प्रधानमंत्री जन धन’ से आम आदमी की मुट्ठी में आए बैंक

प्रधानमंत्री जन धन योजना के 11 साल पूरे हो गए। अब से ग्यारह साल पहले भारत आर्थिक रूप से बहुत अलग था। करोड़ों लोग ऐसे थे जिनके पास न तो कोई बैंक खाता था और न ही औपचारिक वित्तीय सेवाओं तक पहुँच। खासकर ग्रामीण और पिछड़े इलाकों में आम लोग अपनी मेहनत की कमाई घर में रखते थे या फिर ऊँचे ब्याज पर साहूकारों से कर्ज लेते थे। नतीजा यह होता कि गरीबी और कर्ज का बोझ कभी कम नहीं होता। आर्थिक सुरक्षा तो उन परिवारों के लिए दूर का सपना था।  

ऐसे माहौल में 28 अगस्त 2014 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री जन धन योजना (PMJDY) की शुरुआत की। इसका मकसद सीधा था, ‘हर भारतीय को बैंकिंग से जोड़ना, हर परिवार को वित्तीय पहचान देना और हर नागरिक को आर्थिक सुरक्षा दिलाना।’

इस योजना ने बैंकिंग की दुनिया को आम आदमी के दरवाजे तक पहुँचा दिया। जीरो बैलेंस खाते, आसान केवाईसी प्रक्रिया, रुपे डेबिट कार्ड और बीमा जैसी सुविधाओं ने गरीबों के लिए बैंक को सहज और सुलभ बना दिया।

ग्यारह साल का सफर और उपलब्धियाँ

ग्यारह साल के इस सफर में जन धन योजना ने जो बदलाव किए, वे अपने आप में ऐतिहासिक हैं। आज 56 करोड़ से ज्यादा जन धन खाते खोले जा चुके हैं। इन खातों में जमा राशि बढ़कर 2.67 लाख करोड़ रुपए तक पहुँच गई है, जबकि 2015 में यह महज़ 15,670 करोड़ रुपए थी।

इस योजना की सबसे अहम खासियत यह रही कि इसका सबसे बड़ा फायदा गरीब और ग्रामीण भारत को मिला। करीब 67% खाते गाँव और अर्ध-शहरी इलाकों में खुले और खास बात यह है कि कुल खातों में 56% महिलाओं के नाम पर हैं।

यानी पहली बार लाखों महिलाएँ अपनी आर्थिक पहचान के साथ बैंकिंग सिस्टम का हिस्सा बनीं। इन खातों के साथ सरकार ने सीधे लाभ पहुँचाने की व्यवस्था भी खड़ी की। अब मनरेगा की मजदूरी हो, गैस सब्सिडी हो या किसी अन्य योजना का लाभ सारा पैसा सीधे लाभार्थी के खाते में जाता है। बिचौलियों की भूमिका खत्म हो गई और लोगों का विश्वास भी बैंकिंग व्यवस्था में बढ़ा है।

महिलाओं और गरीबों के जीवन में बदलाव

जन धन योजना सिर्फ आँकड़ों तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसने करोड़ों परिवारों की जिंदगी बदल दी। गाँव की महिलाएँ, जो पहले नकद बचत रखती थीं, अब अपने खाते में पैसा जमा करती हैं।

दिहाड़ी मजदूरों और छोटे किसानों को सीधे खातों में मजदूरी और सब्सिडी मिलती है। दुर्घटना बीमा और ओवरड्राफ्ट सुविधा ने गरीब परिवारों को आकस्मिक हालात में सहारा दिया।

इस योजना ने डिजिटल भुगतान को भी नई गति दी है। अब तक 38 करोड़ से ज्यादा रुपे कार्ड जारी हो चुके हैं। यूपीआई और डिजिटल लेन-देन में भारत ने दुनिया में नेतृत्व हासिल किया है और इसमें जन धन योजना की बड़ी भूमिका रही है।

बने नए रेकॉर्ड और विश्व पहचान

जन धन योजना ने दुनिया में भी भारत का नाम रोशन किया। गिनीज वर्ल्ड रेकॉर्ड्स में इसका नाम शामिल हुआ जब सिर्फ एक हफ्ते में 1.8 करोड़ खाते खोले गए। यह किसी भी देश में अब तक की सबसे बड़ी वित्तीय समावेशन पहल साबित हुई।

ग्यारह सालों में औसत जमा राशि भी कई गुना बढ़ी है। 2015 में एक खाते में औसतन 1,300 रुपए रहते थे, जो अब बढ़कर लगभग 4,768 रुपए हो गए हैं। इसका मतलब है कि लोग न सिर्फ खाते खोल रहे हैं बल्कि नियमित रूप से उनमें बचत भी कर रहे हैं।

साल 2024-25 में ही करीब 6.9 लाख करोड़ रुपए विभिन्न सरकारी योजनाओं के तहत सीधे खातों में ट्रांसफर किए गए। यह सरकार की पारदर्शिता और जन धन योजना की सफलता का जीता-जागता सबूत है।

वित्तीय आजादी की ओर कदम

ग्यारह साल बाद आज साफ दिखता है कि प्रधानमंत्री जन धन योजना ने गरीब और वंचित तबकों की जिंदगी में वास्तविक बदलाव लाया है। यह केवल बैंक खाता खोलने की योजना नहीं रही, बल्कि सम्मान और आत्मनिर्भरता देने की एक राष्ट्रीय मुहिम बन चुकी है।

महिलाओं को आर्थिक ताकत मिली है, ग्रामीण इलाकों तक बैंकिंग की पहुँच हुई है और सरकारी योजनाओं का लाभ सीधे जनता तक पहुँचने लगा है। इस योजना ने भारत में वित्तीय समावेशन की परिभाषा बदल दी है।

रूस-यूक्रेन युद्ध तो असल में ‘मोदी का वॉर’… जहर उगलने से बाज नहीं आ रहा डोनाल्ड ट्रंप का सलाहकार पीटर नवारो: हर चीज के लिए बता रहा भारत को जिम्मेदार

अमेरिका आजकल भारत को नसीहत दे रहा है, उसकी बुराई कर रहा है और रूस-यूक्रेन युद्ध के लिए भारत को जिम्मेदार ठहरा रहा है। ये ट्रंप प्रशासन के अधिकारियों का रोज का काम बन गया है और भारतीयों के लिए मीम मटेरियल। मगर अब ट्रंप के व्यापार सलाहकार पीटर नवारो ने दावा किया कि यूक्रेन-रूस युद्ध किसी तरह ‘मोदी का युद्ध’ है, सिर्फ इसलिए क्योंकि भारत रूस से तेल खरीदता है।

ब्लूमबर्ग को दिए इंटरव्यू में व्हाइट हाउस के व्यापार सलाहकार पीटर नवारो ने भारत को इस बात के लिए जिम्मेदार ठहराया कि अमेरिका और यूरोप को यूक्रेन को रूस के हमले के खिलाफ फंडिंग करनी पड़ रही है।

नवारो ने गुस्से में कहा, “यूक्रेन हमसे और यूरोप से कहता है कि हमें और पैसे दो (युद्ध के लिए)। भारत जो कर रहा है, उसकी वजह से अमेरिका में सब हार रहे हैं। ग्राहक और कारोबारी हार रहे हैं; मजदूर हार रहे हैं क्योंकि भारत के ऊँचे टैरिफ की वजह से नौकरियाँ, कमाई और ज्यादा तनख्वाह का नुकसान हो रहा है। टैक्स देने वाले हार रहे हैं क्योंकि हमें मोदी के युद्ध को फंड करना पड़ रहा है।”

नवारो ने आगे कहा, “शांति का रास्ता कम से कम कुछ हद तक नई दिल्ली से होकर गुजरता है।” व्हाइट हाउस के व्यापार सलाहकार ने भारत को ‘घमंडी’ करार दिया क्योंकि वो अपनी ऊर्जा जरूरतों को प्राथमिकता देता है और सलाह दी कि उसे ‘लोकतंत्रों का साथ देना चाहिए।’

नवारो ने कहा, “भारतीय लोग इस बारे में बहुत घमंडी हैं। वो कहते हैं हमारे टैरिफ ऊँचे नहीं हैं। ये हमारा हक है। हम जिससे चाहें तेल खरीद सकते हैं। भारत तुम दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र हो। ठीक है? तो वैसे ही बर्ताव भी करो। लोकतंत्रों का साथ दो।”

नवारो ने भारत पर चीन के साथ रिश्ते सुधारने के लिए भी हमला बोला, मॉस्को और बीजिंग के साथ भारत के बढ़ते रिश्तों पर गुस्सा जाहिर किया, जिन्हें उन्होंने ‘तानाशाह’ बताया।

नवारो ने कहा, “तुम तानाशाहों के साथ जा रहे हो। चीन, तुम दशकों से उनके साथ चुपके-चुपके जंग लड़ रहे हो। उसने अक्साई चिन और तुम्हारी जमीन पर कब्जा किया। ये तुम्हारे दोस्त नहीं हैं, दोस्तों। ठीक है? और रूस.. अरे, चलो न।”

नवारो के बयान तब आए जब डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन द्वारा भारतीय सामान पर 50 फीसदी टैरिफ लागू हुआ, जो बुधवार (27 अगस्त 2025) से शुरू हो गया। 50 फीसदी टैरिफ में से 25 फीसदी इसलिए लगाया गया क्योंकि भारत रूस से तेल और सैन्य उपकरण खरीद रहा है, जिसे विदेश मंत्रालय ने ‘बेहद दुर्भाग्यपूर्ण’ बताया और अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने की बात दोहराई।

नवारो ने कितनी आसानी से रूस-यूक्रेन युद्ध को ‘मोदी का युद्ध’ कह दिया, जैसे कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दोनों देशों को लड़ने के लिए कहा हो ताकि भारत उससे पैसे कमा सके। अगर ये रूस और यूक्रेन के अलावा किसी का युद्ध है, तो वो अमेरिका का है। रूस-यूक्रेन युद्ध से किसी ने ज्यादा फायदा नहीं उठाया जितना अमेरिका ने।

भारत पर ‘रूसी युद्ध मशीन’ को बढ़ावा देने का आरोप लगाने से लेकर अब बिना सोचे-समझे रूस-यूक्रेन युद्ध को ‘मोदी का युद्ध’ कहने तक, अमेरिका ने अपने कामों पर गौर करना छोड़ दिया। जब नवारो भारत पर हमला बोल रहे हैं, तब 16 अगस्त को अलास्का में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ मुलाकात में पता चला कि पिछले कुछ महीनों में अमेरिका-रूस का द्विपक्षीय व्यापार 20 फीसदी से ज्यादा बढ़ गया है, जिससे ट्रंप के उन दावों की पोल खुलती है कि अमेरिका मॉस्को पर युद्ध खत्म करने का दबाव डाल रहा है।

खास बात ये है कि 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से अमेरिकी तेल कंपनियों ने रिकॉर्ड मुनाफा कमाया है। लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) निर्यात, हथियार बिक्री और युद्ध से जुड़े कई मौकों से अमेरिका इस युद्ध का सबसे बड़ा फायदा उठाने वाला है।

अमेरिका ने यूरोप को अपना सस्ता LNG घरेलू कीमत से चार गुना ज्यादा कीमत पर बेचा, जिसे ‘युद्ध की वजह से आपूर्ति में रुकावट’ बताया गया और यूरोप की वैकल्पिक जरूरतों का फायदा उठाया। 2022 में अमेरिकी तेल और गैस कंपनियों जैसे शेवरॉन और एक्सॉनमोबिल ने युद्ध से पहले 2021 की तुलना में 125 फीसदी ज्यादा मुनाफा कमाया।

हाल ही में एक्सॉन मोबिल रूस के सखालिन-1 तेल और गैस प्रोजेक्ट में वापसी की योजना बना रहा है। अलास्का में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और उनके अमेरिकी समकक्ष के बीच मुलाकात में रूस को अपने लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) प्रोजेक्ट्स, जैसे आर्कटिक LNG 2 के लिए अमेरिकी उपकरण खरीदने की इजाजत देने पर बात हुई, भले ही ये अभी प्रतिबंधों के तहत है। रूस को ‘सजा’ देने और पुतिन की ‘युद्ध मशीन’ को रोकने की बात तो दूर की है।

ऊर्जा के अलावा अमेरिका ने रूस-यूक्रेन युद्ध से अपनी रक्षा निर्यात के जरिए भी फायदा उठाया। अमेरिका ने यूक्रेन को 19 अरब डॉलर से ज्यादा के सैन्य उपकरण दिए, जिससे लॉकहीड मार्टिन और रेथियॉन जैसी अमेरिकी रक्षा कंपनियों के शेयरों की कीमत बढ़ गई।

ये भी नहीं भूलना चाहिए कि अमेरिका ने बेशर्मी से दावा किया कि यूक्रेन को दी जाने वाली रक्षा आपूर्ति अमेरिकी अर्थव्यवस्था को मजबूत कर रही है। पहले अमेरिका 95 अरब डॉलर का एक अतिरिक्त रक्षा बिल लाया, जिसमें यूक्रेन के लिए 60.7 अरब डॉलर रखे गए और वादा किया कि इसके 64 फीसदी फंड अमेरिकी रक्षा उद्योग को ‘पुनर्जीवित’ करेंगे।

अब डोनाल्ड ट्रंप यूरोपीय देशों के जरिए यूक्रेन को हथियार बेच रहे हैं, वो भी 10 फीसदी ज्यादा कीमत पर, ताकि अमेरिका का खजाना भरे, जबकि रूस और यूक्रेन के लोग अपनी जान गँवा रहे हैं। ट्रंप ने यूक्रेन को सुरक्षा गारंटी देने की अमेरिकी भागीदारी की कीमत भी तय कर दी है।

जब अमेरिका यूक्रेन के लिए यूरोप को 10 फीसदी ज्यादा कीमत पर हथियार बेचता है, तो ये ठीक है। लेकिन जब भारत अपनी जरूरतों के लिए रूसी तेल खरीदता है और अपने पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स यूरोप और अमेरिका को बेचता है, तो भारत रूसी युद्ध मशीन को बढ़ावा दे रहा है और ये अचानक मोदी का युद्ध बन जाता है।

अमेरिका ने रूस-यूक्रेन युद्ध से मुनाफा कमाया और अब शांति की दलाली करके भी मुनाफा कमाने की कोशिश कर रहा है। अगर रूस-यूक्रेन युद्ध को खत्म करने की शांति वार्ता में युद्धविराम, क्षेत्रीय वापसी या स्थायी शांति की गारंटी से ज्यादा अमेरिका को रूस और यूक्रेन से लाभकारी व्यापार सौदे मिल रहे हैं, तो साफ है कि अमेरिका को शांति नहीं, सिर्फ मुनाफा चाहिए।

रूस-यूक्रेन युद्ध से मुनाफा कमाने के अलावा अमेरिका ने मॉस्को के साथ अपने व्यापारिक रिश्ते भी जारी रखे हैं। गैर-लौह धातु, उर्वरक, अकार्बनिक रसायन, परमाणु रिएक्टर और मशीनरी, तैयार पशु चारा, लोहा और इस्पात और तिलहन आदि में अमेरिका का रूस से आयात लगातार बना हुआ है और कुछ मामलों में बढ़ा भी है। ये सब तब हो रहा है जब पश्चिम ने रूस पर कई प्रतिबंध लगाए हैं और उसकी अर्थव्यवस्था को कमजोर करने का दावा करता है।

यूरोप और अमेरिका को भारत के रूसी तेल खरीदने से दिक्कत है, लेकिन रूसी कच्चे तेल से बने पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स खरीदने में उन्हें कोई परेशानी नहीं है। बात सीधी है, अगर पसंद नहीं तो मत खरीदो। लेकिन अमेरिका खरीदता है, यूरोप खरीदता है। अगर पश्चिम को रूसी तेल से बने पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स खरीदने में खुद से नफरत नहीं है, तो भारत को उसी के लिए विलेन नहीं बनाना चाहिए।

अगर भारत नहीं होता, तो वैश्विक ऊर्जा की कीमतें आसमान छूतीं, जिससे संकट पैदा होता, लेकिन भारत रूसी युद्ध मशीन को बढ़ावा दे रहा है।

अमेरिका रूस के साथ व्यापार कर रहा है। यूक्रेन को हथियार बेचकर अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत कर रहा है। रूस को बाजार से बाहर करके यूरोप को अपने प्रोडक्ट्स बेच रहा है। लेकिन भारत रूस-यूक्रेन युद्ध से मुनाफा कमा रहा है, उसका जोर इसी झूठ को जोर-शोर से फैलाने पर है, ताकि वो खुद का चेहरा बचा सके और भारत को विलेन साबित कर सके।

मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में श्रद्धा पाण्डेय ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें