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अमेरिकी धौंस के सामने भारत ने नहीं टेके घुटने, व्यापार वार्ता बीच में ही छोड़ी… 25% टैरिफ लगाकर ट्रंप ने निकाली खीझ, रूस के साथ संबंधों पर बोले- मुझे इसकी परवाह नहीं

भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते पर महीनों बातचीत के बाद भी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बुधवार (30 जुलाई 2025) को भारत से व्यापार पर 25 प्रतिशत टैरिफ लगाने के साथ-साथ भारत पर अतिरिक्त पैनल्टी लगाने की भी घोषणा की।

अमेरिका का ये कदम दर्शाता है कि नई दिल्ली अमेरिका के आगे झुकने को तैयार नहीं हुआ। मोदी सरकार की ‘राष्ट्र प्रथम’ नीति का भी ये एक प्रमाण है। भारत किसी भी तरह की आर्थिक अधीनता स्वीकार नहीं कर सकता।

रूस के साथ भारत के संबंध और व्यापार वर्षों पुराने हैं। भारत रूस से ऊर्जा और सैन्य हार्डवेयर खरीदता रहा है। अमेरिका ने इसे मुद्दा बनाते हुए भारत पर अतिरिक्त पैनल्टी की घोषणा कर दी।

‘असफल दबाव’ का संकेत है टैरिफ

राष्ट्रपति ट्रंप ने खास स्टाइल में भारत पर टैरिफ लगाने की घोषणा की। भारत पर टैरिफ की वजह ‘असहयोग या खराब व्यवहार’ नहीं है, बल्कि ये टैरिफ अमेरिका के तमाम दबाव के बावजूद भारत के नहीं झुकने का प्रमाण है।

ऐसे समय में जब जापान अमेरिका की शर्तों पर टैरिफ व्यवस्था में छूट दे रहा था, भारत एकतरफा समझौता करने के लिए तैयार नहीं हुआ और बातचीत छोड़कर बीच में ही निकल गया। अगर भारत अमेरिकी कृषि उत्पादों और डेयरी प्रोडक्ट को खुली छूट दे देता तो भारत के घरेलू उद्योग और किसानों पर इसका बुरा असर पड़ता।

भारत अगर अमेरिकी शर्तों को मान लेता तो शायर भारत को टैरिफ वाली मुसीबत नहीं झेलनी पड़ती। लेकिन देशहित से समझौता करने के लिए भारत तैयार नहीं हुआ। अमेरिकी टैरिफ में छूट मिलने से भले ही थोड़े समय के लिए भारत को फायदा मिलता, लेकिन दीर्घकालीन राष्ट्रीय हित प्रभावित होता।

‘ऑपरेशन सिंदूर’ को लेकर ट्रंप के फैलाया था झूठ

भारत और पाकिस्तान के बीच युद्धविराम कराने को लेकर अमेरिका राष्ट्रपति 25 से ज्यादा बार ‘सफेद झूठ’ बोल चुके हैं। यह पूरा घटनाक्रम ट्रंप के उन दावों की पोल भी खोल रहा है जिसमें राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा था कि भारत- पाकिस्तान के बीच सीजफायर उन्होंने कराया और ऑपरेशन सिंदूर के दौरान तनाव कम करने में मदद की थी। लेकिन यह भारतीय सेना का अभियान था जिसने न केवल पहलगाम आतंकी हमले का बदला लिया, बल्कि सीमा पार आतंकवाद में पाकिस्तान की भूमिका को भी उजागर किया।

ऐसे आतंकवादियों के अंतिम संस्कार में पाकिस्तानी सेना के अधिकारी शामिल हुए जिसे संयुक्त राष्ट्र ने भी आतंकी घोषित कर रखा था। इसकी ऑनलाइन तस्वीरें पूरी दुनिया ने देखी। भारत ने 11 पाकिस्तानी एयरबेस और 9 से ज़्यादा आतंकी शिविरों पर बमबारी की।

ऐसा करके भारत ने ये साबित किया कि सीमा पार पाकिस्तान में बैठे आतंकवादी भी अब सुरक्षित नहीं रह सकते। आतंकवादी चाहे कहीं भी हों, भारत उन्हें ढूँढ कर मार देगा। भारत के सटीक हमले से डरे हुए पाकिस्तान ने तुरंत युद्धविराम की गुहार लगाई।

हालाँकि ट्रंप दोनों देशों के बीच युद्धविराम कराने का श्रेय लेने के लिए जरा जल्दी में थे। उन्होंने बार-बार लगातार इस दावे को दोहराया की भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध उन्होंने रुकवाया। जबकि भारत लंबे समय से कहता आ रहा है कि दोनों देशों के बीच किसी तीसरे पक्ष का हस्तक्षेप हमें बर्दाश्त नहीं है।

भारत ने पाकिस्तान के लगातार अनुरोध के बाद ही हमलों को रोकने का फैसला किया। अगर भारत ने सचमुच अमेरिकी हुक्म का पालन किया होता और अपने फैसले ट्रंप की समझदारी पर छोड़ दिए होते, तो उसे अब व्यापार दंड का सामना नहीं करना पड़ता। ट्रंप का ताजा गुस्सा साफ तौर पर दर्शाता है कि भारत ने स्वतंत्र रणनीतिक फैसले लिए।

रूसी तेल और हथियारों का भारत खरीदार रहा है। राष्ट्रपति ट्रंप को ये बात भी चुभती रही है। कई बार उन्होंने अपनी निराशा जताई है। लेकिन भारत ये खुद तय करता है कि उसके लिए क्या सही है।

भारत के लिए रूसी ऊर्जा फायदेमंद

भारत का रियायती दरों पर रूसी तेल खरीदने का फैसला एक व्यावहारिक आर्थिक कदम रहा है। 2022 से रूस- यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद रूस पर पश्चिमी देशों ने कई तरह के प्रतिबंध लगा दिए। ऐसे में रूस काफी कम दाम पर कच्चा तेल भारत को बेचता है।

दुनिया में कच्चे तेल की बढ़ी कीमतों और पश्चिमी देशों की शर्तों का विकल्प भारत को रूस के रूप में मिला है। इससे भारत को ऊर्जा बिलों में अरबों की बचत करने और मुद्रास्फीति को नियंत्रण में रखने में मदद मिल रही है।

ऐसे में भारत से ये उम्मीद करना कि रूस- यूक्रेन युद्ध को देखते हुए भारत अमेरिकी नजरिए का समर्थन करेगा और रूस से व्यापारिक रिश्ता तोड़ देगा, पूरी तरह काल्पनिक लगता है, खास कर तक जब कई पश्चिमी देश रूस से रेयर अर्थ मिनरल्स आज भी खरीद रहे हैं।

रूस के साथ भारत के ऐतिहासिक रक्षा संबंध

भारत रूस का पारंपरिक रक्षा संबंध रहा है। रूस से हथियार खरीदने पर अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप को सख्त ऐतराज रहा है। भारत लगातार उनकी शिकायतों की अनदेखी करता रहा है। नेहरू और इंदिरा गाँधी से लेकर वाजपेयी और मनमोहन सिंह तक के काल में भी मास्को के साथ भारत के रक्षा संबंध जरूरत पर आधारित और विश्वसनीय रहे हैं।

ट्रंप ने भारत पर टैरिफ की घोषणा के बाद ये साफ करने की भी कोशिश की कि उन्हें रूस और भारत के रिश्ते से कोई फर्क नहीं पड़ता पर असलियत इससे बिल्कुल उलट है।

शीत युद्ध के दौरान अमेरिका ने अफगानिस्तान में युद्ध लड़ने के लिए पाकिस्तान को कई रियायतें दी, जिससे भारत उसके रक्षा सौदों से बाहर हो गया। उस वक्त रूस ही था जिसने भारत की हर मुश्किल घड़ी में साथ दिया।

यहाँ तक कि 1971 के बांग्लादेश मुक्ति युद्ध के दौरान भी सैन्य सहायता उपलब्ध कराई। ट्रंप या अमेरिका के किसी भी राजनीतिज्ञ के लिए अब यह उम्मीद करना कि भारत दशकों पुराने रिश्तों को त्याग देगा, क्योंकि वह ऐसा चाहते हैं तो ये संभव नहीं है।

भारत के लिए संप्रभुता सर्वोपरि

ट्रंप के आगे नहीं झुकना सिर्फ व्यापार के लिए ही नहीं, बल्कि देश की संप्रभुता के लिए भी जरूरी है। ट्रंप की आक्रामक लेन-देन संबंधी कूटनीति के आगे न झुक कर भारत ने दुनिया को यह संदेश दिया है कि वह किसी भी वैश्विक शक्ति का जागीरदार नहीं बनेगा। चाहे सैन्य निर्णय हों, ऊर्जा स्रोत हों, या व्यापार नीति, भारत अपने राष्ट्रीय हित में कार्य करेगा। ट्रंप के सामने खड़े होकर नई दिल्ली ने दिखा दिया है कि वह अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए आर्थिक घाटा भी सहन करने को तैयार है।

हालाँकि ये टैरिफ भारत की निर्यात को थोड़े वक्त के लिए नुकसान पहुँचा सकते हैं। इसका असर देश की अर्थव्यवस्था पर भी दिख सकता है। लेकिन बड़े कैनवास पर देखें तो ये दीर्घकालिक स्वायत्तता के लिए चुकाई जाने वाली एक छोटी सी कीमत हैं। ट्रंप द्वारा भारत पर ‘दंड’ लगाना कोई कूटनीतिक हार नहीं है, बल्कि एक कूटनीतिक घोषणा है कि भारत अपनी संप्रभुता को गिरवी नहीं रख सकता।

जैसे-जैसे भारत एक स्वतंत्र विदेश नीति और आर्थिक लचीलेपन के साथ दुनिया के छोटे-बड़े हर देश से अपनी दोस्ती को मजबूत कर रहा है, इससे आने वाले वर्षों में भारत एक विकसित राष्ट्र के रूप में दुनिया के सामने खुद को स्थापित करेगा। भारत एक ऐसा संप्रभु राष्ट्र है, जो अपनी शर्तों पर निर्णय लेता है।

(ये मूल रूप से अंग्रेजी में जिनित जैन द्वारा लिखी गई है। इसे यहाँ क्लिक कर देखा जा सकता है)

J&K में चिनाब नदी पर 1856 मेगावट का पावर प्रोजेक्ट होगा तैयार, ‘सिंधु नदी’ का सारा जल भारत के काम आएगा: पाकिस्तान को मोदी सरकार ने फिर दिया झटका

भारत सरकार ने ‘सिंधु जल संधि’ रोकने के बाद एक और बड़ा फैसला लिया है। सरकार ने जम्मू-कश्मीर के रामबन जिले के सिद्धू गाँव के पास चिनाब नदी पर 1,856 मेगावाट क्षमता वाले सावलकोट जलविद्युत परियोजना के निर्माण की शुरुआत कर दी है। इस परियोजना पर पहली बार 1960 में विचार किया गया था।

जानकारी के अनुसार, भारत द्वारा 22 अप्रैल 2025 को सिंधु जल संधि को निलंबित करने के बाद विकास संबंधी यह फैसला पाकिस्तान के लिए एक बड़ी समस्या का कारण हो सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान की ओर बहने वाले पानी को रोकने के लिए भारत को जल भंडारण क्षमता बढ़ाने की जरूरत है। कहा जा रहा है कि सावलकोट परियोजना पूरी होने के बाद भारत सिंधु नदी के पानी का बेहतर इस्तेमाल कर पाएगा।

यह परियोजना ऊपर की ओर बगलीहार डैम और नीचे सालाल डैम के बीच आने वाले चिनाब नदी के हिस्से पर बनाई जा रही है। यह परियोजना रामबन और उधमपुर जिलों में फैली हुई है और जम्मू और श्रीनगर दोनों से लगभग 120-130 किलोमीटर की दूरी पर है।

रिपोर्ट के मुताबिक, प्रोजेक्ट में एक ‘रोलर कॉम्पैक्टेड कंक्रीट ग्रैविटी डैम’ बनेगा, जिसकी ऊँचाई 192.5 मीटर होगी। नदी का बहाव मोड़ने के लिए घोड़े की नाल के आकार की तीन सुरंगें बनाई जाएँगी, जिनकी लंबाई क्रमशः 965 मीटर, 1130 मीटर और 1280 मीटर होगी। यह नदी का रुख मोड़ने में सक्षम होगा।

परियोजना के तहत डैम के बाएँ किनारे पर एक भूमिगत पावर हाउस बनेगा, जिसमें 225 मेगावाट के 8 यूनिट होंगे यानी कुल मिलाकर इसकी क्षमता 1,800 मेगावाट होगी। इसके अलावा, पर्यावरणीय जल प्रवाह के लिए छोड़े गए पानी से 56 मेगावाट की अतिरिक्त बिजली बनाई जाएगी, जिसके बाद इसकी क्षमता 1856 मेगावाट हो जाएगी।

बता दें कि बाढ़ नियंत्रण के लिए भी योजना तैयार की गई है। योजना के मुताबिक, अन्य मौसम में 2,977 क्यूमेक और मॉनसून में 9,292 क्यूमेक पानी मोड़ने की क्षमता होगी। परियोजना के तहत कार्यों की देखरेख की जिम्मेदारी राष्ट्रीय जलविद्युत निगम (NHPC) को सौंपी गई है।

यह पूरी परियोजना ‘रन-ऑफ-द-रिवर’ (नदी प्रवाह आधारित) सिस्टम पर आधारित है। सावलकोट जल विद्युत परियोजना से प्रतिवर्ष 7,994.73 मिलियन यूनिट ऊर्जा उत्पन्न होने की उम्मीद है, जिससे ऊर्जा की कमी वाले उत्तरी ग्रिड में बिजली की आपूर्ति को बढ़ावा मिलेगा और साथ ही क्षेत्र में औद्योगिक विकास में भी सहायता मिलेगी।

अमेरिका से बिगड़े रिश्ते, रणनीतिक संप्रभुता को पहुँचे नुकसान… राहुल गाँधी ने लोकसभा में यूँ ही नहीं ‘ऑपरेशन सिंदूर’ पर उगला जहर, जानिए कितने खतरनाक मंसूबे

लोकसभा में राहुल गाँधी की ओर से ऑपरेशन सिंदूर पर दिया गया बयान एक ऐसे मौके पर आया, जब देश पहलगाम आतंकी हमले की जवाबी कार्रवाई और एक सफल सैन्य प्रतिक्रिया को लेकर एकमत था।

हालाँकि इस मौके पर राष्ट्रीय एकता की उम्मीदों को दरकिनार करते हुए, गाँधी का भाषण न केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तीखा हमला था, बल्कि भारतीय संप्रभुता, सैन्य प्रतिष्ठा और विदेश नीति की स्थिरता पर भी सीधा प्रहार था।

राहुल ने इस सैन्य ऑपरेशन को महज एक ‘जनसंपर्क अभियान’ बताया। उन्होंने सेना के हाथ बंधे होने का दावा किया और सरकार पर राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी का आरोप लगाया।

इसके पीछे छिपा असली उद्देश्य था- मोदी को उकसाकर उनकी प्रतिक्रिया को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेतुका दिखाना और अमेरिका जैसे रणनीतिक साझेदारों के साथ भारत की सावधानीपूर्वक बनाई गई विदेश नीति को नुकसान पहुँचाना।

जानबूझकर उकसावे की कोशिश: राहुल का असली निशाना मोदी की अमेरिकी रणनीति

राहुल गाँधी के भाषण का सबसे हैरान करने वाला पल वह था जब उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी को संसद में खुलेआम अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को ‘झूठा’ कहने की चुनौती दी। यह सिर्फ एक तीखा बयान नहीं था, बल्कि एक सोची-समझी चाल थी।

गाँधी का मकसद था मोदी को भावनात्मक रूप से भड़काना, ताकि वे कोई ऐसा जवाब दें जिससे भारत और अमेरिका के बीच बने मजबूत लेकिन नाजुक रिश्तों को नुकसान पहुँचे।

यह बात किसी से छिपी नहीं है कि ट्रंप के दोबारा राष्ट्रपति बनने के बाद से उनका व्यवहार कितना अस्थिर और अप्रत्याशित रहा है। अगर भारत-अमेरिका के रिश्तों में कोई खटास आती है, तो इसका असर सीधे-सीधे भारत की रणनीतिक स्थिति पर पड़ेगा, खासकर ऐसे समय में जब भारत, चीन से बढ़ते तनाव के बीच खुद को पश्चिमी देशों के लिए एक भरोसेमंद और पसंदीदा साझेदार के रूप में सामने रख रहा है।

यहाँ तक कि कॉन्ग्रेस के समर्थक माने जाने वाले पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने भी राहुल गाँधी के बयानों को ‘दिखावा’ कहा और माना कि अगर राहुल खुद प्रधानमंत्री होते, तो शायद ऐसा कुछ नहीं कहते, जैसा वह दूसरों से कह रहे हैं।

हालाँकि, मोदी ने इस उकसावे में नहीं आए और अपनी रणनीतिक समझ और धैर्य का परिचय दिया। मोदी सरकार की विदेश नीति का मकसद है- अमेरिका जैसे ताकतवर देश से एक बराबरी वाले साझेदार की तरह अपनी शर्तों पर बात करना, न कि किसी कमजोर या दबाव में आए देश की तरह उसकी बात को मानना।

आज जब भारत अपनी अर्थव्यवस्था, तकनीक और रक्षा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने की कोशिश कर रहा है, तब एक भी गलत कदम देश को पीछे धकेल सकता है। राहुल गाँधी का ये बयान जवाबदेही से ज्यादा एक तरह की राजनीतिक तोड़फोड़ की कोशिश लगती है। ऐसा प्रयास जिससे सरकार को अंतरराष्ट्रीय मंच पर कमजोर दिखाया जा सके और बाद में उसका राजनीतिक फायदा उठाया जा सके।

मोदी का दृष्टिकोण: संयम, लाभ और रणनीतिक धैर्य

राहुल गाँधी ने प्रधानमंत्री मोदी पर जो ‘साहस की कमी’ का आरोप लगाया, वह पूरी तरह गलत साबित हुआ। इसके उलट, ऑपरेशन सिंदूर एक सटीक, शांत और सोच-समझकर किया गया सैन्य कदम था, जो अच्छे नेतृत्व और दूरदर्शी रणनीति का उदाहरण है।

पहलगाम में हुए आतंकवादी हमले के सिर्फ 48 घंटे के अंदर भारत ने पाकिस्तान के कब्जे वाले इलाकों में एक सटीक सैन्य कार्रवाई की, जिसमें कई आतंकी ठिकाने तबाह कर दिए गए। प्रधानमंत्री मोदी ने संसद में साफ बताया कि यह कार्रवाई किसी अंतरराष्ट्रीय दबाव में आकर नहीं रोकी गई, बल्कि इसलिए रुकी क्योंकि पाकिस्तान खुद पीछे हट गया और दया की गुहार लगाने लगा।

पीएम मोदी ने यह भी कहा कि इस दौरान किसी भी वैश्विक नेता ने भारत को रोकने की कोशिश नहीं की। जब अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने उन्हें सैन्य ब्रीफिंग के बीच फोन किया, तो मोदी का जवाब साफ था: “अगर वे हमें रोकना चाहते हैं, तो इसकी उन्हें भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। हम गोली का जवाब गोले से देंगे।”

भारत ने इस पूरे अभियान में संयम दिखाया। उसने आम नागरिकों या शहरों को निशाना नहीं बनाया, बल्कि आतंक के खिलाफ सटीक जवाब दिया। इस तरह भारत ने न सिर्फ अपनी ताकत दिखाई, बल्कि तनाव बढ़ने से भी बचा और अपनी अंतरराष्ट्रीय साख भी बनाए रखी। यही असली नेतृत्व होता है, सोच समझकर किया गया एक मजबूत फैसला।

अमेरिका के साथ रिश्तों को लेकर भी यही समझदारी दिखती है। न्यूयॉर्क टाइम्स के एक लेख में बताया गया है कि कैसे दुनिया के नेता ट्रंप जैसे अस्थिर स्वभाव वाले नेता से डील करने के लिए चापलूसी, रणनीतिक चुप्पी और सीमित असहमति का इस्तेमाल कर रहे हैं ताकि अपने देश के लिए बेहतर सौदे हासिल कर सकें।

जो देश ट्रंप से सीधे टकराते हैं, उन्हें नुकसान भी झेलना पड़ता है। इसका उदाहरण यूक्रेन है, जहाँ राष्ट्रपति जेलेंस्की से विवाद के बाद अमेरिका ने कुछ समय के लिए यूक्रेन को हथियार भेजना रोक दिया, जबकि वह पहले से रूस के साथ जंग में फँसा हुआ था।

ऐसे में भारत का संयम दिखाना कमजोरी नहीं, बल्कि एक रणनीतिक ताकत है। जहाँ जवाब भी दिया गया और भविष्य के लिए रिश्तों को भी संभाल कर रखा गया।

ग्लोबल साउथ, रूस और स्वतंत्रता की पुनर्परिभाषा

सबसे अहम बात यह है कि प्रधानमंत्री मोदी की विदेश नीति का मकसद सुर्खियों में आना या दिखावा करने का नहीं है, बल्कि इसका असली लक्ष्य है भारत की ऐतिहासिक रूप से पश्चिम पर रही निर्भरता को कम करना और देश को एक आत्मनिर्भर, स्वतंत्र ताकत बनाना।

पहली बात, भारत खुद को ‘ग्लोबल साउथ’ यानी विकासशील देशों की आवाज के रूप में पेश कर रहा है। इसके तहत वह अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और आसियान देशों के साथ रिश्ते मजबूत कर रहा है। साथ ही, ब्रिक्स जैसे समूहों को और मजबूत करके उन्हें पश्चिमी देशों के दबदबे के एक संतुलन के रूप में खड़ा कर रहा है।

दूसरी बात, भारत और रूस के बीच रिश्ते केवल पुरानी दोस्ती की वजह से नहीं टिके हुए हैं, बल्कि ये पूरी तरह से व्यवहारिक सोच पर आधारित हैं। जब यूक्रेन युद्ध के दौरान अमेरिका और यूरोप ने भारत से उम्मीद की कि वह उनके लगाए प्रतिबंधों का साथ दे, तब भारत ने एक तटस्थ और स्वतंत्र रुख अपनाया। इससे कई पश्चिमी सरकारें नाराज भी हुईं, लेकिन भारत ने साफ कर दिया कि वह अब किसी का मोहताज नहीं है न ही किसी के दबाव में आने वाला देश है।

तीसरी और शायद सबसे अहम बात यह है कि मोदी सरकार ने चुपचाप लेकिन ठोस कदमों के साथ भारत में टेक्नोलॉजी और डेटा संप्रभुता की नींव रखनी शुरू कर दी है। यह आज की दुनिया में बेहद जरूरी और रणनीतिक रूप से अहम मुद्दा है। कॉन्ग्रेस ने या तो इस पर ध्यान नहीं दिया, या फिर विदेशी कंपनियों और ताकतों के साथ समझौता कर लिया।

इन तीनों पहलुओं से साफ होता है कि मोदी की विदेश नीति भारत को एक आत्मनिर्भर, मजबूत और सम्मानित वैश्विक ताकत बनाने की दिशा में आगे बढ़ रही है।

तकनीकी संप्रभुता: पश्चिम की सेंसरशिप मशीन से सबक

यूक्रेन युद्ध ने एक कड़वी सच्चाई को सबके सामने ला दिया है, जिसे भारत अब नजरअंदाज नहीं कर सकता। बड़ी अमेरिकी टेक कंपनियाँ जैसे मेटा, गूगल, यूट्यूब और एप्पल, सिर्फ बिजनेस नहीं करतीं, बल्कि वे अमेरिका की विदेश नीति का हिस्सा बन चुकी हैं। इन कंपनियों ने अपने एल्गोरिदम का इस्तेमाल करके लोगों की बातों को दबाया, कंटेंट को सेंसर किया और ऐसे नैरेटिव बनाए जो वाशिंगटन की रणनीति के हिसाब से फिट बैठते हों।

सोचिए, अगर कल भारत का अमेरिका से किसी मुद्दे जैसे व्यापार, टैरिफ या कश्मीर पर मतभेद हो जाए, तो क्या गारंटी है कि ये टेक कंपनियाँ भारत की आवाज को दबाने या भारत विरोधी बातें फैलाने में इस्तेमाल नहीं होंगी? ये कोई कल्पना नहीं है, बल्कि दुनिया में पहले से हो चुका है। मोदी सरकार ने इस खतरे को समय रहते समझ लिया है और इसके खिलाफ तैयारी शुरू कर दी है।

इंडिया स्टैक, डिजिटल इंडिया एक्ट और सेमीकॉन इंडिया मिशन- ये सब केवल डिजिटल प्रगति के नाम पर नहीं हो रहे, बल्कि इनका असली मकसद है भारत को तकनीकी रूप से आत्मनिर्भर बनाना और विदेशी कंपनियों की पकड़ को कमजोर करना।

सरकार अब डेटा को देश के भीतर रखने (डेटा लोकलाइजेशन), सीमाओं के पार डिजिटल डेटा के प्रसार पर सख्ती और ओपन-सोर्स तकनीक पर आधारित पब्लिक डिजिटल प्लेटफॉर्म को बढ़ावा दे रही है। यह सब इसलिए किया जा रहा है ताकि भारत की डिजिटल आजादी और सुरक्षा किसी बाहरी दबाव में न आ कर अपनी शर्तों पर बनी रहे।

नयारा मामला: भारत की संप्रभुता की लड़ाई, एक-एक क्षेत्र में

इस पूरे संघर्ष का एक साफ उदाहरण नायरा मामला है, जिसमें भारत ने अपने अहम राष्ट्रीय बुनियादी ढाँचे पर विदेशी कंपनियों से नियंत्रण वापस लेने की कोशिश की। बाहर से देखने पर यह बस एक निजी ऊर्जा सौदे जैसा लगता है, लेकिन असल में यह भारत की संप्रभुता और आत्मनिर्भरता से जुड़ा मामला है।

सरकार का मकसद साफ है, यह सिर्फ निवेश की बात नहीं है, बल्कि यह तय करना है कि कोई भी विदेशी पूँजी या कंपनी इतनी ताकतवर न बन जाए कि वह भारत के अंदर राजनीतिक फैसलों को प्रभावित कर सके या सरकार पर दबाव बना सके।

चाहे बात ऊर्जा की हो, डेटा की या फिर रक्षा क्षेत्र की भारत अब यह संदेश साफ दे रहा है- देश का भविष्य भारत खुद तय करेगा, न कि विदेशी निवेशक या विदेशी सरकारें।

कॉन्ग्रेस और अमेरिकी डीप स्टेट: समर्पण का इतिहास

विडंबना यह है कि भारत की मौजूदा विदेश नीति पर सवाल उठाने का सबसे कम हक अगर किसी को है, तो वह कॉन्ग्रेस पार्टी को है। नेहरू के समय में भारत ने गुटनिरपेक्ष नीति अपनाई, लेकिन असल में यह नीति रणनीतिक गहराई देने के बजाय सिर्फ अमेरिका को नाराज करने का कारण बनी।

बाद में इंदिरा गाँधी के सोवियत संघ से गहरे रिश्तों ने अमेरिका की नजरों में भारत को और संदिग्ध बना दिया। लेकिन असली झुकाव तो यूपीए-2 सरकार के समय दिखा, जब कॉन्ग्रेस ने अमेरिकी ‘डीप स्टेट’ के सामने पूरी तरह झुकने का रवैया अपना लिया। निगरानी सहयोग (सर्विलांस), व्यापार में छूट और नीति संबंधी फैसलों में अमेरिका को खुश करने की कोशिश साफ नजर आई।

विकीलीक्स द्वारा सामने आए दस्तावेजों से यह भी साफ हुआ कि उस समय अमेरिकी दूतावास भारत के नीति-निर्माण वाले गलियारों में कितनी गहराई तक घुसा हुआ था। आज, मोदी सरकार उसी असंतुलित विरासत को संतुलित करने की कोशिश कर रही है।

भारत को आत्मनिर्भर और स्वतंत्र रणनीतिक सोच वाला देश बनाने के लिए। लेकिन दूसरी तरफ राहुल गाँधी वही बातें दोहरा रहे हैं जो विदेशी मीडिया, पश्चिमी फंड से चलने वाले NGO, और जॉर्ज सोरोस जैसे विवादित अंतरराष्ट्रीय चेहरों से जुड़ी थिंक टैंक संस्थाएँ फैला रही हैं।

चाहे वो जानबूझकर कर रहे हों या अनजाने में, पर राहुल ऐसी ताकतों की मदद कर रहे हैं जो नहीं चाहतीं कि भारत एक मजबूत, आत्मनिर्भर और निर्णय लेने में स्वतंत्र देश बने। वे भारत को फिर से कमजोर, दबाव में रहने वाला और विदेशों पर निर्भर बनाना चाहते हैं और राहुल की बातें उसी दिशा में जाती दिखती हैं।

ऑपरेशन सिंदूर दुनिया के लिए एक संदेश था, और यह तोड़फोड़ भी एक संदेश है

राहुल गाँधी जब ऑपरेशन सिंदूर को सिर्फ एक प्रचार का हथकंडा बताते हैं, तो वह सिर्फ प्रधानमंत्री मोदी पर हमला नहीं कर रहे, बल्कि वे हमारे सशस्त्र बलों के हौसले और बलिदान को भी छोटा दिखा रहे हैं।

वे इस सैन्य अभियान की सफलता को नज़र अंदाज़ कर रहे हैं, उन जवानों के साहस और त्याग को कमतर बता रहे हैं जिन्होंने अपनी जान जोखिम में डालकर इस मिशन को पूरा किया। इतना ही नहीं, यह कहकर कि भारत ने झिझक दिखाई, राहुल दुश्मन को गलत संदेश दे रहे हैं और उनका हौसला बढ़ा रहे हैं।

जैसा कि प्रधानमंत्री मोदी ने मंगलवार को लोकसभा में बहुत साफ शब्दों में कहा, “भारत ने जो ठान लिया था, वह हासिल करके दिखाया। हमारी सेना ने यह सुनिश्चित किया कि पाकिस्तान आने वाले दशकों तक इस सबक को कभी न भूले।”

राहुल गाँधी जिस बात को ‘राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी’ कह रहे हैं, असल में वह एक तरह की अराजकता फैलाने की कोशिश है। यह कोई सामान्य असहमति नहीं है। यह राष्ट्रीय हितों के साथ किया गया एक गंभीर विश्वासघात है।

उनकी यह बयानबाज़ी किसी साहस या सोच से नहीं, बल्कि राजनीति में खुद को जरूरी बनाए रखने की हताशा से भरी है। इसके लिए अगर देश को अनावश्यक विवादों में धकेलना पड़े या भारत को फिर से बाहरी ताकतों के दबाव में झुकाना पड़े तो भी उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता।

मोदी संप्रभु भविष्य का निर्माण कर रहे हैं, राहुल औपनिवेशिक अतीत बेच रहे हैं

ऑपरेशन सिंदूर मोदी की छवि चमकाने के लिए नहीं था। यह दुनिया को एक साफ संदेश देने के लिए था।
मेसैज साफ था: भारत जवाब देगा, लेकिन अपनी शर्तों पर। भारत आतंकवाद से लड़ेगा, लेकिन विदेशी ताकतों या पूंजीपतियों को खुश करने के लिए नहीं। भारत अपनी संप्रभुता की रक्षा करेगा, ना कि उसे किसी के साथ ‘समझौते’ में सौंप देगा।

जहाँ प्रधानमंत्री मोदी चुपचाप लेकिन मजबूती से भारत की तकनीकी, कूटनीतिक और आर्थिक आजादी की नींव रख रहे हैं, वहीं राहुल गाँधी संसद में सिर्फ गुस्सा निकालने और नारेबाज़ी करने में लगे हैं। वो चाहते हैं कि भारत ठोस नीति बनाए बिना शोर मचाए लेकिन इससे देश को कोई फायदा नहीं होगा।

ये साहस नहीं, बल्कि एक तरह की मिलीभगत है। ऐसे लोगों के साथ, जो नहीं चाहते कि भारत अपने पैरों पर खड़ा हो। लोकसभा में राहुल गाँधी के कुछ डायलॉग पर उनके समर्थक इंटरनेट पर तालियाँ जरूर बजा सकते हैं, लेकिन भारत का भविष्य अब ऐसे ‘वायरल पलों’ से तय नहीं होगा।

भारत अब खुद फैसले करता है, वो जमाना गया जब वाशिंगटन में बैठकर भारत के लिए नीतियाँ लिखी जाती थीं। अब देश शोर या ड्रामे से नहीं, बल्कि रणनीति, आत्मनिर्भरता और स्थिर नेतृत्व से आगे बढ़ रहा है और एक हताश ‘राजकुमार’ की यह दिखावटी कोशिशें भारत की इस रफ्तार को नहीं रोक सकतीं।

यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में जिनित जैन ने लिखी है। जिसको पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करे। हिंदी में इसका अनुवाद विवेकानंनद मिश्र ने किया है।

‘जिन्होंने किया पहलगाम हमला, उनके सिर में मारी गोली’: गृह मंत्री अमित शाह ने बताई बदले की कहानी, कहा- वोटबैंक के लिए लश्कर-ए-तैयबा को भी बचाएगी कॉन्ग्रेस

गृह मंत्री अमित शाह ने कहा है कि कॉन्ग्रेस वोट बैंक बचाने के लिए पाकिस्तान और लश्कर-ए-तैयबा तक का समर्थन भी करेगी। उन्होंने ऑपरेशन सिंदूर पर कॉन्ग्रेस नेता पी चिदंबरम के प्रश्नों को लेकर भी जम कर सुनाया। गृह मंत्री अमित शाह ने कॉन्ग्रेस की ऐतिहासिक गलतियाँ भी गिनाईं। यह सब बातें उन्होंने राज्यसभा में बुधवार (30 जुलाई, 2025) को अपन वक्तव्य में कहीं। उन्होंने इस दौरान पहलगाम आतंकी हमले के बदले के बारे में भी बात की।

गृह मंत्री शाह के बयान से पहले विपक्ष ने काफी हंगामा मचाया और कहा कि प्रधानमंत्री जवाब दें। हालाँकि, इस पर सुबह ही बात तय हो चुकी थी। विपक्ष ने हंगामा मचाने के बाद राज्यसभा से वॉकआउट भी कर दिया। गृह मंत्री शाह ने इस पर हमला बोला और कहा, “विपक्ष वालों ने सालों से वोटबैंक बचाने के चक्कर में आतंकवाद के खिलाफ कुछ नहीं किया, इसलिए इनसे जवाब नहीं सुना जाएगा”

उन्होंने ऑपरेशन महादेव के विषय में भी बताया, जिसमे पहलगाम हमला करने वाले तीन आतंकी सुलेमान, जिब्रान और अफगान मारे गए थे। उन्होंने बताया, “आतंकियों की डेड बॉडी की पहचान उनके 2 मददगारों और उनकी माँ ने भी की है… तीनों लोगो ने कहा है कि यही आतंकी थे जो 21 अप्रैल को यहाँ ढोक में आए थे और खाना लेकर गए थे।”

गृह मंत्री शाह ने इस ऑपरेशन पर एक और बात बताई। उन्होंने कहा, “मुझे मैसेज आए थे कि इन आतंकियों को जब भी मारें, सिर में गोली मारें। संयोग है कि इन तीनों के एनकाउंटर में सिर में ही गोली लगी है।” उन्होंने इसके बाद उन लोगों पर प्रश्न उठाए जो इस ऑपरेशन को लेकर शोर मचा रहे थे। उन्होंने कॉन्ग्रेस नेता पी चिदंबरम को भी घेरा।

गृह मंत्री अमित शाह ने कहा, “कॉन्ग्रेस पार्टी की मानसिकता पूरी दुनिया के सामने चिदंबरम साहब ने उजागर कर दी कि वोट बैंक के लिए हम पाकिस्तान का समर्थन करते हुए भी नहीं डरेंगे, हमारी वोट बैंक के लिए लश्कर ए तैयबा को बचाने के लिए भी नहीं डरेंगे और हमारी वोट बैंक के लिए हम आतंकियों को शाब्दिक शेल्टर भी देंगे।”

उन्होंने कॉन्ग्रेस पर हमला जारी रखते हुए कहा, “कॉन्ग्रेस की प्राथमिकता देश की सुरक्षा नहीं है, राजनीति है। इनकी प्राथमिकता आतंकवाद को समाप्त करना नहीं है, अपनी वोट बैंक है। इनकी प्राथमिकता हमारी सीमा की सुरक्षा नहीं है, सेक्यूलर और तुष्टिकरण की राजनीति है।”

POK को लेकर भी उन्होंने स्टैंड स्पष्ट कर दिया। गृह मंत्री शाह ने कहा,”मैं कॉन्ग्रेस को कहना चाहता हूँ पाकिस्तान को पाक अधिकृत कश्मीर आपने दिया था, लेकिन वापस लेने का काम भारतीय जनता पार्टी की सरकार करेगी।” गृह मंत्री ने ऑपरेशन सिंदूर पर भी बात की और कॉन्ग्रेस पर प्रश्न उठाए।

उन्होंने कहा, “चिदंबरम जी कहते हैं कि ‘ऑपरेशन सिंदूर’ निर्णायक नहीं है… 1965 की लड़ाई निर्णायक थी क्या, 1971 की लड़ाई निर्णायक थी क्या, तो फिर आंतक क्यों फैला।” गृह मंत्री ने यह भी कहा कि 30 साल तक भाजपा की सरकार रहेगी, इसकी आदत डाल लेनी चाहिए।

गृह मंत्री शाह ने 2008 में 26/11 हमले पर कॉन्ग्रेस सरकार के एक्शन ना लेने पर भी निशाना साधा। गृह मंत्री ने कहा, “कॉन्ग्रेस की सरकार होती तो हमले के बाद पाकिस्तान को तुरंत क्लीन चिट मिल जाती, रक्षा मंत्रालय की जगह विदेश मंत्रालय काम करता… रातों रात डोजियर तैयार होता, डोजियर वहाँ भेज कर चर्चा करते सरम-अल-शेख की।”

गृह मंत्री शाह ने यह भी प्रश्न उठाया कि कॉन्ग्रेस राज में दाऊद इब्राहिम और टाइगर मेमन जैसे अपराधी भागे और इस पर कोई जवाब नहीं है। गृह मंत्री ने इससे पहले लोकसभा में भी इस मामले पर जवाब दिया था और कॉन्ग्रेस को घेरा था।

UK में ग्रूमिंग जिहाद की शिकार बच्चियों का पुलिसवाले भी करते थे रेप, 11 साल की लड़की तक का दुष्कर्म किया… रेपिस्ट कॉन्स्टेबल हसन अली बिना सजा पाए मरा: 5 पीड़िताओं ने अब सुनाई आपबीती

ब्रिटेन के रोथरहम में एक भयावह सच सामने आया है। पाँच पीड़ित महिलाओं ने खुलासा किया है कि पाकिस्तानी मुस्लिम पुरुषों की गैंग ने न सिर्फ उनके बचपन को तबाह किया, बल्कि साउथ यॉर्कशायर पुलिस (SYP) के कुछ पुलिस वालों ने भी उनकी जिंदगी नर्क बना दी।

एक पीड़िता ने सनसनीखेज आरोप लगाया कि दो पुलिस वालों ने उसका यौन शोषण किया, जिसमें से एक का नाम पीसी हसन अली था। बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार, इन दोनों पुलिस वालों ने न सिर्फ उसका शोषण किया, बल्कि उसे नशे की दवाइयाँ भी दीं। हसन अली की जनवरी 2015 में एक कार दुर्घटना में मौत हो गई। उस वक्त वह शोषण के मामले में जाँच के दायरे में था और उसे प्रतिबंधित ड्यूटी पर रखा गया था, लेकिन उसे कभी गिरफ्तार नहीं किया गया।

पुलिस की सफाई और छिपी सच्चाई

साउथ यॉर्कशायर पुलिस ने दावा किया कि हसन अली के खिलाफ शिकायतें थीं, लेकिन ये सिर्फ ‘एक पीड़िता को बार-बार डेट के लिए पूछने, गोपनीय जानकारी साझा करने और पीड़ितों की सुरक्षा में नाकामी’ से जुड़ी थीं। पुलिस ने नशे की सप्लाई के आरोपों को खारिज किया। लेकिन ‘ऑपरेशन लिंडन’ में दो साल तक काम करने वाले गैरी हार्पर ने इस दावे को झूठा करार दिया।

गैरी हार्पर ने दो साल तक इंडिपेंडेंट ऑफिस फॉर पुलिस कंडक्ट (आईओपीसी) के लिए जाँच जीस जिसमें एसवाईपी द्वारा 1997 से 2013 तक रॉदरहैम में चाइल्ड सेक्सुअल एब्यूज की रिपोर्ट्स को कैसे हैंडल किया गया, ये पता लगाना था।

अपनी जाँच के बाद हार्पर ने बताया कि हसन अली पर नशा सप्लाई करने और पीड़िताओं के यौन शोषण के कई गंभीर आरोप थे। उन्होंने यह भी खुलासा किया कि दूसरा पुलिस वाला भी इन घिनौनी हरकतों में शामिल था, लेकिन उसे रिटायर होने की इजाजत दे दी गई। हार्पर ने इसे पुलिस की बदनामी छिपाने की कोशिश बताया और कहा, “ये सबसे अच्छे हाल में उनकी प्रतिष्ठा बचाने की कोशिश थी। और सबसे बुरे हाल में, ये खुला भ्रष्टाचार था।”

पुलिस की क्रूरता और पीड़िताओं का दर्द

पीड़िताओं ने बताया कि 1990 के दशक के मध्य से 2000 के शुरुआती सालों तक, पुलिस वालों ने पाकिस्तानी गैंग के साथ मिलकर उनका शारीरिक और यौन शोषण किया। ज्यादातर पीड़िताएँ उस वक्त किशोर थीं, लेकिन कुछ तो महज 11 साल की थीं।

एक पीड़िता ने बताया कि गैंग ने उसका बार-बार बलात्कार किया और उसे गैरकानूनी गर्भपात के लिए मजबूर किया। जब एक यूथ वर्कर ने सोशल सर्विस और पुलिस को इसकी सूचना दी, तो उसी पुलिस वाले ने उसका बयान लिया, जो उसका शोषण कर रहा था। कुछ दिन बाद, उस पुलिस वाले ने पीड़िता के सामने उसका बयान फाड़कर कूड़ेदान में फेंक दिया। इस घटना के बाद कोई कार्रवाई नहीं हुई।

12 साल की बच्ची को पुलिस की गाड़ी में बनाया शिकार

एक अन्य पीड़िता ने बताया कि जब वह 12 साल की थी, तब एक पुलिस वाले ने उसे एक पुलिस गाड़ी में यौन शोषण का शिकार बनाया। उसने धमकी दी कि अगर उसने उसका विरोध किया, तो वह उसे वापस उन बलात्कारियों के पास भेज देगा। एक महिला जो 1990 के दशक में फोस्टर केयर में थी और बच्चों के आश्रय गृह से बार-बार भागती थी, उसने बताया कि एक पुलिस वाला उसे ढूँढकर एक खाली मकान में ले जाता और बलात्कार करता।

पीड़िता ने कहा, “वह जानता था कि हमारी कोई सुनवाई नहीं होगी। हम अनाथ थे, कमजोर थे, और वह हमारा डर जानता था। वह जानता था कि हम कुछ नहीं बोल पाएँगे।”

पुलिस और कानूनी व्यवस्था पर भरोसा टूटा

30 पीड़िताओं में से सिर्फ 17 ने अपनी सहमति दी कि उनके बयान पुलिस जाँच में इस्तेमाल किए जाएँ। कई पीड़िताओं ने अब इस जाँच से खुद को अलग कर लिया है, क्योंकि उनका पुलिस और कानूनी व्यवस्था पर से भरोसा पूरी तरह उठ चुका है।

गैरी हार्पर ने साउथ यॉर्कशायर पुलिस पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि पुलिस ने हर संभव तरीके से जवाबदेही से बचने की कोशिश की। उन्होंने आठ साल की जाँच को ‘शुरू से अंत तक पूरी तरह नाकाम’ करार दिया।

कुछ कार्रवाई, लेकिन सजा का नामोनिशान नहीं

वॉचडॉग ने 43 पुलिस वालों के खिलाफ शिकायतों को सही पाया, जिनमें से आठ पर छोटे-मोटे गलत व्यवहार और छह पर गंभीर भ्रष्टाचार के आरोप थे। इसके बावजूद, किसी भी पुलिस वाले को न तो कोई सजा हुई और न ही उनकी नौकरी गई।

दिसंबर 2024 से अब तक तीन पूर्व पुलिस वालों को बलात्कार की कोशिश, यौन उत्पीड़न और अपने पद के दुरुपयोग जैसे गंभीर आरोपों में गिरफ्तार किया गया है। ये अपराध 1995 से 2004 के बीच हुए, जब ये पुलिस वाले ड्यूटी पर थे। लेकिन अभी तक इनमें से किसी को भी सजा नहीं हुई है।

नई जाँच की शुरुआत

साउथ यॉर्कशायर पुलिस की मेजर क्राइम यूनिट अब पुलिस वालों की इस घिनौनी साजिश की नई जाँच शुरू कर रही है। यह जाँच पुलिस वॉचडॉग की निगरानी में होगी। स्वतंत्र पुलिस आचरण कार्यालय (IOPC) ने 91 जाँचें कीं, जिनका निष्कर्ष 2022 में आया।

IOPC के एक प्रवक्ता ने कहा, “हमने पाया कि उस दौरान साउथ यॉर्कशायर पुलिस कमजोर बच्चों और युवाओं की सुरक्षा में पूरी तरह नाकाम रही।”

रोथरहम में 1400 बच्चियों का शोषण

2014 में प्रोफेसर एलेक्सिस जे की जाँच से खुलासा हुआ कि 1997 से 2013 के बीच रोथरहम में कम से कम 1,400 बच्चियों का यौन शोषण हुआ। जे ने अपनी रिपोर्ट में कहा, “हमने जो सबूत देखे और सुने, उनके आधार पर ज्यादातर पीड़ितों ने अपने शोषकों को पाकिस्तानी मूल का बताया।”

पाकिस्तानी गैंग और पुलिस की मिलीभगत का काला सच

ब्रिटेन में कई दशकों से पाकिस्तानी गैंग ग्रूमिंग जिहाद करते हुए नाबालिग ब्रिटिश लड़कियों को निशाना बनाते रहे हैं। इन गैंग्स ने बलात्कार, शारीरिक शोषण और यातना जैसे जघन्य अपराध किए। सरकार, पुलिस और मीडिया पर भी गंभीर आरोप हैं कि उन्होंने इन अपराधों की गंभीरता को दबाने की कोशिश की, ताकि नस्लवाद का ठप्पा न लगे।

यह घिनौना सच अब धीरे-धीरे सामने आ रहा है, लेकिन पीड़िताओं को अभी तक इंसाफ का इंतजार है। उनकी आवाजें दबाई गईं, उनके बयान फाड़े गए और उनकी जिंदगियाँ तबाह कर दी गईं। अब सवाल यह है कि क्या इस नई जाँच से इन पीड़िताओं को इंसाफ मिल पाएगा या यह भी एक और नाकाम कोशिश साबित होगी?

‘CJI कोई पोस्ट ऑफिस नहीं’: सुप्रीम कोर्ट ने कपिल सिब्बल को लगाई लताड़, जस्टिस यशवंत वर्मा मामले में CJI के ‘एक्शन’ पर उठा रहे थे सवाल

जस्टिस यशवंत वर्मा मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कपिल सिब्बल को फटकार लगाई। कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि CJI को पोस्ट ऑफिस मत समिझए, जो सिर्फ फाइलें आगे बढ़ाते हैं। कोर्ट ने अपने आदेश में यशवंत वर्मा की रिट याचिका पर भी फैसला सुरक्षित रख लिया है।

बुधवार (30 जुलाई, 2025) को सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “भारत के CJI का काम केवल पोस्ट ऑफिस की तरह चिट्ठी भेजना नहीं है। अगर उनके पास किसी जज के गलत आचरण का सबूत है तो वे उसे राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को सूचित करना उनका अधिकार है।”

सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणियाँ जस्टिस यशवंत वर्मा की रिट याचिका पर सुनवाई के दौरान की। जिसमें उन्होंने आंतरिक जाँच रिपोर्ट को चुनौती दी थी। इस रिपोर्ट में CJI संजीव खन्ना की राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से यशवंत वर्मा को हटाने की सिफारिश की गई थी। सुनवाई जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एजी मसीह की पीठ ने की।

इस दौरान कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि इन-हाउस कमेटी के जज की बर्खास्तगी की सिफारिश करना गैर-कानूनी है। उन्होंने कहा कि आर्टिकल 124 के तहत ही महाभियोग प्रक्रिया हो सकती है। सिब्बल ने कहा कि ऐसा करके CJI संसद के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप कर रहे हैं, यह ‘अस्वीकार्य’ है। इसी पर सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें लताड़ लगाई।

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान ‘कैश कांड’ वाले जस्टिस यशवंत वर्मा के रवैए पर भी प्रश्न उठाए। कोर्ट ने कहा, “आप जो मुद्दे उठा रहे हैं, वे महत्वपूर्ण हैं लेकिन पहले भी उठाए जा सकते थे, इसलिए आपका आचरण विश्वास पैदा नहीं करता और आपका आचरण बहुत कुछ कहता है। आप नहीं चाहते कि यहाँ कुछ भी उजागर हो। संसद को फैसला करने दीजिए। हम यह क्यों तय करें कि यह आपका पैसा है या नहीं? यह आंतरिक समिति का काम नहीं था।”

साथ ही जस्टिस दत्ता ने इन-हाउस रिपोर्ट पर कहा कि यह केवल शुरुआती जाँच का निष्कर्ष है और CJI की सिफारिश केवल एक ‘सलाह’ है। कोर्ट ने कहा कि निष्कासन केवल संसद की प्रक्रिया के अनुसार हो सकता है, इन-हाउस रिपोर्ट के अनुसार बिल्कुल भी नहीं हो सकता।

यशवंत वर्मा के घर से मिले थे अधजले नोट

जस्टिस यशवंत वर्मा के दिल्ली स्थित निवास स्थान पर 14 मार्च 2025 को आग लग गई थी। इस आगजनी में घर के स्टोर रूप में बड़ी मात्रा में अधजले नोट मिले थे। इसको लेकर जाँच के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक कमेटी बनाई थी।

कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि कई गवाहों, वीडियो और तस्वीरों से यह साबित होता है कि जस्टिस वर्मा के दिल्ली वाले घर के स्टोररूम में बड़ी मात्रा में कैश खासकर 500 रुपए के नोट मिले थे, जिनमें से कुछ आधे जले हुए थे।

सबसे हैरानी की बात यह है कि इतनी बड़ी घटना के बावजूद ना तो जस्टिस वर्मा और ना ही उनके परिवार ने पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई थी और ना ही अपने किसी वरिष्ठ को सूचना दी थी।

₹35 लाख में सेरोगेसी का लालच देकर दे दिया किसी और का बच्चा, DNA जाँच में असलियत आई सामने तो धमकाने लगी: डॉक्टर समेत 8 गिरफ्तार, हैदराबाद का मामला

सरोगेसी के नाम पर हैदराबाद फर्टिलिटी क्लिनिक ने दंपती से 35 लाख रुपए लेकर उन्हें किसी और का बच्चा दे दिया दे दिया है। पुलिस जाँच में पता चला कि बच्चा एक गरीब परिवार से मात्र 90,000 रुपए में खरीदा गया था और उसे दंपत्ति को उनके बेटे के रूप में दे दिया गया।

DNA जाँच में जब सच्चाई सामने आई तो दंपती ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई, जिसके बाद मामला सामने आया। पुलिस जाँच में ये पता चला की यूनिवर्सल सृष्टि फर्टिलिटी सेंटर अवैध सरोगेसी रैकेट बिना किसी लाइसेंस के चल रहा था।

मामले में अब तक आठ लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है और अन्य कई दंपतियों की जाँच जारी है, पुलिस को शक है कि और भी लोगों को इसी तरह ठगा गया होगा।  

झूठी सरोगेसी और जाली दस्तावेज

राजस्थान के एक दंपती ने अगस्त 2024 में हैदराबाद स्थित यूनिवर्सल सृष्टि फर्टिलिटी सेंटर से संपर्क किया। क्लिनिक की संचालिका डॉ अथलुरी नम्रता ने उन्हें सरोगेसी का सुझाव दिया और आश्वासन दिया कि प्रक्रिया में उनके ही भ्रूण का प्रत्यारोपण किया जाएगा।

इलाज के नाम पर दंपती से करीब 35 लाख रुपये वसूले गए और बताया गया कि एक सरोगेट माँ गर्भवती है। जून 2025 में उन्हें बताया गया कि विशाखपटनम में सरोगेट ने एक बेटे को जन्म दिया है। बच्चे को सौंपने से पहले दो लाख रुपये प्रसव के नाम पर लिया गया और साथ ही एक जाली जन्म प्रमाण पत्र भी दिया गया, जिसमें बच्चे को उनका अपना बेटा (जैविक पुत्र) बताया गया था।

शंका होने पर दंपती ने दिल्ली की फोरेंसिक लैब में DNA परीक्षण कराया, जिसमें साफ हुआ कि बच्चे का दंपती से कोई बोयोलॉजिकल रिश्ता नहीं है। जब उन्होंने क्लिनिक से स्पष्टीकरण माँगा तो डॉ नम्रता ने बातचीत बंद कर धमकी देना शुरू कर दिया। इसके बाद दंपती ने गोपालपुरम पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई।

पुराने मामले और अवैध नेटवर्क का भंडाफोड़

शिकायत मिलने के बाद पुलिस ने कार्रवाई करते हुए डॉ नम्रता, उनके बेटे पी जयंत कृष्णा, सरकारी गाँधी अस्पताल के डॉक्टर नरगुला सदानंदम, एजेंट धनश्री संतोषी, दो क्लिनिक कर्मचारियों और बच्चे के बोयोलॉजिकल माता-पिता सहित कुल आठ लोगों को गिरफ्तार किया।

रिपोर्ट के अनुसार, जाँच में पता चला कि बच्चा असम के एक गरीब परिवार से 90,000 रुपये में खरीदा गया था और माँ को प्रसव के लिए विशाखपटनम भेजा गया। दो दिन बाद बच्चे को दंपती को सौंप दिया गया।

डॉ नम्रता पहले भी दो बार विवादों में रह चुकी हैं। 2016 में एक NRI दंपती ने उन पर फर्जी सरोगेसी का आरोप लगाया था, जिसके चलते उनका लाइसेंस पाँच साल के लिए निलंबित किया गया। 2020 में उन्हें विशाखापटनम पुलिस ने नवजात बच्चों की तस्करी के मामले में गिरफ्तार किया था। अब तक उनके खिलाफ हैदराबाद, विशाखपटनम और गुंटूर में दस से अधिक मामले दर्ज हो चुके हैं।

पुलिस और स्वास्थ्य विभाग की संयुक्त छापेमारी में पाया गया कि क्लिनिक बिना वैध लाइसेंस के IVF, भ्रूण निर्माण, लिंग परीक्षण, MTP जैसी संवेदनशील प्रक्रियाएँ चला रहा था। क्लिनिक के भीतर लिंग परीक्षण उपकरण, नाइट्रस ऑक्साइड सिलेंडर और अन्य अवैध उपकरण बरामद हुए हैं।

कैसे चलता था फर्जीवाड़ा और आगे की कार्रवाई

क्लिनिक दंपतियों को यह भरोसा दिलाता था कि उनके ही भ्रूण से बच्चा जन्मेगा। लेकिन वास्तव में किसी भी सरोगेट माँ से संबंध नहीं होता था और गरीब महिलाओं से नवजात बच्चे खरीदकर उन्हें सौंपा जाता था।

क्लिनिक की ओर से लगातार झूठी जानकारी दी जाती थी कि गर्भावस्था सामान्य चल रही है। जब ग्राहक सवाल उठाते तो उन्हें धमकाया जाता था। स्वास्थ्य विभाग ने क्लिनिक को सील कर दिया है और अन्य शाखाओं कोंडापुर, विजयवाड़ा और विशाखपटनम में भी जाँच चल रही है।

DCP रश्मि पेरुमल ने बताया कि उन सभी दंपतियों की जाँच की जा रही है जिन्होंने क्लिनिक की किसी भी शाखा से IVF या सेरोगेसी सेवा ली थी। पुलिस का मानना है कि यह सिर्फ एक मामला नहीं, बल्कि एक बड़े सरोगेसी-तस्करी रैकेट का हिस्सा है, जो वर्षों से गरीबों का शोषण कर रहा है।

अमेरिका ने भारत पर लगाया 25% टैरिफ, रूस से ‘दोस्ती’ पर ‘पेनाल्टी’ भी जोड़ी: राष्ट्रपति ट्रंप ने किया ऐलान, जानिए हमारे एक्सपोर्ट पर इसका क्या होगा असर

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ऐलान किया है कि 1 अगस्त, 2025 से भारत को अपने निर्यातों पर 25% टैरिफ देना होगा। इसके अलावा उसे पेनाल्टी के रूप में कुछ और प्रतिशत का टैरिफ भी झेलना होगा। इसका ऐलान उन्होंने बुधवार (30 जुलाई, 2025) को किया है।

ट्रंप ने अपने प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर यह ऐलान किया है। अमेरिकी राष्ट्रपति ने लिखा, “भारत भले हमारा मित्र है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में हमने उसके साथ बहुत कम व्यापार किया है क्योंकि उसके यहाँ टैरिफ़ बहुत ज़्यादा हैं, दुनिया में सबसे ज़्यादा हैं, और किसी भी देश की तुलना में उसके यहाँ सबसे कठोर व्यापार बैरियर हैं।”

ट्रंप ने आगे लिखा, “इसके अलावा, उन्होंने हमेशा अपने अधिकांश हथियार रूस से ही खरीदे हैं और चीन के साथ मिलकर वह रूस के तेल का सबसे बड़ा खरीददार है। वो भी ऐसे समय में जब हर कोई चाहता है कि रूस यूक्रेन में हत्याएँ रोके, इसलिए सब कुछ ठीक नहीं है।”

ट्रंप ने इसके बाद भारत के खिलाफ टैरिफ रेट्स का भी ऐलान किया। उन्होंने कहा, “सब कुछ ठीक नहीं है! इसलिए, भारत को 1 अगस्त से 25% टैरिफ़ और बाकी बताए गए कारणों के चलते पेनाल्टी भी भरनी होगी।” ट्रंप ने इससे पहले दोनों देशों के बीच डील फाइनल ना होने की बात कही थी।

भारत वर्तमान में अमेरिका से एक व्यापार समझौते को लेकर बातचीत कर रहा है। हालाँकि, कई मुद्दों पर बातचीत फंसी हुई है। इस बीच ट्रंप ने भारतीय सामान के अमेरिका में जाने पर यह नए टैरिफ घोषित कर दिए हैं। इससे जब तक भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौता नहीं होता, तब तक भारतीय निर्यातकों को परेशानी उठानी पड़ेगी।

इसका भारत पर क्या असर?

इन टैरिफ का सीधा असर भारत के अमेरिका को होने वाले निर्यात पर पड़ेगा। अब अमेरिकी बाजार में भारतीय सामान 25% महँगे दामों पर बिकेंगे। इससे उनकी अमेरिकी स्थानीय उत्पादों या फिर दूसरे देश से आए उत्पादों के मुकाबले किफायत कम हो जाएगी। भारतीय सामानों पर अभी तक अमेरिका में औसतन 3% का टैरिफ लगता आया है।

अमेरिका भारत का सबसे बड़ा निर्यात सहयोगी है। रिपोर्ट बताती हैं कि भारत ने 2024 में अमेरिका को 87 बिलियन डॉलर (लगभग ₹7.5 लाख करोड़) का निर्यात किया। भारत के कुल निर्यात में अमेरिका की हिस्सेदारी 18% है। अमेरिका के साथ भारत व्यापार अधिशेष में रहता है। यानी अमेरिका को भारत जितना निर्यात करता है, उससे कम अमेरिकी सामान का आयात करता है।

भारत अमेरिका टैरिफ ट्रम्प

विदेशों के साथ व्यापार का लेखाजोखा रखने वाले वाणिज्य मंत्रालय के अनुसार, वर्ष 2024-25 की तीन तिमाहियों (अप्रैल-जून) में ही भारत की तरफ व्यापार का पलड़ा लगभग 30 बिलियन डॉलर (लगभग ₹2.5 लाख करोड़) से अधिक झुका है।

अब यह स्थिति कुछ बदल सकती है। राष्ट्रपति ट्रंप के इस कदम का नुकसान भारतीय फार्मा कम्पनियों और टेलीकॉम क्षेत्र को होगा। वाणिज्य मंत्रालय के आँकड़ों के अनुसार, 2024-25 के अप्रैल से जून के बीच भारत ने अमेरिका को ₹63 हजार करोड़ से ज्यादा की दवाइयाँ बेचीं हैं।

भारत अमेरिका टैरिफ ट्रम्प

वहीं भारत ने इसी दौरान ₹55 हजार करोड़ से अधिक के टेलीकॉम उत्पाद भी अमेरिका को बेचे हैं। इसके बाद रत्न और हीरे भी भारत का बड़ा निर्यात हैं। अब इन सब पर असर पड़ेगा। संभव है कि उनके निर्यात में कुछ कमी देखने को मिले। हालाँकि, भारत पहले ही इन टैरिफ की तैयारी कर चुका है।

फरवरी, 2025 में आई सिटीबैंक की एक रिपोर्ट कहती है कि भारत को अमेरिका के टैरिफ से लगभग ₹50 हजार करोड़ का नुकसान सालाना हो सकता है। रिपोर्ट बताती है कि सबसे अधिक नुकसान स्टील और एल्युमीनियम जैसे सेक्टर उठाएँगे। दवाइयों को लेकर थोड़ा असर जरूर पड़ेगा लेकिन इससे कोई ख़ास अंतर नहीं आने वाला।

सिटीबैंक की रिपोर्ट के इतर, भारतीय स्टेट बैंक की एक रिपोर्ट ने बताया था कि भारत को चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। स्टेट बैंक की रिपोर्ट कहती है कि अमेरिका के इस कदम के बाद भारत के अमेरिका को निर्यातों में लगभग 3%-3.5% की कमी आ सकती है। भारत इसे आसानी से झेल सकता है।

क्या अंतिम चरण में है ट्रेड डील?

भारत और अमेरिका के बीच बीत कुछ महीनों से लगातार व्यापार समझौते पर बातचीत चल रही है। डेयरी और कृषि जैसे मुद्दों पर यह बात फँसी हुई है। हालाँकि, अब इन टैरिफ के ऐलान के बाद यह व्यापार जल्द हो सकता है। यह समझौता जल्द से जल्द हो जाए, यह दोनों देश चाहते हैं।

चीन से टैरिफ की लड़ाई के चलते पहले ही वहां से आने वाले सामानों को लेकर अमेरिका में समस्याएँ पैदा हो चुकी हैं। ऐसे में भारत स व्यापार समझौता अमेरिका के पक्ष में भी है। इसके अलावा इस टैरिफ का नुकसान उन अमेरिकी कंपनियों को उठाना पड़ेगा, जो भारत से सामान या सेवाएँ आयात करती हैं।

भारत जबकि दूसरे तरफ अपने निर्यात में कोई समस्या नहीं आने देना चाहेगा, इसलिए वह जल्द यह समझौता करना चाहेगा। विश्लेषकों ने कहा है कि ट्रंप ने ऐसे ही धमकी भरे ट्वीट जापान और यूरोपियन यूनियन को लेकर भी दिए थे। हालाँकि, इसके कुछ ही दिनों में डील हो गई। ऐसे में यह भी अनुमान लगाया जा रहा है कि भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौता आखिरी चरणों में हो।

743 किमी दूर रहकर पृथ्वी पर रखेगा नजर, दुनिया होगी ‘निसार’: ISRO-NASA का सेटेलाइट हर 12 दिन पर धरती को करेगा स्कैन, सबको फ्री में मिलेगी हर जानकारी

भारत आंध्र प्रदेश राज्य में श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से बुधवार (30 जुलाई 2025) को एक बेहद महत्वाकांक्षी मिशन के सेटेलाइट ‘निसार’ को GSLV-F16 प्रक्षेपण यान के जरिए लॉन्च किया गया। ये सेटेलाइट केंद्र से उड़ान भरकर सूर्य की समकालिक ध्रुवीय कक्षा में स्थापित होगा।

निसार का पूरा नाम ‘नासा-इसरो सिंथेटिक अपर्चर रडार’ (NASA-ISRO Synthetic Aperture Radar) है। ये एक अत्याधुनिक पृथ्वी-अवलोकन सेटेलाइट है, जिसे भारत के इसरो और अमेरिका की नासा ने संयुक्त रूप से विकसित किया है।

फोटो साभार- X- @isro

इस सेटेलाइट का वजन 2,392 किलोग्राम है और यह दुनिया का पहला बड़ा उपग्रह है। इसमें दो फ्रीक्वेंसी बैंड लगाए गए हैं। L-बैंड NASA की ओर से और S-बैंड ISRO द्वारा लगाए गए हैं। यह दोहरे बैंड वाला रडार सिस्टम इस मिशन को पृथ्वी की सतह पर होने वाले परिवर्तनों को किसी भी अन्य उपग्रह की तुलना में अधिक सटीकता से देखने में सक्षम बनाता है।

भारत के लिए बेहद उपयोगी है निसार

लॉन्च के बाद पहले 90 दिनों तक यह इन-ऑर्बिट चेकआउट चरण में रहेगा। इस चरण के दौरान उपग्रह को वैज्ञानिक संचालन के लिए तैयार किया जाएगा। इसके बाद इसका वैज्ञानिक संचालन शुरू होगा।

इससे मिले डेटा सभी उपयोगकर्ताओं को कुछ ही घंटों में सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध होगा और साथ ही इसके लिए कोई शुल्क भी नहीं लगेगा। ऐसे में यह भारत की पर्यावरण योजना, आपदा प्रबंधन और वैज्ञानिक शोध के लिए एक बड़ा वरदान साबित होगा।

अपनी स्कैनिंग क्षमता के जरिए ये सेटेलाइट पृथ्वी की सतह पर हो रहे बदलावों को मिलीमीटर स्तर तक की सूक्ष्मता से माप सकता है। इस लिहाज से निसार सेटेलाइट भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि यह भूकंप, भूस्खलन, ज्वालामुखी और सुनामी जैसे हर तरह की प्राकृतिक आपदाओं की निगरानी कर सकता है।

साथ ही ये हिमखंडों की गतिविधियाँ, समुद्र स्तर में वृद्धि, भूजल और वन क्षेत्रों की स्थिति और कृषि पर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को भी ट्रैक करने में सक्षम है।

पृथ्वी से 743 किमी दूर होगा निसार सेटेलाइट

इसके प्रक्षेपण पर भारतीय खगोलशास्त्री और अंतरिक्ष वैज्ञानिक प्रोफेसर आरसी कपूर ने कहा, “यह NASA और ISRO के बीच एक महत्वपूर्ण सहयोग है। यह पृथ्वी से लगभग 743 किलोमीटर की ऊँचाई और 98.4 डिग्री के झुकाव के साथ पर उसकी कक्षा में स्थापित किया जाएगा। यह उपग्रह लगभग 12 दिनों में पूरी पृथ्वी का स्कैन करेगा। इसके बाद यह प्रतिदिन काफी मात्रा में डेटा हमें देगा।”

डॉ. कपूर ने आगे कहा, “इसके कारण आपदा प्रबंधन के साथ पृथ्वी की कई ऐसी जानकारियाँ मिलेंगी जो वर्तमान और भविष्य की कई परेशानियों का समाधान कर सकती हैं। इसके साथ ही पृथ्वी का गहराई से अध्ययन करने वालों के लिए ये बेहद उपयोगी होगा। आज की तारीख में, यह पृथ्वी का सबसे उन्नत अवलोकन उपग्रह बनने जा रहा है।”

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) और राष्ट्रीय वैमानिकी एवं अंतरिक्ष प्रशासन (नासा) द्वारा संयुक्त रूप से विकसित, भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी का GSLV Mk-II रॉकेट निसार को 747 किलोमीटर की सूर्य-समानध्रुवीय कक्षा (sun-synchronous polar orbit) में स्थापित करेगा।

कैसे काम करेगा निसार

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, नासा के वैज्ञानिकों का कहना है कि प्रत्येक प्रणाली का सिग्नल पृथ्वी की सतह पर अलग-अलग आकार की विशेषताओं के प्रति संवेदनशील होता है और प्रत्येक प्रणाली अलग-अलग विशेषताओं जैसे नमी की मात्रा, सतह की खुरदुरापन, और गति को मापने में विशेषज्ञता रखती है।

अपनी कक्षा में जाने के बाद सेटेलाइट की सिंथेटिक अपर्चर रडार (SAR)तकनीक पृथ्वी की सतह पर रडार तरंगें भेजेगी। ये तरंगें सतह से टकराकर लौटेंगी। रिटर्न सिग्नल के समय और उसके फ़ेज में हुए बदलाव को मापा जाएगा।

निसार सेटेलाइट पृथ्वी का अवलोकन L-बैंड SAR के 1.257 GHz के माध्यम से करेगा। ये लंबी तरंग दैर्ध्य (Wavelength) वाली रेडियो तरंगें होती हैं। यह तकनीक घने जंगलों और मिट्टी के नीचे तक होने वाले परिवर्तनों के साथ सतह पर होने वाली विकृतियों को भी ट्रैक करने में सक्षम है।

इसके अलावा, S-बैंड SAR, 3.2 GHz की छोटी तरंग दैर्ध्य वाली रेडियो तरंगों का उपयोग करता है। इससे फसलों, पानी की सतह और जमीन की सतही जानकारियों का विस्तृत विश्लेषण कर सकने में सक्षम है।

चौड़े क्षेत्र से लेकर कोने तक का हो सकेगा विस्तृत स्कैन

इसरो के अनुसार, सेटेलाइट पहली बार SweepSAR (स्वीप सिंथेटिक अपर्चर रडार) तकनीक का उपयोग कर 242 किमी के चौड़े क्षेत्र को भी उच्च स्थानिक विभेदन यानी spatial resolution के साथ स्कैन कर सकेगा।

आसान भाषा में कहा जाए तो SweepSAR एक रडार तकनीक है जिसमें बड़े क्षेत्र को कम समय में विस्तृत तौर पर स्कैन किया जा सकता है। यह तकनीक कई छोटे रडार एलीमेंट्स को एक साथ और अलग-अलग कोणों से चलाकर सतह की काफी स्पष्ट तस्वीर तैयार करती है।

इसी तरह स्थानिक विभेदन का मतलब है कि एक तस्वीर में कितनी अधिक जानकारी दिख रही है। जितना अधिक रेजोल्यूशन होगा उतनी ही साफ और सूक्ष्म डिटेल मिलेगी। निसार हर 12 दिन में पृथ्वी को स्कैन करेगा और किसी भी मौसम, दिन या रात में हाई रेजोल्यूशन वाले तस्वीर देगा। इसके दोहरे रडार पेलोड और SweepSAR तकनीक इसे और अधिक बेहतर बनाते हैं।

फोटो साभार- X- @isro

इससे वैज्ञानिकों और नीति निर्माताओं को बेहद कम समय में सटीक और व्यापक डेटा मिल सकता है। ये जलवायु परिवर्तन, कृषि और आपदा प्रबंधन के लिए बेहद जरूरी है।

निसार मिशन भारत और अमेरिका के बीच अंतरिक्ष सहयोग में बढ़ती साझेदारी को दर्शाता है। इसे लेकर केंद्रीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा, “यह मिशन केवल एक उपग्रह प्रक्षेपण नहीं है। यह एक ऐसा क्षण है जो दर्शाता है कि विज्ञान और वैश्विक कल्याण के प्रति समर्पित 2 लोकतंत्र मिलकर बहुत कुछ हासिल कर सकते हैं, इसे दिखा रहा है।”

केंद्रीय मंत्री ने आगे कहा, “निसार न सिर्फ भारत और अमेरिका को सेवा देगा बल्कि दुनिया भर के देशों को भी खास तौर पर, आपदा प्रबंधन, कृषि और जलवायु निगरानी जैसे क्षेत्रों में महत्वपूर्ण डेटा देगा।”

वैश्विक स्तर पर निसार क्यों है खास

वैश्विक पटल पर देखें तो दुनिया भर में जलवायु परिवर्तन से जुड़ी कई घटनाएँ अक्सर देखने को मिल रही हैं। निसार उन सभी घटनाओं की जानकारी पहले से ही संभावित करेगा। इससे आपदा प्रबंधन के साथ कई घटनाओं को होने से पहले ही रोका जा सकेगा।

निसार भूकंप, भूस्खलन, बाढ़, ज्वालामुखी विस्फोट और तूफानों की लगभग वास्तविक समय में निगरानी करेगा। इससे आपातकालीन सेवाएँ तेजी से काम करेंगी। वैज्ञानिकों को जलवायु मॉडल को बेहतर बनाने और क्षेत्रीय प्रभावों को समझने में मदद मिलेगी।

निसार कृषि और जलवायु परिवर्तन पर असर की भी निगरानी करने में सक्षम है। फसल वृद्धि, भूमि उपयोग और सिंचाई स्तर की निगरानी कर फसल उत्पादन का पूर्वानुमान, जल प्रबंधन और सूखे की पहचान पहले से किया जा सकेगा।

इसके अलावा ये सेटेलाइट भूमि धंसने और संरचनात्मक ढाँचों में होने वाले बदलावों को देख सकेगा। इससे पुलों, सड़कों और बांधों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकेगी।

वन और जैव विविधता संरक्षण में भी निसार बाहद कारगर सिद्ध होगा। इससे वनों की कटाई और प्राकृतिक आवासों की निगरानी संभव होगी। इसके जरिए अवैध कटाई और संकटग्रस्त प्रजातियों की भी पहचान की जा सकती है।

यह मिशन भारत को वैश्विक जलवायु वार्ताओं में एक डेटा-संपन्न और तकनीकी रूप से सक्षम भागीदार बनाने में मदद करेगा। ये मिशन इस बात को सिद्ध करता है कि भारत अब केवल डेटा उपभोक्ता नहीं, बल्कि डेटा प्रदाता और नीति निर्माता की भूमिका में आ गया है।

पश्चिम बंगाल में जोड़े जा रहे थे फर्जी वोटर, चुनाव आयोग ने सैंपल चेकिंग में पकड़ी गड़बड़ी: जाँच के आदेश, SIR का विरोध कर रहीं हैं CM ममता

पश्चिम बंगाल में वोटरलिस्ट में बड़ा फर्जीवाड़ा चुनाव आयोग ने पकड़ा है। यहाँ चुनाव आयोग ने पाया है कि बड़ी मात्रा में फर्जी वोटर फॉर्म को स्थानीय अधिकारी जमा कर रहे थे। यह काम बंगाल के कुछ जिलों में हो रहा था। दो अधिकारियों ने यह माना भी है कि उन्होंने बड़ी संख्या में फर्जी फॉर्म भी जमा किए।

पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने 28 जुलाई, 2025 को सभी जिला निर्वाचन अधिकारियों को संबोधित एक पत्र में लिखा, “निरंतर अपडेशन के दौरान ERO द्वारा 1% से कम फॉर्म 6 निपटान की सैंपल जाँच में सामने आया है कि कि दो लोगों ने फर्जी मतदाताओं के लिए काफी संख्या में फॉर्म 6 स्वीकार किए थे।”

चुनाव आयोग ने बताया कि इन दो ERO अधिकारियों ने स्वीकार किया है कि उन्होंने अपने से निचले अधिकारियों को चुनाव आयोग पोर्टल का एक्सेस दिया था। यहाँ ERO.net पोर्टल पर ‘डाटा एंट्री ऑपरेटरों’ ने फॉर्म 6 के आवेदन निपटा दिए।

भारतीय जनता पार्टी के आईटी सेल के राष्ट्रीय संयोजक अमित मालवीय ने एक्स पर ट्वीट करते हुए कहा है,”ममता बनर्जी द्वारा बूथ लेवल अधिकारियों को खुलेआम धमकी देने और उन्हें भारत के चुनाव आयोग के निर्देशों का पालन न करने के लिए कहने के कुछ ही दिनों बाद, पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय ने नियमित मतदाता सूची जाँच और नमूना सर्वेक्षणों के दौरान गंभीर अनियमितताओं को चिन्हित किया है।”

और भी गंभीर बात यह है कि इन मामलों में बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) से फॉर्म की सत्यापन प्रक्रिया को बिना किसी जरूरी कारण के हटा दिया गया। एक जैसे दस्तावेज कई फॉर्मों में इस्तेमाल किए गए और उनकी जाँच रिपोर्ट भी एक जैसी दिखाई दी।

इस गंभीर गड़बड़ी को देखते हुए CEO ने तत्काल जाँच के आदेश दिए हैं। सभी DEOs को निर्देश दिया गया है कि वे वरिष्ठ अधिकारियों की एक टीम बनाकर पिछले एक साल में निपटाए गए सभी फॉर्म 6 की सैंपल जाँच करें। यह रिपोर्ट 14 अगस्त 2025 तक अनिवार्य रूप से CEO को भेजनी होगी।

CEO ने अपने पत्र में यह भी कहा है कि दोषियों के खिलाफ उचित कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।

पश्चिम बंगाल में वोटर लिस्ट जाँच पर हो रही बात

राज्य चुनाव आयोग की वेबसाइट पर स्पेशल इन्टेंशिव रीवीजन (SIR) 2002 के डेटा के प्रकाशन के साथ ही राज्य में मतदाता सूची की समीक्षा की अटकलें तेज हो गई हैं। माना जा रहा है कि अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले राज्य चुनाव आयोग मतदाता सूची को अपडेट कर सकता है।

बिहार में चुनाव आयोग ने SIR प्रक्रिया करवाई है। यहाँ अक्टूबर-नवंबर 2025 में विधानसभा चुनाव होने हैं। राजद, कॉन्ग्रेस और तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने इस प्रक्रिया का कड़ा विरोध किया है। उन्होंने दावा किया है कि यह मतदाता सूची के बहाने राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) को गुपचुप तरीके से लागू करने की कोशिश है।

TMC सांसद महुआ मोइत्रा समेत कई विपक्षी नेताओं ने इस मुद्दे को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती भी दी। हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रक्रिया पर रोक लगाने से इनकार कर दिया और कहा कि यह मतदाता सूची को अपडेट करने की नियमित प्रक्रिया है। कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग को यह करने का पूरा अधिकार है।

बिहार में SIR के बाद करीब 65 लाख नाम मतदाता सूची से हटाए गए थे। इससे पहले 21 जुलाई 2025 को पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने स्पष्ट रूप से कहा था कि वह अपने राज्य में SIR प्रक्रिया नहीं होने देंगी।

भाजपा ने पश्चिम बंगाल में फर्जी मतदाताओं को लेकर जताई चिंता

भाजपा नेता सुवेंदु अधिकारी ने हाल ही में आरोप लगाया था कि बांग्लादेश से सटी पश्चिम बंगाल की सीमावर्ती जिलों में मतदाता आवेदन की संख्या में अचानक तेजी आई है। उनका कहना है कि यह बढ़ोतरी राज्य प्रशासन द्वारा जिला अधिकारियों को डोमिसाइल (स्थायी निवास) प्रमाणपत्र जारी करने के निर्देश देने के बाद देखने को मिली है।

सुवेंदु अधिकारी ने चुनाव आयोग (ECI) को पत्र लिखकर माँग की है कि अगर 2026 के विधानसभा चुनावों से पहले राज्य में कोई विशेष पुनरीक्षण (SIR) किया जाता है, तो 25 जुलाई 2025 या उसके बाद जारी किए गए डोमिसाइल प्रमाणपत्रों को मान्य नहीं माना जाए।

बीजेपी लंबे समय से पश्चिम बंगाल में फर्जी और डुप्लिकेट वोटरों का मुद्दा उठाती रही है। फरवरी 2024 में सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व में बीजेपी के छह सदस्यों का एक प्रतिनिधिमंडल राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) से मिला और 16 लाख फर्जी या दोहरे वोटरों की शिकायत की। उन्होंने चुनाव आयोग से तुरंत कार्रवाई की माँग की।

इसके अलावा, दिसंबर 2023 में झारखंड के गोड्डा से बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने संसद में बांग्लादेशी अवैध घुसपैठियों का मुद्दा उठाया था और केंद्र सरकार से जल्द से जल्द राष्ट्रीय नागरिक पंजी (NRC) लागू करने की माँग की थी।