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इंदिरा-इंदिरा का भोंपू बजाने वाले क्या बाबू जगजीवन राम को दलित होने की देते हैं सजा? बांग्लादेश ने मुक्ति के लिए दिया सम्मान, पर कॉन्ग्रेस की कब मिटेगी नफरत

संसद के मानसून सत्र में लगातार ऑपरेशन सिंदूर पर चर्चा हो रही है। लोकसभा में इस चर्चा के दौरान राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी.. अपनी दादी इंदिरा गाँधी को ‘आयरन लेडी’ बताते रहे। लेकिन सच्चाई क्या है? सच्चाई यह है कि कॉन्ग्रेस द्वारा बाबू जगजीवन राम का क्रेडिट छीन लिया गया। आज बहुत कम लोग उनका नाम जानते हैं।

कॉन्ग्रेस ने दलित नेता जगजीवन राम को उनका हकदार क्रेडिट नहीं दिया। सारा क्रेडिट इंदिरा गाँधी को दिया जाता है। जबकि क्रेडिट सेना को मिलना चाहिए था, और उस समय के रक्षा मंत्री जगजीवन राम को भी। एलजेपी सांसद शांभवी चौधरी ने लोकसभा में इस बात का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस दलितों की मसीहा बनती है, लेकिन अपने ही दलित नेता के योगदान को छिपाती है।

बाबू जगजीवन राम और बांग्लादेश मुक्ति संग्राम

1971 का भारत-पाकिस्तान युद्ध भारतीय सेना की बहादुरी, अटूट हौसले और सफलता का सबसे अच्छा उदाहरण है। 16 दिसंबर को विजय दिवस मनाया जाता है, जब भारतीय सेना ने बांग्लादेश को पाकिस्तान की जुल्मों से आजाद कराया और इतिहास व भूगोल दोनों बदल दिए। बांग्लादेश का जन्म हुआ। कॉन्ग्रेस पार्टी के प्रमुख दलित चेहरे और पूर्व उप-प्रधानमंत्री स्वर्गीय बाबू जगजीवन राम को इस युद्ध के नायकों में से एक माना जाता है। लेकिन कॉन्ग्रेस ने गाँधी परिवार को महान बनाने के चक्कर में उन्हें बहुत कम सम्मान दिया।

1971 में पाकिस्तान के तानाशाह जनरल याह्या खान की जुल्म और अत्याचार से पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) टूट रहा था। भारत भी प्रभावित हुआ। करीब एक करोड़ शरणार्थी बांग्लादेश से भारत आए। जैसे-जैसे संकट बढ़ा, भारत ने पाकिस्तान के उस हिस्से की मदद करने का फैसला किया। देश की तीनों सेनाओं ने रक्षा मंत्रालय और रक्षा मंत्री के नेतृत्व में अटूट बहादुरी दिखाई।

बाबू जगजीवन राम ने फ्रंट से किया नेतृत्व

बाबू जगजीवन राम की 1971 युद्ध में भूमिका बहुत महत्वपूर्ण थी। बांग्लादेश ने कॉन्ग्रेस नेता और तत्कालीन रक्षा मंत्री बाबू जगजीवन राम को इस युद्ध का नायक माना। भारतीय सेना में सिर्फ देशभक्ति का जोश नहीं था, बल्कि यह युद्ध भारत की बजाय दूसरे देश के लिए लड़ा गया। जगजीवन राम ने सेना के जवानों का मनोबल बढ़ाने और उनमें विश्वास जगाने में बड़ी भूमिका निभाई। 1970 में रक्षा मंत्री बनने के बाद से ही भारत-पाकिस्तान युद्ध का खतरा बढ़ रहा था।

इस दौरान पश्चिम पाकिस्तान (आज का पाकिस्तान) पूर्वी पाकिस्तान पर बड़े-बड़े अत्याचार कर रहा था। जगजीवन राम की बेटी और पूर्व लोकसभा स्पीकर मीरा कुमार ने 16 दिसंबर 2016 को ‘1971 भारत-पाकिस्तान युद्ध: बांग्लादेश की मुक्ति’ नामक कार्यक्रम में हिस्सा लिया। यह कार्यक्रम इंडियन वॉर वेटरन्स एसोसिएशन, इंडिया फाउंडेशन और नेहरू मेमोरियल म्यूजियम एंड लाइब्रेरी के साथ मिलकर आयोजित हुआ था। मीरा कुमार ने अपने भाषण में बताया कि उनके पिता के नेतृत्व में की गई तैयारियाँ कितनी महत्वपूर्ण थीं।

मीरा कुमार ने कहा कि जगजीवन राम रक्षा मंत्री बनने के बाद पूरे देश में घूमे और सेना से मिले। उन्होंने कहा, “हमारी इतिहास, परंपरा या जड़ों में पहले हमला करने की आदत नहीं है। लेकिन अगर युद्ध थोपा गया, तो यह भारत की जमीन पर नहीं होगा। हम दुश्मन को पीछे धकेलेंगे और उनके क्षेत्र पर लड़ेंगे।” उन्होंने हर दो-तीन दिन में संसद में स्थिति और युद्ध तैयारियों पर ब्रीफिंग दी।

बाबू जगजीवन राम हर दो-तीन दिन में सार्वजनिक भाषण देते, लोगों को राष्ट्रीय घटनाओं और युद्ध योजनाओं की जानकारी देते। शहरों और गाँवों में सबको कहते, “डरने की कोई बात नहीं। हम इस युद्ध को ऐतिहासिक बना देंगे।” उन्होंने देश में जरूरी माहौल बनाया। मीरा कुमार ने बताया कि जगजीवन राम कहते थे, “आप किसी व्यक्ति का सम्मान करें या न करें, लेकिन सैनिक को देखकर सम्मान जरूर करें, क्योंकि अमूर्त चीज के लिए जान देना आम बात नहीं है।”

देश की रक्षा सिर्फ सीमा पर सेना का लड़ना नहीं है। रक्षा का मतलब है कि हर व्यक्ति देश और उसके सम्मान की रक्षा करे। जगजीवन राम को बांग्लादेश की मुक्ति बहिनी पर भी भरोसा था। उन्होंने भारतीय सेना को निर्देश दिया कि दुश्मन क्षेत्र में घुसते समय घनी आबादी वाली जगहों से दूर रहें, ताकि लोगों को असुविधा न हो।

मीरा कुमार ने कहा कि पाकिस्तानी सेना की क्रूरता इतिहास में दर्ज है, लेकिन भारतीय सेना पर ऐसी कोई शिकायत नहीं आई। उन्होंने इस युद्ध को सम्मानजनक बताया। यह युद्ध इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि इससे बांग्लादेश बना और इतिहास-भूगोल बदल गया।

93,000 पाकिस्तानी सैनिकों ने आत्मसमर्पण किया। पहली बार भारतीय नौसेना ने किसी युद्ध में हिस्सा लिया। पहले युद्धों में सिर्फ थलसेना और वायुसेना शामिल हुई थीं। ऑपरेशन ट्राइडेंट भारतीय नौसेना का पहला और सबसे सफल अभियान था। इसमें पाकिस्तान की रीढ़ कराची को नुकसान पहुँचाया गया, जिससे उनका मनोबल टूट गया। इसी युद्ध में लेफ्टिनेंट जनरल आमिर अब्दुल्ला खान नियाजी ने 93,000 सैनिकों के साथ भारत के सामने आत्मसमर्पण किया।

बांग्लादेश मुक्ति संग्राम से जुड़े इन महत्वपूर्ण तथ्यों के बारे में देश को पता न चलने की वजह कॉन्ग्रेस का परिवारवाद है। पार्टी ने ऐतिहासिक घटनाओं का क्रेडिट सिर्फ नेहरू-गाँधी परिवार को दिया। इसी वजह से जगजीवन राम का नाम युद्ध के रिकॉर्ड से गायब हो गया। दलितों की ‘मसीहा’ बनने वाली कॉन्ग्रेस ने अपने दलित नेता की उपलब्धि पर ध्यान नहीं दिया। अगर बांग्लादेश ने जगजीवन राम को युद्ध नायक न बताया होता, तो यह सच्चाई कभी सामने न आती।

बांग्लादेश ने जगजीवन राम के योगदान को उजागर किया। अगर बांग्लादेश ने ध्यान न दिलाया होता, तो जगजीवन राम का योगदान कभी पता न चलता। 2012 में बांग्लादेश की आजादी के 41 साल बाद प्रधानमंत्री शेख हसीना के समय में उनकी भूमिका सामने आई। बांग्लादेश ने 1971 के पाकिस्तान युद्ध में तत्कालीन रक्षा मंत्री जगजीवन राम को ‘महत्वपूर्ण’ माना। उन्होंने प्रशंसा पत्र लिखा।

बांग्लादेश की ओर से जारी प्रशंसा में कहा गया, “उन्होंने बांग्लादेश और भारतीय सेनाओं की ‘संयुक्त कमान’ बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिससे अंतिम हमले में जीत मिली।” इसमें आगे लिखा गया, “उन्होंने बांग्लादेशी स्वतंत्रता सेनानियों को प्रशिक्षण, हथियार और आपूर्ति देकर युद्ध रणनीति को मजबूत किया। लेकिन राजनीतिक इतिहास उन्हें 16 दिसंबर 1971 के संसद भाषण के लिए ज्यादा याद रखेगा, जिसमें उन्होंने स्वतंत्र बांग्लादेश के उदय की घोषणा की।”

जगजीवन राम के संसद भाषण का जिक्र भी पत्र में है। उन्होंने कहा, “मुझे एक घोषणा करनी है। पश्चिम पाकिस्तान की सेना ने बांग्लादेश के सामने बिना शर्त आत्मसमर्पण कर दिया। ढाका अब स्वतंत्र देश की राजधानी है।” पाकिस्तान के संयुक्त भारत-बांग्लादेश बलों के सामने आत्मसमर्पण के कुछ मिनट बाद ही जगजीवन राम ने संसद में भाषण दिया।

बांग्लादेश ने किया बाबू जगजीवन राम का सम्मान

साल 2012 में बांग्लादेश ने उन्हें सम्मानित किया। मीरा कुमार के बेटे और जगजीवन राम के पोते अंशुल कुमार वहाँ मौजूद थे। 20 अक्टूबर 2012 को बंगबंधु इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस हॉल में राष्ट्रपति मोहम्मद जिल्लुर रहमान और प्रधानमंत्री शेख हसीना ने सम्मान दिया। अंशुल ने कहा, “उल्लेखनीय बात है कि वे (जगजीवन राम) कभी युद्ध नहीं चाहते थे, सिर्फ न्याय चाहते थे, क्योंकि पाकिस्तानी सैनिकों ने बांग्लादेश में नरसंहार किया और भारत पर हमला किया।” सुरक्षा विशेषज्ञों ने भी जगजीवन राम के नेतृत्व की सराहना की।

इस समारोह में पूर्व प्रधानमंत्री आईके गुजराल, जगजीवन राम और कर्नल (रिटायर्ड) अशोक तारा समेत 61 ‘विदेशी मित्रों’ को सम्मानित किया गया। अशोक तारा ने शेख हसीना और उनके परिवार को पाकिस्तानी सेना की कैद से बचाया था। कई बुजुर्ग व्हीलचेयर पर आए। कुछ को मरणोपरांत सम्मान मिला। गुजराल और नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री गिरिजा प्रसाद कोइराला को ‘बांग्लादेश लिबरेशन वॉर ऑनर’ दिया गया। बाकी को ‘फ्रेंड्स ऑफ लिबरेशन वॉर’ सम्मान। 61 में 51 भारतीय थे, जिनमें सेना के वेटरन्स, सहायता कार्यकर्ता, राजनेता, पत्रकार, कलाकार और राजनयिक शामिल थे।

स्वतंत्रता सेनानी से बांग्लादेश के जनक तक का सफर

जगजीवन राम का जन्म 5 अप्रैल 1908 को हुआ। वे दलित समुदाय से थे और सामाजिक न्याय के योद्धा थे। स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रहे। आजादी के बाद कई महत्वपूर्ण पदों पर रहे, जैसे रक्षा मंत्री (1970-74), कृषि मंत्री (1974-77)। 1971 युद्ध में उनकी भूमिका भारत की जीत में निर्णायक थी। वे सबसे लंबे समय तक कैबिनेट मंत्री रहे। लेकिन कॉन्ग्रेस ने उनका योगदान छिपाया, क्योंकि परिवारवाद हावी था। आज भी दलित नेता होने के बावजूद उन्हें उचित सम्मान नहीं मिलता।

मीरा कुमार ने अपने भाषण में बताया कि जगजीवन राम ने युद्ध के बाद दो साल तक रक्षा मंत्री बने रहकर जवानों की देखभाल की। वे प्रत्येक जवान की तरह परिवार की तरह देखते थे। उन्होंने जिनेवा कन्वेंशन का पालन किया और PoW को अच्छा व्यवहार दिया। अमेरिकी सातवें फ्लीट के आने पर भी वे आश्वस्त रहे।

सुरक्षा विशेषज्ञ कहते हैं कि जगजीवन राम का नेतृत्व बेजोड़ था। उन्होंने मुक्ति बहिनी से संपर्क रखा, हथियार दिए। युद्ध में समन्वय, लॉजिस्टिक्स और कमांड चेन को संभाला। जनरल नियाजी का मनोबल टूटा, जिससे आत्मसमर्पण हुआ।

कॉन्ग्रेस को दलित नेताओं के क्रेडिट को खाने का इतिहास

कॉन्ग्रेस का यह रवैया दिखाता है कि वे दलितों के नाम पर वोट लेते हैं, लेकिन उनके नेताओं को क्रेडिट नहीं देते। जगजीवन राम जैसे नायक को भुला दिया गया। आज नई पीढ़ी को उनकी कहानी पता होनी चाहिए। शांभवी चौधरी जैसे सांसदों ने इसे उठाया, ताकि सच्चाई सामने आए। 1971 युद्ध सिर्फ सैन्य जीत नहीं, बल्कि मानवता की जीत था, जिसमें जगजीवन राम का बड़ा हाथ था।

स्ट्रेंजर ऑफ़ नेशन, Strangers Of The Nation 2… ऐसे ही एकाउंट्स से जिहाद फैलाती थी शमा परवीन: फेसबुक-इंस्टाग्राम पर अलकायदा के लिए जुटाए 10000+ फॉलोअर, गुजरात ATS ने अब पकड़ा

गुजरात ATS ने अल-कायदा से जुड़ी लेडी मास्टरमाइंड शमा परवीन को गिरफ्तार किया है। 30 साल की शमा परवीन कुछ समय से बेंगलरु में रह रही थी और उसके सोशल मीडिया अकाउंट पर एटीएस की नजर थी। अलकायदा इन द इंडियन सबकॉन्टिनेंट (AQIS) से जुड़े आतंकी मॉड्यूल की शमा परवीन अहम सदस्य है।

22 जुलाई को इस मॉड्यूल से जुड़े 4 लोगों को गिरफ्तार किया था, जिससे पूछताछ में पता चला था कि ये लोग इंस्टाग्राम के जरिए एक दूसरे से जुड़े थे और ये इंस्टाग्राम अकाउंट्स शमा परवीन का था। इस अकाउंट के 10000 से ज्यादा फॉलोअर्स हैं। झारखंड की रहने वाली परवीन पाकिस्तान से कट्टरपंथी नेटवर्क से जुड़ी रही है और बेंगलुरु में रहते हुए ऑनलाइन आतंकी गतिविधियों का प्रचार कर रही थी।

बुधवार (30 जुलाई 2025) को प्रेस कॉन्फ्रेंस में सुरक्षा एजेंसियों ने खुलासा किया कि हाल ही में अल-कायदा से जुड़े आतंकवादियों से पूछताछ के दौरान सोशल मीडिया पर सक्रिय कुछ संदिग्ध अकाउंट की जानकारी सामने आई है।

इनमें ‘strangers_nation02’, ‘Strangers Of The Nation’ और ‘Strangers Of The Nation 2’ नाम के प्रोफाइल शामिल हैं, जिनके माध्यम से आतंकी संगठन अल-कायदा से संबंधित सामग्री साझा की जाती थी और उन पर चर्चाएँ की जाती थी।

इन प्रोफाइल्स की जाँच के बाद बेंगलुरु से शमा परवीन को गिरफ्तार किया गया। बीकॉम ग्रेजुएट शमा परवीन से शुरुआती पूछताछ में यह भी बात सामने आई है कि वह कई पाकिस्तानी व्हाट्सएप अकाउंट्स के संपर्क में थी।

रिपोर्ट के अनुसार, एजेंसियाँ अब इस बात की जाँच कर रही हैं कि उसका नेटवर्क कितना फैला हुआ है और उसकी भूमिका किस हद तक गंभीर थी। अहमदाबाद से मोहम्मद फरदीन, दिल्ली से मोहम्मद फैक, नोएडा से जीशान अली और गुजरात के अरावली जिले के मोडासा से सेफुल्लाह कुरैशी की गिरफ्तारी के बाद हुई है।

इन चारों पर इंस्टाग्राम और फेसबुक के जरिए AQIS से जुड़ी कट्टरपंथी सामग्री को कथित तौर पर बढ़ावा देने के लिए गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम, 1967 और भारतीय न्याय संहिता (BNS) की कई धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया था।

ATS ने उसे कोर्ट में पेश कर ट्रांजिट रिमांड पर लिया है। शमा AQIS मॉड्यूल में गिरफ्तार होने वाली पहली महिला आतंकी है। गुजरात के गृह राज्य मंत्री हर्ष सांघवी के अनुसार, शमा परवीन पूरी तरह कट्टरपंथी थी और पाकिस्तान में मौजूद अपने हैंडलर्स से सीधे संपर्क में थी।

वह सोशल मीडिया पर आतंकी कंटेंट साझा करती थी और युवाओं को भड़काने व भर्ती करने में सक्रिय भूमिका निभा रही थी।

गुजरात ATS के मुताबिक, वह अल-कायदा के देशव्यापी हमले की साजिश में शामिल थी और उसका लिंक गुजरात के अल-कायदा मॉड्यूल से था। फिलहाल वह ट्रांजिट रिमांड पर है और पूछताछ जारी है। शमा परवीन अल-कायदा मॉड्यूल से जुड़ी पहली महिला आतंकी है।

हरिद्वार में विशालकाय मस्जिद बनाई, खड़ी कर दी ऊँची मीनार… लेकिन नहीं ली कोई अनुमति: CM धामी के एक्शन के बाद रुका निर्माण, कागज दिखाने को भी कहा

उत्तराखंड के हरिद्वार में अवैध रूप से बनाई जा रही बड़ी मस्जिद का काम रोक दिया गया है। इसका निर्माण मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के आदेश पर रोका गया है। इस मस्जिद को बनाने की अनुमति तक नहीं ली गई थी। इसका निर्माण उस हरिद्वार जिले में हो रहा था, जो हिन्दू आस्था का केंद्र है।

यह मस्जिद हरिद्वार के नगर पंचायत सुल्तानपुर में बनाई जा रही है। ऊँची-ऊँची मीनारों वाली इस मस्जिद में तेजी से काम चल रहा था। इसको लेकर हिन्दुओं ने चिंता जताई। इसके बाद मुख्यमंत्री धामी ने इस पर रिपोर्ट माँगी। मुख्यमंत्री के रिपोर्ट माँगने के बाद यहाँ हरिद्वार के DM ने निर्माण कार्य रुकवा दिया।

हरिद्वार के डीएम मयूर दीक्षित ने इस मस्जिद के निर्माण स्थान का दौरा भी किया। उन्होंने इसके बाद बताया कि कुछ दिनों पहले मीडिया के जरिये सुल्तानपुर में इस मस्जिद निर्माण की सूचना मिली थी और पता चला था कि उसकी मीनार काफी ऊँची हैं।

उन्होंने आगे बताया कि अब सुल्तानपुर में निर्माण मस्जिद का काम रुकवा दिया गया है और मस्जिद की जमीन और निर्माण संबंधी दस्तावेज दिखाने के लिए नोटिस जारी किया जा रहा है। डीएम दीक्षित ने यह भी बताया कि इसको लेकर प्रशासनिक अधिकारियों ने मस्जिद कमिटी से कागज दिखाने तक निर्माण रोकने के लिए भी हाल ही में बैठक की थी।

इस मामले में एक्शन हिन्दू संगठनों और साधु-संतों के आवाज उठाने के बाद हुआ है। उन्होंने ही मुख्यमंत्री धामी से इस मस्जिद के निर्माण पर रोक लगाने की माँग की थी। हालाँकि, निर्माण रुकने के बाद हिन्दू संगठन लगातार इस बात की जाँच की माँग कर रहे है कि इतनी बड़ी मस्जिद बनाने का पैसा कहाँ से आ रहा है।

उन्होंने विदेशी फंडिंग की जाँच करवाने की माँग की है। यह मस्जिद जिस तहसील में बन रही है वहाँ पहले भी कई अवैध ढांचों पर कार्रवाई हो चुकी है। धामी सरकार राज्य में 500 से अधिक अवैध मजार भी ध्वस्त करवा चुकी है।

ऑपरेशन सिंदूर के समय भारत विरोधी प्रोपेगेंडा कर रहा था वाशिंगटन पोस्ट, भारतीय मीडिया को बदनाम करने के चक्कर में खुद हो गया एक्सपोज: अब स्वीकारी गलती, लेख में भी किया बदलाव

ऑपरेशन सिंदूर की कवरेज पश्चिमी मीडिया के लिए किसी उत्सव से कम नहीं थी, मानो क्रिसमस से पहले ही उन्हें भारत पर लगातार हमला करने का मौका मिल गया हो। हालाँकि, ऐसा करते हुए वे खुद भी गलत सूचना और फर्जी खबरें फैलाने लगे। 

द वाशिंगटन पोस्ट (WaPo) ने भारतीय मीडिया पर युद्धकाल में गलत जानकारी फैलाने का आरोप लगाया, लेकिन इसी कोशिश में वो खुद वही गलती कर बैठा। उसने भी संदिग्ध स्रोतों पर भरोसा किया, स्थानीय भाषा का गलत अनुवाद किया और बिना पुष्टि के जानकारी प्रकाशित की।

एक सुधार जो मूल कहानी से कहीं अधिक कहता है

वॉशिंगटन पोस्ट ने 4 जून 2025 को एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी जिसका शीर्षक ‘How misinformation overtook Indian newsrooms amid conflict with Pakistan’ था। यह रिपोर्ट पत्रकार करिश्मा मेहरोत्रा ने लिखी थी। इसमें भारतीय मीडिया, खासकर टीवी न्यूज चैनलों पर आरोप लगाया गया कि उन्होंने भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव के समय झूठी खबरें और नाटकीय दावे दिखाए। रिपोर्ट में कहा गया कि भारतीय चैनलों ने फर्जी वीडियो और अपनी जीत के बयान बढ़ा-चढ़ाकर चलाए।

लेकिन अब उसी रिपोर्ट में वॉशिंगटन पोस्ट ने चुपचाप एक सुधार (correction) जोड़ा है, जिससे यह साफ हुआ कि उन्होंने खुद पत्रकारिता संबंधी एक बड़ी गलती की थी।

रिपोर्ट की सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि एक भारतीय पत्रकार को व्हाट्सऐप पर यह संदेश मिला कि पाकिस्तान के सेना प्रमुख को तख्तापलट (कूप) में गिरफ्तार कर लिया गया है। वॉशिंगटन पोस्ट ने दावा किया कि यह मैसेज प्रसार भारती (भारत की सरकारी प्रसारण संस्था) से आया था। उन्होंने भारतीय पत्रकारों को यह कहकर दोषी ठहराया कि उन्होंने बिना जाँच किए इस खबर को आगे बढ़ाया।

पर अब वॉशिंगटन पोस्ट ने माना है कि वह व्हाट्सऐप मैसेज प्रसार भारती के आधिकारिक चैनल से आया ही नहीं था। वह मैसेज केवल किसी एक व्यक्ति के दावे पर आधारित था। इसका ना कोई प्रमाण था और ना कोई दूसरा स्रोत। यह सिर्फ व्हाट्सऐप पर आया एक कथित मैसेज था।

अपनी सुधार सूचना में अब वॉशिंगटन पोस्ट ने कहा है कि वह मैसेज ‘प्रसार भारती के एक कर्मचारी’ द्वारा भेजा गया था। लेकिन यह नहीं बताया गया कि वह कर्मचारी कौन था, उसका पद क्या था, या वह जानकारी कितनी विश्वसनीय थी।

प्रसार भारती ने भी एक बयान जारी कर कहा है कि उसने ऐसी कोई झूठी जानकारी अपने किसी प्लेटफॉर्म पर साझा नहीं की थी। संस्था ने यह भी कहा कि उसके पास एक सख्त फैक्ट-चेकिंग सिस्टम है और वह केवल जाँची-परखी खबरें ही जारी करता है।

चुपचाप हटा दिए गए भारतीय चैनलों पर से झूठे आरोप

यहाँ से लेख ने एक और झूठ की ओर रुख किया। वॉशिंगटन पोस्ट ने TV9 भारतवर्ष पर एक झूठा आरोप लगाया कि चैनल ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के आत्मसमर्पण की खबर चलाई थी। बाद में चुपचाप इस दावे को लेख से हटा दिया गया।

एक Pulitzer जीतने की चाह रखने वाला न्यूजरूम यह उम्मीद तो कर ही सकता है कि वह ऐसे गंभीर आरोप लगाने से पहले जानकारी की अच्छी तरह जाँच कर ले। लेकिन लगता है कि ये नियम सिर्फ दूसरों पर लागू होते हैं उन पर नहीं जो खुद आरोप लगा रहे हैं। पत्रकारिता में सच्चाई की जाँच जरूरी है, लेकिन वॉशिंगटन पोस्ट ने खुद यह नियम तोड़ा।

सूडान के वे दृश्य जो कभी प्रसारित नहीं हुए

रिपोर्ट में यह झूठा दावा भी किया गया था कि भारतीय समाचार चैनलों ने सूडान संघर्ष के दृश्य प्रसारित किए, जो फिर से झूठ निकला। अब संशोधित संस्करण में उस पंक्ति को हटा दिया गया है।

अनुवाद में खोकर हिंदी वाक्यांशों का गलत अनुवाद

फिर सबसे अहम बात जो सामने आई वह था हिंदी शब्दों का गलत अनुवाद। वॉशिंगटन पोस्ट ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि भारतीय न्यूज चैनलों ने बताया था ‘पाकिस्तान के बड़े शहर तबाह कर दिए गए हैं।’ लेकिन यह बात बाद में गलत साबित हुई और उन्हें इसे सुधारना पड़ा।

असल में जो लोग भारतीय चैनल देखते हैं या जिन्हें थोड़ी भी हिंदी समझ आती है, वो जानते हैं कि चैनलों पर ‘कराची में तबाही’ जैसे शब्दों का मतलब होता है कि वहाँ अफरा-तफरी या हंगामा मचा है, इसका ये मतलब नहीं होता कि पूरा शहर मिटा दिया गया है।

लेकिन वॉशिंगटन पोस्ट ने ‘तबाही’ का सीधा मतलब complete destruction (पूरी तरह बर्बाद हो जाना) निकाला। लगता है उन्होंने या तो Google Translate का इस्तेमाल किया या फिर किसी AI टूल से शब्द दर शब्द अनुवाद करवा लिया था। शायद वॉशिंगटन पोस्ट के पास फ्रीलांस पर भी कोई ऐसा कर्मचारी रखने का बजट नहीं है, जो भारतीय भाषाओं को समझता हो।

विडंबना का एक सबक

एक ऐसा लेख, जिसे भारतीय मीडिया में गलत जानकारी को उजागर करने के लिए लिखा गया था, खुद ही एक उदाहरण बन गया कि कैसे झूठी या भ्रामक बातें कभी-कभी मशहूर पश्चिमी मीडिया संस्थानों में भी छप जाती हैं।

यह रिपोर्ट जो भारतीय न्यूज चैनलों को शर्मिंदा करने के इरादे से लिखी गई थी, अंत में खुद ही अपनी संपादकीय प्रक्रिया की कमजोरी को उजागर कर बैठी। ऐसे में बेहतर तो यहीं होगा कि वॉशिंगटन पोस्ट दूसरों पर उँगली उठाने से पहले खुद अपनी पत्रकारिता और नैतिकता पर ध्यान दे और आत्ममंथन करे।

इस खबर को मूल रूप से अंग्रेजी में अनुराग ने लिखा है। इसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें। इसका अनुवाद सौम्या सिंह ने किया है।

दलित से शादी करने वाले की नहीं बदल जाती जाति, इसके बाद भी हो सकता है SC/ST का केस: हिमाचल हाई कोर्ट, कहा- जन्म के समय ही निर्धारित हो जाती है जाति

हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने कहा है कि अगर कोई महिला दलित व्यक्ति से शादी करती है, तो भी एससी-एसटी एक्ट के तहत कार्रवाई से नहीं बच सकती है। कोर्ट ने ये फैसला राज्य सरकार बनाम सरोजनी मामले में निचली अदालत के फैसले को खारिज करते हुए कही है। कोर्ट के मुताबिक जाति का निर्धारण जन्मजात होता है। ये विवाह से नहीं बदल सकता।

दरअसल सरोजनी ने एक दलित व्यक्ति से शादी की थी। ससुराल में झगड़े के दौरान जातिसूचक शब्द के इस्तेमाल का उस पर आरोप लगाया गया। इस मामले में निचली अदालत ने कहा कि सरोजनी ने अनुसूचित जाति के व्यक्ति से शादी की है इसलिए उस पर एससी-एसटी एक्ट नहीं लगेगा। कोर्ट ने सरोजनी को बरी कर दिया था। इस फैसले के खिलाफ राज्य सरकार ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

हाई कोर्ट के मुताबिक ऐसी शादियाँ एससी- एसटी एक्ट,1989 के तहत अपराध करने से नहीं रोकता है। राज्य सरकार बनाम सरोजनी मामले पर सुनवाई करते हुए जस्टिस राकेश कैंथला ने कहा, “जाति किसी व्यक्ति के जन्म से निर्धारित होती है, जो जीवनभर नहीं बदलती है। निचली अदालत ने ये गलत माना कि आरोपित महिला का विवाह अनुसूचित जाति के व्यक्ति से हुआ है इसलिए वह अब अनुसूचित जाति की सदस्य बन गई है।”

हाई कोर्ट ने कहा कि अनुसूचित जाति- अनुसूचित जनजाति अधिनियम 1989 की धारा 3(1)(s)अनुसूचित जाति-जनजाति के सदस्य को सार्वजनिक स्थान पर जाति का नाम लेकर गाली देने को अपराध मानती है। हाईकोर्ट ने निचली कोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए आरोपित महिला के खिलाफ फिर से मामले को तय करने के लिए वापस भेज दिया है।

इससे पहले निचली अदालत के फैसले को चुनौती देते हुए राज्य सरकार ने कहा कि जाति हमेशा एक जैसी रहती है, इसे बदला नहीं जा सकता। कोर्ट ने इससे सहमति जताते हुए कहा कि भारत में जाति का निर्धारण जन्म से ही होता है और एससी-एसटी एक्ट के तहत इसमें बदलाव की बात भी नहीं की गई है। इसलिए सरोजनी के मामले में भी ऐसा ही होगा।

आज जो म्यांमार गृहयुद्ध, तख्तापलट और नार्को-टेरिरिज्म में फँसा, वहाँ 1000 साल पहले था समृद्ध बागान साम्राज्य: बौद्ध राजवंश पर थी भारतीय संस्कृति की छाप, खूब हुआ मंदिरों का निर्माण

म्यांमार हाल ही में गृह युद्ध, सैन्य तख्तापलट, नार्को-टेररिज्म और चीन द्वारा चलाए जा रहे ऐसे कॉल सेंटर्स की वजह से सुर्खियों में है, जहाँ भारत और अन्य देशों से अगवा किए गए पर्यटक और नौकरी के तलाश में गए लोग फँसे हुए पाए गए हैं। इन गंभीर घटनाओं ने इस बौद्ध-बहुल देश के गौरवशाली अतीत को कहीं पीछे छोड़ दिया है। जबकि कभी इसे ‘स्वर्ण भूमि’ कहा जाता था।

कभी यह देश एक समृद्ध और सांस्कृतिक रूप से जीवंत सभ्यता था। यहाँ सुंदर प्राकृतिक दृश्य और सुनहरे मंदिरों की भरमार थी। लेकिन अब यह देश लगातार राजनीतिक अशांति और हिंसा से जूझ रहा है।

म्यांमार के लंबे और रोचक इतिहास में कई साम्राज्य और राजवंश आए और गए – जैसे अवा साम्राज्य, हंथवाडी राज्य और तौंगू साम्राज्य। इन सभी ने इस देश की सांस्कृतिक धरोहर और ऐतिहासिक विरासत को गहराई से प्रभावित किया और समृद्ध बनाया है।

जब बागान साम्राज्य ने जमाई जड़ें

बागान (जिसे कुछ ग्रंथों में पैगन भी कहा गया है) वंश म्यांमार का पहला ऐसा साम्राज्य था जिसने उन क्षेत्रों को एकजुट किया जो आगे चलकर वर्तमान म्यांमार (पहले बर्मा) बना। ‘म्रनमा’ या ‘बर्मन’ लोगों को ही ‘बर्मा’ और ‘म्यांमार’ नामों की उत्पत्ति का स्रोत माना जाता है। इतिहासकारों के अनुसार, बर्मन लोग तिब्बत और पश्चिमी चीन की सीमावर्ती पहाड़ियों से आए थे।

9वीं शताब्दी ईस्वी के मध्य में जब प्यू राज्य एक सैन्य संकट से जूझ रहा था, तब बर्मन लोगों ने इस अवसर का लाभ उठाया और उस क्षेत्र पर कब्जा कर लिया। उन्होंने 849 ईस्वी में बागान (Bagan) को अपनी राजधानी बनाया। हालाँकि यह कब्जा पूरी तरह से जबरदस्ती नहीं था, क्योंकि बर्मन लोगों ने प्यू संस्कृति और परंपराओं को लूटने और नष्ट करने की बजाय अपनाने की कोशिश की।

प्यू लोग पहले से ही भारत के साथ सांस्कृतिक और आर्थिक रूप से जुड़े हुए थे। वे बौद्ध धर्म को मानते थे और बर्मन लोगों ने भी यही रास्ता अपनाया। प्यू लोगों की गीली धान की खेती (wet-rice cultivation), जो आज भी इरावडी डेल्टा में होती है, बर्मन लोगों के लिए एक नई चीज थी, क्योंकि वे पहाड़ी इलाकों के अनुकूल थे जहाँ तापमान और जमीन दोनों अलग थे।

प्यिनब्या को आधुनिक इतिहासकार बागान साम्राज्य के शुरुआती राजाओं में से एक माना जाता है। उसने आने वाले दो सौ वर्षों में मध्य म्यांमार पर अधिकार कर लिया। लेकिन पारंपरिक म्यांमार के राजवंश-ग्रंथों में प्यिनब्या को बागान वंश का 33वाँ राजा बताया गया है।

जब सत्तारुढ़ होता है ‘अनावराता’

बागान एक साधारण राज्य था, लेकिन 1044 में जब अनिरुद्ध (जो बाद में अनावराता के नाम से प्रसिद्ध हुए) राजा बने, तो राज्य का भाग्य बदल गया। अनावराता, राजा पिनब्या के परपोते थे। उनके शासन में बागान न सिर्फ एक शक्तिशाली राज्य बना, बल्कि पूरे क्षेत्र की दिशा भी बदल गई।

राजा अनावराता ने अपने राज्य में सिंचाई व्यवस्था को बेहतर बनाया, जिससे बागान चावल उत्पादन में अग्रणी बन गया। इसके साथ ही उन्होंने साहसिक सैन्य अभियान भी चलाए। 1057 में उन्होंने दक्षिण में स्थित, समृद्ध और सुंदर मोन राज्य की राजधानी थाटोन पर विजय प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने पूरे इरावदी क्षेत्र को बागान के अधीन कर लिया और पहला बर्मी साम्राज्य स्थापित किया।

इस बड़ी उपलब्धि के बाद आस-पास के मोन शासक भी बर्मा की सत्ता को मानने लगे। अनावराता की सफलता सिर्फ युद्ध में नहीं थी, बल्कि सांस्कृतिक रूप से भी उनका शासन महत्वपूर्ण रहा। वे मोन परंपरा से प्रभावित थे और थेरवाद बौद्ध धर्म के समर्थक बने। उन्होंने इस धर्म को पूरे बागान क्षेत्र में फैलाया क्योंकि वे इसे एकता का माध्यम मानते थे।

बागान साम्राज्य का विस्तार और भारतीय प्रभाव

अनावराता (Anawrahta) के शासनकाल में बागान का स्वर्णकाल शुरू हुआ। मोन संस्कृति, जो भारतीय संस्कृति से गहराई से प्रभावित थी, अनावराता को बहुत प्रिय थी। उन्होंने मोन बंदरगाहों पर विजय प्राप्त कर भारी संपत्ति प्राप्त की और उसी धन से बगान को सजाने के लिए मोन इंजीनियरों, सुनारों, बढ़ईयों और कलाकारों को काम पर लगाया। मोन सभ्यता नदी परिवहन पर भी नियंत्रण रखती थी, जिससे उनका प्रभाव और अधिक बढ़ गया।

राजा अनावराता ने उस समय असंख्य मंदिरों, पगोडों और स्तूपों का निर्माण कराया। हर नया निर्माण पिछले से अधिक भव्य और विशाल होता था। इसी समय भारत का प्रसिद्ध धार्मिक महाकाव्य रामायण बर्मा (अब म्यांमार) में लोकप्रिय हुआ, जिसे बर्मी भाषा में रामा जतदाव (Rama Zatdaw) कहा गया।

इसकी कहानियाँ पहले मौखिक रूप से 13वीं शताब्दी के अंत में आवा (Ava) में प्रचलित थीं और 16वीं शताब्दी तक मौखिक परंपरा में चलती रहीं। 18वीं शताब्दी तक बौद्ध भिक्षुओं ने इसे एक महान कथा के रूप में स्वीकार किया और बगान की पुरानी मौखिक परंपराओं के आधार पर इसे गद्य, पद्य और नाट्य रूप में लिपिबद्ध किया गया।

अनावराता की मृत्यु 1077 में हुई, लेकिन बागान का स्वर्णकाल जारी रहा। व्यापार में वृद्धि के चलते मंदिरों का निर्माण तेजी से होता रहा। 1044 से 1287 ईस्वी तक बगान राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बना रहा।

लेकिन हर साम्राज्य की तरह बगान का भी पतन हुआ। 13वीं सदी के अंत में राजनीतिक और आर्थिक समस्याएँ शुरू हुईं और इसके बाद मंगोल आक्रमणों ने स्थिति को और बिगाड़ दिया। राजा नरथिहापते ने शुरू में मंगोल सम्राट कुबलई खान से कोई बातचीत नहीं की। नतीजा ये हुआ कि सन 1277 ईस्वी में बगान राज्य को नगासाउंगग्यान की लड़ाई में अप्रत्याशित हार मिली और दस साल बाद 1287 में बागान का पतन हो गया।

इसके बाद सदियों तक कई मंदिर और पगोडे त्याग दिए गए, लेकिन बगान की सांस्कृतिक विरासत समाप्त नहीं हुई। 15वीं शताब्दी में यह एक बार फिर बौद्ध तीर्थ स्थल के रूप में प्रसिद्ध हुआ और 1700 के दशक में फिर से मंदिर निर्माण शुरू हुआ।

आज भी यहाँ हजारों मंदिर, मठ और स्तूप हैं। ये स्तूप बुद्ध के अवशेषों या पवित्र वस्तुओं को संरक्षित करने वाले माउंटेन जैसे या घंटी के आकार के होते हैं। इनमें से अधिकतर ईंट और प्लास्टर से बने हुए हैं और आज भी श्रद्धा का केंद्र हैं।

बागान को यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल में किया गया शामिल

बागान एक पवित्र स्थल है जो म्यांमार में स्थित है। यह जगह बौद्ध कला और वास्तुकला का एक अनमोल खजाना है। यहाँ सदियों से थेरवाद बौद्ध परंपरा के तहत ‘पुण्य अर्जन’ (जिसे कम्माटिक बौद्ध धर्म कहा जाता है) की परंपरा चली आ रही है।

बागान का इतिहास 11वीं से 13वीं सदी के बीच के बागान काल से जुड़ा है, तब बौद्ध धर्म को राजा ने राजनीतिक नियंत्रण के एक साधन के रूप में अपनाया था। राजा ही मुख्य दाता (donor) बन गया और पुण्य अर्जन के चलते मंदिरों का निर्माण बहुत तेजी से बढ़ा। यह निर्माण कार्य 13वीं सदी में अपने शिखर पर पहुँचा।

बागान का यह क्षेत्र इरावदी नदी (Irrawaddy River) के एक मोड़ पर स्थित है और आठ हिस्सों (components) में बँटा हुआ है, इनमें से एक नदी के एक ओर है और बाकी सात दूसरी ओर।

यह क्षेत्र सिर्फ इमारतों का समूह नहीं है, बल्कि इसमें खेती, पारंपरिक सांस्कृतिक रीति-रिवाज, बौद्ध पूजा और पुण्य अर्जन की गतिविधियाँ भी शामिल हैं जो इसकी अमूर्त (intangible) सांस्कृतिक विरासत को दर्शाती हैं।

यहाँ 3,595 दर्ज स्मारक हैं, जिनमें स्तूप, मंदिर और अन्य धार्मिक ढाँचे शामिल हैं। इसके अलावा, यहाँ खुदाई से जुड़ी कई जानकारियाँ, शिलालेख, भित्ति चित्र और मूर्तियाँ भी पाई गई हैं।

बागान एक जटिल और बहुस्तरीय सांस्कृतिक स्थल है जिसमें आधुनिक शहर और आवासीय इलाके भी शामिल हैं। इसे 2019 में संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन (UNESCO) द्वारा विश्व धरोहर स्थल (World Heritage Site) घोषित किया गया था।

संस्कृति और धर्म का मिश्रण

बगान का मैदान लगभग 65 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है। यह धार्मिक महत्व से भी एक ऐतिहासिक स्थान है। यहाँ 5,000 से अधिक धार्मिक स्मारक बगान के शासकों की देखरेख में बनाए गए थे। आज भी ‘बगान पुरातात्त्विक क्षेत्र’ (Bagan Archaeological Zone) में इन मूल संरचनाओं में से 2,000 से अधिक विभिन्न स्थिति में मौजूद हैं।

इन मंदिरों और स्तूपों की दीवारों पर भगवान बुद्ध और पूर्व बुद्धों के जीवन की चित्रकारी की गई है। कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार, साम्राज्य की राजधानी रहते हुए बागान का स्वर्ण काल 250 वर्षों से अधिक चला। उस समय यहाँ 40 वर्ग मील के क्षेत्र में लगभग 10,000 धार्मिक स्मारक थे।

फोटो साभार: नेशनल ज्यॉग्राफी

इन हजारों स्मारकों में बड़े मंदिरों से लेकर छोटे एक-कक्षीय मठों तक कुछ बेहद खास और आकर्षक स्थल भी हैं। लौकानंदा पगोडा (Lawkananda Pagoda) विशेष रूप से प्रसिद्ध है, जिसे राजा अनावराता ने बनवाया था। इसका सुनहरा गुंबद और छतरी के आकार की चोटी (finial) पर्यटकों को मंत्रमुग्ध कर देती है।

कहा जाता है कि इस पैगोडा में एक अवशेष रखा है जिसे बुद्ध के दाँतों में से एक माना जाता है, इसे श्रीलंका के शासक ने प्राप्त किया था। बगान में कई गुलाबी रंग के स्तूप और मंदिर लाल मिट्टी और हरे-भरे पेड़ों के बीच में खड़े हैं। यह इरावदी नदी के किनारे पर्यटकों के लिए अद्भुत दृश्य पेश करते हैं।

यह क्षेत्र दुनिया में बौद्ध मंदिरों की सबसे बड़ी एकत्रता में से एक माना जाता है और यह इस बात का प्रमाण है कि संस्कृति और धर्म का आपसी संबंध कितना गहरा था। विद्वानों ने यह भी अध्ययन किया है कि कैसे इस धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत ने 1900 के दशक की शुरुआत में बर्मी पहचान (Burmese identity) को आकार दिया।

बागान के लिए क्या है आगे?

बागान, जो म्यांमार (बर्मा) में स्थित है, एक बहुत ही पुराना और ऐतिहासिक शहर है। 18वीं शताब्दी की ‘महा यजाविन’ और 19वीं शताब्दी की ‘ह्मानन यजाविन’ नाम की इतिहास की किताबों में बागान का इतिहास दर्ज है।

1900 के दशक की शुरुआत में बर्मी और विदेशी शोधकर्ताओं ने और सटीक जानकारी पाने के लिए नए प्रमाण ढूँढे। इन प्रमुख शोधकर्ताओं में ब्रिटिश विद्वान गॉर्डन लूज और बर्मी विद्वान यू पे मांग टिन शामिल थे। बागान का इलाका भूकंपों के लिए जाना जाता है। यहाँ कई बार तेज भूकंप आए हैं। इनमें भी 1975 और 2016 के भूकंपों ने कई मंदिरों और ऐतिहासिक इमारतों को भारी नुकसान पहुँचाया था।

1990 के दशक में म्यांमार की सैन्य सरकार ने बड़े स्तर पर पुनःनिर्माण (restoration) का काम शुरू किया और लगभग 2,229 मंदिरों और स्मारकों को संरक्षित किया। हालाँकि इस काम की कई पुरातत्वविदों (archaeologists) ने आलोचना की, क्योंकि उन्हें लगा कि यह काम ऐतिहासिक दृष्टिकोण से सही तरीके से नहीं किया गया।

बागान को 2019 में विश्व धरोहर स्थल (World Heritage Site) का दर्जा मिला। शोधकर्ताओं का मानना है कि यह दर्जा म्यांमार सरकार और विशेषज्ञों के बीच सहयोग को बढ़ावा देगा, ताकि बागान के धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सके।

बागान को अक्सर एक पुरातात्त्विक चमत्कार कहा जाता है, लेकिन यह सिर्फ एक बीता हुआ इतिहास नहीं है, बल्कि यह आज भी एक जीवित धार्मिक स्थल है। यहाँ आज भी पूजा होती है और यह स्थान स्थानीय, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय बौद्ध समुदाय के लिए बेहद पवित्र है।

बागान के संरक्षण में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (ASI) ने भी अहम भूमिका निभाई है, जिसने इस सांस्कृतिक धरोहर को सँभालने में म्यांमार की मदद की।

बागान: भारतीय धर्म और संस्कृति का मिश्रण

बागान भारत के प्रभाव का  एक जीवंत उदाहरण है, खासकर उस धर्म का जो भारत में जन्मा और फिर पूरी दुनिया में फैला, जिसमें म्यांमार भी शामिल है। यह भारत और उसकी धार्मिक परंपराओं की गहरी छाप को दर्शाता है। भारत की वह धार्मिक परंपराएँ जो सदियों से दुनिया की संस्कृतियों, परंपराओं, समाजों और सभ्यताओं को प्रभावित करती आई है और इसका प्रमाण आज भी बागान जैसे स्थानों में देखा जा सकता है।

बागान यह भी दिखाता है कि बर्मा (अब म्यांमार) के बर्मी लोग विजेता थे, जिन्होंने दूसरे राज्यों को जीतकर अपना साम्राज्य बनाया। फिर भी उन्होंने स्थानीय विरासत को अपनाया और उसे मिटाने की बजाय उसमें घुल-मिल गए।

उस समय भारत की संस्कृति और एक भारतीय मूल के धर्म का क्षेत्र में पहले से ही प्रभाव था, जिसे बर्मियों ने न केवल स्वीकार किया बल्कि उसका प्रचार भी किया। इतना ही नहीं उन्होंने उस धर्म और संस्कृति को सम्मान देने के लिए भव्य स्मारक और मंदिर भी बनवाए।

इस लेख को मूल रूप से अंग्रेजी में रुक्मा राठौर ने लिखा है। इसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें। इसका अनुवाद सौम्या सिंह ने किया है।

पाकिस्तान ने करवाया पहलगाम में हिंदुओं का नरसंहार, UNSC ने आतंकी सैंक्शन रिपोर्ट में TRF का नाम किया शामिल: भारत को मिली बड़ी कूटनीतिक जीत

भारत को कूटनीतिक फ्रंट पर एक बड़ी जीत हासिल हुई है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की आतंक प्रतिबन्ध निगरानी समिति ने द रेजिस्टेंस फ्रंट (TRF) को अपनी रिपोर्ट में शामिल किया है। TRF को पहलगाम आतंकी हमला करने का जिम्मेदार इस रिपोर्ट में बताया गया है। यह इसलिए भी बड़ी जीत हैं क्योंकि वर्तमान में पाकिस्तान UNSC का सदस्य है। इससे पहले अमेरिका ने TRF पर प्रतिबन्ध लगाए थे।

UNSC की समिति ने क्या कहा?

मंगलवार (29 जुलाई, 2025) को जारी की गई UNSC की प्रतिबन्ध निगरानी समिति रिपोर्ट में TRF पर बात की गई है। इस रिपोर्ट में कहा गया है, “22 अप्रैल को, 5 आतंकवादियों ने जम्मू और कश्मीर के पहलगाम में एक पर्यटन स्थल पर हमला किया। इसमें 26 नागरिक मारे गए। उसी दिन हमले की ज़िम्मेदारी द रेजिस्टेंस फ्रंट (TRF) ने ली, जिसने घटनास्थल की एक तस्वीर भी जारी की। इसके अगले दिन दोबारा जिम्मेदारी का दावा किया गया।”

रिपोर्ट में आगे बताया गया है, “हालाँकि, 26 अप्रैल को, TRF ने अपना दावा वापस ले लिया। TRF की ओर से कोई और जानकारी इस पर नहीं आगे दी गई। किसी और ने इस हमले की जिम्मेदारी भी नहीं ली। इसके चलते इस क्षेत्र में तनाव अभी नाजुक मोड़ पर हैं, जिसका फायदा आतंकी उठा सकते हैं।”

इस रिपोर्ट के अनुसार,”एक सदस्य देश ने कहा कि यह हमला लश्कर-ए-तैयबा के समर्थन के बिना नहीं हो सकता था, और कि लश्कर तथा TRF के बीच कनेक्शन है। एक और देश ने कहा कि यह हमला TRF ने ही किया जो लश्कर का ही पर्याय है। एक और सदस्य देश ने इन विचारों को खारिज कर दिया और दावा किया कि लश्कर अब निष्क्रिय हो चुका है।”

यह क्यों भारत के लिए बड़ी कूटनीतिक जीत?

UNSC की रिपोर्ट में TRF का जिक्र और उसे पहलगाम हमले से सीधे तौर पर लिंक किया जाना भारत के लिए बड़ी कूटनीतिक सफलता है। भारत ने पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद UNSC को विशेष तौर पर TRF और उसके पाकिस्तान से लिंक के विषय में बताया था। भारत ने इस दौरान UNSC से TRF को वैश्विक आतंकी संगठन लिस्ट में शामिल करने की माँग की थी। भारत ने इस दौरान UNSC में इसके मददगारों पर भी एक्शन की माँग की थी।

अब UNSC की इस महत्वपूर्ण समिति कि रिपोर्ट में TRF का स्पष्ट तौर पर जिक्र है। यह जिक्र तब किया गया है जब UNSC के 15 सदस्यों में वर्तमान में पाकिस्तान भी शामिल है। पाकिस्तान वर्तमान में UNSC के 10 अस्थायी सदस्यों में से एक है। वह लगातार चीन के साथ मिलकर भारत के आतंक के खिलाफ एक्शन को रोकने के प्रयास करता रहा है। हालाँकि, भारत के कूटनीतिक प्रयासों के चलते उसकी एक नहीं चली और TRF को इस रिपोर्ट में शामिल किया गया।

पाकिस्तान ने इसका विरोध किया है, यह रिपोर्ट की एक लाइन से भी स्पष्ट होता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि एक सदस्य देश ने लश्कर-ए-तैयबा के खत्म होने की बात कही है। ऐसे दावे पाकिस्तान करता आया है। उसका दावा रहा है कि आतंक की नर्सरियों को बंद कर चुका है। हालाँकि, यह स्पष्ट है कि वह लगातार आतंकियों को खाद-पानी देता है। लश्कर और जमात उद दावा जैसे आतंकी समूह लगातार उसकी जमीन से चलते हैं।

अमेरिका ने भी लगाया था प्रतिबन्ध

अमेरिका ने भी जुलाई, 2025 में TRF को एक वैश्विक आतंकी संगठन घोषित किया था। अमेरिका की इस कार्रवाई को भारत ने एकदम सही कहा था और पाकिस्तान ने भी दबाव में माना था कि यह लश्कर से जुड़ा हुआ है। TRF पहलगाम आतंकी हमले के अलावा और भी कई हमलों में शामिल रही है।

अपने ही ‘सिस्टम’ से हार गई एक महिला जज, जिस पर लगाए यौन उत्पीड़न के आरोप उसे हाई कोर्ट का जज बनाया: इस्तीफा देकर लिखा- टूट चुकी हूँ, मेरे साथ न्याय नहीं हुआ

न्याय सुनिश्चित करना न्यायपालिका का काम है। पर एक महिला जज ने ही इस व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा है कि उन्हें न्याय देने में यह सिस्टम विफल रहा है। इस महिला जज का नाम अदिति शर्मा है।

उन्होंने राजेश कुमार गुप्ता को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट का जज बनाए जाने के विरोध में इस्तीफा दिया है। महिला जज ने गुप्ता पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए थे। हालाँकि जज गुप्ता का कहना है कि उन्हें ऐसे किसी आरोपों की आधिकारिक जानकारी नहीं है।

गुप्ता ने हाई कोर्ट के जज के तौर पर फिलहाल शपथ नहीं ली है। लेकिन इस पर विरोध दर्ज कराते हुए मध्य प्रदेश के शहडोल की सिविल जज अदिति शर्मा ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है।

अदिति शर्मा ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को अपना इस्तीफा भेजा है। इसमें कहा है, “अपनी नैतिकता और भावनाओं को लगे आघात को देखते हुए मैं न्यायिक सेवा से इस्तीफा दे रही हूँ, इसलिए नहीं कि मैंने न्याय में विश्वास खो दिया है, बल्कि इसलिए कि ‘न्याय’ ने उसी संस्था के भीतर अपना रास्ता खो दिया है जिसने इसकी रक्षा करने की शपथ ली थी।”

उन्होंने अपने इस्तीफे को ‘विरोध दर्ज कराने का तरीका’ कहा है। जज अदिति शर्मा ने लिखा है, “उन्होंने न्याय में विश्वास नहीं खोया है, बल्कि उस सिस्टम से टूट चुकी हैं, जो न्याय की संरक्षक मानी जाती है। उनका इस्तीफा इस रूप में दर्ज हो कि कभी मध्यप्रदेश में एक महिला जज थी जो न्याय के लिए समर्पित थी, लेकिन उसी संस्था ने उसके साथ न्याय नहीं किया।”

शर्मा ने इस साल की शुरुआत में भारत के राष्ट्रपति और सर्वोच्च न्यायालय कॉलेजियम से कई शिकायतें की थीं, जिनमें उन्होंने गुप्ता की पदोन्नति पर पुनर्विचार करने का आग्रह किया था। शर्मा उन छह महिला जस्टिस में से एक थीं जिन्हें जून 2023 में मध्य प्रदेश सरकार ने सेवा से हटा दिया था।

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में हस्तक्षेप करते हुए सभी 6 जजों की बहाली का आदेश दिया था। टॉप कोर्ट ने कहा था कि न्यायिक संस्थानों को महिला अधिकारियों के प्रति ज्यादा संवेदनशीलता दिखानी चाहिए थी और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि न्याय न सिर्फ दिया जा रहा है, बल्कि दिखाई भी दे रहा है। इसके बाद जज अदिति शर्मा शहडोल में 2024 में दोबारा सिविल जज बनीं ।

हाईकोर्ट के जज बने आरोपित जज राजेश कुमार गुप्ता पर जज अदिति शर्मा के अलावा दो दूसरी न्यायिक अधिकारियों ने भी यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए थे और शिकायत दर्ज कराई थी। इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम ने आरोपित जज के नाम की सिफारिश की और केन्द्र ने मंजूरी दे दी।

आरोपित जज राजेश गुप्ता ने खुद पर लगे आरोपों से इनकार करते हुए सार्वजनिक रूप से कहा था कि उनके खिलाफ किसी शिकायत की उन्हें आधिकारिक जानकारी नहीं है। वे तीन दशक से न्यायिक सेवा में अपना योगदान दे रहे हैं।

नाम- शमा परवीन, पहचान- भारत में अल कायदा की पहली महिला आतंकी, काम- इंस्टाग्राम पर जिहाद फैलाना: गुजरात ATS ने बेंगलुरु से दबोचा, 4 आतंकियों वाले मॉड्यूल से कनेक्शन

गुजरात की ATS यूनिट ने बेंगलुरु से अल कायदा इंडियन सब कॉन्टिनेन्ट (AQIS) की एक महिला इस्लामी आतंकी को गिरफ्तार किया है। इसका नाम शमा परवीन है। शमा परवीन सोशल मीडिया से अल कायदा का आतंक फैला रही थी। उसका लिंक हाल ही में अनकवर किए गए मॉड्यूल से है। ATS उससे बाकी जानकारियाँ निकालने में जुटी है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यह गिरफ्तारी बेंगलुरु में 30 जुलाई, 2025 के आसपास हुई है। पकड़ी गई शमा परवीन 30 वर्ष की है। शर्मा परवीन झारखंड की रहने वाली अहिहै। वह बेंगलुरु में अपने भाई के साथ रहती है। यहीं से वह सोशल मीडिया पर इस्लामी आतंक का प्रचार-प्रसार करती है।

शमा परवीन को कुछ रिपोर्ट्स में भारत अल कायदा मॉड्यूल का सरगना बताया गया है। शमा परवीन की गिरफ्तारी अल कायदा मॉड्यूल के खुलासे के बाद हुई है। 23 जुलाई, 2025 को देश के अलग-अलग हिस्से से पकड़े गए 4 इस्लामी आतंकियों से पूछताछ में शमा परवीन का नाम आया था। इसके बाद बाद उसे बेंगलुरु से गिरफ्तार किया गया।

गुजरात के गृह राज्य मंत्री हर्ष सांघवी के अनुसार, शमा परवीन पूरी तरह कट्टरपंथी है और पाकिस्तान के सीधे सम्पर्क में थी। यहाँ वह अपने हैंडलर्स से बातचीत करती थी। ATS ने बताया है कि वह इंस्टाग्राम समेत बाक़ी सोशल मीडिया पर आतंकी कंटेंट साझा करती थी और लोगों को भड़काती थी। इसके साथ ही वह आतंकी भर्ती में भी लगी हुई थी।

शमा परवीन भड़काऊ बयान डाउनलोड करके भी साझा करती थी। उसका लिंक गुजरात के अलकायदा मॉड्यूल से भी था। शमा परवीन और उससे जुड़े लोग देश भर में बड़े हमले की योजना बना रहे थे। यह भी जानकारी सामने आई है।

शमा परवीन वर्तमान में बेरोजगार है लेकिन उसका भाई बेंगलुरु में तीन साल से नौकरी करता है। ATS ने उसे गिरफ्तार करके कोर्ट में पेश किया और उसकी ट्रांजिट रिमांड ली है। अब उससे और भी पूछताछ की जा रही है। अल कायदा मॉड्यूल में शमा परवीन पहली महिला आतंकी है।

गौरतलब है कि इससे पहले गुजरात ATS ने अल कायदा 4 आतंकवादियों को गिरफ्तार किया था। यह आतंकवादी देश के अलग-अलग हिस्सों से गिरफ्तार किए गए थे। यह चारों अल कायदा के लिए भर्ती चला रहे थे। इनकी पहचान मोहम्मद फरदीन रईस, सेफुल्लाह कुरैशी रफीक, मोहम्मद फैक रिजवान और जीशान अली के रूप में हुई थी।

दो आतंकी को गुजरात में अलग-अलग जगहों से पकड़ा गया था। वहीं, एक को दिल्ली और अन्य को नोएडा से गिरफ्तार किया गया था। ये सभी आतंकी सोशल मीडिया पर भड़काऊ पोस्ट डालकर लोगों को अल कायदा से जोड़ने का काम कर रहे थे। यह सोशल मीडिया पर कट्टरपंथी और आतंकवादी विचारधारा से संबंधित फोटो-वीडियो डालते थे।

सोने की खानों के लिए प्रसिद्ध कोलार की एक महिला का ब्लड ग्रुप ऐसा, जो दुनिया में किसी और का नहीं: न किसी को दे सकती है खून और न किसी से ले सकती है, जानिए क्या है CRIB?

भारत के राज्य कर्नाटक में स्थित कोलार जिला वैसे तो अपने सोने की खदानों के साथ दूध के उत्पादन के लिए सबसे अधिक प्रसिद्ध है। लेकिन अब ये जिला एक अन्य कारण से भी चर्चा में है।

चर्चा ये कि यहाँ पर 38 वर्षीय महिला में एक नया और दुर्लभ रक्त समूह सामने आया है। ये रक्त समूह महिला को नई पहचान देने के साथ उसके लिए मुश्किलों का सबब भी है। वह न तो किसी को अपना खून दे सकती है और न ही किसी तरह की आपात स्थिति में दुनिया केस किसी भी अन्य रक्त समूह से ब्लड यूनिट ले पाएगी। आइए आपके बताते हैं पूरा मामला

पहुँची हार्ट सर्जरी के लिए, सामने आई दूसरी मुश्किल

कर्नाटक के कोलार जिले में 38 वर्ष की एक महिला अपने हृदय की सर्जरी के लिए अस्पताल पहुँची। सामान्य जाँचों में उसका रक्त समूह O+ve निकल कर आया। हालाँकि डॉक्टरों को रक्त में कुछ बदलाव नजर आया। आगे की जाँच में उन्हें पता चला कि महिला का रक्त किसी अन्य O+ve रक्त यूनिट से मेल नहीं खाता। इसके बाद आगे की जाँच की गई।

जाँच में पाया गया कि महिला का रक्त पैनरिएक्टिव था। इसका अर्थ है कि ये रक्त किसी भी अन्य रक्त के नमूने से किसी भी तरह से मैच नहीं हो रहा था। इसके बाद महिला के रक्त को रोटरी बैंगलोर टीटीके ब्लड सेंटर की एडवांस्ड इम्यूनोहेमेटोलॉजी लैब को भेजा गया। यहाँ पर जाँच होने के साथ-साथ रक्त का नमूना ब्रिटेन स्थित इंटरनेशनल ब्लड ग्रुप रेफरेंस लैब भी भेजा गया।

10 महीने लंबी जाँच के बाद सामने आया CRIB

इस पूरे मामले में 10 महीने की लंबी जाँच की प्रक्रिया चली। वैज्ञानिकों और डॉक्टरों की मेहनत रंग लाई। पता चला कि महिला के रक्त में नया एंटीजन है। यह दुर्लभ है। दुर्लभ रक्त का मतलब है कि किसी व्यक्ति के रक्त में एक बहुत ही सामान्य एंटीजन की कमी है जो अधिकांश आबादी में पाया जाता है, या फिर उसमें एंटीजन का एक संयोजन मौजूद नहीं है।

10 महीने की गहन जाँच के बाद वैज्ञानिकों द्वारा खोजे गए नए रक्त एंटीजन को क्रोमर समूह की श्रेणी में रखा गया है। इसका नाम CRIB रखा गया है। CR का मतलब क्रोमर Cromer और IB का अर्थ भारत और बेंगलुरू (India, Bangalore) है।

पूरी जांच के बाद जब महिला का रक्त समूह सामने आया उसके बाद महिला के हार्ट सर्जरी की गई। खास बात यह रही कि इस हार्ट सर्जरी में महिला को बिना किसी अतिरिक्त खून ब्लड यूनिट के पूरी शल्य प्रक्रिया खत्म की गई।

न किसी को खून दे सकती है, न ले सकती है

हालाँकि इस नए रक्त समूह के जानकारी के बाद महिला के साथ एक नई चुनौती भी है और वह किसी से खून ले नहीं सकती और न ही किसी को खून दे सकती है। ऐसे में भविष्य में यदि महिला को कभी भी रक्त की आवश्यकता होती है तो उन्हें अपना ही रक्त पहले ब्लड बैंक को देना होगा ताकि उसकी जाँच के बाद वहीं उन्हें वापस चढ़ाया जा सकेगा।

भारत के कुछ दुर्लभ रक्त समूह

भारत में सामान्य तौर पर A+, B+, A-, B-, AB+, AB-, O+ और O-ve रक्त समूह मिलते हैं। -ve फैक्टर वाले रक्त समूह ज्यादातर कम ही पाए जाते हैं। इनके साथ ही भारत में पाए जाने वाले बॉम्बे ब्लड ग्रुप और RhNull दुर्लभ रक्त समूह हैं।