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हमास आतंकियों के लिए बैटिंग करने उतरी प्रियंका गाँधी, इजरायल के राजदूत ने किया बोल्ड: जानिए वायनाड की कॉन्ग्रेस MP के पोस्ट को क्यों कहा ‘शर्मनाक’

कॉन्ग्रेस की नीति इजरायल विरोध की रही है। ईरान युद्ध हो या फिलिस्तीन से जंग, कॉन्ग्रेस हमेशा केन्द्र को इजरायल के खिलाफ कदम उठाने की नसीहत देती है। कॉन्ग्रेस नेता प्रियंका गाँधी वाड्रा ने इजरायल के बहाने केन्द्र सरकार को घेरने की कोशिश की है। उन्होंने इजरायल पर फिलिस्तीन के नरसंहार का आरोप लगाया है। साथ ही कहा है कि केन्द्र सरकार इस पर चुप क्यों है?

प्रियंका के बयान को इजरायल के राजदूत रेवुएन अजार ने कहा, ” आपकी धुर्तता कितनी शर्मनाक है। इजरायल ने 25,000 हमास आतंकवादियों को मारा। मानव जीवन को हुई क्षति के लिए हमास की घिनौनी रणनीति जिम्मेदार है। नागरिकों के पीछे छिप कर कायराना हमला, पलायन करने वालों पर गोली चलाना और रॉकेट दागना हमास कर रहा है।”

इजरायल के राजदूत ने ये भी कहा है कि इजरायल ने गाजा में 20 लाख टन खाद्य सामग्री पहुँचाई। हमास ने उसे जब्त करने की कोशिश की, जिससे भुखमरी की स्थिति पैदा हो गई। उन्होंने दावा किया कि पिछले 50 सालों में गाजा की आबादी 450% बढ़ी है। वहाँ कोई नरसंहार नहीं हुआ है। हमास के आँकड़ों पर यकीन मत कीजिए।

इससे पहले कॉन्ग्रेस नेता प्रियंका गाँधी वाड्रा ने कहा, “इजरायल नरसंहार कर रहा है। उसने 60,000 से ज़्यादा लोगों की हत्या की है, जिनमें 18,430 बच्चे थे। सैकड़ों लोगों को भूख से मरने के लिए मजबूर किया गया। इनमें कई बच्चे भी शामिल हैं। लाखों लोगों को भूखा मारने की धमकी दी जा रही है।”

केन्द्र सरकार पर इस मामले में निष्क्रियता का आरोप लगाते हुए प्रियंका गाँधी ने कहा, “चुप्पी साधकर और निष्क्रियता से अपराधों को बढ़ावा देना अपने आप में एक अपराध है। यह शर्मनाक है कि भारत सरकार चुप बैठी है जबकि इजरायल फिलिस्तीन के लोगों पर तबाही मचा रहा है।”

दरअसल कॉन्ग्रेस ने 9 अक्टूबर 2023 को हमास द्वारा इजरायली हमले के दूसरे दिन खुले तौर पर फिलिस्तीनियों के समर्थन में प्रस्ताव पास किया था। इसमें फिलिस्तीनी लोगों के अधिकारों का समर्थन किया था।

प्रस्ताव में कहा गया था कि CWC फिलिस्तीनी लोगों के जमीन, स्वशासन और आत्मसम्मान एवं गरिमा के साथ जीवन के अधिकारों के लिए अपने दीर्घकालिक समर्थन को दोहराती है। लेकिन इस प्रस्ताव में हमास के आतंकी हमले का जिक्र तक नहीं किया गया था। कॉन्ग्रेस की नीति में इजरायल का विरोध शुरू से नजर आता है। लेकिन भारत की विदेश नीति निस्पक्ष रही है। इसके तहत बगैर भेदभाव के मानवीय आधार पर सहायता भारत करता रहा है।

अगवा कर हिंदू नर्स से किया गैंगरेप, फिर सड़क पर फेंक दी क्षत-विक्षत लाश… कौन थी कश्मीरी पंडित सरला भट्ट, जिनकी हत्या में यासीन मलिक और उसके साथियों के ठिकानों पर छापे

जम्मू-कश्मीर में 1990 में हुई कश्मीरी पंडित सरला भट्ट की हत्या का मामला एक बार चर्चा में है। राज्य जाँच एजेंसी (SIA) ने इस मामले की जाँच आगे बढ़ाई है। मंगलवार (12 अगस्त 2025) को श्रीनगर में SIA ने 8 जगह छापेमारी की है। यह छापेमारी जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (JKLF) का मुखिया यासीन मलिक और उसके साथियों के घरों पर की गई है।

JKLF ही 1990 में हुए कश्मीरी पंडितों के नरसंहार का जिम्मेदार है। सरला भट्ट को भी इसी आतंकी संगठन ने अपहरण और गैंगरेप कर हत्या कर दी थी। इस घटना को 35 साल बीत चुके हैं, लेकिन अब तक सरला भट्ट को न्याय नहीं मिला है।

SIA को मामले की जाँच सौंपे जाने के बाद तेजी आई है। SIA को जाँच में सरला भट्ट की हत्या से जुड़े काफी सबूत मिले, जिसके आधार पर SIA आगे की कार्रवाई शुरू की गई।

कौन थीं सरला भट्ट?

27 साल की सरला भट्ट जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग जिले में रहने वाली एक कश्मीरी पंडित थीं। शायद यही उनका गुनाह था। जब 1990 में घाटी में कश्मीरी पंडितों का जिहादियों ने नरसंहार किया, तब सरला भी उसका शिकार हुईं।

वे कश्मीर के सौरा स्थित शेर-ए-कश्मीर इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (SKIMS) में एक नर्स के रूप में कार्यरत थीं। आतंकी उन्हें उठाकर ले गए 5 दिन बाद सड़क पर उनका शव पड़ा मिला था।

सरला भट्ट के शरीर के टुकड़े कर बाजार में फेंके गए

14 अप्रैल 1990 का दिन था। जब सरला भट्ट SKIMS के हब्बा खातून हॉस्टल से आतंकियों ने उन्हें बंदूक की नोक पर अगवा कर ले गए। सरला भट्ट का 5 दिन तक कुछ पता नहीं लगा। रिपोर्टों के अनुसार, उनके साथ गैंगरेप किया गया। उन्हें बुरी तरह टॉर्चर किया गया। 19 अप्रैल 1990 को उनका क्षत-विक्षत शव सड़क पर पड़ा मिला था।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, सरला भट्ट के शव के पास एक नोट भी मिला था, जिसमें उन्हें पुलिस का मुखबिर बताया गया था। द हिंदू के मुताबिक, इस मामले में निगीन पुलिस थाने में FIR दर्ज की गई थी। इसकी संख्या 56/1990 है। हालाँकि, इसमें हिंदू नर्स के साथ रेप का कोई जिक्र तक नहीं है। इस बर्बर मामले में JKLF के पूर्व नेता पीर नूरुल हक शाह उर्फ एयर मार्शल का भी नाम सामने आया था।

सरला भट्ट की हत्या में JKLF के खिलाफ सबूत

SIA को जब सरला भट्ट मामले की जाँच सौंपी गई तो JKLF सरगना यासीन मलिक और उसके साथियों के खिलाफ सबूत मिले। इसी के आधार पर SIA ने यासीन मलिक और उसके गुर्गों के घरों पर छापेमारी की है। बता दें कि यासीन मलिक आतंकी गतिविधियों में शामिल होने के चलते तिहाड़ जेल में बंद है।

NIA ने यासीन मलिक को फाँसी की सजा सुनाने की माँग की है। यासीन मलिक पर 1990 में कश्मीरी पंडितों के नरसंहार में शामिल होने के भी आरोप हैं।

700 से अधिक कश्मीरी पंडितों की हुई हत्या

सरला भट्ट केवल एकलौता नाम नहीं है, जिनकी बर्बरता से हत्या की गई। 1980-90 तक ऐसे 700 कश्मीरी पंडितों की घाटी में हत्या कर दी गई। ये हत्या कश्मीरी पंडितों के बीच दहशत फैलाने के लिए की गई थी।

आतंकी सरेआम हिंदू महिलाओं को घर से उठा ले जाते थे, कई माँ-बाप के सामने उनके बच्चों की हत्या हुई, हिंदुओं का मकान चुनकर निशाना बनाया जाता था। इन सब से परेशान होकर उस समय लगभग 3.5 लाख कश्मीरी पंडितों ने घाटी से पलायन किया।

रिपोर्ट के अनुसार साल 2024 तक घाटी में केवल 728 गैर-प्रवासी पंडित ही बचे हैं, जबकि 2021 में 808 परिवारों की थी। ‘द कश्मीर फाइल्स’ भी कश्मीरी पंडितों पर हुए अत्याचार और उनके पलायन को दर्शाने वाली फिल्म थी, जिसमें घाटी की असलियत दिखाई गई थी।

जैसे ‘कबूल’ से हो जाता है निकाह, वैसे ही मुस्लिमों का तलाक भी जुबानी हो सकता है: ‘मुबारात’ पर गुजरात हाई कोर्ट का फैसला, कहा- अलग होने के लिए दस्तावेज जरूरी नहीं

मुस्लिम में तलाक अब मौखिक तौर पर लिए जा सकेंगे। गुजरात हाईकोर्ट ने इस पर अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट का कहना है कि ‘मुबारात’ के जरिए तलाक संभव है। ‘मुबारात’ का मतलब है आपसी सहमति से बगैर लिखित समझौते के मौखिक तौर पर लिया जाने वाला तलाक।

‘मुबारात’ के जरिए तलाक हो सकता है- हाई कोर्ट

गुजरात हाईकोर्ट के वकील जस्टिस ए वाई कोगजे और जस्टिस एन एस संजय गौड़ा की खंडपीठ ने तलाक को लेकर दायर केस में सुनवाई के दौरान ये फैसला दिया। कोर्ट ने कुरान और हदीस का हवाला देते हुए राजकोट की एक फैमिली कोर्ट के उस आदेश को खारिज कर दिया जिसमें मुस्लिम कपल के ‘मुबारात’ द्वारा तलाक से रोका गया था।

हाई कोर्ट ने कहा, “कुरान और हदीस के आयात या मुस्लिम पर्सनल लॉ से फैमिली कोर्ट का फैसला मेल नहीं खाता है। इनमें कही भी नहीं लिखा कि मुबारात के लिए लिखित समझौता जरूरी है।”

हाई कोर्ट का कहना है कि ऐसा कोई रिवाज मुस्लिम में नहीं है कि आपसी सहमति से तलाक के लिए रजिस्ट्री या रिटन कॉन्ट्रैक्ट जरूरी हो। निकाहनामा निकाह का दस्तावेज है। जैसे निकाह के लिए कबूल पर्याप्त है, वैसे ही तलाक के लिए मुबारात काफी है।

राजकोर्ट फैमिली कोर्ट ने क्या कहा था?

राजकोट की फैमिली कोर्ट का कहना था कि धारा 7 के तहत ये मुकदमा सुनने योग्य नहीं है क्योंकि तलाक के लिए आपसी सहमति के साथ लिखित समझौता जरूरी है। केस में लिखित समझौते का दस्तावेज संलग्न नहीं था इसलिए इसे खारिज कर दिया गया था।

हालाँकि हाई कोर्ट ने ये मामला एक बार फिर फैमिली कोर्ट में भेज दिया है और इसे 3 महीने के अंदर दोबारा सुनवाई करने के लिए कहा है।

मुस्लिम दंपति के तलाक का मामला

ये मामला ऐसे दंपति का है जिनका निकाह 2021 में बिहार में हुआ था। कुछ समय बाद दोनों मियाँ-बीवी में मतभेद शुरू हो गए । दोनों ने मुबारात के जरिए अलग होने का फैसला किया और राजकोट के फैमिली कोर्ट में तलाक के लिए केस दायर किया।

आतंकी ठिकाने तबाह होने का ‘बदला’ पानी-गैस-अखबार रोक कर ले रहा है पाकिस्तान, 2019 में भी भारतीय राजनयिकों को किया था परेशान: बौखलाहट में तोड़ रहा प्रोटोकॉल

भारत के साथ चली आ रही रही तनातनी के बीच इस्लामी मुल्क नीचता पर उतर आया है। खबर है कि पाकिस्तान ने इस्लामाबाद में भारतीय उच्चायोग (Indian High Commission) के कर्मचारियों और उनके परिवारों को बुनियादी जरूरतों की आपूर्ति पर रोक लगा दी है। इस कदम को भारत ने ‘जानबूझकर उठाया गया एक पूर्व-निर्धारित’ कदम बताया है।

जानकारी के अनुसार, भारत ने इसे विएना कन्वेंशन (Vienna Convention) का उल्लंघन कहा है, जो गारंटी देता है कि एक मुल्क में दूसरे देश के राजनयिकों की सुरक्षा और कामकाज करने को गारंटी मिलेगी।

रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय राजनयिकों को अब खाना पकाने के लिए गैस, पीने के लिए साफ पानी, यहाँ तक कि अखबार भी नहीं मिल पा रहे हैं। गैस पाइपलाइन होने के बावजूद गैस की सप्लाई बंद कर दी गई है। जिन दुकानदारों से पहले गैस सिलेंडर मिलते थे, उन्हें अब भारतीय स्टाफ को कुछ भी बेचने से मना कर दिया गया है।

इसके अलावा पीने के पानी की नियमित सप्लाई भी रोक दी गई है और सभी स्थानीय वाटर वेंडर्स को उच्चायोग को पानी न देने का निर्देश दिया गया है। वहीं अखबारों की सप्लाई बंद होने से भारतीय राजनयिकों की स्थानीय खबरों तक पहुँच मुश्किल हो गई है।

क्या है इसकी वजह?

सरकारी अधिकारियों का कहना है कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI ने यह कदम भारत के हाल के दो फैसलों के जवाब में उठाया है। इसमें पहला है, ऑपरेशन सिंदूर की सफलता और दूसरा है सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) को भारत द्वारा सस्पेंड करना।

इन दोनों घटनाओं के बाद पाकिस्तान ने यह ‘छोटी सोच वाली बदले की कार्रवाई’ की है, ताकि इस्लामाबाद में रह रहे भारतीय राजनयिकों की जिंदगी मुश्किल हो जाए। ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि भारत भी अब पाकिस्तान के राजनयिकों के खिलाफ जवाबी कार्रवाई कर सकता है।

बता दें कि यह पहली बार नहीं है जब इस तरह की हरकत हुई है। 2019 में पुलवामा हमले के बाद भारत द्वारा बालाकोट के समय भी इसी तरह भारतीय राजनयिकों को परेशान किया गया था।

पाकिस्तान ने भारतीय राजनयिकों की निगरानी भी बढ़ा दी है। उनके घरों और दफ्तरों पर नजर रखी जा रही है। भारत का कहना है कि पाकिस्तान की ये हरकतें विएना कन्वेंशन का सीधा उल्लंघन हैं, जो किसी भी देश में राजनयिकों को बुनियादी सुविधाएँ देने और उनके सम्मान की रक्षा करने की बात करता है। भारत ने चेतावनी दी है कि इस तरह की घटनाएँ दोनों देशों के बीच रिश्तों को और ज्यादा नुकसान पहुँचा सकती हैं।

BLA को अमेरिका ने घोषित किया FTO: जानिए कैसे नेहरू की ‘भूल’ का पाकिस्तान ने उठाया फायदा, क्या ‘आयल वॉर’ का नया मैदान है बलूचिस्तान?

अमेरिका ने बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी और उससे जुड़ी मजीद ब्रिगेड को आतंकी संगठन घोषित कर दिया है। इससे पहले पाकिस्तान के तेल भंडार को विकसित करने के लिए अमेरिका पहले ही समझौता कर चुका है। बलूचिस्तान में पाकिस्तान का तेल और गैस भंडार है जिसका नए सिरे से दोहन करने की तैयारी है। बीएलए इलाके के आर्थिक शोषण का विरोध करता रहा है।

बीएलए को अमेरिका ने घोषित किया विदेशी आतंकी संगठन

अमेरिका ने पाकिस्तान की मुराद पूरी कर दी है। उसने बलूच लिबरेशन आर्मी यानी बीएलए और मजीद ब्रिगेड को विदेशी आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया है। इसकी घोषणा 11 अगस्त 2025 को अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने की। अमेरिका अब इन संगठनों की हर एक्टिविटी पर प्रतिबंध लगा देगा। अमेरिका स्थित संगठन के सदस्यों की संपत्तियों को जब्त कर सकता है। अमेरिकी विदेश विभाग के मुताबिक, ये कदम आतंकवाद पर अमेरिकी सख्ती को दिखाता है। दरअसल बलूच विद्रोहियों पर एक्शन लेने की माँग पाक आर्मी चीफ ने विश्वसमुदाय से की थी

बलूच समूहों ने अमेरिकी आतंकवाद के टैग को खारिज करते हुए इसे आत्मनिर्णय की लड़ाई बताया है, क्योंकि ट्रम्प के पाकिस्तान तेल समझौते से इस क्षेत्र में अमेरिका की और अधिक भागीदारी की आशंका बढ़ गई है, जो पहले से ही संसाधन दोहन और राजनीतिक अशांति से ग्रस्त है।

ट्रंप के ‘पाकिस्तान प्रेम’ की एक वजह तेल भी

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में पाकिस्तान के ‘तेल भंडार’ को संयुक्त रूप से विकसित करने के लिए इस्लामाबाद के साथ एक नए व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। यह घोषणा भारतीय आयातों पर 25% टैरिफ और अतिरिक्त दंड के पहले दौर की घोषणा के कुछ ही घंटों बाद हुई थी। दिलचस्प बात यह है कि ट्रंप ने दावा किया कि किसी दिन पाकिस्तान भारत को तेल बेच सकता है।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर एक पोस्ट में ट्रंप ने कहा, “हमने अभी-अभी पाकिस्तान के साथ एक समझौता किया है, जिसके तहत पाकिस्तान और अमेरिका अपने विशाल तेल भंडार को विकसित करने के लिए मिलकर काम करेंगे… कौन जाने, शायद वे किसी दिन भारत को भी तेल बेचेंगे!”

फोटो साभार- ट्रूथ

बलूचिस्तान कहाँ है?

बलूचिस्तान वो इलाका है जो पाकिस्तान को ईरान और अफगानिस्तान से जोड़ता है। बलूचिस्तान को अलग देश बनाने की माँग होती है। ये पाकिस्तान का सबसे बड़ा हिस्सा है। पाकिस्तान ने बलूचियों के साथ काफी दुर्व्यवहार किया जाता रहा है। पाकिस्तानी फौज की दमनकारी नीति, आर्थिक और सामाजिक शोषण की वजह से बलूचिस्तानी की आजादी की माँग को लेकर बलूच लिबरेशन आर्मी का गठन किया गया। इससे जुड़ा माजिद ब्रिगेड भी है।

पाकिस्तान ने जबरन किया था कब्जा

1948 में पाकिस्तान ने इस प्रांत को अपने में मिला लिया था। ये पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत है, लेकिन आबादी सबसे कम है। 2023 की जनगणना के मुताबिक पाकिस्तान की आबादी करीब 24 करोड़ है, लेकिन बलुचिस्तान की आबादी मात्र 1.5 करोड़ है।

बलूच 1948 से ही पाकिस्तान से आजादी की माँग करते आ रहे हैं। उनके राजा को धोखा देकर पाकिस्तान ने इलाके पर कब्जा किया था। दरअसल जब भारत का बँटवारा हुआ और प्रांतों को भारत या पाकिस्तान या फिर आजाद रहने का विकल्प दिया गया तो बलूचिस्तान ने फैसला नहीं लिया था कि उसे किसके साथ जाना है या अलग मुल्क बन कर रहना है। स्थिति का फायदा उठाकर पाकिस्तान ने राजा अहमद यार खान को मजबूर किया कि वह पाकिस्तान में अपने ‘रियासत कलात’ का विलय कर दें। हालाँकि इसके खिलाफ पहला विद्रोह 1948 में ही हो गया था।

पाकिस्तान में विलय के लिए नेहरू भी जिम्मेदार

तिलक देवाशर की किताब ‘द बलूचिस्तान कोरंड्रम’ के अनुसार, कलात के खान ने अंग्रेजों से कहा था कि वह आजाद रहना चाहते हैं। इसको लेकर दस्तावेज भी अंग्रेजों द्वारा भेजे गए कैबिनेट मिशन को दिए थे। मजे की बात यह है कि इस काम में मोहम्मद अली जिन्ना ने उनकी सहायता की थी। जिन्ना कलात के खान के वकील थे। ‘कलात के खान’ और कलात के प्रधानमंत्री तथा विदेश मंत्री की 1947 में बलूचिस्तान के भविष्य को लेकर बैठक हुई थी।

हमद यार खान ने कहा कि पाकिस्तान में शामिल होना जनता के विरोध के कारण चुनौतीपूर्ण था। इसके अलावा भारत वाले विकल्प को पाकिस्तान की चिंताओं पर नकार दिया गया था।

अहमद यार खान ने कथित तौर पर दावा किया कि नेहरू उनसे नफरत करते थे और कॉन्ग्रेस ने कभी उन पर भरोसा नहीं किया। कलात के विदेश मंत्री डगलस येट्स फेल ईरान में शामिल होने के पक्ष में थे। उन्होंने इसे बलोच एकता के लिए फायदेमंद करार दिया था। गौरतलब है कि बड़ी बलोच आबादी ईरान में रहती है। हालाँकि, कलात के खान अफगानिस्तान में भी शामिल होने के पक्ष में थे लेकिन इस पर भी नहीं बात बन पाई। अंत में लंदन वाला विकल्प भी नकार दिया गया।

इसके बाद कलात के खान के पास कोई विकल्प नहीं शेष थे। इसी बीच पाकिस्तान ने लासबेला, मकरान और खरान को मिला लिया। अब कलात बीच में फंस गया और उसके पाकिस्तान में मिलने के सिवा कोई चारा ना रहा। बलूच के पाकिस्तान में मिलने में नेहरू के ढीलेढाले रवैये का अहम रोल था।

पाकिस्तान ने बलूचिस्तान को लूटा

बलूचियों का कहना है कि पाकिस्तानी सरकार ने अब तक सिर्फ इस प्रांत को लूटा है और लोगों की उपेक्षा की है। मिनरल्स से भरपूर इस प्रांत में कोयला,सोना, तांबा, गैस की बहुतायत है। फिर भी पाकिस्तान जैसे भिखारी देश का ये सबसे गरीब इलाका है। आज भी पाकिस्तान का सबसे बड़ा बंदरगाह ग्वादर इसी क्षेत्र में है। ये चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारा यानी सीपीईसी के लिए काफी अहम है।

बलूचिस्तान के सुई इलाके में 1950 के ही दशक में गैस का पता चला था। इस गैस की लूट मचा दी गई। पाकिस्तान ने बलूचिस्तान में इस गैस की सप्लाई नहीं दी बल्कि पंजाब और सिंध तक पहुँचाई। यहाँ तक कि 1990 का दशक आते-आते यह गैस लगभग खत्म हो गई। इसके बाद पाकिस्तान के हुक्मरानों ने बलूचिस्तान में जमीन बेच दी। वर्तमान में बलूचिस्तान का ग्वादर बंदरगाह और एयरपोर्ट चीन के अधीन है। स्थानीय लोग इसका विरोध करते हैं।

बलूचिस्तान में अयस्क और खनिज भरे हुए हैं। पाकिस्तान ने यह भी चीन को लगभग बेच दिए हैं। इससे भी बलोच लोगों में गुस्सा है। बलूचिस्तान में स्कूल, अस्पताल जैसी बुनियादी सुविधाएँ भी पाकिस्तान ने नहीं पहुँचाई हैं। ऐसे में विद्रोह के लिए लोग मजबूर हो रहे हैं। बलोच महिलाएँ भी इस विद्रोह में शामिल हैं। इन महिलाओं को पाकिस्तानी फौज ने अत्याचार का शिकार बनाया है।

बलाच मर्री ने की बीएलए की स्थापना

पाकिस्तान द्वार कब्जा कर लिए जाने के बाद बलुचियों ने अलग राष्ट्र की स्थापना के लिए संघर्षरत रहे हैं। इनका कहना है कि प्रांत के संसाधनों का बड़ा हिस्सा उनके प्रांत के काम आना चाहिए। 2000 के दशक में बलूचिस्तान की आजादी की माँग को लेकर बीएलए यानी बलूच लिबरेशन आर्मी की स्थापना की गई। बलूच राष्ट्रवादी नेता नवाब खैर बख्श मर्री के बेटे बलाच मर्री ने इसकी स्थापना की।

बलूचिस्तान में विद्रोह को दबाने के लिए पाकिस्तानी फौज ने प्रदर्शन करने वाले निर्दोष बलूचों पर हवाई हमले किए। उनपर गोलियाँ बरसाईं। 2006 में बलूच के बड़े नेता नवाब अकबर बुगती की हत्या पाकिस्तानी फौजी शासक परवेज मुशर्रफ ने करवा दी। उनके शव तक को परिवार को नहीं सौंपा। इसके बाद बलोच और भी भड़क गए। पाकिस्तानी सरकार एक के बाद एक बलूची नेताओं की हत्या करने लगे।

एक साल बाद बलूची नेता बलाच मरी की भी हत्या कर दी गई। पाकिस्तानी हुक्मरान ने बीएलए पर प्रतिबंध लगा दिया। ये विद्रोह 2005 में उस वक्त और ज्यादा भड़क गई जब बलूचिस्तान में तैनात एक फौज के मेजर ने एक बलोच लड़की के साथ बलात्कार किया। उस पर कार्रवाई करने के बजाय परवेज मुशर्रफ ने उसे बचाया और बलोच लोगों को धमकाया।

पूर्ण स्वतंत्रता चाहते हैं बलूची

बीएलए प्रतिबंध के बावजूद पूर्ण स्वतंत्रता की माँग को लेकर संघर्ष कर रहा है। बशीर जैब बलूच बीएलए ने फिलहाल नेतृत्वकर्ता माने जाते हैं। संगठन में महिलाओं को भी शामिल किया गया है। माजिद ब्रिगेड का नेतृत्व हम्माल रेहान के हाथों में है। संगठन की ट्रेनिंग में रहमान गुल बलूच का अहम रोल है। वो पाकिस्तानी फौज के पूर्व अधिकारी हैं।

बीएलए चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा यानी सीपीईसी का विरोधी है। संगठन का मानना है कि ये आर्थिक शोषण के लिए बनाया गया है। इसलिए पाकिस्तान में हुए कई हमलों को बीएलए ने अंजाम दिया है। 2024 में कराची हवाई अड्डा और ग्वादर बंदरगाह प्राधिकरण के परिसर में हमला शामिल है। 2025 में क्वेटा से पेशावर जा रही जाफर एक्सप्रेस ट्रेन को हाईजैक कर बीएलए ने किया था। 2018 में पाकिस्तान स्थित चीन के वाणिज्य दूतावास पर हमले की जिम्मेदारी संगठन ने ली थी।

बलूचिस्तान में 5 बार बड़े विद्रोह की आग भड़क चुकी है। अगर 1980-90 का दशक छोड़ दिया जाए तो अब तक लगातार हर दशक में बलूच विद्रोही उठ खड़े हुए हैं। वर्तमान में बलूचिस्तान में चल रही लड़ाई की चिंगारी 2005 में भड़की थी। तब से पाकिस्तानी फौज के साथ बलूच लिबरेशन आर्मी की टक्कर होती रहती है।

बंगाल में SIR से क्यों डर रही ममता सरकार, क्यों अवैध घुसपैठियों पर आ रहा दुलार?: IIM प्रोफेसरों की रिसर्च में खुलासा- हजारों-लाखों नहीं, राज्य में 1 करोड़ से ज्यादा हो सकते हैं अतिरिक्त वोटर

चुनाव आयोग (ECI) ने बिहार में स्पेशल इंटेंशिव रिवीजन (SIR) के तहत मतदाता सूची की खास समीक्षा की। इसमें 60 लाख से ज्यादा फर्जी या अपंजीकृत मतदाता सामने आए। इस खुलासे ने भारतीय लोकतंत्र में फर्जी वोटिंग और राजनीतिक संरक्षण के जरिए वोटरों की घुसपैठ की गंभीरता को उजागर कर दिया है।

इस अभियान के दौरान जो सामने आया कि 35 लाख लोग या तो अब नहीं मिल रहे हैं या हमेशा के लिए कहीं और चले गए हैं, 22 लाख वोटर अब इस दुनिया में नहीं हैं यानी उनकी मौत हो चुकी है, 7 लाख वोटर एक से ज्यादा जगहों पर नामांकित हैं और लगभग 1.2 लाख फॉर्म अभी लंबित हैं।

चुनाव आयोग के इस कदम को लेकर विपक्षी दल, खासकर राजद (RJD) और कॉन्ग्रेस ने कड़ा विरोध जताया है। उनका आरोप है कि यह पूरी प्रक्रिया एक ‘साजिश’ है जिसका मकसद वोटरों, खासकर मुस्लिम समुदाय के वोटरों को बाहर करना है। उन्होंने ECI की निष्पक्षता पर भी सवाल उठाए और कहा कि आयोग BJP के इशारे पर काम कर रहा है।

खास बात यह है कि IIM संस्थानों के प्रोफेसरों द्वारा पहले ही एक शोध पत्र में चेतावनी दी गई थी कि बिहार में 70 लाख से अधिक फर्जी वोटर हो सकते हैं।

यह पूरी प्रक्रिया अब सिर्फ बिहार तक सीमित नहीं रही। इससे देशभर में अवैध बांग्लादेशी और रोहिंग्या मुस्लिम घुसपैठियों के खिलाफ चल रहे अभियानों को भी नई ताकत मिली है। जैसे ही बिहार में फर्जी वोटरों की पहचान हुई, वैसे ही कई राज्यों में अवैध घुसपैठियों को पहचानने, हिरासत में लेने और देश से बाहर भेजने की कार्रवाई तेज कर दी गई है।

इस अभियान को लेकर तथाकथित ‘धार्मिक रूप से तटस्थ’ (secular) पार्टियों में नाराजगी साफ देखी जा रही है।

ममता बनर्जी ने बीएलओ को दिलाया याद, वे चुनाव आयोग नहीं राज्य सरकार के लिए करते हैं काम

हरियाणा और अन्य BJP शासित राज्यों में अवैध प्रवासियों के खिलाफ चल रही कार्रवाई और बिहार में SIR की प्रक्रिया के बीच, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने BJP के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। उन पर पहले भी यह आरोप लगते रहे हैं कि उनकी सरकार वोट बैंक बढ़ाने के लिए अवैध घुसपैठ को बढ़ावा देती है।

ममता बनर्जी ने पहले ही साफ कर दिया था कि वे बंगाल में नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन (NRC) लागू नहीं होने देंगी। हाल ही में उन्होंने मोदी सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि जिन लोगों को बांग्लादेशी या रोहिंग्या बताकर हिरासत में लिया जा रहा है, वे असल में बंगाली प्रवासी हैं।

इसके साथ ही उन्होंने मतदाता सूची सुधार (Summary Revision) के लिए ट्रेनिंग ले रहे बूथ लेवल ऑफिसर्स (BLOs) को एक तरह से चेतावनी दे दी। उन्होंने कहा, “चुनाव आयोग सिर्फ तब सक्रिय होता है जब चुनाव की तारीखें घोषित होती हैं। उससे पहले और उसके बाद भी प्रशासन राज्य सरकार के हाथ में रहता है। आप राज्य सरकार के कर्मचारी हैं, किसी को बेवजह परेशान मत कीजिए।”

बीरभूम में जुलाई में एक प्रशासनिक बैठक को संबोधित करते हुए ममता बनर्जी ने यह भी आरोप लगाया कि चुनाव आयोग BJP के इशारों पर काम कर रहा है। उन्होंने कहा, “मतदाता सूची गुजरात में बैठे लोग बना रहे हैं। यह काम BJP की एक एजेंसी कर रही है, मुझे उसका नाम भी पता है।”

इसके साथ ही उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में कहा, “अगर बंगाल में किसी का नाम वोटर लिस्ट से हटाने की कोशिश की गई तो छऊ नृत्य (एक आदिवासी नृत्य) होगा, ढोल और शंख की आवाज सुनाई देगी। मैं जिंदा रहते हुए ना NRC लागू होने दूँगी और ना ही डिटेंशन कैंप बनने दूँगी।”

पश्चिम बंगाल वह राज्य है, जहाँ जाली दस्तावेजों और स्थानीय मदद से रह रहे अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों की संख्या है सबसे अधिक

हाल ही में पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। ऐसा माना जा रहा है कि अगर राज्य में SIR कराया गया तो लाखों फर्जी मतदाता, खासकर वे जो बांग्लादेश से अवैध रूप से आकर नकली दस्तावेजों के जरिए भारतीय पहचान बना चुके हैं, वे सूची से हटा दिए जाएँगे।

पश्चिम बंगाल उन राज्यों में से एक है जहाँ सबसे अधिक ‘बांग्लादेशी घुसपैठिए’ आकर बसते हैं। पिछले तीन वर्षों में 2,688 बांग्लादेशी नागरिकों को पकड़ा गया और उन्हें वापस भेजा गया है।

8 अगस्त को, तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) सरकार ने राज्य के मुख्य चुनाव अधिकारी (Chief Election Officer – CEO) से एक ‘स्पष्टीकरण’ माँगा, क्योंकि उन्होंने चुनाव आयोग को यह लिखा था कि राज्य SIR के लिए ‘तैयार’ है।

पिछले हफ्ते चुनाव आयोग ने 293 विधानसभा क्षेत्रों की 2002 की SIR वोटर लिस्ट प्रकाशित की (सिर्फ एक सीट को छोड़कर)।

गौरतलब है कि बंगाल में आखिरी बार SIR वर्ष 2002 में हुआ था और उसी के आधार पर 2004 की मतदाता सूची तैयार की गई थी। अब जब 22 साल बाद फिर से SIR की संभावना है तो राज्य में राजनीति गरमा गई है।

चुनाव आयोग का काम होता है कि वह मतदाता सूची को समय-समय पर अपडेट करे, गलतियाँ सुधारे, मृतकों के नाम हटाए और फर्जी वोटरों को चिन्हित करे, लेकिन राज्य की तृणमूल कॉन्ग्रेस सरकार, जिसे कई लोग ‘धर्मनिरपेक्ष’ कहकर मुस्लिम तुष्टिकरण से जोड़ते हैं, इस SIR प्रक्रिया को लेकर विरोध जता रही है और इसे लेकर चुनाव आयोग को ‘याद दिला’ रही है और दबाव भी बना रही है।

पश्चिम बंगाल जैसे राजनीतिक और सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील राज्य में मतदाता सूची में गड़बड़ी (Electoral Roll Inflation) कोई नई बात नहीं है और इसी वजह से SIR की जरूरत महसूस की जा रही है।

IIM प्रोफेसरों के शोध पत्र में आया सामने: पश्चिम बंगाल की 2024 की मतदाता सूची में 1 करोड़ अतिरिक्त मतदाता

7 अगस्त 2025 को प्रकाशित एक रिसर्च पेपर, जिसका नाम ‘Electoral Roll Inflation in West Bengal: A Demographic Reconstruction of Legitimate Voter Counts (2024)’ है,  यह दिखाता है कि पश्चिम बंगाल की 2024 की वोटर लिस्ट में लगभग 1 करोड़ फर्जी नाम हो सकते हैं। यह 13.69% का वोटर इन्फ्लेशन है।

यह रिसर्च IIM विशाखापत्तनम के डॉ. मिलन कुमार और SP जैन के डॉ. विधु शेखर ने किया है। उन्होंने सरकारी आँकड़ों जैसे कि वोटर लिस्ट, जनगणना और सिविल रजिस्ट्रेशन सिस्टम का इस्तेमाल किया और हर चरण पर रक्षात्मक (conservative) तरीका अपनाया, ताकि अनुमान नीचे रहे।

शोध पत्र में कहा गया है, “हम सभी पात्र युवाओं के पूर्ण पंजीकरण को मानते हैं, उच्च उत्तरजीविता संभावनाओं को लागू करते हैं, और हालिया वृद्धि के बजाय दशकीय रुझानों के आधार पर प्रवासन का मॉडल तैयार करते हैं। इससे हमें वैध मतदाता आबादी का एक निम्न-सीमा अनुमान लगाने में मदद मिलती है। फिर हम इस आँकड़े की तुलना 2024 के लिए चुनाव आयोग द्वारा प्रकाशित आधिकारिक मतदाता सूची से करते हैं।”

यह शोध 2024 तक पश्चिम बंगाल में वैध मतदाता आबादी के अनुभवजन्य अनुमान तीन चरणों में प्रस्तुत करता है: (i) 2004 की मतदाता सूची से बचे लोगों का अनुमान, (ii) 1986 और 2006 के बीच जन्मे नए मतदाता समूहों से जुड़ाव, और (iii) शुद्ध स्थायी प्रवास के लिए समायोजन। इसके बाद शोधकर्ताओं ने मतदाता सूची में अनुमानित अधिशेष की गणना करने के लिए परिणामों का संश्लेषण किया।

2004 की मतदाता सूची में 4.74 करोड़ पंजीकृत मतदाता दर्ज थे। शोध में इस जनसंख्या को छह आयु समूहों में विभाजित किया गया और 2001 की जनगणना के आँकड़ों का उपयोग करते हुए, आयु-विशिष्ट 20-वर्षीय उत्तरजीविता दरों का उपयोग किया गया। इन अनुमानों से 2004 की मतदाता सूची के अनुसार, अनुमानित 3.74 करोड़ जीवित मतदाता प्राप्त होते हैं।

इसके अलावा, शोधकर्ताओं ने अनुमान लगाया कि 2004 और 2024 के बीच लगभग 3.01 करोड़ नए पात्र व्यक्ति नामांकित होंगे।

इसके बाद, शोध ने 2001 और 2011 की जनगणना के आंकड़ों का उपयोग करके स्थायी बाहरी और आंतरिक प्रवास का अनुमान लगाया। विश्लेषण में पाया गया कि 2001 और 2011 के बीच पश्चिम बंगाल में प्रवासियों की कुल संख्या में गिरावट आई है।

2001 और 2011 की जनगणना के आँकड़ों का उपयोग करते हुए तथा CAGR के माध्यम से अनुमान लगाते हुए शोधकर्ताओं ने अनुमान लगाया कि इस अवधि के दौरान पश्चिम बंगाल से कुल 17.86 लाख व्यक्तियों का स्थाई प्रवास हुआ।

विश्लेषण के अनुसार, वैध मतदाताओं की अनुमानित संख्या (2024) 6,57,06,849 है, जबकि आधिकारिक मतदाता सूची (2024) के अनुसार मतदाताओं की संख्या 7,61,24,780 है। यह अनुमानित 1,04,17,931 मतदाताओं का अधिशेष दर्शाता है, जो प्रतिशत के हिसाब से 13.69% है।

शोधकर्ताओं का कहना है कि उन्होंने जानबूझकर ऊँची सर्वाइवल रेट, ज्यादा पंजीकरण और धीमी माइग्रेशन रेट मानी, ताकि कम से कम फर्जीवाड़ा दिखे, फिर भी इतना बड़ा अंतर मिला। इसका मतलब है कि असल वोटर इन्फ्लेशन इससे भी ज्यादा हो सकता है।

इस रिसर्च के अनुसार, इतने ज्यादा फर्जी नाम होने से चुनावों की निष्पक्षता पर खतरा पैदा होता है, क्योंकि कई सीटों पर जीत का अंतर इससे छोटा होता है। इसका फायदा धोखाधड़ी, फर्जी वोटिंग और राजनीतिक गड़बड़ी में उठाया जा सकता है।

रिसर्च सुझाव देता है कि वोटर लिस्ट को आधार, सिविल रजिस्ट्रेशन और माइग्रेशन डेटा से जोड़ा जाए। एल्गोरिदम से ऑटोमेटिक चेकिंग हो जैसे 100 साल से ऊपर के हजारों वोटर, एक ही व्यक्ति के कई रजिस्ट्रेशन आदि और हर तीन महीने में जनसांख्यिकीय ऑडिट हो।

पश्चिम बंगाल और ऐसे राज्य जहाँ पिछले कई सालों से SIR नहीं हुई है, वहाँ घर-घर जाकर वोटर वेरिफिकेशन होना चाहिए।

पश्चिम बंगाल की वोटर लिस्ट में 2024 में 13.69% यानी 1 करोड़ से ज्यादा फर्जी नाम हो सकते हैं। यह चुनाव की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल उठाता है और जरूरी है कि सरकार व चुनाव आयोग इस पर तुरंत और सख्त कदम उठाए।

नोट: मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में श्रद्धा पांडेय ने लिखी है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

2 हिंदू बहनें, 1 महिला पुलिसकर्मी, 6 राज्य और 9 ठिकाने… आगरा के धर्मांतरण गिरोह की कैसे टूटी कमर, पढ़ें ऑपइंडिया पर ‘ऑपरेशन अस्मिता’ के बारे में Exclusive डिटेल

आगरा से गायब हुई दो सगी बहनों के बरामदगी से जुड़े मामले की जाँच के दौरान उजागर हुआ ‘धर्मांतरण गैंग’ आज पूरे देश में चर्चा का विषय बना हुआ है। इस गिरोह के साथ ही चर्चा उत्तर प्रदेश पुलिस के ‘ऑपरेशन अस्मिता’ की भी है, जिसके तहत यूपी पुलिस ने 6 राज्यों में जाकर 9 स्थानों पर एक समय पर छापे मारे और 7 लड़कियों को बचाया।

इस केस और ऑपरेशन से जुड़ी हर जानकारी लेने के लिए हमने पुलिस कमिश्नर दीपक कुमार से मुलाकात की। इस दौरान पुलिस कमिश्नर ने पूरे ऑपरेशन अस्मिता और धर्मांतरण गैंग को लेकर ऑपइंडिया के साथ कई चौंकाने वाले खुलासे किए। पुलिस कमिश्नर दीपक कुमार के मुताबिक आगरा पुलिस को 24 मार्च के दिन सदर थाने से दो सगी बहनों के अचानक गायब होने की लिखित शिकायत मिली थी। पीड़ित पिता की शिकायत पर सदर थाने में गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज की गई और छानबीन शुरू हुई।

प्रारंभिक जाँच के दौरान पुलिस को गुमशुदगी मामले में कोई सुराग नहीं मिला क्योंकि दोनों बहनों के पास न तो मोबाइल था और न कोई इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस। पुलिस हर प्रयास करने के बावजूद लड़कियों की लोकेशन नहीं ट्रेस कर पा रही थी और केस वहीं का वहीं रुका हुआ था। देखते ही देखते 41 दिन बीत गए और पुलिस खाली हाथ ही रही।

इंस्टाग्राम प्रोफाइल पर AK-47 देख उड़े पुलिस के होश

एक दिन अचानक पुलिस के सामने पीड़ित पिता ने साइमा नाम की लड़की के नाम पर संदेह जाहिर किया और पुलिस ने गुमशुदगी वाली रिपोर्ट में धाराएँ बढ़ाते हुए जाँच शुरू की। पड़ताल के दौरान छोटी बहन के इंस्टाग्राम प्रोफाइल पर AK-47 के साथ मिली डीपी ने आगरा पुलिस के होश उड़ा दिए। केस की जाँच अब तेजी से आगे बढ़ने लगी थी।

मामले की गहनता से जाँच कर रही साइबर सेल व सर्विलांस यूनिट को एक बड़ी जानकारी हाथ लगी। वह ये कि अचानक से गायब दोनों बहन एक बड़े धर्मांतरण गिरोह का हिस्सा बन चुकी हैं। इसके बाद मामले की गंभीरता से देखते हुए आगरा पुलिस ने जाँच साइबर क्राइम और एटीएस को सौंप दी। इस बीच, दो ग़ायब बहनों की तीसरी बहन से उस माइक्रो ब्लॉगिंग साइट के बारे में जानकारी मिली, जिस पर अक्सर वो दोनों बहनें जुड़ा करती थीं।

इस ब्लॉग पर आगरा पुलिस को ‘रिवर्टी’ नाम का एक पेज मिला जिस पेज की लोकेशन, कोलकाता थी। यहीं से आगरा पुलिस को सुराग मिला कि कोलकाता से चार देशों, अमेरिका, कनाडा, दुबई और लंदन, में संवाद हो रहा है और इसी लोकेशन से देश के 15 राज्यों में बैंक द्वारा पैसों का लेनदेन हुआ है। यही तथ्य आगरा पुलिस के लिए संजीवनी साबित हो गया।

जब एक महिला सब इंस्पेक्टर ‘रिवर्टी’ ग्रुप में हुई शामिल

पुलिस के लिए अब बड़ी चुनौती दो बहनों को वापस लाने के साथ ही धर्मांतरण गिरोह का पर्दाफाश करने की थी। इसके लिए एक महिला सब इंस्पेक्टर को तैयार किया गया। गायब दो बहनों की तीसरी बहन से एक सोशल मीडिया एकाउंट के बारे में मिली जानकारी के बाद महिला पुलिस अधिकारी गैंग के एक ‘रिवर्टी’ ग्रुप में शामिल हो जाती है और फिर सदस्यों से व्यक्तिगत बातचीत करते हुए कई जानकारी जुटाती है।

कमिश्नर दीपक कुमार ने आईपीएस आदित्य के नेतृत्व में एक टीम बनाई। 100 फीसदी मुस्लिम इलाका होने के चलते एक विशेष टीम को तत्काल कोलकाता भेजा गया। यहाँ टीम ने अपनी पहचान छुपाकर करीब 5 दिन तक इलाके की रेकी की और फिर डीजीपी राजीव कृष्ण और पुलिस कमिश्नर दीपक कुमार ने ऑपरेशन अस्मिता को अंजाम देने के लिए 11 टीमों का गठन किया।

ऑपरेशन अस्मिता को रखा गया था गोपनीय

टीम में शामिल करीब 45 पुलिसकर्मियों को विशेष रूप से ट्रेनिंग दी गई। ऑपरेशन को इतना गोपनीय रखा गया था कि एक-आध अधिकारियों के अलावा किसी को भी इस बात की जानकारी नहीं थी कि वह कितने बड़े धर्मांतरण गिरोह की कमर तोड़ने वाले हैं। यहाँ तक कि किसी भी टीम को यह भी जानकारी नहीं थी कि कौन सी टीम कहाँ जाएगी। बड़ी बात यह कि पूरे ऑपरेशन में सरकारी गाड़ी के बदले किराए की टैक्सी का ही इस्तेमाल किया गया।

कुछ ही देर में ऑपरेशन अस्मिता के तहत दोनों गायब बहनों को मुस्लिम इलाके से बरामद कर लिया गया। हालाँकि इस दौरान आगरा पुलिस को स्थानीय लोगों के विरोध का भी सामना करना पड़ा था। आगरा पुलिस कमिश्नर का तो यहाँ तक दावा है कि यूपी पुलिस ने एक साथ इतने स्थानों पर छापेमारी पहली बार की है।

‘ऑपरेशन अस्मिता’ की सफलता का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि देश के अलग-अलग हिस्सों में 9 स्थानों पर की गई छापेमारी में 7 बहनों को सही सलामत गैंग के चंगुल से निकाला गया है। साथ ही इस मामले में गैंग से जुड़े 14 आरोपितों को गिरफ्तार कर जेल भेजा जा चुका है। आरोपितों के पास से ‘इस्लाम और बहुजन समाज’, ‘धर्म परिवर्तन’ और ‘आपकी अमानत आपकी सेवा’ में जैसी पुस्तकें बरामद हुई हैं। साथ ही मोबाइल से हिंदू समाज को तोड़ने वाले तमाम वीडियो भी मिले हैं।

किसानों की 65000 एकड़+ जमीन ले रही थी पंजाब की AAP सरकार, विरोध के बाद दबी: लैंड पूलिंग पॉलिसी ली वापस, HC ने दी थी रद्द करने की चेतावनी

किसानों के आंदोलन और विपक्ष के विरोध के बीच आखिरकार पंजाब सरकार बैकफुट पर आ गई है। आप सरकार ने लैंड पूलिंग पॉलिसी को वापस लेने का फैसला लिया है। इससे पहले पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने भी अगले आदेश तक पॉलिसी पर रोक लगा दी थी। साथ ही पंजाब की मान सरकार को पॉलिसी रद्द करने की चेतावनी दी थी।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पंजाब सरकार के डिपार्टमेंट ऑफ हाउसिंग एंड अर्बन डेवलपमेंट के प्रिंसिपल सेक्रेटरी ने लेटर जारी कर यह जानकारी दी। लेटर में बताया गया कि 14 मई 2025 को लागू की गई पंजाब लैंड पॉलिसी और इससे जुड़े संशोधनों को वापस लिया जा रहा है।

बता दें कि इससे पहले पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट ने लैंड पूलिंग पॉलिसी मामले की सुनवाई पर 4 हफ्ते की रोक लगा दी थी। कोर्ट ने पंजाब सरकार को 2 विकल्प दिए थे, जिसमें कहा गया था कि या तो पॉलिसी वापस ली जाए वरना अदालत इसे रद्द कर देगी।

हाईकोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई की तारीख 10 सितंबर 2025 तय कर पंजाब सरकार को जवाब दाखिल करने का समय दिया था। साथ ही कोर्ट ने पंजाब सरकार को भी फटकार लगाते हुए कहा था कि यह पॉलिसी जल्दबाजी में बनाई गई है।

किसानों ने आंदोलन की दी थी चेतावनी

लैंड पूलिंग पॉलिसी के विरोध में किसान लगातार विरोध प्रदर्शन किया। किसान मजदूर संघर्ष समिति ने पंजाब के कई जिलों में बाइक रैली निकाली। इस दौरान समिति ने फैसले का जमकर विरोध करते हुए पॉलिसी वापस लेने की माँग की थी। साथ ही ऐसा ना करने पर पंजाब सरकार को बड़े आंदोलन की भी चेतावनी दी थी।

पॉलिसी को लेकर किसान नेताओं ने दावा किया था कि लैंड पूलिंग से सरकार प्रदेश की 65000 एकड़ से ज्यादा जमीन को निजी संस्थानों के हाथों में देना चाहती है। वहीं, शिरोमणि अकाली दल ने पूरे पंजाब में विरोध रैलियाँ की। अब 01 सितंबर 2025 को पक्का मोर्चा निकालने की तैयारी थी।

क्या है लैंड पूलिंग पॉलिसी?

लैंड पूलिंग पॉलिसी 2011 में अकाली दल की सरकार के दौरान लागू की गई थी। इसके बाद कैप्टन अमरिंदर सिंह ने भी इसे बढ़ावा दिया। फिर अब पंजाब की मौजूदा मान सरकार ने पॉलिसी में बदलाव करते हुए इसे लागू किया। जून 2025 में पंजाब कैबिनेट में पॉलिसी को बदलाव के साथ मंजूरी मिल गई।

इस पॉलिसी के तहत प्रदेश के अलग-अलग क्षेत्रों में जमीन अधिग्रहित कर इंडस्ट्रिटयल, कमर्शियल और रिहायशी सेक्टर विकसित किए जाने थे। पॉलिसी में यह भी बताया कि किसानों को जमीन के बदले मुआवजा नहीं दिया जाएगा बल्कि उसी क्षेत्र में कमर्शियल और रिहायशी प्लॉट दिए जाएँगे।

वहीं किसानों का कहना था कि पॉलिसी के तहत जमीन को कॉरपोरेट को देने की साजिश है। किसानों ने कहा कि उनपर चारों ओर से हमले किए जा रहे हैं। एक तरफ जमीन छीनने की साजिश की जा रही है, वहीं दूसरी तरफ भारत पर लगातार अमेरिका दबाव बना रहा है कि कृषि, डेयरी, पोल्ट्री, मछलीपालन जैसे क्षेत्र में उसे भारत में घुसने दिया जाए।

PMAY, मुद्रा, लखपति दीदी… मोदी सरकार की योजनाओं के बूते 12 वर्षों में 27 करोड़+ गरीबी से निकले बाहर: बच्चों-महिलाओं को सबसे ज्यादा फायदा, रिसर्च ने बताया- अब केवल 2.2% औरतें निर्धन

मोदी सरकार की योजनाओं ने करोड़ों लोगों को गरीबी से निकालने में बड़ी भूमिका निभाई है। PM आवास योजना से लेकर मुद्रा और लखपति दीदी जैसी योजनाओं ने देश में महिलाओं और बच्चों की गरीबी कम करने में बड़ी भूमिका निभाई है। यह जानकारियाँ एक रिपोर्ट से सामने आई हैं। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि 12 वर्षों के समय में देश में 27 करोड़ से अधिक लोग गरीबी से निकाले गए हैं।

27 करोड़ गरीबी से बाहर निकले

यह रिसर्च रिपोर्ट शमिका रवि और मुदित कपूर ने लिखी है। रिपोर्ट बताती है कि 2011-12 के मुकाबले 2023-24 में देश के घरों में महिलाओं को अधिक संसाधन मिलने लगे हैं। महिलाओं के साथ ही बच्चों को भी घर के संसाधनों में ज्यादा हिस्सा मिलने लगा है। इसका असर सीधे तौर पर महिलाओं और बच्चों की आर्थिक हालत पर पड़ा है। रिपोर्ट बताती है कि 2011-12 में बच्चों की गरीबी दर सबसे ज़्यादा (58.3%) थी, उसके बाद महिलाओं (33.3%) और पुरुषों (15.1%) का स्थान था।

रिपोर्ट के अनुसार, 2023-24 तक, बच्चों की गरीबी घटकर 17.8%, महिलाओं की गरीबी घटकर 2.2% रह गई, लेकिन पुरुषों की गरीबी मामूली रूप से घटकर 13.5% ही रह गई। यह बदलाव मात्र 12 वर्षों के भीतर हुए। इस दौरान अधिकांश समय में केंद्र में मोदी सरकार ही रही है। ऐसे में स्पष्ट तौर पर कहा जा सकता है कि इसमें बड़ा योगदान सरकार का रहा है, जिससे महिलाएँ सशक्त हुई हैं और बच्चे भी गरीबी के कुचक्र से निकले हैं।

रिपोर्ट कहती है कि प्रधानमंत्री आवास योजना, मुद्रा योजना और लखपति दीदी योजना के चलते गरीबी घटाने में बड़ी सहायता मिली है। प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत अब तक देश में 4 करोड़ घर बन चुके हैं। इस योजना में मकान में महिला को सह स्वामिनी रखना जरूरी है। ऐसे में संसाधनों के बँटवारे में महिलाएँ और सशक्त हुई हैं। इसके अलावा लखपति दीदी योजना ने उन्हें रोजगार का अवसर दिया है। मुद्रा ने उन्हें वह पूँजी उपलब्ध करवाई है, जिससे वह सशक्त हो सकें।

पहले आई रिपोर्ट्स ने भी दिखाई बदली तस्वीर

यह ऐसी कोई पहली रिपोर्ट नहीं है, जिसमें देश में गरीबी कम होने की पुष्टि की गई हो। इससे पहले कई और रिपोर्ट्स गरीबी कम होने के साथ ही खर्च बढ़ने तक की बात बता चुकी हैं। केंद्र सरकार के सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वन मंत्रालय (MoSPI) के देश के परिवारों द्वारा किए जाने खर्चे को लेकर किए गए पारिवारिक उपभोग व्यय सर्वे के अनुसार, अब देश के गाँवों में बसने वाली आबादी में प्रति व्यक्ति मासिक खर्च ₹3773 है जबकि शहर में रहने वाला एक आदमी औसतन ₹6459 प्रति माह अपने ऊपर खर्च करता है। 

2011-12 में किए गए सर्वे की तुलना में लगभग 2.5 गुना है। 2011-12 में गाँव में रहने वाला प्रत्येक व्यक्ति अपने ऊपर ₹1430 जबकि शहरी व्यक्ति ₹2630 खर्च करता था। गाँवों में रहने वाला व्यक्ति अपने कुल खर्चे का 46% जबकि शहरों में रहने वाला व्यक्ति 39% खर्च खाने-पीने पर करता है। रिपोर्ट के आँकड़े दर्शाते हैं कि गाँव और शहर के खर्चे के बीच की खाई भी कम हुई है। अब दोनों के खर्चे में 71% का अंतर है जबकि 2011-12 में यह लगभग 84% था।

भारत में गरीबी कम होने की बात की पुष्टि वर्ल्ड बैंक तक कर चुका है। वर्ल्ड बैंक के अनुसार, वर्ष 2011-12 में 27% लोग भारत में अत्यंत निर्धनता में रह रहे थे। अब यह संख्या मात्र 5.3% ही रह गई है। वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट बताती है कि सबसे अधिक काम उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, ओडिशा और बिहार जैसे राज्यों में हुआ है। इन राज्यों से सबसे अधिक लोग अत्यंत निर्धनता से बाहर निकाले गए हैं। भारत ने यह उपलब्धि तब हासिल की है जब वर्ल्ड बैंक ने किसी व्यक्ति को गरीब माने जाने के मानदंड बदले हैं और उन्हें और ऊँचा कर दिया है।

मोदी सरकार ने घर-पानी-बिजली पर सबसे पहले किया काम

केंद्र में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार आने के बाद सबसे पहले देश की मूलभूत समस्याओं को हल करने का प्रयास चालू किया है। मोदी सरकार ने देश की बड़ी आबादी को मूलभूत सुविधाएँ मुहैया करवाना चालू किया। देश में जिन लोगों के पक्का मकान नहीं था, उन्हें मोदी सरकार ने प्रधानमंत्री आवास योजना (शहरी) और प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) के तहत मकान देना चालू किया। अब तक ग्रामीण योजना के तहत 2.82 करोड़ मकान बनाए जा चुके हैं जबकि शहरी योजना के तहत 94 लाख से अधिक घर बन गए हैं।

वहीं मोदी सरकार में घर-घर बिजली सौभाग्य योजना के तहत बिजली पहुँची। इसके अलावा पानी पहुँचाने के लिए मोदी सरकार ने वर्तमान में जल जीवन मिशन चालू कर रखा है। इसके चालू होने के बाद से देश में 12.44 करोड़ घरों में पानी पहुँच चुका है। जनधन योजना से बैंकिंग की पहुँच देश के 50 करोड़ से अधिक लोगों तक हुई है। यह मूलभूत सुविधाएँ देश में गरीबी उन्मूलन का आधार बन रही हैं।

‘न्यूक्लियर धमकी में नहीं आएगा भारत’: अमेरिका की जमीन से ‘मुल्ला मुनीर’ की गीदड़भभकी का भारत ने दिया जवाब, PM मोदी ने भी किया साफ़- परमाणु ब्लैकमेल नहीं करेगा काम

अमेरिका की सरजमीं से पाकिस्तान का आर्मी चीफ आसिम मुनीर भारत को परमाणु बम की धमकी दे रहा है। इस पर विदेश मंत्रालय ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। MEA ने पाकिस्तान के साथ-साथ अमेरिका को भी आईना दिखाया है।

भारत ने कहा है कि पाकिस्तानी आर्मी चीफ के अमेरिका दौरे के दौरान दिए गए बयान पर उनकी नजर पड़ी है। पाकिस्तान की पुरानी आदत है परमाणु हमले की धमकी देना। विश्व समुदाय पाकिस्तान के इस बयान पर मतलब निकाल सकता है। क्योंकि ये सिर्फ क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए नहीं बल्कि वैश्विक सुरक्षा के लिए भी खतरा है।

‘ढोंगी’ पाकिस्तान के हाथ में परमाणु बम सुरक्षित नहीं- MEA

आगे विदेश मंत्रालय ने कहा, ” ये काफी खेदजनक है कि ये बयान एक मित्र देश की जमीन से दी गई है।” परमाणु हथियार का दम भरने वाले पाकिस्तान का ‘ढोंग’ बताते हुए विदेश मंत्रालय ने कहा कि इस तरह के बयान ये बताता है कि ऐसे देश के हाथ में परमाणु बम कितना सुरक्षित है। ‘आतंकियों से गठजोड़ वाला’ पाकिस्तान पुरी दुनिया के लिए खतरा है।

भारत ब्लैकमेलिंग बर्दाश्त नहीं करेगा- पीएम मोदी

पीएम मोदी ने पहले ही साफ कर दिया था कि भारत ब्लैकमेलिंग बर्दाश्त नहीं करेगा। हम अपनी सुरक्षा के लिए हरसंभव कदम उठाएँगे। ऑपरेशन सिंदूर पर संसद में बहस के दौरान पीएम मोदी ने कहा था, “पाकिस्तान को क्या लगा था कि परमाणु ब्लैकमेल काम करेगा? हमने अपने हिसाब से हमलों का जवाब दिया। कोई परमाणु धमकी हमें रोक नहीं पाएँगी और हम आतंकियों को पनाह देने वालों के साथ भी आतंकियों जैसा ही व्यवहार करेंगे।”

मुनीर के अमेरिका की गोद में बैठकर दिए बयान को भी भारत ‘बकवास’ और ‘बेफिजुल की बातें’ ही करार दे रहा है। भारत का मानना है कि पाकिस्तान जैसा देश जहाँ लोकतंत्र नहीं है और सेना ही सबकुछ करती है, ऐसे देश के पास परमाणु बम होना कितना खतरनाक है, ये भी मुनीर के बयान से समझा जा सकता है।

पाकिस्तानी आर्मी चीफ ने क्या कहा ?

अमेरिकी दौरे पर गए पाक आर्मी चीफ मुनीर ने एक डिनर पार्टी में गीदड़भभकी देते हुए कहा कि भारत के साथ युद्ध में पाकिस्तान के अस्तित्व को खतरा हुआ तो वो इस क्षेत्र को परमाणु युद्ध में झोंक देगा। मुनीर ने कहा, “हम एक परमाणु राष्ट्र हैं, अगर हमें लगता है कि हम डूब रहे हैं, तो हम आधी दुनिया को अपने साथ ले जाएँगे।”

पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने सिंधु जल समझौते को स्थगित कर दिया है। मुनीर ने इस पर भी जहर उगला है। मुनीर ने इस फैसले से 25 करोड़ लोगों को भुखमरी का खतरा बताया। मुनीर ने कहा, “हम भारत के बांध बनाने का इंतजार करेंगे और जब वह ऐसा करेगा, तो हम उसे 10 मिसाइलों से तबाह कर देंगे।”

पाकिस्तान बजरी से भरा ट्रक, भारत चमचमाती मर्सिडीज- मुनीर

मुनीर ने कहा, “भारत एक चमचमाती हुई मर्सिडीज है जो फेरारी की तरह हाईवे पर आ रही है। हम बजरी से भरा एक डंप ट्रक हैं। अगर ट्रक कार से टकरा जाए, तो नुकसान किसका होगा?” ऐसे पाकिस्तानी आर्मी चीफ के बयान पर भारत प्रतिक्रिया देना भी अपनी तोहीन समझता है। लेकिन बात अमेरिका से जुड़ी हुई थी, इसलिए विदेश मंत्रालय ने दोनों देशों को ही लताड़ दिया।