Home Blog Page 2813

कॉन्ग्रेस वर्कर ने की नशा तस्करी की शिकायत, AAP समर्थकों ने किया हमला: धारदार हथियार से 30 वार कर सड़क किनारे तड़पता छोड़ा

पंजाब के तरनतारन (Tarantaran, Punjab) में सत्ताधारी आम आदमी पार्टी (AAP) के समर्थकों ने बुधवार (13 अप्रैल 2022) को कॉन्ग्रेस (Congress) के एक कार्यकर्ता पर तलवार से हमला कर दिया। बताया जा रहा है कि उस पर लगभग 30 वार किए गए हैं। गंभीर अवस्था में घायल व्यक्ति को अस्पताल में भर्ती करवाया गया है। इस मामले में SSP के हस्तक्षेप के बाद केस दर्ज किया गया है। विवाद का कारण नशे के तस्करी की शिकायत करना बताया जा रहा है। वहीं, कुछ मीडिया संस्थान इसे राजनैतिक रंजिश भी बता रहे हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह मामला गाँव ठट्ठियाँ महंता का है। यहाँ के दिलबाग सिंह कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता हैं। पंजाब विधानसभा चुनाव के दौरान उनका आम आदमी पार्टी के कुछ समर्थकों से विवाद हुआ था। घटना के दिन दिलबाग सिंह सुबह 11 बजे के आसपास अपनी 3 साल की बेटी का एडमिशन करवाने नौशहरा पन्नुआ के एक प्राइवेट स्कूल में बाईक से गए थे। इस दौरान उन पर लगभग 5 से 7 हमलावरों ने धारदार हथियारों से हमला कर दिया। उनके हाथ, पैर और सिर को निशाना बनाते हुए लगभग 30 वार किए गए।

हमले के बाद घायल को सड़क के किनारे तड़पता छोड़कर हमलावर फरार हो गए। गंभीर हालात में उन्हें अमृतसर के अमनदीप अस्पताल में भर्ती करवाया गया है। SSP रणजीत सिंह ढिल्लों ने पीड़ित का बयान दर्ज कर आरोपितों के खिलाफ FIR दर्ज करने के आदेश दिए हैं। वहीं, पीड़ित दिलबाग सिंह के घर वालों ने आम आदमी पार्टी के समर्थकों पर हमले का आरोप लगाया है। उनके मुताबिक दिलबाग सिंह को पहले भी धमकियाँ मिल रही थीं।

दिलबाग ने नशे के तस्करों के खिलाफ की थी शिकायत

न्यूज़ 18 से बात करते हुए दिलबाग सिंह के पिता ने बताया, “मेरे बेटे ने नशा तस्करों की शिकायत पुलिस से की थी। इस बात से वो रंजिश रखते थे। उन्होंने मेरे बेटे को बहुत मारा।” वहीं पुलिस के मुताबिक, “आरोपित अजीत सिंह, भिन्दर, राजू तीन सगे भाई हैं। डेढ़ साल पहले भी इनकी लड़ाई हुई थी। उस केस में पंचायत ने दोनों का समझौता कराके राजीनामा लिखवा दिया था। अब फिर मारपीट हुई है। मामला दर्ज कर के आरोपितों की गिरफ्तारी के लिए दबिश दी जा रही है।”

‘पंजाब-हरियाणा में FCI की बजाए अडानी ग्रुप किसानों से खरीद रहा गेहूँ’: मीडिया में किए जा रहे दावों का फैक्ट चेक

सोशल मीडिया पर बीते कुछ दिनों से ऐसे वीडियो वायरल हो रहे हैं, जिनमें देखा जा सकता है कि पंजाब के मोगा जिले में अपनी फसल बेचने के लिए अडानी समूह (Adani Group) के गोदामों के सामने किसान (Farmer) लाइन लगाए खड़े हैं। इसको लेकर कई मीडिया हाउसों ने दावा किया कि लोग सरकारी मंडियों के बजाय अडानी को अपनी फसल बेच रहे हैं, क्योंकि वहाँ फिक्स एमएसपी (MSP) पर गेहूँ की खरीद की जा रही है।

एबीपी सांझा, द खालसा टीवी, द पंजाब टीवी समेत कई अन्य मीडिया आउटलेट्स ने अडानी को फसल बेचने का दावा किया। वहीं, इंडियन एक्सप्रेस और प्रो पंजाब टीवी जैसे दूसरे मीडिया घरानों ने अपनी रिपोर्ट के लिए क्लिकबेट शीर्षक का इस्तेमाल किया। अपनी रिपोर्ट में एबीपी सांझा ने कहा कि किसान आंदोलन के दौरान किसानों ने अडानी समूह का विरोध किया था, लेकिन अब वो खुद अपना गेहूँ अडानी को ही बेच रहे हैं। एबीपी सांझा से बात करते हुए हरप्रीत सिंह नाम के एक किसान ने कहा कि अडानी के पास अपनी उपज बेचकर उन्होंने न सिर्फ समय बचाया, बल्कि 5,000 रुपए का अतिरिक्त फायदा भी हुआ।

वहीं, खालसा टीवी ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया कि कई किसानों ने उसे बताया है कि पंजाब के मोगा और हरियाणा के कैथल में सरकारी मंडियाँ बंद हैं। इसलिए अडानी को उपज बेचने के अलावा उनके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है। खालसा टीवी का आरोप है कि सरकार ने ऐसी व्यवस्था की है, जिससे लोगों को मजबूरी में अडानी के पास ही जाना पड़ता है।

प्रो पंजाब टीवी ने अपनी क्लिकबेट रिपोर्ट में कहा कि किसान अडानी साइलोस को इसलिए चुन रहे हैं, क्योंकि वहाँ पर अच्छी सुविधाएँ हैं। रिपोर्ट में इस बात को भी स्पष्ट किया गया है कि ये गेहूँ अडानी नहीं खरीद रहा है, बल्कि वो केवल भारतीय खाद्य निगम की तरफ से इसका भंडारण कर रहा है। खरीद की प्रक्रिया सरकार कर रही है और इसमें अडानी समूह का कोई नियंत्रण नहीं है।

इस मामले में खास बात ये है कि प्रो पंजाब टीवी ने इस बात का उल्लेख नहीं किया कि किसान एफसीआई को अपनी उपज बेच रहे थे। हालाँकि, उस किसान ने इस बात को कबूल किया कि वह किसान विरोध में शामिल था और एक साल तक दिल्ली सीमा पर रहा। उसका आरोप लगाया है कि किसानों ने राजनीति में आकर धोखा दिया है। इसलिए उसने अपने ट्रैक्टर से किसान विरोध का झंडा हटा दिया और उपज बेचने अडानी के पास आया। उसके ट्रैक्टर पर पंजाबी में लिखा हुआ था ‘मैं किसान हूँ, आतंकवादी नहीं’। उसने रिपोर्टर को बताया कि अडानी साइलोस में बिक्री की प्रक्रिया केवल चार घंटे में ही पूरी हो गई, लेकिन दूसरे जिले की एक सरकारी मंडी में उसके जानकार को गेहूँ बेचने में 5 दिन लगे।

वहीं, पंजाब टीवी ने संयुक्त किसान मोर्चा के एक नेता की 6 मिनट का बयान चलाया, जिसमें उसने कहा कि अडानी समूह के बजाए एफसीआई को गेहूँ बेचे जाने के दावे फर्जी हैं। उसने केंद्र पर किसानों को गुमराह करने का आरोप लगाया। चैनल ने झूठ फैलाया कि केंद्र सरकार सरकारी मंडियों को बंद कर उसे निजी हाथों में देने की योजना पर काम कर रही है। उसने कहा कि किसानों को अडानी के पास अपनी उपज नहीं बेचनी चाहिए।

क्या है सच्चाई

अडानी समूह द्वारा गेहूँ की खरीद किए जाने का दावा गलत है, क्योंकि किसानों से गेहूँ की खरीद एफसीआई के द्वारा की जा रही है और उसका भंडारण अडानी के गोदामों में हो रहा है। अडानी साइलोज को भंडारण के लिए किराए पर लिया गया है और यहीं पर सभी किसान पहले की तरह ही अपनी उपज बेच रहे हैं। द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार (जिसमें किसान अडानी समूह को गेहूँ बेच रहे हैं, यह दिखाने के लिए क्लिकबैट शीर्षक का इस्तेमाल किया गया था), ये साइलो 2007 से ही काम कर रहा है।

अडानी एग्री लॉजिस्टिक के साइलो की क्षमता 2 लाख टन है। हर बार गेहूँ के मौसम में इसे लगभग 90,000 टन गेहूँ मिलता है। इंडियन एक्सप्रेस ने मोगा में अडानी एग्री लॉजिस्टिक के क्लस्टर मैनेजर अमनदीप सिंह सोनी के हवाले से कहा, “हम एफसीआई को स्टोरेज प्लेस मुहैया करा रहे हैं और इसके बदले में सरकार अडानी ग्रुप को रेंट और हैंडलिंग चार्ज देती है। फसल की खरीद एफसीआई द्वारा ही की जाती है।”

पंजाब के मोगा स्थित एफसीआई के डिविजनल मैनेजर पंकज कुमार सिंघारिया ने ऑपइंडिया से बात करते हुए इन दावों का खंडन किया कि अडानी ग्रुप को गेहूँ बेचा जा रहा था। उन्होंने कहा, “अडानी साइलोज सिर्फ एक भंडारण प्वाइंट है और अडानी समूह की उपज के भंडारण की सुविधा प्रदान करने के अलावा खरीद में कोई भूमिका नहीं है। साइलोज गाँवों के करीब स्थित हैं, जिससे किसानों के लिए उपज बेचना आसान और किफायती हो जाता है। अडानी समूह द्वारा गेहूँ खरीदने का दावा झूठा है। एफसीआई और राज्य एजेंसियाँ ​​अपनी जरूरत के मुताबिक खरीद कर रही हैं।”

टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, अडानी साइलोस में एक बार में ही किसान अपनी फसलों को साफ कर उन्हें उतार सकते हैं। ये उनके लिए आसान होता है। क्योंकि हैंडलिंग भी अडानी साइलोस के द्वारा दिया जा रहा है, इसलिए किसानों को यह सुविधा बेहतर लग रही है। केंद्र सरकार के सुझाव के अनुसार किसानों को एमएसपी मिल रही है और 48 घंटें में इसका पैसा भी अकाउंट में आ जा रहा है।

किसान कुलविंदर सिंह के हवाले से टीओआई ने कहा, “हम स्टॉक को 2,015 रुपए प्रति क्विंटल के एमएसपी पर बेच रहे हैं। ये भ्रामक सूचनाएँ फैलाई जा रही हैं कि किसान अडानी को एमएसपी से अधिक दर पर गेहूँ बेच रहे हैं, जो कि पूरी तरह से झूठ है।” किसानों पर अडानी समूह को फसल बेचने का आरोप लगाने वालों का कहना है कि वो लोग ‘प्रदर्शन के दौरान मारे गए 700+ किसानों के बलिदान’ को भूल गए हैं।

fact-check-is-adani-group-procuring-wheat-in-punjab-and-haryana-fci

‘दंगों में जो घर जले, उनको मामा बनवाएगा’: MP के सीएम ने बताया- गुंडों से छुड़ाए 21000 एकड़ जमीन, गरीबों में बाँटेंगे

उत्तर प्रदेश सरकार की तर्ज पर मध्य प्रदेश सरकार भी अपराधियों के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति के तहत काम कर रही है। अब प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने रामनवमी पर खरगोन में हुए दंगों में अपना घर खोने वाले लोगों को आर्थिक मदद देने का ऐलान किया है। इसके साथ ही सीएम ने दो टूक कहा कि पत्थरबाजों और दंगाइयों का पर बुलडोजर चलते रहेंगे। इन्हें राज्य की संपत्तियों को नष्ट करने की कीमत चुकानी पड़ेगी।

गुरुवार (14 अप्रैल 2022) को अंबेडकर जयंती के अवसर पर भोपाल स्थित मोतीलाल नेहरू स्टेडियम में सीएम ने दंगों पर बात करते हुए कहा, “गुड फ्राइडे, ईद या फिर हनुमान जयंती हो प्रेम से मनाइए सरकार सभी के साथ है। जिनके घर जलाए गए हैं, उनके घरों को मामा फिर से बनवाएगा, लेकिन जिन्होंने घरों को जलाया है, उनसे इसकी वसूली करूँगा। छोड़ूँगा नहीं।”

माफियाओं और दंगाइयोंपर की जा रही प्रशासनिक कार्रवाई को लेकर सीएम शिवराज ने कहा कि मध्य प्रदेश में लगातार बुलडोजर चल रहे हैं। अभी तक हमने बुलडोजर के दम पर माफियाओं से 21 हजार एकड़ की जमीनों को मुक्त करा लिया है। सीएम ने कहा, “गुंडों और माफियाओं से मुक्त कराई गई 21 हजार एकड़ जमीन को गरीब लोगों में बाँट दिया जाएगा।”

खरगोन हिंसा को लेकर फर्जी फोटो पोस्ट करने पर उन्होंने पूर्व सीएम दिग्विजय सिंह को भी फटकार लगाई। उन्होंने कहा,”सिंह ने राज्य में धार्मिक अशांति पैदा करने की साजिश रची औऱ प्रदेश में सांप्रदायिक दंगे भड़काने की कोशिश की। मेरे राज्य में सांप्रदायिक दंगे भड़काने की कोशिश करने वाले किसी को भी मैं माफ नहीं करूँगा।”

इस दौरान उन्होंने ये भी स्पष्ट किया है कि जिस तस्वीर को दिग्विजय सिंह ने शेयर किया था वो मध्य प्रदेश की है ही नहीं। गौरतलब है कि खरगोन हिंसा को हिंदू साम्प्रदायिकता और मुस्लिमों को पीड़ित दिखाने की कोशिशों के तहत दिग्विजय सिंह ने ट्वीट किया था, “क्या तलवार लाठी लेकर धार्मिक स्थल पर झंडा लगाना उचित है। क्या खरगोन प्रशासन ने हथियारों को लेकर जुलूस निकालने की इजाजत दी थी? क्या जिन्होंने पत्थर फेंके चाहे वो जिस भी धर्म के हों, सभी के घर पर बुलडोजर चलेगा? शिवराज जी मत भूलिए.. आपने निष्पक्ष होकर सरकार चलाने की शपथ ली है।” हालाँकि, बाद में कॉन्ग्रेस नेता ने अपने ट्वीट को डिलीट कर दिया था।

दिग्विजय सिंह द्वारा डिलीट किया गया ट्वीट (साभार: ट्विटर)

खरगोन दंगे

गौरतलब है कि 10 अप्रैल 2022 को खरगोन के तालाब चौक इलाके में शुरू हुई रामनवमी जुलूस में डीजे बजाने को लेकर मुस्लिमों ने विवाद खड़ा किया। इसके बाद तो हिंसा का दौर शुरू हो गया पत्थरबाजी और आगजनी की गई। दंगाइयों ने कई गाड़ियों को जला दिया। उन्मादी भीड़ को कंट्रोल करने के लिए पुलिस ने आँसू गैस के गोले दागे। इस हिंसा में छह पुलिस कर्मियों समेत कुल 24 लोग घायल हो गए थे।

’29 अप्रैल को हरियाणा के हर DC ऑफिस पर खालिस्तानी झंडे लहराए जाएँगे’: SFJ आतंकी पन्नू की धमकी, Video

प्रतिबंधित आतंकी संगठन ‘सिख फॉर जस्टिस’ (SFJ) ने एक बार फिर खालिस्तान (Khalistan) का राग अलापा है। उसने 15 अप्रैल 2022 (शुक्रवार) को ‘हरियाणा बनेगा खालिस्तान’ नाम से एक पत्र जारी किया है। इस पत्र में गुरुग्राम के DC ऑफिस पर 29 अप्रैल को खालिस्तान का झंडा लगाने का एलान किया गया है। इसके साथ ही खालिस्तान के लिए हरियाणा में रेफरेंडम की बात भी कही गई है।

SFJ

SFJ के गुरपतवंत सिंह पन्नू ने कहा, “हरियाणा पर पंजाब का अधिकार है। यह अधिकार प्रदर्शित करने के लिए 29 अप्रैल को गुरुग्राम के DC कार्यालय पर खालिस्तान का झंडा लगाया जाएगा। यह खालिस्तान के 36वें घोषणा दिवस के मौके पर होगा।” SFJ ने खालिस्तान का मानचित्र भी जारी कर रखा है जिसमें हरियाणा को भी शामिल किया गया है। इस पत्र में हरियाणा सिख गुरुद्वारा मैनेजमेंट कमेटी (HSGMC) के अध्यक्ष बलजीत सिंह दादूवाल के अलावा ऑल इंडिया सिख स्टूडेंट फेडरेशन (AISSF) द्वारा भी खालिस्तान अभियान में समर्थन मिलने का दावा किया गया है।

इस पत्र में गुरपतवंत सिंह पन्नू द्वारा जारी किए गए एक वीडियो का भी जिक्र किया गया है। इसमें खालिस्तान समर्थक वॉलेंटियर्स की भर्ती की भी घोषणा की गई है। वीडियो में पन्नू कह रहा है, “पंजाब को भारत के कब्ज़े से आज़ाद करवाने के लिए जारी खालिस्तान रेफरेंडम का अगला चरण इटली में 8 मई को होगा। पंजाब के भारत से आज़ाद होने के बाद हरियाणा पंजाब का हिस्सा होगा। 29 अप्रैल को हरियाणा के हर जिले के DC ऑफिस पर खालिस्तान का झंडा लगाया जाएगा। हरियाणा के लोग सुन लें कि उनकी जमीन पंजाब का हिस्सा है। यह तुम्हें तय करना है कि तुम्हें पंजाब के साथ जाना है या भारत के साथ।”

भगवंत मान कर चुके हैं चंडीगढ़ को पंजाब में मिलाने की पैरवी

इससे पहले पंजाब के वर्तमान मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के नेता भगवंत मान Punjab CM Bhagwant Mann) चंडीगढ़ को पंजाब में मिलाने की पैरवी कर चुके हैं। उन्होंने 1 अप्रैल 2022 को राज्य विधानसभा में प्रस्ताव पेश करते हुए केंद्र सरकार पर केंद्र शासित प्रदेश के प्रशासन में संतुलन को बिगाड़ने की कोशिश करने का आरोप लगाया था। इसी के साथ चुनाव से पहले पन्नू ने आम आदमी पार्टी के भगवंत मान को एक कथित लेटर लिखा था, जो वायरल हो गया था। गौरतलब है कि चंडीगढ़ को लेकर पंजाब और हरियाणा का पिछले 5 दशकों से अधिक समय से विवाद चल रहा है। दोनों राज्य चंडीगढ़ पर दावा करते हैं।

याद है पाकिस्तानी क्रिकेट टीम का आखिरी भारत दौरा, ​’जासूस’ बनकर खिलाड़ियों के साथ आईं थी बीवियाँ: PCB के पूर्व चीफ का खुलासा

पाकिस्तानी क्रिकेट टीम आखिरी बार 2012-2013 में भारत दौरे पर आई थी। कई पाकिस्तानी क्रिकेटर अपने परिवार के साथ उस समय भारत आए थे। अब पता चला है कि पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड (PCB) ने खिलाड़ियों के साथ उनकी बी​वी को जासूस बनाकर भेजा था। ये खुलासा PCB के पूर्व अध्यक्ष जका अशरफ किया है। उन्होंने बताया है कि 2012-2013 की द्विपक्षीय सीरीज के दौरान उन्हें पाकिस्तानी खिलाड़ियों पर भारत में कुछ गड़बड़ करने का शक था। इसलिए उन्होंने हर खिलाड़ी के साथ उसकी बीबी के जाने का बंदोबस्त किया था।

बता दें कि पूर्व के भारत दौरे पर कई पाकिस्तानी खिलाड़ी मैच के बाद पार्टियों में मस्ती करते हुए पाए गए थे। इसे ध्यान में रखते अशरफ ने सोचा कि अगर खिलाड़ी के साथ उनकी बीबी होंगी तो वे देर रात तक बाहर नहीं घूमेंगे। यह फैसला पाकिस्तानी खिलाड़ियों पर नजर रखने के लिए लिया गया था। अशरफ को डर था कि कहीं भारतीय मीडिया के हाथ कुछ लग गया तो इससे PCB और पाकिस्तान की इमेज खराब हो सकती है। इसलिए अशरफ ने तय किया कि खिलाड़ियों की हरकतों पर नजर रखने के लिए उनकी बीवी साथ रहेंगी।

अशरफ ने आरोप लगाया कि जब भी पाकिस्तान की टीम इंडिया के दौरे पर आती थी तो भारतीय मीडिया उनके खिलाड़ियों की छवि खराब करने की कोशिशों में रहता था। इससे पूरा पाकिस्तान बदनाम हो सकता था। ऐसे में किसी भी बदनामी के खतरे से बचने के लिए उन्होंने बीवियों को जासूस बनाकर भेजने का फैसला किया।

बता दें कि 2012-2013 में पाकिस्तानी टीम 3 वनडे और दो टी-20 मैच खेलने भारत आई थी। टी-20 सीरीज बराबरी पर समाप्त हुई थी, जबकि वनडे सीरीज में पाकिस्तानी टीम ने जीत दर्ज की थी। इस दौरे पर मोहम्मद हाफिज, अजहर अली, युनूस खान, मिसबाह-उल-हक, कामरान अकमल, उमरगुल आदि पाकिस्तानी क्रिकेटर आए थे। उस दौरे के बाद से ना तो पाक खिलाड़ी कभी भारत दौरे पर आए और ना ही टीम इंडिया कभी पाकिस्तान गई। अब इन दोनों चिर प्रतिद्वंद्वियों का मुकाबला केवल आईसीसी प्रतियोगिताओं में ही होता है।

मोहन भागवत ने बताया ‘अखंड भारत’ का रोडमैप: जानिए कैसा होगा नक्शा, पाकिस्तान ही नहीं ये देश भी कभी थे ‘ग्रेटर इंडिया’ का हिस्सा

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने ‘अखंड भारत’ को लेकर बड़ी बात कही है। उन्होंने बताया है कि संघ के लिए यह हमेशा से सर्वोपरि रहा है। जिस तरह से चीजें आगे बढ़ रही है उससे 20-25 साल में यह काम पूरा हो जाएगा। लेकिन सामूहिक प्रयास को गति देने पर यह जल्दी भी पूरा हो सकता है।

भागवत बुधवार (13 अप्रैल 2022) को हरिद्वार में एक कार्यक्रम को संबोधित कर रहे ​थे। उन्होंने कहा, “इसी गति से चले तभी गणना से काम होने वाला है। हम थोड़ी गति और बढ़ा देंगे तो आपने 20-25 साल कहा, मैं 10-15 ही कहता हूँ। उसमें जिस भारत का सपना देखकर हम चल रहे थे, वो भारत स्वामी विवेकानंद ने जिसको अपने मनुचक्षों से देखा था। और जिसके उदय की महर्षि योगी अरविंद ने भविष्यवाणी की थी वो हम इसी देह में, इन्हीं आंखों से अपने इस जीवन में देखेंगे। मेरी शुभकामना भी है, ये आप की इच्छा भी है और हम सबका संकल्प भी है।”

मोहन भागवत ने यह बात (जिसे अखंड भारत के संदर्भ में देखा जा रहा है) अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष स्वामी रवींद्र पुरी के आकलन का समर्थन करते हुए कही। स्वामी पुरी ने कहा था कि ज्योतिषीय गणना के अनुसार 20-25 साल में अखंड भारत का सपना पूरा हो सकता है। वैसे यह पहला मौका नहीं है जब भागवत ने अखंड भारत पर जोर दिया है। इससे पहले फरवरी 2021 में उन्होंने कहा था,”आने वाले समय में अखंड भारत की ज़रूरत है। भारत से अलग होने वाले क्षेत्र जो वर्तमान में खुद को अलग मानते हैं, उनके लिए भारत से जुड़ना आवश्यकता है। ऐसे कई क्षेत्र जो खुद को भारत का हिस्सा नहीं मानते हैं उनमें अस्थिरता है।”

भागवत के बयान से एक बार फिर अखंड भारत पर चर्चा ने जोर पकड़ लिया है। लेकिन, क्या आपको पता है कि पाकिस्तान के अलावा कई अन्य देश भी हैं जो कभी भारत का हिस्सा हुआ करते थे? आगे हम आपको उन देशों के बारे में बता रहे हैं ताकि आप समझ सके कि अखंड भारत का सपना पूरा होने के बाद मानचित्र किस तरह का हो सकता है।

नेपाल

भले ही आज नेपाल के नेता अपने लोगों को खुश करने के लिए कहते हैं कि उनका देश कभी भी भारत का हिस्सा नहीं था, लेकिन लिच्छवि गणराज्य (400-750 CE) के अंतर्गत जो भी क्षेत्र आते थे, उनमें नेपाल भी शामिल था। उससे पहले वहाँ किरात वंश का शासन हुआ करता था। नेपाल में राजा जनक के महल के साथ-साथ वाल्मीकि आश्रम होना भी यह बताता है कि ये क्षेत्र कभी भारत का हिस्सा हुआ करता था।

लिच्छिवि राज्यों ने वैशाली को अपनी राजधानी बनाया था। अंग्रेजों का नेपाल के साथ 1816 में युद्ध भी हुआ था। नेपाली सैनिकों ने बहादुरी से लड़ाई की, लेकिन अंग्रेजों की जीत हुई। नेपाल ने खुद ही समर्पण करते हुए अपने कई क्षेत्र अंग्रेजों को दे दिए, जिसके बाद उनमें समझौता हुआ। इसके बाद अंग्रेजों ने बड़ी संख्या में नेपालियों को अपनी सेना में भर्ती किया। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में कई बार आग्रह के बावजूद नेपाल के नेताओं ने भारत की मदद नहीं की।

पाकिस्तान और बांग्लादेश

बांग्लादेश ही सबसे ताज़ा देश है, जो कभी भारत का हिस्सा हुआ करता था। इंदिरा गाँधी के समय में भारत-पाकिस्तान में युद्ध हुआ, जिसके बाद बांग्लादेश को आज़ादी मिली। इससे पहले ये पूर्वी पाकिस्तान हुआ करता था। पाकिस्तान की फ़ौज ने यहाँ के विद्रोह को दबाने के लिए क्रूरता अपनाई। कई महिलाओं का बलात्कार किया गया और कइयों की हत्या की गई। अंत में पाकिस्तान ने भारत पर हमला कर दिया, जिसके बाद बांग्लादेश आज़ाद हुआ।

ठीक इसी तरह, 1947 में भारत की स्वतंत्रता से ठीक 1 दिन पहले पाकिस्तान को भी कथित आज़ादी मिली। आज का पाकिस्तान कभी भारत का एक बड़ा हिस्सा हुआ करता था, लेकिन इस्लामी शासकों ने लाहौर जैसे शहरों को अपना अड्डा बनाया था और यहाँ मुस्लिम जनसंख्या अच्छी-खासी बढ़ गई। मोहम्मद अली जिन्ना जैसों ने इसका फायदा उठाया और कॉन्ग्रेस ने भी देश के विभाजन के लिए हामी भर दी।

अफगानिस्तान

वो अंग्रेज ही थे, जिन्होंने ‘ब्रिटिश इंडिया’ और अफगानिस्तान के बीच डुरंड रेखा खींच दी थी। इस फैसले पर 12 नवंबर, 1893 को ब्रिटिश अधिकारी सर मोर्टिमर डुरंड और अफगानिस्तान के अमीर अब्दुर रहमान खान ने हस्ताक्षर किए थे। इस क्षेत्र के आसपास पंजाबी और पश्तून समुदाय की अच्छी-खासी जनसंख्या थी। इस्लामी धर्मांतरण का सबसे ज्यादा प्रभाव अफगानिस्तान में हुआ था, लयोंकी अरब यहीं से भारत में घुसे थे।

अफगानिस्तान में मुस्लिम शासकों ने कंधार और काबुल जैसे शहरों का नामकरण कर के इन्हें अपना अड्डा बनाया। अगर हम महाभारत काल तक भी पीछे जाएँ तो उसमें अफगानिस्तान में स्थित गांधार साम्राज्य का जिक्र मिलता है। इसीलिए, शकुनि को ‘गांधार नरेश’ व धृतराष्ट्र की पत्नी को गांधारी कहा जाता था। 1750 तक अफगानिस्तान को भारत का हिस्सा ही माना जाता था। अफगानिस्तान पर कभी कुषाण वंश का शासन हुआ करता था और कनिष्क के काल में बौद्ध धर्म वहाँ फैला।

श्रीलंका

भले ही भारत और श्रीलंका को समुद्र अलग कर देता हो, लेकिन इसके बावजूद भी ये कभी भारतवर्ष का ही हिस्सा हुआ करता था। श्रीलंका का नाम पहले सीलोन या फिर सिंहलद्वीप हुआ करता था। वहीं सम्राट अशोक के समय इस क्षेत्र का नाम ताम्रपर्णी हुआ करता था। सम्राट अशोक ने अपने बेटे महेंद्र और बेटी संघमित्रा को बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए वहाँ भेजा था। इस तरह ‘अखंड भारत’ की परिकल्पना में श्रीलंका भी शामिल है।

सन् 933 में राजराज चोल के समय में श्रीलंका चोल साम्राज्य का हिस्सा हुआ करता था। उनके बेटे राजेंद्र चोल के कार्यकाल में भारत की नौसेना और मजबूत हुई, जिसके बाद श्रीलंका के कई हिस्से इस साम्राज्य का हिस्सा बन गए। उस समय सिंहला लोग पंड्या साम्राज्य के करीबी हुआ करता थे, इसीलिए उनसे चोल साम्राज्य को कई युद्ध करने पड़े। रामायण काल में श्रीलंका को लंका कहा गया है, ये सभी को पता है।

म्यांमार

म्यांमार भी कभी भारत का हिस्सा हुआ करता था। इसका नाम पहले बर्मा था। भारत के स्वतंत्र होने से मात्र 10 वर्ष पहले, 1937 में अंग्रेजों ने इसे भारत से काट कर अलग कर दिया। 1921 में बर्मा की राजनीतिक स्थिति के अध्ययन के लिए साइमन कमीशन को वहाँ भेजा गया था। 1930 में साइमन कमीशन ने इसे भारत से काट कर अलग करने की सिफारिश की। उस समय बर्मा दो गुटों में बँट गया था, जिसमें एक हिस्सा भारत के साथ रहना चाहता था।

बर्मा में कुछ कट्टरवादियों ने एक अलगाववादी समूह बना लिया था, जो भारतीयों के खिलाफ वहाँ अभियान चला रहा था। भारत के लोगों के प्रति घृणा फैलाई जा रही थी। अंग्रेजों का कहना था कि बर्मा एक अलग देश रहा है और ‘अक्समात रूप से प्रशासनिक सुविधा के लिए’ इसे भारत के साथ जोड़ दिया गया था। बर्मा में भारतीयों को प्रवासी बताया जाने लगा और उनके खिलाफ माहौल बनाया गया।

भूटान

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का एक वीडियो वायरल होने के बाद उनकी खूब खिल्ली उड़ाई गई थी, जिसमें उन्होंने भूटान को भारत का हिस्सा बता दिया था। प्राचीन काल में पूरे के पूरे हिमालय को भारत का ही हिस्सा माना जाता था। लेकिन, अगर मौर्य काल में उन्होंने ये बात कही होती तो उन पर कोई नहीं हँसता, क्योंकि तब भूटान भारत का ही हिस्सा हुआ करता था। यहाँ भी साम्राज्य अशोक के समय बौद्ध धर्म फैला।

आज भी भारत व भूटान के रिश्ते काफी मधुर हैं और भारत अपने इस छोटे से पड़ोसी देश के रक्षक के रूप में काम करता है। चीन के साथ दोकलाम विवाद में भारत मजबूती से भूटान के साथ खड़ा रहा था। असम में जब कामरूप साम्राज्य फला-फूला तो भूटान भी इसका एक हिस्सा हुआ करता था। अहोम साम्राज्य का ये एक भाग था। भूटान अर्ध गणराज्य है, जहाँ अब भी देश का सुप्रीम लीडर राजा ही होता है।

ग्रेटर इंडिया

अगर हम ‘अखंड भारत’ की परिकल्पना करते हैं तो मलेशिया और थाईलैंड भी इसमें आएँगे ही आएँगे, क्योंकि इन दोनों जगह कभी भारत से प्रभावित साम्राज्यों का राज हुआ करता था। श्रीविजय, केदारम और मजापाहित जैसे साम्राज्य एक तरह से भारतीय ही थे। चोल साम्राज्य के बारे में भी कहा जाता है कि उसने मलेशिया में विजय हासिल की थी। बाद में पुर्तगालियों ने यहाँ कब्ज़ा जमाया, जैसा उन्होंने गोवा और दमन एवं दीव में किया था।

इंडोनेशिया में भी भारत के प्रभावित ऐसे ही साम्राज्य थे। तभी जावा में आज भी आपको इसकी झलक मिल जाती है। जैसे, उदाहरण के लिए कलिंग्गा साम्राज्य को ले लीजिए, जो बौद्ध धर्म से प्रभावित था। इसी तरह कादिरी साम्राज्य ने भी इंडोनेशिया पर राज किया। जावा में सुंडा साम्राज्य भी था, जिसकी संस्कृति भारतीय ही थी। इस तरह आज जो भारत हम देश रहे हैं, वो अखंड भारत का एक तिहाई भी नहीं है। हमारा अस्तित्व व हमारी पहचान इससे काफी बड़ी है।

क्या RSS के हॉस्पिटल में केवल हिंदुओं का ही इलाज होता है: रतन टाटा की ‘दुविधा’ जब गडकरी ने की दूर, बताया- यहाँ धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं

क्या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) धार्मिक आधार पर भेदभाव करता है? क्या RSS के अस्पताल केवल हिंदुओं के लिए होते हैं? ये सवाल हम आपसे इसलिए पूछ रहे क्योंकि कभी उद्योगपति रतन टाटा भी इनसे जूझे थे। उस समय उनकी दुविधा का समाधान केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी (Nitin Gadkari) ने किया था।

रतन टाटा से जुड़ा यह किस्सा गडकरी ने गुरुवार (14 अप्रैल 2022) को महाराष्ट्र के पुणे में स्थित सिंहगढ़ किला क्षेत्र में एक मल्टी स्पेशलिटी चैरिटेबल अस्पताल का उद्घाटन करते सुनाया। गडकरी ने कहा, “औरंगाबाद में RSS के दिवंगत प्रमुख केबी हेडगेवार के नाम पर एक अस्पताल का उद्घाटन किया जा रहा था। मैं तब राज्य सरकार में मंत्री था। आरएसएस के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने इच्छा व्यक्त की कि अस्पताल का उद्घाटन रतन टाटा द्वारा किया जाए और मुझसे मदद करने के लिए कहा।” यह मामला तब का है जब गडकरी महाराष्ट्र की पहली शिवसेना-भाजपा सरकार में मंत्री हुआ करते थे।

संघ के पदाधिकारी की इच्छा से अवगत होने के बाद गडकरी ने रतन टाटा से संपर्क किया। उन्हें देश में गरीब कैंसर मरीजों के उपचार में टाटा कैंसर अस्पताल के योगदान का हवाला देते हुए उद्घाटन के लिए राजी किया। आगे गडकरी ने बताया, “अस्पताल पहुँचने पर टाटा ने पूछा कि क्या अस्पताल केवल हिंदू समुदाय के लोगों के लिए है। मैंने उनसे पूछा- आप ऐसा क्यों सोचते हैं। उन्होंने तुरंत जवाब दिया, क्योंकि यह आरएसएस का है। मैंने उनसे कहा कि अस्पताल सभी समुदायों के लिए है और आरएसएस में ऐसा कुछ (धर्म के आधार पर भेदभाव) नहीं होता है।” फिर उन्होंने टाटा को संघ से जुड़ी कई बातें बताईं और बाद में वह बहुत खुश हुए।

इसके साथ ही अस्पताल के उद्घाटन के मौके पर केंद्रीय सड़क और परिवहन मंत्री ने कहा कि देश में स्वास्थ्य और शिक्षा के बुनियादी ढाँचे में सुधार के लिए और अधिक काम किए जाने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में जरूरत के अनुसार सुविधाएँ उपलब्ध नहीं हैं। यदि शहरी क्षेत्र में सुविधाएँ हैं, तो ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति अच्छी नहीं है, खासकर शिक्षा की स्थिति। लेकिन सुविधाओं में सुधार हो रहा है। गडकरी ने यह भी कहा कि वह सिर्फ 10 प्रतिशत राजनीति और 90 प्रतिशत सामाजिक कार्य करते हैं।

बंगाल में अब दिव्यांग महिला को अगवा कर टॉर्चर किया, रेप का प्रयास: तृणमूल कॉन्ग्रेस का नेता गिरफ्तार

पश्चिम बंगाल में सत्ताधारी तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के पंचायत सदस्य को एक दिव्यांग महिला के साथ रेप की कोशिश के आरोप में गिरफ्तार किया गया है। राज्य के हंसखली में नाबालिग (Hanshkhali Rape Case) और काकद्वीप में महिला के साथ रेप की घटना के बाद यह केस सामने आया है। कलकत्ता हाईकोर्ट के आदेश के बाद सीबीआई हंसखली रेप केस की जाँच कर रही है।

दिव्यांग पीड़िता के साथ रेप की कोशिश मिदनापुर जिले के पिंगला थाना क्षेत्र के कालूखरा गाँव में की गई। कथित तौर पर टीएमसी नेता ने उसे अगवा कर प्रताड़ित किया और रेप की कोशिश की। गिरफ्तार टीएमसी नेता की पहचान अविजीत मंडल के तौर पर हुई है। आरोपित को 3 दिनों की पुलिस कस्टडी में भेज दिया गया है। घटना 11 अप्रैल 2022 (सोमवार) की है। सहायक लोक अभियोजन अधिकारी सैयद नाजिम हबीब ने इस घटना की पुष्टि की है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक पीड़िता घटना के दिन वह अपनी बड़ी बहन के घर गई थी। रात को वह बर्तन धोने के लिए तालाब पर गई। तभी TMC नेता मंडल ने कथित तौर पर उसका अपहरण कर लिया। इसके बाद पीड़िता के परिजनों ने इस घटना की शिकायत दर्ज करवाई। शिकायत में 2 आरोपितों के नाम हैं। लेकिन एक की ही गिरफ्तारी की बात सामने आई है। घटना के अगले दिन मंगलवार (12 अप्रैल) को मेदिनीपुर के मेडिकल कॉलेज में पीड़िता की जाँच करवाई गई। आरोपित अविजीत 13 अप्रैल (बुधवार) को कोर्ट में पेश किया गया जहाँ से उसे 3 दिन की पुलिस कस्टडी में भेज दिया गया।

ममता सरकार में मंत्री मानस रंजन भूणिया ने कहा है, “रेप एक गंभीर अपराध है। इस पर किसी को राजनीति नहीं करनी चाहिए। घटना में उचित कार्रवाई होगी भले ही आरोपित किसी भी पार्टी का क्यों न हो।” वहीं भाजपा नेता तन्मय दास ने कहा है, “हम CBI जाँच की माँग को ले कर हाईकोर्ट जा रहे हैं। यहाँ की महिला मुख्यमंत्री ही महिलाओं के प्रति संवेदना नहीं रखती हैं। यदि अदालत बीच में न आए तो TMC कार्यकर्ता यहाँ किसी का भी जीना हराम कर देंगे।”

भाजपा ने इस घटना पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की चुप्पी पर भी सवाल उठाए हैं। भाजपा ने पूछा, “क्या मुख्यमंत्री इस बार भी कहेंगीं कि लड़की गर्भवती थी या उसका प्रेम संबंध था?” गौरतलब है कि नदिया जिले के हंसखली में एक जन्मदिन की पार्टी में कथित तौर पर गैंगरेप के बाद नाबालिग लड़की की मौत हो गई थी। इस मामले में मुख्य आरोपित TMC के एक पंचायत सदस्य का बेटा है। इस घटना के सामने आने के बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने गैंगरेप के दावे पर ही सवाल खड़े कर दिए थे। उन्होंने कहा था, “आपको कैसे पता कि उसके साथ रेप हुआ, क्या वो प्रेग्नेंट थी, या लव अफेयर का मामला था या फिर वह बीमार थी।”

‘इस्लाम विरोधी गुरबाणी हटाओ’: जिन्हें कहते हैं ‘सूफी संत’, उनके हुक्म से जहाँगीर ने गुरु को मरवाया, जलती भट्टी पर बिठा डाला गर्म बालू

भारत की महान धरती पर हर सनातनी संप्रदाय में एक से बढ़ कर एक विद्वान और योद्धा हुए हैं, जिनके पदचिह्नों पर चल पर हमारी सभ्यताएँ फली-फूलीं उन्हीं में से एक नाम है सिखों के पाँचवें गुरु अर्जुन देव जी का, जिन्होंने अपना बलिदान दे दिया लेकिन मुगलों के सामने नहीं झुके। 15 अप्रैल, 1563 को पंजाब के तंरतारन स्थित गोयंदवाल जन्मे गुरु अर्जुन देव जी को मुग़ल आक्रांता जहाँगीर के अत्याचारों का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने अपना सिर नहीं झुकाया और न ही अधर्मियों की बात मानी।

जहाँगीर हर हाल में सिख गुरु अर्जुन देव को मृत देखना चाहता था, जिसके काई कारण थे। मुगलों को लगता था कि गुरु ग्रन्थ साहिब में इस्लाम को लेकर कुछ गलत बातें लिखी गई हैं, जिन्हें हटाया जाना चाहिए। जहाँगीर को ये भी लगता था कि गुरु अर्जुन देव जी बागी शहजादा खुसरो की सहायता कर रहे हैं। लेकिन, सबसे बड़ा कारण ये था कि सिख संप्रदाय जिस तरह से आगे बढ़ रहा था, उससे इस्लामी आक्रांता भयभीत हो उठे थे। गुरु अर्जुन देव जी को ‘शहीदों का सरताज’ कहा जाता है।

सिखों के पाँचवें गुरु अर्जुन देव जी: जीवन परिचय

गुरु रामदास की पत्नी बीबी भानी के तीन पुत्र थे – जिनमें सबसे बड़े का नाम पृथ्वी चंद्र था और सबसे छोटे तीसरे पुत्र अर्जुन देव थे। इन दोनों के बीच में जो थे, उनका नाम महादेव रखा गया था। उन दिनों सिखों के तीसरे गुरु अमरदास गोयंदवाल में ही रहा करते थे। गुरु अर्जुन दास तीनों भाइयों में सबको सबसे ज्यादा योग्य लगते थे और साथ ही उनमें अपने पिता और नाना अमर दास के गुण भी भरे पड़े थे। इस कारण सभी उनसे प्रेम करते थे।

उनका विवाह जालंधर जिले के मऊ गाँव के कृष्ण चंद्र की पुत्री गंगा देवी से हुआ था। गंगा देवी की कोख से ही सिखों के छठे गुरु हरगोविंद का जन्म हुआ था। असल में ये उनका दूसरा विवाह था, क्योंकि पहली पत्नी का देहांत हो चुका था और उनकी कोई संतान नहीं हुई थी। एक बार गुरु राम दास ने बेटे की परीक्षा लेने के लिए उन्हें लाहौर में अपने एक रिश्तेदार के विवाह में भेजा और कहा कि उनके बुलाने पर ही वो वहाँ से वापस आएँ।

कार्यक्रम ख़त्म होने के बावजूद जब गुरु का बुलावा नहीं आया तो बेटे को उनकी याद आने लगी। उन्होंने लाहौर में ही गुरु वाणी का सन्देश फैलाने के साथ-साथ सिखों को इकट्ठा करना शुरू कर दिया। उन्होंने तीन पत्र पिता को भेजा, लेकिन उनके ईर्ष्यालु भाई पृथ्वी चंद्र ने इन पत्रों को गुरु तक जाने ही नहीं दिया। अंत में एक पत्र उन्होंने अपने किसी विश्वस्त के माध्यम से भेजा, जब गुरु राम दास ने बाबा बुड्ढा को अर्जुन देव को लाने के लिए भेजा।

गुरु राम दास ने अर्जुन देव को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर के चिरनिद्रा को अपना लिया। लेकिन, पृथ्वी चंद्र को ये रास नहीं आया और वो दिल्ली में मुगलों से जा मिला। उस समय दिल्ली की मुग़ल सत्ता भी हिल रही थी, क्योंकि अंदरूनी बगावतों ने उसे तबाह कर रखा था। जिस तरह अकबर के खिलाफ बेटे सलीम ने बगावत की थी, अब जहाँगीर बन चुके उस सलीम के बेटे खुसरो ने भी अपने अब्बा के खिलाफ बगावत ठोक दी थी।

हालाँकि, उसे युद्ध में हार मिली थी। जब वो पराजित होकर लाहौर जा रहा था तो उसने रास्ते में गुरु अर्जुन देव जी से मुलाकात की थी। शहजादा खुसरो ने सहायता माँगी, लेकिन आक्रांताओं की इस लड़ाई में गुरु अर्जुन देव ने हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया और इसे राजकीय मामला बताया। वो गुरु अर्जुन देव ही थे, जिन्होंने पिछले सिख गुरुओं और कई भारतीय संतों की वाणियों को संग्रहित किया। इसके लिए पुस्तकालय तैयार किया गया।

इस संकलन को उन्होंने ‘पोथी साहिब’ नाम दिया था। जहाँगीर के दीवान चन्टू शाह ने भी अपनी बेटी की शादी गुरु अर्जुन दास के बेटे से करने की पेशकश रखी थी, लेकिन गुरु ने उसे साफ़ मना कर दिया। इससे वो बिलबिला उठा था। वो बदला लेने की ताक में रहता था। इसी बीच उसने जहाँगीर को उकसा दिया कि गुरु अर्जुन देव ने शहजादा खुसरो के साथ बैठक की है और युद्ध में सहायता का आश्वासन दिया है। जहाँगीर ने गुरु अर्जुन देव को अपने दरबार में पेश किए जाने का हुक्म दिया और फ़ौज को भेजा।

गुरु अर्जुन देव जी को हो गया था जहाँगीर की बुरी मंशा का अंदेशा

गुरु अर्जुन देव भाँप गए थे कि जहाँगीर उन्हें जीवित नहीं छोड़ेगा, इसीलिए उन्होंने दिल्ली जाने से पहले हरगोविंद को गद्दी सौंपते हुए अंदेशा जताया कि वो शायद लौट नहीं पाएँगे। उन्होंने कहा कि सिखों में जागृत हुई नई चेतना से जहाँगीर भयभीत हो उठा है। उन्होंने हरगोविंद को शक्तिशाली होने के फायदे समझाते हुए सिखों को संगठित करने में पूरी शक्ति लगाने का आदेश दिया। उन्होंने समझाया कि शक्तिशाली से टकराने की हिम्मत कोई नहीं कर पाता।

गुरु अर्जुन देव जी पर जब शहजादा खुसरो की सहायता का आरोप लगाया गया, तो उन्होंने स्पष्ट किया कि गुरु के दरबार में आने से किसी को रोका नहीं जा सकता और यहाँ जाति-पाति या धर्म-मजहब का भेदभाव भी नहीं चलता है, ऐसे में अन्य लोगों के समान खुसरो भी गुरु के दरबार में आया था और उसे रोकना गुरु परंपरा के विरुद्ध था। 30 मई, 1606 को उन्हें जहाँगीर के आदेश पर मार डाला गया। वो बलिदान हो गए।

उनकी जीवनी के लेखक प्रोफेसर गुरप्रीत सिंह ने लिखा है कि उन्हें पहले रावी नदी के किनारे ले जाया गया। वहाँ एक जलती हुई भट्ठी के ऊपर लोहे की चादर डाली गई, जो काफी गर्म हो उठी थी। उन्हें तपती हुई लोहे की चादर पर बिठा दिया गया और ऊपर से गर्म बालू डाला गया। इस तरह गुरु अर्जुन देव जी को सिख संप्रदाय में ‘प्रथम शहीद’ का दर्जा मिला। इस तरह उन्हें मृत्युदंड दिए जाने के पीछे जहाँगीर के मन में एक और कारण था, वही विचारधारा, जिस पर चल कर आज भी हिन्दू विरोधी हिंसा की जाती है।

जहाँगीर चाहता था कि ‘गुरु ग्रन्थ साहिब’ में इस्लाम के खिलाफ जो बातें लिखी हैं, उन्हें हटा दिया जाए। साथ ही वो सिख गुरु के साथ उनके अनुयायियों को इस्लाम में धर्मांतरित भी करना चाहता था। गुरु अर्जुन देव जी ने उसकी शर्तों को मानने से साफ़ इनकार कर दिया। एक और बात ध्यान दने लायक है कि गुरु अर्जुन देव को 6 दिन तक घोर प्रताड़ना देने और उनके बलिदान के पीछे सूफियों का हाथ है, जिन्हें आज इस्लामी कट्टरपंथी सूफी संत’ कहते हैं। जहाँगीर ने अपनी आत्मकथा में भी लिखा है कि गुरु अर्जुन देव ने इस्लाम अपनाने से इनकार कर दिया था।

इन सूफियों ने जहाँगीर को ज़हर भरा पत्र भेजा था, जिसमें सिख गुरु को मार डाले जाने का हुक्म दिया गया था। इसमें सबसे बड़ा हाथ नक्षबंदी समुदाय के सूफी फकीर शेख अहमद सरहिंदी का हाथ माना जाता है। प्रताड़ना के लिए गुरु अर्जुन देव को लाहौर के शासक को सौंप दिया गया था। ये सब इसके बावजूद हुआ, जब गुरु अर्जुन देव ने हरमंदिर साहिब (स्वर्ण मंदिर) का नींव रखने के लिए ‘सूफी संत’ मियाँ मीर को आमंत्रित किया था। कई दस्तावेजों में ये बात लिखी है

यूपी के बड़े मियाँ-छोटे मियाँ दरगाह में लहराया ‘भगवा’ ध्वज, लोगों का दावा- यहाँ था प्राचीन शनि मंदिर: कार्रवाई के बाद अकबर फरार

उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) के एटा (etah) जिले के जलेसर में स्थित बड़े मियाँ-छोटे मियाँ की दरगाह (Bade Miyan Chhote Miyan Dargah) में शनिजात से पहले हरे रंग की जगह भगवा ध्वज फहरा दिया गया है। यह अगले दिन बुधवार (13 अप्रैल) को भी परिसर में लगा रहा है। वहीं, स्थानीय लोगों का कहना है कि यहाँ पहले शनि मंदिर था और बाद में अतिक्रमण करके दरगाह बना दिया गया है। जैन समाज का दावा है कि उनका एक हिस्सा भी दरगाह में है।

अलीगंज के SDM अलंकार अग्निहोत्री ने बताया कि शनिदेव की पूजा के लिए, जिसे जात कहा जाता है, यहाँ पर भारी संख्या में हिंदू श्रद्धालु आते हैं। इस दौरान वे नेजा (ध्वज) चढ़ाते हैं। लाल रंग का (या भगवा) जो ध्वज लगाया गया है, उसे इन्हीं श्रद्धालुओं ने चढ़ाया है। दूर-दूर लोग दरगाह में जात के लिए बुधवार और शनिवार को आते हैं और पूजा-पाठ करते हैं।

वहीं, जलेसर देहात ग्राम पंचायत के प्रधान शैलेंद्र सिंह का कहना है कि इस स्थान पर शनिदेव का एक प्राचीन मंदिर स्थित था और दरगाह से जुटे लोगों ने धीरे-धीरे करके पूरे मंदिर का अतिक्रमण कर लिया। अब मंदिर का अस्तित्व ही खत्म हो गया। स्थानीय विधायक संजीव दिवाकर भी का भी यही मानना है।

बता दें कि इस दरगाह में शनिजात के चढ़ावे में आने वाले करोड़ों रुपए और सामानों के घोटाले का मामला भी सामने आ चुका है। घोटाला सामने आने के बाद प्रशासन ने दरगाह को अपने कब्जे में ले लिया है। यहाँ की व्यवस्था के लेकर हर इंतजाम अब प्रशासन के हाथ में आ चुका है। यहाँ चढ़ावे में सालाना लगभग 5 करोड़ रुपए आते हैं। अब यहाँ जो भी पैसा चढ़ावे में आएगा, वह सरकारी कोष में जमा कराया जाएगा।

इसके पहले यह दरगाह बड़े मियाँ दरगाह कमिटी के पदाधिकारियों के परिजनों के कब्जे में था। यह परिवार बड़े मियाँ और छोटे मियाँ, दोनों दरगाहों का प्रबंधन देखता था। घपले के बाद जब प्रशासन ने कार्रवाई शुरू की तो वे जलेसर छोड़ कर भाग गए। दरगाह की देखरेख की जिम्मेवारी कुछ स्थानीय लोगों को प्रशासन ने सौंपी हैं।

दरगाह में बड़े मियाँ और शनि मंदिर में श्रद्धालु अधिक आते हैं। वहीं, जैन समाज बुधवार को होने वाले जात का प्रबंधन देखता है। यहाँ घोटाले और हेराफेरी को लेकर जाँच जारी है। प्रशासन का कहना है कि अगर कोई इसमें दोषी पाया जाता है तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।

बता दें कि ग्राम प्रधान शैलेंद्र सिंह राजपूत ने 14 मार्च 2022 को इस घोटाले की तहरीर दी थी और कमिटी के विरुद्ध जाँच की माँग की थी। उसके बाद जलेसर की दरगाह कमिटी के सदस्यों के खिलाफ करीब 99 करोड़ रुपए के गबन को लेकर मामला दर्ज किया गया है। इसमें दरगाह कमिटी के अध्यक्ष मोहम्मद अकबर सहित 9 लोगों पर केस दर्ज किया गया है, जिसके बाद से सभी फरार हैं। इन पर दरगाह का पैसा गबन कर अकूत संपत्ति जुटाने का आरोप है।