जम्मू-कश्मीर में एक सरकारी किताब में आतंकियों के महिमामंडन और भारत को लेकर उल्टा सीधा लिखने पर बवाल मचा हुआ है। इस किताब में जहाँ एक और मकबूल भट्ट जैसे आतंकी को शहीद बताया गया है तो वहीं अलगाववादियों की तारीफ की गई है। साथ ही, ‘भारत के कब्जे वाला कश्मीर’ जैसे शब्दों का भी इस्तेमाल किया गया है। जम्मू और कश्मीर (J&K) प्रशासन ने ‘अलगाववाद’ को बढ़ावा देने वाली यह सामग्री मिलने के बाद शनिवार (4 जुलाई 2026) को 8 शिक्षा अधिकारियों को निलंबित और लेखकों-पब्लिशर्स को ब्लैकलिस्ट कर दिया है।
विवादित किताब में क्या लिखा गया है?
यह विवाद जम्मू-कश्मीर में सरकार द्वारा सरकारी स्कूलों की लाइब्रेरी के लिए खरीदी गई किताब को लेकर है। एक किताब Personalities and Legends of J&K (जम्मू-कश्मीर की हस्तियाँ और दिग्गज) है जिसे हिलाल अहमद और संतोष मीणा ने लिखा है। यह किताब समग्र शिक्षा, जम्मू-कश्मीर 2025-26 योजना के तहत स्कूलों के पुस्तकालयों के लिए चुनी गई थी।

इस पुस्तक में पेज 23 पर आतंकी मकबूल भट्ट का जिक्र शुरू होता है जिसमें उसे महिमामंडन करते हुए ‘शहीद’ बताया गया है। इसमें लिखा गया है, “मकबूल भट्ट के लिए ‘महान बलिदान’ की उस राह की शुरुआत तब हुई, जब वह सेंट जोसेफ कॉलेज में छात्र थे।”

मकबूल भट्ट से जुड़े हिस्से में की कश्मीर को लेकर भी आपत्तिजनक बातें कही गई हैं। इसमें कश्मीर को IHK (Indian-Held Kashmir) और IOK (Indian-occupied Kashmir) यानी भारत के कब्जे वाला कश्मीर कहा गया है। जम्मू-कश्मीर हमेशा से भारत का अभिन्न अंग रहा है लेकिन इस किताब में वही भाषा बोली गई है जो पाकिस्तान बोलता है।
इसमें लिखा गया है, “पहली बार वापस IHK में प्रवेश…10 जून 1966 को NLF सदस्यों का पहला समूह गुप्त रूप से भारतीय कब्जे वाले कश्मीर में पार गया। मकबूल बट ने अपने समूह के तीन सदस्यों के साथ तीन महीने तक भूमिगत काम किया और IOK में कई गुरिल्ला सेल स्थापित किए।”

किताब में मकबूल को शहीद बताते हुए लिखा गया है, “इस तरह आधुनिक कश्मीरी इतिहास के सबसे महान क्रांतिकारियों में से एक का जीवन समाप्त हो गया और वह जन्मा, जिसे कश्मीरी शहीद-ए-आजम यानी सबसे महान शहीद के रूप में याद करते हैं।”

इस पुस्तक मकबूल के महिमामंडन के साथ भारत को कब्जा करने वाला और दमनकारी राज्य बताया गया है। पुस्तक में लिखा गया है, “भारत को लोकतांत्रिक दुनिया में पृथ्वी का सबसे बड़ा लोकतंत्र माना जाता है।”
आगे लिखा गया है, “इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारत में लोकतांत्रिक परंपराएँ और संस्थाएँ कहीं अधिक स्थापित हैं लेकिन जब बात कश्मीर की आती है तो भारत एक कब्जा करने वाले और दमनकारी राज्य से अधिक कुछ नहीं है, जो कश्मीर पर औपनिवेशिक ढाँचों और तानाशाही तरीकों से शासन करता है तथा लोकतांत्रिक मूल्यों, मानवाधिकारों और नागरिक स्वतंत्रताओं की बहुत कम परवाह करता है। कश्मीर में भारतीय शासन का यह नव-औपनिवेशिक चेहरा अपने सबसे बुरे रूप में उस तरीके से सामने आया, जिस तरह मकबूल बट को फाँसी दी गई।” पुस्तक में मकबूल को रोमांटिक बताया गया है।

मकबूल भट्ट: अलगाववाद का खूनी चेहरा
कश्मीर के अलगाववादी इतिहास में मकबूल भट्ट को उसके समर्थक चाहे जितना ‘रोमांटिक क्रांतिकारी’ बताने की कोशिश करें, दस्तावेजों और घटनाओं की जमीन पर उसका चेहरा एक सजायाफ्ता आतंकी, हत्यारे और भारत-विरोधी सशस्त्र नेटवर्क के अगुवा का ही है।
मकबूल भट्ट पढ़ाई के बाद वह पाकिस्तान चला गया और वहीं से कश्मीर को भारत से अलग करने की हिंसक राजनीति में उतर गया। उसने नेशनल लिबरेशन फ्रंट यानी NLF से अपना रिश्ता बनाया, जिसे आगे चलकर JKLF की वैचारिक और संगठनात्मक जड़ माना गया। यही JKLF बाद में भारत-विरोधी हिंसा, अलगाववादी अभियान और कश्मीर में आतंकी गतिविधियों का अगुआ बना।
मकबूल भट्ट की असली खूनी फाइल 1966 से खुलती है। वह पाकिस्तान अधिकृत क्षेत्र से जम्मू-कश्मीर में घुसा और अपने साथियों के साथ गुप्त आतंकी सेल बनाने की कोशिश में लगा था। इसी दौरान CID/पुलिस इंस्पेक्टर अमर चंद को अगवा किया गया और उनकी हत्या कर दी गई।
यही वह अपराध था जिसने मकबूल भट्ट की ‘क्रांतिकारी’ छवि का नकाब उतार दिया। कोई आंदोलनकारी पुलिस अधिकारी को अगवा कर गोली नहीं मारता, यह काम आतंकी करते हैं। इसी हत्या केस में सेशन जज नीलकंठ गंजू ने अगस्त 1968 में मकबूल भट्ट को मौत की सजा सुनाई।
1984 में इस खूनी अध्याय का अंतरराष्ट्रीय चेहरा सामने आया। ब्रिटेन के बर्मिंघम में भारतीय राजनयिक रविंद्र हरेश्वर म्हात्रे का अपहरण किया गया। अपहरणकर्ताओं की माँग थी कि भारत मकबूल भट्ट को छोड़े। यानी एक सजायाफ्ता हत्यारे को बचाने के लिए भारतीय राजनयिक को निशाना बनाया गया। जब भारत झुका नहीं तो म्हात्रे की हत्या कर दी गई।
11 फरवरी 1984 को मकबूल भट्ट को दिल्ली की तिहाड़ जेल में फाँसी दे दी गई। मकबूल भट्ट को रविंद्र म्हात्रे हत्या केस में फाँसी नहीं हुई थी। उसकी फाँसी 1966 के इंस्पेक्टर अमर चंद हत्या केस में मिली सजा के आधार पर हुई थी। ऐसे आतंकी को हीरो बनाकर बच्चों को पढ़ाया जा रहा है।
देश विरोधी अलगाववादी हीरो बना दिए गए हीरो
यह कहानी सिर्फ मकबूल भट्ट पर खत्म नहीं होती है। जम्मू-कश्मीर पीपल्स फोरम (JKPF) की ‘भारत का पैसा भारत के खिलाफ’ रिपोर्ट में बताया गया है कि इस किताब कथित अलगाववादियों का भी महिमामंडन किया गया है।
JKPF की रिपोर्ट कहती है कि किताब में कई अलगाववादी नेताओं का परिचय भी सहानुभूति भरे अंदाज में दिया गया है और कई जगह उनकी बातों को उन्हीं के शब्दों में रखा गया है। ये वे नेता हैं जिन्होंने कश्मीर पर भारत की संप्रभुता को खारिज किया, कश्मीर के पाकिस्तान में विलय की बात की और एक मामले में 2008 के मुंबई आतंकी हमले के मास्टरमाइंड तथा संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित अंतरराष्ट्रीय आतंकी हाफिज सईद की तारीफ भी की।
रिपोर्ट बताती है कि पुस्तक में आतंकवादी मकबूल भट्ट के साथ-साथ मसरत आलम भट्ट, सैयद अली शाह गिलानी, मीरवाइज उमर फारूक और शब्बीर शाह शामिल हैं। ये सभी खुले तौर पर पाकिस्तान का समर्थन करते हैं। मसरत आलम भट्ट, शब्बीर शाह, मीरवाइज उमर फारूक, मीरवाइज मौलवी मोहम्मद फारूक और सैयद अली शाह गिलानी अलगाववादी नेता हैं जिनका नाम गैरकानूनी गतिविधियाँ रोकथाम अधिनियम के मामलों, संगठनों पर प्रतिबंध, उकसावे, हिरासत और प्रवर्तन एजेंसियों की कार्रवाइयों से जुड़ा रहा है।
मसरत आलम
मसरत आलम को लेकर JKPF की रिपोर्ट में लिखा है, “किताब एक अलगाववादी के पाकिस्तान-समर्थक रिकॉर्ड को स्वीकृति-भाव से और बिना किसी खंडन के दोहराती है। उसके अपने शब्दों में ‘मैं बचपन से पत्थर फेंकने वाला हूँ’ और ‘यह हमारी जमीन है…हम इसी मिट्टी के बेटे हैं’।”
वहीं, इसी किताब में यह लिखा है कि आलम ने 2008 मुंबई हमलों के मास्टरमाइंड हाफिज सईद का समर्थन किया और हिजबुल मुजाहिदीन प्रमुख सैयद सलाहुद्दीन का पक्ष लिया ‘हाफिज सईद का क्या पैगाम…कश्मीर बनेगा पाकिस्तान’ के नारे लगाए थे। 15 अप्रैल 2015 को उसने अलगाववादी सैयद अली शाह गिलानी का स्वागत करने के लिए श्रीनगर की एक रैली में पाकिस्तानी झंडा फहराया था।
मसरत आलम के खिलाफ 8 जिलों में 47 मामले दर्ज है। मसरत एक खुले तौर पर आतंकी रहा है। 1990 में जब जम्मू-कश्मीर के कश्मीर क्षेत्र में आतंकवाद शुरू हुआ, वह आतंकी संगठन हिज्बुल्ला में शामिल हुआ था। उसे 2 अक्टूबर 1990 को बटमालू में गिरफ्तार किया गया, 11 महीने तक हिरासत में रखा गया और फिर रिहा कर दिया गया। अप्रैल 2015 में वह श्रीनगर में पाकिस्तानी झंडा फहराते और पाकिस्तान-समर्थक नारे लगाते पकड़ा गया और 16 अप्रैल 2015 को बडगाम में फिर गिरफ्तार किया गया। वह अब राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (एनआईए) के आतंकी मामले में तिहाड़ जेल में बंद है।
मीरवाइज उमर फारूक
किताब में मीरवाइज उमर फारूक का भी जिक्र है। मीरवाइज उमर फारूक ऑल पार्टीज हुर्रियत कॉन्फ्रेंस (M) के मुखिया हैं और यह वह साझा संगठन है जिसके संविधान में (गिलानी प्रविष्टि में उद्धृत) कश्मीर को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के ‘जबरन और धोखाधड़ीपूर्ण कब्जे’ के रूप में पेश करने के लिए प्रतिबद्धता जताई गई है।
किताब में लिखा गया है, “उमर फारूक ने कश्मीर के 23 उग्रवादी संगठनों को ऑल पार्टी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस (एपीएचसी) में एकजुट किया। यह 23 कश्मीरी अलगाववादी पार्टियों का एक ढीला-ढाला समूह था, जो खुद को क्षेत्र में कश्मीरियों की वैध आवाज बताता था और कश्मीर पर होने वाली किसी भी बातचीत में शामिल किए जाने की माँग करता था।”
इसमें आगे लिखा है, “वह यह मानते हैं कि भारत और पाकिस्तान के साथ बातचीत होनी चाहिए, बशर्ते कश्मीरियों की आकांक्षाओं को भी सुना जाए। हुर्रियत कॉन्फ्रेंस कश्मीर में दक्षिणपंथी ताकतों का प्रतिनिधित्व करती है। युवा, आधुनिक और व्यावहारिक इस्लामी नेता उमर को कई लोग कश्मीर की आखिरी और सबसे बड़ी उम्मीद मानते हैं।”

कैसे बच्चों तक पहुँची किताबें?
JKPF ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि समग्र शिक्षा निदेशालय के एक आधिकारिक पत्र में दर्ज है कि इस किताब को एक निजी प्रकाशक से खरीदा गया था। इसे ‘विशेषज्ञ समिति द्वारा अनुशंसित’ बताया गया और शिक्षा मंत्रालय की नीति के तहत ‘बच्चों की उम्र के हिसाब से उपयुक्त’ प्रमाणित किया गया।
यानी जिस किताब में भारत को कब्जा करने वाला बताया गया, एक दोषसिद्ध आतंकवादी को शहीद की तरह पेश किया गया और अलगाववादी नेताओं को सम्मानजनक जगह दी गई, उसी किताब को बच्चों के लिए उपयोगी, प्रेरक और उम्र के हिसाब से सही पढ़ाई की श्रेणी में रख दिया गया।
जम्मू-कश्मीर के समग्र शिक्षा निदेशालय ने इन किताबों के लिए 24 फरवरी 2026 को जम्मू के मैसर्स ओबेरॉय बुक सर्विस को आर्डर दिया था। इसमें 550 रुपए मूल्य की इन 123 किताबों को खरीदे जाने का जिक्र है।
किताबें जिला स्तर पर संबंधित मुख्य शिक्षा अधिकारी के कार्यालय में 9 अप्रैल 2026 तक या उससे पहले सप्लाई करने को कहा गया था। यह पत्र समग्र शिक्षा जम्मू-कश्मीर के कोऑर्डिनेटर फाजिल इमरान सिद्दीकी के नाम से है। इनमें से 72 किताबें जम्मू, 15 किताबें रामबन और 36 किताबें उधमपुर भेजी गई थीं।

प्रशासन ने की क्या कार्रवाई?
सरकारी स्कूलों की लाइब्रेरी में अलगाववाद से जुड़ी विवादित सामग्री वाली किताबें पहुँचने के मामले में सरकार ने बड़ी कार्रवाई की है। स्कूल शिक्षा विभाग ने पहले दोनों किताबों को तत्काल वापस लेने का आदेश दिया और फिर 4 जुलाई 2026 को 8 अधिकारियों-कर्मचारियों को निलंबित कर दिया। यह किताबें समग्र शिक्षा योजना के तहत सरकारी स्कूलों की लाइब्रेरी के लिए खरीदी गई थीं।
जिन लोगों को निलंबित किया गया है उनमें फाजिल इमरान सिद्दीकी, कोऑर्डिनेटर लाइब्रेरी, समग्र शिक्षा; गुरजीत सिंह, असिस्टेंट कोऑर्डिनेटर, समग्र शिक्षा; संजीव शर्मा, प्रिंसिपल, जीएचएसएस कोरे पन्नू, कठुआ; शाजिया कौसर, एकेडमिक ऑफिसर, एससीईआरटी जम्मू; इम्तियाज अहमद मीर, लेक्चरर, बीएचएसएस वाथूरा, बडगाम; निरंजन शर्मा, लेक्चरर, जीएचएसएस बधात, किश्तवाड़; रेणु मेंगी, लेक्चरर, डीआईईटी जम्मू; और राजमोहिनी, लेक्चरर, जीजीएचएसएस पुंछ शामिल हैं।

निलंबन की अवधि में ये सभी स्कूल शिक्षा विभाग के प्रशासनिक विभाग से अटैच रहेंगे। इसके अलावा कोऑर्डिनेटर लाइब्रेरी, समग्र शिक्षा की सहायता कर रहे संविदा कंप्यूटर असिस्टेंट शेख सुहेल अहमद को भी तत्काल प्रभाव से हटा दिया गया है।
पहली किताब का नाम ‘पर्सनैलिटीज एंड लीजेंड्स ऑफ जम्मू-कश्मीर’ है जिसे हिलाल अहमद और संतोष मीणा ने लिखा है। इसे जम्मू के ओबेरॉय बुक सर्विस ने प्रकाशित किया था। दूसरी किताब ‘ग्रेट पर्सनैलिटीज ऑफ जम्मू एंड कश्मीर’ है जिसे डॉ. सुशांत गिरि ने लिखा है और दिल्ली के अनुराग प्रकाशन ने प्रकाशित किया है।
सरकार ने दोनों किताबों को स्कूलों से वापस मँगाने के साथ-साथ इनके लेखकों और प्रकाशकों को जम्मू-कश्मीर में बैन और ब्लैकलिस्ट कर दिया है। आदेश में यह भी कहा गया है कि इन लेखकों या प्रकाशकों की कोई भी प्रकाशित सामग्री जम्मू-कश्मीर से वापस ली जाएगी।
मामले की जाँच के लिए आईएएस अधिकारी अश्विनी कुमार, वित्त आयुक्त/अतिरिक्त मुख्य सचिव, बिजली विकास विभाग को जाँच अधिकारी बनाया गया है। रोहित शर्मा, जेकेएएस, अतिरिक्त सचिव, सामान्य प्रशासन विभाग को इस मामले में प्रेजेंटिंग ऑफिसर नियुक्त किया गया है। जाँच अधिकारी को 30 दिन के भीतर रिपोर्ट सौंपनी होगी।


