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BBC की गाजा पर डॉक्यूमेंट्री थी प्रोपेगेंडा, हमास आतंकी के लड़के को बनाया हीरो: अब खुद मानी अपनी गलती, कहा- प्रोडक्शन कंपनी ने बोला था झूठ

BBC की गाजा पर बनाई हुई डॉक्यूमेंट्री ‘गाजा हाउ टू सर्वाइव अ वारजोन’ पूरी तरह से प्रोपेगेंडा थी। यह बात BBC ने खुद मान ली है। BBC ने बताया है कि उसने इस डॉक्यूमेंट्री में हमास आतंकी के बेटे को इसमें दिखाया था। इसे BBC ने पीड़ित दिखाने का प्रयास किया था। यह डॉक्यूमेंट्री फरवरी, 2025 में प्रसारित हुई थी।

BBC ने सोमवार (14 जुलाई 2025) को अपनी गलती स्वीकार की है। BBC ने कहा है कि उसने डॉक्यूमेंट्री में संपादकीय नियमों का उल्लंघन किया है। BBC ने बताया है कि बाद में पता चला है कि डॉक्यूमेंट्री में जिस बच्चे ने नैरेशन किया है, वह हमास से जुड़े एक सीनियर आतंकी का बेटा है। यह जानकारी पहले दर्शकों से छुपाई गई।

यह डॉक्यूमेंट्री ‘होयो फिल्म्स’ नाम की एक कंपनी ने बनाई थी। फरवरी 2025 में डॉक्यूमेंट्री प्रसारित होने के बाद बच्चे को लेकर प्रश्न उठे थे। बच्चे को लेकर उठे सवालों के बाद इसे BBC के iPlayer से हटा लिया गया था। अब यह भी सामने आया है कि डॉक्यूमेंट्री बनाने वाले 3 लोग हमास वाली बात जानते थे।

दावा है कि उन लोगों ने BBC से यह बात छुपाई कि जिस लड़के को वह पीड़ित दिखा रहे हैं वह असल में हमास आतंकी का बेटा है। BBC ने बताया है कि डायरेक्टर जनरल टिम डेवी द्वारा कराई गई समीक्षा में BBC की भारी लापरवाही की बात सामने आई है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि डॉक्यूमेंट्री के निर्माण और मंजूरी के समय सही जाँच नहीं की गई।

BBC न्यूज की CEO डेबोरा टर्नेस ने कहा है कि बीबीसी अपनी गलती को स्वीकार करता है और अब इसे सुधारने का प्रयास करेगा। यहूदियों के खिलाफ घृणा से लड़ने वाले एक संगठन ने इस डॉक्यूमेंट्री को जनता के पैसों का दुरुपयोग कहा है और BBC पर सच छुपाने का आरोप लगाया है। अब इस मामले में मीडिया रेगुलेटर ऑफकॉम ने भी जाँच शुरू कर दी है।

HOYO फिल्मस पर उठे सवाल

BBC ने माना है कि डॉक्यूमेंट्री रिलीज करने से पहले तथ्यों की ठीक से जाँच नहीं की गई। वहीं पूर्व ITN CEO और ऑफकॉम के पूर्व कंटेंट रेगुलेटर स्टीवर्ट पर्बिस ने इस मामले में प्रोडक्शन कंपनी होयो फिल्म्स की पारदर्शिता पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं।

BBC Radio 4 के कार्यक्रम ‘वर्ल्ड ऐट वन’  में बात करते हुए पर्बिस ने बताया कि BBC ने कम से कम दो बार इस मामले में सीधे होयो फिल्म्स से सवाल किए थे। जिनके फिर भी होयो फिल्म्स ने बच्चे के पिता को लेकर कोई जानकारी नहीं दी।

पर्बिस ने यह भी कहा कि जब BBC ने पूछा कि क्या किसी तरह का कोई दस्तावेज है जो हमास से संबंध दिखाता हो, तो होयो फिल्म्स ने भरोसा दिलाया कि सोशल मीडिया चेक में कुछ नहीं मिला। जवाब के अधूरे और अस्पष्ट होने के बावजूद BBC ने आगे जाँच नहीं की।

BBC की यही गलती आगे चलकर एक बड़ी संपादकीय चूक साबित हुई। पर्बिस ने साफ कहा है कि यह मामला सिर्फ BBC की गलती नहीं है, बल्कि प्रोडक्शन कंपनी की तरफ से जरूरी जानकारी छिपाने का गंभीर मामला है।

डॉक्यूमेंट्री में क्या दिखाया और क्या छिपाया

‘गाजा हाउ टू सर्वाइव अ वारजोन’ नाम की इस डॉक्यूमेंट्री का निर्देशन जैमी रॉबर्ट्स और यूसुफ हम्माश ने किया था। यह फिल्म चार लड़कों की कहानी दिखाती है, जो इजरायल और हमास के बीच चल रहे युद्ध के बीच गाजा में रह रहे हैं। फिल्म को होयो फिल्म्स ने बनाया था।

इस डॉक्यूमेंट्री की शूटिंग गाजा में अंतरराष्ट्रीय मीडिया के प्रवेश पर लगे प्रतिबंधों के कारण लंदन से दूर बैठकर निर्देशित की गई। डॉक्यूमेंट्री की खास बात यह थी कि इसे एक 13 साल के बच्चे की आवाज में सुनाया गया था ताकि

लेकिन बाद में पता चला कि यह बच्चा एक हमास नेता का बेटा है। यह जानकारी डॉक्यूमेंट्री में नहीं बताई गई थी, जो BBC के संपादकीय नियमों का उल्लंघन है। इस खुलासे के बाद फिल्म की साख पर सवाल उठने लगे और BBC ने इसे फरवरी 2025 में हटा दिया था।

गाजा पर दूसरी डॉक्यूमेंट्री भी हटाई

BBC की CEO डेबोरा टर्नेस ने भी इस डॉक्यूमेंट्री को लेकर बात की। उन्होंने इस दौरान दूसरी डॉक्यूमेंट्री ‘गाजा: डॉक्टर्स अंडर अटैक’ लेकर उठे विवाद पर बात की। उन्होंने बताया कि इस डॉक्यूमेंट्री पर भी प्रश्न उठे थे। इस लिए इसे प्रसारित करने से रोक दिया गया था।

उन्होंने बताया कि BBC के अंदर ही कुछ लोगों ने इस पर सवाल उठाए थे, क्योंकि इस डॉक्युमेंट्री से जुड़ी एक पत्रकार ने सोशल मीडिया पर कुछ आपत्तिजनक बातें कही थीं। बाद में यह फिल्म Channel 4 ने प्रसारित की।

डेबोरा टर्नेस ने कहा कि इस डॉक्युमेंट्री की मुख्य पत्रकार रमिता नवई ने BBC Radio 4 के ‘Today’ कार्यक्रम में जो भाषा इस्तेमाल की, वह BBC की निष्पक्षता के मानकों के खिलाफ थी। उन्होंने कहा, “इसकी वजह से हमारे लिए इस प्रोजेक्ट को जारी रखना नामुमकिन हो गया।” उन्होंने यह भी जोड़ा “BBC का कोई भी पत्रकार ऐसा बयान ऑन एयर नहीं दे सकता।”

गौरतलब है कि 4 जुलाई को रमिता नवई ने BBC रेडियो पर दावा किया था, “इजरायल एक ‘रफ स्टेट’ है, जो वार क्राइम्स, एथनिक क्लिंजिंग और मास मर्डर (फिलिस्तीनियों की सामूहिक हत्या) कर रहा है।”

टर्नेस ने माना- BBC हुआ फेल

BBC की CEO डेबोरा टर्नेस ने BBC Radio 4 से बातचीत में जवाबदेही पर जोर दिया। उन्होंने माना कि BBC कुछ जरूरी सवालों की सही तरह से जाँच नहीं कर पाया। उन्होंने कहा कि BBC ने मामले को गंभीरता से लिया और पूरी जाँच की।

उन्होंने दावा किया कि BBC में किसी को भी नरेटर के हमास से जुड़े उसके पिता के बारे में पता नहीं था। टर्नेस ने स्वीकार किया कि BBC को पता होना चाहिए था।

होयो फिल्म्स ने माँगी माफ़ी

डॉक्यूमेंट्री बनाने वाली कंपनी होयो फिल्म्स ने अब एक बयान जारी कर माफ़ी माँगी है और BBC की बातों को सही माना है। उसने कहा है कि वह BBC की रिपोर्ट को गंभीरता से लेती है। हालाँकि, कंपनी ने BBC को गुमराह करने के किसी भी इरादे से इनकार किया है और कहा है कि वह सुधार करेगी। कंपनी ने आगे कहा कि वह iplayer के लिए डॉक्यूमेंट्री का एक संशोधित संस्करण जारी करने के लिए BBC के साथ काम कर रही है।

BBC महानिदेशक कार्रवाई का किया वादा

BBC के महानिदेशक ने इस गलती को स्वीकार करते हुए इसे एक बड़ी चूक बताया है। उन्होंने इस लापरवाही के लिए माफी माँगी है और कहा है कि BBC इस मामले में दो स्तरों पर कार्रवाई करेगा। उन्होंने कहा कि इसके तहत जिम्मेदार लोगों को जवाबदेह ठहराया जाएगा और ऐसी गलती दोबारा न हो इसके लिए भी जरूरी कदम उठाए जाएँगे। BBC बोर्ड ने भी एक बयान में कहा,”हमारी पत्रकारिता में भरोसा और पारदर्शिता से अधिक महत्वपूर्ण कुछ नहीं है।”

इस साल मार्च में BBC के डायरेक्टर जनरल टिम डेवी ने ‘कल्चर, मीडिया एंड स्पोर्ट सेलेक्ट कमेटी’ को बताया था कि उन्होंने डॉक्युमेंट्री को iPlayer से हटाने जैसा कठिन फैसला लिया था। डेवी ने बताया कि डॉक्युमेंट्री में नरेशन करने वाले लड़के के परिवार को लेकर बार-बार प्रोडक्शन कंपनी से सवाल पूछे गए लेकिन उनका कोई जवाब नहीं मिला।

उन्होंने बताया था कि इस डॉक्युमेंट्री को लेकर BBC को दो तरफ़ से शिकायतें मिलीं। इसमें इजरायल विरोधी लगभग 500 शिकायतें और इसे हटाने को लेकर 1,800 शिकायतें आईं थी।

विदेशी-घुसपैठिए ही नहीं, बिहार में 12.5 लाख ऐसे भी वोटर जो अब नहीं हैं जिंदा: 35.5 लाख लोगों को लिस्ट से बाहर करेगा चुनाव आयोग, अब तक 6.60 करोड़ ने जमा किए फॉर्म

बिहार में वोटर वेरिफिकेशन का काम जोर शोर से चल रहा है। अब तक करीब 7.90 करोड़ लोगों में से 6.60 करोड़ मतदाताओं का गणना फॉर्म जमा कराया जा चुका है यानी करीब 88 फीसदी मतदाताओं का वेरिफिकेशन हो चुका है। अब तक 5.74 करोड़ फॉर्म चुनाव आयोग की वेबसाइट पर अपलोड किया जा चुका है। बीएलओ अभी भी घर-घर जाकर फॉर्म जमा कर रहे हैं और 963 एईआरओ लगातार इस पूरी प्रक्रिया पर नजर बनाए हुए हैं।

चुनाव आयोग ने कहा, “करीब 1 लाख बीएलओ जल्द ही घर-घर जाकर तीसरे राउंड का दौरा शुरू करेंगे। सभी राजनीतिक दलों के 1.5 लाख बूथ-स्तर के एजेंट हर दिन 50 मतदाता पहचान पत्र सत्यापित और जमा कर सकते हैं। बिहार के 261 शहरी स्थानीय निकायों (यूएलबी) के सभी 5,683 वार्डों में विशेष शिविर भी लगाए जा रहे हैं ताकि कोई भी मतदाता वोटर लिस्ट में शामिल होने से वंचित न रह जाए”

(ग्राफिक्स साभार- न्यूज 18)

किसके नाम कटे हैं?

अब तक की कवायद में ही करीब 35.50 लाख से ज्यादा मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटाए जा चुके हैं जिनमें मृतकों के नाम, डुप्लिकेट मतदाता या प्रवासियों के नाम शामिल हैं। इसमें लगभग 12.55 लाख (1.59%) पंजीकृत मतदाता शामिल हैं, जिनकी मृत्यु हो चुकी है। करीब 17.37 लाख मतदाता (2.2%) स्थायी रूप से राज्य से बाहर चले गए हैं। 5.76 लाख (0.73 फीसदी) ऐसे मतदाता हैं जिन्होंने एक से अधिक जगहों पर अपना नाम वोटर लिस्ट में रखा हुआ है।

चुनाव आयोग को नेपाल, बांग्लादेश और म्यांमार जैसे देशों के कुछ विदेशी नागरिक भी मिले, जो मतदाता के रूप में पंजीकृत थे। जाँच के बाद उनके नाम मतदाता सूची से हटा दिए जाएँगे।

राज्य से बाहर रहने वाले मतदाता ऐसे भरें फॉर्म

जो मतदाता अस्थायी रूप से राज्य से बाहर हैं, उनसे या तो सीधे संपर्क किया जा रहा है या उन्हें अखबारों में विज्ञापन देकर जानकारी दी है ताकि वे अपने गणना फॉर्म भर सकें।

चुनाव आयोग ने कहा, “अस्थायी रूप से राज्य से बाहर रहने वाले मतदाता अपने मोबाइल फोन का उपयोग करके ECINet ऐप या https://voters.eci.gov.in पर ऑनलाइन गणना फॉर्म भर सकते हैं। अगर उनके परिवार का कोई सदस्य राज्य में मौजूद है तो व्हाट्सएप या किसी अन्य माध्यम से एप्लिकेशन फॉर्म लेकर ऑनलाइन BLO को भेज सकते हैं।”

चुनाव आयोग ने कहा है कि अगर कोई गलती सुधारना चाहता है या कोई अपडेट करना चाहता है तो ऑनलाइन कर सकता है।

विपक्ष पहुँचा सुप्रीम कोर्ट

बिहार में मतदाता सूची संशोधन का विपक्ष लगातार विरोध कर रहा है। इसको लेकर चुनाव आयोग भी विपक्ष के निशाने पर है। महुआ मोइत्रा, योगेंद्र यादव, मनोज झा और एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) सहित कई विपक्षी नेताओं और संगठनों ने इसको लेकर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि चुनाव आयोग ने नागरिकों पर ही पहचान साबित करने का भार डाल दिया है। राज्य में प्रवासियों की संख्या और गरीबी को देखते हुए ये गलत है। चुनाव आयोग ने जिन दस्तावेजों की माँग की है इससे लाखों मतदाता वोटिंग प्रक्रिया से वंचित रह जाएँगे। उन्होंने मतदाता प्रमाण पत्र के रूप में आधार कार्ड को शामिल नहीं करने पर भी सवाल उठाए।

हालाँकि सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (10 जुलाई 2025) को एसआईआर पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने हालाँकि सुझाव दिया कि चुनाव आयोग आधार कार्ड, ईपीआईसी कार्ड और राशन कार्ड को भी पहचान पत्र के लिए शामिल करे। मामले की अगली सुनवाई 28 जुलाई को होगी।

सीमांचल राज्यों में मिले थे जनसंख्या से ज्यादा आधार कार्ड

बिहार के सीमांचल 4 जिलों कटिहार, पूर्णिया, किशनगंज और अररिया में आधार कार्ड की संख्या आबादी से अधिक मिली है। इन सीमांचल इलाकों में 100 लोगों पर 120-126 आधार कार्ड मिले हैं। इससे आधार कार्ड की विश्वसनीयता पर ही सवाल उठ गए हैं। ऐसे में आधार कार्ड को पहचान पत्र में शामिल नहीं करने के फैसले पर सवाल नहीं उठाया जाना चाहिए।

बिहार के उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने बताया है कि 2025 में जनवरी से मई तक हर महीने औसतन 26 हजार से लेकर 28 हजार आवेदन निवास प्रमाण पत्र के लिए किशनगंज में आ रहे थे। उन्होंने बताया कि जैसे ही चुनाव आयोग की यह प्रक्रिया चालू हुई यह संख्या तेजी से बढ़ गई।

उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने बताया कि जुलाई के 6 दिनों में ही निवास प्रमाण पत्र बनवाने के लिए 1.28 लाख से अधिक आवेदन किशनगंज में आ गए। उन्होंने कहा कि इससे पता चलता है कि किशनगंज में घुसपैठिए बड़ी संख्या में मौजूद हैं।

विदेश मंत्री जयशंकर ने की चीनी राष्ट्रपति जिनपिंग से मुलाकात, PM मोदी-राष्ट्रपति मुर्मू का सन्देश भी पहुँचाया: कहा- व्यापार में ना डालो अड़ंगा, 6 साल बाद हुआ है दौरा

विदेश मंत्री एस जयशंकर ने मंगलवार (15 जुलाई 2025) को चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात की। 2020 की गलवान घाटी के संघर्ष के बाद पहली बार दोनों देशों के नेताओं ने मुलाकात की। विदेश मंत्री एस. जयशंकर वर्तमान में शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के विदेश मंत्रियों की बैठक के लिए बीजिंग में पहुँचे हैं।

चीनी राष्ट्रपति से मुलाकात की जानकारी विदेश मंत्री ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर दी। उन्होंने लिखा, “बीजिंग में राष्ट्रपति शी चिनफिंग से बातचीत की। उन्हें राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की शुभकामनाएँ दीं। हमारे द्विपक्षीय रिश्तों की प्रगति के बारे में भी चर्चा हुई। इस दिशा में हमारे नेताओं के मार्गदर्शन का अहम योगदान रहा।”

अपनी मुलाकात में दोनों नेताओं ने सीमा विवाद, व्यापारिक सहयोग, और क्षेत्रीय स्थिरता जैसे कई मुद्दों पर चर्चा की। यह मुलाकात दोनों देशों के बीच संबंधों को सामान्य करने और संवाद को आगे बढ़ाने की दिशा में एक सकारात्मक संकेत मानी जा रही है।

इस मुलाकात में भारत और चीन के बीच कैलाश मानसरोवर यात्रा के शुरू पर भी खुशी जताई। राष्ट्रपति से मिलने से पहले विदेश मंत्री जयशंकर ने चीनी उपराष्ट्रपति हान झेंग और विदेश मंत्री वांग यी से भी मुलाकात की थी।

जयशंकर की चीनी राष्ट्रपति के साथ ये पहली मुलाकात है। शी जिनपिंग विदेश मंत्रियों से अक्सर मुलाकात में दिलचस्पी नहीं दिखाते। अब इस मुलाकात के बाद दोनों देशों के बीच चल रहे तल्ख रिश्तों में नर्मी आने का अंदेशा जताया जा रहा है।

विदेश मंत्री ने चीन के साथ बातचीत में व्यापारिक प्रतिबंधों पर बात की। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, चीन भारत के मैनिफैक्चरिंग सेक्टर में नुकसान पहुँचाने वाले कदमें से परहेज करे। इसी के साथ पर्यटन को मजबूत करने के लिए सीधी उड़ान के साथ यात्रा की प्रक्रिया को सरल बनाने की बात भी कही है।

SCO में भारत का रुख स्पष्ट

SCO की बैठक में जयशंकर ने भारत के आतंकवाद के कड़े रुख पर अपनी सीधी बात रखी। उन्होंने कहा कि जब SCO का मूल उद्देश्य ही आतंकवाद से लड़ना है, तो उसके संयुक्त बयान में आतंकवाद का उल्लेख न होना भारत को स्वीकार नहीं है। जयशंकर ने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के उस फैसले को भी दोहराया जिसमें उन्होंने पहलगाम आतंकी हमले का ज़िक्र न होने के कारण दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया था।

जयशंकर ने यह भी कहा कि भारत आतंकवाद के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति अपनाता है और ऐसे देशों की आलोचना करने से नहीं हिचकिचाना चाहिए जो आतंकवाद को नीति के रूप में इस्तेमाल करते हैं।

बता दें कि SCO देशों में भारत, चीन के साथ पाकिस्तान भी शामिल है। SCO देशों में चीन, बारत, रूस, पाकिस्तान, ईरान, बेलारूस, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान देश शामिल हैं। 2001 में इसकी स्थापना की गई थी। इसका मुख्यालय चीन के बीजिंग में है। ये संगठन यूरेशिया क्षेत्र में राजनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा सहयोग को बढ़ावा देने के लिए बनाया गया है।

‘मंदिर-देवताओं के हितों की रक्षा करने को न्यायालय बाध्य’: मद्रास HC ने खारिज की फातिमा की याचिका, शौहर इकबाल की मौत के बाद लेना चाहती थी तमिलनाडु के मंदिर की प्रॉपर्टी

मद्रास हाईको्र्ट ने कहा है कि भगवान में आस्था रखने वाला कोई भी व्यक्ति मंदिर की संपत्तियों की सुरक्षा के लिए कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकता है। हाईकोर्ट ने ये भी कहा है कि न्यायालय मंदिर और देवता के हितों की रक्षा करने के लिए बाध्य है।

ये टिप्पणी करते हुए याचिकाकर्ता एए फातिमा नाचिया की दायर अर्जी खारिज कर दी। फातिमा नाचिया चेन्नई के चन्नमल्लेश्वर और चन्न केशवरपेरुमल देवस्थानम की संपत्तियों पर कब्जा चाहती थी।

कोर्ट ने क्या कहा?

मद्रास हाईकोर्ट के जस्टिस एडी जगदीश चंदिरा ने अपने आदेश में कहा, ” मंदिर में रुचि रखने वाला कोई भी व्यक्ति कानून की शरण में आ सकता है और कोर्ट खुद भी मंदिर या देवताओं के हितों की रक्षा करने के लिए बाध्य है।”

क्या था मामला?

दरअसल मंदिर की संपत्ति याचिकाकर्ता फातिमा के शौहर मोहम्मद इकबाल को पट्टे पर दी गई थी। मंदिर प्रबंध कमेटी ने 1994 में उनके खिलाफ दीवानी अदालत में एक याचिका दायर की थी। इस पर सुनवाई करते हुए 2000 में कोर्ट ने इकबाल से पट्टे की जमीन वापस लेने का आदेश पारित किया। इसके बाद इकबाल ने कोर्ट के आदेश के खिलाफ अपील दायर की। इकबाल की मृत्यु के बाद उसकी पत्नी फातिमा ने मुकदमा जारी रखा।

इस पर अब मद्रास हाईकोर्ट ने फैसला दिया है। कोर्ट ने ये भी टिप्पणी की कि याचिकाकर्ता विवाद को अनसुलझा रखने के लिए एक के बाद एक कई आवेदन दायर करके केवल कुछ तकनीकी पहलुओं पर मुकदमे को लंबा खींच रहा है।

ऐतिहासिक मंदिर है पेरुमल देवस्थानम

चन्ना मल्लेश्वरम और चन्ना केशव मंदिर को पेरुमल देवस्थानम कहा जाता है। चेन्नई के इन दोनों मंदिर को जुड़वां मंदिर कहा जाता है। ये मंदिर भगवान विष्णु (चेन्ना केशव) और भगवान शिव (चेन्ना मल्लेश्वर) को समर्पित हैं, साथ ही ये चेन्नई के इतिहास से जुड़े हुए हैं। चेन्ना शब्द से चेन्नई शब्द की उत्पत्ति हुई है। इसलिए हिन्दुओं के लिए ये प्राचीन मंदिर काफी अहम है।

‘भीगी-भागी लड़की’ से लेकर ‘मोहब्बत बरसा देना’ तक… गीतकारों ने सावन में बार-बार लगाई ‘आग’, तलवार और बाण को भी प्यार सिखा देने वाला मास

विक्रम संवत 2082, मास – श्रावण। श्रावण, जिसे लोकभाषा में सावन कहते हैं, अपने साथ कितना कुछ लेकर आता है न? सावन सिर्फ़ झमाझम बारिश, चारों तरफ पसरी हरियाली और खा-खाकर अघाए शाकाहारी पशुओं का ही महीना नहीं है – बल्कि ये रचनात्मकता का शिखर छूने वालों के लिए भी एक आदर्श महीना है। इतिहास तो यही कहता है। बॉलीवुड के गीतकारों ने इसी महीने के ऊपर एक से बढ़कर एक गीत लिखे हैं, जिनपर फिल्मों में एक से बढ़कर एक दृश्य फिल्माए गए हैं। आइए, एक व्यक्तिगत अनुभव से शुरू करता हूँ।

2009 की बात रही होगी। घर में नया-नया फोन आया था जिसमें इंटरनेट चल सकता था – Nokia 2690. शायद पहला ऐसा फोन, जिसमें Opera Mini ब्राउजर चलता था। बड़ा मस्त ब्राउजर था। सुदूर गाँव में इंटरनेट मिल गया था हमें, और क्या चाहिए! नौवीं में थे, गाना भी डाउनलोड करना सीख लिया। साइबर कैफे में जाकर चायनीज फोन में गाने ‘भरवाने’ वाली जेनरेशन अब ख़ुद ही गाने डाउनलोड कर सकती थी।

एक बार मैंने माँ से पूछा, “आपका फेवरिट गाना कौन सा है?” अब एक क्लिक पर गाने उपलब्ध हैं, इसे प्रदर्शित करने का इससे बेहतर मौका क्या हो सकता था। माँ ने कुछ देर सोचकर कहा, “मेरे नैना सावन-भादो, फिर भी मेरा मन प्यासा”। हमने डाउनलोड किया, बजा दिया। परम संतुष्टि! सीमेंट की जगह मिट्टी के ‘गिलेवा’ से जुड़ी ईंटों की दीवारों पर खड़ा घर, जिसके ऊपर की छत मिट्टी से ही गढ़े गए खपरों की थीं, उसके नीचे रह रहे बच्चों ने इंटरनेट सीखकर गाना बजाना भी जान लिया था!

बड़े हुए तो समझ आया कि कैसे आनंद बख़्शी ‘बिजुरी’ में ‘बीते समय की रेखा’ देख रहे थे। सावन में कड़कती बिजली डराती नहीं, अतीत की यादों का दस्तावेज खोलती है- ये भी पता लगा! ये गीत था ‘महबूबा‘ (1976) का! कॉलेज के समय एक गाना सुना, जिसके बोल बार-बार कानों में गूँजते थे:

जब दर्द नहीं था सीने में
क्या ख़ाक मज़ा था जीने में

पिछली वाली घटना से एक दशक बाद की बात है। दिल्ली आ गया था, पत्रकारिता करने लगा था। एक बार हमलोग गाँव जा रहे थे, साथ में छोटा भाई था। हमलोग ऑटो में थे। मैंने देखा कि वो इयरफोन लगाकर गाने सुन रहा है। मैंने फोन लेकर गाना चेंज करने की कोशिश की। उसने झल्लाकर कहा कि पुराना गाना नहीं नहीं सुनना है। फिर भी मैंने किशोर कुमार की आवाज़ वाला वो गाना लगाया – “अब के शायद हम भी रोयें सावन के महीने में, जब दर्द नहीं था सीने में…”। उसने वो गाना पूरा सुना। आनंद हो सकता है कभी-कभार आज भी सुन लेता हो। 1977 में ‘अनुरोध‘ का ये गीत भी आनंद बख़्शी की क़लम से ही निकला था। खैर… फ़ास्ट फॉरवर्ड टू 21वीं सदी नाउ!

आई है रात मतवाली बिछाने हरियाली
ये अपने संग में लाई है सावन को…

जब सावन को लेकर गीत लिखे जाते हैं, तब युद्ध के भयानक अस्त्र-शस्त्र भी कोमल और प्यारे स्वरूपों में परिवर्तित हो जाते हैं। तभी तो जब जावेद अख़्तर ‘लगान’ (2001) का गाना ‘घनन-घनन’ लिखते हैं तो ‘बिजुरी की तलवार’ और ‘बूँदों के बाण’ का ज़िक्र आता है, लेकिन ये युद्ध प्रेमोद्दीपक है, ये खुशियाँ बरसाने वाला है।

हालाँकि, सावन के महीने को इस सदी के किसी गाने से वर्णित करना बड़ा मुश्किल होगा, क्योंकि बड़े-बड़े दिग्गजों का करियर इस महीने ने बनाया है। यकीन न हो तो मुंबई की असली बारिश में फ़िल्माए गए गाने ‘रिमझिम गिरे सावन‘ को उठा लीजिए। ‘मंज़िल’ (1979) ने कारोबार तो औसत ही किया था, लेकिन इस एक गाने ने ‘एंग्री यंग मैन’ के रोमांटिक साइड को युवाओं में स्थापित कर दिया, खाँटी अभिनय के लिए जानी जाने वाली मौसमी चटर्जी को ‘नेशनल क्रश’ बना दिया। जब

जावेद अख़्तर सावन पर गीत लिखते हैं तो तलवार और बाण रोमांस की विषयवस्तु बन जाते हैं, वहीं जब योगेश लिखते हैं तो बारिश और ठंडी हवाओं में भी आग जल उठता है। वरना, मन कैसे सुलगेगा भला? पानी में अगन कैसे लगेगी भला? यही तो ख़ूबसूरती है सावन की, पानी और आग साथ मिल जाते हैं। जब सावन का ज़िक्र हो ही आया है तो बॉलीवुड के OG मल्टीटास्कर को कौन भूल सकता है भला – फिर से किशोर कुमार! केवल योगेश ही सावन में मन सुलगने और अगन लगने की बातें नहीं लिखते हैं, उनसे 2 दशक पूर्व मज़रूह सुल्तानपुरी ये कारनामा कर चुके थे। शायद पानी और आग के मिलन के गुरु वही थे।

‘अजनबी’ किशोर कुमार जब ‘सावन की सूनी रात में’ ‘धुँधलाती और बलखाती हुई’ मधुबाला को देखते हैं तो उन्हें भी ऐसा ही लगता है कि वो ‘दिल ही दिल में जली जाती है।’ मज़रूह सुल्तानपुरी की बात हो रही है तो ये भी बता दें कि ‘एक लड़की भीगी-भागी सी’ लिखने के 41 साल बाद भी जब वो क़लम उठाते हैं तो ‘दहक’ में भी सावन को ही देखते हैं। कभी उन्होंने सावन में जलन लिखा, कभी उन्होंने ज्वाला में सावन लिखा। मैंने कहा न, सावन ही एकमात्र ऐसा मास है जहाँ गीतकार भीगी धरती में भी अगन देखता है। शायद, ये आग भी शीतल है! कितने अजीब संयोग बनता है न ये सावन! पृथ्वी को भिगोने वाले इस सावन का अग्नि से क्या नाता है, ये समझ नहीं आता।

मज़रूह सुल्तानपुरी और योगेश के बीच हमें कहीं गुलज़ार मिल जाते हैं। यूँ तो गुलज़ार के नाम पर कई नक़ली गीत इंटरनेट के इस ज़माने में चलते रहते हैं, ‘बीबी और मकान’ (1966) का गीत ‘सावन में बरखा सताये’ असली वाला है। ‘अग्नि लगाये कहीं अग्नि बुझाये’… गुलज़ार को भी ‘पल-पल छिन-छिन बरसते’ सावन में अग्नि ही दिखाई देती है। आग की बहुत बात हो गई, आग को बुझाने वाली हवा की ओर बढ़ते हैं। आनंद बख़्शी से शुरू किया था, उनके साथ ही ख़त्म करते हैं।

हम कविताओं में देखते हैं कि कैसे सावन की लयबद्ध हवाओं में कवियों ने संगीत सुना। लेकिन, जब आनंद बख़्शी सावन पर गाना लिखने बैठते हैं तो यही हवा उन्हें शोर करती हुई सुनाई देती है। सावन में शोर (सोर?) भी संगीत है। ये एक गीत आनंद बख़्शी को शीर्ष पर पहुँचा देता है। शोर करते पवन और गजब ढाती पुरवइया के बीच जियरा झूमने लगे, तभी ‘मिलन’ (1967) होता है। ये सावन में ही हो सकता है। ये कोई आनंद बख़्शी ही लिख सकते थे।

‘मेरा मन प्यासा’ वाले आनंद बख़्शी एक दशक पहले ‘मौजवा’ और ‘नदी की धारा’ से संवाद किया करते थे। आनंद बख़्शी का कोई जवाब नहीं है! 1967 के ‘मिलन’ और 1976 की ‘महबूबा’ के बाद 1989 में ‘चाँदनी’ के लिए जब वो क़लम उठाते हैं तो विनोद खन्ना की उदासी को चित्रित करने के लिए सावन की शरण में ही पहुँचते हैं। कमाल की बात तो ये कि फिर से आग लग जाती है, उफ्फ! मैं बार-बार सावन में बरसते पानी को समझने के लिए इन गीतकारों के पास पहुँचता हूँ, ये हैं कि झमाझम बारिश में भी आग तापते जा रहे हैं।

लगी आज सावन की फिर वो झड़ी है
वही आग सीने में फिर जल पड़ी है

ख़ैर, सावन की एक और विशेषता देखिए। ये सबसे बड़ी है। जब टोनी कक्कर भी इसपर गाना लिखता है तो अरिजीत सिंह ऐसा गा देते हैं कि लोग गीतकार को भूल जाते हैं। आज की पीढ़ी के लिए – मोहब्बत बरसा देना तुम, कि सावन आया है… हालाँकि, जिस गाने ने मीका को लोकप्रिय बनाया वो भी कुछ यूँ ही था – “सावन में लग गई आग, कि दिल मेरा हाय”।

वैसे कई गाने हैं जो इस लेख में छूट गए, लेकिन वो भी लाखों लोगों के पसंदीदा हैं और उनका ज़िक्र न होना उनकी लोकप्रियता को ज़रा सा भी कम नहीं करता। आनंद बख़्शी का ही लिखा – ‘आया सावन झूम के‘, ‘तेरी दो टकिये की नौकरी में मेरा लाखों का सावन जाये‘ और लता मंगेशकर की आवाज़ में आया ‘सावन में झूले पड़ें‘ – ये सब एक से बढ़कर एक गाने हैं। शायद अगले सावन में फिर लिखूँगा तो इन्हीं गानों का प्रमुखता से ज़िक्र हो!

AIIMS में ओडिशा की जिस छात्रा से मिलीं थी राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, वह जिंदगी की जंग हारी: यौन उत्पीड़न से तंग आकर खुद को लगा ली थी आग, प्रिंसिपल-प्रोफेसर गिरफ्तार

ओडिशा के बालासोर के कॉलेज में खुद को आग लगाने वाली छात्रा की मौत हो गई है। फकीर मोहन महाविद्यालय की छात्रा सौम्यश्री बीसी, कॉलेज के प्रोफेसर के यौन उत्पीड़न किए जाने से परेशान थी। सुनवाई न होने के पर उसने 12 जुलाई 2025 को प्रिंसिपल कार्यालय के बाहर खुद को आग लगा ली थी। इलाज के लिए उसे एम्स भुवनेश्वर में भर्ती कराया गया था। यहाँ सोमवार (14 जुलाई 2025) की रात 11:46 बजे उसकी मौत हो गई।

छात्रा बालासोर के फकीर मोहन स्वयंशासित महाविद्यालय में बी.एड इंटीग्रेटेड की पढ़ाई कर रही थी और सेकेंड ईयर की स्टूडेंट थी। उसने कॉलेज के शिक्षा विभाग के प्रमुख समीर कुमार साहू पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था। उसका आरोप था कि प्रोफेसर समीर उसे यौन संबंध बनाने के लिए जबरदस्ती करते हैं।

पीड़िता का कहना था कि समीर ने धमकी भी दी थी कि अगर वह ऐसा नहीं करती है तो उसका भविष्य खराब कर दिया जाएगा। शिकायत करने के बाद भी कार्रवाई नहीं हुई तो प्रिंसिपल कार्यालय के बाहर उसने आत्मदाह कर लिया।

घटना के बाद उसे भुवनेश्वर के एम्स में भर्ती कराया गया था। रिपोर्ट्स के अनुसापीड़िता को बालासोर जिला मुख्यालय अस्पताल से रेफर किए जाने के बाद 12 जुलाई की शाम 5:15 बजे एम्स बर्न्स सेंटर के ICU में लाया गया था। उसकी हालत काफी नाजुक थी, इसलिए उसे वेंटिलेटर पर रखा गया था।

राष्ट्रपति ने की थी मुलाकात

सोमवार (14 जुलाई 2025) को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ओडिशा के AIIMS भुवनेश्वर के 5वें दीक्षांत समारोह में शामिल होने पहुँची थीं। इस दौरान उन्होंने भी बर्न और प्लास्टिक सर्जरी विभाग में जाकर पीड़ित छात्रा सौम्यश्री बीसी से मुलाकात कर उसके स्वास्थ्य की जानकारी ली थी। पीड़िता के भाई के अनुसार  “राष्ट्रपति मुर्मू ने मुझसे कहा कि भगवान जगन्नाथ से प्रार्थना करें, मैं भी करूँगी। आपकी बहन जब ठीक हो जाएगी, तब मैं उसके लिए कुछ करूँगी।”

बता दें कि इस मामले में कॉलेज के प्रिंसिपल दिलीप घोष और शिक्षा विभाग के प्रमुख समीर कुमार साहू को गिरफ्तार कर लिया गया है। छात्रा की मौत के बाद एम्स चिकित्सालय परिसर में मौजूद लोगों में भारी आक्रोश को देखते हुए पुलिस बल भी तैनात कर दिया गया था।

ओडिशा के सीएम मोहन माझी ने छात्रा की मौत पर शोक व्यक्त किया है। उन्होंने एक्स पर लिखा “फकीर मोहन ऑटोनोमस कॉलेज की छात्रा के निधन की खबर सुनकर मुझे गहरा दुख हुआ है। सरकार के सभी प्रयासों और विशेषज्ञ चिकित्सा दल के अथक प्रयासों के बावजूद  छात्रा की जान नहीं बचाई जा सकी। मैं भगवान जगन्नाथ से प्रार्थना करता हूँ कि वे उनके परिवार को इस अपूरणीय क्षति को सहन करने की शक्ति प्रदान करें”।

जानकारी के मुताबिक सौम्यश्री बीसी का अंतिम संस्कार उसके पैतृक गाँव बालेश्वर के भोगराई ब्लॉक के पाल्सी में किया जाना है।

‘यूक्रेन के साथ करो शांति समझौता, वरना लगाएँगे 100% टैरिफ’: पुतिन को ट्रम्प ने दिया 50 दिनों का अल्टीमेटम, नाटो के जरिए जेलेंस्की को भेजे हथियार

शांति दूत बनने की होड़ में आगे बढ़ रहे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अब रूस को धमकी दे डाली है। हर देश में संघर्ष रुकवाने का श्रेय लेने वाले ट्रंप ने कहा है कि अगर 50 दिन के अंदर रूस यूक्रेन के साथ शांति समझौता नहीं करता है तो इसका खामियाजा उसे भुगतना पड़ेगा।

डोनाल्ड ट्रंप ने नाटो (NATO) के सेक्रेटरी जनरल मार्क फ्रूट से नाटो के ओवल कार्यालय में बातचीत की। इस दौरान उन्होंने कहा है कि शांति समझौता न करने पर रूस के सामानों पर 100% तक टैरिफ लगाया जाएगा।

इसे लेकर व्हाइट हाउस की ओर से भी एक बयान जारी हुआ है। इस बयान में सेकेंड्री टैरिफ की बात को भी शामिल किया गया है। असल में सेकेंड्री टैरिफ से मतलब उन देशों पर है जो रूस से तेल समेत अन्य सामान आयात करते हैं।

ट्रंप ने कहा है कि रूस से तेल समेत अन्य व्यापार करने वाले देशों पर सेकेंड्री टैरिफ चुकाना होगा। गौरतलब है कि इन देशों में भारत भी शामिल है। अमेरिका को भारत के रूस से तेल लिए जाने पर पहले भी आपत्ति रही है। हालाँकि भारत ने इस आपत्ति को दरकिनार करते हुए रूस से तेल आयात करना जारी रखा है।

व्हाइट हाउस के अनुसार, यदि 50 दिनों के अंदर रूस, यूक्रेन के साथ अपने संघर्षों पर कोई समझौता नहीं कर पता है तो न केवल रूस पर बल्कि उसके साथ व्यापार करने वाले अन्य देशों पर भी बड़े और कड़े टैरिफ लगाए जाएँगे।

रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध को रोकने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप कई बार कोशिश हो चुके हैं, लेकिन नतीजा सिफर ही रहा है। इसके बाद रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन पर दबाव बनाने के लिए ट्रंप ने अपना ‘टैरिफ बम’ फोड़ा है।

बताते चलें कि अमेरिका की ओर से अब तक 25 देश पर टैरिफ की घोषणा की जा चुकी है। कई देशों में डोनाल्ड ट्रंप ने अपने टैरिफ की बात पत्र लिखकर भेजी है। ट्रंप के टैरिफ की नई दरें 1 अगस्त 2025 से लागू की जाएँगी।

हालाँकि इनमें कई देश ऐसे भी हैं जिनको टैरिफ की सूची से अब तक बाहर रखा गया है जिसमें रूस भी अब तक शामिल था। ट्रंप की इस नई शर्त के सामने रूस क्या प्रतिक्रिया देगा, यह जानना दिलचस्प होगा क्योंकि इससे पहले भी ट्रंप की बात को खारिज कर दिया था।

किन देशों पर लगे हैं टैरिफ

ट्रंप ने अपने ‘बिग ब्यूटीफुल बिल’ के तहत कई देशों पर 20 से 50% तक टैरिफ लगाया है। इसके तहत जापान, मलेशिया, दक्षिण कोरिया, फिलीपींस, कजाकिस्तान, ट्यूनीशिया, ब्रुनेई, माल्दोवा पर 25% टैरिफ, श्रीलंका, लीबिया, अल्जीरिया, दक्षिण अफ्रीका, इराक, हर्जेगोविना के साथ यूरोपीय यूनियन के देशों में 30% टैरिफ, इंडोनेशिया पर 32% टैरिफ, कनाडा, बांग्लादेश और सर्बिया पर 35% टैरिफ, थाईलैंड और कंबोडिया पर 36% टैरिफ, म्यांमार और लाओस पर 40% और ब्राजील में 50% तक टैरिफ की दरें शामिल की गई हैं।

रूस को धमकी, यूक्रेन को हथियार

एक तरफ रूस को टैरिफ की धमकी देकर ट्रंप दूसरी ओर यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की के साथ दोस्ती प्रगाढ़ करने की कोशिश कर रहे हैं। ट्रंप ने यूक्रेन को आर्थिक और तकनीकी यहयोग देने की बात कही है।

अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में ट्रंप ने कहा, ‘नाटो के जरिए कई हजार करोड़ डॉलर के अमेरिकी हथियार यूक्रेन के युद्धक्षेत्र में पहुँच रहे हैं। इसमें एयर डिफेंस, मिसाइल और ड्रोन टेक्नोलॉजी शामिल हैं।’

ट्रंप के विशेष दूत कीथ कैल्लॉग भी कीव पहुँचे हैं। उन्होंने राष्ट्रपति जेलेंस्की से मुलाकात को ‘प्रोडक्टिव’ बताया और कहा कि अब अमेरिका, यूरोप और यूक्रेन मिलकर डिफेंस प्रोडक्शन और खरीद में भी साझेदारी करेंगे।

पहले ‘पायलट की गलती’ वाली खबर चलाई, फिर फ्यूल कंट्रोल स्विच पर किया गुमराह: क्या एअर इंडिया हादसे में विदेशी मीडिया ने पहले ही खोज लिया था ‘कुर्बानी का बकरा’?

एअर इंडिया हादसे की शुरूआती जाँच रिपोर्ट के बाद लगातार एक्शन और आदेशों का दौर जारी है। भारत से लेकर देश-विदेश तक एयरलाइन अपने विमानों की जाँच में जुटी हैं। सरकारें भी उन्हें कील-कांटे दुरुस्त करने को कह रही हैं। लेकिन इस बीच कहानी का एक हिस्सा पहले दिन से अभी तक एक जैसा ही है। यह है किसी तरह पायलटों को दोषी बताने का। चाहे AAIB की जाँच रिपोर्ट के सामने आने से पहले आई विदेशी मीडिया की खबरों की बात हो या फिर जाँच रिपोर्ट के तथ्यों को तोड़ना-मरोड़ना, यह प्रयास अब भी जारी हैं।

इस मामले में सामने आई AAIB की जाँच रिपोर्ट ने बताया था कि एअर इंडिया की फ्लाईट AI 171 के क्रैश होने का कारण फ्यूल कंट्रोल स्विच का बंद हो जाना था। रिपोर्ट में बताया गया था कि इसके चलते इंजनों को तेल नहीं पहुँचा और यह बंद हो गए। रिपोर्ट में यह भी बताया गया था कि फ्यूल कंट्रोल स्विच के बंद होने को लेकर पायलटों की आपस में बात हुई थी। इस बातचीत में एक पायलट ने स्विच बंद करने को लेकर दूसरे से पूछा और दूसरे पायलट ने इससे इनकार कर दिया।

अब इस मामले में अमेरिकी विमान नियामक FAA और विमान निर्माता बोइंग ने दावा किया है कि उसके विमानों में फ्यूल कंट्रोल स्विच एकदम सही हैं। FAA ने कहा है कि फ्यूल कंट्रोल स्विच को रोकने के लिए लगाए जाने वाले लॉक को लेकर कोई भी निर्देश जारी करने की जरूरत अभी नहीं दिखाई पड़ती है। FAA के आदेश का अर्थ यह है कि बोइंग के किसी भी विमान में वर्तमान में फ्यूल कंट्रोल स्विच को लेकर जाँच करने की जरूरत नहीं है और बोइंग के हिस्से पर कोई गड़बड़ नहीं है।

FAA की यह एडवायजरी ऐसे समय में आई है जब भारत से लेकर दक्षिण कोरिया और एतिहाद जैसी एयरलाइन अपने विमानों में फ्यूल कंट्रोल स्विच को लेकर नए निर्देश जारी किए हैं। FAA की एडवायजरी एक तरह से बोइंग का बचाव भी करती है। लेकिन यह कोई नया प्रयास नहीं है। ऐसा लगता है कि बोइंग को बचाने की पटकथा शुरुआत से ही लिखी जा रही थी। इसका पहला प्रमाण विदेशी मीडिया की रिपोर्ट लगी थीं।

दरअसल, अमेरिकी अखबार वॉल स्ट्रीट जनरल ने गुरुवार (10 जुलाई,2025) को इसी संबंध में एक खबर प्रकाशित की थी। इस खबर में दावा किया गया था कि जाँचकर्ता अब एअर इंडिया हादसे की जाँच इंजन या अन्य फेलियर के एंगल से नहीं परंतु पायलटों की ‘भूल’ के एंगल से कर रहे हैं। यह खबर तब प्रकाशित की गई थी जब AAIB की जाँच रिपोर्ट सामने नहीं आई थी। बाद में जब AAIB की रिपोर्ट सामने आई तो इसमें पायलटों की भूल की बात तक नहीं की गई।

यह प्रयास सिर्फ वॉल स्ट्रीट जनरल ने नहीं किया था। वॉल स्ट्रीट जनरल के अलावा ब्लूमबर्ग, रॉयटर्स, ABC न्यूज और विमानन पर रिपोर्ट करने वाली वेबसाइट एयर करेंट ने भी विमान हादसे का कारण इंजन को ईंधन पहुंचाने वाले फ्यूल स्विच के ‘गलती से बंद होना’ बताने का प्रयास किया था। इन सभी मीडिया पोर्टल में यह खबरें 8 जुलाई से 10 जुलाई के बीच प्रकाशित हुई थी जबकि AAIB की जाँच रिपोर्ट 12 जुलाई को प्रकाशित हुई थी।

यह प्रयास AAIB रिपोर्ट के बाद रुके नहीं थे। AAIB रिपोर्ट को भी विदेशी मीडिया संस्थानों जैसे रॉयटर्स, बीबीसी, डेली मेल आदि ने इस रिपोर्ट को जानबूझकर गलत तरीके पेश किया। AAIB रिपोर्ट में पायलटों की गलती को लेकर कोई बात नहीं कही गई थी। फिर भी इन मीडिया संस्थानों ने पायलटों को ही को दोषी ठहराने की कोशिश की। अब इस कड़ी में FAA की वह नोटिफिकेशन भी सामने आई है जिसमे बोइंग को क्लीन चिट दी गई है।

ऐसे में लगता है कि सारा दोष पायलटों पर मढ़ के बोइंग की साख को बचाने के लिए किया जा रहा है। पायलटों को बलि का बकरा बनाना वैसे भी बोइंग की पुरानी आदत रही है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण वर्ष 2019 और 2020 में हुए 737 मैक्स विमान के हादसे हैं। यह हादसे इंडोनेशिया की लायन एयर और इथियोपिया की इथियोपियन एयरलाइंस के विमानों के साथ हुए थे। इन हादसों में 346 लोग मारे गए थे।

इन हादसों के बाद न्यू यॉर्क टाइम्स के साथ एक बातचीत में बोइंग के CEO डेविड कोल्हान ने कहा था,”वहाँ (एशिया और अफ्रीका) के पायलटों का अनुभव, अमेरिकी पायलटों के मुकाबले कहीं नहीं ठहरता।” उन्होंने सीधे तौर पर पायलटों को कम अनुभव वाला और हादसे के लिए जिम्मेदार ठहराने का प्रयास किया था। इन्हीं हादसों को लेकर डेविड कोल्हान से पहले बोइंग के CEO रहे डेनिस मुलिनबर्ग ने भी ऐसी ही टिप्पणी की थी। 

उन्होंने हादसों के बाद अमेरिकी संसद के सामने कहा था कि उनके विमान (737 मैक्स) एकदम ठीक थे लेकिन पायलटों ने सारे कदम नहीं उठाए, जिसके चलते विमान हादसे का शिकार हो गए। इन दोनों की बातें आगे चलकर एकदम झूठ साबित हुई थीं।  यह दोनों विमान हादसे बोइंग की ही एक गलती के चलते हुए थे। बोइंग ने अपने 737 मैक्स में MCAS नाम का एक सॉफ्टवेयर लगाया था जो विमान के आगे के हिस्से को अधिक ऊपर उठने से रोकता था।

इसके विषय में बोइंग ने पायलटों को नहीं बताया था। यह सॉफ्टवेयर खुद ही काम करता था। बोइंग के पायलटों को इस विषय में ना बताने के पीछे कारण था कि यह विमान खरीदने वाली एयरलाइंस को उन्हें ट्रेनिंग देनी पड़ती जो बड़ा खर्च होता। इसके अलावा इस सिस्टम का प्रमाणन भी बोइंग को करवाना पड़ता, यह भी एक खर्चीली प्रक्रिया है। बोइंग की बेइमानी का परिणाम यह हुआ कि यह दोनों हादसे हो गए। इन दोनों हादसे में विमान के उड़ान भरने के कुछ ही देर बाद वह नीचे की तरफ गोते खाने लगा और अंत में जाकर क्रैश हो गया।

इसके पीछे कारण था कि MCAS सॉफ्टवेयर लगातार इन दोनों में विमानों को नीचे की तरफ दबाता रहा और पायलट चाह कर भी कुछ नहीं कर पाए। बोइंग ने पहले तो अपनी गलती स्वीकार ही नहीं की और इन दोनों एयरलाइंस के पायलट पर ही दोष मढ़ दिया। बाद में हुई जाँच में सच्चाई खुली और बोइंग को लगभग ₹20 हजार करोड़ का जुर्माना झेलना पड़ा था और MCAS में गड़बड़ी की बात भी स्वीकार करनी पड़ी थी। 

भारत-नेपाल सीमा पर इस्लामी कट्टरपंथियों का डेरा, मस्जिद-मजार जिहाद के लिए दक्षिण भारत से आ रहा मोटा पैसा: डेमोग्राफी भी बदली, ₹150 करोड़ फंडिंग के मिले सबूत

भारत-नेपाल सीमा पर मस्जिद-मदरसे बनाने और धर्मांतरण के खेल के लिए दक्षिण भारत की से फंडिंग हो रही थी। यह फंडिंग सैकड़ों करोड़ में है। नकद के अलावा यह फंडिंग UPI के जरिए भी हुई है। आयकर विभाग की एक गोपनीय रिपोर्ट में इसका खुलासा हुआ है।

आयकर विभाग ने गृह मंत्रालय को यह विस्तृत रिपोर्ट सौंपी है। इस रिपोर्ट में फंडिंग के अलावा रिपोर्ट में नेपाल से सटे जिलो में मुस्लिम आबादी बढ़ने की भी जानकारी है। इनमें श्रावस्ती, बहराइच, बलरामपुर, सिद्धार्थनगर जैसे जिले शामिल हैं। रिपोर्ट के अनुसार, कई जिलों के गाँवों में मुस्लिम आबादी बढ़ी है तो वहीं हिंदू आबादी घटी है।

नेपाल सीमा के जिलों की डेमोग्राफी बदलने का यह अभियान बीते एक दशक से ज्यादा समय से चल रहा है। इसमें कई एंगल से जाँच चल रही है।

आयकर विभाग की छापेमारी में मिले फंडिंग के सबूत

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, नेपाल से सटे रक्सौल, रुपैडीहा, बढ़नी आदि इलाकों में ₹2000 के नोट अवैध तरीके से बदले जा रहे थे। इसकी सूचना पर आयकर विभाग अलर्ट हुआ और छापेमारी की। विभाग ने बड़े स्तर पर बैंक खातों में ट्रांजेक्शन की जाँच की, जिसमें UPI के जरिए संदिग्ध खातों में करोड़ो रुपए के लेन-देन की जानकारी लगी।

आयकर विभाग की शुरुआती जाँच में ₹150 करोड़ की फंडिंग के सुराग भी मिले हैं। इसका इस्तेमाल अवैध धर्मांतरण के साथ मस्जिद, मदरसे और मजारें बनाने में किया जा रहा है। जाँच में एक मुस्लिम व्यक्ति के बैंक खाते में करीब ₹12 करोड़ पहुँचे थे, जो कि तमिलनाडु की एक संस्था द्वारा भेजे गए थे।

योगी सरकार ने अवैध मस्जिद-मदरसों पर लगातार की कार्रवाई

आयकर विभाग की रिपोर्ट में अब साफ हो गया है कि नेपाल से सटे जिलों में इस्लामिक कट्टरपंथी अपनी पैंठ जमाने में लगे हैं। ये बात कोई नई नहीं हैं, उत्तर प्रदेश की योगी सरकार लगातार इसके खिलाफ ऑपरेशन चलाए हुए हैं। इन जिलों में अवैध मस्जिद-मदरसों पर लगातार कार्रवाई की जा रही है।

उत्तर प्रदेश और नेपाल के बीच 7 जिलों की 570 किलोमीटर की सीमा पर रोज अवैध ढाँचे समतल किए जा रहे हैं। महाराजगंज से लेकर सिद्धार्थनगर, बलरामपुर, बहराइच, श्रावस्ती, पीलीभीत और लखीमपुर में इन कब्जों को चिन्हित किया जा रहा है। लगातार 2025 में ऐसे सैंकड़ों अवैध ढाँचे गिराए गए हैं।

ऑपइंडिया ने बताई थी नेपाल सीमा पर बदलती डेमोग्राफी की सच्चाई

नेपाल से सटे जिलों के गाँवों में डेमोग्राफी बदलने कोई नई बात नहीं है। यह अभियान सालों से चला आ रहा है। ऑपइंडिया इस समस्या को परखने के लिए जमीनी स्तर पर पहुँचा थे। ग्राउंड रिपोर्ट में चौंकाने वाले खुलासे भी हुए। नेपाल सीमा के आसपास के गाँवों में मुस्लिम आबादी कई गुना बढ़ी है।

साल 2022 की इस ग्राउंड रिपोर्ट में नेपाल की सीमा से 15 किलोमीटर के दायरे में सैंकड़ों से अधिक मस्जिद और मदरसे पाए गए। अकेले बलरामपुर जिले में बॉर्डर से 15 किलोमीटर 150 मदरसे चल रहे हैं। इसके अलावा इसी क्षेत्र में नेपाल सीमा से 15 किलोमीटर क्षेत्र में मस्जिदों की संख्या 200 से अधिक है।

इन दोनों के अतिरिक्त लगभग 10 स्थान ऐसे भी हैं, जहाँ मस्जिद के ही अंदर मदरसे चल रहे हैं। हाल ही में पकड़ा गया छांगुर पीर इसी बलरामपुर का है। उसे भी विदेशी फंडिंग का खुलासा हुआ था। इस रिपोर्ट में यह भी सामने आया था कि कई गाँव जो पहले हिन्दू बहुल हुआ करते थे वो अब मुस्लिम बहुल हो चुके हैं।

नेपाल में 20 साल में मुस्लिम आबादी दोगुना

केवल नेपाल सीमा से सटे भारत के जिलों में ही नहीं बल्कि उस पार भी मुस्लिम आबादी बढ़ी है। इसकी पुष्टि नेपाल के सांसद अभिषेक सिंह तक ने भी की थी। साल 2022 में ऑपइंडिया से बातचीत में सांसद ने कहा था कि पहले भी मुस्लिम आबादी बढ़ी, लेकिन तब इसका एहसास नहीं हुआ लेकिन अब जब सब सामने नजर आने लगा तब हम लोग चिंतित हैं।

सांसद ने कहा कि पिछले 20 साल के भीतर नेपाल में मुस्लिम आबादी दोगुना हो गई है। उन्होंने बताया कि 20 साल पहले 4.5% मुस्लिम आबादी वाले नेपाल में अब 9% से अधिक मुस्लिम आबादी है। इसी के साथ सांसद ने आने वाले 20 वर्षों में मुस्लिम आबादी कई गुना और बढ़ जाने की आशंका जताई।

दीवाल फाँद कर जिनकी कब्र पर फातिहा पढ़ने पहुँचे CM उमर अब्दुल्ला, वो शहीद नहीं ‘दंगाई’ थे: जानिए ’13 जुलाई’ का वह सच जिसे इतिहासकारों ने बदला, कश्मीर में हिन्दुओं का हुआ था नरसंहार

केन्द्रशासित प्रदेश जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने सोमवार (14 जुलाई, 2025) को श्रीनगर की एक मजार पर जाकर फूल चढ़ाए हैं। उन्होंने यहाँ फातिहा भी पढ़ा है। यहाँ पहुँचने के लिए उन्होंने पुलिस से लड़ाई झगड़ा, दीवाल फांदी और श्रीनगर के भीतर काफी हंगामा किया।

उमर अब्दुल्ला ने ‘नक्शाबाद साहिब’ कही जाने वाली इस मजार पर फूल चढ़ाने और इन कथित शहीदों को श्रद्धांजलि देने के लिए एक्स (पहले ट्विटर) पर भी खूब बवाल किया और दावा किया कि उन्हें नजरबन्द किया गया है। उनकी सरकार में शामिल कई और लोगों ने भी यही दावे किए।

यह सभी इस ‘शहीदों’ वाली मजार पर श्रद्धांजलि देना चाहते थे। इससे पहले उन्होंने जिला प्रशासन से इसकी अनुमति माँगी थी, जिसके लिए इनकार कर दिया गया था। जिस मजार पर उमर अब्दुल्ला ने यह फूल चढ़ाए हैं, उन्हें वह ’13 जुलाई के शहीद’ कहते हैं जबकि असल में यह दंगाई थे। यह लोग 1931 में मारे गए थे।

क्यों हो रहा 13 जुलाई पर बवाल?

इस पूरे बवाल की जड़ 9 दशक पहले की एक तारीख 13 जुलाई, 1931 से जुड़ी है। दरअसल, 13 जुलाई, 1931 को श्रीनगर की सेंट्रल जेल के बार महाराजा हरि सिंह की सेना ने 21 इस्लामी दंगाइयों को गोली मार दी थी। यह इस्लामी दंगाई जेल पर हमला करने आए थे और महाराजा हरि सिंह का तख्तापलट करना चाहते थे।

1948 में जब जम्मू कश्मीर का विलय भारत में हो गया और नेशनल कॉन्फ्रेंस राज्य की सत्ता में आई तो इन्हें शहीद का दर्जा दे दिया गया। इस दिन राज्य में छुट्टी भी घोषित की गई। इनको ‘लोकतंत्र’ के लिए आंदोलन करने वाला क्रांतिकारी बताया गया। इनके लिए एक सूफी संत की मजार के पास एक स्मारक भी बनाया गया था।

अब इसी स्मारक पर उमर अब्दुल्ला श्रद्धांजलि देना चाहते थे, जिसकी अनुमति न मिलने पर हंगामा हुआ।

क्या है 13 जुलाई के शहीदों की सच्चाई

कश्मीर में कट्टर मानसिकता वाले लगातार 13 जुलाई की घटना को महाराजा हरि सिंह के खिलाफ क्रान्ति और जनआंदोलन करार देते हैं। इसे ‘कश्मीर शहीद दिवस’ बताते हैं। कहा जाता है कि यह महाराजा के कथित क्रूर शासन के खिलाफ एक विद्रोह था। जबकि असल में यह एक ‘काफिर’ हिन्दू शासक के खिलाफ लड़ाई थी।

इस सम्बन्ध में कश्मीरी पंडित एक्टिविस्ट सुशील पंडित ने एक लेख में काफी अच्छे से समझाया था। वो मानते हैं कि आधुनिक कश्मीर का पहला नरसंहार तभी हुआ था, वो भी पूरी साजिश के साथ। सैकड़ों लोगों की हत्या कर दी गई, ज़िंदा जला दिया गया, विकलांग बना दिया गया और नदी में फेंक दिया गया।

महिलाओं का यौन शोषण और बलात्कार हुआ। कइयों के घर लूट लिए गए तो कइयों को इस्लाम अपनाने के लिए मजबूर किया गया। उन्होंने बताया है कि कैसे जब पुलिस ने दंगाइयों पर कार्रवाई की तो उनमें से कुछ की मौत हो गई, जिसके बाद उनके गिरोह द्वारा उन्हें ‘शहीद’ बता दिया गया।

स्वतंत्र भारत में जम्मू कश्मीर की नई सरकार ने उन आतंकियों के कृत्यों को ‘पवित्र’ बनाने के लिए नायकों की तरह उनका सम्मान करते हुए 13 जुलाई को उन्हें याद किया जाने लगा। आइए, अब जानते हैं कि असल में उस दिन हुआ क्या था। उस समय जम्मू कश्मीर के स्वायत्त राजा थे हरि सिंह।

तब जम्मू कश्मीर के साथ-साथ लद्दाख, गिलगिट-बाल्टिस्तान, मुजफ्फराबाद-मीरपुर और अक्साई चीन के अलावा शक्सगाम घाटी के इलाके भी उनके क्षेत्र का हिस्सा हुआ करते थे। लेकिन, अंग्रेज उनसे कुछ इलाके छीनना चाहते थे। महाराजा हरि सिंह उन दुर्लभ राजाओं में से एक थे, जिनका शासन मुस्लिम बहुल इलाके में था। इसीलिए, अंग्रेजों ने एक साजिश के तहत पेशवर के एक अहमदी अब्दुल क़दीर को खानसामा के वेश में श्रीनगर में स्थापित कर दिया।

इसके बाद ‘अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU)’ के शेख मोहम्मद अब्दुल्लाह को भी लाया गया। वो एक राजनीतिक महत्वाकांक्षा वाला व्यक्ति हुआ करता था, जिसकी पुश्तें आज भी जम्मू कश्मीर को अपनी बपौती समझती हैं। ख़ानक़ाह मोहल्ला स्थित ‘शाह-ए-हमदान’ में एक सार्वजनिक सभा हुई, जहाँ अब्दुल क़दीर ने एक भड़काऊ भाषण दिया। महाराजा के विरुद्ध जंग के लिए कुरान का हवाला दिया गया। उसने भड़काया कि एक ‘काफिर’ कैसे मुस्लिमों के ऊपर राज कर सकता है, इसकी इस्लाम में सख्त मनाही है।

कानून के अनुसार जिस गोहत्या पर प्रतिबंध था, उसके लिए उसने मुस्लिमों को खुल कर उकसाया। उसे जब राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किया गया तो दंगे भड़क गए। कानूनी प्रक्रिया में बाधा डालने की कोशिशें हुईं। मज़बूरी में जेल परिसर में ही सुनवाई होती थी। 13 जुलाई को भी एक ऐसी ही सुनवाई थी। लेकिन, भीड़ ने वहाँ हमला कर दिया और जज के चैंबर में घुसने की कोशिश करने लगे। भीड़ ने पुलिस पर हमला बोल दिया और आगजनी शुरू कर दी।

जैसा कि आज भी होता है, जम कर मुस्लिम भीड़ ने पत्थरबाजी भी शुरू कर दी। जेल के कैदियों ने भी वहाँ से भागने का प्रयास शुरू कर दिया। पुलिस बल ने सारे पैंतरे आजमा लिए, लेकिन मुस्लिम भीड़ तितर-बितर नहीं हुई। कुछ कैदियों को भगा भी दिया गया। इसके बाद स्थानीय DM ने गोली चलाने के आदेश दिए। हरि पर्वत किले की तरफ भी भीड़ चल पड़ी थी। लाठीचार्ज का कोई असर नहीं हो रहा था। महराजगंज तब व्यापारियों का अड्डा हुआ करता था, जहाँ जम कर लूटपाट मचाई गई।

सुशील पंडित लिखते हैं कि इसके बाद भोरी कदल से लेकर आईकदल तक एक लंबी दूरी में हिन्दुओं की दुकानों को तहस-नहस कर दिया गया और चीजें लूट ली गईं। सफाकदल, गंजी, खुद और नवाकदल जैसे इलाकों में भी जम कर लूटपाट हुई। बाजार में बही-खातों को जला दिया गया और हिन्दू दुकानदारों में भगदड़ मच गई। लाखों के सामान लूट लिए गए, ये सड़कों पर तहस-नहस कर के फेंक दिए गए। हालाँकि, इस दौरान किसी मुस्लिम के दुकान में घुस कर लूटपाट की कोई खबर नहीं आई।

श्रीनगर के विचारनाग में मुस्लिम भीड़ अलग से जुटी हुई थी। वहाँ समृद्ध हिन्दुओं के साथ अत्याचार किया गया और उनकी महिलाओं का यौन शोषण हुआ। जब तक सेना आई, तब तक मुस्लिम भीड़ ने हिन्दुओं का बड़ा नुकसान कर दिया था। इसके बाद ‘बुद्धिजीवी’ गिरोह काम पर लगा और उसने इसे ‘सामंती सत्ता के विरुद्ध लोकतांत्रिक विद्रोह’ नाम दे दिया। याद कीजिए, मोपला मुस्लिमों द्वारा केरल में किए गए बड़े स्तर के नरसंहार को भी ‘जमींदारों के खिलाफ किसानों का विद्रोह’ कह दिया गया था।

जबकि, असल में कश्मीर में 13 जुलाई, 1931 को जो भी हुआ, वो एक हिन्दू राजा के विरुद्ध इस्लामी जंग था। शेख मोहम्मद अब्दुल्लाह का भी इन दंगों को भड़काने में बड़ा हाथ था। उसे गिरफ्तार कर जेल भी भेजा गया। हालाँकि, अगले ही साल महाराजा ने उसे माफ़ी दे दी और उसने ‘ऑल जम्मू एंड कश्मीर मुस्लिम कॉन्फ्रेंस’ का गठन कर के लोगों को भड़काना शुरू कर दिया। मीरपुर में हिन्दुओं ने भाग कर जान बचाने की कोशिश की। बाद में उनमें से सैकड़ों को शरणार्थी बन कर रहना पड़ा।

हिन्दुओं के गाँव जलाए, मंदिर तोड़े

उस समय इस घटना को देखने वाले बुजुर्गों ने बताया था कि कैसे कइयों को बेरहमी से मार डाला गया और इस्लाम अपनाने को भी कइयों को मजबूर किया गया। मंदिरों और गुरुद्वारों पर हमले की कई घटनाएँ सामने आईं। गुरुग्रंथ साहिब सहित कई पवित्र सनातनी पुस्तकों को जला दिया गया और देवी-देवताओं की प्रतिमाओं को खंडित किया गया। इसे ’88 ना शौरांश’ कहते हैं, अर्थात 88 का नरसंहार। विक्रम संवत के हिसाब से तब 1988 चल रहा था।

उस घटना के बाद के सैकड़ों परिवार और उनकी पुश्तें दशकों तक पुनर्वास के लिए संघर्ष करती रहीं। खुद अंग्रेजी रिकार्ड्स की मानें तो 31 मंदिरों-गुरुद्वारों को पूरी तरह तबाह कर दिया गया। 600 के आसपास जबरन इस्लामी धर्मांतरण के मामले सामने आए। सुक्खचैनपुर और संवल (मीरपुर) के हिन्दुओं को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ। अंग्रेज लिखते हैं कि जहाँ भी दंगाई पहुँचे, स्थानीय मुस्लिम जनसंख्या ने उनका साथ दिया।

कुछ हिन्दुओं के गाँवों को तो एकदम से वीरान ही बना दिया गया, ऐसी लूटपाट और तबाही मचाई गई। इसके बाद 18 जनवरी, 1932 को भी हिन्दुओं के 50 गाँवों पर हमला हुआ और 300 घरों को लूटा गया। इनमें से 40 को आग के हवाले कर दिया गया। इतना ही नहीं, 40 हिन्दुओं को जबरन मुस्लिम बनाया गया। थन्ना गाँव में 20 जनवरी, 1932 को फिर से 36 घरों में लूटपाट हुई और 8 को फूँक दिया गया। सोहाना गाँव में 84 घरों में लूटपाट हुई और एक अन्य गाँव में 28 जनवरी को लूटपाट हुई।

जिस कश्मीर को महाराजा रणजीत सिंह ने अफगानों के चंगुल से छुड़ाया था और फिर डोगरा राजाओं ने हिन्दू शासन की स्थापना की, वहाँ के गैर-मुस्लिमों को सदियों के अत्याचार से राहत मिली। लेकिन, इस घटना के बाद से पुनः कश्मीर में पंडितों का नरसंहार शुरू हो गया। वहाँ भारत का संविधान स्वतंत्रता के बाद भी लागू नहीं हो पाया और मुट्ठी भर अलगाववादियों के अलावा अब्दुल्लाह-मुफ़्ती मिल कर यहाँ इस्लामी शासन चलाते रहे।

मोदी सरकार में रुका गद्दारों का सम्मान

जुलाई 2020 में ऐसा पहली बार हुआ, जब कश्मीर में दंगाइयों को श्रद्धांजलि नहीं दी गई। मोदी सरकार के कारण ये संभव हो पाया। आधुनिक कश्मीर में हिन्दुओं को संगठित तरीके से खदेड़ना के कार्य तभी शुरू हुआ था। अंग्रेजों के षड्यंत्र और इस्लामी भीड़ की हिंसा ने एक हिन्दू सत्ता को उखाड़ने के लिए हिन्दुओं का नरसंहार किया और बाद में ‘बुद्धिजीवियों’ ने इसे एक अलग रंग दिया। महाराजा हरि सिंह ने इन घटनाओं की जाँच के लिए हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बरजोर दलाल की अध्यक्षता वाली एक समिति को दी।

महाराजा हरि सिंह ने लंदन के गोलमेज सम्मेलन में भारतीय एकता की बात की थी, उसी के बाद अंग्रेज सेनाधिकारी मेजर बोट ने अब्दुल कदीर नाम के पठान को वहाँ लाकर बसाया। ये सब एक साजिश का हिस्सा था। ब्रिटिश ने सत्ता सँभालने के बाद अब्दुल कदीर को 1.5 साल में ही रिहा कर दिया, जबकि उसे 5 साल की जेल हुई थी।

कादियाँ नगर के अहमदिया समुदाय ने इस पूरे मामले में अंग्रेजो की खासी मदद की। इस रिपोर्ट में पता चला कि अंग्रेज अधिकारी वेकफील्ड जानबूझ कर उस दिन जेल के पास स्थिति को काबू करने नहीं गया, जबकि सुरक्षा का नियंत्रण उसके पास ही था।

4 जुलाई, 1931 को कुरान की बेअदबी की खबर सामने आई, जबकि ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था। लेकिन, वेकफील्ड ने जाँच के बाद कुरान के तौहीन की बात प्रचारित की और मुस्लिमों को भड़काया। श्रीनगर में महाराजा हरि सिंह के खिलाफ भड़काऊ सामग्रियाँ भेजी गईं। वेकफील्ड की जगह प्रधानमंत्री बनाए गए हरि कृष्ण कौल ने मुस्लिम दंगाइयों से राज्य का समझौता कराया, लेकिन दंगे नहीं रुके। देश के कई हिस्सों में इस्लामी दंगों का पैटर्न यही रहा है, आज भी यही है।