आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और वाईएसआरसीपी अध्यक्ष जगन मोहन रेड्डी के वाहन से कुचल कर एक व्यक्ति की बुधवार (18 जून 2025) को मौत हो गयी थी। दिल दहला देने वाली इस घटना का वीडियो सामने आया है।
इसमें देखा जा सकता है कि पूर्व सीएम रेड्डी को ले जा रहे वाहन के पहियों के नीचे शख्स आ जाता है और उसकी मौत हो जाती है। ये वीडियो अब वायरल हो गया है। जगन मोहन रेड्डी ने घटना पर दुख जताते हुए मृतक के परिजनों को 10 लाख रुपए मुआवजा देने का ऐलान किया है।
हाथ मिलाते नेता और धक्का-मुक्की करते कार्यकर्ता
वायरल वीडियो में देखा जा सकता है कि पूर्व सीएम जगन मोहन रेड्डी अपना हाथ हिलाते हुए अपनी कार की गेट पर खड़े हैं। इस दौरान समर्थक उनसे हाथ मिलाने के लिए एक-दूसरे को धक्का-मुक्की करते नजर आ रहे हैं। कार धीमी रफ्तार से आगे बढ़ रही है। तभी एक व्यक्ति कार के अगले पहिए के नीचे आ जाता है और किसी को पता भी नहीं चलता। ये घटना गुंटूर जिले के इटुकुरु गाँव से गुजरने वाली नेशनल हाइवे पर हुई है।
Shocking Visuals: Ex-Chief Minister of Andhra Pradesh Jagan Reddys car runs over bystander in rally. https://t.co/tXDzLJDwte
पूर्व सीएम रेड्डी की कार के पहिए के नीचे आने वाले शख्स का नाम चीली सिंगैया है। वह वेंगलयापलेम गाँव का रहनेवाला है और वाईएसआरसीपी का समर्थक है। दरअसल जगन मोहन रेड्डी की सत्तेनापल्ली मंडल के रेंटापल्ली गाँव में एक प्रतिमा का अनावरण करना था, इसलिए वहाँ काफी भीड़ जमा थी। सड़क के दोनों किनारों पर लोगों का हुजूम उमड़ा हुआ था। जब काफिला गुजरा तो सिंगैया ने पूर्व सीएम पर फूल बरसाने का प्रयास किया।
इस दौरान वह पूर्व सीएम रेड्डी की गाड़ी से टकरा गया और उसके नीचे आ गया। हुजूम अपने नेता पर फूल बरसाने में बिजी रही, जय-जयकार करती रही। इतने शोर-शराबे में एक समर्थक की चीख न नेताजी के कान तक पहुँची और न ही किसी समर्थक ने इस पर ध्यान दिया।
कार चालक कार बढ़ाता गया और समर्थक नेताजी की कार के नीचे बुरी तरह से कुचल गया। इस घटना के दौरान ही कई लोग कार पर चढ़े दिखे। हर कोई सीएम रेड्डी को छू लेना चाहता था। लेकिन किसी को कार के सामने गिरे व्यक्ति की आवाज सुनाई नहीं दी।
वीडियो में दिखा गर्दन पर चढ़ा कार का पहिया
वीडियो फुटेज में देखा जा सकता है कि जब सिंगैया गाड़ी के पास गिरते हैं, गाड़ी बिना रुके आगे बढ़ती रहती है, और पहिया उनकी गर्दन के ऊपर से गुजर जाता है। जब तक किसी ने देखा और उन्हें बचाने की कोशिश की तब तक वे बुरी तरह घायल हो चुके थे। पुलिस ने सिंगैया को गुंटूर के सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया, जहाँ इलाज के दौरान उनकी मृत्यु हो गई।
So @ysjagan car just crushed a person on the road!
गुंटूर के पुलिस अधीक्षक सतीश कुमार और गुंटूर रेंज के आईजी श्रेष्ठा त्रिपाठी ने घटना की पुष्टि की है। शुरुआती जाँच में पता चला है कि इस काफिले में 30-35 गाड़ियाँ थीं, जबकि पुलिस ने सिर्फ 3 गाड़ियों की परमिशन दी थी। पुलिस अधिकारियों ने जाँच के बाद काफिले में शामिल अन्य गाड़ियों पर कार्रवाई का भरोसा दिया है। पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया है और जाँच कर रही है कि क्या ये लापरवाही था या जानबूझ कर घटना को अंजाम दिया गया।
पीड़ित परिवार ने न्याय की लगाई गुहार
घटना ने सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं साथ ही पूर्व सीएम के काफिले के कुप्रबंधन को भी उजागर किया है। मृतक सिंगैया के परिजनों ने सरकार से घटना की जाँच कराने और न्याय देने की माँग की है।
वीडियो सामने आने के बाद, राज्य के मंत्री गोट्टीपति रवि कुमार ने कहा कि वाईएसआरसीपी नेता अपने प्रचार स्टंट के लिए लोगों की जिंदगी को खतरे में डाल रहे हैं।
अमेरिका ने ईरान में घुसकर उसके तीन न्यूक्लियर साइट्स (परमाणु ठिकानों) को तबाह कर दिया। इसमें उसने बी-2 स्पिरिट स्टील्थ बॉम्बर (बमवर्षक विमान) का इस्तेमाल किया। ये स्टील्थ फाइटर जेट दुनिया के सबसे खतरनाक और आधुनिक हथियारों में से एक है। ये ऐसा विमान है जो न सिर्फ दुश्मन के इलाके में घुसकर हमला कर सकता है, बल्कि उनकी रडार (Radar) और हवाई रक्षा (Air Defense) को भी चकमा दे देता है।
ईरान के तीन परमाणु ठिकानों फोर्डो, नतांज और इस्फहान पर अमेरिकी हमले के बाद बी-2 स्पिरिट्स ने एक बार फिर से पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है। ये ऐसा फाइटर जेट है, जिसने बार-बार दुनिया के सामने अपनी ताकत दिखाई है। ये अमेरिका के न्यूक्लियर ट्रॉयड की रीढ़ है।
बी-2 स्पिरिट की क्षमताओं को समझने के लिए ये जानना जरूरी कि ये फाइटर जेट इतना खास क्यों है? ये कैसे काम करता है? ये कौन-कौन से हथियार ले जा सकता है? ये दुश्मन की नजरों से कैसे बचता है? और इसकी इतनी अहमियत क्यों है?
बी-2 स्पिरिट स्टील्थ बॉम्बर (बमवर्षक विमान) एक ऐसा फाइटर जेट है, जिसे अमेरिकी कंपनी नॉर्थरॉन ग्रुम्मन ने बनाया। इसकी पहली उड़ान 1989 में हुई थी, और 1997 में इसे अमेरिकी वायुसेना (US Air Force) में शामिल किया गया।
इसका डिज़ाइन बहुत अनोखा है – ये एक चमगादड़ जैसा चपटा विमान है, जिसमें कोई पूँछ या धड़ (Fuselage) नहीं होता। इसे फ्लाइंग विंग डिज़ाइन कहते हैं। इसकी कीमत इतनी ज्यादा है – लगभग 2.1 बिलियन डॉलर (करीब 17,000 करोड़ रुपये) प्रति विमान, कि इसे दुनिया का सबसे महँगा फाइटर जेट माना जाता है।
अमेरिका के पास सिर्फ 21 बी-2 फाइटर जेट हैं, क्योंकि ये इतना महँगा है कि ज्यादा बनाना मुमकिन नहीं हुआ। ये फाइटर जेट खास तौर पर उन मिशनों के लिए बनाया गया है, जहाँ दुश्मन के इलाके में गहरे जाकर, बिना पकड़े गए, हमला करना हो।
ये सामान्य बमों से लेकर परमाणु हथियार (Nuclear Weapons) तक ले जा सकता है। हाल ही में ईरान के परमाणु ठिकानों पर हुए हमले में इसने अपनी ताकत दिखाई, जहाँ इसने 37 घंटे की लगातार उड़ान भरी और बंकर बस्टर बम (Bunker Buster Bombs) दागे।
बी-2 की जरूरत क्यों पड़ी?
बी-2 स्पिरिट का जन्म कोल्ड वॉर (शीत युद्ध) के समय हुआ, जब अमेरिका और सोवियत संघ (अब रूस) के बीच हथियारों की होड़ थी। 1970 के दशक में अमेरिका को एक ऐसे फाइटर जेट की जरूरत थी, जो सोवियत संघ की मजबूत हवाई रक्षा को भेद सके। इसके लिए नॉर्थरॉप ग्रुम्मन ग्रुप ने स्टील्थ तकनीक (Stealth Technology) पर काम शुरू किया।
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पहली उड़ान: 17 जुलाई 1989 को बी-2 ने पहली बार उड़ान भरी।
वायुसेना में शामिल: 1997 में इसे आधिकारिक तौर पर अमेरिकी वायुसेना में शामिल किया गया।
पहला युद्ध इस्तेमाल: 1999 में कोसोवो युद्ध में बी-2 का पहली बार इस्तेमाल हुआ। इसने सर्बिया के ठिकानों पर सटीक बमबारी की और बिना पकड़े गए वापस लौट आया।
अन्य मिशन: बी-2 का इस्तेमाल अफगानिस्तान (2001), इराक (2003), और लीबिया (2011) में भी हुआ। हर बार इसने दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम को चकमा देकर हमले किए।
बी-2 को शुरू में परमाणु हमलों के लिए बनाया गया था, लेकिन बाद में इसे सामान्य युद्धों (Conventional Warfare) के लिए भी तैयार किया गया। इसका डिज़ाइन और तकनीक इतनी खास थी कि ये आज भी दुनिया का सबसे उन्नत फाइटर जेट माना जाता है।
खास फीचर्स बनाते हैं बी-2 को खास
बी-2 की ताकत इसके अनोखे डिज़ाइन और आधुनिक तकनीकों में है। इसे समझने के लिए इसके फीचर्स को आसान तरीके से समझते हैं-
स्टील्थ तकनीक (Stealth Technology): बी-2 को रडार (Radar) पकड़ नहीं सकता। इसका रडार क्रॉस-सेक्शन (RCS) सिर्फ 0.001 वर्ग मीटर है, यानी रडार पर ये एक छोटे से पक्षी जितना दिखता है। इसका चपटा डिज़ाइन और खास पेंट (Radar-Absorbent Material) रडार की तरंगों को सोख लेता है। इसकी गर्मी (Infrared Signature) और आवाज बहुत कम होती है, जिससे इसे सेंसर (Sensors) से पकड़ना मुश्किल है।
लंबी उड़ान की ताकत: बी-2 बिना रिफ्यूलिंग (Refueling) के 6,000 नॉटिकल मील (लगभग 11,000 किमी) तक उड़ सकता है। हवा में रिफ्यूलिंग के साथ ये दूरी 10,000 नॉटिकल मील (19,000 किमी) तक हो सकती है। जैसे, ईरान हमले में इसने मिसूरी से 37 घंटे की उड़ान भरी। ये 50,000 फीट (15,000 मीटर) की ऊँचाई पर उड़ सकता है, जहाँ ज्यादातर एंटी-एयरक्राफ्ट मिसाइलें (Anti-Aircraft Missiles) नहीं पहुँचतीं।
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दो लोगों की टीम: बी-2 को सिर्फ दो लोग चलाते हैं – एक पायलट और एक मिशन कमांडर। इसका कॉकपिट (Cockpit) इतना आधुनिक है कि लंबे मिशनों में भी पायलट थकते नहीं। इसमें ऑटोमेशन सिस्टम (Automation System) हैं, जो काम को आसान बनाते हैं।
हर मौसम में काम: बी-2 दिन हो या रात, बारिश हो या तूफान, हर हाल में मिशन पूरा कर सकता है। इसका जीपीएस (GPS) और नेविगेशन सिस्टम इतना सटीक है कि ये बिल्कुल सही निशाने पर हमला करता है।
लचीलापन: ये ऊँची उड़ान (High-Altitude) और जमीन के करीब (Low-Altitude) दोनों तरह से काम कर सकता है। दुश्मन की रक्षा के हिसाब से ये अपनी रणनीति बदल लेता है।
बी-2 कौन-कौन से हथियार ले जा सकता है?
बी-2 इतने ज्यादा हथियार – 40,000 पाउंड (18,000 किलोग्राम) ले जा सकता है कि इसे ‘उड़ता हुआ हथियारखाना’ कह सकते हैं। ये सामान्य बमों से लेकर परमाणु हथियार तक ले जा सकता है। इसके प्रमुख हथियार हैं-
मैसिव ऑर्डनेंस पेनेट्रेटर (MOP, बंकर बस्टर): ये 30,000 पाउंड (13,600 किलोग्राम) का भारी बम है, जो जमीन के अंदर बने बंकरों (Bunkers) को नष्ट करता है। ये 200 फीट (61 मीटर) तक जमीन में घुस सकता है और फिर फटता है। पहाड़ के अंदर 300 फीट नीचे ईरान के फोर्डो ठिकाने को 6 MOP बमों से नष्ट किया गया। बी-2 एक बार में दो MOP ले जा सकता है।
परमाणु हथियार (Nuclear Weapons): बी-2 16 B83 परमाणु बम (2,400 पाउंड प्रत्येक) ले जा सकता है। ये इसे परमाणु हमलों के लिए खास बनाता है। ये अमेरिका के न्यूक्लियर ट्रायड (परमाणु त्रिकोण) का हिस्सा है, जिसमें जमीन, समुद्र, और हवा से हमले की ताकत शामिल है।
सामान्य बम (Conventional Bombs): JDAM (जॉइंट डायरेक्ट अटैक म्यूनिशन): ये जीपीएस-गाइडेड बम हैं, जो सटीक निशाना लगाते हैं। बी-2 80 ऐसे 500-पाउंड बम ले जा सकता है।
JSOW (जॉइंट स्टैंडऑफ वेपन): ये ग्लाइड बम हैं, जो दूर से हमला करते हैं।
JASSM-ER (जॉइंट एयर-टू-सरफेस स्टैंडऑफ मिसाइल): ये लंबी दूरी की मिसाइलें हैं, जो 500 मील (805 किमी) तक निशाना लगा सकती हैं।
टॉमहॉक मिसाइलें (Tomahawk Missiles): ईरान के नतांज और इस्फहान ठिकानों पर 30 टॉमहॉक मिसाइलें दागी गईं। ये लंबी दूरी की सटीक मिसाइलें हैं, जो बी-2 के साथ-साथ अन्य प्लेटफॉर्म्स से भी छोड़ी जा सकती हैं।
बी-2 दुश्मन की पकड़ से कैसे बचता है?
बी-2 को टअदृश्य योद्धाट कहा जाता है, क्योंकि ये दुश्मन की रडार और हवाई रक्षा को आसानी से चकमा दे देता है। इसके पीछे कई खास तकनीकें हैं-
रडार-शोषक सामग्री (Radar-Absorbent Material): बी-2 की बॉडी पर खास पेंट और सामग्री होती है, जो रडार की तरंगों को सोख लेती है। इससे रडार को सिग्नल वापस नहीं मिलता, और विमान स्टील्थ यानी ‘अदृश्य’ रहता है।
फ्लाइंग विंग डिज़ाइन: इसका चपटा और बिना पूंछ वाला डिज़ाइन रडार सिग्नल्स को बिखेर देता है। इसमें कोई नुकीले किनारे नहीं होते, जो रडार की पकड़ में आएँ।
कम गर्मी और आवाज (Low Infrared and Acoustic Signature): बी-2 के इंजन कम गर्मी और आवाज पैदा करते हैं, जिससे इसे इन्फ्रारेड सेंसर (Infrared Sensors) या साउंड डिटेक्टर से पकड़ना मुश्किल है।
हथियार अंदर रखने की जगह (Internal Weapons Bay): इसके सारे हथियार विमान के अंदर रखे जाते हैं, जिससे बाहर कुछ दिखाई नहीं देता। इससे रडार सिग्नेचर और कम हो जाता है।
जैमिंग सिस्टम (Electronic Countermeasures): बी-2 में ऐसे सिस्टम हैं, जो दुश्मन के रडार और मिसाइलों को भटका सकते हैं। ये इसे और सुरक्षित बनाते हैं।
बी-2 की इतनी अहमियत क्यों है?
बी-2 स्पिरिट स्टील्थ बॉम्बर (बमवर्षक विमान) की अहमियत कई कारणों से है-
रणनीतिक डर (Strategic Deterrence): बी-2 अमेरिका के परमाणु त्रिकोण का हिस्सा है। ये दुश्मनों को ये सोचने पर मजबूर करता है कि अमेरिका उनके सबसे मजबूत ठिकानों को भी नष्ट कर सकता है। इसके 2 और साथी भी हैं -रॉकवेल बी-1 लॉन्सर और बी-52 स्ट्रैटोफोर्ट्रेस।
गहरे हमले की ताकत: बी-2 उन ठिकानों पर हमला कर सकता है, जो जमीन के अंदर गहरे बने हों, जैसे ईरान का फोर्डो बंकर। MOP जैसे बमों के साथ, ये दुनिया में अकेला ऐसा फाइटर जेट है।
दुनिया में कहीं भी हमला: इसकी लंबी उड़ान और हवा में रिफ्यूलिंग की ताकत इसे दुनिया के किसी भी कोने में हमला करने लायक बनाती है।
मनोवैज्ञानिक दबाव: बी-2 का इस्तेमाल दुश्मन पर डर पैदा करता है। जैसे ईरान पर हमले ने दिखाया कि कोई भी ठिकाना सुरक्षित नहीं है।
कम संख्या, बड़ा असर: सिर्फ 21 फाइटर जेट होने के बावजूद, बी-2 की ताकत इतनी है कि ये पूरी जंग का रुख बदल सकता है।
ईरान परमाणु ठिकानों पर बी-2 का इस्तेमाल
21 जून 2025 को अमेरिका ने बी-2 का इस्तेमाल करके ईरान के तीन परमाणु ठिकानों फोर्डो, नतांज और इस्फहान पर हमला किया। इस हमले की कुछ खास बातें-
फोर्डो पर हमला: फोर्डो एक ऐसा ठिकाना था, जो पहाड़ के अंदर 300 फीट नीचे बना था। बी-2 ने 6 MOP बमों से इसे पूरी तरह नष्ट कर दिया।
नतांज और इस्फहान: इन ठिकानों पर 30 टॉमहॉक मिसाइलें दागी गईं, जो सतह पर बने ढाँचों को खत्म करने के लिए थीं।
37 घंटे की उड़ान: बी-2 ने मिसूरी (अमेरिका) से उड़ान भरी, हवा में कई बार रिफ्यूलिंग की और 11,400 किमी की दूरी तय करके हमला किया।
रणनीतिक संदेश: इस हमले ने ईरान को साफ बता दिया कि उनकी सबसे मजबूत सुविधाएँ भी अमेरिका की पहुँच से बाहर नहीं हैं।
फोटो साभार: ChatGPT
बी-2 स्पिरिट बॉम्बर्स का भविष्य
हालाँकि बी-2 अब 36 साल पुराना है, लेकिन ये अभी भी दुनिया का सबसे उन्नत फाइटर जेट है। अमेरिका इसे 2030 तक इस्तेमाल करने की योजना बना रहा है, जब तक कि नया बी-21 रेडर स्टील्थ बॉम्बर (बमवर्षक विमान) पूरी तरह तैयार न हो जाए। बी-2 को लगातार अपग्रेड किया जा रहा है, जैसे-
नए रडार और सेंसर: इनसे ये और सटीक और सुरक्षित हो रहा है।
आधुनिक हथियार: नए बम और मिसाइलें जोड़ी जा रही हैं।
सॉफ्टवेयर अपडेट: इससे इसका सिस्टम और तेज और स्मार्ट हो रहा है।
बी-21 रेडर आने के बाद बी-2 धीरे-धीरे रिटायर हो सकता है, लेकिन अभी ये अमेरिका की सैन्य ताकत का अहम हिस्सा है।
अमेरिका का न्यूक्लियर ट्रॉयड क्या है और भविष्य कैसा होगा?
अमेरिका का न्यूक्लियर ट्रॉयड 3 बड़े फाइटर-स्ट्रेटजिक बॉम्बर्स से मिलकर बना है। इसमें हैं – रॉकवेल बी-1 लॉन्सर, बी-2 स्पिरिट और बी-52 स्ट्रैटोफोर्ट्रेस। हालाँकि बी-52 स्ट्रैटोफोर्ट्रेस स्टील्थ नहीं है बल्कि जेट पॉवर्ड स्ट्रेटजिक बॉम्बर है। पर ये बी-2 से भी ज्यादा हथियार ले जा सकता है। वहीं, रॉकवेल बी-1 भी 34 हजार किलो के बम ले जा सकते हैं। ये तीनों साइज में न सिर्फ बड़े हैं, बल्कि पूरी दुनिया में कहीं भी हमला करने में सक्षम हैं और कितने भी बड़े बमों के साथ।
हालाँकि बी-2 स्पिरिट इन सबसे सबसे खास है, क्योंकि वो स्टील्थ यानी अदृश्य रहकर हमला करता है और किसी रडार की पकड़ में नहीं आता। ये तीनों स्ट्रेटजिक बॉम्बर अमेरिका के न्यूक्लियर ट्रॉयड का हिस्सा हैं, जो कन्वेंशनल यानी आम बमों के साथ ही परमाणु बम भी ले जा सकते हैं।
आने वाले समय में इन्हें रिप्लेस किया जाना है। सबसे पहले बी-2 स्पिरिट और बी-1 लॉन्सर 2030 से 2024 तक रिटायर होंगे, इसके बाद 2050 से पहले तक बी-52। इनकी जगह लेने के लिए बी-21 रेडर जेट तैयार हो रहे हैं, जिन्हें लॉन्ग रेंज स्ट्राइक बॉम्बर के तौर पर बनाया जा रहा है। ये स्टील्थ भी होंगे और ज्यादा ताकतवर भी।
बहरहाल, बी-2 स्पिरिट स्टील्थ बॉम्बर (बमवर्षक विमान) सिर्फ एक फाइटर जेट नहीं, बल्कि अमेरिका की सैन्य ताकत का प्रतीक है। इसका इतिहास कोल्ड वॉर से शुरू हुआ और आज ये ईरान जैसे मिशनों में अपनी ताकत दिखा रहा है। इसकी स्टील्थ तकनीक, लंबी उड़ान और भारी हथियार ले जाने की ताकत इसे बेजोड़ बनाती है। ये दुश्मन की नजरों से बचकर उनके सबसे सुरक्षित ठिकानों को नष्ट कर सकता है।
भविष्य में बी-21 रेडर इसका स्थान ले सकता है, लेकिन अभी बी-2 दुनिया का सबसे खतरनाक फाइटर जेट है। चाहे रणनीतिक डर हो या गहरे हमले बी-2 हर मोर्चे पर लाजवाब है।
इंदिरा गाँधी की अगुवाई में कॉन्ग्रेस सरकार द्वारा लगाए गए 21 महीने लंबे आपातकाल की 50वीं वर्षगाँठ से पहले कर्नाटक सरकार एक नया कानून ला रही है। इसका नाम है कर्नाटक मिसइन्फॉर्मेशन एंड फेक न्यूज (प्रतिबंध) बिल, 2025।
बताया जा रहा है कि इस कानून का मकसद सोशल मीडिया पर फेक न्यूज और गलत जानकारी फैलाने पर रोक लगाना है। इस बिल के तहत अगर कोई व्यक्ति ऐसी जानकारी साझा करता है जिसे सरकार झूठी या भ्रामक मानती है, तो उसके खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज किया जाएगा और उसे जेल भी हो सकती है।
यह कदम कॉन्ग्रेस सरकार द्वारा लगाए गए 21 महीने की इमरजेंसी की 50वीं वर्षगाँठ से पहले उठाया जा रहा है। इस बिल के जरिए राज्य सरकार को यह अधिकार मिल जाएगा कि वह तय कर सके कि कौन सी जानकारी फर्जी है और जिसके आधार पर कानूनी कार्रवाई कर सके।
इस प्रस्तावित बिल के तहत अगर कोई व्यक्ति ऐसी जानकारी फैलाता है जो जनस्वास्थ्य, सुरक्षा, शांति या चुनावों की निष्पक्षता के लिए खतरा बनती है, तो उसके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की जा सकती है।
इस कानून के तहत दोषी पाए जाने पर 2 साल की न्यूनतम सजा हो सकती है, जिसे बढ़ाकर 5 साल तक किया जा सकता है, साथ में जुर्माना भी लगेगा। गंभीर मामलों में सजा 7 साल तक की जेल या ₹10 लाख तक जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। अगर कोई व्यक्ति प्रतिबंधित जानकारी को फैलाने में मदद करता है, तो उसे भी 2 साल तक की सजा हो सकती है।
किसी भी ‘झूठी सामग्री’ को ब्लॉक करने और प्रतिबंधित करने के लिए छह सदस्यीय प्राधिकरण
विधेयक के मसौदे में सोशल मीडिया पर फर्जी समाचार और भ्रामक जानकारी को रोकने के लिए एक छह सदस्यीय सोशल मीडिया नियामक प्राधिकरण का गठन किया जाएगा।
यह प्राधिकरण सोशल मीडिया पर किसी भी ऐसी सामग्री को प्रतिबंधित, ब्लॉक या हटाने का अधिकार रखेगा जिसे वह गलत, भ्रामक या हानिकारक मानता है। इसे यह सुनिश्चित करने की पूरी शक्ति दी जाएगी कि ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म्स पर फर्जी समाचार या हानिकारक सामग्री का प्रसार न हो।
इस प्राधिकरण में छह सदस्य होंगे: कन्नड़ और संस्कृति मंत्री जो पदेन अध्यक्ष होंगे, विधान सभा और विधान परिषद से एक-एक सदस्य, राज्य सरकार द्वारा नियुक्त सोशल मीडिया कंपनियों के दो प्रतिनिधि, और एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी जो सचिव के रूप में कार्य करेंगे।
प्रस्तावित विधेयक के तहत विशेष न्यायालय स्थापित किए जाएँगे
इस विधेयक के तहत राज्य सरकार को कर्नाटक के अंदर और बाहर रहने वाले लोगों के खिलाफ भी फर्जी या भ्रामक जानकारी फैलाने पर कार्रवाई करने के लिए व्यापक अधिकार दिए गए हैं।
इसके प्रावधानों के अनुसार, आरोपित लोगों पर मुकदमा चलाने के लिए सत्र न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक विशेष न्यायालय बनाया जाएगा। यह विशेष न्यायालय गलत जानकारी फैलाने वाले सोशल मीडिया मध्यस्थों, प्रकाशकों, प्रसारकों या किसी अन्य व्यक्ति को रोकने और उन पर नियंत्रण रखने के निर्देश दे सकेगा।
कॉन्ग्रेस, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने का इतिहास और आपातकाल
बता दें कि कॉन्ग्रेस पार्टी पर बार-बार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को दबाने के आरोप लगे हैं और अब वह ऐसा विधेयक ला रही है जिससे भविष्य में सेंसरशिप और राजनीतिक दुरुपयोग की आशंका बढ़ जाती है।
आपातकाल के दौरान दिवंगत प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी द्वारा आरएसएस पर प्रतिबंध लगाया गया था, लाखों लोगों को जेल में डाला गया और समाचार पत्रों पर प्री-सेंसरशिप लागू की गई थी। इसे भारतीय लोकतंत्र पर एक गंभीर हमला माना गया है।
अब कर्नाटक सरकार का प्रस्तावित विधेयक सरकार को यह अधिकार देता है कि वह अपनी पसंद के अनुसार किसी भी बयान या सामग्री को गलत बताकर उस पर कार्रवाई कर सके, जिससे निष्पक्ष अभिव्यक्ति पर खतरा बढ़ जाता है।
ये भी मालूम हो कि कॉन्ग्रेस पार्टी ने कई मौकों पर मीडिया और फिल्मों पर प्रतिबंध लगाने की कोशिश की है। 2018 में कॉन्ग्रेस ने ‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ फिल्म पर रोक लगाने की माँग की थी क्योंकि उसमें यह दिखाया गया था कि सोनिया गाँधी सरकार को नियंत्रित करती थी।
वही राहुल गाँधी ने ‘उड़ता पंजाब’ फिल्म का समर्थन किया, जो उस समय भाजपा-अकाली सरकार पर आधारित थी। उन्होंने फिल्म ‘मर्सेल’ का भी समर्थन किया जिसमें नोटबंदी की आलोचना की गई थी और दावा किया कि मोदी सरकार इस फिल्म को दबाने की कोशिश कर रही है।
कॉन्ग्रेस सरकार द्वारा पत्रकारों को निशाना बनाए जाने के भी कई उदाहरण हैं। मई 2022 में पवन खेड़ा ने पत्रकार अर्नब गोस्वामी के खिलाफ मामला दर्ज करवाया क्योंकि उनके चैनल ने कॉन्ग्रेस सरकार से जुड़ी खबरें दिखाई थी।
हाल ही में कॉन्ग्रेस-शासित तेलंगाना में मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने कहा कि जो उनके और उनके परिवार के खिलाफ आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल करेगा, उसे नंगा करके घुमाया जाएगा। यह बयान तब आया जब दो महिला पत्रकारों को एक किसान का इंटरव्यू लेने पर हिरासत में लिया गया, जिसने सरकार की आलोचना की थी।
कुल मिलाकर इस लेख में ये सारी जानकारी पाठकों को इसलिए दी जा रही है ताकि पता रहे कि कैसे कॉन्ग्रेस पार्टी बार-बार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को नियंत्रित करने की कोशिश करती रही है और अब नया विधेयक भी उसी दिशा में एक कदम हो सकता है।
पश्चिम बंगाल के हुगली के गोघाट में बीजेपी नेता शेख बकीबुल्ला का शव उनके बालकनी से लटका मिला है। मृतक बकीबुल्ला के दोनों हाथ बँधे हुए थे। शनिवार (21 जून 2025) को हुई इस घटना के विरोध में बीजेपी ने पुलिस के खिलाफ जमकर प्रदर्शन किया। कार्यकर्ताओं ने टीएमसी पर साजिश के तहत मारने का आरोप लगाया है।
35 साल के बकीबुल्ला बीजेपी के गोघाट अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ के अध्यक्ष थे और इलाके में काफी सक्रिय रहते थे। वह गोघाट के सानबंधी इलाके के रहने वाले थे।
परिजनों ने योजनाबद्ध तरीके से उनकी हत्या करके शव को फंदे से बाँध कर घर के बालकनी में लटकाने का आरोप लगाया है। परिजनों ने बीजेपी नेतृत्व से ‘हत्या है या आत्महत्या’ इसकी जाँच करने की माँग की है। पार्टी कार्यकर्ता और घरवाले पोस्टमार्टम की रिपोर्ट का भी इंतजार कर रहे हैं।
पुलिस पूरे मामले की जाँच कर रही है। इलाके में लोकप्रिय बकीबुल्ला की मौत से लोग सकते में आ गए हैं। लोगों ने दावा किया है कि ये एक राजनीतिक हत्या है। घटना के बाद जब पुलिस मौके पर पहुँची तो लोगों ने जमकर विरोध किया। इसके बाद बीजेपी के नेताओं द्वारा समझाने के बाद कार्यकर्ता शांत हुए और पुलिस ने शव को बरामद किया।
Killed for wearing saffron
Sheikh Bakibulla, a BJP worker from Goghat, was hanged with hands tied. TMC-backed goons did it.
इस मौत से इलाके के बीजेपी नेता गुस्से में हैं। इनलोगों के पूरी घटना की जानकारी पार्टी के उच्च पदाधिकारियों को दे दी है। पुलिस अब तक ये नहीं बता पा रही है कि शेख बकीबुल्ला ने आत्महत्या की है या उनका मर्डर किया गया है।
पश्चिम बंगाल पुलिस के अधिकारी ने बताया, “इस विशेष मामले में गोघाट पुलिस स्टेशन में भारतीय न्याय संहिता (हत्या) की धारा 103(1) के तहत अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई है । पोस्टमार्टम जाँच के बाद सर्जन ने मौखिक रूप से कहा कि मौत फाँसी के कारण हुई है। “
मृतक बकीबुल्ला के पिता शेख अब्दु्ल्ला ने कहा कि पहले बकीबुल्ला सीपीएम के कार्यकर्ता थे, लेकिन पार्टी के रवैया से दुखी होकर वह बीजेपी में शामिल हो गये। टीएमसी उनके जान के पीछे पड़ी थी। उन्होंने कई बार पहले भी उन पर हमला किया और जान लेने की कोशिश की।
वहीं हुगली के पुरसुरा से बीजेपी विधायक बिमन घोष ने कहा, ” उनके हाथ बँधे हुए थे और घटनास्थल पर खून भी गिरा था। इससे साफ होता है कि उनकी हत्या की गई है। प्रशासन से माँग है कि हत्या किसने की उसे सामने लाया जाए, किसी को बचाया नहीं जा सकता” उन्होने टीएमसी के गुंडों और स्थानीय नेताओं पर हत्या में हाथ होने का आरोप भी लगाया
पश्चिम बंगाल बीजेपी की ओर से कहा गया है कि, ” गोघाट में बीजेपी कार्यकर्ता शेख बकीबुल्ला को हाथ बाँधकर फाँसी पर लटका दिया गया। टीएमसी समर्थित गुंडों ने ऐसा किया। कोई गिरफ्तारी अब तक नहीं हुई। ये सिर्फ एक हत्या नहीं है बल्कि ममता बनर्जी की अगुवाई वाली बंगाल में टारगेटेड राजनीतिक हत्या है। “
बंगाल में बीजेपी नेताओं और कार्यकर्ताओं के साथ मारपीट, हत्या जैसी घटनाएँ कई बार सुर्खियों में आई हैं।
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प जो इस समय ईरान पर एयरस्ट्राइक करके चर्चा में हैं, वो एक दिन पहले तक नोबेल शांति पुरस्कार की चाह रखने के लिए सुर्खियों में बने हुए थे।
उन्होंने अपनी सोशल मीडिया साइट ट्रुथ सोशल पर एक लंबी पोस्ट लिखी थी, जिसमें उन्होंने दावा किया था कि रवांडा और डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो (DRC) के बीच एक शांति समझौता हुआ है। ट्रम्प ने इसे अफ्रीका के लिए एक महान दिन और दुनिया के लिए भी एक महान दिन बताया।
इस समझौते का श्रेय खुद को देते हुए ट्रम्प ने यह भी कहा कि उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलनी चाहिए और यह अफसोस जताया कि उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार नहीं मिला।
फोटो साभार: ट्रुथ सोशल
दिलचस्प बात यह है कि ट्रम्प ने बार-बार इस बात पर जोर दिया कि उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार नहीं मिलेगा, भले ही उन्होंने कई अहम काम किए हों। उन्होंने दावा किया कि रवांडा-DRC शांति समझौते के अलावा उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध भी रोका था।
पाकिस्तान एंगल – क्या ट्रम्प ने खुद को नामांकित करवाया?
हाल ही में खबरें आई हैं कि डोनाल्ड ट्रम्प नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकन की योजना बना रहे हैं। रिपोर्टो के मुताबिक, उन्होंने भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव के दौरान अपने शांति प्रयासों का हवाला देकर यह नामांकन आगे बढ़ाने की कोशिश की।
कहा जा रहा है कि ट्रम्प ने इसके लिए पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर से अपनी नजदीकी का इस्तेमाल किया। यह विवाद उस समय शुरू हुआ जब 22 अप्रैल को पहलगाम में आतंकी हमला हुआ।
जिसकी जिम्मेदारी लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े ‘द रेजिस्टेंस फ्रंट’ ने ली। इसके जवाब में भारत ने पाकिस्तान और उसके कब्जे वाले कश्मीर में आतंकी ठिकानों पर ‘ऑपरेशन सिंदूर‘ नाम से सैन्य कार्रवाई की। इस कार्रवाई से परेशान होकर पाकिस्तान ने रॉकेट, मिसाइल और ड्रोन दागे, जिन्हें भारत की रक्षा प्रणाली ने नाकाम कर दिया, जिसके बाद ये ऑपरेशन 9 मई को खत्म हुआ।
पाकिस्तान के डीजीएमओ ने 10 मई को भारत के डीजीएमओ को फोन करके युद्ध विराम की माँग की थी। अमेरिका ने इस मामले में हस्तक्षेप करने की कोशिश की, लेकिन भारत ने साफ कर दिया कि वह किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता नहीं चाहता।
वहीं, पाकिस्तान ने अमेरिका पर दबाव डाला कि वह भारत को हमले रोकने के लिए मजबूर करे। पाकिस्तान के अनुरोध पर भारत ने सैन्य कार्रवाई रोकने पर सहमति जताई, लेकिन इससे पहले कि कोई औपचारिक घोषणा हो, डोनाल्ड ट्रम्प ने दावा कर दिया कि उन्होंने ही यह युद्ध रोका है। भारत ने इस दावे को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा कि यह उसका खुद का निर्णय था और इसमें कोई तीसरा पक्ष शामिल नहीं था।
रिपोर्टों के मुताबिक, ट्रम्प पाकिस्तान के लिए इसलिए नरम रुख अपना रहे हैं क्योंकि पाकिस्तान उन्होंने उन्हें उनका नाम नोबेल शांति पुरस्कार के लिए दिया है। ट्रम्प का पाकिस्तान को लेकर रुख पहले से उतार-चढ़ाव भरा रहा है कभी कड़ा, कभी दोस्ताना।
याद दिला दें की एक समय ट्रम्प पाकिस्तान पर आतंकवाद का समर्थन करने का आरोप लगाते थे और चाहते थे कि अमेरिका उसकी फंडिंग बंद कर दे। आखिरकार, ओसामा बिन लादेन भी पाकिस्तान में ही तो पकड़ा गया था।
रवांडा-कांगो शांति समझौता – वास्तविक प्रगति या अवसरवाद?
डोनाल्ड ट्रम्प ने अपनी ट्रुथ सोशल पोस्ट में दावा किया कि उन्होंने अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के साथ मिलकर डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो (DRC) और रवांडा के बीच शांति समझौते की व्यवस्था की। उन्होंने यह भी कहा कि दोनों देशों के प्रतिनिधि जल्द ही वाशिंगटन में समझौते पर दस्तखत करेंगे।
अगर सचाई की बात करें तो यह है कि रवांडा और DRC के बीच यह शांति प्रक्रिया कई सालों से अफ्रीकी संघ और संयुक्त राष्ट्र की मदद से चल रही थी। अमेरिका ने इसमें मदद की, लेकिन वह अकेला नहीं था।
कतर ने भी इस समझौते में अहम भूमिका निभाई और पहले अंगोला ने भी मध्यस्थता की थी, जिसने मार्च में खुद को अलग कर लिया। दोनों देशों ने पूर्वी DRC में हिंसा रोकने के लिए एक अनंतिम समझौते पर सहमति जताई है और 27 जून को वाशिंगटन में औपचारिक रूप से दस्तखत होने हैं।
ट्रम्प ने इस पूरी प्रक्रिया का पूरा श्रेय खुद को देने की कोशिश की और नोबेल शांति पुरस्कार न मिलने की फिर से शिकायत की, लेकिन हकीकत यह है कि यह एक साझा कूटनीतिक प्रयास था और पूरी तरह से ट्रम्प को इसका श्रेय देना सही नहीं होगा।
क्या नोबेल के प्रति जुनून ओबामा के नोबेल शांति पुरस्कार से उपजा है?
ट्रंप की नाराज़गी शायद इस वजह से है कि बराक ओबामा को 2009 में नोबेल शांति पुरस्कार मिल गया था, वो भी उनके पहले कार्यकाल के कुछ ही महीनों बाद। जिसको लेकर ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर लिखा, “मैं चाहे कुछ भी कर लूँ, मुझे नोबेल शांति पुरस्कार नहीं मिलेगा।”
ट्रंप ने भारत-पाकिस्तान, सर्बिया-कोसोवो, मिस्र-इथियोपिया और इजरायल-ईरान जैसे कई क्षेत्रों में संघर्ष रोकने का दावा किया। लेकिन सोचने वाली बात ये है कि इन जगहों पर अब भी तनाव जारी है और खासकर मध्य पूर्व में हालात और भी खराब हो रहे हैं।
इससे सवाल उठता है कि क्या ट्रंप की कूटनीति वास्तव में नतीजे लाई है, या वो सिर्फ खुद को श्रेय देने में लगे हुए है, बिना किसी ठोस बदलाव के कुछ लोग उन्हें ऐसे व्यक्ति के रूप में देखने लगे हैं जो दिखावा ज्यादा करते हैं, जैसे कि गिल्डरॉय लॉकहार्ट , जो नाम कमाने के लिए दूसरों की उपलब्धियों का श्रेय लेता है।
नोबेल बलपूर्वक?
नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकन आमतौर पर किसी योग्य व्यक्ति या संगठन द्वारा किया जाता है, लेकिन ट्रम्प का पाकिस्तान के जरिए नामांकन पाने की कोशिश उनकी निराशा को दिखाता है। जैसे अब ये शांति के लिए नहीं, बल्कि अपनी छवि और प्रतिष्ठा के लिए है।
ट्रम्प चाहते हैं कि लोग उन्हें नोबेल के लायक मानें, भले ही उन्होंने ऐसा कोई ठोस काम न किया हो। खुद ट्रम्प ने कहा, “लोग जानते हैं और यही मेरे लिए मायने रखता है।” लेकिन हकीकत ये है कि इतिहास शायद उन्हें इतनी आसानी से श्रेय नहीं देगा। दुनिया के कई हिस्सों में संघर्ष अब भी जारी हैं और ट्रम्प की शांति उपलब्धियाँ अब एक वास्तविक रिकॉर्ड की जगह सिर्फ दावों की लिस्ट लगती हैं।
आज ये साफ हो गया है कि ट्रम्प नोबेल शांति पुरस्कार पाना चाहते हैं जिसके लिए वो पूरी कोशिश कर रहे है। वो अलग-अलग देशों के संघर्ष गिनाने लगे हैं, यह कहते हुए कि उन्होंने वहाँ कुछ ऐसा किया है जिससे उन्हें यह पुरस्कार मिलना चाहिए।
उन्हें कल तक इससे फर्क नहीं पड़ रहा था कि मध्य पूर्व में हालात और बिगड़ रहे हैं या इजरायल पर ईरानी मिसाइलें गिर रही हैं। उनके लिए बस इतना काफी था कि ओबामा को मिला था, तो उन्हें उससे ज्यादा मिलना चाहिए।
नोट- ये रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में अनुराग द्वारा लिखी गई है। इसका अनुवाद विवेकानंद मिश्रा ने किया है।
इजरायल ईरान युद्ध में अब अमेरिका सीधे रूप में शामिल हो गया है। अमेरिकी वायुसेना ने फोर्डो, नातांज और इस्फाहन परमाणु ठिकानों पर हमला किया है। राष्ट्रपति ट्रंप ने हमले की पुष्टि करते हुए कहा है कि यह एक बड़ा और सफल एयर स्ट्राइक था जिसमें अमेरिका के सभी लड़ाकू विमान सुरक्षित वापस लौट आए हैं।
उन्होंने कहा कि मुख्य निशाना ईरान का अहम परमाणु ठिकाना फोर्डो था जिसे पूरी तरह नष्ट कर दिया गया है। राष्ट्र्पति ट्रंप ने इसे अमेरिकी सेना की उपलब्धि बताया। हमले के बाद अमेरिका ने मध्य-पूर्व में अपने सभी एयरबेस को अलर्ट कर दिया है।
राष्ट्रपति ट्रम्प ने शनिवार (21 जून 2025) रात व्हाइट हाउस से राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में कहा, “हमारा उद्देश्य ईरान की परमाणु बम बनाने की क्षमता को नष्ट करना और दुनिया में आतंकवाद फैलाने वाले नंबर एक देश के परमाणु खतरे से लोगों को बचाना है। पिछले 40 साल से ईरान अमेरिका के खिलाफ काम कर रहा है और कई अमेरिकी इस नफरत का शिकार हुए हैं, इसलिए मैंने तय किया है कि अब इसे रोकना ही होगा।”
करीब दो हफ्ते पहले राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान के खिलाफ इजरायल के सैन्य हमले की जानकारी दी थी। हालाँकि इसके बाद उन्होने कहा था कोई नहीं जानता कि वह क्या करने जा रहे हैं।
अमेरिका ने अपने अत्याधुनिक फाइटर जेट्स बी2 बॉम्बर्स को मध्यपूर्व की ओर प्रशांत महासागर में रवाना किया था। इसके बाद कयास लगाए जा रहे थे कि अमेरिका रणनीति में बदलाव कर सीधा युद्ध में शामिल हो सकता है।
राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान को इस हमले के बाद चेतावनी दी है। उन्होने कहा है कि अगर ईरान ने अब भी शांति का रास्ता नहीं अपनाया तो इसके परिणाम और भी ज्यादा भयानक होंगे। ट्रंप ने कहा, “या तो ईरान में शांति होगी या फिर विनाश”
हमले पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए इजरायल के पीएम नेतन्याहू ने अमेरिका और राष्ट्रपति ट्रंप की तारीफ की और कहा, “राष्ट्रपति ट्रम्प और मैं अक्सर कहते हैं कि शक्ति के रास्ते ही शांति आती है। पहले शक्ति आती है, फिर शांति आती है।”
President Trump and I often say: ‘Peace through strength.’
— Benjamin Netanyahu – בנימין נתניהו (@netanyahu) June 22, 2025
ईरान ने इस हमले का बाद सरकारी टीवी चैनल के माध्यम से चेतावनी दी है। ईरान ने कहा है कि अब क्षेत्र में मौजूद हर अमेरिकी नागरिक या सैन्यकर्मी ईरान के टारगेट पर हैं।
इससे पहले ईरान के सुप्रीम लीडर अली खामेनेई ने तीन नामों का जिक्र किया है जिनमें से कोई भी उनके उत्तराधिकारी बन सकते हैं। ये हैं- अलीरेजा अराफी अली असगर हेजाजी, हासिम हुसैनी बुशहरी और अली अकबर वेलायती। ये तीनों मोलवी हैं। इन नामों में खामेनेई के बेटे का नाम शामिल नहीं है।
पहले माना जा रहा था कि खोमेनेई का उत्तराधिकारी उनका बेटा मोजतबा होगा। अब इस बहस पर विराम लग गया है। रिपोर्ट के मुताबिक खामेनेई इस वक्त बंकर में छिपे हुए हैं। उनके आसपास कोई डिवाइस नहीं है ताकि कोई उनके लोकेशन को ट्रेस न कर सके। ये जानकारी ईरान के अधिकारियों ने दी है।
कॉन्ग्रेस सांसद और नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी आजकल कभी कभार अपने AC कमरों से निकल आते हैं। जब वह निकलते हैं तो उन्हें कोई ना कोई दुखी इंसान मिल जाता है। इसके बाद उस दुख की कहानी का एक सिरा मोदी सरकार से जोड़ कर उसकी आलोचना की जाती है।
देश पर 6 दशक से अधिक राज करने वाली कॉन्ग्रेस के डिफैक्टो मुखिया राहुल गाँधी इसी कड़ी में हाल ही में दिल्ली में अपने परनाना के नाम पर बनाई गई नेहरू प्लेस मार्केट पहुँचे। इसे एशिया की सबसे बड़ी कंप्यूटर और मोबाइल मार्केट होना का खिताब हासिल है।
“Make in India” promised a factory boom. So why is manufacturing at record lows, youth unemployment at record highs, and why have imports from China more than doubled?
Modi ji has mastered the art of slogans, not solutions. Since 2014, manufacturing has fallen to 14% of our… pic.twitter.com/HsL9PBUYpx
जब राहुल गाँधी यहाँ पहुँचे तो उन्हें पता चला कि इस देश में फोन बनाए जाते हैं। लेकिन इसमें उन्हें एक समस्या दिखी और यह समस्या उन्होंने ट्वीट के रूप में जाहिर की। राहुल गाँधी ने दावा किया कि भारत में मोदी सरकार आने के बाद निर्माण क्षेत्र बर्बाद हो गया है।
उन्होंने यह भी दावा किया कि भारत में जो फोन निर्मित हो रहे हैं वह असल में मैन्युफैक्चरिंग नहीं बल्कि असेम्बलिंग यानी पुर्जों को एक साथ जोड़ना है। इसके साथ ही उन्होंने वीडियो में दावा किया कि हम चीन से कहीं पीछे हैं। उन्होंने चीन और भारत के बीच व्यापार घाटे का भी ठीकरा मोदी सरकार पर फोड़ा।
वैसे तो देश के नेता प्रतिपक्ष का मैन्युफैक्चरिंग जैसी चीजों के लिए चिंतित होना काफी प्रसन्नता की बात होती, लेकिन राहुल गाँधी असल में चिंतित नहीं हैं बल्कि वह झूठ बोल रहे हैं और आधे अधूरे तथ्य रख कर सरकार को घेरना चाह रहे हैं। ऑपइंडिया राहुल गाँधी के दावों की सच्चाई आपके सामने ला रहा है।
सबसे पहला दावा- असेम्बलिंग और मैन्युफैक्चरिंग
राहुल गाँधी ने कहा कि हमारे देश में जो स्मार्टफोन का निर्माण हो रहा है, वह असल में मेक इन इंडिया नहीं बल्कि असेम्बल इन इंडिया है। उन्होंने दावा किया कि हम सिर्फ पुर्जे जोड़ने के काम को मेक इन इंडिया कह रहे हैं। राहुल गाँधी ने दावा किया कि चीन से पुर्जे आते हैं और हम उन्हें जोड़ देते हैं।
राहुल गाँधी के इस दावे की सच्चाई हाल ही में आई एक रिपोर्ट बताती है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत में बनने वाले एप्पल के फोन और बाकी उत्पादों में लगने वाले 20% से अधिक पार्ट देश में ही बन रहे हैं। यानी भारत में बनने वाले किसी आईफोन के लगभग 20% पार्ट स्थानीय स्तर पर ही निर्मित होते हैं।
रिपोर्ट बताती है कि यह उपलब्धि एप्पल को अलग-अलग पार्ट सप्लाई करने वाले वेंडर्स ने हासिल की है। एप्पल के भारत भर में पार्ट सप्लायर्स मौजूद हैं। इनमें TDK कॉर्पोरेशन, होन हाई प्रिसिजन, टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स, फॉक्सलिंक समेत तमाम कम्पनियाँ हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, सैमसंग और डिक्सन भी 20%-25% तक भारत में बने पार्ट ही उपयोग कर रही है। सरकार का लक्ष्य है कि इसे आने वाले वर्षों में 35%-40% के स्तर पर ले जाया जाए। इससे भारतीय उद्योग भी मजबूत होंगे और जरूरी पार्ट्स के लिए विदेशों पर निर्भरता भी कम होगी।
राहुल गाँधी को यह पता होना चाहिए कि दशकों से इस काम जुटा हुआ चीन भी अभी तक 35%-40% के स्तर पर पहुँच पाया है। भारत ने 20% की उपलब्धि 5 ही वर्षों में हासिल कर ली है। और उन्हें एक बात और समझनी चाहिए कि किसी भी वस्तु का निर्माण जब चालू होता है, तो उसका लोकलाइजेशन धीमे-धीमे होता है।
इसका सबसे बड़ा उदाहरण देश की ऑटो इंडस्ट्री है। 1980 के दशक में सुजुकी ने भारत में गाड़ियों को केवल एक साथ जोड़ना (असेम्बली) चालू किया थी लेकिन अब भारत में बनने वाली सुजुकी की हर गाड़ी में 95% पार्ट भारतीय होते हैं। यही स्थिति बाक़ी इंडस्ट्री की भी है।
राहुल गाँधी आज जिस असेम्बलिंग को कोस रहे हैं, उसने वित्त वर्ष 2024-25 में देश के निर्यात में ₹2 लाख करोड़ से अधिक का योगदान दिया है। इससे लाखों नौकरियाँ पैदा हुई हैं। हालाँकि, ऐसा पहली बार नहीं है जब राहुल या उनके गैंग ने भारत की इस उपलब्धि को कम कर दिखाने का प्रयास किया है।
इससे पहले उनके करीब रघुराम राजन भी ऐसी बातें कह चुके हैं। उनके करीबी कई लोग तो इसे पेचकसबाजी बताते थे। हालाँकि, जब भारत ने पार्ट्स भी स्थानीय स्तर पर बनाने चालू कर दिए, तो उनके होठ सिल गए हैं। राहुल गाँधी को पूरी सच्चाई देश को बतानी चाहिए।
दूसरा दावा- चीन पर बढ़ती निर्भरता
राहुल गाँधी वीडियो क दौरान दावा करते हैं कि बीते 10 वर्षों में हमारे चीन से आयात 2 गुना बढ़ गए हैं और मोदी सरकार दोनों देशों के बीच बढ़ते व्यापार घाटे के लिए दोषी है। यह बात ठीक है कि हम चीन से बड़ी मात्रा में चीजें आयात करते हैं और हमारा, उसका व्यापार घाटा भी बहुत बड़ा है।
लेकिन राहुल गाँधी एक बात इस दौरान बहुत करीने से छुपा ले जाते हैं। वह यह नहीं बताते कि भारत की चीन पर निर्भरता असल में UPA दौर में ही चालू हुई थी। मोदी सरकार को आयात में दोगुनी बढ़त के लिए कोसने वाले राहुल गाँधी की पार्टी के राज में भारत का चीन से व्यापार घाटा लगभग 20 गुना बढ़ा।
वर्ष 2004 में भारत चीन से आयात मात्र 7.5 बिलियन डॉलर (₹62 हजार करोड़) था। कॉन्ग्रेस के 2004 से 2014 के राज में या 8 गुना बढ़ कर लगभग 60 बिलियन डॉलर (₹5 लाख करोड़+) के पार पहुँच गया। यानी इस दौरान इसमें बिना किसी रोकटोक के 8 गुने की बढ़त हुई।
राहुल गाँधी को यह भी जानना चाहिए कि इसी दौरान भारत और चीन का व्यापार घाटा भी प्रति वर्ष 45% की रफ़्तार से बढ़ा। केन्द्रीय मंत्री पीयूष गोयल के अनुसार, 2004 और 2014 के बीच, भारत का व्यापार घाटा 2 बिलियन डॉलर से लगभग 40 बिलियन डॉलर हो गया।
आँकड़ों के अनुसार, वर्ष 2004 में भारत का चीन से व्यापार घाटा लगभग ना के बराबर था। कॉन्ग्रेस के सत्ता में रहते हुए 2014 में यह 40 बिलियन डॉलर (₹3.2 लाख करोड़+) के पार पहुँच गया। वर्तमान में मोदी सरकार ने इसे बीते कई वर्षों से नियंत्रित कर रखा है।
राहुल गाँधी और उनकी पार्टी को यह जवाब देना चाहिए कि आखिर क्यों उनकी सरकार के दौरान चीन के लिए भारत के बाजार के दरवाजे खोल दिए गए और क्यों उसके उत्पाद भारत में बिना रोक टोक के आते रहे। क्यों उस दौरान कॉन्ग्रेस ने भारत में निर्माण को बढ़ावा देने पर जोर दिया।
यह काम भी मोदी सरकार ने ही चालू किया और PLI (प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव) की स्कीम निकाली। इसके चलते भारत के निर्माण क्षेत्र में दोबारा जान आई और विदेशी कम्पनियाँ चीन के बजाय भारत को भी एक विकल्प के तौर पर देखने लगीं।
तीसरा दावा- मैन्युफैक्चरिंग का घटता शेयर
राहुल गाँधी ने अपने इस वीडियो और ट्वीट में दावा किया कि भारत में निर्माण क्षेत्र का हिस्सा लगातार घट रहा है। उन्होंने यह बताया तो लेकिन दो तथ्य छुपा लिए। पहला तथ्य यह है कि जब भी कोई देश विकासशील से विकसित की यात्रा करता है, तो उसकी अर्थव्यवस्था में निर्माण और कृषि क्षेत्र का हिस्सा घटता है।
दूसरा यह कि जब भी कोई देश विकसित होने चलता है तो वह कृषि से निर्माण और फिर सेवा क्षेत्र की तरफ जाता है। लेकिन यह कॉन्ग्रेस की ही देन है कि भारत सीधे कृषि से सेवा क्षेत्र में जाने वाली अर्थव्यवस्था बना है। कॉन्ग्रेस को सलाह देने वाले अर्थशास्त्रियों ने लगातार इस बात का विरोध किया है कि भारत को निर्माण क्षेत्र पर फोकस बढ़ाना चाहिए।
इसका सबसे बड़ा उदाहरण रघुराम राजन हैं। उन्होंने ही भारत को चीन की तरह निर्माण क्षेत्र पर ध्यान ना देने की सलाह दी थी। कॉन्ग्रेस के ही राज में 1991 तक तो भारत में आर्थिक सुधार नहीं हुए। इसके चलते निर्माण क्षेत्र नहीं पनपा। इसके बाद जब आर्थिक सुधार मजबूरी में किए भी गए तो हमने सेवा क्षेत्र की राह पकड़ी।
राहुल गाँधी जिस निर्माण क्षेत्र का हिस्सा GDP में घटने की बात कर रहे हैं, वह कोई नई बात नहीं है। यह प्रक्रिया कॉन्ग्रेस राज में ही चालू हो गई थी। असल बात यह है कि निर्माण क्षेत्र में भारत वापस अब अपनी मजबूती दर्ज करवा रहा है। इससे राहुल गाँधी को समस्या है।
कभी वह इसे असेम्बली इन इंडिया तो कभी चीन को फायदा पहुँचाने की प्रक्रिया बता रहे हैं। उनके पास इसका कोई विकल्प है, ऐसा भी नहीं है। राहुल गाँधी सिर्फ आलोचना के वास्ते ही भारत की इस उपलब्धि का मजाक उड़ा रहे हैं, हालाँकि यह सत्य के आसपास भी नहीं फटकता।
इंदिरा गाँधी ने प्रधानमंत्री रहते हुए देश पर जो आपातकाल थोपा था उसके 50 वर्ष पूरे होने को हैं। इंदिरा गाँधी ने देश में 25 जून 1975 को आपातकाल घोषित किया और ये 21 मार्च 1977 तक चला। यह आजाद भारत का सबसे काला दौर माना जाता है, जब नागरिकों के सभी मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गए और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक लगा दी गई थी।
सरकार ने सभी संस्थाओं का इस्तेमाल विरोध को दबाने के लिए किया। जो सरकार के खिलाफ बोले, उन्हें गिरफ्तार किया गया, पीटा गया और कई बार बिना सबूत के मार दिया गया। छात्र और युवा विशेष रूप से निशाना बने।
सरकार ने मीडिया पर सख्त सेंसरशिप लगाई, ताकि जनता तक सही जानकारी न पहुँचे। उस समय रेडियो और टीवी सरकार के नियंत्रण में थे, इसलिए केवल प्रेस ही स्वतंत्र माध्यम था, जिसे दबा दिया गया।
सरकार के साथ सहयोग करने वाले अफसरों और मीडिया के लोगों को इनाम दिए गए, जबकि जनता के दुख-दर्द को नजरअंदाज कर दिया गया। सत्ता के बल पर संविधान और अभिव्यक्ति का स्वतंत्रता को कुचलकर भारतीय लोकतंत्र को खत्म करने का प्रयास किया गया।
प्रिंट मीडिया और आपातकाल
आपातकाल के दौर में लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करना हर किसी का दायित्व था। पर आधिकांश मीडिया संस्थानों ने सत्ता के सामने घुटने टेकते हुए ‘प्रेस की आजादी’ को गिरवी रख दिया।
शुरुआत में कुछ अखबारों ने आपातकाल विरोध किया। कुछ ने अपने संपादकीय पन्ने खाली छापे। लेकिन सरकारी दबाव में जल्द ही ये विरोध बंद हो गया। मीडिया ने लोकतांत्रिक अधिकारों पर प्रतिबंधों को चुपचाप स्वीकार कर लिया।
भारतीय जनता पार्टी (BJP) के वरिष्ठ नेता और पूर्व उप-प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने इस स्थिति को एक वाक्य में बयाँ किया, “जब इंदिरा गाँधी ने मीडिया को झुकने को कहा, तो वह रेंगने लगा।”
उस समय अखबारों में सिर्फ सरकार की तारीफ होती थी। इंदिरा गाँधी और उनके बेटे संजय गाँधी की शान में कसीदे पढ़े जाते थे। सरकार काढोल पीटते हुए विज्ञापन छापे जा रहे थे।प्रेस की आजादी के लिहाज से यह सबसे बुरे दौर में से एक था।
इंदिरा गाँधी भारत में आपातकाल की घोषणा करती हुई। (फोटो साभार: मिंट)
आपातकाल के दौरान भारत के कई प्रमुख अंग्रेजी समाचार पत्रों और पत्रकारों ने सरकार का समर्थन किया और प्रेस की स्वतंत्रता छोड़ दी। उद्योगपति कृष्ण कुमार बिड़ला के नेतृत्व में उस समय का मशहूर अंग्रेजी अखबार हिंदुस्तान टाइम्स (HT) ने इंदिरा गाँधी सरकार का साथ दिया।
टाइम्स ऑफ इंडिया (TOI) ने भी सरकारी रुख अपना लिया, क्योंकि इसके निदेशक मंडल का एक-तिहाई हिस्सा सरकार का समर्थन कर रहा था। मीडिया में आलोचना की स्वतंत्रता के लिए जगह खत्म हो गई, राजनीतिक कार्टून रातों-रात गायब हो गए। किसी ने भी प्रधानमंत्री की आलोचना करने की हिम्मत नहीं की। द हिंदू अखबार ने भी अत्यधिक सावधानी बरती और खुले विरोध से परहेज किया।
इसमें द इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ इंडिया के संपादक और मशहूर पत्रकार खुशवंत सिंह भी शामिल थे जिन्होंने आपातकाल का पुरजोर समर्थन किया। उन्होंने कहा कि मई 1975 तक देशभर में सरकार के खिलाफ बड़े स्तर पर विरोध प्रदर्शन हो रहे थे, जो कई बार हिंसक हो जाते थे।
उन्होंने बॉम्बे की सड़कों पर नारेबाज करते हुए लोगों को कारों और दुकानों को नुकसान पहुँचाते खुद से देखने की बात भी कही थी। उनके अनुसार, विपक्षी नेता चाहते थे कि देश की स्थिति इस कदर बिगड़ जाए कि इंदिरा गाँधी इस्तीफा देने के लिए मजबूर हो जाएँ।
बाद में खुशवंत सिंह को इंदिरा गाँधी की सरकार ने राज्यसभा भेजा। 2007 में उन्हें देश का दूसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण भी दिया गया।
एक आज्ञाकारी प्रेस
आपातकाल के दौरान चुप्पी को कई पत्रकारों, संपादकों और अखबार मालिकों ने जायज ठहराने की भी कोशिश की। टाइम्स ऑफ इंडिया के बोर्ड का कहना था कि वे आपातकाल का विरोध नहीं करेंगे, क्योंकि यह उस समय का कानून था और उसका पालन करना जरूरी था।
इस फैसले के बारे में अखबार के वरिष्ठ पत्रकार इंदर मल्होत्रा ने बताया, “हम इसके खिलाफ नहीं बोल सकते, यह तय कर लिया गया था। चूंकि अखबार निजी स्वामित्व में था, इसलिए हमें भी वही रुख अपनाना पड़ा।” उन्होंने यह भी बताया कि कुछ लोगों ने सुझाव दिया था कि अगर हम विरोध नहीं कर सकते, तो कम से कम समर्थन भी न करें और आखिरकार यही अखबार की नीति बन गई।
बाद में इंदर मल्होत्रा ने 1991 में इंदिरा गाँधी के राजनीतिक और निजी जीवन पर एक पुस्तक भी लिखी। सूचना और प्रसारण मंत्रालय की ओर से दिए गए सरकारी विज्ञापन और घोषणाएँ ज्यादातर इंदिरा गाँधी सरकार के नसबंदी अभियान को बढ़ावा देने के लिए थी, जिसकी जिम्मेदारी उनके बेटे संजय गाँधी ने संभाल रखी थी। खबरें इस तरह से लिखी जाती थीं कि वह सरकारी प्रचार अधिक लगता था।
इस स्थिति की व्याख्या करते हुए लालकृष्ण आडवाणी ने कहा था कि प्रेस पर सेंसरशिप लागू होने के बाद सभी अखबार एक जैसे लगने लगे थे- बेरंग, नीरस और सरकारी घोषणाओं की कॉपी जैसे।
उस समय इंडियन एक्सप्रेस के चेन्नई संस्करण में रिपोर्टर रहे लेखक ज्ञानी शंकरन ने बताया था कि मीडिया के पास इसके अलावा कोई विकल्प नहीं था। सेंसरशिप इतनी सख्त थी कि अगर किसी खबर को मंजूरी नहीं मिलती तो पन्ने खाली छोड़ने पड़ते थे या ‘प्याज का रायता कैसे बनाएँ’ जैसे कामचलाऊ लेख छापने पड़ते थे। सेंसर की अनुमति के बिना राजनीतिक खबर छापना मना था
आपातकाल के दौरान कुछ अखबारों और कई छोटे, स्वतंत्र पत्र-पत्रिकाओं ने सेंसरशिप का विरोध किया और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करने की कोशिश की। मीडिया विश्लेषक इंदु बी सिंह के अनुसार प्रेस को नियंत्रित करने के लिए इंदिरा गाँधी ने तीन मुख्य रणनीति अपनाई,
सरकारी विज्ञापनों का इस्तेमाल दबाव बनाने के लिए करना
समाचार संगठनों का जबरन विलय?
पत्रकारों, अखबार मालिकों और शेयरधारकों में डर और असुरक्षा पैदा करना
उनके अनुसार इन रणनीतियों की वजह से अधिकांश मीडिया संस्थान सरकार के सामने झुक गए और स्वतंत्र पत्रकारिता लगभग खत्म हो गई।
आपातकाल का गुणगान करने का प्रयास
आपातकाल के दौरान कुछ प्रमुख मीडिया प्लेटफॉर्मों ने न केवल सरकार के आदेशों का पालन किया, बल्कि आपातकाल को सकारात्मक रूप देने की कोशिश भी की।
इंडिया टुडे में 15 दिसंबर 1975 को छपे एक लेख के अनुसार, सरकार ने दावा किया कि हैदराबाद, बेंगलुरु, चेन्नई और तिरुवनंतपुरम जैसे दक्षिणी शहरों में आपातकाल को जनता ने सकारात्मक रूप से स्वीकार किया है। लोगों ने यहाँ तक कहा कि यह कदम 1947 में ही उठा लिया जाना चाहिए था।
रिपोर्ट में बताया गया कि विरोध, हड़ताल और आंदोलनों को दमन किए जाने के बाद एक ‘शांत माहौल’ बना। इसे सरकार ने अपनी उपलब्धि बताया। इस उपलब्धि में गेहूं-चावल की पर्याप्त आपूर्ति, कीमतों पर नियंत्रण और बेहतर सरकारी कामकाज को भी गिनाया गया।
कॉन्ग्रेस के उस समय के मुख्यमंत्री देवराज उर्स ने कहा कि काम की रफ्तार बढ़ी है और लोग ज्यादा जिम्मेदार हो गए हैं। आंध्र प्रदेश ने कर संग्रह में रिकॉर्ड बनाया। इसके बाद सरकार की वार्षिक योजना को बढ़ाकर 1870 करोड़ रुपए कर दिया गया।
कॉन्ग्रेस अध्यक्ष देवकांत बरुआ ने भी आपातकाल को देश के लिए जरूरी बताया था। उन्होंने कहा था कि अगर भारत बचेगा, तभी बाकी सब बचेगा। उद्योगपति कृष्ण कुमार बिड़ला ने कहा था कि अर्थव्यवस्था पहले से बेहतर हुई है, काला धन और तस्करी पर लगाम लगी है और प्रवासी भारतीयों ने भी अपना निवेश बढ़ाया है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि आपातकाल ने छात्रों को शिक्षा की ओर लौटने, कौशल प्रशिक्षण शुरू करने और सरकारी कामकाज में पारदर्शिता लाने में मदद की। हालाँकि, इंदिरा गाँधी को बैंकों के राष्ट्रीयकरण के लिए आलोचना भी झेलनी पड़ी। इसके अलावा 20-सूत्रीय योजना के जरिए अर्थव्यवस्था पर सरकारी शिकंजा कसने को लेकर भी किरकिरी हुई। इसे निजी क्षेत्र की स्वतंत्रता का हनन और विकास के लिए बाधा माना गया।
आपातकाल के पीड़ितों को ही दोषी ठहराने की कोशिश
आपातकाल के दौरान इंडिया टुडे ने इंदिरा गाँधी को प्रेस की आजादी की समर्थक बताने की कोशिश की। उनकी रिपोर्ट में कहा गया था कि इंदिरा गाँधी अक्सर कहती थीं कि वे प्रेस को दबाना नहीं चाहती, जबकि असल में प्रेस पर कड़े प्रतिबंध लगे हुए थे और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इसकी आलोचना हो रही थी। लेख में यह भी जोड़ा गया था कि लोकतंत्र में स्वतंत्रता और जिम्मेदारी के बीच संतुलन बनाना एक चुनौती है।
इंडिया टुडे ने भारतीय प्रेस को ‘जीवंत’ के बजाय ‘जंगली’ बताया और आरोप लगाया कि यहाँ बिना सबूत के अफवाहें और अप्रमाणित रिपोर्टें छापी जाती हैं। उन्होंने यह तर्क दिया कि पश्चिमी देशों में सख्त मानहानि कानूनों के कारण ऐसी रिपोर्टिग संभव नहीं होती। लेख में यह भी दावा किया गया था कि आपातकाल के दौरान सेंसरशिप कानूनों को धीरे-धीरे नरम किया जा रहा है ताकि ‘रचनात्मक आलोचना’ को अनुमति दी जा सके।
इंडिया टुडे ने आपातकाल के विरोधियों को ‘शोर मचाने वाला अल्पसंख्यक’ कहा। इसके साथ ही ये सवाल भी उठाया कि क्या लोकतंत्र में बिना हिंसा के अनुशासन, मेहनत और सामाजिक कार्यकुशलता फिजूल है? इसमें बताया गया कि कुछ गैर-कॉन्ग्रेसी राज्य सरकारें जैसे गुजरात और तमिलनाडु ठीक से काम कर रही हैं ताकि ये दिखाया जा सके कि आपातकाल का विरोध बेबुनियाद है।
पत्रिका ने विपक्षी एकता को भी निशाना बनाया और आरोप लगाया था कि किसी वैचारिक लक्ष्य से परे वे सिर्फ इंदिरा गाँधी को सत्ता से हटाने के लिए एकजुट हुए हैं। कुछ विपक्षी नेताओं को ‘अपमानजनक कार्यों’ में शामिल होने के आरोप में की गई गिरफ्तारी को भी सही बताया गया। यहाँ तक कि स्वतंत्रता सेनानी जयप्रकाश नारायण के जेल जाते वक्त राष्ट्रीय क्रांति की घोषणा का भी मजाक बनाया गया।
लेख में बेहद असंवेदनशील तरीके से सवाल ठातो हुए लिखा गया था कि ‘आपातकाल कहाँ है? सैनिक कहाँ हैं? बंदूकें कहाँ हैं?’ और दावा किया गया था कि आम लोग अब राहत महसूस कर रहे हैं क्योंकि चीजें सस्ती हुई हैं। लोग अपने परिवार का भरण-पोषण ठीक से कर पा रहे हैं। एक नेता ने तो यहाँ तक कह दिया कि भारत में पर्यटन बढ़ाने के लिहाज से आपातकाल का प्रचार किया जाना चाहिए। टैगलाइन हो, ‘आपातकाल देखने भारत आएँ।’
इसी तरह, इंडिया टुडे ने न केवल आपातकाल का समर्थन किया बल्कि आलोचकों और पीड़ितों का मजाक भी उड़ाया। साथ ही इंदिरा गाँधी को सहनशील नेता के रूप में पेश करने की कोशिश की गई। ये तब हो रहा था जब प्रेस की आजादी और लोकतंत्र की मूल भावना को ध्वस्त किया जा रहा था।
इंदिरा गाँधी के प्रति वफादारी
आपातकाल के दौरान कई मीडिया संगठनों ने कॉन्ग्रेस और इंदिरा गाँधी का समर्थन किया। इसके पीछे या तो कोई दबाव था या फिर उनका निजी फायदा शामिल था। इस कड़ी में टाइम्स ग्रुप एक बड़ा उदाहरण है।
टाइम्स ग्रुप को आजादी के बाद रामकृष्ण डालमिया ने ब्रिटिश मालिकों से खरीदा था। लेकिन उन्होंने एक बीमा कंपनी के अध्यक्ष पद का गलत इस्तेमाल किया, जिसकी ओर पंडित नेहरू की सरकार ने ध्यान नहीं दिया। बाद में इंदिरा गाँधी के पति फिरोज गाँधी ने संसद में इस घोटाले को उठाया। इसकी जाँच हुई और डालमिया को दोषी ठहराकर तिहाड़ जेल भेज दिया गया।
इसके बाद नेहरू ने टाइम्स ग्रुप का स्वामित्व डालमिया के दामाद साहू शांति प्रसाद जैन को सौंपी। बाद में शांति प्रसाद जैन को भी सब्सिडी वाले अखबारी कागज को ब्लैक मार्केट में बेचने के आरोप में जेल जाना पड़ा। इसके बाद सरकार ने इस समूह पर खुद नियंत्रण कर लिया।
आपातकाल के दौरान इंदिरा गाँधी ने साहू शांति प्रसाद जैन के बेटे अशोक कुमार जैन को टाइम्स ग्रुप वापस दे दिया। यह फैसला इसलिए लिया गया ताकि सरकार को उनके समर्थन की गारंटी मिल सके। अशोक जैन टाइम्स ग्रुप के वर्मान मालिक विनीत जैन और समीर जैन के पिता थे। उन्होंने बाद में सरकार विरोधी पत्रकारों को नौकरी से निकाल दिया।
अशोक जैन पर मनी लॉन्ड्रिंग जैसे मामलों में संलिप्त होने के आरोप लगे। एक मामले में स्विट्ज़रलैंड के एक बैंक खाते में 1.25 मिलियन डॉलर के अवैध ट्रांसफर की जाँच के चलते उन्हें देश छोड़ना पड़ा।
प्रेस की स्वतंत्रता पर इंदिरा का दबाव
आपातकाल के दौरान मीडिया के दमन कई तरीकों के किए जाने की कोशिश हुई। अखबार और पत्रिकाओं को छपने के लिए बिजली की जरूरत होती थी। दिल्ली के बहादुर शाह जफर मार्ग में मौजूद न्यूजप्रिंट की बिजली आपूर्ति सरकारी नियंत्रण थी। अखबारों को छपने से रोकने के लिए कई बार आपूर्ति को बाधित किया जाता था।
सरकार ने विदेशी मीडिया पर भी सख्ती की। उस समय पर 29 विदेशी पत्रकारों को भारत आने से रोका गया और 7 को देश से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था। भारतीय मीडिया के भी 2 कार्टूनिस्ट, 6 फोटोग्राफरों समेत 54 पत्रकारों की मान्यता रद्द कर दी गई और लगभग 250 पत्रकारों को जेल में डाल दिया गया था।
मीडिया की आर्थिक निर्भरता सरकारी विज्ञापनों पर थी क्योंकि पाठकों से मिलने वाला पैसा अखबार चलाने के लिए काफी नहीं होता था। सरकार ने इसी कमजोरी का फायदा उठाकर मीडिया को नियंत्रित किया। संजय गाँधी के करीबी रहे सूचना और प्रसारण मंत्री विद्या चरण शुक्ला ने मीडिया को कड़े नियमों और सेंसरशिप में बाँध दिया।
1976 में लाया गया ‘आपत्तिजनक मामलों के प्रकाशन की रोकथाम अधिनियम’ प्रेस की स्वतंत्रता पर रोक लगाने वाला कानून बन गया। इसने सरकार को किसी भी लेख या रिपोर्ट को ‘आपत्तिजनक’ बताकर उसे रोकने, प्रेस को बंद करने और सिक्योरिटी डिपॉजिट जब्त करने का अधिकार दे दिया। इसके कारण सरकार की नीतियों की आलोचना और विरोध पूरी तरह दब गए।
दुर्गा दास जैसे वरिष्ठ पत्रकारों ने कहा कि इंदिरा गाँधी कभी भी प्रेस को स्वतंत्र नहीं मानती थी। उनका मानना था कि मीडिया को सरकार का पक्ष रखना चाहिए, न कि जनता की आवाज बनना चाहिए। यह साफ दिखाता है कि इंदिरा गाँधी ने आपातकाल के दौरान ही नहीं, बल्कि शुरुआत से ही प्रेस की आजादी को दबाने की कोशिश की थी।
कॉन्ग्रेस के शासन में मीडिया और प्रेस पर जितना बड़ा हमला आपातकाल के दौरान हुआ, वैसा पहले कभी नहीं हुआ। उस दौर में कॉन्ग्रेस के समर्थक पत्रकार सबसे ज्यादा झुके हुए और सरकार के प्रति वफादार साबित हुए।
मूल रूप से अंग्रेजी में यह रिपोर्ट रुकमा राठौड़ ने लिखी है। विस्तार से पढ़ने के लिए लिंक पर क्लिक करें। हिंदी में इसका अनुवाद विवेकानंद मिश्र ने किया है।
न्यूयॉर्क शहर का मेयर बनने की रेस में शामिल जोहरान ममदानी का नाम इन दिनों खूब चर्चा में है। जोहरान, मशहूर फिल्ममेकर मीरा नायर और लेखक महमूद ममदानी का बेटा है। लेकिन उसकी चर्चा न तो किसी अच्छे काम के लिए है, न ही किसी बड़े विजन के लिए। उसका नाम विवादों में है, ऐसे विवादों में… जो भारत, हिंदुओं और यहूदियों के खिलाफ उसकी बयानबाजी और गतिविधियों से जुड़े हैं।
कभी पीएम मोदी को ‘फास्टिस्ट’ कहने वाला ममदानी भारत और हिंदुओं के खिलाफ लगातार आग उगलता रहा है। वो गुजरात दंगों को लेकर भी प्रोपेगेंडा चलाता रहा है और हिंदू विरोधी बयान भी देता रहा है।
चूँकि वो खुद को सोशलिस्ट कह कर लोगों के वोट पाना चाहता है, ऐसे में धीरे-धीरे ही सकती, उसका असली चेहरा बेनकाब होने लगा है। यही नहीं, इस चुनाव में उसका साथ भी वही जिहादी और इस्लामी कट्टरपंथी दे रहे हैं, जो भारत और हिंदुओं के खिलाफ ही नहीं, बल्कि यहूदियों के खिलाफ भी काम करते रहे हैं।
जोहरान खुद को ‘प्रोग्रेसिव’ और ‘सोशल जस्टिस’ का झंडाबरदार बताता है। लेकिन उसकी फंडिंग और समर्थन कहाँ से आ रहा है, ये देखकर उसकी असलियत सामने आती है।
भारत और हिंदू विरोधी होने के लिए कुख्यात काउंसिल ऑन अमेरिकन-इस्लामिक रिलेशंस (CAIR) नाम का इस्लामी कट्टरपंथी संगठन जोहरान के सबसे बड़े समर्थकों में से एक है। CAIR ने जोहरान की कैंपेन को चलाने वाली सबसे बड़ी कमेटी ‘न्यूयॉर्कर्स फॉर लोअर कॉस्ट्स’ को एक लाख डॉलर (लगभग 83 लाख रुपए) का चंदा दिया है। ये पैसा दो किस्तों में आया – 30 मई 2025 को 25,000 डॉलर और 16 जून 2025 को 75,000 डॉलर।
CAIR पर पहले से ही भारत और हिंदू विरोधी गतिविधियों को बढ़ावा देने के आरोप लगते रहे हैं, और अब उसका ममदानी को समर्थन देना कई सवाल खड़े कर रहा है।
CAIR का इतिहास देखें तो ये संगठन खुद को अमेरिका में मुस्लिमों के हक की लड़ाई लड़ने वाला बताता है। लेकिन हकीकत में ये भारत और हिंदुओं के खिलाफ लगातार जहर उगलता रहा है। 2022 में इसने एक रिपोर्ट निकाली थी, जिसमें अमेरिका में मुस्लिमों के साथ भेदभाव की बात कही गई थी।
लेकिन उसी CAIR ने भारत में हिंदू विरोधी प्रोपगैंडा को बढ़ावा दिया। मिसाल के तौर पर, 2021 में इसने ‘डिसमैंटलिंग ग्लोबल हिंदुत्व’ नाम के एक हिंदू विरोधी कॉन्फ्रेंस को सपोर्ट किया था। इतना ही नहीं, पिछले साल न्यू जर्सी में 26/11 के मुंबई हमले की सच्चाई दिखाने वाली एक मोबाइल बिलबोर्ड ट्रक को भी CAIR ने ‘नफरत फैलाने वाला’ करार दे दिया था।
CAIR का रुख सिर्फ हिंदू विरोधी ही नहीं, यहूदी विरोधी भी है। ये संगठन हमास जैसे आतंकी संगठन के समर्थन में भी खड़ा रहा है। 7 अक्टूबर 2023 को जब हमास ने इजरायल के निर्दोष नागरिकों का नरसंहार किया, CAIR के कुछ लोग उसका जश्न मना रहे थे।
जोहरान भी इस मामले में पीछे नहीं है। उसने ‘ग्लोबलाइज द इंतिफादा’ जैसे नारे का बचाव किया, जो यहूदियों के खिलाफ नफरत और हिंसा भड़काने वाला है। उसने इजरायल के अस्तित्व को मानने से भी इनकार किया है।
Mamdani, on The Bulwark podcast, says ‘Globalize the Intifada’ chant signifies, to him, a call for Palestinian human rights.
Adds: “The word has been used by the Holocaust Museum when translating the Warsaw Ghetto Uprising into Arabic — because it’s a word that means struggle.” pic.twitter.com/k2yeiSJpMy
CAIR के अलावा जोहरान को और भी ऐसे लोगों का समर्थन मिल रहा है, जो या तो भारत विरोधी हैं, हिंदू विरोधी हैं, या फिर यहूदी विरोधी। मिसाल के लिए यहूदी विरोधी बयानों के लिए जानी जाने वाली लिंडा सरसौर, उसने जोहरान की कैंपेन को 2,500 डॉलर दिए। इसके अलावा इजरायल विरोधी संगठन ‘इफनॉट नाउ’ से जुड़े ‘एंड द ऑक्यूपेशन’ ग्रुप ने भी उसे 1,000 डॉलर का चंदा दिया। इजरायल पर ‘नरसंहार’ का इल्जाम लगाने वाले न्यू जर्सी के ‘द ट्रुथ प्रोजेक्ट’ ने भी 9 जून 2025 को उसे 10,000 डॉलर दिए।
जोहरान का भारत और हिंदुओं के प्रति रवैया भी साफ है। उसने कई बार भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘फासिस्ट’ और ‘वॉर क्रिमिनल’ कहा। 2002 के गुजरात दंगों को लेकर उसने झूठ बोला कि मोदी ने मुस्लिमों का कत्लेआम करवाया और गुजरात में अब मुस्लिम बचे ही नहीं। जबकि सुप्रीम कोर्ट ने मोदी को क्लीन चिट दी है, और गुजरात में मुस्लिम आबादी बढ़ी है। जोहरान ने मोदी की तुलना इजरायली पीएम बेंजामिन नेतन्याहू से की और दोनों को एक ही श्रेणी में रखा।
साल 2020 में जब अयोध्या में राम मंदिर बन रहा था, जोहरान ने इसके खिलाफ रैली निकाली। उस रैली में हिंदुओं के खिलाफ अपमानजनक नारे लगाए गए, और इसे खालिस्तानी तत्वों ने आयोजित किया था। 2023 में जब मोदी न्यूयॉर्क आए, तब भी जोहरान ने उनके खिलाफ जहर उगला।
जोहरान ने मोदी से जुड़े हिंदुओं को ‘फासिस्ट’ कहा और न्यूयॉर्क के दो भारतीय-अमेरिकी नेताओं जेनिफर राजकुमार और केविन थॉमस पर हमला बोला, क्योंकि उन्होंने मोदी की आलोचना नहीं की। राजकुमार ने जवाब में जोहरान के बयानों को ‘चरमपंथी और विभाजनकारी’ बताया और वोटरों से नफरत को खारिज करने की अपील की।
जोहरान को सिर्फ CAIR ही नहीं, बल्कि इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल (IAMC) जैसे संगठनों का भी समर्थन मिल रहा है।
IAMC का इतिहास भी भारत और हिंदू विरोधी गतिविधियों से भरा है। इस संगठन के तार लश्कर-ए-तैयबा और जमात-ए-इस्लामी जैसे आतंकी संगठनों से जुड़े हैं। 2021 में IAMC और CAIR ने मिलकर भारत को ‘कंट्री ऑफ पार्टिकुलर कंसर्न’ घोषित करने की कोशिश की थी। IAMC पर भारत में फर्जी खबरें और प्रोपगैंडा फैलाने का भी इल्जाम है और इसे UAPA के तहत कार्रवाई का सामना करना पड़ा है।
यहाँ तक कि हाल ही में भारत-पाकिस्तान संघर्ष के दौरान भी IAMC और CAIR ने पाकिस्तान में पाकिस्तानी फौज समर्थित आतंकवादी प्रतिष्ठानों के खिलाफ भारत के ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की निंदा की थी।
इतना ही नहीं, जोहरान को सुनीता विश्वनाथ जैसी शख्सियतों का भी साथ मिला है, जो ‘हिंदूज फॉर ह्यूमन राइट्स’ (HfHR) की को-फाउंडर हैं। ये संगठन जॉर्ज सोरोस से फंडिंग लेता है और हिंदू विरोधी एजेंडा चलाता है। सुनीता ने हाल ही में जोहरान का समर्थन करते हुए कहा कि वो ‘एक हिंदू’ के तौर पर उसके साथ खड़ी हैं, जबकि उनके काम और बयान हिंदुत्व के खिलाफ हैं। HfHR को IAMC और ‘ऑर्गनाइजेशन फॉर माइनॉरिटीज ऑफ इंडिया’ ने 2019 में बनाया था। इन संगठनों ने मिलकर 2019 में मोदी के ह्यूस्टन दौरे के खिलाफ प्रदर्शन भी किया था।
जोहरान की कैंपेन को भारत के कुछ वामपंथी मीडिया हाउस भी बढ़ावा दे रहे हैं। वो उसे ‘प्रोग्रेसिव मुस्लिम’ के तौर पर पेश करते हैं, लेकिन उसका भारत, हिंदू और यहूदी विरोधी रुख उसकी असलियत बयान करता है।
जोहरान का मकसद साफ है – वो उन ताकतों का साथ लेकर न्यूयॉर्क का मेयर बनना चाहता है, जो भारत और हिंदुओं के खिलाफ हैं। लेकिन सवाल ये है कि क्या न्यूयॉर्क जैसे शहर के लोग ऐसे शख्स को अपना नेता चुनेंगे, जिसका एजेंडा नफरत और विभाजन पर टिका है? बहरहाल, इस सवाल का जवाब तो वक्त बीतने के साथ सामने आ ही जाएगा।
मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में श्रद्धा पाण्डेय ने लिखी है। मूल रिपोर्ट यहाँ क्लिक करके पढ़ सकते हैं। इसका हिंदी भावानुवाद सौम्या सिंह ने किया है।
कॉन्ग्रेस ने ईरान का समर्थन करके अपने ‘मुस्लिम वोट बैंक’ को खुश करने की कोशिश की है। उसने मोदी सरकार पर आरोप लगाया कि वह इजरायल और ईरान के बीच चल रहे संघर्ष में किसी का भी पक्षकार नहीं बन रही, बल्कि वो तठस्थ है। यानी वो ईरान या इजरायल में से किसी एक पक्ष का भी साथ नहीं दे रही। कॉन्ग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने शनिवार (21 जून 2025) को ‘द हिंदू’ अखबार में एक लेख लिखा, जिसमें उन्होंने ईरान को समर्थन दिया और मोदी सरकार की निष्पक्ष नीति की आलोचना की।
यह कदम कॉन्ग्रेस की अध्यक्ष ने अपने घरेलू ‘मुस्लिम वोट बैंक’ को खुश करने के लिए उठाया, जो ‘उम्माह’ (मुस्लिम समुदाय) के हित में ईरान के साथ खड़ा है और इस बात को नजरअंदाज कर रहा है कि ईरान एक शिया-बहुल देश है, जब बात इजरायल के साथ संघर्ष की आती है।
सोनिया गाँधी ने अपने लेख में ईरान को पश्चिमी देशों और इजरायल की आक्रामकता का शिकार बताया। उन्होंने यह भी दावा किया कि अली होसैनी खामेनेई के नेतृत्व वाला इस्लामी गणराज्य भारत का ‘लंबे समय का दोस्त’ रहा है।
"New Delhi's silence on the devastation in Gaza and now on the unprovoked escalation against Iran reflects a disturbing departure from our moral and diplomatic traditions. This represents not just a loss of voice but also a surrender of values.
अपने दावों को सही साबित करने के लिए कॉन्ग्रेस की पूर्व अध्यक्ष ने लिखा, “1994 में ईरान ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग में कश्मीर के मुद्दे पर भारत के खिलाफ एक प्रस्ताव को रोकने में मदद की थी।” लेकिन सोनिया ने यह नहीं बताया कि ईरान ने कश्मीर पर कई बार अपना रुख बदला है और उसके सुप्रीम लीडर ने सोशल मीडिया पर भारत के खिलाफ कई बार गलत बयान दिए हैं।
ईरान ने ‘ऑर्गनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन’ (OIC) के कश्मीर संपर्क समूह में कश्मीरियों के ‘आत्मनिर्णय के अधिकार’ का समर्थन किया है, जिससे पाकिस्तान के रुख को बल मिलता है। अली होसैनी खामेनेई ने भी जम्मू-कश्मीर, जो भारत का अभिन्न हिस्सा है, उस पर अपनी इस्लामी गणराज्य की स्थिति को साफ कर दिया है।
साल 2017 से ईरान के सुप्रीम लीडर ने कई बयानों और सोशल मीडिया पोस्ट में कश्मीर को ‘स्वतंत्र क्षेत्र’ दिखाने की कोशिश की है। उन्होंने बदनाम तरीके से कहा था, “हर किसी को यमन, बहरीन और कश्मीर के लोगों का खुलकर समर्थन करना चाहिए।”
अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 हटाए जाने के तुरंत बाद अली होसैनी खामेनेई ने ट्वीट किया, “हम कश्मीर में मुसलमानों की स्थिति को लेकर चिंतित हैं। हमारे भारत के साथ अच्छे संबंध हैं, लेकिन हम उम्मीद करते हैं कि भारत सरकार कश्मीर के सम्मानित लोगों के प्रति निष्पक्ष नीति अपनाए और इस क्षेत्र में मुसलमानों पर अत्याचार और दमन को रोके।”
अली होसैनी खामेनेई के ट्वीट का स्क्रीनग्रैब
मार्च 2020 में एक और ऐसा ही ट्वीट आया – “दुनियाभर के मुसलमानों के दिल भारत में मुसलमानों के नरसंहार से दुखी हैं। भारत सरकार को कट्टर हिंदुओं और उनकी पार्टियों का सामना करना चाहिए और मुसलमानों का नरसंहार रोकना चाहिए, ताकि भारत इस्लामी दुनिया से अलग-थलग न पड़े।”
पिछले साल खामेनेई ने पोस्ट किया, “इस्लाम के दुश्मन हमेशा हमें हमारी साझा इस्लामी पहचान के प्रति उदासीन बनाने की कोशिश करते हैं। हम खुद को मुसलमान नहीं मान सकते अगर हम म्यांमार, गाजा, भारत या किसी अन्य जगह पर एक मुसलमान के दुख से बेखबर रहें।”
इससे साफ है कि ईरान भारत का ‘लंबे समय का दोस्त’ नहीं है, खासकर जब बात जम्मू-कश्मीर की आती है। दूसरी ओर इजरायल ने हमेशा भारत का खुलकर समर्थन किया है और पाकिस्तान के खिलाफ युद्धों में हमारी मदद की है।
अली होसैनी खामेनेई के ट्वीट का स्क्रीनग्रैब
सोनिया गाँधी का ‘द हिंदू’ में लिखा लेख, जिसमें इजरायल को बदनाम किया गया और ईरान की तारीफ की गई है। इसका कूटनीति से कम और देश के भीतर अपने मुख्य वोट बैंक (इस्लामी) के साथ वैचारिक तालमेल से ज्यादा लेना-देना है, खासकर चुनावों से पहले।
इजरायल-ईरान संघर्ष ने कॉन्ग्रेस को अपने मुस्लिम समर्थकों को यह संदेश देने का मौका दिया कि यह पुरानी पार्टी ‘यहूदी’ इजरायल के खिलाफ उम्माह के साथ खड़ी है। यही कारण है कि कॉन्ग्रेस नेता प्रियंका गाँधी वाड्रा ने इस साल मार्च में इजरायली सरकार पर हमला बोला था।
सोनिया गाँधी ने अपने लेख में मोदी सरकार पर इजरायल-ईरान संघर्ष में किसी का पक्ष न लेने का आरोप लगाया।
सोनिया ने लिखा, “इस मानवीय आपदा के सामने, नरेंद्र मोदी सरकार ने भारत की लंबे समय से चली आ रही और सिद्धांतवादी नीति को लगभग छोड़ दिया है, जिसमें एक स्वतंत्र, संप्रभु फिलिस्तीन की कल्पना की जाती थी, जो इजरायल के साथ आपसी सुरक्षा और सम्मान के साथ शांति में रहे।”
सोनिया ने आगे लिखा, “गाजा में तबाही और अब ईरान के खिलाफ बिना उकसावे की आक्रामकता पर नई दिल्ली की चुप्पी हमारी नैतिक और कूटनीतिक परंपराओं से एक परेशान करने वाला विचलन है। यह न केवल आवाज की हानि है, बल्कि मूल्यों का समर्पण भी है। अभी भी देर नहीं हुई है। भारत को स्पष्ट बोलना चाहिए, जिम्मेदारी से काम करना चाहिए और पश्चिमी एशिया में तनाव कम करने और बातचीत की ओर लौटने के लिए हर कूटनीतिक रास्ते का इस्तेमाल करना चाहिए।”
मोदी सरकार का वैश्विक संघर्षों पर रुख
कॉन्ग्रेस पार्टी के उलट, जो अपने घरेलू वोट बैंक को खुश करने के लिए कूटनीतिक संबंधों को खतरे में डालने को तैयार है, मोदी सरकार ने वैश्विक संघर्षों में सावधानी, संयम और रणनीतिक संतुलन दिखाया है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बार-बार कहा है कि भारत शांति के पक्ष में है। यूक्रेन-रूस युद्ध के दौरान भारत ने किसी भी देश का पक्ष नहीं लिया, भले ही पश्चिमी देश यूक्रेन को हथियार देकर युद्ध को बढ़ावा दे रहे थे।
शांति और तनाव कम करने की बार-बार अपील के कारण रूस ने वैश्विक ऊर्जा संकट के बीच भारत को सस्ते दामों पर कच्चा तेल दिया। भारत ने रूस और यूक्रेन दोनों में फँसे भारतीय नागरिकों के लिए सुरक्षित रास्ते बनाए और ‘ऑपरेशन गंगा‘ के तहत उन्हें हवाई जहाज से घर वापस लाया।
इजरायल-हमास युद्ध के दौरान भी भारत ने यही रास्ता अपनाया। भारत ने आतंकी संगठन हमास और इजरायली नागरिकों पर उसके क्रूर हमले की कड़ी निंदा की, लेकिन फिलिस्तीनी लोगों के लिए मानवीय सहायता भी भेजी।
भारत ने इस संघर्ष पर किसी भी प्रस्ताव पर वोट नहीं दिया और भारतीय संसद में पूछे गए सवाल के जवाब में अपनी स्थिति साफ की।
फरवरी 2024 में मोदी सरकार ने कहा, “भारत की फिलिस्तीन नीति लंबे समय से चली आ रही और सुसंगत है। हमने एक बातचीत के जरिए दो-राष्ट्र समाधान का समर्थन किया है, जिसमें एक स्वतंत्र, संप्रभु और व्यवहार्य फिलिस्तीन की स्थापना हो, जो सुरक्षित और मान्यता प्राप्त सीमाओं के भीतर इजरायल के साथ शांति में रहे।”
सरकार ने आगे कहा, “भारत ने 7 अक्टूबर 2023 को इजरायल पर हुए आतंकी हमलों और इजरायल-हमास संघर्ष में नागरिकों की मौत की कड़ी निंदा की है। हमने संयम और तनाव कम करने की अपील की है और बातचीत और कूटनीति के जरिए शांतिपूर्ण समाधान पर जोर दिया है। हमने बचे हुए बंधकों की रिहाई की भी माँग की है। प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री ने कई नेताओं से बात की है, जिनमें इजरायल के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री, और फिलिस्तीन के राष्ट्रपति और विदेश मंत्री शामिल हैं। विदेश मंत्री ने 20 जनवरी 2024 को कंपाला में फिलिस्तीनी विदेश मंत्री से मुलाकात की और दो-राष्ट्र समाधान के लिए भारत के समर्थन को दोहराया।”
ईरान-इजरायल संघर्ष के बीच भी भारत ने शानदार संतुलन दिखाया और ‘ऑपरेशन सिंधु’ के तहत दोनों देशों में फँसे भारतीय नागरिकों को सुरक्षित निकाला।
भारत ने इजरायल के साथ मजबूत रक्षा, खुफिया और व्यापार संबंध बनाए रखा है, जिसमें हर साल 2 बिलियन डॉलर से ज्यादा के सैन्य उपकरण (मिसाइल, ड्रोन, निगरानी उपकरण) आयात होते हैं। साथ ही भारत ईरान के साथ भी महत्वपूर्ण रणनीतिक और आर्थिक परियोजनाओं पर काम कर रहा है, जैसे कि इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) और चाबहार बंदरगाह। इसके साथ ही दोनों देशों के बीच व्यापार बढ़ा रहा है।
मिडिल-ईस्ट का संघर्ष कई पहलुओं वाला, जटिल और पेचीदा है। बाहरी दबाव के बावजूद, मोदी सरकार की निष्पक्ष और कूटनीतिक नीति की वजह से भारत को सभी पक्षों से फायदा मिल रहा है।
उदाहरण के लिए मिडिल ईस्ट के 8 इस्लामी देशों – सऊदी अरब, अफगानिस्तान, फिलिस्तीन, मालदीव, संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, मिस्र और कुवैत ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपने उच्च नागरिक सम्मानों से सम्मानित किया है। इनमें शामिल हैं-
किंग अब्दुलअजीज़ का ऑर्डर (2016) – सऊदी अरब का दूसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान
अमानुल्लाह खान का ऑर्डर (2016) – अफगानिस्तान का सर्वोच्च नागरिक सम्मान
फिलिस्तीन राज्य का ऑर्डर (2018) – फिलिस्तीन का सर्वोच्च नागरिक सम्मान
इज्जुद्दीन का ऑर्डर (2019) – मालदीव का विदेशी गणमान्य व्यक्तियों को दिया जाने वाला सर्वोच्च सम्मान
ज़ायद का ऑर्डर (2019) – संयुक्त अरब अमीरात (UAE) का सर्वोच्च नागरिक सम्मान
रेनेसाँ का ऑर्डर (2019) – बहरीन का तीसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान
नाइल का ऑर्डर (2023) – मिस्र का सर्वोच्च नागरिक सम्मान
मुबारक द ग्रेट का ऑर्डर (2024) – कुवैत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान
ये सम्मान मोदी सरकार की कूटनीतिक संतुलन, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मजबूत व्यक्तित्व और विश्व व्यवस्था में भारत के बढ़ते प्रभाव का सबूत हैं।
अगर भारत ने वैश्विक संघर्षों में सक्रिय रूप से पक्ष लिया होता और पक्षपात किया होता, तो हमें व्यापार संबंधों में नुकसान, मित्र देशों से दूरी और उन युद्धों में अनजाने में उलझने की कीमत चुकानी पड़ती, जो हमने शुरू नहीं किए।
कॉन्ग्रेस भले ही मोदी सरकार पर इजरायल-ईरान संघर्ष या इजरायल-हमास युद्ध में पक्ष न लेने का आरोप लगाए, लेकिन पीछे देखें तो यह भारत के लिए सबसे सही फैसला था, है और रहेगा।