Home Blog Page 318

‘बिग ब्यूटीफुल बिल’ पर ट्रंप ने किया हस्ताक्षर, स्वतंत्रता दिवस पर व्हाइट हाउस में हुई पिकनिक: विधेयक में ऐसा क्या है कि अमेरिका में हो गए दो फाड़?

अमेरिका के 249वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर शुक्रवार (4 जुलाई 2025) को व्हाइट हाउस में पिकनिक मनाया गया। इसी दौरान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने टैक्स और सरकारी खर्च संबंधी अपने पसंदीदा विधेयक ‘बिग ब्यूटीफुल बिल’ पर हस्ताक्षर भी किए।

इस बिल को एक दिन पहले अमेरिकी संसद हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स ने 218-214 वोटों से पारित किया था।

अमेरिका के 249वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर व्हाइट हाउस में पिकनिक मनाया गया। इस दौरान बिल पर साइन करते हुए ट्रंप ने कहा कि ये बिल अमेरिका के लोगों, परिवार और व्यापार के लिए नई शुरुआत है। हम गैर जरूरी खर्चों को कम कर टैक्स घटा रहे हैं ताकि हमारी अर्थव्यवस्था अधिक मजबूत हो सके।

ट्रंप ने इस अवसर पर कहा कि मैंने अमेरिका के लोगों को इतना खुश पहले कभी नहीं देखा। इस बिल के कारण अलग अलग वर्गों के लोग भी सुरक्षित महसूस कर रहे हैं।

इस बिल का पास होना ट्रंप के दूसरे कार्यकाल की सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है। हालाँकि इसे लेकर अमेरिका में दो अलग अलग मतों पर बहस छिड़ी हुई है। बिल के अमेरिकी संसद में पारित होने से पहले विपक्ष की डेमोक्रैट पार्टी ने बिल के विरोध में लगभग 8 घंटे तक लंबा भाषण दिया था। विपक्ष का कहना है कि ये बिल आने वाले वर्षों में लोगों को स्वास्थ्य बीमा और शिक्षा की सुविधा से वंचित कर सकता है।

 869 पन्नों के बिल में कई तरह की कटौती, सेना के लिए बजट, डिफेंस और एनर्जी उत्पादन के बढ़े हुए खर्च, स्वास्थ्य और पोषण कार्यक्रमों में कटौती समेत कई बातें शामिल हैं। इसके अलावा अवैध प्रवासियों के लिए डिपोर्टेशन के लिए बजट बढ़ाने मुद्दे भी रखे गए हैं।

कुछ विश्लेषकों का ये भी मानना है कि इस बिल के कारण देश के 36.2 ट्रिलियन डॉलर (2715 लाख करोड़ रुपए) के कर्ज में 3 ट्रिलियन डॉलर (2 खरब 50 लाख करोड़ रुपए) का अधिक इजाफा कर सकता है। यहाँ तक कि डोनाल्ड ट्रंप के चहेते रहे एलन मस्क ने भी इस बिल का विरोध किया था। टेस्ला के CEO मस्क का कहना है कि इस बिल से सस्ते और स्वच्छ ऊर्जा के उद्योग में अमेरिका को नुकसान हो सकता है।

अक्षय ऊर्जा की माँग लगातार बढ़ रही है। इस बिल के कारण अमेरिका में अगले 10 वर्षों में ऊर्जा की कीमतें 50% तक बढ़ जाएँगी। ऐसे में इस उद्योग से जुड़ी नौकरियों के अमेरिका में खत्म होने की आशंका जता ई जा रही है।

बिल में क्या-क्या शामिल

इस बिल में अमेरिका- मेक्सिको के बॉर्डर वॉल के लिए 46 अरब डॉलर (लगभग 3,85,730 करोड़ रुपए) का बजट रखा गया है। इसके अलावा 10,000 नए ICE अधिकारियों की भर्ती की जाएगी। 1 लाख प्रवासी डिटेंशन बेड्स के लिए 45 अरब डॉलर (3 लाख 73 हजार 777 करोड़ रुपए) का बजट रखा गया है।

इस बिल के तहत पेंटागन बजट में इजाफा किया गया है। अमेरिकी गोल्डन डोम कहे जाने वाले मिसाइल शील्ड के लिए 25 अरब डॉलर (लगभग 207,000 करोड़ रुपए) और मंगल ग्रह पर जाने वाले मिशन के लिए 10 अरब डॉलर (लगभग 83,000 करोड़ रुपये) का बजट तय किया गया है।

मुहर्रम और काँवड़ यात्रा के आते ही शुरू हुआ ‘शांति समितियों’ के साथ बैठकों का दौर, हिंसा के बाद पीड़ित ‘बहुसंख्यक’ ही ठहराए जाएँगे दोषी: क्या हिंदुओं को तुष्टिकरण का आसान शिकार बनाने के लिए होती हैं बैठकें?

हर साल की तरह इस बार भी मुहर्रम और काँवड़ यात्रा का समय एक साथ आ रहा है। हिंदू भगवान शिव को जल चढ़ाने के लिए काँवड़ यात्रा निकालते हैं, तो मुस्लिम समुदाय मुहर्रम में इमाम हुसैन की शहादत को याद करता है। ये दोनों धार्मिक-मजहबी आयोजन अपने आप में बहुत खास हैं, लेकिन जब ये एक साथ होते हैं, तो कई बार तनाव और हिंसा की खबरें सामने आती हैं।

इसे रोकने के लिए पुलिस और प्रशासन पहले से ही शांति समितियों (पीस कमेटी) की बैठकें आयोजित कर रहा है, खासकर उन इलाकों में जहाँ हिंदू और मुस्लिम आबादी मिली-जुली है। लेकिन इन सबके बीच एक सवाल बार-बार उठता है – हिंसा हो या न हो, दोष ज्यादातर हिंदुओं पर ही क्यों डाला जाता है? आखिर यह खेल क्या है?

शांति समितियों की कहाँ-कहाँ हो रही हैं बैठकें?

इसका जवाब है – देश के कई हिस्सों में… जहाँ हिंदू और मुस्लिम आबादी साथ-साथ रहती है, शांति समितियाँ बनाई गई हैं। इनका मकसद है कि मुहर्रम और काँवड़ यात्रा के दौरान शांति बनी रहे। कुछ जगहों पर ये बैठकें हो चुकी हैं-

  • दिल्ली: सीलमपुर, जहाँगीरपुरी और मंडावली जैसे इलाकों में पुलिस ने शांति समितियों के साथ बैठकें कीं। इनमें काँवड़ यात्रा के रास्तों, लाउडस्पीकर की आवाज और सुरक्षा पर बात हुई।
  • उत्तर प्रदेश: गाजियाबाद, मुजफ्फरनगर, मेरठ, मुरादाबाद, सीतापुर और रायबरेली में जिला प्रशासन ने दोनों समुदायों के धार्मिक नेताओं को बुलाकर बैठकें कीं।
  • पश्चिम बंगाल: मुर्शिदाबाद जैसे मुस्लिम बहुल इलाकों में भी शांति समितियाँ सक्रिय हैं, खासकर हाल की वक्फ (संशोधन) अधिनियम 2025 के विरोध के बाद।
  • बिहार और झारखंड: कुछ संवेदनशील इलाकों में भी ऐसी बैठकें हुईं, जहाँ दोनों समुदायों के लोग शामिल हुए।

इन बैठकों में पुलिस, प्रशासन और दोनों समुदायों के प्रतिनिधि शामिल होते हैं। मकसद होता है कि रास्तों का बँटवारा हो, समय का ध्यान रखा जाए और कोई विवाद न हो। लेकिन सवाल यह है कि क्या ये समितियाँ वाकई निष्पक्ष हैं या इनका इस्तेमाल सिर्फ हिंदुओं को कटघरे में खड़ा करने के लिए होता है?

हिंदुओं को दोषी ठहराने की आदत

बीते सालों में कई ऐसी घटनाएँ हुईं, जहाँ हिंसा के बाद हिंदुओं को ही दोषी ठहराया गया, भले ही शुरुआत दूसरी ओर से हुई हो। कुछ उदाहरण देखिए—

  • जहाँगीरपुरी-2022 (दिल्ली): हनुमान जयंती की शोभा यात्रा पर पथराव हुआ। कई लोग घायल हुए, जिनमें पुलिसकर्मी भी शामिल थे। जाँच में पता चला कि पथराव मुस्लिम समुदाय के कुछ लोगों ने किया। लेकिन शांति समिति की बैठकों और कुछ मीडिया में यह नैरेटिव बनाया गया कि हिंदुओं ने ‘उकसावे’ वाली हरकत की।
  • खरगोन-2022 (मध्य प्रदेश): रामनवमी के जुलूस पर पथराव हुआ। दुकानें और घर जले। जाँच में मुस्लिम समुदाय के कुछ लोगों को दोषी पाया गया। लेकिन प्रशासन और कुछ मीडिया ने हिंदुओं पर इल्जाम लगाया कि उन्होंने भड़काऊ नारे लगाए।
  • मुजफ्फरनगर-2016 (उत्तर प्रदेश): काँवड़ यात्रा के दौरान एक छोटा-सा विवाद हिंसा में बदल गया। बाद में पुलिस और स्थानीय नेताओं ने काँवड़ियों पर ही इल्जाम लगाया कि उन्होंने हंगामा किया।

इन घटनाओं में एक पैटर्न दिखता है – हिंसा की शुरुआत चाहे कोई भी करे, दोष ज्यादातर हिंदुओं पर ही डाला जाता है। शांति समितियों की बैठकों में भी हिंदुओं को ही सलाह दी जाती है कि वे ‘सावधानी’ बरतें, लाउडस्पीकर न बजाएँ या जुलूस में भीड़ न करें, ताकि मुस्लिम समुदाय ‘उत्तेजित’ न हो। लेकिन क्या मुस्लिम समुदाय को ऐसी सलाह दी जाती है? यह सवाल हर बार उठता है।

शांति समितियों की जरूरत क्यों?

पुलिस का कहना है कि शांति समितियाँ बनाना जरूरी है, क्योंकि अतीत में मुहर्रम और काँवड़ यात्रा के दौरान हिंसा की कई घटनाएँ हुई हैं।

कुछ बड़े उदाहरण इस तरह से हैं-

  • अहमदाबाद दंगा-1969: मुहर्रम और अन्य आयोजनों के समय हुए दंगों में करीब 1000 लोग मारे गए।
  • मुरादाबाद दंगा-1980: ईद और अन्य आयोजनों के दौरान हिंसा में सैकड़ों लोग मारे गए।
  • मुजफ्फरनगर दंगा-2013: एक छोटी-सी घटना ने सांप्रदायिक हिंसा का रूप ले लिया, जिसमें कई लोग मारे गए और हजारों बेघर हुए।

पुलिस का मानना है कि शांति समितियाँ दोनों समुदायों के बीच संवाद का रास्ता खोलती हैं। इन बैठकों में रास्तों, समय और सुरक्षा जैसे मुद्दों पर बात होती है। लेकिन कई बार ऐसा लगता है कि ये समितियाँ सिर्फ औपचारिकता हैं और इनका असल मकसद हिंदुओं को ‘नियंत्रण’ में रखना है।

कॉन्ग्रेस और शांति समितियों का इतिहास

शांति समितियों की शुरुआत का इतिहास कॉन्ग्रेस सरकारों से जुड़ा है। 1947 के भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद देश में सांप्रदायिक हिंसा की कई घटनाएं हुईं। नोआखली (बंगाल) और बिहार के दंगों में हजारों लोग मारे गए। उस समय कॉन्ग्रेस ने शांति समितियों (या अमन कमेटियों) का गठन शुरू किया। इनका मकसद था –

  • हिंदू-मुस्लिम समुदायों के बीच विश्वास बहाल करना।
  • धार्मिक आयोजनों के दौरान तनाव रोकना।
  • हिंसा की आशंका को कम करना।

लेकिन लोगों का कहना है कि कॉन्ग्रेस ने इन समितियों का इस्तेमाल अपने वोट बैंक को मजबूत करने के लिए किया। खासकर मुस्लिम बहुल इलाकों में, इन समितियों के जरिए कॉन्ग्रेस ने मुस्लिम समुदाय को यह दिखाने की कोशिश की कि वह उनकी सुरक्षा की गारंटी है। इस प्रक्रिया में हिंदुओं को बार-बार “संयम” बरतने का संदेश दिया गया।

सिर्फ मुस्लिम बहुल इलाकों में क्यों?

शांति समितियाँ ज्यादातर उन इलाकों में बनाई जाती हैं जहाँ मुस्लिम आबादी ज्यादा है। जैसे दिल्ली का सीलमपुर, जहाँगीरपुरी या पश्चिम बंगाल का मुर्शिदाबाद। इसका कारण यह बताया जाता है कि इन इलाकों में सांप्रदायिक तनाव की आशंका ज्यादा रहती है। लेकिन यह बात कई सवाल उठाती है-

  • एकतरफा नीति: हिंदू बहुल इलाकों में ऐसी समितियाँ क्यों नहीं बनतीं? या उनकी जरूरत ही क्यों नहीं पड़ती?
  • हिंदुओं पर दबाव: काँवड़ यात्रा जैसे हिंदू आयोजनों में हिंदुओं को सलाह दी जाती है कि वे लाउडस्पीकर न बजाएँ, जुलूस छोटा रखें, ताकि मुस्लिम समुदाय ‘नाराज’ न हो। लेकिन मुहर्रम के जुलूसों में ऐसी सख्ती क्यों नहीं दिखती?
  • दोष का खेल: हिंसा होने पर हिंदुओं को ही दोषी ठहराया जाता है, यह कहकर कि उन्होंने ‘उकसाया’। और मामलों की जाँच में ये बात हमेशा सामने आती है कि शुरुआत मुस्लिम समुदाय ही करता है।

यह नीति न सिर्फ एकतरफा लगती है, बल्कि यह भी सवाल उठाती है कि क्या प्रशासन मुस्लिम समुदाय को ‘तुष्टिकरण’ करने की कोशिश कर रहा है?

हिंदुओं को क्यों बार-बार सलाह?

हिंदू त्योहारों जैसे काँवड़ यात्रा, रामनवमी या हनुमान जयंती के दौरान हिंदुओं को ही सलाह दी जाती है कि वो…

  • ‘लाउडस्पीकर धीमा रखें।’
  • ‘जुलूस में ज्यादा भीड़ न करें।’
  • ‘मुस्लिम बहुल इलाकों से बचें।’

ऐसा इसलिए, ताकि मुस्लिम समुदाय ‘उत्तेजित’ न हो। लेकिन मुहर्रम जैसे मुस्लिम आयोजनों में ऐसी सख्ती कम दिखती है। और जब दोनों त्योहार एक साथ होते हैं, तो दोनों से शांति की अपील की जाती है, लेकिन हिंसा होने पर दोष फिर भी हिंदुओं पर ही डाला जाता है। यह स्थिति एक खतरनाक नैरेटिव को जन्म देती है – कि मुस्लिम समुदाय की हिंसा को ‘जायज’ माना जाए और हिंदुओं को हर बार ‘संयम’ बरतना चाहिए।

इस साल भी वही कहानी

इस साल भी मुहर्रम और काँवड़ यात्रा के लिए शांति समितियों की बैठकें हो रही हैं। दिल्ली, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में पुलिस और प्रशासन सक्रिय है। लेकिन हर बार की तरह, हिंदुओं को ही ज्यादा सावधानी बरतने की सलाह दी जा रही है। अगर इस बार हिंसा होती है, तो क्या फिर से हिंदुओं को ही दोषी ठहराया जाएगा?

यह ‘नाटक’ क्यों? ऐसे में लोग शांति समितियों को एक ‘नाटक’ ही मानते हैं। क्योंकि…

  • हिंदुओं को कटघरे में खड़ा करना: हिंसा की शुरुआत चाहे कोई भी करे, दोष हिंदुओं पर ही डाला जाता है।
  • राजनीतिक फायदा: कुछ राजनीतिक दल इन समितियों का इस्तेमाल अपने वोट बैंक को मजबूत करने के लिए करते हैं।
  • एकतरफा अपील: हिंदुओं को बार-बार संयम बरतने की सलाह दी जाती है, लेकिन मुस्लिम समुदाय को ऐसी सख्ती कम दिखाई देती है।

यह सब मिलकर एक ऐसा माहौल बनाता है, जहाँ हिंदू अपने ही देश में अपने त्योहार मनाने से डरने लगते हैं।

शांति समितियाँ बनाना गलत नहीं है। अगर ये वाकई शांति ला सकती हैं, तो यह अच्छा कदम है। लेकिन इनकी कार्यप्रणाली और नीयत पर सवाल उठते हैं। बार-बार हिंदुओं को दोषी ठहराने की आदत न सिर्फ एकतरफा है, बल्कि यह सांप्रदायिक तनाव को और बढ़ाती है।

अगर शांति समितियाँ निष्पक्ष हों, तो दोनों समुदायों की जिम्मेदारी बराबर होनी चाहिए। हिंसा को किसी भी रूप में सही नहीं ठहराया जा सकता। हालाँकि अब इस बार मुहर्रम और काँवड़ यात्रा के दौरान शांति बनी रहे, ऐसा हर कोई चाहता है, लेकिन इसके लिए प्रशासन और शांति समितियों को निष्पक्ष रहना होगा।

भारत सरकार ने वक्फ कानून से जुड़े दिशानिर्देश किए जारी, अब खास पोर्टल और डाटाबेस में दर्ज होंगी सभी प्रॉपर्टीज: जानें- इसके मायने क्या और ये कैसे करेगा काम

केंद्र सरकार ने गुरुवार (3 जुलाई 2025) को वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 के तहत नए वक्फ नियम 2025 लागू किए। इसे एकीकृत वक्फ प्रबंधन, सशक्तिकरण, दक्षता और विकास नियम – 2025 (Unified Waqf Management, Empowerment, Efficiency and Development Rules, 2025) कहा जा रहा है। ये नियम हाल ही में लागू वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 के तहत बनाए गए हैं, जो 8 अप्रैल 2025 से लागू हुआ था।

इस कदम का उद्देश्य वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन को पारदर्शी, उत्तरदायी और आधुनिक तकनीक से युक्त बनाना है। यह पहली बार है जब देशभर की वक्फ संपत्तियों को एक केंद्रीकृत डिजिटल पोर्टल पर लाने का प्रयास किया जा रहा है।

इस नए नियम के अंतर्गत एक ऑनलाइन प्लेटफॉर्म केंद्रीय वक्फ प्रबंधन प्रणाली (Central Waqf Management System – CWMS)  बनाया गया है। इसमें वक्फ संपत्तियों और उनके अतिक्रमण, विकास योजनाओं और वित्तीय जानकारी को डिजिटल रूप से दर्ज किया जाएगा। यह पोर्टल अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय में वक्फ विभाग के संयुक्त सचिव के अधीन कार्य करेगा।

हर वक्फ संपत्ति को एक विशेष पहचान संख्या (ID) दी जाएगी जिससे उनकी निगरानी और भविष्य में निर्देश लेना आसान होगा। अब राज्य वक्फ बोर्डों की फाइलों में सीमित जानकारी की जगह सारी जानकारी सार्वजनिक पोर्टल पर मौजूद रहेगी।

नियमों के अनुसार, हर राज्य सरकार को एक नोडल अधिकारी नियुक्त करना होगा जिसकी रैंक कम से कम संयुक्त सचिव के बराबर हो। साथ ही, एक केंद्रीय सहायता इकाई बनाई जाएगी जो वक्फ की जानकारी, पंजीकरण, अकाउंट मैन्ट्नन्स, ऑडिट और अन्य कार्यों को सुचारू रूप से कराने में मदद करेगी।

सभी मुतवल्लियों (वक्फ संपत्तियों के प्रबंधकों) को पोर्टल पर रजिस्ट्रेशन कराना अनिवार्य होगा। उन्हें मोबाइल और ईमेल के जरिए ओटीपी द्वारा प्रमाणित किया जाएगा। इसके बाद वों सभी अपनी वक्फ संपत्तियों की जानकारी पोर्टल पर दर्ज करा सकेंगे और नियमित वित्तीय व प्रशासनिक रिपोर्ट वक्फ बोर्ड को देनी होगी।

नए नियमों में वक्फ संपत्तियों का समय पर पंजीकरण, जियो टैगिंग और डिजिटल मैपिंग को अनिवार्य कर दिया गया है। इससे अपंजीकृत और सीमा-विवादित संपत्तियों की पहचान की जा सकेगी। हर वक्फ बोर्ड को समय-समय पर ऑडिट रिपोर्ट जमा करना होगा और देरी की स्थिति में कार्रवाई की जा सकती है।

एक तय किए गए प्रारूप में अकाउंट मैन्ट्नन्स की व्यवस्था की गई है जिससे पारदर्शिता और एकरूपता सुनिश्चित हो सके। अतिक्रमित वक्फ संपत्तियों की सूची अब सार्वजनिक पोर्टल पर उपलब्ध कराई जाएगी जिसमें उनकी कानूनी स्थिति और पुनः प्राप्ति की जानकारी भी होगी।

इससे वक्फ बोर्डों पर दबाव रहेगा कि वे समय पर कार्रवाई करें और अतिक्रमण पर सख्ती दिखाएँ। यह व्यवस्था आम जनता को सूचनाएँ उपलब्ध कराने का काम भी करेगी। इसके अलावा, विधवाओं, तलाकशुदा महिलाओं और अनाथों को वक्फ से सहायता प्राप्त करने की प्रक्रिया को स्पष्ट किया गया है। अकाउंटिंग, ऑडिट, रजिस्टर संधारण आदि के तरीके भी नियमों में शामिल किए गए हैं।

सरकार का कहना है कि यह पहल वक्फ संपत्तियों की गड़बड़ियों, अतिक्रमण और भ्रष्टाचार को रोकने के लिए जरूरी थी, जिसे कई बार संसद और ऑडिट रिपोर्टों में उजागर किया गया था।

हालाँकि वक्फ संशोधन अधिनियम 2025 को लेकर कई याचिकाएँ सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं, जिनमें वरिष्ठ कॉन्ग्रेस नेताओं समेत कई याचिकाकर्ताओं ने इसकी वैधता पर सवाल उठाए हैं। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में फैसला सुरक्षित रखा है।

यह विषय आगामी मानसून सत्र में संसद में भी चर्चा का केंद्र रह सकता है। सरकार का कहना है कि ये नियम मजहबी और सामाजिक संपत्तियों को समाज के ज़रूरतमंद तबकों के हित में उपयोग में लाने की दिशा में एक अहम और निर्णायक पहल हैं।

छत्तीसगढ़ और राजस्थान की 9-9 पार्टियों पर संकट, आयोग ने थमाया नोटिस: जानें क्या है मामला- क्यों छिन जाती है किसी राजनीतिक पार्टी की मान्यता?

पिछले छह साल यानी 2019 से चुनाव नहीं लड़ने वाले राजनीतिक दलों को चुनाव आयोग ने नोटिस जारी किया है। आयोग ने ऐसे सभी पार्टियों को सूची से हटाने के संबंधित राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को निर्देश दिए हैं। फिलहाल इन पार्टियों को कारण बताओ नोटिस जारी कर अपना पक्ष रखने के लिए कहा गया है। सुनवाई की प्रक्रिया पूरी होने के बाद चुनाव आयोग अपना फैसला लेगा कि इन पार्टियों को सूची से बाहर करना है या नहीं।

छत्तीसगढ में ऐसी 9 पार्टियाँ हैं जिन्हें नोटिस थमाया गया है।

  1. छत्तीसगढ़ एकता पार्टी
  2. छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा
  3. छत्तीसगढ़ समाजवादी पार्टी
  4. छत्तीसगढ़ संयुक्त जातीय पार्टी
  5. छत्तीसगढ़ विकास पार्टी
  6. पृथक बस्तर राज्य पार्टी
  7. राष्ट्रीय आदिवासी बहुजन पार्टी
  8. राष्ट्रीय मानव एकता कांग्रेस पार्टी
  9. राष्ट्रीय समाजवादी स्वाभिमान मंच

राजस्थान की बात करें तो यहाँ भी ऐसी 9 पार्टियाँ हैं। इनमें पूर्व बीजेपी नेता और राज्यसभा सांसद घनश्याम तिवाड़ी की पार्टी का नाम भी शामिल है।

राजस्थान की 9 पार्टियाँ

  1. राजस्थान जनता पार्टी
  2. राष्ट्रीय जनसागर पार्टी
  3. खुशहाल किसान पार्टी
  4. भारत वाहिनी पार्टी
  5. भारतीय जन हितकारी पार्टी
  6. नेशनल जनसत्ता पार्टी
  7. नेशनल पीपुल्स फ्रंट
  8. स्वच्छ भारत पार्टी
  9. महाराणा क्रांति पार्टी

दरअसल ये पार्टियाँ चुनाव के समय राजनीतिक फायदे के लिए पेपर पर बनाई जाती हैं। पार्टी बनने पर सरकार से वित्तीय मदद और दूसरी सुविधाओं का लाभ उठा लिया जाता है और धरातल पर इसका वजूद नहीं होता।

भारत में रिप्रेजेंटेशन ऑफ द पीपल एक्ट 1951 की धारा 29A के तहत राजनीतिक पार्टियों का रजिस्ट्रेशन चुनाव आयोग करता है। इसमें टैक्स में छूट का भी फायदा मिलता है। चुनाव चिन्ह मिलने और राजनीतिक फायदा उठाने के लिए पार्टियाँ माध्यम बन जाती हैं।

15 दिनों की मोहलत

मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने इन पार्टियों को 15 दिन में आयोग के ऑफिस आकर जवाब देने के लिए कहा है। पार्टियों के अध्यक्ष, महासचिव या पार्टी प्रमुख जो भी चाहे आयोग आकर जवाब दे सकते हैं। इसमें ये बताना होगा कि 2019 के बाद 6 साल तक इनलोगों ने किसी भी चुनाव में हिस्सा क्यों नहीं लिया? और अब तक धरातल पर क्या-क्या किया है या इनकी गतिविधि चल रही है या नहीं।

नोटिस में ये भी कहा गया है कि यदि वक्त रहते इन पार्टियों के नुमाइंदे आयोग के सामने प्रस्तुत होकर जवाब नहीं दिया तो आयोग इन पार्टियों को निष्क्रिय मानते हुए पार्टियों की सूची से हटा सकता है।

क्यों छीनी जाती है पार्टियों की मान्यता ?

  1. पार्टियाँ अगर चुनाव आयोग द्वारा तय वोट प्रतिशत से कम वोट पाती हैं तो मान्यता छिन जाती है।
  2. चुनाव आयोग के नियम और संविधान का उल्लंघन करने पर पार्टियों की मान्यता जा सकती है।
  3. चुनाव आयोग समय-समय पर समीक्षा करता है कि पार्टियाँ धरातल पर एक्टिव हैं या नहीं।
  4. अगर कोई राजनीतिक दल टूट जाता है और उसका वजूद नहीं बचता तो पार्टी की मान्यता खत्म हो जाती है।
  5. अगर पार्टी का रजिस्ट्रेशन गलत तरीके से किया गया हो, तो मान्यता रद्द हो सकती है

चीन ने पाकिस्तान को लाइव लैब बनाकर की अपने हथियारों की टेस्टिंग, डिप्टी आर्मी चीफ बोले-ऑपरेशन सिंदूर में तीन दुश्मनों से एक साथ लड़ा भारत: हमें मजबूत एयर डिफेंस सिस्टम की जरूरत

भारतीय सेना के डिप्टी चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ लेफ्टिनेंट जनरल राहुल आर. सिंह ने ऑपरेशन सिंदूर को लेकर बड़ा खुलासा किया है। दिल्ली में FICCI के ‘न्यू एज मिलिट्री टेक्नोलॉजीज’ कार्यक्रम में उन्होंने बताया कि मई 2025 में हुए इस ऑपरेशन के दौरान पाकिस्तान को चीन से भारतीय सेना की गतिविधियों की लाइव जानकारी मिल रही थी।

जनरल सिंह ने कहा, “भारत और पाकिस्तान के बीच DGMO स्तर की बातचीत चल रही थी, तब पाकिस्तान को चीन हमारे सैन्य ठिकानों की लाइव अपडेट्स दे रहा था। जनरल सिंह ने कहा कि भारत को एक साथ तीन दुश्मनों पाकिस्तान, चीन और तुर्की का सामना करना पड़ा।” उन्होंने कहा, “एक बात जो चीन ने शायद देखी है वो ये कि वो अपने हथियारों को अलग-अलग सिस्टम्स के खिलाफ आजमा सकता है। जैसे एक तरह की ‘लाइव लैब’ उसे मिल गई हो।”

जनरल राहुल सिंह ने बताया कि पिछले पाँच सालों में पाकिस्तान के 81% हथियार चीन से आए हैं। चीन ने पाकिस्तान को एक लाइव लैब की तरह इस्तेमाल किया, जहाँ वह अपने हथियारों को दूसरे हथियारों के खिलाफ टेस्ट कर रहा था। तुर्की ने भी पाकिस्तान को खुफिया जानकारी और राजनीतिक समर्थन देकर उसका साथ दिया। उन्होंने कहा कि जंग एक बॉर्डर पर हो रही थी लेकिन विरोधी तीन थे। वैसे, आपको बता दें कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान सभी चीनी हथियार फुस्स साबित हुए।

देश को मजबूत एयर डिफेंस सिस्टम की जरूरत

जनरल सिंह ने कहा कि हमारे कुछ स्वदेशी हथियारों ने शानदार काम किया, लेकिन कुछ ने निराश किया। उन्होंने चेतावनी दी कि भविष्य में ऐसे खतरों से निपटने के लिए मजबूत एयर डिफेंस सिस्टम की जरूरत है।

डिप्टी चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ लेफ्टिनेंट जनरल राहुल आर. सिंह ने कहा, “हमारे पास इजरायल जैसा आयरन डोम नहीं है। हमारा देश बहुत बड़ा है और ऐसी तकनीक में भारी खर्चा आता है।” फिर भी भारतीय सेना ने पाकिस्तान के हमलों को नाकाम कर दिया। ऑपरेशन के चार दिन बाद 10 मई को भारत और पाकिस्तान के बीच सीजफायर हुआ। जनरल सिंह ने इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर पर भी जोर दिया और कहा कि हमें अपने सिस्टम को और मजबूत करना होगा। इस ऑपरेशन से भारत को कई सबक मिले हैं।

बता दें कि ये सब 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद शुरू हुआ, जिसमें 26 लोग मारे गए, जिनमें पर्यटक और स्थानीय लोग शामिल थे। इसके जवाब में भारत ने 7 मई को ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया। इस ऑपरेशन में भारतीय सेना ने पाकिस्तान और पाकिस्तान-ऑक्यूपाइड कश्मीर (PoK) में नौ आतंकी ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन से सटीक हमले किए। जवाब में पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर और पंजाब में ड्रोन हमले किए खासकर पुंछ और राजौरी में, जहाँ कई नागरिकों की जान गई।

त्रिनिदाद और टोबैगो को बनाने वाले कौन हैं गिरमिटिया मजदूर? पीएम मोदी ने जिनकी मेहनत को किया याद: प्रधानमंत्री कमला सुशीला प्रसाद का जानिए बिहार से कनेक्शन

भारतीयों की पहचान उनकी मेहनत, सफलता और हर मुसीबत से लड़ने की कर्मठता के लिए जानी जाती है। ये अपनी संस्कृति के साथ हर नई जगह में घुलमिल जाते हैं। यही वजह है कि भारतीय सदियों से दुनिया भर में प्रवास करते रहे हैं। भारतीयों की कार्यकुशलता, शिक्षा और उद्यमशीलता का लोहा आज दुनिया मान रही है।

एक समय ऐसा भी था जब उन्हें जबरन दूसरे देशों में मजदूरी के लिए ले जाया जाता था। धीरे-धीरे गुलाम जैसी जिंदगी से आगे बढ़े और जहाँ बसे वहाँ की पहचान बन गए। पराधीनता, दर्द और पीड़ा से मुक्त होकर अपना नाम कमाया।

पीएम मोदी ने भारतीय समुदाय की प्रशंसा की

वेनेजुएला के पास एक छोटे सा द्वीप है जिसे त्रिनिदाद और टोबैगो के नाम से जाना जाता है। इसका इतिहास भारत से जुड़ा हुआ है क्योंकि भारतीय यहाँ भी ले जाकर बसाए गए थे।

5 देशों के दौरे पर गए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब त्रिनिदाद और टोबैगो पहुँचे तो उसका जमकर स्वागत किया गया। कोवा में नेशनल साइक्लिंग वेलोड्रोम में एक कार्यक्रम में पीएम मोदी ने कहा, “मैं जानता हूँ कि त्रिनिदाद और टोबैगो में भारतीय समुदाय की मौजूदगी उनके साहस और कार्यकुशलता के बारे में बताता है,”

फोटो साभार-Focus2Move

भगवान राम के जयकारे सुनकर पीएम मंत्रमुग्ध हो गए। उन्होंने कहा, “मैं भी इसी तरह की भक्ति भावना के साथ कुछ लेकर आया हूँ। अयोध्या में स्थित राम मंदिर की प्रतिकृति और सरयू नदी का कुछ जल”

पीएम ने कहा, “हम अपने प्रवासी समुदाय की ताकत और समर्थन को बहुत महत्व देते हैं। दुनिया भर में फैले 35 मिलियन से अधिक लोगों के साथ, भारतीय प्रवासी हमारा गौरव हैं। जैसा कि मैंने अक्सर कहा है, आप में से प्रत्येक एक राष्ट्रदूत है, भारत के मूल्यों, संस्कृति और विरासत का एक राजदूत है।” उन्होंने वैश्विक स्तर पर भारतीय समुदाय के योगदान की चर्चा की

19वीं शताब्दी से है रिश्ता हमारा

19वीं शताब्दी में भारत के लोगों को मजदूरी करने के लिए अंग्रेजों ने अपने उपनिवेशों में भेजा। कम मजदूरी और दयनीय हालत के बावजूद भारतीय मजदूर बड़ी संख्या में अनुबंध समाप्त होने के बाद वहीं रह गए।

इसकी शुरुआत 1834 में मॉरीशस से हुई। 87 साल की औपनिवेशिक अनुबंध के तहत 1.5 मिलियन से ज्यादा भारतीय दूसरे देशों में बंधुआ मजदूरों के रूप में लाए गए। अनुबंध समाप्त होने के बाद इनमें से कई अप्रवासियों ने विदेशी धरती पर ही रहने का फैसला किया। इन लोगों ने समृद्ध बस्तियाँ बनाईं और अपनी परंपराओं को आगे बढ़ाया।

पीएम मोदी ने इसको याद करते हुए कहा, “आपके पूर्वजों ने जिन परिस्थितियों का सामना किया, वो मजबूत इरादे वाले लोगों को भी तोड़ सकती थी। लेकिन उन्होंने उम्मीद नहीं छोड़ी और समस्याओं का डटकर सामना किया। पूर्वजों ने गंगा और यमुना को पीछे छोड़ दिया, लेकिन अपने दिलों में रामायण को बसाए रखा। उन्होंने अपनी मिट्टी छोड़ी, लेकिन अपनी आत्मा नहीं।”

प्रधानमंत्री मोदी ने प्रवासियों को “एक शाश्वत सभ्यता के संदेशवाहक” के रूप में भी याद किया। प्रवासियों के योगदान से देश को सांस्कृतिक, आर्थिक और आध्यात्मिक फायदा हुआ। इस खूबसूरत देश पर आप का प्रभाव दिख रहा है।”

उल्लेखनीय है कि त्रिनिदाद और टोबैको की पहली महिला और वर्तमान प्रधानमंत्री कमला सुशीला प्रसाद-बिसेसर एक हिंदू हैं। उनकी विरासत दक्षिण भारत और उत्तर भारत दोनों से मिलती है। उनके पूर्वज भारतीय अनुबंध प्रणाली के तहत त्रिनिदाद और टोबैको आए और यहीं बस गए।

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, “भारत में लोग प्रधानमंत्री कमला को बिहार की बेटी मानते हैं। उनकी तरह यहाँ भी ऐसे कई लोग हैं जिनकी जड़ें बिहार में हैं। बिहार की विरासत हम सभी के लिए गर्व की बात है।” दुनिया के महान प्रवासी भारतीयों की शानदार उपलब्धियों की चर्चा करते हुए उन्होंने कई प्रतिष्ठित हस्तियों का नाम भी लिया।

पीएम ने कहा, “आप, गिरमिटिया (ब्रिटिश भारत से आए गिरमिटिया मजदूर) के बच्चे हैं लेकिन अब उन संघर्ष से आगे अपनी सफलताओं के लिए जाने जाते हैं।” कैरेबियाई राष्ट्र के क्रिकेट के प्रति दीवानगी की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा, “25 साल पहले जब मैं यहाँ आया था, तो हम सभी ब्रायन लारा के कवर ड्राइव और पुल शॉट से मंत्रमुग्ध हो गए थे। फिलहाल सुनील नरेन और निकोलस पूरन हमारे युवाओं के दिलों में बसते हैं। पिछले कुछ सालों में हमारी दोस्ती और गहरी हुई है।”

दोनों देशों के बीच गहरे और ऐतिहासिक संबंधों की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा, “बनारस, पटना, कोलकाता, दिल्ली भारत के शहर हो सकते हैं, लेकिन वे यहाँ की सड़कों के नाम भी हैं। नवरात्रि, महाशिवरात्रि, जन्माष्टमी यहाँ दोगुने उत्साह और गर्व के साथ मनाई जाती है।”

उन्होंने भगवान राम का भी जिक्र किया और भारतीय समुदाय की भगवान राम में गहरी आस्था के बारे में बताया। उन्होंने कहा, “मुझे यकीन है कि आप सभी ने 500 साल बाद अयोध्या में राम लला की वापसी का बहुत उत्साह के साथ स्वागत किया होगा। हमें याद है कि आपने अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए पवित्र जल और शिलाएं भेजी थीं।”

यूनेस्को (संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन) ने 1998 में दास व्यापार और उन्मूलन को याद करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय दिवस की स्थापना की ।

कौन हैं गिरमिटिया?

1833 में ब्रिटिश साम्राज्य, 1848 में फ्रांसीसी उपनिवेशों और 1863 में डच साम्राज्य में दास प्रथा का अंत हो गया। ब्रिटेन में भारतीयों की गिरमिटिया दासता 1920 के दशक तक जारी रही। इससे इंडो-साउथ अफ़्रीकी, इंडो-कैरिबियन, इंडो-मॉरीशस और इंडो-फिजियन समुदायों का विकास हुआ।

दरअसल दास प्रथा खत्म होने के बाद काम करवाने के लिए अंग्रेजी साम्राज्य को मजदूरों की जरूरत पड़ी। तब भारत से 5 साल के अनुबंध पर इन मजदूरों को 1834 के दशक में अमेरिका, अफ्रीका और यूरोप भेजा गया। 5 साल बीत जाने के बाद आने के पैसे नहीं थे इसलिए ज्यादातर लोग यहाँ बस गए और इन्हें गिरमिटिया कहा गया।

भारत से बाहर भेजे गए मजदूरों के लिए गिरमिटिया शब्द का इस्तेमाल सबसे पहले अंग्रेजों ने ही किया। जब मजदूरों को अनुबंध के तहत भेजा जाता था तो उसे गिरमिटिया कहा जाता था। गिरमिटिया की पूरी कहानी ब्रिटिश उपनिवेशवाद से जुड़ी हुई है। दरअसल ब्रिटिश साम्राज्य को स्थापित करने और उसे मजबूत बनाने के लिए सस्ते और मेहनतकश लोगों की जरूरत थी। उस वक्त ब्रिटिश शासन ने भारतीय किसानों पर भारी टैक्स लगा दिया था और कर्ज के चंगुल में किसान लगातार फँसते जा रहे थे। ऐसे में गिरमिटिया बनकर बड़ी संख्या में लोगों ने पलायन किया।

त्रिनिदाद और टोबैगो में भारतीय प्रवासियों का संक्षिप्त इतिहास

1498 में क्रिस्टोफर कोलंबस के त्रिनिदाद और टोबैगो के समुद्र तट पर कदम रखा। इससे पहले इस द्वीप को कोई नहीं जानता था। बाद में जब इस द्वीप का दुनिया से सामना हुआ तो यहाँ के लोगों को दास के रूप में काम करने के लिए मजबूर किया गया।
स्पेनिश साम्राज्य में 1796 तक त्रिनिदाद शामिल था।

1802 में इस क्षेत्र को ब्रिटिश क्राउन को सौंप दिया गया और ये द्वीप ब्रिटिश उपनिवेश का हिस्सा बन गया। अंग्रेजी निवेशक त्रिनिदाद के चीनी क्षेत्र को बढ़ावा देना चाहते थे। अंग्रेजी कंपनियों को इससे जबरदस्त फायदा हो रहा था। द्वीप के चीनी और कोको बागानों में काम करने के लिए अफ्रीकी देशों से मजदूरों को दास के रूप में लाया गया था।

1838 में ब्रिटिश संसद के दास प्रथा को गैरकानूनी घोषित कर दिया। इसका असर त्रिनिदाद पर पड़ा। यहाँ की कृषि अर्थव्यवस्था तब ढहने के कगार पर पहुँच गई थी। यहाँ अफ्रीकी लोगों ने खेतों, बागानों में काम करने से इनकार कर दिया।

चीनी और चॉकलेट उद्योगों ने खुद को पूरी तरह से ढहने से बचाने के लिए नए मजदूरों को लाना शुरू किया। इस वक्त चीनी, पुर्तगाली, अफ्रीकी-अमेरिकी और सबसे ज्यादा भारतीय मजदूरों को यहाँ लाया गया। भारतीय सबसे मेहनती और तैयार मजदूर माने जाते थे और कथित तौर पर इन्हें ‘मूल्यवान स्थिर मजदूर’ कहा जाता था।

इसलिए भारतीय मजदूरों की माँग यहाँ ज्यादा थी और किसी भी अन्य राष्ट्र से अधिक संख्या में इन्हें काम पर रखा गया था। 1891 तक इन द्वीपों में 45,800 से अधिक भारतीय रह रहे थे। 1917 में ब्रिटिश सरकार ने गिरमिटिया व्यवस्था को खत्म कर दिया।

सच में, दास व्यापार का उन्मूलन केवल एक दिखावा था, क्योंकि उपनिवेशों में गिरमिटिया व्यवस्था उससे कम अमानवीय नहीं था। भारतीयों को केवल ब्रिटिश हितों के लिए हिंद महासागर और अटलांटिक महासागर को पार करके हजारों किलोमीटर की दूरी तय करने के लिए मजबूर किया गया।

भारतीय मजदूरों की जिंदगी

217 भारतीय मजदूरों को लेकर पहला जहाज 1845 में त्रिनिदाद के पोर्ट-ऑफ-स्पेन पहुँचा। त्रिनिदाद में अधिकांश भारतीय कलकत्ता (कोलकाता) और मद्रास (चेन्नई) के बंदरगाहों से आए थे। इनमें ज्यादातर बिहार, उत्तर प्रदेश और बंगाल के लोग शामिल थे। इसके बाद 1845 और 1917 के बीच जहाजों में भरकर हजारों भारतीयों को कैरीबियाई देशों में ले जाया गया।

यात्रा के दौरान मुश्किलों के बाद जब ये लोग वहाँ पहुँचे तो परिस्थितियाँ काफी मुश्किलभरी थी। भारतीयों को दुर्व्यवहार, घटिया भोजन और मौसम की मार का सामना करना पड़ा।

प्रसिद्ध बारबेडियन उपन्यासकार जॉर्ज लैमिंग ने कहा, “त्रिनिदाद और गुयाना का ऐसा कोई इतिहास नहीं हो सकता जो भारतीय मजदूरों की मेहनत से परे हो।”

बाद में परिस्थितियाँ बदली। यहां एक कानून बनाया गया जिसके तहत मज़दूरों को जमीन दी गई। कई भारतीय मजदूरों ने इसे मान लिया और वहीं के होकर रह गए। 1960 के दशक तक बड़ी संख्या में त्रिनिदाद में बसे भारतीय ईसाई मिशनरियों के चंगुल में फँस गए और वहाँ बड़े पैमाने पर धर्मांतरण हुआ। इनमें से ज्यादातर निरक्षर और गरीब थे।

20वीं सदी की शुरुआत में भारतीय यहाँ के व्यापार और राजनीति में सक्रिय हुए। उन्होंने एकजुट होकर राजनीतिक संगठन बनाए। धीरे-धीरे यहाँ की राजनीति पर इनकी पकड़ मजबूत होती चली गई।

निष्कर्ष

30 मई को मनाया जाने वाला भारतीय प्रवासी दिवस उन पहले भारतीय गिरमिटिया मजदूरों को याद करता है, जो मई 1845 में फेटेल रजाक जहाज पर सवार होकर त्रिनिदाद पहुंचे थे,। हालाँकि वे अपनी मर्जी से नहीं गए थे, बल्कि बिना किसी विकल्प के इस यात्रा पर निकलने के लिए मजबूर थे। धीरे- धीरे इन लोगों ने विदेशी भूमि को अपने घर के रूप में अपनाया और इसे भारत के रंगों और परंपराओं से समृद्ध किया।

जैसा कि पीएम मोदी ने कहा कि गिरमिटिया के बच्चों ने वास्तव में इतिहास रच दिया है। उन्होंने दिखाया कि उनकी ताकत, मेहनत और जीवन जीने का दृढ़ संकल्प ब्रिटिश उत्पीड़न और अत्याचारों के कहीं ऊपर था। स्थिति अब बदल गई है। कई देशों की तरह त्रिनिदाद और टोबैगो में ये लोग प्रमुख पदों पर पहुँच गए हैं और देश की उपलब्धियों में अपना अहम योगदान दे रहे हैं।

PAK-चीन में 3000KM भीतर घुसकर जो मचा दे तबाही, जमीन के भीतर हो विस्फोट… ऐसा हाइपरसोनिक बंकर बस्टर बना रहा DRDO: जानें- भारत के पास ऐसा क्या, जो इजरायल के पास भी नहीं

भारत ने अपनी ताकत को और मजबूत कर लिया है! DRDO की अग्नि-5 बंकर बस्टर मिसाइल अब तैयार हो रही है, जो दुश्मन के जमीन के नीचे बने बंकरों को पल में उड़ा देगी। ये मिसाइल 7,500 किलो का भारी वारहेड ले जा सकती है और 100 मीटर गहराई तक घुसकर तबाही मचा सकती है। इसकी रेंज 3,000 किमी तक रहेगी, यानी पाकिस्तान और चीन के अहम ठिकाने इसके निशाने पर होंगे।

खास बात ये है कि ये हाइपरसोनिक है, यानी इतनी तेज कि कोई रडार इसे पकड़ नहीं सकता। अमेरिका के GBU-57 बम से भी ज्यादा ताकतवर, ये मिसाइल सस्ती और स्वदेशी है। पाकिस्तान के कहुटा और नूर खान जैसे ठिकानों को नष्ट करने में ये गेम-चेंजर होगी। DRDO की इस तकनीक ने भारत को दुनिया के टॉप डिफेंस पावर में ला खड़ा किया है।

खास बात ये है कि भारत की अग्नि-V मिसाइल ऐसी मिसाइल है, जिससे रेंज में दुनिया की कुछेक मिसाइलें भले ही आगे हों, लेकिन बंकर बस्टर के तौर पर, जैसा इसे बनाया जा रहा है, वैसी ताकत दुनिया के किसी भी देश के पास नहीं है। आइए, विस्तार से जानते हैं अग्नि-V के बारे में सबकुछ…

अग्नि-V बंकर बस्टर मिसाइल क्या है?

भारत का रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) एक ऐसी मिसाइल बना रहा है, जो दुनिया के सबसे ताकतवर गैर-परमाणु हथियारों में से एक होगी। इसका नाम है अग्नि-V बंकर बस्टर मिसाइल। ये मिसाइल जमीन के नीचे बने मजबूत बंकरों, सैन्य ठिकानों और हथियारों के गोदामों को तबाह करने के लिए बनाई जा रही है। इसे खास तौर पर पाकिस्तान और चीन जैसे पड़ोसी देशों की चुनौतियों को ध्यान में रखकर डिज़ाइन किया गया है।

Infographics: AI
फोटो साभार: AI ChatGPT

अग्नि-5 (AGNI-V) पहले से ही भारत की एक शक्तिशाली मिसाइल है, जो 5,000-7,000 किलोमीटर तक मार कर सकती है और परमाणु हथियार ले जा सकती है। लेकिन अब DRDO इस मिसाइल का एक नया वर्जन बना रहा है, जो पारंपरिक हथियार (यानी गैर-परमाणु) के साथ काम करेगा। इस नए वर्जन को खास तौर पर बंकर बस्टर के लिए डिज़ाइन किया जा रहा है। बंकर बस्टर का मतलब है ऐसा हथियार जो जमीन के नीचे गहरे बने बंकरों, सुरंगों और जमीन के नीचे या ऊपर कंक्रीट की मोटी परतों से बनाई गई इमारतों को ध्वस्त कर सके।

अग्नि-V मिसाइल की खास बातें

  • वजन और ताकत: ये मिसाइल 7,500-8,000 किलोग्राम (7.5-8 टन) का भारी वारहेड ले जा सकती है। इसका मतलब है कि इसमें इतना विस्फोटक होगा कि ये बहुत बड़े और मजबूत ढाँचों को भी उड़ा देगा। इसका खुद का वजन 50 हजार किलोग्राम तक है।
  • पेनेट्रेशन: ये मिसाइल जमीन में 80-100 मीटर गहराई तक घुसकर विस्फोट कर सकती है। यानी पहाड़ों या कंक्रीट के नीचे बने बंकर भी इससे नहीं बच सकते।
  • रेंज: भारी वारहेड की वजह से इसकी रेंज 2,500-3,000 किलोमीटर तक होगी, जो पाकिस्तान और चीन के ज्यादातर हिस्सों को कवर कर सकती है।
  • गति: ये मिसाइल मैक 8 से मैक 20 (9,800-24,500 किमी/घंटा) की रफ्तार से चलती है। इतनी तेज गति की वजह से इसे रोकना लगभग नामुमकिन है।
  • दो तरह के वारहेड
  1. एयरबर्स्ट वारहेड: ये हवा में फटेगा और हवाई अड्डों, रडार स्टेशनों, या सतह पर मौजूद ठिकानों को तबाह करेगा।
  2. डीप-पेनेट्रेशन वारहेड: ये जमीन में गहराई तक जाएगा और बंकरों, मिसाइल साइलो, या कमांड सेंटर को नष्ट करेगा।
  • सटीकता शानदार: इसमें भारत का नाविक (NavIC) नेविगेशन सिस्टम, रिंग लेजर जायरोस्कोप और माइक्रो इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम है, जो इसे सटीक निशाना बनाने में मदद करते हैं।
  • ये मिसाइल कैनिस्टर-लॉन्च तकनीक का इस्तेमाल करती है, यानी इसे ट्रक या रेल से कहीं भी ले जाकर तेजी से लॉन्च किया जा सकता है। ये इसे और भी खतरनाक और लचीला बनाता है।
फोटो साभार: AI ChatGPT

अमेरिका के GBU-57 और भारत के अग्नि-V में कितना अंतर?

अमेरिका का GBU-57 मैसिव ऑर्डनेंस पेनेट्रेटर (MOP): ये दुनिया का सबसे मशहूर बंकर बस्टर बम है। इसका वजन 13,600 किलोग्राम (30,000 पाउंड) है, जिसमें 2,400-2,700 किलोग्राम विस्फोटक होता है। ये 60 मीटर गहरे कंक्रीट या 130 फीट चट्टान में घुस सकता है। लेकिन इसे इस्तेमाल करने के लिए B-2 स्पिरिट स्टील्थ बॉम्बर चाहिए, जो बहुत महँगा है। अमेरिका ने 21 B-2 बनाए, लेकिन अब सिर्फ 19 सक्रिय हैं। हालाँकि अग्नि-V इन महँगे झंझटों से मुक्त है और पूरी तरह से सटीक हमले करने में सक्षम है।

आइए जानते हैं अग्नि-V और GBU-57 में अंतर

डिलीवरी का तरीका: GBU-57 को B-2 जैसे स्टील्थ बॉम्बर से गिराया जाता है, जो महंगे हैं और उनकी देखभाल में भारी खर्चा आता है। जबकि अग्नि-V एक मिसाइल है, जो कैनिस्टर से लॉन्च होती है। इसे बॉम्बर की जरूरत नहीं, जिससे ये सस्ता और तेज़ है।

पेलोड: GBU-57 का विस्फोटक 2,400-2,700 किग्रा है, जबकि अग्नि-V 7,500-8,000 किग्रा का वारहेड ले जा सकती है। यानी अग्नि-V ज्यादा तबाही मचा सकती है।

पेनेट्रेशन: GBU-57 60 मीटर तक घुस सकता है, लेकिन अग्नि-V 80-100 मीटर तक जा सकती है।

रेंज: GBU-57 की रेंज B-2 बॉम्बर पर निर्भर करती है, जो 11,000 किमी तक जा सकता है। वहीं, अग्नि-V की रेंज 2,500-3,000 किमी है, जो भारत के लिए काफी है।

गति: GBU-57 की गति मैक 1 (जब 50,000 फीट से गिराया जाता है) है। जबकि अग्नि-V मैक 8-20 की हाइपरसोनिक गति से चलती है, जिसे दुश्मन की मिसाइल डिफेंस सिस्टम रोक नहीं सकते।

मोबिलिटी : अग्नि-V को तेजी से तैनात किया जा सकता है। इसे दुनिया के सबसे बेहतरीन एयर डिफेंस सिस्टम भी ट्रैक नहीं कर सकते।

कुल मिलाकर अग्नि-V ज्यादा सस्ता, तेज़ और पाकिस्तान-चीन जैसे क्षेत्रीय खतरों के लिए बेहतर विकल्प है।

फोटो साभार: AI ChatGPT

दुनिया में किन देशों के पास ये ताकत

कई देशों ने बंकर बस्टर हथियार बनाए हैं, लेकिन उनकी ताकत अलग-अलग है-

  • अमेरिका: GBU-57 MOP (60 मीटर पेनेट्रेशन), GBU-28, और BLU-109 बम। इन्हें B-2 या B-52 बॉम्बर ले जाते हैं।
  • चीन: DF-15C बैलिस्टिक मिसाइल, जिसका पेलोड 500-750 किग्रा और पेनेट्रेशन 20-25 मीटर है। ये अग्नि-V से कम ताकतवर है।
  • रूस: KAB और BetAB बम, जो 1.5-5 मीटर तक घुस सकते हैं।
  • दक्षिण कोरिया: Hyunmoo-4 और Hyunmoo-5 मिसाइलें, 600 किमी रेंज और 24 मीटर पेनेट्रेशन।
  • भारत: अग्नि-V अपने भारी पेलोड और गहरी पेनेट्रेशन की वजह से GBU-57 के बाद दूसरा सबसे ताकतवर बंकर बस्टर हो सकता है।
फोटो साभार: AI ChatGPT

खास बात ये है कि इजरायल के पास इस रेंज की मिसाइल तो है, लेकिन उसके पास ऐसी मार करने वाली क्षमता नहीं है। इजरायल की जेरिको-3 मिसाइल की रेंज 11 हजार किमी के आसपास है, लेकिन वो सिर्फ 800-900 किलोग्राम का ही वॉरहेड ढो सकता है।

पाकिस्तान के कौन से ठिकाने भारत के निशाने पर?

पाकिस्तान ने अपनी सीमाओं पर कई मजबूत भूमिगत सैन्य ठिकाने बनाए हैं, जो भारत के लिए खतरा हैं। अग्नि-V बंकर बस्टर इन ठिकानों को नष्ट करने के लिए बनाई जा रही है। कुछ अहम ठिकानों के बारे में भी जान लीजिए।

कहुटा न्यूक्लियर फैसिलिटी

  • ये पाकिस्तान का सबसे महत्वपूर्ण परमाणु हथियार अनुसंधान और उत्पादन केंद्र है।
  • इसे पहाड़ों के नीचे बनाया गया है, ताकि हवाई हमलों से बचा जा सके।
  • क्यों निशाना बनाना जरूरी?: अगर युद्ध हुआ, तो ये सुविधा पाकिस्तान के परमाणु हमलों का आधार हो सकती है। इसे नष्ट करना भारत की रक्षा के लिए जरूरी है।

किराना हिल्स

  • ये पाकिस्तान की सीक्रेट न्यूक्लियर वेपन साइट है। यहाँ पाकिस्तान न सिर्फ न्यूक्लियर वेपन्स रखता है, बल्कि टेस्टिंग भी करता है।
  • यहाँ भूमिगत सुरंगें और बंकर हैं, जहाँ हथियार छिपाए जाते हैं।
  • इन हथियारों को नष्ट करके भारत पाकिस्तान की हमलावर क्षमता को कम कर सकता है।

नूर खान एयरबेस

  • इस एयरबेस के नीचे भूमिगत हथियार गोदाम और कमांड सेंटर हैं।
  • ये पाकिस्तान की वायुसेना का अहम ठिकाना है।
  • इसे तबाह करने से पाकिस्तान की हवाई ताकत और कमांड-कंट्रोल सिस्टम कमजोर होगा।

मसरूर एयरबेस

  • कराची के पास ये एयरबेस मिसाइल और परमाणु हथियारों का भंडारण करता है।
  • इसकी तबाही से पाकिस्तान की मिसाइल ताकत को बड़ा झटका लगेगा।
  • पाकिस्तान के पलटवार की संभावनाएँ लगभग नष्ट हो जाएँगी।

पाकिस्तान ने भारत के साथ कई युद्ध लड़े हैं और उसकी परमाणु ताकत भारत के लिए लगातार खतरा है। अगर युद्ध हुआ, तो ये ठिकाने भारत पर हमले का आधार बन सकते हैं। अग्नि-V की गहरी पेनेट्रेशन और हाइपरसोनिक गति इन ठिकानों को तेजी से और पूरी तरह नष्ट कर सकती है, जिससे भारत की सुरक्षा बढ़ेगी।

भारत को इस बंकर बस्टर की जरूरत क्यों?

  • पाकिस्तान और चीन का खतरा: दोनों देशों ने जमीन के नीचे बंकर, मिसाइल साइलो, और कमांड सेंटर बनाए हैं। ये भारत के लिए खतरा हैं। अग्नि-V इन ठिकानों को नष्ट करके भारत को रणनीतिक बढ़त देगी।
  • पहाड़ी युद्ध में फायदा: हिमालय जैसे इलाकों में दुश्मन सुरंगों और बंकरों का इस्तेमाल करता है। अग्नि-V इनका जवाब है।
  • सस्ता और तेज़ विकल्प: अमेरिका की तरह महँगे स्टील्थ बॉम्बर की जरूरत नहीं। मिसाइल सस्ती और तेजी से तैनात हो सकती है।
  • ईरान पर अमेरिकी हमले से मिली प्रेरणा: 22 जून 2025 को अमेरिका ने ईरान के फोर्डो परमाणु सुविधा पर GBU-57 का इस्तेमाल किया। इससे साबित हुआ कि बंकर बस्टर हथियार कितने जरूरी हैं।
  • आत्मनिर्भर भारत: ये मिसाइल पूरी तरह स्वदेशी है, जो भारत की रक्षा तकनीक में आत्मनिर्भरता दिखाती है।

अग्नि-V बंकर बस्टर मिसाइल भारत की रक्षा में एक गेम-चेंजर है। ये अमेरिका के GBU-57 से ज्यादा ताकतवर, सस्ती और तेज़ है। इसकी हाइपरसोनिक गति और 80-100 मीटर की पेनेट्रेशन क्षमता इसे दुनिया के सबसे खतरनाक हथियारों में से एक बनाती है। खास तौर पर पाकिस्तान के कहुटा, किराना हिल्स और नूर खान जैसे ठिकानों को नष्ट करने की इसकी क्षमता भारत को रणनीतिक बढ़त देती है। साथ ही ये मिसाइल भारत की आत्मनिर्भरता और वैश्विक रक्षा ताकत का प्रतीक है।

जो एनसीआरबी 2024 की रिपोर्ट आई तक नहीं, उसका हवाला देकर मीडिया ने किया UP को बदनाम: रिपोर्ट में उत्तर प्रदेश को बताया अपराध का अड्डा, फैक्ट चेक में पोल खुली

5 मई को टाइम्स नाउ ने ‘सबसे ज़्यादा अपराध दर वाले शीर्ष 10 भारतीय राज्यों का खुलासा!’ शीर्षक से एक लेख प्रकाशित किया। इसमें दावा किया गया है कि ‘2024 एनसीआरबी की विस्तृत अपराध रिपोर्ट’ में उत्तर प्रदेश में अपराध दर ‘7.4 प्रति व्यक्ति’ है (जिसका मतलब है कि प्रति 1,00,00 जनसंख्या पर 7,40,000 अपराध)। जबकि 2024 के आँकड़े अब तक एनसीआरबी ने जारी ही नहीं किए हैं। नवीनतम आँकड़ा 2022 का है।

टाइम्स ऑफ इंडिया ने भी 6 मई को यही प्रकाशित किया। जागरण ने भी 22 मई को इसे प्रकाशित किया। इन सभी रिपोर्टों में एक जैसे दावे किए गए।

दावा क्या है?

रिपोर्ट में कहा गया है कि उत्तर प्रदेश में प्रति व्यक्ति क्राइम रेट 7.4 है। इसका मतलब है कि प्रति 100,000 पर 7,40,000 अपराध होता है। मीडिया रिपोर्ट में दावा किया गया कि यह आँकड़ा 2024 एनसीआरबी रिपोर्ट के हवाले से है। नौ अन्य राज्यों के लिए भी इसी तरह के हाई क्राइम रेट का दावा किया गया है। इसका मतलब है कि देश में अपराध बढ़ा है।

देश में सर्वाधिक क्राइम वाले 10 राज्य

  1. उत्तर प्रदेश – प्रति व्यक्ति 7.4 क्राइम रेट
  2. अरुणाचल प्रदेश – प्रति व्यक्ति 5.8 क्राइम रेट
  3. झारखंड – प्रति व्यक्ति 5.3 क्राइम रेट
  4. मेघालय – प्रति व्यक्ति 5.1 क्राइम रेट
  5. दिल्ली (एनसीटी) – प्रति व्यक्ति 5.0 क्राइम रेट
  6. असम – प्रति व्यक्ति 4.4 क्राइम रेट
  7. छत्तीसगढ़ – प्रति व्यक्ति 4.0 क्राइम रेट
  8. हरियाणा – प्रति व्यक्ति 3.8 क्राइम रेट
  9. ओडिशा – प्रति व्यक्ति 3.8 क्राइम रेट
  10. आंध्र प्रदेश – प्रति व्यक्ति 3.6 क्राइम रेट

रिपोर्ट का आँकलन किया जाए तो पता चलता है कि इन सभी राज्यों में जनसंख्या से ज्यादा अपराध हुए हैं, यानी करीब- करीब हर व्यक्ति क्राइम का शिकार हुआ है। क्योंकि इनमें प्रति व्यक्ति अपराध दर 1 से अधिक है। यही दावा सिविल सेवा से लेकर बैंकिंग परीक्षा की तैयारी कराने वाले PW IAS, Adda 24 7 और Study IQ जैसी संस्थानों ने अपने वेबसाइट पर किया।

रिपोर्ट में ये भी बताया गया है कि आखिर इन राज्यों में क्राइम रेट हाई क्यों हैं? उत्तर प्रदेश में अपराध ज्यादा होने की वजह चोरी , हिंसा, सांप्रदायिक अशांति को बताया गया। वहीं अरुणाचल प्रदेश और मेघालय जैसे राज्यों में कम क्राइम रेट की वजह पहाड़ों पर दूरदराज क्षेत्रों में स्थानीय जनजातीय समुदाय का रहना बताया गया है। इसकी वजह से पुलिस तक शिकायतें कम आती हैं।

झारखंड और छत्तीसगढ़ में, नक्सली हिंसा और अवैध खनन की वजह से क्राइम होता है। दिल्ली में महिलाओं के खिलाफ अपराध और सड़क पर होने वाली हिंसा काफी है, जिससे क्राइम रेट ज्यादा है। असम में जातीय संघर्ष और सीमा विवाद हिंसक घटनाओं के लिए जिम्मेदार है। हरियाणा और ओडिशा में महिलाओं के साथ अपराध और ग्रामीण असमानता बढ़ रही है, इसलिए सामाजिक तनाव तेजी से बढ़ रहा है। आंध्र प्रदेश में साइबर क्राइम और वित्तीय गड़बड़ियों का मामला सबसे ज्यादा है।

वास्तविकता

राज्यों को लेकर किए गए दावे पूरी तरह से निराधार हैं और NCRB की आधिकारिक रिपोर्ट इसका समर्थन नहीं करता। पहली बात की राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की ‘भारत में अपराध’ रिपोर्ट वर्ष 2022 में होने वाले क्राइम को लेकर दी गई है, न कि 2024 के लिए। इसे 3 दिसंबर 2023 को जारी किया गया था। 2023 या 2024 के लिए कोई भी NCRB रिपोर्ट अभी तक NCRB वेबसाइट पर प्रकाशित नहीं हुई है। हमने NCRB के अधिकारियों से भी इसे लेकर बातचीत की है। उन्होंने साफ कहा है कि 2022 की रिपोर्ट ही वेबसाइट पर मौजूद नवीनतम रिपोर्ट है।

2022 में राज्यों और केन्द्रशासित प्रदेश में क्राइम रेट के आँकड़े

एनसीआरबी 2022 की रिपोर्ट

इस रिपोर्ट में राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों का डेटा है। ये मीडिया रिपोर्टों को झुठलाती हैं। भारत में अपराध 2022 की तालिका 1A.3 के अनुसार, देश में क्राइम रेट प्रति 100,000 जनसंख्या पर 422.2 थी, जबकि उत्तर प्रदेश में अपराध दर प्रति 1,00,000 जनसंख्या पर 322 है। यानी मीडिया रिपोर्ट में किए गए प्रति व्यक्ति 7.4 से काफी कम।

एनसीआरबी के आँकड़ों से साफ पता चलता है कि दिल्ली में क्राइम रेट सबसे ज्यादा है। यहाँ प्रति एक लाख आबादी पर 1512.8 अपराध हुए हैं। जबकि केरल में प्रति 100,000 लोगों पर 1274.8 अपराध दर्ज किए गए। इसकी तुलना उत्तर प्रदेश से की जाए तो ये काफी कम हैं। इतना ही नहीं यूपी में अपराध केरल, हरियाणा, गुजरात, तमिलनाडु आदि कई अन्य राज्यों से कम हुए हैं।

मीडिया में ये दावा किया गया कि उत्तर प्रदेश में अपराध दर प्रति 100,000 पर 7,40,000 है, यानी 24 करोड़ की आबादी वाले राज्य में 170 करोड़ से ज्यादा क्राइम। ये अपने आप में ही गलत आँकड़ा है।

प्रमुख मीडिया वेबसाइटों ने जिस तरह से मनगढ़ंत आँकड़ों का प्रचार किया है ये काफी चिंता की बात है। इससे जनता को गलत जानकारी मिलती है, आधिकारिक आँकड़ों को कमजोर करती है साथ ही राज्य की कानून व्यवस्था की कथित नाकामी को लेकर प्रशासन पर गलत दबाव बनाया जाता है। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े और ज्यादा जनसंख्या वाले राज्य को लेकर गलत रिपोर्ट पेश करना ज्यादा गंभीर मामला है। साथ ही ये पत्रकारिता की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाती है। इस झूठे आँकड़े को हजार बार कहकर योगी आदित्यनाथ सरकार के अपराध को लेकर जीरो टॉलरेंस की नीति पर सवाल उठाए जाते हैं।

‘सर के लिए मैं सूटकेस में भी बंद हो जाऊँगी, बीफ खाऊँगी’: इंदौर के शूटिंग कोच मोहसिन खान के जाल में फँसी हिंदू लड़कियाँ करती थीं ऐसी बात, पीड़िता ने किया खुलासा

इंदौर में रेप और यौन उत्पीड़न के इल्जाम में गिरफ्तार हुए मोहसिन खान को लेकर पीड़िताओं ने नई खुलासे किए हैं। पीड़िताओं ने बताया कि कैसे मोहसिन खान मुस्लिम लड़कियों को अपनी बहनें बताता था और उसने हिंदू लड़कियों को अपने टारगेट पर लिया हुआ था।

लड़कियाँ उसके जाल में इस तरह फँसी हुई थीं कि वो आम बातचीत में ये तक कह देती थीं कि ‘सर के लिए तो मैं सूटकेस तक में बंद होने के लिए तैयार हूँ।’

ये खुलासा खुद मोहसिन खान के जाल में फँसी एक पीड़िता ऑर्गनाइजर की पत्रकार सुभी विश्वकर्मा से बातचीत में किया है। सुभी की ग्राउंड रिपोर्ट में लड़की को ये सारी बातें करते साफ सुना जा सकता है।

‘हिंदू लड़कियाँ उसका निशाना थीं’– पीड़िता

ऑर्गेनाइजर की ग्राउंड रिपोर्ट के मुताबिक, पीड़िता ने बताया कि मोहसिन हिंदू लड़कियों के शरीर पर भद्दी टिप्पणियाँ करता था और ‘ओमेगल ऐप’ पर लड़कियों के साथ न्यूड वीडियो कॉल भी करता था।

पीड़िता के मुताबिक, मोहसिन कहता था कि सभी मुस्लिम लड़कियाँ उसकी बहनें हैं, लेकिन हिंदू लड़कियाँ उसका निशाना हैं। वह हिंदू लड़कों से भी लड़कियों को ‘यूज एंड थ्रो’ करने के लिए कहता था।

मोहसिन हिंदू लड़कियों को कलावा पहनने या तिलक लगाने से रोकता था। मोहसिन खान उन लड़कियों को भी मांस खिलाता था, जो नहीं खाती थी। इसमें जैन और राजपूत लड़कियाँ शामिल थी।

‘बीफ खा सकती हूँ, सूटकेस में पैक करवा सकती हूँ’

मोहसिन लड़कियों को पॉवर के नाम और लड़कों को स्टेमिना के नाम पर खाने के लिए गोलियाँ देता था। पीड़िता ने बताया कि एक लड़की मोहसिन के प्रभाव में आकर सुबह 4 बजे नमाज़ पढ़ने लगती थी। वह लड़की ‘अस्सलाम अलैकुम’ या ‘अल्लाह हाफिज’ कहने लगी थी।

कोचिंग में पढ़ने वाली एक और लड़की ने मजाक-मजाक में ये तक कह दिया कि वह ‘मोहसिन के लिए बीफ खा सकती है या खुद को सूटकेस में पैक भी करने दे सकती है।’

झूठ बोलकर फ्लैट पर जाती थी शादीशुदा महिलाएँ

मोहसिन हिंदू लड़कियों को अपने फ्लैट पर बुलाता था। फ्लैट पर उसके दोस्त भी शादीशुदा हिंदू महिलाओं को लाते थे। कई लड़कियाँ कोचिंग या कॉलेज जाने का बहाना बनाकर उसके फ्लैट पर रुकती थीं।

मोहसिन खासतौर पर 12 से 15 साल की नाबालिगों को निशाना बनाता था। इसमें एक दलित रिसेप्शनिस्ट भी शामिल थी। पीड़िता ने बताया कि मोहसिन ने एक 12 साल की बच्ची को कहा था कि तुम्हारें ब्रेस्ट बहुत बड़े हो गए है और आवाज भारी हो गई है जो अजीब लग रही है।

पीड़िता ने आगे बताया कि मोहसिन हमारे सामने ही न्यूड वीडियो कॉल के बारे में खुलकर बात करता था। मोहसिन ने एक लड़की से टारगेट शॉट्स का हवाला देते हुए कहा, “अगर मुझे नहीं देगी तो उल्टे क्लिक करवा दूँगा।”

मोदी-योगी नेताओं की बुराई

पीड़िता ने आगे बताया, “मोहसिन लड़कियों से कहता एक बार कलमा पढ़कर देखो, यह बहुत पवित्र है।” मोहसिन मोदी जी और योगी जी जैसे बड़े नेताओं की बुराई करता था।

मोहसिन कहता था कि मोदी जी ने महंगाई बढ़ा दी है और उन्होंने अपनी पत्नी को छोड़ दिया है। मोहसिन लड़कियों को मंदिर जाने से रोकता और कहता, “आप भगवान को पानी चढ़ाते हो, इससे अच्छा है कि वह पानी गरीबों को दो।”

मोहसिन खुद को विराट कोहली जैसा बताता था। मोहसिन हिंदू धर्म की बातों का मज़ाक उड़ाता था। कुछ छात्रों ने मोहसिन को कहा था कि चादर चढ़ाने के बजाय गरीबों की मदद करनी चाहिए तो इस बात पर मोहसिन गुस्सा हो जाता था।

इजरायल का विरोधी मोहसिन खान

पीड़िता ने बताया कि मोहसिन के फ्लैट पर पानी की बोतलों में कागज़ की पर्चियाँ मिली थीं। इन पर्चियों पर कुछ लिखा भी था।

मोहसिन इजरायल का विरोध भी करता था। वह लड़कियों से कहता कि कुछ खास चिप्स या स्नैक्स मत खाओ, क्योंकि वे इजरायल से जुड़े हैं।

अब तक की कार्रवाई

एडिशनल सीपी ने बताया कि मोहसिन पर रेप, POCSO एक्ट, SC/ST एक्ट और मध्य प्रदेश के धर्मांतरण विरोधी कानून के तहत आरोप हैं। पुलिस इस मामले को प्राथमिकता दे रही है और पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए प्रतिबद्ध है।

अधिकारियों का कहना है कि वे ऐसे अपराधियों को रोकने के लिए जागरूकता अभियान चला रहे हैं और ट्रेनर के बैकग्राउंड चेक पर भी ध्यान दे रहे हैं।

क्या था मामला?

इंदौर में ड्रीम ओलंपिक शूटिंग एकेडमी का कोच मोहसिन खान हिंदू लड़कियों को अपने जाल में फँसाकर उनके साथ रेप करता और ब्लैकमेल कर धर्मांतरण करवाता था। मोहसिन खान के फोन से 30 महिलाओं के आपत्तिजनक वीडियो मिले थे।

मोहसिन ने एक वीडियो में हिंदू लड़कियों को जानबूझकर निशाना बनाने की बात कबूली थी। पुलिस ने इस मामले में अब तक 8 FIR दर्ज की हैं। इनमें बलात्कार, POCSO एक्ट और धोखाधड़ी के आरोप शामिल हैं।

ट्रंप का ‘बिग ब्यूटीफुल बिल’ अमेरिकी संसद में हुआ पास, 250वें स्वतंत्रता दिवस पर होंगे हस्ताक्षर: 869 पन्नों के बिल में जानें क्या कुछ, जिसके विरोध में डेमोक्रेट नेता 8 घंटे देते रहे भाषण

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का वन बिग ब्यूटीफुल बिल गुरुवार (3 जुलाई 2025) को अमेरिकी कॉन्ग्रेस में 218 मतों से पास कर दिया गया है। अमेरिकी सीनेट ने इस बिल को मंगलवार (2 जुलाई 2025) ही पास कर दिया था। अब इस बिल पर राष्ट्रपति के हस्ताक्षर होने हैं। इसके लिए ट्रंप ने अमेरिका के 250वें स्वतंत्रता दिवस यानी 4 जुलाई 2025 का दिन चुना है।

बिल के पास होने पर ट्रंप ने कहा, “यह अमेरिका के लिए एक बेहतरीन बिल होगा। ये देश को आगे बढ़ाने में तेजी लाएगा।”

ट्रंप ने कहा, – “स्वतंत्रता दिवस पर इससे बड़ा गिफ्ट कोई नहीं हो सकता।”

ट्रंप का कहना है कि मैंने अमेरिका के लोगों को डेथ टैक्स से निजात दिलाई है। व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट के अनुसार, शुक्रवार को शाम 5 बजे आयोजित बड़े समारोह में ट्रंप इस विधेयक पर हस्ताक्षर करेंगे।

बिग ब्यूटीफुल बिल का पास होना ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के लिए बड़ी उपलब्धि का तौर पर देखा जा रहा है। गुरुवार को हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में ये बिल 218-214 के मतों के अंतर से पास हो गया है। मतदान के दौरान रिपब्लिकन पार्टी के दो सांसदों ने डेमोक्रेटिक पार्टी के पक्ष में अपना वोट डाला। रिपब्लिकन पार्टी इस बिल का लगातार विरोध कर रही है। यहाँ तक कि एलन मस्क ने भी इस बिल का विरोध किया था।

वादे किये, वादे पूरे किए

अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, “सभी को बधाई। कई बार तो मुझे शक हुआ कि ये बिल 4 जुलाई तक हम इस काम को पूरा कर भी पाएँगे या नहीं। पर अब हमने बड़े टैक्स में कटौती कर ली है और सीमा पर सुरक्षा के लिए भी जरूरी रिसोर्सेज जुटाए हैं।”

वेंस ने आगे लिखा, “हमने वादे किए, वादे पूरे किए।”

मंगलवार को अमेरिका के निचले सदन यानी सीनेट में ये बिल 51-50 से पारित हुआ था। 869 पन्नों के बिल में कई तरह की कटौती, सेना के लिए बजट, डिफेंस और एनर्जी उत्पादन के बढ़े हुए खर्च, स्वास्थ्य और पोषण कार्यक्रमों में कटौती समेत कई बातें शामिल हैं। इसके अलावा अवैध प्रवासियों के लिए डिपोर्टेशन के लिए बजट बढ़ाने मुद्दे भी रखे गए हैं।

ट्रंप के दूसरे कार्यकाल की बड़ी उपलब्धि

बिग ब्यूटीफुल बिल का पास होना ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के लिए बड़ी उपलब्धि का तौर पर देखा जा रहा है। गुरुवार को हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में ये बिल 218-214 के मतों के अंतर से पास हो गया है। मतदान के दौरान रिपब्लिकन पार्टी के दो सांसदों ने डेमोक्रेटिक पार्टी के पक्ष में अपना वोट डाला। रिपब्लिकन पार्टी इस बिल का लगातार विरोध कर रही है। यहाँ तक कि एलन मस्क ने भी इस बिल का विरोध किया था।

डेमोक्रेट नेता हकीम जेफ्रीस ने विधेयक के विरोध में करीब आठ घंटे से ज्यादा समय तक भाषण दिया। विपक्ष का कहना है कि इस बिल के कारण आने वाले वर्षों में लाखों लोगों को स्वास्थ्य बीमा से वंचित रहना पड़ सकता है। साथ ही शिक्षा पर भी असर पड़ेगा। हालाँकि व्हाइट हाउस ने इस बात से इंकार किया है।

बिल में क्या-क्या शामिल

इस बिल में अमेरिका- मेक्सिको के बॉर्डर वॉल के लिए 46 अरब डॉलर (लगभग 3,85,730 करोड़ रुपए) का बजट रखा गया है। इसके अलावा 10,000 नए ICE अधिकारियों की भर्ती की जाएगी। 1 लाख प्रवासी डिटेंशन बेड्स के लिए 45 अरब डॉलर (3 लाख 73 हजार 777 करोड़ रुपए) का बजट रखा गया है।

इस बिल के तहत पेंटागन बजट में इजाफा किया गया है। अमेरिकी गोल्डन डोम कहे जाने वाले मिसाइल शील्ड के लिए 25 अरब डॉलर (लगभग 207,000 करोड़ रुपए) और मंगल ग्रह पर जाने वाले मिशन के लिए 10 अरब डॉलर (लगभग 83,000 करोड़ रुपये) का बजट तय किया गया है।

अमेरिकी कॉन्ग्रेस के बजट ऑफिस का अनुमान है कि इस विधेयक के कारण अगले 10 सालों में संघीय घाटे में 3.3 ट्रिलियन डॉलर की बढ़ोतरी हो सकती है।