Home Blog Page 320

UPSC क्लियर नहीं होने पर भी मिल सकती है नौकरी, मोदी सरकार लेकर आई ‘प्रतिभा सेतु’: जानिए कौन-कौन सी परीक्षा में पिछड़ने के बाद भी सरकारी-प्राइवेट क्षेत्र में मिलेंगे मौके

अब UPSC की परीक्षा में बैठ रहे अभ्यर्थियों को अपने आखिरी मौके के बाद भी निराश नहीं होना पड़ेगा। सिविल सेवा जैसी अन्य परीक्षाओं में अपनी लगन और मेहनत के बल पर अगर अभ्यर्थी इंटरव्यू तक पहुँच जाता है और फिर भी मेरिट में पिछड़ जाता है तो भी उसे सरकारी नौकरी, पब्लिक सेक्टर यूनिट (PSU) और निजी कंपनियों में बड़े ओहदों पर काम करने का मौका मिल सकता है। ये संभव होगा ‘प्रतिभा सेतु’ के जरिए। देश की प्रतिभाओं और बुद्धिमत्ता रखने वाले लोगों को सरकार ‘प्रतिभा सेतु’ नाम की नई योजना से जोड़ेगी।

क्या है प्रतिभा सेतु

प्रतिभा (PRATIBHA) का पूरा नाम ‘प्रोफेशनल रिसोर्स एंड टैलेंट इंटीग्रेशन- ब्रिज फॉर हायरिंग एस्पिरेंट्स’ है। प्रतिभा सेतु को पहले पब्लिक डिस्क्लोजर स्कीम (PDS) के नाम से जाना जाता था। इसे 20 अगस्त 2018 में शुरू किया गया था। तब सिर्फ उम्मीदवारों के नाम सूची में डाला जाता है। अब इसके नाम और प्रारूप में बदलाव किया गया है।

प्रतिभा सेतु के अंदर प्रतिभा पोर्टल बनाया गया है। इसके तहत UPSC की 8 परीक्षाओं के उम्मीदवारों को प्रतिभा सेतु से जोड़ा जाएगा। अंतिम मेरिट सूची से चूकने वाले अभ्यर्थियों की जानकारी सरकारी मंत्रालय, स्वायत्त कंपनियों और निजी संगठनों को साझा किया जाएगा। इच्छुक उम्मीदवारों इसके जरिए नौकरियों के अवसर मिलेंगे।

किन परीक्षाओं के अभ्यर्थियों को मिलेगा मौका

‘प्रतिभा सेतु’ में उन अभ्यर्थियों की जानकारी शामिल होगी जिन्होंने UPSC परीक्षा के सभी चरणों को पास किया हो, इंटरव्यू तक पहुँचा हो लेकिन मेरिट की अंतिम सूची में शामिल नहीं हो पाए हैं।

इसके तहत सिविल सेवा (CSE), आर्थिक और सांख्यिकी सेवा (IESS), संयुक्त चिकित्सा सेवा (CMS), वन सेवा (IFS), रक्षा रेवा (CDS), इंजीनियरिंग सेवा (ESE), भू-वैज्ञानिक (CGSE) और केंद्रीय शस्त्र पुलिस बल (ACS) की परीक्षाएँ शामिल हैं। इन परीक्षाओं से UPSC के पास अब तक 10,000 से अधिक उम्मीदवारों का डेटा मौजूद है।

हालाँकि इसमें NDA, NA, CBI (DSP) LDCE, CISF AC (EXE) LDCE, SO/Steno समेत अन्य परीक्षाओं को अब तक शामिल नहीं किया गया है। उम्मीदवारों की जानकारी प्रतिभा सेतु पर साझा करने से पहले उनकी सहमति भी ली जाएगी।

उनकी शैक्षणिक योग्यता, संपर्क विवरण और बॉयोडेटा जैसी जानकारियाँ शामिल की जाएँगी। पहली बार संयुक्त चिकित्सा सेवा की 2017 की परीक्षा के अभ्यर्थियों के नामों की सूची जारी की थी। UPSC के अनुसार यह प्रतिभा पोर्टल में चयनित हुए अभ्यर्थी भी यूपीएससी परीक्षा में चयनित अभ्यर्थियों के बराबर ही प्रतिभावान हैं जिन्हें बेहतर रोजगार की संभावनाएँ दी जा रही है।

इसके तहत एक पारदर्शी और व्यवस्थित नियुक्ति का आधार तय किया गया है ताकि जिन लोगों को यूपीएससी में मौका नहीं मिल पाया उन्हें अन्य जगहों पर बेहतर अवसर मिल सके और उनकी प्रतिभा का नुकसान न हो।

जो संगठन प्रतिभा पोर्टल पर उम्मीदवारों को नौकरी देने के इच्छुक होंगे, यूपीएससी उन्हें लॉगिन आईडी प्रदान करेगा। इससे ये संगठन उम्मीदवारों के विवरण आसानी से देख सकते हैं। निजी कंपनियाँ भी इसके तहत यूपीएससी पोर्टल के माध्यम से प्रतिभा पोर्टल पर साइनअप कर सकती हैं।

उम्मीदवारों की जानकारी के आधार पर नियोक्ता उन तक आसानी से पहुँच सकते हैं। असल में प्रतिभा सेतु का मुख्य उद्देश्य यूपीएससी उम्मीदवारों के लिए रोजगार के अवसर बढ़ाना और भारत और प्रतिभाशाली लोगों की पहुँच बड़े सरकारी और बेहतर निजी संगठनों तक पहुँचाना है।

UPSC में परीक्षा में असफल हो जाने पर अभ्यर्थी इस कदर निराश हो जाते हैं कि वे अवसाद और तनाव के चरम तक पहुँच जाते है। इससे उनकी मेहनत और प्रतिभा का नुकसान तो होता ही है पर साथ ही देश का भी कहीं न कहीं नुकसान होता है। कई लोग ऐसे भी हैं जो एक बार के बाद दूसरी बार परीक्षा देने की स्थिति तक नहीं आ पाते।

साथ ही कई बार अभ्यर्थी के पास परीक्षा देने का आखिरी मौका होता है। इसमें वह अपनी जी जीन से मेहनत करता है। आखिरी चरण तक पहुँचने के बाद भी अगर अंतिम सूची तक में उसका नाम न आए तो अभ्यर्थी के पास किसी अन्य काम को करने के बारे में सोचने के लिए भी कुछ नहीं रह जाता या काफी समय लग जाता है। उन्हे अपना भविष्य गर्त में नजर आने लगता है।

प्रतिभा सेतु से इस तरह के हुनरमंद उम्मीदवारों को वो मौका मिल सकता है कि वह अपने समय को गँवाए बिना समय पर रोजगार के विकल्प तलाश सके और अपनी प्रतिभा को सही जगह इस्तेमाल कर सके।

खेला होबे, संदेशखाली, मुर्शिदाबाद… वैचारिक विष्ठा करने से पहले सब भूल गईं सागरिका जी, बंगाल-हिंदुओं के लिए ‘T-R-A-G-E-D-Y’ सिंड्रोम है TMC

सागरिका घोष ने ‘द प्रिंट’ पर मोदी सरकार की आलोचना करते हुए एक लेख लिखा है, जिसमें सागरिका घोष ने 11 साल में हुई ‘दुर्घटनाओं’ और प्राकृतिक आपदाओं के लिए भी सरकार को घेरा है। आइए जानते हैं कि सागरिका घोष की बातों में कितनी सच्चाई है।

सागरिका घोष का ‘सच’ और हकीकत: दीदी के चश्मे से देश देखना

सागरिका घोष अपने लेख में मोदी सरकार पर ‘सत्यमेव जयते’ का सम्मान न करने और केवल ‘हेडलाइन मैनेजमेंट’ पर ध्यान देने का आरोप लगा रही हैं। सागरिका घोष M-O-D-I सिंड्रोम यानी Misinformation, Opacity, Distractions, and Incompetence (गलत सूचना, अस्पष्टता, भटकाव और अक्षमता) का जिक्र कर रही हैं।

लेकिन, सागरिका घोष की अपनी बातों में ही कितनी सच्चाई है, यह हमें देखना होगा। लगता है सागरिका जी को अपनी ‘दीदी’ यानी ममता बनर्जी को छोड़कर कोई और काम करता हुआ पसंद ही नहीं आता।

M-O-D-I सिंड्रोम या टीएमसी का ‘T-R-A-G-E-D-Y’ सिंड्रोम?

सागरिका घोष मोदी सरकार को M-O-D-I सिंड्रोम (Misinformation, Opacity, Distractions, and Incompetence) का शिकार बता रही हैं। लेकिन, अगर हम पश्चिम बंगाल में उनकी ही पार्टी TMC के राज को देखें, तो हमें एक नया और अधिक भयावह सिंड्रोम दिखाई देता है, जो T-R-A-G-E-D-Y (त्रासदी) है।

  • T (Terror) आतंक का राज- पश्चिम बंगाल में वामपंथियों के शासनकाल से भी कई गुना ज्यादा अत्याचार TMC के राज में हो रहा है। हिंदुओं की जान की दुश्मन बनी हुई है TMC सरकार। हिंदुओं के घरों पर बम फेंके जाते हैं, पत्थर बरसाए जाते हैं, आग लगाई जाती है। महिलाओं के साथ दुष्कर्म और पुरुषों को मार डालने, उनके प्राइवेट पार्ट देखने जैसी घिनौनी हरकतें आम हैं। मालदा और मुर्शिदाबाद में हिंदुओं को अपने घर छोड़ने पर मजबूर किया गया, राज्यपाल सीवी आनंद बोस को पीड़ितों से मिलने जाना पड़ा। वहीं, संदेशखाली में TMC के गुंडे महिलाओं के साथ रेप-गैंगरेप की घटनाओं को अंजाम देते और टीएमसी महिलाओं को भी हवस का शिकार बनाते। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) और राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) की टीमें भी पीड़ितों से मिलीं, जिन्होंने डर और उत्पीड़न की भयावह कहानियाँ सुनाईं।
  • R (Riot) सुनियोजित दंगेरामनवमी पर हुई हिंसा सुनियोजित थी, जैसा कि पटना हाई कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस नरसिम्हा रेड्डी की फैक्ट-फाइंडिंग टीम ने अपनी रिपोर्ट में बताया। पुलिस ने खुद पीड़ितों से मिलने जा रही टीम को रोका, यह दिखाता है कि सरकार क्या छुपाना चाहती थी। हावड़ा और बाँकुड़ा में हिंदुओं के जुलूस पर हमला हुआ और उलटा हिंदुओं को ही गिरफ्तार कर लिया गया, जबकि मुहर्रम के जुलूस में ऐसी हिम्मत नहीं दिखाई जाती।
  • A (Anarchy) अराजकता और कानून का अभाव- 2021 के विधानसभा चुनाव के बाद बड़े पैमाने पर राजनीतिक हिंसा हुई। टीएमसी के गुंडों ने भाजपा कार्यकर्ताओं और समर्थकों पर हमले किए, उनकी हत्याएँ कीं। हजारों लोग डर के मारे अपने घर छोड़कर भाग गए, जिनमें से कई आज भी विस्थापित हैं। जॉय प्रकाश यादव, कुश खेत्रपाल और अभिजीत सरकार जैसे भाजपा कार्यकर्ताओं की बर्बर हत्याएँ हुईं, जिन पर सागरिका घोष जैसे पत्रकारों की चुप्पी सवाल खड़ा करती है। अभिजीत सरकार की हत्या तो फेसबुक लाइव पर हुई थी। TMC के गुंडों ने परिवारों को जान से मारने की धमकी दी, और मुख्य आरोपित खुले घूम रहे थे। सुप्रीम कोर्ट ने भी TMC कार्यकर्ताओं के जरिए एक हिंदू परिवार पर हमला करने के मामले में उनकी जमानत रद्द करते हुए इसे ‘लोकतंत्र पर गंभीर हमला’ बताया था।
  • G (Grooming Jihad) धर्मांतरण का खतरा– सागरिका घोष ने खुद ग्रूमिंग जिहाद के खतरे को ‘मानसिक उन्माद’ यानि पागलपन कहकर खारिज कर दिया, जबकि यह हिंदू परिवारों के लिए एक गंभीर खतरा है। यह दिखाता है कि सागरिका घोष सच्चाई को कैसे तोड़-मरोड़ कर पेश करती हैं और पीड़ितों को ही दोषी ठहराती हैं।
  • E (Electoral Violence) चुनावी हिंसा का नंगा नाच- चुनावों के बाद TMC की जीत के नशे में चूर गुंडों ने भाजपा समर्थकों को निशाना बनाया, उनके घरों पर हमला किया और उन्हें उजाड़ दिया। यहाँ तक कि केंद्रीय योजनाओं का लाभ भी भाजपा समर्थकों को नहीं मिलता है।
  • D (Demographic Change) जनसंख्या असंतुलन का खेल- पश्चिम बंगाल में अवैध घुसपैठियों को जानबूझकर बसाया जा रहा है, रोहिंग्या मुस्लिमों को आधार कार्ड और घर दिए जा रहे हैं। यह सब वोट बैंक की राजनीति के लिए किया जा रहा है, जिसका सीधा असर राज्य की Demographic पर पड़ रहा है और हिंदुओं पर अत्याचार बढ़ रहे हैं।
  • Y (Yield to Lies) झूठ के आगे घुटने टेकना- पश्चिम बंगाल की फिल्म इंडस्ट्री को TMC ने पूरी तरह से कंट्रोल कर रखा है। जो सरकार की तारीफ करता है उसे काम मिलता है, विरोधियों को बाहर कर दिया जाता है। भाजपा सांसद लॉकेट चटर्जी ने खुद बताया है कि कैसे उन्हें काम नहीं मिलता क्योंकि वह भाजपा में हैं। राष्ट्रीय मीडिया में पश्चिम बंगाल की हिंसा को उस स्तर की कवरेज नहीं मिलती, क्योंकि TMC सरकार सच्चाई को दबाने का काम करती है।

दुर्घटनाओं और प्राकृतिक आपदाओं पर बचकानी सोच

सागरिका घोष ने अहमदाबाद विमान दुर्घटना, ट्रेन पटरी से उतरने और कुंभ मेले में भगदड़ जैसी घटनाओं का जिक्र करते हुए मोदी सरकार को कटघरे में खड़ा किया है। सागरिका घोष का यह तर्क कि ऐसी दुर्घटनाएँ और प्राकृतिक आपदाएँ (जैसे कोविड-19 से हुई मौतें) सीधे सरकार की ‘खामियाँ’ हैं, पूरी तरह से बेतुका और बचकाना है।

क्या किसी सरकार का कंट्रोल विमान दुर्घटनाओं या कुंभ जैसे बड़े आयोजनों में होने वाली भगदड़ पर हो सकता है, जब लाखों लोग एक साथ आते हैं? ऐसी घटनाएँ दुनिया भर में होती हैं और अक्सर नियति और अप्रत्याशित परिस्थितियों के अधीन होती हैं।

यह तो भगवान की माया और नियति का खेल है, जिसे किसी भी सरकार के पाले में डालना नासमझी और बचकानापन है। यदि सागरिका जी यह मानती हैं कि उनकी ‘ममता दीदी’ के राज में ऐसी दुर्घटनाएँ नहीं होतीं या प्राकृतिक आपदाएँ नहीं आतीं, तो यह उनकी संकीर्ण सोच का प्रमाण है।

कोविड-19 के आँकड़ों पर आरोप

कोविड-19 से हुई मौतों के आँकड़ों को लेकर भी सागरिका घोष ने सवाल उठाए हैं। यह सच है कि वैश्विक महामारी के दौरान आँकड़ों को लेकर बहस हुई है, लेकिन यह समझना ज़रूरी है कि ऐसी अभूतपूर्व स्थिति में सटीक आँकड़ों का संग्रह एक जटिल चुनौती थी।

सरकार ने स्थिति को संभालने के लिए हर संभव प्रयास किया, और दुनिया के कई देशों में भी ऐसे ही आँकड़े सामने आए थे, जो बाद में संशोधित हुए। क्या वह यह कहना चाह रही हैं कि दुनिया की किसी भी सरकार ने कोविड से हुई मौतों के सही आँकड़े नहीं दिए?

क्या सागरिका घोष ममता दीदी को भारत का पीएम बनाने का सपना देख रही हैं?

सागरिका घोष को तृणमूल कॉन्ग्रेस ने राज्यसभा भेजा है। उनके पति राजदीप सरदेसाई को ‘रसगुल्ला पत्रकारिता’ के लिए जाना जाता है, जिन्होंने ममता बनर्जी से पश्चिम बंगाल की हिंसा पर कभी कड़े सवाल नहीं पूछे, ताकि उनके ‘चाय पर चर्चा’ में ‘रसगुल्ले’ मिलते रहें। यह सब देखकर तो यही लगता है कि सागरिका घोष ममता दीदी को भारत का प्रधानमंत्री बनाने का ख्वाब देख रही हैं।

लेकिन, क्या उन्हें यह नहीं दिखता कि जिस ममता दीदी के राज में हिंदुओं का अस्तित्व खतरे में है, महिलाएँ असुरक्षित हैं, और पूरी कानून-व्यवस्था ध्वस्त हो चुकी है, वह भारत को कैसे चला सकती हैं? क्या उनका सपना भारत को एक इस्लामी मुल्क बनाने का है, जहाँ हिंदुओं को अपने ही देश में दोयम दर्जे का नागरिक बना दिया जाए?

जिस सरकार के राज में रामनवमी के जुलूस पर पत्थरबाजी होती है, धर्मांतरण के खतरे को ‘मानसिक उन्माद’ यानि पागलपन बताया जाता है, और अपने ही नागरिकों को घर छोड़ने पर मजबूर किया जाता है, क्या ऐसी सरकार देश को आगे ले जा सकती है?

आईना देखना जरूरी है

सागरिका घोष मोदी सरकार पर ‘झूठ’ बोलने और ‘जवाबदेही से बचने’ का आरोप लगा रही हैं। लेकिन, उन्हें सबसे पहले कहीं और झांकना होगा। जिस पार्टी ने उन्हें राज्यसभा भेजा है, वह पश्चिम बंगाल में अराजकता, हिंसा और तुष्टिकरण का प्रतीक बन चुकी है।

भारत में मोदी सरकार ने विकास के कई आयाम गढ़े हैं, चाहे वह सड़कें हों, एयर पोर्ट हों या डिजिटल इंडिया का सपना। हाँ, कोई भी सरकार पूर्ण नहीं होती और गलतियाँ भी होती हैं, लेकिन उन्हें ऐसे पेश करना जैसे हर आपदा और दुर्घटना के लिए सिर्फ सरकार जिम्मेदार है, यह निराधार और राजनीतिक दुर्भावना से प्रेरित है।

भारत की जनता मोदी के कामकाज से प्रेरित होकर उन्हें वोट देती है, जबकि ममता दीदी दादागिरी करके वोट छीनती हैं।

सागरिका घोष जी, आपको यह समझना होगा कि पत्रकारिता का धर्म सच्चाई दिखाना होता है, न कि किसी विशेष राजनीतिक एजेंडे को बढ़ावा देना। अगर आपको ‘M-O-D-I सिंड्रोम’ दिखाई देता है, तो अपनी ही पार्टी के ‘T-R-A-G-E-D-Y सिंड्रोम’ पर भी नजर डालनी चाहिए।

भाई-बहनों को अगवा कर बनाया मुस्लिम, कोर्ट ने कहा- 2 करोड़ रुपए जमा कर ले जाएँ घर, पर करते रहेंगे इस्लाम की प्रैक्टिस: पाकिस्तान में हिंदुओं का उत्पीड़न जारी, जानिए क्या है मामला

पाकिस्तान के सिंध प्रांत में एक बार फिर हिंदू समुदाय के उत्पीड़न का मामला सामने आया है। सिंध प्रांत के शाहदादपुर शहर में चार हिंदू भाई-बहनों जिया बाई (22 साल), दिया बाई (20 साल), दिशा बाई (16 साल) और उनके चचेरे भाई हरजीत कुमार (13 साल) का अपहरण कर लिया गया। इन मासूम बच्चों को जबरन इस्लाम मजहब अपनाने के लिए मजबूर किया गया।

इस मामले में हिंदुओं ने विरोध-प्रदर्शन किया और मामले को मीडिया में उठाया, जिसके बाद बैकफुट पर आए प्रशासन ने चारों बच्चों को बरामद कर लिया। हालाँकि उनका अपहरण करने वाले आरोपितों को कोर्ट ने बरी कर दिया।

यही नहीं, कोर्ट ने 2 बालिग लड़कियों को सेफ हाउस भिजवा दिया, तो 2 नाबालिग बच्चों की कस्टडी के लिए माँ-बाप से ही 10-10 मिलियन पाकिस्तानी रूपए यानी 1-1 करोड़ पाकिस्तानी रुपए का बॉन्ड भरवाया, ताकी दोनों बच्चों की घर वापसी न कराई जा सके और वो इस्लाम की प्रैक्टिस करते रहें। यानी हिंदू माँ-बाप अपने ही जबरन मुस्लिम बनाए गए बच्चों को इस्लामी तरीके से पालते रहें और इसकी गारंटी भी दें कि वो हिंदू नहीं बनेंगे।

कोर्ट के ऑर्डर की कॉपी (फोटो साभार: X_SindhHindu)

क्या है पूरा मामला

रिपोर्ट्स के मुताबिक, ये घटना सिंध प्रांत के शाहदादपुर शहर की है, जो हिंदुओं की छोटी-मोटी आबादी वाला इलाका है। जिया, दिया, दिशा और हरजीत एक साधारण हिंदू परिवार से हैं। जिया और दिया मेडिकल की पढ़ाई कर रही हैं, जबकि दिशा 10वीं कक्षा की छात्रा है। हरजीत जो सिर्फ 13 साल का है, स्कूल में 8वीं कक्षा में पढ़ता है।

एक दिन ये चारों बच्चे अचानक गायब हो गए। परिवार ने आस-पास तलाश की, लेकिन कुछ पता नहीं चला। फिर खबर मिली कि बच्चों को शाहदादपुर से कराची ले जाया गया है। माँ ने स्थानीय पुलिस में शिकायत दर्ज की और बताया कि एक कंप्यूटर शिक्षक फरहान खासखेली ने बच्चों को बहलाकर उनका अपहरण किया।

माँ का कहना था कि फरहान ने पहले बच्चों से दोस्ती की, खासकर जिया और दिया से, जो उसकी कोचिंग क्लास में जाती थीं। उसने बच्चों को नौकरी और बेहतर जिंदगी का लालच दिया और फिर मौका पाकर उन्हें अगवा कर लिया।

कुछ घंटों बाद सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें चारों बच्चे दिख रहे थे। वीडियो में वे कह रहे थे कि उन्होंने अपनी मर्जी से इस्लाम कबूल किया है। लेकिन परिवार और हिंदू समुदाय का कहना है कि बच्चे डरे हुए थे और उन्हें जबरन ऐसा कहने के लिए मजबूर किया गया। खासकर 13 साल के हरजीत को देखकर माँ का दिल टूट गया।

बच्चे की माँ ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में रोते हुए कहा, “मेरा बेटा इतना छोटा है, उसे धर्म की क्या समझ? मेरी बेटियों को मुझसे छीन लिया गया।” माँ ने पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के नेता बिलावल भुट्टो जरदारी से मदद की गुहार लगाई।

पीड़ित परिवार से भरवाया PKR 2 करोड़ का बॉन्ड

हिंदू समुदाय के विरोध और प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद पुलिस ने हरकत में आई। पुलिस ने बताया कि उन्होंने बच्चों को हैदराबाद से छुड़ाया और एक संदिग्ध को पकड़ा। लेकिन परिवार का कहना है कि पुलिस ने शुरू में कोई मदद नहीं की और उल्टा उन्हें धमकाया। अदालत में बच्चों को पेश किया गया। जिया और दिया, जो बालिग थीं, ने कहा कि वे अपनी मर्जी से इस्लाम कबूल करना चाहती हैं। लेकिन परिवार का दावा है कि वे दबाव में थीं।

नाबालिग दिशा और हरजीत को माता-पिता को सौंप दिया गया। हालाँकि इसके लिए 2 करोड़ पाकिस्तानी रुपए बतौर बॉन्ड भरने का भी आदेश दिया गया है।

हालाँकि अदालत ने दोनों आरोपितों फरहान खासखेली और जुल्फिकार खासखेली को अपहरण और जबरन धर्मांतरण के आरोपों से बरी कर दिया। इस फैसले से पीड़ित परिवार और हिंदू समुदाय में निराशा छा गई।

हिंदू पंचायत के प्रमुख राजेश कुमार ने इसे ‘सांस्कृतिक आतंकवाद’ कहा। उन्होंने बच्चों की तस्वीरें दिखाते हुए सवाल उठाया, “क्या ये बच्चे इतने समझदार हैं कि धर्म बदलने का फैसला ले सकें? यह सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि पूरे हिंदू समुदाय का दुख है।”

ये मामला इतना गंभीर था कि सिंध मानवाधिकार कमीशन ने भी इस पर संज्ञान लिया। तो सिंध असेंबली में भी मामला उठा। हालाँकि कोर्ट का आदेश साफ बता रहा है कि हिंदुओं के साथ न्याय तो नहीं ही हो सकता, इसके बदले उन्हें अपने बच्चों को पाने के लिए भी 2 करोड़ पाकिस्तानी रुपए बतौर बॉन्ड भी भरना पड़ेगा।

पाकिस्तान में हिंदुओं के साथ अत्याचार कोई नई बात नहीं

पाकिस्तान में हिंदुओं के साथ अत्याचार कोई नई बात नहीं है। खासकर सिंध और पंजाब के ग्रामीण इलाकों में, जहाँ हिंदू अल्पसंख्यक हैं.. वहाँ ऐसी घटनाएँ आम हैं। हिंदू लड़कियों और महिलाओं का अपहरण, जबरन इस्लाम कबूल करवाना और उनका निकाह करवाने की घटनाएँ लगातार होती रहती हैं। हिंदू पंचायत के अनुसार, हर साल सैकड़ों हिंदू लड़कियों का अपहरण होता है और उनमें से ज्यादातर मामलों में कोई कार्रवाई नहीं होती।

अपहरण और जबरन धर्मांतरण: सिंध के बदिन, घोटकी, और शाहदादपुर जैसे इलाकों में हिंदू लड़कियों को निशाना बनाया जाता है। अक्सर स्थाानीय प्रभावशाली लोग या मजहबी कट्टरपंथी गरीब हिंदू परिवारों की लड़कियों को बहलाते हैं, लालच देते हैं या डराते हैं। इसके बाद उनका धर्म परिवर्तन करवाकर निकाह कर लिया जाता है। ऐसी लड़कियों की उम्र ज्यादातर 12 से 20 साल होती है। कई बार तो 10 साल की बच्चियों को भी नहीं छोड़ा जाता।

न्याय नहीं मिलता: पुलिस और अदालतें ज्यादातर ऐसे मामलों में ढीला रवैया अपनाती हैं। अगर परिवार गरीब या कमजोर हो, तो उनकी सुनवाई नहीं होती। राजेश कुमार ने बताया कि सिर्फ उन्हीं मामलों में कार्रवाई हो पाती है, जिनमें पीड़ित बच्चे प्रभावशाली परिवारों से होते हैं। गरीब हिंदुओं को पाकिस्तान में इंसाफ नहीं मिलता।

सामाजिक दबाव: धर्म परिवर्तन के बाद लड़कियों को उनके परिवार से मिलने की इजाजत नहीं दी जाती। कई बार उन्हें धमकाया जाता है कि अगर वे अपने परिवार के पास गईं, तो उनकी जान को खतरा होगा। इससे परिवार पूरी तरह टूट जाता है।

तेजी से घटती हिंदू आबादी: पाकिस्तान में हिंदुओं की आबादी लगातार कम हो रही है। साल 1947 में आजादी के समय, पाकिस्तान में हिंदुओं की आबादी लगभग 15-20% थी। आज यह घटकर केवल 2-3% रह गई है। इसका सबसे बड़ा कारण है उत्पीड़न, भेदभाव और जबरन धर्मांतरण। सिंध जहाँ हिंदुओं की आबादी थोड़ी ज्यादा है (लगभग 8-10%), वहाँ भी हालात बदतर हैं। हिंदू समुदाय के लोग डर के मारे या तो देश छोड़कर भारत चले जाते हैं या चुपचाप अत्याचार सहते हैं।

आर्थिक और सामाजिक भेदभाव: हिंदुओं को नौकरियों, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं में भेदभाव का सामना करना पड़ता है। कई हिंदू परिवार गरीबी और सामाजिक बहिष्कार के कारण कमजोर हो गए हैं।

पलायन: हर साल हजारों हिंदू परिवार भारत या अन्य देशों में शरण लेते हैं। लेकिन उनके लिए नई जगह पर बसना आसान नहीं होता। जो लोग रह जाते हैं, वे डर और असुरक्षा में जीते हैं।

सांस्कृतिक पहचान पर खतरा: जबरन धर्मांतरण और अपहरण की घटनाएँ हिंदुओं की सांस्कृतिक पहचान को मिटाने की कोशिश हैं। मंदिरों पर हमले, धार्मिक त्योहारों पर पाबंदी और सामुदायिक उत्पीड़न से हिंदू समुदाय का मनोबल टूट रहा है।

पाकिस्तान के जन्म से चला आ रहा हिंदुओं का उत्पीड़न, अपहरण, जबरन धर्मांतरण और तेजी से घटती उनकी आबादी दिखाती है कि हिंदुओं के लिए पाकिस्तान में इंसाफ और सुरक्षा एक सपना है। जरूरी है कि दुनिया इस मसले पर आवाज उठाए और हिंदू समुदाय को वह सम्मान और हक मिले, जो हर इंसान का अधिकार है। चार भाई-बहनों का अपहरण और जबरन धर्मांतरण पाकिस्तान में हिंदुओं की स्थिति को साफ बता देता है।

सबसे ज्यादा चिंता इस बात की है कि पुलिस और अदालतें ऐसे मामलों में इंसाफ नहीं देतीं। यह व्यवस्थित उत्पीड़न का सबूत है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय और मानवाधिकार संगठनों को इस पर ध्यान देना चाहिए। पाकिस्तान सरकार को चाहिए कि हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों की रक्षा के लिए सख्त कानून बनाए और उन्हें लागू करे। ताकि कोई भी डर के बिना अपनी आस्था और पहचान के साथ जी सके।

कैसे मेरे स्कूल का ‘सब्जेक्ट’ बन गया वैश्विक ‘जन आंदोलन’: जानिए मोदी सरकार में योग को लेकर कैसे बदली सोच, अनुभव एक Delhite गर्ल का

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस (21 जून) पर जब मैं टीवी, समाचार और सोशल मीडिया के माध्यम से चारों ओर लाखों-करोड़ों लोगों को एक साथ योग करते देखती हूँ, तो मेरे स्कूल के दिन आँखों के सामने तैर जाते हैं। यह नज़ारा अब सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि विदेशों में भी योग का जलवा है।

मेरे लिए यह किसी अद्भुत कहानी से कम नहीं, क्योंकि आज से 10-15 साल पहले योग को उस नजरिए से देखा ही नहीं जाता था, जैसा आज इसे देखा जा रहा है। 1 दशक पहले जहाँ योग को ऋषि मुनियों की तपस्या का हिस्सा माना जाता था, वहीं आज इसे जन-जन की जरुरत और दिनचर्या माना जा रहा है।

कुछ लोग योग को एक धंधा बना चुके हैं, वहीं बड़ी सँख्या में लोग इसे सकारात्मक रूप से अपनाकर दूसरों को जागरूक करने में लगे हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस योग दिवस पर 40 देशों के करीब 3 लाख लोगों के साथ मिलकर योग किया। लेकिन मैं पीएम मोदी की एक बात से बिल्कुल सहमत हो चुकी हूँ। पीएम ने संदेश दिया कि योग की कोई सीमा नहीं है, यह सभी का है और सभी के लिए है, और अशांत दुनिया में शांति का रास्ता दिखाता है।

पहले और अब के योग में बड़ा अंतर: मेरी नज़र से

मुझे आज भी याद है, जब मैं छठी से 12वीं क्लास तक स्कूल में योग करती थी और प्रतियोगिताओं में सर्टिफिकेट भी जीतती थी। तब योग मेरे लिए बस एक ‘विषय’ था – पढ़ाई-लिखाई का एक हिस्सा, जिससे मैं सक्रिय रहती थी, मेरा शरीर स्वस्थ रहता था, दिमाग तेज होता था और चेहरे पर चमक भी आती थी। मेरी मासूम सी सोच थी कि योग से बस चर्बी नहीं बढ़ती और लंबी उम्र तक जवान रहा जा सकता है।

लेकिन उस दौर में समाज में योग को लेकर आज जैसी जागरूकता नहीं थी। लोग इसे ज्यादातर ऋषि-मुनियों की साधना या कुछ खास, आध्यात्मिक लोगों का काम मानते थे। आम आदमी के लिए योग करना कई बार एक मुश्किल या बोझ जैसा लगता था।

एक दशक पहले योग के फायदे इतने खुलकर सामने नहीं आए थे, और न ही लोग इसे अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाने के लिए इतने उत्सुक थे।

योग क्रांति: एक वैश्विक आवश्यकता और नए अवसर

फिर आया ‘योग क्रांति’ का दौर। 21 जून 2015 को जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हर साल अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाने की पहल की, तब से योग के प्रति लोगों की सोच में सचमुच एक बड़ा बदलाव आया है।

आज योग सिर्फ एक व्यायाम नहीं, बल्कि एक जीवनशैली बन गया है। अब यह किसी मजबूरी की तरह नहीं, बल्कि हमारे स्वस्थ रहने के लिए एक बड़ी आवश्यकता के रूप में देखा जाता है। पहले जहाँ योग कुछ चुनिंदा लोगों तक सीमित था, आज यह एक वैश्विक आंदोलन बन चुका है।

पीएम मोदी की इस पहल का ही नतीजा है कि आज दुनिया के कोने-कोने में, पहाड़ों से लेकर समंदर तक, लोग योग का अभ्यास कर रहे हैं। पीएम मोदी ने बताया कि जब उन्होंने 2015 में इस दिवस की बात की थी, तब 175 देश उनके साथ खड़े थे। आज उन्हें खुशी है कि योग लोगों के जीवन का हिस्सा बन गया है।

अब तो दिव्यांग साथी ब्रेल में योग शास्त्र पढ़ा रहे हैं, और गाँवों में भी लोग योग ओलंपियाड में भाग ले रहे हैं। योग का महत्व कोविड महामारी के दौरान और भी स्पष्ट हुआ। लोगों ने तन-मन को स्वस्थ रखने के लिए इसमें विश्वास जताया।

लॉकडाउन के बाद, पार्कों में योग कक्षाओं की संख्या बढ़ी, और कई योग केंद्र ऑनलाइन व ऑफलाइन मोड में सामने आए। इससे न केवल लोगों को फिट रहने में मदद मिली, बल्कि योग एक करियर और रोजगार के बड़े क्षेत्र के रूप में भी उभरा है।

दीप्ति कुलश्रेष्ठ और प्रीति वर्मा जैसी योग शिक्षिकाएँ, जो वर्षों से इस क्षेत्र में हैं, बताती हैं कि पीएम मोदी के प्रयासों से योग को आज जो लोकप्रियता मिली है, वह अभूतपूर्व है। लोग अब योग को पुरानी बात नहीं मानते, बल्कि इसकी ज़रूरत महसूस कर रहे हैं। यहाँ तक कि जनसंपर्क जैसे अन्य क्षेत्रों में कार्यरत लोग भी अब योग कक्षाएँ दे रहे हैं, क्योंकि उन्हें इसमें अपार संभावनाएँ दिख रही हैं।

योग: स्वास्थ्य, पहचान और कमाई का जरिया

आज के डिजिटल युग में, सोशल मीडिया पर योग वीडियो की बाढ़ आ गई है। लोग योग करके अपनी दिनचर्या साझा कर रहे हैं, दूसरों को प्रेरित कर रहे हैं, और बहुत से लोग इसे कमाई का जरिया भी बना रहे हैं। योग अब ‘मी टू वी’ (मैं से हम तक) के भाव को समझा रहा है, जहाँ यह एक व्यक्तिगत अभ्यास से बढ़कर वैश्विक साझेदारी का माध्यम बन रहा है। भारत अपने योग विज्ञान को आधुनिक रिसर्च से जोड़कर इसका और प्रचार-प्रसार कर रहा है।

प्रधानमंत्री मोदी का आह्वान है कि हम सब मिलकर योग को एक जन आंदोलन बनाएँ। एक ऐसा आंदोलन जो दुनिया को शांति, स्वास्थ्य और समरसता की ओर ले जाए। जहाँ हर व्यक्ति योग से अपने दिन की शुरुआत करे और

जिस चेनाब ब्रिज ने बदली कश्मीरियों की जिन्दगी, जिसमें लगा भारतीयों का ₹1400 करोड़ टैक्स का पैसा: उसमें ब्रिटिश चैनल को दिखता है ‘सैन्य शिकंजा’, जाने अंग्रेजी मीडिया के इस दोगलेपन की सच्चाई

22 वर्ष की मेहनत, 1300 से ज्यादा भारतीयों के पौरुष और 28 हजार टन स्टील से भारत ने अपने मुकुट जम्मू कश्मीर में घाटी को चीरने वाली चेनाब नदी के ऊपर एक पुल बना कर तैयार कर दिया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जब इसका उद्घाटन किया तो प्रदेश के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कहा कि जो अंग्रेज ना कर सके, जो महाराजा के राज में ना हो सका, वो आपने कर दिखाया। 

पहली बार देश के दूसरे हिस्से से चली कोई रेल श्रीनगर पहुँची। इस काम में दिन रात पसीना बहाने वाले भारतीयों का ₹1400 करोड़ से अधिक टैक्स का पैसा लगा। लेकिन जब आइफिल टॉवर से भी ऊँचा यह ब्रिज तैयार हुआ, तो हर भारतीय के मन में उमंग आई। 

कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक भले ही भारतीय इस उपलब्धि से प्रसन्न हुए हों, आज भी दिमाग में औपनिवेशिक विचारधारा लेकर बैठे अंग्रेजों को इससे चिढ़ हो गई। कश्मीर के लोगों को महज कुछ घंटों में भारत के बाकी हिस्सों में ले आने वाला यह ब्रिज एक ब्रिटिश टीवी चैनल को कश्मीरियों पर पकड़ मजबूत करने का साधन दिखाई पड़ा। 

इस ब्रिटिश चैनल का नाम है टीवी 4। उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद के नशे में आज भी चूर चैनल 4 ने हाल ही में कश्मीर में बनाए जा रहे हजारों करोड़ के इन्फ्रा को लेकर एक वीडियो प्रकाशित की। लगभग 10 मिनट के वीडियो में चैनल 4 ने चेनाब पर बनाए नए ब्रिज और श्रीनगर के जाम को खत्म करने के लिए बनाई गई जा रही रिंग रोड को लेकर प्रोपेगेंडा किया। 

चैनल 4 दावा करता है कि भारतीय सेना कश्मीर के हर शहर में मौजूद है और इसकी शहर दर शहर मौजूदगी है। उसका यह भी दावा है कि कश्मीर के भीतर वर्तमान में 7.5 लाख से अधिक सैनिक मौजूद हैं। उसका यह दावा हास्यास्पद और जमीनी सच्चाई से कोसों दूर है।

कश्मीर बीते 80 साल से पाकिस्तानी हमलों और बीते 35 सालों से पाकिस्तान के पाले आतंकवाद से जूझ रहा है। इस आतंकवाद ने बीते 35 सालों में 5000 से ज्यादा भारतीय सुरक्षाबलों और 15000 से ज्यादा नागरिकों की जिंदगियां ली हैं। 

इसी आतंकवाद के चलते हजारों लाखों कश्मीरी हिंदू और सिख अपनी ही जमीन से विस्थापित हो गए। हिंदू महिलाओं का रेप, उनकी हत्याएं हुईं। इसी आतंकवाद ने कश्मीर के बच्चों के हाथ में पत्थर और एके 47 पकड़ा दिए। इसी ने कश्मीर घाटी को दशकों पीछे धकेल दिया। 

इससे निपटने को भारतीय सुरक्षाबल हर शहर क्या, हर गली में तैनात किए जाएँगे। भारत सरकार का पहला काम है अपने नागरिकों को सुरक्षित करना। चाहे वह कश्मीर में रहते हो या ईटानगर में। उन्हें सुरक्षित करने के लिए यदि सुरक्षाबलों की तैनाती करनी पड़ी, तो की ही जाएगी। 

ब्रिटिश चैनल का इस बात पर रोना एकदम गलत है। उसने यह दावा किया है कि कश्मीर के भीतर 7.5 लाख से अधिक सैनिक तैनात हैं। यह संख्या जैसे कहाँ से मिली, यह नहीं मालूम। क्योंकि भारत कभी भी तैनाती संबंधित जानकारियां सार्वजनिक नहीं करता। 

अमेरिका को अपनी सुरक्षा गिरवीं रखने वाला ब्रिटेन अब यह नहीं समझ सकता कि कश्मीर उन दो देशों से घिरा हुआ है, जो भारत से 5 बार युद्ध लड़ चुके हैं। छोटी मोटी लड़ाइयों की गिनती ही नहीं है। पाकिस्तान और चीन का सामना करने को हमेशा सुरक्षाबल तैनात करने ही पड़ेंगे। इसके लिए इंफ्रा भी बनाना ही पड़ेगा। 

भारत को सेना की तैनाती पर ज्ञान देने वाला ब्रिटेन यह भूल जाता है कि उत्तरी आयरलैंड में 1960 के दशक के बाद चालू हुई आजादी की लड़ाई को कुचलने के लिए जाने लगातार 15000 से अधिक सुरक्षाबल तैनात कर रखे थे। ब्रिटिश चैनल 4 इसी वीडियो में कश्मीर के भारत में विलय और 2019 में अनुच्छेद 370 को हटाए जाने पर भी प्रलाप करता है। 

चैनल 4 का दावा है कि अनुच्छेद 370 हटाने से कश्मीरियों को चोट पहुँची है। वह कुछ कथित विशेषज्ञों को भी वही वामपंथी भाषा बोलने के लिए बुलाता है। इसमें उनका दावा है कि इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स से कश्मीरियों को कोई फायदा नहीं होगा।

इन मूढ़ मति लोगों को क्या यह नहीं मालूम कि यदि सैन्य टुकड़ी चेनाब ब्रिज से 3 घंटे में कश्मीर पहुंचेगी तो कश्मीर का आम युवा भी तो पढ़ने और सामान्य व्यापारी अपने काम के लिए 3 घंटे में ही देश के बाकी हिस्से में पहुंचेगा। 

इस ब्रिटिश चैनल का एक दावा और भी है। इसका कहना है कि श्रीनगर के चारों तरफ बनाई जा रही रिंग रोड के आसपास जो बस्तियां बसाई जाएंगी, वो असल में बाहरियों को बसाने का एक प्लान है। भले अभी तक सरकार ने ऐसी कोई मंशा ना जताई हो और ना है ही।

यह ब्रिटिश संस्थान यह क्यों भूलता है कि कश्मीर भी भारत का ही हिस्सा है और जैसे कश्मीर के लोग भारत के बाकी हिस्सों में अधिकारपूर्वक रह सकते हैं, वैसे ही बाकी भारत से भी लोग आकर कश्मीर में रह सकते हैं। इसका दावा है कि अब तक 1 लाख लोग कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद 1 लाख लोगों को यहां का निवास प्रमाण पत्र दिया गया है।

सदैव प्रोपेगेंडा मोड में रहने वाले इस ब्रिटिश चैनल को यह नहीं पता कि जम्मू कश्मीर में बीते 70 सालों से वाल्मीकि समुदाय के हजारों लोगों को नागरिकता नहीं दी गई थी और उन्हें सिर्फ साफ सफाई के काम के लायक समझा गया था। अब इस सांवैधानिक बदलाव ने उन्हें भी दोयम दर्जे से उठा कर भारतीय नागरिक होने का सम्मान दिया है। 

ब्रिटिश चैनल का यह अंतहीन प्रोपेगेंडा कभी खत्म नहीं होने वाला। यदि मोदी सरकार जम्मू कश्मीर के भीतर इंफ्रास्ट्रक्चर ना बनाती, तो इसी ब्रिटिश चैनल का कहना होता कि देश के आर्थिक विकास के बावजूद कश्मीरियों को सुविधाओं से महरूम रखा जा रहा है।

जब भारत ने इंफ्रास्ट्रक्चर बनाया तो उसकी चिंता है कि कहीं भारतीय सेना इसका उपयोग ना कर ले। असल में यह और कुछ विदेशी मीडिया का दोगलापन है जो छठे छमासे बाहर आ ही जाता है। ब्रिटिश मीडिया ही यह कहती हो, ऐसा नहीं है।

अमेरिकी संस्थान न्यू यॉर्क टाइम्स ने भी कुछ ऐसा ही दावा कुछ दिन पहले किया था। उसने भी इंफ्रा के इस्तेमाल को लेकर रोना रोया था। दरअसल, इनकी व्यथा यह नहीं है कि कश्मीर के लोगों को क्या समस्याएं होती हैं या वहां इंफ्रा क्यों बन रहा है।

इनकी व्यथा है कि कश्मीर में भारत ने आतंकवाद से लड़ते हुए लाखों करोड़ का इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा कर दिया है। इन देशों की कश्मीर पर चौधराहट को स्वीकार करने से मना कर दिया है, यह इनकी पीड़ा का मूल है। इनकी यह पीड़ा अब कम से कम तब तक नहीं खत्म होगी, जब तक मोदी सरकार देश की सत्ता में विराजमान है।

उज्जैन में 1996 में हुई डकैती, फिर ‘डकैत’ कहलाने लगा कॉन्ग्रेस पार्षद अनवर कादरी: 19 क्रिमिनल केस पहले से दर्ज, मुस्लिम लड़कों को पैसे देकर इंदौर में करवा रहा था ‘लव जिहाद’

मुस्लिम लड़कों को पैसे देकर लव जिहाद में हिंदुओं लड़कियों को फँसाने वाले कॉन्ग्रेस पार्षद अनवर कादरी पर 19 आपराधिक मामले दर्ज है, जिनमें जानलेवा हमला, डकैती, बलवा, अवैध हथियार रखना और जमीन कब्जा करना शामिल है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, 2011 में कॉन्ग्रेस पार्षद अनवर कादरी, उसका भाई और एक अन्य आरोपित जानलेवा हमले के मामले में एक-एक साल की सजा काट चुके है। 2009 में इंदौर के आजादनगर चौराहे के पास अनवर हुसैन नामक व्यक्ति पर हमला किया था, जो एक मामले में गवाह था।

1996 में उज्जैन के महाकाल थाने में अनवर कादरी पर डकैती का केस दर्ज था। इसके बाद से ही अनवर कादरी के नाम में ‘डकैत’ शब्द जुड़ गया था, जिससे उसे ‘अनवर डकैत’ के नाम से जाना जाने लगा।

अनवर कादरी ने 28 अप्रैल 2025 को पहलगाम हमले के विरोध में पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाए थे। इसमें बड़ी संख्या में मुस्लिम महिलाएँ, पुरुष और बच्चे शामिल थे।

बीते साल 2024 में अनवर कादरी एक पत्रकार जावेद खान के घर में बंदूक लेकर घुसा और मारपीट की थी। इसके अलावा परिवार के लोगों को भी धमकाया था।

साल 2022 में अनवर कादरी ने नगर निगम चुनाव के दौरान मतदाताओं को धमकाने, फर्जी वोट डलवाने की कोशिश की थी। कादरी पर आरोप लगा था, कि उसने अधिकारियों के साथ गाली-गलौज करते हुए जान से मारने की धमकी दी थी।

पुलिस ने अनवर कादरी की गिरफ्तारी के लिए जगह-जगह छापेमारी कर रही है और उस पर 10 हजार रुपए का इनाम घोषित किया है।

अनवर कादरी: आरोपों का पुलिंदा और पुलिस की दबिश

कॉन्ग्रेस पार्षद अनवर कादरी, जिसे ‘अनवर डकैत‘ के नाम से भी जाना जाता है, ‘लव जिहाद’ के मामले में आरोपित बनने के बाद से अपने परिवार समेत फरार है। अनवर कादरी मुस्लिम लड़कों को हिंदू युवतियों को फँसाने के लिए पैसे देता था।

पुलिस उसे पकड़ने के लिए लगातार उसके संभावित ठिकानों, घर और ससुराल पर दबिश दे रही है, लेकिन अब तक वह पुलिस की गिरफ्त से बाहर है। कादरी के घर पर ताला लगा हुआ है।

मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने अनवर कादरी पर सिमी (Students Islamic Movement of India) से जुड़े होने के भी गंभीर आरोप लगाए हैं। विजयवर्गीय ने यह भी कहा कि कादरी ने कई प्लॉट और मकानों पर जबरदस्ती कब्जा किया है।

मंत्री ने दोहराया कि कादरी जैसे अपराधियों को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा और उन्हें सख्त सजा मिलेगी।

वहीं, इंदौर के महापौर पुष्यमित्र भार्गव ने बताया है कि उन्होंने संभाग आयुक्त को कादरी की पार्षदी खत्म करने के लिए पत्र लिखा है, और जल्द ही उसकी पार्षदी समाप्त कर दी जाएगी।

इसके अलावा, ‘लव जिहाद’ की फंडिंग के मामले में भी उस पर गहन जाँच चल रही है। जाँच पूरी होने के बाद उस पर और भी कड़ी कार्रवाई की जाएगी।

शहर में कई जगहों पर अनवर कादरी के खिलाफ विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। इंदौर के राजवाड़ा पर करणी सेना के कार्यकर्ताओं ने अनवर कादरी का पुतला फूँका। करणी सेना ने आरोप लगाया कि कादरी ‘लव जिहाद’ को फंडिंग करता है, उसने कई हिंदू परिवारों को धमकाया है और अवैध वसूली के मामलों में उसका नाम दर्ज है।

एवरेस्ट की चोटियाँ हों या समुंदर का विस्तार…योग की कोई सीमा नहीं: 40 देशों के 3 लाख लोगों संग PM मोदी ने मनाया ‘अंतरराष्ट्रीय योग दिवस’, कहा- गर्व होता जब दिव्यांग साथी विदेश में ये सिखाते हैं

दुनियाभर में आज 11वाँ अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाया जा रहा है। ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी विशाखापट्टनम में एक योग कार्यक्रम में भाग लिया। उन्होंने 40 देशों के करीब 3 लाख लोगों के साथ मिलकर योग किया। इसके बाद उन्होंने सभी को संबोधित करते हुए आज के दिन के महत्व पर भी चर्चा की।

उन्होंने बताया कि जब उन्होंने 2015 में 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाने की बात कही थी, उस समय उनके साथ करीब 175 देश खड़े हुए थे। आज उन्हें ये देखकर खुशी होती है कि योग लोगों के जीवन का हिस्सा बन गया है। गर्व होता है जब वो देखते हैं कि दिव्यांग साथी कैसे ब्रेल में योग शास्त्र पढ़ाते हैं। गाँव-गाँव के साथ योग ओलंपियाड में भाग लेते हैं।

पीएम ने समझाया कैसे योग की सीमा नहीं है। ओपेरा हाउस की सीढ़ियाँ हो या एवरेस्ट की चोटियाँ, समुंदर का विस्तार हो, संदेश बस एक ही जाता है कि योग सभी का है और सभी के लिए है। उन्होंने दुनिया के हालातों पर चर्चा करते हुए कहा कि आज जब चारों ओर तनाव, अशांति और अस्थिरता है तो योग ही है जो शांति का रास्ता दिखाता है

पीएम मोदी ने ‘मीट टू वी’ भाव को समझाते हुए कहा कि योग को सिर्फ पर्सनल प्रैक्टिस न बनाया जा बल्कि ग्लोबल पार्टनरशिप का माध्यम बनाया जाए। भारत इसके प्रचार-प्रसार के लिए योग के साइंस को आधुनिक रिसर्च से विस्तृत कर रहे हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आह्वान किया और बोले “आइए हम सब मिलकर योग को एक जन आंदोलन बनाएँ। एक ऐसा आंदोलन, जो विश्व को शांति, स्वास्थ्य और समरसता की ओर ले जाए। जहाँ हर व्यक्ति दिन की शुरुआत योग से करे और जीवन में संतुलन पाए। जहाँ हर समाज योग से जुड़े और तनाव से मुक्त हो। जहाँ योग मानवता को एक सूत्र में पिरोने का माध्यम बने। और जहाँ Yoga For One Earth, One Health, एक वैश्विक संकल्प बन जाए।”

बता दें कि योग का समय-समय पर प्रचार करने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अलावा राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने भी देहरादून में योग करके लोगों को इसके प्रति जागरूक किया। वहीं अन्य राज्यों में भी बड़े-बड़े नेता योग कार्यक्रमों में शामिल हुए। चेनाब रेल ब्रिज जो पिछले दिनों चर्चा में था, उसके नीचे भी लोग योग करते दिखे।

‘मंगल ग्रह’ से भी अपने नागरिकों को बचा लाएगी मोदी सरकार… ‘ऑपरेशन सिंधु’ ने फिर किया साबित: ईरान से ‘भारत माता की जय’ कहते हुए लौटे 290+ छात्र; जानें अब तक कहाँ-कहाँ चले हैं ऐसे अभियान

ईरान और इजरायल के बीच तनाव के चलते भारत का ‘ऑपरेशन सिंधु’ जारी है। शुक्रवार (20 जून 2025) देर रात 290 भारतीयों को लेकर पहला विमान दिल्ली पहुँचा। इनमें ज़्यादातर जम्मू-कश्मीर के छात्र हैं।

ईरान ने विशेष रूप से 1,000 भारतीयों की निकासी के लिए अपना हवाई क्षेत्र खोला है। शनिवार (21 जून 2025) सुबह भी एक और उड़ान से भारतीय दिल्ली पहुँचे। एयरपोर्ट पर उतरते ही यात्रियों ने ‘भारत माता की जय’ के नारे लगाए और सरकार को धन्यवाद दिया।

चिकित्सा जाँच व अन्य सुविधाएँ भी उपलब्ध कराई गईं। बाकी भारतीयों को लाने के लिए माशहद से दो और, और अश्गाबात से एक अन्य उड़ान आनी है।

इससे पहले, ऑपरेशन सिंधु के तहत 18 जून 2025 को उत्तरी ईरान से 110 भारतीय छात्रों को सफलतापूर्वक निकालकर आर्मेनिया पहुँचाया गया था, जहाँ से उन्हें विशेष विमान के माध्यम से भारत लाया गया।

ऑपरेशन सिंधु क्या है?

ऑपरेशन सिंधु’ भारत सरकार के जरिए चलाया गया एक विशेष राहत अभियान है, जिसका उद्देश्य ईरान में फँसे भारतीयों को सुरक्षित निकालना है। यह कदम तब उठाया गया है जब ईरान और इज़राइल के बीच सैन्य तनाव लगातार बढ़ रहा है और स्थानीय स्थिति अस्थिर होती जा रही है।

यह अभियान विदेशों में रहने वाले भारतीय नागरिकों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देने की भारत सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

मोदी सरकार के तहत पिछले 11 सालों में चलाए गए प्रमुख बचाव अभियान

मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से, भारत ने विदेशों में फँसे अपने नागरिकों को सुरक्षित निकालने के लिए कई बड़े और सफल अभियान चलाए हैं। यह सरकार की ‘पहले नागरिक’ की नीति का एक स्पष्ट प्रमाण है। कुछ प्रमुख अभियानों में शामिल हैं।

  • ऑपरेशन राहत (2015): यमन से 4,640 भारतीयों और 41 देशों के 960 विदेशियों को बचाया गया।
  • ऑपरेशन मैत्री (2015): नेपाल भूकंप के बाद 43,000 से अधिक भारतीयों को सुरक्षित निकाला और बड़े पैमाने पर राहत सामग्री पहुँचाई।
  • ऑपरेशन संकट मोचन (2016): दक्षिण सूडान में संघर्ष के दौरान 300 भारतीयों और कुछ नेपाली नागरिकों को बचाया गया।
  • 2019: लीबिया से CRPF टुकड़ी और 500 से ज़्यादा भारतीय निकाले गए।
  • ऑपरेशन समुद्र सेतु (2020)- कोविड-19 महामारी के दौरान भारतीय नौसेना के जरिए तीन देशों मालदीव, ईरान और श्रीलंका से 3,992 भारतीयों को वापस लाया।
  • वंदे भारत मिशन (2020)- COVID-19 महामारी में विदेशों में फँसे 67.5 लाख से अधिक भारतीय नागरिकों को वापस लाया गया।
  • ऑपरेशन देवी शक्ति (2021)- अफ़गानिस्तान से 500 से ज़्यादा भारतीय और 110 अफ़गान सिख निकाले गए।
  • ऑपरेशन गंगा (2022)- यूक्रेन से 18,282 भारतीय और 18 देशों के 147 विदेशी निकाले गए।
  • ऑपरेशन कावेरी (2023)- सूडान से 3,961 भारतीय और 136 विदेशी निकाले गए।
  • ऑपरेशन दोस्त (2023)- तुर्की और सीरिया में आए विनाशकारी भूकंप के बाद भारत ने सहायता पहुँचाई।
  • ऑपरेशन अजय (2023)- इज़रायल से 1,300 से ज़्यादा भारतीय और कई विदेशी नागरिक निकाले गए।
  • ऑपरेशन ब्रह्मा (2025)- म्यांमार में आए तीव्र भूकंप के बाद भारत ने 5 हजार से ज्यादा लोगों को सुरक्षित निकाला।

मंगल से भी लाएँगे भारतीय- सुषमा स्वराज

अगर कोई भारतीय मंगल ग्रह पर भी फँस जाए, तो उसे सुरक्षित वापस लाया जाएगा। यह कोई कोरी कल्पना नहीं, बल्कि मोदी सरकार की अपने नागरिकों को प्राथमिकता देने की नीति का प्रमाण है।

पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने अपने कार्यकाल में यह बात कहकर भारतीयों का दिल जीत लिया था। सुषमा स्वराज ने स्पष्ट किया था कि भारतीय दूतावास दुनिया के किसी भी कोने में फँसे भारतीय नागरिकों की मदद के लिए हमेशा तैयार रहेंगे, चाहे वो कितनी भी दूर क्यों न हों।

यह दर्शाता है कि मोदी सरकार हर भारतीय की सुरक्षा और कल्याण को सर्वोच्च प्राथमिकता देती है, और उन्हें किसी भी स्थिति में, दुनिया के किसी भी कोने से सुरक्षित घर लाने के लिए हर संभव प्रयास करती है।

‘जंगलराज’ के कुकर्मों का सच उजागर करने की सजा? साधु यादव ने लेखक मृत्युंजय शर्मा को भेजा 5 करोड़ का मानहानि नोटिस: शिल्पी-गौतम मर्डर का अपनी किताब में किया है जिक्र

बिहार के कुख्यात ‘जंगलराज’ को उजागर करने की कोशिश अब भारी पड़ती दिख रही है। लेखक मृत्युंजय शर्मा को लालू प्रसाद यादव के साले और पूर्व विधायक साधु यादव ने 5 करोड़ रुपये की मानहानि का नोटिस थमा दिया है। वजह? मृत्युंजय ने अपनी किताब Broken Promises और एक पॉडकास्ट में साधु यादव के कथित कुकर्मों का जिक्र किया, जिसे वो अपनी ‘प्रतिष्ठा’ पर हमला बता रहे हैं।

हालाँकि मृत्युंजय डटकर मुकाबला करने को तैयार हैं और कहते हैं, “सच बोलने की कीमत मैं चुकाने को तैयार हूँ, न डरूँगा, न माफी माँगूँगा।”

दरअसल, मृत्युंजय शर्मा ने अपनी किताब और पॉडकास्ट में साधु यादव से जुड़े तीन गंभीर आरोपों का जिक्र किया, जो बिहार के उस दौर की तस्वीर खींचते हैं, जब लालू-राबड़ी की सरकार में गुंडागर्दी और डर का बोलबाला था। साधु यादव ने इन्हीं तीन बयानों को आधार बनाकर नोटिस भेजा है-

  1. शिल्पी-गौतम डबल मर्डर केस (1999): इस हत्याकांड ने पूरे बिहार को हिलाकर रख दिया था। मृत्युंजय ने दावा किया कि इस मामले में साधु यादव की कथित संलिप्तता थी।
  2. जेएनयू छात्रों पर गोली चलाने का आदेश: मृत्युंजय का कहना है कि छात्र नेता चंद्रशेखर की हत्या के विरोध में दिल्ली में बिहार भवन के सामने प्रदर्शन कर रहे जेएनयू छात्रों पर साधु यादव ने गोली चलाने का आदेश दिया था।
  3. रोहिणी आचार्य की शादी में लूटपाट: लालू की बेटी रोहिणी आचार्य की शादी के दौरान साधु यादव और उनके लोगों ने पटना की दुकानों से गाड़ियां, गहने और फर्नीचर तक लूट लिए, ऐसा मृत्युंजय ने अपनी किताब में लिखा।

साधु यादव का दावा है कि इन बातों से उनकी ‘प्रतिष्ठा’ को ठेस पहुँची। लेकिन मृत्युंजय का तंज है, “कौन-सी प्रतिष्ठा? गुंडागर्दी और परिवारवाद की संस्कृति ने बिहार को बर्बाद किया, और अब सच बोलने वालों को डराया जा रहा है।”

बीजेपी नेता मृत्युंजय ने साफ कहा, “मैं न माफी माँगूँगा, न डरूँगा। जिन्होंने अपनी राजनीति डर, धन और दबंगई पर खड़ी की, उन्हें अब सच से डर लगना लाजमी है।” उन्होंने यह भी खुलासा किया कि साधु यादव पहले भी उन्हें फोन कर चुके हैं। मृत्युंजय ने चेतावनी दी, “मुझे या मेरे परिवार को अगर कोई नुकसान हुआ, तो इसके जिम्मेदार साधु यादव होंगे।”

ऑपइंडिया से बातचीत में मृत्युंजय ने कहा, “मैं इस नोटिस का कानूनी जवाब दूँगा। जरूरत पड़ी तो किताब और पॉडकास्ट में कही हर बात के लिए सबूत पेश कर सकता हूँ। मैंने सालों तक गहन अध्ययन के बाद ये किताब लिखी है और इसके एक-एक बात के अडिग हूँ। सच लिखना गुनाह कब से हो गया? मुझे न्यायपालिका पर पूरा भरोसा है, और मैं इस केस को पूरी ताकत और सच्चाई से लडूँगा।”

इस मामले से बिहार की सियासत में नई बहस छिड़ने की उम्मीद है। लालू यादव का राजद (RJD) पहले ही ‘जंगलराज’ के आरोपों से जूझता रहा है। साधु यादव भले ही अब राजद से अलग हो चुके हों, लेकिन उनका नाम उस दौर के विवादों से हमेशा जुड़ा रहा। साधु यादव के इस नोटिस को कई लोग सच को दबाने की कोशिश मान रहे हैं। ऐसे में मृत्युंजय शर्मा का कानूनी रूप से लड़ने का कदम उन लोगों के लिए प्रेरणा बन सकता है, जो ‘जंगलराज’ के काले अध्याय को सामने लाना चाहते हैं।

दिल्ली हाई कोर्ट ने फर्जी यूट्यूब चैनल को हटाने का दिया आदेश, गूगल से हुई कमाई की जानकारी भी माँगी: पत्रकार अंजना ओम कश्यप का फेक AI वीडियो हुआ था वायरल

सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो में टीवी एंकर अंजना ओम कश्यप को सरकार से माफी माँगते और पत्रकारिता की आलोचना करते दिखाया गया, लेकिन जाँच में सामने आया कि यह वीडियो फर्जी है और AI से छेड़छाड़ कर बनाया गया है।

इस मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने सख्त कदम उठाते हुए अंजना ओम कश्यप के नाम से चल रहे एक फर्जी यूट्यूब चैनल को हटाने का आदेश दिया है। कोर्ट ने गूगल को 48 घंटे के भीतर यह चैनल हटाने और 2 हफ्ते में चैनल चलाने वाले व्यक्ति की जानकारी देने का निर्देश  दिया है।

वायरल वीडियो में अंजना ओम कश्यप को यह कहते हुए दिखाया गया था कि पत्रकारिता अब सत्ता के साथ खड़ी हो गई है और उन्होंने अब सरकार से सवाल पूछने का फैसला किया है।

लेकिन जब इस वीडियो की जाँच की गई, तो पाया गया कि यह एक पुराना वीडियो है जिसमें वे बिहार से दिल्ली तक की अपनी यात्रा के अनुभव साझा कर रही थीं। वीडियो की लिप-सिंकिंग और आवाज में मेल नहीं होने से AI द्वारा छेड़छाड़ की पुष्टि हुई।

AI कंटेंट डिटेक्शन टूल कैंटिलक्स से पुष्टि हुई कि वीडियो को बदला गया है। साथ ही, वीडियो का असली रूप इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर पहले से मौजूद था, जिसमें कोई राजनीतिक बयान या माफी जैसी बात नहीं कही गई थी।

टीवी टुडे नेटवर्क (आजतक) ने इस फर्जी वीडियो और चैनल के खिलाफ दिल्ली हाई कोर्ट में मुकदमा दायर किया था। अदालत ने माना कि यह चैनल नकली है और अंजना ओम कश्यप की प्रतिष्ठा और पहचान का गलत इस्तेमाल कर रहा है। कोर्ट ने गूगल को चैनल से हुई कमाई की जानकारी देने का भी आदेश दिया है और भविष्य में ऐसे फर्जी पेज हटाने के लिए URL देने की प्रक्रिया को भी लागू करने को कहा है।