पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा को लेकर कलकत्ता हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी के बाद भी भाजपा कार्यकर्ताओं को निशाना बनाया जा रहा है। भारतीय जनता पार्टी ने आरोप लगाया है कि पूर्वी मेदिनीपुर के भगबानपुर में उसके कार्यकर्ताओं की बेरहमी से पिटाई की गई है। पार्टी द्वारा शेयर की गई तस्वीरों में खून से लथपथ घायलों को देखा जा सकता है। इस घटना के लिए राज्य की सत्ताधारी पार्टी तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) को जिम्मेदार ठहराया गया है।
TV9 के पत्रकार अनिंद्य ने ट्विटर पर बताया, “अब जब हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक में बंगाल हिंसा को लेकर कई याचिकाओं पर सुनवाई चल रही है, भाजपा ने दावा किया है कि हिंसा का आलम अब भी जारी है। पार्टी का आरोप है कि पूर्वी मेदिनीपुर के भगबानपुर में क्रूर तरीके से भाजपा कार्यकर्ताओं के खिलाफ हिंसा की गई है। पार्टी ने तस्वीरें भी शेयर की हैं।” हालाँकि, ये स्पष्ट नहीं है कि ये हमला क्यों किया गया।
Even as High Court to Supreme Court hearing cases pertaining to post poll #BengalViolence , the phenomenon seems to be continuing or so claims BJP. East Medinipur's Bhagabanpore has seen brutal violence today, alleges BJP.
भाजपा कार्यकर्ताओं पर हमला तब हुआ, जब वो अपने घर लौट रहे थे। इस हमले में बम और बंदूकों का इस्तेमाल किया गया। साथ ही 30 घरों में लूटपाट और उन्हें तहस-नहस करने का आरोप भी लगाया गया है। बता दें कि भगबानपुर विधानसभा क्षेत्र से इस बार के चुनाव में भाजपा ने बाजी मारी है। भाजपा के रवीन्द्रनाथ मैती ने TMC के सिटिंग विधायक अर्धेंदु मैती को मात दी। कहा जा रहा है कि इसीलिए तृणमूल के गुंडे बौखलाए हुए हैं।
ये सब तब हो रहा है, जब कलकत्ता हाईकोर्ट ने पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव बाद भड़की हिंसा के मामलों पुलिस को FIR दर्ज करने और राज्य सरकार को पीड़ितों का इलाज कराने का आदेश दिया है। कलकत्ता हाई कोर्ट ने पश्चिम बंगाल में भाजपा समेत अन्य विपक्षी पार्टियों के कार्यकर्ताओं के खिलाफ जारी हिंसा के संबंध में राज्य की ममता बनर्जी सरकार की भूमिका को भी संदिग्ध माना है और कहा है कि भले ही प्रशासन इसे स्वीकार नहीं कर रहा, लेकिन चुनाव बाद शुरू हुई हिंसा की खबरें एकदम सत्य है।
झारखंड राज्य के दुमका जिले में स्थित है बासुकीनाथ मंदिर जहाँ भगवान शिव, बासुकीनाथ के रूप में पूजे जाते हैं। यह कहा जाता है कि जब तक बासुकीनाथ के दर्शन न किए जाएँ तब तक देवघर स्थित बाबा बैजनाथ के दर्शन अधूरे ही माने जाएँगे। तो आइए आपको बताते हैं उन बासुकीनाथ के दरबार के बारे में जहाँ होती है फौजदारी मुकदमों की सुनवाई।
मंदिर का प्रचीन इतिहास :
यह माना जाता है कि वर्तमान दृश्य मंदिर की स्थापना 16वीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में हुई। हिंदुओं के कई ग्रंथों में सागर मंथन का वर्णन किया गया है, जब देवताओं और असुरों ने मिलकर सागर मंथन किया था। बासुकीनाथ मंदिर का इतिहास भी सागर मंथन से जुड़ा हुआ है। कहा जाता है कि सागर मंथन के दौरान पर्वत को मथने के लिए वासुकी नाग को माध्यम बनाया गया था। इन्हीं वासुकी नाग ने इस स्थान पर भगवान शिव की पूजा अर्चना की थी। यही कारण है कि यहाँ विराजमान भगवान शिव को बासुकीनाथ कहा जाता है।
इसके अलावा मंदिर के विषय में एक स्थानीय मान्यता भी है। कहा जाता है कि यह स्थान कभी एक हरे-भरे वन क्षेत्र से आच्छादित था जिसे दारुक वन कहा जाता था। कुछ समय के बाद यहाँ मनुष्य बस गए जो अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए दारुक वन पर निर्भर थे। ये मनुष्य कंदमूल की तलाश में वन क्षेत्र में आया करते थे। इसी क्रम में एक बार बासुकी नाम का एक व्यक्ति भी भोजन की तलाश में जंगल आया। उसने कंदमूल प्राप्त करने के लिए जमीन को खोदना शुरू किया। तभी अचानक एक स्थान से खून बहने लगा। बासुकी घबराकर वहाँ से जाने लगा तब आकाशवाणी हुई और बासुकी को यह आदेशित किया गया कि वह उस स्थान पर भगवान शिव की पूजा अर्चना प्रारंभ करे। बासुकी ने जमीन से प्रकट हुए भगवान शिव के प्रतीक शिवलिंग की पूजा अर्चना प्रारंभ कर दी, तब से यहाँ स्थित भगवान शिव बासुकीनाथ कहलाए।
बासुकीनाथ मंदिर झारखंड के कुछ अतिप्राचीन मंदिरों में से एक है। मंदिर के पास ही एक तालाब स्थित है जिसे वन गंगा या शिवगंगा भी कहा जाता है। इसका जल श्रद्धालुओं के लिए अति पवित्र माना जाता है। मुख्य मंदिर के अलावा परिसर में अन्य हिन्दू देवी-देवताओं की स्थापना भी की गई है।
बाबा बैजनाथ के बाद सर्वाधिक महत्व का बासुकीनाथ मंदिर :
देश के कोने-कोने से आने वाले शिव भक्त पहले देवघर स्थित बाबा बैजनाथ धाम पहुँचते हैं और भगवान शिव को गंगाजल अर्पित करते हैं। हालाँकि, बाबा बैजनाथ के बाद अधिकांश श्रद्धालु बासुकीनाथ ही पहुँचते हैं। मान्यता भी है कि जब तक बासुकीनाथ के दर्शन न किए जाएँ तब तक बाबा बैजनाथ की यात्रा अधूरी ही मानी जाएगी। श्रद्धालु अपने साथ गंगाजल और दूध लेकर बासुकीनाथ पहुँचते हैं और भगवान शिव का अभिषेक करते हैं।
मंदिर में स्थापित बासुकीनाथ (फोटो : पत्रिका)
हिंदुओं में यह मान्यता है कि बाबा बैजनाथ में विराजमान भगवान शिव जहाँ दीवानी मुकदमों की सुनवाई करते हैं वहीं बैजनाथ धाम से लगभग 45 किमी दूर स्थित बासुकीनाथ में विराजित भोलेनाथ श्रद्धालुओं की फौजदारी फ़रियाद सुनते हैं और उनका निराकरण करते हैं। बासुकीनाथ में भगवान शिव का स्वरूप नागेश का है। यही कारण है कि यहाँ भगवान शिव को दूध अर्पित करने वाले भक्तों को भगवान शिव का भरपूर आशीर्वाद प्राप्त होता है।
कैसे पहुँचे?
बासुकीनाथ पहुँचने के लिए निकटतम हवाईअड्डा राँची का बिरसा मुंडा एयरपोर्ट है जो मंदिर से लगभग 280-300 किमी की दूरी पर है। इसके अलावा कोलकाता का नेताजी सुभास चंद्र बोस हवाईअड्डा भी यहाँ से लगभग 320 किमी की दूरी पर है। बासुकीनाथ से सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन दुमका है जो लगभग 25 किमी है और बासुकीनाथ से जसीडीह रेलवे स्टेशन की दूरी लगभग 50 किमी है। बासुकीनाथ, दुमका-देवघर राज्य राजमार्ग पर स्थित है। झारखंड के कई शहरों से बासुकीनाथ पहुँचने के लिए बस की सुविधा उपलब्ध है। बासुकीनाथ, राँची से लगभग 294 किमी और धनबाद से लगभग 130 किमी की दूरी पर स्थित है।
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत ने शुक्रवार (2 जुलाई 2021) की देर रात राज्यपाल बेबी रानी मौर्य से मिलकर अपना इस्तीफा सौंप दिया। इस्तीफे की वजह संवैधानिक संकट बताई जा रही है। शनिवार को भाजपा विधायक दल की बैठक बुलाई गई है। इसमें नए नेता का चुनाव होने की उम्मीद है।
इससे पहले रावत शुक्रवार को दिल्ली पहुँचे थे। भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा से मुलाकात के बाद वे शाम के वक्त राजधानी देहरादून लौट आए। इसके बाद एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने अपने संक्षिप्त कार्यकाल के काम गिनाए। लेकिन इस दौरान उन्होंने इस्तीफे को लेकर कोई बात नहीं कही। एएनआई के मुताबिक देर रात राजभवन पहुँच उन्होंने इस्तीफा दे दिया।
Uttarakhand Chief Minister Tirath Singh Rawat submits his resignation to Governor Baby Rani Maurya pic.twitter.com/MaDr5C1cB4
संवैधानिक नियमों के अनुसार, किसी भी व्यक्ति के लिए मंत्री पद ग्रहण करने के छह महीने के भीतर सदन का सदस्य चुना जाना अनिवार्य है। वर्तमान में रावत राज्य के किसी भी सदन के नेता नहीं हैं। इसी को आधार बनाकर तीरथ सिंह रावत ने नड्डा को इस्तीफे की पेशकश की थी। भेजे गए पत्र में तीरथ सिंह ने कहा था, “आर्टिकल 164-ए के हिसाब से उन्हें मुख्यमंत्री बनने के बाद 6 महीने के अंदर विधानसभा का सदस्य बनना था। लेकिन, आर्टिकल 151 कहता है कि अगर विधानसभा चुनाव में एक साल से कम का समय बचता है तो वहाँ उपचुनाव नहीं कराए जा सकते हैं। उतराखंड में संवैधानिक संकट न खड़ा हो, इसलिए मैं मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा देना चाहता हूँ।”
पौड़ी से सांसद रावत इसी साल 10 मार्च को मुख्यमंत्री बने थे। रावत को अपने पद पर बने रहने के लिए 10 सितंबर तक विधानसभा चुनाव जीतना था। राज्य में विधानसभा की दो सीटें गंगोत्री और हल्द्वानी खाली हैं, जहाँ उपचुनाव होना है। कहा जा रहा था कि रावत गढ़वाल क्षेत्र में स्थित गंगोत्री सीट से उपचुनाव लड़ सकते थे। लेकिन अगले साल फरवरी-मार्च में ही विधानसभा चुनाव को देखते हुए माना जा रहा है कि निर्वाचन आयोग उपचुनाव अलग से नहीं कराएगा।
पर्यवेक्षक के रूप में मौजूद रहेंगे केंद्रीय मंत्री तोमर
नए मुख्यमंत्री पद के लिए भाजपा विधायकों की बैठक करेगी, जिसमें उनका नेता चुना जाएगा। विधानमंडल की बैठक शनिवार दोपहर 3 बजे होगी। सभी भाजपा विधायकों को सुबह 11 बजे तक देहरादून पहुँचने के निर्देश दिए गए हैं। इस दौरान केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर केंद्रीय पर्यवेक्षक के रूप में मौजूद रहेंगे। प्रदेश प्रभारी दुष्यंत कुमार गौतम व रेखा वर्मा भी मौजूद रहेंगे।
Uttarakhand: BJP legislature party meeting is scheduled to be held at 3 pm tomorrow at the party headquarters. The meeting will be held under the chairmanship of state president Madan Kaushik, says State’s media in-charge Manveer Singh Chauhan
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार तीरथ सिंह रावत की जगह लेने के लिए कई नाम चर्चा में हैं। इस सूची में सबसे पहला नाम उच्च शिक्षा मंत्री धन सिंह रावत का है। त्रिवेंद्र सिंह रावत के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफे के बाद भी धन सिंह रावत का नाम उछला था, लेकिन कुर्सी तीरथ सिंह रावत को दी गई थी। श्रीनगर सीट से विधायक धन सिंह आरएसएस कैडर हैं और उत्तराखंड बीजेपी में संगठन मंत्री भी रह चुके हैं। धन सिंह के अलावा तीरथ सरकार में मंत्री बंशीधर भगत, हरक सिंह रावत के नाम की भी चर्चा है। इसके अलावा, सतपाल महाराज का नाम भी उछल रहा है।
तीरथ सिंह का राजनीतिक सफर
तीरथ सिंह रावत भाजपा के वरिष्ठ नेता हैं। साथ ही वह जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता भी हैं। 56 वर्षीय तीरथ सिंह रावत वर्तमान में गढ़वाल से सांसद हैं। इससे पहले उन्हें साल 2007 में भाजपा उत्तराखंड इकाई का महामंत्री चुना गया। इसके बाद उन्हें प्रदेश भाजपा चुनाव अधिकारी और प्रदेश सदस्यता अभियान का प्रमुख का पदभार दिया गया। उन्हें दैवीय आपदा प्रबंधन समिति का अध्यक्ष भी चुना गया था
साल 2000 से 2002 तक वह उत्तराखंड के शिक्षा मंत्री रहे। साल 2012-2017 में चौबट्टाखाल विधानसभा क्षेत्र से विधायक थे। वह फरवरी 2013 से दिसंबर 2015 तक उत्तराखंड भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष भी रहे। 2017 में उन्हें भारतीय जनता पार्टी का राष्ट्रीय सचिव बनाया गया। उन्हें लोकसभा चुनाव 2019 में हिमाचल प्रदेश का चुनाव प्रभारी भी बनाया गया था।
कलकत्ता हाईकोर्ट ने पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव बाद भड़की हिंसा के मामलों पुलिस को एफआईआर दर्ज करने और राज्य सरकार को पीड़ितों का इलाज कराने का आदेश दिया है। इसके अलावा हाईकोर्ट के कार्यवाहक चीफ जस्टिस राजेश बिंदल की अध्यक्षता वाली पीठ ने हिंसाग्रस्त जिलों के DM और SP को भी नोटिस जारी कर जवाब माँगा है। कोर्ट ने राज्य सरकार से यह भी कहा है कि वह पीड़ितों के राशन आदि की व्यवस्था करे और भाजपा कार्यकर्ता अविजीत सरकार की दोबारा ऑटोप्सी कराई जाए।
शुक्रवार (02 जुलाई) को अपने अंतरिम आदेश में कलकत्ता हाई कोर्ट ने पश्चिम बंगाल में भाजपा समेत अन्य विपक्षी पार्टियों के कार्यकर्ताओं के खिलाफ जारी हिंसा के संबंध में राज्य की ममता बनर्जी सरकार की भूमिका को भी संदिग्ध माना है और कहा है कि भले ही प्रशासन इसे स्वीकार नहीं कर रहा, लेकिन चुनाव बाद शुरू हुई हिंसा की खबरें एकदम सत्य है।
NHRC की रिपोर्ट के आधार पर हाईकोर्ट ने अपने अंतरिम आदेश में कहा है कि राज्य में चुनाव बाद शुरू हुई हिंसा के मामलों में राज्य की भूमिका संतोषजनक नहीं रही। कोर्ट का कहना है, “हिंसा में कई लोग मारे गए, गंभीर रूप से घायल हुए। कई पीड़ितों को यौन उत्पीड़न भी झेलना पड़ा, यहाँ तक कि नाबालिग लड़कियों को भी नहीं बख्शा गया। लोगों की संपत्ति को नष्ट किया गया और कई लोगों को अपना घर छोड़कर पड़ोसी राज्यों में शरण लेने के लिए मजबूर कर दिया गया। इसके बाद भी राज्य ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया।“ कोर्ट ने यहाँ तक कहा कि कई पीड़ितों की शिकायतों को दर्ज ही नहीं किया गया, बल्कि उल्टा उन्हीं के ऊपर केस दर्ज कर लिया गया।
कलकत्ता हाई कोर्ट का आदेश
कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा है कि पुलिस ने कई मामलों में शिकायत भी नहीं दर्ज की। जहाँ शिकायत दर्ज की गई वहाँ अधिकांश आरोपितों को जमानत दे दी गई। कोर्ट ने माना है कि जब उसके द्वारा इस मामले में संज्ञान लिया गया तब जाकर पुलिस ने कुछ गंभीर अपराधों में मामला दर्ज किया।
कलकत्ता हाई कोर्ट ने NHRC की रिपोर्ट के आधार पर कहा कि यह बड़े आश्चर्य की बात है कि राज्य प्रशासन यह कहता रहा कि हिंसा की शिकायतें प्रशासन के पास आई ही नहीं। लेकिन जब NHRC और स्टेट लीगल सर्विस अथॉरिटी लोगों के पास गई तो उनके पास शिकायतों की बाढ़ सी आ गई। कोर्ट ने कहा कि लोग इतना डरे हुए हैं कि अपना नाम तक नहीं बताना चाहते हैं।
कलकत्ता हाई कोर्ट का आदेश
कोर्ट ने NHRC की कमेटी के द्वारा दर्ज किए गए प्रेक्षणों को बताते हुए अपने आदेश में कहा है कि कमेटी ने अपनी अंतरिम रिपोर्ट में बताया है कि राज्य के विभिन्न अधिकरण कमेटी के द्वारा उठाए गए सवालों का जवाब देने में पूरी तरह से असमर्थ रहे। इससे यह पता चलता है कि हिंसा के मामले में प्रकट करने से अधिक छुपाने के लिए बहुत कुछ है।
कलकत्ता हाई कोर्ट का आदेश
कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी बताया है कि जाँच के लिए गई NHRC की टीम को भी पुलिस द्वारा सुरक्षा नहीं दी जा सकी। कोर्ट ने कहा कि 29 जून को जाधवपुर इलाके में जाँच के लिए गई टीम के सदस्य आतिफ रशीद और उनकी टीम को न केवल उनका काम करने से रोका गया बल्कि उन पर कुछ गुंडों द्वारा हमला भी किया गया। कोर्ट ने माना है कि यह घटना तब हुई है जब NHRC की टीम की सुरक्षा को लेकर स्थानीय प्रशासन और पुलिस को एडवांस में नोटिस दे दिया गया था। इस मामले में कोर्ट द्वारा साउथ कोलकाता के डेप्युटी कमिश्नर ऑफ पुलिस राशिद मुनीर खान के खिलाफ कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट के आधार पर कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है।
कलकत्ता हाई कोर्ट ने फिलहाल NHRC की जाँच रिपोर्ट को यह कहते हुए सार्वजनिक करने से मना कर दिया कि यह अंतिम रिपोर्ट नहीं है। हिंसा की जाँच जारी है और NHRC की कमेटी के द्वारा पेश की गई अंतरिम रिपोर्ट अभी कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल के पास सुरक्षित रहेगी। सुनवाई हाईकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश राजेश बिंदल की अगुवाई वाली 5 सदस्यीय पीठ ने की। पीठ में जस्टिस आईपी मुखर्जी, जस्टिस हरीश टंडन, जस्टिस सौमेन सेन और जस्टिस सुब्रत तालुकदार शामिल थे।
अक्सर हिंदूफोबिक कंटेंट देकर विवादों में आने वाला द न्यूयॉर्क टाइम्स (NYT) अब जॉब रिक्रूटमेंट के दौरान भी खुलकर हिंदू घृणा दिखाने से परहेज नहीं कर रहा। इस अखबार ने 1 जुलाई 2021 को लिंक्डइन पर जॉब रिक्रूटमेंट पोस्ट की। ये जॉब दिल्ली में साउथ एशिया बिजनेस संवाददाता के लिए है। इसमें हायरिंग की शर्तें देख कर ऐसा लगता है जैसे बिना हिंदू विरोधी हुए या फिर एंटी मोदी हुए वहाँ जॉब पाना बेहद मुश्किल है।
अपने विज्ञापन के जरिए इन्होंने साफ बताया है कि अभ्यार्थी ऐसा हो जो भारत सरकार के विरुद्ध लिख सके और सत्ता बदली की उनकी कोशिशों में अपना योगदान दे सके। इस जॉब पोस्टिंग में अखबार ने ये तक लिखा है कि वैसे तो भारत जनसंख्या के मामले में चीन को टक्कर दे रहा है लेकिन फिर भी विश्व मंच पर बड़ी आवाज बनने की महत्वाकांक्षा रखे हुए है।
द न्यूयॉर्क टाइम्स की जॉब पोस्ट
इसमें आगे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में चीन के ख़िलाफ़ कार्रवाई को भारत का एक ड्रामा कहा गया है जो उनके मुताबिक सीमा और राष्ट्रीय राजधानियों के भीतर चल रहा है। जॉब पोस्ट देख कर और उसमें भारत व भारत सरकार के लिए इस्तेमाल किए गए शब्दों को देखकर लगता है जैसे अखबार को भारत से कोई समस्या हो। ये सारे शब्द बताते हैं कि न्यूयॉर्क टाइम्स का मकसद क्या है।
यहाँ इस जॉब पोस्टिंग के साथ भारत के लिए इस्तेमाल की गई भाषा को देखते हुए ये जानना जरूरी है कि चीनी सरकार का इस पर ऐसा क्या प्रभाव है। तो बता दें कि चीन सरकार का मुखपत्र अमेरिकी अखबारों को कथिततौर पर 19 मिलियन डॉलर (लगभग ₹142 करोड़) का भुगतान सिर्फ एड आदि के लिए किया है वो भी 4 वर्षों में।
एक चाइना अखबार द्वारा न्याय विभाग में दायर दस्तावेजों के अनुसार, कम्युनिस्ट पार्टी के मुखपत्र ने वॉल स्ट्रीट जर्नल (WSJ) को $6 मिलियन (₹447,367,458), वाशिंगटन पोस्ट को $4.6 मिलियन (₹342,981,717.80), फॉरेन पॉलिसी को $2,40,000 (₹17,894,698), न्यूयॉर्क टाइम्स को $50,000 (₹3,728,062) से अधिक का भुगतान किया। वहीं डेस मोइनेस रजिस्टर को $34,600 (₹2,579,819) और CQ-रोल कॉल को $76,000 (₹5,666,654) दिया गया। इसके अलावा, कम्युनिस्ट पार्टी के मुखपत्र ने भी ट्विटर पर विज्ञापन पर 2,65,822 डॉलर (₹19,820,018) खर्च किए थे।
बता दें कि इसी क्रम में साल 2018 में न्यूयॉर्क टाइम्स और वाशिंगटन पोस्ट दोनों ने एक प्रायोजित समाचार चलाया। जिसका शीर्षक “बेल्ट एंड रोड अलाइन विद अफ्रीकन नेशंस” था। इसी समाचार के साथ एक अन्य रिपोर्ट भी छपी थी, जिसमें ट्रंप प्रशासन की आलोचना की गई थी। चीन ने ऐसे समाचारों के लिए विदेशी मीडिया को अपने हित के लिए एक टूल की तरह उपयोग किया और दिखाया कि चीन पर यूएस टैरिफ बढ़ने से कैसे यूएस में घर बनाना महँगा हो जाएगा।
अब न्यूयॉर्क टाइम्स की भारत और यहाँ लोकतांत्रिक ढंग से दूसरी बार प्रधानमंत्री चुने गए नरेंद्र मोदी के प्रति घृणा कोई नई बात नहीं है। इससे पहले कई बार ऐसे प्रयास हो चुके हैं। जॉब पोस्ट में भारत की चीन के साथ तुलना और उसमें भी भारत को नीचा दिखाना पूरे प्रोपगेंडे की पोल खोलता है और बताता है कि ये विदेशी अखबार शिद्दत से घृणा फैलाना चाहता है।
द न्यूयॉर्क टाइम्स की जॉब पोस्ट
विवादित जॉब पोस्ट में ये भी कहा गया है कि भारत के पीएम मोदी देश के हिंदू बहुमत पर केंद्रित होकर आत्मनिर्भर भारत और मस्कुलर राष्ट्रवाद की वकालत करते हैं। अब देखिए ये वाक्य भी कितना अटपटा है क्या न्यूयॉर्क टाइम्स को ये दिक्कत है कि भारत आत्मनिर्भर हो रहा है या ये समस्या है कि पीएम भारत को आत्मनिर्भर बनाने में प्रयासरत हैं और वो चीन से घटते व्यापार से तिलमिलाया हुआ है।
मालूम हो कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत की उपलब्धि को न्यूयॉर्क टाइम्स हमेशा खारिज करता रहा है। भारत के महत्वाकांक्षी स्पेस कार्यक्रम के बाद NYT ने एक नस्लवादी कार्टून छाप दिया था और बाद में इसके लिए माफी भी माँगी थी।
nyt का विवादित कार्टून
अब रही बात न्यूयॉर्क टाइम्स के चीन वाले चश्मे की तो, भारत ने उन पर क्या कार्रवाई की इसका पता कुछ आँकड़ों से चलता है। साल 2020 में भारत-चीन व्यापार पर केंद्रीय वाणिज्य मंत्रालय के हालिया आँकड़ों के अनुसार, 2020 में भारत-चीन द्विपक्षीय व्यापार में 5.64% की कमी आई और व्यापार 2019 में 92.89 बिलियन डॉलर की तुलना में 2020 में 87.65 बिलियन डॉलर हो गया। वहीं चीन से भारतीय आयात में भी 10.87% की गिरावट आई और 2019 में 74.92 बिलियन डॉलर की तुलना में ये 2020 में 66.78 बिलियन डॉलर हो गया।
द न्यूयॉर्क टाइम्स की जॉब पोस्ट
इसलिए ये तो स्पष्ट है कि इन सबमें नुकसान भारत का नहीं बल्कि चीन का हुआ और ये भी स्पष्ट है कि इससे NYT नाराज है। विदेशी अखबार के ऐसे कारनामों से उसकी अपनी हालत का जरूर पता चलता है, जो सीसीपी से पैसे लेने को मजबूर हैं। NYT कहता है कि पीएम मोदी देश के हिंदुओं को सशक्त बना रहे हैं जो कि यहाँ के बहुसंस्कृतिवाद के सिद्धांतों के ख़िलाफ हैं। विदेशी अखबार का ये भी कहना है कि NYT भारत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दमन करने में लगा है जबकि इस बात के सबूत क्या हैं, वो इसे नहीं बताता। अपनी हालिया जॉब पोस्ट के विवरण में ऐसी बातों को शामिल करना स्पष्ट रूप से इंगित करता है कि NYT एक स्पष्ट वैचारिक झुकाव वाले पत्रकारों की तलाश कर रहा है और जो अपने कवरेज में हिंदू विरोध दिखाने के लिए आजाद होंगे।
मुनव्वर राणा के बेटे तबरेज पर फायरिंग की घटना नया मोड़ ले चुकी है। यूपी पुलिस बता चुकी है कि तबरेज ने खुद अपने उपर हमले की प्लानिंग की थी। इसके बाद से वह फरार है। वहीं मुनव्वर राणा के छोटे भाई शकील ने तबरेज को अय्याश बताया है। उन्होंने कहा है कि वह गलत संगत में पड़ कर बिगड़ा चुका है।
शकील ने इस मामले में मुनव्वर राणा को निर्दोष बताया है। कहा है कि उनका दोष नहीं है क्योंकि उनका दिमाग थोड़ा कम काम करता है। शकील के अनुसार जमीन और पैसे को लेकर किसी ने तबरेज को बहकाया होगा। उन्होंने दैनिक भास्कर को बताया, “तबरेज अय्याश टाइप का है। महँगी गाड़ियाँ और पैसे उड़ाना उसका शौक है। कुल मिलाकर पूरा मामला जमीन और पैसे का था।” उन्होंने यह भी बतया कि तबरेज राजनीति में कदम रखने की सोच रहा था।
वहीं मुनव्वर के भाई इस्माइल राणा ने कहा कि बेटे और बेटियों ने एक तरह से उनके भाई को कांशीराम बना दिया है। तबरेज गलत संगत में बिगड़ गया है। शहर के कुछ आवारा लोगों और प्रॉपर्टी डीलरों ने उसे बरगला दिया है। इधर एबीपी न्यूज पर भाई इस्माइल राणा को मुनव्वर राणा ने ड्राइवर का बेटा बताते हुए कहा कि वे उनके नाम का फायदा उठा रहे हैं। उनके भाई कितने बड़े गुंडे रहे हैं, यह बात सबको पता है। कोलकाता की पुलिस आज भी खोज रही है। उनके खिलाफ कई जगहों पर केस दर्ज हैं।
उल्लेखनीय है कि मुनव्वर और उनके भाइयों के बीच 8 करोड़ की कीमत वाली पुश्तैनी जमीन को लेकर विवाद चल रहा है। 28 जून को तबरेज पर रायबरेली के त्रिपुला चौराहे के पास हमने की घटना से हल्ला मच गया था। बाद में 29 जून को इस संबंध में शिकायत हुई जिसमें दावा किया गया कि हमलावरों ने तबरेज की सफेद गाड़ी पर कई राउंड फायरिंग की। हमले में वे बाल-बाल बच गए, लेकिन उनकी गाड़ी क्षतिग्रस्त हो गई थी। तबरेज राणा ने इस मामले में अपने ही परिवार के पाँच लोगों के खिलाफ थाने में तहरीर दी थी। देर रात पुलिस ने उसके चाचा समेत पाँचों आरोपितों इस्माइल राणा, राफे राणा, जमील राणा, शकील राणा (सभी चाचा) और यासर राणा (चचेरे भाई) के खिलाफ केस दर्ज किया था।
लेकिन पुलिस की छानबीन में पता चला कि तबरेज ने अपने चाचा और उनके बेटों को फँसाने के लिए खुद के ऊपर अपने दोस्तों से हमला करवाया और बाद में झूठा आरोप लगाते हुए एफआईआर करवा दी। तबरेज की तलाश में गुरुवार (जुलाई 1, 2021) देर रात लखनऊ और रायबरेली पुलिस ने मुनव्वर के घर छापेमारी की। इस मामले में अब तक 4 लोग गिरफ्तार हुए हैं। इनमें तबरेज़ की दोनों शूटर दोस्त भी हैं।
इस खुलासे के बाद भी मुनव्वर राणा पुलिस को ही दोषी दिखाने की कोशिश में हैं। उनके कहना है कि इस केस को बिकरु कांड बनाने की कोशिश चल रही है। पुलिस की छापेमारी के बाद एक वीडियो जारी कर उन्होंने कहा, “एक दिन हमारी जंगल में लाश पड़ी मिलेगी, बिकरु कांड की तरह। इसमें इतना हंगामा करने की क्या जरूरत है? अब ये मुनव्वर राना बिकरु कांड हो गया है। पुलिस ने कहा कि हम इनको जेल ले जाएँगे… उनको जेल ले जाएँगे। मैंने वारंट के बारे में पूछा तो उन्होंने मुझे हटने के लिए बोल दिया।”
नौ साल की बच्ची के साथ सामूहिक बलात्कार और हत्या के मुख्य आरोपी सयाद अली ने असम पुलिस की कस्टडी से भागने की कोशिश की। इस दौरान पुलिस की गोली लगने से वह जख्मी हो गया। घटना शुक्रवार (2 जुलाई 2021) की है। 65 साल के अली को जाँच के लिए पुलिस घटनास्थल पर लेकर जा रही थी। इसी दौरान उसने भागने की कोशिश की।
मोरीगाँव-भूरागाँव पीडब्ल्यूडी रोड के गसरगुड़ी प्वाइंट पर पुलिस अली को एक गाड़ी से दूसरे में बैठा रही थी। इसी दौरान उसने पेशाब करने का बहाना बनाकर भागने का प्रयास किया। मोरीगाँव की पुलिस अधीक्षक अपर्णा नटराजन ने बताया, “आरोपित ने पुलिस हिरासत से भागने की कोशिश की। पुलिस ने दो राउंड फायरिंग की, जिसमें वह घायल हो गया।”
सयाद अली ने पुलिस से पेशाब करने की बात कही और इसके बाद भागने की कोशिश करने लगा। उसे भागने की कोशिश करता देख पुलिसवालों ने रुकने के लिए कहा और फिर मजबूर होकर उन्हें गोली चलानी पड़ी। गोली आरोपित के घुटने में लगी, जिससे वह घायल हो गया।
विशेष पुलिस महानिदेशक जीपी सिंह ने ‘द शिलांग टाइम्स’ से बात करते हुए बताया कि जब क्राइम सीन को रीक्रिएट करने के लिए उसे ले जाया जा रहा था तो उसने पेशाब करने का बहाना बनाकर भागने की कोशिश की, जिसके बाद मोरीगाँव पुलिस को उसे भागने से रोकने के लिए फायरिंग करनी पड़ी।
आरोपित को इलाज के लिए गुवाहाटी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में भर्ती कराया गया है। उसे 27 जून को नौ वर्षीया लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार और हत्या के मामले में गिरफ्तार किया गया था। लड़की का शव 20 जून को ब्रह्मपुत्र नदी के पास एक जूट के खेत से बरामद किया गया था। बालीडुंगा गाँव के निवासियों का दावा है कि आरोपित पहले भी कई अपराधों में शामिल रहा है।
भारतीय सेना के एक जवान की चोरी के शक में पीट पीटकर हत्या कर दी गई। घटना पंजाब के गुरदासपुर स्थित एक गुरुद्वारे की है। रिपोर्टों के अनुसार पठानकोट निवासी दीपक सिंह पानी पीने गुरुद्वारे में गए थे। लेकिन गुरुद्वारे के प्रबंधक और उसके साथियों ने चोर समझ उनकी बेरहमी से पिटाई कर दी। गंभीर अवस्था में दीपक को अस्पताल में भर्ती किया गया जहाँ उनकी मौत हो गई। दीपक अरुणाचल प्रदेश में तैनात थे और 6 महीने बाद अपने घर लौट रहे थे।
घटना पंजाब के गुरुदासपुर-पठानकोट नेशनल हाइवे पर स्थित मुकेरियां चौक के गुरुद्वारा लाल सिंह कुल्ली वाले के पास की है। पठानकोट के लाहड़ी निवासी मृतक दीपक सिंह के पिता ओंकार सिंह ने बताया कि उनके तीन बेटों में से एक दीपक अरुणाचल प्रदेश में भारतीय सेना के ग्रिफ में तैनात थे। बुधवार (30 जून 2021) को दीपक छुट्टी पर अपने घर जा रहे थे। उन्होंने बताया कि दीपक अमृतसर एयरपोर्ट पर उतरने के बाद पठानकोट आने के लिए बस में बैठे, लेकिन गलती से काहनूवान चौक उतर गए।
ओंकार ने बताया कि रात के लगभग पौने एक बजे दीपक का फोन आया। ओंकार के अनुसार दीपक ने उन्हें बताया कि कुछ लोगों ने गुरुद्वारे में चोरी के शक में उन्हें घेर लिया है और मारपीट कर रहे हैं। इसके बाद ओंकार का दीपक से संपर्क टूट गया। ओंकार अपने बेटे दीपक की तलाश करते हुए गुरुदासपुर आए जहाँ उन्हें सिविल अस्पताल के डेथ हाउस से फोन आने पर दीपक की मौत की जानकारी मिली।
दरअसल गलत जगह पर उतर जाने के बाद दीपक सिंह को प्यास लगी थी, जिस कारण वह वहीं नजदीक स्थित गुरुद्वारा लाल सिंह कुल्ली वाले के पास पानी पीने के लिए चले गए। इस दौरान कुछ लोगों ने उन्हें घेर लिया और चोरी के शक में उनकी बेदम पिटाई कर दी। पुलिस ने किसी तरह दीपक को उन लोगों से छुड़ाया और अस्पताल में भर्ती कराया जहाँ दीपक की मौत हो गई।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक पुलिस ने शुरुआत में गैर-इरादतन हत्या का मामला दर्ज किया था। इससे नाराज परिजनों और ग्रामीणों ने दीपक के शव को पठानकोट-अमृतसर नेशनल हाइवे पर रखकर चक्काजाम कर दिया। इसके बाद गुरुदासपुर पुलिस ने दो व्यक्तियों के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज किया। इस मामले में गुरुद्वारे के प्रबंधक गुरजीत सिंह और उसके साथी दलबीर सिंह पहाड़ा के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है।
दूध उत्पादन के क्षेत्र में उत्तर प्रदेश अब देश में पहले स्थान पर है। दूध का कारोबार करने वाली बड़ी-बड़ी कंपनियाँ यूपी में डेयरी स्थापित करने में रुचि दिखा रही हैं। उत्तर प्रदेश की योगी सरकार के बीते चार वर्षों के प्रयासों से सूबे में दूध के कारोबार में तेजी आई है।
अमूल सहित 6 निवेशकों ने प्रदेश में अपने डेयरी प्लांट स्थापित करने के लिए 172 करोड़ रुपए निवेश किए हैं। वहीं, सात डेयरी प्लांट लगाए जाने की प्रक्रिया चल रही है, जबकि 15 निवेशकों ने अपनी यूनिट लगाने के लिए प्रस्ताव दिया है। दूध उत्पादन के क्षेत्र में बड़े निवेशकों द्वारा लगाए जा रहे उद्यमों के चलते ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को रोजगार मिला है। अब गाँव-गाँव में गाय तथा भैंस पालकर दूध का कारोबार करने वाले ग्रामीणों की संख्या लगातार बढ़ रही हैं। यूपी में दूध का कारोबार ग्रामीणों को रोजगार मुहैया करा रहा है।
यूपी का भारत के कुल दूध उत्पादन में 17 प्रतिशत से ज्यादा की हिस्सेदारी है। प्रदेश सरकार के प्रयासों से दुग्ध उत्पादन में यूपी पूरे देश में अव्वल है। वर्ष 2016-17 में यूपी में 277.697 लाख मीट्रिक टन दूध का उत्पादन हुआ था, जो 2020-21 में बढ़कर 318.630 लाख मीट्रिक टन तक पहुँच गया है। दूध उत्पादन में हुआ यह इजाफा सरकार की नीतियों का परिणाम है एवं इसमें और बढ़ोतरी के लिए सरकार लगातार प्रयास कर रही है।
दुग्ध विकास विभाग के अधिकारियों के अनुसार, राज्य में दूध उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए प्रदेश सरकार ने ग्रीनफील्ड डेयरियों की स्थापना करने की शुरुआत की है। ग्रीन फील्ड डेयरी कानपुर, लखनऊ, वाराणसी, मेरठ, बरेली, कन्नौज, गोरखपुर, फिरोजाबाद, अयोध्या और मुरादाबाद में स्थापित की जा रही हैं। इस योजना को सहयोग देने के लिए झाँसी, नोएडा, अलीगढ़ और प्रयागराज की चार पुरानी डेयरी के उन्नयन का कार्य भी किया जा रहा है।
सरकार के ऐसे प्रयासों के बीच ही देश के बड़े निवेशकों ने राज्य में अपनी डेयरी यूनिट लगाने की पहल की। देखते-ही-देखते गाजीपुर में पूर्वांचल अग्रिको, बिजनौर में श्रेष्ठा फूड, मेरठ में देसी डेयरी, गोंडा में न्यू अमित फूड, बुलंदशहर में क्रीमी फूड और लखनऊ में सीपी मिल्क फूड की डेयरी यूनिट लगाई जा रही हैं।
दूसरी तरफ, राज्य में दूध उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए प्रदेश सरकार गोवंश संरक्षण केंद्र एवं गोवंश वन्य विहार का निर्माण करा रही है। इनमें से 118 केंद्रों का निर्माण कार्य पूरा भी हो चुका है। इसके अलावा, मुख्यमंत्री निराश्रित गोवंश सहभागिता योजना के अंतर्गत 66 हजार से अधिक गोवंश को इच्छुक पशुपालकों को दिए गए हैं।
गोवंश पालन और दुग्ध उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए प्रदेश सरकार ने गोकुल पुरस्कार और नंदबाबा पुरस्कार की घोषणा की है। ये पुरस्कार उन उत्पादकों को दिए जाएँगे जो देशी गाय से सर्वाधिक दूध का उत्पादन करेंगे। ग्रामीणों को दूध के कारोबार से जोड़ने के लिए 12 लाख से अधिक पंजीकृत दुग्ध किसानों को क्रेडिट कार्ड दे चुकी है। सरकार के इन प्रयासों के चलते राज्य में दुधारू पशुओं की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि पत्रकार से यह उम्मीद नहीं की जाती कि वह किसी का जीवन खतरे में डालकर उस घटना का नाटकीकरण करे और खबर को भयावह दिखाए। हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी टीवी पत्रकार शमीम अहमद की जमानत याचिका को खारिज करते हुए की। शमीम पर बीते साल एक व्यक्ति को उत्तर प्रदेश विधानसभा भवन के सामने आत्मदाह करने के लिए उकसाने का आरोप है ताकि वह इस घटना को अपने कैमरे में कैद कर सके।
जस्टिस विकास कुँवर श्रीवास्तव ने कहा कि एक पत्रकार का काम है आसपास घटने वाली घटनाओं पर नजर बनाए रखना। उसके बारे में पूरी जानकारी बिना किसी छेड़छाड़ के लोगों तक पहुँचाना। उन्होंने यह भी कहा कि किसी पत्रकार से यह अपेक्षा नहीं रहती है कि वह घटनाओं का नाटकीकरण करेगा और किसी के जीवन को संकट में डालकर खबर बनाने का प्रयास करेगा।
जस्टिस श्रीवास्तव ने 21 जून को दिए गए अपने आदेश में यह भी कहा कि उपलब्ध सबूतों और मामले में दर्ज किए गए बयानों से प्रथम दृष्ट्या यही तथ्य सामने आता है कि आरोपित शमीम अहमद ने मृतक को यह कहते हुए उकसाया कि अगर वह यूपी विधानसभा भवन के सामने आत्महत्या का प्रयास करेगा तो उसकी बात जल्दी सुनी जाएगी।
क्या है मामला?
आत्मदाह करने वाला सुरेन्द्र चक्रवर्ती लखनऊ के उदयगंज इलाके में जावेद खान के यहाँ किराए से रहता था। जावेद अपना घर खाली कराना चाहता था। लेकिन सुरेन्द्र ने आर्थिक तंगी का हवाला देकर घर खाली करने में असमर्थता जताई। इसके बाद 19 अक्टूबर 2020 को मकान मालिक ने कथित तौर पर उससे गाली-गलौच की। इसी दौरान आरोपित पत्रकार शमीम अहमद ने सुरेंद्र को खुद को आग लगाने और घटना को कवर करने का वादा किया।
उसने सुरेंद्र से कहा कि यदि वह ऐसा करेगा तो मामला सबके सामने आ जाएगा और उस घर से निकलने के लिए जावेद मजबूर नहीं कर पाएगा। कथित तौर पर इसी झाँसे में आ सुरेंद्र ने खुद को आग लगा ली और 24 अक्टूबर 2020 को अस्पताल में उसकी मौत हो गई। मामले में जावेद खान को भी आरोपित बनाया गया था।