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यूपी में डेयरी कारोबार ने बहाई रोजगार की धारा, ग्रामीण इलाकों में गाय-भैंस पशुपालकों की संख्या भी बढ़ी

दूध उत्पादन के क्षेत्र में उत्तर प्रदेश अब देश में पहले स्थान पर है। दूध का कारोबार करने वाली बड़ी-बड़ी कंपनियाँ यूपी में डेयरी स्थापित करने में रुचि दिखा रही हैं। उत्तर प्रदेश की योगी सरकार के बीते चार वर्षों के प्रयासों से सूबे में दूध के कारोबार में तेजी आई है। 

अमूल सहित 6 निवेशकों ने प्रदेश में अपने डेयरी प्लांट स्थापित करने के लिए 172 करोड़ रुपए निवेश किए हैं। वहीं, सात डेयरी प्लांट लगाए जाने की प्रक्रिया चल रही है, जबकि 15 निवेशकों ने अपनी यूनिट लगाने के लिए प्रस्ताव दिया है। दूध उत्पादन के क्षेत्र में बड़े निवेशकों द्वारा लगाए जा रहे उद्यमों के चलते ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को रोजगार मिला है। अब गाँव-गाँव में गाय तथा भैंस पालकर दूध का कारोबार करने वाले ग्रामीणों की संख्या लगातार बढ़ रही हैं। यूपी में दूध का कारोबार ग्रामीणों को रोजगार मुहैया करा रहा है।

यूपी का भारत के कुल दूध उत्पादन में 17 प्रतिशत से ज्यादा की हिस्सेदारी है। प्रदेश सरकार के प्रयासों से दुग्ध उत्पादन में यूपी पूरे देश में अव्वल है। वर्ष 2016-17 में यूपी में 277.697 लाख मीट्रिक टन दूध का उत्पादन हुआ था, जो 2020-21 में बढ़कर 318.630 लाख मीट्रिक टन तक पहुँच गया है। दूध उत्पादन में हुआ यह इजाफा सरकार की नीतियों का परिणाम है एवं इसमें और बढ़ोतरी के लिए सरकार लगातार प्रयास कर रही है।

दुग्ध विकास विभाग के अधिकारियों के अनुसार, राज्य में दूध उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए प्रदेश सरकार ने ग्रीनफील्ड डेयरियों की स्थापना करने की शुरुआत की है। ग्रीन फील्ड डेयरी कानपुर, लखनऊ, वाराणसी, मेरठ, बरेली, कन्नौज, गोरखपुर, फिरोजाबाद, अयोध्या और मुरादाबाद में स्थापित की जा रही हैं। इस योजना को सहयोग देने के लिए झाँसी, नोएडा, अलीगढ़ और प्रयागराज की चार पुरानी डेयरी के उन्नयन का कार्य भी किया जा रहा है। 

सरकार के ऐसे प्रयासों के बीच ही देश के बड़े निवेशकों ने राज्य में अपनी डेयरी यूनिट लगाने की पहल की। देखते-ही-देखते गाजीपुर में पूर्वांचल अग्रिको, बिजनौर में श्रेष्ठा फूड, मेरठ में देसी डेयरी, गोंडा में न्यू अमित फूड, बुलंदशहर में क्रीमी फूड और लखनऊ में सीपी मिल्क फूड की डेयरी यूनिट लगाई जा रही हैं।

दूसरी तरफ, राज्य में दूध उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए प्रदेश सरकार गोवंश संरक्षण केंद्र एवं गोवंश वन्य विहार का निर्माण करा रही है। इनमें से 118 केंद्रों का निर्माण कार्य पूरा भी हो चुका है। इसके अलावा, मुख्यमंत्री निराश्रित गोवंश सहभागिता योजना के अंतर्गत 66 हजार से अधिक गोवंश को इच्छुक पशुपालकों को दिए गए हैं।

गोवंश पालन और दुग्ध उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए प्रदेश सरकार ने गोकुल पुरस्कार और नंदबाबा पुरस्कार की घोषणा की है। ये पुरस्कार उन उत्पादकों को दिए जाएँगे जो देशी गाय से सर्वाधिक दूध का उत्पादन करेंगे। ग्रामीणों को दूध के कारोबार से जोड़ने के लिए 12 लाख से अधिक पंजीकृत दुग्ध किसानों को क्रेडिट कार्ड दे चुकी है। सरकार के इन प्रयासों के चलते राज्य में दुधारू पशुओं की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है।

हाईकोर्ट ने शमीम अहमद को पढ़ाया पत्रकारिता का पाठ, UP विधानसभा के सामने सुरेंद्र को आत्मदाह के लिए उकसाने का मामला

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि पत्रकार से यह उम्मीद नहीं की जाती कि वह किसी का जीवन खतरे में डालकर उस घटना का नाटकीकरण करे और खबर को भयावह दिखाए। हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी टीवी पत्रकार शमीम अहमद की जमानत याचिका को खारिज करते हुए की। शमीम पर बीते साल एक व्यक्ति को उत्तर प्रदेश विधानसभा भवन के सामने आत्मदाह करने के लिए उकसाने का आरोप है ताकि वह इस घटना को अपने कैमरे में कैद कर सके।

जस्टिस विकास कुँवर श्रीवास्तव ने कहा कि एक पत्रकार का काम है आसपास घटने वाली घटनाओं पर नजर बनाए रखना। उसके बारे में पूरी जानकारी बिना किसी छेड़छाड़ के लोगों तक पहुँचाना। उन्होंने यह भी कहा कि किसी पत्रकार से यह अपेक्षा नहीं रहती है कि वह घटनाओं का नाटकीकरण करेगा और किसी के जीवन को संकट में डालकर खबर बनाने का प्रयास करेगा।

जस्टिस श्रीवास्तव ने 21 जून को दिए गए अपने आदेश में यह भी कहा कि उपलब्ध सबूतों और मामले में दर्ज किए गए बयानों से प्रथम दृष्ट्या यही तथ्य सामने आता है कि आरोपित शमीम अहमद ने मृतक को यह कहते हुए उकसाया कि अगर वह यूपी विधानसभा भवन के सामने आत्महत्या का प्रयास करेगा तो उसकी बात जल्दी सुनी जाएगी।

क्या है मामला?

आत्मदाह करने वाला सुरेन्द्र चक्रवर्ती लखनऊ के उदयगंज इलाके में जावेद खान के यहाँ किराए से रहता था। जावेद अपना घर खाली कराना चाहता था। लेकिन सुरेन्द्र ने आर्थिक तंगी का हवाला देकर घर खाली करने में असमर्थता जताई। इसके बाद 19 अक्टूबर 2020 को मकान मालिक ने कथित तौर पर उससे गाली-गलौच की। इसी दौरान आरोपित पत्रकार शमीम अहमद ने सुरेंद्र को खुद को आग लगाने और घटना को कवर करने का वादा किया।

उसने सुरेंद्र से कहा कि यदि वह ऐसा करेगा तो मामला सबके सामने आ जाएगा और उस घर से निकलने के लिए जावेद मजबूर नहीं कर पाएगा। कथित तौर पर इसी झाँसे में आ सुरेंद्र ने खुद को आग लगा ली और 24 अक्टूबर 2020 को अस्पताल में उसकी मौत हो गई। मामले में जावेद खान को भी आरोपित बनाया गया था।

भारत ने किसी एक तिमाही में निर्यात का बनाया नया रिकॉर्ड: वर्तमान वित्त वर्ष की जून तिमाही में $95 बिलियन का हुआ एक्सपोर्ट

केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि यह बताते हुए खुशी हो रही है कि देश की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है, साथ ही एक्सपोर्ट में भी बढ़ोतरी हो रही है। उन्होंने कहा कि कोरोना वायरस का प्रभाव कम हो रहा है। वित्त वर्ष 2021-22 की पहली तिमाही यानी पहले तीन महीने- अप्रैल, मई और जून में भारत ने एक्सपोर्ट में इतिहास की सबसे बड़ी उपलब्धि हासिल किया है।

उन्होंने कहा कि कोरोना की दूसरी लहर के बावजूद भारत ने 95 बिलियन अमेरिकी डॉलर यानी लगभग 7.08 लाख करोड़ का एक्सपोर्ट किया है। वाणिज्य मंत्रालय की प्रेस कॉन्फ्रेंस में नागरिक उड्डयन मंत्री हरदीप सिंह पुरी भी मौजूद रहे।

वित्त वर्ष 2018-19 के अप्रैल-जून के दौरान व्यापारिक निर्यात 82 अरब डॉलर था। वहीं, 2020-21 की जून तिमाही में निर्यात 51 अरब डॉलर था, जबकि इसी वित्त वर्ष की अंतिम तिमाही में निर्यात 90 अरब डॉलर रहा। पिछले महीने देश का निर्यात 47 प्रतिशत उछलकर 32 अरब डॉलर रहा था।

गोयल ने कहा, “अप्रैल-जून की अवधि के दौरान निर्यात भारत के इतिहास में हुआ एक तिमाही में अब तक का सबसे अधिक व्यापारिक निर्यात है।” उन्होंने कहा कि मंत्रालय चालू वित्त वर्ष में 400 अरब डॉलर का निर्यात लक्ष्य हासिल करने के लिए सभी संबद्ध पक्षों के साथ मिलकर काम करेगा।

उल्लेखनीय है कि महामारी के बावजूद 2020-21 में देश में 81.72 अरब अमेरिकी डॉलर का एफडीआई प्रवाह रहा, जो अब तक का सबसे अधिक है। अप्रैल 2021 में एफडीआई प्रवाह 6.24 अरब डॉलर रहा, जो अप्रैल 2020 की तुलना में 38 फीसदी अधिक है। आगे उन्होंने कहा कि उद्योग और आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग (DPIIT) द्वारा 623 जिलों में मान्यता प्राप्त स्टार्टअप्स की संख्या 50,000 हो गई है। 

महत्वपूर्ण बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं की समीक्षा 

मालूम हो कि पीयूष गोयल ने करीब 2.7 लाख करोड़ रुपए के अनुमानित निवेश वाली 20 महत्वपूर्ण बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं की समीक्षा की। वहीं, मंत्री ने परियोजनाओं को समय पर चालू करने के लिए लंबित मुद्दों का जल्द समाधान करने के निर्देश दिए और समयसीमा तय की। बयान के मुताबिक, जिन परियोजनाओं की समीक्षा की गई उनमें पूर्वी और पश्चिमी मार्गों पर समर्पित फ्रेट गलियारे और अमृतसर कोलकाता औद्योगिक गलियारा (एकेआईसी) शामिल हैं।

‘आपत्तियों पर खुले मन से विचार को सरकार तैयार’: केंद्रीय कृषि मंत्री ने कृषि कानूनों पर पवार की सोच से जताई सहमति

केंद्र सरकार के तीन कृषि कानूनों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे किसानों को लेकर राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी (एनसीपी) चीफ शरद पवार का बयान का केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने स्वागत किया है। तोमर ने कहा कि केंद्र सरकार पवार की सोच से सहमत है और इस दिशा में केंद्र ने 11 बार किसान यूनियनों के साथ बातचीत की है। केंद्र सरकार की मंशा है कि बातचीत के जरिए ही इस समस्या का समाधान निकले।

केंद्रीय कृषि मंत्री ने कहा, “हम चाहते हैं कि किसान आंदोलन जल्दी से जल्दी समाप्त हो। जिन बिंदुओं पर आपत्ति है, उन बिंदुओं पर खुले मन से विचार करने के लिए तैयार हैं।” उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में यह सरकार किसानों का विकास करने के लिए प्रतिबद्ध है और उनके लाभ को बढ़ाने के लिए बीते सात सालों में कई उपाय किए गए हैं।

उन्होंने आगे कहा, “किसानों को लाभान्वित करने के लिए हमने कई योजनाएँ शुरू की हैं। 2006 में यूपीए के कार्यकाल के दौरान सरकार को सौंपी गई स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के आधार पर कृषि कानूनों में बदलाव किए गए हैं, जबकि कॉन्ग्रेस सरकार इस रिपोर्ट को ही दबाकर बैठ गई थी।”

तोमर ने नए कृषि कानून को किसानों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने वाला बताया। उन्होंने कहा कि शरद पवार कहते हैं कि पूरा कृषि बिल वापस नहीं होना चाहिए, बल्कि जिन मुद्दों पर समस्या है उनमें संशोधन करना चाहिए। मोदी सरकार भी लगातार यही कर रही है। बता दें कि पवार ने 1 जुलाई को मुंबई में एक निजी विश्वविद्यालय के कार्यक्रम में कहा था, “पूरे बिल को खारिज करने के बजाय हम उस हिस्से में संशोधन की माँग कर सकते हैं, जिस पर किसानों को आपत्ति है।”

गौरतलब है कि पंजाब और हरियाणा के किसान पिछले एक साल से केंद्र सरकार द्वारा लाए गए तीन कृषि कानूनों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं। इस मामले में सरकार और किसान संगठनों के बीच कई दौर की बातचीत भी हो चुकी है। हालाँकि, उसका कोई नतीजा नहीं निकला है।

ग्राम प्रधानी चुनाव का झगड़ा मेरठ-बागपत हाइवे पर: सड़क पर चूने की लकीर खींची, फिर इमरान और जमालुद्दीन गुट के बीच जंग

उत्तर प्रदेश के मेरठ-बागपत हाइवे पर दो पक्षों का आपसी मामला उस समय बवाल में तब्दील हो गया, जब दोनों पक्ष के लोग चूने की एक लाइन खींचकर एक-दूसरे पर पथराव करने लगे। पूरी घटना में एक युवती समेत 12 लोग घायल हुए हैं, जबकि उपद्रव के चलते हाइवे 1 घंटे तक बंद रहा।

टाइम्स नाऊ द्वारा जारी वीडियो में आप देख सकते हैं कि सड़क पर चूने की एक लकीर खींची गई है और लोग बिल्डिंग पर खड़े होकर व सड़कों पर निकलकर एक-दूसरे पर पत्थरबाजी कर रहे हैं। सड़कों पर जगह-जगह पत्थर बिखरे देखे जा सकते हैं। वहीं, लोगों के हाथों में लाठियाँ भी साफ दिख रही हैं।

दैनिक जागरण की रिपोर्ट के अनुसार, ये मामला ग्राम प्रधानी के चुनाव में डौला निवासी इमरान नामक प्रत्याशी को मिली हार से जुड़ा हुआ है। चुनावों में हारने के बाद इरफान का अपने ही गाँव के जमालुद्दीन के परिवार से विवाद चल रहा है। दो दिन पूर्व दोनों पक्षों में झगड़ा हो गया था। इसमें इरफान पक्ष का युवक फारुख घायल हो गया था। 

इसी को लेकर शुक्रवार (2 जुलाई 2021) को इरफान के मकान पर पंचायत हो रही थी, लेकिन मामला सुलझने की बजाय दोनों पक्षों में कहासुनी हो गई। देखते-ही-देखते पूरा मामला झगड़े में बदल गया। दोनों पक्षों के बीच पथराव, लाठी-डंडे व धारदार हथियार चले और फायरिंग हुई। स्थिति देख भगदड़ मच गई। पथराव के दौरान हाइवे के दोनों ओर वाहनों की लाइन लग गई।

ये सारी लड़ाई सड़क पर चूने की लाइन खींचकर लड़ी गई। पहले दोनों पक्षों ने एक-दूसरे को चुनौती दी कि अगर दम हो तो वे लाइन पार कर दिखाए। इसके बाद सब लोग अपना जोर दिखाने के लिए लाइन पार करके हमला करने लगे। मौके पर पहुँच पुलिस ने बड़ी मशक्कत के बाद हालात पर काबू पाया। जाँच में सड़क से एक कारतूस का खोखा बरामद हुआ है।

घटना में इरफान, उसका बेटा फिरोज, बेटी अफरोजी और सोनी के अलावा सोनू, रहीसुद्दीन व दूसरे पक्ष से जमालुद्दीन व अन्य लोग घायल हुए हैं। घायलों का इलाज चल रहा है। वहीं, इस दौरान वाहनों के क्षतिग्रस्त होने की भी सूचना है। सर्कल ऑफिसर अनुज मिश्रा ने झगड़े की पुष्टि करते हुए मामले में जाँच के बाद कार्रवाई करने को कहा है।

देहरादून के वेल्हम स्कूल पर FIR, हिंदू बच्चों को हलाल खाने के लिए मजबूर करने का था आरोप

देहरादून के एक लोकल अखबार में प्रकाशित वेल्हम बॉयज स्कूल के टेंडर नोटिस को लेकर बजरंग दल ने 1 जुलाई 2021 को FIR दर्ज करवाई। बता दें कि इस नोटिस में स्कूल ने हलाल मीट और अन्य प्रोडक्ट्स के लिए सप्लॉयर्स को आमंत्रित किया था। 

बजरंग दल (देहरादून) के संयोजक विकास वर्मा ने ऑपइंडिया से बात करते हुए कहा, “आज सत्य की जीत हुई है। हम लड़ाई को तब तक जारी रखेंगे जब तक हम हलाल के नाम पर हो रहे अत्याचार का अंत नहीं कर देते।” पुलिस ने भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 505-2 (वर्गों के बीच शत्रुता, घृणा या दुर्भावना पैदा करने या बढ़ावा देने वाले बयान) के तहत मामला दर्ज किया है।

FIR का स्क्रीनशॉट

प्रमुख बोर्डिंग संस्थान द्वारा 26 जून को हलाल माँस और पोल्ट्री उत्पादों के लिए निविदा जारी करने के बाद बजरंग दल के देहरादून चैप्टर से जुड़े कार्यकर्ताओं ने वेल्हम बॉयज स्कूल के परिसर के बाहर विरोध प्रदर्शन किया था। संगठन ने डालनवाला पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री को भी लिखा था। संगठन ने शिकायत में कहा कि स्कूल में हर समुदाय के छात्र हैं।

संगठन का कहना है कि हलाल मीट का टेंडर हिंदू छात्रों और समुदाय का अपमान है। यदि प्रशासन और पुलिस स्कूल के खिलाफ कोई कार्रवाई करने में विफल रहते हैं, तो वे मामले को सड़कों पर ले जाएँगे और शहर भर में विरोध का आह्वान करेंगे।

इससे पहले बजरंग दल के नगर संयोजक विकास वर्मा ने ऑपइंडिया ने कहा था, “स्कूल में अधिकांश छात्र हिंदू समुदाय के हैं। हम यह नहीं समझ पा रहे हैं कि स्कूल इस्लामी तरीके से काटे गए माँस को हिंदू बच्चों पर क्यों थोपना चाहता है।” उनका कहना था कि स्कूल ने बताया कि वे हलाल और झटका दोनों मीट देते हैं। लेकिन जब इसके प्रमाण माँगे गए तो स्कूल कोई दस्तावेज नहीं दिखा पाया।

वहीं स्कूल के वाइस प्रिंसिपल महेश कांडपाल ने News18 को बताया था कि हलाल के लिए टेंडर पहले ही मँगाए जा चुके हैं, लेकिन झटका के लिए शनिवार को टेंडर निकाला जाएगा। वहीं जागरण से बात करते हुए स्कूल के प्राचार्य ने बताया कि सप्ताह में तीन दिन क्रमश: हलाल और झटका मीट परोसा जाता है। उन्होंने यह भी कहा कि हलाल और झटका माँस के लिए उनके पास अलग-अलग आपूर्तिकर्ता हैं।

एक और जुलाई आई, राहुल गाँधी की ‘मेधा’ आई? जमीं जुम्बद, फलक ज़ुम्बद-न ज़ुम्बद, गुल मोहम्मद!

राहुल गाँधी का राजनीतिक आचरण राहुल गाँधी की तरह ही हो गया है, पूरी तरह से अनियत। जैसे बड़े से बड़ा राजनीतिक पंडित या विश्लेषक यह नहीं बता पाता कि राहुल जी कब और क्यों कौन देश चले जाएँगे, वैसे ही राहुल जी यह नहीं बता सकते कि उनका बयान कौन दिशा में चल देगा। परंपरागत मीडिया को दिए गए बयान हों या फिर सोशल मीडिया पर पोस्ट किए गए, उन्हें देखकर लगता है जैसे कोई टीनेजर मन ही मन ‘समय बिताने के लिए करना है कुछ काम’ सोचते हुए कुछ भी बोल या लिख दे। या फिर ‘कुछ भी कह दो’ जैसे राजनीतिक दर्शन के सहारे कुछ भी कह दे। 

पता नहीं राहुल गाँधी अपने ये बयान किसी सोची समझी-रणनीति के तहत देते हैं या फिर ट्रायल एंड एरर जैसी किसी थ्योरी का सहारा लेते हुए, पर इन्हें देखते हुए ऐसा अवश्य प्रतीत होता है जैसे वे खुद अपने बयानों को गंभीरता से नहीं लेते। जैसे उनके लिए जितना ही प्रधानमंत्री बनना आवश्यक है, उतना ही बयान देना भी आवश्यक है। यह शोध का विषय होगा कि कोई राजनेता इस दशा में कब और कैसे पहुँचता है। शोध का निष्कर्ष चाहे जो निकले पर राजनीतिक सूझबूझ की दृष्टि से यह दशा दयनीय है। उस राजनेता के लिए तो और भी जो एक सौ पैंतीस करोड़ नागरिकों के राष्ट्र को नेतृत्व देने की मंशा रखता है। 

अब पता नहीं बैठे-बैठे या खड़े-खड़े, राहुल गाँधी ने ट्वीट करते हुए पूछा है, “जुलाई आ गया है, वैक्सीन नहीं आई।”

यह कैसा प्रश्न हुआ? प्रश्न का आधार क्या है? आखिर यह किसी तथ्य पर आधारित है या फिर जैसा मैंने पहले कहा कि; समय बिताने के लिए करना है कुछ काम नामक दर्शन के तहत बस कर दिया गया है। जैसे दीये जलते हैं, फूल खिलते हैं वैसे ही प्रश्न उठते हैं। कोई इस बात से असहमत न होगा कि प्रश्न पूछना विपक्ष की राजनीति का आधार होता है, पर क्या ऐसे प्रश्न करने से यह आधार कमज़ोर नहीं होता? विपक्ष के इस दर्शन में तथ्यहीन प्रश्न आवश्यक क्यों हैं? यह समझना कितना कठिन है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में विपक्ष आवश्यक है, विरोध नहीं। हर बात पर विरोध किए बिना भी विपक्ष की भूमिका न केवल निभाई जा सकती है पर उसे प्रासंगिक भी रखा जा सकता है।  

यदि व्यवहारिकता की दृष्टि से देखें तो इस एक प्रश्न के उत्तर में आधा दर्जन प्रश्न खड़े हो सकते हैं। जैसे क्या राहुल गाँधी को यह नहीं पता है कि भारत में टीकाकरण कब से चल रहा है? क्या उन्हें यह पता नहीं कि टीके के कितने डोज़ किस दिन दिए गए? क्या उन्हें यह पता नहीं कि केंद्र सरकार या राज्य सरकारें इस तथ्य की जानकारी रोज देती हैं? क्या उन्हें किसी ने बताया नहीं कि अब तक देश में टीके के करीब 34 करोड़ डोज दिए जा चुके हैं? क्या उन्हें पता नहीं कि टीके के डोज की संख्या के मामले में भारत इस समय विश्व का अग्रणी देश है?  

जो जानकारियाँ सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध हैं, वे राहुल गाँधी को उपलब्ध क्यों नहीं? उन्हें उपलब्ध नहीं हैं, क्या यह संभव है? यदि यह संभव नहीं है तो फिर ऐसे प्रश्न करने के पीछे मंशा क्या है? कुछ लोग कहते हैं कि; उनके ऐसे बयान हिटलर के शासन के उस सिद्धांत पर आधारित हैं जिसके अनुसार किसी झूठ को बार-बार बोलकर उसे सच बनाया जा सकता है। क्या ऐसा संभव है? वैसे इस रणनीति के ऐसे कोई ठोस परिणाम नहीं आए हैं जिसकी वजह से राहुल गाँधी या कॉन्ग्रेस पार्टी इस रणनीति को बार-बार राजनीतिक उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए लगाए। 

ऐसा नहीं है कि उनके किसी बयान पर पहली बार चर्चा हो रही है। ऐसा भी नहीं है कि आगे कभी और न होगी, पर प्रश्न यह है कि एक राष्ट्रीय स्तर के नेता के लिए अपने बयानों पर चर्चा करवा लेना ही क्या राजनीतिक सत्ता की कुँजी है? यह ऐसा प्रश्न है जिस पर राहुल गाँधी विचार करें या न करें, उनकी पार्टी को अवश्य विचार करना चाहिए। वे भले ही न सोचें पर उनकी पार्टी को यह सोचने की आवश्यकता है कि क्या केवल अनियत और ऐसे बयान जिनका तथ्यों से दूर-दूर तक नाता नहीं है, वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि खराब करने के लिए पर्याप्त हैं?

यदि यह रणनीति कारगर होती तो फिर पिछले बीस वर्षों में कभी तो सफल होती हुई दिखती क्योंकि नरेंद्र मोदी के विरुद्ध आरोप और बयानों का सिलसिला बहुत पुराना है और समय-समय पर अलग-अलग नेताओं द्वारा ऐसे प्रयास पहले भी किए जा चुके हैं। राहुल गाँधी जो पिछले सात वर्षों से कर रहे हैं वह कोई नई बात नहीं है। अंतर केवल इतना है कि पहले लगाए जाने वाले आरोपों और दिए जाने वाले बयानों की तुलना में राहुल गाँधी के बयान बहुत अधिक बचकाने लगते हैं। 

यह स्थिति राहुल गाँधी के लिए अच्छी नहीं है। ऐसा करके वे अदालतों तक में फँस चुके हैं और माफ़ी भी माँग चुके हैं पर पता नहीं किस मुगालते में लगातार ऐसा करते जा रहे हैं। सोशल मीडिया पर ऐसे बयान उनके राजनीतिक भविष्य के लिए रोड़ा ही हैं, खासकर इसलिए क्योंकि सोशल मीडिया पर ऐसे एक बयान के जवाब में तथ्य लिए हुए एक लाख उत्तर आते हैं जो निश्चित तौर पर गाँधी ब्वाय की रणनीति के लिए सही नहीं हैं। उन्हें समझने की आवश्यकता है कि भारत अब 1980 के दशक से बहुत आगे आ चुका है और प्रश्न, उत्तर या विमर्श केवल झूठ पर आधारित नहीं हो सकते। वे समझेंगे या नहीं यह कहना मुश्किल है क्योंकि अभी तक यही संदेश मिला है कि;

जमीं जुम्बद, फलक ज़ुम्बद,
न ज़ुम्बद, गुल मोहम्मद!
  

‘मुसलमानों को अहसास होना चाहिए कि कर्नाटक में कॉन्ग्रेस की वजह से भाजपा सत्ता में आई’: एचडी कुमारस्वामी

कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी ने एक बार फिर से कॉन्ग्रेस पर सवाल खड़े किए हैं। कभी कॉन्ग्रेस के समर्थन से मुख्यमंत्री बनने वाले कुमारस्वामी ने दावा किया कि देश की सबसे पुरानी पार्टी दोबारा सत्ता में कभी नहीं आएगी और भविष्य क्षेत्रीय पार्टियों का है। 

दरअसल, पार्टी कार्यालय जेपी भवन में उत्तरी कर्नाटक स्थित हनागल के स्थानीय नेता कादर शेख के नेतृत्व में राजनीतिक कार्यकर्ताओं के जद (एस) में शामिल होने के अवसर पर स्वागत कार्यक्रम आयोजित किया गया था। इस स्वागत समारोह में एचडी कुमारस्वामी भी उपस्थित हुए थे। इस दौरान उन्होंने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि मुसलमानों को ‘अहसास होना चाहिए’ कि राज्य की सत्ता में भाजपा, कॉन्ग्रेस की वजह से आई। इतना ही नहीं, उन्होंने यह भी कहा कि इस समय कर्नाटक में भाजपा की सरकार कॉन्ग्रेस की वजह से ही है। यहाँ पर अगर भाजपा सत्ता में आई है तो यह जद(एस) की वजह की वजह से नहीं, बल्कि कॉन्ग्रेस की वजह से आई है। यह बात मुस्लिम भाइयों को अच्छे से समझ लेनी चाहिए।

जद(एस) नेता ने आगे कहा, ‘‘कॉन्ग्रेस में अकेले सत्ता में आने की ताकत नहीं है। हमारे मुसलमान भाइयों को यह तथ्य समझने की जरूरत है, नहीं तो आपको झटके लगने जारी रहेंगे।’’ उन्होंने दावा किया कि वर्ष 2013 में कॉन्ग्रेस को बहुमत भाजपा के तीन टुकडे़- एक भाजपा और अन्य दो समूह मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा और मंत्री बी श्रीरामुलु- में बँटने की वजह से मिला। 

कुमारस्वामी ने कॉन्ग्रेस पर तंज कसते हुए कहा कि कहा कि यह हास्यास्पद है कि कॉन्ग्रेस के भीतर अगले चुनाव में जीत मिलने पर कौन मुख्यमंत्री बनेगा, इसको लेकर संघर्ष चल रहा है। उन्होंने कहा, ‘‘कॉन्ग्रेस में आंतरिक लड़ाई चल रही है कि अगला मुख्यमंत्री कौन होगा जबकि चुनाव होने में अभी दो साल का समय है। वे सत्ता में आने को लेकर उतावले हैं और दो साल का भी इंतजार नहीं कर सकते। वे यह सोच कर अपनी सूट की सिलाई शुरू कर चुके हैं जैसे वे सत्ता में आ गए हैं।

कादर शेख का स्वागत करते हुए उन्होंने कहा कि हनागल के लोग जद (एस) में शामिल होना इस बात का संकेत है कि यह निर्वाचन क्षेत्र 2023 के विधानसभा चुनावों में उत्तरी कर्नाटक में जीत का ‘हमारा प्रवेश द्वार’ बन जाएगा। बता दें कि हनागल विधानसभा सीट 6 बार से बीजेपी विधायक और पूर्व मंत्री सीएम उदासी के निधन से खाली हुई है।

पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि कर्नाटक में जद (एस) के लिए हर निर्वाचन क्षेत्र महत्वपूर्ण है और उनकी पार्टी का इरादा अपनी पहुँच का विस्तार करना और राज्य भर में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए एक मजबूत क्षेत्रीय पार्टी बनने का है।

श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के भूमि सौदों में कहीं कोई कमी नहीं: ट्रस्ट ने आरोपों को बताया निराधार, निर्माण में बाधा डालने की कोशिश

श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष स्वामी गोविंद देव गिरि ने उत्तर प्रदेश के अयोध्या में हुए भूमि सौदे में भ्रष्टाचार के आरोपों का कठोरता से खंडन किया है। गिरि ने एक प्रेस रिलीज जारी कर कहा कि खुद को राजनीतिक या धार्मिक शख्सियत बताने वाले कुछ लोग गलत भावनाओं के तहत अफवाहें फैलाकर राम मंदिर निर्माण में बाधा पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं।

ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष स्वामी गोविंद देव गिरि का कहना है कि पिछले 15-20 दिनों से कुछ लोग विभिन्न चैनलों के जरिए अयोध्या में भूमि सौदों में गड़बड़ी का आरोप लगा रहे हैं। उन्होंने इन आरोपों के बीच स्पष्ट किया कि मंदिर की जमीन के आसपास की जमीनों के अधिग्रहण के कई कारण हैं। इसमें वास्तु के साथ-साथ भव्य मंदिर का निर्माण पूरा होने और दर्शन के लिए खुलने के बाद बड़ी संख्या में आने वाले श्रद्धालुओं के सुविधा को ध्यान में रखते हुए भवन निर्माण की योजनाएँ शामिल हैं।

प्रेस नोट में उन्होंने कहा कि पिछले तीन दिनों तक वह लगातार वकीलों और चार्टर्ड एकाउंटेंट के साथ मिलकर भूमि खरीद सौदे के सभी कागजातों की अच्छी तरीके से जाँच की है। भूमि के सौदों में कहीं भी कोई कमी नहीं पाई गई है।

स्वामी गिरि द्वारा जारी प्रेस रिलीज का स्क्रीनशॉट
स्वामी गिरि द्वारा जारी प्रेस रिलीज का स्क्रीनशॉट

स्वामी गिरि ने आश्वस्त किया है कि जितनी भी जमीनों का अधिग्रहण ट्रस्ट की ओर से किया गया है, उन सभी को बाजार दरों से कम कीमत पर खरीदा गया है। पैसे का लेनदेन बैंकों के जरिए कानूनी और पारदर्शी तरीके से किया गया है। उन्होंने कहा, “अगर आरोप लगाने वाले लोग हमें उसी स्थान पर इससे भी सस्ती जमीन दिलाने में मदद कर सकते हैं, तो ट्रस्ट उनका कृतज्ञ रहेगा।”

ट्रस्ट को बदनाम करने के लिए फैलाई जा रही अफवाहों पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कोषाध्यक्ष ने कहा कि ऐसा करके भक्तों को गुमराह करने की कोशिश की जा रही है। उनका कहना है कि विपक्ष के लोग बदले की भावना से इस तरह की अनर्गल अफवाहों को फैलाकर राम मंदिर के निर्माण की गति को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे हैं।

उन्होंने कहा, “मैं सभी को आश्वस्त करना चाहता हूँ कि भगवान श्रीराम मंदिर का काम पूरी ईमानदारी और पारदर्शिता के साथ चलता रहेगा।”

श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ने किया था जमीनों का अधिग्रहण

बता दें कि सर्वोच्च न्यायालय ने ‘विवादित जमीन’ को ट्रस्ट को सौंपा था। जबकि, इसके आसपास आसपास की जमीनों के मालिक दूसरे लोग हैं। ऐसे में विभिन्न सुविधाओं के निर्माण के लिए मंदिर के ट्रस्ट ने निजी तौर उन जमीनों का अधिग्रहण किया है, ताकि बाहर से आने वाले भक्तों की सुविधा का ख्याल रखा जा सके।

इसी को देखते हुए इसी साल मार्च 2021 में श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के महासचिव चंपत राय ने राम मंदिर की यात्रा करने वाले तीर्थयात्रियों की सुविधा के लिए जमीनों की खरीद का सौदा किया। इसके तहत 18.5 करोड़ रुपए की लागत से 1.208 हेक्टेयर जमीन ट्रस्ट ने खरीदने का निर्णय लिया। इसमें से एक जमीन सुल्तान अंसारी की थी और दूसरी रवि मोहन तिवारी से खरीदी गई। अंसारी और दूसरे लोगों ने वही जमीन कुसुम पाठक से 2 करोड़ रुपए में खरीदी थी।

AAP ने शुरू किया था विवाद, सपा और कॉन्ग्रेस ने उसे आगे बढ़ाया

मंदिर पर घोटाले का आरोप लगाने के लिए आम आदमी पार्टी ने अंसारी और कुसुम के बीच हुए पुराने लेन-देन और और अंसारी व ट्रस्ट के बीच हुए समझौते का हवाला दिया था। आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह ने आरोप लगाया था कि श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ने अपने महासचिव चंपत राय के जरिए जमीन को बाजार मूल्य से अधिक कीमत पर खरीदा था। इसी तरह के आरोप सपा नेता पवन पांडेय ने भी लगाए थे।

कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी ने ट्विटर पर हैशटैग ‘राम मंदिर घोटाला’ को ट्रेंड कराया। उन्होंने लिखा कि भगवान राम न्याय करते हैं और उनके नाम पर घोटाला ‘अधर्म’ है। इसके बाद कॉन्ग्रेस ने भी यही आरोप लगाया।

ऑपइंडिया ने आप, सपा और कॉन्ग्रेस के झूठ की पोल खोली

जमीन सौदे को लेकर मचे घमासान के बीच 14 जून 2021 को ऑपइंडिया ने सबूतों और हमारे द्वारा जुटाए गए दस्तावेजों के आधार पर एक विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की, जिसमें राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र द्वारा भूमि सौदे के बारे में सच्चाई को सामने रखा गया था।

श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने भी जारी किया स्पष्टीकरण

जमीन खरीद पर हो रही राजनीति के बीच 15 जून 2021 को श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने पूरे जमीन सौदे को लेकर स्पष्टीकरण जारी किया। ट्रस्ट ने सौदों का विवरण देते हुए विरोधियों के बे सिर पैर के आरोपों को खारिज कर दिया।

जयपुर राजघराना, गणेश जी की मूर्ति, नगाड़ा बजाने वाला अब्दुल: अब कह रहा ये प्रॉपर्टी मेरी, थाने पहुँचा मामला

राजस्थान की राजधानी जयपुर में पूर्व राजघराने की संपत्ति पर कब्जा करने का एक प्रकरण सामने आया है। महाराजा सवाई मानसिंह द्वितीय म्यूजियम ट्रस्ट सिटी पैलेस के प्रशासक प्रमोद यादव ने नगाड़ा बजाने वाले एक पूर्व कर्मचारी के खिलाफ माणक चौक थाने में शिकायत दर्ज करवाई है।

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक शिकायत में कहा गया है कि जलेबी चौक स्थित सिरहड्योढ़ी दरवाजे पर गणेशजी की मूर्तियों की स्थापना शुरू से ही है। वहाँ पूजा होती है और रियासत काल से नगाड़ा बजता रहा है। म्यूजियम ट्रस्ट ने भी पुरानी परिपाटी के अनुसार नगाड़ा बजाने के लिए अब्दुल सलाम को नौकरी पर रखा था, जो साल 2018 में रिटायर हुआ। इसके बाद नगाड़ा बजाने के लिए नए लोग रख लिए गए पर सलाम का परिवार अब तक इस प्रॉपर्टी पर डटा हुआ है।

ट्रस्ट के प्रशासक के अनुसार रिटायरमेंट के बाद अब्दुल को सभी लाभ दिए गए थे। लेकिन उसने कब्जा नहीं छोड़ा। उनके अनुसार अब्दुल को यह सम्पत्ति सेवा में रहने के दौरान उपयोग के लिए दी गई थी। लेकिन अपने भाई इस्लाम खाँ और अम्मी मुन्नी बेगम से मिलीभगत कर जाली दस्तावेज तैयार कर संपत्ति पर खुद का कब्जा दिखा बिजली-पानी के कनेक्शन ले लिए।

प्रॉपर्टी पर कब्जे की बात जब ट्रस्ट के संज्ञान में आई तो उन्होंने अब्दुल को संपत्ति से अपना कब्जा खाली करने को कहा। अब्दुल ने कागज और बिजली-पानी का कनेक्शन दिखा जगह छोड़ने से इनकार कर दिया। साथ ही म्यूजियम की संपत्ति को वक्फ की संपत्ति बताने लगा और धार्मिक भावनाएँ भड़काने की भी कोशिश की।

रिपोर्ट्स के अनुसार, जलेबी चौक एवं उससे सटी सारा सम्पत्ति (जिसमें सिरहड्योढ़ी दरवाजा भी आता है) केंद्र सरकार और महाराजा मान सिंह के बीच में निष्पादित कोविनेंट (प्रसंविदा) के अनुसार संपादित महाराजा सवाई मानसिंह के स्वामित्व एवं कब्जे की व्यक्तिगत सम्पत्ति थी। हालाँकि, महाराजा सवाई मानसिंह के स्वर्गवास के बाद महाराजा सवाई भवानी सिंह सिटी पैलेस एरिया की सम्पत्ति एवं जलेबी चौक की सम्पत्ति 1972 के प्रन्यास के जरिए महाराजा सवाई मानसिंह द्वितीय म्यूजियम ट्रस्ट में निहित कर दी गई और उसके बाद से इसकी देखरेख ट्रस्ट के हाथ में है। इस प्रॉपर्टी को लेकर नगर निगम, राज्य सरकार और महाराजा सवाई मानसिंह द्वितीय म्यूजियम ट्रस्ट के बीच एक केस भी चल रहा है जिस पर स्टे है।

इस संबंध में ऑपइंडिया ने माणकचौक थाने और ट्रस्ट के प्रशासक से बात करने की कोशिश की, लेकिन संपर्क नहीं हो पाया। दैनिक भास्कर ने माणकचौक थाने के एसएचओ सुरेंद्र यादव के हवाले से बताया है कि पुलिस ने दोनों पक्षों से रिकॉर्ड माँगा है। अब्दुल इस जमीन पर पुराने समय से अपना कब्जा बता रहा है।

राजमहल में चलता मिला था मदरसा

उल्लेखनीय है कि इससे पहले मध्य प्रदेश स्थित विदिशा जिला मुख्यालय से 70 किलोमीटर दूर प्राचीन उदयपुर नगर में तकरीबन एक हजार साल पुराने परमार वंश के राजमहल पर मदरसा चलते हुए पाया गया था। राजमहल पर मदरसा चलाने वालों ने वहाँ निजी संपत्ति का बोर्ड लगाया हुआ था। काजी ने सफाई में कहा था कि यह एक हजार साल पुराना ना होकर चार सौ साल पुराना है, जिसका निर्माण उनके पूर्वजों द्वारा पूरा कराया गया था। काजी के अनुसार, जहाँगीर और शाहजहाँ ने उनके परिवार के नाम यह संपत्ति कर डाली थी। इस विषय के सोशल मीडिया पर उछलने के बाद वहाँ के तहसीलदार स्वयं इस महल में पहुँचे थे और उन्होंने एक्शन लेते हुए महल से इस बोर्ड को भी हटा दिया था, जिसमें इसे काजी की निजी सम्पत्ति बताया गया था।