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पोर्नोग्राफिक और अश्लील कंटेंट दिखाने पर अब NCW ने लिखा Twitter को पत्र, 1 हफ्ते में हटाने को कहा

भारत सरकार के साथ चल रहे विवाद के बाद से ट्विटर की परेशानियाँ बढ़ती जा रही हैं। राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के बाद राष्ट्रीय महिला आयोग ने भी प्लेटफॉर्म पर पोर्नोग्राफिक और अश्लील कंटेंट दिखाने वाले मामले पर संज्ञान लिया है। आयोग ने इस मामले में एक माह के भीतर कार्रवाई की माँग की है।

आयोग की अध्यक्ष रेखा शर्मा ने ट्विटर के मैनेजिंग डायरेक्ट को पत्र लिखकर तत्काल प्रभाव से ऐसे पोर्नोग्राफिक कंटेंट को प्लेटफॉर्म से हटाने को बोला है। उन्होंने ट्विटर को कार्रवाई करने के लिए 1 हफ्ते का समय दिया है। इसके अलावा रेखा शर्मा ने एक पत्र दिल्ली के पुलिस कमिश्नर को भी लिखा है। पत्र में उन्होंने मामले में उपयुक्त कार्रवाई करने की माँग की है।

प्रेस नोट (साभार: ANI)

प्रेस नोट में बताया गया है कि आयोग ने पहले भी ऐसी शिकायत मिलने पर ट्विटर का ध्यान इन पर दिलवाया था लेकिन कोई एक्शन नहीं लिया गया। अब आयोग इस बात से परेशान है कि ऐसे कंटेंट के बारे में पता होने के बावजूद ट्विटर ने उन्हें बैन नहीं किया जबकि ये न सिर्फ भारतीय कानून का उल्लंघन है बल्कि उनकी अपनी पॉलिसी के भी विरुद्ध है।

आयोग ने इस मामले में ट्विटर से कुछ प्रोफाइल की जानकारी साझा की है जहाँ पोर्नोग्राफिक कंटेंट शेयर हुआ और ट्विटर को निर्देश दिए हैं कि एक हफ्ते के भीतर ये सामग्री हट जानी चाहिए। प्लेटफॉर्म को ये निर्देश भी दिए गए हैं कि वह इस संबंध में हुई कार्रवाई के बारे में आयोग को बताएँ।

उल्लेखनीय है कि इससे पहले राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग की शिकायत पर दिल्ली पुलिस ने ट्विटर के खिलाफ केस दर्ज किया था। आयोग ने कहा था कि उनको नाबालिग लड़की को ऑनलाइन धमकी दिए जाने की शिकायत मिली है। इसके अलावा उनको ट्विटर पर पोर्नोग्राफिक मैटीरियल भी मिला है। दिल्ली पुलिस बुधवार को दर्ज किए केस में अपनी जाँच आगे बढ़ा रही है। उधर, ट्विटर ने इस शिकायत के बाद कहा कि पोर्नोग्राफिक कंटेंट को लेकर उनकी जीरो टॉलरेंस पॉलिसी है।

बता दें कि इससे पहले NCPCR ने ये मामला उठाते हुए 29 जून 2021 को दिल्ली पुलिस के साइबर क्राइम डिपार्टमेंट के डीसीपी को पेश होने का आदेश दिया था। इसके साथ ही ट्विटर के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने को कहा था। आयोग ने दिल्ली पुलिस के डीसीपी अन्येश रॉय से पूछा था कि पिछले महीने 29 मई 2021 को पत्र लिखने के बाद भी ट्विटर के खिलाफ कोई एक्शन क्यों नहीं लिया।

कोवैक्सिन खरीद पर बवाल: भ्रष्टाचार के आरोप लगने पर ब्राजील ने रद्द किया सौदा, भारत बायोटेक ने दिया ये जवाब

कोरोना महामारी से सर्वाधिक प्रभावित देशों की सूची में तीसरे नंबर पर ब्राजील में भारत से कोवैक्सिन खरीद को लेकर बवाल हो गया। इसके बाद ब्राजील की सरकार ने भारत बायोटेक के साथ दो करोड़ कोवैक्सिन खरीदने के लिए किए गए 324 मिलियन डॉलर यानी 24.05 अरब से अधिक रुपए के इस सौदे को निलंबित करने का फैसला लिया है। 

भारत की स्वदेशी कोरोना वैक्सीन को लेकर मचे बवाल के बीच टीका बनाने वाली कंपनी भारत बायोटेक ने सफाई दी है। कंपनी ने बुधवार (जून 30, 2021) को जारी बयान में कहा है कि ब्राजील के साथ करार के लिए चरणबद्ध प्रक्रिया का पालन किया गया है, जिसमें आठ महीने का समय लगा। कंपनी ने कहा कि कोवैक्सिन को ब्राजील में 24 जून 2021 को आपात इस्तेमाल की मंजूरी मिली है और 29 जून तक कंपनी को न तो कोई एडवांस भुगतान किया गया है और न ही कंपनी की ओर से वैक्सीन की सप्लाई की गई है। 

ब्राजील को प्रति डोज देने थे 15 डॉलर

कंपनी ने कहा है कि भारत से बाहर कोवैक्सिन की कीमत 15 से 20 डॉलर प्रति डोज है। ब्राजील को भी प्रति डोज 15 डॉलर का भुगतान करना था। कोवैक्सीन को ब्राजील, भारत, फिलीपींस, ईरान, मैक्सिको समेत कुल 16 देशों में आपात इस्तेमाल की मंजूरी मिल चुकी है। इसके अलावा 50 देशों में इसको मंजूरी मिलने की प्रक्रिया चल रही है। 

राष्ट्रपति पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप 

बता दें कि इससे पहले ब्राजील के स्वास्थ्य मंत्री मार्सेलो ने मंगलवार को कोवैक्सिन डील निलंबित करने की घोषणा की थी। डील के मुताबिक, ब्राजील को भारत बायोटेक से कुल दो करोड़ कोरोना वैक्सीन कोवैक्सिन की डोज खरीदनी थीं, लेकिन इस सौदे को लेकर ब्राजील में सवाल खड़े हो गए। ब्राजील के राष्ट्रपति जायर बोल्सोनेरो पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए गए। विपक्षी पार्टियों की ओर से लगातार ब्राजील की सत्तारूढ़ सरकार को घेरा गया। सरकार की ओर से सफाई भी दी गई, लेकिन उसका कोई फर्क नहीं पड़ा।

अब जब ये मामला ब्राजील के सुप्रीम कोर्ट में पहुँच गया और राष्ट्रपति के खिलाफ अनियमितताओं के आरोपों की जाँच शुरू हो गई, तब ब्राजील सरकार ने इस डील को निलंबित करने का फैसला लिया है। ब्राजीली मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, जब तक इस मामले की जाँच पूरी नहीं हो जाती है, तब तक कोवैक्सिन खरीद सौदा निलंबित ही रहेगा। हालाँकि, ब्राजील के स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से बार-बार दावा किया गया है कि इस डील में किसी तरह की गड़बड़ी नहीं है।

सौदे में लगे इस गड़बड़ी के आरोप

कोवैक्सिन खरीद में आरोप लगे हैं कि ब्राजील से स्वास्थ्य मंत्रालय के अधिकारी पर भारत बायोटेक की कोवैक्सीन खरीदने का दबाव बनाया गया था। इस बारे में राष्ट्रपति जायर को जानकारी थी, लेकिन इसके बावजूद वो डील को नहीं रोक पाए और ब्राजील को महँगी कोवैक्सिन खरीदनी पड़ी। ब्राजील में इस डील को लेकर जब से गड़बड़ी की बात सामने आई थी, तभी से राष्ट्रपति जायर हर किसी के निशाने पर थे। संसदीय पैनल भी कोरोना प्रबंधन को लेकर जाँच कर रहा है, जिसके सामने ये मामला भी उठा।

एलोपैथी पर बाबा रामदेव के बयानों का Video सुप्रीम कोर्ट में होगा पेश, सारे FIR दिल्ली ट्रांसफर करने का मामला

सुप्रीम कोर्ट ने आज (30 जून 2021) योगगुरु बाबा रामदेव की याचिका पर सुनवाई की। शीर्ष अदालत ने COVID-19 के एलोपैथी इलाज को लेकर उनके बयानों का अनएडिटेड वीडियो और टेप पेश करने को कहा है। याचिका में बाबा रामदेव ने विभिन्न राज्यों में दर्ज एफआईआर को समेकित कर दिल्ली ट्रांसफर करने की अपील की है।

याचिका पर मुख्य न्यायधीश एनवी रमना, जस्टिस एएस बोपन्ना और जस्टिस ऋषिकेश रॉय की बेंच ने सुनवाई की। बाबा रामदेव का पक्ष रखते हुए वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने कहा कि डॉक्टरों के लिए उनके मन में पूरा सम्मान है। इसी कारण पिछले साल जब उन्होंने कोरोनिल निकाली और डॉक्टरों ने इसका विरोध किया तो उन्होंने उसे वापस ले लिया था।

रोहतगी ने कहा कि सभी को अभिव्यक्ति की आजादी का अधिकार है। जो वीडियो वायरल हुआ है वह आंशिक था और सही नहीं था। हम सही वीडियो कोर्ट में जमा कराएँगे। इसके अलावा रोहतगी ने सर्वोच्च न्यायालय से बाबा रामदेव के खिलाफ देशभर में दर्ज केसों को दिल्ली ट्रांसफर करने का आग्रह किया है। अब इस मामले में 5 जुलाई को अगली सुनवाई होगी।

गौरतलब है कि बाबा रामदेव द्वारा एलोपैथी को लेकर दिए गए बयान के बाद इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) ने उनके खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। बाबा के खिलाफ बिहार और रायपुर में एफआईआर दर्ज कराई गई थी। इसके अलावा आईएमए ने योगगुरु को 1000 करोड़ रुपए का नोटिस भी भेजा था।

इससे पहले इसी महीने 3 जून 2021 को दिल्ली की हाईकोर्ट ने बाबा रामदेव की कोरोनिल और उनके वीडियो के खिलाफ दिल्ली मेडिकल एसोसिएशन की याचिका को यह कहते खारिज कर दिया था कि वह उनका अपना विचार है। इसे अभिव्यक्ति की आजादी के तौर पर देखा जाना चाहिए।

हाई कोर्ट ने कहा था, “अगर मुझे लगता है कि कुछ विज्ञान फर्जी है, कल मुझे लगता है कि होम्योपैथी नकली है… तो क्या आपका मतलब है कि वे मेरे खिलाफ मुकदमा दायर करेंगे? यह जनता की राय है। रामदेव एक व्यक्ति हैं। उन्हें एलोपैथी पर विश्वास नहीं है। उनका मानना ​​​​है कि योग और आयुर्वेद से सब कुछ ठीक हो सकता है। अब ये सही या गलत हो सकता है। एलोपैथिक किसी के लिए काम करती है और किसी के लिए नहीं, यह सबका अपना-अपना नजरिया है। हम इस मामले में नोटिस जारी कर सकते हैं, लेकिन हम रामदेव को रोक नहीं सकते हैं।”

‘कहीं नहीं मिलेंगे ईमानदार तहसीलदार, 2% तो लेंगे ही लेंगे’: जनसुनवाई के दौरान कॉन्ग्रेस नेता ने बखाना अनुभव, वीडियो वायरल

राजस्थान में कॉन्ग्रेस सरकार के भीतर चल रही तनातनी के बीच एक राज्य मंत्री का विवादित बयान आया है। वहाँ गहलोत सरकार में उद्योग मंत्री व जिले के प्रभारी मंत्री परसादी लाल मीणा ने कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं की सुनवाई करते हुए देश के सभी तहसीलदार और नायब तहसीलदारों को घूसखोर कहा है। उनका आरोप है कि ये लोग 2% लिए बिना काम नहीं करते।

पूरा मामला राजस्थान के बूँदी का है। जहाँ प्रदेश कॉन्ग्रेस कमेटी के सदस्य सत्येश शर्मा ने बूंदी की नायब तहसीलदार प्रीतम कुमारी मीणा को एपीओ करने का मुद्दा उठाया। शर्मा ने कहा कि गलत काम न करने पर एक ईमानदार नायाब तहसीलदार को एपीओ किया गया। इस पर परसादी ने कहा कि भारत में कहीं ईमानदार तहसीलदार, नायब तहसीलदार नहीं मिलेंगे। उनकी ऐसा कहते हुए वीडियो भी सामने आई है।

वीडियो में सुन सकते हैं कि परसादी के मुँह से विवादित बात सुनकर पूर्व मंत्री व वरिष्ठ कॉन्ग्रेस नेता हरमोहन शर्मा ने बीच में उन्हें टोकते हुए कहा कि ये अपवाद है। जिस पर परसादी ने जोर देकर समझाते हुए कहा, “मैं आपके साथ MLA बना हूँ। मैं 6 बार विधायक और 3 बार मंत्री रह चुका हूँ। कितने ही तहसीलदार, नायब तहसीलदार लगा दिए, पर वे 2% तो लेंगे ही लेंगे।” वहीं हरिमोहन शर्मा ने फिर कहा कि ये अपवाद है चाहे तो पता लगा लें।

वीडियो साभार: दैनिक भास्कर

उल्लेखनीय है कि कॉन्ग्रेस शासित प्रदेश में कार्यकर्ताओं की सुनवाई नहीं होने पर जिले के प्रभारी मंत्री परसादी लाल मीणा के सामने कलेक्टर और मंत्री के खिलाफ नारे लगाए। उन्होंने कलेक्टर को तत्काल बूंदी से हटाने की माँग की। साथ ही कहा कि कॉन्ग्रेस के राज में भी कार्यकर्ताओं, जनता की सुनवाई नहीं हो रही। कोई काम करना ही नहीं चाहता, किसके पास जाएँ।

बता दें कि इससे पहले बीते सप्ताह कोटा में वन मंत्री सुखराम विश्नोई की जनसुनवाई में उनके बेटे- भतीजे पर भ्रष्टाचार के आरोप लगने के बाद कार्यकर्ताओं के हंगामे की बात सामने आई थी। अब इसी कड़ी में मीणा के साथ जनसुनवाई पर कार्यकर्ताओं का मंगलवार को गुस्सा फूटा। वहाँ कॉन्ग्रेसी कार्यकर्ताओं ने कलेक्टर की ओर से उनकी बात न मानने की बात पर उनको हटाने की माँग तो की ही। साथ ही इस जनसुनवाई के दौरान कार्यकर्ताओं का गुस्सा इतना अधिक था कि कॉन्ग्रेस के पूर्व बूंदी शहर अध्यक्ष देवराज गोचर ने यह तक बात कह डाली कि यदि प्रभारी मंत्री मीणा ने उनकी बात नहीं सुनी, तो बूंदी में नहीं घुसने दिया जाएगा।

नाम, फोन नंबर, ईमेल… Dark Web पर बिक रहा: लिंक्डइन का 70 करोड़ यूजर्स का डाटा लीक होने से इनकार

पेशेवर नेटवर्किंग वेबसाइट लिंक्डइन (LinkedIn) के करीब 700 मिलियन यानी 70 करोड़ यूजर्स का डेटा हैकर्स ने कथित तौर पर लीक कर दिया है। डार्क वेब स्पेस में यह डाटा बिक्री के लिए उपलब्ध है। यह डाटा लिंक्डइन के सारे यूजर्स का करीब 92 फीसदी है। हालाँकि, लिंक्डइन ने इससे इनकार किया है। डाटा लीक करने वाले हैकरों के बारे में भी अभी तक कुछ भी नहीं पता चल सका है।

लीक हुए डेटा में यूजर्स के नाम, फोन नंबर, मेल आईडी, संस्थान सहित कई महत्वपूर्ण जानकारियाँ हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, लिंक्डइन यूजर्स का डाटा लीक हुआ है। हैकर्स ने इसे डार्क वेब स्पेस में बेचने के लिए डाल दिया है। इसमें से एक मिलियन डाटा को हैकर्स ने डार्क वेब के पब्लिक डोमेन में डाला है।

रेड फोरम ने कंपनी के प्रवक्ता के हवाले से कहा, “हम मामले की जाँच कर रहे हैं और हमारी शुरुआती जाँच में पता चला है कि डेटासेट में लिंक्डइन (LinkedIn) से स्क्रैप की गई जानकारी के साथ-साथ दूसरे सोर्सेज से भी जानकारियों को लिया गया है। यह लिंक्डइन का डेटा लीक नहीं था और हमारी जाँच से पता चला है कि लिंक्डइन (LinkedIn) के किसी भी मेंबर का डेटा लीक नहीं हुआ है। हम यह सुनिश्चित करने के लिए लगातार काम कर रहे हैं कि हमारे सदस्यों की गोपनीयता सुरक्षित रहे।”

कंपनी ने अपनी वेबसाइट पर पोस्ट किए गए एक नोट में कहा, “हमारी टीमों ने कथित लिंक्डइन डेटा के एक सेट की जाँच की है, जिसे बिक्री के लिए पोस्ट किया गया है। हम स्पष्ट करना चाहते हैं कि यह डेटा लीक नहीं है।”

इससे पहले इसी साल अप्रैल में लिंक्डइन (LinkedIn) के 500 मिलियन यूजर्स का डेटा लीक होने की खबर आई थी। इसमें यूजर्स के मोबाइल नंबर, नाम, पता, आईडी और ई-मेल एड्रेस से लेकर सोशल मीडिया अकाउंट तक की जानकारी थी। इसे भी हैकर्स ने डार्क वेब पर सेल के लिए डाल दिया था।

गाजीपुर बॉर्डर पर गाड़ियों के टूटे शीशे, ‘किसानों’ ने चलाए तलवार से लेकर लाठी-डंडे: बवाल के बाद बताया BJP की साजिश

दिल्‍ली के गाजीपुर बॉर्डर पर बीजेपी कार्यकर्ताओं और किसानों के बीच झड़प की खबर सामने आई है। गाजीपुर बॉर्डर पर बुधवार (30 जून 2021) को उत्तर प्रदेश के बीजेपी प्रदेश मंत्री अमित वाल्मीकि के स्वागत में खड़े कार्यकर्ता और किसानों के बीच जमकर हंगामा हुआ। रिपोर्ट्स के मुताबिक, घटनास्थल पर मौजूद लोगों का कहना है कि किसानों ने लोहे से गाड़ियों पर वार किए, जिससे कुछ गाड़ि‍यों के शीशे टूट गए। इस घटना के बाद से गाजीपुर बॉर्डर पर काफी देर तक अफरा-तफरी का माहौल बना रहा।

वहीं, बीजेपी कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि बड़ी संख्या में मौजूद किसानों ने पहले गाड़ियों के शीशे तोड़ दिए और फिर कार्यकर्ताओं पर तलवार, भाले, लाठी-डंडों से हमला किया। वहीं किसान नेता इसे बीजेपी की साजिश बता रहे हैं। तनाव बढ़ता देख मौके पर तैनात पुलिस ने फटाफट बीजेपी के काफिले को वहाँ से रवाना किया।

बीजेपी कार्यकर्ता महेश नेगी ने कहा, ”हम लोग गाजीपुर बॉर्डर पर स्वागत कार्यक्रम कर रहे थे, इसी दौरान किसानों ने हम पर अचानक हमला कर दिया। इस हमले में अमित वाल्मीकि को चोट आई है।” उन्होंने कहा कि हमने कार्यक्रम की सूचना पुलिस को दी थी और वो वहाँ पर मौजूद भी थी। लेकिन इसके बावजूद किसानों ने हम पर हमला कर दिया। हमारे लोगों को वहाँ से जान बचाकर भागना पड़ा।

बीजेपी की महानगर महिला उपाध्यक्ष रनीता सिंह ने कहा, ”किसान आंदोलन के नाम पर यहाँ कुछ गुंडे बैठे हुए हैं, जिन्होंने इस घिनौनी हरकत को अंजाम दिया है।” उन्होंने इन सभी आरोपितों के खिलाफ थाने में शिकायत दर्ज कराई है और सख्त से सख्त कार्रवाई की माँग की है।

भारतीय किसान यूनियन के प्रवक्ता राकेश टिकैत ने न्यूज 18 से बातचीत में कहा कि इस पूरे मामले में किसान यूनियन के किसी भी व्यक्ति का कोई हाथ नहीं है। यह बीजेपी की साजिश है। किसान इस प्रकार की साजिश से डरने वाले नहीं हैं। अगर इस प्रकार की तोड़फोड़ की गई है, तो हम उसकी निंदा करते हैं। पुलिस बल इस मामले में एफआईआर दर्ज कर इसकी जाँच करें।

शायर मुनव्वर राणा के बेटे तबरेज पर हमला, कई राउंड फायरिंग: चाचा इस्माइल राणा सहित परिवार के 5 लोगों पर FIR

यूपी के रायबरेली जिले में प्रख्यात शायर मुनव्वर राणा के बेटे तबरेज राणा पर बाइक सवार नकाबपोशों ने हमला कर दिया। उनकी कार पर कई राउंड गोलियाँ चली। हमले में तबरेज बाल-बाल बच गए, लेकिन उनकी गाड़ी क्षतिग्रस्त हो गई। ताबड़तोड़ हुई फायरिंग और गोली की आवाज सुनकर आसपास हड़कंप मच गया और लोग इकठ्ठा हो गए। इसी बीच हमलावार मौके से भाग गए।

पुलिस ने हमलावरों को पकड़ने के लिए नाकेबंदी की लेकिन कोई सफलता नहीं मिली। पीड़ित तबरेज राणा ने अपने ही परिवार के पाँच लोगों के खिलाफ थाने में तहरीर दी है। देर रात पुलिस ने पाँचों आरोपितों इस्माइल राणा, राफे राणा, जमील राणा, शकील राणा (सभी चाचा) और यासर राणा (चचेरे भाई) के खिलाफ केस दर्ज कर लिया है। सपा नेता राफे राणा आजम खान के करीबी माने जाते हैं।

रायबरेली के शहर कोतवाली के किला बाजार मोहल्ले के रहने वाले शायर मुनव्वर राणा परिवार के साथ लखनऊ में रहते हैं। पुलिस का कहना है कि उनका रायबरेली में परिवार के लोगों के साथ काफी समय से जमीन संबंधी विवाद चल रहा है। तबरेज राणा दो दिन पहले जमीन के किसी विवाद को लेकर शहर आए थे और यहीं पर रुके हुए थे। कोतवाली में दी गई तहरीर के मुताबिक सोमवार (जून 28, 2021) को वह अपनी कार से लखनऊ के लिए जा रहे थे। 

तभी लखनऊ-प्रयागराज हाईवे पर शाम करीब 6 बजे शहर कोतवाली की त्रिपुला पुलिस चौकी क्षेत्र में स्थित पेट्रोल पंप के पास बिना नंबर की बाइक पर बैठे नकाबपोशों ने तबरेज राणा पर ताबड़तोड़ गोलियाँ चलाई। उस वक्त तबरेज कार चला रहे थे। गोलियों की आवाज सुनकर मौके पर लोगों की भीड़ इकठ्ठा होने लगी। कई राउंड गोलियाँ चलाने के बाद हमलावर भाग गए। कार के शीशे में गोलियों के निशान भी मिले हैं। कोतवाल अतुल कुमार सिंह ने बताया कि पीड़ित की तहरीर के आधार पर मुकदमा दर्ज किया गया है।

फिलहाल यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि तबरेज से मिलने होटल में कौन आया और कौन गया। एसपी ने बताया कि घटना के खुलासे के लिए कोतवाल अतुल कुमार सिंह, मिल एरिया के एसओ आशुतोष त्रिपाठी और एसओजी को लगाया गया है। तीनों टीमें अलग-अलग टास्क पर काम कर रही हैं। घटना के चश्मदीद पेट्रोल पंप के सेल्समैन से भी पूछताछ की गई है। एक-दो दिन में घटना का खुलासा कर दिया जाएगा। घटनास्थल से जुड़े पेट्रोल पंप और आसपास के सीसीटीवी फुटेज खँगाले जा रहे हैं। एक सीसीटीवी फुटेज में बाइक से दो लोग जाते दिखे हैं। पुलिस को शक है कि यह बाइक सवार घटना में शामिल हो सकते हैं।

आरोपित राफे राणा ने बताया कि राजघाट पर साढ़े आठ बीघा जमीन है। इसमें चार बीघा उनकी और उनके भाई इस्माइल की है। साढ़े चार बीघा में 6 भाइयों का हिस्सा है। पिता की मृत्यु के बाद गलत वरासत हो गई और पूरी साढ़े आठ बीघा जमीन 6 भाइयों के नाम चढ़ गई। इसका वाद न्यायालय में विचाराधीन है। राफे के मुताबिक फरवरी 2021 में तबरेज ने उनके हिस्से की जमीन में से 18 बिस्वा बेच दी। ये बात जब पता चली तो निबंधन कार्यालय में आपत्ति करके दाखिल खारिज रोकवा दी। इसका हमले की घटना से कोई सरोकार नहीं है।

लॉकडाउन में घर लौटे श्रमिकों में से 10 लाख को UP सरकार दे चुकी है रोजगार: SC ने भी की ‘योगी मॉडल’ की तारीफ

कोरोना वायरस के चलते पिछले साल लॉकडाउन के बाद प्रवासी मजदूरों की वापसी ने कई राज्यों की चिंता बढ़ा दी थी। ऐसे समय में योगी सरकार ने इस स्थिति को जिस तरह सँभाला उसकी जानकारी होने पर सुप्रीम कोर्ट ने उसकी सराहना की है।

प्रवासी मजदूरों की स्थिति से संबंधित दो याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार द्वारा दायर एक विस्तृत हलफनामे का हवाला दिया। इसमें बताया गया था कि योगी सरकार ने प्रवासी मजदूरों के लिए क्या-क्या कदम उठाए। सबसे पहले उस पंजीकरण व्यवस्था के बारे में बताया गया जिसमें राज्य में लौटे सभी मजदूरों को रजिस्टर कर उन्हें चिह्नित किया गया। इसके बाद उस पोर्टल का जिक्र है जिसपर सभी श्रमिकों के विवरण अपलोड होने हैं और उन्हें राहत दी जानी है।

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि यूपी ने राज्य में ऐसे प्रवासी कामगारों के पंजीकरण की एक मजबूत प्रणाली बनाई जो कि उनके राज्य में आने को लेकर है। इस बारे में दिनांक 22 मई 2021 को दिए गए हलफनामे में विस्तृत ब्यौरा दिया गया है। रिलीफ कमिश्नर की वेबसाइट http://www.rahat.up.nic.in पर एक पोर्टल बनाया गया है, जिस पर सभी प्रवासी श्रमिकों के जुड़ी सभी जानकारी उनसे जुड़े वास्तविक समय में अपलोड की गई।

कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि, उत्तर प्रदेश के प्रशिक्षण और रोजगार निदेशक के पास उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार, पूरी कोरोना महामारी की अवधि के दौरान 37,84,255 प्रवासी श्रमिक अपने मूल स्थानों पर लौट आए हैं। उनकी स्किल मैपिंग का काम पूरा हो चुका है और राज्य सरकार के विभिन्न विभागों की विभिन्न योजनाओं में 10,44,710 मजदूरों को पहले ही रोजगार दिया जा चुका है।

कोर्ट ने पेश किए आँकड़ों पर कहा कि 8 जून 2021 तक उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार 3,79,220 प्रवासी श्रमिकों का विवरण/डेटा पंजीकृत किया गया है और उनके कौशल को  1 अप्रैल 2021 से पोर्टल rahat.up.nic.in पर मैप किया गया है। 

इसमें यह भी कहा गया कि सभी पात्र व्यक्तियों को निर्वाह भत्ता प्रदान करने के लिए राज्य मंत्रिमंडल द्वारा 15 मई 2021 को लिए गए फैसले का लाभ उठाने के लिए पंजीकृत श्रमिकों के अलावा अन्य श्रमिकों की पहचान करने के लिए भी rahat.up.nic.in पोर्टल का उपयोग किया जा रहा है और उन्हें हर महीने 1000 रुपए हर महीने सीधे बैंक खाते में ट्रांसफर किया जा रहा है। 

बता दें कि साल 2020 में लॉकडाउन लगने के बाद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ बार-बार कह चुके हैं कि श्रमिकों की आजीविका उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता है। अभी पिछले दिनों योगी सरकार ने श्रमिकों को 230 करोड़ रुपए की सौगात दी थी। प्रदेश के 23.2 लाख पंजीकृत श्रमिकों के खाते में भरण पोषण भत्ते के तौर पर सीएम योगी द्वारा 1000-1000 रुपए ट्रांसफर किए थे। इस दौरान सरकारी आवास पर एक कार्यक्रम में सीएम ने 5 श्रमिकों को खुद ये धनराशि दी। वहीं बाकियों से फोन कॉल के जरिए बात की थी।

चुनाव से पहले ही केजरीवाल ने शुरू कर दिया पलटी मारना: पंजाब में फ्री बिजली की बातें, दिल्ली से किए वादे याद नहीं

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल अपनी आम आदमी पार्टी (AAP) को दूसरे राज्यों में फैलाना चाहते हैं। 2017 के पंजाब विधानसभा चुनाव में पार्टी को 20 सीटें मिली भी थीं और वो 23.8% वोट शेयर पाने में भी सफल रही थी, ऐसे में पहले ही चुनाव में इस तरह के प्रदर्शन ने केजरीवाल के लिए नई उम्मीद जगा दी है। अब वो पंजाब के नए राजनीतिक परिदृश्य में चंडीगढ़ पहुँच कर वादों की झड़ी लगा कर आए हैं।

पंजाब में पिछले 5 वर्षों से कैम्प्टन अमरिंदर सिंह के नेतृत्व में कॉन्ग्रेस की सरकार चल रही है और इसके खिलाफ एंटी-इंकम्बेंसी भी है। साथ ही नवजोत सिंह सिद्धू की बगावत के बाद आंतरिक कलह से भी कॉन्ग्रेस का संगठन जूझ रहा है। इधर दशकों पुराने साथी भाजपा और अकाली दल अलग हो गए। भाजपा अकेले पड़ गई है और ‘किसान आंदोलन’ से उसकी नकारात्मक छवि बनाने में विरोधी खासे व्यस्त हैं।

ऐसे में AAP इन बदले समीकरणों का फायदा उठाने के लिए मैदान में उतरी है। मंगलवार (जून 29, 2021) को केजरीवाल ने घोषणा की कि AAP की सरकार बनने पर राज्यवासियों को प्रति महीने 300 यूनिट बिजली मुफ्त में दी जाएगी। ये सुविधा पंजाब के घरेलू उपभोक्ताओं को मिलेगी। साथ ही उन्होंने 24 घंटे पॉवर सप्लाई का भी वादा किया। अपनी सरकार बनने पर उन्होंने पुराने सारे बकाए बिजली बिल माफ़ करने की भी घोषणा की।

बता दें कि किसानों को पहले ही पंजाब में मुफ्त बिजली मिल रही है और उद्योगों के लिए वहाँ बिजली का अलग रेट है, ऐसे में केजरीवाल के पास ये दावा करने के अलावा कोई और चारा नहीं बचा कि ये सुविधाएँ जारी रहेंगी। फिर जिस राज्य में अधिकतर जनसंख्या को बिजली के मामले में सुविधाएँ मिल रही हैं, वो केजरीवाल के 300 यूनिट मुफ्त बिजली वाली घोषणा के कारण उन्हें वोट देगी? दिल्ली एक शहरी क्षेत्र है और महानगर है, जबकि पंजाब में किसानों और गाँवों के हिसाब से फैसले होते हैं।

गाँवों में बिजली का दर शहरों से सस्ता होता है। जहाँ दिल्ली में अधिकतर लोग बड़ी इमारतों फ्लैट्स में रहते हैं और उनका बिजली-पानी का खर्च अधिक होता है, पंजाब में अधिकतर जनसंख्या को अन्न-जल खरीद कर नहीं लाना होता है और वो मुफ्त बिजली के सहारे तो नहीं ही रहेंगे। सिंचाई से लेकर अन्य कृषि कार्यों के लिए उन्हें पहले से ही मुफ्त बिजली मिल रही है। केजरीवाल ने 24 घंटे की निर्बाध बिजली सप्लाई की तो घोषणा की, लेकिन यहाँ एक पेंच फँसा दिया।

उन्होंने अपने वादे के साथ ‘नियम एवं शर्तें’ जोड़ते हुए कहा कि इसके लिए इंफ्रास्ट्रक्चर को नए सिरे से आधुनिक बनाना होगा, इसीलिए इसमें समय लगेगा। अब केजरीवाल कहने को 2027 के विधानसभा चुनाव में (अगर उन्होंने 2022 जीता तो) ये भी कह सकते हैं कि इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास में ही 5 साल लग गए, इसीलिए अब मुफ्त बिजली अगली बार मिलेगी। पंजाब पहले से ही पॉवर सरप्लस राज्य है, ये भी जानना चाहिए।

केजरीवाल ने उसी दिन शाम होते-होते 300 यूनिट फ्री बिजली वाली घोषणा में भी ‘नियम एवं शर्तें लागू’ जोड़ दिया। उन्होंने कहा कि SC-ST, OBC और BPL परिवारों को 300 यूनिट बिजली निःशुल्क दी जाएगी। यानी, सामान्य वर्ग को इस सुविधा का लाभ नहीं मिलेगा। शायद केजरीवाल को ये पता ही नहीं है कि पंजाब में पहले से ही एससी, बीसी और बीपीएल परिवारों को 200 यूनिट फ्री है। इस पर केजरीवाल को सफाई देते नहीं बन रहा।

अगर करदाताओं की बात करें तो दिल्ली में अधिकतर नौकरीपेशा लोग हैं और वहाँ का GST कलेक्शन पंजाब से लगभग 3 गुना अधिक होता है। ऊपर से पंजाब सरकार के ऊपर कर्ज भी अधिक है। तीसरा फैक्टर ये है कि दिल्ली में गृह विभाग और विकास प्राधिकरण सहित कई चीजें केंद्र के अधीन हैं, ऐसे में इन चीजों के लिए AAP सरकार को सिर नहीं खपाना पड़ता है। दिल्ली एक पूर्ण राज्य नहीं है। पंजाब पूर्ण राज्य है।

ऊपर से पंजाब एक संवेदनशील राज्य है, जिसकी सीमाएँ पाकिस्तान से लगती हैं। खालिस्तानियों का सपना है कि उसे शेष भारत से अलग-थलग कर दिया जाए। AAP में रहीं अभिनेत्री गुल पनाग कह चुकी हैं कि खालिस्तानियों से साँठगाँठ बढ़ाने को लेकर उन्होंने अपनी पार्टी को चेतावनी दी थी। ऐसे में AAP जैसी पार्टी का पंजाब में सरकार बनना देश के लिए भी खतरे से खाली नहीं होगा। केजरीवाल अपनी राजनीति के सामने बाकी चीजों को किनारे रखते हैं।

ऊपर से एक नजर इस पर भी डालना जरूरी है कि दिल्ली के लिए किए वादों में से केजरीवाल ने कितने को पूरा किया। उन्होंने ‘जन लोकपाल’ का वादा किया था। उनकी ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ का पूरा आंदोलन ही लोकपाल के गठन पर केंद्रित था। दिल्ली में अब तक लोकपाल का गठन नहीं हो सका है। इसके लिए भी केजरीवाल सरकार केंद्र पर आरोप मढ़ती है। उसका कहाँ है कि केंद्र की नीतियों के कारण लोकपाल बिल अटका पड़ा है।

अरविंद केजरीवाल ने वादा किया था कि दिल्ली में 15 लाख सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएँगे, लेकिन अब तक इसका कोई अता-पता नहीं है। बीच में कुछ सीसीटीवी कैमरे लगाने की बात कही भी गई थी तो उसके लिए एक चीन की कंपनी से करार की बात सामने आई थी। एक छोटे से प्रदेश दिल्ली को संभालने में नाकाम रहे केजरीवाल पंजाब को चमकाने का वादा कर रहे हैं। दिल्ली को उन्होंने एक वैश्विक विरोध प्रदर्शन स्थल बना रखा है।

अरविंद केजरीवाल ने दावा किया कि उनकी सरकार ने 20,000 नए क्लासरूम बनवाए हैं, जो 500 नए स्कूलों के ही बराबर है। दिल्ली की शिक्षा नीति को भी बर्बाद कर दिया गया। हेराफेरी कर के 10वीं के परिणाम में सुधार दिखाया गया। यमुना नदी को साफ़ करने का दावा करने वाली AAP की सरकार के दौरान प्रदूषण और बढ़ ही रहा है। आए दिन यमुना नदी में तैरते सफ़ेद जहरीले झाग की तस्वीरें वायरल होती हैं।

अरविंद केजरीवाल ऐसे नेता हैं जो हिन्दू विरोधियों का विश्वास जीतने के लिए स्वस्तिक जैसे पवित्र चिह्न को झाड़ू मारने वाली तस्वीर पोस्ट करते हैं तो चुनाव के समय डैमेज कट्रोल के लिए करोड़ों रुपए खर्च कर के परिवार सहित अक्षर धाम मंदिर में दीपावली का त्यौहार मानते हैं। उनका राजनीतिक चरित्र कुछ ऐसा रहा है कि उन्होंने सेजिकल स्ट्राइक का सबूत माँग भारतीय सेना को बदनाम किया था और एयर स्ट्राइक के समय डैमेज कंट्रोल के लिए तुरंत बधाई दे डाली।

आज हिंसा में बंगाल को जलाने वाले जब होंगे ‘भस्मासुर’ तब क्या करेंगी दीदी: अब नजरें NHRC की रिपोर्ट पर

पश्चिम बंगाल में चुनाव बाद हुई हिंसा को लेकर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) की टीम ने बुधवार (30 जून 2021) को अपनी रिपोर्ट कलकत्ता हाईकोर्ट की पाँच सदस्यीय पीठ को सौंप दी। इससे उच्च न्यायालय के निर्देश पर हिंसा की जाँच करने पहुँची आयोग की टीम पर कोलकाता के जाधवपुर इलाके में हमले की खबर आई थी। रिपोर्ट के अनुसार तृणमूल कार्यकर्ताओं (TMC) और उनके समर्थकों ने टीम को न केवल अपना काम करने से रोकने का प्रयत्न किया गया, बल्कि उनपर हमला भी हुआ।

खबरों के अनुसार टीम के सदस्य जब हिंसा प्रभावित एक क्षेत्र में स्थानीय लोगों का बयान ले रहे थे तब हमला किया गया। हमले के बाद टीम के एक सदस्य द्वारा पुलिस से पर्याप्त सहयोग न मिलने की बात भी की गई। उधर पुलिस के अनुसार उसके पास रपट है कि स्थानीय लोगों ने टीम के सदस्यों के साथ कुछ ‘अभद्रता’ करने की कोशिश की पर टीम की ओर से घटना से सम्बंधित कोई रपट पुलिस थाने में नहीं लिखाई गई। पुलिस के अनुसार यदि टीम की ओर से आधिकारिक रपट लिखाई गई होती तो वह अवश्य कार्रवाई करती।

पुलिस का यह बयान आश्चर्यचकित नहीं करता। चुनाव परिणामों के बाद शुरू हुई हिंसा को लेकर पुलिस का रवैया पिछले दो महीनों से ऐसा ही रहा है। यही कारण है कि कोलकाता उच्च न्यायालय में एक-दो नहीं बल्कि कई याचिकाएँ आईं जिनमें लगातार हो रही हिंसा, लूट, हत्या, बलात्कार और अन्य आपराधिक घटनाओं की जाँच और उस पर रोक लगाने के लिए न्यायालय के हस्तक्षेप और आवश्यक कार्रवाई की माँग की गई।

इस बात से शायद ही कोई असहमत हो कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को मिला उच्च न्यायालय का निर्देश पहले ही देर से आया था। ऐसे में आयोग द्वारा नियुक्त टीम पर हुए हमले को उच्च न्यायालय के निर्देश के पालन के लिए की जा रही कार्रवाई की राह में रोड़ा ही माना जाएगा।

ऐसा नहीं कि न्यायालय के निर्देश की राह में रोड़ा खड़ा करने का प्रयत्न पहले नहीं हुआ। दरअसल 18 जून को कोलकाता उच्च न्यायालय की पाँच न्यायाधीशों वाली बेंच द्वारा मानवाधिकार आयोग को दिए गए निर्देश पर रोक लगाने के लिए पश्चिम बंगाल सरकार अपील भी कर चुकी है। इसे पाँच सदस्यीय बेंच ने यह कहकर ठुकरा दिया कि वह अपने ही निर्देश या फैसले को नहीं रोक सकता।

प्रश्न यह है कि जिस न्याय व्यवस्था में आए दिन नामी-गिरामी मुल्ज़िम भी अपना विश्वास प्रकट करते रहते हैं, उसके निर्देश पर बानी किसी जाँच टीम पर राज्य सरकार को विश्वास क्यों नहीं है? राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग जो भी कर रहा है या करेगा वह न्यायपालिका के निर्देश के अनुसार ही कर रहा है। ऐसे में एक संवैधानिक संस्था को अपनी जिम्मेदारियों का पालन करने से रोकने की बात किसी भी दृष्टिकोण से तर्कपूर्ण या स्वाभाविक नहीं लगती।

इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि कानून-व्यवस्था को लेकर राज्य सरकार द्वारा अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ने के बाद ही राज्य में मानवाधिकार के उल्लंघन सम्बंधित याचिकाएँ उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय तक पहुँची हैं। यदि राज्य प्रशासन संविधान के अनुसार आचरण करता तो लोग न्यायालय क्यों जाते? ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि पुलिस कार्रवाई में राजनीतिक दखलंदाज़ी के विरुद्ध क्या केवल इसलिए कुछ न कहा जाए क्योंकि सत्ताधारी दल ‘सेक्युलर’ है? या पुलिस द्वारा अपना काम न करने को क्या यह कहकर न्यायसंगत माना जा सकता है कि पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा का इतिहास पुराना है? कई लोग तो पुलिस या राज्य सरकार की नाकामी को यह तर्क देकर ढकने का प्रयत्न करते है कि हिंसा दोनों राजनीतिक दलों की ओर से हो रही है या फिर हो रही हिंसा को सांप्रदायिक करार नहीं दिया जा सकता।

यह विमर्श का विषय है कि ऐसे तर्कों के लिए एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में कितना स्थान होना चाहिए। राज्य सरकार और सत्ताधारी दल की राजनीति तो अपनी जगह होगी, परन्तु खुद को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ और चुनाव को लोकतंत्र का पर्व बताने वाली परंपरागत मीडिया भी पश्चिम बंगाल में हो रही हिंसा पर यह कह कर पर्दा डालने का प्रयत्न करती है कि हिंसा होने के आरोप लगाए जा रहे हैं। इस तर्क को आगे रख कर मीडिया हो रही हिंसा को कथित हिंसा बताता है। मीडिया के पास ऐसा कहने के लिए क्या तर्क है यह तो वही जाने पर ऐसा करके वह पहले से ही नीचे जा रही अपनी विश्वसनीयता को और खतरे में डाल रहा है। ऐसे में लोकतंत्र के इस स्तंभों के शर्मनाक आचरण के बीच राज्य के पीड़ित आम नागरिक के पास न्यायालय की शरण लेने के अलावा कौन सा रास्ता बचता है, यह प्रश्न सत्ताधारी दल के नेताओं और राज्य सरकार के मंत्रियों को खुद से पूछना चाहिए।

मानवाधिकार आयोग की टीम पर हुआ हमला राजनीतिक तौर पर क्या सन्देश देता है? यह ऐसा प्रश्न है जिसका उत्तर भले ही अभी न मिले पर प्रश्न महत्वपूर्ण है। मेरे विचार से स्थानीय स्तर पर ऐसे हमलों से एक संदेश यह भी निकलता है कि यदि ऐसा ही चलता रहा तो एक समय आएगा जब सत्ताधारी दल और उसके नेतृत्व के लिए अपने कार्यकर्ताओं और समर्थकों पर लगाम लगाना संभव न होगा। जब भी यह स्थिति आ जाएगी, इस बात का दल और उसके नेतृत्व की साख पर बुरा असर पड़ेगा। यदि कोई समाजशास्त्री आज भी यह कहे कि सत्ताधारी दल और उसके नेतृत्व का अपने कार्यकर्ताओं और समर्थकों पर नियंत्रण नहीं है तो मुझे इस बात पर आश्चर्य नहीं होगा।

हो रही इस हिंसा का एक पहलू और भी है। हिंसा, लूट, आगजनी और बलात्कार से संबंधित मानवाधिकार हनन की घटनाएँ तो प्रत्यक्ष रूप से दिखाई देती हैं पर कई जगहों पर स्थानीय स्तर पर हो रही कुछ आपराधिक घटनाएँ प्रत्यक्ष तौर पर दिखाई नहीं देती और वे राजनीतिक विमर्श का हिस्सा नहीं बन पाती। पश्चिम बंगाल में परोक्ष रूप से सिंडिकेट की बात कई वर्षों से होती रही है। इस चुनाव के बाद राजनीति में सिंडिकेट ने शायद एक नया रूप ले लिया है जिसके बारे में विमर्श या शोर शायद बाद में सुनाई दे।

इन सब घटनाओं को देखते हुए प्रश्न यह उठता है कि सत्ताधारी दल और उसका नेतृत्व इस स्थिति से कब तक आँखें मूँदे रह सकता है? राष्ट्रीय स्तर पर देखा जाए तो उच्चतम न्यायालय में पश्चिम बंगाल से आने वाले दो न्यायाधीशों ने जिस तरह खुद को सुनवाई से अलग किया, वह विचारणीय है। यह ऐसी घटना है, जिस पर सार्वजनिक मंचों पर लगातार चर्चा हो रही है और फिलहाल इस चर्चा का रुकना इसलिए संभव नहीं जान पड़ता क्योंकि इन न्यायाधीशों ने खुद को सुनवाई से अलग रखने का कोई कारण सार्वजनिक नहीं किया है।

यह ममता बनर्जी के लिए आदर्श स्थिति नहीं है। खासकर, इसलिए भी क्योंकि वे खुद को 2024 में राष्ट्रीय राजनीतिक मंच के लिए तैयार कर रही हैं। ऐसे में यह कहने से कोई गुरेज नहीं कर सकता कि इन घटनाओं का उनके राजनीतिक भविष्य पर बुरा असर पड़ेगा। हिंसा न रोक पाने के पीछे उनकी चाहे जो मज़बूरियाँ हों, पर इसके चलते उनकी ‘छवि’ को अपूरणीय क्षति पहुँचा रही है।

फिलहाल तो देखना यह है कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की इस टीम ने कोलकाता उच्च न्यायालय को जो रिपोर्ट सौंपी है उसमें क्या बताया गया है। यह देखना भी दिलचस्प रहेगा कि उस रिपोर्ट से होने वाले संभावित राजनीतिक हानि का तृणमूल कॉन्ग्रेस और उसके नेतृत्व पर क्या असर पड़ता है। पुलिस प्रशासन और कानून-व्यवस्था की बागडोर सँभालने वाले इसे चाहे जैसे देखते हों पर राजनीतिक नेतृत्व की दृष्टि इससे होने वाले नुकसान पर रहेगी। आज यही एक पहलू है जो उसे हिंसा रोकने के लिए बाध्य कर सकता है।