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अहमदाबाद: GF की मौजूदगी में साहिल शेख ने दोस्त तसकील के साथ मिल कर किया युवती का रेप, मामला दर्ज

मुंबई की 19 साल की युवती के साथ अहमदाबाद के नारोल इलाके के एक फ्लैट में रविवार (फरवरी 14, 2021) को सामूहिक दुष्कर्म का मामला उजागर हुआ। पीड़िता केटरिंग के काम से अहमदाबाद के फ्लैट पर गई थी। वहाँ केटरिंग के कॉन्ट्रैक्टर और उसके दोस्त ने एक अन्य युवती की मौजूदगी में उसके साथ मिल कर रेप किया। 

कॉन्ट्रैक्टर की पहचान साहिल शेख और तसकील कुरैशी के रूप में हुई। इनके साथ इस केस में तान्या दानवाल को भी नामजद किया गया है। तान्या साहिल की प्रेमिका है और जब पीड़िता के साथ रेप किया गया, तब वह वहीं पर मौजूद थी।

पुलिस के मुताबिक, पीड़िता शनिवार को अहमदाबाद गई थी। जहाँ उसे आक्रुति नगर के नारोल के एक फ्लैट में ले जाया गया। फ्लैट पर कई लोग मौजूद थे। इनमें से तीन के साथ उसने शराब भी पी व बाकी 6 अन्य लोग हॉल में मौजूद रहे। 

रात के करीब 10:30 बजे, जब सब खत्म हुआ तो उनमें से चार लोग बाहर आ गए। उनके साथ पीड़िता भी निकली लेकिन उसने पी ज्यादा हुई थी इसलिए सोफे पर गिर गई। रात के करीब 11:30 बजे शेख और कुरैशी उसे दूसरे कमरे में ले गए। शेख ने पहले उसका बलात्कार किया फिर कुरैशी ने। इस बीच दानवाल कमरे में भी गई, लेकिन बाद में वापस आ गई।

देर रात जब युवती को दर्द होना शुरू हुआ तो उसकी आँख खुली। उसने देखा कि प्राइवेट पार्ट से खून निकल रहा था, तब उसे पता चला कि उसका रेप किया गया है। उसके हल्ला मचाने पर वहाँ मौजूद अन्य लोगों को भी घटना का पता चला। बाद में अन्य महिलाओं के साथ सोमवार रात साढ़े 3 बजे पीड़िता थाने पहुँची और शिकायत लिखवाई।

पुलिस ने कुरैशी और दानवाल को फौरन हिरासत में लिया जबकि साहिल मौके से फरार हो गया। पुलिस के अनुसार शिकायत में अन्य महिलाओं के बयान भी दर्ज किए गए हैं और उसके बाद उन्हें उनके घर जाने दिया गया। पीड़िता को अस्पताल ले जाकर मेडिकल टेस्ट करवाया गया है। अब आगे की आवश्यक कार्रवाई चल रही है।

‘जिसकी हर बात मानती थी, उसने ही मुझे…’: सलमान खान से शादी करने 16 साल की लड़की Pak से मुंबई आ गई थी

पूर्व अभिनेत्री सोमी अली ने अपने छोटे से बॉलीवुड करियर को लेकर बातें की हैं। उस दौर में उन्होंने सैफ अली खान और सुनील शेट्टी जैसे अभिनेताओं के साथ स्क्रीन शेयर किया था, लेकिन सलमान खान के साथ नाम जुड़ने के बाद वो खासी चर्चा में आई थीं। पाकिस्तान के कराची में जन्मी सोमी अली फ़िलहाल अमेरिका में ‘नो मोर टीयर्स’ नामक NGO का संचालन करती हैं। उन्होंने कहा है कि 16 वर्ष की उम्र में उनके मुंबई आने का एक ही कारण था – सलमान खान के साथ शादी।

उन्होंने ‘बॉम्बे टाइम्स’ को बताया, “वो 1991 का वर्ष था और मैं मात्र 16 साल की थी। मैंने ‘मैंने प्यार किया’ फिल्म देखी और सोचा कि मुझे इस व्यक्ति से शादी करनी है। मैंने अपनी माँ से कह दिया कि मैं कल ही भारत जा रही हूँ। उन्होंने मुझे मेरे कमरे में भेज दिया लेकिन मैं विनती करती रही कि मुझे सलमान खान के साथ शादी करने के लिए भारत जाने दो।” बता दें कि 1989 में आई ‘मैंने प्यार किया’ उस दशक की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्मों में से एक थी।

सोमी अली ने कहा कि वो जानती थीं कि सलमान खान उनके ‘रक्षक’ बनेंगे। उन्होंने अपने पिता को फोन कर के भारत जाने की जिद की और मुंबई में रिश्तेदारों से मिलने का बहाना बनाया। उन्होंने कहा कि उन्हें ताजमहल देखना है। सोमी अली ने कहा कि उनका बचपन पाकिस्तान में बीता, फिर वो मियामी आ गईं। उन्होंने कहा कि ताजमहल का बहाना तो बनाया, लेकिन अब तक वो आगरा नहीं जा सकी हैं।

उन्होंने कहा कि मुंबई में लोग उनका मजाक बनाते थे, क्योंकि वो एक ‘स्ट्रगलिंग एक्टर’ होकर भी फाईब स्टार होटल में रहती थीं। उन्होंने कहा कि एक प्रोडक्शन हाउस में जब वो गई थी तो उन्होंने सलमान खान को देखा। उन्होंने चंकी पांडेय, जितेंद्र और मिथुन चक्रवर्ती जैसे अभिनेताओं के साथ किए गए काम को याद करते हुए कहा कि 1997 में आई ‘चुप’ में उन्हें ओम पुरी के साथ काम करने का मौका तो मिला, लेकिन उसके बाद उनका करियर ही ‘चुप’ हो गया।

सोमी अली ने कहा कि वो कुछ ज्यादा ही अमेरिकन बन गई थीं और टॉमबॉय हो गई थीं, इसीलिए बॉलीवुड में वो मिसफिट थीं। उन्होंने कहा कि उनके कारण कुछ रिलेशनशिप भी बर्बाद हो गए, क्योंकि उन्हें कोई गलत सलाह दे रहा था – जिसकी वो हर बात मानती थीं। सोमी ने बताया कि उनका रिलेशनशिप भी फेल हो गया, जिसके बाद वो 1999 में मियामी लौट आईं। उन्होंने नौवीं कक्षा में पढ़ाई छोड़ दी थी, लेकिन वापस आकर साइकोलॉजी में डिग्री ली।

बकौल सोमी अली, उन्होंने सलमान खान से कई सालों से बात नहीं की है और चीजों को जाने देने का यही सही तरीका है। उन्होंने कहा, “जब नए लोग ज़िंदगी में आते हैं तो हम उनसे सीखते हैं कि हमें क्या करना चाहिए और क्या नहीं। एक समय आते हैं जब हमें मूव ऑन करना होता है। बचपन में एक्टिंग नहीं कर सकी तो अब क्या वापसी होगी। मैं मुंबई की पानी-पूरी और पाव-भाजी को मिस करती हूँ।”

हिजाब पहनी लड़कियों को जेल, गुबंद वाली मस्जिद खत्म: उइगरों के बाद चीन ने कसा उत्सुल मुस्लिमों पर शिकंजा

उइगर मुस्लिमों के साथ होते अत्याचार की खबरों के बीच पता चला है कि अब चीन की नजर सान्या क्षेत्र के उत्सुल मुस्लिमों पर है। इस क्षेत्र में 10 हजार से भी कम संख्या में ये समुदाय रहता है। मगर, वहाँ ‘चीनी सपने’ को साकार करने की आड़ में इस समुदाय पर अप्रत्यक्ष रूप से हमले होने शुरू हो गए हैं।

जानकारी के अनुसार, सान्या में अब मुस्लिम घरों व दुकानों के बाहर लिखे मजहबी नारों जैसे अल्लाह-हू-अकबर को स्टिकर्स की मदद से ढका जा रहा है। हलाल खाने के बोर्ड को भी रेस्त्रां आदि से हटाया जा रहा है। इस्लामी स्कूल बंद हो रहे हैं और हिजाब पहनने वाली लड़कियों को जेल भेजने की कोशिश हो चुकी है।

न्यूऑर्क टाइम्स की रिपोर्ट बताती है कि चीनी सरकार की मुस्लिम समुदाय के ऊपर ऐसी मनमानियाँ मजहबी कट्टरता रोकने के नाम पर हो रही हैं। उइगर मुस्लिमों के बाद उत्सुल मुस्लिमों पर ऐसा नियंत्रण चीन की कम्युनिस्ट पार्टी का असली तानाशाही चेहरा उजागर करता है। 

फ्रॉस्टबर्ग स्टेट यूनिवर्सिटी में एक एसोसिएट प्रोफेसर जो मैरीलैंड कहते हैं कि उत्सुल मुस्लिमों पर नियंत्रण का कड़ा होना स्थानीय समुदायों के खिलाफ चीनी कम्युनिस्ट अभियान के असली चेहरे को प्रकट करता है। वह कहते हैं कि राज्य का कड़ा नियंत्रण बताता है कि ये सब पूर्ण रूप से इस्लाम विरोधी है।

बता दें कि चीन में इस्लाम को दबाने का काम साल 2018 के बाद से शुरू हुआ, जब चीनी कैबिनेट ने एक गुप्त निर्देश पास किया कि मस्जिदों और मदरसों में अरब के बढ़ते प्रभाव को रोका जाए। लेकिन अब हाल में सान्या में उत्सुल मुस्लिमों के साथ शुरू हुई मनमानी बताती है कि चीन अपनी ही सरकारी नीतियों के उलट चल रहा है। कुछ साल पहले तक इस समुदाय को और इसके मुस्लिम देशों से संबंधों को बढ़ावा दिया जाता था। लेकिन अब ये लोग उसी समुदाय की धार्मिक पहचान को मिटाने का काम कर रहे हैं।

मलेशियन-चीनी लेखक युसूफ लियो कहते हैं कि उत्सुल मुस्लिमों की अलग पहचान है। इन्होंने सदियों से भौगोलिक रूप से अलग रहकर, अपने मजहब को संभाले रखा। वह बताते हैं कि उत्सुल मुस्लिम कई मायनों में मलेशिया के लोगों जैसे हैं। वह एक जैसे कई गुण, जैसे भाषा, पोषाक, इतिहास, और खान-पान साझा करते हैं।

रिपोर्ट के अनुसार स्थानीय मस्जिद के मजहबी नेताओं को अब लाउडस्पीकर्स हटाने के लिए कहा जा रहा है। इसके अलावा, आवाज को भी कम रखने की बात कही गई। एक नई मस्जिद का निर्माण कथित रूप से अरब वास्तुशिल्प तत्वों के विवाद की वजह से रुका हुआ है। जहाँ पूरी तरह से धूल इकट्ठा हो गई है। स्थानीयों का कहना है कि शहर में 18 साल से कम उम्र के बच्चों को अरबी पढ़ने से रोक दिया गया है।

उत्सुल समुदाय के लोगों का कहना है कि वे अरबी सीखना चाहते थे, जिससे न केवल इस्लामी ग्रंथों को बेहतर ढंग से समझ सकें, बल्कि उन अरब के पर्यटकों के साथ भी बातचीत कर सकें, जो उनके यहाँ रेस्त्रां, होटल और मस्जिद में आते हैं। कुछ लोगों ने नए प्रतिबंधों पर नाराजगी व्यक्त की है।

एक स्थानीय मजहबी नेता ने कहा कि समुदाय को बताया गया था कि उन्हें अब गुंबद बनाने की अनुमति नहीं। वह नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर बोले, ”मध्य-पूर्व की मस्जिदें इसी तरह हैं। हम चाहते हैं कि ये भी मस्जिदों की तरह दिखें, न कि घरों की तरह।”

बता दें कि इस संबंध में हाल ही में कुछ लोगों को सरकार की आलोचना करने पर हिरासत में भी ले लिया गया था। वहीं, पिछले साल सितंबर महीने में उत्सुल पैरेंट्स और कुछ स्टूडेंट्स ने हिजाब नहीं पहनने के आदेश के खिलाफ कई स्कूलों और सरकारी दफ्तरों के बाहर विरोध प्रदर्शन भी किया था।

गौरतलब है कि एक ओर जहाँ सान्या के उत्सुल मुस्लिमों को लेकर ऐसी खबर आई है वहीं चीन के शिनजियांग प्रांत में उइगर मुस्लिमों पर अत्याचार अब सामान्य हो चुका है। वहाँ चीनी अधिकारी उइगरों की पहचान मिटाने के लिए उन्हें कैंप में रखते हैं, उनके मस्जिदों रिकंस्ट्रक्ट करते हैं और घरों के इंटीरियर तक को बदलने का काम वहाँ किया जाता है। इसके अलावा पुरूषों को असहनीय पीड़ा और महिलाओं का बर्बरता से रेप उइगर मुस्लिमों के लिए कोई नई बात नहीं रह गई है।

17 साल की लड़की, फौज की 2 बटालियन और लगान माफी का लालच: अंग्रेजों को पानी पिलाने वाली रानी गाइदिन्ल्यू

“अरे ओ साम्बा! सरकार कितने का ईनाम रखी है रे हम पर?” एक मशहूर से वक्तव्य में ‘शोले’ का गब्बर पूछता है। जिस पर ईनाम ही न हो, वो बागी कैसा? सरकार के खिलाफ आपने कितनी बड़ी बगावत कर रखी है, इसका पता ही इसी बात से चलता है कि आपके सर पर ईनाम कितने का है।

आज जरूर लोकतंत्र है और जनता की चुनी हुई सरकार के खिलाफ होने के कारण किसी का ‘ईनामी’ होना बदनामी होती है। अर्थों के ऐसे बदलने की वजह से ही हम जब ‘टूलकिट पत्रकारों’ को ‘ईनामी पत्रकार’ कह देते हैं तो उनकी भावना भी आहत हो जाती है।

थोड़े पुराने दौर में ऐसा नहीं था। प्रकट तौर पर भले लोग न दर्शाएँ, लेकिन जनभावनाओं में ब्रिटिश सरकार का ‘ईनामी’ भारतीय जनमानस के लिए सम्मानित ही होता था। उनके सर पर ईनाम भी कोई छोटा मोटा नहीं था। फिरंगी दौर में आज से करीब सौ वर्ष पहले 1930 के दशक में जब उनके सर 500 का ईनाम रखा गया, तो ये काफी बड़ी रकम थी। ईनाम सिर्फ इतना ही नहीं था। जिस गाँव में वो पकड़ी जाती, उसके लिए भी अगले दस वर्ष तक टैक्स में छूट थी। इस सब के वाबजूद ये लड़की पकड़ी नहीं जा रही थी। करीब सत्रह साल की इस लड़की को पकड़ने के लिए फिरंगियों को असम रायफल्स की तीसरी और चौथी बटालियन उतारनी पड़ी।

सत्रह साल की ये लड़की रानी गाइदिन्ल्यू (Gaidinliu) थी। आज के असम, नागालैंड और मिजोरम के क्षेत्रों में उस समय ‘हेराका’ (शुद्धिकरण) का आन्दोलन चल रहा था। साथ ही साथ, ये आन्दोलन राष्ट्रवादी भी था, इसलिए इसके नेता जदोनाँग को फिरंगियों ने गिरफ्तार करके फाँसी पर चढ़ा दिया था।

तेरह वर्ष की आयु में हेराका से जुड़ी रानी गाइदिन्ल्यू ने अपने भाई की मृत्यु के बाद आन्दोलन की कमान संभाल ली। स्थानीय धार्मिक नेतृत्व का उभारना ईसाई फिरंगियों को पसंद तो नहीं ही आना था। इसलिए बड़े ईनाम और मजबूत सेना के साथ उनकी तलाश शुरू हुई। उन्हें 1932 में गिरफ्तार किया जा सका। नेहरू उनसे 1937 में मिले थे और अपने इंटरव्यू में रानी गाइदिन्ल्यू बुलाने के कारण गाइदिन्ल्यू के नाम में रानी जुड़ गया।

जब 1946 में भारत में प्रोविंशियल गवर्नमेंट बनी, तब जाकर रानी गाइदिन्ल्यू को छोड़ा गया। तब तक वो अलग-अलग जेलों में करीब 14 वर्ष बिता चुकी थी। जेल से छूटने के बाद रानी गाइदिन्ल्यू में जुटी रहीं, लेकिन फिर क्रन्तिकारी के जीवन में क्रांति एक ही बार कब होती है?

रानी गाइदिन्ल्यू एक जेलिआँगरोंग समूह के कबीलों के भारत राष्ट्र के अन्दर होने की वकालत करती थीं। इसकी तुलना में नागा समूह के कबीलों में अलग देश की माँग उठ रही थी। रानी गाइदिन्ल्यू जिस हेराका संस्कृति की बात करती थी, वो प्रकृति इत्यादि के पूजन वाली व्यवस्था थी। नारी-विरोधी बैप्टिस्ट ईसाई नागा किसी पैगन व्यवस्था को जीवित कैसे रहने दे सकते थे? बैप्टिस्ट ईसाई व्यवस्था को चुनौती देने के कारण उन्हें गंभीर परिणाम भुगतने की धमकियाँ मिलने लगीं और अंततः उन्हें 1960 में फिर से भूमिगत होना पड़ा।

इन सबके बीच, ईसाइयों द्वारा उनकी हत्या की कोशिशों के बाद भी उनका हेराका आन्दोलन रुका नहीं। जब वो कोहिमा में थीं (1972) तब उन्हें स्वतंत्रता सेनानी का ताम्रपत्र मिला। दस वर्ष बाद (1982 में) उन्हें पद्मभूषण भी मिला था।

बैप्टिस्ट ईसाइयों का विरोध करने वाली स्वतंत्रता सेनानी की आवाज भी किस हद तक दबाई जा सकती है, इसका अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि आपने हाल के दौर तक रानी गाइदिन्ल्यू के बारे में बिकने वाली मीडिया में कुछ भी नहीं पढ़ा। आज भी आप उनके बारे में सोशल मीडिया पर ही पढ़ पा रहे है। ऐसा तब है जब पत्रकारिता के विख्यात संस्थान – दिल्ली के आईआईएमसी का हॉस्टल ही रानी गाइदिन्ल्यू के नाम पर है!

बाकी जब गैर कॉन्ग्रेसी स्वतंत्रता सेनानियों को याद कीजिएगा तो रानी गाइदिन्ल्यू का नाम भी याद कर लीजियेगा। ये भी सोचियेगा कि जब कॉन्ग्रेस के अलावा दूसरे संगठनों के आंदोलनों की बात की जाती है, तो कैसे उन्हें संस्कृति-साहित्य आदि से बौद्धिक रूप से क्षीण बताया जाता है।

ऐसा तब है, जब रानी गाइदिन्ल्यू जिस हेराका आन्दोलन को चलाती रही, वो मुख्यतः अपनी सभ्यता-संस्कृति बचाने के लिए ही था। बाद तक इसे बैप्टिस्ट ईसाइयों का हिंसक विरोध झेलना पड़ा। आज उनकी याद इसलिए क्योंकि आज (17 फ़रवरी 1993) उनकी पुण्यतिथि होती है।

आजाद भारत में फाँसी पाने वाली पहली महिला शबनम: सलीम के प्यार में 7 परिवार वालों को कुल्हाड़ी से काट डाला था

स्वतंत्र भारत में किसी पहली महिला कैदी को फाँसी देने की तैयारी चल रही है। आज़ाद भारत के इतिहास में आज तक किसी महिला अपराधी को फाँसी की सजा नहीं दी गई। उत्तर प्रदेश के मथुरा में राज्य का इकलौता फाँसीघर है, जहाँ ये कार्रवाई पूरी की जाने की तैयारी चल रही है। उक्त महिला कैदी का नाम शबनम है, जिसने अपने प्रेमी के साथ मिल कर अपने ही परिवार के 7 लोगों की कुल्हाड़ी से काट कर बेरहमी से हत्या कर दी थी।

निर्भया के आरोपितों को फाँसी पर लटकाने वाले पवन जल्लाद फाँसी देने की प्रक्रिया पूरी करेंगे। उन्होंने मथुरा के महिला फाँसीघर में चल रही तैयारियों का दो बार जायजा भी लिया है। हालाँकि, अभी फाँसी की तारीख़ नहीं तय की गई है। अमरोहा की रहने वाले शबनम ने 2008 में इस वारदात को अंजाम दिया था। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने शबनम को मिली सजा बरकरार रखी थी और राष्ट्रपति भी उसकी दया याचिका ख़ारिज कर चुके हैं।

मथुरा जेल में यूँ तो आज से 150 वर्ष पूर्व ही फाँसीघर तैयार कर लिया गया था, लेकिन आज़ादी के बाद अब तक ऐसा नहीं हुआ कि किसी महिला अपराधी को फाँसी दी गई हो। वरिष्ठ जेल अधीक्षक शैलेंद्र कुमार मैत्रेय ने कहा कि डेथ वारंट जारी होने के बाद तारीख तय कर के शबनम को फाँसी दे दी जाएगी। तख्ता-लीवर में पवन जल्लाद को कमी दिखी, जिसे ठीक करवाया जा रहा है। बिहार के बक्सर से फाँसी के लिए फंदा आएगा, जबकि रस्सी मनीला से लाई जाएगी।

38 वर्षीय शबनम का 12 साल का एक बेटा भी है। गिरफ़्तारी के वक़्त गर्भवती रही शबनम ने जेल में ही बेटे को जन्म दिया था। वो 7 वर्ष तक जेल में ही पला-बढ़ा, जिसके बाद अब वो एक व्यक्ति की देखरेख में है। शबनम फ़िलहाल रामपुर की जेल में बंद है। 15 वर्ष पूर्व बुंदेलखंड की रामश्री को फाँसी दी जानी थी, लेकिन महिला संगठनों के हंगामें के बाद सजा उम्रकैद में बदल दी गई थी। कल्लू जल्लाद ने तब तैयारियाँ भी पूरी कर ली थी।

बावनखेड़ी गाँव के मास्टर शौकत अली की बेटी शबनम ने अपने प्रेमी सलीम के साथ मिलकर 14-15 अप्रैल, 2008 की रात को अपने ही घर में 7 खून किए थे। उसने अपने माता-पिता, दो भाई, एक भाभी, मौसी की लड़की और मासूम भतीजे को मार डाला था। अब 1870 में निर्मित मथुरा के महिला फाँसीघर में उसे उसके गुनाहों की सज़ा मिल सकती है, अगर बीच में कोई अड़चन न आए। प्रशासन तैयारियों में लगा है।

एमए पास शबनम उस समय गाँव के स्कूल में शिक्षा मित्र थीं। मास्टर शौकत उसकी शादी किसी पढे़-लिखे लड़के से करना चाहते थे। लेकिन, शबनम का दिल अपने गाँव के 8वीं पास सलीम पर आ चुका था। दोनों का प्यार इतना परवान चढ़ा कि शबनम ने अपने घरवालों को नशे की दवाई देकर सलीम को हर रात घर पर बुलाना शुरू कर दिया। कुछ दिनों में दोनों ने परिवार को बाधा मानकर उन्हें खत्म करने की साजिश रची और फिर एक रात इस खौफनाक वारदात को अंजाम दे दिया।

मस्जिद में हिजाब… लेकिन भगवान गणेश की लॉकेट नंगे होकर: हिंदू-घृणा से सना है हॉलीवुड, रिहाना के अलावा 5 और हैं नाम

बॉलीवुड में पसरा हिंदूफोबिया अक्सर सिनेमा और वेबसीरीज के माध्यम से दर्शकों में देखा जाता रहा है, लेकिन हाल में अमेरिकी पॉप सिंगर रिहाना के टॉपलेस तस्वीर के साथ भगवान गणेश के लॉकेट ने इस बात को चर्चा में ला दिया है कि क्या ऐसी कोशिश हॉलीवुड ने भी शुरू कर दी है? 

वास्तविकता में हॉलीवुड में हिंदूफोबिया कोई नई बात नहीं है। इससे पहले अमेरिका की एक महिला रैपर कार्डी बी ने रिबॉक के स्निकर्स को प्रमोट करने के लिए दुर्गा माँ का मजाक उड़ाया था। 

नेक लेस टॉप के साथ वह हाथ में लाल रंग के जूते लिए नजर आई थी और उनका अवतार बिलकुल ऐसा था जैसे हिंदू ग्रंथों में देवी दुर्गा के लिए दर्शाया जाता रहा है। उनकी वह तस्वीर देखने के बाद कई भारतीयों ने इसका विरोध किया था, जिसके चलते उन्हें माफी माँगनी पड़ी थी।

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कार्डी बी (साभार: रीडर सेक्टर फीमेल)

ऐसे ही साल 2008 में हेदी क्लम (Heidi Klum) ने एक हैलोवीन पार्टी में काली माँ का रूप धारण कर हिंदुओं की भावनाओं को आहत किया था। उनके इस रूप की तस्वीरें वायरल होने के बाद कई हिंदू नेताओं ने उनका विरोध किया था और उनसे सार्वजनिक तौर पर माफी माँगने को कहा गया था। हिंदू नेताओं का कहना था कि काली की पूजा हिंदू मंदिर में करते हैं, पब्लिसिटी स्टंट के लिए क्लब में नहीं लाया जा सकता।

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हेदी क्लम

साल 2017 में कैटी पैरी का एक सोशल मीडिया पोस्ट इसी तरह वायरल हुआ था। उसमें अपने मूड की तुलना उन्होंने काली माँ की तस्वीर से शेयर करके की थी। कैटी के ऐसे प्रयासों को हिंदुओं ने अभद्र करार दिया था।

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इसी तरह डीजे ओ कार्ली ने भी अपनी आस्था के नाम पर देवी काली के रूप का इस्तेमाल हैलोवीन कार्यक्रम में शामिल होने के लिए किया था। लोगों ने इसे देख उन पर गुस्सा जाहिर किया था और कहा था कि हमारा धर्म तुम्हारा हैलोईन कॉस्ट्यूम नहीं है।

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साभार: इंडियन स्पाइस

उक्त घटनाओं से ये साफ है कि हिंदू देवी-देवताओं का मजाक उड़ाना या उन्हें गलत तरह से प्रस्तुत करना हॉलीवुड के लिए कोई नई बात नहीं है। रिहाना ने भी नग्न तस्वीर के साथ गणेश लॉकेट की तस्वीर साझा करके सिर्फ़ उसी परंपरा को आगे बढ़ाया है, जहाँ हिंदुओं की आस्था से ख़िलवाड़ सामान्य माना जाने लगा है।

नंगे शरीर पर गणेश जी का लॉकेट लटका कर फोटो खिंचवाने का क्या मतलब हो सकता है? हिंदुओं को आहत करने से अधिक कुछ भी नहीं। प्रोग्रेसिव फोटोशूट की बात थी तो लॉकेट के रूप में कोई और चीज भी गले में लटकाई जा सकती थी, लेकिन ऐसा नहीं किया गया, क्योंकि उसे हिंदू समुदाय, महिला की निजता का मामला मानता और भावनाओं को ठेस दूर-दूर तक नहीं पहुँचती। 

रिहाना गणेश लॉकेट
टॉपलेस होकर गणेश लॉकेट के साथ फोटो खिंचाती रिहाना

दिलचस्प बात यह है कि हिंदू देवताओं का लॉकेट गले में टाँग अपनी टॉपलेस तस्वीर ख़िंचाने वाली रिहाना वही खुले विचारों की महिला हैं, जिन्हें जब मस्जिद के बाहर फोटोशूट कराना था तो वह नकाब ओढ़ कर गई थीं, जबकि उससे पहले तक उन्हें उनके सेक्सी पोज और न्यूड फोटोशूट के लिए जाना जाता था।

हिजाब में रिहाना
मस्जिद में फोटोशूट कराने के लिए हिजाब पहन तैयार हुई रिहाना

शायद, रिहाना को मालूम था कि यदि वो एक निश्चित समुदाय के प्रति इतना सम्मान नहीं दिखाएँगी तो उनका क्या होगा। लेकिन फिर भी हालत देखिए, अपनी तरफ से सामान्य पहनावा पहनने के  बावजूद शेख जायद शाही मस्जिद के अधिकारियों ने उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया था, वो भी सिर्फ़ इसलिए क्योंकि उन्होंने अपने फोटोशूट के दौरान कोई गलत पोज देने की कोशिश की थी। उससे पूर्व मस्जिद के कंपाउंड में खड़े होकर पोज देने के लिए भी बहुत हंगामा मचा था।

प्‍लेबॉय मॉडल ल्युआना सैंडियन (साभार: इंस्टाग्राम)

मालूम हो कि रिहाना अकेली ऐसी हस्ती नहीं हैं, जिन्हें इस्लामी रिवाज के कारण मस्जिद के बाहर या फिर इस्लामी देश में उटपटांग फोटोशूट कराने के लिए चलता किया गया हो। अभी हाल में मुस्लिम देश दुबई में एक प्लेबॉय मॉडल ल्युआना सैंडियन को टॉपलेस तस्‍वीर खिंचवाना भारी पड़ गया था। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर यूज़र्स आलोचनाओं के साथ उन्हें धमकी भरे मैसेज भेजे जाने लगे थे। 

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टखने दिखाती सेलेना गोम्ज (साभार: डेलीमेल)

हालाँकि, इस मामले को लेकर मॉडल का कहना था कि उन्होंने कुछ भी गलत नहीं किया है। शूट के दौरान उन्होंने हाथों से अपने ब्रेस्ट को ढक लिया था। उनके अलावा पॉप स्टार सेलेना गोमेज के आबू धाबी की ग्रैंड मस्जिद में ड्रेस उठाकर टखने दिखाते तस्वीर पर विवाद हुआ था। बात इतनी बढ़ गई थी कि सेलेना को लोगों की नाराजगी और बढ़ते विवाद को देख कर अपनी ये दोनों तस्वीरें अपने अकाउंट से हटानी पड़ी थी।

31 वर्षों बाद खुला श्रीनगर का शीतल नाथ मंदिर: इस्लामी आतंकियों ने जला डाला था, विशेष पूजा के साथ दर्शन चालू

श्रीनगर का शीतल नाथ मंदिर पिछले 31 वर्षों से बंद पड़ा हुआ था, जिसे मंगलवार (फरवरी 16, 2021) को वसंत पंचमी के मौके पर खोला गया। इस मंदिर को इस्लामी आतंकवाद और हिन्दुओं के पलायन के कारण बंद किया गया था। ये मंदिर जम्मू कश्मीर की राजधानी श्रीनगर के हब्बा कदल क्षेत्र में स्थित है। मंदिर को 3 दशकों बाद पुनः खोलने के बाद श्रद्धालुओं ने यहाँ विशेष पूजा का भी आयोजन किया।

मंदिर में पूजा करने आए एक श्रद्धालु संतोष राजदान ने कहा कि स्थानीय लोगों ने इस मंदिर को खोलने में बड़ी भूमिका निभाई है। वहीं कई लोग इसे ‘नया जम्मू कश्मीर’ का कमाल भी बता रहे हैं। उन्होंने बताया कि अब तो मुस्लिमों ने भी मंदिर को खोलने में मदद की है। यहाँ आसपास पहले काफी सारे हिंदू रहा करते थे, जिन्हें इस्लामी आतंकवाद के कारण पलायन करना पड़ा था। अब यहाँ दर्शन चालू हो गया है।

शीतल नाथ मंदिर में आयोजित पूजा के आयोजकों में से एक रवींद्र राजदान ने कहा कि स्थानीय लोगों ने मंदिर की साफ़-सफाई में खासी मदद की है। पहले प्रत्येक वर्ष इस तरह की पूजा की जाती थी। बाब शीतल नाथ भैरों की जयंती भी वसंत पंचमी के दिन ही पड़ती है, इसीलिए ये दिन श्रद्धालुओं के लिए विशेष है। जब कश्मीरी पंडित यहाँ रहा करते थे, तब वो नियमित रूप से यहाँ पूजा-पाठ किया करते थे।

शीतल नाथ मंदिर से ग्राउंड रिपोर्ट (वीडियो साभार: Times Now)

यहाँ अब आसपास कोई हिंदू परिवार नहीं बचा है। रवींद्र राजदान इस मंदिर के सेवादार हैं, जिन्होंने इसे खोलने में बड़ी भूमिका निभाई है। उन्होंने कहा कि वे इस जगह के निवासी हैं। उन्होंने बताया कि इस मंदिर को 1991 में जला दिया गया था। उन्होंने कहा कि 3 दशक पहले यहाँ मेला लगा करता था और दुकानें सजती थीं। उन्होंने बताया कि अब हम फिर उसी महिमा को वापस लाना चाहते हैं, जिसके लिए सरकार की भी मदद चाहिए।

उन्होंने कहा, “ये कश्मीरी पंडितों का निवास स्थान है। हम चाहते हैं कि हम यहाँ आएँ और रहें। उसी वैभव के साथ, जैसे पहले हम यहाँ निवास किया करते थे। लेकिन, राज्य और केंद्र सरकारों को भी हमें इसके लिए सहायता करनी चाहिए। स्थिति ऐसी बनाई जानी चाहिए, ताकि हम यहाँ रहने लायक बनें। सरकारें सिर्फ वादा करती हैं, लेकिन वादों से पेट नहीं भरता है।” उन्होंने उम्मीद जताई कि कश्मीरी पंडितों की वापसी होगी।

‘दक्षिण अफ्रीका ने भारत को वापस भेज दी कोरोना वैक्सीन की 10 लाख डोज, कारगर नहीं है, हो रही बीमारी’ – Fact Check

कई मीडिया संस्थानों ने खबर चलाई है कि दक्षिण अफ्रीका ने भारत से ली गई वैक्सीन की डोज लौटाने का फैसला किया है। इन ख़बरों में कहा गया कि पुणे के ‘सीरम इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (SII)’ से ली गई कोरोना वैक्सीन की 1 मिलियन डोज दक्षिण अफ्रीका अब उसे वापस लौटा देगा। बताया गया कि वायरस के नए म्युटेंट पर ये कारगर नहीं है और इससे बीमारी हो रही है, इसलिए ऐसा फैसला लिया गया।

पाकिस्तान की सत्ताधारी पार्टी ‘तहरीक-ए-इंसाफ (PTI)’ ने भी फ़ोर्ब्स की खबर शेयर कर के दावा किया कि भारत पूरी दुनिया को खतरे में डाल रहा है। सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने भी ‘द हिन्दू’ की खबर शेयर कर इसे आगे बढ़ाया। NDTV ने भी रिपोर्ट्स के हवाले से इस खबर को लपक लिया और दक्षिण अफ्रीका के स्वास्थ्य मंत्री के हवाले से इस खबर को आगे बढ़ाया। ‘इकनोमिक टाइम्स’ और ‘आउटलुक’ ने भी इस बारे में खबर प्रकाशित की।

पोर्टल ‘VCCircle’ ने भी अपनी खबर में कहा कि AstraZeneca के शॉट्स तैयार करने वाली SII को दक्षिण अफ्रीका की सरकार ने कह दिया है कि वो अपने दिए 10 लाख वैक्सीन की डोज वापस ले ले। कई अन्य मीडिया पोर्टल्स ने भी इस खबर को प्रकाशित किया। सोशल मीडिया पर इसे शेयर कर के भाजपा विरोधियों ने अपने वही पुराने राग को अलापा, जिसमें इस वैक्सीन को खतरनाक बताया गया था।

अब आपको बताते हैं कि इस खबर की सच्चाई क्या है। दक्षिण अफ्रीका के स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर ज़्वेली मखीज़ ने मंगलवार (फरवरी 16, 2021) को स्पष्ट किया कि उनके देश ने SII को वैक्सीन वापस नहीं किया है। ‘स्टेट ऑफ द नेशन एड्रेस डिबेट’ के दौरान संसद में उन्होंने साफ़ किया कि मीडिया रिपोर्ट्स में जैसा कहा जा रहा है, ऐसा कुछ भी नहीं है। ‘Wion News’ ने मंत्री के इस बयान को प्रकाशित किया है।

दक्षिण अफ्रीका के स्वास्थ्य मंत्री ने इस पर सफाई देते हुए आगे कहा, “मैं फिर से ये साफ़ कर देना चाहता हूँ कि वैक्सीन एक्सपायर नहीं हुए हैं और हमने खुद से परीक्षण कर के 31 अप्रैल की एक्सपायरी तारीख तय की है। गलत अफवाह फैलाई गई कि वैक्सीन एक्सपायर हो गए हैं। हमने जॉनसन एंड जॉनसन वैक्सीन की भी 90 लाख डोज ऑर्डर की है। कई अंतरराष्ट्रीय चैनलों से वैक्सीन निर्माताओं से बातचीत जारी है।”

बता दें कि भारत अब तक 15 से अभी अधिक देशों को वैक्सीन की खेप भेज कर उनकी मदद कर चुका है। भारत इसी महीने कनाडा को कोरोना वैक्सीन ‘कोविशील्ड’ की पाँच लाख खुराक भेजेगा। भारत सरकार ने इसकी मंजूरी दे दी। कनाडाई प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच फोन पर हुई बातचीत के बाद ये मंजूरी दी गई। इसी तरह पाकिस्तान के अलावा सभी पड़ोसी मुल्कों को भी वैक्सीन दी गई।

महंत पर चाकुओं से ताबड़तोड़ वार, लखनऊ में चल रहा इलाज: लईक खान ने अतीक, सलमान के साथ किया हमला

उत्तर प्रदेश के सीतापुर में मंगलवार (फरवरी 16, 2021) को ‘बड़ी संगत’ के महंत मुनि बजरंग दास पर चाकुओं से जानलेवा हमला किया गया। महंत पर ये हमला तब हुआ, जब समुदाय विशेष के लोग विवादित बाग़ में दवा का छिड़काव कर रहे थे और महंत ने इस पर विरोध जताया। इसके बाद आरोपितों ने महंत पर चाकुओं से ताबड़तोड़ कई वार किए, जिससे वो जख्मी हो गए। हमले में महंत के सुरक्षाकर्मी सहित 4 लोग जख्मी हो गए।

‘न्यूज़ 18’ की खबर के अनुसार, घायल महंत मुनि बजरंग दास की गंभीर हालत को देखते हुए उन्हें लखनऊ रेफर कर दिया गया है। घटना की संवेदनशीलता को देखते हुए जिले के डीएम और एसपी ने खुद घटनास्थल पर जाकर स्थिति का जायजा लिया। मौके पर भारी पुलिस बल तैनात है। ये घटना खैराबाद थाना क्षेत्र की है। उक्त बाग़ विवादित है, जहाँ समुदाय विशेष के लोग दवा का छिड़काव करने पहुँच गए थे।

जैसे ही महंत ने विरोध जताया, समुदाय विशेष के कई लोग धारदार हथियारों से लैस होकर वहाँ पहुँच गए। इस जमीन को लेकर काफी समय से विवाद चला आ रहा है। संगत की कई बीघा जमीन महंत ने हाल ही में कब्जे से मुक्त कराई है। प्रशासन की तरफ से महंत को बंदूक से लैस एक सुरक्षाकर्मी भी दिया गया है। स्थानीय प्रशासन ने कहा है कि ये जमीन का विवाद है और मामले की जाँच की जा रही है।

मुख्य आरोपित का नाम लईक खान है, जिसने अपने साथियों के साथ महंत पर हमला किया। साथ में उसके भाई सलमान और अतीक भी थे। डीएम विशाल भारद्वाज और एसपी आरपी सिंह खुद मामले पर नजर रख रहे हैं।

‘उदासीन अखाड़ा’ के महंत धर्मेंद्र दास ने शांति की अपील करते हुए कहा कि आपसी विवाद में कहासुनी हुई और महंत बजरंग को चोट आई। उन्होंने प्रशासन को स्थिति को संभालने के लिए धन्यवाद देते हुए कहा कि चीजें नियंत्रण में हैं और अफवाह न फैलाएँ।

सीतापुर पुलिस ने बताया है कि खैराबाद क्षेत्र में जिलाधिकारी एवं पुलिस अधीक्षक की अध्यक्षता में शांति समिति की बैठक की गई, जिसमें दोनों समुदायों के गणमान्य लोग शामिल हुए। पुलिस ने कहा कि कानून/शांति व्यवस्था सम्बन्धी कोई समस्या नहीं है।

महंत की हालत भी स्थित बताई गई है, जिसकी पुष्टि ‘उदासीन अखाड़े’ ने भी की है। अभियुक्तों के खिलाफ जाँच कर के कार्रवाई की बात कही गई है। ये घटना ऐसे समय में हुई है, जब दिल्ली के मंगोलपुरी में चाकुओं से रिंकू शर्मा की हत्या से लोग आक्रोशित हैं।

प्रदर्शनकारी ने दिल्ली पुलिस के SHO पर तलवार से किया जानलेवा हमला, अस्पताल में भर्ती: नशे में धुत था ‘किसान’ हरप्रीत

गणतंत्र दिवस के दिन जिस तरह से ‘किसान’ प्रदर्शनकारियों की हिंसा में 500 पुलिसकर्मी घायल हुए थे, उसे अभी देश भूल भी नहीं है कि पुलिसकर्मियों पर फिर हमले किए जा रहे हैं। सिंघु सीमा पर फिर से दिल्ली पुलिस के एक SHO पर तलवार से हमला किया गया। मंगलवार (फरवरी 16, 2021) की रात 8 बजे हरप्रीत सिंह नामक प्रदर्शनकारी ने तलवार के बल पर जानलेवा हमला कर के दिल्ली पुलिस की कार छीन ली।

उक्त प्रदर्शनकारी कार लेकर चंपत होने लगा, जिसके बाद पुलिस ने उसका पीछा करना शुरू किया। मुकरबा चौक पर जब उसने खुद को घिरा हुआ पाया तो उसने कार को वहीं पर छोड़ दी और वहाँ पड़ी एक स्कूटी लेकर भाग खड़ा हुआ। समयपुर बादली थाने में तैनात SHO आशीष दुबे पुलिस बल के साथ उसका पीछा कर रहे थे, इसी दौरान उसने तलवार से हमला कर दिया और वो जख्मी हो गए।

तलवार के हमले में उनकी जान बाल-बाल बची। उँगलियों और गर्दन में जख्म होने के कारण उन्हें रात को ही अस्पताल में इलाज के लिए भर्ती कराया गया। आरोपित पंजाब का रहने वाला है। उसके खिलाफ दो मुकदमे दर्ज कर लिए गए हैं। पुलिस ने उसे गिरफ्तार भी कर लिया है। पुलिस ने बताया है कि आरोपित नशे में भी था। उससे पूछताछ की जा रही है। इससे प्रदर्शन स्थल पर नशे को लेकर भी सवाल खड़ा हुआ है।

इससे पहले भी ऐसी वारदात सामने प्रदर्शनकारियों ने अलीपुर के SHO पर तलवार से हमला कर दिया था और वो गंभीर रूप से घायल हो गए थे। जनवरी 29, 2021 की इस घटना में प्रदर्शन कर रहे किसानों ने वहाँ मौजूद SHO पर तलवार से हमला कर दिया था, जिसमें उनका हाथ जख्मी हो गया। घायल SHO को अस्पताल ले जाकर तलवार को कब्जे में ले लिया गया था। 26 जनवरी को ऐसी कई वारदातें हुई थीं।