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अब सौरव गांगुली की करीबी MLA वैशाली डालमिया ने TMC की खोली पोल, लक्ष्मी रतन भी मंत्री पद से दे चुके हैं इस्तीफा

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव से पहले सौरव गांगुली की एक और करीबी व बल्ली विधानसभा से तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) विधायक वैशाली डालमिया ने अपनी ही पार्टी के खिलाफ़ मोर्चा खोल दिया है। इससे पहले सौरव के खास लक्ष्मी रतन शुक्ला ने मंत्री पद से अपना इस्तीफा ममता सरकार को सौंपा था।

वैशाली डालमिया पूर्व क्रिकेट एडमिनिस्ट्रेटर जगमोहन डालमिया के बेटी होने के साथ सौरव गांगुली की अच्छी फैमिली फ्रेंड भी हैं। ऐसे में उनकी नाराजगी को सौरव गांगुली से जोड़ कर देखा जा रहा है। हालाँकि, डालमिया का कहना है कि उन्हें तृणमूल कॉन्ग्रेस के शासन में राज्य की चिंता है। उन्होंने ने पार्टी के वर्क कल्चर पर सवाल उठाए हैं।

उन्होंने कहा कि पार्टी में कुछ लोग दूसरों को काम नहीं करने दे रहे। ऐसे लोग दीमक की तरह पार्टी को अंदर ही अंदर खोखला कर रहे हैं। इंडिया टीवी को दिए साक्षात्कार में उन्होंने बताया कि पिछले तीन वर्षों से अपने विधानसभा में हो रहे भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ आवाज उठा रही हैं। उनकी मानें तो पार्टी के लोग ही एक-दूसरे को पिछले 3-4 साल से काम करने नहीं दे रहे हैं।

टीएमसी पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि हाल ही में ममता सरकार के मंत्री लक्ष्मी रतन शुक्ला ने दुखी होकर मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया और अब उन्हें पार्टी के लोगों के हमले का सामना करना पड़ रहा है। ये ऐसे लोग (TMC) हैं, जो दूसरी पार्टियों से ही नहीं, बल्कि अपनी पार्टी के अंदर ही लड़ते रहते हैं। इन्हें मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से भी कोई लगाव नहीं है।

वह कहती हैं कि उन्हें रतन शुक्ला के इस्तीफे के बाद बहुत बुरा लग रहा है। वह अच्छा काम कर रहे थे। वह पार्टी के कामकाज से नाराज नहीं हैं, लेकिन उनकी शिकायत है कि टीएमसी पार्टी के सदस्य ही काम के दौरान रोड़ा बनने का काम करते हैं।

तृणमूल कॉन्ग्रेस में ऐसे लोग हैं जिन्हें पार्टी कार्यकर्ताओं से कोई प्यार नहीं है, जो राज्य के लोगों से प्यार नहीं करते, वे सिर्फ खुद से प्यार करते हैं। वे दीमक हैं जो पार्टी को भीतर से खा रहे हैं। ये वे लोग हैं जो दूसरी पार्टियों से नहीं लड़ते बल्कि भीतर के लोगों से लड़ते हैं। उन्हें ममता बनर्जी से प्यार भी नहीं है।

क्या भाजपा में शामिल होंगी वैशाली?

वैशाली के बयान के बाद ये अटकलें लगाई गईं कि वह भाजपा में शामिल होने वालीं हैं। हालाँकि उन्होंने इस पर विराम लगाते हुए कहा कि फिलहाल उनकी भाजपा से जुड़ने की इच्छा नहीं है। उन्होंने कहा, “मैं लोगों के लिए काम करना जारी रखूँगी। मुझे कई बार गैर-राजनीतिक कहा गया है। अब ऐसा ही होगा। मैं लोगों के साथ काम करना जारी रखूँगी, उनके साथ खड़ी रहूँगी। ”

दीदी बनाम दादा?

वैशाली की सौरव गांगुली से करीबियों के कारण भी उनके भाजपा में शामिल होने की बातें कहीं गई थी। हाल में लक्ष्मी रतन के पद से इस्तीफा देने पर भी यही अटकलें तेज हुई थीं। जिनके पीछे सबके बड़ा कारण सौरव गांगुली की भाजपा से करीबियाँ है।

गांगुली न केवल अमित शाह और उनके बेटे जय शाह के करीबी माने जाते हैं बल्कि हाल में उन्होंने राज्यपाल धनखड़ के साथ भी मुलाकात की थी। इसी प्रकार डोना गांगुली भी भाजपा महिला मोर्चा की दुर्गा पूजा में नृत्य प्रदर्शन करते देखी गई थीं। गांगुली की लोकप्रियता का ही नतीजा है कि आगामी विधानसभा लोग को दादा बनाम दीदी के नजरिए से देख रहे हैं।

वैशाली की भाँति लक्ष्मी रतन को भी अपने फैसले के बाद साफ करता पड़ा था कि चूँकि वह कुछ समय तक राजनीति से दूरी बनाना चाहते हैं इसलिए उन्होंने इस्तीफा दिया है। उन्होंने किसी भी पार्टी में शामिल होने के कयासों को खारिज किया था। साथ ही कहा था कि अभी वह विधायक हैं और फिलहाल मंत्री पद से इस्तीफा देकर सिर्फ़ अपना ध्यान खेल पर लगाएँगे।

भारी बर्फबारी के बीच मंजूर अहमद की गर्भवती बीवी को लेकर 2 किमी चले जवान, अस्पताल पहुँचाया-गूँजी किलकरियाँ

कश्मीर में जारी भारी बर्फ़बारी के बीच सेना एक तरफ आतंकी मंसूबों को नाकाम करने में जुटी है, दूसरी तरफ उसके जवान हर हालात में स्थानीय लोगों की मदद को तत्पर हैं। घुटनों तक जमी बर्फ़ के बीच भारतीय सेना के जवान एक गर्भवती महिला को अस्पताल पहुँचाने के लिए दो किलोमीटर तक चले। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ महिला ने शुक्रवार (8 जनवरी 2021) को करलपुरा अस्पताल में एक लड़के को जन्म दिया।  

मंगलवार (5 जनवरी 2021) को कुपवाड़ा के करलपुरा स्थित भारतीय सेना, कंपनी ऑपरेशन बेस (सीओबी) में रात के लगभग 11:30 बजे मंज़ूर अहमद शेख नाम के युवक का फोन आया। फर्कियां गाँव का रहने वाला मंज़ूर कॉल पर बातचीत के दौरान काफी परेशान था। रिपोर्ट्स के मुताबिक़ उसने सेना के जवानों से कहा कि उसकी पत्नी को बहुत ज़्यादा दर्द हो रहा है और जल्द से जल्द अस्पताल में भर्ती कराए जाने की ज़रूरत है। 

जिस वक्त मंज़ूर शेख का सेना के जवानों के पास फोन आया उस वक्त पिछले एक दिन से लगातार बर्फ़बारी जारी थी। जिसकी वजह से पूरे क्षेत्र में घुटनों तक बर्फ़ जम गई थी। खराब मौसम और भीषण बर्फ़बारी की वजह से न तो सामुदायिक स्वास्थ्य सेवाएँ पहुँच सकती थीं और न ही नागरिक परिवहन से जुड़ी कोई सेवा मददगार साबित होती। आवागमन के पूरे रास्तों पर बर्फ़ जमी हुई थी।

नर्सिंग असिस्टेंट, मेडिकल किट के साथ पहुँचे जवान

ऐसे हालातों में जब कोई विकल्प नहीं बचा रह गया तब भारतीय सेना के जवान मदद के लिए आगे आए। सेना के जवान युद्ध के दौरान मौजूद रहने वाली नर्सिंग असिस्टेंट और मेडिकल किट के साथ मंज़ूर अहमद शेख के घर पहुँचे। इसके बाद वह महिला को अपने कंधों पर लेकर बर्फ़ वाले रास्ते पर दो किलोमीटर तक चल कर करलपुरा अस्पताल लेकर गए। वहाँ पहुँचते ही तुरंत स्वास्थ्य कर्मचारियों ने महिला का उपचार शुरू किया। भारतीय सेना के जवानों ने उन्हें पहले से सूचित कर दिया था जिसकी वजह से वह उपचार के लिए तैयार हो गए थे। 

मंज़ूर अहमद शेख के परिवार वालों और प्रशासन ने भारतीय सेना का इस मानवीय प्रयास के लिए आभार जताया है। बच्चे के जन्म के बाद मंज़ूर अहमद शेख ने कंपनी ऑपरेशन बेस जाकर जवानों को मिठाई खिलाई।         

नमस्कार, मैं भारत का वामपंथ… RSS ने करवाया अमेरिकी संसद पर हमला!

नमस्कार, मैं भारत का वामपंथ हूँ, सल्फेटिया वामपंथ! भले ही दक्षिणपंथी ट्रम्प के समर्थकों ने अमेरिकी संसद पर हमला कर दिया, पर आज मैं आह्लादित हूँ कि उनमें से एक के हाथों में तिरंगा भी था। अब मैं आराम से उस तिरंगाधारी को RSS का ब्राह्मणवादी, पितृसत्तात्मक, भगवा आतंकी बोल कर, अपने लिब्रांडू समाज के व्हाट्सएप्प ग्रुपों में छा जाऊँगा। वैसे भी किसान आंदोलन में मेरे इच्छाधारी प्रदर्शनकर्मी योगेन्द्र यादव के दाने के बाद भी, कुछ खास होता नहीं दिख रहा।

पर मैं तो भारत का सल्फेटिया वामपंथ हूँ, मुझे तो चाहिए आग, रक्त, चिंगारी और बारूद ताकि मैं उनसे अपना पोषण पाता रहूँ। मैं ही तो अपनी दिमागी लकवाग्रस्त संतान ‘द वायर’ की वो दोगली पत्रकारिता हूँ जहाँ मैं कैपिटोल अटैक पर यह कहता पाया जाता हूँ कि तैयारी महीनों की थी, और पुलिस हाथ मलती रह गई, लेकिन मैं सारे सबूतों के मेरे चश्मे के शीशों के भीतर तक सटा कर दिखाने के बाद भी दिल्ली के हिन्दू विरोधी दंगों की प्लानिंग में ताहिर हुसैन, फारूक फैजल की मौजूदगी, मुस्लिम घरों और मस्जिद की छतों के ऊपर पत्थरों का ढेर कभी देख नहीं पाता।

मैं भारत का ‘दो रुपिया दे दो न कामरेड, बीड़ी पीनी है कामरेड’ कह कर गिड़गिड़ाता जेएनयू का वो नालायक माओवंशी हूँ जो ब्लैक लाइव्स मैटर पर घंटे में सात बार स्खलित हो रहा था, और अमेरिकी संसद पर हुए इस प्रदर्शन को देख कर अलीगढ़ के लाल कुआँ वाले हकीम उस्मानी के दवाखाने की तरफ भागता पाया जाता हूँ।

मैं वो फेसबुकिया वामपंथन भी हूँ, जो ब्लैक लाइव्स मैटर के दंगों और लूट को सिर्फ इसलिए जस्टिफाय कर रही थी क्योंकि उसे कूल माना जा रहा था। मैं वो फेसबुकिया वामपंथन हूँ जो ब्लैक लाइव्स मैटर पर रंगभेद का ज्ञान देती हूँ, जबकि मेरी पूरी उम्र फाउंडेशन मार कर चेहरे को गोरा करने में सिर्फ इसलिए चली गई क्योंकि सॉफ्टवेयर इंजीनियर के प्रेम का और बैंक पीओ से विवाह के दोहरे आनंद का कोई जोड़ा नहीं है। मेरी सारी एक्टिविज्म तब गायब हो जाती है जब मैं सोशल मीडिया पर अपने साँवलेपन को फिल्टर के गोरेपन में छुपा लेती हूँ क्योंकि बैंक पीओ को गोरी लड़की चाहिए, और मुझे बैंक पीओ चाहिए!

मैं वो फेसबुकिया चिरकुट हूँ जिसे यह नहीं पता कि दूध जानवर से मिलता है न कि मदर डेयरी से, पर मैं वैश्विक मुद्दों पर सबसे पहले प्रोफाइल पिक्चर बदल कर काला कर लेता हूँ। मेरी वामपंथी ठरक मुझे वामपंथनों की कविताओं पर “आ हा हा! क्या लिखा है आपने… आप बस प्रेम लिखती हैं… आपके शब्द जैसे कि भोर की पहली किरण, जैसे कि घास पर टिकी ओस की बूँद, जैसे शांत नदी की सतह से उठती धुंध… आपने जो लिखा, उससे बेहतर क्या लिखा जाएगा!” जैसी बातें लिखने को मजबूर करती हैं, और इसी चक्कर में मैं इन्स्टाग्राम पर अमेरिकी लड़कियों के पोस्ट के नीचे ट्रम्प को गरियाता नजर आता हूँ कि कहीं उनकी निगाहों में आ जाऊँ। लेकिन खराब अंग्रेजी के कारण ‘नाइस मीटिंग यू, कीप इन टच’ को ‘नाइस मीटिंग, कीप टचिंग’ लिख कर वैसी गालियाँ सुनता हूँ जिसका अर्थ मुझे अर्बन डिक्शनरी पर खोजना पड़ता है, जिसे पढ़ कर मैं आह्लादित होता हूँ कि ‘चलो, गाली भी तो इंग्लिश में दी है लड़की ने, नोटिस तो किया कम से कम!’

मैं भारत का वो लम्पट पत्रकार हूँ जो सीलमपुर, मौजपुर, जाफराबाद, मेरठ, लखनऊ, फुलवारीशरीफ आदि में हो रही पत्थरबाजी, आगजनी, इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा हिन्दुओं को जिंदा जला दिए जाने की घटनाओं को छिटपुट और प्रोपेगेंडा तक कहता हूँ, लेकिन अमेरिका में हो रहे प्रदर्शन को इसलिए हिंसक बताता हूँ क्योंकि वो तो ट्रम्प के समर्थक थे, तो उन्हें विरोध का अधिकार कैसे दे दिया जाए!

मैं बंगाल का वो मंत्री हूँ जो धूलागढ़, मुर्शिदाबाद, मालदा, बर्धमान आदि के दंगों और आगजनी को सिर्फ इसलिए होने देता रहा क्योंकि मुझे एक समुदाय का वोट चाहिए, लेकिन अमेरिकी संसद पर हुए प्रदर्शन में मैं RSS की साजिश सिर्फ इसलिए देख लेता हूँ क्योंकि छः दिसम्बर को बाबरी ध्वस्त की गई थी, और यह हमला छः जनवरी को हुआ था।

आज मैं सिर्फ इसलिए खुश हूँ क्योंकि उस तिरंगे वाले के कारण मैं खुल कर कह सकता हूँ कि वो मोदी का समर्थक था जो कि स्वभाववश स्वतः हिंसक होते हैं। मैं अपने किसी छुटभैया फेसबुक मित्र को वीडियो पर बुला कर इस बात पर चर्चा कर सकता हूँ कि कैसे भारत की मोदीवादी जनता के भीतर के फासीवाद ने राम मंदिर निर्णय पर ह्वाइट हाउस के सामने भगवा झंडा लहराने से ले कर छः जनवरी को हुए अमेरिकी संसद पर हमले में तिरंगा लहराने तक एक प्रमुख भूमिका निभाई है। मैं किसी रैंडम बयान को निकाल कर उसे मोदी से जोड़ सकता हूँ कि ऐसे ही बयानों के कारण इस तरह की हिंसा होती है।

मैं वो विलक्षण वामपंथी हूँ जो ‘साड्डा कुत्ता कुत्ता, त्वाड्डा कुत्ता टॉमी’ की अवधारणा से चलते हुए भारत के आतंकवादियों को उनके मुस्लिम होने के कारण, कभी हेडमास्टर का बेटा तो कभी धोनी का फैन बताता फिरता हूँ, लेकिन अमेरिका में हुए एक प्रदर्शन से मेरी अधोजटाएँ ऐसी सुलगती हैं, और अंग विशेष में ऐसा मीठा दर्द उठता है कि मुझे वो शेर याद आ जाता है:

बैठता हूँ तो दर्द उठता है,
दर्द उठता है बैठ जाता हूँ

मैं भारत का सल्फेटिया वामपंथ हूँ जो लड़कियों के खड़े हो कर मूत्र त्याग करने के अधिकार के लिए चर्चा करता है और पुरुषों को गर्भवान बनाने की वकालत करता है। क्या ये तर्क आपको नहीं बताता कि आज मैं इस प्रदर्शन को हिंसा और तिरंगे झंडे की उपस्थिति को ट्रम्प के तख्तापलट की साजिश में मोदी का सायलेंट सहयोग क्यों कह रहा हूँ?

नमस्कार

‘भाई’ से नहीं किया निकाह तो घरवालों ने उतारा महिला को मौत के घाट, प्रेमी की भी बलात्कार के बाद की हत्या

तुर्की के कमान जिले के बेरामोजू गाँव (Bayramozu Village ) में एक महिला और उसके प्रेमी को नए साल के मौके पर मौत के घाट उतार दिया गया। महिला की गलती केवल इतनी थी कि उसने अपने कजन (रिश्ते में भाई) से निकाह (शादी) करने से मना किया था और अपने प्रेमी के साथ नया जीवन शुरू करने के लिए भाग गई थी। नए साल पर उसी महिला को उसके घरवालों ने आपसी सुलह के लिए घर बुलाया और पहले उसे मौत के घाट उतारा, फिर उसके प्रेमी से बलात्कार करके उसकी भी जान ले ली।

24 वर्षीय मृतक महिला का नाम विल्डन इंस था। काफी समय से उसका परिवार उस पर उसके कजन से निकाह करने का दबाव बना रहा था। जिसके चलते 2 माह पहले वह अपने 25 साल के प्रेमी ओसमान सेलिक (osman celik) के साथ भाग गई। परिवार ने दोनों को खोजने का बहुत प्रयास किया। लेकिन दोनों की जानकारी तब मिली जब वह नए साल की पार्टी पर गाँव लौटे। जैसे ही परिवार को मालूम हुआ कि बेटी कमान में है। उन्होंने उसे सुलह के लिए घर बुला लिया।

ओसमान सेलिक (साभार: डेली मेल की रिपोर्ट)

डेली मेल की रिपोर्ट के अनुसार, जैसे ही महिला अपने प्रेमी के साथ अपने घर गई। वहाँ उसे बाथरूम में ले जाकर बर्बरता से मार दिया गया। वहीं उसके प्रेमी को पहले नंगा किया गया। उसका बलात्कार किया गया और फिर धारधार हथियार घोंपकर उसे भी मौत के घाट उतार दिया गया। 

गिरफ्तार हुए महिला के परिजन

वारदात को अंजाम देने के बाद परिवार ने दोनों के शव को नहलाया ताकि उनके खून से फर्श गंदी न हो। इसके बाद उन्हें गाँव के बाहर ले जाकर मिट्टी खोदकर दफना दिया गया। काफी समय तक जब सेलिक के परिवार को अपने बेटे का मालूम नहीं चला तो उन्होंने उसकी गुमशुदगी की शिकायत पुलिस में लिखवाई। 

सूचना पाते पुलिस ने इंस के परिवार को हिरासत में लेकर पूछताछ शुरू की। जाँच पड़ताल के बाद मृतक महिला के घरवालों ने स्वीकार लिया कि उन्होंने ही दोनों (विल्डन और ओसमान) को मौत के घाट उतारा और बाद में दोनों का शव दफन कर दिया। पुलिस ने पूछताछ करके फौरन शव को जमीन से निकलवाया और महिला के पिता, माँ, भाई और कजन को गिरफ्तार किया। पड़ताल में पता चला कि इन सबके अलावा दो अन्य संबंधियों ने भी इस वारदात में परिवार का साथ दिया था। पुलिस पूरे मामले में अब भी अपनी आगे की जाँच कर रही है।

50+ के फेसबुक फ्रेंड थे शिकार, अश्लील वीडियो था इनका हथियार: वारिस, रईस, वाहिद, अकरम सहित 6 राजस्थान से गिरफ्तार

दिल्ली पुलिस की साइबर सेल ने एक साइबर सेक्सएक्सटॉर्शन रैकेट का भांडाफोड़ करते हुए 6 साइबर बदमाशों को गिरफ्तार किया है। कथिततौर पर पकड़े गए आरोपित फेसबुक पर लोगों को ब्लैकमेल करके उनसे पैसे ऐंठते थे। दिल्ली पुलिस ने भरतपुर राजस्थान से वारिस, रईस, अन्नय खान, वाहिद, मुफीद और अकरम को गिरफ्तार किया है जो कथित तौर पर एक ऑनलाइन जबरन वसूली रैकेट चला रहे थे।

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, अपराधी कथित रूप से फेसबुक पर फर्जी प्रोफाइल बनाते थे और लोगों को फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजते थे। ये लोग ज्यादातर 50 वर्ष से ज्यादा की उम्र वालों को अपना शिकार बनाते थे, जो आमतौर पर सोशल मीडिया पर सक्रिय रहते हैं।

इसमें साइबर अपराधी किसी ना किसी माध्यम से सामने वाले शख्स को वीडियो कॉल पर जुड़ने के लिए कहते हैं, पहले फेसबुक पर दोस्ती करते हैं फिर वीडियो कॉल करने को कहते है, उनके झाँसे में आकर जब वो शख्स वीडियो कॉल जॉइन करता है तो उन्हें वीडियो कॉल पर अश्लील वीडियो दिखाया जाता था।

यह गैंग अश्लील वीडियो देख रहे व्यक्ति का वीडियो दूसरे फोन से बना लेते थे। जिसके बाद गैंग का सदस्य खुद को संबंधित सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म का सीनियर ऑफिसर बताता और पीड़ित से उनका अश्लील वीडियो डिलीट करवाने के लिए उनसे पैसे की डिमांड करता था।

रिपोर्ट के मुताबिक, साइबर सेल के आलाधिकारियों को आरोपितों के फोन से तकरीबन 40 पीड़ितों की वीडियो हाथ लगे हैं। अब तक 25 लाख से ज्यादा की धोखाधड़ी ये कर चुके है, 10 एकाउंट्स को फ्रीज किया गया है। इनके पास से 17 मोबाइल फोन, 2 एटीएम कार्ड, चेक बुक आदि जब्त किए गए हैं। ज्यादातर पीड़ित की उम्र 50 वर्ष से ज्यादा की है जो फेसबुक पर ऐक्टिव रहा करते हैं। फेसबुक पर इन पीड़ितों में कुछ के प्रोफाइल कैटरिंग सर्विस देनेवाले, स्टेशनरी बिजनेस करने वाले के हैं।

अश्लील वीडियो रिकॉर्ड कर, करते थे लोगों को ब्लैकमेल

साइबर सेल के डीसीपी अन्येष रॉय ने कहा कि साइबर क्राइम यूनिट को बीते कुछ हफ्तों से ऑनलाइन उगाही रैकेट से संबंधी कई शिकायतें मिल रही थीं। लोग बता रहे थे कि कैसे कुछ लोग उनके अश्लील वीडियोज को इंटरनेट पर डालने की धमकी देकर ब्लैकमेलिंग कर रहे हैं। उन्होंने बताया, “जाँच में पता चला कि पीड़ितों को फेसबुक जैसे सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म्स के जरिए जाल में फँसाया गया। वो गैंग के सदस्यों के साथ चैट करते और उन्हें मेसेंजर या वॉट्सऐप के जरिए वीडियो कॉल करने को कहा जाता। उन्हें वीडियो कॉल के दौरान पॉर्न वीडियोज दिखाए जाते और उसी वक्त रिकॉर्डिंग भी की जाती। कुछ देर बाद उनके पास ब्लैकमेलिंग की कॉल आ जाती और 2000 से 3000 रुपए माँगे जाते।”

रॉय ने कहा कि ज्यादातर पीड़ितों ने पैसे दे दिए जबकि कुछ ने इसकी शिकायत पुलिस से की। उन्होंने कहा, तकनीकी सूचनाओं की मदद से आरोपितों का लोकेशन भरतपुर में मिला। आरोपितों ने फर्जी पहचान पत्रों के जरिए सिम कार्ड खरीदे और बैंक खाते तक खुलवा लिए। आरोपित एक-दो दिन में ही सिम कार्ड बदल लिया करते थे। सिम कार्ड फर्जी पहचान पत्रों पर देश के अलग-अलग इलाकों से लिए जाते थे। जिस बैंक में अपराधियों ने पैसे जमा करवाए, वह अलवर का था। छापेमारी के दौरान अपराधियों को गिरफ्तार कर लिया गया।

सजा कम कर रिहा कर दिया गया अबू बशीर, 200 लोगों को उड़ाने वाले बम धमाके का था मास्टरमाइंडः खुद को शिक्षक बताता है आतंकी

इंडोनेशिया ने शुक्रवार (जनवरी 8, 2021) को आतंकी अबू बक्र बशीर को जेल से रिहा कर दिया। साल 2002 में इंडोनेशिया के बाली में नाइट क्लब में हुए धमाके का वह मास्टरमाइंड था। दो दशक पहले हुए उस हमले में कई विदेशियों समेत 200 लोगों की मौत हो गई थी।

इंडोनेशियाई सरकार का कहना है कि 82 साल के अबू की सजा पूरी हो गई है, इसलिए उसे रिहा किया गया है। इस्लामिक आतंकवादी नेटवर्क जेमाह इस्लामिया (JI) के सबसे कट्टर लीडरों में अबु बकर बशीर का नाम गिना जाता रहा है। कथित तौर पर उसके संबंध अल कायदा से भी है। खुद को अध्यापक बताने वाला कट्टरपंथी प्रचारक सारे आरोपों को गलत बताता रहा है। 

शुक्रवार को जकार्ता की गुनुंग सिंदूर (Gunung Sindur) जेल से उसे वैन में बैठाकर रिहा किया गया। मुमकिन है कि उसे सीधे उसके गृहनगर सोलो भेजा जाए, जहाँ वह दोबारा ‘इस्लामी शिक्षा’ देना शुरू करे। उसे साल 2011 में मामले की सुनवाई के दौरान 15 साल की सजा हुई हुई थी। लेकिन हाल में अधिकांश कैदियों की सजा में कटौती के बाद उसकी सजा भी कम कर दी गई और उसे रिहा कर दिया गया।

उसके वकील ने कोविड-19 का हवाला देकर भीड़भाड़ वाली जेल से उसे रिहा करने की माँग की थी। बशीर के बेटे ने भी उसे कट्टरपंथी विचारधारा का पीड़ित कहा था और ये भी कहा था कि वह कट्टर विचारों को सॉफ्ट करने की कोशिश कर रहे हैं।

दो साल पहले भी मानवीय आधार पर बशीर को छोड़ने की माँग उठाई गई थी। लेकिन उस समय ऑस्ट्रेलिया में हड़कंप मच गया और उसकी रिहाई टाल दी गई। बता दें कि जिस हमले में बशीर दोषी पाया गया था उसमें ऑस्ट्रेलिया के 88 लोग मारे गए थे। हमले से बचे लोग आज भी बशीर की रिहाई का विरोध कर रहे। ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री ने भी रिहाई पर नाराजगी जताई है।

51 साल के Laczynski नाम के सर्वाइवर का कहना है कि उस दिन वह अपने दोस्तों के साथ ऑस्ट्रेलिया वापस लौटने ही वाला था कि अचानक क्लब में हमला हुआ। उनके 5 दोस्त हमले में मारे गए। वह कहते हैं, “उस हमले ने मुझे बहुत दुखी किया। मैं केवल न्याय चाहता हूँ।”

उनके मुताबिक आज भी कई लोग ऐसे हैं जो इंडोनेशिया के क्लब में हुए हमले को नहीं भुला पाए हैं। उनके घाव का इलाज आज तक चल रहा है। सभी पीड़ित चाहते हैं कि बस किसी तरह से इंसाफ मिल जाए। बशीर की रिहाई बिलकुल बर्दाश्त नहीं की जा सकती। वह अपील करते हैं कि उसे किसी प्रकार का मंच देकर कट्टर विचारों को फैलाने न दिया जाए। वह एक राक्षस था और हमेशा रहेगा।

इसी तरह Thiolina Ferawati Marpaung, जिनकी उस विस्फोट में हमेशा के लिए आँखें खराब हो गईं, वह कहती हैं कि बशीर की रिहाई से उन्हें बहुत डर लग रहा है। बस उम्मीद ही की जा सकती है कि प्रशासन उस पर निगरानी रखे।

उल्लेखनीय है कि 2002 में बाली में धमाके के एक साल बाद जकार्ता के जेडब्ल्यू मैरिअट होटल पर हमला करने का आरोप भी जमा इस्लामिया पर लगा था। सुरक्षा विश्लेषकों का कहना है कि इंडोनेशिया के जिहादी आंदोलन में अबू बक्र बशीर की काफी बड़ी छवि है और यह असंभव नहीं है कि उसके नाम का फिर से इस्तेमाल नहीं किया जाएगा।

कैपिटल हिल में हिंसा के दौरान एक हिन्दू लहरा रहा था भगवा झंडा? लिबरल गिरोह के दावे का फैक्टचेक

7 जनवरी 2021 की सुबह के शुरुआती घंटों में (भारतीय समयानुसार) तमाम लोगों ने कैपिटल हिल में हिंसा देखी। जब अमेरिकी संसद में राष्ट्रपति चुनावों के वोटों की गिनती जारी थी और नतीजों में जो बायडेन को बहुमत मिल रहा था, तब डोनाल्ड ट्रंप के समर्थकों ने वाशिंगटन डीसी स्थित कैपिटल हिल में उपद्रव और हिंसा शुरू कर दी। कैपिटल हिल में ही अमेरिकी सीनेट और हाउस ऑफ़ रीप्रेजेंटेटिव बैठते हैं। ताज़ा अपडेट के अनुसार हिंसा की घटना में अब तक 4 लोगों की मौत हो चुकी है और आरएनसी और डीएनसी में दो पाइप बम बरामद किए गए थे। 

प्रधानमंत्री मोदी समेत दुनिया भर के तमाम नेताओं ने इस घटना की निंदा की थी और अमेरिका के अनेक राजनीतिक दलों से निवेदन किया था कि वो सत्ता का शांतिपूर्ण स्थानांतरण सुनिश्चित करें। लेकिन जैसा कि हमने देखा, लोकतांत्रिक संस्था में कैसे हालात नज़र आए, भारत की लिबरल जमात भी अपना दिमाग खराब करने में व्यस्त थी। इसलिए नहीं कि कैपिटल हिल में क्या हो रहा है बल्कि इसलिए कि उन्हें ‘हिन्दूवादियों’ पर झूठा आरोप लगाने का मौक़ा मिल गया। 

तमाम तथाकथित और स्वघोषित लिबरल्स, जिसमें से कुछ पत्रकार होने का भी अच्छा नाटक कर लेते हैं, उन्होंने ट्विटर पर फेक न्यूज़ फैलाना शुरू कर दिया कि अनेक “हिन्दूवादी” कैपिटल हिल में हुई हिंसात्मक रैली के दौरान वहीं मौजूद थे। वामपंथी गिरोह के मुताबिक हिन्दुओं ने भारत को शर्मिंदा किया। 

अमेरिका में प्रोफेसर अशोक स्वेन जो अक्सर मुद्दों पर टिप्पणी करते रहते हैं, भले उन्हें मुद्दों की जानकारी हो या नहीं। उन्होंने ट्विटर पर लिखा, “क्या हिन्दूवादियों को वाकई ऐसा लगता है कि श्वेत वर्चस्ववादी उन्हें स्वीकार करेंगे?” ऐसा ट्वीट करते हुए उन्होंने एक व्यक्ति की तस्वीर साझा की जो कैपिटल हिल में भगवा झंडा लेकर खड़ा था। हालाँकि, हमेशा की तरह झूठ पकड़े जाने पर चुपके से ट्वीट डिलीट कर दिया है।

डिलीट किया गया ट्वीट

इसी तरह सागारिका घोष ने ‘Hindutva Watch’ का ट्वीट साझा किया और अमेरिकी प्रोफेसर की तरह ही प्रोपेगेंडा फैलाया। 

सागारिका घोष का ट्वीट

लिबरल जमात के इन दोनों विशेषज्ञों में एक ने अपना ट्वीट खुद हटा दिया और दूसरे ने जिसका ट्वीट साझा किया था वह हटा दिया।

भारतीय झंडा लिए हुए व्यक्ति की पहचान विन्सेंट ज़ेवियर (Vincent Xavier) के रूप में हुई थी जो कि वामपंथ विरोधी है और मूल रूप से केरल का रहने वाला है। इसके पहले वह शशि थरूर से भी मिल चुका है और किसी भी लिहाज़ से ‘हिन्दूवादी चरमपंथी’ नहीं है। विवादों में आई असल तस्वीर में व्यक्ति कैपिटल हिल के सामने भगवा झंडा लेकर खड़ा था। 

वह तस्वीर जिसे कैपिटल हिल में हुई हिंसा के वक्त का बताया जा रहा है

यहाँ सबसे अहम बात ये है कि इस तरह का कोई सबूत सामने नहीं आया है कि विन्सेंट, कैपिटल हिल में हुई हिंसा में किसी भी तरह शामिल हुआ था। अमेरिका का नागरिक होने के नाते उसके पास पूरा अधिकार है कि अपने पसंद या नापसंद के उम्मीदवार का समर्थन या विरोध कर सके। यानी सिर्फ भारत का झंडा थामने की वजह से लिबरल्स ने उसे निशाना बनाना शुरू कर दिया और प्रोपेगेंडा फैलाने में लग गए। इसी तरह एक और व्यक्ति लिबरल जमात के झूठ में फँस गया था। 

व्यक्ति जिसके एक हाथ में भगवा झंडा है और दूसरे हाथ में अमेरिकी झंडा, तत्काल प्रभाव से उसे ‘कट्टरपंथी हिन्दूवादी’ के रूप में प्रचारित किया जाने लगा, जो कि कैपिटल हिल में हुई हिंसा का जश्न मना रहा है। लेकिन यह दावा भी झूठा निकला।    

वाशिंगटन डीसी में भगवा झंडा लिए हुए इस व्यक्ति की तस्वीर 5 अगस्त 2020 की है, यानी अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि के भूमि पूजन के ठीक बाद की तस्वीर। इस मुद्दे पर फ़ाइनेंशियल एक्सप्रेस ने भी ख़बर प्रकाशित की थी जिसमें उन्होंने इस बात का ज़िक्र किया था कि किस तरह दुनिया भर के हिन्दुओं ने इस ऐतिहासिक इवेंट का जश्न मनाया। 

फ़ाइनेंशियल एक्सप्रेस द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट (5 अगस्त 2020)

जिस तस्वीर पर सबसे ज़्यादा सवाल खड़े किए गए थे जिसमें एक व्यक्ति के एक हाथ में भगवा झंडा है और दूसरे हाथ में अमेरिकी झंडा, पीटीआई की वह तस्वीर 5 अगस्त 2020 को अयोध्या में हुए भूमि पूजन के बाद कैपिटल हिल के सामने मनाए गए जश्न की थी।

फ़ाइनेंशियल एक्सप्रेस के लेख से लिया गया स्क्रीनशॉट

लिबरल जमात ने बिना किसी जाँच पड़ताल के अमेरिका में रहने वाले भारतीय नागरिकों के बारे में झूठ फैलाना शुरू कर दिया। कैपिटल हिल में हुई हिंसा के बाद कानूनी संस्थाओं ने वारदात को अंजाम देने वाले लोगों के बारे में जानकारी इकट्ठा करना शुरू कर दिया है। लिबरल्स ने इन दो भारतीय मूल के नागरिकों के बारे में झूठा प्रचार करके उनका जीवन ख़तरे में डाल दिया है और इतना कुछ सिर्फ इसलिए कि वो यहाँ के हिन्दुओं को बदनाम कर सकें। जब अमेरिका वहाँ के ‘लिबरल्स’ द्वारा लगाई गई आग में जल रहा था, तब भारत के ‘लिबरल्स’ फासीवादियों की तरह व्यवहार कर रहे थे।                  

प्रशासन ने हटाया परमार वंश के राजमहल से काजी परिवार की ‘निजी सम्पत्ति’ का बोर्ड

हाल ही में ऑपइंडिया पर मध्य प्रदेश स्थित विदिशा जिला मुख्यालय से 70 किलोमीटर दूर प्राचीन उदयपुर नगर में तकरीबन एक हजार साल पुराने परमार वंश के राजमहल पर एक लेख प्रकाशित हुआ था। यह राजमहल एक ‘निजी सम्पत्ति’ वाले बोर्ड के कारण चर्चा का विषय बना, जिसे अब प्रशासन द्वारा हटा दिया गया है।

प्राचीन विरासत से जुड़े इस महल में मदरसा चलते हुए पाया गया। यही नहीं, इस पर ‘निजी संपत्ति’ का बोर्ड लगाने वाले एक काजी ने यहाँ तक दावा किया कि यह एक हजार साल पुराना ना होकर चार सौ साल पुराना है, जिसका निर्माण उनके पूर्वजों द्वारा पूरा कराया गया था। काजी के अनुसार, जहाँगीर और शाहजहाँ ने उनके परिवार के नाम यह संपत्ति कर डाली थी।

सोशल मीडिया पर इस विषय के उछलने के बाद तहसीलदार इस महल में पहुँचे और उन्होंने एक्शन लेते हुए महल से इस बोर्ड को भी हटा दिया है, जिसमें इसे काजी की निजी सम्पत्ति बताया गया था।

तहसीलदार का कहना है, “कल यहाँ किसीने निजी सम्पत्ति के नाम से बोर्ड लगा दिया था। यह एरिया उदयपुर ग्राम के खसरा संख्या- 822 में करीब साढ़े तीन बीघा जमीन पुरातत्व विभाग के अंतर्गत आता है। इसी वजह से हम लोग आए और हमने ये बोर्ड हटवा है।”

तहसीलदार ने इसके किसी व्यक्ति के निजी सम्पत्ति होने की बात से स्पष्ट मना करते हुए कहा कि उन्होंने इसके विवरण की पुष्टि राजस्व विभाग से कर ली है।

उल्लेखनीय है कि इस महल पर अपनी निजी संपत्ति का बोर्ड लगाने वाले काजी परिवार ने महल को मुगल बादशाह जहाँगीर और शाहजहाँ से जोड़ा है। उन्होंने कहा कि ये महल कोई हजार साल पुराना नहीं है, बल्कि बादशाह जहाँगीर के समय इसकी और शाही मस्जिद की नींव उदयपुर में रखी गई थी।

बोर्ड हटाए जाने के बाद, काजी परिवार के एक सदस्य ने कहा, “मुग़ल बादशाह ने हमारे काजी खानदान को ये दिया था, हमारे परिवार ने इसे बनाने का काम पूरा किया था। चार सौर साल से हमारा परिवार इसे चलाता आ रहा था। और अब मैं इसकी देखरेख कर रहा हूँ। ये चार सौ साल पुराना है और दूर-दूर तक इसका कोई वास्ता नहीं है।”

उन्होंने आगे कहा, “वो बोर्ड हमने लगवाया था, चार सौ साल से क्या होता आया था, हमें इसकी सरकारी या कानूनी जानकारी नहीं है। सरकार ने कहा तो हमने निजी सम्पत्ति का बोर्ड हटा दिया है। लम्बी-चौड़ी जायदात थी, तो लोग भी यहाँ आते थे।”

‘पत्रिका’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, परिवार के सदस्यों का दावा है कि शाहजहाँ के समय इसका निर्माण पूरा हुआ और उसने ही इसका उद्घाटन भी ने इसका उद्घाटन किया था। रिपोर्ट में बताया गया है कि डॉ इरफान अली इस काजी परिवार के मुखिया हैं। इरफ़ान अली का कहना है कि ये बादशाह का महल था, जिसे बाद में काजी परिवार को जमीदार बनाने के बाद परिवार को ही दे दिया गया।

काजी परिवार के सदस्यों की मानें तो उनकी चार पीढिय़ों का इस महल पर कब्जा है और पिछले 25 वर्षों से वही इस जगह पर मदरसा चला रहे हैं।

इस संदर्भ में ही, विजय मोहन तिवारी अपने फेसबुक प्रोफाइल पर लिखते हैं, “एक कैमरापर्सन ने सवाल पूछा तो एक साहब सीधे बादशाह जहाँगीर के दरबार में जा पहुँचे और बताया कि जहाँगीर ने इस महल की संगे-बुनियाद उदयपुर में रखी थी। शाहजहाँ के समय यह बनकर तैयार हुआ और काजी साहब के खानदान को दे दिया गया, ताकि वे मस्जिद में नमाज पढ़ाते रहें। काजी साहब कहीं शहर में बस गए और महल में मदरसा खोल दिया।”

विजय मोहन व्यंगात्मक लहजे में आगे लिखते हैं, “अगर जहाँगीर या शाहजहाँ ने इन्हें यह जगह दी है और यह इनकी निजी संपत्ति मान ली जाती है तो सरकार को वे 84 गाँव भी इन्हें देने होंगे, जिनकी जमींदारी इनके अनुसार इन्हें मुगलों ने दी थी। किले पर अपनी निजी संपत्ति का ऐलान करने वाले साइनबोर्ड की सफाई में इनके पास जहाँगीर-शाहजहाँ का यही किस्सा है। शायद उनके संज्ञान में यह नहीं है कि 15 अगस्त 1947 के बाद ही निजाम नहीं बदला है। 1857 में अंग्रेज ही आखिरी मुगल को रंगून रवाना कर चुके थे। अब लालकिले पर मुगलों का कोई दावा नहीं है। न कोई मुगल हैं। वो इरफान हबीबों के ख्यालों में रोशन हैं।”

इस महल का पूरा इतिहास ऑपइंडिया पर आप इस लिंक पर पढ़ सकते हैं

सुशांत का पूर्व स्टाफ व ड्रग पेडलर ऋषिकेश लापता: अहम कड़ी की तलाश में NCB का सर्च ऑपरेशन

एक्टर सुशांत सिंह राजपूत की असामयिक मौत के बाद बॉलीवुड ड्रग नेक्सस की जाँच कर रहे नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो पूर्व असिस्टेंट डायरेक्टर ऋषिकेश पवार की तलाश कर रही है। ऋषिकेश की खोज में NCB ने सर्च अभियान शुरू किया है। ऋषिकेश दिवंगत अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत का एक स्टाफ था। जाँच के दौरान सुशांत के स्टाफ दीपेश सावंत ने भी अपने बयान में ऋषिकेश का नाम लिया था और आरोप लगाया था कि वह सुशांत को ड्रग्स सप्लाई करता था।

NCB के जोनल डायरेक्टर समीर वानखेड़े के अनुसार, “ऋषिकेश पवार की तलाश जारी है। वो सुशांत सिंह राजपूत के ड्रीम प्रोजेक्ट में असिस्टेंट डायरेक्टर थे। कई सबूत सामने आए हैं, जिसमें ये साफ हुआ है कि ऋषिकेश पवार ही सुशांत को ड्रग्स सप्लाई करता था। एनसीबी ने ऋषिकेश के घर से लैपटॉप सीज़ किया है, जिसमें कुछ डाटा भी मिला है। कई बार एनसीबी ने उन्हें बुलाया लेकिन वो नहीं आए, अब जब उनकी अग्रिम जमानत याचिका ख़ारिज हो गई है तो हमने उन्हें पकड़ने का प्लान बनाया है।”

इससे पहले CBI ने 12 सितंबर, 2020 को ऋषिकेश पवार को तलब किया था और फिर उसे NCB को सौंप दिया गया। दीपेश सावंत ने अपने बयान में कहा था, “उस दौरान मैं कभी सुशांत सर के लिए ड्रग्स नहीं लाया था, लेकिन मेरा एक साथी ऋषिकेश पवार सुशांत सर के लिए ड्रग्स लाता था।”

जानकारी के मुताबिक, पवार ने पहले अदालत में गिरफ्तारी की आशंका जताते हुए अग्रिम जमानत माँगी थी। हालाँकि, गुरुवार को विशेष एनडीपीएस अदालत के न्यायाधीश वी. विदवान ने उनकी जमानत अर्जी खारिज कर दी। एनसीबी की टीम उनके घर पहुँची लेकिन वो तब तक लापता हो गए थे।

NCB के ज़ोनल डायरेक्टर समीर वानखेड़े ने कहा, “हाँ, हम ऋषिकेश पवार की तलाश कर रहे हैं।” उन्होंने आगे बताया कि NCB शुरू से ही उनसे पूछताछ करना चाहती थी, लेकिन उन्होंने किसी प्रकार से भी उन्हें कोऑपरेट नहीं किया, कई नोटिस को भी उन्होंने नजरअंदाज कर दिया है। उनकी इस हरकतों ने मामले में उनकी भूमिका को लेकर हमारे शक को और मजबूत कर दिया है।

चेंबूर के निवासी पवार राजपूत के ड्रीम प्रोजेक्ट में सहायक निर्देशक के रूप में काम करते थे। हालाँकि, उन्हें कुछ समय बाद निकाल दिया गया था। फिर भी उन्होंने अभिनेता से मिलना जुलना जारी रखा। एनसीबी अधिकारियों ने कहा कि वे इसके बारे में उनसे पूछताछ करना चाहते हैं।

गौरतलब है कि पिछले साल जून में सुशांत सिंह राजपूत ने आत्महत्या कर ली थी। इस मामले की जाँच सीबीआई कर रही है। इसी मामले में ड्रग्स एंगल की भी बात सामने आई थी। जिसके बाद 26 अगस्त, 2020 से ही एनसीबी पूरे मामले की जाँच कर रही है। तब से NCB ने अभिनेता की मौत से जुड़े ड्रग मामले के संबंध में 27 लोगों को गिरफ्तार किया है। इसके अलावा दीपिका पादुकोण, सारा अली खान, रकुलप्रीत सिंह और अर्जुन रामपाल सहित कई बॉलीवुड हस्तियों से पूछताछ भी की जा चुकी है।

हिंदू स्कूल टीचर एकता कुमारी को अगवा कर बनाया आयशा, मियाँ मिट्ठू ने इस्लाम कबूल करवाया: जबरन धर्मांतरण के लिए सिंध में बना रखी है ‘आर्मी’

पाकिस्तान में हिंदू लड़कियों के जबरन धर्मांतरण के मामले थमने का नाम नहीं ले रहे। ताजा मामला 6 जनवरी 2021 का है। सिंध के घोटकी में एकता कुमारी नाम की स्कूल टीचर से जबरन इस्लाम कबूल करवाया गया। अब उसका नया नाम आयशा है।

पाकिस्तान के सामाजिक कार्यकर्ता राहत ऑस्टिन ने एकता की तस्वीर और उसके धर्मांतरण के प्रमाण अपने सोशल मीडिया में शेयर किए हैं। उन्होंने लिखा, “एक प्राइमरी स्कूल में पढ़ाने वाली हिंदू शिक्षिका और अनिल कुमार की बेटी एकता कुमारी को सिंध पाकिस्तान के घोटकी के बारझुंडी शरीफ धरकी में मियाँ मिट्ठू के जरिए इस्लाम कबूल करवाया गया। अब उसका नया इस्लामी नाम आयशा है।”

वॉयस ऑफ पाकिस्तान माइनॉरिटी नाम के ट्विटर अकाउंट ने एकता का मामला उठाते हुए लिखा, “जबरन धर्म परिवर्तन यहाँ (पाकिस्तान में) पर सामान्य हो चुका है। मियाँ मिट्ठू द्वारा एक प्राइमरी स्कूल में पढ़ाने वाली हिंदू शिक्षिका को 6 जनवरी को इस्लाम कबूल करवाया गया। एक दिन ऐसा भी आएगा जब यहाँ के झंडे से सफेद रंग (अल्पसंख्यक को दर्शाने वाली पाकिस्तानी झंडे में सफेद पट्टी है) बिलकुल गायब हो जाएगा।”

बता दें कि एकता के धर्मांतरण के पीछे जिस मियाँ मिट्ठू का नाम सामने आ रहा है, उसके लिए यह कोई नई बात नहीं है। मियाँ मिट्ठू ने क्षेत्र में तमाम हिंदू लड़कियों के जबरन धर्म परिवर्तन करवाए हैं। पिछले दिनों इस कट्टरपंथी ने कविता कुमारी नाम की लड़की का धर्मांतरण करवाया था। वह भी बारझुंडी की ही थी।

राहत ऑस्टिन ने ही कविता कुमारी की वीडियो साझा करते हुए दिखाया था कि कैसे मियाँ मिट्ठू अपने सामने बैठा कर हिंदू लड़कियों को इस्लाम कबूल करवाता है और गर्व से इसकी वीडियो भी बनवाता है। कहते हैं कि इलाके में मियाँ मिट्ठू के मनसूबों को पूरा करने के लिए उसकी पूरी ‘आर्मी’ सक्रिय है।

साल 2019 में महक केसवानी का भी एक मामला आया था। उस समय महक का धर्म परिवर्तन भी इसी मियाँ मिट्ठू ने करवाया था। उससे भी पहले की बात करें तो, होली के अवसर पर घोटकी से ही 2 नाबालिग हिंदू बहनों रवीना और रीना को अगवा कर उनका धर्म परिवर्तन कराया गया था।

मौजूदा जानकारी के अनुसार, मियाँ मिट्ठू घोटकी के बारझुंडी दरगाह में रहता है और अगर कोई कट्टरपंथी, किसी लड़की का अपहरण करता है तो उसे इसके पास लाता है और ये फिर उसका इस्लाम में परिवर्तन कराता है।

साल 2016 के आँकड़ों के अनुसार, उसके खिलाफ 117 मामले दर्ज हो चुके हैं। पाकिस्तान में हिंदू लोग मियाँ मिट्ठू के खिलाफ कई बार सड़कों पर भी उतरे हैं। लेकिन उसके ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई की खबर नहीं है। कई तस्वीरों में उसे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान और पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा के साथ भी देखा जा सकता है।

पाक के सिंध प्रांत में धर्म परिवर्तन की फैक्ट्री चलाने वाला मियाँ मिट्ठू