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सतपाल निश्चल की हत्या का पाकिस्तान ही जिम्मेदार नहीं, भारत का ​सेक्युलर-लिबरल पॉलिटिक्स भी दोषी

जम्मू-कश्मीर में बीते दिनों आतंकवादियों ने सतपाल निश्चल की गोली मार कर हत्या कर दी। उन्हें हाल ही में डोमिसाइल सर्टिफिकेट मिला था। इससे उन्हें कश्मीर में अचल संपत्ति खरीदने और अन्य चीजों के अधिकार मिले थे। दुखद बात यह है कि यही उनकी हत्या की वजह भी बनी। 70 वर्षीय बुजुर्ग सतपाल पिछले चालीस वर्षों से कश्मीर में रह रहे थे और गुरुवार को डोमिसाइल सर्टिफिकेट प्राप्त करने के कारण मारे जाने वाले वह पहले व्यक्ति बन गए।

सतपाल निश्चल की हत्या की जिम्मेदारी आतंकी संगठन ‘द रेजिस्टेंस फ्रंट’ (TRF) ने ली है। इस आतंकी संगठन ने सोशल मीडिया पर धमकी देते हुए एक बयान भी जारी किया। बयान में कहा गया कि जिन लोगों ने डोमिसाइल सर्टिफिकेट हासिल किया है वे सभी ‘आरएसएस’ एजेंट हैं। वह ऐसे सभी लोगों के नाम और पते जानता है। यह भी जानता है कि वे क्या करते हैं। टीआरएफ ने धमकी दी है कि अगला नंबर ऐसे ही अन्य लोगों का हो सकता है।

सतपाल निश्चल कश्मीर में चल रहे सिविलाइज़ेशन वॉर में जान गँवाने वाले पहले व्यक्ति नहीं हैं। उनकी हत्या इसलिए नहीं की गई है क्योंकि वह एक कश्मीरी नहीं थे या उन्होंने कश्मीरियों के खिलाफ कोई काम किया हो। उनकी हत्या तो इसलिए की गई कि वह इस्लाम के अनुयायी नहीं थे।

हैरानी की बात है कि म्यांमार के रोहिंग्या जम्मू कश्मीर में ‘घुसपैठ’ करने में कामयाब रहे हैं। आज वे बिना किसी खतरे के वहाँ रह रहे हैं। लेकिन कश्मीरी पंडितों को उनके घरों से बाहर कर दिया गया और वे तीन दशक बाद भी वापस नहीं लौट पाए। ऐसा क्यों है?

कुछ लोगों को भ्रम है कि कश्मीर में आतंकवाद कश्मीरी स्वतंत्रता से संबंधित है और इस्लाम का इससे बहुत कम लेना-देना है। मीडिया में मौजूद प्रोपेगेंडाबाज भी इस नैरेटिव को आगे बढ़ाने की भरसक कोशिश करते हैं। जबकि सच्चाई यह है कि वहाँ पर अवैध रोहिंग्या मुस्लिम अप्रवासी को तो शरण मिल जाता है, लेकिन कश्मीरी पंडितों को भगा दिया जाता है। भारत के अन्य क्षेत्र के हिंदुओं को ‘आरएसएस एजेंट’ करार दिया जाता है। यह सब दिखाता है कि यह कश्मीरियत के बारे में नहीं, बल्कि इस्लामी आतंकवाद के बारे में है।

दुर्भाग्य की बात यह है कि कुछ ही दिनों में सतपाल निश्चल का नाम भुला दिया जाएगा और कश्मीर में दशकों से जारी हिंसा का सिलसिला यूँ ही जारी रहेगा। इसके बाद अधिकारी खुद को यह कहते हुए सांत्वना देंगे कि पाकिस्तान समर्थित आतंकवादी हत्या के लिए जिम्मेदार हैं।

हो सकता है कि आतंकवादियों को पाकिस्तान का समर्थन प्राप्त हो। लेकिन क्या कोई गंभीरता से इस बात को मानेगा कि कश्मीर में हिंदुओं की स्थिति पाकिस्तानी हिंदुओं से अलग नहीं होती, अगर वहाँ पर भारतीय सेना नहीं होती। फिर भी इस्लामी कट्टरपंथ की वास्तविक समस्या को ढँकने के लिए हम पर कश्मीरी प्रोपेगेंडा थोपा जाता है।

वैसे देखा जाए तो इसका कोई सरल समाधान भी नहीं है। अंतत: सिविलाइज़ेशन वॉर में लोगों को अपने खून की कीमत ही चुकानी पड़ेगी और इतिहास इस तथ्य का प्रमाण है कि इसके लिए पहले से ही बहुत सारे रक्त का बलिदान किया जा चुका है और आगे भी जारी रहेगा।

कश्मीर में भारतीय राज्य और भारतीय नागरिक जिस दुश्मन का सामना कर रहे हैं, वह है- राजनीतिक इस्लाम। दूसरी ओर, धर्मनिरपेक्षता का भारतीय ब्रांड इस मामले पर वैचारिक स्पष्टता को रोकने के लिए ओवरटाइम काम करता है, ताकि खतरे का प्रभावी ढंग से सामना किया जा सके। जब कश्मीर की बात आती है तो बहुसंस्कृतिवाद हमारी ताकत है। कश्मीर में राजनीतिक इस्लाम के खतरे को बेअसर करने का एकमात्र तरीका क्षेत्र की सांस्कृतिक समृद्धि है।

यदि ‘विविधता वास्तव में हमारी ताकत है’, तो भारत में कश्मीर इसका परीक्षण करने के लिए सबसे उपयुक्त जगह है। लेकिन जब इस तरह के सुझाव दिए जाते हैं, तो हमारे देश में सेक्युलर-लिबरल फासीवाद का रोना रोना शुरू कर देते हैं। यह जानना काफी महत्वपूर्ण है कि सतपाल निश्चल की हत्या इसलिए की गई क्योंकि वह उस विविधता का प्रतिनिधि थे, जिससे घाटी में इस्लामी आतंकवादी सबसे ज्यादा डरते हैं।

सतपाल निश्चल की हत्या कर दी गई क्योंकि कश्मीर में इस्लामी आतंकवादी क्षेत्र के सांस्कृतिक संवर्धन की अनुमति नहीं दे सकते। लेकिन भारत सरकार इस त्रासदी के बाद चुने गए रास्ते से नहीं हट सकती। इसके बजाए, उसे उन अताताइयों को सबक सिखाना होगा, जिन्होंने 70 साल के बुजुर्ग को मौत के मौत के घाट उतार दिया।

यही आगे का रास्ता है। सेक्युलर-लिबरल भारतीय हितों को कमजोर करने के लिए जातीय-वर्चस्ववादी इस्लामी आतंकवादियों के साथ सहयोगी बनने के लिए तैयार हैं। लेकिन भारी दबाव के बावजूद पीछे नहीं हटा जा सकता। अगर ऐसा हुआ तो धारा 370 के निरस्त होने के बाद से कश्मीर ने जो प्रगति की है, वह सब खत्म हो जाएगी।

अब देवी सीता की मूर्ति तोड़ी, आंध्र प्रदेश में मंदिरों पर हमले का सिलसिला जारी

आंध्र प्रदेश में मंदिरों पर हमले की घटनाएँ थम नहीं रही है। विजयवाड़ा के सीताराम मंदिर में देवी सीता की मूर्ति खंडित पाई गई है। यह मूर्ति 40 साल पुरानी बताई जा रही है। यह मंदिर विजयवाड़ा के पंडित नेहरू बस कॉम्पलेक्स में स्थित है।

बीते कुछ दिनों के भीतर इस तरह की यह तीसरी घटना है। इससे पहले विजयनगरम जिले की एक मंदिर में विराजित भगवान राम की 400 साल पुरानी मूर्ति खंडित कर दी गई थी। इसके बाद राजमुंद्री के विघ्नेश्वर मंदिर में भगवान सुब्रमण्येश्वर स्वामी की मूर्ति क्षतिग्रस्त करने का मामला सामने आया था।

बता दें कि रविवार (जनवरी 03, 2021) को विजयवाड़ा के सीताराम मंदिर में देवी सीता की एक मूर्ति टूटी हुई मिली थी। मंदिर के पुजारी ने देवी सीता की मूर्ति खंडित पाए जाने की पुलिस में शिकायत की। सर्कल इंस्पेक्टर सत्यानंद ने मंदिर का दौरा किया। पुलिस जाँच शुरू कर रही है।

पुलिस ने बताया कि सीसीटीवी फुटेज की जाँच कर पता लगाया जा रहा है कि क्या बदमाशों ने मूर्ति को खंडित किया है। इस बीच, हिंदू संगठनों के कार्यकर्ताओं ने मूर्ति खंडित किए जाने के विरोध में मंदिर में धरना-प्रदर्शन किया।

बीजेपी के राष्ट्रीय सचिव सुनील देवधर ने रेड्डी सरकार को जमकर लताड़ लगाई। उन्होंने कहा, “YSRCP पार्टी और TDP नेताओं द्वारा कल के नाटक के बावजूद, मंदिरों पर हमले जारी हैं।” देवता की मूर्ति तोड़ने की पिछली घटनाओं की ओर इशारा करते हुए, देवधर ने सीएम रेड्डी से सवाल किया कि ‘यह केवल हिंदुओं के साथ ही क्यों हो रहा है?’ 

आंध्र प्रदेश के सीएम पर निशाना साधते हुए, बीजेपी के देवधर ने कहा, “अब बहुत हो गया। वाईएस जगनमोहन रेड्डी, क्या आपकी चुप्पी और निष्क्रियता को उपद्रवियों के लिए छिपे समर्थन के रूप में नहीं माना जाना चाहिए? क्या आप हिंदू भावनाओं को ऐसे ले रहे हैं? विडंबना यह है कि वाईसीपी के सभी हिंदू नेता भी चुप हैं। क्या उन्हें इस बात की जानकारी नहीं है कि लोग उन्हें नहीं छोड़ेंगे।”

तेलुगु देशम पार्टी के आधिकारिक प्रवक्ता पट्टाभि ने मंदिर का दौरा किया। पुलिस की ओर से जानवरों द्वारा मूर्ति को खंडित किए जाने की आशंका जताए जाने पर तेदेपा नेताओं की पुलिस से बहस हो गई। पूर्व मंत्री एवं वरिष्ठ तेदेपा नेता देवीनेनी उमामहेश्वर राव ने आरोप लगाया कि वाईएसआरसीपी सरकार अपनी विफलताओं को छुपाने के लिए मंदिरों पर हमले और देवताओं की मूर्तियों के साथ तोड़-फोड़ करवा रही है। तेदेपा विधायक बुद्ध वेंकन्ना ने भी इस घटना की निंदा करते हुए आरोप लगाया कि वाईएसआरसीपी प्रशासन में देवताओं की मूर्तियाँ भी सुरक्षित नहीं है।

गौरतलब है कि हाल ही में आंध्र प्रदेश के राजमुंद्री के विघ्नेश्वर मंदिर में भगवान सुब्रमण्येश्वर स्वामी की प्रतिमा को भी क्षतिग्रस्त कर दिया गया। राजमुंद्री का श्रीराम नगर ईस्ट गोदावरी जिले में पड़ता है। राजमुंद्री को आंध्र की सांस्कृतिक राजधानी भी कहते हैं, लेकिन लोगों का दावा है कि यहाँ ईसाई मिशनरियों का बोलबाला है।

इस घटना से 2 दिन पहले ही विजयनगरम जिले के नेल्लीमरला मंडल में एक पहाड़ी पर स्थित मंदिर में अज्ञात उपद्रवियों ने भगवान राम की 400 साल पुरानी मूर्ति को क्षतिग्रस्त कर दिया था। मूर्ति रामतीर्थम गाँव के पास पहाड़ी की चोटी पर स्थित बोडिकोंडा कोदंडाराम मंदिर में विराजमान थी। उपद्रवी ताला तोड़ मंदिर के गर्भगृह में घुसे और और स्वामी कोदंडारामुडु का सिर काटकर अलग कर दिया। मुख्य मंदिर पहाड़ी की तलहटी में है।

बता दें कि मंदिरों पर हो रहे हमले को लेकर पूर्व मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने कहा था, “जगन रेड्डी ईसाई हो सकते हैं। लेकिन यह सोचना कि वह अपने शक्ति का इस्तेमाल हिंदुओं को धर्मांतरित करने के लिए कर सकते हैं, गलत है। अगर सत्ता में लोग धर्मांतरण का सहारा लेते हैं, तो यह विश्वासघात होता है। किसी को भी इस तरह की धार्मिक असहिष्णुता नहीं दिखानी चाहिए। अयोध्या के राम मंदिर में ‘जय श्री राम’ का नारा गूँजता है। ठीक इसी तरह, रामतीर्थम के राम मंदिर को हमेशा उत्तर आंध्र में सम्मान के साथ देखा गया है। ऐसे मंदिर में उपद्रवियों ने भगवान राम की मूर्ति के साथ बर्बरता की है, लेकिन सरकार दोषियों को पकड़ने के लिए कोई कदम नहीं उठा रही है।”

पाकिस्तान के बलूचिस्तान में अपहरण के बाद 11 कोयला खनिकों की गोली मारकर हत्या

बलूचिस्तान के माच (Mach) इलाके में रविवार (जनवरी 03, 2021) को बंदूकधारी आतंकवादियों ने 11 कोयला खनिक को गोली मार कर मौत के घाट उतार दिया। 4 घायल बताए जा रहे हैं। आतंकवादी कोयला खनिकों को अगवा कर पास के पहाड़ी में ले गए और पाकिस्तान के दक्षिण-पश्चिमी बलूचिस्तान प्रांत में उन पर गोलियाँ चला दी।

पाकिस्तानी मीडिया Dawn के मुताबिक लेविस फोर्स के एक अधिकारी मोअज्जम अली जतोई ने बताया कि 6 कोयला खनिकों की मौके पर ही मौत हो गई थी, जबकि पाँच जो गंभीर रूप से घायल थे, उनकी अस्पताल ले जाते समय मौत हो गई।

जतोई ने कहा कि प्रारंभिक जाँच में पता चला है कि हमलावरों ने शिया हजारा समुदाय से संबंध रखने वाले कोयला खनिकों की पहचान की और उन्हें मार डाला। वहीं अन्य लोगों को छोड़ दिया गया, उन्हें कोई नुकसान नहीं पहुँचाया गया। फिलहाल किसी ग्रुप ने इस हमले की जिम्मेदारी नहीं ली है।

घटना के बाद पुलिस, फ्रंटियर कॉर्प्स और जिला प्रशासन के अधिकारियों की भारी टुकड़ी घटनास्थल पर पहुँची। बलूचिस्तान के मुख्यमंत्री जाम कमाल खान ने इस घटना की निंदा की है और संबंधित अधिकारियों से जाँच रिपोर्ट माँगी है। उन्होंने कहा, “जिन्होंने इन निर्दोष कोयला खनिकों को निशाना बनाया, वे किसी भी रियायत के लायक नहीं हैं।”

पाकिस्तानी पत्रकार अनस मल्लिक ने ट्विटर पर लिखा कि माच में पूर्ण रूप से नरसंहार को अंंजाम दिया गया है। भीषण तरीके से मारे गए 11 कोयला खनिकों में अधिकतर शिया हजारा समुदाय से थे। उन्होंने उम्मीद जताई है कि बलूचिस्तान सरकार इसमें शामिल लोगों के खिलाफ ठोस कार्रवाई करेगी। क्वेटा के उपायुक्त मुराद कास के अनुसार, अभी तक कोई मामला दर्ज नहीं किया गया है।

वहीं बलूचिस्तान में हुई इस दर्दनाक घटना के बाद ट्वीट करते हुए पाकिस्तान के पीएम इमरान खान ने कहा कि माच में 11 निर्दोष कोयला खनिकों की निंदनीय हत्या आतंकवाद का एक और कायरतापूर्ण अमानवीय कृत्य है। उन्होंने इन हत्यारों को पकड़ने और पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए सभी संसाधनों का उपयोग करने के निर्देश दिए हैं।

गौरतलब है कि पिछले दिनों बलूचिस्तान नेशनल पार्टी (बीएनपी) के नेता मीर नवाब अमानुल्लाह जेहरी की खुजदार में देर रात गोली मारकर हत्या कर दी गई। हमलावरों ने जेहरी के 14 साल के पोते और दो मित्रों को भी गोलियों से छलनी कर दिया था। बीएनपी अध्यक्ष और नेशनल एसेंबली के सदस्य अख्तर मेंगल ने जेहरी की हत्या को पार्टी और बलूचिस्तान की जनता के लिए काला दिवस करार दिया था।

मुनव्वर फारूकी अगर ‘शार्ली एब्दो’ होता तो उसकी गर्दन नीचे पड़ी होती… लटर-पटर बंद करो लिबरलों

12 सितम्बर 2001 को इस्लामी आतंकवाद ने दुनिया को दहलाया था और अमेरिका के ट्विन टॉवर्स पर हुए हमले में करीब 3000 लोग मारे गए। ये एक घटना हुई। विनोद (काल्पनिक नाम) ने इसका विरोध किया। अफजल (बेहद ही काल्पनिक नाम) ने इसका समर्थन किया। कुछ दिन बाद अफजल ने विनोद के घर में घुस कर पेशाब कर दिया। विनोद ने उसे धक्का देकर बाहर निकाल दिया। मीडिया ने कहा, “विनोद और ओसामा में कोई अंतर नहीं।” तथाकथित कॉमेडियन मुनव्वर फारूकी के मामले में यही हो रहा है। उसकी गिरफ़्तारी की तुलना ‘शार्ली एब्दो नरसंहार’ से की जा रही है।

हिन्दू देवी-देवताओं को गाली देकर अपना व्यापार चलाने वाला, अपने हमनाम बुजुर्ग शायर के इस्लामी कट्टरवाद का अनुसरण करने वाला और देश के चुने हुए जनप्रतिनिधियों को अपमानित कर के तालियाँ पिटवाने वाले एक कॉमेडियन को जब कोई आक्रोश में एकाध चाँटा लगा देता है और पकड़ के पुलिस को सौंप देता है तो सीधे इसकी तुलना हिरोशिमा और नागासाकी बम ब्लास्ट से करने वाले पैदा हो जाते हैं। कौन हैं ये लोग? कहाँ से आते हैं?

दोनों ही सवालों के जवाब स्पष्ट हैं। ये लिबरल-सेक्युलर-कट्टर इस्लामी गिरोह के लोग हैं, जो मोदी विरोधी गुट से आते हैं। ये कहानी वही विनोद और अफजल वाली है। विनोद के घर में घुस कर अफजल लगातार उसके माता-पिता और पूर्वजों को गालियाँ बक रहा है और जब विनोद ने उसे धक्का देकर निकाल दिया तो वो बड़े-बड़े नरसंहारकों से भी भयानक हो गया। मीडिया का ये गुट चाहता है कि विनोद का घर अफजल का बाथरूम बन जाए और विनोद को आपत्ति जताने तक का भी हक़ न हो।

ये वही हैं, जो दिल्ली में 50 लोगों को मौत के घाट उतार देते हैं और इनके खिलाफ एक चार्जशीट तक भी दायर हो जाए तो ये पीएम मोदी की तुलना 60 लाख लोगों को मरवाने वाले हिटलर से करने लगते हैं। जबकि अगर इन्होंने हिटलर राज में अपनी इस गुंडई का हजारवाँ हिस्सा भी प्रदर्शित किया होता तो इनके शरीर में कहाँ-कहाँ शॉक दिए जाते, ये इन्हें भी नहीं पता। यहाँ ये कट्टरवाद का झंडा लिए घूम भी रहे हैं और सामने वाले पर हर वो इल्जाम लगा रहे हैं, जिसमें वो खुद हद से ज्यादा फिट बैठते हैं।

अप्रैल 2013 में ‘बिजनेस टुडे’ पत्रिका में एमएस धोनी को भगवान विष्णु बना दिया जाता है। खुद को नास्तिक बताने वाला अर्मिन नवाबी माँ काली की आपत्तिजनक तस्वीर पोस्ट कर के उन्हें ‘सेक्सी’ बताता है। ‘पीके’ फिल्म में आमिर खान भगवान शिव का अपमान करता है। कोई कट्टरवादी अपने सोशल मीडिया हैंडल्स से खुलेआम भगवान राम और सीता की आपत्तिजनक तस्वीरें पोस्ट करता है। ऐसे सैकड़ों इन्सिडेंट्स हुए हैं।

इनमें से किसी एक को कभी कुछ नहीं हुआ। वो इसीलिए, क्योंकि हिन्दू इस विश्व का सबसे उदार और सहिष्णु समुदाय है। उनके खिलाफ अगर किसी ने आक्रोशित होकर विरोध का एक स्वर उठा भी दिया तो ये बड़ी खबर बन गई और ऐसा दिखाया गया जैसे पूरे देश में अभिव्यक्ति की आज़ादी (FOE) के लिए कोई जगह ही नहीं रही। हिन्दुओं के लिए भावनाएँ आहत होने पर विरोध में चूँ करने की तुलना नरसंहार से हो रही है।

ये वही बात हुई कि ओसामा बिन लादेन एक साथ 3000 लोगों का नरसंहार कर के भी ‘अच्छा शौहर’ के रूप में देखा जाता है। रियाज़ नाइकू कइयों को मौत के घाट उतार कर भी ‘गणित का शिक्षक’ बना रहता है और विनोद अपने घर में पेशाब करते अफजल को धक्का दे दे, तो वो इन दोनों से भी बड़ा ‘आतंकी’ साबित कर दिया जाता है। हिन्दू देवी-देवता कोई कॉमिक आइटम हैं क्या? मोदी-शाह ने इन कथित कॉमेडियनों का कर्जा खाया है कि वो उनसे अपमानित होते रहें?

ये भूमिका थी। मध्य प्रदेश की घटना पर वापस आते हैं, जहाँ इंदौर में एक कार्यक्रम में हिन्दू देवी-देवताओं को अपशब्द कह कर और मोदी-शाह को अपमानित कर तालियों की अपेक्षा करने वाले मुनव्वर फारूकी को कुछ लोगों ने पुलिस को सौंप दिया। इन लोगों की भावनाएँ आहत हुईं और उन्होंने प्रतिक्रिया दी। फारूकी के दोस्त को कोर्ट में वकीलों ने भी एकाध चाँटा लगा दिया। अब किसी को पकड़ कर सबूतों के साथ पुलिस को सौंपना कब से अपराध हो गया?

वहाँ के हिन्दुओं ने कार्यक्रम का वीडियो बनाया है और उस वीडियो को सबूत के रूप में पुलिस को सौंपा है। लेकिन, इधर सोशल मीडिया पर कुछ लिबरल-सेक्युलर-कट्टरवादी एक्टिव हो गए। कर्नाटक कॉन्ग्रेस के नेता श्रीवत्स ने ‘भक्तों’ पर तंज कसते हुए लिखा कि ये लोग शार्ली एब्दो को FOE के रूप में देखते हैं, जबकि मुनव्वर फारूकी को FOE का अधिकार नहीं देना चाहते। उन्होंने लिखा कि अमेरिका में कोई भेदभाव नहीं है और सब बराबर हैं, जबकि भारत में हिंदुत्व का राज है और कोई धर्मनिरपेक्षता नहीं है।

उन्होंने आगे लिखा, “भाजपा भक्त कभी स्वतंत्रता या बराबरी के अधिकारी को लेकर सजग नहीं हैं। वो असहिष्णु लोग हैं, जो अपने हिसाब से अपना स्टैंड बदलते रहते हैं।” अगर ऐसा है, तो कभी कोई ‘भक्त’ हाफिज सईद, लखवी, बुरहान वानी, लादेन या अफजल का गुणगान करता हुआ क्यों नहीं पाया जाता? जब ‘भक्त’ हमेशा अपना स्टैंड बदलते रहते हैं तो कभी वो अलकायदा और ISIS का समर्थन क्यों नहीं करते?

इसी तरह प्रोपेगेंडा पोर्टल ‘ऑल्टन्यूज़’ की सह-संस्थापक सैम जावेद ने शार्ली एब्दो की FOE के दक्षिणपंथी झंडाबरदार एक कॉमेडियन से ऑफेंड महसूस कर रहे हैं? असल में इनका मकसद ये तो है ही कि अपने देवी-देवताओं को गालियाँ देने वालों का विरोध करने वाले हिन्दुओं को गलत साबित करें , लेकिन इससे भी बड़ा इनका मकसद है कि ये उन लोगों को सही साबित कर सकें, जिन्होंने शार्ली एब्दो के दफ्तर में घुस कर 12 लोगों की बेरहम हत्या कर दी थी।

लखनऊ में कमलेश तिवारी सिर का एक बयान के कारण कलम कर दिया जाता है। वो भी तब, जब वो इसी के लिए जेल की सज़ा भुगत कर आए होते हैं। फ्रांस में शिक्षक सैमुअल पैटी का गला रेत दिया जाता है। ऐसी न जाने कितनी ही घटनाएँ हैं, जहाँ मुस्लिमों की भावनाएँ आहत करने के नाम पर खून बहाए गए, लेकिन हिन्दुओं की भावनाएँ आहत होने पर प्रतिकार स्वरूप सोशल मीडिया पर दो शब्द लिख देना भी सैमुअल पैटी और कमलेश तिवारी के हत्यारों से भी बड़ा अपराध बन जाता है।

जब भारती, रवीना टंडन और फराह खान जैसी बड़ी फ़िल्मी हस्तियाँ बाइबिल के एक शब्द को लेकर कुछ मजाक कर देती हैं तो उन्हें सोशल मीडिया पर, मीडिया में और वेटिकन के पादरी से मिल कर हस्तलिखित माफीनामा सौंप कर- तीन तरह से माफी माँगनी पड़ती है। लेकिन, हिन्दू देवी-देवताओं को गाली देकर विरोध कर रहे हिन्दुओं को ही दोषी ठहरा कर हर कोई खुद को ‘बहादुर’ दिखाना चाहता है।

लिबरलों द्वारा शार्ली एब्दो के कार्टूनिस्टों की हत्या, सैमुअल पैटी की गर्दन काटने को मुनव्वर फारूकी की गिरफ्तारी के समानांतर रखना, बताता है कि इनके तर्क कितने वाहियात हैं। जहाँ कुछ बोलने के लिए किसी राष्ट्र के कानून के खिलाफ जा कर हत्या और कुछ बोलने पर राष्ट्र के कानून के आलोक में की गई गिरफ्तारी बराबर बात है। मुनव्वर फारूकी अगर ‘शार्ली एब्दो’ होता, तो उसकी गर्दन नीचे पड़ी होती, कानून के हिसाब से कोर्ट और पुलिस कार्रवाई नहीं कर रही होती। अगर ये ‘शार्ली एब्दो के बराबर घटना होती, तो मुनव्वर फारूकी के साथ-साथ उसके दोस्तों, दोस्तों के रिश्तेदारों- सभी की गर्दन जमीन पर पड़ी होती।

सूचित करते चलें कि मध्य प्रदेश के इंदौर में हिन्दू देवी-देवताओं और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पर अभद्र टिप्पणी करने के आरोप में शनिवार को गिरफ्तार कथित कॉमेडियन मुनव्वर फारूकी समेत 5 आरोपितों को 13 जनवरी तक न्यायिक हिरासत के तहत जेल भेज दिया गया है। मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) अमन सिंह भूरिया ने फारूकी और अन्य चार को जमानत देने से इनकार कर दिया। फारूकी की तरफ से वकील अंशुमन श्रीवास्तव ने अदालत में बहस की, जो कॉन्ग्रेस का नेता भी है।

‘नहीं लगवाऊँगा BJP की कोरोना वैक्सीन’ कहने के बाद अखिलेश यादव ने लिया यू टर्न

कोरोना वैक्सीन पर बेतुके बयानों के बाद सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के सुर बदल गए हैं। शनिवार को उन्होंने इसे बीजेपी की वैक्सीन बताते हुए कहा था कि वे इसे नहीं लगवाएँगे। लेकिन अगले ही दिन उन्होंने टीकाकरण की तारीख जल्द तय करने की डिमांड रखी है।

सोशल मीडिया पर भारी आलोचनाओं के बाद अखिलेश यादव ने रविवार (3 दिसंबर, 2020) को ट्वीट किया, “कोरोना का टीकाकरण एक संवेदनशील प्रक्रिया है इसलिए भाजपा सरकार इसे कोई सजावटी-दिखावटी इवेंट न समझे और अग्रिम पुख़्ता इंतज़ामों के बाद ही शुरू करे। ये लोगों के जीवन का विषय है अत: इसमें बाद में सुधार का ख़तरा नहीं उठाया जा सकता है। गरीबों के टीकाकरण की निश्चित तारीख तय हो।”

हालाँकि अखिलेश यादव ने टीका नहीं लगवाने वाले अपने पहले फैसले के बारे में कोई टिप्पणी नहीं की है। बता दें उन्होंने शनिवार को कहा था कि कोरोना टीका बीजेपी का है। वे कोरोना वैक्सीन नहीं लगवाएँगे, क्योंकि उन्हें इस टीके पर भरोसा नहीं है। अखिलेश ने दावा किया कि जब उत्तर प्रदेश में उनकी सरकार बनेगी तो वे प्रदेश की जनता को मुफ्त टीका लगवाएँगे।

सिर्फ अखिलेश ही नहीं उनकी पार्टी के विधायक आशुतोष सिन्हा ने तो यहाँ तक कह दिया कि हमें लगता है कि बीजेपी वाले बाद में कह देंगे कि जनसंख्या कम करने के लिए, नपुंसक बनाने के लिए लगा दिया वैक्सीन। उन्होंने कहा कि समाजवादी पार्टी ही नहीं किसी को भी वैक्सीन नही लगवाना चहिए।

उल्लेखनीय है कि देश में कोरोना वैक्सीन को लेकर ड्रग्‍स कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (DCGI) ने रविवार को बड़ा ऐलान करते हुए सीरम इंस्टीट्यूट की वैक्सीन कोविशील्ड (Covishield) और भारत बायोटेक की वैक्सीन कोवैक्सीन (Covaxin) के आपातकाल इस्तेमाल की अंतिम मंजूरी दे दी है। वहीं वैज्ञानिकों की इस सफलता पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी पूरे देश को बधाई दी है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट करते हुए कहा, “वैश्विक महामारी के खिलाफ भारत की जंग में एक निर्णायक क्षण! SerumInstIndia और BharatBiotech की वैक्सीन को DCGI की मंजूरी से एक स्वस्थ और कोविड मुक्त भारत की मुहिम को बल मिलेगा। इस मुहिम में जी-जान से जुटे वैज्ञानिकों-इनोवेटर्स को शुभकामनाएँ और देशवासियों को बधाई।”

उन्होंने आगे कहा, “हर भारतीय को गर्व होगा कि जिन दो टीकों को आपातकालीन उपयोग की मंजूरी दी गई है वे भारत में बने हैं!” पीएम मोदी ने देश को, वैज्ञानिकों को और नवोन्मेषकों को बधाई देते हुए कहा, “यह आत्मनिर्भर भारत के सपने को पूरा करने के लिए हमारे वैज्ञानिक समुदाय की इच्छाशक्ति को दर्शाता है। वह आत्मनिर्भर भारत, जिसका आधार है- सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया।”

वहीं फ्रंटलाइन वॉरियर्स को धन्यवाद देते हुए पीएम मोदी ने कहा, “विपरीत परिस्थितियों में असाधारण सेवा भाव के लिए हम डॉक्टरों, मेडिकल प्रोफेशनल्स, वैज्ञानिकों, पुलिसकर्मियों, सफाईकर्मियों और सभी कोरोना वॉरियर्स के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। देशवासियों का जीवन बचाने के लिए हम सदा उनके आभारी रहेंगे।”

3 महीने पहले इस्लाम छोड़ मोहम्मद अनवर बने थे देव प्रकाश, कट्टरपंथियों ने जला डाला घर: एक्शन में UP पुलिस

उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले में सांप्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने की घटना हुई है। रायबरेली जिले के रहने वाले एक व्यक्ति ने इस्लाम धर्म त्याग कर हिन्दू धर्म स्वीकार किया था। क्षेत्र के कट्टरपंथियों को यह बात पसंद नहीं आई, इसलिए उन्होंने उसके घर को आग के हवाले कर दिया। इस घटना के दौरान घर में उसके बच्चे भी मौजूद थे। किसी तरह सभी ने अपनी जान बचाई लेकिन घटना में उनका पूरा घर जल कर राख हो गया। 

सितंबर 2020 में रायबरेली, सलोन स्थित रतासो गाँव के निवासी मोहम्मद अनवर ने केकोगना घाट पर हिन्दू धर्म में वापसी की थी। धर्मांतरण के बाद मोहम्मद अनवर ने अपना नाम देव प्रकाश पटेल रख लिया था। धर्मांतरण के बाद उसके तीन बच्चों रेहान, अली और ख़ुशी का नाम देव नाथ, देवी दयाल और दुर्गा देवी कर दिया गया था। देव प्रकाश पटेल ने मुंडन करवाने के बाद पूरे विधि-विधान से हिन्दू धर्म में वापसी की थी। 

लेकिन उसके आस-पास रहने वाले कट्टरपंथियों को यह बात हज़म नहीं हुई। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ शनिवार (2 जनवरी 2021) को ग्राम प्रधान ताहिर अहमद ने देव प्रकाश पटेल के घर को आग के हवाले कर दिया। इस घटना के दौरान घर में मौजूद सभी लोग सो रहे थे। देव प्रकाश ने किसी तरह अपनी और अपने बच्चों की जान बचाई। लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद उसका घर पूरी तरह जल कर राख हो गया है। 

सलोन एसएचओ पंकज त्रिपाठी ने ऑपइंडिया से बात करते हुए बताया, “आरोपितों पर एफ़आईआर दर्ज कर ली गई है। पुलिस ने मामले की जाँच शुरू कर दी है, वारदात को अंजाम देने वालों को जल्द से जल्द गिरफ्तार कर लिया जाएगा।” 

दरअसल देव प्रकाश पटेल धर्मांतरण से पहले फ़कीर बिरादरी से ताल्लुक रखते थे। कुछ साल पहले उनकी पत्नी का निधन हो गया था। उनके दो बेटे और एक बेटी थी। उनके सामने जीवनयापन की बड़ी चुनौती थी।

इस बीच आस-पास रहने वाले हिन्दू परिवारों ने बिना किसी भेदभाव के उनकी काफी मदद की थी। वह इस बात से काफी प्रभावित हुए और उन्होंने इस्लाम धर्म त्याग दिया। देव प्रकाश ने हिन्दू धर्म स्वीकार करने से पहले प्रशासनिक अधिकारियों को भी सूचित किया था। साथ ही यह भी कहा था कि उन्होंने यह कदम अपनी इच्छा से उठाया है।                  

इबोला खोजने वाले डॉक्टर ने ‘Disease X’ को लेकर चेताया, कोरोना से भी ज्यादा घातक

इस वक्त दुनिया कोरोना महामारी से जूझ रही है। लेकिन, इबोला की खोज करने वाले डॉक्टर की मानें तो दुनिया पर इससे भी घातक महामारी का खतरा मँडरा रहा है। इसे नाम दिया गया है Disease X। 1976 में इबोला वायरस की खोज में मदद करने वाले प्रोफेसर जीन जैक्स मुएंबे तांफुम (Jean-Jacques Muyembe Tamfum) का कहना है कि अफ्रीका के वर्षा वनों से नए और घातक वायरस के फैलने का खतरा है।

प्रोफेसर तांफुम ने कहा कि हम अब ऐसी दुनिया में रह रहे हैं जहाँ नए वायरस आएँगे और इसी वजह से इंसानियत पर खतरा भी बना रहेगा। उन्होंने इंसानों से जानवरों में बीमारी के प्रसार को लेकर कहा कि यह मानवता के लिए कहीं अधिक खतरनाक हो सकता है और इसकी शुरुआत अफ्रीका के वर्षा वनों से होने की आशंका है।

हाल ही में अफ्रीका के कॉन्गो में एक मरीज में Hemorrhagic Fever के लक्षण दिखे। इसके बाद मरीज को आइसोलेट कर दिया गया और उसके सैंपल इबोला टेस्ट के लिए भेज दिए गए। इस दौरान तमाम मेडिकल एक्सपर्ट एक सवाल से जूझ रहे थे कि क्या होगा अगर महिला को इबोला ना हो? क्या होगा अगर महिला किसी नए वायरस से पैदा होने वाली ‘Disease X’ की पेशेंट जीरो हो? हालाँकि महिला का रिपोर्ट निगेटिव आया। लेकिन उनकी बीमारी आज भी रहस्य बनी हुई है।

WHO के अनुसार, ‘Disease X’ में X अज्ञात है। यानी एक अज्ञात बीमारी जो आने वाले वक्त में दुनिया में फैल सकती है। दुनिया के जाने-माने मेडिकल साइंटिस्ट्स का कहना है कि ‘Disease X’ का डर जायज है।

बता दें नया वायरस कोरोना की तरह से तेजी से फैल सकता है लेकिन इससे मरने वालों की संख्‍या इबोला से भी 50 से 90 फीसदी ज्‍यादा हो सकती है। गौरतलब है कि प्रोफेसर जीन ने वायरस का पता लगाने के लिए जिस नमूने को लिया था, उसे बेल्जियम और अमेरिका भेजा गया जहाँ वैज्ञानिकों ने पाया कि यह खून में वार्म के आकार के वायरस मौजूद है। बता दें इबोला होने पर खून बहने लगता था और मरीज की मौत हो जाती है।

कॉन्गो के Yambuku Mission Hospital में पहली बार रहस्यमय बीमारी की पुष्टि इबोला के रूप में हुई थी और तब हॉस्पिटल के 88 फीसदी मरीज और 80 फीसदी स्टाफ की जान इबोला ने ले ली थी।

महिलाओं ने कपड़े फाड़े, छतों से बरसाए पत्थर: रेहान को पकड़ने पहुँची UP पुलिस पर जानलेवा हमला

कानपुर के हिस्ट्रीशीटर रेहान उर्फ गुड्डू को पकड़ने गई बेकनगंज पुलिस टीम पर आरोपितों के साथियों ने पथराव कर दिया। यहाँ तक कि पुलिस से मुहल्ले के लोग भी भिड़ गए। किसी तरह बेकनगंज थाने के दरोगा व सिपाही वहाँ से जान बचाकर भाग निकले। बता दें कि रेहान डी 80 गैंग का सरगना है।

मामला कानपुर के कर्नलगंज क्षेत्र के गम्मू खाँ के हाते का है। यहाँ टॉप 10 अपराधी को पकड़ने पहुँची पुलिस से लोग भिड़ गए। वहीं महिलाओं ने कपड़े फाड़कर हंगामा किया। अराजक तत्वों ने छतों से पुलिस टीम पर पथराव कर दिया। बवाल की जानकारी पर कई थानों की फोर्स मौके पर पहुँची, लेकिन तब तक हिस्ट्रीशीटर अपने भाइयों के साथ रफूचक्कर हो चुका था।

पुलिस के अनुसार गम्मू खाँ का हाता निवासी रेहान उर्फ गुड्डू शातिर हिस्ट्रीशीटर व टॉप 10 मोबाइल चोर है। उसके भाई भी हिस्ट्रीशीटर हैं। रेहान इन दिनों शुक्लागंज में रहता है। जबकि उसके दो भाई गम्मू खाँ का हाता में रहते हैं और दो अन्य भाई बजरिया थानाक्षेत्र में रह रहे हैं। मोबाइल चोरी व लूट के मामले में बेकनगंज थाने के दारोगा मो. नईम शनिवार (जनवरी 02, 2021) देर शाम दो सिपाहियों सलमान व मुश्ताक के साथ रजाकत को पकड़ने के लिए हाते में पहुँचे।

उन्हें सूचना मिली थी कि रेहान भी भाइयों से मिलने आया है। जैसे ही पुलिस टीम के आने की जानकारी आरोपित के घरवालों को हुई, कई महिलाएँ हाथों में डंडे लेकर पुलिस से भिड़ने लगीं।

यहाँ तक कि कुछ महिलाओं ने कपड़े फाड़कर पुलिस टीम पर ही आरोप लगाने शुरू कर दिए। इसके बाद अचानक छतों से कुछ युवकों ने पत्थर चला दिए। पत्थर चलते ही दारोगा और सिपाही जान बचा कर वहाँ से भागे। उन्होंने बेकनगंज थाना प्रभारी को घटना की जानकारी दी।

इसके बाद बेकनगंज व कर्नलगंज थाने की फोर्स मौके पर पहुँची। हालाँकि इस बीच रजाकत व उसके भाई फरार हो चुके थे। कर्नलगंज सीओ दिनेश कुमार शुक्ला ने बताया कि दारोगा की तहरीर पर आरोपितों के खिलाफ बलवा, सरकारी कार्य में बाधा डालने, मारपीट करने आदि धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया है। जल्द ही आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया जाएगा।

विकास दुबे कांड से कोई सीख नहीं

गौरतलब है कि पिछले दिनों कानपुर के चौबेपुर के बिकरू गाँव में दबिश देने गई पुलिस टीम पर हमला कर आठ पुलिसकर्मियों की हत्या कर दी गई थी। नक्सलियों की तरह 8 पुलिसकर्मियों की बेरहमी से हत्या करने वाला मोस्टवांटेड हिस्ट्रीशीटर विकास दुबे एमपी के उज्जैन में पकड़ा गया। हालाँकि बाद में वह भागने की कोशिश करते हुए पुलिस एनकाउंटर में मारा गया।

एसओ कौशलेंद्र प्रताप सिंह ने बताया था कि उस रात पुलिस एनकाउंटर के इरादे से नहीं गई थी और न ही उनके पास पर्याप्त मात्रा में असलहे थे। लेकिन विकास दुबे और उसका गैंग पूरी तैयारी में था। घायल एसओ कौशलेंद्र प्रताप सिंह ने बताया कि 2 जुलाई की रात करीब 12 बजे दबिश देने की तैयारी थी।

उनके साथ उनकी टीम थी, साथ ही चौबेपुर थाने के एसओ विनय तिवारी, माय फोर्स व एक अन्य थाने की फोर्स भी थी। इसके अलावा सीओ भी थे। सभी लोगों को करीब साढ़े 12 बजे विकास के घर से करीब 200 मीटर की दूरी पर गाड़ी से उतरना पड़ा। रास्ते में जेसीबी को इस तरह से खड़ा किया गया था कि कोई गाड़ी न निकल सके। पैदल भी एक बार में एक ही आदमी निकल सके।

इसके साथ ही उन्होंने बताया कि वहाँ पर पर्याप्त मात्रा में रोशनी न होने की वजह से वो लोग विकास दुबे की गैंग को नहीं देख पा रहे थे, मगर वो लोग उनको अच्छी तरह से देख रहे थे। उन्होंने बताया कि तीन तरफ से फायरिंग हो रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे एक ही समय में 15 लोग गोली चला रहे हों। उन्होंने आरोपितों के पास सेमी ऑटोमेटिक वेपन्स होने की भी आशंका जताई थी।

मुनव्वर फारूकी, ये चुटकुला सुनो, बहुत मजा आएगा… | Ajeet Bharti on Munawar Faruqui

लिबरलों द्वारा शार्ली एब्दो के कार्टूनिस्टों की हत्या, तत्पश्चात् सैमुअल पेटी की गर्दन काटने को मुनव्वर फारूकी की गिरफ्तारी के समानांतर रखना, बताता है कि इनके तर्क कितने वाहियात हैं जहाँ कुछ बोलने के लिए किसी राष्ट्र के कानून के खिलाफ जा कर हत्या और कुछ बोलने पर राष्ट्र के कानून के आलोक में की गई गिरफ्तारी बराबर बात है।

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रेड बिकनी गर्ल: 18 की उम्र और जहाज में छेद कर समुद्र में छलांग… कम्युनिस्टों को चकमा देने की एक नायाब कहानी

70 का दशक। सोवियत यूनियन (USSR) और अमेरिका की प्रतिद्वंद्विता। दुनिया कोल्ड वॉर के दौर से गुजर रही थी। उसी दौर में कई लोगों ने USSR से पलायन भी किया। इनमें एक 18 साल की लड़की भी थी, जिसे दुनिया ने ‘रेड बिकनी गर्ल’ के नाम जाना।

रेड बिकनी गर्ल यानी लिलियाना गैसिन्काया (Liliana Gasinskaya) को तब सनसनी बनीं जब वह कम्युनिस्टों को चकमा देकर ऑस्ट्रेलिया पहुँचने में कामयाब रही। वह भी समुद्री रास्ते से। इस घटना के 41 साल बाद केजीबी की वह सीक्रेट फाइल सामने आई है जिसमें गैसिन्काया के बारे में सूचनाएँ हैं।

1979 में ऑस्ट्रेलिया की मीडिया में सिर्फ गैसिन्काया की ही चर्चा थी। ‘डेली मिरर’ ने उन्हें ‘लाल बिकनी वाली सुंदरी’ कहा था, क्योंकि वो इसी ड्रेस में क्रूज के एक छेद से किसी तरह निकलीं और तैरते हुए सिडनी हार्बर पहुँची थीं। लिलियाना गैसिन्काया को ऑस्ट्रेलिया में शरण मिली और उन्होंने वहाँ की पत्रिका ‘पेंटहाउस’ के लिए न्यूड तस्वीरें भी क्लिक करवाईं। पत्रिका ने उनकी तस्वीर को बीच के दो पन्नों पर जगह दी और लिखा – ‘लाल बिकनी वाली सुंदरी, बिना बिकनी के।’

वैसे तो उनकी इस बहादुरी भरी तैराकी के 41 वर्ष हो चुके हैं, लेकिन अब जाकर रूस की खुफिया एजेंसी KGB की वो फाइल सामने आई है, जिसमें इसके डिटेल्स हैं। असल में वो ‘SS Leonid Sobinov’ जहाज में लिफ्ट अटेंडेंट और वेट्रेस थीं। ये जहाज ओडेस्सा के ब्लैक सी पोर्ट से ऑपरेट किया जाता था। लाल बिकनी में ऑस्ट्रेलिया पहुँचीं लिलियाना गैसिन्काया को एक व्यक्ति अपने पालतू कुत्ते के साथ दिखा, जिससे उन्होंने कपड़े और मदद माँगी थी।

हालाँकि, इस दौरान एक अखबार की भी चाँदी हो गई और इससे पहले कि ऑस्ट्रेलिया या सोवियत रूस की खुफिया एजेंसियाँ उन्हें ढूँढ पाती, उससे पहले ही ‘The Mirror’ उन्हें लेकर एक सेक्रेट जगह पर ले गई और उसके बाद कई एक्सक्लूसिव खबरों के साथ-साथ बिकनी में उनकी कई तस्वीरें भी प्रकाशित की। लिलियाना ने बताया था कि उन्होंने एक बिकनी और अँगूठी के अलावा सब कुछ छोड़ दिया था, क्योंकि उन्हें पता था कि वो कुछ भी लेकर जाएँगी तो वो लोग उन्हें पकड़ लेंगे।

वो जहाज में एक बिस्तर के ऊपर चढ़ीं और फिर एक पोर्टहोल के माध्यम से बाहर निकल आईं। KGB का एक अधिकारी लियोनिड सोबिनोव उनका पीछा कर रहा था और ऑस्ट्रेलिया के तटों पर लोगों से पूछा कि क्या उन्होंने किसी ऐसी लड़की को देखा है। वहाँ के कम्युनिस्ट सरकार ने इसे गद्दारी के रूप में देखा। जनवरी 14, 1979 को लिलियाना गैसिन्काया ने क्रू पार्टी में हिस्सा नहीं लिया था और सिरदर्द का बहाना बनाया था।

उनके भागने के बाद जहाज में एक कागज का टुकड़ा भी मिला था, जिसमें उन्होंने अंग्रेजी के कुछ शब्द सीख कर प्रैक्टिस किए थे। इसमें शामिल था कि वो कैसे ऑस्ट्रेलिया में शरण के लिए मदद माँगेंगी। उनकी माँ एक अभिनेत्री और पिता संगीतकार थे। USSR में उनके खिलाफ एक आपराधिक मामला भी चल रहा था। वो अपने साथ रुपए और पासपोर्ट तक नहीं ले गई थीं, जो जहाज के केबिन में ही पड़े रह गए थे।

अब भी रूस के ख़ुफ़िया अधिकारी यही मानते हैं कि लिलियाना गैसिन्काया को एक प्रोपेगेंडा की तरह अमेरिका ने बाहर निकाला था। शिप के कप्तान का कहना था कि वो रात की पार्टियों में अजनबियों से मिलती थीं और उन्हें किस करती थीं, जबकि जहाज पर विदेशियों के साथ नजदीकियाँ बढ़ाने पर प्रतिबन्ध था। वो अंग्रेजी सुधारने के बहाने ये सब करती थीं। विदेशियों से दूर रखने के लिए 2 बार उनका ट्रांसफर भी हुआ था।

लिलियाना को ‘पेंटहाउस’ के फोटोशूट के लिए $15000 मिले थे। उनका कहना था कि सोवियत संघ (USSR) में तो ऐसा कुछ भी करने पर प्रतिबंध था, जो सेक्सी हो। एक फोटोग्राफर से रिलेशनशिप के कारण उन्हें DJ की नौकरी मिली और एक टीवी शो में भी काम मिला। उनके तीन बच्चे भी हुए। उन्होंने एक शादी भी की, जो 6 वर्षों के बाद ही टूट गई। वो फिर लाइमलाइट से दूर लंदन जाकर रहने लगीं। भागने के एक साल बाद ही सोवियत ने उनकी नागरिकता छीन ली थी।