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80% सीटों पर BJP की जीत: अरुणाचल के स्थानीय चुनावों में रचा इतिहास, निर्दलीय दूसरे नंबर पर, बाकी पार्टियाँ फुस्स

भारतीय जनता पार्टी ने (BJP) अरुणाचल प्रदेश में हुए स्थानीय निकाय के चुनावों में कमाल का प्रदर्शन किया है। भाजपा ने न सिर्फ कॉन्ग्रेस, बल्कि उत्तर-पूर्व की स्थानीय राजनीतिक दलों को भी पटखनी देकर इतिहास रच दिया। पंचायत और जिला परिषद स्तर पर भाजपा को मिली बड़ी सफलता 2019 की याद दिला गई। तब राज्य में हुए विधानसभा चुनावों में भी भाजपा ने 60 में से 41 सीटें और 50.86% वोट शेयर पाकर सरकार बनाई थी।

पासीघाट म्युनिसिपल काउंसिल की बात करें तो यहाँ BJP ने 8 में से 6 सीटें जीतीं और कॉन्ग्रेस मात्र 2 पर सिमट कर रह गई। वहीं ईटानगर म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन में भाजपा ने 20 में से 10 सीटें जीत ली और दूसरे नंबर पर 9 सीटों के साथ जदयू रही। कोर्नाड संगमा की NPP को 1 सीट मिली, जो मेघालय में भाजपा की सहयोगी पार्टी है। पासीघाट और ईटानगर में भाजपा की जीत से अरुणाचल के बड़े शहरों में उसकी पैठ का पता चलता है।

वहीं अगर ग्रामीण इलाकों की बात करें तो जिला परिषद की 237 सीटों में से भाजपा ने 187 सीटें जीतीं। भाजपा ने जिला परिषद की 78.9% सीटें जीत लीं। दूसरी पार्टियों का प्रदर्शन इतना बुरा रहा कि 22 सीटों के साथ निर्दलीय ने ये स्थान काबिज किया। जदयू को जिला परिषद में 10 और कॉन्ग्रेस को 9 सीटों पर कामयाबी मिली। वहीं NPP ने भी 6 सीटें जीती। कुल मिला कर भाजपा का यहाँ एकतरफा दबदबा रहा।

जहाँ तक ग्राम पंचायत की बात है, उसमें भाजपा को जिला परिषद से भी बड़ी सफलता मिली। भाजपा ने ग्राम पंचायत सदस्यों की 79.48% सीटों को अपने नाम किया। भाजपा ने 8125 कुल सीटों में से 6458 को जीत कर इतिहास रच दिया। ग्राम पंचायत में भी 974 सीटों के साथ निर्दलीय दूसरे स्थान पर रहे। कॉन्ग्रेस को 328 तो NPP को 238 सीटें प्राप्त हुईं। जदयू ने भी 121 सीटें जीत कर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।

कुल मिला कर देखें तो पूरे स्थानीय निकाय चुनावों में अरुणाचल प्रदेश में भाजपा ने कुल 8390 सीटों में से 6661 को जीत कर एकतरफा दबदबा कायम किया और राज्य में अपनी स्थिति पूरी तरह मजबूत कर ली। 79.39% सीटों पर जीत को मुख्यमंत्री पेमा खांडू के परफॉरमेंस पर जनता के मुहर के रूप में भी देखा जा रहा है। सीएम खांडू ने इसे मोदी सरकार के कामकाज का नतीजा बताया है और जनता का धन्यवाद किया है।

अब अरुणाचल प्रदेश की विधानसभा में भी जदयू के 6 विधायकों के भाजपा में शामिल होने के बाद पार्टी के विधायकों की संख्या 48 हो गई है। इसके 1 दिन बाद ही मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद छोड़ दिया और उनकी जगह उनके ही विश्वस्त आरसीपी सिंह को जनता दल यूनाइटेड (जदयू) का नया अध्यक्ष चुना गया। अरुणाचल की राजनीति का असर बिहार में भी देखने को मिल रहा है।

‘अडानी रेलवे… अब रेलवे निजी संपत्ति है’: पुणे जंक्शन का टिकट वायरल, PM मोदी ने अडानी को बेच दी भारतीय रेलवे?

भारत में अक्सर विपक्षी दल भाजपा की केंद्र सरकार को देश के दिग्गज उद्योगपतियों अंबानी और अडानी से जोड़ते रहते हैं। इस पीएम नरेंद्र मोदी के साथ उनकी तस्वीरें शेयर की जाती है और लोगों को भड़काने के लिए तरह-तरह की बातें की जाती हैं। अब सोशल मीडिया पर पुणे जंक्शन का एक टिकट शेयर किया जा रहा है, जिसके साथ दावा किया जा रहा है कि पीएम मोदी ने भारतीय रेलवे को अडानी को बेच दिया है।

रेलवे अडानी की निजी संपत्ति हो गई है?

राज प्रीत नामक फेसबुक यूजर ने इस तस्वीर को शेयर किया, जिसमें टिकट पर लिखा नजर आ रहा है – “अडानी रेलवे; रेलवे अब हमारी निजी संपत्ति है”। साथ ही इस पर अगस्त 6, 2020 की तारीख भी अंकित की गई है। इस तस्वीर को शेयर करते हुए दावा किया जा रहा है कि सरकार ने अडानी को भारतीय रेलवे को बेच दिया है। साथ ही ये भी कहा जा रहा है कि अडानी ने रेलवे टिकटों के दाम भी काफी बढ़ा दिए हैं।

बता दें कि ये दावा पूरी तरह फेक है, क्योंकि देश के किसी भी हिस्से में कोई भी रेलवे स्टेशन या कोई भी ट्रेन किसी भी अन्य कंपनी को ‘बेची’ नहीं गई है। इसीलिए, ये दावा झूठा है। असली टिकट की तस्वीर के ऊपर अडानी का नाम लिख कर उसे रेलवे की निजी संपत्ति बताते हुए एडिट किया गया है और फिर उसे किसी ने भ्रम फैलाने के लिए सोशल मीडिया पर शेयर कर दिया। ये दावा वैसे पहली बार वायरल नहीं हो रहा।

अगस्त 2020 में पत्रकार प्रशांत कनौजिया ने भी पुणे जंक्शन पर टिकट के दाम बढ़ाए जाने की बात लिखी थी, जिस पर जवाब देते हुए भारतीय रेलवे ने लिखा था – “पुणे जंक्शन द्वारा प्लेटफार्म टिकट का मूल्य ₹50 रखने का उद्देश्य अनावश्यक रूप से स्टेशन पर आने वालों पर रोक लगाना है, जिस से सोशल डिस्टेंसिंग का पालन किया जा सके। रेलवे प्लेटफॉर्म टिकट की दरों को कोरोना महामारी के शुरुआती दिनों से ही इसी प्रकार नियंत्रित करता आया है।”

अडानी सहित 15 ऐसी कंपनियाँ हैं, जिन्हें भारत में कंटेनर ट्रेन्स के ऑपरेशन की अनुमति मिली हुई है, इसीलिए उन कंटेनर ट्रेन्स की तस्वीरें और वीडियो शेयर कर के भी दावा किया जा रहा है कि भारतीय रेलवे अडानी चला रहा है। ‘General-Purpose Wagon Investment Scheme’ के तहत टाटा जैसे कंपनियों को भी कोयला और मिनरल्स ढोने की अनुमति है। लेकिन, इन ट्रेनों का भी नियंत्रण और रेगुलेशन पूर्णरूपेण भारतीय रेलवे के हाथ में है।

विपक्षी दलों द्वारा ऐसे ही भ्रम फैलाने का नतीजा है कि पंजाब के किसान रिलायंस जियो की दूरसंचार आपूर्ति सेवाओं को बाधित कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर ऐसे वीडियो शेयर किए जा रहे हैं, जिनमें लोगों को कियो टॉवर की बिजली सप्लाई को बंद करते देखा जा सकता है। रिलायंस के पेट्रोल पम्प और रिटेल स्टोर के बाहर विरोध प्रदर्शन के बाद, पंजाब में किसानों ने अब राज्य के कई हिस्सों में दूरसंचार कंपनी की सेवाओं को बाधित करने के लिए रिलायंस Jio मोबाइल टावरों की बिजली आपूर्ति बंद कर दी है।

बेटे को गोविंदा बनाने निकले थे, डेविड धवन की Coolie No 1 बन गई दूसरी सबसे ज्यादा खराब रेटिंग वाली फिल्म

वरुण धवन और सारा अली खान अभिनीत फिल्म ‘Coolie No 1’ को रेटिंग के मामले में गहरा धक्का लगा है। विश्लेषकों में चर्चा थी कि 90 के दशक के सुपरस्टार गोविंदा से दुश्मनी मोल लेने के बाद फिल्म निर्देशक डेविड धवन अपने बेटे को गोविंदा बनाना चाहते थे, लेकिन फिलहाल IMDb पर 10 में से 1.3 की रेटिंग के साथ ही ऑल टाइम वर्स्ट फिल्मों की सूची में आ गई है। फिल्म को दर्शकों ने पूरी तरह नकार दिया है।

इससे पहले जून 2018 में आई सलमान खान की ‘रेस 3’ को IMDb पर 1.9 रेटिंग मिली थी। उससे भी पहली मार्च 2013 में रिलीज हुई अजय देवगन की ‘हिम्मतवाला’ को काफी खराब रेटिंग मिली थी। उसे 10 में से मात्र 1.7 रेटिंग ही मिल पाई थी। ‘Coolie No. 1’ को OTT वीडियो प्लेटफ़ॉर्म अमेजन प्राइम पर इस शुक्रवार (दिसम्बर 25, 2020) को क्रिसमस के मौके पर रिलीज किया गया था। फिल्म बुरी तरह फ्लॉप हो गई है।

वहीं अगर जून 1995 मे आई गोविंदा की ‘Coolie No 1’ की बात करें तो IMDb पर उसकी रेटिंग 6.3 है, जो इसकी रीमेक से काफी अच्छी है। समीक्षकों ने भी वरुण धवन की फिल्म को नकार दिया है। फिल्म में कोरोना वायरस का प्रयोग भी मजाक के रूप में किया गया है, जिसने दुनिया भर में 17 लाख से भी अधिक लोगों की जान ले ली है। वहीं सारा आली खान का कहना है कि अगर राजनीतिक चश्मे से देखा जाए तो कोई भी मजाक या कॉमेडी खत्म हो जाएगी।

यहाँ तक कि इस फिल्म के गाने भी अरिजनल नहीं हैं और पुरानी ‘Coolie No 1’ के 2 लोकप्रिय गानों ‘हुस्न है सुहाना’ और ‘मैं तो रस्ते से जा रहा था’ को रीक्रिएट किया गया है। ये फिल्म मई 2020 में ही रिलीज की जाने वाली थी, लेकिन कोरोना संक्रमण के चलते इसे आगे बढ़ाया गया। ‘इंडिया टुडे’ ने भी इसे साल की सबसे बुरी 8 फिल्मों की सूची में रखा है। डेविड धवन गोविंदा को लेकर 17 फिल्में निर्देशित कर चुके हैं, लेकिन अब उनमें बातचीत बंद है।

इससे पहली इसी साल रिलीज हुई ‘सड़क 2’ के ट्रेलर को अब तक 6 मिलियन (60 लाख) से ज्यादा बार डिस्लाइक किया चुका था, जो कि अपने आप में बेहद ही खराब रिकॉर्ड है। जबकि इस ट्रेलर को देखकर इसे पसंद या लाइक करने वालों की संख्या महज तीन लाख के आसपास है। सड़क 2 भारत की सबसे ज्यादा डिसलाइक वीडियो बन गई थी। सोशल मीडिया पर इस दौरान ‘अनइंस्टॉल हॉटस्टार’ ट्रेंड होता रहा क्योंकि लोगों का कहना था कि इस फिल्म में केवल नेपोटिज्म के प्रोडक्ट्स भरे पड़े हैं, जिन्हें महेश भट्ट आगे बढ़ा रहे हैं।

सिखों की लाश पर PM बने, मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए हदें पार की: कॉन्ग्रेस का ‘मिस्टर क्लीन’… लेकिन कहे गए ‘बोफोर्स चोर’

भारत के लोकसभा चुनाव के इतिहास में अगर किसी पार्टी को कभी सबसे ज्यादा सीटें मिलीं तो वो थी 1984 में कॉन्ग्रेस पार्टी को मिली 414 सीट। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की हत्या के कुछ ही दिनों बाद हुए इन चुनावों में राजीव गाँधी के नेतृत्व में पार्टी ने 76.5% सीटें जीत कर एक बहुत बड़ा बहुमत प्राप्त किया। पूरे देश में कॉन्ग्रेस और गाँधी परिवार के लिए सहानुभूति की एक बहुत बड़ी लहर थी, जिसका फायदा राजनीति में नए-नवेले आए राजीव गाँधी को मिला।

इस चुनाव में विपक्ष की हालत इतनी पतली थी कि एक क्षेत्रीय पार्टी दूसरे नंबर पर उभरी। आंध्र प्रदेश के तेलुगु सुपरस्टार NTR की TDP को 30 सीटें मिलीं और देश के चुनावी इतिहास में पहली बार एक क्षेत्रीय पार्टी मुख्य विपक्षी दल बन गई। ये भाजपा का पहला चुनाव था और उसने मात्र 2 सीटों के साथ बस अपना खाता भर ही खोला था। वामपंथी CPI (M) को 22 और जनता पार्टी को मात्र 10 सीटें ही मिलीं।

लेकिन, इसके बाद अगले 5 वर्ष तक राजीव गाँधी ने जो सरकार चलाई, वो भारत की सबसे विवादित सरकारों में से एक थी। ऐसे-ऐसे फैसले लिए गए, जिसे न सिर्फ न्यायपालिका एक मजाक बन कर रह गई, बल्कि तुष्टिकरण की भी नई परिभाषा लिखी गई। आवाज़ उठाने वाला कोई विपक्ष तो था नहीं, ऐसे में जम कर मनमानी की गई। इस दौरान कॉन्ग्रेस टूटी भी और वीपी सिंह जैसे नेता निकल गए। राजीव गाँधी द्वारा अन्य नेताओं के साथ व्यवहार की भी खूब चर्चा हुई।

राजीव गाँधी इस दौरान सबसे पहले दल-बदल कानून लेकर आए। कहा तो गया कि इसका उद्देश्य नेताओं को प्रलोभन दिए जाने व दल-बदल को रोकना है। लेकिन, असली बात ये थी कि 80 के दशक में कॉन्ग्रेस के ही कई नेताओं ने पार्टी छोड़ दी थी। ये वो समय था, जब कॉन्ग्रेस देश की सबसे प्रभावशाली और समृद्ध पार्टी हुआ करती थी। ऊपर से आपातकाल के फैसले से कई नेता नाराज थे। ऐसे में कई शीर्ष नेताओं ने पार्टी छोड़ना उचित समझा।

शाहबानो केस: मुस्लिम तुष्टिकरण का सबसे बड़ा दाँव

लेकिन, उनके प्रधानमंत्रित्व काल का सबसे विवादित निर्णय था शाहबानो केस। इसमें सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट कर मुस्लिम तुष्टिकरण की हदें पार कर दी गईं। आपने इस केस का नाम खूब सुना होगा, यहाँ हम इस बारे में और इसके प्रभाव को लेकर चर्चा करेंगे। मोहम्मद अहमद खान द्वारा तलाक दिए जाने के बाद शाहबानो सुप्रीम कोर्ट गईं, जहाँ उनके शौहर को आदेश दिया गया कि वो तलाक के बाद भी अपनी बीवी को वित्तीय खर्च मुहैया कराएँ।

1932 में हुए निकाह के 14 वर्षों बाद अधिवक्ता अहमद खान एक दूसरी पत्नी लेकर आ गया, जिसकी उम्र उससे काफी छोटी थी। दोनों पत्नियों के साथ कई वर्षों तक रहने के बाद उसने 62 साल की शाहबानो को तलाक दे दिया और बाद में 200 रुपए का मासिक पेंशन भी रोक दिया, जिसका उसने वादा किया था। सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय संविधान और कुरान का हवाला देते हुए कहा कि पति को पत्नी को मेंटेनेंस खर्च देना चाहिए।

इसके बाद पूरे देश के मुस्लिमों ने इस जजमेंट के खिलाफ अभियान शुरू कर दिया। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड सहित कई इस्लामी संगठनों ने सड़क पर आंदोलन शुरू कर दिया। शरीया कानून के बचाव में ऐसा अभियान चला कि कॉन्ग्रेस पार्टी को भी मुस्लिमों का मसीहा बनने का मौका सूझा। राजीव गाँधी ने तलाकशुदा महिलाओं को अधिकार देने के नाम पर कानून बनाया और सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटते हुए मेंटेनेंस राशि की अवधि मात्र 90 दिन कर दी।

मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए पहली बार भारतीय संसद ने इस तरह का कानून बनाया। तब भाजपा ने इसे सुप्रीम कोर्ट की पवित्रता को ठेस पहुँचाने वाला करार दिया। राम जेठमलानी सहित कई वरिष्ठ वकीलों ने इसकी आलोचना की। विश्लेषकों ने कहा कि भारत न जाने कितने ही वर्ष पीछे चला गया है। ये भारतीय नागरिकों को दिए गए बराबरी के अधिकार के भी विरुद्ध था। तमाम विरोधों के बाद राजीव गाँधी सरकार को भी एहसास हुआ कि उसने कितनी बड़ी गलती की है।

छवि सुधारने के लिए राम मंदिर का इस्तेमाल

इसके बाद राम मंदिर आंदोलन में भाजपा और VHP जैसे संगठनों से क्रेडिट लेने और मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए की गई गलती को ढकने के लिए गलती पर गलती हुई। फ़रवरी 1986 में राजीव गाँधी ने राम मंदिर का ताला खोल कर वहाँ हिन्दुओं को पूजा की अनुमति दी। अपनी राजनीति चमकाने के लिए राम मंदिर का इस्तेमाल किया गया। जहाँ एक तरफ कॉन्ग्रेस नेता राम मंदिर के नाम पर वोट माँग रहे थे, राजीव गाँधी मुस्लिमों को फिर से ये एहसास दिलाने में लग गए कि बाबरी मस्जिद सुरक्षित है।

‘मिस्टर क्लीन’ के रूप में खुद को प्रचारित कर के सत्ता में आए राजीव गाँधी के लिए उस समय के विपक्षी नेताओं ने ‘बोफोर्स चोर’ शब्द का इस्तेमाल किया। बोफोर्स स्कैम का लिंक इटली और स्वीडन से जुड़े होने के आरोप लगे। स्वीडिश कम्पनी ‘Saab-Scania’ से उनका नाम जुड़ा। ये कम्पनी भारत को एयरक्राफ्ट्स बेचना चाहती थी। बोफोर्स तोप घोटाले ने भारत के रक्षा सौदों को पूरी तरह से लकवाग्रस्त कर दिया।

विदेश नीति में भी वो फेल रहे। बिना ज़रूरत श्रीलंका में LTTE को छेड़ डाला, जो उनकी हत्या का भी कारण बना। उन्होंने श्रीलंका में भारतीय सेना को ‘शांति मिशन’ पर भेजा। विशेषज्ञ आज भी कहते हैं कि इतने बड़े स्तर पर श्रीलंका में हस्तक्षेप से पहले तमिलनाडु के तमिलों को भरोसा में लेना चाहिए था। इससे तमिलों के मन में भारत के खिलाफ अलगाववाद की भावना प्रबल होकर उभरने लगी। अब उनकी हत्या के दोषियों को माफ़ी देने का नाटक कर गाँधी परिवार तमिल वोटों की आस लगाए बैठा है।

‘प्रधानमंत्री’ राजीव गाँधी के किस्से और भी हैं..

इसी तरह लक्षद्वीप में राजीव गाँधी किस तरह छुट्टियाँ मनाने गए थे और उस दौरान INS विराट को उनके व उनके पूरे परिवार की सेवा में लगाया गया था, ये भी ज्ञात कहानी है। पीएम मोदी ने भी इसका जिक्र किया था। जब ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में उस वक़्त ये खबर छपी तो कॉन्ग्रेस ने उस मीडिया संस्थान को भी बदला लेने के लिए प्रताड़ित किया। इन छुट्टियों के दौरान अमिताभ बच्चन का परिवार भी उनके साथ था।

भोपाल गैस त्रासदी कोई भारतीय शायद ही भूल सकता है। हजारों लोगों की मौत के जिम्मेदार एंडरसन को राजीव गाँधी ने 25 हजार रुपए के पर्सनल बॉन्ड पर भारत से बाहर भेज दिया था। भोपाल गैस त्रासदी हुई, उसके एक महीने पहले ही राजीव गाँधी प्रधानमंत्री बने थे। 8000 लोगों की मौत इस त्रासदी के महज 2 हफ़्ते के भीतर ही हो गई थी। अब तक इससे 25,000 की जान जा चुकी है। बताया जाता है कि राजीव गाँधी के मौखिक आदेश के बाद अर्जुन सिंह ने वॉरेन को भोपाल से जाने दिया था। 

इन सबके अलावा सिख दंगों पर कई बार बात हो चुकी है, जिसके बारे में उन्होंने कहा था कि जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती ही है। साथ ही अपनी सरकार के भ्रष्टाचार को खुद स्वीकारते हुए उन्होंने कहा था कि सरकार एक रुपया भेजती है तो गरीब के पास 15 पैसा ही पहुँचता है। आंध्र प्रदेश के दलित नेता अंजैय्या का उन्होंने अपमान किया था। भीड़ के सामने उन्हें डाँटने का नतीजा ये हुआ कि कॉन्ग्रेस आंध्र से साफ़ ही हो गई।

अरुणाचल में 6 विधायकों के जदयू छोड़ने के बाद नीतीश कुमार ने छोड़ा पार्टी अध्यक्ष का पद, कहा- ‘दबाव में बना मुख्यमंत्री’

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पार्टी मुखिया का पद छोड़ दिया है। बीते दिन रविवार (27 नवंबर 2020) को नीतीश कुमार के सहयोगी आरसीपी सिंह को जनता दल यूनाइटेड (जदयू) का नया अध्यक्ष चुना गया। नीतीश कुमार ने ही आरसीपी सिंह के नाम का सुझाव दिया था जिस पर कार्यकर्ताओं ने राष्ट्रीय कार्यकारिणी बैठक में सहमति जताई थी। 2019 में बिहार के मुख्यमंत्री को जदयू का अध्यक्ष चुना गया था और उनका कार्यकाल 3 साल का था। उन्होंने इस्तीफ़ा देते हुए इस पद को आरसीपी सिंह के हवाले कर दिया जो कि राज्यसभा में जदयू का प्रतिनिधित्व करते हैं। 

पार्टी मुखिया का पद छोड़ने के बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि उनकी बिहार का मुख्यमंत्री बनने की कोई इच्छा नहीं थी। वह सिर्फ इतना चाहते थे कि जनादेश का सम्मान हो भले मुख्यमंत्री कोई भी क्यों न बने। 

जदयू की राष्ट्रीय कार्यकारिणी बैठक के दौरान नीतीश कुमार ने कहा था, “लोग कह रहे हैं कि भाजपा को मुख्यमंत्री पद चाहिए। मुझे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता है, मैं इन पदों से नहीं बंधा हुआ हूँ। बहुत ज़्यादा दबाव होने की वजह से मुझे मुख्यमंत्री का पद स्वीकार करना पड़ा, मुझे वाकई इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि इस कुर्सी पर कौन बैठने वाला है। जैसे ही चुनाव के नतीजे आए मैंने गठबंधन के सामने अपनी इच्छा जाहिर कर दी लेकिन दबाव इतना ज़्यादा बढ़ गया था कि मुझे ज़िम्मेदारी संभालनी ही पड़ी।”

नीतीश कुमार ने 2016 के बिहार विधानसभा चुनावों में भाजपा को हाशिये पर रख कर राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और कॉन्ग्रेस के साथ गठबंधन कर लिया था। इतना सब कुछ सिर्फ यह सुनिश्चित करने के लिए कि वह मुख्यमंत्री की कुर्सी हासिल कर लें। लेकिन जब उनके इस गठबंधन का विरोध शुरू हुआ तब उन्होंने राजद को नकार कर भाजपा का दामन थाम लिया और फिर से मुख्यमंत्री बन गए।  

इस बात की अटकलें चरम पर हैं कि उन्होंने मुख्यमंत्री बनने की आकांक्षा नहीं रखने वाला बयान इसलिए दिया क्योंकि उनके ही विधायक पार्टी की लुटिया डुबाने में लग गए हैं। 

हाल ही में अरुणाचल प्रदेश में जदयू के 6 विधायक पार्टी से इस्तीफ़ा देकर भाजपा में शामिल हो गए थे लिहाज़ा वहाँ राजनीतिक अस्थिरता पैदा होना स्वाभाविक था। वहीं पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने इस बात पर रोष जाहिर किया है और कहा है कि इससे बिहार की गठबंधन सरकार प्रभावित हो सकती है। 

फर्जी आधार कार्ड से रवि बना.. पूजा पाठ भी करता था रफ़ीक खान: हिन्दू लड़की से निकाह करने की साजिश में गिरफ्तार

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से लव जिहाद का एक मामला सामने आया है, जिसमें रफ़ीक खान नाम का युवक अपनी पहचान छुपा कर एक हिन्दू युवती से शादी करने जा रहा था। इस बात की जानकारी मिलते ही हिन्दूवादी संगठनों ने युवक से पूछताछ कर जब उसका आधार कार्ड देखा, तो पता चला कि उसका आधार कार्ड भी नकली है। ज़ी न्यूज़ की रिपोर्ट के मुताबिक़, पुलिस ने इस घटना की जानकारी मिलते ही आरोपित रफ़ीक को गिरफ्तार कर लिया।

रफ़ीक मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले का निवासी है और उसने अपना नाम रवि यादव बताया था। रफ़ीक खान ने रवि नाम से ही एक फ़र्ज़ी पहचान पत्र (आधार कार्ड) भी बनवा रखा था। लगभग डेढ़ साल पहले रफ़ीक का रायसेन के गेंहूरास गाँव की रहने वाली हिन्दू लड़की के घर आना जाना शुरू हुआ। वह पीड़िता के भाई के साथ काम करता था, जिसकी वजह से उसकी युवती से भी पहचान हुई। फिर हिन्दू युवती और रफ़ीक के बीच बातचीत बढ़ी, उसने पीड़िता को बहला-फुसलाकर प्रेम जाल में फँसा लिया। 

दोनों के बीच शादी की बात होने लगी, इस बीच रफ़ीक कई बार पीड़िता के परिवार वालों से मिलने भी गया। उसने हिन्दू युवती के परिवार वालों से बताया कि काफी समय पहले उसके माता-पिता की मृत्यु हो चुकी है और वह अनाथ है। इस संबंध में पीड़िता के परिजनों का कहना था कि आरोपित का काफी समय से उनके घर आना जाना था। वह पूजा पाठ में भी शामिल होता था और मदद भी करता था जिसकी वजह से उन्हें कभी किसी तरह का संदेह नहीं हुआ। 

रफ़ीक हिन्दू युवती के साथ भोपाल के कोलार स्थित मंदिर में शादी कर ही रहा था कि तभी रायसेन जिला स्थित मंडीदीप के हिन्दू संगठन को इस बात की सूचना मिली। मामले की जानकारी मिलते ही वह तुरंत मौके पर पहुँचे और उन्होंने तुरंत रफ़ीक से पूछताछ शुरू कर दी। पूछताछ में उसने बताया कि उसका नाम रवि है और उसका अपना कोई नहीं है।

जब आरोपित से उसका आधार कार्ड माँगा गया तो वह नकली निकला और हिन्दूवादी संगठन ने इस मामले की जानकारी पुलिस को दी। इसके बाद पुलिस ने तत्काल प्रभाव से आरोपित रफ़ीक को गिरफ्तार कर लिया। 

हिन्दूवादी संगठनों ने इस मामले में एक और युवक के शामिल होने का भी आरोप लगाया है। उनका कहना है कि शिव कुमार भार्गव नाम का युवक इस घटना के षड्यंत्र में शामिल था। वह शादी के वक्त मंदिर में मौजूद था लेकिन हिन्दू संगठन के लोगों को देखकर मौके से फ़रार हो गया। फ़िलहाल उसका नंबर बंद है और पुलिस उसकी खोजबीन में जुट गई है।   

जाकिर नाइक का ‘हिन्दू लड़की’ को ज्ञान: गैर-मुस्लिम से शादी न करें, जब तक वह इस्लाम नहीं अपना लेता

भारतीय कानूनी एजेंसियों के डर से भागने वाला इस्लामी कट्टरपंथी उपदेशक जाकिर नाइक अक्सर विवादित और मजहबी टिप्पणियाँ करता रहता है। वह एक बार फिर से गैर-मुस्लिमों, विशेष रूप से हिंदुओं के खिलाफ जहर उगलने और इस्लामी वर्चस्ववाद के चरमपंथी विचारधारा का प्रचार करने के लिए चर्चा में है।

इस महीने की शुरुआत में नाइक के आधिकारिक यूट्यूब चैनल पर जारी एक वीडियो में मुस्लिम धर्मगुरु को मुशरिकों (गैर-समर्थकों) के खिलाफ शेखी बघारते हुए देखा गया। उसका कहना था कि मुस्लिम पुरुष और महिलाएँ उनसे बहुत बेहतर हैं।

दरअसल, एक लड़की कथित तौर पर तीन साल पहले हिन्दू से इस्लाम में परिवर्तित हो गई थी और वह जीवन भर इस्लाम मजहब में ही रहना चाहती थी। जाकिर नाइक इसी लड़की के सवाल का जवाब दे रहा था। लड़की का सवाल था कि उसके समाज में मुस्लिम पुरुष से शादी करना काफी मुश्किल है तो क्या मुस्लिम व्यक्ति से शादी करना अनिवार्य है या फिर ऐसी परिस्थिति में वह हिंदू युवक से भी विवाह कर सकती है?

इस पर नाइक ने इसका जवाब दिया कि लड़की के लिए मुस्लिम पुरुष से शादी करना नितांत आवश्यक था। नाइक ने अपने जवाब को पुख्ता बनाने के लिए कुरान के आयतों का हवाला दिया।

Source: YouTube

जाकिर नाइक ने कहा, “कुरान (चैप्टर नंबर 2, आयत संख्या 221) के सूरह अल बकराह में स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि मुशरिक (एक मूर्तिपूजा वाली महिला) से शादी तब तक नहीं करो, जब तक वह इस्लाम समर्थक न हो। इस्लाम का समर्थन करने वाली महिला, भले ही वह एक दासी हो, वह एक गैर इस्लाम समर्थक महिला की तुलना में काफी बेहतर है। एक इस्लाम का समर्थन करने वाली महिला, भले ही वह नौकर हो, वह बदसूरत हो सकती है, वह एक गैर इस्लाम समर्थ महिला से कहीं बेहतर है, भले ही वह ब्यूटी क्वीन हो या दुनिया की सबसे धनी महिला हो।”

नाइक ने आगे कहा, “एक गैर इस्लाम समर्थक आदमी से शादी मत करो, एक मुशरिक से शादी मत करो, एक मूर्तिपूजक से शादी मत करो, जब तक कि वह इस्लाम को गले नहीं लगाता। इस्लाम का समर्थन करने वाला आदमी, वह एक बंधुआ हो सकता है, वह एक नौकर हो सकता है, वह बदसूरत हो सकता है, लेकिन वह एक मूर्तिपूजक से बेहतर है, एक गैर इस्लाम समर्थक आदमी भले ही वह दुनिया का सबसे सुंदर आदमी हो या फिर दुनिया का सबसे अमीर आदमी हो।”

कट्टरपंथी इस्लामिक उपदेशक ने यह भी कहा कि केवल मुसलमान ही जन्नत (स्वर्ग) के लिए योग्य हैं और जो इस्लाम का पालन नहीं करते हैं, वे नरक में जाते हैं।

“यदि आप मानते हैं कि इस्लाम ऐसा मार्ग है जिससे आपको मोक्ष मिलेगा और आपने तीन साल पहले इस्लाम कबूल किया है और आपने वादा किया है कि आप अपने शेष जीवन के लिए इस्लाम पर रहेंगे, तो आप अपने पति को नरक में क्यों भेजना चाहती हैं?” नाइक ने सवाल किया।

नाइक ने कहा, “हमारे पास औसत जीवन प्रत्याशा 50-60 साल है। अगर आप इसमें उथल-पुथल मचाओगे तो यह आपके के लिए 50-60 साल तक दर्द का कारण बना रहेगा। अगला जीवन चिरकालिक है बहन। तो बहन, भले ही यह आपके लिए मुश्किल हो, मेरी सलाह है कि आप उन कठिनाइयों को सहन करें, एक मुस्लिम व्यक्ति से शादी करें, भले ही वह अच्छा न हो, भले ही वह बदसूरत हो, भले ही वह अमीर न हो। वह सबसे धनी और मूर्तिपूजक पुरुषों की तुलना में कहीं अधिक श्रेष्ठ होगा।”

‘रवीश कुमार जैसे दूसरे धर्म वाले, चाहे वो कितना भी हमारे पक्ष में बोलें, नरक ही जाएँगे’

भगोड़ा जाकिर नाइक फिलहाल भारत से फरार है और मलेशिया में रह रहा है। उसके वीडियोज देख कर कई युवक आतंक का रुख कर लेते हैं। पिछले दिनों एक नए वीडियो में जाकिर नाइक ने रवीश कुमार जैसे पत्रकारों पर तल्ख टिप्पणी किया था।

बकौल जाकिर नाइक, रवीश कुमार हों या ‘समुदाय विशेष का पक्ष लेने वाले’ अन्य दूसरे धर्मों वाले, उन सभी के लिए समान सज़ा की ही व्यवस्था है। जाकिर नाइक ने अपने अनुयायियों को समझाया कि जन्नाह अलग-अलग तरह के होते हैं, जैसे फिरदौस और फिरदौस आला। नाइक ने कहा कि जब कोई जन्नत में जाता है तो सबके लिए अलग-अलग लेवल की व्यवस्था की गई है, सारे जन्नाह समान नहीं होते।

जाकिर नाइक ने कहा कि मजहब के सभी लोग भले ही उच्च-कोटि वाले जन्नाह में नहीं जाएँगे लेकिन मजहब के सारे सच्चे लोग जन्नाह में ही जाएँगे। दूसरे धर्म वालों के बारे में उसने कहा कि जन्नाह की तरह नरक भी अलग-अलग प्रकार के होते हैं और दूसरे धर्म वाले दिल के कितने भी अच्छे क्यों न हों, उन्हें जाना नरक में ही है। जाकिर नाइक ने स्पष्ट कहा कि दूसरे धर्म वालों का नरक में जाना तय है। बकौल नाइक, अगर कोई मरते समय इस्लाम का अनुयायी नहीं है तो उसके लिए नरक की ही व्यवस्था है।

‘मैरी क्रिसमस’ कहना हराम, तुम जहन्नुम में जाओगे’

हाल ही में एक वीडियो में कट्टरपंथी जाकिर ने कहा था, “अपने उद्देश्य तक पहुँचने के लिए तुम गलत ज़रिया नहीं चुन सकते हो। जो उनके लिए हराम है वह तुम्हारे लिए भी हराम है। जब तुम किसी को मैरी क्रिसमस कहते हुए इसकी बधाई देते हो तो इसका मतलब है कि तुम स्वीकार कर रहे हो कि वो (जीसस) भगवान की संतान है और ऐसा करना शिर्क (पाप) है। ऐसा इसलिए क्योंकि वहाँ के लोग मानते हैं कि जीसस क्राइस्ट भगवान की संतान हैं। चाहे वह ईसाई धर्म से जुड़ी प्रक्रियाओं का हिस्सा हों या नहीं, वो लोग इसलिए ख़ुशी मनाते हैं क्योंकि यह जीसस का जन्मदिन है।” 

क्रिसमस पर सुपरस्प्रेडर ‘सांता क्लॉज’ ने दिया 157 को ‘कोरोना गिफ्ट’: संक्रमण से 18 बुजुर्गों की मौत

बेल्जियम (Belgium) के एक केयर होम में रहने वाले लोगों के लिए सांता क्लॉज से गिफ्ट लेना भारी पड़ गया। कोरोना वायरस से संक्रमित सांता क्लॉज बने एक व्यक्ति ने 157 लोगों को कोरोना संक्रमित कर दिया। इनमें से 36 स्टाफ मेंबर बताए जा रहे हैं। ‘डेली मेल‘ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इनमें से 18 लोगों की अब तक मौत हो चुकी है। बताया जा रहा है कि एक व्यक्ति कोरोना संक्रमित था और वह केयर होम क्रिसमस की बधाइयाँ देने पहुँचा था।

बुजुर्गों का बढ़ाना चाहते थे मनोबल

रिपोर्ट के अनुसार, बेल्जियम के एन्टवर्प के केयर होम के कर्मचारी वहाँ रहने वाले बुजुर्गों का मनोबल बढ़ाना चाहते थे। इसलिए उन्होंने सांता क्लॉज बुलवाकर उनके हाथों से बुजुर्गों को गिफ्ट दिलवाने की योजना बनाई। प्लान के तहत उन्होंने केयर होम के लोगों की देखभाल करने वाले एक चिकित्सक को सांता क्लॉज बनने के लिए तैयार कर लिया।

सांता क्लॉज बना ‘सुपरस्प्रेडर’

इस केयर होम में एक के बाद कई कोरोना पॉजिटिव मामले पाए जाने पर वहाँ रह रहे सभी लोगों और देखभाल कर रहे सभी स्टाफ की जाँच की गई। यहाँ जब 157 लोग कोरोना संक्रमित पाए गए तो सांता क्लॉज को ही सुपरस्प्रेडर करार दिया गया। क्रिसमस से एक दिन पहले और क्रिसमस के दिन पाँच लोगों ने अपनी जान गँवाई है, जिसके बाद केयर होम के अभी तक 18 लोग अपनी जान गँवा चुके हैं। कुछ लोगों को ऑक्सीजन वेंटिलेंटर पर रखा गया है।

सांता क्लॉज अपने कुछ साथियों के साथ बेल्जियम के एन्टवर्प के केयर होम में पहुँचे थे

नियमों की हुई अनदेखी

स्थानीय मेयर विम कीयर्स ने कहा कि केयर होम के लिए यह बुरा समय है। उन्होंने कहा कि आगामी कुछ दिन बहुत ही मुश्किल भरे होंगे। मेयर ने पहले यह बयान दिया था कि सांता क्लॉज के केयर होम जाने के दौरान नियमों का पालन किया गया था। हालाँकि मेयर ने केयर होम की तस्वीरें देखने के बाद यह कहा कि यहाँ नियमों का पालन नहीं हुआ। सभी लोगों ने मास्क नहीं पहना था। सांता भी दो मीटर से कम की दूरी पर बुजुर्गों के समीप खड़ा था।

मेयर ने जताया अफसोस

मेयर विम कैयर्स व्यक्तिगत रूप से इस मामले की जाँच करा रहे हैं। उनका कहना है यह इवेंट खुशियाँ बाँटने और मनोरंजन के अच्छे इरादे से आयोजित किया गया था लेकिन अफसोस कि यहाँ आए लोगों को कोविड से संक्रमित होना पड़ा।

उन्होंने केयर होम के लिए इसे एक ब्लैक डे करार दिया। स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार सेंटा बना व्यक्ति पहले अस्वस्थ महसूस नहीं कर रहा था और न ही उसमें कोविड-19 का का कोई लक्षण दिखा था।

9 महीनों से वेतन माँग रहे श्रमिकों ने ‘दीदी’ के खिलाफ खोला मोर्चा, बैठक में चली कुर्सियाँ तो भाग निकले मंत्री

पश्चिम बंगाल में होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले ममता बनर्जी एक ओर जहाँ पार्टी में आंतरिक कलह से जूझ रही हैं तो अब दूसरी ओर श्रमिकों ने भी रुकी हुई सैलरी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। दरअसल पश्चिम बंगाल में प्रदेश सरकार के अंतर्गत काम करने वाले हज़ारों अस्थाई श्रमिक राज्य की सरकार के विरोध में उतर आए हैं।

स्थाई नौकरी सहित पिछले 9 माह से रुके हुए वेतन की माँग करते हुए कर्मचारियों ने ‘नेताजी इनडोर स्टेडियम’ में मंत्रियों के सामने विरोध प्रदर्शन किया, नारे लगाए और कुर्सियाँ ​​फेंकीं। वेतन ना मिलने से गुस्साए श्रमिकों ने वहाँ लगे होर्डिंग्स तक फाड़ डाले।

पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा चलाई जा रही सामाजिक सुरक्षा योजना के तहत हज़ारों ‘अस्थाई श्रमिक’ कार्यरत हैं। उनका आरोप है कि पिछले कुछ समय से उनके वेतन का भुगतान नहीं किया गया है। नतीजतन आज हज़ारों श्रमिकों ने कोलकाता के नेताजी इंडोर स्टेडियम में खूब हंगामा किया। कुछ ही देर में हालात इतने अनियंत्रित हो गए कि ममता सरकार के तमाम मंत्रियों को बैठक छोड़कर ही भागना पड़ गया।  

राज्य सरकार के अधीन कार्य कर रहे अस्थाई श्रमिकों का कहना है कि SLO (Self Employed Labour Organisers) एसोसिएशन के अस्थाई श्रमिक लॉकडाउन के समय से ही लगातार काम कर रहे हैं। वेतन नहीं मिलने की वजह से वह काफी समय से लगातार माँग उठा रहे थे, लेकिन उनके तमाम प्रयासों के बावजूद कोई नतीजा निकल कर नहीं आया।

इन अस्थाई मजदूरों की माँगों के मुद्दे पर आज (28 दिसंबर 2020) प्रदेश की राजधानी कोलकाता के नेताजी इंडोर स्टेडियम में बैठक बुलाई गई थी। बैठक में नगर विकास मंत्री फिरहाद हकीम, श्रम और क़ानून मंत्री मलय घटक, सोवनेब चटर्जी समेत अन्य मंत्री शामिल हुए थे, लेकिन इस बैठक में अस्थाई श्रमिकों की माँगों को लेकर कोई समाधान नहीं निकला

बैठक के किसी नतीजे पर नहीं पहुँचने की वजह से श्रमिकों ने मौके पर ही विरोध करना शुरू कर दिया और फिर मंत्रियों को वहाँ से निकलना पड़ा। ममता सरकार के इस रवैए से गुस्साए श्रमिकों ने जमकर बवाल किया और स्टेडियम के बाहर लगे टीएमसी के पोस्टर भी फाड़ दिए। 

इस घटना की वजह से मौके पर हालात बेकाबू हो गए, जिसके मद्देनज़र भारी पुलिसबल तैनात कर दिया गया। फ़िलहाल अस्थाई श्रमिकों के वेतन के मुद्दे पर ममता सरकार कोई समाधान नहीं निकाल पाई है। ‘बंगाल मिरर’ की रिपोर्ट के अनुसार, राज्य के वरिष्ठ मंत्री शोभन देव चट्टोपाध्याय ने कहा कि श्रम विभाग की लापरवाही के कारण यह हालात बने हैं।

शोभन देव ने इसके लिए राज्य के श्रम विभाग के अधिकारियों को जिम्मेदार बताया है। उन्होंने कहा कि श्रम विभाग के अधिकारियों के कारण ही इन अस्थाई श्रमिकों का डाटा मिट गया, जिस कारण इन लोगों को महीनों से कमीशन का भुगतान नहीं हो रहा है।

कॉन्ग्रेस नेता ने पंजाब में 1300 Jio टावरों पर हमला करने वालों का किया उत्साहवर्धन, देश में इसी तरह के तोड़-फोड़ के लिए उकसाया

यूथ कॉन्ग्रेस के राष्ट्रीय अभियान प्रभारी श्रीवत्स को पंजाब में Jio मोबाइल टावरों से बिजली काटने वाले किसानों का उत्साहवर्धन करते देखा गया। कर्नाटक कॉन्ग्रेस के पूर्व मीडिया प्रमुख इस बात को लेकर उत्साहित थे कि राज्य के 9000 Jio मोबाइल टावरों में से 1300 में बिजली की आपूर्ति नहीं है।

Senior Youth Congress leader cheers for criminal behaviour
युवा कॉन्ग्रेस नेता ट्वीट

श्रीवत्स ने आगे कहा, “किसानों को समझ आ गया है कि मोदी से सीधे बात करने का एकमात्र तरीका अंबानी को तकलीफ देना है।” उन्होंने यह भी कहा कि इस तरह के आपराधिक व्यवहार को पूरे देश में दोहराया जाना चाहिए। उन्होंने कहा, “अगर यह पूरे भारत में होने लगा, तो मोदीजी दौड़ते हुए सिंघु बॉर्डर पर आएँगे।”

इससे पहले पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर ने ‘प्रदर्शनकारी’ किसानों से अपील की थी कि वे बिजली बाधित करके या फिर बुनियादी ढाँचे को नष्ट करके आम जनता के लिए असुविधा उत्पन्न न करें। उन्होंने ‘प्रदर्शनकारियों’ से कनेक्टिविटी को बंद न करने और टेलीकॉम वर्कर्स के साथ मारपीट न करने का भी आग्रह किया था। हालाँकि, ऐसा लगता है कि ‘प्रदर्शनकारी किसानों’ ने मुख्यमंत्री की अपील पर कोई ध्यान नहीं दिया और अब ऐसा लगता है कि कॉन्ग्रेस नेता भी इस तरह की अराजकता की वाह-वाही कर रहे हैं। वहीं आज भी CM ने टॉवर में तोड़-फोड़ करने वालों के खिलाफ कार्रवाई के आदेश दिए हैं।

‘प्रदर्शनकारी’ रिलायंस जियो टावरों को निशाना बना रहे हैं क्योंकि उनका दावा है कि रिलायंस के साथ ही अडानी समूह नए कृषि कानूनों की मदद से किसानों का शोषण करेंगे। समाचार एजेंसी पीटीआई ने सूत्रों का हवाला देते हुए कहा कि जब साइट मैनेजर ने प्रदर्शनकारियों को बुनियादी ढाँचे को नष्ट करने से रोकने की कोशिश की तो उन्हें थप्पड़ मारा गया और उनके साथ दुर्व्यवहार किया गया। बिजली लाइनों को तोड़ दिया गया और टावरों को कुल्हाड़ी मारने की कोशिश की गई।

उधर मोगा में मोबाइल टॉवर में तोड़-फोड़ करने खबर है। और ये सिलसिला पंजाब में बढ़ता ही जा रहा है।

गौरतलब है कि ‘किसानों’ का प्रदर्शन अब प्रदर्शनकारियों की हरकत के कारण संदेह के घेरे में आता दिख रहा है। पिछले दिनों हमने वायरल वीडियो में किसानों को Jio मोबाइल टावर कुल्हाड़ी से काटते देखा और फिर बाद में एक नई वीडियो सामने आई, जिसमें वह जियो के जेनरेटर लूट कर शेखी बघारते नजर आए।

प्रदर्शन के नाम पर वीडियो में देखा जा सकता है कि ये कथित प्रदर्शनकारी टेलीकॉम टॉवर्स से जुड़े जियो जेनरेटर को वीडियो में ट्रैक्टर से बाँध कर उसे उसकी जगह से जबरदस्ती हटा रहे थे और फिर उसे सड़क पर घसीट कर गुरुद्वारे में ले जाकर डोनेट करते दिख रहे थे। इस दौरान ट्रैक्टर पर एक झंडा भी लगाया गया था और कई लोग उसके पीछे चल रहे थे।