18 दिसंबर 2020 को जारी किए गए आदेश में दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली पुलिस को एक मामले में एफ़आईआर नहीं दर्ज करने के लिए फटकार लगाई है। इस मामले में एक हिन्दू लड़की के पिता ने आरोप लगाया था कि मुस्तफ़ा नाम का युवक उनकी बेटी को ‘सुनियोजित तरीके’ से अपने साथ ले गया।
हाईकोर्ट ने आदेश दिया है कि लड़की को बरामद करके अदालत के सामने पेश किया जाए। न्यायाधीश विपिन संघी और रजनीश भटनागर की पीठ ने कहा है कि एफ़आईआर दर्ज करने के बाद इस मामले की जाँच दिल्ली, अपराध ब्यूरो की एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट को सौंप दिया जाए।
लाइव लॉ के मुताबिक़ लड़की के पिता ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका (हैबियस कॉरपस पेटीशन) दायर की थी, जिससे उनकी बेटी की तलाश की जा सके, जो 7 नवंबर 2020 से ही लापता चल रही है। आरोपित युवक का पूरा नाम सैय्यद मुस्तफ़ा है, जिसने लड़की को घर से ही उठा लिया था। लड़की के पिता ने यह आरोप भी लगाया है कि इस घटना के दिन ही आरोपित उसे ट्रेन से कोलकाता लेकर चला गया।
लड़की बी.टेक और मुस्लिम व्यक्ति मजदूर
याचिका में पीड़िता के पिता ने बताया है कि उनकी बेटी ने बी.टेक किया है, जबकि आरोपित युवक मजदूर है। लड़की के गायब होने के ठीक बाद से ही आरोपित मुस्तफ़ा का पिता भी फ़रार चल रहा है। वहीं प्रशासन ने अदालत के समक्ष अपनी रिपोर्ट में कहा कि लड़की ने मुस्तफ़ा से शादी की है और इस बारे में उसने अपने परिवार को भी बताया था कि वह खुश है और उसे परेशान नहीं किया जाए।
FIR नहीं दर्ज करने के लिए एसएचओ को अदालत की फटकार
एसएचओ ने अदालत के समक्ष अपना पक्ष रखते हुए बताया कि एफ़आईआर इसलिए नहीं दर्ज की गई क्योंकि उन्हें निकाहनामा दिया गया था, जिसे देख कर यह स्पष्ट था कि हिन्दू लड़की ने मुस्तफ़ा से शादी की है। जब अदालत ने उस निकाहनामे की पुष्टि करने के लिए कहा तब पुलिस ने कहा कि तमाम कोशिशों के बावजूद निकाहनामे की पुष्टि नहीं हो पाई थी।
एसएचओ की लापरवाही पर फटकार लगाते हुए अदालत ने कहा, “हम इस बात से हैरान हैं कि ऐसे हालातों में भी इन्होंने (एसएचओ) एफ़आईआर दर्ज करना ज़रूरी नहीं समझा। वह खाली इस बयान के आधार पर आगे बढ़ गए, जिसमें दावा किया गया है कि लड़की ने मुस्तफ़ा से शादी की है। इस मामले में एसएचओ ने अपनी ज़िम्मेदारी की पूरी तरह अनदेखी की है।”
अदालत ने यह भी कहा कि उनके लिए इस बात पर भरोसा करना मुश्किल है कि लड़की ने अपनी सहमति से बयान दिया है। अदालत ने पुलिस को आदेश दिया कि वह लड़की को अदालत के सामने पेश करें।
इस आदेश के साथ-साथ अदालत ने कहा, “लड़की के बरामद होने के बाद उसे दिल्ली लेकर आया जाए और अगली तारीख़ के पहले कम से कम 4 दिन तक नारी निकेतन में रखा जाए, जिससे उस पर किसी भी पक्ष का दबाव न हो।” इसके अलावा अदालत ने एसएचओ को लड़की के पिता और परिजनों की सुरक्षा का पूरा ध्यान रखने का आदेश दिया।
ऑपइंडिया ने मधु पासवान से बातचीत की, जो सोशल मीडिया में खासे सक्रिय रहते हैं और वीडियो बना कर लोगों को जागरूक करते रहते हैं। सीतामढ़ी के रहने वाले मधु पासवान ऑटो चलाते हैं, लेकिन उनका कहना है कि आरक्षण के खिलाफ अभियान चलाने के कारण उनकी जान को खतरा है। वो चार भाइयों में सबसे छोटे हैं और उनकी माँ मुखिया भी रह चुकी हैं। मधु पासवान ने संपादक अजीत भारती से जातिवाद और आरक्षण पर बात की।
जातिवाद का उदाहरण देते हुए मधु पासवान ने कहा कि उनके गाँव में एक मुखिया के निधन के बाद श्राद्धकर्म में निमंत्रण मिलने पर वो खाने गए थे। उन्होंने कहा कि गाँव में चमार और मुशहर सहित इन जातियों को सबसे अंत में खिलाया जाता है। वहाँ उन्होंने एक व्यक्ति को ये कहते हुए सुना कि दलित जातियों को अंत में खिलाया जाए, जिसके बाद वो पूरे पासवान समुदाय को लेकर वहाँ से चले गए। साथ ही उन्होंने कहा कि यहाँ के सवर्ण समुदाय के अधिकतर लोग ‘निम्न जाति’ के उम्र में बड़े लोगों को भी सम्मान नहीं देते।
मधु पासवान ने याद दिलाया कि रामायण में भगवान श्रीराम ने निषादराज को जो सम्मान दिया था, वैसे ही वो सनातन से जुड़े हुए हैं। हालाँकि, मधु पासवान ने ये भी कहा कि आज सवर्ण समाज में ऐसे कई लोग हैं, जो उनके साथ नाश्ता-पानी करते हैं। उन्होंने कहा कि अब बदलाव आ गया है और वो राजपूतों के यहाँ पानी पीते हैं, उनके कार्यक्रमों में जाते हैं। उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी के साथ ऐसी कोई समस्या नहीं है।
उन्होंने कहा कि पहले ऐसा नहीं था, लेकिन अब 5-10 उनसे उम्र में छोटे लोग हैं, जो उन्हें ‘भैया’ कह कर पुकारते हैं, जबकि अधिकतर ‘भाई’, ‘जी’ या नाम के साथ ही सम्बोधित करते हैं। उन्होंने पूछा कि क्या 12 वर्ष का एक बच्चा 60 साल के बुजुर्ग को ‘भाई’ बोल सकता है? उन्होंने बताया कि उनके पंचायत के पकड़ी गाँव में मुशहर समाज से ईसाई मिशनरी जुड़ गए हैं। लेकिन उन्होंने स्पष्ट किया कि उनके पिता के जो संस्कार हैं, इस कारण वो वीडियो बना कर लोगों को जागरूक करते हैं।
उन्होंने JNU में लगे देशविरोधी नारों की भी बात की। आरक्षण का विरोध करते हुए उन्होंने कहा कि कोई अधिक अंक पाकर भी किसी परीक्षा में उत्तीर्ण नहीं हो पाता, वहीं कोई कम अंक लाकर भी पद पा जाता है। उन्होंने पूछा, “ये भारत बैसाखी के सहारे चलना चाहता है? क्या पीछे जाना चाहता है?” उन्होंने कहा कि अगर ऐसी हालत रही तो भारत बर्बाद हो जाएगा, हम इस देश की मिट्टी से बँधे हैं, अगर इस पर तांडव करने वाला उनका भाई भी होगा, तो वो तलवार लेकर खड़े हो जाएँगे।
उन्होंने कहा कि दलितों को धर्म परिवर्तन के लिए लाखों में कैश दिए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि मिशनरियों के प्रयासों को विफल करने के लिए वो मुशहर समाज के बच्चों को पढ़ाते हैं, उनकी मदद करते हैं। उन्होंने बताया कि इसके लिए आम जनता ही उनकी मदद कर देती है। मधु पासवान ने कहा कि मनुष्य शिक्षा के सहारे आगे बढ़ता है, बैसाखी नहीं। उन्होंने कहा कि गरीबों को भूमि व स्वास्थ्य सुविधाएँ मुहैया कराई जानी चाहिए।
अपनी बात जारी रखते हुए उन्होंने बताया कि आरक्षण की जगह ये चीजें (भूमि, शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएँ मुहैया कराना) होनी चाहिए थी। ऐसा नहीं कि कोई कहीं से भी 5% लेकर आ जाए तो उसे शिक्षक की नौकरी मिल जाएगी। उन्होंने कहा कि जब उनकी बहन शिक्षक बनी तो भी उन्होंने उसे टोका कि वो गरीबों को क्या पढ़ाएँगी? उन्होंने आरक्षण से आए शिक्षकों को ‘बैसाखी वाला’ बताते हुए कहा कि वो गरीबों के बच्चों का जीवन बर्बाद कर रहे हैं और वो उनका बहिष्कार करते हैं। बकौल मधु, अधिक सब्सिडी से लाचारी आती है।
मधु पासवान से ऑपइंडिया के संपादक अजीत भारती की बातचीत
जातिवाद और आरक्षण पर बोलते हुए मधु पासवान ने कहा, “भारत में शिक्षा में संविधान के हिसाब से समानता का अधिकार होना चाहिए। झूठ बोल कर अपनी ही जाति के लोगों को जनेऊधारी लोगों के प्रति भड़काया जाता है। गरीबी दूर करने के लिए मूलभूत सुविधाएँ ऐसे परिवारों को मुहैरा कराई जाए और पद उसी को दिए जाएँ, जो इसके योग्य हों।” इसके अलावा मधु पासवान ने कहा कि किसी के वस्त्र बदलने से गुण नहीं बदलते। उन्होंने संस्कृति बचाने पर जोर दिया।
साइबराबाद पुलिस (Cyberabad police) ने शुक्रवार (25 दिसंबर 2020) को ऑनलाइन लोन एप्लीकेशन धोखाधड़ी के मामले में 4 लोगों को गिरफ्तार किया है। इसमें एक चीनी नागरिक भी शामिल है। ये लोग लोन नहीं चुका पाने वाले ग्राहकों को फ़र्ज़ी लीगल नोटिस भेजते, धमकाते और मानसिक रूप से प्रताड़ित करते थे। इसके अलावा उनकी एडिट की गई तस्वीरें साझा करके उन्हें जालसाज़ की तरह दिखाते थे।
साइबराबाद पुलिस कमीश्नर वीसी सज्जानर ने बताया कि इस पूरे मामले के सरगना का नाम जिया झांग (Zixia Zhang) है, जो फ़िलहाल सिंगापुर में है। इसके अलावा गिरफ्तार किए गए आरोपितों की पहचान चीन स्थित शंघाई के यी बाई (Yi bai) उर्फ डेनिस, सत्यपाल, अनिरुद्ध मल्होत्रा, रिची हेमंत सेठ के रूप में हुई है। मामले के दो अन्य आरोपित जिया झांग और उमापति उर्फ अजय अभी फ़रार चल रहे हैं।
पुलिस के मुताबिक़ आरोपितों ने तत्काल ऋण वित्त व्यवस्था (इंस्टैंट लोन फाइनेंसिंग) दिसंबर 2019 में शुरू कर दी थी। इसके बाद इन्होंने देश के कई अलग-अलग क्षेत्रों में इससे संबंधित कंपनी बनाई। आरोपितों ने आम लोगों को लोन बाँटने के लिए कुल 11 फाइनेंसिंग एप्लीकेशन बनाई थी और लोन वितरण के लिए भारी शुल्क भी लेते थे। हैदराबाद में पुलिस द्वारा कॉल सेंटर पर छापेमारी के बाद यह गिरफ्तारी हुई। कॉल सेंटर दिल्ली की कंपनी स्काईलाइन्स इनोवेशन्स टेक्नोलॉजी प्राइवेट लिमिटेड के अंतर्गत चल रहा था और इसका पंजीयन गुरुग्राम के पते पर है।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ डेनिस ने सत्यपाल की मदद से देश के अलग-अलग क्षेत्रों में कई कॉल सेंटर शुरू किए। इसके बाद उन्होंने ग्राहकों को लोन बाँटना शुरू किया और जो लोन नहीं चुका पाते थे, उनका मानसिक रूप से शोषण करने लगे। पुलिस का इस घटना पर कहना था कि इन लोन फाइनेंसिंग एप्लीकेशन्स का किसी भी नॉन बैंकिंग फाइनेंसिंग कंपनी से समझौता या क़रार नहीं था।
कमीश्नर वीसी सज्जानर के मुताबिक़, “आरोपितों ने अपने संसाधनों का उपयोग करके लोगों को लोन दिया। हम इस मामले की जाँच कर रहे हैं कि इन्हें दूसरों को लोन देने के लिए रुपए कहाँ से मिलते थे।” तेलंगाना पुलिस ने अभी तक ऑनलाइन लोन एप्लीकेशन धोखाधड़ी के मामले में कुल 15 लोगों को गिरफ्तार किया है।
डिटेक्टिव विभाग के जॉइंट कमीश्नर ऑफ़ पुलिस अविनाश मोहंती ने भी इस घटना के संबंध में जानकारी दी। उन्होंने कहा, “हमने अभी तक 42 ऐसी एप्लीकेशन की पहचान की है, जो लोन फाइनेंसिंग का दावा करती हैं। इसके अलावा कुल 350 वर्चुअल खाते भी बरामद किए गए हैं, जिनमें लगभग 87 करोड़ रुपए मौजूद है।”
उनका कहना था कि जाँच के दौरान पता चला कि दो एप्लीकेशन चार कंपनी (Liufang Technologies, Hotfull Technologies, Nabloom Technologies and Pin Print Technologies) के दायरे में आती हैं। यह कंपनियाँ राजेंद्र नगर में व्यक्ति की आत्महत्या के मामले से संबंधित हैं।
महाराष्ट्र की सत्ताधारी पार्टी शिवसेना के मुखपत्र ‘सामना’ में अपनी ही सहयोगी पार्टी कॉन्ग्रेस और राहुल गाँधी पर निशाना साधा गया है। इस संपादकीय में देश के विपक्षी दलों को कमजोर और बिखरा हुआ बताया गया है। ‘सामना’ के संपादकीय में लिखा है कि ‘लोकतंत्र के अधोपतन’ के लिए विपक्षी दल ही जिम्मेदार हैं और उन्हें आत्मचिंतन की आवश्यकता है। साथ ही लिखा है कि विपक्षी दलों को अभी एक सर्वमान्य नेता चाहिए, लेकिन इस मामले में वे दिवालिया हो गए हैं।
इस संपादकीय में खासकर के कॉन्ग्रेस के गाँधी परिवार को निशाना बनाया गया है। लिखा है कि बीते 5 वर्षों में सरकार ने किसी भी आंदोलन को लेकर गंभीरता ही नहीं दिखाई, क्योंकि सरकार के मन में विपक्षी दलों का कोई अस्तित्व ही नहीं है। यही उनकी दुर्दशा है। शिवसेना ने कॉन्ग्रेस वर्किंग कमिटी के नेताओं को इस विषय पर चर्चा करने की सलाह दी है कि उनके ‘सर्वोच्च नेता को घोषित तौर पर अपमानित करने की हिम्मत सत्ताधीश क्यों दिखाते हैं?’
शिवसेना ने कॉन्ग्रेस को ‘सरकार पर टूट पड़ने’ में कमजोर करार देते हुए कहा कि कॉन्ग्रेस सहित सभी विपक्षी दल ‘किसान आंदोलन’ को धार नहीं दे पाए हैं। साथ ही पश्चिम बंगाल में क़ानून-व्यवस्था बिगाड़ने के लिए भाजपा को ही जिम्मेदार ठहराया गया है। पूछा गया है कि कॉन्ग्रेस का नेतृत्व अब कौन करेगा? साथ ही उसने कॉन्ग्रेस को ये भी याद दिलाया कि उसके पास अमित शाह जैसे कोई ‘व्यवस्थापक’ भी नहीं है। संपादकीय में आगे लिखा है:
“कॉन्ग्रेस के नेतृत्व में एक ‘यूपीए’ नामक राजनीतिक संगठन है। उस ‘यूपीए’ की हालत एकाध ‘एनजीओ’ की तरह होती दिख रही है। ‘यूपीए’ के सहयोगी दलों द्वारा भी देशांतर्गत किसानों के असंतोष को गंभीरता से लिया हुआ नहीं दिखता। ‘यूपीए’ में कुछ दल होने चाहिए लेकिन वे कौन और क्या करते हैं? इसको लेकर भ्रम की स्थिति है। शरद पवार के नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी (NCP) को छोड़ दें तो ‘यूपीए’ की अन्य सहयोगी पार्टियों की कुछ हलचल नहीं दिखती। शरद पवार का एक स्वतंत्र व्यक्तित्व है, राष्ट्रीय स्तर पर है ही और उनके वजनदार व्यक्तित्व तथा अनुभव का लाभ प्रधानमंत्री मोदी से लेकर दूसरी पार्टियाँ भी लेती रहती हैं।”
बिहार में कॉन्ग्रेस की हार की चर्चा करते हुए ‘सामना’ के संपादकीय में कहा गया है कि राहुल गाँधी की मेहनत में कमी जरूर है। मायावती, अखिलेसग यादव, जगन रेड्डी, नवीन पटनायक, केसीआर ममता बनर्जी, उद्धव ठाकरे, प्रकाश सिंह बादल और कुमारस्वामी जैसे नेताओं की पार्टियों को शिवसेना में लाने की बात कही गई है। शिवसेना ने विपक्षी दलों की हालत की तुलना ‘उजड़े हुए गाँव की जमींदारी’ से की है। साथ ही विपक्ष को ‘मरा हुआ’ बताया गया है।
‘सामना’ में इससे पहले भी कई संपादकीय में भाजपा सहित अन्य दलों व लोगों पर आपत्तिजनक टिप्पणियाँ की जाती रही हैं। शिवसेना के मुखपत्र ‘सामना’ ने अक्टूबर 5, 2020 अपने संपादकीय में सुशांत सिंह राजपूत को असफल और चरित्रहीन कलाकार बताया था। तब अपने संपादकीय में सामना ने कहा था कि बीते दिनों बिहार के पूर्व डीजीपी गुप्तेश्वर पांडे को महाराष्ट्र द्वेष का गुप्तरोग हो गया था और देश के कई अन्य ‘गुप्तेश्वरों’ को (जो महाराष्ट्र पुलिस या सरकार पर सवाल उठा रहे थे) भी यह रोग हो गया था।
उत्तर प्रदेश से कॉन्ग्रेस के लिए एक बुरी ख़बर सामने आई है। एक वरिष्ठ नेता ने पार्टी का साथ छोड़ दिया है। उल्लेखनीय है कि उन्होंने पार्टी महासचिव और यूपी प्रभारी प्रियंका गाँधी वाड्रा पर गंभीर आरोप लगाए हैं।
उनका कहना है कि गाँधी परिवार अपनी छवि बचाए रखने के लिए दिग्गज नेताओं का अपमान कर रहा है। इतना ही नहीं, उन्हें पार्टी छोड़ने पर मजबूर भी किया जा रहा है। विनोद मिश्रा के मुताबिक़ कॉन्ग्रेस की पूरी प्रदेश इकाई को वामपंथी नेताओं के हवाले कर दिया गया है।
उत्तर प्रदेश कॉन्ग्रेस के दिग्गज नेता और ब्राह्मण महासभा के संयोजक विनोद मिश्रा ने शुक्रवार (25 दिसंबर 2020) को त्याग पत्र दिया। वह इसके पहले उत्तर प्रदेश कॉन्ग्रेस के महासचिव भी रह चुके हैं और राज बब्बर के कार्यकाल में लखनऊ प्रभारी भी रह चुके हैं। उन्होंने अपने इस्तीफ़े के लिए पूरी तरह प्रियंका गाँधी वाड्रा को ज़िम्मेदार ठहराया है।
विनोद मिश्रा ने यहाँ तक आरोप लगाया कि गाँधी परिवार सीबीआई (केंद्रीय जाँच ब्यूरो) और ईडी (प्रवर्तन निदेशालय) से बचने का प्रयास कर रहा है और इसके लिए वह संगठन का इस्तेमाल कर रहा है। यह कॉन्ग्रेस के नेताओं के अपमानित होने की वजह है और नतीजतन उन्हें मजबूर होकर पार्टी का साथ छोड़ना पड़ रहा है।
इसके अलावा विनोद मिश्रा ने दिए गए बयान में कहा, “प्रदेश की कॉन्ग्रेस इकाई को पहले ही वामपंथी नेताओं के हवाले किया जा चुका है। राज्य के भीतर पार्टी की बागडोर उनके हाथों में ही है, जिस पार्टी का इतिहास 100 साल से भी पुराना है, जिसने देश की आज़ादी में इतनी अहम भूमिका निभाई, उसके लिए यह दुर्भाग्यपूर्ण है।”
उनका स्पष्ट रूप से कहना है कि पूरी पार्टी सिर्फ ‘वाड्रा’ के बचाव में लगी हुई है और नीतियों से पूरी तरह भटक गई है। पूर्व कॉन्ग्रेस नेता ने अपना त्याग पत्र कॉन्ग्रेस के उत्तर प्रदेश अध्यक्ष अजय लल्लू को दे दिया है। हालाँकि उन्होंने यह भी कहा है कि फ़िलहाल वह किसी अन्य दल का दामन नहीं थामने वाले हैं। अब से उनका पूरा प्रयास ब्राह्मण महासभा को मज़बूत करने पर होगा।
हाल ही में कॉन्ग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने पार्टी की कार्यप्रणाली से असंतुष्ट चल रहे ग्रुप-23 के दिग्गज नेताओं के साथ बैठक और वार्ता की थी। इस बैठक के बाद असम से कॉन्ग्रेस पार्टी की विधायक अजनंता नियोग को संगठन विरोधी गतिविधियों के चलते पार्टी से निकाल दिया गया था।
असम कॉन्ग्रेस को विधायक पर संदेह था कि वह केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के दौरे के वक्त भाजपा का हिस्सा बन सकती हैं। असम में भी आगामी 2021 में विधानसभा चुनाव होने हैं, ऐसे में अगर अजनंता नियोग भाजपा में शामिल होती हैं तो यह बेशक कॉन्ग्रेस के लिए बड़ा झटका साबित होगा।
दिल्ली में चल रहे ‘किसान आंदोलन’ के बीच विवादित बयानों का सिलसिला थम नहीं रहा है। अब कॉन्ग्रेस सांसद रवनीत सिंह बिट्टू ने हिंसक टिप्पणी की है। उन्होंने केंद्र की मोदी सरकार को धमकाते हुए कहा कि वो सोचते हैं कि हम यहाँ पर बैठे हैं इतने दिनों से तो बैठे-बैठे थक जाएँगे। उन्होंने कहा, “1 तारीख (जनवरी 1, 2020) के बाद हम लाशों के भी ढेर लगाएँगे। हम अपना खून भी देंगे। हम इसके लिए कहीं भी, किसी भी हद तक जा सकते हैं।”
रवनीत सिंह बिट्टू के इस बयान को लेकर लोगों ने तीखी प्रतिक्रिया दी। वो पंजाब के लुधियाना से लोकसभा सांसद हैं। वहाँ से वो लगातार दूसरी बार सांसद बने हैं। जहाँ 2014 में उन्हें 3 लाख वोट मिले थे, 2019 में उन्होंने 3.83 लाख वोट पाकर AAP और भाजपा को हराया। इससे पहले 2009 में वो आनंदपुर साहिब से कॉन्ग्रेस सांसद रह चुके हैं। कहा जाता है कि ‘किसान हितैषी’ दिखने के लिए उन्होंने ही होड़ लगाई थी, जिसके बाद हरसिमरत कौर बादल ने इस्तीफा दिया।
अब उन्होंने ऐलान किया है कि प्रदर्शनकारी जनवरी 1 के बाद एक नई प्लानिंग के साथ आएँगे। पंजाब में अकाली दल और कॉन्ग्रेस के बीच प्रदर्शन में ज्यादा से ज्यादा भागीदारी और कट्टरता को लेकर एक होड़ सी मची हुई है और इसमें दिल्ली की आम आदमी पार्टी भी घुस गई है। एक के बाद एक विवादित बयान सामने आ रहे हैं, जिनमें पीएम मोदी को जान की धमकी से लेकर अब ‘लाशों के ढेर लगाने’ की बातें की जा रही हैं।
रवनीत का बयान 1:11 के बाद (वीडियो साभार: न्यूज़ नेशन)
कंगना रनौत और दिलजीत दोसाँझ के बीच ट्विटर पर चली बहस के दौरान भी बिट्टू का नाम आया था। जून 18, 2020 को की गई एक ट्वीट में बिट्टू ने पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टेन अमरिंदर सिंह से माँग की थी कि जत्थेदार हरप्रीत सिंह, दिलजीत दोसाँझ और जैजी बी पर FIR की जाए, क्योंकि इन्होने SFJ और पन्नू के खालिस्तान की माँग का समर्थन किया है। कंगना ने उनकी इस ट्वीट का सहारा लेकर दिलजीत पर निशाना साधा था।
ये पहली बार नहीं है, जब प्रदर्शनकारियों का उनके नेताओं ने मरने-मारने की बात की हो। कुछ ही दिनों पहले सोशल मीडिया पर वायरल हुए एक वीडियो में एक महिला को कहते हुए देखा जा सकता है, “मोदी मर जा तू, शिक्षा बेच के खा गया रे मोदी, मर जा तू। रेल बेचकर खा गया रे मोदी, मर जा तू। देश बेच के खा गया रे मोदी, मर जा तू। किसानों को धोखा दे गए रे मोदी, मर जा तू।” वहीं सामने बैठी महिला बार-बार ‘हाय-हाय मोदी मर जा तू’ दोहरा रही थी।
राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) ने पाया है कि असम और मणिपुर में बदरुद्दीन अजमल के मरकाजुल मारीफ के द्वारा संचालित 6 बाल संरक्षण गृहों में फंड्स का गलत इस्तेमाल किया गया है। इनमें से एक बाल संरक्षण गृह को तो उस NGO से फंड्स मिले, जिसकी वैश्विक आतंकी संगठन अलकायदा से लिंक्स की जाँच की जा रही है। शुक्रवार (दिसंबर 25, 2020) को NCPCR ने कहा कि उसकी इंस्पेक्शन टीम को बताया गया कि इन 6 बाल संरक्षण गृह में 778 बच्चे रह रहे हैं।
असम के विवादित सांसद बदरुद्दीन अजमल ने इन बाल संरक्षण गृहों की स्थापना की है। लोकसभा की वेबसाइट पर उपलब्ध उनके बायो में बताया गया है कि इनमें 1010 बच्चे रह रहे हैं। मरकाजुल मारीफ की वेबसाइट पर इनमें 1080 बच्चों के होने की बात बताई गई है। इस तरह से संस्था द्वारा दी गई जानकारी और अन्य आँकड़े अलग-अलग हैं। NCPCR का कहना है कि बाकी के 300 बच्चों के बारे में पता करना आवश्यक है।
IHH नामक अंतरराष्ट्रीय NGO से संस्था को धन प्राप्त हो रहा है। साथ ही बच्चों की एक सूची भी मिली है, जिन्हें इस धन का ‘फायदा’ मिल रहा है। 2017 की एक सूची के अनुसार, इन बच्चों को IHH स्पॉन्सर कर रहा है। तुर्की के इस NGO से तुर्की में ही पूछताछ चल रही है, क्योंकि उसके अलकायदा से जुड़ने होने की बात सामने आई है। आयोग ने अभी तक उन बच्चों के डिटेल्स को लेकर कुछ नहीं बताया है, जिन्हें इस NGO ने स्पॉन्सर कर रखा है।
आयोग का कहना है कि इन गृहों में 302 बच्चे ऐसे हो सकते हैं, जिनका रजिस्ट्रेशन नहीं कराया गया है और उनके बारे में पता किया जा रहा है। इंस्पेक्शन टीम ने कहा है कि इस मामले में अब NIA को जाँच कर के तथ्यों का पता लगाना चाहिए। दिसंबर 14-18 के बीच हुई जाँच के बाद असम और मणिपुर की सरकारों को सौंपी गई रिपोर्ट में NCPCR ने कहा है कि इन बाल संरक्षण गृहों में किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 सहित कई नियमों का उल्लंघन किया गया है।
वहाँ के गंदे व अनहाइजेनिक टॉयलेट्स, लड़कियों के लिए असुरक्षा, बाँस के डंडे से दंड देने सहित कई ऐसी चीजें हैं, जिनके बारे में रिपोर्ट में बताया गया है। इनमें से कइयों में CCTV कैमरे भी नहीं हैं। इनका निर्माण भी बच्चों की सुरक्षा को लेकर जारी दिशा-निर्देशों के तहत नहीं किया गया है। इससे बच्चों को प्रताड़ित किए जाने की आशंका है। कर्मचारियों ने भी स्वीकारा है कि बच्चों को शारीरिक रूप से दंड दिए जाते हैं।
एक बच्चे ने भी जाँच टीम से अपनी पिटाई किए जाने की शिकायत की, जिसके बाद दोषियों के खिलाफ आयोग ने FIR करने की बात पर बल दिया है। एक बाल संरक्षण गृह में तो पुरुष कर्मचारियों को बच्चियों के कमरों में घूमते हुए देखा गया और वो वहाँ भी घूम रहे थे, जहाँ ये बच्चियाँ सोती हैं। रिपोर्ट में बताया गया है कि इन बच्चियों की प्रताड़ना की आशंका है। आयोग की रिपोर्ट के बाद दोनों राज सरकारों पर कार्रवाई का दारोमदार है।
इनमें से 5 बाल संरक्षण गृह असम के धुबरी, गोलबरा और नगाँव, जबकि एक मणिपुर के थौबल में स्थित है। इन सभी का नाम ‘मरकज दारुल यातमा’ रखा गया है। बच्चों के मेडिकल के लिए कोई डॉक्टर नहीं था। बच्चों के बायोलॉजिकल गार्जियंस को ढूँढने के लिए कोई प्रयास नहीं किया गया। बच्चों की केस हिस्ट्री नहीं तैयार की गई। जिन-जिन क्षेत्रों के जिन कर्मचारियों को वहाँ नियमानुसार होना चाहिए, वो नहीं थे।
1000 स्क्वायर फ़ीट के कमरे होने चाहिए, जबकि सभी इससे छोटे थे और उनमें से दुर्गंध आ रही थी। साफ़-सफाई की व्यवस्था नहीं थी और काउंसिलिंग रूम की व्यवस्था भी नहीं की गई थी। न तो सही से बाउंड्री पर फेंसिंग की गई थी, न ही सुरक्षा की कोई व्यवस्था थी। आयोग ने पाया कि इनमें से कई के रजिस्ट्रेशन एक्सपायर हो चुके थे, लेकिन उन्होंने फिर से अप्लाई नहीं किया। 2012 में मुख्यमंत्री की योजना के तहत भी इन्हें धन मिला था।
NCPCR ने ये भी पाया कि इन बाल संरक्षण गृहों के परिसर में खुलेआम जानवरों की हत्या की जा रही थी, जबकि बच्चों को इस तरह से दृश्य नहीं देखने चाहिए। उन्हें बीमारी होने पर बिना डॉक्टर की सलाह के दवाएँ दी जा रही थीं। कुछ दिनों पहले ये भी खबर आई थी कि इन बाल संरक्षण गृहों को चीन की संस्थाओं से फंडिंग मिल रही है। बच्चों की वोकेशनल ट्रेनिंग के लिए भी व्यवस्था नहीं की गई है। NCPCR ने ऐसी कई अनियमितताएँ पाईं।
#Breaking NCPCR recommended inquiry of @BadruddinAjmal run Markazul Maarif child homes through specialized investigation agencies for its logistical relations with #AlQaida linked #Turkish charities. During raids @NCPCR_ found illegal activities at Dhubri, Goalpara, Nagao homes pic.twitter.com/X7WAcUADNx
आयोग ने बताया कि कई जगह तो उसे सूचनाएँ भी ठीक से नहीं दी गईं। ज़रूरी कागजात मुहैया नहीं कराए गए। आयोग ने इस पर आश्चर्य जताया है कि नियमों के उल्लंघन के बावजूद इन्हें राज्य सरकारों द्वारा ‘सर्व शिक्षा अभियान’ के तहत वित्त क्यों मुहैया कराया गया? बच्चों के लिए सुरक्षा नीति, खानपान, मेडिकल और डेली रूटीन को लेकर कुछ तय मानक हैं, जिनका वहाँ पालन नहीं किया जा रहा था।
आयोग ने कहा कि गोलपारा में एक संरक्षण गृह के भीतर स्कूल भी चल रहा है, जिसका वेरिफिकेशन जरूरी है। आयोग ने असम और मणिपुर की सरकारों से सिफारिश की है कि जिन गृहों का रजिस्ट्रेशन नहीं हुआ है, वहाँ के बच्चे-बच्चियों को किसी अन्य संस्थान में शिफ्ट किया जाए। साथ ही शिक्षा विभाग सरकारी फंड्स के उपयोग के डिटेल्स माँगे और जाँच करे। IHH को भी बच्चों के डिटेल्स भेजे गए होंगे, इसीलिए इसकी भी जाँच की जाए।
इसी महीने में ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (AIUDF) के प्रमुख बदरुद्दीन अजमल द्वारा संचालित ‘अजमल फाउंडेशन’ के खिलाफ असम के दिसपुर पुलिस स्टेशन में मामला दर्ज किया गया था। गुवाहाटी के सीपी एम एस गुप्ता ने बताया था कि यह मामला सत्य रंजन बोराह द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत के बाद दायर किया गया था, जिसने एनजीओ पर विदेशी फंड प्राप्त करने और संदिग्ध गतिविधियों में इसका इस्तेमाल करने का आरोप लगाया था।
26 दिसंबर 2004। एक भयावह दिन। भारत, श्रीलंका, इंडोनेशिया समेत कई देशों के तटीय क्षेत्रों के पास बसे कई शहरों को मालूम भी नहीं था कि वह कुछ ही देर में मलबे में बदलने वाले हैं। पर्यटकों या स्थानीय लोगों में से किसी को खबर भी नहीं थी कि आखिर उनमें से कौन जिंदा बचेगा। सुबह के करीब 7:58 पर अचानक हिंद महासागर ने एक विकराल रूप धारण किया और पानी की लहरें चट्टान की ऊँचाई में तब्दील हो गईं। जब ये तबाही का मंजर रुका तो पता चला दो लाख से ज्यादा लोग हिंद महासागर के प्रकोप का आहार बन चुके थे।
सबसे ज्यादा तबाही झेली थी दक्षिण भारत, श्रीलंका और इंडोनेशिया ने। वहीं चट्टान रूपी लहरों ने थाइलैंड, मेडागास्कर, मालदीव, मलेशिया, म्यांमार, सेशेल्स, सोमालिया, तंजानिया, केन्या, बांग्लादेश पर भी अपना कहर छोड़ा था। कहते हैं कि 13 प्रभावित देशों में से 7 लाख से ज्यादा लोग विस्थापित हुए थे। वहीं आपदा से निपटने के लिए सरकारी सहायता और निजी दान के रूप में 13.6 अरब डॉलर खर्च किए गए थे।
साभार: Fludaskoli
अकेले तमिलनाडु के नागापट्टिनम में सुनामी के कारण 6000 से ज्यादा लोग मारे गए थे। जो बचे थे, उन्होंने अपने परिजनों को गँवा दिया था। ये इलाका सबसे ज्यादा प्रभावित इलाकों में से एक माना जाता है। जहाँ सबसे ज्यादा मछुआरे सुनामी का शिकार हुए। आज 16 साल बाद भी यहाँ के लोग जब इस किनारे जाते हैं तो वो उस त्रासदी को नहीं भूल पाते और अपनो को याद करने लगते हैं।
मद्रास के मरीना बीच (साभार: द एटलांटिक)
2004 की सुनामी में अकेले भारत में 16,279 लोग मारे गए या लापता हुए थे। वहीं थाईलैंड में सुनामी के कारण 5,300 से अधिक लोगों की मौत हो गई थी, जिनमें पर्यटक भी शामिल थे। बर्मा के तटों पर भी इसका असर दिखा था और भारत का अंडमान निकोबार भी इसकी चपेट में आ चुका था।
उधर, इंडोनेशिया के सुमात्रा में समुद्र के नीचे दो प्लेटों में आई दरारें खिसकने से उत्तर से दक्षिण की ओर पानी की लगभग 1000 किलोमीटर लंबी दीवार खड़ी हुई थी जिसका रुख पूर्व से पश्चिम की ओर था। इस जल प्रलय में इतनी ताकत थी कि सुमात्रा का उत्तरी तट तो पूरी तरह बर्बाद हो गया था। इसके साथ आचेह प्रांत का तटीय इलाका भी पूरी तरह से समुद्री पानी में डूब गया था।
सुनामी से जीती जिंदगी की जंग लेकिन खो दिए अपने परिजन
द गार्जियन की रिपोर्ट के मुताबिक भयावह सुनामी के प्रत्यक्षदर्शी व एक सर्वाइवर नजरुद्दीन मूसा उस दिन को याद करते हुए कहते हैं, “उस दिन मैं फिशिंग स्पॉट krueng cut village में था। वहाँ मुझे हल्का भूकंप महसूस हुआ तो मुझे लगा कि मुझे परिवार को देख आना चाहिए। 15 मिनट बाद जब वहाँ पहुँचा तो सब ठीक था। मैं सोच रहा था कि भूकंप से क्या तबाही मची होगी। लेकिन तब तक मैंने सुनामी की कल्पना नहीं की थी। पर कुछ ही देर में मैंने पानी अपनी तरफ आते देखा। वह घरों को तोड़ते हुए तेजी से बढ़ रहा था। मैंने यह देखते ही अपने बेटे को उठाया और अपनी बीवी को लेकर भागा। हमारे पास थोड़ा सा समय था और जिंदगी और मौत का क्षण था। हम दो माले की इमारत की ओर दौड़े और हमने देखा कि वह जल प्रलय अपने साथ सैंकड़ों लोगों को अपनी चपेट में ले चुकी थी। मैंने भागकर सड़क पर पड़ी एक लड़की को दूसरे माले पर पहुँचाया। और कुछ ही देर में दूसरी लहर भी आगई। हम पहली लहर के बाद लोगों को घायल पड़े देख पा रहे थे, जबकि दूसरी और घातक थी, जो सबको अपने साथ बहा ले गई।”
बांदा आचेह के एल्थ नागा गाँव के मारथुनिस उस त्रासदी को याद करते हुए कहते हैं, “मैं उस दिन अपने दोस्तों के साथ सॉसर खेल रहा था। भूकंप आते ही हम घर की ओर भागे और हमने एरोप्लेन जैसी तेज आवाज सुनी। जब मैंने समुद्र की ओर देखा तो वह कुछ ऐसा था, जो मैंने कभी नहीं देखा था। वो सब भयानक था। मेरे घर वाले मिनिवैन में भाग गए थे लेकिन सड़क पर ऐसे लोग थे, जो बचने का प्रयास कर रहे थे। अचानक काली लहर आई और हमारी मिनीवैन से टकराई। सब थोड़ी देर में अंधकार में बदल गया। जब होश आया तो मैं पानी में था। मैंने एक स्कूल कुर्सी पकड़ी हुई थी। मुझे पता ही नहीं था मैं कहाँ हूँ। बहुत तेज भूख और प्यास लग रही थी। आस-पास शव थे। मैं अपने ईर्द-गिर्द जमा हुए चीजों से नूडल्स या पानी की बोतल तलाश रहा था। 5 दिन के बाद मेरे आस पास कुछ नहीं बचा था। मैने किसी तरह 20 दिन गुजारे। इसी दौरान मैंने उन लोगों को शवों को उठाते देखा, जिन्होंने मुझे बचाया था। वह मुझे फकीनाह अस्पताल ले गए। जहाँ मैंने अपने पिता को पाया। उन्होंने मुझे बताया कि मेरी माँ और बहन सुनामी में मर चुकी हैं।”
इंडोनेशिया का Banda aceh (साभार: नेशनल वेदर सर्विस)
आपदा झेलने वाले महियुद्दीन बताते हैं, “तीन लहरें झेलने के बाद हमें दोपहर में रेडियो कॉल आई और हमसे पीड़ितों को बचाने के लिए मदद माँगी गई। रास्तें में जाते समय हमने कई शवों को तैरते देखा। कई सर्वाइवर्स को हमने बचाया। रात होने से पहले कइयों को रेस्क्यू किया। दुख इस बात का था कि मेरा घर बह चुका था। मेरी पत्नी और बेटी मुझसे दूर हो गए थे। लेकिन मुझे नहीं पता था कि मैं क्या करूँ। मैं मस्जिद में जाकर सोया और काफी समय वहीं रहा।”
इसी प्रकार एक महिला जो अपने बेटे और पति को सुनामी की भेंट चढ़ते देख चुकी थी। वह कहती है, “जब हमने सुनामी को आते देखा, हमें समझ नहीं आया, वो पानी है या तेल। वो लहर बहुत काली थी। जब दूसरे माले पर वो हम तक पहुँची तो लगा आज आखिरी दिन है। मैंने सोचा मैं और बच्चे सब मर जाएँगे। लेकिन घबराकर मेरे लड़के ने छत में एक छेद किया और वह उस पर चढ़ गया। धीरे-धीरे सब ऊपर गए। वहाँ से हमने देखा कि कई लोग पानी में बह रहे थे। मैंने दुआ करनी शुरू की और अपने माता-पिता व पति की सलामती की माँग करती रही। वह सब मर चुके थे। अब भी याद आती है लेकिन जिंदगी किसी के लिए नहीं रुकती।”
सुनामी की असली वजह और मीडिया में तैरती कॉन्सपिरेसी थ्योरी
इस आपदा की वजह वैसे तो हिंद महासागर में 9.15 की तीव्रता वाले भूकंप को माना जाता है, जिसकी वजह से सुनामी की लहरें उठीं और जान-माल सबका नुकसान हुआ। लेकिन, इस तथ्य के अलावा कई कॉन्सिपिरेसी थ्योरी भी हैं, जो इस आपदा के बाद मीडिया में आईं। इनमें से एक सबसे प्रचलित थी, जिसका तर्क था कि ये सब भारत द्वारा परमाणु परीक्षण किए जाने के कारण हुआ।
न्यूयॉर्क मैगजीन में प्रकाशित 2013 के एक छोटे लेख को देखें तो इस आपदा के बाद संभावना जताई गई थी कि हो सकता है अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज बुश के निर्देश पर हिंद महासागर में बम गिरा दिया गया हो ताकि एक साथ मुख्य एशियाई अर्थव्यवस्थता, आतंकी संगठन तबाह हो जाएँ और वह हीरो बन कर उभरें। इसके अलावा यह भी माना जाता है कि पाकिस्तान को पछाड़ने के लिए भारत द्वारा परमाणु परीक्षण इस तबाही की मुख्य वजह बना।
श्रीलंका के साउथ कोलंबो का हश्र (साभार: द एटलांटिक)
आगे यह भी अनुमान लगाए गए कि कहीं वैज्ञानिकों ने ऐसी भीषण विपदा को जन्म तो नहीं दिया, लेकिन फिर ये तर्क इस आधार पर खारिज होते गए कि कोई भी मानव निर्मित शक्ति इतनी ऊर्जा पैदा नहीं कर सकती कि भूकंप का स्केल 9 के पार हो जाए।
वाद-विवाद में ऐसी बातें भी कहीं गई कि हो सकता है कि एलियन प्रभावित क्षेत्रों के पास अपने स्पेशशिप में घूम रहे हों और चेतावनी के लिहाज से ऐसा किया गया हो। अरब के समाचार स्रोत अलजजीरा ने इस थ्योरी को आगे बढ़ाया कि भारतीय या अमेरिकी सेना इलेक्ट्रोमैग्नेटिक हथियारों का परीक्षण कर रही थीं और उसी की वजह से ये सब हुआ।
अरब के मीडिया ने यह भी आरोप मढ़ा कि यूएस को पहले ही इस प्राकृतिक आपदा का भान था लेकिन वह एशियाई देशों को इसकी सूचना देने से बचते रहे और समय आने पर जवाब देने की जगह एलियनों की थ्योरी देकर हाथ पीछे कर लिया।
इस पूरी बहस में सारी तबाही का कारण दैवीय शक्तियों के प्रकोप को भी बताया गया। वहीं कोलंबो में सेंटर फॉर इस्लामिक स्टडीज के प्रबंधक ने इस सुनामी से अल्लाह को जोड़ दिया और तर्क दिया कि श्रीलंका के पश्चिमी तटों पर सुनामी के कुछ सेकेंड बाद ली गई सैटेलाइट तस्वीर से पता चलता है कि वहाँ अरबी भाषा में ‘अल्लाह’ नाम देखने को मिला है।
गौरतलब हो कि सुनामी को लेकर कई कॉन्सिपिरेसी थ्योरी सामने आई थीं। लेकिन इन पर विचार के बाद यही पता चलता है कि 26 दिसंबर 2004 की सुनामी एक प्राकृतिक आपदा थी। जिसे याद करके आज भी लोग काँप उठते हैं।
कहा जाता है कि सुनामी के शुरुआती झटकों के दो घंटों में सुनामी की लहरों ने श्रीलंका और दक्षिण भारत को अपना निशाना बनाया था, जिसके बाद एजेंसियों की रिपोर्ट से मीडिया भर चुका था। लेकिन जानकारी होने के बावजूद इस भयावह मंजर से निपटने का इंतजाम किसी देश पर नहीं था। आज कहीं-कहीं वैज्ञानिकों के हवाले से यह भी पढ़ने को मिलता है कि 2004 की उस सुनामी में 9000 परमाणु बम जितनी शक्ति थी।
पृथ्वी पर क्या पड़ा असर?
16 साल पहले 26 दिसंबर को आई सुनामी इतिहास की सबसे विनाशकारी सुनामी थी। रिपोर्ट्स के अनुसार भारतीय प्रायद्वीप की टेक्टोनिक प्लेटों के बीच पिछले करीब 150 साल से एक दबाव बन रहा था। ये भूकंप उसी का नतीजा था। उससे पहले हिंद महासागर में 1883 के बाद कोई बड़ी सुनामी नहीं आई थी।
शायद इसलिए 2004 की सुनामी तक कोई सुनियोजित अलर्ट सेवा स्थापित नहीं की गई। अगर अलर्ट सेवा होती, तो इस विनाश से करीब तीन घंटे पहले लोगों को अलर्ट कर सुरक्षित जगहों पर भेजा जा सकता था। ऐसे में माल की हानि तो होती लेकिन लाखों लोगों को मरने से बचाया जा सकता था।
सबसे हैरानी की बात यह है कि इस सुनामी का प्रभाव इतना गहरा था कि पृथ्वी का आकार (जल-थल भाग) भी बदल गया। कुछ आईलैंड कई मीटर तक अपनी पूर्व जगहों से खिसक गए। सुमात्रा के भूगोल में तो तबाही ने काफी बदलाव किया। यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ लंदन के प्रोफेसर बिल मैकगायर भी मानते हैं कि सुमात्रा निश्चित रूप से अपनी जगह से खिसक गया है।
तस्वीर साभार: ABC
यहाँ बता दें कि सुनामी में मरने वालों की संख्या आज दो-ढाई लाख के पार बताई जाती है। लेकिन माना जाता है कि इस प्राकृतिक आपदा से हुआ जानों का नुकसान कम हो सकता था, पर जल प्रलय की निर्धारित तारीख ने इस संख्या को और बढ़ा दिया। दरअसल उस समय कई पर्यटक 25 दिसंबर यानी क्रिसमस के मौके पर तटीय क्षेत्रों में क्रिसमस और 1 जनवरी से पहले नए साल का जश्न मनाने गए थे। मगर इतिहास के उस काले दिन ने किसी से उनकी जिंदगी छीनी तो किसी से उसके अपने। पानी के वेग में बड़े से बड़ा पुल, ऊँची से ऊँची इमारत, भारी से भारी जानवर, सबसे मजबूत वृक्ष भी एक तिनके की भाँति सैलाब में तैर रहा था।
मध्य प्रदेश के उज्जैन स्थित बेगमबाग में शुक्रवार (दिसंबर 25, 2020) की शाम हिंदू संगठनों की रैली पर जम कर पत्थरबाजी की गई। बताया गया है कि मुस्लिम भीड़ की इस हरकत के बाद दोनों समुदायों के बीच झड़प हुई और इलाके में तनाव व्याप्त हो गया। वहाँ खड़ी कई गाड़ियों को क्षतिग्रस्त कर दिया गया। तोड़-फोड़ और पथराव की इस घटना में 10 लोगों के घायल होने की सूचना है। पुलिस ने एक आरोपित को गिरफ्तार भी किया है।
हिंदू कार्यकर्ता अयोध्या में निर्माणाधीन राम मंदिर के लिए चंदा इकट्ठा करने के लिए रैली निकाल रहे थे। इस रैली को टॉवर क्षेत्र से महाकाल क्षेत्र स्थित भारत माता मंदिर तक जाना था। तभी रास्ते में ही बेगमबाग क्षेत्र में मुस्लिम समुदाय के कुछ असामाजिक तत्वों ने रैली पर पथराव शुरू कर दिया। हिन्दू कार्यकर्ताओं ने भारी पत्थरबाजी में खुद को घिरे हुए देख कर वहाँ से भागने में ही भलाई समझी। लेकिन, उन्होंने अपनी गाड़ियाँ वहीं छोड़ दीं।
इसके बाद मुस्लिम भीड़ ने गाड़ियों को ही निशाना बनाना शुरू कर दिया। तोड़फोड़ के कारण सभी गाड़ियाँ क्षतिग्रस्त हो गईं। पुलिस को जैसे ही इस घटना की सूचना मिली, उसने घटनास्थल पर पहुँच कर स्थिति को नियंत्रित किया। डीएम आशीष सिंह और एसपी सत्येन्द्र शुक्ला भी मौके पर पहुँचे। डीएम ने आपसी विवाद को झगड़े की वजह करार दिया है। उन्होंने बताया कि पुलिस ने स्थिति को संभाल किया है और कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए आगे की कार्रवाई की जा रही है।
उज्जैन में महाकाल मंदिर से कुछ ही दूरी पर हुई घटना (वीडियो साभार: MP News TV)
इस पत्थरबाजी में न सिर्फ गाड़ियों के शीशे टूटे, बल्कि दुकानों के काँच भी टूट गए। क्षेत्र में भारी पुलिस बल की तैनाती की गई है। कुछ लोग हिरासत में भी लिए गए हैं। घटना से आक्रोशित हिंदुओं ने महाकाल थाने का घेराव किया और न्याय की माँग की। भाजपा सांसद अनिल फिरौजिया भी थाने पहुँचे। दोपहिया वाहनों की इस रैली पर शाम के 6 बजे पथराव हुआ। बदमाशों को चिह्नित कर के कार्रवाई की जा रही है।
श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट (Ram Janmbhoomi Teerth Kshetra) ने अयोध्या में बनने जा रहे भव्य राम मंदिर के निर्माण के लिए एक देशव्यापी जन संपर्क और योगदान अभियान शुरू करने की योजना बनाई है। इस दौरान लोगों को जन्मभूमि आंदोलन के ऐतिहासिक महत्व से भी अवगत कराया जाएगा। जनसंपर्क अभियान मकर संक्रांति से शुरू होकर माघ पूर्णिमा तक जारी रहेगा। इस अभियान के तहत अरुणांचल प्रदेश, नागालैंड, अंडमान निकोबार और त्रिपुरा जैसे सुदूर के राज्यों तक में श्रीराम मंदिर की ऐतिहासिकता से रामभक्तों को अवगत कराया जाएगा।
दिल्ली की संजय कॉलोनी से एक बेहद ही खौफनाक मामला सामने आया है। जहाँ एक सिरफिरे आशिक ने एक तरफा प्यार के जुनून में एक महिला के बेटे की बेरहमी से हत्या कर दी। बता दें, आरोपित महिला से प्यार करता था और उससे शादी करना चाहता था। लेकिन महिला ने उसके प्रस्ताव को ठुकरा दिया। जिससे गुस्साए प्रेमी ने उसके बेटे को प्यार का दुश्मन समझ कर उसे इस कदर मौत के घाट उतारा जिसे सुनकर आपके पैरों तले ज़मीन खिसक जाएगी।
साउथ दिल्ली में 28 नवंबर को एक महिला ने अपने 10 साल के बेटे के लापता होने की रिपोर्ट दर्ज करवाई थी। पुलिस ने मामले में काफी जाँच पड़ताल की लेकिन उन्हें कोई सबूत हाथ नहीं लगा। धीरे-धीरे मामला ठंडा पड़ने लगा तभी लगभग एक महीने बाद पुलिस को 24 दिसंबर को जंगल के इलाके में एक बच्चे की लाश मिली शिनाख्त के बाद पता चला यह बच्चा वही है जिसकी तलाश की जा रही थी। बच्चे की लाश बेहद सड़ी गली अवस्था में थी।
पुलिस ने मामले में 22 साल के बिट्टू को गिरफ्तार किया है। पूछताछ में बिट्टू ने बताया कि उसने एक फेमस क्राइम टीवी सीरियल देखकर अपहरण और खौफनाक हत्या की इस वारदात को अंजाम दिया था। पुलिस के मुताबिक आरोपित बच्चे को उसके प्रेम के बीच रोड़ा मानता था। और उसे मारकर वह उसकी माँ के करीब जाना चाहता था।
एफआईआर के मुताबिक महिला का बेटा शिवम 28 नवम्बर को शाम करीब 4:00 बजे घर से बाहर कुछ सामान लेने के लिए निकला था और उसके बाद से ही वह लापता हो गया। बच्चे की माँ ने उसे बहुत ढूँढने की कोशिश की लेकिन जब वह नहीं मिला तो उन्होंने पुलिस थाने में किडनैपिंग की रिपोर्ट दर्ज करवाई।
बता दें, बच्चे के माँ- बाप आपसी मदभेद के चलते साथ नहीं रहते थे और उनका बच्चे की कस्टडी को लेकर कोर्ट में केस भी चल रहा था। बच्चे के गायब होने पर पुलिस को सबसे पहले पिता पर शक हुआ लेकिन तमाम जाँच पड़ताल और इलाके की सीसीटीवी फुटेज खंगालने के बाद पुलिस को कुछ खास सफलता नहीं मिली।
फिर अचानक से एक दिन पुलिस को जंगल के पास के नदी में एक 10 साल के बच्चे की सड़ी हुई लाश मिली। पुलिस ने लाश की तफ्तीश की तो पता चला यह बच्चा वही है जिसकी तलाश की जा रही थी। बच्चे की हालत देख कर माँ बाप के भी होश उड़ गए थे।
जिसके बाद पुलिस ने मामले में फिर से जाँच शुरू की इस दौरान पुलिस को बिट्टू नाम के एक शख्स के बारे में पता चला। जो कि पीड़ित माँ के बचपन का दोस्त था और वह महिला से शादी भी करना चाहता था। लेकिन महिला के परिजनों ने उसकी शादी कहीं और करवा दी थी।
वहीं जब बिट्टू को महिला और उसके पति के बीच की अनबन के बारे में पता चला तो वह वापस से उससे शादी करने का सपना सजाने लगा। बिट्टू धीरे-धीरे बच्चे की माँ के करीब आने लगा और उसने बच्चे से भी दोस्ती कर ली। वह अक्सर बच्चे को अपने साथ घुमाने के लिए ले जाया करता था। लेकिन जब उसने महिला के सामने शादी का प्रस्ताव रखा तो उसने मना कर दिया और उससे दूरी बना ली।
पुलिस को बिट्टू पर शक हुआ और उन्होंने तुरंत उसे गिरफ्त में लेते हुए मामले की पूछताछ की। शुरुआत में बिट्टू ने पुलिस को उलझाने और अपने गुनाहों पर पर्दा डालने की तमाम कोशिश की। फिर सख्ती बरतने पर बिट्टू ने अपना जुर्म कबूल कर लिया।
पूछताछ में बिट्टू ने बताया कि उसने बच्चे की माँ को कुछ दिन पहले शादी का प्रस्ताव दिया था लेकिन बच्चे की माँ ने उसके इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। बच्चे की माँ का कहना था कि अब उसका बेटा 10 साल का है वो अब दूसरी शादी नहीं करेगी। यह बात बिट्टू को नागवार गुजरी और बिट्टू ने 10 साल के मासूम शिवम को रास्ते से हटाने का प्लान बनाया।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, बच्चे को अकेला देख बिट्टू उसे कुछ खिलाने के बहाने अपने साथ ले गया। वह पहले उसे बस स्टैंड ले गया और उसके बाद फतेहपुर बेरी पहुँचा वहाँ उसे जंगलों की तरफ ले गया और मौका देखकर बिट्टू ने गमछे से मासूम शिवम का गला दबाकर हत्या कर दी और उसकी लाश को एक तालाब में फेंक कर फरार हो गया। फिर वापस लौट कर बच्चे को ढूँढने का नाटक किया ताकि कोई शक ना कर सके।
साउथ दिल्ली के डीसीपी अतुल ठाकुर के मुताबिक अपहरण और कत्ल के आरोपी बिट्टू ने लाश को जलाने की भी कोशिश की थी। हत्या के अगले दिन बिट्टू एक बार फिर उसी तालाब पर पहुँचा जहाँ पर उसने शिवम की लाश को ठिकाने लगाया था। लाश तालाब में तैर रही थी बिट्टू ने लाश को बाहर निकाला और पास के पेट्रोल पंप से पेट्रोल लाकर लाश को जलाने की कोशिश की लेकिन कम पेट्रोल और लाश गीली होने की वजह से वह उसे जला नहीं पाया। इसके बाद बिट्टू ने शिवम की लाश को पत्थरों के नीचे छिपा दिया। पुलिस के मुताबिक उसके अगले दिन भी लाश के पास पहुँचा और शिवम के तमाम कपड़े उतार दिए ताकि उसकी पहचान ना हो सके।