Sunday, February 28, 2021
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सुशांत ‘चरित्रहीन’, मीडिया ‘हरामखोर’… बिल में है कंगना, गुप्तेश्वर को ‘गुप्तरोग’: शिवसेना ने सामना से दिखाया स्तर

"सुशांत एक चंचल और चरित्रहीन कलाकार थे। अगर हमारी पुलिस को इसकी जाँच करने दी जाती तो शायद सुशांत और उसके परिवार की रोज बेइज्जती होती। इसलिए..."

शिवसेना के मुखपत्र सामना ने आज (अक्टूबर 5, 2020) अपने संपादकीय में सुशांत सिंह राजपूत को असफल और चरित्रहीन कलाकार बताया है। अपने संपादकीय में सामना ने कहा है कि बीते दिनों बिहार के पूर्व डीजीपी गुप्तेश्वर पांडे को महाराष्ट्र द्वेष का गुप्तरोग हो गया था और देश के कई अन्य ‘गुप्तेश्वरों’ को (जो महाराष्ट्र पुलिस या सरकार पर सवाल उठा रहे थे) भी यह रोग हो गया था।

एम्स की रिपोर्ट का हवाला देकर महाराष्ट्र सरकार और पुलिस कार्रवाई की निष्पक्षता पर सवाल उठाने वालों के खिलाफ इस संपादकीय में मानहानि का मामला दर्ज कराने की बात कही गई है। इसमें पूछा गया है कि जिस ‘एम्स’ पर देश के गृह मंत्री को विश्वास है, उस ‘एम्स’ ने सुशांत मामले में जो रिपोर्ट दी है, उसे अंधभक्त नकारेंगे क्या?

लेख में कहा गया कि कलाकार (सुशांत) की मृत्यु को 110 दिन बीत गए हैं और इस दौरान मुंबई पुलिस की खूब बदनामी की गई। इसलिए मुंबई पुलिस की जाँच पर जिन्होंने सवाल उठाए, उन राजनेताओं को और कुत्तों की तरह भौंकने वाले चैनलों को महाराष्ट्र से माफी माँगनी चाहिए। वहीं महाराष्ट्र सरकार उन लोगों के ख़िलाफ़ मानहानि का दावा करे, जिन्होंने उनकी छवि पर कलंक लगाने का प्रयास किया।

सामना में प्रकाशित लेख के मुताबिक सीबीआई जाँच से यह पता चला है कि सुशांत एक चंचल और चरित्रहीन कलाकार थे। इसके अलावा उसमें यह भी लिखा है कि अगर पुलिस को इसकी जाँच करने दी जाती तो शायद सुशांत और उसके परिवार की रोज बेइज्जती होती। इसलिए बिहार राज्य व सुशांत के परिवार को उन लोगों का आभार मानना चाहिए।

सामना का कहना है कि नीतीश कुमार ने इस मुद्दे को उठवाया और पुलिस महानिदेशक गुप्तेश्वर को वर्दी में नचाया। बाद में आखिरकार वह नीतीश कुमार की पार्टी में शामिल हो गए, इससे उनकी वर्दी भी चली गई।

इस लेख में मीडिया वालों के लिए भी अपशब्द का इस्तेमाल हुआ है। लेख में कहा गया, “खुद को पत्रकारिता में हरिश्चंद्र का अवतार समझने वाले हकीकत में हरामखोर और बेईमान निकले। उन बेईमानों के विरोध में मराठी जनता को एक बड़ी भूमिका लेनी चाहिए।”

इस संपादकीय में प्रत्यक्ष रूप से बिहार के पूर्व डीजीपी गुप्तेश्वर पांडे पर निशाना साध कर मुंबई पुलिस का बखान किया गया। इसमें लिखा गया, “मुंबई पुलिस ने जो जाँच की, उस सच को सीबीआई और ‘एम्स’ के डॉक्टर भी नहीं बदल सके। यह मुंबई पुलिस की जीत है। कई गुप्तेश्वर आए और गए। लेकिन मुंबई पुलिस की प्रतिष्ठा का झंडा लहराता रहा।”

इसमें साफ-साफ कहा गया कि अगर मृत्यु के बाद भी मुकदमा दायर करने की कोई कानूनी व्यवस्था होती तो कलाकार पर ड्रग्स मामले में मादक पदार्थ सेवन का मुकदमा चलाया जाता।

इसके बाद कंगना रनौत के पीओके वाले बयान की चर्चा भी इस लेख में है। इसमें पूछा गया:

“सुशांत की मौत को जिन्होंने भुनाया, मुंबई को पाकिस्तान और बाबर की उपमा दी, वह अभिनेत्री अब किस बिल में छिपी है? हाथरस में एक युवती से बलात्कार करके मार डाला गया। वहाँ की पुलिस ने उस युवती के शरीर का अपमान करके अंधेरी रात में ही लाश को जला डाला। इस पर उस अभिनेत्री ने आँखों में ग्लिसरीन डालकर भी दो आँसू नहीं बहाए। जिन्होंने उस लड़की से बलात्कार किया, वे उस अभिनेत्री के भाई-बंधु हैं क्या? जिस पुलिस ने उस लड़की को जलाया, वे पुलिसकर्मी उस अभिनेत्री के घरेलू नौकर हैं क्या?”

लेख के आखिर में महाराष्ट्र व मराठी मानुस के रास्ते में आने वाले इंसान को खुलेआम धमकी दी गई और कहा गया कि जो भी महाराष्ट्र व मराठी मानुस के रास्ते में आएगा, उसका बर्बाद होना तय है। आगे फिर बेईमान और हरामखोर कहकर हाथरस मामले पर चुप रहने वालों से ये कहा गया कि महाराष्ट्र की मर्दानगी की परीक्षा न लें।

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ऑपइंडिया स्टाफ़http://www.opindia.in
कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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