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‘राम मंदिर निर्माण नेहरूवादियों, मार्क्सवादियों, मीडिया, शिक्षाविदों की हार है, जिसने इतिहास, पुरातत्व, भक्ति को नकारने की कोशिश की’

पद्म भूषण सम्मान से सम्मानित अमेरिकी वैदिक शिक्षक डेविड फ्रॉली ने बुधवार (अगस्त 5, 2020) को कहा कि राम मंदिर के निर्माण की शुरुआत एक अरब सपनों का साकार होना है। बता दें कि डेविड फ्रॉली वेद, हिंदुत्व, योग, आयुर्वेद और वैदिक एस्ट्रॉलजी पर कई किताबें लिख चुके हैं।

डेविड फ्रॉली ने टाइम्स नाउ के प्रधान संपादक राहुल शिवशंकर के साथ एक्सक्लुसिव इंटरव्यू में राम मंदिर पर अपने विचार रखते हुए कहा कि भगवान राम की महिमा को पुन: स्थापित किया गया है। उन्होंने आगे कहा कि अयोध्या विवाद संभवतः दुनिया के इतिहास में सबसे अधिक समय तक चलने वाला मुकदमा था।

डेविड फ्रॉली ने राम मंदिर के निर्माण को देश की आजादी के बाद आधुनिक भारत की सबसे महत्वपूर्ण घटना बताते हुए कहा कि रामायण एशिया की सबसे लोकप्रिय कहानियों में से एक है और अब राम मंदिर भारत को उसके वास्तविक भाग्य के प्रति जागृत करेगा। उन्होंने आगे कहा, “हमें ‘अयोध्या के विजय’ को श्री राम की विजय के रूप में स्वीकार करना चाहिए।”

फ्रॉली ने कहा कि अयोध्या भारत के सात पवित्र शहरों में सबसे महत्वपूर्ण है। इसके साथ ही उन्होंने कहा, “हिंदू धर्म एक परंपरा है जो कई प्रकार के आध्यात्मिक मार्ग स्वीकार करता है। यह संकीर्ण विचारधारा वाली परंपरा नहीं है।”

फ्रॉली ने आगे कहा, “हिंदुओं ने अपने मंदिरों के पुन: प्राप्ति के लिए राजनीतिक रूप से कोई स्टैंड नहीं लिया। जब तक हिंदू राजनीतिक रूप से स्टैंड नहीं लेगें, उन्हें अल्पसंख्यक ही माना जाएगा, उन जगहों पर भी, जहाँ पर वो बहुसंख्यक हैं।”

फ्रॉली ने ट्वीट करते हुए लिखा था, “राम मंदिर का निर्माण नेहरूवादियों, मार्क्सवादियों, माओवादियों, चीन समर्थकों, मीडिया और शिक्षाविदों के लिए हार है, जिसने इतिहास, पुरातत्व और भक्ति को नकारने की कोशिश की थी।”

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अयोध्या में बुधवार को राम मंदिर निर्माण के लिए भूमि पूजन किया और मंदिर की आधारशिला रखी। इसके बाद उन्होंने लोगों को संबोधित करते हुए कहा, “यह मेरा सौभाग्य था कि श्री राम जन्म भूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने मुझे मंदिर निर्माण के भूमि पूजन में आमंत्रित किया। आज पूरा देश राममय और हर मन दीपमय है। सदियों का इंतजार समाप्त हुआ।”

पीएम मोदी ने कहा, ”राम हमारे मन में गढ़े हुए हैं, हमारे भीतर घुल-मिल गए हैं। कोई काम करना हो, तो प्रेरणा के लिए हम भगवान राम की ओर ही देखते हैं। भगवान राम की अद्भुत शक्ति देखिए। इमारतें नष्ट कर दी गईं, अस्तित्व मिटाने का प्रयास भी बहुत हुआ, लेकिन राम आज भी हमारे मन में बसे हैं, हमारी संस्कृति का आधार हैं। श्रीराम भारत की मर्यादा हैं, श्रीराम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं।”

मुझे कोई बुलाएगा नहीं और मैं जाऊँगा भी नहीं: अयोध्या में मस्जिद के शिलान्यास पर CM योगी की दो टूक

मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान श्रीराम की जन्म स्थली पर भव्य मंदिर निर्माण के लिए भूमि पूजन कर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश दुनिया के करोड़ों रामभक्तों के सपने को साकार कर दिया। बुधवार को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने विधि विधान के साथ मंदिर की नींव रखी।

इस दौरान पीएम मोदी के साथ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ मौजूद रहे। भूमि पूजन के कार्यक्रम के बाद सभी अथितियों को संबोधित करते सीएम योगी ने कहा कि पाँच सदी के बाद आज 135 करोड़ भारतवासियों का संकल्प पूरा हो रहा है।

राम मंदिर भूमि पूजन से इतर योगी आदित्यनाथ ने न्यूज चैनल आज तक के साथ खास बातचीत में मस्जिद के शिलान्यास पर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने साफ कर दिया कि वो मस्जिद के शिलान्यास कार्यक्रम का हिस्सा नहीं होंगे।

बता दें कि मीडिया चैनल ने सीएम योगी से सवाल किया था, “विरोधी कह रहे हैं कि आपने सभी धर्मों के लोगों को राम मंदिर के भूमि पूजन में बुलाया और सब आए। लेकिन आने वालों दिनों में जब अयोध्या में मस्जिद का निर्माण शुरू होगा, तो कहा जा रहा है कि कि सीएम योगी वहाँ नहीं जाएँगे।”

सीएम योगी आदित्यनाथ ने इसका जवाब देते हुए कहा, “मेरा जो काम है वो काम मैं करूँगा। मैं अपने कार्य को हमेशा कर्तव्य और धर्म मानकर चलता हूँ। मैं जानता हूँ कि मुझे कोई बुलाएगा नहीं इसलिए मैं जाऊँगा भी नहीं।”

उन्होंने भूमि पूजन कार्यक्रम में कई बड़े नेताओं के शामिल नहीं होने पर भी कहा कि हर समुदाय के लोग इस कार्यक्रम में आना चाहते थे, लेकिन कोरोना के कारण कार्यक्रम को सीमित कर दिया गया। उन्होंने कहा कि सिर्फ कॉन्ग्रेस की बात नहीं है, भाजपा के भी कई बड़े नेता कार्यक्रम में शामिल नहीं हो पाए।

इसके साथ ही सीएम योगी आदित्यनाथ ने राम मंदिर को लेकर कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सूझबूझ और प्रयासों के कारण आज संकल्प पूरा हो रहा है। हमने तीन साल पहले अयोध्या में दीपोत्सव का कार्यक्रम शुरू किया था, आज उसकी सिद्धि हो रही है। उन्होंने कहा कि सरकार की ओर से पहले रामायण सर्किट का काम शुरू किया गया, साथ ही अयोध्या में विकास कार्य हो रहा है।

सीएम ने कहा कि योगी आदित्यनाथ ने कहा कि पीएम नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत के लोकतांत्रिक मूल्यों और उसकी न्यायपालिका की शक्ति ने दुनिया को दिखा दिया है कि शांति से लोकतांत्रिक और संवैधानिक रूप से सुलझाए जाने वाले मामले कैसे हो सकते हैं।

गौरतलब है कि 9 नवंबर 2019 को उच्चतम न्यायालय ने अयोध्या में पूरी 2.77 एकड़ विवादित भूमि राम लला को दी। इसके साथ ही केन्द्र और उत्तर प्रदेश प्रदेश सरकार को मस्जिद के निर्माण के लिए किसी प्रमुख स्थान पर पाँच एकड़ जमीन दूसरे पक्ष को देने का भी निर्देश दिया।

यूपी सरकार ने 5 फरवरी को ही अयोध्या जिला मुख्यालय से 18 किलोमीटर की दूरी पर ग्राम धन्नीपुर तहसील सोहावल में थाना रौनाही से लगभग 200 मीटर पीछे 5 एकड़ जमीन मस्जिद के लिए आवंटित की थी। यहीं पर मस्जिद का निर्माण होना है। 

भूमि पूजन के बाद ओवैसी का फूटकर बह रहा है दर्द, कहा- ‘ये लोकतंत्र और सेकुलरिज्म की हार है’

भूमि पूजन की तारीख आने के बाद से लगातार देश के लोकतंत्र और सेकुलरिज्म पर सवाल उठाने वाले ओवैसी अब खुल कर जहर उगल रहे हैं। सुबह उन्होंने सबसे पहले यह ट्वीट किया, “बाबरी मस्जिद थी, है और रहेगी। इंशाल्लाह।” इसके बाद भूमि पूजन संपन्न होते ही उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को शपथ का उल्लंघन करने वाला ही करार दे दिया।

उन्होंने कहा, “भारत एक सेकुलर देश है। प्रधानमंत्री ने आज मंदिर का शिलान्यास करके अपनी शपथ का उल्लंघन किया है। ये लोकतंत्र की और सेकुलिज्म की हार है और हिंदुत्व की जीत है।”

ओवैसी ने आगे कहा, “पीएम का इस कार्यक्रम में शामिल होना देश की धर्मनिरपेक्ष नीतियों का उल्लंघन है। आज हिंदुत्व और धर्मनिरपेक्षता के लिए एक सफल दिन है क्योंकि मोदी (एक पीएम के रूप में) इस कार्यक्रम में शामिल हुए। पीएम ने कहा कि आज का कार्यक्रम भारत का प्रतीक है, लेकिन, वह एक देश के पीएम हैं और उन्हें समझने की जरूरत है कि देश का प्रतीक मंदिर या मस्जिद नहीं हो सकता।”

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार ओवैसी ने आगे कहा, “मैं कह रहा हूँ कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रमुख उपस्थिति के कारण हिंदुत्व की सफलता का दिन है। वह वहाँ क्यों है? भागवत ने कहा कि यह नया भारत बनाता है। क्या है नया भारत? नया भारत जहाँ मुस्लिमों के साथ भेदभाव किया जाएगा?”

AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने कहा, ”प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि मैं भावुक हूँ। मैं कहना चाहता हूँ कि मैं भी उतना ही भावुक हूँ क्योंकि मैं सह-अस्तित्व और नागरिकता की समानता में विश्वास करता हूँ। प्रधानमंत्री, मैं भावुक हूँ क्योंकि एक मस्जिद 450 साल से वहाँ खड़ी थी।”

बता दें, ओवैसी इस समय सिर्फ़ प्रधानमंत्री पर अपना गुस्सा नहीं दिखा रहे बल्कि कॉन्ग्रेस से लेकर समाजवादी पार्टी उनके निशाने पर है। प्रधानमंत्री के ख़िलाफ़ बोलने से पहले उन्होंने कॉन्ग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा था, ”कॉन्ग्रेस हमेशा खामोशी से हिंदुत्व की राजनीति करती आई है। कॉन्ग्रेस को खुलकर कह देना चाहिए कि वह हिंदुत्व की विचारधारा को मानती है। कॉन्ग्रेस पहले भी मिली हुई थी। अब उनको यह तय करना है कि वो टीम हिंदुत्व का साथ देंगे या टीम इंडिया का जो धर्मनिरपेक्षता पर विश्वास रखती है।”

इसी प्रकार उन्होंने मुलायम सिंह यादव को भी आड़े हाथों लिया और कहा, “मुलायम सिंह यादव ने भी अपनी सियासी रोटी हमारे खून पर सेकी है। बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद जब दोबारा मुलायम सिंह यादव यूपी के मुख्यमंत्री बने तो वो इस मामले में सोते रहे। उन्होंने केस में कोई नोटिफिकेशन जारी नहीं किया। जिन लोगों को हमने रक्षक समझा, उन्हीं लोगों ने हमें नुकसान पहुँचाया है।”

‘काशी विश्वनाथ और कृष्ण जन्मस्थान मंदिर में जब प्रार्थना करते हैं तो महसूस होता है कि हम आज भी गुलाम हैं’

अयोध्या में भव्य राम मंदिर के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार (अगस्त 5, 2020) को भूमि पूजन के बाद शिलान्यास किया। अब मंदिर निर्माण शुरू हो जाएगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, सीएम योगी आदित्यनाथ, आरएसएस चीफ मोहन भागवत समेत करीब 175 लोग इस ऐतिहासिक लम्हे का गवाह बने। पीएम मोदी ने अभिजीत मुहूर्त में मंदिर का शिलान्यास किया।

लोगों ने इस ऐतिहासिक क्षण को अभूतपूर्ण बताते हुए भावुक नजर आए। लोग इस दिन को दिवाली मानकर एक दूसरे को बधाईयाँ दे रहे हैं। इस बीच कर्नाटक के ग्रामीण विकास एवं पंचायत राज मंत्री केएस ईश्वरप्पा ने काशी विश्वनाथ और मथुरा में कृष्ण जन्मस्थान को लेकर आवाज उठाई है।

केएस ईश्वरप्पा ने ट्वीट करते हुए लिखा, यह एक अच्छा दिन है। राम मंदिर के लिए आधारशिला रखी गई है। अब एक सुंदर मंदिर बनेगा, लेकिन काशी विश्वनाथ और कृष्ण जन्मस्थान मंदिर को मुक्त किया जाना बाकी है।

उन्होंने एक ट्वीट में आगे लिखा, “इन दोनों जगहों पर, जब हम प्रार्थना करते हैं, तो दोनों ओर मस्जिदें होती हैं, जो कहती हैं कि आप अब भी गुलाम हैं। इन मंदिरों को मुक्त करना आवश्यक है।”

गौरतलब है कि भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने बीते दिनों एक इंटरव्यू में कहा था, “हमें तीन मंदिर चाहिए। एक राम मंदिर, दूसरा कृष्ण जन्मस्थान मथुरा का कृष्ण मंदिर और तीसरा काशी विश्वनाथ। काशी विश्वनाथ और कृष्ण मंदिर के तो सबूत भरपूर हैं। ये (राम मंदिर) सबसे मुश्किल था।”

सुब्रह्मण्यम स्वामी ने दोनों जगहों पर जमीन अधिग्रहित करने की केंद्र सरकार से मॉंग की थी। इससे पहले भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधिकारी रहे केके मुहम्मद ने कहा था कि मथुरा-काशी हिंदुओं के लिए मक्का-मदीना जैसा है। साथ ही उन्होंने दूसरे समुदाय से ये दोनों जगह हिंदुओं को सौंप देने की अपील की थी।

पिछले दिनों काशी-मथुरा को लेकर जमीयत-उलेमा-ए-हिंद ने वकील एजाज मकबूल के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दाखिल करके हिंदू पुजारियों की याचिका का विरोध किया था।

जमीयत-उलेमा-ए-हिंद की ओर से दाखिल की गई याचिका में कहा गया था कि हिंदू पुजारियों की याचिका पर नोटिस न जारी किया जाए। उनका कहना था कि मामले में नोटिस जारी करने से समुदाय के लोगों के मन में अपने इबादत स्थलों के संबंध में भय पैदा होगा।

राम मंदिर आंदोलन: हिंदू विरोधी कवरेज पर गुजरातियों ने 4 हफ्ते में बताई थी इंडिया टुडे को औकात, शेखर गुप्ता थे संपादक

साल 1992 में अयोध्या राम मंदिर आंदोलन को कई जगह सेकुलर मीडिया द्वारा शर्मसार करने वाला करार दिया गया। कई समाचार पत्रों ने इसी बिंदु पर बड़े-बड़े लेख छापे। इसी क्रम में इंडिया टुडे के गुजराती संस्करण पर भी इस घटना को प्रकाशित किया गया। इस घटना का जिक्र करते हुए इंडिया टुडे ने इसे राष्ट्र के नाम पर कलंक बताया। जिसके बाद इसकी ऐसी भद्द पिटी कि कुछ ही दिन में इसे बंद होना पड़ा।

इंडिया टुडे के गुजराती संस्करण के साथ जब यह सब हुआ तब उसके संपादक शेखर गुप्ता हुआ करते थे। शायद इसी कारण से आज राम मंदिर के भूमि पूजन के समय वह इस दिन को दोबारा याद कर रहें।

शेखर गुप्ता अपने ट्वीट में लिखते हैं, “हमने साल 1992 के अक्टूबर महीने में गुजराती संस्करण लॉन्च किया था। मात्र 6 हफ्तों के अंदर उस समय इसका प्रसार 75 हजार तक बढ़ गया। लेकिन अयोध्या पर ऐसी हेडलाइन और कवरेज के बाद लोगों ने इसके विरोध में बहुत पत्र भेजे। आने वाले 4 हफ्तों में इसका प्रसार मात्र 25 हजार रह गया। संस्करण समाप्त हो गया जैसा कि हमारे मार्केटिंग हेड को उम्मीद थी।”

शेखर गुप्ता ने यह ट्वीट पत्रकार शीला भट्ट के ट्वीट को रीट्वीट करते हुए किया है। अपने ट्वीट में उन्होंने लिखा, “दिसंबर 1992 में (जब मैं सीनियर एडिटर थी और शेखर गुप्ता एडिटर थे) हमने राष्ट्र नु कलंक नाम से स्टोरी कवर की। मगर, गुजरात का उस समय इतना भगवाकरण हो चुका था कि पाठकों ने इसके ख़िलाफ़ विरोध कर दिया। इसके बाद इसका गुजराती संस्करण बंद करना पड़ा।”

बता दें, शीला भट्ट और शेखर गुप्ता के इन ट्विट्स को देखकर एक यूजर का कहना है कि बिलकुल ऐसा ही हर उस संस्थान के साथ होगा, जो देश विरोधी बात करेगा। आज लोग ज्यादा जागरूक हैं। कॉन्ग्रेस की दुकान बंद हो गई है और बकवास करने वाले कलाकार घर पर बैठे हैं। हिंदू सहिष्णु है और सबको स्वीकारता है लेकिन अब कोई हमें अपने मुताबिक नहीं चला सकता।

इसके अलावा एक यूजर लिखता है कि इस बात से साबित होता है कि हिंदुओं को अब मूर्ख नहीं बनाया जा सकता। हम वहाँ चोट करेंगे जहाँ दर्द सबसे ज्यादा होगा यानी ऐसे प्रकाशनों के राजस्व पर। हम बिलकुल ऐसी पत्रिकाओं को नहीं स्वीकारेंगे जो राष्ट्र के ख़िलाफ़ नैरेटिव बनाएँ।

राम मंदिर भूमि पूजन पर रामभक्तों ने किया अद्भुत कला का प्रदर्शन: देखें सोशल मीडिया पर वायरल हुए पोस्ट

तकरीबन 500 साल के इंतजार के बाद आज (5 अगस्त, 2020) राम मंदिर भूमि पूजन का कार्यक्रम पीएम मोदी के हाथों संपन्न हुआ। कोविड -19 महामारी के कारण राम भक्त लाइव प्रसारण के जरिए इस पावन पल का हिस्सा बने। अयोध्या न पहुँच पाने के बाद इस अवसर पर कुछ कलाकारों ने अनोखे अंदाज में भगवान राम का स्वागत किया। भक्तों ने अद्भुत चित्र, मूर्तियों और बेहतरीन कलाकृतियों को बना कर भगवान श्री राम को समर्पित किया।

यहाँ कुछ कलाकृतियाँ हैं, जो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर भक्तों द्वारा शेयर की गई है।

रेत से कलाकृति बनाने वाले प्रसिद्ध कलाकार सुदर्शन पट्टन ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट्स पर भगवान राम की रेत से बनाई गई मूर्ति की तस्वीरें पोस्ट की।

पीएम मोदी द्वारा भूमि पूजन करने का यह चित्र हार्दिक पंचोली द्वारा बनाया गया है। सोशल मीडिया पर यह तस्वीर इस वक्त लोगों का काफी दिल जीत रहा है।

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जय श्री राम भारत माताकी जय 05-08-2020 ऐतिहासिक दिन बार-बार नहीं आएगा क्योंकि असत्य पर सत्य हमेशा विजय होती है। हमें 500 वर्षों के लंबे समय के बाद हमे यह अवसर मिला है। इस चित्र में प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी साहेब भूमिपूजन कर रहे हैं तब भगवान श्री राम भी अपना हाथ बढ़ाकर उनके कार्य का स्वीकार कर रहे हैं। ऐसा चित्रकार के द्वारा बनाया गया है। कई लोगों की आत्मा इस अवसर की प्रतीक्षा कर रही थीं लेकिन ऐसा सौभाग्य उन्हें नहीं मिला जैसा हमें प्राप्त हुआ है, इसलिए इस अवसर का घरसे हि आनंद लें। यह चित्र वोटरकलर के माध्यम से बनाया गया है। यह पेंटिंग गुजरात के एक चित्रकार हार्दिक पंचोली के द्वारा बनाई गई है। जय श्री राम भारत माताकी जय #narendermodi #pmo #india #Arti #yogiadityanath #bjpgovt #ramnam #bhartiyajantaparty #facebooklive #instagram #ram @narendramodi @myogi_adityanath #ganesh @dr.rutvijpatel #avadhpuri #ramlala #valmiki @ram__mandir__ayodhya_ #Krishna #mahadev #mahakal #kedarnath #somnath @ranchhodraiji.dakor @ram_krishan_hari #rammandir #ayodhya #ram #krishna #bharat #bhudev #bhoomipujan #illustrations #art #instagram #ramjanmbhumi

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बैंगलुरु के जाने-माने माइक्रो स्कल्पचर आर्टिस्ट सचिन सांघे ने पीएम मोदी की अद्भुत चाॉक मूर्ति बनाई। इस मूर्ति में भगवान राम पीएम मोदी को आशीर्वाद देते हुए दिखाई दे रहे हैं।

उन्होंने मूर्तियाँ बनाने की प्रक्रिया का एक छोटा वीडियो भी पोस्ट किया।

रूद्र हनुमान स्केच के लिए हर घर में प्रसिद्ध करण आचार्य इस भूमि पूजन के अवसर पर पिछले कुछ हफ्तों में कई चित्र बनाए हैं। जिसमें पहला रामलला का है।

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Jai Shri Ram

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राम मंदिर भूमि पूजन से एक दिन पहले उन्होंने जो दूसरा चित्र पोस्ट किया वह भगवान राम का है।

बैंगलुरु के रामेश्वरम ने भगवान राम, माता सीता, लक्ष्मण और हनुमान का सुंदर चित्रण किया।

वहीं मंगलुरु के पवन आचार्य ने भगवान राम की राम मंदिर की ओर जाते हुए एक चित्र को पोस्ट किया।

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✨#conceptart: Finally the glorious day after the centuries of struggle. ?Today is the day which was most awaited by most of us in India that is the Bhoomi Pooja in RAM MANDIR AYODHYA . ?Me being an artist would not like to miss a chance to create an artwork on Bhoomi Pooja according to my imagination✨ . . ?I hope you all like my artwork.? . . ✨Literally it will be a emotional moment of all of us when the Bhoomi Pooja of RAM MANDIR ?will be performed. It was a dream of our forefather which now has come true.✨ . . ✨Ram Janmabhoomi Temple is a Hindu temple that is being built at the sacred pilgrimage site of Ram Janmabhoomi? in Ayodhya of Uttar Pradesh, India.?Ram Janmabhoomi is the birthplace of Rama by Hindus. ?The temple construction will be undertaken by Shri Ram Janmabhoomi Teerth Kshetra.?The temple has been designed by the Sompura family of Gujarat.✨ . . ?️JAI SHRI RAM?️ . . All manipulation is done using #photoshop . . . Do like,comment,share &tag your friends. . . For more updates on digital manipulation follow @pawan_acharya_boloor . . . #lordram #ram #hanuman #shreeram #ramayana #hinduism #sitaram #rama #ayodhya #siyaram #lordrama #sita #hindu #bajrangbali #jairam #lordhanuman #bharat #jayshreeram #india #hinduism #jaishreeram #ramnavami #rambhaktahanuman #bhakti #jaishriram #ravan #om_connection #pa1_creations #pawanacharyaboloor

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राम मंदिर के प्रति अपनी खुशी और उत्साह को प्रदर्शित करने के लिए दुनिया भर के कलाकारों द्वारा सैकड़ों चित्र सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर पोस्ट किए गए हैं। बता दें राम जन्मभूमि तीर्थक्षेत्र ट्रस्ट द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, निर्माण कार्य को पूरा करने में लगभग 3.5 साल लगेंगे।

क्यों मिलता है किसी गिलानी को ‘निशान-ए-पाकिस्तान’: कश्मीरियत को ‘पत्थरबाजी’ बनाने का यूँ रचा खेल

स्वतंत्र भारत के इतिहास में जम्मू-कश्मीर सर्वाधिक चर्चित और चिंताजनक अध्याय रहा है। इस चर्चा और चिंता का मूल कारण भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 और धारा 35 ए रहे हैं। स्वतंत्रता के तुरंत बाद जम्मू-कश्मीर के भारतीय संघ में विलय के समय संविधान में कुछ ‘अस्थाई और संक्रमणकालीन प्रावधान’ किए गए थे। इन प्रावधानों को अनुच्छेद 370 और धारा 35 ए के नाम से जाना जाता रहा है।

इन विशेष प्रावधानों के अंतर्गत जम्मू-कश्मीर राज्य को अन्य राज्यों की तुलना में ‘अस्थाई रूप से कुछ अधिक स्वायत्तता’ प्रदान की गई थी। जम्मू-कश्मीर राज्य विदेश, रक्षा और दूरसंचार जैसे तीन विषयों के सन्दर्भ में भारत पर निर्भर होने के अतिरिक्त अपना नीति-नियन्ता स्वयं था। यहाँ तक कि उसका दंड विधान भी भारतीय दंड विधान से पृथक रणवीर पीनल कोड के नाम से जाना जाता था। वहाँ की विधानसभा का कार्यकाल भी अन्य राज्य विधानसभाओं से अलग 6 वर्ष का था।

जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने सबसे पहले और सबसे जोरदार ढंग से जम्मू-कश्मीर को अलग करने वाले इन विशेष प्रावधानों का संसद से लेकर सड़क तक और दिल्ली से लेकर श्रीनगर तक विरोध किया। उन्होंने पंडित नेहरू की तुष्टिकरण की नीति और शेख अब्दुल्ला को शह देने की राजनीति का लगातार विरोध किया।

उन्होंने शेख अब्दुल्ला के नेतृत्व वाली सरकार द्वारा शासन-प्रशासन की विविध योजनाओं, सुविधाओं-संसाधनों के वितरण और सरकारी सेवाओं में भागीदारी में जम्मू सम्भाग की उपेक्षा के खिलाफ आन्दोलनरत प्रेमनाथ डोगरा और प्रजा परिषद् का भी साथ दिया।

जम्मू-कश्मीर राज्य में जहाँ कश्मीर घाटी को वरीयता और बढ़ावा दिया जा रहा था, वहीं, जम्मू और लद्दाख क्षेत्र की घनघोर उपेक्षा की जा रही थी। शेख अब्दुल्ला की इस विभाजनकारी और भेदभावपूर्ण नीति को प्रधानमन्त्री पंडित जवाहरलाल नेहरू का पूर्ण प्रश्रय था।

पंडित नेहरू की यह नीति न सिर्फ जम्मू-कश्मीर के आंतरिक एकीकरण की बाधा थी बल्कि जम्मू-कश्मीर के भारतीय संघ में पूर्ण विलयन में भी सबसे बड़ी अड़चन थी। स्वाधीनता आन्दोलन की पृष्ठभूमि और गाँधी जी के उत्तराधिकारी होने के कारण स्वतन्त्रताप्राप्ति के समय देश का राजनीतिक आकाश कॉन्ग्रेस और नेहरू जी से आच्छादित और आक्रांत था।

स्वाधीनता बेला में विपक्ष नाममात्र का ही था। संसद में उसकी स्थिति नक्कारखाने में तूती की आवाज जैसी ही थी। लेकिन डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने इस सबकी परवाह न करते हुए भारत की एकता, अखंडता और संप्रभुता  की लड़ाई लड़ी। जम्मू-कश्मीर के भारत में पूर्ण-विलयन और राष्ट्रीय एकीकरण को सुनिश्चित करने के लिए दिया गया उनका नारा, “एक देश में दो विधान,दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे!” बहुचर्चित रहा है।

ऐतिहासिक तथ्य है कि भारत के एकीकरण और जम्मू-कश्मीर राज्य के भारत में पूर्ण-विलयन की लड़ाई लड़ते हुए ही 23 जून, 1953 को श्रीनगर के निकट निशात बाग़ में नज़रबंदी के दौरान उनकी रहस्यमयी परिस्थितियों में असामयिक मृत्यु हुई।

डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी के बलिदान-दिवस से लेकर 5 अगस्त, 2019 तक “जहाँ हुए बलिदान मुखर्जी, वह कश्मीर हमारा है!” और “ कश्मीर हो या गोहाटी, अपना देश अपनी माटी” जैसे नारों ने भारत के राष्ट्रवादी नौजवानों को लगातार आंदोलित किया है।

डॉ. मुखर्जी के बलिदान के बाद से अनुच्छेद 370 और धारा 35 ए को हटाने का मुद्दा लगातार जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण विचारधारात्मक और भावनात्मक मुद्दा रहा है। जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी के अधिवेशन और चुनावी घोषणा-पत्र इसकी पुष्टि करते हैं।

इसी वैचारिक प्रतिबद्धता के परिणामस्वरूप 5 अगस्त, 2019 को भारतीय जनता पार्टी की नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली प्रचंड बहुमत की केंद्र सरकार ने इन दोनों “अस्थाई और संक्रमणकालीन” प्रावधानों को हटाकर जम्मू-कश्मीर का भारतीय संघ में पूर्ण विलय कर दिया।

जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम-2019 को संसद के दोनों सदनों में पारित करते हुए जम्मू-कश्मीर राज्य के दो केंद्रशासित प्रदेश- जम्मू-कश्मीर और लद्दाख बना दिए गए। लद्दाख को पृथक केन्द्रशासित प्रदेश बनाने की मूल वजह वहाँ के निवासियों द्वारा लगातार की जा रही माँग थी।

इस माँग का आधार जम्मू-कश्मीर राज्य के शासन-प्रशासन द्वारा लम्बे समय तक लद्दाखवासियों के साथ किया गया भेदभाव और उपेक्षा थी। हालाँकि, आजादी से लेकर जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन तक इस भेदभाव और उपेक्षा के शिकार जम्मू संभाग के लोग भी रहे हैं।

कश्मीर के लोग ‘शासक भाव’ और श्रेष्ठता ग्रंथि के शिकार रहे हैं। उनमें जम्मू और लद्दाखवासियों के प्रति उनके दिलोदिमाग में हीनता और हिकारत का स्थाई भाव रहा है। परन्तु अब नई बनती हुई व्यवस्था में उनके साथ भी भेदभाव की समाप्ति और न्याय की शुरुआत हो चुकी है।

अमीर खुसरो ने ‘गर फिरदौस बर-रूए-ज़मीन अस्त! हमीं अस्त! हमीं अस्तो! हमीं अस्त!’ कहकर जम्मू-कश्मीर प्रदेश के प्राकृतिक सौन्दर्य और सांस्कृतिक समृद्धि की ओर संकेत किया था। कश्मीर भारत की समृद्ध ज्ञान-परम्परा की आदिभूमि और भामह, मम्मट, रुद्रट, कुंतक, वामन, भट्टनायक, क्षेमेन्द्र आनंदवर्धन, अभिनवगुप्त, चरक, कल्हण, विष्णु शर्मा, कालिदास और लालेश्वरी जैसे प्रख्यात और प्रकांड विद्वानों की कर्मभूमि रही है।

ज्ञान-विज्ञान और दर्शन की अनुसन्धान भूमि और भारत माता का सिरमौर कश्मीर कालांतर में राजनीतिक दुर्घटना का शिकार हो गया। निहित स्वार्थ के वशीभूत स्थानीय नेताओं और पड़ोसी पाकिस्तान ने अलगाववाद और आतंकवाद को हवा दी। कश्मीरी नौजवानों को जन्नत के सब्जबाग दिखाकर दिग्भ्रमित कर दिया गया और उनमें से कुछ के हाथ में कलम और किताब की जगह गोला-बारूद और बन्दूक पकड़ा दी।

‘पत्थरबाजी’ को ही उनका भविष्य बना डाला गया। धरना-प्रदर्शन, बंद और तोड़-फोड़, दंगा-फ़साद और खून-ख़राबे का यह प्रायोजित खूनी खेल कई दशक तक जम्मू-कश्मीर में चलता रहा। मुट्ठीभर लोगों ने कश्मीर और कश्मीरियत को ‘हाइजैक’ कर लिया। इनके द्वारा गढ़ी गई कश्मीर की परिभाषा और इनके ही द्वारा अन्तरराष्ट्रीय मंचों पर दिया गया उसका परिचय उसके अतीत से मेल नहीं खाता।

इसमें बाजारू और बिकाऊ मीडिया खासकर अन्तरराष्ट्रीय मीडिया की भी बड़ी नकारात्मक भूमिका रही। उसने खबरों को मसालेदार बनाकर बेचा। यहाँ तक कि ‘कश्मीर की आजादी’ तक की बात की जाने लगी। आज़ाद कश्मीर का नारा पड़ोसी पाकिस्तान के उकसावे और हुर्रियत कॉन्फ्रेंस जैसे अलगाववादी संगठन के अतिमहत्वाकांक्षी सरगनाओं की सत्ता-लालसा से पैदा हुआ विषवृक्ष था।

निःसंदेह, पाकिस्तान पोषित इस विषवृक्ष का बीज “अनुच्छेद 370 और धारा 35 ए का अस्थाई और संक्रमणकालीन” प्रावधान ही था। 5अगस्त, 2019 को इस विषवृक्ष को समूल नष्ट कर दिया गया। भारत की प्रचंड बहुमत और उससे भी प्रचंड संकल्प वाली केंद्र सरकार ने ऐतिहासिक निर्णय लेते हुए इन दोनों अस्थाई प्रावधानों को निष्प्रभावी करके उपरोक्त विध्वंसक मानसिकता और राष्ट्रद्रोही कारस्तानियों का स्थायी बंदोबस्त कर दिया।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने यह निर्णय लेकर भारतीय संघ की शक्ति और संकल्प का ऐतिहासिक उद्घोष किया। गृहमंत्री अमित शाह ने दूरदर्शिता का परिचय देते हुए ऐसे सभी अलगाववादी तत्वों और निर्दोष कश्मीरी नागरिकों को पत्थरबाजी, तोड़-फोड़ और हिंसा के लिए भड़का सकने वाले राजनेताओं को एहतियातन गिरफ़्तार या नज़रबंद करवा दिया।

ऐसे नेताओं में पीडीपी की अध्यक्षा और पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती, नेशनल कॉन्फ्रेस के अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री फारूख अब्दुल्ला और उमर अब्दुल्ला, कॉन्ग्रेस के नेता सैफुद्दीन सोज, जम्मू-कश्मीर पीपुल्स कॉन्फ्रेंस के नेता सज्जाद लोन के अलावा अलगाववादी संगठन हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के अनेक धड़ों के नेता शामिल थे। निश्चय ही अपनी नज़रबंदी के दौरान इन नेताओं ने डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की नज़रबंदी और बलिदान को याद करते हुए पश्चाताप किया होगा।

पाकिस्तानी सेना और आईएसआई की ओर से जम्मू-कश्मीर में छद्म-युद्ध (प्रॉक्सी-वॉर) लड़ रहे आतंकवादी संगठनों ने यह सुनिश्चित किया था कि कोई भी राष्ट्रवादी या भारतीयतावादी पत्रकार कश्मीर घाटी में न टिक पाए ताकि उनके द्वारा ‘मैन्युफैक्चर्ड एंड मैन्युपुलेटेड’ ख़बरें ही प्रचारित और प्रसारित हों।

इन प्रायोजित पत्रकारों और उनकी झूठी-सच्ची ख़बरों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत विरोधी नैरेटिव गढ़ा। पिछले दिनों भारत विरोधी प्रायोजित खबरें लिखने वाले तथाकथित पत्रकारों की भी खबर ली गई है। हाल ही में जम्मू-कश्मीर में लागू की गई मीडिया नीति और आचार-संहिता ने पत्रकारिता और पत्रकारों को अधिक जिम्मेदार और जवाबदेह बनाया है।

अब मनगढ़ंत, भड़काऊ और भारतविरोधी ख़बरों के प्रचार-प्रसार को आपराधिक कृत्य माना जाएगा। लोगों को उकसाकर उपद्रव करवाने वाले स्वयंभू नेताओं की नज़रबंदी के अलावा अस्थाई रूप से इन्टरनेट पर भी रोक लगाई गई, ताकि सोशल मीडिया (व्हाट्सएप्प, फेसबुक, इन्स्टाग्राम, ट्विटर आदि) के माध्यम से अफवाहें और प्रायोजित खबरें फैलाकर शांति और सौहार्द को बिगाड़ने की नापाक कोशिश न की जा सके।

अनुभवी और सक्षम कमांडरों के नेतृत्व में सभी संवेदशील स्थानों पर सुरक्षा बलों की पर्याप्त और मुस्तैद उपस्थिति भी सुनिश्चित की गई। इन सब सचेत उपायों से लगभग स्थाई बन चुके अनुच्छेद 370 और धारा 35 ए की विदाई संभव हुई।

ये प्रावधान अस्थाई और संक्रमणकालीन होते हुए भी राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव के कारण इतने स्थाई बन चुके थे कि माननीय उच्चतम न्यायालय तक को 2018 में यह कहना पड़ा था कि “अस्थाई प्रावधान अनुच्छेद 370 ने बहुत लम्बे समय (लगभग 75 साल) से होने के कारण इतना स्थायित्व प्राप्त कर लिया है कि अब इसकी समाप्ति असम्भव-सी है।” बहरहाल, भारत सरकार ने इस असंभव को सम्भव करते हुए जम्मू-कश्मीर और भारत की जनभावना का सम्मान किया।

पिछला एक साल जम्मू-कश्मीर के लिए निर्णायक रहा है। अब यहाँ जमीनी बदलाव की आधारभूमि तैयार हो चुकी है। पिछले एक साल में आतंकवादी और हिंसक घटनाओं में उल्लेखनीय कमी हुई है। हालाँकि, आतंकवादी संगठन और उनके आका पुरजोर कोशिश कर रहे हैं कि हिंसा और दहशतगर्दी करके माहौल को बिगाड़ा जा सके और अन्तरराष्ट्रीय मंचों पर यह प्रचारित किया जा सके कि अनुच्छेद 370 और धारा 35 ए को निष्प्रभावी किए जाने से जम्मू-कश्मीर के बाशिंदे परेशान हैं और प्रतिक्रियास्वरूप इस प्रकार की वारदातों को अंजाम दे रहे हैं।

हालाँकि, सुरक्षा-बलों और पुलिस की मुस्तैदी की वजह से उनके मंसूबे पूरे नहीं हो पा रहे हैं। पिछले एक साल में मिली नाकमयाबी की वजह से तमाम आतंकवादी संगठनों और उनके आकाओं में हताशा है। ऐसा लगता है कि वे अपने अस्तित्व की निर्णायक और अंतिम लड़ाई लड़ रहे हैं।

इन आतंकवादी संगठनों और हुर्रियत कॉन्फ्रेंस जैसे अलगाववादी संगठनों की बाहरी और अवैध फंडिंग को भी बहुत हद तक नियंत्रित किया जा चुका है। मुफ्तखोरी के आदी ये अलगाववादी नेता और आतंकवादी संगठन फंडिंग न हो पाने से अब ‘जल बिनु मछली’ की तरह तड़प रहे हैं।

उल्लेखनीय है कि कश्मीर की आज़ादी का राग अलापने वाले इन तथाकथित नेताओं की फाइव स्टार जीवन-शैली, विदेशी सैर-सपाटे और बीवी-बच्चों का विदेश प्रवास और शिक्षा-दीक्षा, सब हवाला फंडिंग का प्रतिफल था। अब उन्हें आटे -दाल का सही भाव पता चलने लगा है।

पाकिस्तान पोषित इन राष्ट्र-द्रोहियों को इनके “सेवाकार्यों” के लिए पैसे और अन्यान्य प्रलोभनों के अलावा तरह-तरह के पुरस्कार भी दिए जाते रहे हैं। हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के पूर्व-अध्यक्ष सैय्यद अली शाह गिलानी को पिछले दिनों दिया गया ‘निशान-ए-पाकिस्तान’ इसका उदाहरण है। अब आतंकवाद और अलगाववाद की दुकानों का क्रमिक ‘लॉकडाउन’ हो रहा है।

सैन्य बल जहाँ आतंकवादियों की अच्छी आवभगत कर रहे हैं, वहीं, पुलिस-प्रशासन द्वारा तथाकथित पत्रकारों,बुद्धिजीवियों, स्वयंसेवी संगठनों के झोलाछापों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की भारत विरोधी गतिविधियों और आय के अवैध श्रोतों पर शिकंजा कसा जा रहा है। इन राष्ट्रद्रोही ‘लाउडस्पीकरों’ की बिजली कट जाने से वातावरण में लम्बे समय से व्याप्त नकारात्मकता, निराशा और नफ़रत की धुंध छँट रही है।

शेख अब्दुल्ला और मुफ़्ती मोहम्मद सईद खानदान की वंशवादी राजनीति से भी जम्मू-कश्मीर का आम नागरिक त्रस्त रहा है। आजकल दोनों ही खानदानों की तीसरी पीढ़ी (शेख अब्दुल्ला के पौत्र उमर अब्दुल्ला और मुफ़्ती मोहम्मद सईद की नातिन इल्तिजा मुफ़्ती) राजनीति कर रही है।

विकल्पहीनता के कारण यहाँ विकास और बदलाव के स्थान पर खाने-पीने की राजनीति का बोलबाला रहा है। अभी तक केंद्र सरकार से मिलने वाली आर्थिक मदद का कोई लेखा-जोखा (ऑडिट) नहीं होता था। इसलिए पैसा जनकल्याण और आधारभूत ढाँचे के निर्माण में लगने के स्थान पर सीधे मुट्ठीभर लोगों की जेब में चला जाता था।

इसका एक प्रमाण यह है कि केन्द्रशासित प्रदेश बनने के कारण ऑडिट के दायरे में आते ही पिछले एक साल में अनेक सरकारी कार्यालयों में आगजनी हुई और ‘दुर्घटनावश’ अनेक फाइलें जलकर राख हो गईं। ज़मीनी विकास न होने से स्थानीय निवासियों में और ज्यादा असंतोष और अलगाव बढ़ता था।

अब राज्य-स्तरीय कराधान से अर्जित और केंद्र से प्राप्त धनराशि विकास-योजनाओं, आधारभूत ढाँचे के निर्माण और बदलाव-कार्यों में लगने से नई संभावनाओं का सूर्योदय हो रहा है। भ्रष्टाचार और अव्यवस्था काफी हद तक कम हुई है। शासन-प्रशासन में संवेदनशीलता, जवाबदेही और पारदर्शिता बढ़ी है। इसी का परिणाम है कि नागरिकों में सरकार और सरकारी-तंत्र के प्रति विश्वास-बहाली हो रही है।

31 मार्च, 2020 को केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन (राज्य विधि का अनुकूलन) आदेश-2020 अधिसूचित किया था। इस आदेश के तहत राज्य में पूर्व-प्रचलित 129 कानूनों में आंशिक संशोधन किया है और 29 कानूनों को पूर्ण रूपेण निरस्त किया गया है।

इसी आदेश में जम्मू-कश्मीर प्रशासनिक सेवा (विकेंद्रीकरण और भर्ती) अधिनियम-2010 के खंड 2 में आंशिक बदलाव करते “स्थाई निवासी” शब्द के स्थान पर “अधिवासी” शब्द जोड़ा गया है। इसी संशोधित अधिनियम के खंड 3 ए के अंतर्गत “अधिवासी” शब्द का स्पष्टीकरण करते हुए उसे परिभाषित किया गया है।

इस परिभाषा के अनुसार कम-से-कम 15 वर्ष या उससे अधिक समय तक जम्मू-कश्मीर केंद्रशासित  प्रदेश में रहने वाले व्यक्ति “अधिवासी” माने जाएँगे। इसके अलावा केन्द्रशासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर के शिक्षण-संस्थानों से अपनी 10 वीं/12 वीं की पढ़ाई को मिलाकर कम-से-कम 7 वर्ष तक शिक्षा प्राप्त करने वाले छात्र-छात्राएं भी अधिवासी माने जाएँगे।

कम-से-कम 10 वर्ष तक जम्मू-कश्मीर में सेवा देने वाले केन्द्रीय सेवाओं, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों/अन्य उपक्रमों, केन्द्रीय विश्वविद्यालयों और अन्य केन्द्रीय स्वायत्तशासी निकायों आदि के कर्मचारी/अधिकारी और उनके बच्चे भी अधिवासी माने जाएँगे। इसके साथ ही,जम्मू-कश्मीर के राहत एवं पुनर्वास आयुक्त कार्यालय में पंजीकृत विस्थापित भी अधिवासी माने जाएँगे।

संभवतः, वर्षों से चले आ रहे राजनीतिक प्रोपेगेंडा और  स्थायीभाव बन चुके तुष्टिकरण के दबाव  में ही केंद्र सरकार ने अधिवासन की पात्रता के इतने कठिन नियम बनाए हैं अन्यथा उसे अन्य राज्यों जैसे ही अधिवासन के सरल नियम बनाकर जम्मू-कश्मीर के विलयन की प्रक्रिया पर पूर्ण-विराम लगाना चाहिए था।

संभवतः सामान्य भारतीय नागरिकों के लिए 8 वर्ष की निवास-अवधि के बाद, जम्मू-कश्मीर में कार्यरत केन्द्रीय कर्मियों और उनके बच्चों को 5 वर्ष की निवास-अवधि के बाद अधिवास प्रमाण-पत्र निर्गत करने की नीति अधिक न्यायपूर्ण, तार्किक और समावेशी होती।

इस अधिवासन नीति में कम-से-कम कश्मीर घाटी की जनसांख्यिकी को बदलने की दिशा में भी साहसिक निर्णय लेने की आवश्यकता थी। यह कश्मीर घाटी की जनसांख्यिकी ही थी जिसने 19 जनवरी, 1990 की बर्फ़ीली रात में 3 हजार से अधिक निर्दोष कश्मीरी पंडितों का कत्लेआम किया और 3 लाख से अधिक को घर-द्वार और जड़-जमीन से बेदख़ल और विस्थापित किया।

कश्मीर घाटी में न सिर्फ कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास की कोई ज़मीनी योजना बनाई जानी चाहिए बल्कि जम्मू-कश्मीर में एक दिन भी सेवा करने वाले भारतीय सेना और अर्ध सैन्य बलों के सेवानिवृत्त अधिकारियों और सैनिकों को कश्मीर घाटी में बसने पर तत्काल अधिवासन अधिकार दिए जाएँ ताकि आतंकवाद और आतंकी मानसिकता की जनसांख्यिकी को संतुलित किया जा सके।

नई अधिवास नीति के लागू हो जाने के बाद जम्मू-कश्मीर में पूँजी निवेश की अपार संभावनाएँ हैं। जिस प्रकार सन 1991 के बजट के बाद भारतीय अर्थ-व्यवस्था में क्रांतिकारी परिवर्तन हुए थे, ठीक उसी प्रकार के परिवर्तन के मुहाने पर अभी जम्मू-कश्मीर है। पूँजी-निवेश और आर्थिक-पुनर्नियोजन के लिए उसके द्वार खुल चुके हैं।

यह सचमुच एक ऐतिहासिक परिघटना है। पर्यटन, सीमेंट, बिजली, औषधिक सम्पदा, ऊनी वस्त्र, चावल, केसर, फल, मेवा, शहद और दुग्ध-उत्पाद आदि से सम्बंधित यहाँ के उधोग-धंधे और व्यापार आवश्यक पूँजी-निवेश और नयी श्रम-शक्ति, कौशल और प्रतिभा से कई गुना विकसित होने की संभावना है। अगर ये उद्योग-धंधे और व्यापार अपनी पूर्ण-क्षमतानुसार विकसित होते हैं तो इससे स्थानीय युवाओं को रोजगार के अधिकाधिक अवसर मिलेंगे।

एक बार फिर उनके हाथ में पत्थर और बंदूक की जगह कलम-किताब और इलेक्ट्रॉनिक गजट होंगे। लगभग 6 महीने से 2G इन्टरनेट की सुविधा बहाल हो गई है। जल्दी ही 4G इन्टरनेट शुरू होने की भी प्रबल संभावना है। जम्मू-कश्मीर ज्ञान-विज्ञान की उर्वर भूमि रही है। शांति-बहाली होते ही यहाँ अंतरराष्ट्रीय स्तर के शिक्षण-संस्थान खुलने लगेंगे।

यहाँ वैष्णो देवी और अमरनाथ धाम जैसे अनेक सर्वमान्य तीर्थस्थल हैं। यहाँ का वातावरण प्रदुषण-मुक्त है और श्रेष्ठतम शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य के अनुकूल हैय़ इसलिए यहाँ प्राकृतिक, धार्मिक, शैक्षणिक और स्वास्थ्य पर्यटन के विकास की अपरिमित संभावनाएँ हैं।

उल्लेखनीय है कि अभी तक जम्मू संभाग के लोक-कलाओं और पर्यटन-स्थलों के विकास एवं प्रचार-प्रसार के प्रति भी सायास उदासीनता बरती गई है। अब इन संभावनाओं का सुनियोजित विकास और सतत दोहन करने की आवश्यकता है। जम्मू-कश्मीर के नौजवानों को देश की मुख्यधारा में शामिल करके और विकास-योजनाओं में उनकी भागीदारी सुनिश्चित करके ही पाकिस्तान पोषित आतंकवाद को मात दी जा सकती है।

अनुच्छेद 370 और धारा 35ए की समाप्ति करके भारत ने अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में अपनी सामर्थ्य और स्वीकार्यता का भी परचम फहराया है। पिछले एक साल में बार-बार इस मुद्दे को तमाम अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाने की कोशिशों के बावजूद पाकिस्तान को  सफलता नहीं मिली है।

संयुक्त राष्ट्र संघ से लेकर मुस्लिम राष्ट्रों के मंच तक पर उसे मुँह की खानी पड़ी है। विश्व के सर्वाधिक सशक्त लोकतंत्र अमेरिका से लेकर यूरोप के अनेक लोकतान्त्रिक राष्ट्रों ने भारत के पक्ष का समर्थन किया है। इससे पाकिस्तान की खिसियाहट और बढ़ गयी है।

जम्मू-कश्मीर के पूर्ण-विलय के बाद पाक अधिकृत जम्मू-कश्मीर (POJK) पर भी भारत की दावेदारी बढ़ गई है। गिलगिट, बाल्टिस्तान आदि क्षेत्रों में नागरिक आन्दोलन चल रहे हैं। वहाँ के निवासी पाकिस्तानी जुल्मोसितम के ख़िलाफ़ अपनी आवाज़ बुलंद कर रहे हैं और सशक्त और संकल्पशील भारत की ओर आशाभरी नज़र से देख रहे हैं।

जम्मू-कश्मीर की राज्य विधान-सभा में क्षेत्रीय असंतुलन रहा है। इसलिए चुनाव आयोग विधान-सभा चुनाव कराने  से पहले वहाँ विधान-सभा क्षेत्रों का परिसीमन करा रहा है। यह परिसीमन कार्य इस वर्ष के अंत तक होने की सम्भावना है। परिसीमन प्रक्रिया के पूर्ण हो जाने के बाद लोकतान्त्रिक व्यवस्था और विकास-प्रक्रिया में सभी क्षेत्रों और समुदायों का समुचित प्रतिनिधित्व और भागीदारी सुनिश्चित हो सकेगी।

शासन-प्रशासन की कश्मीर केन्द्रित नीति भी संतुलित हो सकेगी और अन्य क्षेत्रों के साथ होने वाले भेदभाव और उपेक्षा की भी समाप्ति हो जाएगी। लोकतान्त्रिक प्रक्रिया में सभी नागरिकों की विश्वासबहाली और भागीदारी सुनिश्चित करना किसी भी राज्य का सर्वप्रमुख कर्तव्य है और यही उसकी सबसे बड़ी चुनौती भी है। आज केंद्र-शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर इस कर्तव्य को पूरा करने की चुनौती स्वीकार करने की दिशा में अग्रसर है।

सुशांत की बहन ने PM मोदी को दिया धन्यवाद, CBI जाँच को बताया- ‘राखी गिफ्ट’

फिल्म अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या मामले की जाँच अब सीबीआई करेगी। बहन श्वेता सिंह कीर्ति खुश हैं कि अब उनके भाई को न्याय मिलेगाl साथ ही उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आभार भी व्यक्त किया हैl 

इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (अगस्त 5, 2020) को कहा कि सुशांत सिंह राजपूत की मौत के पीछे की सच्चाई सामने आनी चाहिए। न्यायमूर्ति हृषिकेश रॉय की पीठ ने महाराष्ट्र, बिहार और सुशांत सिंह राजपूत के पिता कृष्ण किशोर सिंह को बॉलीवुड अभिनेत्री रिया चक्रवर्ती की याचिका पर तीन दिनों के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।

बता दें कि रिया चक्रवर्ती पर सुशांत सिंह राजपूत को आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप है। उनके खिलाफ सुशांत के पिता ने पटना में एफआईआर दर्ज करवाया है। रिया ने कोर्ट में याचिका डालकर के मामले को पटना से मुंबई शिफ्ट करने की माँग कर रही है।

सुशांत मौत मामले की जाँच सीबीआई को सौंपे जाने पर उनकी बहन श्वेता सिंह कीर्ति ने प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने इसके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को धन्यवाद दिया है।

इसके साथ ही उन्होंने इंस्टाग्राम पर एक तस्वीर शेयर की है, जिस पर लिखा हुआ है- ‘BREAKING… सुशांत सिंह केस- केंद्र सरकार ने बिहार सरकार की CBI जाँच की सिफारिश स्वीकार की।’ इस पोस्ट में उन्होंने ‘रक्षाबंधन गिफ्ट’ का हैशटैग भी इस्तेमाल किया है। सुशांत की एक्स गर्लफ्रेंड और अभिनेत्री अंकिता लोखंडे ने भी इस बड़ी खबर को अपने इंस्टाग्राम पर शेयर किया।

बता दें कि सुप्रीम कोर्ट में केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पुष्टि की कि सीबीआई ने बिहार सरकार के अनुरोध को स्वीकार कर लिया है। सुशांत के परिवार के वकील ने मुंबई पुलिस पर इस मामले में सबूत नष्ट करने का आरोप लगाया और मामले में किसी और तरह की देरी न हो, इसके लिए अपील की। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने बिहार IPS अधिकारी की जाँच को रोकने का भी सवाल उठाया, जिन्हें जाँच का नेतृत्व करने के लिए बुलाया गया था।

इससे पहले श्वेता सिंह कीर्ति ने एक ट्वीट करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से इस मामले में न्याय की गुहार लगाई थी। इसके अलावा उन्होंने प्रधानमंत्री के नाम एक ओपन लेटर भी लिखा था।

गौरतलब है कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के आदेश पर राजीव नगर थाना कांड संख्या 241/ 20 की सीबीआई जाँच की सिफारिश मंगलवार (अगस्त, 04, 2020) को केन्द्र सरकार को भेज दी गई थी। इससे पहले राज्य पुलिस मुख्यालय ने इसका प्रस्ताव तैयार किया। जल्द ही सीबीआई इस मामले में नई एफआईआर दर्ज कर पड़ताल शुरू कर सकती है।

अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले में हर दिन नए खुलासे सामने आए हैं। इसमें उनकी गर्लफ्रेंड रिया चक्रवर्ती के साथ उनके संबंधों से लेकर उनके मानसिक स्वास्थ्य, बैंक अकाउंट से लेकर उनकी मैनेजर रही दिशा सालियान की मौत से जुड़े कई सवाल सामने आए हैं।

क्या कारसेवकों द्वारा बाबरी मस्जिद के विध्वंस में नरसिम्हा राव की मिलीभगत थी? उनके निजी डॉक्टर ने बताया- क्या है सच

जब राम जन्मभूमि आंदोलन का इतिहास लिखा जाएगा, तो एक इंसान की भूमिका हमेशा एक पहेली बनी रहेगी। हम बात कर रहे हैं पीवी नरसिम्हा राव की। पीवी नरसिम्हा राव को परिस्थिति की माँग के मुताबिक चीजों को लागू करने के लिए जाना जाता है।

पीवी नरसिम्हा राव को भारत में आर्थिक सुधार के युग की शुरुआत के लिए भी जाना जाता है। हालाँकि, 6 दिस्बर 1992 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव राम जन्मभूमि पर कारसेवकों द्वारा बाबरी मस्जिद को गिराते हुए चुपचाप देखते रहे।

इस बात को लेकर कॉन्ग्रेस पार्टी के भीतर उनके आलोचकों ने आरोप लगाया कि उन्होंने बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में आरोपित प्रमुख षड्यंत्रकारियों के साथ हाथ मिलाया था। यह आरोप लगाया जाता है कि वो पूरे घटनाक्रम से वाकिफ थे, उन्हें पता था कि क्या होने वाला है, इसके बावजूद उन्होंने चुप्पी साधे रखी और चीजों को होने दिया।

यह सच है कि जीवन के आखिरी चरण और उनके मरने के बाद भी पीवी नरसिम्हा राव को अपनी पार्टी से ज्यादा विपक्षी पार्टी के राजनेताओं का समर्थन मिला। राम मंदिर भूमि पूजन के साथ हमें बाबरी मस्जिद के विनाश के घातक दिन पर उनके कार्यों का मूल्यांकन करना चाहिए।

बता दें कि जिन दिनों विध्वंस होने वाला था, उन दिनों उन्होंने राज्य में भाजपा सरकार को खारिज करने पर विचार किया था। अपनी पुस्तक ‘अयोध्या: 6 दिसंबर 1992’ में नरसिम्हा राव का कहना है कि राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति हाथ से बाहर निकलने पर हस्तक्षेप के लिए केंद्र सरकार को सूचित करना राज्यपाल का विशेषाधिकार है।

इसके साथ नरसिम्हा राव ने लिखा कि हाल ही में अंतिम विध्वंस से पाँच दिन पहले, तब उत्तर प्रदेश के राज्यपाल सत्यनारायण रेड्डी ने केंद्र से सामान्य कानून और व्यवस्था की स्थिति के लिए संवाद किया था। इस दौरान चीजों के सांप्रदायिक पहलू पर विशेष तौर से बात की गई। यह वास्तव में संतोषजनक था। राज्यपाल की रिपोर्ट में कहा गया कि यद्यपि कारसेवक अयोध्या में बड़ी संख्या में एकत्रित हो रहे थे, मगर वे शांतिपूर्वक थे।

रिपोर्ट में कहा गया था, “ऐसी खबरें हैं कि बड़ी संख्या में कारसेवक अयोध्या पहुँच रहे हैं, लेकिन वे शांतिपूर्ण हैं। मेरी राय में, इस समय यूपी सरकार की बर्खास्तगी या राज्य विधानसभा को भंग करने या राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने जैसे कठोर कदम उठाने का समय नहीं है।”

नरसिम्हा राव ने अप्रत्यक्ष रूप से सुप्रीम कोर्ट पर कुछ दोषारोपण करते हुए कहा था, “अयोध्या में विवादित ढाँचे को पर्याप्त सुरक्षा देने के सीमित और विशिष्ट उद्देश्य के लिए केंद्र सरकार को रिसीवर बनाने के लिए सुप्रीम कोर्ट का इनकार भी एक सार्थक संकेत है।”

नरसिम्हा राव ने राजीव गाँधी पर भी उँगली उठाई। उन्होंने कहा, “अयोध्या के विकास के लिए इंदिरा गाँधी की कई योजनाएँ थीं। इस भावनात्मक मुद्दे की राजनीतिक तनाव का असर इंदिरा गाँधी पर नहीं पड़ी। मगर उनकी मृत्यु के बाद, उनके बेटे ने प्रधानमंत्री का पदभार संभाला और तब से, विनाशकारी चरणों की एक शृंखला शुरू हुई।”

इस तरह, राव के अनुसार, वह संवैधानिक मानदंडों और ऐतिहासिक मिसाल से बँधे थे। उनके बारे में कहा जाता है कि उन्होंने अपने निजी सचिव से कहा था, “लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकार को बिना किसी वैध कारण के एहतियात के तौर पर कैसे बर्खास्त किया जा सकता है? क्या यह संवैधानिक होगा? क्या हम एक असंवैधानिक रूप से असंवैधानिक कृत्य का सहारा ले रहे हैं?”

नरसिम्हा राव के पर्सनल फिजिशियन के श्रीनाथ रेड्डी का मानना है कि बाबरी मस्जिद के विध्वंस के दिन नरसिम्हा वास्तव में व्यथित थे। के श्रीनाथ रेड्डी ने उन दिनों को याद करते हुए बताया कि जब उन्होंने बाबरी मस्जिद को नीचे गिरते हुए देखा था, तो नरसिम्हा राव से मिलने पहुँचे थे। वो प्रधानमंत्री को लेकर चिंतित थे, जो कि दिल की बीमारी से पीड़ित थे।

रेड्डी ने बताया, “जैसा कि मुझे उम्मीद था, उनका दिल तेजी से धड़क रहा था … नाड़ी काफी तेज़ थी … बीपी बढ़ गया था। उनका चेहरा लाल हो रहा था, वे उत्तेजित थे।”

उन्होंने आगे कहा, “मैं एक डॉक्टर के रूप में काफी आश्वस्त हूँ कि विध्वंस के लिए उनकी व्यक्तिगत प्रतिक्रिया सच्ची व्याकुलता थी। यह उस व्यक्ति का नहीं था, जिसने इसकी योजना बनाई होगी या इसमें उनकी कोई संलिप्तता होगी।”

यदि उनके डॉक्टर की तत्कालीन स्वास्थ्य स्थिति का विवरण सटीक है, तो यह साबित होता है कि नरसिम्हा राव को यह पता नहीं था कि क्या होने वाला था। यह ज्ञात है कि वह व्यक्तिगत रूप से समाधान निकालकर दोनों पक्षों के बीच मध्यस्थता स्थापित करने की कोशिश कर रहे थे और हिंदू संगठन के नेताओं से यह आश्वासन लेने का प्रयास कर रहे थे कि मस्जिद क्षतिग्रस्त नहीं होगी।

ऐसा कहा जाता है कि नरसिम्हा राव ने 1992 के नवंबर का अधिकांश समय भाजपा के नेताओं के साथ गुप्त वार्ता में बिताया। इन वार्ताओं में क्या चर्चा हुई, यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता है। हालाँकि उनके आलोचको का मानना है कि 6 दिसंबर 1992 को जो हुआ, उसमें वह भी शामिल थे।

राम जन्मभूमि के साथ कई और प्रकरण जुड़े हुए हैं। वैसे बाबरी विध्वंस में राव की भूमिका भी संभवतः आने वाले लंबे समय तक या फिर शायद, अनंत काल के लिए एक पहेली बनी रहेगी।

जख्म-ए -लिबरल: शेखर गुप्ता को याद आया 1992 का समय, बाबरी विध्वंस को ‘राष्ट्रीय कलंक’ बताने पर बंद करनी पड़ी थी मैगजीन

अयोध्या में पवित्र श्रीराम मंदिर के ऐतिहासिक भूमिपूजन के अवसर पर पूरा देश उत्सव के मूड में है, लेकिन देश के कुछ चुनिन्दा इस्लामिक और सेक्युलर विचारकों ने आज इस शुभ दिन पर हिंदुओं के खिलाफ जहर उगलने का अपना पारम्परिक व्यवसाय जारी रखते हुए खुदको प्रासंगिक बनाए रखा है।

लिबरल जमात का यह मानसिक आघात सिर्फ भूमिपूजन के दिन ही शुरू नहीं हुआ बल्कि पिछले काफी समय से वो इस ‘बुरे दौर’ से गुजर रहे थे और आज उनका यह दुःख बरबस फूट रहा है। यही वजह है कि कुछ ही दिन पहले ट्विटर पर ‘कहीं पूजन, कहीं सूजन’ जैसे दुखद हैशटैग ट्रेंड कर रहे थे।

आज के दिन की शुरुआत में ही सबसे पहले जहाँ ओवैसी और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के एक जहरीले बयान से हुई, वहीं यह क्रम पूरे दिन जारी रहा और इस्लामिक प्रपंचकारी राणा अयूब से लेकर आरफ़ा खानम रह-रहकर अपना दर्द ट्विटर पर उगलते रहे

इस्लामिक विचारधारा समर्थक राना अयूब तो इस बात से भी खफ़ा हैं कि कॉन्ग्रेसी नेता भी राम मंदिर के जश्न में हिन्दुओं के साथ अपनी उपास्थिति दर्ज कराने के लिए मरे जा रहे हैं।

दरअसल, पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने ट्वीट में लिखा- “अयोध्या में राम मंदिर की ऐतिहासिक नींव रखने पर भारत के लोगों को मेरी हार्दिक बधाई, जो कि हर भारतीय की लम्बे समय से इच्छा थी। भगवान राम के धर्म का सार्वभौमिक संदेश न केवल भारत के लिए, बल्कि दुनिया के लिए मार्गदर्शक बना हुआ है।”

इस से राना अयूब अपने भीतर के ज्वालामुखी को रोक नहीं सकीं और उन्होंने इस ट्वीट को शेयर करते हुए लिखा – “भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस अपना असली चेहरा दिखाते हुए।”

2002 के गुजरात दंगों की काल्पनिक कहनियों को अपनी पत्रकारिता बताने वाली राना ने इससे पहले एक अन्य ट्वीट में लिखा – “हम हैरान क्यों हैं? यहाँ एक ऐसा व्यक्ति है जिसने मुस्लिमों का नरसंहार किया और उसके लिए उसे सत्ता मिली। वह शख्स, जिसने उन्हें हिंदू भारत का सपना बेचा था और अब इसे पूरा कर रहा है। यह नाटक बंद करो।”

वहीं, जेएनयू की फ्रीलांस प्रोटेस्टर शेहला रशीद ने राम मंदिर पर कोई विशेष टिप्पणी ना करते हुए बस पीएम मोदी की दाढ़ी और नए लुक पर सवाल किया कि आखिर मोदी जी ‘एर्तुग्रुल दाढ़ी’ क्यों रख रहे हैं?

शेहला के इस ट्वीट के जवाब में कई तरह की प्रतिक्रियाएँ देखने को मिलीं, जिनमें से कुछ लोगों ने भाषा की मर्यादा का ध्यान ना रखते हुए पीएम मोदी की दाढ़ी की तुलना छत्रपति शिवाजी महाराज के साथ भी की।

शीला भट्ट ने द प्रिंट के संस्थापक शेखर गुप्ता से जुड़े एक किस्से को याद दिलाते हुए ‘इंडिया टुडे’ मैगजीन की कवर फोटो शेयर किया जिसमें अयोध्या बाबरी विध्वंस का जिक्र करते हुए मुख्य पन्ने पर लिखा था- “राष्ट्रीय कलंक।”

इस फोटो के साथ शीला भट्ट ने लिखा है – “दिसंबर 1992 में, इंडिया टुडे के गुजराती संस्करण, (तब, मैं वरिष्ठ संपादक थी और शेखर गुप्ता इसके संपादक थे) ने इसके कवर पर लिखा था ‘राष्ट्र नु कलंक।’ गुजरात का तब तक इतना भगवाकरण कर दिया गया था कि पाठकों ने गुजराती इंडिया टुडे के खिलाफ कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की थी। आखिरकार गुजराती संस्करण बंद हो गया।”

इसके जवाब में शेखर गुप्ता ने अपने दर्द का स्मरण करते हुए लिखा है – “हमने अक्टूबर 1992 में गुजराती संस्करण का शुभारंभ किया था। 6 सप्ताह के भीतर, हम 75 हजार तक बढ़ गए थे। इसके बाद अयोध्या के शीर्षक और कवरेज में विरोध की बाढ़ आई। अगले 4 हफ्तों में, हम 25 हजार तक गिर गए। संस्करण हमारे मार्केटिंग हेड के कहे अनुसार ही डूब गया।”

‘द प्रिंट’ की ही जर्नलिस्ट जैनाब सिकंदर ने ट्वीट किया है – “मुझे अयोध्या में सैंटा की मौजूदगी महसूस हो रही है।”

इसके जवाब में उन्हें ट्विटर यूजर ने कई क्रिएटिव जवाब दिए –

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा अयोध्या में श्रीराम मंदिर निर्माण का भूमिपूजन किए जाने पर असदुद्दीन ओवैसी ने कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष (सेक्युलर) देश है और पीएम मोदी ने राम मंदिर की आधारशिला रखकर प्रधानमंत्री कार्यालय की शपथ का उल्लंघन किया है। ओवैसी ने कहा कि यह लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता की हार और हिंदुत्व की सफलता का दिन है।

इसके अलावा आईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने अपना दर्द शेयर करते हुए कहा, ”प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि मैं भावुक हूँ। मैं कहना चाहता हूँ कि मैं भी उतना ही भावुक हूँ क्योंकि मैं सह-अस्तित्व और नागरिकता की समानता में विश्वास करता हूँ। प्रधानमंत्री, मैं भावुक हूँ क्योंकि एक मस्जिद 450 साल से वहाँ खड़ी थी।”