महाराष्ट्र पुलिस ने मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे की आलोचना करने पर सुनैना होले नाम की एक ट्विटर यूजर को गिरफ्तार कर लिया है। सुनैना के खिलाफ़ शिवसेना की यूथ विंग के नेता रोहन चव्हाण ने नालासोपारा के तुलिंज थाने में शिकायत दर्ज कराई थी।
अपनी शिकायत में चव्हाण ने कहा था कि सुनैना ने ट्विटर पर मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे और पर्यावरण मंत्री आदित्य ठाकरे के ख़िलाफ़ आपत्तिजनक पोस्ट किया। शिकायत में सुनैना के रियल अकॉउंट के अलावा @NidarNaari अकाउंट का उल्लेख किया गया। उन्होंने बताया कि सुनैना बैकअप अकॉउंट के रूप में इसे चलाती हैं।
चव्हाण ने शिकायत में कहा कि सुनैना ने अपने बेहद आक्रामक पोस्ट के जरिए शिवसेना प्रमुख और उनके बेटे की छवि को सोशल मीडिया पर बिगाड़ने का प्रयास किया।
उन्होंने पुलिस से सुनैना के ख़िलाफ़ धारा 294 (सार्वजनिक स्थान पर आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल), धारा 499 (मानहानि), धारा 506 (आपराधिक धमकी) और आईटी एक्ट 2000 की धारा 66ए समेत अन्य उपयुक्त धाराओं के तहत 48 घंटों में कार्रवाई करने की माँग की।
अब सोशल मीडिया के कई यूजर्स का कहना है कि पुलिस ने सुनैना को गिरफ्तार कर लिया है और उसे आज कोर्ट में पेश किया जाएगा। ऑपइंडिया ने इस मामले में जानकारी जुटाने के लिए पुलिस से संपर्क करने का प्रयास किया। लेकिन वहाँ बात नहीं हो पाई। जैसे ही इस संबंध में कोई सूचना आएगी हम यह खबर अपडेट करेंगे।
फिलहाल, सोशल मीडिया पर यूजर्स सुनैना की गिरफ्तारी के ख़िलाफ़ आवाज बुलंद कर रहे हैं। शिवसेना के पूर्व कार्यकर्ता रमेश सोलंकी लिखते हैं, “गणपति बप्पा का अपमान करने पर कोई कार्रवाई नहीं हुई लेकिन यदि आपने महाविकास अघाड़ी नेताओं के ख़िलाफ़ कुछ भी बोला तो आपको हिरासत में लेकर गिरफ्तार कर लिया जाएगा।”
Abusing Ganpati Baapa no action
Abusing Sri Ram and Sita Maa no action
Abusing Chatrapati Shivaji Maharaj no action
Abusing Hindus and their faith no action
But if you question or say something abt MahaVikasAghadi leaders you will be booked and arrested ?#IStandWithSunaina
भाजपा नेता किरीट सोमैय्या ने मामले की जानकारी होते ही सुनैना को मदद पेशकश की। उन्होंने ट्वीट करते हुए कहा कि अगर मुंबई पुलिस उनके ख़िलाफ़ कोई एक्शन लेती है, तो वह उन्हें संपर्क कर सकती हैं।
गौरतलब है कि यह पहली बार नहीं कि शिवसेना ने ट्विटर पर कोई पोस्ट करने पर नागरिकों के ख़िलाफ़ एक्शन लिया हो। अप्रैल 2020 में शिवसेना ने सुनैना होले पर एक कार्रवाई और की थी। इसके अलावा उस दौरान शेफाली वैद्य के ख़िलाफ़ भी एक्शन लिया गया था।
इन दोनों की गलती ये थी कि इन्होंने तबलीगी जमात पर सवाल उठा दिया था। इन दोनों के अतिरिक्त एक डॉक्टर पर भी शिकंजा कसा गया था। जबकि 2019 में शिवसैनिकों ने एक आदमी को उद्धव ठाकरे के ख़िलाफ़ लिखने पर गंजा कर दिया था।
अयोध्या स्थित श्री राम जन्मभूमि मंदिर के भूमिपूजन कार्यक्रम में पूरे देश भर के कई तीर्थ स्थलों से मिट्टी लाइ गई। सम्पूर्ण भारत में कई तीर्थ स्थलों से जल भी यहाँ लाया गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उपस्थिति वाले इस भूमिपूजन कार्यक्रम में पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (POK) स्थित शारदा पीठ से भी पवित्र मिट्टी मँगाई गई। भारत-पाकिस्तान तनाव के कारण ये आसान नहीं रहा, क्योंकि POK में किसी भारतीय की एंट्री पर प्रतिबन्ध है।
इन सब मुश्किलों के बावजूद पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (POK) स्थित शारदा पीठ से मिट्टी लाने का काम एक भारतीय दम्पति ने ही पूरा किया। उसने चीन के पासपोर्ट पर ये कमाल कर दिखाया और हॉन्गकॉन्ग के रास्ते वहाँ की मिट्टी लेकर यहाँ पहुँचा। ये दम्पति मूल रूप से कर्नाटक का निवासी है, जहाँ रामभक्त हनुमान जी का भी जन्म हुआ था। इस दम्पति की तुलना लोग हनुमान द्वारा संजीवनी बूटी लाने से कर रहे हैं।
कर्नाटक के वेंकटेश रमन और उनकी पत्नी ने पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले कश्मीर (POK) में स्थित शारदा पीठ से मिट्टी लाकर राम मंदिर भूमिपूजन में समर्पित किया। ये दम्पति चीन में ही रहता है। ‘सेव शारदा पीठ कमिटी’ ने उनसे संपर्क किया था। चूँकि POK में भारतीय नागरिकों के घुसने पर पाबन्दी लगी हुई है, इसीलिए इन दोनों ने चीन के पासपोर्ट पर वहाँ जाकर मिट्टी लाए।
दोनों ने हॉन्गकॉन्ग के रास्ते शारदा पीठ का रास्ता तय किया। वे सीधे POK की राजधानी मुज़फ़्फ़राबाद पहुँचे, जहाँ से वो शारदा पीठ के लिए रवाना हुए। फिर उन्होंने वहाँ से न सिर्फ प्रसाद लिया बल्कि पवित्र मिट्टी भी ली। उन्होंने ‘सेव शारदा पीठ कमिटी’ के सदस्य अंजना शर्मा को मिट्टी सौंपी। उन्होंने बताया कि वे शारदा पीठ के मुख्य पुजारी रवींद्र पंडित के कहने पर अयोध्या पहुँचे हैं।
इतना ही नहीं, ये दम्पति अपने साथ अंजना पर्वत का जल लेकर भी पहुँचा। कर्नाटक स्थित अंजना पर्वत ही हनुमान जी की जन्मस्थली है। उन्होंने बताया कि गोकर्ण से भी पवित्र जल एवं मिट्टी मँगाई गई है। श्रीलंका और नेपाल से जल एवं मिट्टी लाकर यहाँ उपयोग किया गया। बता दें कि शारदा पीठ को हिन्दुओं, खासकर कश्मीरी पंडितों के सबसे पवित्र तीर्थ स्थलों में से एक माना जाता है। नीलम नदी के किनारे स्थित ये स्थल उरी से 70 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।
अयोध्या मामले की तरह ही POK स्थित शारदा पीठ का मामला भी कई दशकों से विवादों में है। रवींद्र पंडित का कहना है कि अगर अयोध्या मामला हल हो सकता है तो इसका भी समाधान हो सकता है। उन्होंने करतारपुर का उदाहरण देते हुए कहा कि भविष्य में यहाँ भी कोई समाधान निकलेगा। कश्मीरी साधु स्वामी नन्दलाल ने वहीं अपना आश्रम बनाया था, लेकिन विभाजन के बाद उन्हें जम्मू कश्मीर के टिक्कर में बसना पड़ा।
IANS में कार्यरत नवनीत मिश्रा ने ट्विटर पर जानकारी दी है कि अयोध्या में राम मंदिर के लिए POK की मिट्टी भी मँगाने की बात चली। वहाँ 500 साल पुराना प्रसिद्ध शारदा पीठ है। श्रीनगर से करीब 100 KM दूर इस पीठ के पुजारी की भी मिट्टी भेजने की इच्छा थी। लेकिन, संघ परिवार के सामने सवाल था कि मिट्टी मँगाई कैसे जाए? वहाँ तो कोई भारतीय जा नहीं सकता? उन्होंने इस प्रकरण के बारे में जानकारी देते हुए लिखा:
“संघ, VHP, ट्रस्ट ने देश में संचालित शारदा पीठ फाउंडेशन से चर्चा की। फाउंडेशन के अंजना शर्मा ने फिर कमान सँभाली। उन्होंने चेन्नई के मूल निवासी और चीन में बस चुके वेंकटेश रमन से बात की। वेंकटेश रमन इससे पहले कांची और श्रृंगेर मठ को शारदा पीठ की मिट्टी दे चुके थे। POK में चीनी नागरिकों को जाने की छूट के कारण वेंकटेश आसानी से वहाँ जा सकते थे। वेंकटेश ने अंजना शर्मा से कहा- रामकाज का मौका मिलने से बड़ा सौभाग्य क्या हो सकता है। वह चीन से हॉन्गकॉन्ग पहुँचे और फिर वहाँ से इस्लामाबाद होते हुए POK की राजधानी मुजफ्फराबाद गए। फिर शारदा पीठ पहुँचे और मंदिर से मिट्टी, प्रसाद लेकर वापस हॉन्गकॉन्ग लौटे। यहाँ से फिर दिल्ली पहुँचे और अंजना शर्मा से भेंटकर उन्हें सब सौंप दिया।”
फिर शारदा पीठ पहुंचे और मंदिर से मिट्टी, प्रसाद लेकर वापस हांगकांग लौटे। यहां से फिर दिल्ली पहुंचे और अंजना शर्मा से भेंटकर उन्हें सब सौंप दिया। फिर अंजना शर्मा शारदा पीठ की पवित्र मिट्टी लेकर अयोध्या पहुंचे और ट्रस्ट को मंदिर की नींव में डालने के लिए उपलब्ध कराया।
नवनीत मिश्रा ने जानकारी दी कि अंजना शर्मा शारदा पीठ की पवित्र मिट्टी लेकर अयोध्या पहुँचे और ट्रस्ट को मंदिर की नींव में डालने के लिए उपलब्ध कराया। उन्होंने आशावान होकर कहा कि जब राम मंदिर की मिट्टी लाने के लिए इतना बेहतरीन ऑपरेशन चल सकता है तो फिर लगता है कि मोदी सरकार में एक न एक दिन पीओके भी आएगा। बता दें कि बुधवार (अगस्त 5, 2020) को राम मंदिर का भूमिपूजन कार्यक्रम संपन्न हुआ।
अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए हुए भूमि पूजन के बाद सोशल मीडिया पर बधाइयों की भरमार लग गई। हर ओर से राम भक्तों ने अपनी खुशी जाहिर की। इसी बीच भारत के तेज गेंदबाज मोहम्मद शमी की पत्नी हसीन जहाँ ने भी हिंदू समाज के समस्त लोगों को मुबारकबाद दी।
अपने बोल्ड फोटोशूट और डांस वीडियोज के कारण सुर्खियों में रहने वाली हसीन जहाँ ने जो पोस्टर शेयर किया, उसमें श्रीराम और राम मंदिर की तस्वीर बनी हुई है। साथ ही उसपर लिखा है, “अयोध्या में श्रीराम मंदिर के भूमिपूजन के लिए समस्त हिंदू समाज को दिली मुबारकबाद। ढेर सारी शुभकामनाएँ। हसीन जहाँ।”
अब इस पोस्टर पर कई लोगों की प्रतिक्रियाएँ आई हैं। अधिकांश हिंदुओं ने इस बधाई को स्वीकारते हुए बदले में इस फोटो पर जय श्री राम लिखा है। लेकिन वहीं कुछ कट्टरपंथी ऐसे भी हैं जिन्होंने हसीन जहाँ के लिए बेहद घिनौने शब्दों का प्रयोग किया।
न्यूज 18 की रिपोर्ट के अनुसार तो उन्हें रेप और जान से मारने की धमकियाँ भी दी गईं। इसके अलावा कुछ समुदाय विशेष के लोगों ने हसीन जहाँ पर निराशा जताई और कुछ ने गाली ने देकर पूछा कि क्या बस यही रह गया था।
एक यूजर ने उन्हें डूब कर मरने की सलाह दी और एक सलमान सिद्दकी नाम के यूजर ने फैज अहमद फैज की उस विवादित कविता को ही लिख दिया जिसमें हर जगह से बुत उठवाने की बात है। सलमान लिखता है, “जब अर्जे खुदा के काबे से सब बुत उठवाये जाएँगे, बस नाम रहेगा अल्लाह का, लाजिम है कि हम भी देखेंगे”
कुछ अन्य यूजर भी उनकी पोस्ट पर कमेंट करते दिखे। एक साहिब नाम का युवक कहता है कि उसे राम मंदिर मामले पर बोलने वालों में सिर्फ़ एक आदमी पसंद आया है- वो है ओवैसी। क्योंकि ओवैसी ही एक ऐसा शख्स है जिसने छाती ठोंक कर कहा कि उस जगह बाबरी थी और बाबरी ही रहेगी।
एक ने हसीन को गाली देते हुए लिखा कि अल्लाह उसे ऐसा सबक सिखाएगा कि वह हमेशा उसे याद रखेगी। एक ने उनकी तुलना वेश्या से की और उन्हें वेश्या की औलाद बताया। इसी तरह एक ने शमी की पत्नी को हिंदू बनने की सलाह दी और उनके पारिवारिक जीवन पर टिप्पणी करते हुए उन्हें कहा कि वे वैसे भी अपने बच्चों और पति को छोड़ चुकी हैं।
गौरतलब है कि इससे पहले भी हसीन जहाँ को कुर्बानी वाले उनके एक पोस्ट पर कट्टरपंथियों की प्रतिक्रिया झेलनी पड़ी थी। एक ने उन्हें इस्लाम के मायने न समझने वाली कहते हुए लिखा था कि वह अपना जिस्म दिखाकर पैसे कमाती हैं। इसी तरह samhitler5892 वाली आईडी से हसीन जहाँ के लिए लिखा गया था, “तेरा रेप करूँगा कहीं भी मिल जाओ….तेरा गैंगरेप करूँगा।”
सुप्रीम कोर्ट ने बृहस्पतिवार को महाराष्ट्र सरकार से कहा कि वह अप्रैल में पालघर में साधुओं की मॉब लिंचिंग मामले में आरोपित पुलिसकर्मियों की कथित भूमिका की जाँच और कार्रवाई की स्थिति के बारे में अवगत कराए।
जस्टिस अशोक भूषण और आर सुभाष रेड्डी की पीठ ने राज्य सरकार से संबंधित ट्रायल कोर्ट के समक्ष दायर की गई चार्जशीट को पेश करने का आदेश देते हुए कहा है कि वो इसकी जाँच करना चाहती है।
उन्होंने कहा कि इस बात पर अदालत को विचार करना है कि क्या इस मामले में कोई पुलिसकर्मी शामिल था या क्या कर्तव्य का पालन करने में कोई ऐसी लापरवाही हुई है, जिसके कारण अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए? पीठ ने मामले की आगे की सुनवाई को तीन सप्ताह के लिए स्थगित कर दी। इस घटना में तीन लोग मारे गए थे।
इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार की खिंचाई करते हुए पूछा है कि पालघर केस में कई महीने हो गए हैं, आपने पुलिसकर्मियों के खिलाफ किस तरह की कार्रवाई की? आप इस मामले में क्या कर रहे हैं?
इस मामले में केंद्र सरकार ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट को यह देखना चाहिए कि इस मामले में जाँच कैसे की गई है। सीबीआई जाँच तभी की जाए, जब कोर्ट राज्य सरकार की जाँच से संतुष्ट न हो।
पालघर में साधुओं की मॉब लिंचिंग मामले की जाँच सीबीआई या एनआईए को सौंपने का महाराष्ट्र पुलिस विरोध कर चुकी है। महाराष्ट्र पुलिस का कहना था कि अभी जाँच जारी है और वह जाँच की डिटेल सार्वजनिक नहीं कर सकती।
पालघर मॉब लिंचिंग मामले की जाँच सीबीआई या एनआईए से कराने की माँग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में PIL दाखिल हुई थी। इस याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है।
पालघर में पुलिस के ही सामने तीन साधुओं की भीड़ ने की थी हत्या
यह घटना राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन के दौरान 16 अप्रैल की रात की है, जब मुंबई के कांदिवली के रहने वाले 2 साधू और एक ड्राइवर लॉकडाउन के बीच अपने गुरु के अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए गुजरात के सूरत जा रहे थे। रास्ते में पालघर के कासा पुलिस स्टेशन के आदिवासी इलाके में गडचिंचले गाँव में लोगों ने साधुओं और उनके ड्राइवर को बुरी तरह पीटा और पुलिस तमाशा देखती रही। मॉब लिंचिंग में तीनों की मौत हो गई।
कोरोना महामारी के बीच बॉलीवुड और छोटे पर्दे से बुरी खबरें आने का सिलसिला अब भी जारी है। खबर है कि टीवी एक्टर समीर शर्मा ने खुदकुशी कर ली है। समीर ने मुंबई में अपने घर पर आत्महत्या की है। समीर शर्मा ने ‘कहानी घर-घर की’, सास भी कभी बहु थी’, ‘वो रहने वाली महलों की’ जैसे नामी सीरियलों में काम किया था।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक 44 वर्षीय समीर शर्मा ने मलाड पश्चिम स्थित नेहा सीएचएस बिल्डिंग में अपने घर पर फाँसी लगाकर जान दी। पुलिस के मुताबिक एक्टर ने खुदकुशी 2-3 दिन पहले की होगी। क्योंकि जब पुलिस फ्लैट के अंदर पहुँची तो बॉडी डिकंपोज होना शुरू हो चुकी थी।
TV actor & model Sameer Sharma was found hanging from his kitchen ceiling at his residence in Malad West last night. Accidental Death Report registered, body sent for autopsy. Looking at body’s condition, it’s suspected that he died by suicide two days back: Malad Police. #Mumbai
मलाड पुलिस के अनुसार, समीर ने इसी साल फरवरी में ये अपार्टमेंट किराए पर लिया था। वह यहाँ अकेले रहते थे। बुधवार को रात की ड्यूटी के दौरान चौकीदार को समीर शर्मा का शव लटकता हुआ दिखा। इसके बाद ये सूचना आगे सोसायटी मेंबर्स दी गई। फिर जानकारी होते ही पुलिस भी मौके पर पहुँची।
फ्लैट खोल कर देखा गया तो समीर का शव किचन में पंखे से लटक रहा था। पुलिस का कहना है कि फिलहाल उन्हें कोई सुसाइड नोट नहीं मिला है। पूरे घर का सर्च ऑपरेशन किया जा रहा है। पुलिस इस केस में फाइनेंसियल एंगल को भी खंगाल रही है।
खबरों की मानें तो समीर काफी दिनों से किसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे लेकिन बाद में वे ठीक होकर एक्टिंग करने लगे थे। वह इस समय स्टार प्लस के शो ‘ये रिश्ता क्या कहलाता है ‘ का हिस्सा थे। वे शो में कुहू के पिता की भूमिका में नजर आए थे।
इस शो के अलावा समीर ने कई और टीवी शो ‘लेफ्ट राइट लेफ्ट’ ‘इस प्यार को क्या नाम दूँ- एक बार फिर’ ‘गीत हुई सबसे पराई’, 2612, ‘दिल क्या चाहता है’, ‘वो रहने वाली महलों की’ और ‘ज्योति’ में काम किया था।
हिन्दू धर्म के विरोध के लिए यूँ तो लिबरल गिरोह के पत्रकार तरह-तरह की नौटंकी करते हैं, लेकिन इस बार ‘द वायर’ की पत्रकार रोहिणी सिंह ने अपने बच्चे के माध्यम से राम मंदिर के विरुद्ध प्रोपेगेंडा फैलाया है। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि उनके बेटे ने एक मंदिर और एक मस्जिद की ड्राइंग बनाई है। ड्राइंग में दोनों अगल-बगल ही दिख रहे हैं। बकौल रोहिणी सिंह, उनके बेटे ने इसके साथ-साथ सहिष्णुता पर लेख भी लिखा है।
‘द वायर’ की रोहिणी सिंह के अनुसार, बाईं तरफ उनके बेटे ने एक हरे रंग की मस्जिद का चित्र बनाया और उसके बगल में ही एक मंदिर का चित्र बनाया, जो लाल रंग की है। साथ ही उसने सहिष्णुता पर भी लेख लिखा। उसने लिखा,
“सहिष्णुता किसी के बुरे व्यवहार को स्वीकार करना नहीं होता है, इसका अर्थ है जो जैसे हैं उन्हें वैसे ही स्वीकार करना और उनके साथ ऐसा ही व्यवहार करना जैसा आप अपने साथ होते हुए देखना चाहते हैं। इसका अर्थ ये कतई नहीं है कि आप अपनी विरासत और आस्था को कुर्बान कर दें। हम उस विरासत और आस्था को शत-प्रतिशत बनाए रखते हुए दूसरों की विविधता को सेलिब्रेट कर सकते हैं।”
हालाँकि, ‘द वायर’ की रोहिणी सिंह ने ये नहीं बताया कि उनके बेटे ने ये सारी चीजें ख़ुद की सोच के आधार पर लिखीं या फिर इसमें कुछ शब्द उनके भी हैं और उन्होंने इस लेख को प्रभावित किया। ऐसा इसीलिए, क्योंकि ये चीजें किसी और से ज्यादा उन्हें ख़ुद सीखने की ज़रूरत है।
लेकिन, मुद्दा यहाँ ये नहीं है कि रोहिणी सिंह कितनी सहिष्णु हैं या फिर उनके पास सहिष्णुता नाम की कोई चीज है ही नहीं। मसला ये है कि उन्होंने अपने बेटे की ड्राइंग बताकर जिस चित्र को शेयर किया, उससे मिलता-जुलता चित्र इंटरनेट पर पहले से ही वायरल है। एक ट्विटर यूजर ने इस ओर सबका ध्यान दिलाया।
यहाँ हम ये नहीं कह रहे कि बच्चे ने ये चित्र चुरा लिया है क्योंकि हो सकता है कि उसने इस चित्र को इंटरनेट पर देखा हो और फिर देख कर ड्रा किया हो। लेकिन, जो सहिष्णुता वाला लेख है वो भी बच्चों की ही सेल्फ-हेल्प वेबसाइट पर उपलब्ध है।
यहाँ बच्चे ने ‘अपने बच्चे को इस बारे में बराबर बताते रहें’ वाला भाग हटा दिया है क्योंकि ये यहाँ पर फिट नहीं बैठता है। हो सकता है कि रोहिणी सिंह ने खुद अपने बेटे को ये सब लिखने को कहा हो ताकि वो इसके बहाने ट्विटर पर राजनीति खेल सकें। ये सम्भावना तो कम ही दिखती है कि बच्चे ने खुद सर्च कर उस सेल्फ-हेल्प पैरेंटिंग वेबसाइट की खोज की हो और काफी चालाकी से वहाँ से इन पंक्तियों को कॉपी कर लिया हो।
लिबरल और कट्टर इस्लामी गिरोह का पुराना तरीका है कि वो अपने एजेंडे के लिए बच्चों का इस्तेमाल करने से भी नहीं चूकते। इसीलिए हो सकता है कि ‘द वायर’ की पत्रकार ने भी यही टैक्टिक आजमाया हो। हालाँकि, ये पहली बार नहीं है जब उन्होंने ऐसा किया हो। अक्टूबर 2109 में भी रोहिणी ने दावा किया था कि एक 5 साल की लड़की ज़ोया को एक जन्मदिन पार्टी से भगाया जाने लगा तो बच्ची ने जवाब दिया कि वो पाकिस्तानी नहीं है।
बिहार में एक महादलित किशोरी को अगवा कर कथित तौर पर गैंगरेप का मामला सामने आया है। आरोपित पीड़िता के गॉंव के ही हैं। पुलिस ने 15 वर्षीय पीड़िता को मुक्त करा लिया है। साथ ही बलात्कार की बात से इनकार करते हुए कहा है कि उसे सिर्फ अगवा किया गया था।
मुख्य आरोपित ने 2 युवकों के साथ मिल कर उसका अपहरण किया। पीड़िता की माँ ने कसबा थाना क्षेत्र में अपनी बेटी के अपहरण और बलात्कार का मामला दर्ज कराया है। मोहम्मद मुजफ्फर मुख्य आरोपित है। पुलिस ने पीड़िता को मेडिकल जाँच के लिए अस्पताल भेजा है।
पीड़िता की माँ ने अपने बयान में बताया है कि सोमवार (अगस्त 4, 2020) की रात घर के सभी लोग छत पर सो रहे थे। मोहम्मद मुजफ्फर अपने सहयोगियों नवाजिश और अबू बकर के साथ आया और उनकी बेटी का अपहरण कर लिया।
पीड़िता की मॉं का दावा है कि अगवा करने से पहले उनकी बेटी को बेहोश किया गया। आरोपितों ने उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया। पीड़िता की माँ ने बताया कि सुबह उसे घर में न पाकर परिजन बेचैन हो गए और तलाश शुरू की। काफी खोजबीन के बाद पता चला कि पीड़िता को मोहम्मद मुजफ्फर ने बंधक बना कर रखा है।
मदरसा ज्ञान
पूर्णिया में स्थित क़स्बा थाना क्षेत्र में एक 15 साल की महादलित किशोरी से गैंग रेप करने का मामला सामने आया हैं। किशोरी की माँ के अनुसार गांव के ही तीन मुस्लिम युवक मुजफ्फर, नवाजिश व मो.अबू बकर ने जबरन किशोरी को अगवा कर उसके साथ पहले दुष्कर्म किया फिर बंधक बना लिया। https://t.co/wALWLAjdg1
जब परिजन वहाँ पहुँचे तो आरोपितों ने गाली-गलौज कर के उन्हें भगा दिया। पीड़िता को मुजफ्फर के घर से कहीं और शिफ्ट कर दिया। परिजनों के अनुसार जब पुलिस पहुँची, तब तक सारे आरोपित फरार हो चुके थे लेकिन पीड़िता को छुड़ा लिया गया। थानाध्यक्ष पंकज आनंद का कहना है कि पीड़िता की माँ की शिकायत पर पुलिस मौके पर पहुँची थी।
उन्होंने ये भी बताया कि मेडिकल जाँच के लिए महादलित पीड़िता को पूर्णिया सदर अस्पताल भेज दिया गया है। हालाँकि, पुलिस समूहिक बलात्कार की बात से इनकार कर रही है। ‘दैनिक भास्कर’ की खबर के अनुसार, राजद जिलाध्यक्ष नवीन यादव ने इस मामले में स्पीडी ट्रायल को माँग की है। पुलिस ने सामूहिक बलात्कार की घटना से इनकार करते हुए कहा है कि नामजद आरोपितों की तलाश में लगातार छापेमारी की जा रही है।
कॉन्ग्रेस नेता सलमान निजामी का कहना है कि टीपू सुल्तान ‘राम’ नाम वाली अँगूठी पहनता था, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी स्कल कैप (मुस्लिमों द्वारा पहने जाने वाली मजहबी टोपी) नहीं पहनते। जबकि, वास्तव में राम नाम वाली इस अँगूठी और इसके स्वामित्व को लेकर किए गए दावे झूठे हैं।
इतिहास की सबसे विवादित हस्तियों में से एक टीपू सुल्तान एक बार फिर चर्चा का विषय है। इस बार टीपू सुल्तान देवनागिरी में लिखी हुई ‘राम’ नाम वाली ख़ास सोने की अँगूठी की वजह से चर्चा में है। समाजवादी पार्टी नेता आजम खान ने पीएम मोदी से 18वीं शताब्दी की राम नाम वाली इस अँगूठी को टीपू सुल्तान की बताते हुए लंदन से भारत वापस लाने की माँग की है।
हालाँकि, वास्तविकता यह है कि यह अँगूठी टीपू सुल्तान की नहीं, बल्कि उसके द्वारा लुटे गए मंदिरों में से चुराई हुई एक अँगूठी थी। दावा किया जाता है कि टीपू की मौत के बाद एक अंग्रेज अफसर मेजर जनरल लॉर्ड फिट्जरॉय ने टीपू की लाश से इस अँगूठी को चोरी कर लिया था। सोशल मीडिया पर इसी विषय को लेकर जमकर विवाद हो रहा है।
इस अँगूठी की नीलामी साल 2014 में क्रिस्टीज़ नीलामीघर ने की थी। क्रिस्टीज़ की वेबसाइट के अनुसार इस अँगूठी का वज़न 41 ग्राम था। आजम खान का कहना है कि पीएम मोदी को ऐतिहासिक महत्व की इस अँगूठी को भारत लाकर उन लोगों को दिखाना चाहिए, जो टीपू के खिलाफ राजनीति करते हैं।
ट्विटर पर कॉन्ग्रेस नेता सलमान निजामी ने इस अँगूठी की तस्वीर ट्वीट करते हुए लिखा है, “मुस्लिम शासक, टीपू सुल्तान ने एक अँगूठी पहन रखी थी, जिस पर ‘राम’ अंकित था, लेकिन मोदी ने सर पर टोपी (स्कल कैप) पहनने से इनकार कर दिया। सांप्रदायिक कौन है?”
सलमान निजामी के इस दावे को फर्जी बताते हुए ‘ट्रू इंडोलोजी’ ने इस अँगूठी के इतिहास पर अब तक चले आ रहे फर्जी तथ्यों से पर्दा उठाया है।
‘ट्रू इंडोलोजी’ ने लिखा है, “टीपू ने कभी इस अँगूठी को नहीं पहना। अँगूठी टीपू के संग्रह का एक हिस्सा थी, जो उसने अपने शासन में की गई लूट के दौरान चुराई थी। ऐसा कोई संदर्भ नहीं है कि टीपू ने कभी यह अँगूठी पहनी हो। यह हाल ही में निर्मित फर्जी तथ्य है कि यह अँगूठी उसके शव से बरामद हुई थी।”
FAKE!
Tipu NEVER wore this ring. The ring was a part of Tipu’s collection of loot he accumulated throughout his career.
There is NOT ONE reference that Tipu ever wore this ring. This is a recently manufactured FAKE MYTH that it was found on his dead body. https://t.co/MIPWs0B5T1
ट्रू इंडोलोजी ने लिखा है, “यह मेजर अलेक्जेंडर एलन का विवरण है, जो इतिहास में टीपू के मृत शरीर का एकमात्र प्रत्यक्षदर्शी है। उसने उस पूरे दृश्य की रिपोर्ट लिखी थी, जो टीपू के शव का वर्णन करता है। इसमें स्पष्ट रूप से लिखा गया है कि टीपू के शव से किसी भी प्रकार का आभूषण बरामद नहीं हुआ था।”
इस विवरण के अनुसार, “जब टीपू को प्रवेश द्वार के नीचे से लाया गया था, तो उसकी आँखें खुली थी, और शरीर इतना गर्म था कि कुछ क्षणों के लिए कर्नल वेलेजली और खुद मुझे संदेह था कि क्या वह मर गया है; उसकी नाड़ी और धड़कन को देखने पर हमारा संदेह दूर हुआ। उसके शरीर पर चार घाव थे, शरीर में तीन और सर में एक; गोली दाहिने कान से थोड़ा ऊपर, और गाल में देखी गई। उसकी पोशाक में महीन सफ़ेद लिनेन की जैकेट, फूलदार चिंट्ज़ के ढीले-ढाले कपड़े, रेशम और सूती क्रिमसन कपड़े, उसकी कमर पर गोल, लाल और हरे रंग की सिल्क बेल्ट के साथ एक सुंदर थैली उसके कंधे पर लटकी हुई थी; उसके सिर को खुला रखा गया था। उसकी पगड़ी उसके गिरने पर गिर गई थी, उसके हाथ पर एक ताबीज था, लेकिन कोई आभूषण नहीं था।”
2)This is the account of Major Alexander Allan who is history’s only known eyewitness of Tipu’s body just a few moments after he died
टीपू की इस कथित अँगूठी के साथ ही समाजवादी पार्टी नेता आजम खान ने प्रधानमंत्री मोदी से कोहिनूर हीरे को घर वापस लाने के लिए भी कहा है। आजम खान ने कहा,- “पीएम रानी एलिजाबेथ द्वितीय के साथ भोजन करने जा रहे हैं, जो कोहिनूर को अपने मुकुट पर पहनती हैं। क्या मोदीजी उनसे भारत का कीमती हीरा लौटाने के लिए कहेंगे?”
ऑल इंडिया इमाम एसोसियेशन के मौलाना साजिद रशिदी ने राम मंदिर पर ज़हर उगला है। मौलाना ने कहा “एक मस्जिद हमेशा एक मस्जिद ही रहती है। यह कुछ और बनाने के लिए तोड़ी नहीं जा सकती है। हम ऐसा मानते हैं और भरोसा करते हैं कि वहाँ मस्जिद थी और मस्जिद ही रहेगी। वह मस्जिद एक मंदिर को तोड़ कर नहीं बनाई गई थी लेकिन अब ऐसा हो सकता है कि कभी मंदिर तोड़ कर उस जगह पर मस्जिद बनाई जाए।”
इसके बाद मौलाना ने कहा “प्रधानमंत्री ने अयोध्या के मंदिर निर्माण कार्यक्रम में शामिल होकर संविधान की अवहेलना की है। उस ज़मीन पर बाबरी मस्जिद थी जिसे हिटलर की फ़ौज से मिलते जुलते लोगों ने तोड़ा था। जो लोग इंसाफ में भरोसा रखते हैं वह किसी न किसी दिन उस मंदिर को मस्जिद में तब्दील कर देंगे।”
Islam says a mosque will always be a mosque. It can’t be broken to build something else. We believe it was, and always will be a mosque. Mosque wasn’t built after demolishing temple but now maybe temple will be demolished to build mosque: Sajid Rashidi, Pres, All India Imam Assn pic.twitter.com/DzlbYQ3qdm
गौरतलब है कि 5 अगस्त 2020 भारत के लिए एक ऐतिहासिक दिन, अयोध्या में रामलला के भव्य मंदिर की नींव पड़ी। लेकिन मंदिर की नींव पड़ते ही देश के चुनिंदा लोग और समुदाय विशेष के लोग विरोध में उतर आए। विरोध कर रहे लोगों में न तो देश के संविधान की फ़िक्र नज़र आई। और न ही देश की सबसे बड़ी अदालत के फैसले के प्रति सम्मान और भरोसा। इस कड़ी में देश की राजनीति के तमाम नेता भी शामिल हैं।
लोकसभा सांसद और ऑल इंडिया मजलिस ए इत्तेहादुल मुस्लीमीन के मुखिया असदुद्दीन ओवैसी ने भी इस मामले पर अपने हिस्से का जहर उगला। तमाम विवादित नेताओं से कहीं आगे बढ़ कर ओवैसी ने यहाँ तक कह दिया कि बाबरी मस्जिद थी और वही रहेगी। बुधवार की सुबह अपने ट्विटर एकाउंट से ट्वीट करते हुए ओवैसी ने कहा “बाबरी मस्जिद थी, है और रहेगी इंशाअल्लाह #BabriZindaHai।
इसके बाद ओवैसी ने यह भी कहा प्रधानमंत्री मोदी ने संविधान की शपथ का उल्लंघन किया है। हिंदुत्व की कामयाबी धर्म निरपेक्षता की हार है। यह सिर्फ और सिर्फ हिंदू राष्ट्र की नींव रखी गई है। जहाँ लोगों ने नमाज़ पढ़ी उसे सर्वोच्च न्यायालय में झूठ बोल कर तबाह किया गया। ओवैसी के मुताबिक़ प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में भूमि पूजन को सिम्बल ऑफ़ इंडिया था। जबकि देश का सिम्बल कोई भी धार्मिक जगह नहीं हो सकती है।
मामला राम मंदिर का हो और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड अपनी तरफ से बयान जारी करने में पीछे रह जाता। ऐसा कैसे संभव होता, नतीजतन उनकी तरफ से भी 4 अगस्त के दिन राम मंदिर मुद्दे पर बयान जारी किया गया था। बोर्ड द्वारा जारी की गई प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया, “बाबरी हमेशा एक मस्जिद ही रहेगी। हागिया सोफ़िया इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। अन्यायपूर्ण, दमनकारी और शर्मनाक तरीके से ज़मीन पर कब्ज़ा किया गया। बहुसंख्यक समाज के तुष्टिकरण वाले इस निर्णय से मस्जिद का दर्जा नहीं बदल सकता। दिल तोड़ने की ज़रूरत नहीं है, हालात हमेशा एक जैसे नहीं रहते हैं।”
जबकि हगिया सोफ़िया से तुलना करने के बाद सोशल मीडिया पर लोगों ने बोर्ड की जम कर आलोचना की थी। इसके अलावा नेटिजन्स ने भी इस बयान को जम कर ट्रोल किया था। यहाँ तक कि तमाम समुदाय के लोगों ने इस बयान को शर्मिंदगी भरा बताया था।
#BabriMasjid was and will always be a Masjid. #HagiaSophia is a great example for us. Usurpation of the land by an unjust, oppressive, shameful and majority appeasing judgment can’t change it’s status. No need to be heartbroken. Situations don’t last forever.#ItsPoliticspic.twitter.com/nTOig7Mjx6
— All India Muslim Personal Law Board (@AIMPLB_Official) August 4, 2020
कुल मिला कर इस्लाम को मानने वाले नेताओं और मौलानाओं के लिए न तो संविधान का महत्व है और न ही न्याय प्रणाली में विश्वास। देश की सबसे बड़ी अदालत इस मामले पर अपना निर्णय सुना चुकी है। ऐसे में इस इंसाफ़ और मंदिर को मस्जिद में बदलने की बात का क्या मतलब। आखिर एक तरफ़ यह समुदाय हमेशा संविधान में भरोसे की दुहाई देता है लेकिन राम मंदिर के फैसले पर धमकी दे रहा है।
कुछ नेताओं ने तो यहाँ तक कह दिया कि वहाँ बाबरी मस्जिद थी और हमेशा वही रहेगी। जब वह सत्ता में आएँगे तब इसका हिसाब बराबर होगा। यानी यह खुद को देश के लोगों की आस्था और देश की क़ानून व्यवस्था से बढ़ कर मान रहे हैं। वाकई इस देश में अभिव्यक्ति की आज़ादी का इस्तेमाल किस हद तक किया जाता है वह 5 अगस्त के बाद स्पष्ट तौर पर नज़र आया। इतना ही नहीं सर्वोच्च न्यायालय ने वक्फ़ वोर्ड को अयोध्या में ही मस्जिद निर्माण के लिए 5 एकड़ की जमीन दी थी।
अस्पताल बनवाने के मुद्दे पर संत समाज ने कहा था कि जो मंदिर की ज़मीन पर अस्पताल बनवाना चाहते थे वह अब मस्जिद की ज़मीन पर बनवा सकते हैं। इस पुण्य कार्य में संत समाज आर्थिक मदद तक करने को तैयार है। देश का संवैधानिक ढाँचा ही ऐसा है कि अक्सर लोगों की सच्चाई सामने आ ही जाती है।
इस निर्णय के बाद ही यह पूरी तरह साफ़ हो गया कि संविधान में भरोसे की बात करने वाले लोग खुद में कितना बड़ा अपवाद हैं। यही नेता हैं जो सर्वोच्च न्यायालय की निर्णय की दुहाई देते थे लेकिन फैसला आने के बाद इस्लाम का हवाला दे रहे हैं। यानी इस्लामी कानून शरिया देश के संविधान और सर्वोच्च अदालत से भी बड़ा है।
दुनिया का कोई भी इतिहासकार इस बात से असहमति नहीं जता सकता कि भारत में कितने मंदिर तोड़े और लूटे गए इसका कोई हिसाब नहीं। लेकिन भारत का हिंदू केवल एक मंदिर के लिए लड़ा, सिर्फ एक “श्रीराम” मंदिर के लिए लड़ा। अभी अगर बाकी मंदिरों के लड़े तो सोचिए क्या होगा?
चलिए… जो होना था वो तो हो ही गया। संवैधानिक मूल्यों की बलि चढ़ाई गई और मेरे चैनल तक पर बूँद-बूँद टेलीकास्ट हुआ। क्या कीजिएगा, मैं एक अदद पत्रकार, छलकत हमरो जबनिया ऐ राजा बकैत कुमार, कर ही क्या लेता। मैं तो चैनल नहीं चलाता लेकिन एक पत्रकार के तौर पर चुप भी तो नहीं रह सकता।
बताइए कि जिनके ऊपर मस्जिद गिराने का आरोप है, वो भूमिपूजन में शामिल थे! आज के दौर में जबकि न्यायपालिका न्याय नहीं करती, फैसले सुना देती है, वैसे समय में हम वामपंथियों के पास क्या चारा बचा है! हम तो आरोप को ही निर्णय मानते हैं। आप कहेंगे कि मेरे चैनल और उसके मालिक पर सीबीआई ने केस दर्ज किए हुए हैं। तो भाई, हमारे मालिक कौन सा भूमिपूजन जैसा पवित्र कार्य कर रहे थे? वो तो यहीं चैनल के दफ्तर में बैठे रहते हैं।
चौबीस घंटे एक ही बात चल रही है कि कैसा होगा मंदिर, मोदी किधर जाएँगे, किस गाड़ी से आएँगे, कौन से रंग का कुर्ता पहनेंगे… क्या यही है विकास? कब तक मंदिर-मस्जिद होता रहेगा इस देश में? सॉरी, मंदिर तो हो गया, मस्जिद की कोई बात नहीं की गई, जबकि दोनों ‘म’ अक्षर से ही शुरू होते हैं। अक्षर का मतलब होता है जो नष्ट न किया जा सके, जबकि मस्जिद का भाग्य देखिए कि उसे नष्ट कर दिया गया।
नष्ट तो खैर मंदिर को भी किया गया, ऐसा हिन्दू मानते हैं। लेकिन क्या एक समाज के तौर पर ये हमारी सामूहिक हार नहीं है कि हम 492 साल पहले हुए अन्याय को याद किए बैठे हैं? और राम को अयोध्या में आप मान रहे हैं, जबकि कहा जाता कि ‘राम तो रोम-रोम में हैं’। तो फिर हिन्दुओं को तो रोम जाना चाहिए और वहाँ मंदिर निर्माण का कार्य करना चाहिए। लेकिन नहीं, वो तो दूर पड़ जाएगा, वहाँ भाजपा की रैलियों के लिए लाखों की भीड़ कैसे जुटाएँगे, इसलिए अयोध्या का नाम लिया गया, जो कि वास्तव में फैजाबाद था।
फैज से याद आया कि उसे मिट्टी नहीं ले जाने दी गई! बताइए, ये किस तरह का समाज अपने बच्चों के लिए छोड़े जा रहे हैं हम? कल टीवी का एक स्क्रीनशॉट किसी ने व्हाट्सएप्प पर भेजा जिसमें आजतक चैनल पर भूमिपूजन लाइव चल रहा था और साइड में ‘जलन हो तो बर्नोल लगाएँ’ जैसा कुछ लिखा हुआ था। क्या मीडिया पैसों के लिए हम वामपंथियों को खुलेआम ट्रोल करेगा? क्या हमें एक दिन का सुकून नहीं है? हमारे गिरोह के सदस्यों ने लाल रंग का डीपी लगाया तो ट्रोलर अजीत भारती ने लिखा कि वो हनुमान जी का रंग है!
आप ही बताइए कि अब रंग भी हनुमान जी के होने लगे! तब तो कह दीजिएगा कि वामपंथियों का झंडा भी हनुमान जी का है और ‘लाल सलाम’ वास्तव में ‘जय श्री राम’ का अपभ्रंश है जो कि बाली और सुग्रीव ने मुँह में सेव का टुकड़ा खाते हुए बोला था, तो वो ‘लाल सलाम’ जैसा लगा। अब यही सब होगा इतिहास की किताब में कि कौन सा रंग किस भगवान का है।
हमने इतिहासकार दिए आपको, जो तथ्य नहीं कल्पना लिखता हो, आपने कहा कि गलत इतिहास पढ़ाया जा रहा है। अरे भाई, सही इतिहास तो इंटरनेट पर है ही, लेकिन देश में कभी रचनात्मकता की कक्षा लगी है? कभी बच्चों को बोला गया है सरकारी स्कूलों में कि कहानी लिखो, अपने मन से? उसी क्रिएटिविटी को बढ़ावा देने के लिए रोमिला ने, इरफान हबीब, विपिन चंद्रा, गुहा आदि ने तथ्य को परे रख कर काल्पनिक बातों को इतिहास के रूप में लिखा ताकि अगली पीढ़ी कहानी बनाने में माहिर हो, नैरेटिव गढ़ सके।
आपको यह क्या कम लगता है कि इन्हीं में से कई इतिहासकार अयोध्या मामले में कोर्ट में लड़े थे ये साबित करने में कि रामजन्मभूमि अयोध्या नहीं है, ये बात और है कि जजों ने उनकी रिपोर्ट को मोड़ कर कूड़ेदान में फेंक दिया। फासीवाद तो तभी से मुझे दिखने लगा था।
ख़ैर, मंदिर का भूमिपूजन हो गया और एक घेराबंदी की गई कि हम वामपंथी लोग ठीक से अभिव्यक्ति भी न कर पाएँ। हमारे एक ट्वीट पर तीन हजार लोग गरियाने आ जाते हैं। ट्रोलर अजीत भारती ने कल यहाँ तक लिख दिया कि मंदिर तो बन जाएगा, लेकिन बड़े दिल वाले मजहबी भाइयों को मस्जिद की पाँच एकड़ जमीन पर अस्पताल या स्कूल खोलने की पहल करनी चाहिए, समाज आशीर्वाद देगा।
ये क्या जान-बूझकर माहौल बिगाड़ने की कोशिश नहीं हो रही है? एक तो मस्जिद के लिए वहाँ जमीन दे दी गई जहाँ कोई मंदिर है ही नहीं, जबकि भारत में कई बड़े मस्जिद मंदिरों के ही ऊपर बनाए गए हैं। आप ही बताइए कि जिस देश में परंपरा यही रही हो कि मंदिर तोड़ो, मस्जिद बनाओ, या मंदिर न टूट रहा हो तो सीमेंट से उसकी दीवार सफेद रंग से पोत कर गुंबद लगा दो, हो गई मस्जिद, वहाँ आपने कहा कि खाली जमीन पर मस्जिद बना लो।
और तब इन मीडिया वालों को देखिए कि वो वक्फ बोर्ड से पूछते हैं कि मस्जिद कब बनेगा? जबकि वो लोग इस चक्कर में हैं कि जहाँ जमीन दी, वहाँ भी खोद कर देख लें कि नीचे कोई मंदिर तो नहीं क्योंकि मस्जिद बनते ही कुछ लोग ये याचिका न लगा दें कि रामलला घुड़कते हुए एक दिन वहाँ भी गए थे, अब मंदिर यहीं बनेगा। ये सब अच्छा लगता है क्या? एक समाज के तौर पर, एक जो तहजीब का दायरा है, एक जो बिरयानी के मसालों वाली बात है, एक जो रायता होता है, हमें वो सब भी देख कर चलना चाहिए।
आप ये बताइए कि कुछ लोग यह भी कहते पाए जाते हैं कि मुगलों ने कुछ नहीं दिया है, बस हिन्दुओं के मंदिरों को तोड़ कर गुंबद जोड़ देते थे। ये कितना गलत है अपने आप में! ठीक है कि ज्ञानवापी है, मथुरा है, भारत के 40,000 मंदिर हैं जिन्हें तोड़ दिया गया या गुंबद रख कर इस्लामी आक्रमणकारियों ने मस्जिद बना दी उसके ऊपर, लेकिन आप ये कैसे कह रहे हैं कि कुछ नहीं दिया? गुंबद किसने लगाई? सीमेंट-बालू, पत्थर, रंग आदि तो मुगलों या उसकी संतानों ने लगाया होगा न अपना? फिर आप ये कैसे कह देते हैं कि उन्होंने कुछ नहीं दिया? ये क्या समाज में वैमनस्य फैलाने वाली बात नहीं है?
राफेल आया तो उसके लैंडिंग की फोटो दिखाते रहे, मंदिर बन रहा है तो संस्कृत में चैनलों पर मंत्र पढ़ा जा रहा है… एक सेकुलर समाज में संस्कृत में मंत्र पढ़ना क्या हिन्दू तुष्टीकरण नहीं है? क्या दूसरी बार प्रधानमंत्री बने मोदी जी को बड़ा हृदय करते हुए ‘सब बुत उठवाए जाएँगे, बस नाम रहेगा अल्लाह का’ वाली नज्म फैज के फैजाबाद में बन रहे मंदिर में नहीं पढ़ना चाहिए था? अयोध्या में क्या सिर्फ ब्राह्मण ही रहते हैं कि कार्यक्रम संस्कृत में कराया गया? क्या ये दलितों को अलग-थलग करने की कोशिश नहीं है?
एक प्रधानमंत्री यजमान बन कर बैठे थे, क्या यह शोभा देता है? क्या यह प्रधानमंत्री पद की गरिमा के अनुरूप है? जो प्रधानमंत्री संविधान को प्रणाम करता है, वो राम को कैसे प्रणाम कर सकता है? उसे तो हमने इफ्तार पार्टी में जालीदार टोपी पहन कर केले खाते नहीं देखा, फिर रामलला को साष्टांग दंडवत् किया जा रहा है! एक राष्ट्र के नाम पर हम विश्व में क्या मुँह दिखाएँगे कि देखो यहाँ का प्रधानमंत्री एक मूर्ति के आगे लेट गया है?
मैं कल पूरे दिन इतना परेशान रहा कि क्या बताऊँ। कोई कह रहा था कि बाजार में मिट्टी का दीया नहीं मिल रहा है, कोई पटाखे ढूँढ रहा था, कोई कह रहा था चायनीज झालर मत खरीदना… सरयू किनारे योगी आदित्यनाथ ने फिर से दीपोत्सव करा दिया। इस आदमी को दीपों से इतना प्रेम है कि अगले साल से पाँच अगस्त को राजकीय दीवाली ही न मनाने लगे!
आप सोचिए कि दीपकों में तो घी या तेल पड़ा है, उससे कितने घरों में पूड़ियाँ छानी जा सकती थी! या फिर ठेले पर जो चाऊमीन बिकता है, एक दीपक के तेल से हाफ प्लेट तो बन ही जाता है अजीनोमोटो डाल कर। किसी गरीब को चाऊमीन खिला देते योगी जी, तो याद रखता। हो सकता है उनकी रैली में भी आता, उनका परमानेंट वोटर बन जाता। ऐसे ही तो परमानेन्ट वोटर बनते हैं कि कलावती के घर खाना खा लो, उसी के खर्चे का खाना, और वही कृतज्ञता में कॉन्ग्रेसी भी बन गई।
कोई कहता है कि कुम्हार ने दीये बनाए होंगे, तेल बेचने वाले ने तेल निकाला होगा, इन सबसे उनके घरों में भोजन बना होगा। ठीक है, बना होगा, लेकिन हाफ प्लेट चाऊमीन का जो आनंद मिलता है किसी गरीब को, जिसने कभी चाऊमीन खाई न हो, उसकी भरपाई क्या किसी गरीब कुम्हार के घर में भोजन बनने से हो सकेगी?
आप देखिए कि इस कार्यक्रम का हर भाग ऐसा था मानो हिन्दुओं का ही कार्यक्रम हो। देश सेकुलर है तो यहाँ मंदिर कैसे बन रहा है? संविधान में जब सेकुलर लिखा हुआ है तो यहाँ मंदिर कैसे बन रहा है? क्या हम बचपन से यह सीखते नहीं आए कि सेकुलर का मतलब ही होता है हिन्दुओं की हर चीज, हर प्रतीक, हर कर्मकांड, हर बात से घृणा करना। ऐसे में, मंदिर बना देना क्या संविधान की इस अवधारणा के खिलाफ नहीं?
क्या नेहरू जी ने राष्ट्रपति राजेन्द्र बाबू को सोमनाथ जाने से नहीं रोका था? क्या आपको लगता है कि नेहरू जी ने कुछ गलत किया होगा? आपको लगता है कि नेहरू जी कभी कुछ गलत कर सकते थे? उन्होंने डिस्कवरी ऑफ इंडिया की थी। वो असली सेकुलर थे, उन्होंने अपने समय में राम मंदिर नहीं बनने दिया क्योंकि यही तो भारत की पहचान है कि प्रधानमंत्री स्वयं को दुर्घटनावश हिन्दू मानता रहा। ये बात और है कि उनकी संततियों की संततियों के संततियों ने बार-बार योजनाबद्ध तरीके से हिन्दू बनने की कोशिश कर के बैलेंस करने की कोशिश की है। मुझे इसका दुख था, लेकिन क्या कर सकते हैं, घर जहाँ से चले, वहाँ ज्यादा सवाल नहीं करना चाहिए… हें हें हें!
मुझे तो मोदी के यजमान बनने से ज्यादा समस्या उस बेगूसराय के पंडित से है! बताइए बेगूसराय की धरती से कन्हैया जैसे महान विचारक और शोधार्थी हुए हैं, वहीं के एक पंडित ने अपने काम से काम नहीं रखा। एक तो पूरा कार्यक्रम संस्कृत का था, एक भी गालिब का शेर या फराज की गजल का कोई मिसरा नहीं कहा… बाबर ने जो गंगा-जमुनी तहजीब शाब्दिक तरीके से मिला दी थी कि मंदिर के ऊपर ही मस्जिद बनवा दिया, तो क्या पंडित जी से यह आशा नहीं की जा सकती कि वो उर्दू में ‘एक बिरहमन ने कहा है ये साल अच्छा है’ ही पढ़ देते? हिन्दुओं को लिए तो अच्छा ही है साल!
लेकिन नहीं, उर्दू का एक शब्द नहीं बोला गया उनसे! संस्कृत तक तो फिर भी बर्दाश्त हुआ क्योंकि हिन्दुओं ने खुद ही उसे त्याग दिया है तो उन्हें समझ में कहाँ से आता। लेकिन पंडित जी ने, यह जानते हुए कि सारे चैनल उसी डीडी न्यूज का फीड चला रहे हैं, हिन्दी में भी बताना शुरू किया। और जो वो हिन्दी में कह रहे थे, वो हिन्दुओं के लिए तो बड़ी अच्छी बात कही जा सकती है लेकिन, हम जैसे वामपंथियों की कितनी सुलग रही थी, वो हमें ही पता है। मुझे निजी तौर पर कहाँ-कहाँ कष्ट हुआ, और पूरे घर में कितना धुआँ भर गया, वो मैं ही जानता हूँ। इसकी क्या जरूरत थी?
पूरे दिन बर्फ की सिल्ली पर बैठा रहा और जलन ऐसी कि ‘जिया जले, जाँ जले, सिल्ली पर धुआँ चले’ हो गया। जैसे ऊर्ध्वपाती पदार्थ होते हैं न जो ठोस से सीधा गैसीय अवस्था को प्राप्त कर जाते हैं, वैसे ही आप यकीन मानिए कि बर्फ की सिल्ली ठोस बर्फ से सीधे वाष्पीकृत हो रही थी और रत्ती भर भी पानी नहीं बन पा रहा था। यूँ तो सिल्ली का लाभ मैंने पहले कई बार लिया है, क्यूब्स का भी सहारा लेता हूँ, लेकिन मंदिर वाला मसला इतना परीशाँ कर देगा, ये मैंने सोचा नहीं थ। वो तो अच्छा हो व्हाट्सएप के मित्रों का जिन्होंने बिना पैसे लिए सुबह ही कुछ सिल्लियाँ भिजवा दी थीं, जिसे मैंने सूती बोरे में लपेट कर रखा हुआ था। उन मित्रों को आभार जो मेरे स्वास्थ्य का इतना ध्यान रखते हैं, वरना कोरोना काल में तो घर से भी निकलना मुश्किल ही है। हें हें हें!
ख़ैर, ज्यादा समय नहीं लूँगा आपका क्योंकि अहमदाबाद के कोरोना अस्पताल में एक दुर्घटना हो गई है और मुझे उन लाशों पर राजनीति करनी है, मुझे ये दिखाना है कि ऐसी दुर्घटना दुनिया में पहली बार हुई। मुझे ये लिखना है कि ‘ये है गुजरात मॉडल’, और पीछे के कई पोस्ट के बारे में बताऊँगा कि कैसे मैंने अहमदाबाद पर काफी कुछ लिखा लेकिन कोई मेरी बात सुन नहीं रहा था।
अंत में, हिन्दुओं से अपील है कि रामजन्मभूमि पर उल्लास मनाइए, गाइए, नाचिए लेकिन यह भी याद रखिए कि आपकी खुशी के कारण बीस करोड़ लोगों को भयानक दर्द हो रहा है। आप हमेशा कहते हैं कि आप सहिष्णु हैं, मैं हमेशा कहता हूँ भारत इन्टोलरेंट हो गया है, तो आप ही की बात मान लेते हैं। आप बड़ा दिल दिखाइए, अभी भी कुछ बना नहीं है वहाँ, दे दीजिए मस्जिद वालों को जमीन, उन्हें अच्छा लगेगा।
अरे क्या हुआ कि नीचे मंदिर के अवशेष निकल आए? क्या हुआ कि लाखों हिन्दू पाँच सौ सालों में मुगलों द्वारा भी काटे गए, और मौलाना मुलायम द्वारा भी गोलियों के शिकार बने? क्या होता है इससे कि सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई में आपके पक्ष में निर्णय दे दिया? सत्य तो यही है न कि जो लोग कहते थे कि वो कोर्ट का फैसला मानेंगे, आज नहीं मान रहे… अब आप ही कहिए कि किसी को कोर्ट का फैसला ही स्वीकार्य नहीं तो क्या हम इसे न्याय मानेंगे? क्या गाँधी जी होते तो यह न कहते कि ‘अब्दुल तो अपना भाई है’?
क्या आप गाँधी जी से भी बड़े हैं? उन्होंने तो मंदिर में कुरान पढ़वाया था, मजहबी हत्यारों को वो माफ कर देते थे। आप एक मंदिर तक न दे सके? ये हिन्दू समाज की न्यायिक जीत जरूर है, लेकिन एक समाज के तौर पर हम हार गए हैं।