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हाथ-पैर-गर्दन काट सबको जला दिया, पिताजी की हड्डियाँ तक नहीं मिली: संभल लौटे बनवारी लाल के पुत्र, बताया- घास-फूस पर आटा लपेट पुतला बनाया, फिर किया अंतिम संस्कार

संभल में 1978 में हुए हिन्दू विरोधी दंगों की बर्बरता अब सामने आ रही है। इस दंगे में 180 से ज्यादा लोग मरे थे। दंगे में संभल के बड़े व्यापारी बनवारी लाल गोयल की भी हत्या की गई थी। उनके हाथ-पैर और गला काट कर जला दिया गया था। बनवारी लाल गोयल के बेटे विनीत गोयल अब वापस संभल लौटे हैं। उन्होंने बताया है कि किस तरह दंगाइयों के चलते वह अपने पिता की अस्थियाँ तक नहीं पा सके और उन्हें सांकेतिक रूप से उनका अंतिम संस्कार करना पड़ा।

विनीत गोयल ने कैमरे पर उस दंगे की सच्चाई बताई है। गोयल ने बताया कि उनका संभल में तब बहुत बड़ा एक अहाता था, जिसमें व्यापार होता था। दंगाइयों ने ट्रैक्टर लगाकर उस अहाते का गेट तोड़ दिया था। गोयल ने बताया कि उनके रसोइये हरद्वारी लाल ने यह सब पूरा माजरा देखा था। वह एक ड्रम में छुपे हुए थे। यहीं पर उनके पिता बनवारी लाल भी बाकी लोगों के साथ छुपे हुए थे। यह सभी दंगों के चलते दूसरी मंजिल की कोठरी में थे। उन्होंने बताया कि दंगाइयों को जब यह बात पता लगी तो वह बनवारी लाल समेत सबको नीचे ले आए।

विनीत गोयल के अनुसार, हरद्वारी लाल ने देखा था कि बनवारी लाल के मुस्लिम दंगाइयों ने हाथ-पैर काट दिए। उनकी पूरी दुकान और अहाते में पेट्रोल और मिट्टी का तेल डाल दिया गया और आग लगा दी गई। यहाँ पर टायरों में आग लगाई गई और विनीत गोयल के पिता समेत बाकी लोगों को इसी आग में झोंक दिया गया। इसी आग में जलकर सारे लोग मारे गए। किसी के शरीर तक नहीं बचे थे।

विनीत गोयल ने बताया कि इस कारण से उनको अपने पिता की अस्थियाँ तक नहीं मिली थी। गोयल ने बताया कि अपने पिता के चश्मे के एक हिस्से के सहारे उन लोगों ने यह पता किया था कि उनकी मौत हो गई। दंगे के एक माह के बाद उन्होंने फूल-पत्तों पर आटा लपेटकर उनका सांकेतिक दाह संस्कार किया था। विनीत गोयल के साथ के लोगों ने बताया कि संभल में हालात हमेशा ही खराब रहे हैं। उन्होंने बताया कि पीस कमेटी की बैठक में अच्छी-अच्छी बातें कही जाती थीं जबकि बाहर आकर कुछ भी नहीं बदलता था।

विनीत गोयल ने जो कुछ कैमरे पर बताया, कुछ वैसी ही बात हाल ही में ऑपइंडिया को मिली एक इंटरनल रिपोर्ट में भी लिखी हुई थी। यह रिपोर्ट संभल में हुए दंगों पर प्रशासन ने तैयार की थी। रिपोर्ट के अनुसार, बनवारी लाल गोयल को मुस्लिम दंगाइयों ने पकड़ा और कहा कि तुम इन पैरों से पैसे लेने आए हो और उनके पैर काट दिए। फिर कहा कि तुम इन हाथों से पैसे लेने आए हो और हाथ भी काट दिए। इसके बाद गर्दन काट कर उनकी हत्या कर दी गई। इस दौरान मुस्लिम दंगाइयों के सामने बनवारी लाल गिड़गिड़ाते रहे कि मुझे काटो मत, गोली मार दो।

इसके बावजूद भी उनकी मुस्लिम दंगाइयों ने एक ना सुनी और 24 लोगों समेत हत्या कर दी। विनीत गोयल के परिवार की मुश्किलें यहीं नहीं खत्म हुई। दंगे के बाद भी उन लोगों को न्याय नहीं मिल सका। इस दंगे का मामला 2010 में गवाह ना होने चलते बंद हो गया था। गवाहों पर किस तरह का दबाव रहा होगा इसे इस बात से समझा जा सकता है कि बनवारी लाल के बेटे विनीत गोयल के कारोबारी साझेदार रहे प्रदीप अग्रवाल के भाई की वसीम ने गोली मारकर हत्या कर दी।

उसने साथ ही धमकी दी कि यदि उसके खिलाफ किसी ने एफआईआर करवाई तो उसकी भी हत्या कर दी जाएगी। उसके खिलाफ कोई मामला दर्ज नहीं हुआ। दंगे में किसी को सजा ना हो इसके लिए बनवारी लाल के परिवार पर डॉक्टर शफीकुर रहमान बर्क की ओर से भी दबाव डाला गया था। बर्क संभल से समाजवादी पार्टी से सांसद रहे हैं। फिलहाल उनके पोते जियाउर्रहमान बर्क इस सीट से सपा के सांसद हैं। न्याय ना मिलने और लगातर प्रताड़ना के चलते 1993 में बनवारी लाल गोयल के परिवार ने संभल छोड़ दिया था और दिल्ली चले आए थे।

विनीत गोयल ने संभल लौट कर डीएम और एसपी से मुलाक़ात की है। उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से भी मिलने का प्रयास किया है। उन्होंने कहा है कि अगर दंगे में मारे गए उनके पिता को न्याय मिल जाता है, तो यह सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

बैंकों के कर्ज वसूलने के तरीकों पर हाई कोर्ट ने उठाए सवाल, कहा- डिफॉल्टरों का नाम-फोटो छाप उन्हें मजबूर नहीं कर सकते: निजता और सम्मान के अधिकार का बताया उल्लंघन

केरल हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि बैंक डिफॉल्टरों (कर्ज न चुकाने वालों) की तस्वीरें और जानकारी सार्वजनिक कर उन्हें कर्ज चुकाने के लिए मजबूर नहीं कर सकते। जस्टिस मुरली पुरुषोत्तम ने इसे व्यक्ति के गरिमा और प्रतिष्ठा के अधिकार का उल्लंघन बताया।

लाइव लॉ के मुताबिक, हाईकोर्ट ने कहा, “कर्ज चुकाने के लिए उधारकर्ताओं को उनकी प्रतिष्ठा और गोपनीयता को नुकसान पहुँचाने की धमकी देना गलत है। डिफॉल्टरों की तस्वीरें और जानकारी सार्वजनिक करना उनके गरिमा और सम्मान के अधिकार पर हमला है। किसी के जीवन और स्वतंत्रता को केवल कानूनी प्रक्रिया के तहत ही बाधित किया जा सकता है।”

कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसा कदम संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है, जो जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है। साथ ही, यह किसी कानून या नियम में बताए गए कर्ज वसूली के तरीकों में शामिल नहीं है।

यह मामला चेम्पझंथी एग्रीकल्चरल इंप्रूवमेंट कोऑपरेटिव सोसाइटी की ओर से दायर याचिका का था। याचिका में असिस्टेंट रजिस्ट्रार ऑफ कोऑपरेटिव सोसाइटीज के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें सोसाइटी के मुख्य कार्यालय के बाहर लगे फ्लेक्स बोर्ड को हटाने को कहा गया था। इस बोर्ड पर डिफॉल्टरों के नाम और तस्वीरें प्रदर्शित की गई थीं।

बैंक ने कोर्ट में अपनी सफाई देते हुए कहा कि उन्होंने इन डिफॉल्टरों को कई बार कर्ज चुकाने की अपील की थी। जब इसका कोई असर नहीं हुआ, तो उन्होंने यह कदम उठाया। बैंक ने यह भी बताया कि तस्वीरें और जानकारी सार्वजनिक करने के बाद कई लोगों ने कर्ज चुका दिया। इस सफलता से प्रेरित होकर, वे बैंक परिसर में एक और ऐसा बोर्ड लगाने की योजना बना रहे थे।

बैंक ने अपनी दलील में 1969 के केरल कोऑपरेटिव सोसाइटीज रूल के रूल 81 का हवाला दिया। उन्होंने इसे ‘टोम-टॉम’ प्रक्रिया के समान बताया, जो अचल संपत्तियों की कुर्की और बिक्री के दौरान अपनाई जाती है। इस पर कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि टोम-टॉम की प्रक्रिया अब पुरानी और अप्रचलित हो चुकी है। हालांकि, कोर्ट ने इस प्रक्रिया की वैधता पर कोई फैसला नहीं सुनाया क्योंकि यह मामला याचिका में शामिल नहीं था।

सम्मान देकर बांग्लादेश में हिंदू विरोधी हिंसा का जश्न मना रहा है ‘द इकॉनॉमिस्ट’, दिया ‘कंट्री ऑफ द ईयर’ अवॉर्ड: पश्चिमी मीडिया की ‘नैतिकता’ की फिर खुली पोल

हर साल दिसंबर महीने में यूरोपीय मैगज़ीन द इकॉनॉमिस्ट अपने प्रतिष्ठित ‘कंट्री ऑफ द ईयर’ अवॉर्ड की घोषणा करती है। यह पुरस्कार किसी देश की समृद्धि या खुशहाली को नहीं, बल्कि उस देश द्वारा किए गए महत्वपूर्ण सुधारों को आधार बनाकर दिया जाता है। ऐसा दावा खुद ‘द इकॉनॉमिस्ट’ ही करता है।

इस साल बांग्लादेश को यह सम्मान मिला है। द इकॉनॉमिस्ट ने कहा कि बांग्लादेश ने कथित ‘तानाशाही शासन’ को समाप्त करके यह अवॉर्ड प्राप्त किया। हालाँकि, इस दौरान मैगज़ीन ने बांग्लादेश में हिंदू समुदाय पर हो रही हिंसा और उत्पीड़न को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया।

द इकॉनॉमिस्ट के अनुसार, ये अवॉर्ड उन देशों को दिया जाता है जिन्होंने पिछले साल में महत्वपूर्ण प्रगति की हो। मैगज़ीन ने बताया कि बांग्लादेश ने शेख हसीना की सरकार को हटाकर ‘तकनीकी अंतरिम सरकार’ स्थापित की है, जिसकी अगुवाई नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस कर रहे हैं। इसके अलावा छात्र आंदोलनों की भी सराहना की गई, जिन्होंने शेख हसीना की सत्ता को समाप्त किया।

मैगज़ीन ने यह भी दावा किया कि शेख हसीना के हटने के बाद देश में ‘व्यवस्था बहाल’ हुई है और ‘आर्थिक स्थिरता’ आई है। लेकिन क्या सच में ऐसा हुआ है? हाल ही में बांग्लादेश ने भारत से 50,000 टन चावल की माँग की है और अडानी ग्रुप के बिजली बिल का बड़ा हिस्सा बकाया है। इसके अलावा बांग्लादेश का टेक्सटाइल उद्योग भी गंभीर संकट से गुजर रहा है। ऐसे में यह स्पष्ट नहीं है कि द इकॉनॉमिस्ट किस आर्थिक स्थिरता की बात कर रहा है।

लेकिन सबसे चिंता का विषय यह है कि द इकॉनॉमिस्ट ने बांग्लादेश में बढ़ती हिंदू विरोधी हिंसा और अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया। शेख हसीना की सरकार के गिरने के महज तीन दिनों के भीतर हिंदू मंदिरों, व्यवसायों और घरों पर 205 से अधिक हमले हुए। ऑपइंडिया ने इन घटनाओं का दस्तावेजीकरण किया है और अगस्त 2024 से बांग्लादेश में हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों पर हो रहे अत्याचारों पर विस्तार से रिपोर्ट दी है।

बांग्लादेश में हिंदू समुदाय पर हो रहे अत्याचारों का एक प्रमुख उदाहरण चिटगाँव में भगवान गणेश की मूर्तियों के साथ की गई तोड़फोड़ है। इसी तरह पबना और किशोरगंज जिलों में दुर्गा की मूर्तियों को नष्ट किया गया। ये घटनाएँ बांग्लादेश में धार्मिक असहिष्णुता के बढ़ते स्तर को दर्शाती हैं, लेकिन द इकॉनॉमिस्ट ने इन घटनाओं को पूरी तरह नजरअंदाज किया।

अब सवाल यह उठता है, क्या कोई देश सच में ‘सुधार’ कर सकता है, जबकि उसके अल्पसंख्यक समुदायों के खिलाफ हिंसा और दमन बढ़ रहा हो? भारत के विदेश मंत्रालय द्वारा संसद में प्रस्तुत किए गए आँकड़ों के अनुसार, बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर हमलों की संख्या पिछले तीन सालों में तेजी से बढ़ी है। 2022 में हिंदुओं पर 47 हमले दर्ज हुए थे, 2023 में यह संख्या 302 हो गई, जो 2022 के मुकाबले 545% अधिक थी। वहीं, 2024 में यह संख्या 2,200 तक पहुँच गई, जो 2023 से 628% और 2022 के मुकाबले 4,580% अधिक थी। इन आँकड़ों के बावजूद द इकॉनॉमिस्ट ने इन घटनाओं पर चुप्पी साध रखी है, जिससे उनकी ‘प्रगति’ की परिभाषा पर गंभीर सवाल उठते हैं।

हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों की अनदेखी

हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों को अनदेखा करना एक व्यापक समस्या का हिस्सा है, जो उपमहाद्वीप में हिंदू समुदाय के हाशिए पर जाने और उनके उत्पीड़न को दर्शाता है। हाल के महीनों में बांग्लादेश में कट्टरपंथी इस्लामी समूहों ने हिंदुओं पर हमले तेज कर दिए हैं। इन समूहों ने हिंदुओं और उनके संगठनों को परेशान करने के लिए ईशनिंदा के आरोपों का सहारा लिया है। हृदय पाल और उस्ताद मंडल के मामले इसका स्पष्ट उदाहरण हैं।

यहाँ तक कि इस्कॉन जैसे हिंदू संगठन भी इस अत्याचार से बच नहीं सके। इस्कॉन पर प्रतिबंध लगाने की कोशिश और हिंदू नेता चिन्मय कृष्ण दास प्रभु की गिरफ्तारी, हिंदू संस्थानों को निशाना बनाने की सोची-समझी रणनीति को दर्शाती है। अंतरिम सरकार द्वारा हिंदू विरोध प्रदर्शनों को दबाने और उन पर देशद्रोह जैसे झूठे आरोप लगाने के फैसले से यह साफ होता है कि उनकी स्वतंत्रता को खत्म करने के लिए एक साजिश चल रही है।

पश्चिमी देशों का सेलेक्टिव अप्रोच

पश्चिमी देशों की चयनात्मक नैतिकता इस समस्या को और बढ़ाती है। बढ़ते सबूतों के बावजूद वैश्विक संस्थाएँ और मीडिया हाउस इन अत्याचारों को नजरअंदाज कर रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय (OHCHR) ने इन नफरत से भरे अपराधों को दस्तावेज़ करने से परहेज किया है। हमारी एक रिपोर्ट के अनुसार, OHCHR ने इन हमलों को धार्मिक घृणा अपराध मानने से इनकार कर दिया है, जो हिंसा को नजरअंदाज करने की सोची-समझी कोशिश को दर्शाता है। इसके बजाय, वे व्यापक सांप्रदायिक मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करते हैं और इन घटनाओं के धार्मिक पहलुओं को छिपा देते हैं।

भारतीय मीडिया पोर्टल द वायर ने भी बांग्लादेश में हिंदुओं के उत्पीड़न की गंभीरता को छिपाने या कमकर दिखाने का प्रयास किया है। हाल ही में एक खुलासे में यह पाया गया कि द वायर ने जातीय सफाए को ‘अतिरंजित’ या ‘राजनीतिक रूप से प्रेरित’ बताने की कोशिश की है, जिससे कट्टरपंथी इस्लामी समूहों की जिम्मेदारी को कम किया गया। ऐसी रिपोर्टिंग न केवल पाठकों को गुमराह करती है, बल्कि यह उन खतरनाक विचारों को बढ़ावा देती है, जो हिंदू अल्पसंख्यकों के दर्द और पीड़ा को कमतर आँकते हैं।

बीबीसी ने भी बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ हुई हिंसा की रिपोर्टिंग के लिए आलोचना का सामना किया है। ऑपइंडिया की एक रिपोर्ट में बताया गया कि कैसे बीबीसी ने हिंदुओं के खिलाफ टारगेटेड हिंसा और हमलों को ‘राजनीतिक हिंसा’ के तौर पर पेश किया और धार्मिक मामले को नजरअंदाज किया। बीबीसी ने इसे व्यापक राजनीतिक अशांति से जोड़ते हुए इस बात को छिपा दिया कि यह हिंसा सुनियोजित तरीके से हिंदुओं पर हो रही है। इससे न केवल हिंदुओं के खिलाफ हो रहे व्यवस्थित उत्पीड़न को अनदेखा किया गया, बल्कि अंतरिम सरकार और अपराधियों की जिम्मेदारी को भी कम कर दिया गया।

पश्चिमी मीडिया और संस्थाओं का यह दोहरा रवैया लंबे समय से जारी है। द इकॉनॉमिस्ट, द वायर और बीबीसी जैसे मीडिया पोर्टल्स ने लगातार हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों की गंभीरता को कम करके दिखाया है। वे इन घटनाओं को अक्सर ‘राजनीतिक’ या ‘आर्थिक अशांति’ के रूप में पेश करते हैं और धार्मिक संदर्भों को नजरअंदाज करते हैं। इस तरह की रिपोर्टिंग न केवल हिंदुओं के उत्पीड़न की गंभीरता को गलत तरीके से पेश करती है, बल्कि अपराधियों को अंतरराष्ट्रीय मंच पर जिम्मेदारी से बचने का मौका भी देती है।

द इकॉनॉमिस्ट का हिंदू-विरोधी पक्षपात पुराना

सालों से द इकॉनॉमिस्ट ने यह साबित किया है कि उसका हिंदुओं, हिंदुत्व और भारतीय सरकार खासतौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ स्पष्ट झुकाव है। यह पक्षपात लगातार हिंदू राष्ट्रवाद को ‘चरमपंथी’ आंदोलन के रूप में पेश करने के प्रयासों में दिखता है, जबकि इसके ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक संदर्भों को अनदेखा किया गया है।

हमारे शोध के दौरान यह पाया गया कि द इकॉनॉमिस्ट की रिपोर्टिंग में एक बार-बार दोहराया जाने वाला विषय है, जिसमें हिंदुत्व को एक रूढ़िवादी और वर्चस्ववादी विचारधारा के रूप में दिखाया गया है। उदाहरण के लिए, अपने एक लेख ‘What is Hindutva, the ideology of India’s ruling party?’ में इस मैगजीन ने हिंदुत्व को अल्पसंख्यकों को हाशिए पर डालने वाले हथियार के तौर में पेश किया।

इसके साथ ही द इकॉनॉमिस्ट भारत की नीतियों और घटनाओं के संदर्भ को तोड़-मरोड़कर पेश करने या पूरी तरह अनदेखा करने का प्रयास करता है। उदाहरण के तौर पर, उसने नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) की आलोचना करते हुए इसे भेदभावपूर्ण कानून बताया, जबकि इसके मूल उद्देश्य को नजरअंदाज कर दिया।

प्रधानमंत्री मोदी के शासन की कवरेज भी द इकॉनॉमिस्ट के इस पक्षपाती दृष्टिकोण को दिखाती है। उदाहरण के लिए, “How Narendra Modi is remaking India into a Hindu state” जैसे लेखों में पत्रिका ने सरकार पर अल्पसंख्यकों के खिलाफ भीड़ द्वारा हिंसा को बढ़ावा देने का आरोप लगाया, जबकि सरकार द्वारा चलाए जा रहे कई कल्याणकारी योजनाओं को पूरी तरह अनदेखा कर दिया।

वास्तव में द इकॉनॉमिस्ट का हिंदू विरोधी और पक्षपाती रवैया केवल भारतीय राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वैश्विक स्तर पर हिंदू विरोधी विचारों को बढ़ावा देने का प्रयास करता है। इस पत्रिका की रिपोर्टिंग और इसके द्वारा उठाए गए मुद्दे अक्सर इस विचारधारा का समर्थन करते हैं, जिसमें हिंदुओं के धार्मिक पहचान को निशाना बनाया जाता है और हिंदुओं पर ही चरमपंथ के आरोप लगाए जाते हैं, जोकि सच्चाई से एकदम उलट है।

(मूल रूप से ये लेख अंग्रेजी भाषा में लिखा गया है। मूल लेख पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

दिल्ली में लाकर बसाता था जो शेख, बांग्लादेशी घुसपैठियों ने उसको ही मार डाला…हत्या की गुत्थी सुलझाते-सुलझाते दिल्ली पुलिस ने पकड़ लिया फेक आधार-वोटर कार्ड बनाने वाला पूरा गैंग

दिल्ली में अवैध घुसपैठियों के विरुद्ध वर्तमान में बड़ा अभियान चल रहा है। इसी कड़ी में घुसपैठियों के भारतीय पहचान पत्र बनाने वाले एक बड़े गिरोह के 11 लोग गिरफ्तार किए गए हैं। पकड़े गए लोगों में से 5 बांग्लादेशी हैं जबकि बाकी भारतीय हैं। पकड़े गए में गिरोह आधार कार्ड ऑपरेटर और टेक्निकल एक्सपर्ट भी शामिल हैं। इनके द्वारा अब तक बनाए गए पहचान पत्रों और उसे बनवाने वालों की भी पड़ताल चल रही है।

दिल्ली पुलिस ने यह कार्रवाई मंगलवार (24 दिसंबर, 2024) को की है। दिल्ली के DCP दक्षिणी अंकित चौहान ने इस कार्रवाई की जानकारी मीडिया से साझा की है। उन्होंने बताया है कि जंगलों के रास्ते भारत में घुसपैठ करने वाले बांग्लादेशी विभिन्न रास्तों से दिल्ली पहुँच कर इस गिरोह से मिलते थे। पकड़े गए लोगों ने उस शेख की हत्या भी कर दी थी जो यहाँ उन्हें बांग्लादेश से लाता था।

DCP अंकित चौहान ने बताया, “हमने कुछ दिन पहले 4 लोगों को हत्या के एक मामले में पकड़ा था। उन्होंने बताया कि वह बांग्लादेशी हैं। उन्होंने सेंटो शेख नाम के एक आदमी ने उन्हें बुलाया था। उसने यहाँ दिल्ली के रोहिणी इलाके में पूनम कम्प्यूटर सेंटर चलाने वाले साहिल से मिलकर इन बांग्लादेशियों का फर्जी जन्म प्रमाण पत्र बनवाया। उनका आधार कार्ड भी बनवाया गया। 11 लोग गिरफ्तार किया गया है। इसमें 5 बांग्लादेशी और 6 उनके मददगार शामिल हैं।”

DCP अंकित चौहान ने बताया, “यह लोग जंगल के रास्ते भारत आते हैं। इसके बाद यह फर्जी कागजों के सहारे दिल्ली तक आते हैं। इसके बाद यह दिल्ली आकर फर्जी कागज बनाने वाले नेटवर्क से मिलकर आधार कार्ड वगैरह हासिल करते हैं। इसमें एक वेबसाइट का भी खुलासा हुआ है। इस वेबसाइट से फर्जी कागज बनाए जाते थे। यह वेबसाइट रजत मिश्रा, सद्दाम, सोनू कुमार और चाँद मोहम्मद मिलकर चलाते थे। इससे 228 प्रमाण पत्र 2 अकाउंट से बनाए गए हैं। कुल प्रमाण पत्र हजारों में हो सकते हैं।”

उन्होंने यह भी बताया कि एक महिला ने भारत में आकर अपना वोटर कार्ड भी बनवा लिया था। उसको भी पकड़ा गया है। पुलिस ने बताया है कि वह दिल्ली में घुसपैठियों की रोज तलाश कर रहे हैं। गौरतलब है कि यह घुसपैठिए कबाड़ बीनने से लेकर फैक्ट्रियों में काम करने में लगे हुए हैं। इन सभी से पूछताछ की जा रही है।

पुलिस यह भी पड़ताल कर रही है कि इनके द्वारा बनाए गए पहचान पत्रों का उपयोग कर के कौन सा घुसपैठिया कहाँ रह रहा है। इन गिरोह में शामिल अन्य लोगों की भी जानकारी जुटाई जा रही है। इन्होंने कितने फर्जी दस्तावेज अब तक तैयार कर दिए, इस पर भी जाँच हो रही है।

गौरतलब है कि फरवरी,2025 में दिल्ली में होने जा रहे विधानसभा चुनावों से पहले उपराज्यपाल वी के सक्सेना ने पुलिस को अवैध घुसपैठियों के खिलाफ सघन अभियान चलाने का आदेश दिया है। इस अभियान के तहत अब तक 175 संदिग्ध बांग्लादेशी की पहचान की जा चुकी है। उनके कागजों का सत्यापन हो रहा है। इसके अलावा दिल्ली के स्कूलों को भी यह आदेश मिला है कि वह अवैध घुसपैठियों के बच्चों को दाखिला ना दें। भाजपा इससे पहले आरोप लगाती आई है कि दिल्ली में आम आदमी पार्टी सरकार ने अवैध घुसपैठियों को संरक्षण दिया है।

‘गरीब नवाज’ कहलाए मणिपुर के मैतेई राजा पम्हीबा, हिंदुत्व को बनाया राजधर्म, संस्कृत में रखा राज्य का नाम: जन्म के बाद से ही मौत को देते रहे मात, खौफ खाता था बर्मा

भारत के पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर कुकी और मैतेई के बीच जातीय हिंसा के कारण पिछले कुछ समय से चर्चा में है। हाल के दिनों में मणिपुर और मिज़ोरम के साथ-साथ और बांग्लादेश और म्यांमार के कुछ क्षेत्रों में बसे कुकी ईसाइयों पर ‘ज़ोगाम’ या ‘ज़लेनगाम’ नाम से एक अलग ईसाई देश बनाने के प्रयासों का आरोप लगा है। हालाँकि, ऐतिहासिक रूप से मणिपुर एक मैतेई राज्य था।

मणिपुर की खूबसूरत धरती पर पम्हीबा नाम के एक राजा राज करते थे। यह बहुत पुरानी बात नहीं। है। साल 1690 में जन्मे पम्हीबा को मणिपुर राज्य में बड़ सामाजिक-राजनीतिक एवं धार्मिक परिवर्तनों के लिए याद किया जाता है। अपनी प्रजा के लिए उन्होंने जो कुछ किया, इसके कारण राजा पम्हीबा को गरीब नवाज भी कहा जाता था। गरीब नवाज फारसी शब्द है, जिसका अर्थ दयालु या प्रजा वत्सल है।

पम्हीबा का जन्म और मौत का साया

राजा चराइरोंग्बा और छोटी रानी नंगशेल छराइबी के बेटे पम्हीबा सन 1709 में कांगलीपाक के राजा बने। उस समय उनकी उम्र सिर्फ 19 साल थी। उस समय मणिपुर को कांगलीपाक के नाम नाम से जाता था। यह नाम मैइतेई लोगों की स्थानीय संस्कृति और मान्यताओं से जुड़ा था। इस राज्य के लोग सनमाहिम या कांगलेइ परंपरा को मानते थे। ये लोग जीववादी थे और अपने पूर्वजों की पूजा किया करते थे।

लेखक विक्रम संपत ने अपनी किताब ‘शौर्य गाथाएँ: भारतीय इतिहास के अविस्मरणीय योद्धा’ में लिखा है कि उस समय मैतेई राजपरिवार में एक नृशंस परंपरा थी। बड़ी रानी के अलावे अन्य रानियों के बेटों को मार दिया जाता था। इसके पीछे उद्देश्य था कि बड़े बेटे के उत्तराधिकार को लेकर कोई अन्य बेटा समस्या ना पैदा करे और इसके कारण कोई सत्ता संघर्ष भी ना हो।

पम्हीबा राजा चराइरोंग्बा की सबसे छोटी रानी के बेटे थे। इसलिए वे भी मौत के घाट उतारे जाते, इससे पहले ही उनकी माँ ने गुपचुप तरीके से पम्बीहा को एक नगा कबीले के सरकार के घर भेजवा दिया। बाद में बड़ी रानी को पता चला कि छोटी रानी का भी बेटा है तो वह उसे मरवाने की लगातार कोशिशें करती रहीं, लेकिन पम्हीबा हर बार बच जाते थे।

विक्रम संपत ने अपनी किताब में लिखा है कि राजा चराइरोंग्बा को किसी अन्य रानी से कोई बेटा नहीं हुआ। आखिरकार वे अपने उत्तराधिकारी की तलाश करने लगे। एक दिन राजा चराइरोंग्बा एक गाँव से गुजर रहे थे। वहाँ कुछ बच्चे खेल रहे थे। उन्हें उसमें एक बच्चे को बेहद होशियार एवं निडर देखा। वह बच्चा पम्हीबा थे। इसके बाद उन्हें लेकर राजा राजमहल आ गए और बाद मे उन्हें अपनी गद्दी सौंपी।

मणिपुर का हिंदू राज्य के रूप में उदय

राजा चराइरोंग्बा ने भारत के बाकी राज्यों के साथ भी अपने राजनयिक संबंध बनाने शुरू कर दिए थे। इसके साथ ही उनका झुकाव हिंदू धर्म की ओर बढ़ चला था। उन्होंने हिंदू प्रथाओं का पालन करना भी शुरू कर दिया था। जब पम्हीबा राजा बने तो ये संबंध और भी मजबूत मजबूत हुए। इतना ही नहीं, पम्हीबा ने हिंदू धर्म अपना लिया और इसे अपने राज्य का मुख्य धर्म घोषित कर दिया।

कहा जाता है कि सन 1717 में राजा पम्हीबा शांतिदास गोसाईं (जिन्हें गोशाई भी लिखा जाता है) के प्रयासों से हिंदू धर्म के संपर्क में आए। गोसाईं बंगाल के सिलहट के एक वैष्णव प्रचारक और चैतन्य संप्रदाय के अनुयायी थे। शांतिदास के मार्गदर्शन में पम्हीबा ने वैष्णव धर्म को अपनाया। वैष्णव संप्रदाय भगवान विष्णु, भगवान राम और कृष्ण को समर्पित भक्ति संप्रदाय है।

राजा के हिंदू बनने के साथ ही वहाँ की प्रजा पर भी इसका बड़ा प्रभाव पड़ा। कांगलीपाक के मैतेई समुदाय के लोग भी बड़ी संख्या में हिंदू धर्म को अपनाने लगे। इसके कारण कुछ पारंपरिक मैतेई अनुष्ठानों का कायापलट हो गया या फिर उन्हें हिंदू रीति-रिवाजों से बदल दिया गया या उनमें मिला दिया गया। इस तरह हिंदू धर्म का प्रभाव बढ़ता रहा। सन 1724 में उन्होंने कांगलीपक का नाम मणिपुर कर दिया।

मणिपुरी नृत्य के जरिए राधा-कृष्ण की पूजा

राजा पम्हीबा अपने लोगों या बाहर से आने वाले व्यापारियों को लेकर इतने उदार थे कि मुस्लिम प्रवासी उन्हें गरीब नवाज कहने लगे थे। हालाँकि, राजा पम्हीबा का हिंदू नाम गोपाल सिंह था। उन्होंने अपने दरबार में मंदिर बनवाए और हिंदू रीति-रिवाज अपनाए। राजा पम्हीबा को मणिपुरेश्वर के नाम से भी जाना जाता था, क्योंकि उन्होंने कंगलीपाक का नाम बदलकर संस्कृत नाम मणिपुर रख दिया था।

राजा पम्हीबा ने राजधानी इम्फाल में ब्रह्मपुर गुरुआरीबाम लेईकाई के श्रीकृष्ण मंदिर सहित कई हिंदू मंदिरों का निर्माण करवाया था। हालाँकि, उस दौरान मैतेई देवताओं के कई मंदिरों को या तो ध्वस्त कर दिया गया या हिंदू मंदिर बना दिया गया। पम्हीबा के वंशज राजा भाग्यचंद्र उर्फ जय सिंह और गंभीर सिंह आदि ने भी हिंदू मंदिरों का निर्माण जारी रखा। राजा भाग्यचंद्र ने ‘रासलीला नृत्य’ का आविष्कार किया था।

मणिपुर में हिंदू धर्म के उदय का श्रेय राजा पाम्हीबा को देते हुए टीसी होडसन ने अपनी पुस्तक ‘द मीथिस’ में लिखा है, “पाम्हीबा (गरीब निवाज), जिनके शासनकाल में राज्य का भाग्य अपने चरम पर पहुँच गया, उनकी शाही इच्छा के कारण हिंदू धर्म को राज्य के आधिकारिक धर्म के रूप में अपनी वर्तमान स्थिति प्राप्त हुई है।” इसी तरह 33 ईस्वी से चला आ रहा राजपरिवार हिंदू बन गया।

टीसी हडसन की किताब का हिस्सा

हालाँकि, मैतेई समुदाय के बीच हिंदू धर्म का विस्तार काफी पुरानी घटना है। एसके चटर्जी ने अपनी पुस्तक ‘किरात-जन-कृति: द इंडो-मंगोलोइड्स; देयर कंट्रीब्यूशन टू द हिस्ट्री एंड कल्चर ऑफ इंडिया’ में लिखा है, “ऐसा प्रतीत होता है कि मैतेई या मणिपुरी कम-से-कम 8वीं शताब्दी की शुरुआत में हिंदू धर्म में शामिल हो गए थे जब उनके बीच वैष्णव धर्म फैल गया था।”

अभिलेखीय साक्ष्यों के आधार पर कुछ इतिहासकारों का मानना ​​है कि 8वीं शताब्दी के अंत तक मणिपुर हिंदू संस्कृति के प्रभाव में आ गया था। राजा खोंगटेकचा (765-799 ई.) द्वारा शक संवत 721 (799 ई.) को मणिपुरी लिपि में जारी एक ताम्रपत्र को मणिपुरी पुरातत्वविद् युमजाओ सिंह ने इम्फाल से लगभग 9 मील पश्चिम में फेयेंग गाँव से खोजा था। इस पर शिव, दुर्गा, हरि, गणेश और अन्य हिंदू देवताओं की पूजा के प्रचलन का जिक्र था।

बर्मा के खिलाफ पम्हीबा का सैन्य अभियान

राजा पम्हीबा न केवल प्रजा वत्सल शासक थे, बल्कि वे एक महत्वाकांक्षी सैन्य संचालक भी थे। उनके शासन के दौरान मणिपुर ने पूर्व में बर्मा और पश्चिम में छोटे राज्यों के खिलाफ सफल सैन्य अभियान चलाया और उन्हें मणिपुर में मिलाकर अपने क्षेत्रों का काफी विस्तार किया। राजा पम्हीबा ने 1725 में पहली बार बर्मा पर आक्रमण किया, लेकिन वास्तविक उपलब्धि 1737 में मिली।

उस दौरान मैतेई सेना ने थोड़े समय के लिए बर्मा की राजधानी अवा सहित बर्मा की भूमि के बड़े हिस्से पर कब्ज़ा कर लिया था। बर्मा के खिलाफ़ उनके अभियान का मकसद अपने राज्य को उसके हमले से बचाना था। कहा जाता है कि शादी की पार्टी की आड़ में घात लगाकर बर्मा की सेना को हराया था। वहाँ से मणिपुर की सेना को काफी मात्रा में धन संपत्ति भी मिला था।

पम्हीबा के प्रभाव वाले इलाके (साभार: ImphalReviews)

बर्मा पर हमले के पीछे एक प्रमुख कारण उनके पिता चराइरोंग्बा से किया गया वादा भी था। ‘समसोक न्गाम्बा’ में कहा गया है कि बर्मी राजा ने अपने पिता के शासनकाल के दौरान पम्बीहा की बहन का कथित तौर पर अपमान किया था। इसका बदला वे नहीं ले सके थे। सिंहासन पर बैठने के बाद पम्हीबा ने जवाबी कार्रवाई करने की कसम खाई और बर्मा के खिलाफ कई सफल सैन्य अभियान शुरू किए।

वहीं, संपत अपनी किताब में लिखते हैं कि 1725 में बर्मा के राजा तानिंगान्वे लड़ाई हार गए। इसके बाद पम्बीहा ने उन्हें शांति वार्ता के लिए बुलाया। उस दौरान तानिंगान्वे ने दंभपूर्ण रवैया अपनाते हुए पम्बीहा की बहन सत्यमाला से विवाह का प्रस्ताव रख दिया। यह एक हारे हुए राजा की तरफ से दिया जाने वाला प्रस्ताव अपमानजनक था।

हालाँकि, पम्बीहा ने कुछ सोचकर इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। जब सत्यमाला के साथ शादी के लिए बर्मा का राजा तानिंगान्वे मणिपुर पहुँचा तो वहाँ बारातियों को ठहराया गया। इसके बाद मणिपुरी सैनिक सामान्य वेश में वहाँ पहुँचकर बर्मा के सेना का कत्लेआम मचा दिया। इस तरह से अपने और अपनी बहन के अपमान का बदला पम्बीहा ने ले लिया।

अमेठी में दलित जेठूराम ने बनवाया मंदिर, मुस्लिमों ने कब्जा कर पूजा-पाठ बंद करवाई: स्थानीय लोगों ने की जीर्णोद्धार की माँग, संभल के कूप से फूटी जलधारा

उत्तर प्रदेश के अमेठी जिले में एक 120 साल पुराने मंदिर पर मुस्लिमों के कब्जे का मामला सामने है। यह पंच शिखर शिव मंदिर एक दलित जेठूराम ने बनवाया था, जो पिछले 20 सालों से मुस्लिम समुदाय के कुछ लोगों के कब्जे में था। इस कब्जे के बाद मंदिर में पूजा-पाठ बंद करवा दी गई थी। ग्रामीणों की शिकायत पर प्रशासन ने जाँच शुरू कर दी है और मंदिर की मुक्ति व जीर्णोद्धार की माँग की गई है। इस बीच, संभल में एक कुएँ में जलधारा मिली है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ये मामला अमेठी के मुसाफिरखाना थाना इलाके का है। यहाँ गाँव औरंगाबाद के ग्रामीणों ने एक मंदिर पर कब्ज़े की शिकायत अमेठी के ADM से की है। ग्रामीणों का आरोप है कि उनके 120 साल पुराने आस्था केंद्र पंच शिखर शिव मंदिर पर मुस्लिमों ने कब्ज़ा जमा लिया है। इस मंदिर को तब जेठूराम नाम के एक दलित ने बनवाया था। लगभग 2 दशक पहले किए गए इस कब्ज़े के बाद वहाँ पूजापाठ भी बंद करवा दी गई।

ग्रामीणों ने बताया कि औरंगाबाद के इस मंदिर की देखरेख पहले पुजारी गणेश तिवारी और उनका परिवार करता था। लेकिन करीब दो दशक पहले उन्हें पलायन करना पड़ा। ग्रामीणों का कहना है कि इसके बाद मुस्लिम समुदाय के कुछ लोगों ने मंदिर पर कब्जा कर लिया। ऑपइंडिया के पास शिकायत कॉपी मौजूद है।

इस मामले में भाजपा कार्यकर्ता भी सक्रिय हो गए हैं और अवैध कब्जेदारों पर कार्रवाई की माँग कर रहे हैं। अमेठी की ADM ने इस मामले की जाँच स्थानीय तहसीलदार को सौंप दी है। जाँच रिपोर्ट आने के बाद आगे की कार्रवाई अमल में लाई जाएगी।

संभल के बंद पड़े कुएँ में मिली जलधारा

इस बीच संभल में कब्ज़े के शिकार कुओं की तलाश में एक नया मोड़ आया है। संभल जिले के नैमिषारण्य तीर्थ क्षेत्र में एक पुराने कुएँ से जलधारा फूटने की खबर ने लोगों को उत्साहित कर दिया है। महंत बालयोगी दीनानाथ ने खुदाई के दौरान इस कुएँ को खोजा, जिसमें 20 फीट नीचे जलधारा बहती मिली। जलधारा मिलने की सूचना पर यहाँ भक्तों की भीड़ जुटने लगी है।

बता दें कि संभल के जिलाधिकारी राजेंद्र पैंसिया और पुरातत्व विभाग (ASI) ने जिले के 19 प्राचीन कुओं और 68 तीर्थों की खोज के लिए अभियान छेड़ रखा है। अब तक 22 सूखे कुएँ खोजे जा चुके हैं। प्रशासन इन स्थानों को पुनर्जीवित करने की दिशा में प्रयासरत है।

ब्रिटेन के फौजी ने करवाया पंजाब के थाने पर हमला, एप के जरिए खालिस्तानी आतंकियों के लोकेशन का लगा सुराग: पढ़िए पीलीभीत एनकाउंटर की इनसाइड स्टोरी

उत्तर प्रदेश में तराई के जिले पीलीभीत में सोमवार (23 दिसम्बर, 2024) को सुबह-सुबह तीन खालिस्तानी आतंकियों का एनकाउंटर हो गया। यह तीनों पंजाब के गुरदासपुर में एक पुलिस चौकी पर ग्रेनेड हमला करके भागे थे। यह यूपी के पीलीभीत से नेपाल जाने की जुगत में थे। हालाँकि, इससे पहले ही पंजाब पुलिस को इनकी सूचना मिल गई और यूपी पुलिस ने इसके बाद इन तीनों को ढेर कर दिया। इनके एनकाउंटर के बारे में अब कई जानकारियाँ सामने आई हैं। यह भी पता चला है कि इनका हैंडलर एक ब्रिटिश सिख सैनिक है।

कैसे लगा आतंकियों का सुराग?

इन आतंकियों ने 19 दिसम्बर, 2024 को गुरदासपुर के बटाला में एक पुलिस चौकी पर हमला किया था। इसके बाद गुरविंदर, वीरेंद्र और जशनप्रीत, तीनों ही गायब हो गए थे। पंजाब पुलिस लगातार इनकी तलाश में लगी हुई थी। यह वहाँ से सैकड़ों किलोमीटर भाग कर यूपी के पीलीभीत आए थे। पंजाब पुलिस ने इनका पता लगाने के लिए सर्विलांस लगाया हुआ था। हालाँकि, इनका फोन ऑफ था। मीडिया रिपोर्ट्स में बताया गया है कि इन आतंकियों ने एक ऐसे एप पर हमले की वीडियो डाली थी, जो इन्हीं कामों के लिए इस्तेमाल होता है।

पंजाब पुलिस ने इस वीडियो के शेयर उनकी लोकेशन ट्रेस की। इसके बाद वह यूपी के पीलीभीत पहुँची। वहीं यह भी सामने आया कि इन आतंकियों ने कुछ समय के लिए अपना फोन ऑन किया था, इससे भी इनके बारे पता चला। इसके बाद दोनों जगह की पुलिस ने अपना ऑपरेशन चलाया और तीनों को मार गिराया गया। इन आतंकियों से जहाँ पर मुठभेड़ हुई, वह पूरनपुर का इलाका है और यहाँ सिख आबादी काफी है। यह इलाका जंगली भी है, जिससे छिपने में आसानी होती है। आतंकियों के पास से बरामद हुई बाइक भी चोरी की थी।

इनका सरगना अब पाकिस्तान में

पीलीभीत में मार गिराए गए तीनों आतंकी खालिस्तान जिंदाबाद फ़ोर्स नामक आतंकी संगठन का हिस्सा थे। इसका मुखिया रंजीत सिंह उर्फ़ नीता है। वह मूल रूप से जम्मू का रहने वाला है। वह वर्तमान में पाकिस्तान भाग चुका है और वहीं से अपनी आतंकी गतिविधि चलाता है। उसने 1993 में यह संगठन बनाया था। शुरुआत में वह अपने आतंकी जम्मू क्षेत्र से ही जुटाता था। टाइम्स ऑफ़ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, इसका मुख्य निशाना जम्मू से दिल्ली चलने वालीं बसें रही हैं।

यह संगठन 2009 में एक सिख धर्मगुरु की हत्या में भी शामिल रहा है। यहाँ तक कि इसने ऑस्ट्रिया के विएना में भी एक सिख धर्मगुरु की हत्या करवाई थी। बीते कुछ समय से इस समूह ने अपना ट्रैक बदल लिया है। अब यह पुलिस को निशाना बना रहा है। पंजाब में हाल के वर्षों में कई पुलिस चौकी या थानों को निशाना बनाया गया है। हाल में गुरदासपुर में हुआ हमला भी इसी नीयत से किया गया था। इस संगठन का नेटवर्क भारत के अलावा ब्रिटेन, ग्रीस समेत बाकी कई देशों में भी है।

ब्रिटिश सैनिक था तीनों आतंकियों का हैंडलर

इस एनकाउंटर से एक और चौंकाने वाली जानकारी सामने आई है। पंजाब पुलिस के मुखिया गौरव यादव ने इस एनकाउंटर की सफलता के बाद बताया है कि इस पूरे आतंकी नेटवर्क को सरगना नीता के जरिए ग्रीस में बैठा जसविंदर सिंह मन्नू चलाता है। इसी से ब्रिटिश सैनिक जगजीत सिंह जुड़ा हुआ है। यह ब्रिटिश सैनिक मूल रूप से भारत का ही निवासी है। उसने अपना एक दूसरा नाम भी रख लिया है। अब वह अपने आप को फ़तेह सिंह बागी बताता है। जगजीत सिंह लगभग 10 वर्ष पूर्व भारत से इंग्लैंड पढ़ने के लिए गया था।

इसके बाद वह यहाँ की सेना में शामिल हो गया। उसने अफगानिस्तान में भी ब्रिटिश फ़ौज को अपनी सेवाएँ दी हैं। आशंका है कि इसी जगजीत सिंह ने गुरदासपुर में चौकी पर ग्रेनेड से हमला करवाया है। इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में सामने आया है कि उसका परिवार भारतीय सेना में रहा है। उसके पिता और दादा भी भारतीय सेना में अलग-अलग पदों पर रहे हैं जबकि उसका एक भाई भी भारतीय सेना में रहा है। बताते हैं कि वह इन खालिस्तानी हमलों को सोशल मीडिया पर डालता है और सिख युवाओं को बरगलाता है। उसके ISI से भी लिंक तलाशे जा रहे हैं।

कई सवालों के जवाब अब भी नहीं

इस एनकाउंटर के बाद भी कई सवालों के जवाब अभी नहीं मिले हैं। पुलिस अभी यह नहीं बता पाई है कि आखिर यह पंजाब से यूपी के भीतर कैसे पहुँचे। इसके अलावा यह भी नहीं सामने आया अहि कि आखिर इन्होने भागने के लिए पीलीभीत ही क्यों चुना। हमले के दो दिन तक वह यहाँ रहे तो उन्हें यहाँ शरण किसने दी और वह किस होटल में रुके। इसके अलावा उनके खाने-पीने से लेकर बाकी इंतजाम किसने किया। पुलिस को यह भी नहीं मालूम हो पाया है कि यह नेपाल किस रस्ते से जाने वाले थे।

पुलिस को एनकाउंटर में आंतकियों के पास से 2 AK-47 समेत विदेशी पिस्टल भी मिली हैं। इन हथियारों का स्रोत क्या है, यह जानकारी भी अभी सामने नहीं आई है। इन आतंकियों के स्थानीय स्तर पर क्या कनेक्शन थे, इन सवालों के जवाब पुलिस तलाश रही है। जिस खालिस्तानी आतंकी संगठन से यह जुड़े हुए थे, क्या उसकी जड़ें यूपी के पीलीभीत या फिर सिख जनसंख्या वाले लखीमपुर खीरी में भी हैं, इस बात की जाँच भी हो रही है।

एनकाउंटर तो हुआ, लेकिन खतरा बरकरार

पीलीभीत में तीन आतंकियों का एनकाउंटर से और कई चिंताएँ सामने आ गई हैं। दरअसल, उत्तर प्रदेश के पीलीभीत और लखीमपुर खीरी ऐसे जिले हैं, जहाँ लाखों में सिख जनसंख्या है। यह दोनों जिले 1980 और 1990 में खालिस्तानी आंतक से ग्रसित रहे हैं। लखीमपुर खीरी और पीलीभीत में 1980 और 1990 में खालिस्तानियों ने बड़े हमले किए हैं। ऐसे ही एक हमले में 29 तो दूसरे में 7 लोगों की हत्या कर दी थी। इसके अलावा भी कई बड़े हमले हुए, जिनमें बड़ी संख्या में लोग मारे गए।

दोनों ही जिलों में बड़े जंगल हैं और यहाँ सिखों के जनसंख्या से दूर बने हुए झाले (फ़ार्महाउस) भी हैं। बीते कुछ सालों में गाड़ियों पर भिंडरावाले की फोटो भी दिखी है। पूरनपुर में बीते दिनों एक मोटरसाइकिल पर सवाल कुछ सिख छात्रों ने काले झंडे लहराए थे और नारे भी लगाए थे। इसके अलावा यहाँ से कुछ वर्ष पहले भी खालिस्तानी आतंकी पकड़े गए थे। इन्होने पंजाब के नाभा में जेल से आतंकियों को भागने में मदद की थी। लखीमपुर में जब गृह राज्य मंत्री अजय मिश्र टेनी के कायर्क्रम में बवाल हुआ था तो भी यहाँ एक युवक भिंडरावाले की टीशर्ट पहने नजर आया था।

यहाँ तक कि खालिस्तान समर्थक सांसद अमृतपाल सिंह को जब पुलिस तलाश रही थी तो उसके भी पीलीभीत में होने की बात सामने आई थी। ऐसे में इस चरमपंथ के फिर से सर उठाने का खतरा अब भी बरकरार है। सुरक्षा एजेंसियों की चौकसी के चलते बीते कुछ वर्षों में कोई घटना नहीं हुई है। यदि वह यही चौकसी बनाए रखती हैं तो तराई का इलाका शांत रहेगा।

बांग्लादेश की मुक्ति के लिए लड़े, मिला ‘बीर प्रतीक’ सम्मान… अब अपने ही गाँव में जमात-ए-इस्लामी ने जूतों की माला पहनाई: पीड़ित बोले- पाकिस्तानी जानवरों से भी बुरा व्यवहार किया

बांग्लादेश में एक चौंकाने वाली घटना में प्रख्यात स्वतंत्रता सेनानी अब्दुल हई कानू का अपमान किया गया। कट्टरपंथी संगठन जमात-ए-इस्लामी के समर्थकों ने उन्हें जूतों की माला पहनाई और धमकाया। यह घटना कॉमिल्ला जिले के चौद्ग्राम में हुई, जहाँ ‘बीर प्रतीक’ से सम्मानित अब्दुल हई कानू को उनके गाँव लुडियारा में लौटने के बाद निशाना बनाया गया।

इस अपमानजनक कृत्य का वीडियो इंटरनेट पर वायरल हो गया है। जिसमें 10-12 लोग कानू को घेरकर उनसे माफी माँगने के लिए मजबूर कर रहे हैं। इनमें से कुछ लोगों ने उन्हें गाँव छोड़ने की धमकी दी।

खबरों में बताया गया है कि कानू को धमकाने वाले लोगों में एक व्यक्ति दुर्दांत आतंकी था जो 2006 में दुबई चला गया था और यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार बनने के बाद वापस लौटा है। कानू ने आरोप लगाया कि जमात की राजनीति से जुड़े अबुल हाशम मजूमदार और वाहिद मजूमदार ने हमले का नेतृत्व किया। जमात-ए-इस्लामी साल 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान पाकिस्तान का समर्थन करने के लिए कुख्यात रही है।

बांग्लादेशी न्यूज पोर्टल ने कानू के हवाले से कहा, “मैंने सोचा था कि इस बार मैं गांव में आराम से रह सकूँगा। मगर उन्होंने मेरे साथ पाकिस्तानी जंगली जानवरों से ज्यादा हिंसक व्यवहार किया।”

साल 1971 में पाकिस्तान से मुक्ति के लिए लड़े गए संग्राम की वजह से कानू को बांग्लादेश के चौथे सर्वोच्च वीरता पुरस्कार ‘बीर प्रतीक’ से सम्मानित किया गया था। कानू को 426 लोगों के साथ ये सम्मान मिला था।

चौद्दाग्राम पुलिस थाने के इंचार्ज अख्तरुज जमान ने कहा कि हम आरोपितों को पकड़ने के लिए तलाशी अभियान चला रहे हैं, लेकिन अभी तक कोई पकड़ में नहीं आया है। उन्होंने कहा, ‘हमने 12-14 अपराधियों की पहचान कर ली है और उन्हें पकड़ने के लिए छापेमारी कर रहे हैं।”

बहरहाल, घटना की जाँच के आदेश दिए गए हैं। वहीं, कानू के परिवार ने बताया कि वे मानसिक रूप से टूट चुके हैं और अपने घर छोड़कर चले गए हैं।

जमात-ए-इस्लामी क्या है?

जमात-ए-इस्लामी एक कट्टरपंथी इस्लामी राजनीतिक दल है, जो 1971 के बांग्लादेश मुक्ति युद्ध के दौरान पाकिस्तानी सेना के साथ खड़ा था। इसे देशद्रोही गतिविधियों और बांग्लादेशी स्वतंत्रता सेनानियों के खिलाफ हिंसा के लिए जिम्मेदार ठहराया जाता है। शेख हसीना की सरकार ने इसे आतंकवाद से जोड़कर प्रतिबंधित कर दिया था। हालाँकि शेख हसीना सरकार के पतन के बाद इस पर से युनुस सरकार ने बैन हटा लिया, जिसके बाद से ये पूरे बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों खासकर हिंदुओं और आवामी लीग से जुड़े लोगों को निशाना बना रही है।

पनामा नहर कैसे बनी, क्या है इसकी अहमियत, कहाँ हैं ग्रीनलैंड, क्यों इन पर अमेरिका का नियंत्रण चाहते हैं डोनाल्ड ट्रंप: सब कुछ जानिए एक साथ

अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने विवादास्पद बयानों और साहसिक फैसलों के लिए जाने जाते हैं। हाल ही में उन्होंने फिर से पनामा नहर और ग्रीनलैंड को लेकर चर्चा छेड़ दी। ट्रंप ने न केवल पनामा नहर को अमेरिका के नियंत्रण में लेने की इच्छा जताई बल्कि ग्रीनलैंड को अमेरिका में शामिल करने का भी प्रस्ताव रखा। यह पहली बार नहीं है जब ट्रंप ने इन मुद्दों पर अपनी दिलचस्पी दिखाई है। इस लेख में हम इन दोनों स्थानों की सामरिक और आर्थिक महत्ता को विस्तार से समझने की कोशिश करेंगे।

पनामा नहर: एक ऐतिहासिक और सामरिक धरोहर

पनामा नहर एक 82 किलोमीटर लंबा जलमार्ग है जो अटलांटिक महासागर को प्रशांत महासागर से जोड़ता है। यह नहर समुद्री व्यापार का एक मुख्य केंद्र है, जो वैश्विक व्यापार के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

पनामा नहर बनाने का सपना 16वीं सदी से देखा जा रहा था। 1513 में वास्को नुनेज़ डी बाल्बोआ ने इस विचार को जन्म दिया। उन्होंने पाया कि एक ऐसा जलमार्ग जो अटलांटिक और प्रशांत महासागरों को जोड़ सके, व्यापार और यात्रा को सरल बना सकता है। क्योंकि अगर किसी को पानी के रास्ते एशिया से अमेरिका महाद्वीपों के पूर्वी इलाकों में जाना होता तो उसके लिए एकमात्र विकिल्प यही थी की वह पहले दक्षिणी अमेरिका के निचले सिरे तक जाता और फिर उत्तर की ओर जाता। इसमें उसे हजारों किलोमीटर का सफर करना होता था, लेकिन नहर बनने के बाद 12874 किलोमीटर का सफर बचने लगता। ऐसे में फ्रांस ने 1881 में इस परियोजना को शुरू किया, लेकिन कठिन भौगोलिक स्थितियों, बीमारियों और वित्तीय समस्याओं के कारण इसे पूरा नहीं कर सका।

साल 1904 में अमेरिका ने इस परियोजना को अपने हाथ में लिया और 10 वर्षों की कड़ी मेहनत और 375 मिलियन डॉलर के निवेश के बाद 1914 में इसे पूरा किया गया। इस नहर के निर्माण में 5,609 मजदूरों ने अपनी जान गंवाई। इसे बनाने में गेट और लॉक सिस्टम जैसी नई तकनीकों का इस्तेमाल किया गया, जो जलस्तरों के अंतर को संतुलित करने के लिए उपयोगी साबित हुई। नहर के जरिए एशिया और अमेरिका के बीच व्यापारिक दूरी 12,874 किलोमीटर तक घट जाती है।

पहले अमेरिका ही करता था नहर का संचालन

इस नहर का संचालन पहले अमेरिका ही करता था, लेकिन साल 1977 में अमेरिका और पनामा के बीच हुए टोरीजोस-कार्टर संधि के तहत धीरे-धीरे साल 1999 से नहर का संचालन पूरी तरह से पनामा को सौंप दिया गया। पनामा नहर प्राधिकरण (Panama Canal Authority) इसका प्रबंधन करता है। यह नहर पनामा की अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा है, जिससे देश को वार्षिक आय का लगभग पाँचवाँ हिस्सा मिलता है। हर साल लगभग 14,000 जहाज इस नहर से गुजरते हैं। मोटे अनुमानों के मुताबिक, वैश्विक समुद्री व्यापार का 6% हिस्सा इस नहर से होकर गुजरता है।

पनामा नहर का सामरिक महत्व: पनामा नहर केवल व्यापार के लिए ही नहीं, बल्कि सामरिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह नहर समुद्री मार्गों की लंबाई को हजारों किलोमीटर तक घटा देती है। इसके अलावा, इसका उपयोग युद्धपोतों और आपातकालीन राहत सामग्री को जल्दी से ले जाने के लिए किया जा सकता है।

दरअसल, अमेरिकी दक्षिणी कमान ने इन चीनी निवेशों के बारे में चिंता व्यक्त की थी। उसका कहना है कि पीपीसी के माध्यम से नहर के दोनों छोर की बंदरगाहों पर चीन के नियंत्रण ने इन चिंताओं को और बढ़ा दिया है। पीपीसी एक हांगकांग स्थित कंपनी है, जिसका बीजिंग के साथ मजबूत संबंध है। इस नियंत्रण से चीन को नहर पर पर्याप्त नियंत्रण मिलता है।

ग्रीनलैंड में भी डोनाल्ड ट्रंप की दिलचस्पी

पनामा नहर ही नहीं, डोनाल्ड ट्रंप की नजर ग्रीनलैंड पर भी है। दरअसल, ग्रीनलैंड, आर्कटिक महासागर के पास स्थित, दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप है। यह डेनमार्क का एक स्वायत्त क्षेत्र है और प्राकृतिक संसाधनों, जैसे खनिज, तेल और गैस के लिए जाना जाता है। ग्रीनलैंड का भौगोलिक महत्व इसकी आर्कटिक स्थिति के कारण है। यह क्षेत्र जलवायु परिवर्तन और वैश्विक सुरक्षा के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है।

साल 2019 में डोनाल्ड ट्रंप ने ग्रीनलैंड को खरीदने का प्रस्ताव दिया था, जिसे डेनमार्क ने खारिज कर दिया। ट्रंप का तर्क था कि ग्रीनलैंड के प्राकृतिक संसाधन और भू-राजनीतिक स्थिति अमेरिका के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हैं। दरअसल, ग्रीनलैंड में तेल, गैस और खनिज जैसे प्राकृतिक संसाधनों के बड़े भंडार हैं। यह भविष्य में वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। वहीं, आर्कटिक क्षेत्र में ग्रीनलैंड की स्थिति इसे सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बनाती है। अमेरिका इस क्षेत्र में चीन और रूस के प्रभाव को कम करना चाहता है।

पनामा नहर को लेकर डोनाल्ड ट्रंप के दी कैसी धमकी?

दरअसल, अमेरिका के नव-निर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पनामा से पनामा नहर पर शुल्क कम करने और इसे अमेरिकी नियंत्रण में वापस करने की माँग की है। उन्होंने मध्य अमेरिकी देश पर अमेरिकी शिपिंग और नौसैनिक जहाजों से ‘अत्यधिक कीमत’ वसूलने का आरोप लगाया।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक रविवार को एरिजोना में समर्थकों की भीड़ से उन्होंने कहा, “पनामा द्वारा लगाए जा रहे शुल्क हास्यास्पद और बेहद अनुचित हैं।” उन्होंने कहा, “हमारे देश के साथ यह पूरी तरह से धोखा तुरंत बंद हो जाएगा।” उनका इशारा अगले महीने पदभार ग्रहण करने पर था। इससे पहले शनिवार को उन्होंने अपने ट्रुथ सोशल प्लेटफॉर्म पर लिखा कि पनामा नहर अमेरिकी अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा में ‘महत्वपूर्ण भूमिका’ निभाती है।

पनामा के राष्ट्रपति होजे राउल मुलिनो ने ट्रंप के बयान को उनकी संप्रभुता पर हमला बताया। पनामा के राष्ट्रपति जोस राउल मुलिनो ने कहा कि नहर ‘पनामा के हाथों में बनी रहेगी।’ उन्होंने कहा कि नहर का हर इंच पनामा का है और रहेगा। पनामा नहर प्राधिकरण ने भी ट्रंप के आरोपों को खारिज किया और कहा कि शुल्क का निर्धारण व्यावसायिक जरूरतों और विशेषज्ञों की राय के आधार पर किया जाता है।

ट्रंप की विदेश नीति और कूटनीतिक प्रभाव

ट्रंप का बयान उनकी ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति का हिस्सा है। वैसे, ट्रंप का यह कदम चीन के बढ़ते प्रभाव को कम करने की रणनीति का हिस्सा भी हो सकता है। हांगकांग स्थित कंपनियों का नहर के प्रवेश द्वारों पर नियंत्रण अमेरिका के लिए चिंता का विषय हो सकता है।

पनामा नहर और ग्रीनलैंड दोनों ही सामरिक और आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। ये दोनों स्थान भू-राजनीतिक रणनीतियों के केंद्र में हैं। भले ही डोनाल्ड ट्रंप के बयान महत्वपूर्ण हों, लेकिन अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत अमेरिका द्वारा अब पनामा नहर को वापस लेना संभव नहीं है। ऐसे में डोनाल्ड ट्रंप के ये बयान अमेरिका-पनामा, अमेरिका-डेनमार्क के बीच के संबंधों को नुकसान पहुँचा सकते हैं।

बांग्लादेश को सौंप दे शेख हसीना, मुकदमा चलाना है: यूनुस सरकार ने भारत को भेजा राजनयिक नोट, तख्तापलट के बाद पूर्व PM पर हत्या-अपहरण जैसे 225+ केस

बांग्लादेश की मोहम्मद यूनुस की सरकार ने सोमवार (23 दिसंबर 2024) अपदस्थ प्रधानमंत्री एवं आवामी लीग की नेता शेख हसीना के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया। उसने भारत से शेख हसीना को उसे सौंपने की भी माँग की है। इसके लिए यूनुस सरकार ने भारत को एक राजनयिक पत्र भी लिखा है। दरअसल, 5 अगस्त 2024 को तख्तापलट के बाद शेख हसीना भारत आ गई थीं। तब से यहीं हैं।

दरअसल, यूनुस सरकार ने शेख हसीना के खिलाफ हत्या, अपहरण और देशद्रोह जैसे गंभीर आरोपों में 225 से अधिक केस दर्ज किए हैं। इन मामलों में सुनवाई के तहत बांग्लादेश के अंतर्राष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण (ICT) ने शेख हसीना और उनकी कैबिनेट के कई मंत्रियों, सलाहकारों तथा सैन्य एवं सिविल अधिकारियों के खिलाफ मानव अपराध और नरसंहार के लिए गिरफ्तारी वारंट जारी किए हैं।

बांग्लादेश ने यह भी शेख हसीना को लेकर यह भी चेतावनी दी है कि पूर्व प्रधानमंत्री की भारत में रहने और लगातार बयान देने से भारत और बांग्लादेश के रिश्तों में तनाव बढ़ सकता है। बांग्लादेश की अंतरिम सरकार में विदेश मामलों के सलाहकार तौहीद हुसैन ने कहा, “हमने भारत सरकार को एक मौखिक नोट भेजा है, जिसमें कहा गया है कि बांग्लादेश न्यायिक प्रक्रिया के लिए हसीना को वापस चाहता है।”

वहीं, बांग्लादेश के गृह सलाहकार जहाँगीर आलम ने कहा कि उनके कार्यालय ने भारत से शेख हसीना के प्रत्यर्पण के लिए विदेश मंत्रालय को एक पत्र भेजा है। बांग्लादेश और भारत के बीच प्रत्यर्पण संधि पहले से ही मौजूद है। बांग्लादेश के कानून सलाहकार आसिफ नजरूल ने कहा था कि अगर संधि के किसी प्रावधान का हवाला देकर भारत प्रत्यर्पण से इनकार करता है तो बांग्लादेश इसका विरोध करेगा।

बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस ने पिछले महीने अपनी सरकार के 100 दिन पूरे होने पर कहा था कि वे 77 वर्षीय शेख हसीना के प्रत्यर्पण की माँग करेंगे। उन्होंने कहा था, “हमें हर हत्या में न्याय सुनिश्चित करना है।” बता दें कि 5 अगस्त को बांग्लादेश के छात्रों ने 16 साल पुरानी उनकी सरकार का तख्ता पलट दिया था।

भारत और बांग्लादेश के बीच प्रत्यर्पण समझौता

भारत और बांग्लादेश के बीच साल 2013 से ही प्रत्यर्पण संधि है। साल 2016 में इसे संशोधित किया गया था। यह संधि उग्रवाद और आतंकवाद के मुद्दे से निपटने के उद्देश्य से किया गया था। उस समय भारत के उत्तर-पूर्व राज्यों के उग्रवादी समूह के अपराधी किसी घटना को अंजाम देने के बाद भागकर बांग्लादेश में छिप जा रहे थे। वहीं, बांग्लादेश के प्रतिबंधित जमात उल मुजाहिदीन के आतंकी भारत में आ जा रहे थे।

इस प्रत्यर्पण संधि में अपराधियों, उग्रवादियों और आतंकियों आदि के प्रत्यर्पण की बात है। इसमें राजनीतिक प्रत्यर्पण की बात नहीं है। इसमें साफ कहा गया है कि भारत राजनीति से जुड़े किसी भी व्यक्ति के प्रत्यर्पण से इनकार कर सकता है, लेकिन अगर उस व्यक्ति पर हत्या और किडनैपिंग जैसे संगीन मामले दर्ज हो तो उसके प्रत्यर्पण को रोका जा नहीं सकता है। हालाँकि, साल 2016 में इस संधि में एक संशोधन किया गया।

इस संशोधन के मुताबिक, प्रत्यर्पण की माँग करने वाले देश को अपराध के सबूत देने की जरूरत भी नहीं है। इसके लिए कोर्ट से जारी वारंट ही काफी है। ये संशोधन हसीना के लिए मुश्किलें पैदा कर सकती हैं। प्रत्यर्पण समझौते के अनुच्छेद 8 में कहा गया है कि ऐसे मामले, जिनमें आरोप साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं हों या फिर अगर आरोप सैन्य अपराधों से जुड़े हों जो सामान्य आपराधिक कानून के तहत मान्य नहीं हैं। ऐसी स्थिति में प्रत्यर्पण से इनकार किया जा सकता है।