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पनामा नहर कैसे बनी, क्या है इसकी अहमियत, कहाँ हैं ग्रीनलैंड, क्यों इन पर अमेरिका का नियंत्रण चाहते हैं डोनाल्ड ट्रंप: सब कुछ जानिए एक साथ

अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने विवादास्पद बयानों और साहसिक फैसलों के लिए जाने जाते हैं। हाल ही में उन्होंने फिर से पनामा नहर और ग्रीनलैंड को लेकर चर्चा छेड़ दी। ट्रंप ने न केवल पनामा नहर को अमेरिका के नियंत्रण में लेने की इच्छा जताई बल्कि ग्रीनलैंड को अमेरिका में शामिल करने का भी प्रस्ताव रखा। यह पहली बार नहीं है जब ट्रंप ने इन मुद्दों पर अपनी दिलचस्पी दिखाई है। इस लेख में हम इन दोनों स्थानों की सामरिक और आर्थिक महत्ता को विस्तार से समझने की कोशिश करेंगे।

पनामा नहर: एक ऐतिहासिक और सामरिक धरोहर

पनामा नहर एक 82 किलोमीटर लंबा जलमार्ग है जो अटलांटिक महासागर को प्रशांत महासागर से जोड़ता है। यह नहर समुद्री व्यापार का एक मुख्य केंद्र है, जो वैश्विक व्यापार के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

पनामा नहर बनाने का सपना 16वीं सदी से देखा जा रहा था। 1513 में वास्को नुनेज़ डी बाल्बोआ ने इस विचार को जन्म दिया। उन्होंने पाया कि एक ऐसा जलमार्ग जो अटलांटिक और प्रशांत महासागरों को जोड़ सके, व्यापार और यात्रा को सरल बना सकता है। क्योंकि अगर किसी को पानी के रास्ते एशिया से अमेरिका महाद्वीपों के पूर्वी इलाकों में जाना होता तो उसके लिए एकमात्र विकिल्प यही थी की वह पहले दक्षिणी अमेरिका के निचले सिरे तक जाता और फिर उत्तर की ओर जाता। इसमें उसे हजारों किलोमीटर का सफर करना होता था, लेकिन नहर बनने के बाद 12874 किलोमीटर का सफर बचने लगता। ऐसे में फ्रांस ने 1881 में इस परियोजना को शुरू किया, लेकिन कठिन भौगोलिक स्थितियों, बीमारियों और वित्तीय समस्याओं के कारण इसे पूरा नहीं कर सका।

साल 1904 में अमेरिका ने इस परियोजना को अपने हाथ में लिया और 10 वर्षों की कड़ी मेहनत और 375 मिलियन डॉलर के निवेश के बाद 1914 में इसे पूरा किया गया। इस नहर के निर्माण में 5,609 मजदूरों ने अपनी जान गंवाई। इसे बनाने में गेट और लॉक सिस्टम जैसी नई तकनीकों का इस्तेमाल किया गया, जो जलस्तरों के अंतर को संतुलित करने के लिए उपयोगी साबित हुई। नहर के जरिए एशिया और अमेरिका के बीच व्यापारिक दूरी 12,874 किलोमीटर तक घट जाती है।

पहले अमेरिका ही करता था नहर का संचालन

इस नहर का संचालन पहले अमेरिका ही करता था, लेकिन साल 1977 में अमेरिका और पनामा के बीच हुए टोरीजोस-कार्टर संधि के तहत धीरे-धीरे साल 1999 से नहर का संचालन पूरी तरह से पनामा को सौंप दिया गया। पनामा नहर प्राधिकरण (Panama Canal Authority) इसका प्रबंधन करता है। यह नहर पनामा की अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा है, जिससे देश को वार्षिक आय का लगभग पाँचवाँ हिस्सा मिलता है। हर साल लगभग 14,000 जहाज इस नहर से गुजरते हैं। मोटे अनुमानों के मुताबिक, वैश्विक समुद्री व्यापार का 6% हिस्सा इस नहर से होकर गुजरता है।

पनामा नहर का सामरिक महत्व: पनामा नहर केवल व्यापार के लिए ही नहीं, बल्कि सामरिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह नहर समुद्री मार्गों की लंबाई को हजारों किलोमीटर तक घटा देती है। इसके अलावा, इसका उपयोग युद्धपोतों और आपातकालीन राहत सामग्री को जल्दी से ले जाने के लिए किया जा सकता है।

दरअसल, अमेरिकी दक्षिणी कमान ने इन चीनी निवेशों के बारे में चिंता व्यक्त की थी। उसका कहना है कि पीपीसी के माध्यम से नहर के दोनों छोर की बंदरगाहों पर चीन के नियंत्रण ने इन चिंताओं को और बढ़ा दिया है। पीपीसी एक हांगकांग स्थित कंपनी है, जिसका बीजिंग के साथ मजबूत संबंध है। इस नियंत्रण से चीन को नहर पर पर्याप्त नियंत्रण मिलता है।

ग्रीनलैंड में भी डोनाल्ड ट्रंप की दिलचस्पी

पनामा नहर ही नहीं, डोनाल्ड ट्रंप की नजर ग्रीनलैंड पर भी है। दरअसल, ग्रीनलैंड, आर्कटिक महासागर के पास स्थित, दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप है। यह डेनमार्क का एक स्वायत्त क्षेत्र है और प्राकृतिक संसाधनों, जैसे खनिज, तेल और गैस के लिए जाना जाता है। ग्रीनलैंड का भौगोलिक महत्व इसकी आर्कटिक स्थिति के कारण है। यह क्षेत्र जलवायु परिवर्तन और वैश्विक सुरक्षा के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है।

साल 2019 में डोनाल्ड ट्रंप ने ग्रीनलैंड को खरीदने का प्रस्ताव दिया था, जिसे डेनमार्क ने खारिज कर दिया। ट्रंप का तर्क था कि ग्रीनलैंड के प्राकृतिक संसाधन और भू-राजनीतिक स्थिति अमेरिका के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हैं। दरअसल, ग्रीनलैंड में तेल, गैस और खनिज जैसे प्राकृतिक संसाधनों के बड़े भंडार हैं। यह भविष्य में वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। वहीं, आर्कटिक क्षेत्र में ग्रीनलैंड की स्थिति इसे सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बनाती है। अमेरिका इस क्षेत्र में चीन और रूस के प्रभाव को कम करना चाहता है।

पनामा नहर को लेकर डोनाल्ड ट्रंप के दी कैसी धमकी?

दरअसल, अमेरिका के नव-निर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पनामा से पनामा नहर पर शुल्क कम करने और इसे अमेरिकी नियंत्रण में वापस करने की माँग की है। उन्होंने मध्य अमेरिकी देश पर अमेरिकी शिपिंग और नौसैनिक जहाजों से ‘अत्यधिक कीमत’ वसूलने का आरोप लगाया।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक रविवार को एरिजोना में समर्थकों की भीड़ से उन्होंने कहा, “पनामा द्वारा लगाए जा रहे शुल्क हास्यास्पद और बेहद अनुचित हैं।” उन्होंने कहा, “हमारे देश के साथ यह पूरी तरह से धोखा तुरंत बंद हो जाएगा।” उनका इशारा अगले महीने पदभार ग्रहण करने पर था। इससे पहले शनिवार को उन्होंने अपने ट्रुथ सोशल प्लेटफॉर्म पर लिखा कि पनामा नहर अमेरिकी अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा में ‘महत्वपूर्ण भूमिका’ निभाती है।

पनामा के राष्ट्रपति होजे राउल मुलिनो ने ट्रंप के बयान को उनकी संप्रभुता पर हमला बताया। पनामा के राष्ट्रपति जोस राउल मुलिनो ने कहा कि नहर ‘पनामा के हाथों में बनी रहेगी।’ उन्होंने कहा कि नहर का हर इंच पनामा का है और रहेगा। पनामा नहर प्राधिकरण ने भी ट्रंप के आरोपों को खारिज किया और कहा कि शुल्क का निर्धारण व्यावसायिक जरूरतों और विशेषज्ञों की राय के आधार पर किया जाता है।

ट्रंप की विदेश नीति और कूटनीतिक प्रभाव

ट्रंप का बयान उनकी ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति का हिस्सा है। वैसे, ट्रंप का यह कदम चीन के बढ़ते प्रभाव को कम करने की रणनीति का हिस्सा भी हो सकता है। हांगकांग स्थित कंपनियों का नहर के प्रवेश द्वारों पर नियंत्रण अमेरिका के लिए चिंता का विषय हो सकता है।

पनामा नहर और ग्रीनलैंड दोनों ही सामरिक और आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। ये दोनों स्थान भू-राजनीतिक रणनीतियों के केंद्र में हैं। भले ही डोनाल्ड ट्रंप के बयान महत्वपूर्ण हों, लेकिन अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत अमेरिका द्वारा अब पनामा नहर को वापस लेना संभव नहीं है। ऐसे में डोनाल्ड ट्रंप के ये बयान अमेरिका-पनामा, अमेरिका-डेनमार्क के बीच के संबंधों को नुकसान पहुँचा सकते हैं।

बांग्लादेश को सौंप दे शेख हसीना, मुकदमा चलाना है: यूनुस सरकार ने भारत को भेजा राजनयिक नोट, तख्तापलट के बाद पूर्व PM पर हत्या-अपहरण जैसे 225+ केस

बांग्लादेश की मोहम्मद यूनुस की सरकार ने सोमवार (23 दिसंबर 2024) अपदस्थ प्रधानमंत्री एवं आवामी लीग की नेता शेख हसीना के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया। उसने भारत से शेख हसीना को उसे सौंपने की भी माँग की है। इसके लिए यूनुस सरकार ने भारत को एक राजनयिक पत्र भी लिखा है। दरअसल, 5 अगस्त 2024 को तख्तापलट के बाद शेख हसीना भारत आ गई थीं। तब से यहीं हैं।

दरअसल, यूनुस सरकार ने शेख हसीना के खिलाफ हत्या, अपहरण और देशद्रोह जैसे गंभीर आरोपों में 225 से अधिक केस दर्ज किए हैं। इन मामलों में सुनवाई के तहत बांग्लादेश के अंतर्राष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण (ICT) ने शेख हसीना और उनकी कैबिनेट के कई मंत्रियों, सलाहकारों तथा सैन्य एवं सिविल अधिकारियों के खिलाफ मानव अपराध और नरसंहार के लिए गिरफ्तारी वारंट जारी किए हैं।

बांग्लादेश ने यह भी शेख हसीना को लेकर यह भी चेतावनी दी है कि पूर्व प्रधानमंत्री की भारत में रहने और लगातार बयान देने से भारत और बांग्लादेश के रिश्तों में तनाव बढ़ सकता है। बांग्लादेश की अंतरिम सरकार में विदेश मामलों के सलाहकार तौहीद हुसैन ने कहा, “हमने भारत सरकार को एक मौखिक नोट भेजा है, जिसमें कहा गया है कि बांग्लादेश न्यायिक प्रक्रिया के लिए हसीना को वापस चाहता है।”

वहीं, बांग्लादेश के गृह सलाहकार जहाँगीर आलम ने कहा कि उनके कार्यालय ने भारत से शेख हसीना के प्रत्यर्पण के लिए विदेश मंत्रालय को एक पत्र भेजा है। बांग्लादेश और भारत के बीच प्रत्यर्पण संधि पहले से ही मौजूद है। बांग्लादेश के कानून सलाहकार आसिफ नजरूल ने कहा था कि अगर संधि के किसी प्रावधान का हवाला देकर भारत प्रत्यर्पण से इनकार करता है तो बांग्लादेश इसका विरोध करेगा।

बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस ने पिछले महीने अपनी सरकार के 100 दिन पूरे होने पर कहा था कि वे 77 वर्षीय शेख हसीना के प्रत्यर्पण की माँग करेंगे। उन्होंने कहा था, “हमें हर हत्या में न्याय सुनिश्चित करना है।” बता दें कि 5 अगस्त को बांग्लादेश के छात्रों ने 16 साल पुरानी उनकी सरकार का तख्ता पलट दिया था।

भारत और बांग्लादेश के बीच प्रत्यर्पण समझौता

भारत और बांग्लादेश के बीच साल 2013 से ही प्रत्यर्पण संधि है। साल 2016 में इसे संशोधित किया गया था। यह संधि उग्रवाद और आतंकवाद के मुद्दे से निपटने के उद्देश्य से किया गया था। उस समय भारत के उत्तर-पूर्व राज्यों के उग्रवादी समूह के अपराधी किसी घटना को अंजाम देने के बाद भागकर बांग्लादेश में छिप जा रहे थे। वहीं, बांग्लादेश के प्रतिबंधित जमात उल मुजाहिदीन के आतंकी भारत में आ जा रहे थे।

इस प्रत्यर्पण संधि में अपराधियों, उग्रवादियों और आतंकियों आदि के प्रत्यर्पण की बात है। इसमें राजनीतिक प्रत्यर्पण की बात नहीं है। इसमें साफ कहा गया है कि भारत राजनीति से जुड़े किसी भी व्यक्ति के प्रत्यर्पण से इनकार कर सकता है, लेकिन अगर उस व्यक्ति पर हत्या और किडनैपिंग जैसे संगीन मामले दर्ज हो तो उसके प्रत्यर्पण को रोका जा नहीं सकता है। हालाँकि, साल 2016 में इस संधि में एक संशोधन किया गया।

इस संशोधन के मुताबिक, प्रत्यर्पण की माँग करने वाले देश को अपराध के सबूत देने की जरूरत भी नहीं है। इसके लिए कोर्ट से जारी वारंट ही काफी है। ये संशोधन हसीना के लिए मुश्किलें पैदा कर सकती हैं। प्रत्यर्पण समझौते के अनुच्छेद 8 में कहा गया है कि ऐसे मामले, जिनमें आरोप साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं हों या फिर अगर आरोप सैन्य अपराधों से जुड़े हों जो सामान्य आपराधिक कानून के तहत मान्य नहीं हैं। ऐसी स्थिति में प्रत्यर्पण से इनकार किया जा सकता है।

रिपोर्ट, इंटरव्यू, लेख… ‘द वायर’ ने बांग्लादेश में हिंदुओं की प्रताड़ना पर पर्दा डालने के लिए किए सारे जतन, इस्लामी कट्टरपंथियों को बचाने के लिए लगातार चला रहा प्रोपेगेंडा

बांग्लादेश में प्रधानमंत्री शेख हसीना के सत्ता से हटाए जाने के बाद हिन्दुओं पर अत्याचार लगातार जारी है। मोहम्मद यूनुस सरकार के अंतर्गत हिन्दू लगातार निशाना बन रहे हैं, उनके मंदिर तोड़े जा रहे हैं। विदेशी मीडिया हमेशा की तरह हिन्दुओं के विरुद्ध हो रहे अत्याचारों पर आँख मूँद चुकी है। लेकिन इस पूरे खेल में भारत का वामपंथी मीडिया पोर्टल द वायर भी पीछे नहीं है। वायर लगातार प्रयास कर रहा है कि बांग्लादेश में हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचार को लेकर पर्दा डाला जाए।

द वायर का ध्यान बांग्लादेश में हो रहे हिन्दुओं की पीड़ा दिखाने बजाय इस बात पर ज्यादा रहा कि आखिर कौन दूसरा भारतीय पोर्टल कथित तौर पर झूठ फैला रहा है। अगस्त 2024 के बाद द वायर द्वारा प्रकाशित 10 रिपोर्टों, इंटरव्यू और लेखों का विश्लेषण हमने किया है। इसमें साफ दिखता है कि वायर ने बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमलों को कम करके दिखाया है।

21 दिसंबर, 2024 को ही, द वायर ने लोकसभा में विदेश मंत्रालय के एक जवाब पर बांग्लादेशी सरकार की आधिकारिक प्रतिक्रिया का हवाला देते हुए एक रिपोर्ट छापी। विदेश मंत्रालय ने बताया था कि 2024 में बांग्लादेश में हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा की 2,200 घटनाएँ हुई हैं।

स्रोत: द वायर

यहाँ पर द वायर ने भारतीय विदेश मंत्रालय द्वारा दी गई जानकारी के विरोध में बांग्लादेश सरकार की जानकारी रखी। द वायर ने बांग्लादेशी प्रेस विंग के हवाले से दावा किया कि जनवरी और नवंबर 2024 के बीच हिंसा की केवल 138 घटनाएँ हुई हैं। वायर ने ले-देकर वही कहा जो बांग्लादेश दावा कर रहा है।

इसी तरह 12 दिसंबर, 2024 को वायर में पार्थ एस घोष ने एक लेख लिखा। इस लेख में घोष ने बांग्लादेश में हिंदुओं तथा अन्य अल्पसंख्यकों पर हमलों को लगभग नकार दिया। उन्होंने पड़ोसी देश में बिगड़ती स्थिति के बारे में चिंताओं को किनारे करते हुए हिन्दुओं पर हुए हमलों को ‘राजनीति से प्रेरित’ बताया। उन्होंने कहा कि यह हमले बढ़ा-चढ़ा कर दिखाए गए हैं।

स्रोत: द वायर

घोष ने बांग्लादेशी राजनीति में इस्लामी ताकतों के मजबूत होने को स्वीकार तो किया लेकिन हिंसा को लेकर कुछ नहीं कहा। उन्होंने हिन्दुओं पर होने वाले हमलों को लेकर बांग्लादेश से आने वाली रिपोर्टों पर सवाल उठा दिए और उन्हें फर्जी खबर और ‘हिंदुत्व प्रोपेगेंडा’ बता दिया।

घोष ने यहाँ तक दावा किया कि बांग्लादेश की स्थिति भारत से कोई ख़ास अलग नहीं है। उन्होंने इस दौरान बांग्लादेश पर लिखने बताने के बजाय भारत की आलोचना में अपनी कलम घिसनी चालू कर दी। उन्होंने दावा किया कि भारत में मुस्लिमों पर अत्याचार होता है और ऐसे में भाजपा को बांग्लादेश पर प्रश्न नहीं उठाने चाहिए।

वायर ने लेख और विशेष रिपोर्ट में ही नहीं बल्कि रोजमर्रा की खबरों में भी अपना प्रोपेगेंडा जारी रखा। वायर ने इस बात को दिखने में एड़ी चोटी का जोर लगाया कि बांग्लादेश में सब कुछ एकदम बढ़िया चल रहा है। इसी तरह 10 दिसम्बर,2024 को भारत और बांग्लादेश के बीच घटते व्यापार को लेकर एक रिपोर्ट प्रकाशित की।

स्रोत: द वायर

इसमें वायर ने बोनगांव के एक व्यापारी तपन साहा का हवाला दिया। वायर ने बताया कि तपन साहा को ढाका को रोजमर्रा की जिन्दगी काफी सामान्य लगी और भारत में जैसा बताया गया, वैसा कुछ भी नहीं है। यहाँ तक कि वह हिंसा के वीडियो भी बांग्लादेशी मीडिया से गायब थे।

इसी तरह से 5 दिसंबर, 2024 को प्रकाशित एक अन्य रिपोर्ट में, वायर ने मुहम्मद यूनुस के बयान को आगे बढ़ाने का प्रयास किया। यूनुस लगातार कहते आए हैं कि बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर हमलों की रिपोर्ट ‘बढ़ा-चढ़ाकर’ बताई गई है और यह भारत और अन्य वैश्विक शक्तियों द्वारा फैलाई गई ‘मनगढ़ंत कहानी’ का हिस्सा है।

स्रोत: द वायर

वायर लगातार प्रयास कर रहा है कि हिन्दुओं के खिलाफ प्रताड़ना को किसी तरह दबाकर बताए। 3 दिसंबर, 2024 को द वायर ने बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के कार्यकारी अध्यक्ष तारिक रहमान का हवाला देते हुए एक रिपोर्ट प्रकाशित की। इसमें रहमान का दावा था कि भारत में ‘बांग्लादेश विरोधी भावना’ को बढ़ावा दिया गया है।

स्रोत: द वायर

गौरतलब है कि रहमान, जो वर्तमान में निर्वासन के तहत यूनाइटेड किंगडम में रह रहे हैं। वह 21 अगस्त,2004 को अवामी लीग की राजनीतिक रैली पर हुए आतंकवादी ग्रेनेड हमले का मुख्य आरोपित और मास्टरमाइंड हैं। उन्हें 2008 में बांग्लादेश में आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। हाल ही में बांग्लादेश में उन्हें राहत मिली है।

वायर ने हिन्दुओं पर अत्याचार दबाने की बात के लिए बांग्लादेशी मीडिया का भी सहारा लिया है। 29 नवंबर, 2024 को द वायर के लिए करन थापर के साथ एक इंटरव्यू में, ढाका ट्रिब्यून के संपादक जफर सोभन ने बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमलों को काफी कम बताया।

इस्कॉन नेता चिन्मय कृष्ण दास की गिरफ्तारी पर चर्चा के दौरान, सोभन ने राजद्रोह के आरोपों की आलोचना की लेकिन इस बीच उन्होंने मोहम्मद यूनुस वाला ही राग अलापा। उन्होंने इस दौरान मोहम्मद यूनुस वाली बात कही कि बांग्लादेश हिन्दुओं की प्रताड़ना की बात मनगढ़ंत है।

बांग्लादेशी अखबार प्रथम अलो द्वारा पहले प्रकाशित और 19 अगस्त, 2024 को द वायर पर छपी एक कथित फैक्ट-चेक रिपोर्ट में, एक रूमर स्कैनर की एक रिपोर्ट का हवाला दिया गया। इस रिपोर्ट में भारतीय मीडिया आउटलेट्स पर आरोप लगाया गया कि उन्होंने बांग्लादेश में हिन्दुओं पर हमलों को बढ़ा चढ़ा कर दिखाया गया।

स्रोत: द वायर

रिपोर्ट में कई सोशल मीडिया पोस्ट की जाँच की गई थी, जिसमें कथित तौर पर बांग्लादेश में हुई घटनाओं को हिंदुओं पर हमले के रूप में गलत तरीके से पेश किया गया था। इस रिपोर्ट में पूरा फॉक्स इस बात पर था कि कैसे भारतीय मीडिया को झूठा साबित किया जाए। रिपोर्ट में ऑपइंडिया पर तक गलत सूचना फैलाने का आरोप लगाया।

वायर ने अपना प्रोपेगेंडा बढ़ाने के लिए कथित फैक्ट चेक का भी हवाला कर दिया। इसमें मदद भी उसने उस ऑल्टन्यूज की ली, जिस पर खुद फर्जी खबर फ़ैलाने के आरोप है। वायर ने एक फैक्ट चेक के सहारे गृह मंत्री अमित शाह के उस बयान को गलत साबित करने की कोशिश की जिसमें उन्होंने बांग्लादेश में हिन्दुओं की घटती जनसंख्या के बारे में बात की थी।

स्रोत: द वायर

असल में तो सच्चाई यह है कि बांग्लादेश का खुद का आँकड़ा यही बात दिखाता है। जनसंख्या आँकड़ों के अनुसार, हिन्दू जनसंख्या 1901 में 33% से 1991 में 10.5% तक की गिरावट आई है, जबकि 2022 की जनगणना में इसमें और कमी आई है और यह सिर्फ़ 7.95% है।

बांग्लादेश में सत्ता के तख्तापलट के कुछ ही दिनों बाद 17 अगस्त, 2024 को वायर में मानश फिराक भट्टाचार्जी ने एक लेख लिखा। इसमें उन्होंने विदेशी मीडिया की तरह वही राग अलापा कि बांग्लादेश में हिन्दुओं पर अत्याचार मजहबी आधार पर नहीं हुआ है बल्कि इसका कारण राजनीतिक और उनका आवामी लीग से जुड़ाव है।

स्रोत: द वायर

15 अगस्त को द वायर में प्रकाशित राम पुनियानी के लेख में भी यही बात कही गई। हालाँकि, हिन्दुओं की पीड़ा बताने के बजाय पुनियानी ने यह बताया कि कैसे बांग्लादेश में लोकतंत्र बहाल हो गया है। उन्होंने यहाँ तक दावा कर दिया कि यूनुस सरकार मंदिरों को बचा रही है।

स्रोत: द वायर

द वायर का कुल मिलाकर एजेंडा यह रहा कि भारतीय मीडिया की विश्वसनीयता कम करे। इसके अलावा उसने वह हर स्रोत नकारने की कोशिश की जो हिन्दुओं पर हमलों को बताती है और उसके बराबर में बांग्लादेशी दावा खड़ा किया है। वह बांग्लादेश सरकार का भोंपू बना हुआ हुआ है।

वायर ने जहाँ खुद तो हिन्दुओं की पीड़ा नहीं बताई, उन्होंने सभी मीडिया पोर्टल और लोगों को घृणा फ़ैलाने वाला घोषित कर दिया जो अपने स्तर पर यह काम कर रहे थे। इसे वायर ने इस्लामोफोबिया करार दिया। वायर ने इस दौरान हिन्दुओं पर हमलों का कारण भी राजनीतिक बता दिया, यही प्रयास विदेशी मीडिया करती आई है।

(मूल रूप से अनुराग ने यह रिपोर्ट अंग्रेजी में लिखी है। आप इस लिंक पर क्लिक कर इसे विस्तार से पढ़ सकते हैं)

यहूदियों की सुरक्षा के लिए आगे आए हिंदू, हाथों में थामी बजरंग बली की पताका… लगाए जय श्रीराम के नारे: कनाडा में कड़ाके की ठंड में दिखाई एकजुटता, Video

कनाडा में यहूदियों के खिलाफ बढ़ रहे अपराध मामलों के बाद कनाडाई हिंदुओं ने सड़कों पर उतरकर यहूदियों के प्रति एकजुटता दिखाई है। उन्होंने टोरंटो के बाथसर्ट और शेपर्ड में यहूदी समुदाय की रक्षा के लिए प्रदर्शन किया।

कड़ाके की ठंड के बीच हुए प्रदर्शन की कुछ वीडियोज डेनियल बोर्डमैन ने अपने इंस्टा पर भी साझा की है। उन्होंने बताया कि बाथसर्ट और शेपर्ड में जिहादियों से यहूदियों की रक्षा के लिए हिंदू कनाडाई नागरिक सड़कों पर उतरे हैं। वीडियो में देख सकते हैं कि उनके हाथ में भारत, कनाडा, इजरायल का झंडा होने के साथ ‘जय श्रीराम’ लिखी पताका भी है जिसमें हनुमान जी भी बने हैं।

वीडियो में देख सकते हैं कि प्रदर्शन कर रहे लोगों का कहना है कि वह यहूदियों के अधिकार के लिए सड़कों पर उतरे हैं क्योंकि यहूदियों के पास भी उतना ही जीने का अधिकार है जितना कि किसी और समुदाय के व्यक्ति के लिए है। हिंदू न केवल यहूदियों का समर्थन करते हैं बल्कि उनके शांति से जीने को भी पूरा सपोर्ट करते हैं।

प्रदर्शनकारी हिंदुओं ने कहा कि वह इजरायली और यहूदी भाइयों के साथ खड़े होकर ये बताना चाहते हैं कि वे कनाडा में सुरक्षित हैं। वहीं एक अन्य व्यक्ति ने यहूदियों को विश्वास दिलाया कि वह कनाडा में हिंदू यहूदियों के साथ हैं।

गौरतलब है कि पिछले कुछ दिनों में कनाडा में यहूदियों के खिलाफ काफी हिंसा होती देखी गई है। पिछले सप्ताह की बात है यहूदियों के धर्मस्थल पर आगजनी के बाद उनके एक प्राथमिक विद्यालय में गोलीबारी की घटना सामने आई थी।

ये पहली बार नहीं है जब कनाडा में हिंदू इजरायल के यहूदियों के लिए एकजुट हुए हो। पिछले साल भी जब हमास ने इजरायल के ऊपर हमला किया था उस समय भी हमास आतंकियों के खिलाफ कनाडा के हिंदुओं ने यहूदियों के साथ एकजुटता दिखाई थी और इस्लामी कट्टरपंथियों, आतंकियों के खिलाफ आवाज बुलंद की थी। साथ ही जोर-जोर से नारेबाजी भी हुई थी।

हाई कोर्ट में नकाब से चेहरा ढककर आई मुस्लिम महिला वकील, जज ने हटाने को कहा तो बोली- ये मेरा मौलिक अधिकार: जानिए फिर क्या हुआ, क्या कहते हैं नियम

जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख हाई कोर्ट ने हिजाब पहनी एक महिला वकील की बात सुनने से इनकार कर दिया। महिला वकील ने अपना चेहरा ढक रखा था। जब जज ने महिला वकील से अपना चेहरा दिखाने को कहा तो उस महिला वकील ने चेहरा दिखाने से इनकार कर दिया। जज ने कहा कि कोई भी महिला वकील अपना चेहरा ढक कर अदालत में बहस नहीं कर सकती।

न्यायमूर्ति मोक्ष खजुरिया काज़मी और न्यायमूर्ति राहुल भारती की ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के नियमों का हवाला देते हुए कहा कि महिला वकीलों को अपना चेहरा ढककर अदालत में उपस्थित होने की अनुमति नहीं है। इसके बाद खंडपीठ ने महिला वकील की बातें सुनने से इनकार कर दिया और इस केस में अगली तारीख दे दी।

दरअसल, यह मामला 27 नवंबर का है। उस दिन ‘मोहम्मद यासीन खान बनाम नाज़िया इकबाल’ से जुड़े घरेलू हिंसा के मामले की सुनवाई हो रही थी। इसी दौरान एक महिला हाई कोर्ट में पेश हुई। उसने खुद को सैयद ऐनैन कादरी नाम की एक वकील बताया और कोर्ट को कहा कि इस मामले को रद्द करने से जुड़ी याचिका में याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हो रही है।

वह कोर्ट में वकील की पोशाक में आई, लेकिन उसने अपना चेहरा ढक रखा था। उस समय मामले की सुनवाई जस्टिस राहुल भारती कर रहे थे। जब न्यायाधीश राहुल भारती ने उस महिला वकील से अपना चेहरा दिखाने का अनुरोध किया तो उसने इनकार कर दिया। महिला वकील ने जोर देकर कहा कि चेहरा ढककर आना उनका मौलिक अधिकार है। इसलिए कोर्ट उससे नकाब हटाने के लिए नहीं कह सकता।

इसके बाद जज राहुल भारती ने 27 नवंबर के अपने आदेश में कहा, “यह न्यायालय याचिकाकर्ताओं के वकील के रूप में खुद को अधिवक्ता सुश्री सैयद ऐनैन कादरी बताने वाली महिला की उपस्थिति पर विचार नहीं करता, क्योंकि कोर्ट के पास एक व्यक्ति और एक पेशेवर के रूप में उनकी वास्तविक पहचान की पुष्टि करने का कोई आधार/अवसर नहीं है।” कोर्ट ने मामले को 5 दिसंबर तक के लिए स्थगित कर दिया।”

इसके बाद कोर्ट ने न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल से पूछा कि क्या ऐसा कोई नियम है, जो महिला अधिवक्ताओं को अपना चेहरा ढककर पेश होने या अपना नहीं चेहरा ढकने के न्यायालय के अनुरोध को अस्वीकार करने का अधिकार देता है। इसके बाद रजिस्ट्रार जनरल ने 5 दिसंबर को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की।

रजिस्ट्रार जनरल की रिपोर्ट की जाँच करने के बाद न्यायमूर्ति मोक्ष खजूरिया काजमी ने 13 दिसंबर को कहा कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) द्वारा निर्धारित नियमों में ऐसे किसी अधिकार का उल्लेख नहीं है। बीसीआई नियमों के अध्याय IV (भाग VI) की धारा 49(1) (जीजी) के तहत महिला अधिवक्ताओं के लिए ड्रेस कोड का विवरण दिया गया है।

जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाई कोर्ट ने पाया कि BCI की इन प्रावधानों में महिला अधिवक्ताओं को काले रंग की पूरी आस्तीन वाली जैकेट या ब्लाउज, सफेद बैंड, साड़ी या अन्य मामूली पारंपरिक पोशाक के साथ-साथ काला कोट पहनने की अनुमति है। हालाँकि, न्यायालय ने बताया कि निर्धारित न्यायालय पोशाक में चेहरा ढकना शामिल नहीं है या इसकी अनुमति नहीं है।

इसके बाद न्यायालय ने कहा, “नियमों में कहीं भी यह नहीं कहा गया है कि इस न्यायालय के समक्ष उपस्थित होने के लिए इस तरह की कोई पोशाक (चेहरा ढकना) स्वीकार्य है।” हालाँकि, बाद में याचिकाकर्ताओं का प्रतिनिधित्व करने के लिए एक अन्य वकील आगे आए। बाद में न्यायमूर्ति काज़मी ने 6 दिसंबर को मामले में निर्णय सुरक्षित रख लिया और 13 दिसंबर को उसे खारिज कर दिया।

संभल में जहाँ मिली 3 मंजिला बावड़ी, वह कभी हिंदू बहुल इलाका था: रानी की पोती आई सामने, बताया- हमारा बचपन यहीं बीता, बदायूँ के अनेजा ने प्लॉट काट मुस्लिमों को बेच दिए

उत्तर प्रदेश स्थित संभल जिले के चंदौसी क्षेत्र में राजस्व विभाग ने एक प्राचीन बावड़ी को भी खोज निकाला है। इसे ‘रानी की बावड़ी’ कहा जा रहा है। इसकी साफ-सफाई का काम जोर-शोर से जारी है। चंदौसी नगरपालिका की सफाई एवं खाद्य निरीक्षक प्रियंका सिंह का कहना है कि यहाँ खुदाई मैन्युअली की जा रही है। 40-50 मजदूर काम कर रहे हैं।

प्रियंका सिंह का कहना है कि ये बावड़ी है और इसकी खुदाई में किसी प्रकार की हानि ना हो इसलिए मशीनों का प्रयोग नहीं किया जा रहा है। खुदाई का ये काम चंदौसी के लक्ष्मणगंज इलाके में हो रहा है। साल 1857 तक ये क्षेत्र हिन्दू बहुल हुआ करता था। हालाँकि, हिंदुओं के पलायन के बाद इस बावड़ी पर कब्जा कर लिया गया और उसे भर दिया गया।

दरअसल, इस जगह की खुदाई की माँग को लेकर संभल के जिलाधिकारी को एक प्रार्थना पत्र मिला था। प्रार्थना पत्र में लक्ष्मणगंज के अंदर बिलारी की रानी की प्रचीन बावड़ी होने का दावा किया गया था। इसी शिकायत का संज्ञान लेकर राजस्व विभाग की टीम लक्ष्मणगंज पहुँची थी। बस्ती के बीच में एक जगह चिन्हित कर के खुदाई शुरू हुई। कुछ ही देर बाद जमीन के नीचे प्राचीन इमारतें मिलनी शुरू हो गईं। 

रामपुर से सटे सहसपुर-बिलारी राजपरिवार द्वारा इसे बनवाया गया था। रानी की बावड़ी की खुदाई के बाद से यहाँ तीन मंजिला बावड़ी मिली है। वहीं, यहाँ रानी रहीं सुरेंद्र बाला की पोती राजकुमारी शिप्रा बाला ने बताया कि यह इलाका पहले हिंदू बहुल था। बाद में इस राजपरिवार के कई हिस्सेदार होने के बाद यहाँ की जमीनों को बदायूँ के अनेजा को बेच दिया। अनेजा ने इसकी प्लॉटिंग करके मुस्लिमों के बेच दिया।

राजकुमारी शिप्रा ने बताया, “यह दादी सुरेंद्र बाला और बाबा जगदीश कुमार की संपत्ति है। उनके बेटे लल्ला बाबू विष्णु कुमार की पाँच बेटियों में मैं सबसे छोटी हूँ। यहाँ हमारा पुश्तैनी फार्म हाउस था। फार्म हाउस में गन्ने की खेती हुआ करती थी। हम लोगों के लिए यहाँ एक कुआँ भी था। हम लोग यहाँ मम्मी-पापा के साथ पिकनिक मनाते थे। हमारा बचपन यहीं बीता है। यहाँ पर कोठी से जुड़ा हुआ लक्ष्मणगंज है।”

शिप्रा बाला का कहना है कि कोई भाई नहीं था। बकौल राजकुमारी, “अकेला आदमी अपनी संपत्ति पर ध्यान नहीं दे पाता है। इसके कारण लोग उसकी जमीन हथियाना शुरू कर देते हैं।” यही हाल परिवार से जुड़ी जमीनों का भी यही हुआ। ये मामला सहसपुर राजपरिवार से जुड़ा हुआ है। 1857 के सिपाही विद्रोह के समय सहसपुर की रानी अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई में इसे छावनी के तौर पर इस्तेमाल करती थीं।

स्थानीय लोगों के अनुसार, यह बावड़ी बिलारी के राजा के नाना (सहसपुर के राजा) के समय की है। इसमें एक कूप और 4 कमरे हैं। बावड़ी के अंदर का दृश्य मंदिर जैसा दिखाई देता है। इसके अंदर एक सुरंग भी है। लगभग 150 साल पुरानी इस बावड़ी का प्रयोग पानी जमा करने और सैनिकों के आराम करने के लिए किया जाता था। इसके सिर्फ 150 मीटर दूर इलाके का सबसे प्रसिद्ध क्षेमनाथ तीर्थ मंदिर भी है।

यह बावड़ी करीब 10-12 मीटर लंबी और 28 फीट गहरी बताई जा रही है। संभल के डीएम राजेंद्र पैंसिया ने बताया कि इस बावड़ी में नीचे के दो मंजिल मार्बल के हैं और सबसे ऊपर का मंजिल ईंटों का बना है। उन्होंने बताया कि यह 400 वर्गमीटर क्षेत्र में फैला है। वर्तमान में 210 वर्गमीटर ही है और बाकी हिस्सों पर कब्जा किया गया है। जिलाधिकारी ने बताया कि जल्द ही उन्हें भी खाली करा लिया जाएगा।

अब इस्लामी कानून से ब्रिटेन को हाँक रहे मुस्लिम, चल रहे 85 शरिया कोर्ट: 4 बीवी की रवायत को बढ़ावा, ग्रूमिंग गैंग के आतंक पर लिबरलों की चुप्पी से पैदा हुआ नया खतरा

इंग्लैंड का कानून इस्लामी कट्टरपंथ के आगे घुटने टेक रहा है। कभी दुनिया के एक बड़े हिस्से पर राज करने वाला इंग्लैंड अब मुस्लिम कट्टरपंथियों के नतमस्तक है। जिस इंग्लैंड ने ‘कानून का राज’ की अवधारणा दी थी, उस देश में अब इस्लामी अदालतें चल रही हैं। ब्रिटेन में दशकों से आदर्शवादी और लिबरल बनने के चक्कर में कट्टरपंथ पर मुंह बंद रखा गया था।

इस्लामी कट्टरपंथ के पैर पसारने को लेकर अगर कोई बोलता है तो उसे इस्लामोफोब करार दिया जाता है। इस्लाम पर इस चुप्पी का सबसे ज्वलंत उदाहरण ग्रूमिंग गैंग रहे हैं, जिन्होंने हजारों ब्रिटिश लड़कियों को निशाना बनाया। यह निशाना बनाने वाले मुस्लिम थे और उनके ऊपर कोई कार्रवाई नहीं हुई।

अब शरिया अदालतें खुल्लम-खुल्ला ब्रिटिश कानूनों की धज्जियाँ उड़ा रही हैं। ‘शरिया कोर्ट’ के नाम पर चलाई जा रहीं यह अदालतें ब्रिटेन 4 निकाह जैसी सामजिक कुरीतियों को बढ़ावा दे रही हैं। इन अदालतों पर ब्रिटिश सरकार अंकुश नहीं लगा पा रही है। यह अदालतें अवैध निकाह भी करवा रही हैं जिनका कानूनन कोई रिकॉर्ड नहीं है।

ब्रिटिश अखबार द टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, इंग्लैंड में वर्तमान में 85 ऐसी शरिया अदालतें चल रही हैं। मुस्लिमों के मसलों से निपटने के लिए बनाई गई यह शरिया अदालतें पूरे इंग्लैंड में फैली हुई हैं। यह अदालतें निकाह, तलाक, खुला और चार निकाह जैसे मामलों पर फैसले दे रही हैं। यह अदालतें ब्रिटिश कानून के खिलाफ जाकर तमाम फैसले देती हैं।

रिपोर्ट बताती है कि ऐसी पहली शरिया अदालत इंग्लैंड में लंदन में 1982 में खोली गई थी। तब से यह लगातार बढ़ रही हैं। इनमें से एक अदालत ने एक ऐसे एप को मंजूरी दे रखी थी जो मुस्लिम पुरुषों से उनकी बीवियों की संख्या पूछता था। इसके अलावा इंग्लैंड में चलने वाले एक और एप में भी मुस्लिम युवा निकाह के बाद कितनी बीवियाँ रखेंगे, इसकी जानकारी भर सकते हैं।

गौरतलब है कि ब्रिटिश कानून के अंतर्गत कोई भी व्यक्ति एक से अधिक शादी/निकाह नहीं कर सकता। ऐसा करने के लिए तलाक और उसका कानूनी आदेश जरूरी है। हालाँकि, यहः शरियाई अदालतें इन सब बातों को नहीं मानती हैं और धड़ल्ले से इन सब कामों में मशगूल हैं।

इन शरिया अदालतों ने लगभग 100000 ऐसे निकाह करवाए हुए हैं, जिनका ब्रिटिश कानून में कोई पंजीकरण नहीं हुआ है। इंग्लैंड के भीतर शरिया अदालतों की धाक इतनी बढ़ गई है कि अब यूरोप के बाकी देशों और अमेरिका से मुस्लिम यहाँ अपने इस्लामी मसले लेकर पहुँच रहे हैं।

यह अदालतें चार निकाह को बढ़ावा दे रही हैं लेकिन ब्रिटिश एजेंसियाँ इनके आगे लाचार हैं। लगातार मुस्लिम तुष्टिकरण में लगे रहने वाले ब्रिटिश नेताओं ने इस मसले पर आँखे मूँद ली हैं। इसी के चलते इंग्लैंड अब शरिया कोर्ट के पश्चिमी देशों का प्रमुख केंद्र है।

इंग्लैंड में इन शरिया अदालतों को लेकर धर्मनिरपेक्षता को लेकर काम करने वाले संगठन विरोध कर रहे हैं। इंग्लैंड के ऐसे ही एक संगठन नेशनल सेक्युलर सोसायटी ने माँग की है कि ब्रिटेन में चल रही इस समानांतर कानून व्यवस्था पर नकेल कसी जाए। उन्होंने कहा है कि इससे महिलाओं और बच्चों के अधिकारों पर असर पड़ रहा है। हालाँकि, सरकार इस मामले पर शांत है।

ब्रिटेन में इस्लामी कट्टरपंथ पर सरकार और लिबरल समाज का चुप रहना कोई विचित्र बात नहीं है। ग्रूमिंग गैंग के हाथों जब हजारों ब्रिटिश लड़कियाँ शिकार बन गईं तो एक टास्क फ़ोर्स बनाई गई। लेकिन इसी के साथ अब ब्रिटेन में इस्लामी कानून नाफ़िज करने की तैयारी है। ब्रिटिश सरकार ने इस दौरान शुतुरमुर्ग की तरह रेत में गर्दन धँसा ली है।

ब्रिटिश सरकार इस पूरे इस्लामी कट्टरपंथ के तंत्र पर प्रहार नहीं करना चाहती। उसे लगता है कि इससे उसकी कथित उदार छवि पर असर पड़ेगा, जबकि सच्चाई यह है कि इसी का फायदा उठा कर इस्लामी कट्टरपंथी अपनी धाक इंग्लैंड में जमा रहे हैं। वह हिन्दुओं पर हमला करते हैं, महिलाओं को छेड़ते हैं यहाँ तक कि इंग्लैंड में धमाके भी हो चुके हैं।

दंगों के बाद हिंदुओं को करना पड़ा पलायन, नदी में विसर्जित करनी पड़ी मूर्तियाँ… अब खुर्जा में मिला बंद मंदिर, प्रशासन से जीर्णोद्धार और पूजा-पाठ फिर शुरू करवाने की माँग

बुलंदशहर जिले के खुर्जा कस्बे में एक ऐसा मंदिर मिला है, जो करीब 50 साल पुराना बताया जा रहा है और पिछले 30 वर्षों से बंद पड़ा था। इस मंदिर का निर्माण जाटव समुदाय ने किया था, जो वहाँ पूजा-अर्चना करते थे। साल 1990 के दंगों के बाद जाटव समुदाय ने इस इलाके को छोड़ दिया और मंदिर भी बंद हो गया। इस दौरान मंदिर की मूर्तियों को समुदाय के ही एक परिवार ने नदी में विसर्जित कर दिया था।

खुर्जा के एसडीएम दुर्गेश सिंह ने बताया कि मंदिर सलमा हकान मोहल्ले में स्थित है और इसका ढाँचा पूरी तरह सुरक्षित है। उन्होंने कहा कि इस स्थल को लेकर किसी भी समुदाय के बीच कोई विवाद नहीं है। एसडीएम ने यह भी स्पष्ट किया कि मंदिर की मूर्तियों को नदी में विसर्जित कर दिया गया था और मामले की जाँच जारी है।

मंदिर का पता चलने के बाद विश्व हिंदू परिषद (VHP) और जाटव विकास मंच ने प्रशासन से मंदिर का जीर्णोद्धार कराने की माँग की है। VHP के मेरठ प्रांत के पदाधिकारी सुनील सोलंकी ने बताया कि मंदिर 1990 के बाद से बंद है। उस समय इस क्षेत्र में रहने वाले हिंदू परिवार दंगों के डर से पलायन कर गए थे। उन्होंने प्रशासन को ज्ञापन सौंपकर मंदिर की सफाई और सौंदर्यीकरण कराने का अनुरोध किया, ताकि पूजा-पाठ फिर से शुरू हो सके।

जाटव विकास मंच के अध्यक्ष कैलाश भागमल गौतम ने भी मंदिर के इतिहास पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि मंदिर का निर्माण जाटव समुदाय के लोगों ने किया था। यह मंदिर 50 साल पुराना है, लेकिन 1990 के दंगों के दौरान समुदाय ने पलायन कर दिया, जिससे मंदिर बंद हो गया। अब मंच और VHP के सदस्यों ने मिलकर मंदिर में धार्मिक गतिविधियाँ फिर से शुरू करने की माँग की है।

इस मंदिर को लेकर स्थानीय लोगों और संगठनों की उम्मीदें बढ़ गई हैं। उनका मानना है कि मंदिर का जीर्णोद्धार कर पूजा-अर्चना फिर से शुरू की जा सकती है। प्रशासन से इस मामले में जल्द निर्णय लेने की उम्मीद जताई जा रही है।

बता दें कि इससे पहले संभल और वाराणसी में भी सालों से बंद पड़े मंदिरों का पता चला था। संभल में 1978 से बंद पड़े एक मंदिर को हाल ही में खोला गया, जहाँ कार्बन डेटिंग की प्रक्रिया भी हो चुकी है। वहीं, वाराणसी के मदनपुरा इलाके में 250 साल पुराने एक मंदिर का पता चला है। अब बुलंदशहर के खुर्जा में मिला यह मंदिर भी चर्चा में है।

अल्लू अर्जुन के घर पर हमला करने वालों को मिली जमानत, कॉन्ग्रेसी CM रेवंत रेड्डी के साथ तस्वीरें वायरल: तोड़फोड़ के बाद ‘पुष्पा 2’ एक्टर ने परिवार सहित घर छोड़ा

साउथ के सुपरस्टार व सुपरहिट फिल्म पुष्पा-2 के एक्टर अल्लू-अर्जुन के आवास पर 22 दिसंबर को पत्थरबाजी करके उनकी संपत्ति को नुकसान पहुँचाने का प्रयास हुआ। पुलिस ने इस मामले में 6 लोगों को पकड़ा जिन्हें आज सुबह तक बेल भी मिल गई। अब इसी मामले में एक बीआरएस नेता ने दावा किया है कि आरोपितों में से एक तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी का आदमी था। वहीं कॉन्ग्रेस नेता ने इन आरोपों पर कोई बयान नहीं दिया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, 22 दिसंबर 2024 को उस्मानिया यूनिवर्सिटी की ज्वाइंट एक्शन कमेटी के लोगों ने जुबली हिल्स में जबरन घुसने की कोशिश की थी। उनकी माँग थी कि उस महिला के परिजनों को 1 करोड़ रुपए दिए जाएँ जिनकी मौत भगदड़ के दौरान हुई थी।

पुलिस ने सही समय पर आकर इन्हें गिरफ्तार किया और 6 लोगों को जज के सामने पेश किया। कोर्ट ने 10-10 हजार रुपए तथा दो जमानती पेश होने के बाद सबको छोड़ दिया गया। इस बेल के बाद ही बीआरएस नेता कृष्णक सामने आए। उन्होंने दावा किया श्रीनिवास 2019 के जिला परिषद प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्र (जेडटीपीसी) चुनावों में रेवंत रेड्डी और कोडंगल कॉन्ग्रेस उम्मीदवार के ‘करीबी सहयोगी’ थे।

बीआरएस नेता कृषांक ने कुछ तस्वीरें पोस्ट की, जिनमें अल्लू अर्जुन के घर तोड़फोड़ करने वाला एक आरोपित मुख्यमंत्री के साथ पोज देते हुए दिखाई दे रहे था। उन्होंने कहा, “ओयूजेएसी को साल 2009 में महान तेलंगाना के लिए शुरू किया गया था। उसे हिंसा और ब्लैकमेल के लिए इसका इस्तेमाल करना घृणित है। अल्लू अर्जुन के आवास पर हमला करने वाले रेड्डी श्रीनिवास उस्मानिया विश्वविद्यालय के छात्र नेता नहीं हैं। वह रेवंत के करीबी सहयोगी और 2019 जेडपीटीसी चुनाव में कोडंगल कांग्रेस के उम्मीदवार हैं।”

बता दें कि अल्लू अर्जुन रविवार को अपने घर हुए हमले के बाद परिवार को लेकर चिंतित हैं। वह अपने बच्चों के साथ सुरक्षित जगह चले गए हैं। उन्होंने अपने बच्चों को अपने पिता के घर भेज दिया है। तस्वीर सामने आई है जिसमें वह लोग गाड़ी में है और काफी चिंतित हैं। उनके बच्चे भी हैरान-परेशान होकर डरे बैठे हैं। इस घटना पर अल्लू अर्जुन के पिता ने भी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि उनके घर पर जो कुछ हुआ, उसे सभी ने देखा है। लेकिन अब समय आ गया है कि वह लोग उसके अनुसार काम करें।

इस्लामी लुटेरे अहमद शाह अब्दाली को रोका, मुगल हो या अंग्रेज सबसे लड़े: जूनागढ़ के निजाम ने जहर देकर हिंदू संन्यासियों को मारा, जो बच गए उन्होंने बना दिया जूना अखाड़ा

प्रयागराज महाकुंभ-2025 की तैयारियाँ जोरों पर हैं। वहीं विभिन्न अखाड़ों के साधु-संत विश्व के सबसे बड़े धार्मिक समागम में हिस्सा लेने के लिए पहुँच रहे हैं। इन्हीं अखाड़ों में से एक अखाड़ा है भैरव अखाड़ा। 13 अखाड़ों में सबसे बड़े भैरव अखाड़े को पंचदशनाम जूना अखाड़ा के नाम से भी जाना जाता है। नागा संन्यासियों के इस अखाड़े का इतिहास आध्यात्मिकता के साथ-साथ पराक्रम से भी भरा पड़ा है।

यही कारण है कि नागा संन्यासी अपने साथ अस्त्र-शस्त्र भी रखते हैं। इनके हाथों में तलवार, त्रिशुल, भाला, फरसा जैसे कई तरह के हथियार होते हैं। कहा जाता है कि नागा संन्यासियों ने मुगलों से लेकर अंग्रेजों तक के साथ युद्ध लड़े हैं। जूना अखाड़े में एक शस्त्रागार भी है, जिसमें 400 वर्ष पुराने अस्त्र-शस्त्र रखे हुए हैं। कुंभ के आयोजन के दौरान नागा साधु इन हथियारों को लेकर निकलते हैं।

जूना अखाड़े की स्थापना का उद्देश्य

जूना अखाड़े शैव संप्रदाय से 7 अखाड़ों से ताल्लुक रखता है। इसकी स्थापना 1145 ईस्वी में उत्तराखंड के कर्णप्रयाग में हुआ था। यहीं पर इस अखाड़े का पहला मठ भी बना था। हालाँकि, हिंदू धर्म के कुछ जानकारों का मानना है कि इस अखाड़े की स्थापना का उल्लेख सन 1259 में मिलता है। वहीं, सरकारी दस्तावेजों में इस अखाड़े का पंजीकरण सन 1860 में कराया गया था।

जूना अखाड़े के इष्ट या अराध्य भगवान शिव या उनके रुद्रावतार भगवान दत्तात्रेय हैं। इस अखाड़े का केंद्र एवं मुख्यालय वाराणसी के हनुमान घाट पर स्थापित किया गया है। इस अखाड़े का आश्रम हरिद्वार के महामाया मंदिर के पास बनाया गया। इसके अलावे, इस अखाड़े के केंद्र उज्जैन से लेकर तमाम प्रमुख केंद्रों में स्थित है। कहा जाता है कि इस अखाड़े में 5 लाख से ज्यादा नागा साधु हैं।

कहा जाता है कि जब बौद्ध एवं जैन संप्रदाय के वर्चस्व को तोड़ने के लिए इन अखाड़ों की स्थापना की गई थी। नागा साधुओं को शास्त्र के साथ-साथ अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा देकर युद्ध कौशल में पारंगत बनाया गया, ताकि वे हिंदू धर्म को स्थापित करने में सहयोग कर सकें। तब से ये अखाड़ा चले आ रही हैं। शंकराचार्य के निर्देशन में स्थापित ये अखाड़े बाद में मुस्लिम आक्रमणकारियों से भी लड़े।

अब्दाली, निजाम और मुगलों से भी लिया लोहा

कह जाता है कि इस अखाड़े के नागा साधुओं ने मंदिरों-मठों की रक्षा के लिए मुगलों से लोहा लिया था। यह भी कहा जाता है कि उन्होंने अफगान आक्रांता अहमद शाह अब्‍दाली मथुरा-वृंदावन को लूटने के बाद गोकुल को लूटने के इरादे से आगे बढ़ा, लेकिन नागाओं ने इन्हें रोक दिया। इसके कारण अब्दाली का गोकुल को लूटने का सपना रह गया था।

यह भी कहा जाता है कि नागा साधुओं ने गुजरात के जूनागढ़ के निजाम के साथ एक भीषण युद्ध किया था। इस युद्ध में नागा संन्यासियों ने निजाम और उसकी सेना को धूल चटा दी थी। मान्यता है कि नागा साधुओं के सैन्य कौशल से निजाम भी प्रभावित हो गया था। आखिरकार इन संन्यासियों के आगे घुटने टेकते हुए जूनागढ़ के निजाम को इन्हें संधि के लिए आमंत्रित करना पड़ा।

जूना अखाड़े के संरक्षक महंत हरि गिरि बताते हैं कि अखाड़े के संन्यासी निजाम के पास संधि के लिए गए। इसमें संन्यासियों को जूनागढ़ सौंपने की बात कहते हुए भोजन पर आमंत्रित किया। इस दौरान निजाम ने धोखे से संन्यासियों को भोजन में जहर मिलाकर दे दिया। इससे सैकड़ों संन्यासियों की मौत हो गई। जो बच गए उन्होंने जूना अखाड़े की स्थापना की।

नागा संन्यासियों के शौर्य को लेकर एक और कथा कही जाती है। कहा जाता है कि मुगल आक्रांता जहाँगीर एक बार प्रयागराज कुंभ मेला में आने वाला था। तब वैष्णव और शैव संप्रदाय के संन्यासियों ने मिलकर एक पिरामिड बनाया और उससे एक छद्म युद्ध किया। इसमें पिरामिड पर चढ़कर एक साधु ने जहाँगीर को कटारी भोंक दी थी। इस तरह वे मुगलों के खिलाफ अपनी गुस्सा को रोक नहीं पाए थे।

पंचदशनाम जूना अखाड़े के अष्ट कौशल महंत योगानंद गिरी का कहना है कि नागा संन्यासियों जो अस्त्र-शस्त्र लेकर चलते हैं, इन्हीं उन्होंने मुगलों से लड़ाई लड़ी थी। इसके बाद अंग्रेजों के शासन के दौरान संन्यासी विद्रोह किया। योगानंद गिरि कहते हैं, “इन अस्त्रों को हम कैंची बोलते हैं, जो हमारे लिए पूजनीय होता है।”

कैसे बनते हैं नागा साधु?

अखाड़े का संन्यासी बनने के लिए एक संकल्प पूरा करना होता है। यह संकल्प 12 साल का होता है। यह संकल्प लेने वाला ब्रह्मचारी कहलाता है। ब्रह्मचर्य के दौरान उस शख्स को अखाड़े के नियम और परंपराएँ सिखाई जाती हैं। इस दौरान गुरु की सेवा करनी होती है। जब ब्रह्मचारी का 12 साल का संकल्प पूरा हो जाता है तो आने वाले कुंभ में नागा साधु के रूप में दीक्षा दी जाती है।

शुरुआत में संन्यास की दीक्षा गुरु के द्वारा दी जाती है। मंत्रोच्चार आदि से शरीर पर समस्त चीजों को धारण करवाया जाता है। इसके बाद विजय संस्कार संपन्न किया जाता है। विजय संस्कार में संन्यास लेने वाले व्यक्ति का पिंडदान और अन्य आहुतियाँ करवाकर उसे सांसारिक मोह-माया से काट दिया जाता है। आहूति दीक्षा मिलने के बाद नागा संन्यासी बनने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है।

इस संस्कार के दौरान धर्म ध्वज के नीचे सभी साधुओं को एकत्रित किया जाता है और फिर नागा साधु की दीक्षा दी जाती है। इस दौरान एक अलग गुरु बनाया जाता है, जो दिगंबर होता है। इसके बाद अच्छे नागाओं की अखाड़ों में ड्यूटी लगाई जाती है। नागा संन्यासी आमतौर पर हाथ में त्रिशूल, तलवार, शंख लिए होते हैं और गले एवं शरीर में रुद्राक्ष आदि धारण करते हैं।