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संभल में हिंसा से पहले आसपास के जिलों से बुलाए गए थे मदरसा छात्र, पुलिस को ‘पत्रों’ से मिली जानकारी: उपद्रवियों के खिलाफ नए एंगल से जाँच शुरू, SP बोले- किसी को बख्शा नहीं जाएगा

उत्तर प्रदेश के संभल में हुई हिंसा मामले में पुलिस ने नए एंगल से अपनी जाँच शुरू की है। पुलिस के हवाले से मीडिया में बताया जा रहा है कि पुलिस को कुछ गुमनाम पत्र मिले हैं। इन पत्रों में दावा है कि हिंसा से पहले आसपास के जिले के मदरसों के छात्रों को समन किया गया था। कथिततौर पर ऐसा सिर्फ इसलिए किया गया ताकि मस्जिद के सर्वे वाले दिन (24 नवंबर को) इलाके में बड़े पैमाने पर हिंसा को अंजाम दिया जा सके।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, संभल के पुलिस अधीक्षक (एसपी) कृष्ण कुमार बिश्नोई ने कहा, “हमें कई पत्र मिले हैं, जिनमें दावा किया गया है कि उस दिन रामपुर, हापुड़ और बुलंदशहर जिलों के मदरसों से छात्रों को विशेष रूप से संभल बुलाया गया था। हम इन पत्रों की प्रामाणिकता की पुष्टि कर रहे हैं और उचित जाँच के बाद अगर पत्रों की सामग्री सही पाई जाती है, तो हम सख्त कार्रवाई करेंगे।”

गौरतलब है कि पुलिस ने अब तक हिंसा में शामिल होने के आरोप में 3 महिलाओं समेत करीब 40 लोगों को गिरफ्तार किया है। इसके अलावा, पुलिस ने झड़पों में 93 लोगों की पहचान की है जिनकी इस हिंसा में ‘सक्रिय भागीदारी’ रही। संभल पुलिस जल्द ही इन भगोड़ों को पकड़ने में मदद करने वाली सूचना देने वालों को इनाम देने की घोषणा करेगी।

पुलिस अधीक्षक ने साफ कहा है कि हिंसा में शामिल किसी भी व्यक्ति को बख्शा नहीं जाएगा। पुलिस सभी आरोपितों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करेगी। वहीं फरार आरोपितों को पकड़ने के लिए जल्द ही इनाम की घोषणा भी की जाएगी।

बता दें कि अभी तक इस मामले में कार्रवाई करते हुए 400 संदिग्धों की तस्वीरें जारी की जा चुकी हैं। वहीं इस मामले में बार एफआईआर दर्ज हुई हैं जिनमें से 7 को पुलिस अधिकारियों द्वारा दर्ज करवाया गया है और बाकी की 5 उन लोगों द्वारा दर्ज करवाई गई है जिनके परिजन इस हिंसा में मारे गए हैं।

कहाँ है अतुल सुभाष का 4 साल का बेटा? निकिता की गिरफ्तारी के बाद पीड़ित परिजन जता रहे अनहोनी की आशंका: पति की आत्महत्या से 1 दिन पहले बुक किया था PG, गूगल ड्राइव से फाइलें गायब

बेंगलुरु के AI इंजीनियर अतुल सुभाष की आत्महत्या केस में पुलिस ने उनकी पत्नी निकिता सिंघानिया, सास निशा सिंघानिया और साले अनुराग सिंघानिया को गिरफ्तार कर लिया है। अब अतुल के भाई ने सवाल पूछा है कि उनका भतीजा कहाँ है। अतुल के भाई विकास मोदी ने कहा कि हम सब ये जानना चाहते हैं कि मेरा भतीजा यानि कि अतुल सुभाष का बेटा किस कंडीशन में है, उसको सार्वजनिक रखा जाए। अगर हो सके, तो उसे हमें दिया जाए। हम उसे अपने पास रखने के लिए तैयार हैं। इस बीच, ये जानकारी सामने आ रही है कि अतुल सुभाष के लैपटॉप से जरूरी फोल्डर गायब हैं, खासकर सुसाइड नोट से जुड़ी फाइल और वीडियो।

अतुल के भाई विकास मोदी ने पुलिस को धन्यवाद दिया, लेकिन कहा कि यह गिरफ्तारी न्याय का अंत नहीं है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से अपील की कि इस केस में पुरुषों के साथ हो रहे उत्पीड़न पर भी ध्यान दिया जाए। विकास ने कहा, “हमेशा महिलाओं के अधिकारों की बात होती है, लेकिन पुरुषों के अधिकारों पर कोई चर्चा नहीं होती।” विकास मोदी ने कहा कि निकिता की गिरफ्तारी के बाद अब भी कई सवाल बाकी हैं। सबसे बड़ा सवाल है कि अतुल का बेटा कहाँ है। उन्होंने कहा, “निकिता की तस्वीर में हमारा भतीजा नहीं दिख रहा। हम जानना चाहते हैं कि वह किस हाल में है।”

परिवार की अपील: पोते की कस्टडी चाहिए

अतुल के पिता पवन कुमार मोदी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और अन्य नेताओं से अपील की है कि उनके पोते को सुरक्षित उनके पास लाया जाए। उन्होंने चिंता जताई, “हमें नहीं पता कि हमारा पोता जिंदा है या उसे मार दिया गया है। हमें उसके बारे में कुछ नहीं पता। एक दादा के लिए उसका पोता उसके बेटे से भी ज्यादा मायने रखता है।” पवन कुमार ने बताया कि निकिता ने पोते के नाम पर उनके खिलाफ एक और मामला दर्ज कर दिया है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि वे पोते की परवरिश खुद करना चाहते हैं, ताकि उसे एक सुरक्षित और अच्छा जीवन मिल सके।

पवन कुमार मोदी ने कहा कि अतुल को शादी के बाद से ही लगातार परेशान किया जा रहा था। उन्होंने बताया, “मेरे बेटे को झूठे आरोपों और केसों में फंसाकर इतना प्रताड़ित किया गया कि उसने जान दे दी। कानून को इस तरह के मामलों पर ध्यान देना चाहिए। अगर ऐसा नहीं हुआ, तो कई और अतुल सुभाष इस अन्याय का शिकार होंगे।” उन्होंने यह भी कहा कि न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता और सख्ती की जरूरत है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से इस मामले को गंभीरता से लेने की अपील की।

अतुल के परिवार ने कहा कि उनकी प्राथमिकता अब अतुल के बेटे को अपने पास लाने की है। उन्होंने पुलिस से अपील की कि बच्चे की स्थिति सार्वजनिक की जाए। विकास मोदी ने कहा, “हम तैयार हैं कि पोते की परवरिश हम करें। पुलिस और कोर्ट को सुनिश्चित करना चाहिए कि बच्चा हमारे पास सुरक्षित लौट आए।”

गुरुग्राम से हुई पत्नी की गिरफ्तारी

पुलिस ने निकिता को गुरुग्राम के एक पीजी से गिरफ्तार किया। बताया जा रहा है कि निकिता ने पीजी में अपने नाम पर रजिस्ट्रेशन कराया था और एक महीने का किराया भी भरा, लेकिन वहाँ रुकी नहीं। पुलिस के मुताबिक, निकिता के सामान अब भी उस पीजी में मौजूद हैं। वहीं, निकिता की माँ निशा और भाई अनुराग को प्रयागराज के एक होटल से गिरफ्तार किया गया। तीनों को कोर्ट में पेश करने के बाद न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है।

अतुल के लैपटॉप से गूगल ड्राइव गायब

इस बीच, इस मामले से जुड़ी नई जानकारी निकल कर सामने आई है। दावा किया जा रहा है कि अतुल सुभाष की आत्महत्या के लगभग एक सप्ताह बाद, जिसमें उन्होंने अपनी पत्नी निकिता और उसके परिवार के सदस्यों पर उत्पीड़न का आरोप लगाया था, उनकी मृत्यु से पहले उनके द्वारा साझा किए गए Google Drive लिंक में कई फ़ाइलें रहस्यमय तरीके से गायब हो गई हैं। जो फाइलें गायब हुई हैं, उनमें उनका 24-पृष्ठ का सुसाइड नोट और ‘टू मिलॉर्ड्स’ शीर्षक वाला एक पत्र शामिल है। इस फाइल में न्याय प्रणाली की आलोचना की गई थी।

क्या हुआ था अतुल के साथ?

बेंगलुरु में एक प्राइवेट कंपनी में डिप्टी जनरल मैनेजर के पद पर कार्यरत रहे अतुल सुभाष ने 9 दिसंबर 2024 को आत्महत्या की। उन्होंने अपने सुसाइड नोट में लिखा कि उनकी पत्नी और ससुराल वाले उन्हें बार-बार परेशान कर रहे थे। निकिता 2021 में घर छोड़कर अपने बेटे को लेकर चली गई थी और झूठे आरोप लगाते हुए केस दर्ज कराए थे। अतुल ने यह भी आरोप लगाया कि उनके केस की सुनवाई कर रहे एक जज ने रिश्वत माँगी थी। उन्होंने कहा था कि उनकी पत्नी ने उनके बेटे को उनसे दूर कर दिया और उन्हें आत्महत्या करने पर मजबूर किया।

अतुल ने डेढ़ घंटे का वीडियो और 23 पन्नों का सुसाइड नोट छोड़कर खुदकुशी की थी, जिसमें उन्होंने पत्नी और ससुरालवालों पर उत्पीड़न और झूठे केसों का आरोप लगाया। अतुल ने अपने सुसाइड नोट और वीडियो में शादी के बाद से लेकर आत्महत्या के दिन तक के सभी घटनाक्रम विस्तार से बताए थे। उन्होंने कहा था कि उनकी पत्नी और ससुराल वाले उन्हें दहेज उत्पीड़न, हत्या और जबरन वसूली जैसे झूठे केसों में फंसा रहे हैं। अतुल ने एक जज पर भी पाँच लाख रुपये की रिश्वत माँगने का आरोप लगाया था।

पुलिस ने इस मामले में चार आरोपितों की पहचान की थी, जिनमें से तीन की गिरफ्तारी हो चुकी है। निकिता के चाचा सुशील अभी फरार हैं, और पुलिस उनकी तलाश में जुटी है।

रवींद्र सिंह यादव के ठिकानों पर छापे में मिली अकूत संपत्ति: नोएडा में ₹16 करोड़ का घर तो इटावा में ₹15 करोड़ का स्कूल, योगी के मंत्री ने ऑन द स्पॉट किया था सस्पेंड

उत्तर प्रदेश के नोएडा विकास प्राधिकरण के निलंबित विशेष कार्याधिकारी (ओएसडी) रवींद्र यादव के खिलाफ विजिलेंस विभाग ने बड़ी कार्रवाई करते हुए शनिवार (14 दिसंबर 2024) को उनके नोएडा और इटावा स्थित ठिकानों पर छापेमारी की। 18 घंटे चले इस तलाशी अभियान में यादव की आय से अधिक संपत्ति का खुलासा हुआ। उनके तीन मंजिला आलीशान मकान, करोड़ों की संपत्ति, लाखों के गहने और अन्य दस्तावेजों ने अधिकारियों को चौंका दिया।

नोएडा में 16 करोड़ का आलीशान घर और 60 लाख के गहने बरामद

रिपोर्ट्स के मुताबिक, नोएडा सेक्टर-47 में स्थित रवींद्र यादव का तीन मंजिला आवास उनकी अवैध संपत्ति का मुख्य केंद्र निकला। इस मकान की अनुमानित कीमत करीब 16 करोड़ रुपये बताई गई है। तलाशी के दौरान टीम को इस घर से 60 लाख रुपये के आभूषण, 2.5 लाख रुपये नकद और 37 लाख रुपये के इलेक्ट्रॉनिक उपकरण मिले। इनमें कई महँगे घरेलू सामान शामिल हैं।

विजिलेंस टीम को यहाँ से पासपोर्ट भी मिला, जिससे यादव और उनके परिवार की विदेश यात्राओं का ब्यौरा खंगाला जा रहा है। इसके अलावा, दो गाड़ियाँ- इनोवा और क्विड भी बरामद हुईं। टीम ने छह बैंक खातों और विभिन्न निवेशों के दस्तावेज जब्त किए, जिनकी अभी जाँच जारी है।

इटावा में करोड़ों का स्कूल

छापेमारी के दौरान इटावा के जसवंतनगर स्थित उनके बेटे निखिल यादव के नाम पंजीकृत अरिस्टोटल वर्ल्ड स्कूल में भी अनियमितताओं के प्रमाण मिले। इस स्कूल की जमीन और इमारत की कीमत करीब 15 करोड़ रुपये आँकी गई है। स्कूल में सेंट्रलाइज्ड एयर कंडीशनिंग और महंगे फर्नीचर का इस्तेमाल किया गया है, जिसकी कुल लागत 2 करोड़ रुपये बताई गई है। इसके अलावा, स्कूल में 10 बसें मिलीं, जिनकी कीमत 1.04 करोड़ रुपये आँकी गई।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, विजिलेंस विभाग की जाँच में पाया गया कि 2005 से 2018 के बीच रवींद्र यादव की आय 94.49 लाख रुपये थी, जबकि उन्होंने 2.44 करोड़ रुपये का खर्च दिखाया। इसमें लगभग 1.5 करोड़ रुपये की अतिरिक्त राशि का कोई स्रोत नहीं मिला। इस अवधि में यादव ने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए आय से अधिक संपत्ति अर्जित की।

छापेमारी के दौरान विजिलेंस टीम ने कई महत्वपूर्ण दस्तावेज जब्त किए। इनमें लगभग एक दर्जन भूखंडों के कागजात, बैंक खातों से जुड़े दस्तावेज और एक प्राइवेट ग्रुप हाउसिंग सोसाइटी से जुड़े फर्जी लेन-देन के प्रमाण शामिल हैं। यह भी पता चला है कि रवींद्र यादव ने 2007 में नोएडा प्राधिकरण में विशेष कार्याधिकारी रहते हुए सरकारी भूखंड को नियम विरुद्ध तरीके से प्राइवेट सोसाइटी को आवंटित किया था। इस मामले की जाँच पहले सीबीआई द्वारा की जा चुकी है।

फरवरी 2023 में योगी सरकार ने मंत्री के निर्देश पर हुआ था सस्पेंड

यादव पर पहले भी नोएडा अथॉरिटी में भ्रष्टाचार और अनियमितताओं के आरोप लग चुके हैं। उन्हें फरवरी 2023 में औद्योगिक विकास मंत्री नंद गोपाल गुप्ता नंदी के निर्देश पर निलंबित कर दिया गया था। जाँच में उनके द्वारा अवैध तरीके से अर्जित संपत्ति के कई प्रमाण मिले थे, जिनमें नोएडा और इटावा के अलावा एटा, लखनऊ, और अन्य स्थानों पर संपत्तियों के दस्तावेज शामिल हैं।

रवींद्र यादव ने इन आरोपों को साजिश करार दिया है और खुद को निर्दोष बताया है। वहीं, विजिलेंस विभाग ने उनके खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत मामला दर्ज कर जाँच तेज कर दी है। टीम द्वारा जब्त दस्तावेजों और साक्ष्यों की गहन पड़ताल की जा रही है।

विजिलेंस विभाग अब जब्त संपत्ति और दस्तावेजों का विश्लेषण कर यह तय करेगा कि रवींद्र यादव और उनके परिवार के खिलाफ अगली कानूनी कार्रवाई क्या होगी। बता दें कि औद्योगिक विकास मंत्री नंद गोपाल गुप्ता ने विजिलेंस जाँच का दायरा बढ़ाने के निर्देश दिए थे।

सलमान खान बने संसार सिंह, गोत्र रखा गौरीशंकर… 150 लोग बने हिन्दू: कहा- मुगलों के अत्याचार से पुरखों ने कबूला था इस्लाम, 4 साल पहले मुस्लिमों के विरोध के चलते नहीं हो पाई थी घर वापसी

उत्तर प्रदेश के हापुड़ जिले में मुस्लिम समुदाय के 45 परिवारों ने सनातन धर्म में घर वापसी की है। घर वापसी करने वाले सदस्यों की संख्या 150 है। बुधवार (11 दिसंबर 2024) को इन सभी ने घर के एक दिवंगत सदस्य का हिन्दू विधि-विधान से अंतिम संस्कार करके गंगा स्नान किया। घर वापसी करने वालों ने स्वीकार किया कि उनके पूर्वज हिन्दू थे जो मुगलों के अत्याचार से धर्मान्तरित हो गए थे।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक घर वापसी करने वाले परिवार दिल्ली में रहते हैं। इन सभी ने अपना मूल स्थान पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद बताया है। 1947 के बँटवारे में ये परिवार भारत में आकर बस गए थे। यहाँ उन्होंने दिल्ली को अपना ठिकाना बनाया था। इन परिवारों को इतना याद था कि उनके पूर्वज हिन्दू थे जिन्होंने मुगलों के अत्याचारों से तंग आकर इस्लाम कबूल कर लिया था।

लगभग 4 साल पहले इन परिवारों ने हिन्दू धर्म में घर वापसी का मन बनाया। तब इनको अपने समुदाय में काफी विरोध झेलना पड़ा जिससे इन सभी ने अपना कार्यक्रम फ़िलहाल के लिए टाल दिया था। हालाँकि अंदर ही अंदर ये सभी घर वापसी की कोशिशों में लगे रहे। इसी बीच इनके परिवार में एक वृद्ध का देहांत हो गया। बुधवार (11 दिसंबर) को तमाम परिजन वृद्ध का अंतिम संस्कार करने हापुड़ के बृजघाट गए। यहाँ सभी ने हिन्दू विधि-विधान से मृतक का अंतिम संस्कार किया।

अंतिम संस्कार के बाद मृतक की अस्थियों को गंगा में प्रवाहित किया गया। यहीं सभी ने जीवन में पहले बार गंगा स्नान किया। इस्लाम त्यागकर घर वापसी करने वाले मुस्लिमों के मुखिया सलमान खान थे जो अब संसार सिंह नाम से जाने जाएँगे। इन्होंने अन्य 149 लोगों के साथ मिल कर भगवान शिव और माता पार्वती की आराधना की और गौरीशंकर गोत्र अपनाया। इन सभी ने भविष्य में सभी हिन्दू पर्व और त्योहारों को मनाने और व्रत आदि रखने का संकल्प लिया।

घर वापसी करने वाले सभी 150 सदस्यों ने तय किया है कि वो बृजघाट के एक पुरोहित के यहाँ अपनी वंशावली दर्ज करवाएँगे। सनातन अपनाने पर खुद को बेहद खुश बताते हुए सभी सदस्यों ने इसे किसी सपने के साकार जैसा बताया है। इसमें पुरुष, महिलाएँ और बच्चे भी शामिल हैं जिसमें से कुछ के नाम संजू, सतीश, बलवान, राजेश, संजय और शशि आदि रखे गए हैं। पूर्व के सलमान व वर्तमान में संसार सिंह ने बताया कि वो मुस्लिमों की धोबी जाति से आते थे। इन सभी ने अब भारत में हिन्दुओं के हित सुरक्षित बताए हैं।

PM मोदी को ‘नीच’ कहने वाले गाँधी परिवार के ‘दरबारी’ ने किताब में भी छापी ‘चापलूसी’ की गाथा: सोनिया-राहुल को बचाया, कॉन्ग्रेस की दुर्गति के लिए मनमोहन सिंह को बना दिया ‘कुर्बानी का बकरा’

कॉन्ग्रेस के विवादित नेता मणिशंकर अय्यर ने अपनी नई किताब में यूपीए गठबंधन और अपने राजनीतिक जीवन को लेकर कई बातें की हैं। उन्होंने कहा कि यूपीए-2 में प्रणब मुखर्जी को प्रधानमंत्री और मनमोहन सिंह को राष्ट्रपति बनाया गया होता तो आज स्थिति अलग होती। उन्होंने कहा है कि पिछले 10 सालों से उनकी सोनिया गाँधी से मुलाकात नहीं हुई, जबकि प्रियंका गाँधी से सिर्फ एक बार फोन पर बात हुई।

अपनी हालिया किताब ‘ए मैवरिक इन पॉलिटिक्स’ को लेकर अय्यर ने कहा, “मेरे राजनीतिक करियर की शुरुआत गाँधी परिवार से हुई और खत्म भी उन्हीं के द्वारा हुआ।” अपनी किताब को लेकर PTI से बातचीत में अय्यर ने कहा कि पिछले 10 सालों में उन्हें सोनिया गाँधी से निजी तौर पर मिलने का एक बार भी मौका नहीं मिला, जबकि राहुल गाँधी से सिर्फ एक बार ही मिल सके।

अय्यर ने अपनी किताब में अपने राजनीतिक जीवन के शुरुआती दिनों की चर्चा की है। उन्होंने नरसिम्हा राव के शासनकाल, यूपीए I में मंत्री के रूप में अपने कार्यकाल और फिर कॉन्ग्रेस के पतन का जिक्र किया है। इस किताब में उन्होंने यूपीए-2 के पतन की विशेष चर्चा की है। की जब उनकी पत्नी ने टेलीविजन के सामने यह कह कर अपनी निराशा जताई थी कि “आज कोई घोटाला नहीं हुआ.”

अय्यर ने लिखा है कि साल 2012 में राष्ट्रपति का पद खाली हुआ था। उस समय प्रणब मुखर्जी को प्रधानमंत्री और मनमोहन सिंह को राष्ट्रपति बनाया जाना चाहिए था। अगर ऐसा होता तो यूपीए सरकार में गवर्नेंस पैरालिसिस की स्थिति नहीं होती। उन्होंने कहा कि प्रणब मुखर्जी को राष्ट्रपति और मनमोहन सिंह को सरकार की जिम्मेदारी देने के बाद नई सरकार गठित करने की संभावनाओं का अंत कर दिया। 

अय्यर ने लिखा है कि साल 2012 में मनमोहन सिंह को कई बार ‘कोरोनरी बाईपास सर्जरी’ करानी पड़ी। उसके बाद वह कभी स्वस्थ नहीं हो पाए। इससे उनके काम करने की गति धीमी हो गई और शासन पर इसका असर भी पड़ा। उन्होंने कहा, “जब प्रधानमंत्री का स्वास्थ्य खराब हुआ था, उसी समय कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी भी बीमार पड़ी थीं। हालाँकि, पार्टी ने इस बारे में कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की।”

मणिशंकर अय्यर ने लिखा कि दोनों के बीमार होने के कारण प्रधानमंत्री कार्यालय और पार्टी अध्यक्ष कार्यालय में निर्णय की गति की कमी आ गई थी। शासन का अभाव हो गया था। उन्होंने कहा कि उसी दौरान संकट आए, जिनमें कॉमनवेल्थ घोटाला और अन्ना हजारे का ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ प्रमुख थे। अन्ना आंदोलन का प्रभावी ढंग से सामना नहीं किया गया।

उन्होंने बताया कि 2013 में कॉन्ग्रेस के कई नेताओं के खिलाफ गंभीर आरोप लगाए गए, जो कभी कानूनी रूप से साबित नहीं हुए। हालाँकि, सरकार और पार्टी मीडिया के सवालों का सही ढंग से जवाब देने में नाकाम रहे। इसके कारण विपक्ष के आरोपों ने उनके भरोसे पर चोट की और सरकार एवं पार्टी की छवि खराब हुई। इसके बाद 1984 में 404 सीटें जीतने वाली कॉन्ग्रेस 2014 में 44 सीटों पर आ गई।

उन्होंने गाँधी परिवार पर अपने राजनीतिक करियर को खत्म करने का आरोप लगाया। इसकी चर्चा करते हुए उन्होंने कहा, “मैं मानता हूँ कि ऐसा ही होता है… मुझे पार्टी से बाहर रहने की आदत हो गई है। मैं अब भी पार्टी का सदस्य हूँ। मैं कभी भी इसमें बदलाव नहीं करूँगा और मैं निश्चित रूप से बीजेपी में नहीं जाऊँगा।” बता दें कि मणिशंकर ने पीएम मोदी को नीच कहा था और कई मौकों पर पाकिस्तान और मुगलों का गुणगान कर चुके हैं।

पहले हिंदुओं का कत्लेआम, फिर मंदिर को मुस्लिमों ने अपने घरों में मिला दिया: कुआँ से शिखर तक अकील अहमद का कब्जा, जानिए संभल में 1978 में दंगे कैसे भड़के

उत्तर प्रदेश के संभल जिले में हाल ही में प्रशासन ने 400 साल पुराने शिव मंदिर को अवैध कब्जे से मुक्त कराया। बिजली चोरी की जाँच के दौरान यह मंदिर और इसके पास स्थित एक प्राचीन कुआँ मिला। प्रशासन ने बुलडोजर कार्रवाई के जरिए अकील अहमद के कब्जे से इस कुएँ और मंदिर को मुक्त कराया और पूजा-पाठ शुरू कराया। मंदिर में भगवान शिव, हनुमान और नंदी की प्राचीन मूर्तियाँ मिलीं।

सवाल यह है कि यह मंदिर 46 साल तक क्यों गायब था, और ऐसा क्या हुआ था जिसने इसे भुला दिया गया? इसकी कहानी 1978 में हुए सांप्रदायिक दंगों से जुड़ी है, जिसने न केवल इस मंदिर को छीन लिया बल्कि हिंदुओं को मजबूर किया कि वे अपने घर-बार छोड़ दें। इस रिपोर्ट में हम अतीत के पन्नों को पलटते हुए संभल में दंगों की पूरी कहानी और वहां के हिंदुओं की दुर्दशा को विस्तार से जानेंगे।

संभल में पहले मंदिरों और हिंदू संस्कृति का था वर्चस्व

संभल कभी हिंदू और मुस्लिम समुदाय के बीच सौहार्द्र का प्रतीक माना जाता था। खग्गूसराय, जहाँ यह मंदिर स्थित है, पहले हिंदू बहुल क्षेत्र था। लेकिन 1970 के दशक के उत्तरार्ध में स्थिति बदल गई। साल 1976 और 1978 के दंगों ने हिंदू-मुस्लिम संबंधों को पूरी तरह से तहस-नहस कर दिया। सरकारी आँकड़ों के अनुसार, संभल में आजादी के बाद 14 बड़े दंगे हुए। इनमें 1976 और 1978 के दंगे सबसे अधिक घातक थे।

1976 में मौलाना की हत्या के बाद दंगे

संभल में साल 1976 में जामा मस्जिद के मौलाना मुहम्मद हुसैन की हत्या से पहला बड़ा दंगा भड़का। रिपोर्ट्स के अनुसार, संसदीय रिकॉर्ड और एसएलएम प्रेमचंद की 1979 की प्रकाशित ‘मॉब वायलेंस इन इंडिया’ में दावा है कि हत्या एक हिंदू ने की थी, जिसके बाद पूरे संभल में हिंसा फैल गई। मौलाना के परिवार ने बाद में संभल छोड़ दिया। दंगों के बाद, खग्गूसराय क्षेत्र से हिंदुओं ने पलायन शुरू कर दिया। कहा जाता है कि 1976 में ही मंदिरों को ताले लगा दिए गए और खग्गूसराय धीरे-धीरे मुस्लिम बहुल क्षेत्र बन गया।

साल 1978 के भीषण दंगे

29 मार्च 1978 को संभल में एक और बड़ा दंगा हुआ। यह दंगा मंजर अली नाम के व्यक्ति और उनके साथियों द्वारा ट्रक यूनियन और डिग्री कॉलेज के मुद्दे पर की गई साजिश से शुरू हुआ। मंजर अली डिग्री कॉलेज की प्रबंधन समिति का सदस्य बनना चाहते थे, लेकिन प्रशासन ने उनकी मान्यता खारिज कर दी। दरअसल, तब 10 हजार रुपए देकर कॉलेज के मैनेजमेंट में लोगों को शामिल किया जाता था, लेकिन मंजर को मना कर दिया गया।

इसके बाद 28 मार्च 1978 को, कॉलेज में आयोजित एक सांस्कृतिक कार्यक्रम के दौरान कुछ मुस्लिम छात्राओं ने आरोप लगाया कि उन्हें दी जाने वाली उपाधियाँ आपत्तिजनक हैं। तनावपूर्ण माहौल में अगले ही दिन, मंजर अली और उनके समर्थकों ने बाजार में उत्तेजक नारेबाजी शुरू की। मंजर अली के नेतृत्व में मुस्लिम समुदाय के लोगों ने दुकानों को जबरन बंद कराना शुरू किया। जब कुछ दुकानदारों ने इसका विरोध किया, तो लूटपाट, आगजनी और हत्या का सिलसिला शुरू हो गया।

इस दंगे में मुख्य रूप से खग्गूसराय, सर्राफा बाजार और गंज क्षेत्र प्रभावित हुए। मुरारी लाल नामक व्यक्ति की दुकान में आग लगा दी गई, जिसमें कई हिंदू परिवार फंस गए। दावा किया जाता है कि 10-12 हिंदू दंगों की आग में जलकर मारे गए। दंगे के दौरान, अफवाहें फैलाई गईं कि मस्जिद तोड़ी जा रही है और इमाम को मार दिया गया। इससे मुस्लिम समुदाय और अधिक आक्रोशित हो गया। इन दंगों में कुल 169 अभियोग दर्ज हुए, जिसमें 3 मुकदमे पुलिस वालों की तरफ से हुए, तो बाकी दोनों पक्षों यानी हिंदुओं और मुस्लिमों की तरफ से दर्ज कराए गए।

संभल में दंगों का लंबा इतिहास

संभल, उत्तर प्रदेश का एक ऐसा इलाका है जो सांप्रदायिक तनाव और हिंसा की लंबी कड़वी यादों को अपने भीतर समेटे हुए है। 1947 के बाद से ही यहाँ हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच कई बार ऐसे टकराव हुए, जिन्होंने इस क्षेत्र की सामाजिक और सांस्कृतिक संरचना को झकझोर कर रख दिया।

साल 1956 और 1959 के दंगों में मामूली झड़पों से शुरू हुई घटनाओं ने धीरे-धीरे बड़े सांप्रदायिक तनाव का रूप ले लिया। खग्गूसराय और गंज बाजार जैसे इलाके तब पहली बार दंगे की आग में झुलसे, जहाँ व्यापारियों की दुकानें लूटी गईं और जला दी गईं। 1976 के दंगों ने तो जैसे संभल को पूरी तरह बदलकर रख दिया। जामा मस्जिद के मौलाना मुहम्मद हुसैन की हत्या ने पूरे क्षेत्र को सुलगा दिया। तो 1978 का दंगा भी बेहद भयावह था।

साल 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के दौरान संभल फिर से दंगों की चपेट में आ गया। खग्गूसराय और कोट बाजार में तोड़फोड़ और आगजनी की घटनाओं ने हिंदुओं और मुस्लिमों के बीच खाई को और गहरा कर दिया। इन घटनाओं के बाद खग्गूसराय और गंज बाजार जैसे इलाकों से हिंदू परिवार बड़ी संख्या में पलायन करने लगे। 1976 से लेकर 1992 तक, संभल धीरे-धीरे मुस्लिम बहुल क्षेत्र बन गया।

इन दंगों ने न केवल हिंदुओं के घर-परिवार और व्यापार को प्रभावित किया, बल्कि उनकी धार्मिक आस्थाओं पर भी चोट पहुँचाई। खग्गूसराय का शिव मंदिर, जिसे अब 400 साल पुराना बताया जा रहा है, 1978 के दंगों के बाद से बंद पड़ा था। दंगे के दौरान अकील अहमद के परिवार ने मंदिर के शिखर से लेकर कुएँ तक पर कब्जा कर लिया गया और वर्षों तक इसका कोई अता-पता नहीं था। हाल ही में बिजली चोरी की चेकिंग के दौरान यह मंदिर फिर से सामने आया, तो प्रशासन ने इसे कब्जा मुक्त कराया। शिवलिंग और नंदी की मूर्तियों के साथ-साथ हनुमान जी की प्रतिमा भी यहाँ पाई गई और अब यहाँ पूजा-अर्चना शुरू हो गई है।

आज संभल एक ऐसा जिला है, जहाँ 77% आबादी मुस्लिम है। मंदिर के फिर से सामने आने के बाद हिंदू समुदाय में एक नई उम्मीद जगी है। मंदिर में पूजा-अर्चना शुरू हो चुकी है, और प्रशासन ने इसे संरक्षित करने का वादा किया है। हालाँकि, उन दंगों की यादें और उनके जख्म अब भी स्थानीय लोगों के दिलों में ताजा हैं। कई लोग अब भी 1976 और 1978 की घटनाओं का जिक्र करते हुए मंजर शफी और मौलाना हुसैन के नामों को लेकर चर्चा करते हैं।

9 साल की बच्ची की लाश से दरिंदगी, पर हाई कोर्ट ने दुष्कर्म की नहीं दी सजा: जानिए क्या है नेक्रोफीलिया, क्यों कानून की नजर में नहीं है यह रेप

शव के साथ रेप करने (नेक्रोफीलिया) के आरोपित को छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में भी सजा नहीं मिल पाई। आरोपित को सिर्फ सबूत मिटाने का दोषी मानते हुए सात वर्ष की सुनाई गई सजा को हाई कोर्ट ने बरकरार रखा। दरअसल, दो आरोपितों ने 9 साल की बच्ची के शव के साथ रेप किया था। इसके बाद निचली अदालत ने इस मामले में अपना फैसला सुनाया था।

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक, मामले की सुनवाई करते हुए छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और जस्टिस बीडी गुरु की पीठ ने सिर्फ इतना ही कहा कि जीवित व्यक्तियों के साथ मृतक भी गरिमा और उचित व्यवहार के हकदार हैं। बेंच ने माना कि भारत के मौजूदा कानून में नेक्रोफीलिया यानी शव से दुष्कर्म की सजा का प्रावधान नहीं है।

इसके बाद हाई कोर्ट ने निचली अदालत के खिलाफ दायर की गई अपील को खारिज कर दिया। दरअसल, यह मामला छत्तीसगढ़ के गरियाबंद इलाके का है। पीड़िता की माँ ने 18 अक्टूबर 2018 को 9 साल की अपनी बेटी के गायब होने की शिकायत दर्ज कराई थी। इसके बाद पुलिस ने मामला दर्ज करके नीलकंठ उर्फ नीलू नागेश और नितिन यादव नाम के दो आरोपितों को गिरफ्तार किया था।

दोनों ने घटना को अंजाम देने के बाद शव को जमीन में गाड़ दिया था। ट्रायल कोर्ट ने नितिन यादव को बच्ची के साथ दुष्कर्म और हत्या का दोषी ठहराया और उसे उम्रकैद की सजा दी। वहीं, दूसरे आरोपित नीलकंठ को सिर्फ सबूत मिटाने का दोषी माना और उसे सिर्फ 7 साल की सजा दी। नीलकंठ ने बच्ची के शव के साथ रेप करने की बात कही थी। इसी सजा के खिलाफ हाई कोर्ट में अपील की गई थी।

कर्नाटक हाई कोर्ट ने भी शव के साथ दुष्कर्म नहीं माना था अपराध

पिछले साल जून में इसी तरह के एक मामले में कर्नाटक हाई कोर्ट ने शव के साथ दुष्कर्म को अपराध मानने से इनकार कर दिया था। कर्नाटक हाई कोर्ट ने कहा था कि महिला के मृत शरीर के साथ यौन उत्पीड़न का कार्य भारतीय दंड संहिता में परिभाषित बलात्कार या अप्राकृतिक यौन अपराधों के तहत नहीं आता है। इसके बाद कोर्ट ने 21 साल की लड़की की रेप से आरोपित रंगाराजू वाजपेयी को बरी कर दिया था।

दरअसल, शख्स पर लड़की की हत्या और फिर उसके शव से रेप का आरोप था। इस मामले में जिला अदालत ने शख्स को हत्या और रेप का दोषी माना था। हालाँकि, हाई कोर्ट ने शख्स को सिर्फ हत्या का दोषी माना। फैसला सुनाते हुए न्यायाधीश बी. वीरप्पा और व्यंकटेश नाइक की पीठ ने केंद्र सरकार से सिफारिश की थी कि वह शवों से रेप या यौन उत्पीड़न को अपराध में शामिल करने के लिए कानून बनाए।

बेंच ने कहा था कि तत्कालीन भारतीय दंड संहिता (अब भारतीय न्याय संहिता) की धारा 375 (रेप) और 377 (अप्राकृतिक कार्य) को ध्यान से पढ़ने से पता चलता है कि आरोपित ने सजीव शरीर के साथ संबंध नहीं बनाए। पार्थिव शरीर को मानव या व्यक्ति नहीं माना जा सकता। इसलिए इन पर IPC की धारा 375 और 377 के प्रावधान लागू नहीं होंगे।

क्या है नेक्रोफीलिया (Necrophilia) या शवों से रेप

नेक्रोफीलिया एक मनोविकार है, जिसमें कोई व्यक्ति शवों के प्रति यौन रूप से आकर्षित होता है। नेक्रोफीलिया ग्रीक भाषा का शब्द है, जिसमें नेक्रो का मतलब ‘मृत’ और फिलिया का मतलब ‘प्रेम’ होता है। नेक्रोफीलिया का मतलब शव के साथ यौन संबंध बनाना होता है। नेक्रोफिलिया में मृत लोगों के प्रति एक विकृत कामुक आकर्षण होता है और खुद को यौन रूप से उत्तेजित महसूस करता है।

मेंटल हेल्थ मैगजीन साइकोलॉग्स के अनुसार, नेक्रोफीलिया को आज पैराफीलिया के एक प्रकार के रूप में वर्गीकृत किया गया है। पैराफीलिया तब होता है, जब कोई व्यक्ति किसी असामान्य वस्तु के प्रति यौन उत्तेजना अनुभव करता है या असामान्य यौन कल्पनाएँ करता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने नोक्रोफीलिया को मानसिक स्वास्थ्य विकार के रूप में वर्गीकृत किया है।

नेक्रोफीलिया के घटनाएँ सिर्फ भारत में ही नहीं, कई देशों में सामने आती रहती है। इसका इतिहास बहुत पुराना है। विशेष रूप से यह मिस्र में इसके बारे में रिकॉर्ड है। पहले इतिहासकार हेरोडोटस ने पुस्तक ‘द हिस्ट्रीज़’ में इसके बारे में लिखा है कि मिस्र के लोग डरते थे कि कहीं उनके परिवार के महिलाओं की लाश के साथ रेप ना हो जाए। इससे बचने के लिए वे महिलाओं के शवों को सड़ने देते थे।

हेरोडोटस ने पेरियांडर नाम के एक यूनानी नेक्रोफीलिया से ग्रसित व्यक्ति का उल्लेख किया है। काँस्य युग में पश्चिम एशिया के आसपास हित्तियों का संबंध एक ऐसी सभ्यता से था, जिसमें शव के साथ संभोग की अनुमति थी। हित्ती इंडो-यूरोपियन लोगों का एक प्राचीन समूह था, जो 1600 ईसा पूर्व के आसपास अनातोलिया (आधुनिक तुर्की) के हट्टूसा में एक साम्राज्य का गठन किया। फिर वे लेवेंट और मेसोपोटामिया तक फैल गए।

एलिस (1903) जिन्होंने ‘स्टडीज ऑफ साइकोलॉजी ऑफ बुक’ नामक पुस्तक में दावा किया है कि नेक्रोफिलिया और एल्गोलैग्निया (दर्द से प्राप्त यौन सुख, विशेष रूप से कामुक क्षेत्रों के आसपास) आपस में जुड़े हुए थे। दोनों में भय और घृणा जैसे नकारात्मक प्रभाव उत्तेजना में बदल जाते हैं। नेक्रोफिलिया की एक प्रमुख संपूर्ण समझ वाला अध्ययन रोसमैन और रेसनिक द्वारा 1989 में किया गया था।

रोसमैन और रेसनिक ने 123 ऐसे मामलों को गहराई से अध्ययन किया था। इनमें उन्होंने पाया कि नेक्रोफिलियाक में 57 प्रतिशत ऐसे लोग शामिल थे, जिनका व्यवसाय शवों से संबंधित था। इस मानदंड को पूरा करने वाली कुछ सबसे आम नौकरियाँ मुर्दाघर, कब्रिस्तान में काम करने वाले और अस्पताल में काम करने वाले लोग शामिल थे।

शोध में यह भी पता चला कि कम आत्मसम्मान, मृत्यु एवं मृतकों का डर, चिंता, भय, तनाव, अकेलापन, दब्बूपना आदि प्रमुख कारण हैं। एरिच फ्रॉम के अनुसार, नेक्रोफीलिया इसलिए उत्पन्न होता है क्योंकि व्यक्ति आत्म-पहचान की अनुपस्थिति की भरपाई करना चाहता है। यह तब भी उत्पन्न होता है जब व्यक्ति प्रामाणिकता की कमी को दूर करने का प्रयास करता है।

किन-किन देशों में शवों से रेप की है सजा

इस विकार को देखते हुए कई देशों में इसके लिए कानूनी प्रावधान किए गए हैं। इनमें सभी पश्चिमी देश हैं। अमेरिका में नेक्रोफिलिया अपराध है। वहाँ के कानून में इस कार्य को लाशों का अपमान, यौन अपराध और उसका दुरुपयोग माना गया है। इसके लिए वहाँ कठोर सजा है। शवों के साथ यौन उत्पीड़न पर अमेरिका में जेल, जुर्माना और यौन अपराधी मानकर सजा दी जाती है।

जर्मनी में भी शवों के यौन उत्पीड़न के लिए तीन साल तक की जेल की सजा का प्रावधान है। ब्रिटेन लाश के साथ संभोग को यौन अपराध माना गया है और पकड़े जाने पर जेल की सजा का प्रावधान है। कनाडा में इसे मृत शरीर का अपमान माना जाता है और इसके लिए पाँच साल से अधिक की जेल हो सकती है। ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, दक्षिण अफ्रीका में भी सजा का प्रावधान है।

रुद्रपुर हो या गोपालगंज… हिंदू लड़कियों के शिकार का तरीका एक जैसा: मुस्लिम युवकों ने पहले पहचान छिपा फँसाया, फिर इस्लाम कबूलने का दबाव से लेकर गर्भपात तक

देश के 2 अलग-अलग प्रदेशों से लव जिहाद के मामले सामने आए है। पहली घटना उत्तराखंड के रुद्रपुर की है जहाँ अमन कुरैशी ने अपनी पहचान छिपाकर एक हिन्दू लड़की से शादी की। इस साजिश में अमन के पूरे परिवार और नाते-रिश्तेदारों ने भी साथ दिया। वहीं दूसरा मामला बिहार के गोपालगंज का है। यहाँ तबरेज आलम ने हिन्दू लड़की को प्यार के जाल में फँसा कर रेप किया। दोनों घटनाओं में पीड़िताओं पर इस्लाम कबूल करने का दबाव बनाया गया।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक पहली घटना रुद्रपुर के आदर्श कॉलोनी की है। यहाँ की घास मंडी के वार्ड नंबर 36 में रहने वाले विनोद कोहली ने पुलिस में तहरीर दी है। तहरीर में विनोद ने बताया कि उनके संतोष नाम के परिचित ने उनकी बहन बहन मेनका के लिए दिल्ली में रिश्ता बताया था। संतोष ने अमन का परिचय दिल्ली में कारोबारी और मूल रूप से कुमायूँ के निवासी के तौर पर दिया था। लड़के का नाम अमन चौधरी था जो दिल्ली में रहता था।

संतोष के बताने पर विनोद दिल्ली में अमन का घर देखने गए। घर पूरी तरह से हिन्दू तौर-तरीकों से सजाया गया था जिसके अंदर एक मंदिर भी बना हुआ था। दिल्ली से संतुष्ट हो कर विनोद वापस रुद्रपुर लौटे। दोनों परिवारों की सहमति से 13 अक्टूबर 2024 को रुद्रपुर के सिटी क्लब में मेनका और अमन की सगाई हो गई। पहाड़ी रीति-रिवाज से हुई इस सगाई में अमन और मेनका का पूरा परिवार पारम्परिक वेशभूषा में शामिल हुआ था।

मंगलवार (10 दिसंबर 2024) को रुद्रपुर में अमन और मेनका की शादी हुई। हिन्दू रीति-रिवाज से हुई इस शादी में दोनों पक्षों का पूरा परिवार और रिश्तेदार के साथ मित्र आदि भी शामिल हुए थे। विनोद के मुताबिक कि इस शादी में उन्होंने लगभग 18 से 20 लाख रुपए खर्च किए थे। इसी दौरान लड़के वालों को तमाम सामानों के साथ 150 से 160 ग्राम सोने के गहने भी दिए गए थे। पीड़ित का यह भी दावा है कि सगाई और शादी में अमन ही नहीं उसकी तरफ से मौजूद अन्य तमाम लोगों ने हिन्दुओं के पारम्परिक कपड़े पहन रखे थे।

शादी के बाद मेनका विदा हो कर ससुराल चली गई। अगले दिन विनोद कुछ रिश्तेदारों के साथ रस्म अदायगी के लिए मेनका के पास दिल्ली गया तो वहाँ उसे लड़के वालों के मुस्लिम होने का एहसास हुआ। यहाँ अधिकतर लोग इस्लामी वेशभूषा में थे। पड़ताल करने पर पता चला कि दूल्हे का असली नाम अमन कुरैशी है। अमन ने मेनका पर भी इस्लाम कबूल करने और मुस्लिम तौर तरीकों से रहने का दबाव बनाया। आखिरकार विनोद ने मामले की शिकायत रुद्रपुर पुलिस से की।

रुद्रपुर पुलिस ने टीम गठित की और दिल्ली से मेनका को सही सलामत बरामद करके वापस अपने मायके ले आई। विनोद की तहरीर पर अमन कुरैशी व उसके अन्य परिजनों के खिलाफ केस दर्ज कर लिया गया है। मामले में जाँच व अन्य जरूरी कानूनी कार्रवाई की जा रही है।

हिन्दू लड़की के खिलाफ समीर सहगत बने तबरेज आलम की साजिश

लव जिहाद का दूसरा मामला बिहार के गोपालगंज से आया है। यहाँ के नगर थानाक्षेत्र की रहने वाली एक लड़की ने पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई है। पीड़िता ने बताया कि लगभग 4 साल पहले वह गाँव से पढ़ने शहर आई थी। यहाँ उसकी मुलाकात एक प्राइवेट स्कूल चलाने वाले तबरेज आलम से हुई जिसने खुद का परिचय समीर सहगल के तौर पर दिया था। अच्छी नौकरी दिलाने का झांसा देकर तबरेज ने पीड़िता को अपने प्रेम जाल में फँसा लिया।

बेहतर शिक्षा दिलाने के बहाने तबरेज पीड़िता को लेकर कोलकाता चला गया। यहाँ उसने एक घर में पीड़िता से कई बार रेप किया। रेप के दौरान तबरेज से पीड़िता के कई अश्लील फोटो और वीडियो बना लिए। इसी को दिखाकर तबरेज पीड़िता को ब्लैकमेल करता रहा। कई बार बलात्कार की वजह से पीड़िता गर्भवती हो गई। इसकी जानकारी जब तबरेज को हुई तब उसने एक अस्पताल में पीड़िता का एबॉर्शन करवा दिया। एबॉर्शन के दौरान पीड़िता का नाम आलिया खातून दर्ज करवाया गया था।

पश्चिम बंगाल में अपने साथ हुई इस घटना के बाद पीड़िता ने समीर सहगल की हरकतों का विरोध करना शुरू कर दिया। यहीं पीड़िता को पता चल गया कि समीर सहगल असल में तबरेज आलम है। इस बात पर भी दोनों के बीच झगड़ा हुआ। तब समीर पीड़िता को लेकर वापस बिहार के गोपालगंज में आ गया। यहाँ वह पीड़िता पर इस्लाम कबूल करने का दबाव बनाने लगा। वह पीड़िता से कुरान और नमाज़ पढ़ने के लिए कहता था।

जब पीड़िता इंकार करती तो एक कमरे में बंद करके उसकी पिटाई की जाती थी। जैसे-तैसे मौका देख कर पीड़िता कमरे से आज़ाद होकर थाने पहुँची। यहाँ उसने तहरीर देकर तबरेज पर कार्रवाई की माँग की। शनिवार (14 दिसंबर) को पुलिस ने पीड़िता का मेडिकल करवाया है। केस दर्ज करके फरार चल रहे तबरेज की तलाश में दबिश दी जा रही है।

बांग्लादेश में काली माता का सिर धड़ से उड़ाया, मंदिर में घुसकर लूटपाट; हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियों को किया छिन्न-भिन्न: जमालपुर के एसपी बोले- हमलावरों का अब तक सुराग नहीं

बांग्लादेश में हिन्दू आस्थाओं पर हमले थमने का नाम नहीं ले रहे। शेख हसीना सरकार के पतन के बाद से हिन्दू मंदिरों और आस्थाओं पर लगातार हमले हो रहे हैं। ताजा घटना जमालपुर जिले के सरिसाबाड़ी उपजिला के कामराबाद यूनियन स्थित महाश्मशान काली मंदिर की है। यहाँ शुक्रवार (13 दिसंबर 2024) को कुछ अराजक तत्वों ने मंदिर को निशाना बनाया और मंदिर में घुसकर मूर्तियों को खंडित करने के साथ गहनों की लूटपाट की।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह घटना सरिसाबाड़ी उपजिला में आने वाले कामराबाद यूनियन की है। यहाँ महाश्मशान काली मंदिर स्थानीय हिन्दुओं की आस्था का केंद्र रहा है। गुरुवार-शुक्रवार की रात इसमें कुछ अराजक तत्वों ने घुस कर तोड़फोड़ की। मंदिर में विधि-विधान से स्थापित 7 मूर्तियों में तोड़फोड़ की गई। काली माता की प्रतिमा का सिर धड़ से अलग कर दिया गया।

जाते-जाते हमलावर मूर्तियों के श्रृंगार के लिए चढ़ाए गए आभूषण भी लूट लिए। शुक्रवार सुबह मंदिर के अध्यक्ष उत्तम कुमार तिवारी मंदिर पहुँचे तो उन्हें इस करतूत की जानकारी हुई। उत्तम कुमार के मुताबिक उनको नहीं पता कि यह हरकत किसकी है, लेकिन घटना के पीछे जो कोई भी हो उसे खोज कर सजा दी जाए। मंदिर प्रबंधन की शिकायत के बाद पुलिस घटनास्थल पर पहुँची।

हिंसा प्रभावित मंदिर के वीडियो और फोटो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं। वायरल वीडियो में देखा जा सकता है कि मंदिर पूरी तरह से अस्तव्यस्त है। तोड़फोड़ के बाद मूर्तियों को जमीन में पटक दिया गया है। अधिकतर प्रतिमाओं के सिरों को काट लिया गया है। कईयों के हाथों और पैरों को भी शरीर से अलग कर दिया गया है।

लेखिका तस्लीमा नसरीन ने यह वीडियो अपने X हैंडल पर शेयर करते हुए लिखा, “हम सभी अच्छे से जानते हैं कि ये हरकत किसकी है। मुस्लिमों की।” तस्लीमा नसरीन ने इस करतूत पर अपने ट्वीट के जरिए गुस्सा भी दिखाया है।

जमालपुर के एडिशनल एसपी सुहैल महमूद ने बताया कि पुलिस मामले की गंभीरता से जाँच कर रही है। हिन्दू समुदाय में इस घटना को लेकर गहरा आक्रोश है, लेकिन अभी तक हमलावरों का कोई सुराग नहीं मिल पाया है। यही वजह है कि अभी तक किसी की भी गिरफ्तारी नहीं की गई है।

कैसे होंगे एक साथ चुनाव, बीच में ही सरकार गिरने पर क्या होगा… जानिए सब कुछ: अमित शाह ने बताया क्यों जरूरी है ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’, कैसे बाप-बेटी ने बर्बाद किया सिस्टम

वन नेशन वन इलेक्शन बिल को संसद में पेश करने को लेकर सरकार असमंजस में है। पहले रिपोर्ट आई कि सरकार की ओर से केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुनराम मेघवाल सोमवार (16 दिसंबर) को इसे लोकसभा में पेश करेंगे। हालाँकि, सोमवार को लोकसभा की संशोधित कार्य सूची में इस विधेयक का नाम शामिल नहीं किया गया है, जबकि पहले इसे सूचीबद्ध किया गया था। वहीं, केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने इसकी जरूरत क्यों है, वो बताया है।

अमित शाह ने ‘एक राष्ट्र एक चुनाव’ की वकालत की है। उन्होंने इससे संघीय ढाँचे को कमजोर करने के आरोपों को खारिज कर दिया। उन्होंने कहा, “वन नेशन वन इलेक्शन कोई नई बात नहीं है। साल 1952 का चुनाव एक साथ हुए थे। 1957 में आठ राज्यों की विधानसभाएँ भंग कर दी गईं, ताकि अलग-अलग तारीख होने के बावजूद उनके एक साथ चुनाव कराए जा सकें। तीसरी बार भी यही प्रक्रिया अपनाई गई।”

आजतक के एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा, “पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा केरल में सीपीआई (एम) सरकार को गिराने के बाद इसे रोक दिया गया था। इसके बाद इंदिरा गाँधी ने बड़े पैमाने पर सरकार गिराने की प्रथा अपनाई। यहाँ तक ​​कि 1971 में सिर्फ चुनाव जीतने के लिए समय से पहले लोकसभा को भंग कर दिया गया था। यहीं से बेमेल शुरू हुआ और चुनाव अलग-अलग होने लगे।”

बिल को राष्ट्रपति चुनाव मॉडल बताने और इससे भाजपा को फायदा होने के आरोपों को अमित शाह ने खारिज कर दिया। उन्होंने कहा, “यह बिल्कुल गलत है। ओडिशा में विधानसभा चुनाव और लोकसभा चुनाव एक साथ कराए गए थे, लेकिन भाजपा हार गई। साल 2019 में हमें पूरे देश में भारी जनादेश मिला, लेकिन हम आंध्र प्रदेश में हार गए।” इस बिल को आधिकारिक रूप से संविधान (129वाँ संशोधन) विधेयक 2024 कहा जाता है।

बता दें कि केंद्रीय मंत्रिमंडल ने ‘एक राष्ट्र एक चुनाव’ विधेयक को मंजूरी दी है। इसे 16 दिसंबर को संसद में पेश करने की बातें सामने आ रही थीं। संसद का अंतिम सत्र 20 दिसंबर को चलेगा। हालाँकि, इस सत्र में अब इसके पेश किए जाने को लेकर असमंजस की स्थिति है। वहीं, विपक्षी दलों ने वन नेशन वन इलेक्शन विधेयक का विरोध किया है और इसे संघीय ढाँचे के खिलाफ बताया है।

समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कहा कि इस कानून के बन जाने से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को यह मौका मिल सकता है कि वह राज्यों और केंद्र की सरकारों को भंग कर दें और दोबारा चुनाव कराएँ। उन्होंने यह भी कहा कि इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री मोदी के जुमलों पर विश्वास नहीं करना चाहिए। वहीं, कॉन्ग्रेस सांसद सुखदेव भगत ने इसे देश के संघीय ढाँचे पर प्रहार बताया।

बिल में क्या हैं प्रावधान?

इस विधेयक में संविधान के अनुच्छेद 82A (लोकसभा और सभी विधानसभाओं के लिए एक साथ चुनाव) को शामिल करने और अनुच्छेद 83 (संसद के सदनों की अवधि), 172 (राज्य विधानसभाओं की अवधि) और 327 (विधानसभाओं के चुनावों के संबंध में प्रावधान करने की संसद की शक्ति) में संशोधन करने का प्रस्ताव है। इस बिल में निम्नलिखित प्रावधान हैं:

एक साथ चुनाव: विधेयक में संविधान के अनुच्छेद 82A को शामिल किया गया है, जो ‘लोकसभा और सभी विधानसभाओं के लिए एक साथ चुनाव’ की अनुमति देगा। इसमें एक साथ चुनाव को लोकसभा और सभी राज्यों की विधानसभाओं के गठन के लिए आयोजित आम चुनावों के रूप में परिभाषित किया गया है।

इस विधेयक में कहा गया है कि आम चुनाव के बाद लोकसभा की पहली बैठक की तारीख को जारी की गई ‘सार्वजनिक अधिसूचना’ द्वारा राष्ट्रपति इस अनुच्छेद के प्रावधानों को लागू करेंगे। अधिसूचना की तारीख को नियत तारीख कहा जाएगा। नियत तिथि (अधिसूचना की तिथि) के बाद और लोकसभा के कार्यकाल खत्म होने से पहले हुए गठित विधानसभाएँ लोकसभा के कार्यकाल के साथ ही खत्म हो जाएँगी।

विधेयक का अनुच्छेद 82A(3) विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। इसमें कहा गया है कि लोकसभा के पूर्ण कार्यकाल की समाप्ति से पहले, चुनाव आयोग लोकसभा और सभी विधानसभाओं के लिए ‘एक साथ’ आम चुनाव कराएगा। संविधान के भाग XV (चुनाव) के प्रावधान उन चुनावों पर जरूरी परिवर्तनों के साथ लागू होंगे, जो आवश्यक हो सकते हैं और जिन्हें चुनाव आयोग आदेश निर्देश दे सकता है।

जब विधानसभा के चुनाव स्थगित करने की आवश्यकता हो: विधेयक की धारा 82A(5) में कहा गया है कि जब चुनाव आयोग की यह ‘राय’ हो कि किसी विधानसभा के चुनाव लोकसभा के आम चुनावों के साथ नहीं कराए जा सकते तो वह राष्ट्रपति को ये आदेश देने की सिफारिश कर सकता है कि उस विधानसभा के चुनाव बाद की किसी तिथि में कराए जा सकते हैं।

विधानसभा का कार्यकाल लोकसभा के साथ ही समाप्त हो जाएगा, चाहे स्थगन हो या न हो: विधेयक में कहा गया है कि यदि विधानसभा का कार्यकाल स्थगित भी कर दिया जाता है तो संविधान के अनुच्छेद 172 में वर्णित किसी भी बात के बावजूद, पूर्ण कार्यकाल उसी तिथि को समाप्त होगा जिस तिथि को आम चुनावों में गठित लोकसभा का पूर्ण कार्यकाल समाप्त हुआ था।

मध्यावधि चुनाव: अनुच्छेद 83 में खंड 3 से 7 को सम्मिलित करने का प्रस्ताव है, जो ‘मध्यावधि चुनाव’ के बारे में बात करता है। इसमें कहा गया है कि जब लोकसभा 5 वर्ष की पूर्ण अवधि से पहले भंग हो जाता है तो विघटन की तिथि और पूर्ण अवधि की समाप्ति के बीच की अवधि एक पूर्ण अवधि (जो पूरी नहीं हुई हो) होगी।

बिल के अनुसार, विघटन के बाद मध्यावधि चुनाव होंगे और एक नई लोकसभा का गठन केवल अपूर्ण (पूर्ण अवधि के बीच बाकी बची) अवधि के लिए किया जाएगा। हालाँकि, गठित नई लोकसभा तत्काल पूर्ववर्ती लोकसभा की निरंतरता नहीं होगी। अनुच्छेद 172 में इन खंडों को सम्मिलित करके विधानसभाओं के लिए इसी तरह के मध्यावधि चुनाव प्रस्तावित हैं।