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कोर्ट में राम मंदिर के खिलाफ बिना जानकारी के दिए बयान: वामपंथी ‘इतिहासकारों’ ने स्वीकारा

सदियों बाद अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फ़ैसला आया जिसका सभी ने स्वागत किया। फ़ैसले के साथ ही राम जन्मभूमि पर एक भव्य राम मंदिर के निर्माण का रास्ता भी साफ़ हो गया। लेकिन इस फ़ैसले के बाद, वामपंथी, इतिहासकारों, प्रोफेसरों के ऐसे कई बयान और शपथपत्र सामने आए हैं जो इन्होंने इलाहबाद हाईकोर्ट में दिए थे, ये इनके ज्ञान और कहीं न कहीं इनकी द्वारा शिक्षित छात्रों की भयावह तस्वीर उजागर करती है। वैसे इन सबने सोशल मीडिया पर भी इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपना दु:ख व्यक्त किया है।

ट्विटर यूजर @PeeliHaldi ने ट्विटर पर, वामपंथी इतिहासकारों द्वारा पेश किए गए कुछ हास्यास्पद प्रमाणों का उल्लेख किया। 

जेएनयू की एक प्रोफेसर सुवीरा जायसवाल ने स्वीकार किया कि वो बाबरी मस्जिद के बारे में कुछ नहीं जानती थीं। जब वह अस्तित्व में आई तो उसे यह नहीं पता था कि इस मुद्दे पर उन्हें जो भी जानकारी थी वह मीडिया रिपोर्ट्स और ‘हिस्टोरियंस रिपोर्ट टू द नेशन’ से मिली थी, जिसे अदालती कार्यवाही के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पूरी तरह से ख़ारिज कर दिया था। 

एक अन्य इतिहासकार एससी मिश्रा ने कोर्ट में कहा था कि उन्हें इस बात की जानकारी नहीं थी कि जज़िया क्या था। उन्होंने कहा, ”मुझे याद नहीं है कि जज़िया केवल हिन्दुओं पर लगाया गया था।” इसके आगे उन्होंने कहा, “मैंने बाबरी मस्जिद के निर्माण के बारे में कई किताबें पढ़ी हैं, लेकिन मुझे इस वक़्त किसी किताब का नाम याद नहीं है।”

Ram Mandir

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पीएचडी डिग्रीधारी सुशील श्रीवास्तव ने निष्कर्ष निकाला कि इस बात का कोई सबूत नहीं है कि मस्जिद किसी मंदिर को ध्वस्त करने के बाद बनाई गई थी, भले ही वह फारसी पढ़ या लिख ​​नहीं सकते थे, अरबी नहीं पढ़ सकते थे और संस्कृत का भी ज्ञान उन्हें नहीं था। इसके लिए उन्होंने अपने ससुर एसआर फारूकी की मदद ली थी।

अगर यह सब विचित्र नहीं था, तो इसके आगे उन्होंने जो कहा उसे पढ़िए, “मुझे एपिग्राफी का कोई ज्ञान नहीं है। मुझे न्यूमिज़माटिक का कोई ज्ञान नहीं है। मैंने पुरातत्व में कोई विशेषज्ञता हासिल नहीं की। मैंने भूमि के सर्वेक्षण के बारे में कोई ज्ञान हासिल नहीं किया…”

कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में एक सेवानिवृत्त प्रोफेसर सूरज भान ने भी श्रीवास्तव के बारे में बहुत कुछ कहा। उनका मानना ​​है कि रामायण मूल रूप से तुलसी दास द्वारा लिखी गई थी। एक इतिहासकार के रूप में दिल्ली विश्वविद्यालय के आरसी ठकरान ने “समाचार पत्रों और पत्रिकाओं को ज्ञान का स्रोत माना” और स्वीकार किया कि उन्होंने “इस संबंध में किसी इतिहासकार द्वारा एक पुस्तक नहीं पढ़ी।” ठकरान ने खुद को एक ‘फील्ड पुरातत्वविद्’ की बजाए ‘टेबल पुरातत्वविद्’ के रूप में वर्णित किया। ।

Ram Mandir

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त प्रोफेसर डी मंडल ने कहा था, “मैं कभी अयोध्या नहीं गया। मुझे बाबर के के इतिहास का कोई विशेष ज्ञान नहीं है।” उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि उन्हें ‘यज्ञ’ या ‘वेद’ का अर्थ नहीं पता था। शायद इसकी जानकारी उन्हें JNU की पीएचडी (हैदराबाद विश्वविद्यालय) होल्डर सुप्रिया वर्मा से मिली।

सुप्रिया वर्मा के मुताबिक, “यह कहना ग़लत है कि ‘यक्ष’ या ‘यक्षी’ का संबंध केवल हिन्दू धर्मशास्त्र तक सीमित है। वास्तव में, यह बौद्ध धर्म से भी जुड़ा हुआ है।” इसके बाद, अपने शब्दों का रुख़ मोड़ते हुए उन्होंने कहा, “मैं यह नहीं कह सकती कि ‘यक्ष’ या ‘यक्षी’ शब्द बौद्ध धर्म की किस धार्मिक पुस्तक में उल्लेखित है।”

ग़ौर करने वाली बात यह है कि ये वो इतिहासकार हैं जिन्होंने राम मंदिर मामले पर अपना वामपंथी प्रोपेगेंडा फैलाने का काम किया। कोर्ट में दिए गए इनके बयानों से लोगों के भरोसे को ठेस पहुँचेगी और साथ ही इससे हमारे देश की शिक्षा प्रणाली के प्रति लोगों का विश्वास भी कम होगा। यह विश्वास करना लगभग मुश्किल है कि इस तरह के बयान शपथ के तहत एक संतुलित दिमाग वाले लोगों द्वारा दिए गए थे।

इससे भी अधिक चिंता का विषय यह है कि इन लोगों ने उन छात्रों को भी शिक्षित किया जो भविष्य में सैकड़ों लोगों को शिक्षित करेंगे। यह हमारी शिक्षा की स्थिति की एक भयानक तस्वीर को उजागर करता है। इससे यह बात भी स्पष्ट हो जाती है कि वर्तमान सरकार को प्राथमिकता के आधार पर छात्रों को पढ़ाए जाने वाले इतिहास के पाठ्यक्रम में संशोधन की आवश्यकता क्यों है?

* इस रिपोर्ट में उपयोग की गई सभी तस्वीरों को @PeeliHaldi से लिया गया है।

शिवसेना से गठबंधन को निरुपम ने बताया आत्मघाती कदम: पवार बोले- कॉन्ग्रेस से पूछ कर लेंगे फैसला

महाराष्ट्र के राजनैतिक गलियारों में बढ़ती हलचल से अब स्थिति और भी ज्यादा उलझने लगी हैं। खबरों के अनुसार हाल ही में भाजपा द्वारा राज्य में सरकार बनाने से मना करने के बाद राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने शिवसेना को सरकार बनाने के लिए न्योता दिया है। इसके लिए उन्होंने शिवसेना के एकनाथ शिंदे (विधायक दल के नेता) से सोमवार को शाम 7:30 बजे तक उनकी पार्टी की इच्छा और आँकड़ों की जानकारी देने की बात कही।

जिसके बाद कॉन्ग्रेस एनसीपी के साथ मिलकर शिवसेना द्वारा सरकार बनाने की गतिविधियाँ तेज हो गई और अरविंद सांवत ने अपने सांसद पद से इस्तीफा भी दे दिया। हालाँकि, इसपर एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने कहा कि उनके पास इस्तीफे की कोई सूचना नहीं हैं और साफ़ किया है कि वो जो भी फैसला करेंगे उसे कॉन्ग्रेस के साथ चर्चा के बाद ही लेंगे।

महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव के परिणाम आने के बाद भी सरकार के गठन में हो रही देरी के लिए शिवसेना ने भाजपा को जिम्मेदार ठहराया है। शिवसेना के नेता संजय राउत ने कहा है कि यह भाजपा का अहंकार है कि वह महाराष्ट्र में सरकार बनाने से इंकार कर रही हैं। संजय राउत ने इसे जनता का अपमान बताया है और कहा है कि भाजपा विपक्ष में बैठने के लिए तैयार है लेकिन वे 50-50 का फॉर्मूला मानने के लिए राजी नहीं हैं।

शिवसेना नेता ने अपने बयान में राज्यपाल पर भी निशाना साधा और कहा कि यदि उन्हें अधिक समय दिया गया होता, तो उनके लिए सरकार बनाना आसान होता। यहाँ बता दें कि राज्यपाल ने सरकार गठन के लिए भाजपा को 72 घंटे का समय दिया है, जबकि शिवसेना को उनके मुकाबले थोड़ा कम समय मिला है। राउत के अनुसार ये सब भाजपा की साजिश है, क्योंकि वे राज्य में राष्ट्रपति शासन लगवाना चाहती है।

इधर, दिल्ली में सोनिया गाँधी के आवास पर अहमद पटेल, केसी वेणुगोपाल और मल्लिकार्जुन खड़गे कॉन्ग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक में शामिल होने पहुँचे हैं। उधर महाराष्ट्र में संजय राउत भी उद्धव ठाकरे से मिलने उनके आवास पर पहुँचे हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार कहा जा रहा है कि राज्‍यपाल के निमंत्रण के बाद एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने उद्धव ठाकरे से फोन पर बात की। लेकिन शिवसेना के सामने एनसीपी ने यह शर्त रख दी कि वह भाजपा के सभी रिश्ते खत्म करे और मोदी सरकार में उनके सभी मत्री इस्तीफा दें, तभी वे सरकार बनाने के बारे में सोचेंगे।

इसके अलावा, मुंबई कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और वरिष्ठ नेता संजय निरुपम ने भी राज्य के उन नेताओं की आलोचना की है जो महाराष्ट्र में अगली सरकार गठन के लिए शिवसेना को समर्थन देने पर विचार कर रहे हैं। उन्होंने कहा है कि पिछले चुनाव शिवसेना के साथ साझेदारी करने पर सवाल खड़े करते हैं।

उनका कहना है, “सवाल यह नहीं है कि महाराष्ट्र में सरकार कैसे और किस तरह से बनती है। राज्य में राजनीतिक अस्थिरता से इनकार नहीं किया जा सकता है। समय से पहले हमें चुनाव के लिए तैयार रहना चाहिए, हो सकता है कि 2020 में चुनाव भी हो। क्या हम शिवसेना के साथ चुनाव में जा सकते हैं।” निरुपम ने शिवसेना-कॉन्ग्रेस और एनसीपी के गठन को आत्मघाती कदम बताया है।

उन्होंने कहा है कि अल्पकालिक अवधि के लिए हम सरकार तो बना सकते हैं। जनता से कह भी सकते हैं कि राज्य के विकास के लिए इस तरह का कदम जरूरी था। लेकिन वैचारिक स्तर पर जिस पार्टी से हमारा दशकों विरोध रहा है उन सवालों का जवाब चुनावों में कैसे दे सकते हैं। 

बांदीपोरा कश्मीर: सुरक्षाबलों और आतंकवादियों के बीच मुठभेड़, 2 आतंकी ढेर, गोला-बारूद बरामद

भारतीय सेना ने जम्मू-कश्मीर में बहुत बड़ी कामयाबी हासिल की है। उत्तरी कश्मीर के बांदीपोरा जिले में रविवार (नवंबर 10, 2019) शाम से शुरू हुई मुठभेड़ में अब तक दो आतंकी ढेर कर दिए गए हैं। कुछ अन्य आतंकियों के भी घिरे होने की सूचना है। 

फिलहाल मुठभेड़ जारी है। मारे गए आतंकियों की फिलहाल शिनाख्त की जा रही है। कश्मीर जोन पुलिस ने बताया कि मारे गए आतंकियों के पास से भारी मात्रा में हथियार और गोला बारूद बरामद किए गए हैं।

जिले के लाडूरा गाँव में आतंकियों के छिपे होने की सूचना पर सुरक्षा बलों ने गाँव की घेराबंदी की। घेरा सख्त होता देख एक मकान में छिपे आतंकियों ने सुरक्षा बलों पर फायरिंग शुरू कर दी। अचानक शुरू हुई फायरिंग पर सुरक्षा बलों ने पहले तो आतंकियों को समर्पण के लिए कहा। इसके बाद भी फायरिंग नहीं रुकी तो सुरक्षाबलों ने आतंकियों को मुँहतोड़ जवाब दिया और दो आतंकियों को मौत के घाट उतार दिया।

अधिकारियों ने बताया कि उत्तरी कश्मीर के बांदीपोरा जिले के एक गाँव में सुरक्षाबलों और आतंकवादियों के बीच रविवार को शुरू हुई मुठभेड़ में पहले एक आतंकवादी मारा गया था फिर सोमवार सुबह एक और आतंकी सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में मारा गया। उन्होंने बताया कि श्रीनगर से 55 किलोमीटर दूर लाडूरा गाँव में आतंकवादियों और सुरक्षाबलों के बीच मुठभेड़ जारी है।

गौरतलब है कि सात नवंबर को उत्तरी कश्मीर के सोपोर में लोगों को धमकाने और भयभीत करने के मामले में पुलिस ने हिजबुल मुजाहिदीन के चार ओवरग्राउंड वर्कर (ओजीडब्ल्यू) को गिरफ्तार किया था। इनके पास से एक पिस्टल व अन्य आपत्तिजनक सामग्री बरामद की गई थी। इससे पहले हंदवाड़ा में लश्कर के दो ओजीडब्ल्यू पकड़े गए थे। इससे पहले छह नवंबर को दक्षिण कश्मीर के अवंतीपोरा में लोगों को धमकी देने और भयभीत करने में तीन लोगों को गिरफ्तार किया गया था। इनके पास से लश्कर-ए-तैयबा तथा हिजबुल मुजाहिदीन के पोस्टर बरामद किए गए थे।

CJI, PM मोदी ने किया साफ़: अब काशी, मथुरा सहित किसी धार्मिक स्थल पर विवाद के लिए तैयार नहीं है देश

अयोध्या फैसले में 9 नवंबर को कोर्ट ने सर्वसम्मति से अपना फैसला सुनाया और इसके बाद न्यायपालिका, सरकार एवं RSS जैसे संगठन सब एक मत देते नजर आए। दरअसल, अलग-अलग बयानों में मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सरसंघ संचालक मोहन भागवत ने संदेश दिया कि विवादों को पीछे छोड़कर अब देश के आगे बढ़ने का वक्त है। जिसके बाद ऐसा मानकर चला जा रहा है कि भविष्य में सांप्रदायिक धार्मिक स्थलों के नामपर विवाद होने की गुंजाइश कम है। फिर चाहे मामला मथुरा-काशी से संबंधित ही क्यों न हो।

जानकारी के लिए बता दें कि अयोध्या की तरह काशी के विश्वनाथ मंदिर-ज्ञानवापी मस्जिद विवाद और मथुरा में भी मस्जिद विवाद सालों से चल रहा है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने अपने 1,045 पेज के फैसले में 11 जुलाई, 1991 को लागू हुए प्लेसेज़ ऑफ वर्शिप (स्पेशल प्रोविज़न) एक्ट, 1991 का जिक्र करते हुए साफ कर दिया है कि काशी और मथुरा के संदर्भ में यथास्थिति बरकरार रहेगी।

शनिवार को फैसला सुनाते हुए जस्टिस गोगोई ने 1991 के पूजा स्थल कानून का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि संसद का यह कानून साफ करता है कि 15 अगस्त 1947 के दिन तक जिस भी पूजा स्थल की जो भी स्थिति है, उसमें कोई धार्मिक बदलाव की इजाजत नहीं हैं। इसलिए इन मामलों से जुड़े सभी मुकदमें अब खत्म माने जाएँगे। उल्लेखनीय है कि इस कानून से सिर्फ़ राम जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद को ही छूट थी। जिसका मतलब साफ है कि कोर्ट अब ऐसे किसी भी मुद्दे को सुनने के लिए तैयार नहीं हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी देश को संबोधित करते हुए उसी दिन कहा कि अब देश में कटुता के लिए स्थान नहीं हैं। उन्होंने कहा कि अब नए भारत के निर्माण में सबको जुटना है। इस दौरान उन्होंने करतारपुर कॉरिडोर का उल्लेख करते हुए कहा कि आज के दिन का संदेश जोड़ने का है, जुड़ने का है और मिलकर जीने का है। सभी कटुता को तिलांजलि देने का वक्त है। नए भारत में कटुता, नकारात्मकता पर कोई स्थान नहीं होगा।

वहीं संघ संचालक ने भी अपने बयान में इस मामले से आरएसएस के जुड़ने को एक अपवाद बताया। उन्होंने कहा है कि संघ आंदोलन नहीं करता, राम मंदिर से जुड़ना केवल अपवाद था। जिससे साफ होता है कि संघ किसी और पूजा स्थल के लिए होने वाले आंदोलन से जुड़ने पर विचार नहीं कर रहा है।

TN शेषन बदल दी थी EC की तस्वीर: राव से लेकर लालू यादव तक किसी को भी नहीं बख्शा, PM मोदी ने जताया शोक

भारत में चुनाव नियमों को सख़्ती से लागू करवाने के लिए मशहूर पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन का रविवार (10 नवंबर) को निधन हो गया। 87 वर्षीय शेषन ने कार्डियक अरेस्ट के बाद चेन्नई में अंतिम साँस ली। भारत के 10वें मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन का पूरा नाम तिरुनेलै नारायण अय्यर शेषन था। वह 12 दिसंबर 1990 से 11 दिसंबर, 1996 तक इस पद पर रहे। उन्होंने भारतीय चुनाव प्रणाली में कई बदलाव किए। मतदाता पहचान पत्र की शुरुआत भी भारत में उन्हीं के द्वारा शुरू की गई थी। 1996 में उन्हें रैमन मैग्सेसे अवॉर्ड से भी सम्मानित किया गया था।

शेषन के बारे में यह बात प्रसिद्ध थी कि ‘राजनेता सिर्फ़ दो लोगों से डरते हैं, एक भगवान और दूसरे शेषन’। देश में चुनाव व्यवस्था में शुचिता, पारदर्शिता लाने का श्रेय उन्हीं को दिया जाता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनके निधन पर शोक व्यक्त किया है। उन्होंने ट्वीट किया, “टीएन शेषन एक उत्कृष्ट सिविल सेवक थे। उन्होंने अत्यंत परिश्रम और निष्ठा के साथ भारत की सेवा की। चुनावी सुधारों के प्रति उनके प्रयासों ने हमारे लोकतंत्र को मजबूत और अधिक सहभागी बनाया है। उनके निधन का दुख है। ओम शांति।”

पीएम मोदी के अलावा, गृहमंत्री अमित शाह समेत अन्य नेताओं ने भी उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।

बता दें कि भारत में चुनाव व्यवस्था में जब-जब सुधार की बात की जाएगी, तब-तब शेषन को याद किया जाएगा। वास्तव में वे ही थे, जिन्होंने चुनाव आयोग की तस्वीर बदल दी थी। चुनाव संबंधी नियमों को कड़ाई से लागू करवाने के लिए उन्होंने अपने कार्यकाल में तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव से लेकर बिहार के मुख्यमंत्री रहे लालू प्रसाद यादव किसी को नहीं बख़्शा था।

टीएन शेषन पहले ऐसे चुनाव आयुक्त थे जिन्होंने बिहार में पहली बार चार चरणों में चुनाव करवाया था। इस दौरान उन्होंने मात्र गड़बड़ी की आशंका होने पर ही चारों बार चुनाव की तारीखें बदल दी थी। साथ ही बूथ कैप्चरिंग के लिए बिहार में उन्होंने अर्धसैनिक बल की तैनाती भी कर दी थी। इसके अलावा, चुनाव प्रचार के दौरान खर्च पर अंकुश लगाने की शुरुआत भी उन्होंने ही की थी।

जानकारी के अनुसार, शेषन जब नए-नए मुख्य चुनाव आयुक्त बने थे, उस दौरान पत्रकारों ने उनसे पूछा था कि आयोग में कोई काम तो होता नहीं तो वो करते क्या हैं? इस पर उन्होंने कहा था कि वह अपने ऑफ़िस में बैठकर क्रॉसव‌र्ल्ड पजल्स खेलते हैं।

बता दें कि शेषन के मुख्य चुनाव आयुक्त बनने से पहले चुनाव आयोग की छवि बहुत अच्छी नहीं थी। मुख्य चुनाव आयुक्त बनने से पहले शेषन ने कई मंत्रालयों में काम किया और वो जहाँ भी गए उस मंत्री और मंत्रालय की छवि सुधर गई। मुख्य चुनाव आयुक्त का पद संभालने से पहले 1989 में वह देश के 18वें कैबिनेट सचिव के पद पर थे।

अगर बाबरी मस्जिद अवैध थी तो लालकृष्ण आडवाणी पर मुकदमा क्‍यों चल रहा: ओवैसी ने SC के फैसले पर उठाया सवाल

अयोध्या भूमि विवाद को लेकर सुप्रीम कोर्ट के पाँच जजों की पीठ ने शनिवार को ऐतिहासिक फैसला सुनाया।
ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल (AIMIM) के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर सवाल उठाते हुए हैदराबाद में एक जनसभा को संबोधित करते हुए कहा कि यदि बाबरी मस्जिद अवैध थी, तो इसे ढहाने को लेकर लालकृष्ण आडवाणी पर मुकदमा क्यों चल रहा है और अगर यह वैध थी, तो आडवाणी को जमीन क्यों दी जा रही है? हैदराबाद के सांसद ने इस बात पर आश्चर्य जताते हुए कहा कि जिस इंसान ने किसी का घर गिराया, कैसे उसे वही घर दिया जा सकता है।

जनसभा को संबोधित करते हुए ओवैसी ने राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद जमीन विवाद मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले में खामियाँ बताईं। उन्‍होंने अपनी बात दोहराई कि ‘सुप्रीम कोर्ट सर्वोच्च है लेकिन अचूक नहीं।’ ओवैसी ने कहा, “यदि एक व्यक्ति आपका घर गिरा देता है और आप पंच के पास जाते हैं और वह आपका घर उसी व्यक्ति को दे देता है, जिसने आपका घर गिराया और कहता है कि इसके बदले आपको दूसरी जगह जमीन दी जाएगी तो आपको कैसा लगेगा?” ओवैसी ने कहा कि उनका मूल सवाल यह है कि यदि बाबरी मस्जिद अवैध थी तो मस्जिद को ध्वस्त करने वाले आडवाणी और अन्य लोगों पर मुकदमा क्यों चल रहा है?

ओवैसी ने उन लोगों पर भी निशाना साधा जो मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का विरोध करने को लेकर उनकी आलोचना कर रहे हैं। ओवैसी ने कहा कि यह उनका संवैधानिक अधिकार है कि वह इसका विरोध करें। उन्होंने यह भी कहा कि अन्य स्थान पर 5 एकड़ जमीन देने की बात मुस्लिमों का अपमान है। उन्होंने कहा, “बाबरी मस्जिद हमारा कानूनी अधिकार है। हम जमीन के लिए नहीं लड़ रहे थे। हमें खैरात नहीं चाहिए। हमें भिखारी मत समझिए। हम भारत के सम्मानित नागरिक हैं।”

इसके साथ ही ओवैसी ने सुप्रीम कोर्ट में मुस्लिम पक्ष का प्रतिनिधित्व करने वाले वकीलों का शुक्रिया अदा किया। उन्होंने कहा कि 80 साल की उम्र में भी राजीव धवन ने अदालत में घंटों बहस की। उन्होंने कहा, “राजीव धवन साहब का शुक्रिया अदा करने के लिए हमारे पास शब्द नहीं है। तथ्य यह है कि उन्होंने इस मामले को लिया और परीक्षा की इस घड़ी में लड़ना अपने आप में एक बड़ी बात है।” सांसद ने कहा कि कपिल सिब्बल ने भी मामले में अपना योगदान दिया, लेकिन कॉन्ग्रेस ने उन्हें केस लड़ने से रोक दिया।

अयोध्या मामला: मुस्लिम पक्ष के पास बचा है यह रास्ता, 17 नवंबर को सुन्नी वक्फ बोर्ड करेगा फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने 9 नवंबर को अयोध्या विवाद पर अपना ऐतिहासिक फैसला सुना दिया। फैसले में राम जन्मभूमि की माँग करने वालों को जमीन सुपुर्द कर दी गई और मस्जिद की माँग करने वालों को दूसरी जगह पर 5 एकड़ जमीन देने का निर्देश दिए गए। हालाँकि, इस फैसले के बाद कुछ मस्जिद पक्षकार नाखुश नजर आए और उन्होंने मामले पर रिव्यू याचिका डालने की बात की। लेकिन इस कथन पर अमल किया जाएगा या नहीं, ये अब भी सवाल है।

अंग्रेजी अखबार द इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का अध्ययन कर रहा है। खबर के मुताबिक, इस अध्ययन के बाद वह 17 नवंबर को रिव्यू पिटीशन डालने पर फैसला करेगा। खुद AIMPLB (ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड) के वकील जफरयाब जिलानी ने शनिवार को इसपर संकेत दिए थे कि वो रिव्यू पेटिशन के साथ सुप्रीम कोर्ट जा सकते हैं।

दरअसल, AIMPLB के सदस्यों का सवाल है कि सुप्रीम कोर्ट ने उनके पक्ष में फैसला नहीं सुनाया। उनका कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने माना कि 1949 में बाबरी मस्जिद के अंदर छुपकर मूर्ति रखी गई। इसके अलावा कोर्ट का ये भी कहना है कि कानून तोड़ते हुए 6 दिसंबर 1992 को मस्जिद को ढहाया गया। लेकिन फिर भी जमीन मंदिर को क्यों दी गई।

इसके बाद AIMPLB का ये भी तर्क है कि उन्होंने हिंदुओं को सीता रसोई और चबुतरे पर पूजा करने से कभी मना नहीं किया। सुन्नी वक्फ बोर्ड का कहना है कि उनके पास ज़मीन की कोई कमी नहीं है। उन्हें बस न्याय चाहिए।

बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने 1045 पन्नों के फैसले में पूरी विवादित जमीन पर रामलला का हक माना है। इस जमीन पर मंदिर निर्माण की रूपरेखा तैयार करने के लिए केंद्र सरकार को 3 महीने में ट्रस्ट बनाने का आदेश दिया गया है। केंद्र सरकार ही ट्रस्ट के सदस्यों का नाम निर्धारित करेगी। साथ ही मंदिर निर्माण में कार्य आगे बढ़ेगा।

राम मंदिर की नींव हिन्दू नववर्ष या रामनवमी पर रखी जाए, संतों ने सुझाई ये 2 तारीखें: रिपोर्ट्स

अयोध्या भूमि पर सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला आने के बाद राम मंदिर के निर्माण को लेकर संत समाज ने दो तारीखों का सुझाव दिया है। अखिल भारतीय संत समिति ने सर्वसम्मति से कहा कि मंदिर की नींव हिन्दू नववर्ष (नव संवत्सर) या भगवान राम के जन्मदिन (रामनवमी) को ही रखी जाए। पंचांग के अनुसार, हिन्दू नववर्ष चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से शुरू होता है, जो 2020 में 25 मार्च से शुरू होगा। रामनवमी 2 अप्रैल को है। इन दोनों तारीखों को लेकर संघ भी सहमत है।

दैनिक भास्कर ने संघ के सूत्रों के हवाले से लिखा कि मंदिर निर्माण से जुड़ी आगे की रूपरेखा संत समाज की सहमति से ही तय की जाएगी। बता दें कि इससे पहले मंदिर निर्माण की ज़िम्मेदारी विश्व हिन्दू परिषद (VHP) पर थी। लेकिन, अब सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को मंदिर निर्माण के लिए तीन महीने में ट्रस्ट बनाने को कहा है। इसलिए संत समाज और संघ की भूमिका काफ़ी महत्वपूर्ण हो गई है। वहीं, VHP के नेताओं ने भी संतों द्वारा सुझाई गई दो तारीखों पर अपनी सहमति दी है और कहा कि उनके द्वारा सुझाई गईं तारीख़ों से बेहतर और कोई तारीख़ नहीं हो सकती। कुल मिलाकर अब सरकार पर भी दबाव रहेगा कि वो जल्द ही ट्रस्ट बनाए और इसमें संतों के प्रमुख वर्गों को शामिल करें।

बता दें कि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने रविवार (10 नवंबर) देश के प्रमुख धर्मगुरुओं के साथ बैठक की थी, जिसका मक़सद धर्मगुरुओं के साथ संवाद और सम्पर्क के ज़रिए सभी समुदायों के बीच भाईचारे की भावना को मज़बूत बनाना था। धर्मगुरुओं ने दशकों पुराने अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सम्मान करने का संकल्प लिया। चार घंटे तक हुई इस बैठक में स्वामी अवधेशानंद गिरी, बाबा रामदेव, स्वामी चिदानंद सरस्वती, स्वामी परमात्मानंद, मौलाना अरशद मदनी, मौलाना कल्बे जव्वाद आदि मौजूद थे। अवधेशानन्द गिरी धर्माचार्य सभा के चेयरमैन हैं। मौलाना कल्बे जव्वाद शिया धर्मगुरु हैं, वहीं मौलाना अरशद मदनी भी अपने समुदाय में ख़ासा रसूख रखते हैं।

इसके अलावा, रविवार को 4223 जगह ईद-ए-मिलादुनबी (बारावफात) के जुलूस निकले। अयोध्या में कई जगहों पर हिन्दुओं ने फूलों से जुलूस का स्वागत किया। इसी तरह मुस्लिम नेताओं ने राम जन्मभूमि न्यास पहुँचकर रामलला को सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के लिए बधाई भी दी। इमाम शमसुल कमर क़ादरी ने कहा कि सौहार्द बनाए रखना सबकी ज़िम्मेदारी है। इसलिए हमने कोर्ट के फ़ैसले के दिन शनिवार (9 नवंबर) को बारावफात के जुलूस नहीं निकाले।

ग़ोरतलब है कि करीब 500 साल पुराना अयोध्या विवाद शनिवार को आए सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले से समाप्त हो गया है। सुप्रीम कोर्ट की पॉंच जजों की पीठ ने 1045 पन्नों के अपने फैसले में विवादित जमीन रामलला को सौंप दी है। साथ ही मुस्लिम पक्ष को मस्जिद बनाने के लिए 5 एकड़ जमीन उपलब्ध कराने का निर्देश भी सरकार को दिया है।

उद्धव बनेंगे मुख्यमंत्री: शिवसेना नेता अरविंद सावंत ने किया केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफे का ऐलान

महाराष्ट्र में चल रहे राजनीतिक संकट के बीच शिवसेना नेता अरविंद सावंत ने केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफे का ऐलान कर दिया है। उन्होंने आज 11 बजे प्रेस कॉन्फ्रेंस करने की बात कही है। आपको बता दें कि सावंत मोदी कैबिनेट में भारी उद्योग एवं सार्वजनिक उद्यम मंत्री हैं।

बता दें कि राज्य में हाल के विधानसभा चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी बीजेपी ने सरकार बनाने में असमर्थता जताई। जिसके बाद राज्य के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने शिवसेना को सरकार बनाने के लिए आमंत्रण दिया है। ऐसी संभावना जताई जा रही है कि शिवसेना कॉन्ग्रेस-एनसीपी के साथ मिलकर शिवसेना सरकार का गठन कर सकती है। उल्लेखनीय है कि शरद पवार के नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी (NCP) ने कहा है कि यदि शिवसेना एनडीए का साथ छोड़ देती है तो महाराष्ट्र में सरकार बनाने के लिए उसे समर्थन देने पर विचार हो सकता है।

एनसीपी नेता नवाब मलिक ने कहा कि यदि शिवसेना को हमारा समर्थन चाहिए तो उसे बीजेपी के साथ सारे रिश्ते तोड़ने का ऐलान करना होगा। उसे एनडीए से बाहर आना होगा और मोदी कैबिनेट में शामिल उसके पार्टी नेताओं को इस्तीफा देना होगा।

और अब ऐसा लग रहा है कि सरकार बनाने के लिए शिवसेना ने एनसीपी की शर्तों को मानते हुए केंद्र में बीजेपी के साथ अपना गठबंधन तोड़ने का फैसला किया है। अरविंद सावंत ने मराठी में ट्वीट किया, “शिवसेना का पक्ष सत्य के साथ है। ऐसे खराब माहौल में दिल्ली की सरकार में बने रहने का कोई औचित्य नहीं है। मैं मंत्री पद से इस्तीफा दे रहा हूँ और आज 11 बजे प्रेस के सामने अपना पक्ष रखूँगा।” सावंत के केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफे के ऐलान के साथ ही यह साफ हो गया है कि शिवसेना ने एनडीए छोड़ने का मन बना लिया है।

गौरतलब है कि बीजेपी 105 सीट लेकर सबसे बड़ी पार्टी लेकर उभरी तो शिवसेना को 56 सीटें मिली। जो जरुरी बहुमत 145 से कहीं अधिक ज्यादा था। वहीं कॉन्ग्रेस को 44 और एनसीपी को 54 सीटें मिली है। राज्य विधानसभा में कुल 288 सीटें है। लेकिन शिवसेना ने सीएम पद पर दावेदारी ठोक दिया। और बीजेपी ने शिवसेना की माँग 50-50 के फार्मूले को नकार दिया है। जिसके बाद शिवसेना ने एनसीपी और कॉन्ग्रेस के साथ सरकार बनाने का निर्णय लिया है।

सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड को दिए 5 एकड़ ज़मीन पर सलीम ख़ान ने- कॉलेज तो जावेद अख़्तर ने कहा- बने अस्पताल

लंबे समय से चले आ रहे अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने शनिवार (9 नवंबर) को ऐतिहासिक फ़ैसला सुनाया। पाँच जजों की संवैधानिक पीठ ने 40 दिनों की सुनवाई के बाद यह फ़ैसला सुनाया। फ़ैसले के तहत विवादित ज़मीन राम लला के हक़ में गई। इसके साथ ही मुस्लिम पक्ष को 5 एकड़ ज़मीन अलग से मस्जिद के लिए देने की बात कही।

बता दें कि अयोध्या फ़ैसले का स्वागत करते हुए हिन्दी सिनेमा जगत की हस्तियों द्वारा प्रतिक्रियाएँ दर्ज की जा चुकी हैं। हाल ही में सलमान ख़ान के पिता सलीम ख़ान ने मस्जिद निर्माण के लिए मिलने वाली ज़मीन पर स्कूल या अस्पताल बनाने की सलाह दे चुके हैं। इसी बीच अब गीतकार और लेखक जाावेद अख़्तर ने 5 एकड़ ज़मीन पर अस्पताल बनाने सलाह दी है। जावेद अख़्तर ने ट्विटर के ज़रिए अपनी प्रतिक्रिया दी। इसमें उन्होंने लिखा, “बहुत अच्छा होगा अगर इस 5 एकड़ जमीन पर चैरिटेबल हॉस्पिटल बनाने का फैसला किया जाएगा। इसे सभी समुदाय के लोगों का समर्थन भी मिलेगा।”

इससे पहले 83 वर्षीय सलीम ख़ान ने अयोध्या फ़ैसले का स्वागत करते हुए कहा था कि अयोध्या में मुस्लिम पक्ष को मिलने वाली पाँच एकड़ ज़मीन पर स्कूल बनाया जाना चाहिए। मुस्लिमों को मस्जिद नहीं बल्कि स्कूल की ज़रूरत है। उन्होंने कहा था,

“फ़ैसला आने के बाद जिस तरीके से शांति और सौहार्द्र कायम रही यह प्रशंसनीय है। अब इसे स्वीकार कीजिए… एक पुराना विवाद समाप्त हुआ। मैं तह-ए-दिल से इस फ़ैसले का स्वागत करता हूँ। मुस्लिमों को अब इसकी (अयोध्या विवाद) चर्चा नहीं करनी चाहिए। इसकी जगह उनको बुनियादी समस्याओं की चर्चा करनी चाहिए और उसे हल करने की कोशिश करनी चाहिए। मैं ऐसी चर्चा इसलिए कर रहा हूँ कि हमें स्कूल और अस्पताल की ज़रूरत है। अयोध्या में मस्जिद के लिए मिलने वाली पाँच एकड़ जगह पर कॉलेज बने तो बेहतर होगा।”

पटकथा लेखक सलीम ख़ान के अलावा अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के पूर्व कुलपति लेफ़्टिनेंट जनरल (रिटायर) जमीरउद्दीन शाह ने भी ऐसा ही कुछ कहा। अयोध्या फ़ैसले पर आधारित NDTV के एक चर्चा के कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि मुस्लिमों को दी जाने वाली ज़मीन पर स्कूल या अस्पताल का निर्माण क्यों नहीं कर लेना चाहिए? अयोध्या में पहले से ही पर्याप्त मस्जिदें हैं। 

चर्चा के कार्यक्रम में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को स्वीकार करते हुए उसका स्वागत तो किया था, लेकिन कोर्ट के बाहर इस मसले को हल न कर पाने पर निराशा भी जताई थी। उन्होंने कहा था कि पाँच एकड़ ज़मीन को स्वीकार करने में भले ही कुछ लोगों को दिक्कत हो रही है और वो कह रहे हैं कि उन्हें वो ज़मीन नहीं चाहिए। लेकिन उस ज़मीन को स्वीकार लेना चाहिए और उस पर मस्जिद की बजाय स्कूल या अस्पताल बनवा देना चाहिए।