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पाकिस्तान की शर्मनाक हरकत: वॉर म्यूजियम में अभिनन्दन को दिखाया कैदियों की तरह

भारत को नीचा दिखाने की जुगत में पाकिस्तान एक बार फिर से अपनी ओछी हरकतों पर उतर आया है। दरअसल, पाकिस्तान ने अपने वॉर म्यूजियम में IAF के पॉयलट विंग कमांडर अभिनंदन का पुतला लगाया है। जिसमें वे एक पाकिस्तानी सैनिक की पकड़ में नजर आ रहे हैं।

इस तस्वीर को खुद पाकिस्तानी पत्रकार और राजनैतिक टिप्पणीकार अनवर लोधी ने अपने ट्विटर पर पोस्ट किया है। लोधी ने अपने ट्वीट पर लिखा, “पाकिस्तानी सेना ने संग्रहालय में अभिनंदन का पुतला लगाया है। इसे और दिलचस्प बनाया जा सकता था, अगर पुतले के हाथ में चाय का कप भी पकड़ा दिया जाता।” 

इस तस्वीर में नजर आ रहा है कि अभिनंदन के पुतले को काँच के बॉक्स में रखा गया है। जिसमें उनका चेहरा झुका हुआ और पाकिस्तानी फौजी का सीना तना हुआ दिखाया जा रहा है। इसके अलावा अभिनंदन के पुतले के बगल में एक मग भी रखा हुआ है। जिसे ये दर्शाने के लिए लगाया गया है कि उन्होंने अपनी हिरासत में अभिनन्दन को चाय भी पिलाई थी। जिसे पीते हुए उनकी वीडियो बहुत वायरल हुई थी। इस वीडियो में उनसे पाकिस्तानी अधिकारी पूछते नजर आ रहे थे कि चाय कैसी है और उन्होंने कहा था, “चाय शानदार है, धन्यवाद।”

गौरतलब है कि अभिनन्दन को चाय पिलाने की वीडियो जारी होने के बाद पाकिस्तान ने विश्व कप से पहले भी इसका फूहड़ता से मजाक उड़ाया था। उस समय भी भारत को नीचा दिखाने की कोशिश हुई थी। हालाँकि, बाद में भारत ने भी अपनी ओर से एक अलग विज्ञापन बनाकर जवाब दे दिया था।

यहाँ बता दें कि बालाकोट के आतंकी कैंपों पर हुई IAF की कार्रवाई के बाद अगले दिन पाकिस्तान ने भारत पर हवाई हमला करने की कोशिश की थी। जिसके जवाब में अभिनंदन ने अपने मिग-21 से उनके एक एफ-16 को मार गिराया था और अपनी बहादुरी का परिचय देते हुए दूसरे को भी खदेड़ा था। इस दौरान वे पाकिस्तान की सीमा में जा गिरे थे और पाकिस्तानी अधिकारियों ने उन्हें हिरासत में लिया था। हालाँकि, वे पड़ोसी मुल्क में केवल कुछ ही घंटों के लिए थे, लेकिन इस प्रदर्शनी को देखकर लग रहा है, जैसे अभिनंदन को पकड़ना उनकी कोई उपलब्धि हो।

खैरात नहीं मुआवजा है मस्जिद के लिए 5 एकड़ जमीन: ओवैसी पर बरसे ‘कारसेवक’ मोहम्मद आमिर

राम मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने मस्जिद को दिए जाने वाले 5 एकड़ जमीन को खैरात बताया था। अब उनके इस बयान पर मोहम्मद आमिर उर्फ बलबीर सिंह का बयान सामने आया है। ओवैसी के इस बयान के लिए वो उन पर जमकर बरसे। बता दें कि अयोध्या में बाबरी मस्जिद के विध्वंस में मोहम्मद आमिर भी शामिल थे। फिर बाद में उन्होंने इस्लाम धर्म अपना लिया।

बता दें कि दशकों पुराने विवाद और 134 साल चली कानूनी लड़ाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने शनिवार (नवंबर 9, 2019) को अयोध्या भूमि विवाद का फैसला सुना दिया। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पाँच सदस्यीय संविधान पीठ ने एकमत से अयोध्या को भगवान राम का जन्मस्थान मानते हुए पूरी 2.77 एकड़ विवादित जमीन रामलला विराजमान को सौंपकर मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त कर दिया। वहीं मुस्लिम पक्षकारों को मस्जिद बनाने के लिए 5 एकड़ जमीन देने का निर्णय सुनाया।

असदुद्दीन ओवैसी ने अदालत के इस फैसले पर अपनी नाखुशी जाहिर करते हुए कहा था कि वो इस फैसले से संतुष्ट नहीं हैं। उनका कहना था कि उन्हें खैरात में पाँच एकड़ जमीन नहीं चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि मुल्क हिन्दू राष्ट्र की ओर बढ़ रहा है। संघ अब काशी और मथुरा के मुद्दे को भी उठाएगा।

अब ओवैसी के बयान पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए मोहम्मद आमिर ने कहा कि मस्जिद बनाने के लिए सुन्नी वक्फ बोर्ड को जो जमीन दी जा रही है, वो खैरात नहीं, बल्कि मुआवजा है। इससे पहले ओवैसी के बयान पर बाबा रामदेव ने भी प्रतिक्रिया व्यक्त की थी। उन्होंने कहा था कि ओवैसी का अपना एक अलग मजहबी एजेंडा है। उस मजहबी एजेंडे को चलाकर ये अपना राज कायम रखना चाहते हैं और लोगों को अलग-अलग तरीके से भड़काना चाहते हैं। उन्होंने कहा, “अगर ओवैसी का वश चले तो ये हैदराबाद में निजामी के समय की तरह ही दूसरा फसाद खड़ा कर दे, लेकिन इसकी औकात ही नहीं है इतनी कि हिन्दुस्तान का बँटवारा कर सके।”

आमिर 1 दिसंबर 1992 को देश भर से आने वाले हजारों कारसेवकों में शामिल होने के लिए अयोध्या पहुँचे थे। आमिर के अनुसार 6 दिसंबर को मध्य गुंबद पर चढ़ने वाले वो पहले व्यक्ति थे। बता दें कि आमिर ने एक मुस्लिम महिला से शादी की है और इस्लाम की शिक्षाओं का प्रसार करने के लिए एक स्कूल चलाते हैं। मोहम्मद आमिर और मोहम्मद उमर (एक अन्य कार सेवक जिन्होंने विध्वंस में भाग लिया था) ने मिलकर अब तक 100 से अधिक मस्जिदों का निर्माण किया है।

महाराष्ट्र: गवर्नर ने शिवसेना से पूछा- बनाएँगे सरकार, एनसीपी ने कहा- सम​र्थन चाहिए तो छोड़ो NDA

भाजपा ने महाराष्ट्र में सरकार बनाने से इनकार कर दिया। इसके बाद राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने दूसरे सबसे बड़े दल शिवसेना से सरकार गठन के बारे में पूछा है। गवर्नर कार्यालय की तरफ से इस संबंध में शिवसेना विधायक दल के नेता एकनाथ खडसे से सरकार बनाने की इच्छा के बारे में पूछा गया है।

बताया जाता है कि कॉन्ग्रेस-एनसीपी के साथ मिलकर शिवसेना सरकार का गठन कर सकती है। एनसीपी नेता नवाब मलिक ने कहा है कि यदि गवर्नर सरकार बनाने के लिए शिवसेना को न्योता देते हैं तो पार्टी उसको समर्थन देने पर विचार कर सकती है। मलिक के अनुसार फिलहाल शिवसेना की ओर से उनकी पार्टी को कोई प्रस्ताव नहीं मिला है। उन्होंने कहा कि इस संबंध अंतिम फैसला कॉन्ग्रेस और एनसीपी मिलकर करेगी।

मलिक ने बताया कि एनसीपी ने 12 नवंबर को अपने विधायकों की बैठक बुलाई है। उन्होंने कहा कि यदि शिवसेना को हमारा समर्थन चाहिए तो उसे बीजेपी के साथ सारे रिश्ते तोड़ने का ऐलान करना होगा। उसे एनडीए से बाहर आना होगा और मोदी कैबिनेट में शामिल उसके पार्टी नेताओं को इस्तीफा देना होगा।

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बता दें कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार में शिवसेना भी शामिल है। महाराष्ट्र का विधानसभा चुनाव भी उसने बीजेपी के साथ ही मिलकर लड़ा था। लेकिन, नतीजे आने के बाद से वह ढाई साल के लिए सीएम पद मॉंग रही है। 288 सदस्यीय महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव में भाजपा को 105 और उसकी सहयोगी शिवसेना को 56 सीटें मिली है। कॉन्ग्रेस को 44 और उसकी सहयोगी एनसीपी को 54 सीटें मिली है।

इससे पहले महाराष्ट्र भाजपा के अध्यक्ष चंद्रकांत पाटिल ने राज्यपाल से मुलाकात कर उन्हें बताया कि पार्टी सरकार नहीं बनाएगी। पाटिल ने शिवसेना पर जनादेश के अपमान का आरोप लगाया। पाटिल ने अफ़सोस जताते हुए कहा कि शिवसेना और भाजपा को बहुमत मिलने के बावजूद सरकार का गठन नहीं हो सका है। उन्होंने शिवसेना पर जनादेश का अपमान करने का आरोप लगाया। साथ ही कहा कि यदि कॉन्ग्रेस-एनसीपी के साथ मिल कर शिवसेना सरकार चलाना चाहती है तो उन्हें हमारी शुभकामनाएँ है।

वहीं, शिवसेना सांसद संजय राउत ने फिर ​से अपनी पार्टी का सीएम होने की बात दोहराई है। उन्होंने कहा, “पार्टी प्रमुख उद्धव ठाकरे ने साफ कहा है कि सीएम शिवसेना का होगा। जब उन्होंने कह दिया तो इसका मतलब है कि किसी भी कीमत पर शिवसेना का ही मुख्यमंत्री होगा।” इस बीच, पूर्व मुख्यमंत्री और कॉन्ग्रेस नेता अशोक चव्हाण ने कहा है कि हालात पर पार्टी की नजर है। उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस के लिए सभी विकल्प खुले हैं और पार्टी ने अभी तक अंतिम फैसला नहीं किया है।

जस्टिस गांगुली ने अयोध्या फैसले पर उठाए सवाल: काटजू को कठघरे में खड़ा कर चुके CJI गोगोई करेंगे तलब?

आज़ादी के बाद भारत एक संसदीय लोकतंत्र वाला देश बना। यहाँ अगर संसद को कानून बनाने का अधिकार है तो सुप्रीम कोर्ट को भी इसी व्यवस्था ने कानून की व्याख्या का सर्वोच्च अधिकार दिया है। दोनों ही संस्थाओं की अवमानना अथवा अपमान करने के सन्दर्भ में विभिन्न प्रकार की कार्रवाई के प्रावधान किए गए हैं। यही वजह है कि सियासी दलों से लेकर राजनीति के कई बड़े दिग्गज तक, सभी सुप्रीम कोर्ट के आदेशों पर टिप्पणी करने से बचते हैं।

बावजूद इसके कुछ जज ऐसे होते हैं, जो रिटायर होने के बाद ऐसे ही बयान देते हैं, जैसा उनके कार्यकाल के दौरान किसी ने दिया होता तो वो उन्हीं जज के द्वारा तलब कर लिया जाता। अब अशोक गांगुली के बयान को ही देखिए। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के 5 वरिष्ठ जजों द्वारा सर्वसम्मति से दिए गए फ़ैसले पर सवाल उठाया। अगर ये फ़ैसला उन्होंने दिया होता और किसी अन्य व्यक्ति (भले ही वो रिटायर्ड जज ही क्यों न हो) ने उस पर ऐसी टिप्पणी की होती, तो उसे जस्टिस गांगुली ही अवमानना ममले में कठघरे में खड़ा कर लेते। आइए आपको पूरा मामला समझाते हैं।

अयोध्या के सदियों पुराने भूमि-विवाद पर सर्वोच्च अदालत के फैसले के बाद ज्यादातर तबकों ने सामाजिक सद्भाव की बात कहते हुए कोर्ट के फैसले का स्वागत किया। सुप्रीम कोर्ट ने विवादित 2.77 एकड़ ज़मीन पर रामलला विराजमान का मालिकाना हक बताया, जबकि मस्जिद के लिए दूसरे पक्ष को 5 एकड़ ज़मीन देने की बात कही। लेकिन कुछ लोगों को यह फैसला पांच नहीं रहा। इनमे जस्टिस गांगुली भी हैं।

जस्टिस गांगुली ने कहा कि अल्पसंख्यकों ने अरसे तक वहाँ मस्जिद देखी है, जिसे तोड़ डाला गया। साथ ही उन्होंने कहा कि एक संविधान के विद्यार्थी के रूप में उन्हें इस फ़ैसले को समझने में मुश्किल आ रही है। कुछ ऐसा ही रिटायर्ड जज मार्कण्डेय काटजू के साथ हुआ था। काटजू ने अपने ब्लॉग में लिख दिया था कि जस्टिस रंजन गोगोई को क़ानून की समझ नहीं है। कुछ ही दिनों बाद वो अदालत की अवमानना मामले में उसी कोर्ट में खड़े थे, जहाँ उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान कई फ़ैसले सुनाए होंगे। जस्टिस गोगोई ने उनकी समीक्षा याचिका ख़ारिज कर दी थी। जस्टिस गोगोई ने तो गार्ड को बुला कर काटजू को कोर्ट से निकाल बाहर करने की बात भी कही थी, लेकिन वकीलों के निवेदन के बाद उन्होंने ऐसा नहीं किया।

सम्भावना तो ये भी है कि रिटायर्ड जस्टिस अशोक गांगुली के साथ भी ऐसा हो सकता है। उन्होंने भी सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट का अपमान किया है। जस्टिस गांगुली ने यह भी कहा कि संविधान के लागू होने से पहले वहाँ क्या था, क्या नहीं- ये सुप्रीम कोर्ट की जिम्मेदारी नहीं है। इससे सीधा इंगित होता है कि जस्टिस गांगुली 1950 के बाद से ही भारत के इतिहास की शुरुआत मानते हैं। तभी एक समय ऐसा आया था जब अभिनेता अनुपम खेर ने उन्हें बड़ी विनम्रता से हजारों की भीड़ के सामने कहा था कि माफ़ कीजिए लेकिन आप ग़लत हैं। उस दौरान जस्टिस गांगुली ने असहिष्णुता गैंग के सुर में सुर मिलाया था।

सुप्रीम कोर्ट के जज रहे गांगुली दरअसल यह भूल गए कि उनकी यह टिप्पणी उन्हें महँगी पड़ सकती है। गांगुली खुद भी इस बात से अपरिचित नहीं होंगे कि न्यायालय के किसी आदेश पर टिप्पणी कर उसका निरादर करना कानूनी अपराध है। फैसले पर टिप्पणी करते हुए गांगुली ने कहा कि “इससे मुसलमान क्या सोचेगा”।

जस्टिस गांगुली भले ही कहें कि वहाँ मुस्लिमों ने एक अरसे से मस्जिद ही देखी है, क्या वो फिर संविधान के अस्तित्व में आने से पहले के भी काल का जिक्र नहीं कर रहे? इस तरह वो अपनी ही बातों में विरोधाभास पैदा कर रहे हैं। ऐसा कैसे हो सकता है कि किसी मामले में आज़ादी से पहले क्या हुआ था और क्या नहीं, इस पर अदालत आँख ही मूँद ले? 2017 में जस्टिस कर्णन भी अवमानना मामले में कोर्ट में पेश हुए थे और उन्हें जेल का सामना भी करना पड़ा था। काटजू, कर्णन के बाद क्या अब गांगुली का भी नंबर हो सकता है?

अपने बयान में पूर्व जज गांगुली ने यहाँ तक कहा कि उस मस्जिद में नमाज़ पढ़ी जाती थी तब संविधान अस्तित्व में आया। मगर यह भूल गए कि कोर्ट में पेश साक्ष्यों ने इस बात की पुष्टि की कि मस्जिद बन जाने के बावजूद हिन्दू उसके बाहर अपने अराध्य श्रीराम भगवान की प्रार्थना किया करते थे और मौजूदा वक़्त में भी यह हिन्दुओं की आस्था का केंद्र है। अदालत ने भी सुनवाई के दौरान इस तथ्य को स्वीकार किया। अगर जज गांगुली यह कहते हैं कि धार्मिक स्वतंत्रता का बचाव किया जाना चाहिए तो फिर यह क्यों भूल जाते हैं कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला भी ‘धार्मिक स्वतंत्रता के बचाव’ की ही एक दलील की बात कहता है। इतना ही नहीं दोनों पक्षों की धार्मिक स्वतंत्रता का बचाव करता यह आदेश अपने आप में एक नजीर है।

लिहाज़ा जज रह रह चुके एक व्यक्ति का अदालत के फैसले पर इस प्रकार की टिप्पणी करना आखिर कितना मुनासिब है। जस्टिस गांगुली खुद 2008 में 2जी घोटाले में सभी कम्पनियों के लाइसेन्स रद्द करने वाले फैसले में शामिल रह चुके जज हैं।

अयोध्या पर फैसले के बाद हरकत में NSA अजीत डोभाल, धर्मगुरुओं के साथ की बैठक

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने देश के प्रमुख धर्मगुरुओं के साथ बैठक की। इसका मकसद धर्मगुरुओं के साथ संवाद और संपर्क जरिए सभी समुदायों के बीच भाईचारे की भावना को मजबूत बनाना था। धर्मगुरुओं ने दशकों पुराने अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सम्मान करने का संकल्प लिया।

बता दें कि बैठक में एस्वामी अवधेशानंद गिरी, बाबा रामदेव, स्वामी चिदानंद सरस्वती, स्वामी परमात्मानंद, मौलाना अरशद मदनी, मौलाना कल्बे जव्वाद आदि मौजूद थे। अवधेशानन्द गिरी धर्माचार्य सभा के चेयरमैन हैं। मौलाना कल्बे जव्वाद शिया धर्मगुरु हैं, वहीं मौलाना अरशद मदनी भी अपने समुदाय में ख़ासा रसूख रखते हैं।

धर्मगुरुओं ने सभी देशवासियों से फैसले का सम्मान करने की अपील की है। साथ ही कहा है कि राष्ट्रहित सर्वोपरि है। धर्मगुरुओं ने शांति, सांप्रदायिक सदभावना बनाए रखने में सरकार को पूरा सहयोग देने की बात भी कही। बैठक में आशंका जताई कि कुछ राष्ट्रविरोधी तत्व माहौल खराब करने की साजिश रच सकते हैं। मीडिया रिपोर्ट के ऐसी ताकतों को रोकने के लिए धर्मगुरुओं से सहयोग की डोभाल ने अपील की। बैठक के बाद डोभाल ने कहा, ” यह बातचीत सभी समुदायों के बीच भाईचारा और मेलजोल की भावना को बरक़रार रखने की दिशा में मददगार साबित होगा।”

गौरतलब है कि करीब 500 साल पुराना अयोध्या विवाद शनिवार को आए सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले से समाप्त हो गया है। सुप्रीम कोर्ट की पॉंच जजों की पीठ ने 1045 पन्नों के अपने फैसले में विवादित जमीन रामलला को सौंप दी है। साथ ही मुस्लिम पक्ष को मस्जिद बनाने के लिए 5 एकड़ जमीन उपलब्ध कराने का निर्देश भी सरकार को दिया है।

वामपंथियो! अयोध्या तो झाँकी है ब्रो, अभी तो और जलना बाकी है! उनके नाम जिनकी जली है… बहुत ज्यादा!

याद कीजिए 1992 से 2019 के ये 27 साल, और याद कीजिए उन उपहासों को, उन कटाक्षों को, उन चुटकुलों को जिसमें ‘मंदिर वहीं बनाएँगे, डेट नहीं बताएँगे’ से ले कर, ‘अगर तुम्हारे राम हैं, तो वो टेंट में क्यों हैं?’, ‘जब वो भगवान हैं तो मंदिर क्यों नहीं बनवा लेते अपना?’ जैसी बातें हमें सुनाई देती रहीं। याद कीजिए सोशल मीडिया पर शेहला रशीद जैसे टुटपुँजिया, भाड़े पर मिलने वाले क्रांतिवीरों की जो साल गिना कर याद दिलाते थे कि कहाँ है तुम्हारा मंदिर।

ये मुद्दा काफी पहले सुलझ जाता अगर सरकारों की नीयत सुलझाने की रही होती। ये मुद्दा पहले सुलझ जाता अगर इन वामपंथियों और दूसरे मजहब विशेष के पक्षकारों को सीधी बात समझ में आ जाती कि जैसे उनका मक्का है, वैसे अयोध्या राम का, काशी महादेव का, मथुरा कृष्ण का है। लेकिन ऐसा होता भी तो कैसे, क्योंकि 1989 में वामपंथियों ने दूसरे मजहब वालों को भड़काया कि वो ये केस जीत सकते हैं, और उनके पक्ष में रोमिला थापर जैसे उपन्यासकारों को इतिहासवेत्ता कह कर उतार दिया।

लड़ाई खिंचती रही, हिन्दू चैन से, हाथ-पैर समेट कर, अपने ही देश में, सेकेंड क्लास नागरिक बन कर जीने को मजबूर रहा, उसे पूजा करने तक का अधिकार नहीं मिल सका इस हिन्दू बहुल राष्ट्र में। हिन्दुओं ने बस प्रतीक्षा की, दंगों को झेला है और अपने आराध्य के लिए, अपने अधिकार के लिए एक सतत लड़ाई लड़ी है। बाबरी मस्जिद के बनने से ले कर, अगले 200 सालों में (1528-1731) के बीच 64 बार मुगलों का हिन्दुओं से संघर्ष हुआ है, जो बताता है कि ये लड़ाई भारत की आजादी के बाद की नहीं है, ये तब से है जब से मंदिर की जगह एक हत्यारे, आक्रांता, लुटेरे ने मस्जिद बनवा दी।

उस समय सत्ता उनके पास थी, उन्होंने हजारों मंदिर तोड़े, करोड़ों हत्याएँ कीं (अगर आप बाबर के बाप पक्ष और माता पक्ष के चंगेज खान और तैमूर को जोड़ें तो), और हम उनके द्वारा बनवाए नासूरों को देखते रहे। इस राष्ट्र का कोई भी विवेकशील व्यक्ति किसी भी मुगल शासक के समर्थन में कैसे उठ सकता है! वो लुटेरे थे, उनके बाप लुटेरे थे, उनके बच्चे क्रूरतम शासक बन कर सामने आए। यहाँ के संसाधनों को लूटा, विश्वविद्यालयों में आग लगाई और गाँवों को उजाड़ दिया। आप कहते हैं कि उन्होंने ताजमहल बनवाया? अपने बाप के पैसे से बनवाया? किसने कहा था बनवाने? हमने बुलाया था क्या?

इतिहास को पोतने की कोशिश

जब इन बलात्कारियों को, इन आतंकियों के नाम की सड़कें देखते हैं तो आपको बुरा नहीं लगता? इनमें से एक ने भी भारतीय लोगों के लिए कुछ भी अच्छा नहीं किया। जो भी किया अपनी अय्याशी के लिए किया, यहाँ से कहीं गए नहीं क्योंकि हर जगह से भगाए जा चुके थे। यही इतिहास है, मुगल शासन कोई गौरवगाथा नहीं है कि उनके होने का जश्न मनाया जाए। इस्लामी शासन भारत के इतिहास पर उतना ही बड़ा धब्बा है, जितना अंग्रेजों की गुलामी।

भारत के इस्लाम के समर्थकों से कोई समस्या नहीं है, संविधान मजहब चुनने की स्वतंत्रता देता है। साथ ही, जो उस समय हिन्दू धर्म त्यागकर इसके अनुयाई बने, वो बेचारे डर कर बने, तलवार की नोक पर मजबूर किए गए, उनका क्या कसूर! लेकिन ऐसी भी क्या मजबूरी कि औरंगजेब और टीपू सुल्तान जैसों को अपना आदर्श मानते हैं! पाकिस्तान का तो समझ में आता है जिसके लिए गौरी और गजनी आदर्श हैं क्योंकि वो पाकिस्तान है। लेकिन यहाँ के लोग उन आतंकियों को कैसे हीरो मानते हैं, ये मेरी समझ से बाहर है।

1947 में मौका दिया गया था कि जिन्हें इन डकैतों को हीरो मानने वालों के देश में जाना है चले जाएँ, तब गए नहीं। तो, उम्मीद की जाती है कि भारतभूमि पर जिसने भी गलत निगाह डाली, चाहे आज आपका मजहब और उनका मजहब एक ही रहा हो, फिर भी इस धरती को अपने पाप से कलुषित करने वाले को आप स्नेह से न देखें। क्या कोई अपने घर में आए चोर, डकैत, बलात्कारी, कातिल या अपराधी को अपराध करने के बाद, अपने ही घर में रख कर, उसकी प्रशंसा में अपने मुहल्ले का नाम उस पर रख सकता है?

जी, भारत में यही हुआ है क्योंकि गाँधी नाम को हाईजैक करने वाले पापियों के खानदान ने ऐसा सुनिश्चित किया ताकि आतंकियों को हीरो की तरह पढ़ा जाए, उनके नाम पर सड़कें हों, शहर हों, गाँव बसे। स्टॉकहोम सिंड्रोम तो बहुत बाद की बात है, भारत में तो ये सैकड़ों सालों से आदर्श रूप में स्थापित हो चुका है।

इतिहास 1528 से शुरु नहीं होता, इसलिए हिसाब भी पहले से होगा

इतना सब कुछ हो गया इस देश में, लाखों मारे गए। आस्था और संस्कृति की रीढ़ तोड़ने के लिए मंदिर ध्वस्त किए गए, पांडुलिपियों के पुस्तकालयों में आग लगा दी गई और यहाँ के वामपंथियों को लगता है कि अन्याय बाबरी मस्जिद का टूटना है? बाबरी मस्जिद का टूटना भले ही भारतीय कानून की दृष्टि में एक आपराधिक घटना है, लेकिन हिन्दुओं के इतिहास के हिसाब से यह उस आस्था के साथ न्याय है जिसके मंदिर की दीवार पर मस्जिद खड़ी की गई थी।

इसलिए इतिहास और अन्याय का दौर 1528 या 1992 से शुरु नहीं होता, वो तब से शुरु होता है जब से इस्लामी आक्रान्ताओं ने इस धरती पर लूट-पाट के इरादे से कदम रखा था। अन्याय वहाँ से शुरु हुआ और आज तक होता आया है, बस सत्ता और सरकारें बदलती रहीं। रामलला इंतजार में रहे, हिन्दू प्रतीक्षारत रहा, किसी की हत्या नहीं की, दंगे नहीं किए, किया तो बस इंतजार कि हे राम, आओ और अपने अनुयायियों को शक्ति दो कि वो तुम्हें तुम्हारी जगह पर पूज सके।

‘द वायर’ के अमेरिकी मालिक सिद्धार्थ वरदराजन का एक गटरछाप विडियो आया था जिसमें उसने यह कहा कि ‘जिसने हिंसा की, उसी को उपहार में वह जगह दे दी गई’। वरदराजन के माँ-बाप ने उसके नाम के दोनों हिस्से सोच समझ कर रखे होंगे क्योंकि सिद्धार्थ को ज्ञान मिलता है तब वो गौतम बनता है, और वरदराज की पहली कहानी तो आप सबको याद ही है! यह मूर्ख व्यक्ति, या कहिए धूर्त पत्रकार, विडियो में खूब शमाँ बाँध कर बताता है कि कथित अल्पसंख्यकों के साथ अन्याय हो गया और कोर्ट ने बिलकुल गलत फैसला किया।

और इसकी टाइमलाइन भी 1528 से ही शुरु होती है क्योंकि अजेंडा है बेचारे का। सुबह में इसके पोर्टल पर डी एन झा जैसे बेहूदे आदमी का बयान छपा था जो कहता पाया गया कि तुलसी के मानस में अयोध्या के तीर्थ स्थल होने का जिक्र नहीं है। जिक्र तो डी एन झा के बाप का भी नहीं है मानस में, तो क्या यह मान लिया जाए कि वो अंडे से फूट कर निकले थे और बाप को देखा ही नहीं?

वरदराजन और उसके जैसे कई लम्पटों का कहना है कि उनसे यह क्यों पूछा गया कि वो साबित करें कि नमाज पढ़ी जाती थी, क्योंकि मस्जिद है तो नमाज होती ही होगी। लेकिन वायर का यह प्रपंची मुखिया यह भूल गया कि उससे पहले मंदिर था, जहाँ मस्जिद बनने से बीस साल पहले गुरु नानक देव के वहाँ जाने का, पूजा करने का जिक्र है। और हाँ, अगर ‘पहले क्या था’ वाला गेम और खेलोगे तो इस्लाम का इतिहास चौदह सौ साल पहले खत्म हो जाता है, और हिन्दुओं के पुराण, उपनिषद, ग्रंथ, महाकाव्य, वेद आदि से ले कर राजा, चक्रवर्ती सम्राट और वंशावली आदि इस्लाम के अभ्युदय से हजारों साल पहले तक जाती है। और जो हुआ, वो इसी धरती पर हुआ है।

इसलिए, कामपंथी वामभक्त माओनंदनों और जिहादी आतंकियों के हिमायतियों और भारत में मजहबी हिंसा का जहर घोलने वालों के लिए इतिहास तभी से शुरु होता है, जब से उनके मन को सही लगे। इसलिए आप देखेंगे कि हर पोर्टल, चाहे वो वायर हो, बिग बीसी हो, टेलिग्राफ जैसे बंद होते अखबार हों या वामपंथियों के खानदानी स्तंभकार, हर कोई यही लिख रहा है कि जिसने मस्जिद तोड़ी, उसी को जमीन दे दी गई।

ओवैसी बेचारा वैसे ही अपने लोगाँ के बीच कहता फिर रहा कि ‘घर मेरा तोड़े ना? तो घर मेरे को मिलना ना? तोड़ने वाले को मिलना? बोलो आप, जिसका घर तोड़े उसको मिलना ना?’। बेचारा बीच में अंग्रेजी में बोला ‘व्हाट ए वंडरफुल आइडिया’, भीड़ को कुछ समझ में नहीं आया, वो बस ओवैसी को अंग्रेजी बोलता देख ही हो-हो करने लगे।

अब ओवैसी से एक हिन्दू पूछे कि ‘1528 में मेरा घर में घुस के, मेरा मकान तुम लोग तोड़े ना? तो कायदे से घर तो उसका हुआ ना? उसको मिलना ना?’ तो ओवैसी बोलेगा कि उतना पुराना कायकू याद रखना, 1992 वाला नजदीक का होता, उसको याद रखने का। तब से नापने का कि किसका घर किदर से शुरू होता, किदर को खत्म होता… ऐसा नहीं चलता ओवैसी जी, आप टाइम के बाद आए, टाइम आपके बाद नहीं आया। ये बाताँ समझने का!

वो जो उकसाते थे, मजे लेते थे, उनके धुआँ निकल रहा है

ऑल्टन्यूज के गंजे संस्थापक प्रतीक सिन्हा जैसे लौंडों ने ट्विटर पर साल याद दिला-दिला कर मजे लिए थे। वो पूछते थे कि कब बनेगा मंदिर, अब तो भाजपा भी आ गई। हिन्दुओं ने कुछ नहीं कहा, बस इंतजार किया क्योंकि साठ सालों से राजनैतिक स्तर पर दोयम दर्जे का नागरिक बन चुके हिन्दू कभी कुछ नहीं कहते। इसीलिए, दुर्गा को वेश्या कहा जाता है, त्रिशूल पर कंडोम चढ़ाया जाता है, कृष्ण को मोलेस्टर बताया जाता है, सरस्वती की नग्न पेंटिंग बनती है, और हिन्दू चुप रहता है।

हिन्दू चुप इसलिए रहता है क्योंकि वो सहिष्णुता का वैश्विक मानदंड है। है कोई मजहब या रिलीजन जिसमें हिन्दुओं-सी सहिष्णुता हो? जिसने दूसरे मजहब के देशों पर कभी भी आक्रमण न किया हो? लेकिन, कमलेश तिवारी को कोर्ट भी अपराधी नहीं साबित कर पाई, और उसका गला बेरहमी से रेत दिया। ये है हमारे देश का हिन्दू कि उसकी मंदिर पर मस्जिद बना दी गई, और जब दो भाइयों ने उस पर झंडा लहराया, तो उसे घर से निकाल कर गोली मार दी गई।

हिन्दू तब भी चुप रहा। हिन्दू, प्रतीक सिन्हा जैसे दो कौड़ी के लौंडों के छेड़ने पर चुप रहा क्योंकि उसकी आस्था जानती है कि समय का पहिया घूमता है और कण-कण में जाग्रत ईश्वर, उसकी परीक्षा भी लेंगे, और उसके संतोष का, उसकी प्रतीक्षा का, उसके स्नेह और लगन का प्रतिफल भी देंगे। इसलिए ट्रोलों की पूरी फौज, वामपंथियों की पूरी लॉबी, गुंडों के गिरोह और पत्रकारिता के समुदाय विशेष की सतत चिरकुटई को सुप्रीम कोर्ट का जब तमाचा पड़ा, तो वो दस दिन पहले तक ‘कोर्ट का फैसला सबको मान्य होना चाहिए’ पर पलट गए, पिनक गए, उनकी सुलग गई और स्थान विशेष से धुआँ निकलने लगा।

ज्ञान की बातें करने वाले लोग

कॉन्ग्रेस की डूबती नैया से पानी उपछता नेशनल हेरल्ड, जिसके मालिकों ने नेहरू से ले कर राजीव-सोनिया-राहुल तक, हर संभव प्रयास किया कि तुष्टीकरण का फायदा उन्हें मिलता रहे, दार्शनिक अंदाज में लिखता है कि ‘क्या रक्तपात, हिंसा और जबरदस्ती के बाद बने मंदिर में भगवान रह पाएँगे? क्या ऐसे मंदिर में प्रार्थना कभी सुनी जाएगी अगर भगवान वहाँ रहना भी चाहें?’

इसमें दो-तीन बातें हैं, जो नेशनल हेरल्ड के एडिटर को गौर से देखनी चाहिए। पहली यह कि हिन्दुओं के पास एक रामबाण इलाज है: गंगा जल, जहाँ छिड़क दो पवित्र हो जाता है। दूसरी बात, वहाँ भगवान रहें या न रहें, कॉन्ग्रेसियों को क्या? अपनी देवी को पूजते रहो, भला तो वहीं से होता है। तीसरी बात, हिन्दुओं का रहने दो कि प्रार्थना सुनी जाएगी कि नहीं, हाँ, ये ज़रूर है कि मौसमी हिन्दू बने जनेऊधारी दत्तात्रेय गोत्र के क्रॉसब्रीड या चुनावों के समय गंगा की बेटी बन कर घूमने वालों की प्रार्थना तो वोटर ने ही नहीं सुनी, भगवान तो बिलकुल नहीं सुनेंगे।

इसके बाद आते हैं स्कूल-कॉलेज वाले, तस्लीमा नसरीन टाइप लोग। इन्हें लगता है कि वो जमीन है, वैसी ही जमीन जो कहीं भी हो सकती है। अपनी खुद की जमीन खो चुकी तस्लीमा नसरीन आज भी ‘घर से बेघर’ होने को ले कर नोस्टैल्जिक हो जाती हैं, और ट्वीट करती हैं कि ‘आशा करती हूँ मेरे रहने की परमिट खत्म नहीं की जाएगी’, लेकिन अयोध्या में हॉस्पिटल बनना चाहिए!

अयोध्या में वहाँ मंदिर थे, तीन बड़े मंदिर: रामजन्मभूमि, जिस पर बाबर ने अपने नाम के साथ ‘मस्जिद-ए-जन्मस्थान’ बनवा दी; ठाकुर का मंदिर और स्वर्गद्वार मंदिर, एक को औरंगजेब ने तोड़ दिया गया, और तीसरे पर भी वहाँ मस्जिद बना दी गई। इसलिए, ऐसे लोगों को यह जानना चाहिए कि स्कूल-अस्पताल के लिए बहुत जमीन है। तमाम मंदिरों के ट्रस्ट स्वयं ही अस्पताल और स्कूल चला रहे हैं। राममंदिर का भी ट्रस्ट बनेगा तो स्कूल-कॉलेज खुलेगा।

वामपंथियों की बिलबिलाहट और लोगों की खुशी

जहाँ आम भारतीय, हिन्दू और कई दूसरे मजहब के लोगों समेत, इस बात पर प्रसन्न हैं कि जो भी हुआ, इतने सालों बाद फैसला तो आया, वहीं जेएनयू के कामरेडों से ले कर बड़े मीडिया संस्थानों के पत्रकार और कुख्यात विचारक नाखुश हैं। कोई कह रही है कि ‘सुन्नी वक्फ बोर्ड को दी गई पाँच एकड़ जमीन पर भारत की शानदार लोकतांत्रिक विरासत और उदारवादी धर्मनिरपेक्ष संविधान का ‘भव्य’ मकबरा बना दिया जाए?’

ये तो आपका मसला है कि जो पाँच एकड़ मिले हैं वहाँ मदरसा खुलवा दो, मस्जिद बनवा लो, किसी की चौदहवीं बीवी का मकबरा बनवा लो, मॉल बनवा लो या पंक्चर की दुकान लगा दो। ये सुन्नी वक्फ बोर्ड का मसला है, वो जो चाहें करें, किसी को कोई आपत्ति नहीं क्योंकि यही बात सालों से हिन्दू पक्ष कह रहा था कि प्यार से दे दो जमीन, वरना कानूनी लड़ाई में हारोगे और बाद में रोते फिरोगे।

अयोध्या नहीं दी, तो लड़ कर ले ली गई। आगे काशी है, मथुरा है, वृंदावन है… क्या करें हमारे देवी-देवता ही इतने हैं, और सबके लिए हमने कश्मीर से कन्याकुमारी तक ‘भव्य’ मंदिर बनवाए थे। अब आतंकियों ने उन्हें तोड़ कर अपने मस्जिद या महल बनवा लिए तो, एक शेर याद आता है कि ‘ब्रो, सब दिन होत न एक समाना’। जो हमारा है, जो हमारा था, वो चाहे दबा दो धरती के नीचे या आग लगा कर हमारी किताबें जला दो, खुदाई में मूर्तियाँ निकलेंगी, और दिमाग की स्मृतियों से वापस सारी किताबें भी लिख लेंगे।

कुछ लोग तो राममंदिर के फैसले का हिन्दुओं के पक्ष में जाने से ज्यादा इस बात पर आह्लादित हैं कि लिबरलों और वामपंथियों में खलबली मची हुई है कि क्या-क्या लिख दें, क्या-क्या बोल दें! कोई ये कहता फिर रहा है कि हिन्दू राष्ट्र बनने वाला है, कोई कह रहा है कि न्यायपालिका सरकार की नौकरी में जुट गई है, कोई ये भी कह रहा है कि अब यो काशी-मथुरा भी माँगेंगे! हिन्दू राष्ट्र और जुडिशरी के सरकार की नौकरी में जुटने की बात का तो पता नहीं, पर हाँ, काशी-मथुरा तो बाकी है ही!

एनडीटीवी वाले नाच रहे हैं कि उनके दोनों चैनल अयोध्या के फैसले वाले दिन नंबर एक पर ट्रेंड कर रहे थे। ट्रेंड करने के कई मतलब हो सकते हैं, लेकिन ‘जाकी रही भावना जैसी’ के तर्ज पर उन्हें लग रहा है कि वो कुछ क्वालिटी न्यूज दे रहे थे। जबकि, इसके उलट सत्य यह हो सकता है कि लोग ये देखने को जा रहे हों कि आखिर एनडीटीवी वाले क्या बेहूदगी कर रहे हैं। जैसे कि, लोकसभा चुनावों के परिणाम या बड़े विधानसभा चुनावों के परिणामों को दिन लोग रवीश कुमार का चेहरा देखने के लिए एनडीटीवी ऑन कर लेते हैं। इसका मतलब ये थोड़े ही है कि तुम बढ़िया काम कर रहे हो!

रही बात वामपंथियों के ट्वीट, पोस्ट, लेख, स्तम्भ, विडियो आदि की, तो हमारा यही मानना है कि ‘बोलने दे, तकलीफ़ हुआ है बेचारों को’।

महाराष्ट्र में सरकार नहीं बनाएगी BJP, निरुपम ने कहा- शिवसेना के साथ गई तो डूब जाएगी कॉन्ग्रेस

भाजपा महाराष्ट्र में सरकार नहीं बनाएगी। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष चंद्रकांत पाटिल ने रविवार को राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी से मुलाकात के बाद यह जानकारी दी। उन्होंने कहा कि जनादेश भाजपा और शिवसेना को सरकार चलाने के लिए मिला था। यदि कॉन्ग्रेस-एनसीपी के साथ मिल कर शिवसेना सरकार चलाना चाहती है तो उन्हें हमारी शुभकामनाएँ है।

पाटिल ने अफ़सोस जताते हुए कहा कि शिवसेना और भाजपा को बहुमत मिलने के बावजूद सरकार का गठन नहीं हो सका है। उन्होंने शिवसेना पर जनादेश का अपमान करने का आरोप लगाया। पाटिल ने बताया कि भाजपा ने राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी को बता दिया है कि उनकी पार्टी सरकार का दावा पेश नहीं करेगी।

इससे पहले मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व में भाजपा नेताओं ने राज्यपाल से मुलाक़ात की। राज्यपाल ने सबसे बड़ा दल होने के नाते भाजपा को सरकार गठन करने के लिए आमंत्रित किया था। इसके बाद मुंबई में भाजपा की 2 महत्वपूर्ण बैठकें हुईं। इन बैठकों के बाद नेतागण राज्यपाल से मिलने पहुँचे।

वहीं, एनसीपी ने कहा है कि महाराष्ट्र कोई गोवा और कर्नाटक नहीं है कि भाजपा विधायकों को खरीद लेगी। एनसीपी नेता जीतेन्द्र अहवत ने शिवसेना के साथ गठबंधन की संभावनाओं को नकारते हुए इन्तजार करने को कहा है। उधर, कॉन्ग्रेस विधायक दल की बैठक के बाद पार्टी नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि जनता ने कॉन्ग्रेस से विपक्ष में बैठने को कहा है और उनकी पार्टी यही करेगी। हालाँकि, उन्होंने ये भी कहा कि आलाकमान जो भी निर्णय लेगा, वैसा ही किया जाएगा। खड़गे ने गेंद कॉन्ग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के पाले में डाल दी।

मुंबई कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष संजय निरुपम ने भी शिवसेना के साथ गठबंधन कर सरकार बनाने की अटकलों पर प्रतिक्रिया दी। निरुपम ने कहा कि कॉन्ग्रेस में कुछ ऐसे नेता हैं, जो शिवसेना के साथ सरकार बनाने के लिए बेचैन नज़र आ रहे हैं। संजय ने अपनी पार्टी को चेताया कि भले ही इस क़दम से उसे कुछ दिनों के लिए फायदा मिल जाए, लेकिन बाद में इससे भारी घाटा होगा। पार्टी डूब जाएगी। उन्होंने चेताया कि अगर शिवसेना के साथ गठबंधन हुआ तो दूसरे राज्यों में अन्य सहयोगी दल कॉन्ग्रेस का साथ छोड़ देंगे।

उधर, शिवसेना नेता संजय राउत ने कहा कि महाराष्ट्र में अब शिवसेना का मुख्यमंत्री बनेगा। शिवसेना के मुखपत्र सामना के एग्जीक्यूटिव एडिटर संजय राउत ने कहा कि शिवसेना सरकार बनाने जा रही है। हालाँकि, उसके लिए पार्टी कौन सा कॉम्बिनेशन आजमाने जा रही है, इस सम्बन्ध में उन्होंने कुछ भी कहने से इनकार किया।

ख़ून-ख़राबे से बने मंदिर में भगवान भले आ जाएँ, पूजा करने कौन जाएगा: कॉन्ग्रेसी मुखपत्र का प्रोपगेंडा

कॉन्ग्रेस के मुखपत्र ‘नेशनल हेराल्ड’ में एक अजीबोगरीब लेख प्रकाशित कर राम मंदिर मामले में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का विरोध किया है। सुजाता आनंदन ने इस लेख में लिखा है कि उन्होंने जब 1992 में बाबरी विध्वंस की ख़बर सुनी, तभी उन्होंने यह फ़ैसला किया था कि यदि यहाँ मंदिर बनता भी है तो वे कभी पूजा करने नहीं जाएँगी। सुजाता ने लिखा कि वो किसी ऐसी जगह पर मंदिर को देखना ही नहीं चाहती हैं, जहाँ पहले मस्जिद रहा हो। उन्होंने दावा किया कि इस संघर्ष में ख़ूब ख़ून-ख़राबा हुआ है और भगवान कभी ऐसा नहीं चाहेंगे कि ख़ून की इन बूँदों से मंदिर की शुद्धता भंग हो।

सुजाता ने दावा किया कि अगर वहाँ मंदिर बन भी जाता है और हिन्दू देवी-देवता वहाँ आकर रहने भी लगते हैं, तब भी मंदिर की दीवारों के बीच निर्दोष लोगों की चीखें गूँजती रहेंगी। उन्होंने हिन्दुओं की ठेकेदारी का ढोंग करते हुए लिखा कि उन्हें पूर्ण विश्वास है कि ऐसी परिस्थितियों में उनकी प्रार्थनाएँ शायद ही सुनी जाएँगी। सुजाता ने कॉन्ग्रेस के मुखपत्र में लिखा कि ये सारी चीजें क़ानूनी फ़ैसलों और व्यक्तिगत विचारधारा से परे है। पूर्व उप-प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी पर आरोप लगाते हुए सुजाता ने लिखा कि उन्होंने देवी-देवताओं की चाँदी की मूर्तियों को पिघला कर उससे हथियार बनाए।

सुजाता ने पूछा कि क्या भगवान बल-प्रयोग, हिंसा और ख़ून-ख़राबे के प्रयोग से बने मंदिर में कभी भी रहना चाहेंगे? उन्होंने पूछा कि अगर भवन वहाँ रहने का निर्णय ले भी लेते हैं, तो भी क्या लोगों की प्रार्थनाएँ सफल हो पाएँगी? सुजाता ने इस लेख में हिन्दुओं के प्रति घृणा दिखाते हुए ख़ुद को हिन्दुओं का ठेकेदार बताने की कोशिश है और कई अन्य आपत्तिजनक चीजें लिखी हैं।

सुजाता ने लिखा है कि आडवाणी ने प्रधानमंत्री का पद पाने के लिए राम मंदिर आंदोलन में हिस्सा लिया, जो न तो उन्हें कभी मिला और न ही आगे मिलेगा। अडवाणी की आलोचना करते हुए सुजाता ने आगे लिखा कि उनका पीएम न बनना ‘कर्म के फल’ की विचारधारा में उनका विश्वास पक्का करता है। आडवाणी पर उन्होंने निर्दोषों का ख़ून बहाने का आरोप भी लगाया। सुजाता ने ‘नेशनल हेराल्ड’ में लिखा कि आडवाणी के साथ जब भी कुछ बुरा होता है तो उन्हें ख़ूब ख़ुशी होती है। साथ ही वो नरेंद्र मोदी पर आडवाणी के साथ दुर्व्यवहार करने का आरोप लगाना भी नहीं भूलीं।

सुप्रीम कोर्ट की आलोचना करते हुए सुजाता आनंदन ने लिखा है कि राम मंदिर पर शीर्ष अदालत का फ़ैसला केंद्र सरकार से डर कर लिया गया है। साथ ही भविष्य में किसी अनहोनी की आशंका जताते हुए सुजाता ने लिखा है कि अल्पसंख्यक शांत नहीं बैठेंगे। इसके बाद सुजाता ने शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे का भी जिक्र किया है। सुजाता ने लिखा है कि अगर मान भी लिया जाए कि भगवान राम का जन्म अयोध्या में हुआ था, तब भी वहाँ मंदिर बनाना अल्पसंख्यकों के साथ क्रूरता होगी। सुजाता ने दावा किया कि ठाकरे मंदिर-मस्जिद की जगह अयोध्या में हॉस्पिटल या स्कूल चाहते थे।

सुजाता ने अयोध्या विवाद पर फैसला सुनाने वाले पाँचों जजों (जिनमें भारत के मुख्य न्यायाधीश और भावी मुख्य न्यायाधीश शामिल हैं) के लिए लिखा है कि उन्होंने बुद्धिमत्ता के परिचय नहीं दिया। महाराष्ट्र संकट पर टिप्पणी करते हुए सुजाता ने लिखा है कि उद्धव ठाकरे मंदिर निर्माण के लिए क्रेडिट लेना चाहते हैं और इसीलिए पार्टी नखरे कर रही है। उन्होएँ आरोप लगाया कि उद्धव अपने पिता बाल ठाकरे के उलट सोच रहे हैं। वहीं इस लेख में शरद पवार को सम्मान दिया गया है, क्योंकि उन्होंने ‘शांति रखने की अपील’ की है। साथ ही ‘मॉब लिंचिंग’ नैरेटिव को आगे बढ़ाते हुए सुजाता ने भविष्य में बड़ी अनहोनी की आशंका के साथ अपने लेख को समाप्त किया।

212 स्तम्भ, 5 द्वार: कुछ ऐसा होगा अयोध्या का भव्य राम मंदिर, 1990 से ही चल रहा है काम

अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले से अब भगवान राम के मंदिर निर्माण का रास्ता साफ़ हो गया है। ऐसे में लोगों के ज़ेहन में एक बात ज़रूर आती होगी कि आख़िर कैसा होगा भव्य राम मंदिर? दरअसल, वर्षों से अयोध्या में दरवाज़ों और स्तम्भों को तराशने का काम जारी है। जहाँ रामलला को स्थापित किया जाएगा और उनकी पूजा की जाएगी, वो गर्भगृह आकार में काफ़ी बड़ा होगा। ऐसा कहा जा रहा है कि इसकी दीवारें तैयार हो चुकी हैं, लेकिन अभी ‘गर्भगृह’ का निर्माण होना बाक़ी है।

ख़बर के अनुसार, मंदिर में कुल 212 स्तम्भ होंगे। इनमें से लगभग आधे स्तम्भ तैयार हो गए हैं, जबकि आधे स्तम्भों पर नक्काशी होनी बाक़ी है। अनुमोदित डिज़ाइन के अनुसार, छत पर एक “शिखर” होगा, जो विशाल राम मंदिर की भव्यता को प्रदर्शित करेगा।

प्रस्तावित मंदिर की ऊँचाई 128 फीट, चौड़ाई 140 फीट और लंबाई 270 फीट होगी। बता दें कि इस विशाल मंदिर को विशिष्ट बनाने के लिए स्टील का कोई उपयोग नहीं किया जाएगा। इसके अलावा, राम मंदिर में 5 प्रवेश द्वार होंगे: सिंह द्वार, नृत्य मंडप, रंड मंडप, पूजा कक्ष और परिक्रमा के लिए सबसे महत्वपूर्ण ‘गर्भगृह’। रामलला की मूर्ति को भूतल पर ही रखा जाएगा।

मंदिर के पूर्ण निर्माण के लिए कम से कम 1.75 लाख क्यूबिक फीट बलुआ पत्थर की आवश्यकता होगी, जैसी कि इसकी कल्पना भी की गई थी। मंदिर निर्माण कार्य की शुरूआत 1990 की शुरुआत से ही हो गई थी लेकिन अभी भी काई कार्य बाकी हैं। यह एक आसान काम नहीं होगा, लेकिन काम पूरी तरह से ख़त्म करने के लिए कम से कम 4 साल का समय लग जाएगा।

विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष आलोक कुमार ने बताया, “काम ख़त्म होने से संबंधित मैं आपको कोई समय सीमा नहीं दे सकता। लेकिन हम चाहते हैं कि निर्माण जल्द से जल्द शुरू हो।”

समय अधिक लगने के मुख्य कारणों में से एक कारण ‘कार्यशाला’ तक सामान पहुँचाना है। सड़कें समतल नहीं हैं, इसलिए पत्थरों की आपूर्ति भी धीमी है। इसके अलावा, हाथ की नक्काशी प्रक्रिया काम को धीमा कर देती है। हालाँकि, भूतल का काम ख़त्म हो गया है।

नमाज तो कहीं भी पढ़ लेंगे, मुस्लिमों को स्कूल की ज़रूरत: अयोध्या फैसले पर सलीम खान

अयोध्या विवाद मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने शनिवार (9 नवंबर) को अपना ऐतिहासिक फ़ैसला सुनाया। पाँच जजों की संवैधानिक पीठ ने 40 दिनोंं की सुनवाई के बाद विवादित ज़मीन पर राम लला के पक्ष में निर्णय सुनाया, जिसका स्वागत सभी ने किया। अदालत ने मस्जिद के लिए मुस्लिमों को भी पॉंच एकड़ जमीन उपलब्ध कराने का निर्देश सरकार को दिया है।

हिन्दी सिनेमा जगत के जाने-माने कलाकार सलमान ख़ान के 83 वर्षीय पिता सलीम ख़ान ने इस फ़ैसले का स्वागत करते हुए कहा कि अयोध्या में मुस्लिम पक्ष को मिलने वाली पाँच एकड़ ज़मीन पर स्कूल बनाया जाना चाहिए। उनका कहना है कि मुस्लिमों को मस्जिद नहीं बल्कि स्कूल की ज़रूरत है। उन्होंने कहा, 

“फ़ैसला आने के बाद जिस तरीके से शांति और सौहार्द्र कायम रही यह प्रशंसनीय है। अब इसे स्वीकार कीजिए… एक पुराना विवाद समाप्त हुआ। मैं तह-ए-दिल से इस फ़ैसले का स्वागत करता हूँ। मुस्लिमों को अब इसकी (अयोध्या विवाद) चर्चा नहीं करनी चाहिए। इसकी जगह उनको बुनियादी समस्याओं की चर्चा करनी चाहिए और उसे हल करने की कोशिश करनी चाहिए। मैं ऐसी चर्चा इसलिए कर रहा हूँ कि हमें स्कूल और अस्पताल की ज़रूरत है। अयोध्या में मस्जिद के लिए मिलने वाली पाँच एकड़ जगह पर कॉलेज बने तो बेहतर होगा।”

पटकथा लेखक सलीम ख़ान ने कहा, “हमें मस्जिद की ज़रूरत नहीं, नमाज तो हम कहीं भी पढ़ लेंगे…ट्रेन में, प्लेन में,ज़मीन पर, कहीं भी पढ़ लेंगे। लेकिन हमें बेहतर स्कूल की ज़रूरत है। तालीम अच्छी मिलेगी 22 करोड़ मुस्लिमों को, तो इस देश की बहुत सी कमियाँ ख़त्म हो जाएँगी।”

बालीवुड में कई ब्लॉकबस्टर फिल्में और इसका फॉर्मूला देने वाले फिल्म लेखक ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी शांति पर ज़ोर देते हैं। उन्होंने कहा,

“मैं प्रधानमंत्री से सहमत हूँ। आज हमें शांति की ज़रूरत है, हमें अपने उद्देश्य पर फोकस करने के लिए शांति चाहिए। हमें अपने भविष्य पर सोचने की ज़रूरत है। हमें पता होना चाहिए कि शिक्षित समाज में ही बेहतर भविष्य है। मुख्य मुद्दा यह है कि मुस्लिम तालीम में पिछड़े हैं, इसलिए मैं दोहराता हूँ कि आइए हम इसे (अयोध्या विवाद को) द एंड कहें और एक नई शुरुआत करें।”

सलीम ख़ान के अलावा अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के पूर्व कुलपति लेफ़्टिनेंट जनरल (रिटायर) जमीरउद्दीन शाह ने भी ऐसा ही कुछ कहा। अयोध्या फ़ैसले पर आधारित NDTV के एक चर्चा के कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि मुस्लिमों को दी जाने वाली ज़मीन पर स्कूल या अस्पताल का निर्माण क्यों नहीं कर लेना चाहिए? अयोध्या में पहले से ही पर्याप्त मस्जिदें हैं। 

चर्चा के इस कार्यक्रम में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को स्वीकार करते हुए उसका स्वागत तो किया, लेकिन कोर्ट के बाहर इस मसले को हल न कर पाने पर निराशा भी जताई। उन्होंने कहा कि पाँच एकड़ ज़मीन को स्वीकारने में भले ही कुछ मुस्लिमों को दिक्कत हो रही है और वो कह रहे हैं कि उन्हें वो ज़मीन नहीं चाहिए। लेकिन उस ज़मीन को स्वीकार लेना चाहिए और उस पर मस्जिद की बजाय स्कूल या अस्पताल बनवा देना चाहिए।