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कौन जज क्या फैसला सुना रहे, नहीं छापे मीडिया: पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट की अपील, दिया ‘संवेदनशील’ मामले का उदाहरण

पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने मीडिया से अपील की है कि कोर्ट की सुनवाई, आदेश और फैसलों की रिपोर्टिंग के दौरान जजों के नाम प्रकाशित न किए जाएँ, यह अपील विशेष रूप से संवेदनशील मामलों को ध्यान में रखते हुए की गई है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल ने एक लिखित पत्र के माध्यम से इस अपील को पत्रकारों तक पहुँचाया है। इस पत्र में कहा गया है कि, “हाईकोर्ट के माननीय जजों की सुरक्षा के मद्देनजर, रिपोर्टिंग करते समय उनके नाम प्रकाशित न किए जाएँ।”

यह कदम हाल ही में अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में हुई एक घटना के बाद उठाया गया है। जहाँ सितंबर में व्यक्ति ने हाईकोर्ट के एक जज के निजी सुरक्षा अधिकारी (पीएसओ) से हथियार छीनकर आत्महत्या कर ली थी। इस घटना के बाद हाईकोर्ट ने खुद इस मामले का संज्ञान लेते हुए एक स्वतः संज्ञान (सुओ मोटो) मामला शुरू किया था।

चीफ जस्टिस शील नागू और जस्टिस अनिल क्षेत्रपाल की बेंच ने उस घटना के बाद संबंधित जज की सुरक्षा को बढ़ाने और पंजाब पुलिस को उनकी सुरक्षा व्यवस्था से हटाने का आदेश दिया था।

हालाँकि, यह स्पष्ट नहीं है कि मीडिया को यह निर्देश उस घटना के मद्देनजर जारी किया गया है या किसी अन्य कारण से। हाईकोर्ट ने इस अपील को जजों की सुरक्षा के लिए जरूरी बताया है, खासतौर पर संवेदनशील मामलों में जहाँ जजों की जान को खतरा हो सकता है। मीडिया से उम्मीद की गई है कि वह इस अपील का सम्मान करते हुए न्यायिक प्रक्रिया और जजों की गोपनीयता और सुरक्षा सुनिश्चित करेगा।

बांग्लादेश से कोलकाता आओ, भारतीय पासपोर्ट बनवाओ… सिर्फ 3 लाख रुपए में: 30000 बांग्लादेशी ऐसे ही बने भारत के नागरिक, गिरोह का हुआ पर्दाफाश

भारत में अवैध रूप से घुसकर बांग्लादेशी और रोहिंग्या मुस्लिमों ने फर्जी पासपोर्ट बनवाए और यूरोपीय देशों तक पहुँच गए। इनमें इटली, फ्रांस सहित कई विकसित देश शामिल हैं। ऐसे लोगों की संख्या हजारों में तक बताई जा रही है। इस बात की जानकारी कोलकाता पुलिस ने विदेश मंत्रालय को भी दी है। इस बात का खुलासा हाल ही में फर्जी पासपोर्ट बनाने वाले गिरोह के पर्दाफाश से हुआ है।

कोलकाता पुलिस ने पिछले कुछ दिनों में ऐसे पाँच लोगों को गिरफ्तार किया है। इनमें डाकघर के दो संविदा कर्मचारी- दीपंकर दास और दूसरा दीपक मंडल भी शामिल हैं। इस गिरोह का सरगना समरेश बिश्वास और उसका बेटा रिपन बिश्वास है। दोनों फिलहाल पुलिस की गिरफ्त में हैं। वहीं, जाँच एजेंसियाँ इस मामले में कई डाकघरों के साथ-साथ पासपोर्ट सेवा केंद्रों की भूमिका की भी जाँच कर रही है।

पुलिस का अनुमान है कि इस पूरे फर्जीवाड़े में कई और लोग शामिल हो सकते हैं। एजेंसियों को आशंका है कि संविदा कर्मचारियों के अलावा भारतीय डाक विभाग के कुछ स्थायी कर्मचारियों भी इस रैकेट का हिस्सा हो सकते हैं। खास करके बांग्लादेश के साथ राज्य की अंतरराष्ट्रीय सीमाओं से सटे गाँवों से संचालित होने वाले डाक विभाग के केंद्र ज्यादा निगाह पर हैं। 

पुलिस को पता चला है कि पिछले कुछ महीनों में फर्जी पासपोर्ट गिरोह के सदस्यों ने बांग्लादेशियों को भारतीय बताकर 121 पासपोर्ट बनाए हैं। इनमें से 73 पासपोर्ट क्षेत्रीय पासपोर्ट प्राधिकरण द्वारा जारी किए गए हैं। बाकी 48 पासपोर्ट के बनने का इंतजार था। हालाँकि, अब इन आवेदनों को खारिज कर दिया गया है। यहाँ स्थिति ऐसी है कि आतंकी भी आसानी से पासपोर्ट बनवा सकते हैं।

दरअसल, यह गिरोह भारत में अवैध रूप से आने वाले बांग्लादेशियों का सबसे पहले फर्जी दस्तावेज बनाते थे। इनमें बांग्लादेशियों के नाम पर नकली मतदाता पहचान पत्र, आधार कार्ड आदि प्रमुख दस्तावेज हैं। इन दस्तावेजों के आधार पर अन्य जरूरी दस्तावेज हासिल करते थे और उसे कोलकाता के विभिन्न क्षेत्रों में फर्जी पते से पासपोर्ट के लिए आवेदन करते थे।

गिरोह का सरगना समरेश बिश्वास एक पासपोर्ट के लिए इन बांग्लादेशियों से दो से पाँच लाख रुपए तक लेता था। दैनिक जागरण की रिपोर्ट के मुताबिक, कोलकाता से गिरफ्तार पोस्ट ऑफिस पासपोर्ट सेवा केंद्र के संविदा कर्मचारी दीपंकर दास ने गैजेट से जानकारी मिली कि गिरोह ने लगभग 30,000 व्यक्तियों (मुख्य रूप से बांग्लादेशी) के जाली पासपोर्ट तैयार किए थे। उन सबके नाम मिले हैं।

दरअसल, मालदा जिले में लोगों के भारी संख्या में पासपोर्ट बनने के बाद खुफिया एजेंसियों के कान खड़े हो गए। इस बीच जानकारी मिली कि मालदा में पिछले एक साल में ही 16,000 से अधिक पासपोर्ट बने हैं। पता चला कि मालदा के वैष्णवनगर, कालियाचक, हबीबपुर में भारत-बांग्लादेश सीमा पार करके कई बांग्लादेशी भारतीय पासपोर्ट बनवा रहे हैं।

दरअसल, पश्चिमी देशों में बांग्लादेशियों को आसानी से वीजा नहीं मिलता। इसलिए बांग्लादेशी भारतीय पासपोर्ट बनवाते हैं, ताकि वीसा के साथ-साथ वहाँ आसानी से नौकरी भी मिल जाए। गिरोह का खुलासा होने के बाद अब राज्य खुफिया विभाग पासपोर्ट के आवेदकों से 1971 के पहले के दस्तावेज दिखाने की माँग कर रहा है।

यूपी ATS ने भी पिछले साल किया था खुलासा

उत्तर प्रदेश ATS ने हिन्दू नाम से भारतीय लोगों के फर्जी दस्तावेज लगाकर बांग्लादेशी और रोहिंग्या मुसलमानों को विदेश भेजने वाले रैकेट का नवंबर 2021 को पर्दाफाश किया था। ATS ने इस रैकेट से जुड़े एक आरोपित को सहारनपुर से गिरफ्तार किया है। आरोपित का नाम अजय घिल्डियाल था, जो एयर इंडिया के कस्टमर केयर में काम करता था।

अजय पर अब तक लगभग 40 लोगों को फर्जी दस्तावेजों के सहारे स्पेन, ब्रिटेन सहित अन्य यूरोपीय देशों भेजे जाने का आरोप लगे थे। ATS ने बांग्लादेश और म्यांमार से मुस्लिमों को भारत में हिन्दू नाम से प्रवेश करवाने वाले रैकेट का खुलासा किया था। इस मामले में मानव तस्करी गिरोह का मददगार विक्रम को गाज़ियाबाद और समीर मंडल को भी पश्चिम बंगाल के 24 परगना से गिरफ्तार किया गया था।

समीर मंडल ट्रैवल एजेंसी चलाता था। ये आरोपित बांग्लादेशियों और रोहिंग्या मुसलमानों को भारत की नागरिकता दिलाने का भी काम करते थे। इसी भारतीय नागरिकता के सहारे बांग्लादेशियों और रोहिंग्याओं को विदेश भेजा जाता था। विक्रम से हुई पूछताछ के बाद उसके सहयोगी अजय घिल्डियाल को पकड़ा गया था।

अजय फर्जी दस्तावेजों के सहारे विदेश भेजे जाने वाले हर व्यक्ति पर 15 हजार रुपए लेता था। इस पैसे में कई अन्य कर्मचारी भी हिस्सा बँटवाते थे, जो एयरलाइंस ड्यूटी में तैनात थे। इस मामले में एक अन्य आरोपित गुरप्रीत था, जो लंदन पासपोर्ट ऑफिस में काम करता था। गुरप्रीत आरोपित अजय को फोन पर निर्देश दिया करता था। 

‘धर्मांतरण करके सब पा लिया, लेकिन बेटा खो दिया’: कानपुर में माता-पिता के ईसाई बनने से आहत 17 साल के लड़के ने छोड़ा घर, पत्र में दर्द बयाँ किया

कानपुर के भौंती कस्बे में 17 साल के एक किशोर ने अपने माता-पिता के ईसाई धर्म अपनाने से आहत होकर घर छोड़ दिया। घटना का पता तब चला जब किशोर के परिजनों ने उसके लापता होने पर अपहरण का मामला दर्ज कराया। जाँच के दौरान पुलिस को घर से एक पत्र मिला जिसमें किशोर ने अपना दर्द बयाँ किया है।

माँ-बाप के मतांतरण से नाराज बेटे ने छोड़ा घर

स्थानीय रिपोर्ट्स के मुताबिक, घर छोड़ते समय किशोर ने एक पत्र लिखकर छोड़ा था, जिसमें लिखा था- “मम्मी-पापा, आपने धर्म बदलकर सब कुछ पा लिया, लेकिन मुझे खो दिया। मैं इस धर्म में नहीं रह सकता।” यह पत्र पुलिस की जाँच में सामने आया, जिससे स्पष्ट हुआ कि किशोर अपने माता-पिता के धर्म परिवर्तन से बेहद परेशान था।

मोहल्ले के लोगों के अनुसार, परिवार ने करीब तीन महीने पहले ईसाई धर्म अपनाया था। हालाँकि माता-पिता ने इस पर कोई बयान नहीं दिया। परिवार मूल रूप से जौनपुर के मड़ियावा क्षेत्र का रहने वाला है और भौंती कस्बे में किराए के मकान में रहता है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, 14 दिसंबर की सुबह चार बजे किशोर घर से स्कूल का खाली बैग और जैकेट लेकर चला गया। उसके पिता ठेले पर कपड़े बेचते हैं और परिवार में उसकी माँ और 13 साल का छोटा भाई भी है। परिवार ने 16 दिसंबर को अपहरण की रिपोर्ट दर्ज कराई थी।

जाँच के दौरान पुलिस को किशोर का लिखा हुआ पत्र मिला। एसीपी पनकी शिखर ने बताया कि किशोर के पत्र में किसी धर्म का नाम नहीं लिखा गया है, लेकिन जाँच में यह पुष्टि हुई है कि माता-पिता ने ईसाई धर्म अपनाया है। पुलिस किशोर की तलाश में जुटी है।

यूपी में धर्मांतरण को लेकर पहले भी कई मामले सामने आ चुके हैं, जहाँ प्रलोभन देकर धर्म बदलवाया गया। किशोर के पत्र ने इस घटना को और भावुक बना दिया है। उसने साफ शब्दों में लिखा कि वह ईसाई धर्म में खुद को असहज महसूस करता है और इसीलिए घर छोड़ने का फैसला किया। हालाँकि पुलिस मामले की तह तक जाने की कोशिश कर रही है, लेकिन किशोर की सुरक्षित वापसी अब भी सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है।

अंबेडकर, हिंदुत्व आंदोलन और उनकी भूमिका: एकजुट, मजबूत राष्ट्र… जातिवाद के जंजाल से बाहर निकल राष्ट्रहित की सोच

गृह मंत्री अमित शाह का एक 10 सेकंड का छोटा वीडियो क्लिप कुछ दिन पहले वायरल हुआ, जिसमें झूठा दावा किया गया कि उन्होंने डॉ बीआर अंबेडकर का अपमान किया। ऐसे में आजकल राजनीतिक चर्चा के सबसे बड़े मुद्दों में से एक भारत रत्न बाबा साहेब डॉ बीआर अंबेडकर को लेकर देश में यह बहस छिड़ गई है कि कौन उन्हें सबसे ज्यादा पसंद करता है।

हालाँकि, राजनीतिक हलकों में सवाल को उल्टा रखा जाता है – कौन अंबेडकर से सबसे ज्यादा नफरत करता है? इस मुद्दे पर बीजेपी के पास इतिहास का साथ भी है, क्योंकि कॉन्ग्रेस आजादी की लड़ाई ही नहीं, आजादी के बाद नेहरू के दौर में भी अंबेडकर की तारीफ नहीं करती थी, बल्कि वे एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी थे, लगभग दुश्मन। इस कड़ी में अंबेडकर के द्वारा कॉन्ग्रेस पार्टी के खिलाफ कई बयान हैं, जो इसे साबित भी करते हैं, वहीं नेहरू के भी अंबेडकर के खिलाफ कई बयान हैं, जैसे कि उनकी एडविना को लिखी चिट्ठियों में अंबेडकर के प्रति उनकी पूरी नफरत साफ झलकती है।

दूसरी ओर, कॉन्ग्रेस अमित शाह के छोटे से एडिटेड वीडियो क्लिप का इस्तेमाल यह साबित करने के लिए कर रही है कि बीजेपी अंबेडकर से नफरत करती है। हालाँकि यह लड़ाई वहाँ से नहीं शुरू हुई, बल्कि राहुल गाँधी ने भारतीय संविधान पर वीर सावरकर का गलत हवाला देते हुए संसद में मनुस्मृति को दिखाया। हालाँकि अब पीछे मुड़कर देखें तो बीजेपी को राहुल गाँधी की हरकत पर आक्रामक तरीके से प्रतिक्रिया देनी चाहिए थी। अगर बीजेपी ऐसा करती, तो शायद आज अंबेडकर को लेकर बीजेपी को इस तरह से बचाव की मुद्रा में नहीं आना पड़ता।

राहुल गाँधी दरअसल सालों से मनुस्मृति और संविधान के बीच की पुरानी वामपंथी बहस चला रहे हैं, जिसका उद्देश्य जातिवाद को और बढ़ावा देना है। 2024 के चुनावों की तैयारियों में उनकी लगातार ‘कौन जात हो’ की बहस ने उन्हें कुछ राजनीतिक लाभ भी दिया है, इसलिए वे जानते हैं कि यह रणनीति काम करती है। अंबेडकर और संविधान कॉन्ग्रेस के हथियार जैसे हैं, जिनका इस्तेमाल कॉन्ग्रेसी अपने राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए कर रहे हैं।

ऐतिहासिक रूप से यह बिल्कुल साफ है कि कॉन्ग्रेस (शुरुआत से लेकर 1990s तक) को अंबेडकर से कोई जुड़ाव नहीं था। अगर अंबेडकर के द्वारा विभिन्न संस्थाओं, व्यक्तियों और विचारों पर किए गए नकारात्मक बयानों की गिनती की जाए, जोकि बहुत सारा है, तो गाँधी, नेहरू और कॉन्ग्रेस पार्टी के खिलाफ उनके बयान आसानी से RSS के खिलाफ उनके बयानों से कहीं ज्यादा होंगे। जबकि अंबेडकर का ऐसा कोई बयान ढूँढ़ना मुश्किल है जिसमें उन्होंने सीधे तौर पर RSS पर हमला किया हो।

अंबेडकर और RSS या अंबेडकर और हिंदुत्व के बीच की बहस दरअसल अंबेडकर के हिंदू धर्म (जैसा उन्होंने इसे समझा) और उस समय की हिंदू राजनीति पर दिए गए बयानों की व्याख्या है। यही कारण है कि राहुल गाँधी ने संसद में मनुस्मृति को सामने रखा, क्योंकि वह अंबेडकर का हवाला देकर सीधे तौर पर BJP, RSS या हिंदुत्व पर हमला नहीं कर सकते थे। इसी वजह से राहुल गाँधी को सावरकर के बारे में झूठी जानकारी देने और फर्जीवाड़े का बढ़ावा मिला।

अब चूँकि कॉन्ग्रेस को यह सुविधा मिल गई है कि वह अपनी गलत नीतियों पर सवाल किए बिना अपने दोगलेपन को आसानी से छिपा सकती है। ऐसे में राहुल गाँधी खुद को शिव भक्त और अंबेडकरवादी दोनों के रूप में पेश कर सकते हैं और उनके आसपास के लोग इस पर सवाल भी नहीं उठाएँगे। वहीं, बीजेपी के पास यह सुविधा अब तक नहीं है, क्योंकि लोग सवाल करने लगते हैं कि वे (बीजेपी वाले) किस तरह अंबेडकरवादी होकर भी ‘जय श्री राम’ के नारे (उनकी नजर में दोनों बातें अलग-अलग हैं कि अंबेडकरवादी लोग ‘जय श्रीराम’ नहीं बोल सकते।) लगा सकते हैं।

वैसे, बीजेपी और संघ इस तरह के सवालों को संस्थागत स्तर पर नजरअंदाज करते हैं, जो राजनीतिक तौर पर समझने वाली बात है। पहले- क्यों पार्टी खुद को ऐसे बहसों में उलझाए, जब उनके विरोधियों को बिना किसी सवाल के छूट मिल जाती है? और दूसरे- शायद संगठनात्मक स्तर पर इसका कोई जवाब नहीं है, क्योंकि एक राजनीतिक पार्टी ठीक उसी तरह नहीं होती जैसा कोई वैचारिक समूह होता है। हालाँकि संस्थागत स्तर से परे, समर्थकों और सहानुभूति रखने वालों के लिए इस पर वैचारिक स्तर पर चर्चा करना जरूरी है। यहाँ तक कि संघ में भी, व्यक्तिगत स्वयंसेवक और पदाधिकारी इस पर चर्चा करते हैं (और मैंने खुद कुछ के साथ चर्चा की है), लेकिन वे संघ की ओर से कोई बयान जारी नहीं करते।

यह लेख अंबेडकर और हिंदुत्व आंदोलन में उनकी भूमिका की पहेली पर चर्चा करने का एक प्रयास है। हालाँकि यह विषय इतना व्यापक है कि इस पर पूरी किताब लिखी जा सकती है, लेकिन इसे यहाँ एक बुनियादी (बेसिक) स्तर पर ही समझाने की कोशिश की जा रही है।

अंबेडकर और हिंदू धर्म

अंबेडकर और हिंदू धर्म के संबंध को समझने के लिए सबसे पहले यह साफ कर देना जरूरी है कि अंबेडकर खुद को हिंदू नेता नहीं मानते थे। खासकर उन्होंने अपने जीवन के आखिरी समय में यह साफ कर दिया था कि वो हिंदू नहीं हैं। दरअसल, उन्होंने जिन 22 प्रतिज्ञाओं के जरिए धर्म परिवर्तन किया, उसमें यह साफ तौर पर बताया कि न केवल उन्होंने हिंदू धर्म को अपनाने से इंकार किया, बल्कि उन्होंने एक ऐसी पहचान बनाई जो मुख्य रूप से ‘हिंदू धर्म के खिलाफ’ थी, न कि बौद्ध धर्म या कुछ और… क्योंकि इन प्रतिज्ञाओं में पिंडदान से लेकर राम या कृष्ण की पूजा से इंकार और हिंदू धर्म को समाज के लिए नुकसानदेह मानने जैसी बातें शामिल थीं।

यह भी देखा जा सकता है कि बौद्ध धर्म में दीक्षा लेने से पहले अंबेडकर ने हमेशा हिंदू शब्द का इस्तेमाल एक बाहरी समूह (Out-group) के रूप में किया, न कि अपने समूह (In-group) के लिए। हालाँकि यह भी नहीं कहा जा सकता कि उन्होंने अपने जीवन के आखिर में हिंदू पहचान छोड़ दी, जबकि वो उस समय शायद बहुत अधिक गुस्से में और निराशा से भरे हुए थे। क्योंकि उनकी सामूहिक एकता या सद्भाव की कोशिशें फेल हो रही थीं।

यही तथ्य कई लोगों के लिए यह तर्क देने का आधार बनता है कि अंबेडकर को हिंदुत्व आंदोलन का हिस्सा नहीं माना जा सकता। हालाँकि, यह नजरिया हर जगह व्यापक यानी एक समान नहीं है। उदाहरण के लिए, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म जैसे कि ‘एक्स’ (पूर्व में ट्विटर) पर जहाँ ‘राइट विंग’ की मजबूत मौजूदगी है, वहाँ भी अंबेडकर को लेकर समर्थन अधिक नजर आता है। मैंने खुद एक पोल चलाया… अब जब तक यह लेख लिखा गया, अंबेडकर को भारी समर्थन मिल रहा था। इसका मतलब यह है कि ‘राइट विंग’ विचारधारा वाले भी बड़ी संख्या में अंबेडकर का समर्थन करते हैं। इस पोल में 47.9% प्रतिशत लोग अंबेडकर के पक्ष में जुटे, जबकि दूसरे नंबर पर रहे नेहरू के पक्ष में महज 19.9% और तीसरे नंबर पर रहे मोहनदास करमचंद गाँधी के लिए 19.3% लोग खड़े हुए। पहले और दूसरे-तीसरे स्थान के लिए अंतर बहुत बड़ा रहा और दोनों मिलकर भी अंबेडरकर के आस-पास नहीं पहुँचे, क्योंकि दोनों का जोड़ भी मिलाकर 39.2% ही रहा।

कुछ लोग इस वोटिंग को अवैज्ञानिक कहकर खारिज कर सकते हैं और यह दावा कर सकते हैं कि वोट देने वालों को अंबेडकर के बारे में ‘सच्चाई’ नहीं पता। लेकिन ऐसा सोचना गलत और अनुचित होगा, खासकर बाद वाले मामले में। वामपंथियों के विपरीत, कम से कम हिंदुओं की ओर से तो विरोधाभासी विचारों को समझने की कोशिश होनी ही चाहिए।

मैंने उन लोगों के विचारों को समझने और उनके तर्कों को सुनने की कोशिश की है, जो मानते हैं कि 22 प्रतिज्ञाओं और अन्य बयानों के बावजूद अंबेडकर को हिंदुत्व आंदोलन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा सकता है। यहाँ मैं उन तर्कों को संक्षेप में प्रस्तुत करने की कोशिश करूँगा। यह जरूरी नहीं है कि इन तर्कों का समर्थन भी किया जाए, लेकिन इन्हें सामने रखना इसलिए जरूरी है ताकि इस पर बहस और विचार-विमर्श हो सके।

‘अंबेडकर एक सुधारवादी थे’

अंबेडकर को एक सुधारक के रूप में देखने का तर्क यह है कि हिंदुत्व, जैसा कि सावरकर ने परिभाषित किया और संघ ने अपनाया, वास्तव में हिंदू समाज के सुधार पर केंद्रित एक प्रगतिशील आंदोलन है। सावरकर ने अपने लेखन में हिंदू समाज की ‘सात बेड़ियों’ की चर्चा की है और उन कई प्रथाओं की निंदा की है, जो या तो शास्त्रों द्वारा अनुमोदित थीं या उनकी मुख्यधारा की व्याख्या के अनुसार प्रचलित थीं।

इन प्रथाओं में अस्पृश्यता, सभी जातियों के लिए मंदिर प्रवेश, अंतरजातीय विवाह और भोजन को लेकर निषेध, और कुछ जातियों पर वैदिक अनुष्ठानों की पाबंदी जैसी बातें शामिल थीं। महाराष्ट्र के रत्नागिरी में स्थित पतित पावन मंदिर इस बात का प्रमाण है कि सावरकर ने इन परंपराओं के खिलाफ काम किया। यह स्पष्ट रूप से ‘पारंपरिक’ हिंदू धर्म के खिलाफ जाने जैसा था।

हालाँकि, सावरकर ने इन शास्त्रों को जलाने जैसी कोई प्रतीकात्मक कार्रवाई नहीं की, जो इन प्रथाओं का समर्थन करते थे। लेकिन उन्होंने निश्चित रूप से अपने समय के मौजूदा ज्ञान और प्रथाओं के खिलाफ जाकर सुधारवादी रुख अपनाया। सुधारक अक्सर परंपरावादियों को नाराज करते हैं, क्योंकि वे चीजों को बदलने की कोशिश करते हैं।

अंबेडकर के आलोचकों का मानना है कि उन्होंने हिंदू धर्म और शास्त्रों जैसे मनुस्मृति पर जो हमले किए, उन्हें भी इसी दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए। उनका तर्क है कि ये हमले हिंदू समाज को आगे बढ़ाने के लिए थे। उनकी सामाजिक पीड़ा को दर्शाने वाले उनके तीखे शब्दों को माफ करने की बात भी सामने आती है, भले ही माफी की कोई माँग न हो।

हालाँकि, सावरकर और अंबेडकर के दृष्टिकोण में एक बड़ा अंतर भी है। सावरकर का सुधार एकजुटता के उद्देश्य से प्रेरित था, खासकर बाहरी खतरों और धर्मनिरपेक्ष राज्य के संदर्भ में। उन्होंने जाति जैसी पहचान से ऊपर उठने की बात कही, लेकिन उनका यह प्रयास हिंदू धर्म के प्रति शत्रुता से प्रेरित नहीं था। इसके विपरीत अंबेडकर के विचारों में हिंदू धर्म के प्रति गहरी असहमति दिखाई देती है।

फिर सवाल उठता है कि जब अंबेडकर खुद को हिंदू नहीं मानते थे, तो उन्हें ‘हिंदू सुधारक’ कैसे माना जा सकता है? इस पर आमतौर पर हिंदू और हिंदुत्व की व्यापक परिभाषा का सहारा लिया जाता है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट द्वारा इसे ‘जीवन जीने का तरीका’ कहे जाने का हवाला दिया जाता है।

इसके अलावा अंबेडकर के कुछ बयान भी ऐसे हैं जो यह तर्क देते हैं कि वे हर हिंदू धर्मशास्त्र के खिलाफ नहीं थे। उदाहरण के लिए ‘अनहिलेशन ऑफ कास्ट’ में उन्होंने कहा, “मुझे बताया गया है कि स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व जैसे सिद्धांतों के लिए आपको विदेशी स्रोतों से उधार लेने की आवश्यकता नहीं है। आप उपनिषदों से भी ऐसे सिद्धांत प्राप्त कर सकते हैं।”

कुछ लोग यह भी तर्क देते हैं कि उसी समय के कई अन्य सुधारवादी जैसे आर्य समाज और ब्रह्म समाज के सदस्य भी पारंपरिक शास्त्रों और गैर-वैदिक देवताओं के प्रति उतने सहिष्णु नहीं थे। अगर उन्हें बड़े हिंदू दायरे का हिस्सा माना जा सकता है, तो अंबेडकर को क्यों नहीं?

यह भी कहा जाता है कि जैन समुदाय के कई लोग हिंदू देवताओं पर विश्वास नहीं करते, और उनके विचार भी कभी-कभी हिंदू देवताओं के प्रति आलोचनात्मक होते हैं। फिर भी, ये दोनों समुदाय भाईचारे के साथ रहते हैं।

हालाँकि ये तर्क पूरी तरह से संतोषजनक नहीं लगते, लेकिन औपनिवेशिक युग के संदर्भ और उस समय चल रहे सुधार आंदोलनों को ध्यान में रखना जरूरी है। उस समय ‘उपनिवेशवाद-मुक्त सोच’ जैसा विचार मौजूद नहीं था, क्योंकि पूरी दुनिया उस समय औपनिवेशिक प्रभाव में थी। यह समझ हाल ही में विकसित हुई है।

इस विषय पर बहुत सारा आग और गुस्सा बाहर आ सकता है, क्योंकि इस पर बहस की बहुत ज्यादा ही गुंजाइश है। ऐसे में इसे अभी के लिए यहीं छोड़ना बेहतर होगा।

‘अंबेडकर ने इस्लाम की निंदा की’

अंबेडकर के हिंदुत्व आंदोलन में स्थान को लेकर एक और तर्क यह दिया जाता है कि उन्होंने इस्लाम और मुस्लिम समुदाय पर स्पष्ट और बेबाक टिप्पणियाँ की थीं, खासकर पाकिस्तान के निर्माण और मालाबार में हिंदुओं के नरसंहार के संदर्भ में। उन्होंने इन मुद्दों पर वामपंथियों या धर्मनिरपेक्षतावादियों की तरह बात को घुमाने या मीठे शब्दों में ढालने की कोशिश नहीं की।

यह तथ्य निर्विवाद है। हालाँकि अंबेडकर ने इस्लाम के बारे में कुछ सकारात्मक बातें भी कही थीं और कुछ अवसरों पर ‘अस्पृश्यों’ के इस्लाम धर्म अपनाने का समर्थन किया था। लेकिन जब बात मालाबार नरसंहार, जिसे वामपंथी अक्सर ब्रिटिश शासन के खिलाफ किसान क्रांति के रूप में पेश करते हैं, या पाकिस्तान के निर्माण के समय इस्लामी अलगाववादी मानसिकता की होती है, तो अंबेडकर ने बिना किसी झिझक के सच्चाई सामने रखी।

फिर भी अंबेडकर अकेले ऐसे व्यक्ति नहीं थे। श्री अरविंदो और रवींद्रनाथ टैगोर जैसे अन्य महान व्यक्तियों ने भी इस्लाम और उसकी अलगाववादी मानसिकता पर आलोचनात्मक दृष्टिकोण रखा था। राम स्वरूप और सीता राम गोयल जैसे विचारकों ने भी ऐसे मुद्दों पर चर्चा की है।

तर्क यह है कि वामपंथियों और इस्लामवादियों के लिए अंबेडकर के सीधे बयानों/भाषणों का जवाब देना मुश्किल हो जाता है। अन्य सुधारकों की तुलना में उनका (अंबेडकर) नाम और उनके विचार एक बड़े सामाजिक-राजनीतिक संदर्भ में आते हैं, जो उनके आलोचकों के लिए चुनौती खड़ी करते हैं।

शायद केवल इस वजह से आप पूरी तरह से प्रभावित न हों, लेकिन यह तर्क पूरी तरह से खारिज करने लायक भी नहीं है। हल्के-फुल्के अंदाज में कहा जाए तो, आपको ऐसे बयानों की जरूरत होती है, जिसे विकिपीडिया बैन न करे। वैसे, अगर विकिपीडिया ने अंबेडकर पर बैन लगा दिया, तो शायद इससे कहीं ज्यादा बवाल मचेगा, जितना सीता राम गोयल पर बैन लगाने से हुआ।

‘कम से कम अंबेडकर ने कोई अब्राहमिक मजहब नहीं, बल्कि ‘भारतीय धर्म’ अपनाया’

अंबेडकर के धर्म परिवर्तन को लेकर एक और तर्क यह दिया जाता है कि उन्होंने इस्लाम या ईसाई धर्म की बजाय एक ‘भारतीय’ धर्म को अपनाया। उनकी यह बात अक्सर सामने लाई जाती है।

अंबेडकर ने कहा था, “धर्म परिवर्तन के देश पर पड़ने वाले परिणामों पर विचार करना आवश्यक है। इस्लाम या ईसाई धर्म में धर्म परिवर्तन से दलित वर्गों का राष्ट्रीयकरण समाप्त हो जाएगा। यदि वे इस्लाम में जाते हैं, तो मुसलमानों की संख्या दोगुनी हो जाएगी और मुस्लिम वर्चस्व का खतरा वास्तविक बन जाएगा। यदि वे ईसाई बनते हैं, तो ईसाईयों की संख्या पाँच से छह करोड़ हो जाएगी, जिससे अंग्रेजों की पकड़ देश पर और मजबूत हो जाएगी।”

अंबेडकर ने धर्म परिवर्तन को सिर्फ व्यक्तिगत धर्म का बदलना नहीं, बल्कि पूरे देश की सामाजिक और राजनीतिक पहचान पर प्रभाव डालने वाली घटना के रूप में देखा। उनका यह विचार हिंदुत्व विचारधारा से मेल खाता है, क्योंकि हिंदुत्व भी भारत को एकजुट और मजबूत राष्ट्र के रूप में देखने की बात करता है। इसके साथ ही, अंबेडकर का यह मानना था कि धर्म परिवर्तन के परिणामों को राष्ट्रहित में सोचना चाहिए। उनका उद्देश्य सिर्फ धर्म नहीं, बल्कि समाज के दबे-कुचले वर्गों के लिए एक नया रास्ता खोलना था, ताकि वे जातिवाद के जंजाल से बाहर निकल सकें।

ऐसे में अंबेडकर का ‘हिंदुत्व’ वीर सावर के हिंदुस्व से कहीं अधिक कठोर जान सकता है, क्योंकि सावरकर तो मुस्लिमों को भी हिंदू मानने को तैयार हो गए थे, अगर वो मक्का को छोड़कर भारत को अपनी पवित्र भूमि मानते।

अंबेडकर ने यह भी कहा था कि अगर धर्म परिवर्तन की बात हो, तो सिख धर्म को अपनाना सबसे उपयुक्त होगा। हालाँकि, उन्होंने अंत में बौद्ध धर्म को ही अपनाया। लेकिन अंबेडकर का धर्म परिवर्तन कोई साधारण कदम नहीं था। उन्होंने बौद्ध धर्म को अपनाया, साथ ही 22 उपदेशों के माध्यम से एक नया सामाजिक और धार्मिक रूप रेखा तैयार की। ये उपदेश हिंदू धर्म के खिलाफ थे- जिसमें वे पिंडदान, भगवान राम और कृष्ण की पूजा और हिंदू धर्म की सामाजिक व्यवस्था को नकारते थे।

इसके अलावा यह भी तर्क दिया जाता है कि अंबेडकर ने धर्म परिवर्तन केवल मजबूरी में किया। हालाँकि, उनके विचार और भाषण इस धारणा को पूरी तरह से साबित नहीं करते। उन्होंने अपने जीवनकाल में कई बार हिंदू धर्म छोड़ने और बड़े पैमाने पर धर्म परिवर्तन की बात की थी।

‘उनकी कड़वी बातें उनके अनुभवों की देन थीं’

यह कोई संदेह नहीं है कि जातिवाद ने हमारे समाज में एक बड़ी समस्या पैदा की है और कुछ जातियों को सचमुच असंवेदनशील और अमानवीय व्यवहार का सामना करना पड़ा है। मैं इस बात से बिल्कुल भी सहमत नहीं हूँ कि हम सब कुछ केवल ‘अत्याचार साहित्य’ के रूप में खारिज कर दें, हालाँकि यह सच है कि कुछ घटनाओं को अतिरंजित रूप से पेश किया गया है। अतिरंजनाओं से ज्यादा हमारे समाज में जो असली समस्या है वह है तथ्यों और घटनाओं को तोड़-मरोड़ कर पेश करना।

मैं खुद एक तथाकथित ‘ऊँची जाति’ से हूँ और मैंने कुछ लोगों के सामंती मानसिकता को देखा है। मैंने रिवर्स जातिवाद (यानी दबी जातियों द्वारा तथाकथित उच्च जातियों के खिलाफ-Reverse Casteism) भी देखा है, और यही कारण है कि मैं इस मामले में सिर्फ एक पक्ष को नहीं चुन सकता। एक बात जो मैंने देखा है और जिसका मुझे पूरा विश्वास है, वह यह है कि मेरे परिवार की सामंती मानसिकता कहीं से भी मनुस्मृति की वजह से नहीं थी। मुझे न तो मेरे घर में और न ही मेरे गाँव में इसका कोई प्रमाण मिला। असल में उनमें से अधिकांश लोग धार्मिक भी नहीं थे। मैंने इस बारे पर अपनी किताब में भी लिखा है, जिसे आप यहाँ से खरीद (मेरा प्रचार समझ लीजिए) भी सकते हैं।

लेकिन गंभीरता से कहूँ तो हाँ.. लोग वास्तव में अपने दुखद अनुभवों के कारण कड़वी बातें कह सकते हैं। यह सामान्य रूप से सही है, और हर कोई एक नया आरंभ करने की उम्मीद कर सकता है। क्या यही एकमात्र कारण था कि अंबेडकर ने ऐसा कहा? बिलकुल नहीं। वह एक वकील, राजनेता और कार्यकर्ता थे। उनके पास यह सब कहने के कई कारण थे।

‘वो सबसे बड़े दलित आइकॉन, आप अपने ही लोगों को अलग नहीं कर सकते’

अंततः बात वास्तविक राजनीति पर आ जाती है। संघ और भाजपा के कई लोग मानते हैं कि यह सोचना बड़ी भूल होगी कि हर व्यक्ति जिसने अंबेडकर की फोटो सोशल मीडिया पर लगाई है या जिसे अपने घर में उनकी तस्वीर लगाई है, वह एक कट्टर अंबेडकरवादी है जिसका मुख्य उद्देश्य हिंदू धर्म और विशेष रूप से ब्राह्मणों को खत्म करना है।

इससे पहले कि इसे तुरंत खारिज किया जाए और झूठा बताया जाए, मुझे लगता है कि लोगों को यह ध्यान में रखना चाहिए कि अधिकांश जनता वास्तव में किसी विचारधारा को अपनाने से पहले उसका गंभीरता से विश्लेषण नहीं करती। अधिकांश लोग केवल राजनीतिक नारों को अपना लेते हैं।

उदाहरण के लिए, आज समाजवादी पार्टी (सपा) का समर्थक ‘बाबासाहेब का अपमान’ पर बुरा मान जाएगा, क्योंकि सपा INDI गठबंधन में है और अखिलेश यादव राहुल गाँधी के साथ काम कर रहे हैं। लेकिन 1990 के दशक में सपा के लोग उत्तर प्रदेश के पार्कों और गाँवों में अंबेडकर की मूर्तियों को तोड़ देते थे, क्योंकि उन्हें वह मूर्तियाँ BSP द्वारा सत्ता की ओर बढ़ने के प्रयास के रूप में दिखाई देती थीं। यही है राजनीति का यह बेवजह और बदलता स्वरूप इस देश में।

‘अंबेडकर को उनके पास एक उद्धारक के रूप में बेचा गया है उन लोगों द्वारा जिन्होंने नरेटिव को नियंत्रित किया, और अब हम इस पर ज्यादा कुछ नहीं कर सकते। तुरंत अंबेडकर पर हमला करना और उन्हें अलग-थलग करना, उन्हें वामपंथी या इस्लामवादी पक्ष में धकेलना समझदारी नहीं होगी। हमें कुछ चीजों को नजरअंदाज करना होगा और अपने दृष्टिकोण को मजबूती से प्रस्तुत करना होगा।’

यह बात पूरी तरह से समझ में तब आती, जब आपके पास कोई वैकल्पिक योजना होती, लेकिन मैं व्यक्तिगत रूप से यह नहीं देख पा रहा हूँ। मुद्दा यह है कि वह ‘वैकल्पिक योजना’ क्या होनी चाहिए। संघ अंबेडकर को जैसा है, वैसे ही स्वीकार करने में कोई परेशानी नहीं दिखाता और भाजपा भी ऐसा ही करती है और सच्चाई तो यह है कि आप उन्हें धोखा देने का आरोप नहीं लगा सकते क्योंकि वे हमेशा से ऐसे ही थे।

संघ ने अबेडकर और फुले को अपने विचारों में तीस साल से पहले ही स्वीकार कर लिया था। मैं यहाँ एक किताब का सुझाव दूँगा (जो यहाँ ऑनलाइन फ्री में उपलब्ध है), जिसका नाम है “Manu Sangh and I”, इसे साल 1996 में रामेश पटांगे द्वारा लिखा गया, जो पद्मश्री से सम्मानित वरिष्ठ संघ विचारक हैं। इस किताब में यह बताया गया है कि संघ मनुस्मृति पर विश्वास नहीं करता, भले ही वह उसे जलाए नहीं।

यही वजह है कि भाजपा राहुल गाँधी द्वारा सावरकर के बारे में फैलाए गए झूठ का मुकाबला नहीं कर पाई। राहुल के हाथ में मनुस्मृति होने के कारण पार्टी को हिचकिचाहट हुई, क्योंकि वे उस दौर से बहुत पहले ही निकल चुके हैं।

बाहरी नजरिए से देखा जाए तो संघ और भाजपा को यह साफ समझ में आता है कि अंबेडकर और हिंदुत्व एक साथ चल सकते हैं और वे पिछले 30 वर्षों से इस विचारधारा के साथ हैं भी। ऐसा इसलिए, क्योंकि उनके दृष्टिकोण में हिंदुत्व और हिंदू राष्ट्र दोनों विचार स्वतंत्र, उदार विचार हैं जो सभी को समाहित कर सकते हैं।

हिंदू धर्म और हिंदुत्व को सबसे उदार तरीके से परिभाषित करना आत्मसंतुष्ट और आत्मप्रशंसा जैसा लग सकता है, लेकिन मुझे नहीं लगता कि विचारधाराएँ इस तरह काम करती हैं। क्योंकि कोई व्यक्ति आगे इसमें पेरियार को भी शामिल करने की बात कर सकता है.. और इसके बाद कौन-कौन से नाम आएँगे, इसका मैं अनुमान भी नहीं लगाना चाहता। ऐसे में एक सीमा-रेखा खींची ही जानी चाहिए… और अगर वह सीमा रेखा अंबेडकर के बाद खींची जाती है, तो मुझे कोई आपत्ति नहीं है। लेकिन कम से कम वह सीमा-रेखा स्पष्ट रूप से दिखाई तो दे।

वो सवाल, जिनके जवाब नहीं

जैसा कि मैं पहले कह चुका हूँ कि संघ या भाजपा इन सवालों का संगठन के स्तर पर जवाब नहीं देंगे और न ही ऐसा करने के लिए वो बाध्य हैं। लेकिन व्यापक हिंदू समाज और दक्षिणपंथी समुदाय को इन पर चर्चा करनी होगी।

इस समय सबसे बड़ा खतरा यह नहीं है कि अंबेडकर को भगवान के स्तर पर उठाया जा रहा है, उन्हें तो काफी पहले ही उस स्तर पर रखा गया था, बल्कि उनके इर्द-गिर्द एक तरह का ईशनिंदा कानून (Blasphemy) बनने की स्थिति है। यहाँ तक कि अगर अमित शाह का संदर्भ-रहित वीडियो देख लिया जाए, तो उन पर आरोप लगते कि उन्होंने अंबेडकर को भगवान के रूप में मान्यता देने से इनकार किया। यह ऐसा है जैसे अंबेडकर का नाम लेना स्वर्ग की प्राप्ति का साधन हो गया हो।

यह विडंबना ही है कि एक व्यक्ति (अंबेडकर) जिसने अपनी 22 प्रतिज्ञाओं में हिंदू देवी-देवताओं को मान्यता देने से मना कर दिया, उसे ही एक ऐसे भगवान के रूप में पहचाना जा रहा है, जिसकी पूजा अनिवार्य की जा रही हो।

इसके अलावा हिंदू धर्म में देवी-देवता आपस में लड़ सकते हैं, ईर्ष्या कर सकते हैं, यहाँ तक कि एक-दूसरे के खिलाफ षड्यंत्र भी रच सकते हैं। लेकिन अगर कोई यह कहे कि उसकी हर कोई पूजा करे, तो यह न तो हिंदू परंपरा है और न ही हिंदुत्व का हिस्सा। यह पूरी तरह से अब्राहमिक दृष्टिकोण जैसा लगता है। ऐसे में इससे बचाव कैसे करें, इसके बारे में मेरे पास कोई आईडिया नहीं है।

इसके बावजूद, मैं अंबेडकर को हिंदुत्व के दायरे से पूरी तरह से बाहर करने के पक्ष में नहीं हूँ, इसके कई कारण हैं, जो पहले ही बताए गए हैं। जो लोग अंबेडकर को इस दायरे में शामिल करने की वकालत करते हैं, उनके तर्क भी पूरी तरह से गलत नहीं हैं। लेकिन यह समावेश (उनका हिंदुत्व में प्रवेश) विचारों की स्वतंत्र अभिव्यक्ति की कीमत पर नहीं होना चाहिए, और यही चीज इस समय खतरे में है।

मूल रूप से यह लेख अंग्रेजी में लिखा गया है। मूल लेख पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

सपा सांसद जियाउर्रहमान बर्क के घर चला बुलडोजर, कनेक्शन भी कटा, बिजली चोरी में जुर्माना ₹1.91 करोड़ का: अब्बा ने दी थी ‘सरकार बदलने’ की धमकी

बिजली चोरी में घिरे उत्तर प्रदेश के संभल से समाजवादी पार्टी के सांसद जियाउर्रहमान बर्क को बिजली विभाग ने 1.91 करोड़ रुपए का बिल जारी किया है। विभाग ने सांसद के घर की बिजली सप्लाई भी काट दी है। वहीं, प्रशासन ने उनके घर के बाहर बनी नालियों के ऊपर की सीढ़ियों को बुलडोजर से ध्वस्त कर दिया गया है। दूसरी तरफ, बिजली विभाग के अधिकारियों को धमकाने वाला उनके अब्बू ममलूक उर रहमान का वीडियो भी सामने आया है।

बिजली विभाग के एसडीओ संतोष त्रिपाठी ने बताया कि जब बिजली विभाग की टीम ने सांसद बर्क के घर में लगे मीटर की रीडिंग ली तो वो जीरो निकली थी। इसके बाद विभाग की ओर से उन्हें नोटिस भेजा गया। नोटिस पर 15 दिन में रकम जमा नहीं करने पर विभाग की तरफ से आरसी जारी की जाएगी। अब बिजली विभाग ने उन पर 1.91 करोड़ रुपए का जुर्माना लगाया है।

बता दें कि बिजली विभाग ने गुरुवार (19 दिसंबर 2024) की सुबह तलाशी ली। इस दौरान बर्क के घरवालों ने बिजली के मीटर की जाँच करने से टीम को रोका और जूनियर इंजनीनियर को धमकी भी दी। इस वीडियो भी सामने आया है। जिस वक्त बिजली विभाग के कर्मचारी उनके घर रीडिंग लेने के लिए गए थे, उस वक्त उनके साथ रैपिड ऐक्शन फोर्स, PAC और पुलिस की बड़ी संख्या में जवान मौजूद थे।

जाँच के दौरान सपा सांसद जियाउर्रहमान के अब्बू ममलूक रहमान बर्क ने अधिकारियों को धमकाते हुए कहा था, “हमारी सरकार आने दो…बहुत बदल गया है तू। ये सरकार रहेगी तो तुम्हारा कबाड़ा कर देगी।।” उन्होंने आगे कहा था, “एक आवाज देंगे तो बाहर भीड़ आकर खड़ी हो जाएगी।” इसके बाद उनके खिलाफ धमकी का मामला दर्ज कराया गया था।

बिजली विभाग के जूनियर इंजीनियर वीके गंगवाल ने बताया, “बर्क के घर में हम मीटर रीडिंग कर रहे थे। वहाँ पर सांसद के पिता मौजूद थे। उन्होंने हमें धमकाया और कहा- वक्त हमेशा एक जैसा नहीं रहता है। सरकार बदलेगी तो आपके खिलाफ कार्रवाई कराएँगे। आप हमारी वीडियो बना रहे हैं। आप मुझ पर FIR कराएँ। हम आप पर FIR कराएँगे।”

वहीं, जियार्रहमान पर बिजली चोरी का एक अलग से मुकदमा दर्ज कराया गया है। अब प्रशासन ने उनके घर की बिजली भी काट दी है। उन्हें जुर्माने की राशि को जल्द से जल्द जमा कराने के लिए कहा गया है। वहीं, नगरपालिका के अधिकारियों ने प्रशासन के साथ मिलकर उनके घर के पास बने अवैध निर्माण को ढहा दिया है।

दरअसल, सांसद जियाउर्रहमान के घर में बिजली के दो मीटर लगे हैं। इन मीटरों में टेम्परिंग यानी छेड़छाड़ के सबूत मिले हैं। यही कारण है कि बीते एक साल में उनके घर में बिजली के मीटर की रीडिंग जीरो रही। इसके बाद कुछ दिन पहले ही बिजली विभाग ने सांसद जियाउर्रहमान के घर के पुराने मीटर को जब्त करके जाँच के लिए भेज दिया था और उसकी जगह पर नई और स्मार्ट मीटर लगाए थे।

रिपोर्ट के अनुसार सपा सांसद के दो मंजिला घर में 83 बल्ब, 19 पंखे और 3 एसी चलाए जा रहे थे। गीजर से लेकर माइक्रोवेव तक अन्य आधुनिक उपकरण का भी इस्तेमाल हो रहा था। बिजली विभाग ने बताया है कि इस घर में 16,480 वॉट के उपकरणों का इस्तेमाल किया जा रहा था। इसके बावजूद कई महीनों से उनके घर का बिजली बिल शून्य आ रहा था।

RSS और हिंदू नेताओं को मारने की थी साजिश… असम STF ने बांग्लादेशी आतंकी संगठन के 8 आतंकियों को किया गिरफ्तार, छानबीन में आपत्तिजनक दस्तावेज बरामद

भारत में राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बनकर घूम रहे इस्लामी कट्टरपंथी संगठनों पर असम एसटीएफ ने चोट की है। इस बार असम की स्पेशल टास्क फोर्स ने बंगाल पुलिस और केरल पुलिस के साथ मिलकर राज्यों में ऑपरेशन ‘प्रघात’ चलाया और 8 आतंकियों को गिरफ्तार किया।

आतंकियों की पहचान मोहम्मद साब शेख, मिनारुल शेख, अब्बास अली, नूर इस्लाम मंडल, अब्दुल करीम मंडल, मोजीबार रहमान, हमीदुल इस्लाम और इनामुल हक के तौर पर हुई है। ये सभी लोग देश भर में स्लीपन सेल बनाने की गतिविधियों में संलग्न थे। इनमें से साब शेख और अब्बास अली बांग्लादेशी हैं। अब्बास को पहले फर्जी पासपोर्ट मामले में भी अरेस्ट किया जा चुका था लेकिन इस बार गिरफ्तारी आतंकी गतिविधियों को अंजाम देने की साजिश रचने के लिए हुई।

असम पुलिस के स्पेशल डीजीपी हरमीत सिंह ने इस कार्रवाई को लेकर बताया कि पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद और फलाकाटा में इस्लामी कट्टरपंथियों एक दूसरे से मिले थे। इन बैठकों में हिंदू नेताओं की हत्या की योजना के साथ देश में मजहबी तनाव भड़काकर, सांप्रदायिक सद्भाव बिगाड़ना था।

हालाँकि, पुलिस ने सूचना पाते ही देश के अलग-अलग हिस्सों में अपनी टीमें भेजीं और 17-18 दिसंबर की रात इस मामले में छापेमारी हुई। छानबीन में इनके पास से कई आपत्तिजनक दस्तावेज और सामान भी मिले।

छानबीन में ये भी जानकारी सामने आई कि केरल और बंगाल में रहकर ये आतंकी किसी मोहम्मद फरहान इसराक के लिए काम कर रहे थे जिसका खुद का संबंध अलकायदा के आतंकियों से है। इसके अलावा उसकी करीबी आतंकी संगठन ‘अंसरुल्लाह बांग्ला टीम’ के सरगना जसीमुद्दीमन से भी है।

पुलिस इस एक्शन को एक बड़ी सफलता मान रही है और आगे देश की सुरक्षा के लिए आतंकियों की प्लानिंग के बारे में पता लगाने में जुटी है। अभी तक यही सामने आया है कि ये आतंकी बंगाल के मुर्शिदाबाद और फलाकाटा में कई बैठकें कर चुके थे। जहाँ नूर इस्लाम मंडल नाम का आतंकी अपने साथियों के साथ आया था और इस बैठक में आरएसएस सदस्यों व हिंदू संगठनों के सदस्यों को मारने की बात हुई थी।

इस्लामी आतंकी बलात्कारी भी था, छेड़ता था लड़कियों को: मारा गया फारूक अहमद भट उर्फ फारूक नल्ली, दर्ज थे 37 केस

जम्मू-कश्मीर के कुलगाम में सुरक्षा बलों ने गुरुवार (19 दिसंबर 2024) को 5 आतंकियों को मार गिराया। इनमें आतंकी संगठन हिजबुल मुजाहिदीन का शीर्ष कमांडर फारूक अहमद भट उर्फ नल्ली भी शामिल है। ये सभी आतंकी कुलगाम के रहने वाले थे। इन सबके खिलाफ करीब 91 मामले दर्ज थे। वहीं, A++ कैटेगरी में शामिल आतंकी फारूक भट के खिलाफ रेप सहित 37 मामले दर्ज थे।

कुलगाम जिले के देसचेन येमरिच इलाके का रहने वाला फारूक घाटी में सबसे लंबे समय तक जीवित रहने वाले आतंकवादियों में से एक था। वह हिजबुल का सबसे लंबे समय तक कमांडर रहने वाला आतंकी भी था। वह कई आतंकी घटनाओं में शामिल था। इसके अलावा नेताओं को धमकाने, सुरक्षा बलों की हत्या, ग्रेनेड अटैक जैसी वारदातों में उसका हाथ रहा था।

उसने दक्षिण कश्मीर में कट्टरपंथ को बढ़ावा दिया और स्थानीय आतंकियों की भर्ती में अहम भूमिका निभाई थी। फारूक भट ने ओजीडब्ल्यू (ओवर ग्राउंड वर्कर) नेटवर्क को सक्रिय किया था। इसको देखते हुए A++ कैटेगरी का आतंकी माना गया था। उसके खिलाफ रेप और छेड़छाड़ सहित करीब 37 मुकदमे दर्ज थे। फारूक भट पर 25 लाख रुपए का ईनाम भी रखा गया था।

फारूक भट साल 2015 में हिजबुल मुजाहिदीन में शामिल हुआ था। साल 2020 में श्रीनगर में एक मुठभेड़ में हिजबुल के ऑपरेशन कमांडर सैफुल्लाह को ढेर किए जाने के बाद उसे समूह की ऑपरेशनल कमान दी गई थी। साल 2020 में नवीद बाबू की गिरफ्तारी के बाद उसे हिजबुल का कमांडर इन चीफ नियुक्त किया गया था। इसकी मौत सुरक्षा बलों के लिए एक बड़ी सफलता है।

वहीं, मारा गया एक अन्य आतंकी मुश्ताक अहमद इत्तू साल 2020 से आतंकवादी गतिविधियों में सक्रिय था। उसके खिलाफ 7 केस दर्ज थे। फारूक ने ही मुश्ताक को हिजबुल में भर्ती कराया था। वहीं, इरफान याकूब नाम का आतंकी साल 2022 से, आदिल हजाम साल 2023 से और यासिर जावेद साल 2019 से आतंकी गतिविधियों में सक्रिय था। यह सभी कुलगाम के रहने वाले थे।

ये शोपियाँ और कुलगाम जिले में हिजबुल मुजाहिदीन के मॉड्यूल को संचालित कर रहे थे। ये सभी आतंकी लंबे समय से सुरक्षा बलों के रडार पर थे। कमांडर 2 सेक्टर आरआर ब्रिगेडियर अनिरुद्ध चौहान ने बताया कि सेना और जम्मू-कश्मीर पुलिस पिछले दो महीने से इनके पीछे लगी थी। इसी दौरान सेना को इनपुट मिली कि कुलगाम जिले के बेहिबाग पीएस के कद्देर गाँव में कुछ आतंकी छिपे हुए हैं।

सेना ने सीआरपीएफ और पुलिस के साथ मिलकर सर्च ऑपरेशन चलाया। सुरक्षा बलों को देखते ही आतंकियों ने उन पर गोलीबारी शुरू कर दी। इसके बाद लगभग 6 घंटे के ऑपरेशन में सुरक्षा बलों ने 5 आतंकियों को मार गिराया। मुठभेड़ में दो जवान भी घायल हुए थे। आतंकियों के पास से 5 AK-47 राइफल, 20 एके मैगज़ीन, 2 ग्रेनेड के अलावा अन्य हथियार एवं गोला-बारूद बरामद हुए हैं।

बीवी ने दिया पहले तलाक में 500 करोड़ रुपए देने का तर्क, सुप्रीम कोर्ट ने ₹12 करोड़ एकमुश्त देने का दिया आदेश, साथ ही कहा- ‘पति अनिश्चित काल तक पत्नी को गुजारा भत्ता देने के लिए बाध्य नहीं’

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (19 दिसंबर 2024) को भरण-पोषण और गुजारा भत्ता को लेकर एक अहम टिप्पणी की है। अदालत ने कहा है कि कुछ कानून महिला कल्याण के लिए बनाए गए हैं, ना कि उनके पति एवं ससुराल के लोगों को दंडित करने के लिए। कोर्ट ने कहा कि इन कानूनों को पतियों के उत्पीड़न करने, धमकी देने या उनसे जबरन वसूली के साधन के रूप में प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए।

शीर्ष न्यायालय ने कहा कि विवाह एक पवित्र प्रथा है, जो कि परिवार की नींव है। ये कोई व्यवसायिक समझौता नहीं होता है। कोर्ट ने पाया कि वैवाहिक मामलों से संबंधित अधिकांश मामलों में दुष्कर्म, आपराधिक धमकी और विवाहित महिला से क्रूरता करने संबंधित कई आरोप लगाए जाते हैं। कोर्ट ने इस तरह की कठोर धाराएँ लगाने के लिए फटकार भी लगाई।

सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बीवी नागरत्ना और पंकज मिथल की पीठ ने इस मामले में सख्त रूख अपनाया। पीठ ने कहा कि ऐसी माँगें अक्सर तभी की जाती हैं, जब जीवनसाथी आर्थिक रूप से संपन्न होता है। जब जीवनसाथी की आर्थिक स्थिति खराब हो जाती है या ऐसी माँग करने वाले व्यक्ति की तुलना में कमजोर हो जाती है तो ऐसी माँगें कम होती हैं।

न्यायालय ने कहा, “हमें पार्टियों द्वारा दूसरे पक्ष से संपत्ति के बराबरी के रूप में भरण-पोषण या गुजारा भत्ता मांगने की प्रवृत्ति पर गंभीर आपत्ति है। अक्सर देखा जाता है कि भरण-पोषण या गुजारा भत्ता के लिए अपने आवेदन में पार्टियाँ अपने जीवनसाथी की संपत्ति, स्थिति और आय को उजागर करती हैं और फिर एक ऐसी राशि माँगती हैं जो उनके जीवनसाथी की संपत्ति के बराबर हो।”

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने आगे कहा, “हालाँकि, इस प्रथा में एक असंगति है, क्योंकि बराबरी की माँग केवल उन मामलों में की जाती है, जहाँ जीवनसाथी के पास साधन हैं या वह खुद के लिए बहुत अच्छा कर रहा है। हालाँकि, ऐसी माँगें उन मामलों में स्पष्ट रूप से अनुपस्थित होती हैं, जहाँ अलगाव के समय से जीवनसाथी की संपत्ति में कमी आई है।”

शीर्ष अदालत ने जोर देकर कहा कि गुजारा भत्ता पूर्व पति-पत्नी की वित्तीय स्थिति को समान बनाने के लिए नहीं है। यह आश्रित महिला को उचित जीवन स्तर प्रदान करने के लिए है। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि पूर्व पति अपनी मौजूदा वित्तीय स्थिति के आधार पर पूर्व पत्नी को अनिश्चित काल तक सहायता देने के लिए बाध्य नहीं हो सकता। हिंदू विवाह एक पवित्र संस्था है, न कि एक ‘व्यावसायिक उद्यम’।

पीठ ने कहा, “महिलाओं को इस बात को लेकर सावधान रहने की जरूरत है कि उनके हाथों में कानून के ये सख्त प्रावधान उनकी भलाई के लिए हैं, न कि उनके पतियों को दंडित करने या उनसे जबरन वसूली करने का साधन हैं। हमें आश्चर्य है कि यदि पति के अलग होने के बाद कुछ दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं के कारण वह कंगाल हो गया है तो क्या पत्नी उसके साथ संपत्ति के बराबर होने की माँग करेगी?”

दरअसल, अदालत एक महिला की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इसमें महिला अपने पति द्वारा शुरू किए गए तलाक के मामले को लॉजिस्टिक कारणों से भोपाल से पुणे स्थानांतरित करने की माँग की थी। इस जोड़े का विवाह साल 2021 में हुआ था। पति अमेरिका में IT कंसल्टेंट था। उसने अपनी पत्नी से तलाक की माँग की थी, लेकिन पत्नी ने तलाक का विरोध किया था।

पत्नी ने यह भी दावा किया था कि अलग हुए पति की कुल संपत्ति 5,000 करोड़ रुपए है। इसमें अमेरिका और भारत में कई व्यवसाय और संपत्तियाँ शामिल हैं। पत्नी ने यह बताया था कि उसका अलग रह रहा पति अपनी पहली पत्नी को उससे अलग होने के बाद वर्जीनिया स्थित घर को छोड़कर कम से कम 500 करोड़ रुपए का भुगतान किया था।

हालाँकि, कोर्ट ने अलग रह रहे पति को आदेश दिया कि वह अलग रह रही अपनी पत्नी को अंतिम एवं एकमुश्त स्थायी गुजारा भत्ता के रूप में 12 करोड़ रुपए दे। यह राशि एक महीने के भीतर देने के लिए कहा। इसके साथ ही पति को तलाक भी दे दी। सर्वोच्च न्यायालय ने अलग रह रहे पति के खिलाफ पत्नी द्वारा दायर आपराधिक मामले को भी रद्द कर दिया।

मैं कोई तिरंगा-विरंगा नहीं… राजदीप सरदेसाई ने इस बार किया राष्ट्रीय ध्वज का अपमान: वीडियो देख जनता भड़की, पूछा- क्या ऐसे होते हैं वरिष्ठ पत्रकार

इंडिया टुडे के वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई अपने मुँह से अनाप-शनाप निकालने की वजह से अक्सर सोशल मीडिया पर ट्रोल होते हैं। इस बार भी वह इसी कारण से गाली खा रहे हैं। उन्होंने एक वीडियो में तिरंगे को लेकर अपने मन की बात रखी और वही बात सोशल मीडिया पर वायरल हो गई।

देख सकते हैं कि ‘द लल्लनटॉप’ के सौरभ द्विवेदी के साथ उनकी बातचीत क्रिकेट मैच देखने पर चल रही थी। इसी दौरान सौरभ बताने लगे कि वो स्टेडियम में बैठकर मैच देखने को लेकर इतने उत्साहित हैं कि उन्होंने निर्णय लिया है कि वो कलाई पर तिरंगा भी बनवाएँगे। इसके बाद उन्होंने कैमरे पर दिखाया कि वो अपने डेस्क पर भी हमेशा तिरंगा रखते हैं जिसे भारतीय सेना के बलिदानियों की विधवा (वार विडोज) द्वारा बनाया जाता है। उन्होंने बताया कि ये तिरंगा उनके दोस्तों ने उन्हें दिया था इसलिए वो हमेशा मेज पर रहता है।

इसे सुन राजदीप सरदेसाई बड़ी हैरानी के साथ आँख निकालकर पूछते हैं- तो इसे आप लेकर जा रहे हो? इस पर सौरभ कहते हैं कि वो बस बात बता रहे हैं क्योंकि उन्हें याद आ गया है।तुरंत बाद राजदीप सरदेसाई कहना शुरू करते हैं, “मैं कोई तिरंगा-विरंगा नहीं रखता। तिरंगा मेरे दिल में है।”

सौरभ उनकी बात सुन नाराज होते हैं और उन्हें उनकी इस भाषा के लिए टोंकते हैं। वह समझाते हैं, :आप हमेशा कहते हो कि हिंदी आपकी पहली भाषा नहीं और उसके बाद आप ऐसी बात कहते हो। तिरंगा-विरंगा मत कहो।”

इस पर राजदीप बात को संभालते हुए कहते हैं, “मैं तिरंगे को अपने दिल में रखता हूँ और मैं इंडिया की शर्ट पहनूँगा लेकिन तिरंगा हाथ पर नहीं बनवाऊँगा।” इस पर सौरभ चुटकी लेते हुए कहते हैं- “अब आपकी ये सब करने की उम्र भी नहीं है।”

राजदीप सरदेसाई की यही क्लिप सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है। लोग इसे देखने के बाद राजदीप पर भड़क रहे हैं। कहा जा रहा है कि जिसके मन में तिरंगे के प्रति सम्मान नहीं होता वही इस तरह की बातें करता है।

कुछ यूजर्स इसे सीधे तौर पर भारत के राष्ट्रीय ध्वज का अपमान बता रहे हैं। राजदीप के बड़बोलेपन पर कार्रवाई करने की बातें हो रही हैं।

सवाल खड़ा किया जा रहा है कि जो व्यक्ति खुद को वरिष्ठ पत्रकार कहता है उसे ये भी नहीं पता क्या कि वो शब्द कैसे इस्तेमाल कर रहा है।

किसी का राजदीप सरदेसाई की वीडियो देख कहना है कि ये लोग कॉन्ग्रेसी पत्रकार हैं भारत का अपमान तो करेंगे ही।

तिरछी आँखें, चपटी नाक, लंबी खोपड़ी… इस्लाम के आने से पहले कुवैत में क्या था? खुदाई में मिली मिट्टी की 7000 साल पुरानी मूर्ति खोलेगी राज, आज के एलियन जैसी शक्ल

इस्लामी मुल्क कुवैत के पुरातत्वविदों ने 7,000 साल पुरानी ऐसी एक आकृति की खोज की है, जो आजकल के एलियन के जैसे दिखता है। यह आकृति मिट्टी की बनी है। यह अरब प्रायद्वीप में पाया जाने वाला अपने तरह की पहली मूर्ति है। इस मूर्ति की छोटे-से सिर को बारीकी से तराशा गया है। वहीं, इसकी आँखें तिरछी, चपटी नाक और लम्बी खोपड़ी है।

पुरातत्वविदों का यह भी कहना है कि मूर्ति बनाने की यह शैली मेसोपोटामिया सभ्यता में आम थी। उनका कहना है कि छिपकली के सिर वाली या ओफिडियन के नाम से जानी जाने वाली ऐसी मूर्तियों का मेसोपोटामिया की कब्रों और पवित्र स्थानों में देखी जाने वाली रस्मों से ऐतिहासिक संबंध है। मोसोपोटामिया की सभ्यता आजकल के इराक, कुवैत, सीरिया, दक्षिण-पूर्वी तुर्की आदि क्षेत्रों तक फैला था।

यह मूर्ति इस साल बहरा-1 में खुदाई के दौरान पाया गया है। बहरा-1 उत्तरी कुवैत में एक प्रागैतिहासिक स्थल है। यहाँ पर कुवैती-पोलिश टीम साल 2009 से खुदाई कर रही है। बहरा-1 अरब प्रायद्वीप की सबसे पुरानी बस्तियों में से एक थी, जहां लगभग 5500 से 4900 ईसा पूर्व तक लोग रहा करते थे। इस दौरान बहरा-1 में उबैद लोगों ने बसना शुरू किया।

उबैद लोगों की संस्कृति मेसोपोटामिया में उत्पन्न हुई थी और वे अपने मिट्टी के विशेष बर्तनों के लिए जाने जाते थे। इनमें एलियन जैसी मूर्तियाँ भी शामिल थीं। बहरा-1 में अभियान दल की नेता एग्निएस्का शिमजैक ने कहा कि उबैद छठी सहस्राब्दी ईसा पूर्व में अरब की खाड़ी में नवपाषाण या नए पाषाण युग के समाजों के साथ घुलमिल गए थे। इसके बाद यहाँ इस तरह के बर्तन या मूर्तियाँ बनाई जाने लगीं।

इस स्थल पर खोज की जिम्मेवारी सँभाल रहीं एग्निएस्का शिमजैक का कहना है कि इन लोगों और उनकी संस्कृतियों के टकराव के परिणामस्वरूप ‘सांस्कृतिक आदान-प्रदान का प्रागैतिहासिक क्रॉस रोड’ बन गया। इस आदान-प्रदान का एक हिस्सा कला भी थी। यह मूर्ति मेसोपोटामिया की मिट्टी से बनी है, न कि स्थानीय अरब की खाड़ी में पाए जाने वाले ‘मोटे लाल सिरेमिक’ की तरह है।

खुदाई टीम ने इसका अर्थ ये निकाला कि उबैद लोग इस क्षेत्र में अपनी घरेलू परंपराओं को सक्रिय रूप से आयात कर रहे थे। बेल्जियम के गेन्ट विश्वविद्यालय में निकट पूर्वी पुरातत्ववेत्ता ऑरेली डेम्स ने इसे बेहद महत्वपूर्ण बताया है और कहा है कि इससे प्रागैतिहासिक खाड़ी क्षेत्र और मेसोपोटामिया के बीच संबंधों की जानकारी मिलेगी।

डेम्स ने इन मूर्तियों के असमान्य चेहरे पर शोध कर रही हैं। विभिन्न सिद्धांतों में इन मूर्तियों की असामान्य चेहरे की विशेषताओं को समझाने का प्रयास किया गया है। एक सिद्धांत में यह भी कहा गया है कि इन मूर्तियों में सिरों की कृत्रिम विकृति दिखाई गई है। इसे ‘सिर को आकार देने’ के रूप में जाना जाता है। इसे उबैद समाज में अपनाई जाने वाली एक प्रथा है।

मेसोपोटामिया में खुदाई में मिले कंकाल अवशेषों में इसका प्रमाण भी मिले हैं। शिशु की लचीली खोपड़ी के चारों ओर पट्टियाँ लपेटकर उबैद लोग एक सिर को एक विशेष आकार देने की कोशिश करते थे, जो कि उनकी पहचान से जुड़े प्रतीक के रूप में किया जा सकता है। जैसे कि वर्ग, संस्कृति या उनके बस्ती के भीतर किसी विशेष समूह से संबंधित होना।

माना जाता है कि उबैद समुदाय ने आठवीं और सातवीं सहस्राब्दी ईसा पूर्व में वर्तमान ईरान में इस प्रथा को अपनाया होगा और पाँचवीं सहस्राब्दी ईसा पूर्व के दौरान उबैद समाज में सिर को आकार देने का चलन अपने चरम पर रहा होगा। खैर जो भी हो, इस मूर्ति का अध्ययन जारी है। वहीं, इस स्थल की खुदाई जारी है और इससे जुड़े अन्य सामानों के मिलने की उम्मीद है।