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‘अमित शाह को अंबेडकर से नफरत, संसद में की घृणित बात’: ‘खतना’ वीडियो वायरल कर रहे कॉन्ग्रेसी नेता और दलाल पत्रकार: नेहरू ने बाबा साहेब को किया था जलील, यह है वीडियो की सच्चाई

देश की संसद में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के भाषण के क्लिप के एक हिस्से को काटकर कॉन्ग्रेसी और विरोधी दल सरकार को बदनाम करने का प्रयास कर रहे हैं। यह पहली बार नहीं है कि कॉन्ग्रेस ऐसा कर रही है। जब-जब कॉन्ग्रेस मुद्दाविहीन होती है तो इसी तरह के फेक न्यूज फैलाकर सरकार को बदनाम करने का प्रयास करती है। ये काम सिर्फ कॉन्ग्रेसी या विपक्षी नेता ही नहीं, बल्कि कुछ दरबारी पत्रकार भी बखूबी करते हैं।

दरअसल, राज्यसभा में संविधान पर बहस के दौरान केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने मंगलवार (17 दिसंबर 2024) को डॉक्टर भीरामराव अंबेडकर के नाम पर राजनीति करने वालों को आड़े हाथों लिया था। अपने लगभग 90 मिनट के स्पीच में अमित शाह ने कॉन्ग्रेस और उसके नेताओं को अंबेडकर के साथ पंडित जवाहरलाल नेहरू एवं कॉन्ग्रेस द्वारा की गई हरकतों को देश के सामने रखा था। इसके बाद कॉन्ग्रेस चिढ़ गई।

अपनी चिढ़ ने कॉन्ग्रेस और उसके नेताओं द्वारा दरबारी पत्रकारों ने अमित शाह के भाषण के हिस्से को शेयर करके सरकार को बदनाम करना शुरू कर दिया। कॉन्ग्रेस ने X अपने सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा, “‘अभी एक फैशन हो गया है- अंबेडकर, अंबेडकर, अंबेडकर, अंबेडकर, अंबेडकर.. इतना नाम अगर भगवान का लेते तो सात जन्मों तक स्वर्ग मिल जाता।’ अमित शाह ने बेहद घृणित बात की है।”

कॉन्ग्रेस ने अपनी पोस्ट में आगे लिखा, “इस बात से जाहिर होता है कि BJP और RSS के नेताओं के मन में बाबा साहेब अंबेडकर जी को लेकर बहुत नफरत है। नफरत ऐसी कि उनके नाम तक से इनको चिढ़ है। ये वही लोग हैं जिनके पूर्वज बाबा साहेब के पुतले फूँकते थे, जो ख़ुद बाबा साहेब के दिए संविधान को बदलने की बात करते थे। जब जनता ने इन्हें सबक सिखाया तो अब इन्हें बाबा साहेब का नाम लेने वालों से चिढ़ हो गई है। शर्मनाक! अमित शाह को इसके लिए देश से माफी माँगनी चाहिए।”

यही बात कॉन्ग्रेस के नेता जयराम और सुप्रिया श्रीनेत सहित तमाम नेताओं ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में शेयर की है। इन नेता ने सिर्फ अमित शाह को ही नहीं, बल्कि बाबा साहेब के नाम पर भाजपा और RSS को भी बदनाम करने की कोशिश की है। रणविजय सिंह, ममता त्रिपाठी आदि कई कथित पत्रकारों ने भी अमित शाह के भाषण के आधे-अधूरे क्लिप को वायरल किया।

डॉक्टर लक्ष्मण यादव नाम के एक कथित बुद्धिजीवी ने इस अधूरे क्लिप को वायरल करते हुए लिखा, “अमित शाह को अगर गोडसे, गोलवलकर, सावरकर से फुरसत मिल गई होती और अंबेडकर को पढ़ लिए होते, अंबेडकर को जान लिए होते, अम्बेडकर की भारतीय समाज में मौजूदगी और अहमियत देख लिए होते, तो शायद ऐसा कभी न बोलते।”

उन्होंने आगे लिखा, “डॉ. अंबेडकर ने करोड़ों वंचितों, शोषितों, मजलूमों, महिलाओं को उस जगह से निकाला है, जो नरक से बदतर जीवन जीने को मजबूर थे. उनके लिए स्वर्ग और स्वर दोनों दिया है बाबा साहब ने।”

दरअसल, ये सारा फेक न्यूज एक षडयंत्र के तहत वायरल किया जा रहा है, ताकि अमित शाह, भाजपा और संघ को दलित-वंचित विरोधी साबित किया जा सके। वहीं, कॉन्ग्रेस के नेता अपने पूर्वजों की करतूतों को छिपाने और वर्तमान परिस्थितियों में राजनीतिक लाभ लेने के लिए अब फेक न्यूज जैसे गैर-कानूनी काम करने लगे हैं।

अमित शाह के भाषण के जिस हिस्से को विरोधियों द्वारा साझा किया जा रहा है, वह सही, लेकिन उसका संदर्भ क्या है उसे विरोधी छिपा गए। इससे अमित शाह का बयान एकतरफा दिखने लगा, जबकि हकीकत इसके विपरीत है। अमित शाह ने अंबेडकर के साथ कॉन्ग्रेस के नेताओं के दुर्व्यवहार को उन्होंने उजागर किया था।

अमित शाह ने अपने भाषण में कहा, “अभी यह फैशन चल गया है अंबेडकर अंबेडकर अंबेडकर……. इतना नाम अगर भगवान का लेते तो सात जन्मों का स्वर्ग मिल जाता। हमें आनंद है कि ये अंबेडकर का नाम लेते हैं, लेकिन अंबेडकर जी के प्रति आपका भाव क्या है ये मैं बताता हूँ।” इसके बाद अमित शाह कॉन्ग्रेस और पंडित नेहरू की पोल खोलकर रख देते हैं।

अमित शाह ने आगे कहा, “अंबेडकर जी ने देश की पहली कैबिनेट से इस्तीफा क्यों दे दिया? अंबेडकर जी ने कई बार कहा कि अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों के साथ हुए व्यवहार से मैं असंतुष्ट हूँ। सरकार की विदेश नीति से मैं असहमत हूँ और आर्टिकल 370 से मैं असहमत हूँ। इसलिए वे छोड़ना चाहते थे। उन्हें आश्वासन दिया गया, लेकिन वो पूरा नहीं हुआ और नजरअंदाज किए जाने के कारण इस्तीफा दे दिया।”

केंद्रीय गृहमंत्री ने आगे बताया, “श्री बीसी रॉय ने पत्र लिखा कि अंबेडकर और राजा जी जैसे लोग मंत्रिमंडल छोड़ेंगे तो क्या होगा। तो उनको नेहरू जी ने जवाब में लिखा- राजाजी के जाने से थोड़ा-बहुत नुकसान तो होगा, लेकिन अंबेडकर के जाने से मंत्रिमंडल कमजोर नहीं होगा।” अमित शाह ने आगे कहा कि कॉन्ग्रेस जिसका विरोध करती रही है, उसका वोट के लिए नाम लेना कितना उचित है। अंबेडकर जी मानने वाले पर्याप्त संख्या में आ गए हैं, इसलिए आप अंबेडकर अंबेडकर कर रहे हो।”

इस तरह, केंद्रीय मंत्री अमित शाह के पूरे भाषण को सुना जाए तो वो साफ तौर पर बता रहे हैं कि जिस अंबेडकर का नाम अब कॉन्ग्रेस जप रही है, उन्हीं अंबेडकर को उसने कितना जलील किया है। हालाँकि, अपने राजनीतिक फायदे के लिए कन्ग्रेस, उसके अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, राहुल गाँधी, जयराम रमेश, सुप्रिया श्रीनेत और उनके दरबारी पत्रकार आधे-अधूरे क्लिप को चलाकर फेक न्यूज फैला रहे हैं।

जिसने मार डाला 58 भारतीय लोगों को… उस आंतकी के जनाजे में शामिल मुस्लिम भीड़ के साथ कई विधायक-नेता-एक्टर: अनहोनी से बचने के लिए तैनात रहे 2000+ पुलिसकर्मी

साल 1998 में कोयंबटूर में सीरियल ब्लास्ट हुए थे। इन धमाकों में 58 लोगों की जान चली गई थी, तो 231 लोग घायल हो गए थे। इन धमाकों के पीछे अल-उम्मा नाम के कट्टरपंथी संगठन का नाम आया था, जिसे बैन कर दिया गया। इसी संगठन का मुखिया था एस ए बाशा, जो उन सीरियल ब्लास्ट के मुख्य कर्ता-धर्ताओं में से एक था। उसे उम्रकैद की सजा मिली थी। एसए बाशा दुर्दांत आतंकियों में था, जिसने 2003 में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को भी जान से मारने की धमकी थी। एसए बाशा की सोमनार (16 दिसंबर 2024) को अस्पताल में मौत हो गई थी, और अगले दिन (17 दिसंबर 2024) उसे दफनाया गया।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, एस ए बाशा नाम के आतंकी को अंतिम विदाई देने के लिए हजारों लोग पहुँचे। उसे किसी ‘हीरो’ की तरह विदाई दी गई, जबकि उसने तमिलनाडु को कई बार आतंकी हमलों का दर्द दिया। उसकी आखिरी विदाई के लिए पूरे कोयंबटूर में 2000 पुलिसवालों और 200 आरएएफ जवानों की तैनाती की गई। इतनी भारी सुरक्षा में उसका विदाई जुलूस निकाला गया और किसी ‘शहीद’ जैसी विदाई दी गई।

आतंकी एसए बाशा की अंतिम यात्रा पर वरिष्ठ पत्रकार राहुल शिवशंकर ने ट्वीट किया। उन्होंने लिखा, “कोयंबटूर, तमिलनाडु में इस्लामी आतंकी एस.ए. बाशा की शवयात्रा निकाली जा रही है। ये वही आतंकी है जो 1998 कोयंबटूर धमाकों का मास्टरमाइंड था, जिसमें 58 भारतीयों की जान गई थी। ये पाकिस्तान या बांग्लादेश में नहीं, बल्कि भारत में हो रहा है। न कोई ‘शांतिप्रिय’ इसे लेकर आवाज उठा रहा है, न ‘धर्मनिरपेक्षता’ का झंडा लहराने वाले कुछ कह रहे हैं। ‘संवैधानिकता’ के ठेकेदार तो संविधान के नाम पर अपनी राजनीति में व्यस्त हैं!”

हैरानी की बात नहीं है कि इस्लामिक कट्टरपंथी धड़ों, राजनीतिक पार्टियों के नेता उसकी अंतिम यात्रा में पहुँचे। यही नहीं, खुद को तमिलियन नेशनल कहने वाली पार्टी के सबसे बड़े नेता सीमान ने तो यहाँ तक कह दिया कि डीएमके सरकार को एसए बाशा को पहले ही रिहा कर देना था, जोकि डीएमके सरकार के हाथ में था। ऐसा न करने के लिए डीएमके सरकार की आलोचना भी की गई।

हालाँकि बाशा को पैरोल देकर अस्पताल में रखने वाले इन्हीं मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के पिता करुणानिधि जब मुख्यमंत्री थे, तब बाशा के साथी आतंकवादी को जेल में मालिक तक की सुविधा दी जाती थी। आईए, अब बताते हैं कि कौन से बड़े नेता इस आतंकवादी की आखिरी यात्रा में पहुँचे, जो उसके दक्षिण उक्कड़म स्थित रोज गार्डन वाले घर से शुरू होकर फ्लावर मार्केट स्थित हैदर अली टीपू सुल्तान सुन्नथ जमात मस्जिद तक गई।

1- एनटीके नेता सीमान- सीमान तमिल एक्टर हैं और नाम तमिलार काची नाम की राजनीतिक पार्टी चलाते हैं। वो तमिल पहचान, भाषा, स्वायत्तता की बात करते हैं। तमिल ईलम जैसे बैन आउटफिट के समर्थक भी हैं। उन्होंने डीएमके सरकार को ये कहते हुए बयान दिया है कि आतंकवादी एसए बाशा को पहले ही डीएमके सरकार जेल से निकाल सकती थी।

2- कोंगु इलैगनार पेरावई पार्टी के अध्यक्ष यू थानियारसु। इनकी पार्टी तमिलनाडु के अंदर भी क्षेत्रीय पार्टी है और AIADMK-DMK के बीच झूलती रहती है। थानियारसु AIADMK के टिकट पर 2 बार विधायक भी रहे हैं।

3- वीसीके के उप महासचिव वन्नी अरासु: VCK यानी विदुथलाई चिरुथैगल काची, इस पार्टी को दलित पैंथर्स पार्टी या दलित पैंथर्स इयक्कम यानी आंदोलन भी कहा जाता है। कहने को ये पार्टी दलित और तमिल राष्ट्रवाद की बात कहती है, लेकिन पार्टी के उप महासचिव वन्नी अरासु आतंकवादी को अंतिम विदाई देने पहुँचे।

4- मणिथानेया मक्कल काची के महासचिव और मन्नापरई विधायक पी अब्दुल समद: स्थानीय विधायक पी अब्दुल समद, एसए बाशा का करीबी रहा है। अल-उम्मा के बैन होने के बाद इसके जुड़े सदस्यों ने कट्टरपंथी संगठन की जगह एमकेके पहले टीएनएमएमके और फिर नाम से इस्लामी पार्टी बनाई। ये पार्टी AIADMK के बाद DMK के साथ गठबंधन में है और इस पार्टी के 2 विधायक हैं।

इस पार्टी का अध्यक्ष एम एच जवाहिरुद्दीन है। जवाहरुद्दीन सिमी का सदस्य भी रहा है और एसए बाशा का बेहद करीबी भी। वो राज्य में 25 से ज्यादा इस्लामिक ट्रस्ट, सोसायटी चलाता है और मजहबी दान के नाम पर एंबुलेस सेवा भी देता है।

इन नेताओं के अलावा कई छोटे-बड़े छुटभैय्ये नेता भी एसए बाशा जैसे दोषी पाए गए और उम्रकैद की सजा काट रहे आतंकवादी को आखिरी विदाई देने पहुँचे। खास बात ये है कि तमिलनाडु में इस्लामिक आतंकवाद को बढ़ाने वालों में से एक रहे बाशा की आखिरी यात्रा निकालने की योजना का बीजेपी ने विरोध किया था, लेकिन डीएमके सरकार ने आतंकवादी की न सिर्फ शान से विदाई यात्रा निकाली, बल्कि ‘हीरो’ की तरह विदाई देने जनाजे में उमड़ी भीड़ को मैनेज करने के लिए 2000-2200 जवानों की सेवाएँ भी उपलब्ध कराई।

फिर से वही जामिया, फिर से वही दिसंबर, फिर से वही ‘ला इलाहा इल्लल्लाह’ के नारे… देश को फूँकने की वामपंथियों-कट्टरपंथियों की वह साजिश न भूले हैं, न भूलेंगे, न भूलने देंगे

जामिया मिलिया इस्लामिया में 16 दिसंबर 2024 को एक प्रदर्शन हुआ। इस प्रदर्शन में AISA, SFI और NSUI के सैंकड़ों छात्रों ने मिलकर “तेरा-मेरा क्या रिश्ता- ला इलाहा इल्ललाह” और “हम क्या माँगे आजादी” जैसे नारे जोर-जोर से लगाए।

इनका ऐसा करने के पीछे तर्क था कि ये लोग 2019 में यानी पाँच साल पहले CAA-एनआरसी विरोध प्रदर्शन में जो कुछ भी हुआ था वो उसे याद करने के लिए इकट्ठा हुए हैं।

इनके मुताबिक, 5 साल पहले प्रशासन ने इनपर अत्याचार किया था, दिल्ली पुलिस ने बेवजह परिसर में अपनी ताकत दिखाई थी, इनके साथियों की पिटाई हुई थी।

अपने इस प्रदर्शन को इन्होंने ‘जामिया रेजिस्टेंस डे’ का नाम दिया। हालाँकि ये लोग ये बताना भूल गए कि प्रदर्शन के समय जो ये आजादी-आजादी के नारे लगा रही थी इन्हें आजादी किससे चाहिए?

एक्स पर वामपंथियों और इस्लामियों के ट्वीट पढ़कर लगे कि शायद वाकई साल 2019 में इनपर अत्याचार हुआ था या प्रशासन ने इन्हें दबाने की कोशिश की थी, लेकिन हकीकत क्या है ये इससे एकदम अलग है

आइए एक बार याद करें 2019 में क्या हुआ…

9 दिसंबर 2019 वो तारीख है जब नागरिकता संशोधन बिल (CAB) लोकसभा में पास हुआ था, इसके बाद 11 दिसंबर 2019 को CAA बना… एक तरफ जहाँ इस फैसले से वह पाकिस्तानी-बांग्लादेशी (जिन्हें कभी उनकी धार्मिक पहचान के कारण अपने मुल्कों में सताया गया था और अब भारत उन्हें अपने देश का नागरिक बनने का मौका दे रहा था) सब खुश थे। तो, वहीं दूसरी ओर भारत के इस्लामी कट्टरपंथी, उनके हितैषी वामपंथी पूरी तरह बिलबिला गए थे।

कानून में कोई गलती न ढूँढ पाने के कारण इन लोगों ने मिलकर एक नई साजिश रची… इस्लामी वर्ग को बरगलाने की। अफवाह फैलाई गई कि ये कानून इसलिए आया है ताकि भारत के मुसलमानों को देश से निकाल दिया जाए।

मुस्लिम वर्ग के छोटे बच्चे से लेकर बुजुर्ग महिलाओं तक को समझाया गया कि मोदी सरकार पहले NRC के जरिए कागज माँगेगी, फिर जो कागज नहीं दिखा पाएँगे उसे देश से निकाला जाएगा। इस प्रक्रिया में CAA बाकी समुदाय के लोगों को तो बचा लेगा लेकिन मुस्लिम को छँटनी करके बाहर कर दिया जाएगा क्योंकि इस कानून में मुस्लिमों को देश का नागरिक बनाने की बात ही नहीं है।

इस तरह एक मनगढ़ंत बात को हर मुस्लिम के मन में भरा गया और साल 2019 की दिसंबर में जामिया मिलिया इस्लामिया से विरोध प्रदर्शन की शुरुआत हुई।

13 दिसंबर 2019 से जामिया में इस्लामी-वामपंथी इकट्ठा हुए और 15 दिसंबर 2019 को जामिया नगर में बसों को आग के हवाले करने की घटना सामने आई। आग किसने लगाई? आज इस पर कोई बात नहीं करता, मगर आप सिर्फ कल्पना करिए कि यदि इस हरकत के बाद उस दिन बस में लगे सीएनजी सिलिंडर फट जाते तो उस इलाके का हाल क्या होता…

आग लगाने वालों ने बस में बस में बैठे न ड्राइवर का ख्याल किया और न ही यात्रियों का। आसपास मौजूद लोग बड़ी मुश्किल से अपनी जान बचाकर वहाँ से भागे। स्थिति हाथ से निकल रही थी, उपद्रवी हर सीमा लांघ रहे थे, तभी दिल्ली पुलिस एक्शन में आई और लाठीचार्ज कर अपनी कार्रवाई शुरू की। आँसू गैस तक छोड़े गए मगर हिंसा ने थमने का नाम नहीं लिया। बड़ी मशक्कत के बाद जब चीजें थमीं तो सोशल मीडिया पर उन वीडियोज ने हक्का-बक्का कर दिया जिसमें खुलेआम छात्रों की भीड़ इस्लामी नारे लगा रही थी

ये नारे ‘नारा-ए-तकबीर’ के नारे थे, ‘अल्लाहु-अकबर’ के नारे थे, ‘तेरा-मेरा क्या रिश्ता ला इलाहा इल्लाह’ के नारे थे और साथ ही साथ उसी आजादी के नारे थे जिसकी गूँज के बाद कश्मीर में हिंदुओं का नरसंहार हुआ।

इस घटना के बाद में दिल्ली में लगी आग थमी नहीं, शाहीन बाग के प्रदर्शन ने इसे और ज्यादा विस्तार दिया। और उस प्रदर्शन के बाद क्या हुआ ये याद करके भी रूह कांप जाए।

इतनी व्यापक स्तर पर हिंदू विरोधी हिंसा यूँ ही नहीं अंजाम दे दी गई थी, यूँ ही पुलिस कॉन्सटेबल रतनलाल की ड्यूटी पर हत्या नहीं हुई थी, यूँ ही गुलेल के जरिए हिंदुओं के घरों को पेट्रोल बम से निशाना नहीं बनाया गया था… इसके लिए शरजील इमाम जैसे कट्टरपंथियों ने बीज बोया था।

15 दिसंबर को शुरू हुए प्रदर्शन में पहले दिन से मुस्लिमों को भड़काने का काम अलग-अलग स्तर पर चल रहा था, कहीं पैंफलेट बाँटे जा रहे थे तो कहीं ऑनलाइन ऑडियो-वीडियो भेजकर भीड़ को उकसाया जा रहा था… इस हरकत का खुलकर पता तब चला जब 17 दिसंबर को शरजील इमाम की एक वीडियो वायरल हुई।

इस वीडियो में शरजील ने मुस्लिमों को भड़काते हुए दिल्ली में चक्का जाम करने की बात कही थी। उसने कहा था कि मुसलमान दिल्ली के 500 शहरों में चक्का जाम कर सकता है। इस भाषण के वायरल होने के बाद पुलिस शरजील को ढूँढने में जुट गई और दूसरी ओर इस्लामी, वामपंथी बुद्धिजीवी ये फैलाने में जुट गए कि शरजील तो मुस्लिमों को उनके अधिकार बता रहा था और पुलिस ने उसे आतंकी दिखा दिया।

अब ये बात किसी से छिपी नहीं है कि मुस्लिम भीड़ जब-जब सड़कों पर उतरी है तो उस भीड़ ने कैसे नारे लगाए और कैसी प्रदर्शनों को अंजाम दिया है। हालिया मामलों से याद दिलाएँ तो संभल की घटना याद कर लीजिए चाहे तो बाराबंकी की…आपको इस भीड़ का पैटर्न मालूम पड़ जाएगा।

साल 2019 में तो खुलेआम इस्लामी कट्टरपंथी और वामपंथी इस भीड़ को उकसा रहे थे और जब पुलिस इन्हें रोकने आगे बढ़ रहे थी तो ये ऐसा दिखाया जा रहा था जैसे पुलिस लोगों को बचाने नहीं लोगों को मारने आई है।

आज जिस जामिया में दिल्ली पुलिस की कार्रवाई के खिलाफ प्रदर्शन सामने आया है, उसी जामिया के मेंकभी भी दिल्ली के हिंदू विरोधी दंगों में मारे गए अंकित शर्मा को याद नहीं करते किसी को नहीं देखा गया जिन्हें इस्लामी भीड़ ने चाकुओं से गोद-गोदकर मार डाला था, कभी किसी को उत्तराखंड का दिलबर नेगी भी याद नहीं आया जो दिल्ली कमाने आया था और हाथ-पाँव काटकर उसे जलकर मरने के लिए छोड़ दिया गया

इन्हें याद आते हैं शरजील इमाम, सफूरा जरगर, उमर खालिद जैसे लोग…जिन्होंने सीएए-एनआरसी के बारे में सब कुछ पढ़ने समझने के बाद भी उन्हें अपने वर्ग के कम पढ़े लिखे लोगों तक गलत ढंग से पहुँचाकर भड़काया।

अजीब बात ये है कि दिल्ली पुलिस की जाँच भी बताती है कि जामिया की हिंसा एक सुनियोजित घटना थी, जहाँ दंगाइयों के पास पत्थर थे, लाठियाँ थी, पेट्रोल बम थे, ट्यूबलाइट थी। अगर ऐसा नहीं था तो सोचिए कि उन दंगाइयों को कैसे पता चला कि जामिया में ऐसा कुछ होने वाला है जहाँ पुलिस आँसू गोले चला सकती है, उन्होंने इस तरह की कार्रवाई से बचने के लिए अपने पास गीले कंबल तक रखे हुए थे…।

इन सारी घटनाओं को देख सुन पढ़ने के बाद इसमें कोई दोराय नहीं है कि 2019 की दिसंबर में शुरू हुई हिंसा हिंदुओं के खिलाफ की गई हिंसा थी। एक बार को उस दिसंबर को जामिया के ये ‘वामपंथी और इस्लामी’ भूल भी जाएँ, लेकिन दिल्ली वाले और खासकर दिल्ली के हिंदू कभी नहीं भूलेंगे। उस आग में उन्होंने अपने अपनों को जलते हुए देखा है

CM योगी आदित्यनाथ को धमकी देने वाला अताउल गनी हथियार के साथ गिरफ्तार, बताया- बांग्लादेश से आकर बंगाल के मालदा में बसा: कहा था- बिस्मिल्लाह बोलकर योगी की दूँगा कुर्बानी

नोएडा पुलिस ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को जान से मारने की धमकी देने वाले एक व्यक्ति को दिल्ली के शाहीन बाग इलाके से गिरफ्तार किया है। आरोपित की पहचान शेख अताउल (40) पुत्र उसमान गनी के रूप में हुई है। वह मूल रूप से बांग्लादेश का निवासी है, लेकिन पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में उसका परिवार बस गया था। बाद में वह दिल्ली के शाहीन बाग में रहने लगा। पुलिस ने आरोपित के पास से एक .315 बोर का तमंचा, जिंदा कारतूस, एक चाकू, आपत्तिजनक दस्तावेज और मोबाइल फोन बरामद किया है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, नोएडा सेक्टर 39 पुलिस ने सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो का संज्ञान लेते हुए शेख के खिलाफ मामला दर्ज किया और उसे दिल्ली से गिरफ्तार कर लिया। एडिशनल डीसीपी मनीष मिश्रा ने बताया कि शेख के खिलाफ बीएनएस (भारतीय न्याय संहिता) और आईटी एक्ट की विभिन्न धाराओं के तहत केस दर्ज किया गया है।

शुरुआती पूछताछ में शेख ने बताया कि उसने हथियार अपनी सुरक्षा और डर दिखाने के लिए रखा था। पुलिस अब यह जाँच कर रही है कि क्या शेख आपराधिक गतिविधियों में शामिल रहा है और क्या वह सच में मुख्यमंत्री पर हमला करने की योजना बना रहा था।

एडिशनल डीसीपी मनीष मिश्रा ने कहा, “वायरल वीडियो में आरोपित व्यक्ति ने संवैधानिक पद पर बैठे एक जननेता के खिलाफ झूठी और भड़काऊ बातें कही थीं, जो सांप्रदायिक हिंसा को बढ़ावा दे सकती थीं। आरोपित ने अलगाववादी बयान देकर करोड़ों लोगों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाई।”

पुलिस ने आरोपित के पास से मिले मोबाइल फोन और दस्तावेजों की जाँच शुरू कर दी है। यह पता लगाया जा रहा है कि वह किसी संगठन से जुड़ा हुआ था या किसी बड़ी साजिश का हिस्सा था। पुलिस ने बताया कि इस मामले में सोशल मीडिया सेल ने वीडियो को चिह्नित कर सेक्टर 39 थाने में मामला दर्ज कराया था। यह वीडियो एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर वायरल हुआ था। आरोपित के भड़काऊ बयानों से सांप्रदायिक तनाव फैलने की आशंका थी।

बता दें कि शेख अताउल का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था, जिसमें उसने योगी आदित्यनाथ को ‘कुर्बान’ कर देने की धमकी दी थी। वीडियो में उसने भड़काऊ बयान देते हुए सांप्रदायिक भावनाएँ भड़काने की कोशिश की थी। उसने खुलेआम गोश्त खाने और मस्जिदों को ध्वस्त करने के झूठे आरोप लगाकर धार्मिक उन्माद फैलाने की कोशिश की। उसने कहा था, “बिस्मिल्लाह बोलूँगा और कुर्बानी दे दूँगा योगी की” और यह कहते हुए उसने हाथों से कुर्बानी देने का इशारा भी किया।

शेख अताउल ने अयोध्या में राम मंदिर निर्माण, अवैध मस्जिदों पर कार्रवाई, और लाउडस्पीकर पर प्रतिबंध जैसे मुद्दों पर अपनी नाराजगी जताई। इसके साथ ही उसने कहा, “खुलेआम भैंस का गोश्त काट रहे हैं हम लोग। खुलेआम अजान चल रहा है। जाओ योगी… सु#$@र के जने के पास.. जो मस्जिद से माइक उतारता है। उसकी अम्मी ने शादी किया है, मुसलमान से… बोलता है मुसलमानों को भगाओ यहाँ से.. सामने आएगा तो बिल्मिल्लाह बोलके #$% दूँगा।”

हर्षा हत्याकांड के गवाह को धमकी, कहा- कोर्ट मत जाना: हिजाब के विरोध में लिखने पर इस्लामी कट्टरपंथियों ने चाकू से गोदकर मार डाला था, NIA कर रही है जाँच

कर्नाटक के शिवमोगा जिले में बजरंग दल के कार्यकर्ता हर्षा हिंदू की हत्या का मामला फिर चर्चा में है। हाल ही में राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) की कोर्ट में गवाही देने वाले एक गवाह को धमकी देने का मामला सामने आया है। इस मामले में शिवमोगा के तुंगानगर पुलिस स्टेशन में एफआईआर दर्ज की गई है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, ये गवाह उस पेट्रोल पंप पर काम करता था, जहाँ हर्षा हत्याकांड के बाद हत्यारे गाड़ी में ईंधन डलवाने गए थे। NIA ने जाँच के बाद उस पेट्रोल पंप कर्मचारी को सरकारी गवाह बनाया था, जिसे अब धमकाने की कोशिश की गई। आरोप है कि एक अज्ञात व्यक्ति ने इस गवाह को गवाही न देने की धमकी दी।

धमकी के बावजूद युवक ने दी गवाही

बताया जा रहा है कि पेट्रोल पंप पर काम करने वाला यह युवक अब दूसरी नौकरी कर रहा है। कुछ दिन पहले एक व्यक्ति स्कूटर से पेट्रोल पंप पर आया और गवाह की जानकारी माँगी। पंप कर्मचारियों से कहा गया कि गवाह को कोर्ट में पेश होने से मना कर दें। हालाँकि 12 दिसंबर 2024 को गवाह ने एनआईए कोर्ट में गवाही दी। इसके बाद उन्होंने धमकी की जानकारी पुलिस को की। कोर्ट के निर्देश पर तुंगानगर पुलिस स्टेशन में मामला दर्ज किया गया। पुलिस ने बताया कि गवाह की सुरक्षा सुनिश्चित की जा रही है और मामले की जाँच जारी है।

कर्नाटक के तत्कालीन सीएम ने दिलाया था न्याय का भरोसा

बता दें कि हर्षा को हिंदुत्व विचारधारा से जुड़े कार्यक्रमों में सक्रिय भागीदारी के लिए जाना जाता था। साल 2022 में उस समय कर्नाटक के मुख्यमंत्री रहे बासवराज बोम्मई ने इस हत्या को साजिश करार दिया था।

एक इंटरव्यू में तत्कालीन सीएम बासवराज बोम्मई ने कहा था, “हर्षा, जिसे हर्षा हिंदू के नाम से भी जाना जाता था। वो एक कार्यकर्ता था। वो हर तरह के धार्मिक कार्यक्रमों में सबसे आगे रहता था। उसने हाल ही में हिंदुओं के कई अहम मामलों को उठाया था, जिससे कई लोग काफी चिढ़े हुए थे। कई स्थानीय लोग उसके खिलाफ थे। ये हत्या बहुत ही भयानक थी। ये हत्या से बढ़कर है। ये हार्डकोर दुश्मनी है, जिसे एक छोटे से लड़के पर दिखाया गया है। उसकी हत्या पीछे का सबसे बड़ा कारण यह था कि वो एक हिंदू एक्टिविस्ट था और बहुत ही मुखर तरीके से अपनी आवाज को उठाता था।”

फरवरी 2022 में की गई थी हर्षा की हत्या

गौरतलब है कि कर्नाटक के शिवमोगा जिले 26 साल के बजरंग दल कार्यकर्ता हर्षा की रविवार (20 फरवरी 2022) को चाकुओं से गोद कर हत्या कर दी गई थी। पुलिस की जाँच में सामने आया था कि हर्षा ने फेसबुक प्रोफाइल पर हिजाब के ख़िलाफ़ और भगवा शॉल के समर्थन में पोस्ट लिखी थी, जिसके बाद उसकी हत्या कर दी गई। इस मामले में कई कट्टरपंथी मुस्लिमों को गिरफ्तार किया गया था, जिनकी पहचान रियाज, नदीम, मुजाहिद, कासिफ, आसिफ, अफान (रिहान) के तौर पर हुई थी। इस हत्याकांड में कासिफ मुख्य आरोपित है।

संभल में पुलिस पर हमला करने जिस इलाके से आए थे मुस्लिम उपद्रवी वहाँ भी एक बंद मंदिर मिला, भीतर में विराजमान थे हनुमान जी और राधा-कृष्ण: प्रशासन 22 कुएँ की खोज में लगा

उत्तर प्रदेश के संभल के खग्गू सराय में 46 साल से बंद पड़े कार्तिकेश्वर महादेव मंदिर के खुलने के बाद एक और सालों से बंद पड़ा हिंदू मंदिर मिला है। ये मंदिर हयात नगर थानाक्षेत्र के सरायतरीन इलाके में मिला। अवैध कब्जे हटाने के बीच पुलिस की नजर इस पर पड़ी। पुलिस प्रशासन ने फौरन इसका ताला खुलवाया और पाया कि अंदर राधा-कृष्ण और हनुमान जी की मूर्तियाँ स्थापित थीं।

प्रशासन ने इस मंदिर को भी साफ करवाया है। स्थानीय लोगों का कहना है कि मंदिर काफी समय से इसलिए बंद था क्योंकि पूरा इलाका मुस्लिम बाहुल्य है। पहले इलाके में 30 से 40 हिंदू परिवार रहते थे जो कि दंगे के बाद धीरे-धीरे पलायन कर गए।

मालूम हो कि जिस हयातनगर (सरायतरीन) में यह बंद पड़ा मंदिर मिला है उस जगह की चर्चा संभल हिंसा के बाद भी थी। दरअसल, सामने आया था कि हिंसा में इस इलाके के युवक भी शामिल थे। अब दोबारा से बंद पड़े मंदिर के मिलने के कारण इस इलाके की बात हो रही है।

संभल में मिला एक और मंदिर

सामने आई तस्वीर में देख सकते हैं कि मंदिर के आसपास घनी बस्ती है और मंदिर की दीवारें देखकर ही पता चल रहा है कि सालों से इस पर कोई ध्यान नहीं दिया गया। हालाँकि, मालूम हो कि इस मंदिर के आसपास किसी प्रकार का अतिक्रमण नहीं मिला है जैसा कि कार्तिकेश्वर मंदिर के पास मिला था।

खग्गू सराय में मिले मंदिर के पास अवैध कब्जे को तो मुस्लिम परिवार छोड़ने को तैयार हो गया है और प्रशासन से बातचीत के बाद खुद अतिक्रमण हटा रहा है। लेकिन, अब ये खग्गू सराय इलाके में मिल रहे कुओं के कारण सुर्खियों में है।

जामा मास्जिद के पास मिला एक और कुआँ

बीते दिनों इसी मंदिर को खुलवाने के बाद एक पास में मिले कुएँ की खुदाई भी हुई थी जिसमें से हिंदू देवी-देवताओं की प्रतिमाएँ मिली थीं। इस खुदाई के बाद प्रशासन को एक और कुएँ का पता चला। ये कुआँ मस्जिद के बिलकुल दरवाजे के किनारे पर पाटा गया था। प्रशासन इसकी भी खुदाई करवा रहा है। मौके पर पुलिस फोर्स तैनात है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि यह कुआँ नगर पालिका ने ही बंद करवाया था। अब प्रशासन मंदिर के पास बने कुएँ की तरह इसकी खुदाई भी कराएगा।

कुछ रिपोर्ट्स ऐसी भी सामने आई हैं जिसमें जिलाधिकारी डॉक्टर राजेंद्र पैंसिया के हवाले से बताया गया कि संभल में 68 तीर्थ और 21 कूप और 52 सराय और दर्जनों सरोवर होने की जानकारी सामने आई है। रिपोर्ट में कहा गया कि इलाके में अवैध कब्जा होने के बाद ये सारी चीजें विलुप्त हो गईं। लेकिन अब दोबारा प्रशासन के प्रयासों से संभल अपने वास्तविक रूप में लौट आएगा।

संभल का विवाद

गौरतलब है कि संभल में 24 नवंबर को जामा मस्जिद का सर्वे करने निकली टीम को रोकने के लिए कई इस्लामी कट्टरपंथी सड़कों पर उतर आए थे। इसके बाद इलाके में पथराव से लेकर गोलीबारी तक हुई थी। कुछ ही दिन बाद ये इलाका बिजली चोरी करने के कारण खबरों में आया। प्रशासन ने अपनी कार्रवाई शुरू की और इलाके में बंद पड़े मंदिरों का मामला सामने आया। इसके साथ ही ये भी पता चला कि कैसे 46 साल पहले दंगे के दौरान हिंदुओं को निशाना बनाया गया और उसके बाद तमाम हिंदू पलायन कर गए।

बांग्लादेश की कोर्ट में हमला, मौत की धमकियाँ… फिर भी डटे हुए है संत चिन्मय दास के वकील: बताया- हिंदुओं पर हमले के 1000+ मामले, इलाज के लिए आए हैं भारत

बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर हमले के 1000 से अधिक मामले सामने आ चुके हैं। यह जानकारी बांग्लादेश के सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील रबींद्र घोष ने दी है। वे बांग्लादेश माइनॉरिटी वॉच के संस्थापक अध्यक्ष भी हैं।

इस्कॉन के संत चिन्मय दास की पैरवी को लेकर उन पर बांग्लादेश की कोर्ट में हमला भी हो चुका है। उन्हें लगातार मौत की धमकी दी जा रही है। वे इलाज के लिए 15 दिसंबर 2024 की रात भारत पहुँचे।

रबींद्र घोष ने बताया कि वह डॉक्टरी जाँच के लिए कोलकाता के पास बैरकपुर आए हैं, जहाँ वह अपने बेटे राहुल के घर ठहरे हुए हैं। बांग्लादेश में चिन्मय दास की जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान चटगाँव की कोर्ट में वकीलों के ग्रुप ने उनपर हमला कर दिया था। उन्होंने न्यूज 18 को दिए इंटरव्यू में बताया कि उनके पास अल्पसंख्यकों पर हमलों के 1,000 से अधिक मामले आ चुके हैं, और वो सभी पीड़ितों के लिए लड़ाई लड़ेंगे।

चिन्मय दास पर झूठे आरोप लगाकर की गई गिरफ्तारी

74 वर्षीय वकील रबींद्र घोष ने बताया कि बांग्लादेश के ‘संमिलित सनातनी जागरण जोते’ के प्रवक्ता ISKCON के संत चिन्मोय कृष्ण दास को नवंबर 2024 में ढाका एयरपोर्ट से गिरफ्तार किया गया था। उनके खिलाफ देशद्रोह और अन्य झूठे आरोप लगाए गए हैं। बांग्लादेश की अंतरिम सरकार और कट्टरपंथियों ने उन्हें इसलिए निशाना बनाया, क्योंकि वह हिंदू समुदाय को संगठित कर रहे थे और अल्पसंख्यकों के खिलाफ हो रहे अत्याचारों पर आवाज उठा रहे थे।

घोष ने दावा किया कि उन्हें दास का केस लड़ने के बाद से जान से मारने की धमकियाँ मिल रही हैं। धमकी भरे फोन और मैसेज के बावजूद उन्होंने कहा, “मौत तो एक दिन आनी ही है, लेकिन मैं अन्याय के खिलाफ लड़ाई जारी रखूँगा।”

घोष ने चटगाँव कोर्ट में अपने साथ हुए दुर्व्यवहार का जिक्र करते हुए बताया कि लगभग 40 वकीलों के ग्रुप ने उन पर हमले की कोशिश की। उन्होंने कहा, “वे नहीं चाहते कि कोई वकील दास का केस लड़े। हिंदू वकीलों पर झूठे मुकदमे दर्ज कराए जा रहे हैं, ताकि वे भी पीछे हट जाएँ।” घोष ने बताया कि स्थानीय पुलिस ने उस समय उन्हें बचाया, लेकिन बांग्लादेश में हिंदू वकीलों और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं है। रबींद्र घोष ने बताया कि रेप, जमीनों पर कब्जे, गैंगरेप जैसे 1000 से अधिक मामले उनके सामने आ चुके हैं। वो सभी पीड़ितों के लिए न्याय की लड़ाई लड़ेंगे।

हिंदुओं को बना दिया गया दोयम दर्जे का नागरिक

वकील रबींद्र घोष ने 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम में हिंदुओं की महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आज का बांग्लादेश उस समय लड़े गए आदर्शों के खिलाफ जा रहा है। उन्होंने कहा, “मुक्ति संग्राम समानता और न्याय के लिए था, लेकिन आज हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों को दोयम दर्जे का नागरिक माना जाता है।” घोष ने कहा कि मुक्ति संग्राम में हिंदू और मुसलमान दोनों ने मिलकर लड़ाई लड़ी थी, लेकिन आज हिंदुओं को उनके योगदान के बावजूद नजरअंदाज किया जा रहा है।

रबींद्र घोष ने बांग्लादेश में मुहम्मद युनुस की अगुवाई वाली मौजूदा अंतरिम सरकार पर अल्पसंख्यकों की स्थिति और बिगाड़ने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा, “पहले भी अल्पसंख्यकों पर हमले होते थे, लेकिन अब यह स्थिति नियंत्रण से बाहर हो गई है।” रबींद्र घोष ने यह भी बताया कि दास की गिरफ्तारी का कारण उनकी बड़ी सार्वजनिक रैलियाँ थीं, जो युनुस सरकार को असहज कर रही थीं। उन्होंने कहा, “कट्टरपंथी और सरकार, दोनों ही दास को चुप कराना चाहते हैं।”

घोष ने कहा कि वह भारत में कुछ दिन इलाज कराएँगे और फिर वापस बांग्लादेश लौटकर चिन्मय दास और अन्य अल्पसंख्यकों के लिए लड़ाई जारी रखेंगे। उन्होंने कहा, “मैंने जीवनभर मुसलमानों और हिंदुओं दोनों के लिए अन्याय के खिलाफ लड़ाई लड़ी है। धर्म कोई मायने नहीं रखता, न्याय मायने रखता है।”

मस्जिद कमेटी के झगड़े में मुस्लिम ने मौलवी को मारा, ‘हिंदू ने हत्या कर दी’ की अफवाह उड़ा संभल में तोड़े सूरजकुंड और मानस मंदिर: 5 हिंदुओं की हत्या, 7 दिन कर्फ्यू

16 दिसंबर 2024 को उत्तर प्रदेश विधानसभा में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने संभल में दंगों का इतिहास गिनाते हुए कहा था कि इनमें 209 हिंदुओं की हत्या की गई। दंगों में हिंदुओं की मौत के इस आँकड़े की पुष्टि संभल जिला प्रशासन की इंटरनल रिपोर्ट भी करती है।

ऑपइंडिया के पास मौजूद इस रिपोर्ट से पता चलता है कि 1976 में भड़के दंगों में 5 हिंदुओं की हत्या की गई थी। उस समय हालात पर काबू पाने के लिए 7 दिनों तक कर्फ्यू लगाना पड़ा था। दंगे हिंदू व्यक्ति द्वारा मौलवी की हत्या की अफवाह फैलाकर भड़काई गई थी।

रिपोर्ट के अनुसार 29 फरवरी 1976 को मुस्लिमों ने अफवाह उड़ाई कि पेतिया गाँव के अर्धविक्षिप्त राजकुमार सैनी ने हमारे मौलवी को मार दिया है, जबकि मस्जिद कमेटी के झगड़े में एक मुस्लिम ने ही मौलवी को मारा था। इसके बाद मुस्लिम दंगाइयों की भीड़ ने मंजर शफी और अताउल्ला ततारी की अगुवाई में सूरजकुंड और मानस मंदिर को तोड़ दिया। इसके बाद सरथल चौकी पर मुस्लिम दंगाइयों की भीड़ ने किशनलाल का घर जलाने की कोशिश की। हिंदुओं के प्रतिरोध के बाद वे पत्थरबाजी कर भाग खड़े हुए। इसी दौरान सोतीपुरा के हरि सिंह और कोटीपूर्वी मोहल्ले के राकेश वैश्य की हत्या की गई।

इसके बाद 24 अप्रैल 1976 को कोटपूर्वी मोहल्ले में कल्लू के घर भयानक विस्फोट हुआ। इलाज के दौरान उसके बेटे सलाम की मौत हो गई। इसकी प्रतिक्रिया में सरायतरीन के मोहल्ला लाल मस्जिद के पास बुजुर्ग कामता प्रसाद की चाकू मारकर हत्या कर दी गई। इसके अलावा जयचंद रस्तोगी की गोली मारकर हत्या की गई। इसके अलावा एक अन्य हिंदू की हत्या की गई थी, जिसके नाम का उल्लेख इस रिपोर्ट में नहीं है। रिपोर्ट बताती है कि इन मामलों में जब दोषी 20-22 मुस्लिमों को गिरफ्तार किया गया तो संतुलन बनाने के लिए इतने ही ‘निर्दोष’ हिंदुओं को भी प्रशासन ने गिरफ्तार किया था।

ये दंगे जब हुए थे उसी समय शफीकुर्रहमान बर्क भी उभर रहा था। संभल में 1978 में जो सबसे भीषण दंगा हुआ था, उसमें बर्क की खासी भूमिका थी। 1976 के दंगों के दौरान मुस्लिम दंगाइयों की अगुवाई करने वाला मंजर शफी भी 1978 के दंगों के समय सक्रिय था। उस समय इसने एक हिंदू शिक्षक की बेटी और पत्नी को अगवा कर लिया था। शिक्षक की बेटी को रेप के बाद छोड़ा गया था, जबकि उनकी पत्नी को हिंदुओं ने बचा लिया था। इस घटना के बारे में हम अपनी पिछली रिपोर्ट में बता चुके हैं। हम बता चुके हैं कि कैसे 1978 के दंगों के बाद ह​रिहर मंदिर में शफीकुर्रहमान बर्क ने हिंदुओं का प्रवेश बंद करवाया था।

गौरतलब है कि प्रशासन ने यह रिपोर्ट संभल में हुए दंगों पर तैयार की है। इससे पता चलता है कि दंगों के कारण संभल में धीरे-धीरे हिंदुओं की आबादी कम होती जा रही है। देश की स्वतंत्रता के समय संभल नगरपालिका क्षेत्र में हिंदुओं की आबादी 45 प्रतिशत थी जो आज घटकर 15-20% रह गई है। उस समय मुस्लिम 55% थे। आज वे बढ़कर 80-85 प्रतिशत हो गए हैं।

जिस आतंकी ने कहा था ‘मोदी को मार देंगे’, वह अस्पताल के बेड पर मर गया: कोयंबटूर सीरियल ब्लास्ट का दोषी था बाशा, उसके ही साथी की जेल में ‘मालिश’ करवाती थी DMK सरकार

अल उम्मा नाम के प्रतिबंधित कट्टरपंथी इस्लामी संगठन के संस्थापक और कोयंबटूर ब्लास्ट केस के दोषी एस. ए. बाशा की सोमवार (16 दिसंबर 2024) को मौत हो गई। उसकी उम्र 83 साल थी और बढ़ती उम्र की वजह से वो लंबे समय से बीमार चल रहा था। बता दें कि कोयंबटूर ब्लास्ट केस में बाशा और अल उम्मा के 16 अन्य सदस्यों को इस मामले में उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, कोयंबटूर सीरियल ब्लास्ट केस में उम्रकैद की सजा काट रहे एस. ए. बाशा को अक्टूबर 2023 में इलाज के लिए अस्थायी पैरोल दी गई थी, जिसे सरकार ने उसके स्वास्थ्य के आधार पर बढ़ा दिया था। वह चेन्नई के एक निजी अस्पताल में इलाज करा रहा था।

बता दें कि 14 फरवरी 1998 को कोयंबटूर के आर.एस. पुरम और शहर के अन्य हिस्सों में हुए सीरियल बम ब्लास्ट में 58 लोगों की जान गई और 231 लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे। यह हमला उस समय हुआ जब भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी आर.एस. पुरम में चुनाव प्रचार के लिए पहुँचने वाले थे।

पुलिस ने इस मामले में 166 लोगों को गिरफ्तार किया था, जिनमें बाशा भी शामिल था। स्पेशल कोर्ट ने ने 158 लोगों को दोषी ठहराया और 43 लोगों को उम्रकैद की सजा सुनाई। बाद में 41 लोगों ने मद्रास हाईकोर्ट में अपील की। हाई कोर्ट ने इनमें से दो नाबालिगों को रिहा कर दिया, जबकि 17 लोगों को उम्रकैद और 22 को बरी कर दिया।

पीएम मोदी को दी थी जान से मारने की धमकी, उस समय थे गुजरात के सीएम

बता दें कि प्रतिबंधित कट्टरपंथी संगठन अल-उम्मा के अध्यक्ष एसए बाशा ने जुलाई 2003 में कोयंबटूर का दौरा करने पर गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को जान से मारने की धमकी भी दी थी। बाशा और आठ अन्य लोगों ने यह धमकी उस समय खुले आम दी थी जब हिंदू मुन्नानी नेता की हत्या से संबंधित एक मामले में आजीवन कारावास की सजा सुनाए जाने के बाद पत्रकार कोयंबटूर अदालत परिसर में इन मुजरिमों से बात कर रहे थे। बाशा ने कहा था कि अगर गुजरात के सीएम मोदी कोयंबटूर आएँगे, तो उनकी हत्या कर दी जाएगी।

बाशा के साथी महदानी की जेल में मालिश कराती थी डीएमके सरकार

यहाँ ये बताना जरूरी है कि बाशा और उसके साथियों पर डीएमके सरकार कितनी मेहरबान रहती थी। दरअसल, 24 जुलाई 2006 को इंडियन एक्सप्रेस में एक समाचार प्रकाशित हुआ जिसका शीर्षक था –“कोयंबटूर आतंकी घटनाओं के आरोपी के लिए द्रमुक ने जेल को स्पा में बदला”। समाचार में बताया गया था, “अब्दुल नासिर महदानी की आयुर्वेदिक मालिश का खर्च वहन सरकार कर रही थी और उसकी बीवी के खिलाफ गिरफ्तारी का वॉरंट होने के बावजूद वह महदानी से बेरोकटोक मिल सकती थी। इन हालात में आतंक पर नकेल कसने की जरूरत पर सख्त बातें करने वालों पर हँसा जा सकता है। महदानी 1998 के कोयंबटूर सीरियल विस्फोटों का मुख्य आरोपी है, जिसमें बीजेपी नेता लालकृष्ण आडवाणी को निशाना बनाने की कोशिश करते हुए 58 लोगों की हत्या कर दी गई थी।”

इसमें आगे लिखा था, “जब से करुणानिधि ने मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली है, तब से यहाँ उच्च सुरक्षा वाली जेल में रखे गए महदानी और अल उम्मा के अन्य 166 कैदियों के बीच माहौल खुशनुमा है। इनमें से ज्यादातर को कोयंबटूर विस्फोटों के सिलसिले में गिरफ्तार किया गया था। करुणानिधि की बदौलत, 10 मालिश वालों और चार वरिष्ठ आयुर्वेदिक डॉक्टरों की एक टीम ने 2001 से जेल के अस्पताल में रखे गए महदानी पर ‘उच्च गुणवत्ता वाला उपचार’ शुरू किया है …”

बिजली की तारें, जमाल संस का बोर्ड, अवैध निर्माण… अब वाराणसी के मुस्लिम बहुल इलाके में मिला 40 साल से बंद मंदिर, भीतर मलबा और मिट्टी: हिंदू संगठन ने CM योगी को लिखा पत्र

उत्तर प्रदेश के संभल के बाद अब वाराणसी के मदनपुरा इलाके में 40 साल से बंद पड़ा एक मंदिर सामने आया है, जिसे फिर से खोलने की माँग उठ रही है। इस मंदिर की जानकारी सोशल मीडिया के जरिए मिली, जिसके बाद सनातन रक्षक दल के कार्यकर्ता मौके पर पहुँचे और मंदिर को खुलवाने की कवायद तेज हो गई। बताया जा रहा है कि यह मंदिर करीब 150-250 साल पुराना है और इसके अंदर मलबा भरा हुआ है। इस मंदिर के बारे में स्कंद पुराण के काशीखंड में जिक्र है, साथ ही सिद्धतीर्थ कूप का भी जिक्र है, जो इस मंदिर के पास है।

कैसे सामने आया मंदिर का मामला

सोशल मीडिया पर वायरल एक पोस्ट के जरिए यह जानकारी सामने आई कि वाराणसी के मुस्लिम बहुल इलाके मदनपुरा में एक बंद मंदिर है। सनातन रक्षक दल के प्रदेश अध्यक्ष अजय शर्मा को जब इस बारे में पता चला तो वे अपने कार्यकर्ताओं के साथ मौके पर पहुँचे।

मंदिर को देखने पर पाया गया कि इसमें मलबा और मिट्टी भरी हुई है और लंबे समय से पूजा-अर्चना बंद है। इस मंदिर के अंदर मलबे में देव-विग्रह भी दबे हो सकते हैं। इस मंदिर के आसपास भयंकर तरीके से अतिक्रमण हुआ है। बिजली के तार लटके हैं। घरों के छज्जे मंदिर की दीवार से सटे हुए हैं। ये मंदिर करीब 40 फिट ऊँचा है और बीते 40 साल से बंद है। वहीं, मंदिर से सटे घर के गेट पर जमाल सन्स का बोर्ड भी लगा हुआ है।

मंदिर से सटाकर बने घर पर जमाल सन्स का बोर्ड, तारों के फैले जाल और अतिक्रमण को बयाँ करती तस्वीर (फोटो साभार: भास्कर)

सनातन रक्षक दल के प्रदेश अध्यक्ष अजय शर्मा ने कहा, “यह मंदिर सनातन संस्कृति का प्रतीक है और इसे खोलने की पहल पूरी तरह शांतिपूर्ण है। हमने प्रशासन को इसकी जानकारी दी है और उनका पूरा सहयोग मिल रहा है। जल्द ही मंदिर की सफाई कराई जाएगी और पारंपरिक पूजा-अर्चना शुरू होगी। यह किसी प्रकार के विवाद का मुद्दा नहीं है बल्कि सनातन धर्म के गौरव की पुनः स्थापना का प्रयास है।”

अजय शर्मा का कहना है कि यह मंदिर भगवान शिव का हो सकता है। उन्होंने बताया कि नगर निगम और प्रशासन से इस मंदिर के बारे में जानकारी जुटाई जा रही है ताकि इसे फिर से खोलकर साफ-सफाई के बाद पूजा-अर्चना शुरू की जा सके। उन्होंने मेयर और स्थानीय विधायकों से भी इस बारे में बातचीत की है। इस बारे में सीएम योगी आदित्यनाथ को भी पत्र लिखा गया है।

क्या कर रही है पुलिस और प्रशासन?

मंदिर खुलवाने की माँग के बाद पुलिस और प्रशासन भी सक्रिय हो गया है। दशाश्वमेध थाना प्रभारी प्रमोद कुमार ने बताया कि यह मंदिर काफी समय से बंद है और इलाके में शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस तैनात है। स्थानीय लोगों से बातचीत की जा रही है ताकि मंदिर को खोलने को लेकर किसी प्रकार का विवाद ना हो।

डीसीपी काशी जोन गौरव बंसवाल ने कहा कि मंदिर सार्वजनिक स्थल पर है, और इसे फिर से खोलने के लिए स्थानीय लोगों के साथ बातचीत की जा रही है। उनका कहना है कि मौजूदा स्थिति में इस मामले को शांतिपूर्ण ढंग से सुलझाया जाएगा।

स्कंद पुराण के काशीखंड में मंदिर का जिक्र

मदनपुरा में मिले इस मंदिर का जिक्र स्कंद महापुराण के चौथे खंड ‘काशीखंड‘ में आता है। काशीखंड में काशी की महिमा, उसके आधिदैविक स्वरूप और प्राचीन मंदिरों का विस्तार से वर्णन है। इसमें 100 अध्याय और 11,000 से अधिक श्लोक हैं, जो काशी के तत्कालीन भूगोल, परंपराओं, देवी-देवताओं और मंदिरों की कहानियों पर प्रकाश डालते हैं।

काशीखंड में ‘सिद्धतीर्थ कूप’ का भी उल्लेख है, जिसका अर्थ है एक ऐसा पवित्र कुआँ, जो सिद्धि प्राप्त करने का स्थान माना गया है। मंदिर के पास में ही सिद्धतीर्थ कूप भी है। स्कंद पुराण का काशीखंड वाराणसी की प्राचीनता और धार्मिक महत्व को सिद्ध करता है। शिवजी के महत्व और काशी में उनके वास की कहानियाँ इस ग्रंथ में दी गई हैं।