Home Blog Page 537

पत्थर वाले संविधान पर बवाल, इंसान को तालिबानी आतंकियों की तरह मारा: महाराष्ट्र के परभणी जिले में पत्थर-आगजनी, कलेक्टर ऑफिस में भी तोड़फोड़

महाराष्ट्र के परभणी जिले में पत्थर से बनाई गई संविधान की किताब को एक शख्स ने क्षतिग्रस्त कर दिया। इसके बाद उस शख्स को भीड़ ने बुरी तरीके से पीटा। दावा किया गया कि उसके चेहरे पर पैर रखा गया और उसकी लाठियों से सैकड़ों लोगों के सामने पिटाई हुई। मामला यहीं नहीं रुका बल्कि भीड़ ने परभणी के बाजार में दुकानों और गाड़ियों पर हमला किया और पत्थर बरसाए। महिलाओं की एक भीड़ कलेक्टर ऑफिस में घुसी और यहाँ भी पत्थर चलाए। कुछ महिलाओं ने कलेक्टर के सामने ही हंगामा काट दिया। हिंसा के बाद पुलिस ने कार्रवाई की है।

यह पूरा बवाल मंगलवार (10 दिसम्बर, 2024) को चालू हुआ। यहाँ परभणी रेलवे स्टेशन के बाहर लगाई गई डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर की एक प्रतिमा के पास ही पत्थर की ही संविधान की एक किताब लगाई गई थी। इसे सोपन पवार नाम के एक शख्स ने कथित तौर पर क्षतिग्रस्त कर दिया। इसके बाद इसे भीड़ ने पकड़ लिया और बुरी तरीके से पीटा। इसी घटना का कथित वीडियो वायरल है। इसमें दिखता है कि एक शख्स जमीन पर पडा है और उसके चेहरे पर एक शख्स ने पैर रखा हुआ है। इसके बाद एक और शख्स उसे लाठियों से पीटता है।

संविधान की प्रतिकृति पर हमला के आरोपित को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। हालाँकि, उसकी गिरफ्तारी के बाद भी परभणी में हिंसा हुई। मंगलवार और बुधवार दोनों दिन अम्बेडकरवादी कार्यकर्ताओं ने रैलियाँ निकाली। बुधवार (11 दिसम्बर, 2012) को परभणी में सड़क पर आई भीड़ ने आगजनी की। उन्होंने सड़क पर टायर जलाए। कुछ दुकानों में भी तोड़फोड़ की गई। यहाँ कड़ी गाड़ियों को भी निशाना बनाया गया है। कुछ लोग नीले झंडे और लाठी-डंडे हाथ में लिए नजर आए। इस प्रदर्शन में कुछ हरे झंडे और टोपी वाले लोग भी दिखे।

विरोध प्रदर्शन करने वाली कुछ महिलाएँ इस दौरान परभणी के कलेक्टर ऑफिस में घुस गईं। कलेक्टर के ऑफिस में तोड़फोड़ की गई और उनके सामने भी हंगामा किया गया। कुछ महिलाएँ यहाँ कार्रवाई की माँग को लेकर काफी उत्तेजित हो गईं। इसके बाद उन्हें बाहर ले जाया गया।

इसका एक वीडियो भी वायरल हो रहा है। मामले में पुलिस ने कानून व्यवस्था बनाने के लिए निषेधाज्ञा लागू कर दी है। कहीं-कहीं पुलिस को एक्शन भी लेना पड़ा है। मामले में दलित नेताओं ने कार्रवाई की माँग की है। पुलिस ने अभी तक 40 लोगों को इस हिंसा के संबंध में गिरफ्तार किया है।

बसपा सुप्रीमो मायावती ने भी इस मामले में बयान दिया है। मायावती ने एक्स (पहले ट्विटर) पर लिखा, “महाराष्ट्र राज्य के परभणी में स्थित भारतरत्न बाबा साहेब डा. भीमराव अम्बेडकर की प्रतिमा एवं संविधान का किया गया अपमान अति-निन्दनीय व शर्मनाक। इस घटना से पार्टी काफी दुःखी व चिन्तित भी है। वहाँ की राज्य सरकार, ऐसे जातिवादी व असामाजिक तत्वों के विरुद्ध तुरन्त सख़्त क़ानूनी कार्रवाई करे, वरना वहाँ हालात् काफी बिगड़ सकते हैं। सभी से शान्ति-व्यवस्था बनाये रखने की अपील।”

रमजान (‘शांति’ का महीना) में नमाज कर निकली भीड़ ने बुद्ध-महावीर की तोड़ी थी मूर्तियाँ, अखिलेश सरकार ने कोर्ट को बताया था ‘मनोरंजन’ के लिए थीं प्रतिमाएँ

मुस्लिमों का एक कॉन्सेप्ट है। इसका नाम है ‘उम्माह’, वैसे तो इसका अर्थ होता है राष्ट्र, लेकिन इसका प्रैक्टिकल मतलब होता है कि पूरी दुनिया के मुस्लिम एक हैं। यानि सूडान का मुस्लिम बांग्लादेश के मुस्लिम का साथ देगा, क्योंकि वह उसका इस्लामी भाई है। इसी के चलते 1920 के दशक में जब तुर्की में खलीफा को हटाया गया, तो भारत में मुस्लिमों ने विद्रोह कर दिया। यह कोई अकेली ऐसी घटना नहीं है। भारत लगातार ऐसी घटनाएँ देखता आया है। ऑपइंडिया आपके लिए 2012 की ही एक ऐसी घटना की कहानी लाया है।

यह मामला उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से जुड़ा हुआ है लेकिन इसके तार असम-म्यांमार तक जुड़े हुए हैं। घटना 2012 की है। इसकी शुरुआत होती है लखनऊ से सैकड़ों-हजारों किलोमीटर दूर असम और म्यांमार से। म्यांमार में रोहिंग्या और बौद्धों के बीच लड़ाई होती है। म्यांमार की फ़ौज रोहिंग्याओं को भागने पर मजबूर कर देती है। रोहिंग्याओं के गाँव जलाए जाते हैं। दूसरी तरफ असम में मुस्लिम 4 बोडो लड़कों को मार देते हैं। इससे दोनों समुदाय में दंगा भड़कता है। असम जल उठता है। कुछ मुस्लिम भी मारे जाते हैं।

इससे पूरे देश में रहने वाला मुस्लिम गुस्सा हो जाता है। रमजान के ‘पवित्र’ महीने के अंतिम जुमे की नमाज, यानि अलविदा की नमाज के बाद एक विरोध प्रदर्शन का ऐलान होता है। मुस्लिमों के जमीयत-उलेमा-ए-हिन्द जैसे संगठन कहते हैं कि असम और म्यांमार में मुलिमों पर जुल्म हो रहा है जिसके खिलाफ हर एक मुस्लिम सड़क पर उतरेगा। यहाँ भी उम्मा का कॉन्सेप्ट लगाया जाता है। ये तारीख थी 17 अगस्त, 2024। दिन तो पहले ही बता दिया गया है कि शुक्रवार।

फोटो साभार: The Hindu

नमाज के बाद हजारों मुस्लिमों की भीड़ सड़कों पर उतरती है। यह पूरी कार्रवाई लखनऊ की टीले वाली मस्जिद से चालू हुई। मुस्लिम भीड़ ने इस मस्जिद से निकलने के बाद तोड़फोड़ चालू की। रोड पर जो दिखा, उसके साथ बदतमीजी की। इसके बाद ये भीड़ इसी इलाके में बने महावीर पार्क (जिसे हाथी पार्क के तौर पर जाना जाता है) में घुसी। यहाँ इसने महावीर स्वामी की मूर्ति क्षतिग्रस्त की। उनकी मूर्ति के साथ बर्बरता की गई।

भगवान महावीर की यह 9 फीट ऊँची पद्मासन प्रतिमा 25 अप्रैल, 2002 को स्थापित की गई थी। तब उत्तर प्रदेश सरकार ने भगवान महावीर की 2600वीं जयंती के अवसर पर यह प्रतिमा स्थापित की थी। पहले हाथी पार्क के नाम से मशहूर इस पार्क का नाम बदलकर भगवान महावीर पार्क कर दिया गया था। भगवान महावीर की प्रतिमा को आचार्य 108 श्री विवेकसागरजी महाराज और अन्य जैन साधुओं के नेतृत्व में जैन समुदाय के सदस्यों द्वारा जुलूस के रूप में लाया गया था। लेकिन जिन जैनों का इस हिंसा से कोई लेना-देना तक नहीं था उनको भी निशाना बनाया गया।

इसी के साथ भीड़ बुद्धा पार्क में भी घुसी। यहाँ इस भीड़ ने बुद्ध की मूर्ति पर हमला किया। टोपी लगे हुए युवाओं ने ध्यान की मुद्रा में बैठे बुद्ध की मूर्ति पर हमला किया। लोहे के डंडे और साइन बोर्ड से उनकी मूर्ति को तोड़ने की कोशिश की गई। इस पूरे वाकये की तस्वीरें आज भी जब तब सामने आती हैं। बुद्ध पर होते इस हमले को देखकर आपको अफगानिस्तान के बामियान की याद आ जाएगी। वहाँ भी तालिबान (वैसे तो तालिब का मतलब छात्र होता है, लेकिन यहाँ आतंकी से है) वालों ने बुद्ध की मूर्तियों को विस्फोटक लगा कर उड़ा दिया था।

ये सब काम वहाँ हो रहा था जहाँ पर इस देश के सबसे बड़े सूबे की सरकार बैठती है। लेकिन सरकार भला उन पर क्यों कर एक्शन लेने लगती। क्योंकि सरकार थी समाजवादी पार्टी की। उसके मुखिया थे अखिलेश यादव। ये वही अखिलेश यादव थे, जिनके राज में बरेली में कांवड़ यात्रा के डीजे बंद हो जाते थे। जब पूरे दिन मुस्लिम भी ने खूब तबाही मचा ली, तब जाकर कहीं पुलिस ने उनको तितर बितर किया। इस हिंसा के बाद जैन और बुद्ध समाज ने प्रश्न उठाए। उन्होंने पूछा कि आखिर उनके आराध्य का इसमें क्या दोष था।

लेकिन जैन समाज के साथ मजाक यहीं तक नहीं सीमित था। जब हाई कोर्ट में इस बात के लिए याचिका डाली गई कि सरकार उन लोगों पर कार्रवाई करे जिन्होंने महावीर स्वामी की मूर्ति तोड़ी और नई मूर्ति भी लगवाए तो अखिलेश सरकार ने चौंकाने वाला जवाब दिया। अखिलेश सरकार के नौकरशाह ने हाई कोर्ट को कहा कि साहब वो उन मूर्तियों का कोई ख़ास धार्मिक महत्त्व थोड़े था, वो तो हमें सैर-सपाटे के लिए आने वालों की मौज के लिए लगाई गईं थी। अखिलेश सरकार के दूसरे नौकर शाह ने यह तक कह दिया कि साहब मूर्ति टूटी ही नहीं।

इस पर कोई ने फटकार लगाई। इसके बाद कोर्ट को आदेश देना पड़ा कि मूर्तियाँ या तो रिपेयर करवाओ या फिर नई लगवाओ। सरकार ने भरोसा दिया कि लगवाएँगे लेकिन जब कई दिनों तक कार्रवाई नहीं हुई, तब फिर कोर्ट ने फटकारा। कोर्ट ने 2017 में सरकार को इस बात पर भी फटकार लगाई कि आखिर उन लोगों पर क्या कार्रवाई हुई है जिहोने यह मूर्तियाँ तोड़ी थी। इस पर भी तब की सरकार ने कोई साफ़ जवाब नहीं दिया।

लेकिन ये सब कहानी अब क्यों बताई जा रही है? दरअसल, इस मामले में जिन लोगों ने जनहित याचिका लगाई थी उनके वकील थे हरि शंकर जैन। हरि शंकर जैन के ही बेटे विष्णु शंकर जैन अब संभल में लड़ाई लड़ रहे हैं। उनको धमकियाँ दी जा रही हैं, मुस्लिमों से कहा जा रहा है कि उनका चेहरा पहचान लें। उन्होंने इस मामले में शिकायत भी दर्ज करवाई है। उन्होंने इस लखनऊ वाले मामले की याद भी लोगों को दिलाई है। उन्होंने कोर्ट का वह आदेश साझा किया है।

जिस हिंदू बच्ची का पाकिस्तान में हुआ जन्म, वो भारत आकर बनी डॉक्टर, CAA के कारण बदली किस्मत: अब तक 1222 लोग बने हिंदुस्तानी

गुजरात के अहमदाबाद में पिछले 20 साल से रह रहे 56 पाकिस्तानी नागरिकों को भारतीय नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के चलते भारत की नागरिकता मिली। खुद गृह राज्य मंत्री हर्ष संघवी ने 11 दिसंबर को अहमदाबाद में एक कार्यक्रम के दौरान उन्हें नागरिकता के प्रमाण प्रत्र सौपें। इस अवसर पर, गृह राज्य मंत्री ने सभी नए नागरिकों को बधाई दी और कहा, “मुस्कुराइए, अब आप इस महान देश भारत के नागरिक हैं।”

बता दें कि इन 56 पाकिस्तानी नागरिकों में से एक प्रमुख नाम हिशा कुमारी का है। हिशा का जन्म साल 1998 में पाकिस्तान में हुआ था। वह 2013 में अपने परिवार के साथ भारत आईं और यहाँ आकर 8वीं से आगे की पढ़ाई की। 2017 में उनका एडमिशन अजमेर के मेडिकल कॉलेज में हुआ और अब वह पढ़ाई पूरी करके निकल चुकी हैं।

हिशा भारत की नागरिकता मिलने पर कहती हैं- “मुझे मेरी पहचान लौटाने के लिए देश के पीएम मोदी, गृहमंत्री अमित शाह का आभार। ये नागरिकता मिलने के बाद मैं कहीं भी अप्लाई कर सकती हूँ।” उन्होंने नागरिकता मिलने पर अपने प्रमाण पत्र के साथ अपनी तस्वीर भी दिखाई और बोलीं कि भारत का नागरिक होने पर गर्व महसूस हो रहा है।

गौरतलब है कि साल 2017 से मार्च 2024 तक के बीच में मोदी सरकार 1167 पाकिस्तानी नागरिकों को भारतीय नागरिकता का प्रमाण पत्र दे चुकी है और इन 55 लोगों को मिलाकर ये संख्या 1222 पहुँच गई है। राज्य गृहमंत्री हर्ष संघवी ने भी इस बाबत जानकारी दी कि पिछले छह महीनों में अकेले गुजरात में 50 से अधिक पाकिस्तानी हिंदुओं को यह प्रमाणपत्र मिला है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि पहले इन लोगों को दिल्ली जाकर लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता था, लेकिन अब स्थानीय स्तर पर ही उनकी समस्याओं का समाधान किया जा रहा है।

ब्रेन ट्यूमर से पीड़ित मासूम बच्ची को ठीक करने का झाँसा, चर्च में रखा 40 दिन: अंधविश्वास के चक्कर में 8 साल की दलित लड़़की की मौत

आंध्र प्रदेश के नेल्लोर में अंधविश्वास के चक्कर में 8 साल की एक दलित बच्ची की जान चली गई। पीड़िता का नाम भव्यश्री है, जिसे ब्रेन ट्यूमर था। उसके ब्रेन ट्यूमर का इलाज करने का दावा कर उसे 40 दिनों तक चर्च में रखा गया था। इस दौरान इलाज के बजाय पीड़िता से मज़हबी क्रिया-कलाप करवाए गए। पादरी ने पीड़ित परिवार को ‘सब सही हो जाएगा’ जैसे झाँसे दिए। आखिरकार भव्यश्री ने सोमवार (9 दिसंबर 2024) को दम तोड़ दिया।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, घटना नेल्लोर के कालुवई की है। यहाँ की दलित बस्ती के एक गरीब परिवार में 8 वर्षीया भव्यश्री एक बहन और एक भाई के साथ रहती थी। पिछले कुछ दिनों से भव्यश्री की तबीयत खराब चल रही थी। भव्यश्री को अक्सर उल्टियाँ होती थीं और सिर में दर्द रहता था। परिजनों ने जाँच करवाई तो बच्ची को ब्रेन ट्यूमर निकला। डॉक्टरों ने सर्जरी कराने के लिए कहा, जिसका इलाज काफी ज्यादा था।

भव्यश्री के पिता लक्ष्मैया और माँ लक्ष्मी को कुछ रिश्तेदारों ने इलाज कराने के बजाय चर्च में झाड़-फूँक कराने की सलाह दी। इस सलाह पर यकीन करके लक्ष्मैया और लक्ष्मी अपनी बेटी को लेकर अडुरपल्ली के एक चर्च में गए। यहाँ चर्च के स्टाफ और पादरी ने झाँसा दिया कि प्रार्थना करने से बीमारी ठीक हो जाएँगी। पीड़ित परिवार ने उनकी बातों पर यकीन कर लिया।

पीड़िता को चर्च में ही रोककर उससे तमाम ईसाई क्रिया-कलाप शुरू कराए जाने लगे। हालाँकि, इससे भव्यश्री की तबीयत सुधरने के बजाय बिगड़ती चली गई। लगभग 40 दिनों तक भव्यश्री के माता-पिता अपनी बेटी को लेकर चर्च में पादरी द्वारा बताए गए तामझाम करते रहे। तबीयत बिगड़ने के बजाय वहाँ सब ठीक हो जाने का झाँसा दिया जाता रहा। आखिरकार सोमवार (9 दिसंबर) को भव्यश्री ने दम तोड़ दिया।

आत्महत्या किए अतुल सुभाष के साले और सास का वायरल वीडियो, मीडिया को दे रहे केस की धमकी: निकिता का वकील बोला- कोर्ट इज़ राइट

बेंगलुरु में बीवी और ससुराल वालों की प्रताड़ना से मजबूर होकर एक MNC कम्पनी में काम करने वाले अतुल सुभाष ने आत्महत्या कर ली थी। इस मामले में उनकी पत्नी निकिता सिंहानिया के परिजनों ने अब मीडिया को भी धमकाया है। मीडिया अतुल के ससुराल वालों से उनका पक्ष जानने पहुँची थी। उन्होंने इस बीच मीडिया को कैमरा बंद करने और उन पर भी मुकदमा ठोंकने की धमकी दे दी। निकिता सिंहानिया के वकील ने इस बीच कोर्ट और घूस माँगने की आरोपित महिला जज का बचाव किया है।

अतुल सुभाष की आत्महत्या का मामला सोशल मीडिया और मीडिया पर छाने के बाद कुछ पत्रकार जौनपुर स्थित निकिता सिंहानिया के घर पर पहुँचे थे। यहाँ पर मौजूद निकिता की माँ और उसके भाई ने पत्रकारों के साथ बदतमीजी की। उन्होंने अतुल की आत्महत्या के संबंध में कोई भी जानकारी देने से मना कर दिया। उन्होंने कैमरे पर पत्रकारों से बात भी नहीं की। जब पत्रकारों ने उनसे कैमरे पर बोलने को कहा तो वह इस मामले में भी मुकदमा करने की धमकी देने लगे। इसका एक वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हुआ है।

वहीं इस मामले में निकिता सिंहानिया के वकील दिनेश कुमार मिश्रा ने मीडिया से कहा है कि अतुल सुभाष ने इस मामले में जज रीता कौशिक को दोषी बताया है जो सही नहीं है। वकील दिनेश कुमार मिश्रा ने बताया कि अतुल सुभाष की सैलरी लगभग ₹84000 थी, इसमें से ₹40000 उन्हें भरण पोषण देने का आदेश दिया गया था। दिनेश मिश्रा ने कहा कि अगर अतुल को यह सही नहीं लगा तो वह ऊँची अदालत में जा सकते थे। उन्होंने कहा कि कोर्ट इस मामले में सही है।

वकील दिनेश मिश्रा ने अतुल सुभाष द्वारा जज रीता कौशिक पर लगाए गए आरोपों को लेकर भी बात की। उन्होंने कहा कि जज एकदम सही हैं और हम उनके साथ काम करते हैं। वकील दिनेश मिश्रा ने बताया है कि ऐसे मामले में जो साधारण प्रक्रिया होती है, वही अपनाई गई थी। उन्होंने इस बात पर इनकार किया कि कोर्ट की प्रक्रिया और प्रताड़ना के कारण आत्महत्या करना सही था। उन्होंने कहा कि बाकी अगर कोई मामला हुआ होगा तो उन्हें इसकी जानकारी नहीं है।

गौरतलब है कि हाल ही में अतुल सुभाष ने सोमवार (10 दिसम्बर, 2024) को आत्महत्या कर ली थी। उन्होंने इससे पहले 24 पन्नों का एक सुसाइड नोट भी छोड़ा था। इसमें उन्होंने बताया था कि किस तरह उनकी पत्नी और उसके परिजनों ने उनको परेशान किया और उनके बेटे से भी नहीं मिलने दिया। उनकी पत्नी इस तरह प्रताड़ित करती थी कि 4 साल के अपने बेटे को बाप से बात भी नहीं करने देती थी। उन्होंने बताया था कि वह 2 वर्ष में 120 बार केस के लिए जौनपुर जा चुके थे और वित्तीय के साथ ही मानसिक रूप से परेशान थे।

इस मामले में निकिता सिंहानिया और उनके परिजनों के खिलाफ एक केस दर्ज किया गया है। मामले में बेंगलुरु पुलिस भी उत्तर प्रदेश पूछताछ करने के लिए जा रही है।

गोतस्करी में अचानक क्यों आने लगे हिंदुओं के भी नाम?: षड्यंत्र के पीछे कई सरगना, कहीं डिफेंस लाइन के तौर पर इस्तेमाल, कोई ₹200 देकर नाबालिग हिंदुओं का कर रहा ब्रेनवॉश

उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले में पुलिस ने 8 दिसंबर 2024 को गोतस्करों के एक गिरोह को पकड़ा। इसका सरगना उमर था, जो हिन्दू के वेश में गोहत्या का रैकेट को चला रहा था। वह गले में भगवा गमछा रखता, माथे पर तिलक लगाता और हाथ में त्रिशूल रखता था। उसे देखकर लोग उसे हिन्दू संत समझते थे। इस दौरान गोतस्करी के कई ऐसे रैकेट का खुलासा हुआ, जिसमें आरोपित हिन्दू समुदाय के हैं।

गाय को माँ मानने वाले हिन्दुओं की गोकशी में गिरफ्तारी आम लोगों के लिए बेहद नया और चौंकाने वाली घटना है। ऑपइंडिया ने इन घटनाओं की बारीकी से पड़ताल की और इन घटनाओं के तमाम पहलुओं को खंगाला गया। इस पड़ताल में तमाम ऐसे कारणों का खुलासा हुआ, जो कई अनसुलझे सवालों का जवाब देते हैं।

क्या कहते हैं सरकारी आँकड़े

उदाहरण के लिए उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले को लिया जाए तो गौवध अधिनियम में दर्ज केसों में हिन्दुओं की संलिप्तता का प्रतिशत लगभग 15 है। साल 2024 में जनवरी से नवंबर तक पूरे जिले के विभिन्न थानों में गौवध अधिनियम के कुल 27 केस दर्ज हुए हैं। इसमें 4 मुकदमों में हिन्दू समुदाय के आरोपित नामजद किए गए हैं।

ये मुकदमे बुढ़ाना, नई मंडी और चरथावल पुलिस स्टेशनों में दर्ज हुए हैं। ऑपइंडिया द्वारा जुटाई गई जानकारी में यह भी निकल कर आया कि इन मुकदमों में हिन्दू आरोपितों की संलिप्तता कटे मांस के ट्रांसपोर्ट करने, जीवित गायों को वाहनों में एक जगह से दूसरी जगह पहुँचाने तथा गायों की खरीद-बिक्री करने जैसे कामों में पाई गई है।

एक संदिग्ध की गलती से कई हिन्दू फँसे

गोतस्करी में हिन्दुओं की संलिप्तता का सबसे चर्चित मामला हाल ही में नोएडा से सामने आया था। 9 नवंबर 2024 को ग्रेटर नोएडा में गोरक्षकों के सहयोग से नोएडा पुलिस ने गोमांस की एक बड़ी खेप बरामद की थी। इससे एक ऐसे नेटवर्क का खुलासा हुआ है, जिसमें गाय पश्चिम बंगाल में काटी जाती थी और उसका मांस कंटेनर में भरकर नोएडा लाई जाती थी। यहाँ इसे एक कोल्ड स्टोरेज में रखा जाता था।

फिर इस मांस को दिल्ली-एनसीआर और उत्तराखंड सहित कई जगहों पर सप्लाई की जाती थी। पुलिस ने 185 टन गोमांस बरामद किए जाने की बात कही है। एक अनुमान के मुताबिक, इतना मांस कम-से-कम 8-10 हजार गायों को काटकर जमा किया गया होगा। जिस ट्रक में ये मांस नोएडा लाया गया था, उसे शिव शंकर चला रहा था, जबकि ट्रक में खलासी सचिन था। दोनों को गिरफ्तार कर लिया गया है।

जिस जगह यह गोमांस रखा गया था, उस कोल्ड स्टोरेज का मालिक पूरन जोशी और मैनेजर अक्षय सक्सेना है। जिस कंपनी के जरिए ये गोमांस सप्लाई होती थी, उसके डायरेक्टर मोहम्मद खुर्शिदुन नबी को इन दोनों के साथ गिरफ्तार कर लिया गया है। जाँच के दौरान पुलिस को इस केस में शोएब हक्कानी के साथ अविनाश कुमार और राकेश सिंह की मिलीभगत की जानकारी हुई थी।

ये तीनों टोरो प्राइमरी प्राइवेट लिमिटेड नाम की कम्पनी में स्टाफ हैं। इस कम्पनी पर कोल्ड स्टोरेज में रखे गए गोमांस की खरीद-फरोख्त का आरोप है। इस घटना का खुलासा करने में सबसे अहम भूमिका निभाने वाले गौरक्षक वेद नागर ने ऑपइंडिया से बात की। वेद ने हमें बताया कि पैसों के लालच में पूरन जोशी नामक प्रमुख आरोपित ने बाकी सभी हिन्दुओं को अपने अपराध में बलि का बकरा बना डाला है।

उन्होंने बताया कि ट्रक ड्राइवर शिव शंकर और खलासी सचिन को पता ही नहीं था कि जिस ट्रक को वो ला रहे हैं उसमें क्या लोड किया गया है। पश्चिम बंगाल में गोमांस की लोडिंग के समय भी इन दोनों को कहीं बहाने से भेज दिया जाता था और लोड हो जाने के बाद उन्हें बुला लिया जाता था। इसके बाद उन्हें एक मैप देकर उसके अनुसार चलने के लिए कह दिया जाता था।

वेद नागर का दावा है कि कोल्ड स्टोरेज के मालिक पूरन जोशी के इंटरनेशनल गोतस्करों से रिश्ते हैं। उन्होंने आशंका जताई है कि पूरन जोशी ने इस्लाम कबूल कर लिया है। नागर का कहना है कि खुद को हिन्दू कहने वाला व्यक्ति गोमांस की तस्करी नहीं कर सकता है। इस मामले में गिरफ्तार अन्य हिन्दुओं को नागर ने पूरन जोशी का सहयोगी भर बताया हैं, जिन्हें इसके बारे में कुछ भी पता नहीं था।

नैतिकता और संस्कारों में कमी बन रही वजह

UP के बाराबंकी जिले में पड़ने वाले सतरिख थानाक्षेत्र में पुलिस ने सोमवार (9 नवंबर 2024) को मुठभेड़ के बाद 7 गोतस्करों को गिरफ्तार किया था। गिरफ्तार आरोपितों के पास से चाकू, तमंचे, वाहन आदि बरामद हुए थे। इन 7 गोतस्करों में सरवर, गुफरान, मोहम्मद उमर, नबीजान और मोहम्मद अजीज के अलावा अंकुल गुप्ता नाम का एक युवक भी था। इन आरोपितों ने पुलिस पर गोली भी चलाई थी।

ऑपइंडिया ने इस मामले में निरंजनी अखाड़े के महामंडलेश्वर स्वामी वेदमूर्तिनंद सरस्वती से बात की। स्वामी वेदमूर्तिनंद ने बताया कि वर्तमान समय में हिन्दुओं के घरों में अभिभावक अपने बच्चों को मॉर्डन बनाने के चक्कर में संस्कारों से दूर करते जा रहे हैं। कालांतर में वही संतानें गोहत्या जैसे पापों में शामिल हो रही हैं जिनके माता-पिता ने उनको कभी धर्म, गाय, गंगा और गीता आदि की शिक्षा नहीं दी।

स्वामी वेदमूर्तिनंद ने हमें आगे बताया कि वो गोहत्या और गोवंश की तस्करी में बढ़ रही हिन्दुओं की संख्या से चिंतित हैं और आगामी महाकुंभ में तमाम साधु संतों के साथ वे इस मुद्दे पर गहन मंथन करेंगे। उन्होंने कहा कि इस मंथन के बाद साधु-संत इस मामले में किसी समाधान की तरफ बढ़ेंगे।

लग्जरी जीवन की चाह में पाप

उत्तर प्रदेश के बरेली जिले में अक्टूबर 2024 में पुलिस ने गोतस्करी के एक रैकेट का खुलासा किया था। इस रैकेट में प्रताप मौर्य व उसका भाई बबलू शामिल पाए गए थे। ये दोनों देवरनियाँ थाना क्षेत्र के शरीफनगर गाँव के एक गोशाला के केयरटेकर थे। आरोप है कि इस गोशाला से गोहत्या के लिए गायें भेजी जाती थीं। इनके खरीदारों में अधिकतर मुस्लिम समुदाय के लोग थे।

पुलिस ने इन दोनों को गिरफ्तार करके जेल भेज दिया था। आरोपितों में कुछ मुस्लिम भी थे, जो गायों को काटने का काम करते थे। इनकी गिरफ्तारी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले बरेली के विश्व हिन्दू परिषद के पदाधिकारी हिमांशु पटेल से ऑपइंडिया ने बात की। हिमांशु ने बताया कि लम्बे समय से इस नेटवर्क पर उनकी नजर थी। प्रताप और बबलू गोशाला से 2-3 हजार रुपया प्रति गाय बेच देते थे।

इन गायों में अधिकतर बीमार और बूढ़े गोवंश होते थे, जिन्हें मुस्लिम समुदाय के कसाई जंगलों में ले जाकर उन्हें काट देते थे। जब हमने हिमांशु पटेल से प्रताप मौर्य और उसके भाई बबलू की गोतस्करी में मिलीभगत की वजह पूछी तो उन्होंने बताया कि प्रताप और बबलू लग्जरी लाइफ के शौकीन थे। कुछ पैसों के लालच में वे गोहत्या जैसे अपराध में शामिल हो गए।

हिमांशु ने आगे बताया कि दोनों आरोपित भाई आर्थिक रूप से कमजोर थे। वे गौशाला में काम करते थे और इन दोनों को 6 से 7 हजार रुपए प्रतिमाह वेतन मिलता था। हालाँकि, महंगे शौक ने इन्हें हिन्दू विरोधी अपराध की तरफ धकेल दिया। बकौल हिमांशु पटेल, वो और उनका संगठन गोतस्करी में शामिल हर वर्ग, मत और मज़हब के व्यक्ति को एक ही जैसी सजा की माँग करता है।

गोतस्करी में डिफेंस लाइन के तौर पर हिन्दुओं का इस्तेमाल

ऑपइंडिया ने हैदराबाद से भाजपा विधायक टी राजा सिंह से बात की। टी राजा सिंह ने हमें बताया कि गोहत्या की जड़ में चरमपंथी मुस्लिम समुदाय के लोग होते हैं, लेकिन वो बेहद गरीब हिन्दुओं को लालच देकर उन्हें अपनी डिफेन्स लाइन के तौर पर प्रयोग में लाते हैं। राजा सिंह का कहना है कि गोतस्करी में उन्हीं हिन्दुओं को लगाया जा रहा है, जो गाय के महत्व को नहीं जानते और बेहद गरीब होते हैं।

राजा सिंह ने बताया कि तस्करी में इस्तेमाल ट्रक ड्राइवर और क्लीनर के साथ-साथ लेबर भी हिन्दू होते हैं। उन्होंने इसे पकड़े जाने पर मारपीट आदि से बचने के लिए मुस्लिम तस्करों द्वारा अपनाई जा रही डिफेंस लाइन बताया। तेलंगाना का जिक्र करते हुए राजा सिंह ने कहा कि हिन्दुओं को गलत साबित करने की सोच में कई बार मुस्लिम लोग बकरीद में गरीब हिंदू से ही गाय की कुर्बानी तक करवा देते थे।

गोवंश के खिलाफ राजनैतिक बयानबाजी फैला रही नफरत

भाजपा विधायक राजा सिंह ने गोतस्करी में कुछ हिन्दुओं के शामिल होने की वजह विपक्षी दलों के नेताओं की बयानबाजी बताया है। अखिलेश यादव का उदहारण देते हुए राजा सिंह ने कहा कि वो आए दिन सड़क से लेकर संसद तक बेसहारा गायों को ही देश की सबसे बड़ी समस्या बता रहे हैं। इससे उनकी बातों पर जरा-सा भी विश्वास करने वाले हिन्दुओं में गोमाता के प्रति नफरत का भाव जगता है।

राजा सिंह ने अखिलेश यादव को डिब्बे का दूध पीने वाला बताते हुए लोगों से उनकी बातों पर ध्यान नहीं देने की भी अपील की है। उन्होंने हमें बताया कि कोई भी हिन्दू गोहत्या को जायज नहीं बताता है। वह गाय को माँ मानता है और उसे काटने वाले को अपने धर्म का शत्रु मानता है। बकौल राजा सिंह, कुछ हिन्दुओं को मोहरा बनाकर पूरे समुदाय पर अंगुली उठाने की साजिश रचने वालों के मंसूबे पूरे नहीं होंगे।

गोतस्करी में शामिल हिन्दुओं पर पुलिसकर्मियों के मत

ऑपइंडिया ने गोतस्करी हिन्दुओं के शामिल होने की वजह की पड़ताल में कुछ रिटायर्ड और वर्तमान पुलिसकर्मियों से बात की। नाम नहीं छापने की शर्त पर पुलिसकर्मियों ने साफ तौर पर कहा कि गोतस्करी में हिन्दुओं के शामिल होने की मूल वजह उनका लालच है। हालाँकि, उन सभी ने यह भी कहा कि हिन्दुओं की अधिकतम मिलीभगत गायों को यहाँ से वहाँ ले जाना तक ही सीमित है।

इसी वजह से अधिकतर ड्राइवर, खलासी व उनके कुछ अन्य सहयोगी पुलिस द्वारा साजिश में शामिल मानकर पकड़े जाते हैं। एक पुलिस इंस्पेक्टर ने ऑपइंडिया को यह भी बताया कि हिंदुओं के सामाजिक ताने-बाने में गोहत्यारा को कभी स्वीकार नहीं किया जाता। ऐसे में लिस्टेड गोतस्कर एक साजिश के तहत अपने साथ में हिन्दू समाज के किसी व्यक्ति को शामिल करने की पूरी कोशिश करते हैं।

पुलिस ने इंस्पेक्टर ने आगे बताया कि गोस्तकरों के साथ अगर कोई हिंदू रहेगा तो लोग उस पर शंका नहीं करेंगे। अगर शंका करके पकड़ भी लिए तो केस दर्ज होने में मुश्किल आएगी। एक पुलिसकर्मी का यह भी कहना है कि कई बार गोतस्कर ही अपने क्षेत्र में सक्रिय गोरक्षकों को कानूनी जाल में फँसाने के लिए उनका नाम ले लेते हैं। इस तरह के आरोप जाँच के बाद झूठे भी पाए जाते हैं।

गोतस्करी के लिए नाबालिग हिन्दुओं का ब्रेनवॉश

एक अन्य पुलिस अधिकारी ने बताया कि गोहत्यारों द्वारा नाबालिग हिन्दू बच्चों का ब्रेनवॉश करके महज 200 से 500 रुपए में गोतस्करी जैसे अपराध करवाए जा रहे हैं। रायबरेली के थाना जगतपुर में साल 2022 के एक केस में गिरफ्तारी के बाद यह भेद खुला। हमें बताया गया कि 13-14 साल के नाबालिगों के माता-पिता को भी नहीं पता था कि उनका बेटा गोतस्करी में शामिल है।

लगभग आधे दर्जन नाबालिगों को दिन भर अलग-अलग इलाकों में घूमने के लिए प्रतिदिन के हिसाब से 200 से 300 रुपए मिलते थे। उनको कहा जाता था कि कहीं भी बेसहारा गोवंश दिखे तो फ़ौरन उसे किसी पेड़ से बाँध कर फोन पर सूचना दो। जब गोवंश बाँध दिए जाते थे तो गोतस्कर अपने वाहन से उन्हें लाद कर काटने के लिए कहीं दूर लेकर चले जाते थे।

ऐसे चलता है गोहत्यारों का अर्थतंत्र

एक रिटायर्ड पुलिस अधिकारी ने ऑपइंडिया को बताया कि एक स्वस्थ्य सांड (नर गोवंश) को काट कर गोतस्कर लगभग 10 से 15 हजार रुपए कमाते हैं। इनके मांस, हड्डी और खालों को अलग-अलग ठिकानों पर बेचा जाता है। मांस खाने, जबकि खाल जूते-जैकेट आदि बनाने के काम में आती हैं। पूर्व अधिकारी का दावा है कि एक गोतस्कर का तंत्र मांस से लेकर खाल तक के वैध-अवैध कारोबार से जुड़ा होता है।

नाम न छापने की शर्त पर उस पूर्व अधिकारी ने बताया कि यही वजह है कि जो गोतस्करों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई के बावजूद वो जल्द ही जेलों से छूट जाते हैं, क्योंकि उनकी पैरवी उच्चस्तर पर होती है। हमें यह भी बताया गया कि बदलते समय और सरकार में जैसे सख्ती बढ़ती जा रही है उसी का परिणाम है कि अब गोतस्कर अपने डिफेन्स में कुछ हिन्दुओं को लालच देकर अपने साथ रखना शुरू कर चुके हैं।

पुलिस में भी हैं दोनों मानसिकता के अधिकारी/कर्मचारी

हिन्दू और गोरक्षा संगठनों से हुई बातचीत के दौरान हमें बताया गया कि पुलिस विभाग में भी दोनों मानसिकता के अधिकारी और कर्मचारी होते हैं। कुछ पुलिसकर्मी अपने क्षेत्र में लालच के चक्कर में गोतस्करों से मिलकर उनको बढ़ावा देते हैं। हालाँकि, प्रशासन में कई स्टाफ ऐसे भी हैं, जो गोहत्या जैसे मामले में हर प्रकार के दबाव और लालच को दूर रखकर जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाते हैं।

बरेली के विहिप नेता हिमांशु पटेल ने कहा कि कुछ पुलिसकर्मी ऐसे भी हैं, जो अपनी गलतियों को दबाने के लिए उन हिन्दुओं पर केस दर्ज करने की फिराक में लगे रहते हैं जो अपने इलाके में होने वाली गोतस्करी को मुद्दा बनाकर उठाना शुरू कर देते हैं। हिमांशु पटेल ने उम्मीद जताई है कि उत्तर प्रदेश शासन ऐसे प्रशासनिक अधिकारियों को जल्द चिन्हित करके उनको दंडित करेगा।

हर केस होगा दर्ज, तभी काबू में आएँगे गोतस्कर

ऑपइंडिया की जमीनी पड़ताल में पता चला कि जिस भी थानाक्षेत्र में गोकशी होती है, वहाँ के संबंधित प्रभारी मामले को दबाने की भरसक कोशिश में जुट जाते हैं। ऐसा करने के पीछे की मुख्य वजह अपने ऊपर होने वाली विभागीय कार्रवाई से बचना होता है। गोहत्या साम्प्रदायिक तौर पर संवेदनशील मुद्दा माना जाता है। साथ ही विशेषकर उत्तर प्रदेश के वर्तमान शासन में ऐसा नहीं होने देने के सख्त निर्देश हैं।

उत्तर प्रदेश के जिस क्षेत्र में गोकशी की घटनाएँ होती हैं, वहाँ के पुलिस अधिकारी को अपनी कुर्सी खतरे में दिखने लगती है। कुछ पुलिसकर्मियों के साथ हिन्दू संगठन से जुड़े सदस्यों ने नाम नहीं बताने और कैमरे पर नहीं आने की शर्त पर हमें बताया कि अक्सर गोकशी की घटना को प्रशासन द्वारा इन्हीं कारणों से दबाने की कोशिश की जाती है।

उनका कहना है कि अगर उन्हें हर केस दर्ज करके गोतस्करों को चिन्हित करके उन पर कड़ी कार्रवाई के लिए फ्री-हैंड दे दिया जाए तो कुछ एक मामलों में ही तमाम गोतस्कर व गोहत्यारे जेल की सलाखों के पीछे होंगे। उन्होंने इसे दीर्घकालिक समय में सकारात्मक बदलाव लाने वाला संभावित कदम बताया है।

Gandos = गांडोस या गांडोज: डिक्शनरी से लेकर भाषा-वैज्ञानिक से जानिए इसकी परिभाषा, किसके लिए प्रयोग किया जाता है यह ट्रेंडिंग शब्द

मूर्ख हैं वो लोग, जो कहते हैं कि TV मत देखो… TV आपको बीमार कर देगा। मैं तो न जाने कितने दिनों से TV देखता आ रहा हूँ, सर्दी-खाँसी-बुखार के अलावा कभी सीरियस बीमार हुआ हूँ, यह याद नहीं। जो मना करते हैं, उनका संदर्भ वो जानें… मैं तो ज्ञानवर्धन के लिए TV देखता हूँ, देखता रहूँगा।

चित्रहार शब्द मैंने TV से ही सीखा। चड्डी पहन के फूल भी खिल सकता है, यह TV ने ही बताया। कितना गिनाऊँ! लेटेस्ट मतलब एकदम हाल-फिलहाल में भी एक नया शब्द सिखा – Gandos. पहली बार में समझ नहीं आया, इसलिए मेरे अंदर का खोजी पत्रकार जाग गया – खोजना और खोदना शुरू कर दिया।

ऑक्सफोर्ड की मोटी और बड़ी भारी-भरकम डिक्शनरी पर भरोसा था। सबसे पहले उसे ही पलटा। निराशा हाथ लगी। अंग्रेज कहने को सिर्फ एडवांस हैं, हकीकत में हैं पिछड़े। Gandos जैसा ट्रेंडिंग शब्द भी जिस भाषा-कोष में न मिले, वो काहे का एडवांस भला!

अंग्रेजी से हारा तो हिंदी का सहारा लिया। यहाँ सफलता के करीब-करीब पहुँच गया था… लेकिन निराशा हाथ लगी। Gandos का हिंदी उच्चारण गांडोस या गांडोज तो नहीं मिला लेकिन इससे मिलता-जुलता एक शब्द मिल गया। इसलिए ऊपर लिखा कि करीब-करीब सफल हो चुका था। मेरी सर्च ‘गाँडू’ शब्द पर आकर रुक गई। 150000+ शब्दों वाली ‘नालंदा विशाल शब्द सागर’ डिक्शनरी के अनुसार गाँडू = गुदा मैथुन कराने वाला, डरपोक, बुजदिल, निकम्मा आदि होता है।

दोनों भाषाओं ने निराश ही किया एक तरीके से। थक हार कर मैंने गूगल बाबा का सहारा लिया। गूगल ने निराश नहीं किया। हूबहू Gandos शब्द खोज कर निकाल दिया। जब उस पेज को खोल कर पढ़ा तो जरूर निराशा हाथ लगी। वो इसलिए क्योंकि इस पेज में Gandos सरनेम वाले अमेरिकी परिवार की जानकारी दी गई है। इंडियन TV मीडिया में अमेरिकी परिवार पर चर्चा क्यों? इसलिए गूगल से भी धोखा ही मिला, यह कह सकते हैं।

मैं मीडिया इंडस्ट्री में काम करता हूँ। अपना धंधा ही कॉन्टैक्ट बनाए रखने पर चलता है। तो समझ लीजिए कि मेरे पास भी कुछ कॉन्टैक्ट्स हैं। शब्दकोष से थक कर गूगल पर गिरे… अंत में जब बात समझ में नहीं आई तो इन्हीं कॉन्टैक्ट्स को फोन घुमाया। बात इंडियन TV मीडिया पर पूरे दिन छाए एक शब्द की थी, तो मैंने लगभग सभी राज्यों के अपने कॉन्टैक्ट्स को फोन कर डाला। अंधेरे में चलाया तीर गुजरात और महाराष्ट्र में जाकर लगा सटीक निशाने पर।

गुजराती भाषा पर पकड़ रखने वाले प्रोफेसर लिंकन से जब हमने बात की तो उन्होंने विस्तार से इस शब्द की व्याख्या की। उन्होंने बताया कि गुजराती भाषा में ‘Gandos’ का सीधा-सीधा अर्थ है ‘पागल’। Gando यानी गाँडो (ગાંડો) का अर्थ ही है पागल या ऐसा व्यक्ति जिसके पास दिमाग नहीं है, या फिर दिमाग है पर उसका उपयोग नहीं करता।

जब गुजरात के सौराष्ट्र इलाके का कोई व्यक्ति अपनी स्थानीय (काठियावाड़ी) भाषा में Gandos कहता है, उसका अर्थ होता है ‘गाँडो + छे’ (ગાંડો છે) यानी ‘पागल है’ या ‘मुर्ख है’। प्रोफेसर साहब ने थोड़े कड़क अंदाज में यह भी कहा कि इस शब्द का प्रयोग गुजराती सदियों से करते आ रहे हैं। इसलिए भाजपा के किसी नेता को इसके उद्भव का श्रेय नहीं दिया जा सकता।

आपको बता दें कि प्रोफेसर लिंकन ही वो शख्स हैं, जिन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डोलंड ट्रंप (Donald Trump) को गुजराती के 2-4 शब्द सिखाए थे, जिनका प्रयोग उन्होंने न सिर्फ भारत दौरे पर किया बल्कि अमेरिका में रह रहे गुजरातियों को भी अपने शब्दों से मोहित कर बंपर जीत हासिल की।

महाराष्ट्र में जिन शख्स से मैंने बात की, उन्होंने तो एक अलग आयाम ही खोल दिया। महिला सशक्तीकरण की प्रखर आवाज श्रीमती सिद्धी जी ने बताया कि यह एक गाली है, जिसका मतलब होता है – Asshole. Gandos = Asshole, ऐसा सुन कर ही मैं सदमे में चला गया। श्रीमती सिद्धी जी ने भी निराशा व्यक्त की और कहा कि बच्चे-बच्चे तक इसका प्रयोग करते हैं।

मैं तो सदमे में इसलिए था क्योंकि अगर यह इतनी गंदी गाली है तो फिर TV पर इसे क्यों चलाया जा रहा है? यह प्रश्न मेरे दिमाग में घूमने लगा। 

मीडिया मतलब सवाल। मेरे एक सवाल का जवाब मिल गया तो दूसरा सर पर नाचने लगा। यह पोस्टर को गौर से देखने के बाद हुआ। मैंने अपने सूत्रों से पोस्टर बनाने वाले को खोज निकाला। उन्होंने तो अलग ही कहानी सुना डाली। उन्होंने अपने काम को भाषा से कई स्टेप ऊपर जाकर आध्यात्म और दर्शन से जुड़ा बताया। 

उनके अनुसार पोस्टर बना कर उन्होंने सिर्फ कर्म किया है, तत्पश्चात फल पर उनका कोई अधिकार नहीं है। पोस्टर भी उन्होंने तभी बना डाला था, जब कॉन्ग्रेस वालों ने मोदी और अडानी को जोड़ कर एक फोटो बनाई थी, जिसका नाम दिया था “मोडानी”। इसी तर्क के आधार पर उन्होंने गाँधी और सोरोस को मिला कर एक पोस्टर तैयार किया था। उन्होंने कहा कि यह राहुल गाँधी के कर्मों का फल है कि लोग पोस्टर पर लिखे शब्द का अलग-अलग मतलब निकाल रहे हैं।

इतने गंभीर उत्तर के बाद मैंने दोबारा उस TV क्लिप को देखा। इसमें GANDOS लिखा एक पोस्टर है। पोस्टर में एक फोटो भी है। फोटो में एक शख्स है। उसके आधे चेहरे में बकरे जैसी इस्लामी दाढ़ी है, आधे में कोई ठरकी बुड्ढा दिख रहा है। फोटो को पूर्णता में देखते-समझते हुए मैं भी जोर से बोल उठा – यही है GANDOS… और नींद खुल गई।, बीवी से अत्यधिक TV देखने और बड़बड़ाने के लिए डाँट पड़ी सो अलग।

‘जिसने की मेरी शिकायत, उसे छोड़ूँगा नहीं’: बशीर ने थाने के बाहर ही पुलिसकर्मी पर किया चाकू से हमला… लोगों को याद आया गोरखनाथ मंदिर हमले का आतंकी मुर्तजा अब्बासी

राजस्थान के टोंक जिले में एक मुस्लिम युवक ने थाने के सामने ही पुलिस कांस्टेबल पर हमला कर दिया। इस हमले का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। पुलिसकर्मी को चाकू मारने वाले नाम मोहम्मद बशीर उर्फ़ सद्दाम है घटना रविवार (8 दिसंबर,2024) की है। पुलिस ने बताया है कि उन्होंने बशीर के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई कर दी है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, घटना टोंक जिले के कोतवाली नगर इलाके की है। इस क्षेत्र में रहने वाले सद्दाम नाम से चर्चित मोहम्मद बशीर को उपजिलाधिकारी (SDM) ने पेश होने का नोटिस दिया था। रविवार को वही नोटिस ले कर सद्दाम गुस्से से तमतमाते हुए थाने पहुँचा। गेट पर एक पुलिस कॉन्स्टेबल खड़ा था। सद्दाम ने उससे पूछा, “किसने मेरी शिकायत की है? मैं उसे छोड़ूँगा नहीं।” बताया जा रहा है कि सिपाही कुछ जवाब दे पाता उस से पहले ही सद्दाम ने उस पर हमला बोल दिया।

बशीर मोहम्मद एक चाकू छिपा कर लाया था। उसी से उसने पुलिसकर्मी पर वार किए चाकू से बचने के लिए पुलिसकर्मी ने बशीर का हाथ पकड़ा। बशीर ने पुलिसकर्मी को जमीन में गिरा दिया। यह हमला सड़क पर दिनदहाड़े हुआ। हमले के दौरान बशीर जोर-जोर से चिल्ला रहा था जबकि कॉन्स्टेबल अपने बचाव में लगा था।

कुछ ही समय के अंदर आसपस से गुजर रहे कुछ लोगों व अन्य पुलिसकर्मी भी घटनास्थल पर पहुँच गए। उन्होंने बशीर को सिपाही से अलग किया। आरोपित को कस्टडी में ले लिया गया। किसी राहगीर ने इस घटना का पूरा वीडियो बना कर सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया। टोंक पुलिस के मुताबिक मामले में जरूरी कानूनी कार्रवाई की गई है। गौरतलब है कि ऐसे ही मुर्तजा अहमद अब्बासी ने गोरखनाथ मंदिर में हमला करके PAC जवानों को घायल कर दिया था।

जनेऊ पहनने वाला प्रह्लाद अमेरिका में कैसे बन गया कट्टर, पहनता है इस्लामी आतंकियों जैसे कपड़े: करने गया था PhD, अब MIT कैंपस में घुसने पर भी लगी रोक

अमेरिका के मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (MIT) में पढ़ाई करने वाले भारतीय मूल के छात्र प्रह्लाद अयंगर को फिलिस्तीन के पक्ष में एक पत्रिका में निबंध लिखने के बाद उसके कॉलेज में घुसने पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। उसे जनवरी 2026 तक के लिए निलंबित किया गया है। इसके कारण उसकी 5 साल की NSF फ़ेलोशिप समाप्त हो गई है। वहीं, एमआईटी कोलिशन अगेंस्ट अपार्थाइड (MCAA) उसके समर्थन में आया है और उसके निलंबन को परिसर में फ्री स्पीच पर हमला बताया है।

प्रह्लाद इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग एवं कंप्यूटर साइंस विभाग में Ph.D का छात्र है। साल 2023 में उसे फिलिस्तीन समर्थक रैलियों में भाग लेने के लिए निलंबित कर दिया गया था। एमआईटी के ‘छात्र जीवन’ के डीन डेविड वॉरेन रैंडल द्वारा पत्रिका के संपादकों को एक ईमेल भेजा गया, जिसमें कहा गया कि ऑन पैसिफ़िज़्म नामक निबंध में प्रहलाद द्वारा इस्तेमाल की गई फोटो और भाषा को ‘एमआईटी में विरोध के अधिक हिंसक या विनाशकारी रूपों के आह्वान के रूप में व्याख्या किया जा सकता है।’

ईमेल में निबंध में इस्तेमाल की गई तस्वीरों का भी हवाला दिया गया है, जिसमें यूएस स्टेट डिपार्टमेंट द्वारा आतंकवादी संगठन घोषित ‘पॉपुलर फ्रंट फॉर द लिबरेशन ऑफ फिलिस्तीन’ का लोगो भी शामिल है। इस पत्रिका के संपादकों को अनुशासनात्मक कार्रवाई का सामना करना पड़ रहा है। WBUR से बात करते हुए प्रह्लाद ने अपने निलंबन को फ्री स्पीच का घोर उल्लंघन बताया। अयंगर के अनुसार, “पत्रिका का उद्देश्य हमारे शब्दों में यह बताना था कि हम क्या कर रहे थे, हम ऐसा क्यों कर रहे थे और कैंपस में क्या हो रहा था।”

MCAA ने एक बयान में कहा कि निलंबन वास्तव में निष्कासन है, क्योंकि इससे अयंगर का शैक्षणिक करियर बाधित होगा। उसने आगे कहा कि उसके उसकी प्रवेश की अनुमति उसी पैनल द्वारा दी जानी चाहिए, जिसने उन्हें निलंबित किया था। MCAA ने कहा, “प्रह्लाद अब चांसलर के समक्ष अपने मामले की अपील कर रहा है, ताकि उसके खिलाफ लगाए गए अन्यायपूर्ण प्रतिबंधों को रद्द या कम किया जा सके।”

संस्था ने आगे कहा, “हमने एमआईटी के प्रशासन पर दबाव डालने के लिए एक अभियान शुरू किया है, ताकि इतिहास के सही पक्ष पर खड़े छात्रों का अपराधीकरण बंद किया जा सके। हम सभी संगठनों और संस्थानों से आह्वान करते हैं कि वे इसमें शामिल हों और एमआईटी के दमन के खिलाफ खड़े हों।”

वह निबंध जिसके कारण प्रह्लाद को निलंबित कर दिया गया

ऑपइंडिया ने ऑनलाइन पत्रिका के लिए लिखे प्रह्लाद अयंगर के निबंध की जाँच की। यह निबंध 7 अक्टूबर 2023 को फिलिस्तीनी आतंकी संगठन हमास द्वारा इजरायल में किए गए आतंकी हमले के जवाब में इजरायल की सैन्य कार्रवाई का विरोध किया गया था और उसके खिलाफ फिलिस्तीन आंदोलन का समर्थन करने के लिए लिखा गया था।

अपने निबंध में प्रह्लाद ने फिलिस्तीनी मुक्ति आंदोलन के भीतर शांतिवादी रणनीतियों पर निर्भरता की आलोचना की थी। उसने एमआईटी सहित संस्थानों में विरोध प्रदर्शनों के उद्देश्य को लेकर सवाल उठाए थे। निबंध में अयंगर ने ‘रणनीतिक शांतिवाद’ को अप्रभावी बताया था। उसकी भाषा और रूपरेखा को विश्वविद्यालय परिसरों में विघटनकारी रूपों की वकालत के रूप में व्याख्या की जा सकती है।

प्रह्लाद ने विशेष रूप से ‘रणनीति की विविधता’ की अपील की और प्रतीकात्मक विरोध को अप्रभावी बताया था। उसका निबंध फिलिस्तीन आंदोलन के लिए अपनी आवाज़ उठाने वाले एक्टिविस्ट को चुनौती देता हुआ प्रतीत होता है कि वे ऐसे कार्यों पर विचार करें जो ‘अहिंसा’ तक सीमित ना रहे।

अयंगर के अनुसार, पारंपरिक शांतिवादी दृष्टिकोण सीमित है और इससे अपेक्षित प्रभाव हासिल नहीं होता। उसका मानना था कि यह ‘उस प्रणाली में डिज़ाइन किया गया है जिसके खिलाफ हम लड़ते हैं’। उसने आगे कहा कि शांतिपूर्ण रैलियाँ और गिरफ्तारियाँ एक दिखावा है। ये राजनीतिक नाटक का एक उदाहरण है, जो अपने लोगों की अंतरात्मा को शांत करने के लिए अधिक काम करता है, न कि उस इकाई से कुछ हासिल करने के लिए जो उसी उत्पीड़न को अंजाम दे रही है जिसका वे विरोध कर रहे हैं।

दिलचस्प बात यह है कि प्रह्लाद अयंगर ने युद्ध में इस्तेमाल की जाने वाली तकनीकों के लिए एक सैन्य ठेकेदार और योगदानकर्ता के रूप में इसकी भूमिका को उजागर करके एमआईटी के खिलाफ ही द्वार खोल दिए। उसने तर्क दिया कि शांतिवाद से संस्थागत मिलीभगत को चुनौती नहीं दिया जा सकता। इससे विरोध प्रदर्शनों के लिए अधिक टकरावपूर्ण दृष्टिकोणों की गुंजाइश बनी रहती है।

अपने निबंध में उसने लिखा, “हमारे कार्य किसी राज्य के विरोध की अंतर्निहित धारणा का हिस्सा हैं – हम एक तरह से सांस्कृतिक रूप से शांत हैं, न कि जानबूझकर शांतिवादी।” यह धारणा बताती है कि प्रतीकात्मक गिरफ़्तारियाँ सरकार की दमनकारी सिस्टम को रोकने में सक्षम नहीं है। इसे ऐसी रणनीति के रूप में देखा जा सकता है, जिसे सरकार आसानी से समायोजित नहीं कर सकता है।

उसने कार्रवाई के अधिक आक्रामक रूपों में शामिल करने की अनिच्छा का आलोचना की और लोगों को उकसाते हुए कहा, “एक भयानक नरसंहार के एक वर्ष बाद अब समय आ गया है कि आंदोलन तबाही मचाना शुरू कर दे, अन्यथा जैसा कि हमने देखा है यह सब वास्तव में हमेशा की तरह ही चलता रहेगा।” इस तरह अयंगर ने विरोध को हिंसक बनाने के लिए उकसाया।

ऑपइंडिया ने पाया कि प्रह्लाद ने आतंकवादी संगठन पॉपुलर फ्रंट फॉर द लिबरेशन ऑफ फिलिस्तीन के लोगो वाले दो पोस्टर इस्तेमाल किए। इसके साथ ही ‘हर जगह इंतिफ़ादा’ का आह्वान करते हुए एक पोस्ट भी इस्तेमाल किया। दरअसल, इंतिफ़ादा इजरायल के खिलाफ़ फिलिस्तीन की सशस्त्र कार्रवाई (जिसमें आतंकवादी गतिविधियाँ भी शामिल हैं) है। सबसे पहले जो पोस्टर दिखाया गया, उसमें लिखा था, “हम तुम्हारे पैरों के नीचे की ज़मीन जला देंगे”। पोस्टर में एक PFLP आतंकवादी को हथियार के साथ दिखाया गया था।

Source: Written Revolution

प्रह्लाद अयंगर द्वारा इस्तेमाल किए गए दूसरे पोस्टर पर अरबी भाषा में लिखा था, “रक्त की एकता: विजय की राह पर एक कदम। यहूदी आतंकवाद के खिलाफ संयुक्त लेबनानी-फिलिस्तीनी संघर्ष अमर रहे।” ये दोनों पोस्टर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर साझा किए गए हैं। डीन ने अपने पत्र में कहा है कि ऐसे पोस्टरों के इस्तेमाल को परिसरों में हिंसक विरोध प्रदर्शन के आह्वान के रूप में देखा जा सकता है।

Source: Written Revolution

कुछ सालों में बदल गया प्रह्लाद अयंगर

प्रह्लाद के फेसबुक और इंस्टाग्राम प्रोफाइल पर शेयर किए गए पोस्ट पर नज़र डालने से पता चलता है कि पहले वह एक खुशमिजाज़ लड़का था, जिसे घूमना-फिरना और अपने दोस्तों के साथ समय बिताना पसंद था। उसका फेसबुक प्रोफाइल साल 2019 में यूरोप भर में अपने दोस्तों के साथ यात्रा करने वाली तस्वीरों से भरा पड़ा था।

हालाँकि, जॉर्ज फ्लॉयड की मौत के बाद ‘ब्लैक लाइव्स मैटर’ आंदोलन के दौरान चीजें बदल गईं। मई 2020 में उसने एक डार्क-थीम वाली पोस्ट की। उसमें उसने दावा किया कि फ्लॉयड की मौत के बाद पुलिस की बर्बरता के खिलाफ विरोध प्रदर्शन के दौरान अटलांटा में उथल-पुथल मचने पर उसने विचार किया। उसने निष्क्रिय समर्थन से सक्रिय भागीदारी की ओर बढ़ा और अराजकता को स्वीकार किया।

Source: Prahlad’s Facebook page

यह वह समय था, जब अचानक उनकी प्रोफ़ाइल बदल गई और वह एक ऐक्टिविस्ट बन गया। वह विरोध प्रदर्शनों में भाग लेने लगा। फिर फ़िलिस्तीनी मुद्दे के लिए विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। हमास के खिलाफ़ इज़रायल की सैन्य कार्रवाई के बाद से वे फ़िलिस्तीनी समर्थक आंदोलन करने लगे। प्रह्लाद अयंगर इसमें भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने लगा।

Source: Prahlad’s Facebook page

प्रह्लाद भारतीय मूल का एक साधारण और जनेऊधारी ब्राह्मण लड़का था, जो अपने जीवन से प्यार करता था। हालाँकि, कैंपस एक्टिविज्म और कैंपस में छात्रों के घोर कट्टरपंथीकरण ने उसका पूरा जीवन बदल दिया। इसके कारण वह प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में से एक एमआईटी से निलंबित कर दिया गया है।

(इस लेख को मूलत: अंग्रेजी में अनुराग ने लिखा है। आप इस लिंक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं।)

41 दंगाई गिरफ्तार, 450 पत्थरबाजों की हुई पहचान… नकली पत्रकार असीम रज़ा की भी खुली कलई: दंगे के बाद संभल के उपद्रवियों को बचा नहीं पा रहा ‘नकाब’

उत्तर प्रदेश के संभल जिले में 24 नवंबर, 2024 को हुई हिंसा के बाद पुलिस ने दंगाइयों के खिलाफ अपनी कार्रवाई तेज कर दी है। पुलिस ने इस कार्रवाई में 41 दंगाई गिरफ्तार किए गए है। पुलिस ने लगभग 450 पत्थरबाजों को CCTV फुटेज व अन्य माध्यमों से चिन्हित किया है। इनकी तलाश जारी है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, संभल पुलिस ने 50 और उपद्रवियों की पहचान कर ली है। अब तक 450 ऐसे ही उपद्रवियों की पहचान हो चुकी है। इनमें से 100 के नाम भी पुलिस को पता चल गए हैं। संभल में हिंसा करने वाले दंगाइयों की पहचान में इसलिए भी समय लग रहा है क्योंकि उन्होंने हमले के वक्त नकाब पहन रखा था। संभल हिंसा मामले में हाल ही में एक पत्रकार को भी गिरफ्तार किया था। उसके बारे में भी कई जानकारियाँ सामने आई हैं।

पहले दी पुलिस को धमकी, फिर माफ़ी

संभल पुलिस ने 6 दिसंबर, 2024 को एक फर्जी पत्रकार असीम रज़ा जैदी को गिरफ्तार किया था। असीम जैदी हिंसा के बाद भड़काऊ वीडियो शेयर कर रहा था। उसने मुस्लिमों को इकट्ठा किया था और उन्हें उकसा रहा था। इस संबंध में सूचना संभल पुलिस को दी गई थी।

उसको रोकने के लिए जब पुलिस पहुँची तो वह धमकाने पर उतर आया। उसने सब इंस्पेक्टर संजीव को तक धमकी दे डाली। असीम जैदी ने सब इंस्पेक्टर जैदी से कहा, “मुझे जानते नहीं हो। मैं पत्रकार हूँ। अपनी एक खबर से तुमको बर्खास्त करवा दूँगा।” असीम ने ऊपर के अधिकारियों से भी दारोगा की शिकायत की धौंस दी। इसके बाद असीम को गिरफ्तार कर लिया गया।

असीम के खिलाफ इसके बाद पुलिस ने ही FIR दर्ज की। ऑपइंडिया के पास FIR कॉपी मौजूद है। पुलिसकर्मियों ने इसके बाद असीम जैदी के दावों का सत्यापन भी करवाया कि आखिर वह कहाँ का पत्रकार है। जब असीम के बताए संस्थान से पूछा गया तो उन्होंने बताया कि वह उनका कर्मचारी नहीं है।

पोल-पट्टी खुल जाने के बाद असीम जैदी पुलिस के आगे गिड़गिड़ा कर माफ़ी माँगने लगा। उसने यह भी माना कि वह पत्रकारिता के नाम पर फर्जीवाड़ा कर धंधा चला रहा था। असीम रजा के ऊपर अब फर्जीवाड़े समेत बाकी धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया है।

संवेदनशील इलाकों में हो रही घरों की तलाशी

संभल हिंसा के बाद पुलिस सतर्क को गई है। पुलिस की टीमें संवेदनशील मोहल्ले में चिन्हित किए गए घरों की तलाशी ले रहीं हैं। इसी तलाशी के दौरान सोमवार (10 दिसम्बर, 2024) को कई घरों से नशे की खेप और अवैध हथियार बरामद हुए थे।

तलाशी का यह अभियान नखासा के उस इलाके में चलाया गया था जहाँ सांसद जियाउर्रहमान बर्क का घर है। इसी कार्रवाई में मुल्ला आसिफ, महबर और ताजवर के परिजनों को पूछताछ के लिए थाने में तलब किया गया था। गौरतलब है कि 24 नवंबर को कोर्ट के आदेश पर जामा मस्जिद का सर्वे करने पहुँची टीम पर अल्लाह हू अकबर चिल्लाती मुस्लिम भीड़ ने हमला बोल दिया था। इस हमले में लगभग 2 दर्जन पुलिसकर्मी घायल हो गए। घायलों में डिप्टी कलेक्टर और DSP भी शामिल हैं।