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लड़कियों के नाम पर अल्लाह और कुरान की दुहाई बेकार: अफगानिस्तान में मेडिकल की पढ़ाई पर बैन, क्रिकेटर राशिद खान और मोहम्मद नबी लगा रहे गुहार

अफगानिस्तान में तालिबानी शासन आने के बाद लड़कियों की पढ़ाई पर आए दिन नई रोक लग रही है। हाल में सामने आया कि वहाँ महिलाओं को मेडिसिन से जुड़ी पढ़ाई नहीं करने दी जाएगी। इस फैसले के बाद कई लोगों ने तालिबान सरकार से अनुरोध किया कि वो इस प्रतिबंध पर पुनर्विचार करें। इन लोगों में अफगानिस्तान के स्टार क्रिकेटर राशिद खान और मोहम्मद नबी भी शामिल हैं।

राशिद खान ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट पर लिखा कि वह तालिबानी सरकार के इस फैसले से बहुत दुखी हैं। उन्होंने कहा कि इस्लाम में तालीम का महत्व सभी के लिए है, और कुरान भी तालीम लेने की आवश्यकता पर जोर देता है।

राशिद ने अपने संदेश में लिखा कि इस निर्णय के प्रभाव से न केवल औरतों के भविष्य पर पड़ेगा, बल्कि समाज के समग्र विकास पर भी इसका गहरा असर होगा। उन्होंने कहा कि अफगानिस्तान को चिकित्सा क्षेत्र में पेशेवरों की सख्त जरूरत है, खासकर महिला डॉक्टरों और नर्सों की, क्योंकि यह महिलाओं की स्वास्थ्य देखभाल और गरिमा को सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण है। राशिद ने तालिबान से अपील की कि वे अपने फैसले पर पुनर्विचार करें ताकि लड़कियाँ तालीम ले सकें और देश के विकास में योगदान दे सकें।

राशिद के बाद मोहम्मद नबी ने भी राशिद खान के विचारों का समर्थन करते हुए कहा कि तालिबान का यह फैसला बेहद अन्यायपूर्ण है। उन्होंने बताया कि इस्लाम हमेशा सभी लोगों के लिए शिक्षा के महत्व को मान्यता देता है और मुस्लिम इतिहास में कई प्रेरणादायक महिलाएँ हैं जिन्होंने ज्ञान के माध्यम से समाज में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उन्होंने तालिबानी सरकार से गुहार लगाई है कि वे कुछ बिंदुओं पर विचार करें और लड़कियों को पढ़ाई करने दें ताकि वे एक बेहतर अफगानिस्तान का निर्माण कर सकें।

बता दें कि तालिबान के सत्ता में वापसी के बाद से महिलाओं पर तमाम तरह के प्रतिबंध लगाए जा चुके है। पहले तालिबान ने छठी कक्षा के बाद लड़कियों के लिए स्कूली शिक्षा बंद की। फिर जो महिलाएँ विश्वविद्यालय जा रही थीं, उनपर भी प्रतिबंध लगा दिया।

7 साल की बच्ची से रेप किया, पत्थर से सिर कुचलकर लाश रेलवे लाइन पर फेंका… हाई कोर्ट ने मौत की सजा उम्र कैद में बदल दी, कहा- पिछड़ी जाति से है, सुधर सकता है

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने एक शख्स की फांसी की सजा को खत्म कर दिया है। उसे एक 7 वर्षीय बच्ची का रेप और हत्या करने के मामले में यह सजा सुनाई गई थी। हाई कोर्ट ने कहा है कि फांसी की सजा पाने वाला शख्स पिछड़ी जाति (OBC) से ताल्लुक रखता है, इसलिए उसके सुधरने की संभावना को नकारा नहीं जा सकताखत्म

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट की चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद ने 26 नवम्बर, 2024 को रेप और हत्या के दोषी दीपक बघेल के मामले में यह फैसला सुनाया है। हाई कोर्ट ने इसी के साथ निचली अदालत के फैसले को बदल दिया और फांसी पर अपनी सहमति देने से मना कर दिया।

हाई कोर्ट ने क्या कहा?

हाई कोर्ट ने कहा, “रिकॉर्ड पर ऐसा कोई सबूत नहीं है कि दोषी का सुधार या पुनर्वास नहीं किया जा सकता है क्योंकि अपराध के समय उसकी उम्र लगभग 29 साल थी और वह अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) का व्यक्ति है, इस प्रकार वह पिछड़े समुदाय से जुड़ा है और उसके सुधार की संभावना को नकारा नहीं जा सकता।”

हाई कोर्ट ने बच्ची की हत्या और रेप को गंभीर में भी गंभीरतम अपराध नहीं माना। हाई कोर्ट ने कहा कि मामले के सबूतों और घटनाओं को देख कर नहीं लगता कि यह ऐसा मामला है जिसमें फांसी की सजा दी जाए। कोर्ट ने कहा है कि आजीवन कारावास की सजा इस मामले में न्याय के लिए काफी होगी। हाई कोर्ट ने दीपक बघेल की फांसी की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया और उस पर लगाया गया ₹20,000 का जुर्माना बरकरार रखा है।

क्या था मामला?

यह मामला छत्तीसगढ़ के राजनांदगाँव का है। यहाँ 2021 में दीपक बघेल नाम के एक शख्स अपने पास की एक 7 वर्षीय बच्ची को झांकी दिखाने के बहाने से ले गया था। वह उसके भाई को भी ले गया था। उसने बाद में उसके भाई को झांकी में ही छोड़ दिया जबकि बच्ची को सूनसान जगह ले गया।

यहाँ उसने जबरदस्ती बच्ची के साथ रेप किया। इसके बाद उसने बच्ची के सर पर एक भारी पत्थर मार कर हत्या कर दी। सबूत मिटाने के लिए उसने बच्ची के शव को ट्रेन की पटरियों पर फेंक दिया। इसके कारण उसका शव क्षत-विक्षत हो गया। बच्ची का रेप-हत्या करने के दीपक बघेल अपने घर से भाग गया।

बच्ची का शव मिलने के बाद उसके पिता ने एक FIR दर्ज करवाई थी। दीपक बघेल को इसके बाद पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था। उसके घर से पुलिस को बच्ची का ब्रेसलेट और उसकी खून लगी शर्ट मिली थी। हालाँकि, पुलिस से उसने पूछताछ में खुद के निर्दोष होने की बात कही और आरोप लगाया कि उसे फंसाया गया है।

पुलिस ने अपनी जाँच के बाद उसके खिलाफ अपहरण, रेप, हत्या और POCSO एक्ट की धाराओं में मामला दर्ज किया था। निचली अदालत में अधिकांश आरोप सही पाए आगे और यहाँ उसे मौत की सजा सुनाई गई। इसके साथ ही उस पर ₹20000 का जुर्माना लगाया गया।

निचली अदालत में जज ने इस मामले को गंभीर में भी गंभीरतम अपराध पाया और मौत की सजा को सही ठहराया। निचली अदालत ने इसके बाद मौत की सजा को अनुमति देने का मामला छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट भेजा था। इसी के साथ मौत की सजा समेत बाकी सजाओं के खिलाफ दीपक बघेल ने भी हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की थी।

हाई कोर्ट ने दोनों मामलों को एक साथ सुना। हाई कोर्ट के सामने दीपक बघेल ने दावा किया कि वह निर्दोष है और पुलिस इस मामले में सही सबूत नहीं पेश नहीं कर सकी है। दीपक बघेल ने जेल में अपने अच्छे आचरण के चलते फांसी की सजा हटाने की माँग भी की। हाई कोर्ट ने उसकी दलीलों को मानने से इनकार कर दिया लेकिन मौत की सजा को सही नहीं माना।

जिस दिन माँ-बाप की शादी की सालगिरह उस दिन ही उनका गला काट डाला, बहन को भी नहीं छोड़ा… मॉर्निंग वॉक से लौट रची ट्रिपल मर्डर की कहानी, ताले से खुली

दक्षिण दिल्ली के नेब सराय इलाके का देवली गाँव। इसी गाँव के एक घर में 4 दिसंबर 2024 की सुबह तीन लाश मिली। तीनों हत्या गला काट कर की गई थी। जिनकी हत्या की गई वे थे- 51 साल के राजेश कुमार, उनकी 46 वर्षीय पत्नी कोमल और 23 साल की बेटी कविता। पुलिस को हत्या की सूचना राजेश के ही 20 साल के बेटे अर्जुन ने दी, जिसका कहना था कि वह घटना के समय मॉर्निंग वॉक पर गया था।

राजेश मूल रूप से हरियाणा के महेंद्रगढ़ के गाँव खेड़ी तलवाना के निवासी थे। हत्या की यह वारदात जिस इलाके की है वह सघन बस्ती वाला क्षेत्र है। मकान एक-दूसरे से सटे हैं। बावजूद किसी ने मरने वालों की चीख नहीं सुनी। पुलिस ने पाया कि घर का कोई सामान भी गायब नहीं है। पड़ोसियों ने बताया कि राजेश का किसी से कोई विवाद नहीं था। घर में हत्यारों के साथ संघर्ष के भी कोई निशान नहीं थे, जबकि राजेश सेना से रिटायर थे। एनएसजी में भी रह चुके थे। फिलहाल सिक्योरिटी अफसर का काम कर रहे थे। वहीं उनकी बेटी जूडो में ब्लैक बेल्ट थी।

आसपास के सीसीटीवी खँगाले गए तो कोई बाहर से घर में घुसता भी नहीं दिखा। मेन गेट पर जो ताला गला था उसे भी तोड़ा नहीं गया था।ऐसे में पुलिस यह समझ नहीं पा रही थी कि मेन गेट पर ताला लगे होने के बाद भी कोई कैसे बाहर से आकर हत्या कर सकता है और फिर फरार हो सकता। पुलिस को अर्जुन की कहानी पर शक हुआ। उससे सख्ती से पूछताछ की तो उसने तीनों हत्या कबूल कर ली।

रिपोर्टों के अनुसार अर्जुन ने पुलिस को बताया कि उसे बॉक्सिंग करना पसंद था। लेकिन पिता पढ़ाई नहीं करने को लेकर टोकते रहते थे। हाल ही में सबके सामने उसकी पिटाई भी कर दी थी। उसे यह भी लगता था कि माँ-बाप उसकी बहन कविता को अधिक प्यार करते हैं। उसे लगता था कि वे सारी संपत्ति भी उसकी बहन के नाम कर देंगे। इसी नफरत में उसने तीनों की हत्या करने का प्लान बनाया।

उसने जिस धारदार चाकू से तीनों हत्या की वह उसके पिता की ही थी। इसे अर्जुन ने छिपाकर रखा था। वह काफी समय से हत्या की प्लानिंग कर रहा था। 4 दिसंबर को उसके माता-पिता की शादी की 27वीं सालगिरह थी, इसलिए हत्या के लिए यही दिन चुना।

अपनी प्लानिंग के अनुसार 4 दिसंबर को उसने एक-एक कर तीनों की हत्या कर दी। सबसे पहले ग्राउंड फ्लोर पर सो रही बहन का गला रेता। फिर ऊपर की मंजिल पर सो रहे पिता का गला काटा। उनके सिर पर भी चाकू से वार किए। उसकी मां बाथरूम में थी। जैसे ही वह बाहर निकली उनके गले पर भी चाकू से वार कर दिया। तीनों हत्या करने के बाद वह आराम से टहलने निकल गया। फिर एक घंटे बाद लौटकर घटना को अलग रंग देने में जुट गया।

पड़ोसियों को चीख नहीं सुनाई दे इसलिए उसने सबके गले पर झटके से वार किया। खून रोकने के लिए गर्दन पर चाकू मारते ही वह कपड़े से दबा देता था। उल्लेखनीय है कि राजेश के गले में चुन्नी लिपटी हुई थी, जबकि कोमल और कविता का शव कंबल से ढका हुआ मिला था।

जब मारे जा रहे थे हिंदू, तब गरिया रही थी RSS को, बता रही थी हिंदुत्व प्रोपेगेंडा… जब खुद का घर जला दिया इस्लामी कट्टरपंथियों ने तो चिल्ला रही बाप-बाप: मिलिए वामपंथी प्राप्ति तापोशी से

बांग्लादेश की एक हिन्दू युवती ने शेख हसीना के खिलाफ इस्लामी कट्टरपंथियों का साथ दिया। उसने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के खिलाफ भी जहर उगला और हिन्दुओं के बांग्लादेश में विरोध प्रदर्शनों को भारत का एजेंडा बताया। हिन्दुओं के खिलाफ बोलने पर उसे इस्लामी कट्टरपंथियों ने खूब सराहा, यहाँ तक कि इस्लामी प्रोपेगेंडा फ़ैलाने वाले चैनल अल जजीरा ने भी उसको जगह दी। अब उसके घर पर ही इस्लामी कट्टरपन्थियों ने हमला बोल दिया है। इसके बाद उसने सरकार की खिलाफत चालू कर दी है।

इस युवती का नाम प्राप्ति तापोशी है। वह बांग्लादेश के जहाँगीरनगर विश्वविद्यालय की छात्रा है। वह लगातार विरोध प्रदर्शन और जलसों में शामिल होती रहती है। उसने लगातार हिन्दुओं के खिलाफ जहर उगला है और बांग्लादेश में होने वाली हिन्दू विरोधी हिंसा को नकारा है।

लेकिन अब प्राप्ति ने फेसबुक पर अपने घर इस्लामी कट्टरपंथियों की लूट को लेकर एक पोस्ट लिखा है। फेसबुक ट्रांसलेशन के अनुसार, प्राप्ति ने लिखा, ” सुनामगंज में कल रात मेरे घर और हिन्दुओं पर हमला, तोड़फोड़ और लूटपाट की गई… अभी तक पुलिस की ओर से मारपीट और लूटपाट के आरोप में किसी को गिरफ्तार नहीं किया गया है। कितने घरों और दुकानों में लूटपाट हुई है, इस बारे में भी सरकार ने साफ़ कोई जानकारी नहीं दी है। प्रशासन कह रहा है कि यहाँ कुछ नहीं हुआ।”

प्राप्ति ने दावा किया कि अगर ऐसा ही माहौल रहा तो हिंदुत्ववादियों की ‘अफवाहें’ और जोर पकड़ेंगी। उसने पुलिस और प्रशासन को सबसे बड़ा दोषी ठहराया। गौरतलब है कि सुनामगंज में लगातार हिन्दू विरोधी हिंसा हो रही है। इस्लामी कट्टरपंथियों ने एक हिन्दू युवक आकाश दास की एक सोशल मीडिया पोस्ट को ईशनिंदा बता कर हिन्दुओं को निशाना बनाया है। 100 से अधिक हिन्दू घरों और साथ ही में मंदिर में भी तोड़फोड़ की गई है। इस कारण से 200 हिन्दू यहाँ से भागने को मजबूर हो गए हैं।

प्राप्ति तापोशी अपने घर पर हुए हमले के बाद भले ही पुलिस और प्रशासन को जिम्मेदार ठहरा रही हो लेकिन इससे पहले वह बांग्लादेश में हिन्दुओं पर अत्याचार को नकार रही थी। वह इसे आरएसएस और भारत का एजेंडा बता रही थी। उसका कहना था कि हिन्दुओं को राजनीतिक लाभ के लिए मोहरा बनाया जा रहा है और उन्हें हिंदुत्व के एजेंडे में धकेला जा रहा है। इसको लेकर उसने जोर-शोर से सोशल मीडिया पर पोस्ट डाली थीं।

प्राप्ति सिर्फ हिन्दू और आरएसएस को ही नहीं गालियाँ देती बल्कि वह BSF के खिलाफ भी विरोध प्रदर्शन कर चुकी है। उसका आरोप था कि BSF ने बांग्लादेश और भारत की सीमा पर बांग्लादेशी नागरिकों की हत्या की है। उसने इस संबंध में एक रैली भी निकाली थी।

यही नहीं उसने पीएम मोदी को लेकर भी अभद्र कार्टून साझा किए थे और भारत पर बांग्लादेश में बाढ़ लाने का आरोप जड़ा था। उसका आरोप था कि भारत ने बाँध के दरवाजे खोल दिए जिसके कारण यह बाढ़ आ गई। हालाँकि, यह पूरी तरह झूठ था।

भारत और हिन्दू विरोधी एजेंडा को बढ़ाने के चलते उसे अल जजीरा ने भी जगह दी थी। प्राप्ति तापोशी को बांग्लादेश की एक्सपर्ट के रूप में अल जजीरा ने बुलाया था। अल जजीरा लगातार भारत के खिलाफ प्रोपेगेंडा करता रहा है।

इके पहले उसने बांग्लादेश में छात्रों के सहारे किए गए इस्लामी कट्टरपंथियों को भी खूब समर्थन दिया था। वह हमास का भी समर्थन करती है। वह इजरायल के खिलाफ हमास और बाकी समूहों की जंग ‘इंतिफादा’ की भी समर्थन है। हालाँकि, उसको अब तक लगता था कि इस्लामी कट्टरपंथियों के कहर से वह बचेगी। लेकिन अब जब उसके गृह नगर सुनामगंज में इस्लामी भीड़ आई तो उसको भी नहीं बख्शा।

गौरतलब है कि 5 अगस्त, 2024 को बांग्लादेश प्रधानमंत्री शेख हसीना के सत्तापलट के बाद से लगातर हिन्दू निशाने पर हैं। बांग्लादेश में इस्लामी भीड़ कहीं ईशनिंदा के बहाने तो कहीं आवामी लीग का समर्थक होने के बहाने हिन्दुओं पर हमला कर रही है। हिन्दुओं की इस प्रताड़ना में यूनुस सरकार पूरा साथ दे रही है।

हिन्दुओं पर प्रताड़ना के खिलाफ बोलने वाले संत चिन्मय कृष्ण दास को भी बांग्लादेश में पुलिस ने गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है। उनके वकील पर भी जानलेवा हमला हुआ। स्थितियाँ इतनी खराब हैं कि इस्कॉन ने बांग्लादेश में हिन्दुओं को तिलक और तुलसी माला छोड़ने को कहा है। बांग्लादेश में हिन्दुओं के घरों को जलाया और लूटा जा रहा है। बांग्लादेश इस सब हिंसा को नजरअंदाज कर रहा है।

200+ हिंदू परिवार घर छोड़ भागने पर मजबूर, 20 मंदिरों में तोड़फोड़: बांग्लादेश के सुनामगंज में बरसा इस्लामी भीड़ का कहर, फेसबुक पोस्ट पर किया दंगा

बांग्लादेश में हिंदुओं पर अत्याचार थमे नहीं हैं। हाल में वहाँ सुनामगंज जिले में मुस्लिम कट्टरपंथियों ने हिंदुओं के घरों और मंदिरों को निशाना बनाया। इस बार उन्होंने एक हिंदू युवक के पोस्ट को आधार बनाकर हिंसा को अंजाम दिया और कई हिंदुओं के घरों में तोड़फोड़ की।

कहा जा रहा है कि 3 दिसंबर 2024 को 21 साल के हिंदू युवक ने अपने फेसबुक पोस्ट में हेफज़ात-ए-इस्लाम के नेता मावलाना मुफ्ती मामुनुल हक की आलोचना की थी। इसी को ईशनिंदा बताकर हजारों कट्टरपंथी इकट्ठा हुए और स्थानीय हिंदुओं के घरों और दुकानों पर धावा बोल दिया।

इस क्रम में 3 दिसंबर की रात को बांग्लादेश के सुनामगंज इलाके के दोराबाजार में इस्लामी भीड़ ने 130 घरों और 20 हिंदू मंदिरों में तोड़फोड़ की। अब घटना के बाद की तस्वीरें सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रही हैं। फेसबुक पोस्ट करने वाले युवक का नाम आकाश दास पता चला है। पुलिस पता लगा रही है कि आखिर हमले कहाँ-कहाँ हुए। फिलहाल स्थिति को संभालने के लिए मोंगलागाँव में भारी पुलिस बल और सेना को तैनात किया गया है।

दोवाराबाजार पुलिस थाने के प्रभारी अधिकारी जाहिदुल हक ने बताया कि जब स्थानीय लोगों ने फेसबुक पोस्ट से नाराजगी जताते हुए प्रदर्शन किया, तो उन्होंने आकाश दास को हिरासत में ले लिया। पुलिस के अनुसार इसके बाद भीड़ ने पुलिस टीम पर भी हमला किया और उसे छीनने की कोशिश की। इसके बाद उन्होंने उस व्यक्ति और कई अन्य हिंदू लोगों के घरों और दुकानों में तोड़फोड़ की।

इस घटना को लेकर सुनामगंज कस्बे में केंद्रीय लोकनाथ मंदिर के महासचिव खोकन रॉय ने कहा, “भीड़ ने लोकनाथ मंदिर में भी तोड़फोड़ की और 15 लाख टका से अधिक मूल्य के कीमती सामान चुरा लिए। उन्होंने लगभग 100 घरों में भी तोड़फोड़ की। उपजिला पूजा उद्जन परिषद के अध्यक्ष गुरु डे के घर और पारिवारिक मंदिर में तोड़फोड़ की गई। उन्होंने कई स्वर्ण आभूषण की दुकानों और हिंदुओं की दुकानों में भी लूटपाट की।”

गौरतलब है कि सुनामगंज की इस घटना के बाद हिंदू सवाल कर रहे हैं कि आखिर अगर गलती एक इंसान ने की थी तो उन सबको इसके लिए क्यों भुगतान करना पड़ा? वहीं पुलिस ने इस घटना को लेकर संदेह जताया है कि ये घटना संभवत: सुनियोजित थी।

बता दें कि बीते कुछ दिनों में बांग्लादेश में कई जगह हिंसा की घटनाएँ सामने आई हैं, लेकिन फिर भी बांग्लादेशी मीडिया जगह-जगह ये बता रहा है कि अंतरिम सरकार के आने के बाद हिंदू पूरी तरह सुरक्षित हैं। यूनुस सरकार के प्रेस सचिव शफीकुल आलम ने दावा किया कि भारतीय मीडिया बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों को निशाना बनाए जाने के बारे में झूठी बातें फैला रहा है जबकि हकीकत में यहाँ ऐसा कुछ नहीं है।

ये बयान उस बीच सामने आए हैं जब चटगाँव में हिंदू मंदिर पर हमला हुआ। इस्कॉन प्रमुख चिन्मय कृष्ण दास को गिरफ्तार करके उनपर देशद्रोह लगा दिया गया है, वकील रमेन रॉय पर हमला हुआ है। वहीं मीडिया रिपोर्ट दावा करती हैं कि ऐसी स्थिति के कारण हाल ही में वहाँ से 200 से अधिक हिंदू परिवार पलायन कर चुके हैं।

गोमांस खाने पर साथ आए कॉन्ग्रेसी सांसद गोगोई और AIDUF विधायक रफीकुल इस्लाम: हिमंता सरकार के गोमांस खाने पर सार्वजनिक बैन के लिए कहा – ‘ये RSS का एजेंडा’

असम की हिमंता बिस्वा सरमा सरकार के सार्वजनिक जगहों पर गोमांस परोसे जाने के बैन पर कॉन्ग्रेस और बदरुद्दीन अजमल की पार्टी AIUDF गुस्सा हो गई है। कॉन्ग्रेस की तरफ से असम के पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई के बेटे और सांसद गौरव गोगोई ने गोमांस पर बैन की आलोचना का जिम्मा संभाला है।

असम सरकार के इस फैसले को लेकर AIUDF के विधायक रफीकुल इस्लाम ने कहा, “मैं समझता हूँ इसका ज्यादा महत्व नहीं है। भाजपा ने गोवा और नार्थईस्ट में बीफ पर बैन नहीं जबकि सब जगह उनकी सरकार है, वहाँ लोग बीफ खाते और खिलाते हैं… किसके घर में क्या पकेगा, कौन क्या खाएगा और कौन क्या पहनेगा यह कैबिनेट का विषय नहीं है।”

रफीकुल इस्लाम ने इस मामले में कॉन्ग्रेस पर भी निशाना साधा है। गोमांस के सार्वजनिक खाए जाने पर जाने पर बैन से नाराज कॉन्ग्रेस के एक विधायक शेरमन अली ने आरोप लगा दिया कि असम सरकार आरएसएस के एजेंडे पर चल रही है। उन्होंने इसे संविधान पर हमला बता दिया। वहीं कॉन्ग्रेस सांसद गौरव गोगोई ने इसे झारखंड के चुनाव से जोड़ दिया।

गोमांस पर बैन को लेकर गोगोई ने कहा, “झारखंड में भाजपा को करारी शिकस्त दिलाने के बाद असम के मुख्यमंत्री अपने फेल्यर को छिपाने की कोशिश कर रहे हैं। झारखंड की समझदार जनता की तरह असम की जनता भी अगले चुनाव में असम के भाजपा नेताओं के भ्रष्टाचार, कुशासन और उनके द्वारा अर्जित बेहिसाब संपत्ति की सजा देगी।”

गौरतलब है कि असम कैबिनेट ने बुधवार (4 दिसम्बर, 2024) को राज्य के भीतर रेस्टोरेंट और होटल में गोमांस परोसे जाने पर बैन लगा दिया। सार्वजनिक जगहों और सार्वजनिक कार्यक्रमों में भी इसे नहीं खाया जा सकेगा। यह फैसला हाल ही में भाजपा और कॉन्ग्रेस नेताओं के बीच गोमांस को लेकर चली जुबानी जंग के बाद सामने आया है।

पिछले दिनों मुख्यमंत्री ने कॉन्ग्रेस को चुनौती देते हुए कहा था कि वह समर्थन दे तो उनकी सरकार राज्य में पूर्ण रूप से गोमांस पर पाबंदी लगा देगी। असल में सामागुरी में बीजेपी की जीत के बाद कॉन्ग्रेस नेता रकीबुल हुसैन ने गोमांस बाँटने के आरोप लगाए थे। कहा था कि इसी कारण बीजेपी को इस सीट पर जीत मिली है।

रकीबुल हुसैन पिछले लगभग ढाई दशक से सामागुरी से विधायक थे। लोकसभा चुनाव में वे धुबरी से सांसद बन गए थे। इसके बाद उपचुनावों में इस सीट से कॉन्ग्रेस ने उनके बेटे तंजील हुसैन को मैदान में उतारा था। लेकिन करीब 60 प्रतिशत मुस्लिम आबादी वाली इस सीट को कॉन्ग्रेस बचा नहीं सकी।

रकीबुल हुसैन के आरोपों पर मुख्यमंत्री सरमा ने पूछा था कि क्या कॉन्ग्रेस अब तक गोमांस बाँट कर सामागुरी में जीत रही थी? उन्होंने कहा था, क्या सामागुरी सीट गोमांस बाँट कर जीती जा सकती है। अगर ऐसा है तो क्या कॉन्ग्रेस अब तक सामागुरी सीट गोमांस बाँट कर जीत रही थी? कॉन्ग्रेस नेता रकीबुल हुसैन सामागुरी सीट को अच्छी तरह से जानते हैं, इसलिए उन्हें पता होगा।

साथ ही उन्होंने कहा था कि वे राज्य में गोमांस पर बैन लगाने को तैयार हैं, बशर्ते इसके लिए असम कॉन्ग्रेस अध्यक्ष रिपुन बोरा सहमत हों। उन्होंने कहा कि अगर रिपुन बोरा सहमत हों तो अगली विधानसभा की बैठक में ही गोमांस पर बैन लगा दिया जाएगा।

असम की BJP सरकार ने गोमांस पर लगाया प्रतिबंध: बोले CM सरमा- रेस्टोरेंट-होटल में नहीं परोसा जाएगा, सावर्जनिक जगहों/कार्यक्रमों में नहीं खा सकेंगे

असम की बीजेपी सरकार ने गोमांस के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा दिया है। मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने 4 दिसंबर 2024 को इसकी घोषणा की। उन्होंने बताया कि अब राज्य के रेस्तरां और होटलों में गोमांस परोसने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। सार्वजनिक जगहों और सार्वजनिक कार्यक्रमों में भी इसका इस्तेमाल नहीं कर सकेंगे।

राज्य कैबिनेट की बैठक में लिए गए फैसलों की जानकारी देते हुए उन्होंने यह बात कही। उन्होंने कहा कि गोहत्या को रोकने के लिए हम तीन साल पहले कानून लाए थे। इससे गोहत्या रोकने में काफी कामयाबी मिली है। अब यह निर्णय लिया गया है कि राज्य के होटल, रेस्तरा और सार्वजनिक जगहों पर गोमांस खाने और परोसने पर पाबंदी लगा दी गई है। उन्होंने कहा कि पहले यह मंदिर के 5 किलोमीटर के दायरे में गोमांस खाने पर प्रतिबंध लगा गया था। लेकिन अब इसे पूरे राज्य में लागू कर इसका दायरा बढ़ा दिया गया है।

असम सरकार ने गोमांस को प्रतिबंधित करने का यह फैसला ऐसे समय में किया है जब सामागुरी उपचुनाव के नतीजों के बाद इस मुद्दे पर बीजेपी और कॉन्ग्रेस के बीच जुबानी तकरार चल रही है। पिछले दिनों मुख्यमंत्री ने कॉन्ग्रेस को चुनौती देते हुए कहा था कि वह समर्थन दे तो उनकी सरकार राज्य में पूर्ण रूप से गोमांस पर पाबंदी लगा देगी।

असल में सामागुरी में बीजेपी की जीत के बाद कॉन्ग्रेस नेता रकीबुल हुसैन ने गोमांस बाँटने के आरोप लगाए थे। कहा था कि इसी कारण बीजेपी को इस सीट पर जीत मिली है। रकीबुल हुसैन पिछले लगभग ढाई दशक से सामागुरी से विधायक थे। लोकसभा चुनाव में वे धुबरी से सांसद बन गए थे। इसके बाद उपचुनावों में इस सीट से कॉन्ग्रेस ने उनके बेटे तंजील हुसैन को मैदान में उतारा था। लेकिन करीब 60 प्रतिशत मुस्लिम आबादी वाली इस सीट को कॉन्ग्रेस बचा नहीं सकी।

रकीबुल हुसैन के आरोपों पर मुख्यमंत्री सरमा ने पूछा था कि क्या कॉन्ग्रेस अब तक गोमांस बाँट कर सामागुरी में जीत रही थी? उन्होंने कहा था, क्या सामागुरी सीट गोमांस बाँट कर जीती जा सकती है। अगर ऐसा है तो क्या कॉन्ग्रेस अब तक सामागुरी सीट गोमांस बाँट कर जीत रही थी? कॉन्ग्रेस नेता रकीबुल हुसैन सामागुरी सीट को अच्छी तरह से जानते हैं, इसलिए उन्हें पता होगा।

साथ ही उन्होंने कहा था कि वे राज्य में गोमांस पर बैन लगाने को तैयार हैं, बशर्ते इसके लिए असम कॉन्ग्रेस अध्यक्ष रिपुन बोरा सहमत हों। उन्होंने कहा कि अगर रिपुन बोरा सहमत हों तो अगली विधानसभा की बैठक में ही गोमांस पर बैन लगा दिया जाएगा।

फडणवीस ही ‘चाणक्य’, फडणवीस ही ‘चंद्रगुप्त’ भी: जिसके हाथ में पूरी चुनावी कमान, जिसे देख लोगों ने किया मतदान, जरूरी था उनका मुख्यमंत्री बनना

23 नवंबर 2024 को महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद एकनाथ शिंदे के रूठने-मानने के जो दिन शुरू हुए थे, उस पर अब पूर्ण विराम लग गया है। तय हो गया है कि बीजेपी नेता देवेंद्र सरिता गंगाधर राव फडणवीस (Devendra Fadnavis) 5 दिसंबर 2019 को महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री के तौर पर एक बार फिर शपथ लेंगे। पिछले 10 साल में यह तीसरा मौका होगा जब फडणवीस मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ लेंगे।

मुंबई से प्रकाशित हिंदी दैनिक ‘महानगर’ के संपादक आदित्य दुबे का कहना है कि फडणवीस आज महाराष्ट्र की राजनीति के सबसे बड़े रणनीतिकार हैं। उन्होंने ऑपइंडिया से बातचीत में कहा, “शरद पवार अब तक महाराष्ट्र की राजनीति के सबसे बड़े खिलाड़ी माने जाते थे। सब उन्हें बड़ा रणनीतिकार मानते थे। लेकिन अब सबसे बड़े खिलाड़ी देवेंद्र फडणवीस हैं।”

खुद को ‘सबसे बड़ा खिलाड़ी’ के तौर पर फडणवीस ने 10 साल के भीतर ही स्थापित किया है। 2014 से पहले महाराष्ट्र के बाहर कम ही लोग उनका नाम जानते थे। हालाँकि वे विधायक 2009 में ही बन गए थे। उससे पहले उस नागपुर के मेयर भी रह चुके थे, जहाँ बीजेपी की वैचारिक गुरुकुल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का मुख्यालय भी है।

प्रमोद महाजन की हत्या के बाद बीजेपी में महाराष्ट्र के जिन नेताओं का जलवा रहा उनमें एक नागपुर से ही आने वाले नितिन गडकरी हैं। दूसरे गोपीनाथ मुंडे थे जिनकी 2014 में केंद्र में पार्टी की सरकार बनने के बाद सड़क हादसे में मृत्यु हो गई।

2014 के आम चुनावों से पहले मैं पत्रकारिता करने के लिए इंदौर से मुंबई पहुँचा था। पहली बार फडणवीस का नाम मैंने भी तभी सुना। हालाँकि इस नाम की धमक मुझे लोकसभा चुनावों के बाद महसूस हुई। 2014 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों से पहले एक नारा चला था,

केंद्र में नरेंद्र, महाराष्ट्र में देवेंद्र

शुरुआत में मुंबई में भी कोई इस नारे को गंभीरता से नहीं ले रहा था। इसे फडणवीस के कुछ उत्साही समर्थकों का कैंपेन बताकर खारिज किया जा रहा था। इसका कारण यह था कि तब बाल ठाकरे की पार्टी दो फाड़ नहीं हुई थी। बीजेपी से उसका गठबंधन नहीं टूटा था। महाराष्ट्र में एनडीए के चुनाव जीतने पर मुख्यमंत्री पद शिवसेना को मिलना तय माना जा रहा था।

लेकिन आश्चर्यजनक तौर पर विधानसभा चुनाव से ठीक पहले सीटों के बँटवारे पर मतभेद हुआ और 25 साल पुराना शिवसेना-बीजेपी का गठबंधन टूट गया। अचानक से यह नारा राजनीति का केंद्र बन गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बाद उस चुनाव में बीजेपी का जो चेहरा सबसे अधिक नजर आ रहा था, वह देवेंद्र फडणवीस का ही था।

नतीजे आए तो बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। लेकिन सरकार बनाने लायक बहुमत हासिल नहीं कर सकी। चुनाव के करीब तीन महीने बाद शिवसेना ने महाराष्ट्र में पहली बार बीजेपी की सदारत कबूल कर ली और देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व में एनडीए की उस सरकार ने अपना कार्यकाल पूरा भी किया। फडणवीस की बतौर रणनीतिकार यह चुनाव पहली परीक्षा थी। इस परीक्षा में वे केवल पास ही नहीं हुए, शिवसेना को ‘छोटा भाई’ बनाकर उन्होंने खुद को स्थापित भी किया।

2019 के विधानसभा चुनावों के बाद उद्धव ठाकरे के मन में दबी आकांक्षाएँ जिस तरीके से प्रस्फुटित हुई, उसे पूरा करने के लिए जिस तरह उन्होंने कॉन्ग्रेस की गोद में भी बैठने से संकोच नहीं किया, जिस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए उन्होंने उस हिंदुत्व की विचारधारा तक की तिलांजलि दे दी जो बाल ठाकरे और शिवसेना की पूँजी थी, उससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि फडणवीस का राजनीतिक-रणनीतिक कौशल किस आला दर्जे का होगा कि शिवसेना उनके पहले कार्यकाल में पिछलग्गू बनकर चलती रही।

बावजूद फडणवीस को वह श्रेय नहीं मिला जिसके वे अधिकारी थे। महाराष्ट्र की सारी सफलताएँ उसी तरीके से नरेंद्र मोदी के मुकुट में जोड़ दी गईं, जैसे देश के अन्य हिस्सों में बीजेपी के उद्भव को जोड़ा गया। 2019 के विधानसभा चुनाव के बाद जब अजित पवार के साथ रातोंरात सरकार बनाने का दाँव फेल हो गया, उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में एनसीपी-कॉन्ग्रेस वाली महाअघाड़ी ने सरकार बना ली तो फडणवीस के इस कौशल का खूब मजाक भी बना।

इतना ही नहीं कई मौकों पर उनको उनकी पत्नी की रील के लिए भी ट्रोल किया गया। पर फडणवीस इन बाधाओं से टूटे नहीं। वे एक-एक रणनीतिक चाल चलते रहे। फिर आया जून 2022 का वह महीना जब ​उद्धव की शिवसेना टूट गई। एकनाथ शिंदे मुख्यमंत्री बने। उस समय भी जब देवेंद्र फडणवीस को उपमुख्यमंत्री बनकर उनकी कैबिनेट में शामिल होना पड़ा तो बीजेपी का भी एक धड़ा उनके राजनीतिक अवसान की कहानियाँ गढ़ने लगा।

पर 2024 का नवंबर बीतते-बीतते फडणवीस ने ऐसी सारी कहानियों को अकेले दम पर ढाह दिया। अपनी उस भविष्यवाणी को सही साबित कर दिखाया जिसमें उन्होंने अपने इस्तीफे के बाद कहा था;

मेरा पानी उतरता देख, मेरे किनारे पर घर मत बसा लेना, मैं समंदर हूँ, लौटकर वापस आऊँगा

2024 के विधानसभा चुनावों में बीजेपी ने महाराष्ट्र ने अपनी सबसे बड़ी जीत दर्ज की है। पार्टी जिन 149 सीटों पर लड़ी, उनमें से 132 पर वह जीती। 89 प्रतिशत के स्ट्राइक रेट से। वह भी उस लोकसभा चुनाव के करीब 4 महीने बाद ही, जिसमें महाराष्ट्र में महायुति का आधार तक खिसक चुका था।

विधानसभा चुनाव के नतीजों का संदेश भले यह था कि बहुमत से 13 सीट दूर खड़ी बीजेपी ही अगली सरकार का नेतृत्व करें। लेकिन कुछ दुविधा भी थी। मसलन, 2024 के लोकसभा चुनाव का जो गणित है उससे सहयोगी दलों को साथ लेकर चलना बीजेपी की मजबूरी है। शायद इसी मजबूरी के कारण शिंदे कई दिन तक फैसले को लटकाने में कामयाब रहे।

दूसरा करीब-करीब इसी स्ट्राइक रेट से 2010 के बिहार विधानसभा चुनावों में बीजेपी ने सफलता हासिल की थी, लेकिन आज भी वह बिहार में नीतीश कुमार की छाया से बाहर नहीं निकल सकी है। तीसरी, पिछले ही साल मध्य प्रदेश और राजस्थान में जीत के बाद भी शिवराज सिंह चौहान और वसुंधरा राजे को बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व ने मौका नहीं दिया, ऐसी ही अटकलें कुछ लोग देवेंद्र फडणवीस को लेकर भी लगा रहे थे। यहाँ तक कि वर्तमान राजनीतिक हालातों का हवाला देकर कुछ लोग फडणवीस की जाति (ब्राह्मण) को भी उनके मुख्यमंत्री चुने जाने की राह की बाधा के तौर पर प्रचारित कर रहे थे।

4 दिसंबर को जब बीजेपी विधायक दल ने अपना नेता चुना तो इसने साबित कर दिया कि जितने भी कारण विरोध में गिनाए जा रहे थे, सबको फडणवीस ने अपने रणनीतिक कौशल से अपना पक्ष बना लिया। बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व को यह मानना पड़ा कि महाराष्ट्र की जटिल राजनीतिक परिस्थितियों में फडणवीस ही ‘चाणक्य’ हैं।

ऑपइंडिया से बातचीत में दुबे भी इसकी पुष्टि करते हैं। उन्होंने कहा, “भले विधानसभा चुनाव महायुति ने जीता है। लेकिन वोट लोगों ने बीजेपी को देखकर दिया है। देवेंद्र फडणवीस को देखकर दिया है, जिन्होंने राज्य में सबसे ज्यादा रैलियाँ की। पूरी चुनावी कमान उनके ही हाथों में थी। ऐसे में मतदाताओं की भावनाओं के सम्मान के लिए उनको मुख्यमंत्री बनाना जरूरी था।”

उन्होंने बताया कि गठबंधन सरकार होने के कारण भी बीजेपी के लिए एक ऐसा चेहरा चुनना जरूरी था जो एकनाथ शिंदे और अजीत पवार दोनों के साथ समन्वय स्थापित कर चल सके। किसी नए चेहरे के लिए इन दोनों के साथ समीकरण बैठाना आसान नहीं होता। इसके अतिरिक्त लोकसभा चुनाव में हार के बाद जिस तरह से उन्होंने राज्य में पार्टी को फिर से खड़ा किया, जिस तरह से संघ पूरी ताकत के साथ जुटा, यह भी फडणवीस के पक्ष में गया है।

समर्थकों के बीच ‘देवा भाऊ’ के नाम से मशहूर फडणवीस ने पार्टी के प्रति जिस तरीके से समर्पण दिखाया, जैसे एक-एक आदेश (मसलन शिंदे का डिप्टी बनना) का कार्यकर्ता के तौर पर पालन किया है, उसने भी मुंबई से दिल्ली तक पार्टी के भीतर विरोधियों के मौजूद रहने के बाद भी फडणवीस को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भरोसेमंद बनाया है।

इसके अलावा बिहार की उस सीख ने भी बीजेपी के नेतृत्व को फडणवीस को चुनने की प्रेरणा दी होगी जिसे वह आज भी भोग रही है। बिहार में भी कभी बीजेपी ने खुद से स्टीयरिंग नीतीश कुमार को थमाई थी। 2010 के बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों का एक निहितार्थ यह भी था कि भले मुख्यमंत्री की कुर्सी पर नीतीश कुमार हैं, लेकिन मतदाताओं का मानना था कि राज्य में जो बेहतर बदलाव हुए हैं उसके पीछे की फोर्स बीजेपी ही है।

यह सत्य का है कि 90 प्रतिशत के स्ट्राइक रेट से सीटें जीतने के बाद भी बीजेपी 2010 में बिहार की सबसे बड़ी पार्टी नहीं थी। लेकिन उस जनादेश के निहितार्थ को नहीं पढ़ने की कोशिश के कारण ही उसके बाद के चुनावों में बीजेपी बिहार में उस स्ट्राइक रेट वाला प्रदर्शन नहीं कर पाई। 2020 में सबसे बड़ी पार्टी होकर भी नीतीश कुमार के नेतृत्व में ही चलने को मजबूर हुई। इसके कारण नीतीश के राजनैतिक (कु) प्रयोग का दोष उसके भी मत्थे गया। भले पिछले ढाई दशक में बीजेपी ज्यादातर समय बिहार की सत्ता में रही है, लेकिन उसके पास प्रदेश स्तर पर कोई भी ऐसा नेता नहीं जो अपने दम पर पार्टी को चुनाव जीता सके। यदि आज बीजेपी महाराष्ट्र में देवेंद्र फडणवीस को नहीं चुनने या एकनाथ शिंदे का पिछलग्गू बने रहने का ही भूल करती तो आने वाले वर्षों में उसे महाराष्ट्र में भी इसी तरह के संकट से जूझना पड़ सकता था।

अब बीजेपी ने तय कर दिया है कि जब भी उसकी दूसरी पीढ़ी के नेताओं की गिनती होगी तो वह योगी आदित्यनाथ, हिमंता बिस्वा सरमा के साथ-साथ देवेंद्र फडणवीस का नाम लेने के बाद ही पूर्ण होगी।

AAP विधायक नरेश बालियान को गिरफ्तार करेगी दिल्ली पुलिस: गैंगस्टर से बातचीत का आरोप, संगठित अपराध कानून में लगा है MACOCA

गैंगस्टर के साथ मिलकर वसूली गैंग चलाने के मामले में गिरफ्तार दिल्ली के उत्तम नगर से आम आदमी पार्टी के विधायक नरेश बालियान को क्राइम ब्रांच ने बुधवार (4 दिसंबर 2024) को पेश किया। इस दौरान दिल्ली पुलिस ने कोर्ट को बताया कि नरेश बालियान को महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण अधिनियम (MACOCA) के तहत दर्ज एक मामले में वह गिरफ्तार करेगी।

विशेष लोक अभियोजक अखंड प्रताप सिंह ने दिल्ली राऊज एवेन्यू कोर्ट के अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट पारस दलाल की अदालत के समक्ष अपनी दलील रखी। उन्होंने कहा, “हम नरेश बालियान को एक अलग मकोका एफआईआर में गिरफ्तार करेंगे। हम उन्हें अभी गिरफ्तार करेंगे।” कोर्ट ने मंगलवार (3 दिसंबर) को नरेश बालियान की पुलिस हिरासत को एक दिन के लिए बढ़ा दिया था।

इसके बाद नरेश बालियान ने उसी दिन जबरन वसूली के मामले में जमानत याचिका दायर की थी। पुलिस ने AAP विधायक की न्यायिक हिरासत की माँग की है, ताकि संगठित अपराध को लेकर उनसे पूछताछ की जा सके। इतना ही, नरेश बालियान का वॉइस सैंपल लेकर सामने आए ऑडियो क्लिप में उनके आवाज से उसका मिलान कराया जा सके।

दरअसल, शनिवार (30 नवंबर) को भाजपा ने लंदन में बैठे कुख्यात गैंगस्टर कपिल सांगवान उर्फ नंदू के साथ नरेश बालियान की बातचीत का ऑडियो जारी किया था। भाजपा ने आरोप लगाया था कि AAP नेता अपराधियों के साथ मिलकर वसूली गैंग चला रहे हैं। इसके बाद उसी शाम को दिल्ली पुलिस ने बालियान को गिरफ्तार कर लिया था। उन पर MACOCA भी लगाया है।

बालियान पर आरोप लगाते हुए भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता गौरव भाटिया ने कहा था, “AAP के नरेश बालियान या एक्टॉर्शनिस्ट MLA एक गैंगेस्टर से बात कर रहे हैं। इनका व्यवहार ऐसा है, जैसे एक माता से 2 भाई हों। ऑडियो में कहा जा रहा है कि बिल्डर को धमकाकर उससे मिले पैसे को हवाला का फैसला बाँट लेंगे। जनता ने इन्हें इसलिए नहीं चुना कि आप कभी मदिरा घोटाला करें या एक्सटॉर्शन रैकेट चलाएँ।”

भाजपा ने ऑडियो क्लिप जारी करते हुए लिखा था, “ये हैं आप के ‘कट्टर ईमानदार’… आम आदमी पार्टी के विधायक नरेश बालियान एक गैंगस्टर से बातचीत कर रहे हैं। गैंगस्टर पूछता है कि आप नेता ने उसके खिलाफ शिकायत क्यों दर्ज कराई है। बालियान जवाब देते हैं कि गैंगस्टर और उसके गुंडे उसे ब्लैकमेल कर रहे हैं। गैंगस्टर जवाब देता है कि वह बालियान की कोई रिकॉर्डिंग वायरल कर देगा।”

भविष्य में अवैध/गैर-कानूनी काम किए जाएँगे… फिर भी इसके लिए धन जुटाना PMLA के तहत मनी लॉन्ड्रिंग नहीं: PFI के 3 लोगों को दिल्ली हाई कोर्ट से जमानत

दिल्ली हाई कोर्ट ने बुधवार (4 दिसंबर 2024) को कहा कि प्रतिबंधित इस्लामी संगठन ‘पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) के पदाधिकारियों द्वारा जुटाए गए चंदा को PMLA के तहत मनी लॉन्ड्रिंग ने कहा जा सकता। कोर्ट ने कहा कि इसलिए चंदा के जरिए इस धन को जुटाने वाले लोगों के खिलाफ धन शोधन (Money Laundering) का अपराध नहीं दर्ज किया जा सकता है।

मामले की सुनवाई करते हुए न्यायाधीश जसमीत सिंह ने कहा कि प्रवर्तन निदेशालय (ED) केवल ‘अपराध की आय’ वाले मामले में धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) की धारा 3 को लागू कर सकता है। इसका ये अर्थ हुआ कि ये आपराधिक गतिविधि के प्राप्त धन होगा। इसके विपरीत, PFI के नेताओं के मामले में अदालत ने कहा कि आरोप यह था कि उन्होंने अपराध करने के लिए धन एकत्र किया था।

कोर्ट ने कहा, “ED द्वारा स्थापित मामला कि याचिकाकर्ता जो धन जुटा रहे थे, उसका उपयोग अनुसूचित अपराध करने के लिए किया गया था। यह PMLA के तहत अपराध की आय नहीं है। धन एकत्र करके किया गया अपराध अनुसूचित अपराध सहित किसी भी कानून के तहत अपराध हो सकता है, लेकिन पीएमएलए की धारा 3 को लागू करने के लिए इसे अपराध की आय नहीं कहा जा सकता है।”

इसके बाद दिल्ली हाई कोर्ट ने PFI की दिल्ली इकाई के तीन पदाधिकारियों – परवेज अहमद (अध्यक्ष), मोहम्मद इलियास (महासचिव) और अब्दुल मुकीत (कार्यालय सचिव) को जमानत दे दी। इन सभी पर साल 2020 में हुए CAA-NRC विरोधी प्रदर्शनों में शामिल होने और PFI के लिए धन एकत्र करने का आरोप लगाया गया था। PFI को साल 2022 में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने प्रतिबंधित कर दिया है।

न्यायाध जसमीत सिंह ने कहा कि धन जुटाने का काम साल 2020 के दिल्ली दंगों से पहले ही शुरू हो गया था। उन्होंने कहा कि PMLA में कहा गया है कि अपराध की आय आपराधिक गतिविधि के परिणामस्वरूप उत्पन्न होनी चाहिए। हालाँकि, न्यायालय ने यह भी कहा कि यदि आरोपितों ने अपराध से धन अर्जित किया भी हो तो भी उस पर उनका नियंत्रण नहीं था, क्योंकि धन पीएफआई के पास जमा था।

इसको देखते हुए न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि आरोपितों ने पीएमएलए की धारा 45 के तहत जमानत के लिए दो शर्तें पूरी की हैं। इसके अलावा, न्यायालय ने यह भी कहा कि तीनों आरोपियों ने दो साल से अधिक की अवधि तक जेल की सजा काट ली है और निकट भविष्य में मुकदमे के समाप्त होने की संभावना नहीं है। इस आधार पर तीनों आरोपितों को जमानत दे दी गई।

न्यायालय ने इस संदर्भ में यह भी कहा कि विशेष अधिनियमों के तहत जमानत के लिए कड़े नियम संविधान की अनुच्छेद 21 के तहत गारंटीकृत मौलिक अधिकारों को नहीं छीन सकते। न्यायालय ने इस तथ्य पर भी ध्यान दिया कि इस मामले में अभियोजन पक्ष के कुल 185 गवाह और 456 दस्तावेज हैं। इसके अलावा, डिजिटल साक्ष्य लाखों पृष्ठों में हैं।