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मंदिरों पर कब्जा जमाए मस्जिदों की असलियत नहीं जान पाएँगे हिंदू, पुराने मामलों पर जजमेंट नहीं, सर्वे के लिए याचिका भी नहीं होगी स्वीकार: सुप्रीम कोर्ट का फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने मजहबी स्थलों के सर्वे को लेकर नई याचिकाओं के स्वीकार किए जाने पर रोक लगा दी है। जिन मजहबी स्थलों के खिलाफ ऐसे मामले में चल रहे हैं, उन पर अदालतें कोई फैसला नहीं दे सकेंगी। इसके अलावा किसी भी मजहबी स्थल के सर्वे के आदेश भी नहीं दिए जा सकेंगे। कोर्ट ने यह फैसला प्लेसेस ऑफ़ वर्शिप एक्ट कानून पर चल रही सुनवाई के दौरान दिया है।

CJI संजीव खन्ना की बेंच ने गुरुवार (12 दिसम्बर, 2024) को प्लेसेस ऑफ़ वर्शिप एक्ट की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं की सुनवाई की है। इस कानून को हिन्दू पक्ष ने असंवैधानिक और मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करने वाला बताया है। इसको लेकर कई याचिकाएँ डाली गई थीं। वहीं इसके समर्थन में जमीयत-उलेमा-ए-हिन्द जैसे संगठन हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को आदेश दिया कि अब देश की अदालतों में कोई भी ऐसी याचिका स्वीकार नहीं की जाएगी, जिसमें किसी मजहबी स्थल की स्थिति को लेकर चुनौती दी गई हो। इन याचिकाओं पर सुनवाई ही नहीं होगी। यह आदेश सुप्रीम कोर्ट से नीचे की सभी अदालतों पर लागू होगा।

इसके अलावा जिन मामलों में किसी मजहबी स्थल के खिलाफ मुकदमे चल रहे हैं या जिनके सर्वे के आदेश दिए जा चुके हैं, उनको लेकर भी अदालतें कोई अंतरिम या अंतिम फैसला नहीं दे सकेंगी। इसका अर्थ है कि ज्ञानवापी जैसे मामलों पर अस्थायी रोक रहेगी।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा है कि जिन मामलों में याचिकाएँ स्वीकार हो चुकी हैं, उनमें भी ASI या कोर्ट कमिश्नर जैसे सर्वे के आदेश नहीं जाएँगे। यह रोक तब तक लगी रहेगी जब सुप्रीम कोर्ट प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट की सांवैधानिकता पर फैसला नहीं दे देता। यानि जब तक सुनवाई चलेगी, तब तक किसी मस्जिद, चर्च मंदिर जैसे धर्मस्थान को लेकर दावा नहीं ठोंका जा सकेगा।

सुप्रीम कोर्ट ने प्लेसेस ऑफ़ वर्शिप एक्ट मामले में केंद्र सरकार से एक हलफनामा दायर करने को कहा है। कोर्ट ने कहा है कि केंद्र सरकार को इस मामले में 4 सप्ताह के भीतर अपनी स्थिति स्पष्ट करनी होगी। सुप्रीम कोर्ट अब इस मामले में अगली सुनवाई पर स्थिति और भी स्पष्ट करेगा।

गौरतलब है कि वर्तमान में वाराणसी की ज्ञानवापी, धार की भोजशाला, मथुरा की शाही ईदगाह, संभल की जामा मस्जिद, बदायूँ की शम्सी जामा मस्जिद और जौनपुर की अटाला मस्जिद समेत कई ऐसे ही मजहबी स्थलों की स्थित को लकर हिन्दू पक्ष ने कोर्ट में मामले में डाले हैं। इनमें से कुछ में याचिका स्वीकार हुई है जबकि कुछ में सर्वे के आदेश दिए गए हैं।

आतंकी जाँच मामले में मौलवी हिरासत में, हंगामा मचाने आई बुर्काधारियों को फोर्स ने कंट्रोल किया: मीडिया ने कहा- धक्का-मुक्की हुई, पुलिस ने बताया- हालात अब सामान्य

उत्तर प्रदेश के झाँसी में मौलवी को छुड़ाने के लिए मुस्लिम भीड़ द्वारा NIA टीम को घेरने के मामले में पुलिस का बयान सामने आया है। बयान में झाँसी पुलिस ने बताया कि 12 दिसंबर को झाँसी जनपद के थानाक्षेत्र में NIA और ATS एक संदिग्ध व्यक्ति से पूछताछ के लिए गए थे। इसी दौरान कुछ लोग इकट्ठा होकर कार्रवाई का विरोध करने लगे, लेकिन मौके पर अतिरिक्त बल बुलाकर सबको समझा दिया गया और अब संदिग्ध को साइबर सेल थाना लाकर पूछताछ की जा रही है। माहौल बिलकुल शांत है।

बता दें कि इस मामले में मीडिया रिपोर्ट्स के हवाले से पहले बताया गया था कि गुरुवार (12 दिसम्बर, 2024) को NIA की एक टीम तड़के सुबह सुपर कॉलोनी नाम के मुहल्ले में मुफ़्ती खालिद नदवी को पकड़ने गई थी। खालिद नदवी शहर के काजी का भतीजा है। जब टीम ने उसका घर खटखटाया तो उसने दरवाजा नहीं खोला। आधे घंटे तक मशक्कत के बाद उसने दरवाजा खोला। इसके बाद टीम ने उसके घर में इस्लामी साहित्य और उसके लेनदेन के विषय में जानकारी ली। NIA टीम ने उससे जब बहुत से विदेशी नम्बरों पर बातचीत के विषय में पूछा तो उसने ऑनलाइन पढ़ाने की बात बताई।

इसके बाद सुबह NIA जब उसे अपने साथ ले जाने लगी तो बवाल हो गया। खबरों के अनुसार, मौलवी को हिरासत में लिए जाने के बाद मस्जिद से ऐलान हो गया और सैंकड़ों मुस्लिम आसपास इकट्ठा हो गए। इस भीड़ में मुस्लिम महिलाएँ भी शामिल थीं। सबने मिलकर मौलवी को छुड़ाने की कोशिश की। इस दौरान धक्का-मुक्की तक की बात सामने आई। हालाँकि अतिरिक्त फोर्स बुलाकर स्थिति को संभाल लिया गया और मौलवी को अपने साथ लेकर वो साइबर सेल थाने आ गए।

बताया जा रहा है कि NIA की टीम मौलवी को विदेशी फंडिंग के एक मामले में पकड़ने पहुँची थी। वह ऑनलाइन इस्लाम की तालीम देता है। उसके छात्रों में विदेशी छात्र भी शामिल हैं। NIA टीम ने झाँसी में ही एक और मौलवी से पूछताछ की है। वहीं खालिद को लेकर खबर है कि साइबर पुलिस थाने में पूछताछ के बाद उसे जाने दिया गया।

नोट: यह रिपोर्ट झाँसी पुलिस का बयान आने के बाद अपडेट की गई है।

गौमांस परोसो या होटल बंद करो: बांग्लादेश के इस्लामी कट्टरपंथी सड़कों पर उतरे, बोले- हिंदू मान्यताओं को नीचा दिखाने के लिए ये खाना जरूरी

बांग्लादेश के ढाका में इस्लामी कट्टरपंथ अब इस हद तक पहुँच गया है कि ‘मुस्लिम कंज्यूमर राइट्स काउंसिल’ ने माँग की है कि या तो राज्य के हर रेस्टोरेंट में बीफ परोसा जाए वरना सब मिलकर उसका बहिष्कार करे।

अपनी इस माँग को लेकर मुस्लिम कंज्यूमर राइट्स काउंसिल ने बंगशाल एरिया में एक रैली भी की और साथ में तर्क दिया कि जो रेस्टोरेंट बीफ नहीं दे रहे वो इस्लामी विचारधारा के विरुद्ध हैं इसलिए उन्हें बॉयकॉट किया जाना चाहिए।

रैली में शामिल प्रदर्शनकारी इस दौरान बंगशाल इलाके के एक होटल अल रज्जाक में एकत्रित हुए। इस दौरान उन्होंने नारेबाजी की। बार-बार कहा गया -जहाँ बीफ नहीं बिक रहा वो रेस्टोरेंट भारत और हिंदुत्व के एजेंट हैं। ऐसे रेस्टोरेंट्स का बहिष्कार किया जाए।

ढाका ट्रिब्यून की रिपोर्ट के अनुसार, परिषद के संयोजक मुहम्मद आरिफ अल खबीर ने बीफ को इस्लामी पहचान बताया और कहा कि गोमांस खाना इसी पहचान का प्रतीक है।

मुहम्मद आरिफ अल ख़बीर ने आगे कुरान की आयतों की बात करते हुए ये भी बताया कि उनके मजहब में गोमांस खाना कोई अनिवार्य नहीं है लेकिन हिंदू मान्यताओं को नीचा दिखाने के लिए और इस्लाम के प्रति निष्ठा दिखाने के लिए ऐसा करना जरूरी है। ठीक वैसे जैसे इस्लाम में ऊँट का मांस खाना अनिवार्य नहीं है, लेकिन मुसलमान ऊँट खाते हैं क्यों ये यहूदियों के खानों में निषेध है, इसलिए इस्लाम के प्रति निष्ठा दिखाने के लिए उनका ऊँट खाना जरूरी है।।

आरिफ अल खबीर ने कहा कि सभी रेस्टोरेंटों को अपनें मेन्यू में कम से कम एक बीफ डिश शामिल करके मुस्लिमों के प्रति अपना समर्थन देना चाहिए। अगर वो ऐसा नहीं करते तो ये तो पक्का है कि वो हिंदुत्व के एजेंट हैं और इसीलिए उनका बहिष्कार होना चाहिए।

आरिफ ने अपने बयान में पश्चिमी देशों पर भी गुस्सा जाहिर करते हुए कहा कि यूरोप और अमेरिका में यहूदी और ईसाई मुस्लिमों के लिए हलाल खाना नहीं रखते। मुस्लिमों को अपने खाने के लिए अलग व्यवस्थान करनी पड़ती है। ऐसे ही अगर हिंदुओं को अपने लिए कोई विकल्प रखना है तो वो अपना रेस्टोरेंट खोल लें, मुस्लिमों के अधिकारों का हनन न करें।

AMU में पढ़ाई कर रहे बांग्लादेशियों ने उगला जहर, भारत-महिलाओं को लेकर लिख रहे गालियाँ: 3 छात्रों पर कार्रवाई की माँग, जाँच जारी

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) के 3 बांग्लादेशी छात्रों ने सोशल मीडिया पर भारत, मंदिरों और महिलाओं के खिलाफ अश्लील टिप्पणियाँ की। यूनिवर्सिटी के अन्य छात्रों ने इसकी शिकायत AMU प्रशासन और प्रॉक्टर से की है। उन्होंने माँग की है कि इन बांग्लादेशियों की पढ़ाई बंद करके, उनका वीजा रद्द किया जाए और वापस बांग्लादेश भेजा जाए।

इन तीनों इस्लामी कट्टरपंथी छात्रों की पहचान शम्युल, रिफत रहमान और महमूद हसन अराफात के रूप में हुई है। इन छात्रों की टिप्पणियों के स्क्रीनशॉट भी यूनिवर्सिटी प्रशासन को शेयर किए गए हैं। AMU ने इस मामले की जाँच शुरू कर दी है और आरोपित छात्रों को नोटिस दिया गया है।

AMU के पोस्ट ग्रेजुएशन के छात्र अखिल कौशल और कुछ अन्य छात्रों ने प्रॉक्टर को एक आधिकारिक शिकायत दी है। उन्होंने कहा कि AMU में पढ़ने वाले 3 बांग्लादेशी छात्रों ने सोशल मीडिया पर भारत विरोधी और हिंदू विरोधी पोस्ट किए जबकि दो छात्रों ने भारतीय महिलाओं पर भी अश्लील टिप्पणी की है।

इन छात्रों ने ISKCON के मंदिरों पर प्रतिबंध लगाने की माँग की थी और इस समूह को आतंकवादी संगठन बताया था। उन्होंने खुलासा किया कि बांग्लादेशी छात्रों ने उत्तर प्रदेश में गाय का गोबर खाने को लेकर टिप्पणी की। AMU के डिप्टी प्रॉक्टर नवाज अली जैदी ने बताया कि छात्रों के खिलाफ जाँच शुरू कर दी गई है।

बताया गया है कि शमउल BA की डिग्री लेने के बाद बांग्लादेश लौट गया है। वहीं महमूद हसन अराफात को BA. LLB में दाखिला मिल गया था, लेकिन उसने एडमिशन ही नहीं लिया। मौजूदा जानकारी के मुताबिक वह बांग्लादेश में है, जबकि तीसरा छात्र रिफत रहमान इस समय AMU में बीए की पढ़ाई कर रहा है। उसे नोटिस जारी कर जवाब माँगा गया है।

डिप्टी प्रॉक्टर जैदी ने बताया कि तीनों छात्रों की जानकारी AMU के बांग्लादेश स्थित एडमिशन सेंटर को भी भेज दी गई है। वहाँ से और भी जानकारी जुटाई जा रही है। इस जाँच के पूरा होने बाद इन तीनों पर विभागीय कार्रवाई की जाएगी। जैदी ने ऐसे काम ना करने की छात्रों को चेतावनी दी है।

उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया एक जिम्मेदार मँच होना चाहिए और ऐसी गतिविधियों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। इस बीच, प्रदर्शन करने वाले छात्रों ने कहा कि अगर इन छात्रों को दंडित नहीं किया गया तो उन्हें संस्थान में घुसने नहीं दिया जाएगा। वर्तमान में AMU में बांग्लादेश के 36 छात्र पढ़ रहे हैं।

माँ सहित दोनों बेटों ने की आत्महत्या, बहू-ससुराल वालों की प्रताड़ना से परेशान: लिखा – ‘हमको तंग किया दिमागी रूप से… मेरी मौत की सजा इसको दिलवाना साहब’

राजस्थान के जोधपुर में एक ही परिवार के तीन लोगों ने जहर खाकर आत्महत्या कर ली। आत्महत्या करने वालों में दो युवक और उनकी माँ शामिल हैं। तीनों ने आत्महत्या करने के पहले एक सुसाइड नोट भी छोड़ा है। इस नोट में उन्होंने आत्महत्या के लिए मजबूर करने का आरोप बड़े बेटे की पत्नी और उसके परिजनों पर लगाया है। उन्होंने इन सबके लिए कड़ी सजा की माँग की है।

यह घटना जोधपुर के ओसियाँ की है। ओसियाँ के बिगमी गाँव में बुधवार (11 दिसम्बर, 2024) को एक घर में एक महिला भंवरी देवी (55) और उसके दो बेटों नवरत्न सिंह (27) और प्रदीप (24) के शव मिले। इन तीनों के मुंह से झाग निकल रहा था। यह शव सबसे पहले प्रदीप की मौसी के नाबालिग बेटे ने देखे। उसने इस बात की सूचना बाकी परिजनों और गाँव वालों को दी।

इसके बाद तीनों को अस्पताल ले जाया जहाँ इन्हें मृत घोषित कर दिया गया। बताया गया कि तीनों ने जहर खाकर आत्महत्या की है। इस परिवार ने एक सुसाइड नोट भी छोड़ा है। उन्होंने एक कागज पर पीड़ा व्यक्त की और साथ ही यह सुसाइड नोट व्हाट्सएप पर पुलिस को भी भेजा है।

इस सुसाइड नोट में उन्होंने लिखा, “हमको तंग किया दिमागी रूप से, झूठे इल्जाम लगाए, हमारी मौत की सजा मंडला वाले लाल सिंह, हुकम सिंह, श्रवण सिंह और इनकी बेटी नीतू कंवर इन सब ने दिमागी ढंग से टॉर्चर किया है। जूते इल्जाम लगाए गए हैं, मेरी मौत की सजा इसकी पूरी फैमिली को दिलवाना साहब प्लीज।”

मीडिया रिपोर्ट्स में बताया गया है कि नवरत्न की शादी कुछ माह पहले ही पास के गाँव की नीतू कँवर से हुई थी। तब से ही इस पूरे परिवार को ससुरालीजन परेशान कर रहे थे। पति-पत्नी के बीच भी झगड़ा चल रहा था। इस प्रताड़ना से ही तंग आकर तीनों ने आत्महत्या कर ली।

आत्महत्या करने वाले दोनों भाई एक फाइनेंस कंपनी में काम करते थे। पुलिस ने तीनों शवों का पोस्टमार्टम करने के लिए भेज दिया और और मामले की जाँच कर रही है। पुलिस ने कहा है कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद वह स्पष्ट तौर पर कारण बता पाएँगे।

पिता को जेल से छुड़ाना है तो दो ₹5 लाख… महाराष्ट्र के सतारा में ACB ने जज को रिश्वतखोरी में किया गिरफ्तार: 2 बिचौलिए समेत 4 हिरासत में

महाराष्ट्र के सतारा में रिश्वत लेने के आरोप में न्यायाधीश धनंजय निकम की गिरफ्तारी हुई है। खबर के अनुसार, सतारा भ्रष्टाचार निरोधक विभाग ने जिला एवं सत्र न्यायाधीश धनंजय निकम समेत 4 लोगों को 5 लाख रुपए की रिश्वतखोरी के मामले में गिरफ्तार किया है।

न्यायाधीश को लेकर शिकायत दी गई थी कि उन्होंने शिकायतकर्ता के पिता को जमानत देने के लिए रिश्वत माँगी थी। बाद में पुलिस ने उन्हें होटल में जाल बिछाकर रंगे हाथ पकड़ा। अब मामले को दर्ज करके आगे की कार्रवाई शुरू कर दी गई है।

जानकारी के मुताबिक, महाराष्ट्र भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) ने इस मामले में 11 दिसंबर 2024 को एफआईआर दर्ज की। आरोप के अनुसार, धनंजय निकम ने दो बिचौलियों, किशोर खरात और आनंद खरात, के माध्यम से शिकायतकर्ता से पैसे की माँग की थी।

इसके बाद शिकायतकर्ता ने एसीबी से संपर्क किया और बताया कि उसके पिता को जमानत देने के लिए रिश्वत माँगी गई। एसीबी ने अपनी जाँच शुरू की और आरोप को सच पाया। इसके बाद उन्होंने न्यायाधीस समेत 4 को गिरफ्तार किया।

गौरतलब है कि इससे पहले महाराष्ट्र भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने एक ठेकेदार से तीन लाख रुपए की रिश्वत माँगने और स्वीकार करने के आरोप में बीएमसी के एक सहायक अभियंता को गिरफ्तार किया था। एक अधिकारी ने इस कार्रवाई की जानकारी देते हुए बताया, “ठेकेदार ने बाबासाहेब अंबेडकर रोड और रेय रोड रेलवे स्टेशन के पास शौचालय निर्माण के लिए मंजूरी के लिए आवेदन किया था। एसीबी के जाल में उसे ठेकेदार से तीन लाख रुपए लेते हुए पकड़ा गया।”

इसके अलावा राजस्थान में भी सतारा जैसी घटना सामने आई थी। वहाँ भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने मंगलवार को झुंझुनू में एक मजिस्ट्रेट को उस समय गिरफ्तार कर लिया, जब वह कथित तौर पर 2 लाख रुपए की रिश्वत और एक महंगा डिनर सेट ले रहा था

दूसरे के साथ फरार हुई बीवी, निचले कोर्ट ने पति को दिया मुआवजा, केरल हाई कोर्ट ने पलटा फैसला: कहा- पत्नी की ‘एडल्ट्री’ मुआवजे का आधार नहीं

केरल में हाल में एक मामला सामने आया जहाँ एक पीड़ित पति ने फैमिली कोर्ट से ये कहकर मुआवजा माँगा था कि उसकी बीवी भाग गई है। फैमिली कोर्ट ने उसकी माँग को मान भी लिया। हालाँकि जब ये केस केरल हाई कोर्ट में पुनर्विचार के लिए पहुँचा तो न्यायधीशों द्वारा फैसला पलट दिया गया। उच्च न्यायालय ने कहा कि पत्नी के व्यभिचार को मुआवजे का आधार नहीं माना जा सकता।

हाईकोर्ट ने क्या कहा

लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, केरल हाईकोर्ट के जस्टिस देवन रामचंद्रन और जस्टिस एमबी स्नेहलता ने इस केस की सुनवाई की और कहा कि पत्नी के पति को छोड़कर भागने पर मुआवजा नहीं दिया जा सकता है।अदालत ने यह स्पष्ट किया कि व्यक्तिगत संबंधों में होने वाले विवादों को कानूनी रूप से मुआवजे के रूप में नहीं देखा जा सकता है।

केरल उच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि शादी एक संवैधानिक अधिकार है। इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता के रूप में देखा जाना चाहिए। अगर कोई व्यक्ति अपने साथी के साथ संबंध समाप्त करता है या किसी अन्य व्यक्ति के साथ भाग जाता है, तो इसे कानूनी रूप से दंडनीय नहीं ठहराया जा सकता।

अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि विवाह और व्यक्तिगत संबंधों में कई जटिलताएँ होती हैं और इनका समाधान कानूनी प्रक्रिया द्वारा नहीं किया जा सकता। ऐसे मामलों को सामाजिक और व्यक्तिगत स्तर पर सुलझाने की आवश्यकता होती है।

कोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि तलाक (संशोधन) एक्ट,2001 के बाद सेक्शन 34 को भारतीय तलाक अधिनियम से हटा दिया गया जो व्यभिचार पर हर्जाने की देने की अनमुति देता था। इसके अलावा कोर्ट ने कहा कि इस बात के भी कोई साक्ष्य नहीं हैं जिससे कि ये पता चल सके कि पत्नी की हरकत से पूर्व पति को कोई मानसिक पीड़ा हुई है इसलिए न्यायलय मुआवजा देने वाले फैसले को खारिज करता है।

क्या था मामला

गौरतलब है कि इस मामले में पीड़ित पुरुष ने कोर्ट में कहा था उसकी पत्नी ने उसके साथ धोखा किया और दूसरे व्यक्ति के साथ भाग गई। पति के अनुसार, उसकी पूर्व पत्नी अपने साथ सोना और पैसा भी लेकर गई थी। ऐसे में उसने याचिका में 20 लाख रुपए के मुआवजे का दावा किया और सोना व नकदी वापस माँगा था। फैमिली कोर्ट ने तब सुनवाई करते हुए सोना और नकदी वाली माँग को खारिज कर दिया था और 4 लाख मुआवजा देने के लिए आदेश पारित किया था। फैमिली कोर्ट ने माना था कि घटना से पति को मानसिक और भावनात्मक नुकसान हुआ है इसलिए मुआवजा मिलना चाहिए।

पत्थर वाले संविधान पर बवाल, इंसान को तालिबानी आतंकियों की तरह मारा: महाराष्ट्र के परभणी जिले में पत्थर-आगजनी, कलेक्टर ऑफिस में भी तोड़फोड़

महाराष्ट्र के परभणी जिले में पत्थर से बनाई गई संविधान की किताब को एक शख्स ने क्षतिग्रस्त कर दिया। इसके बाद उस शख्स को भीड़ ने बुरी तरीके से पीटा। दावा किया गया कि उसके चेहरे पर पैर रखा गया और उसकी लाठियों से सैकड़ों लोगों के सामने पिटाई हुई। मामला यहीं नहीं रुका बल्कि भीड़ ने परभणी के बाजार में दुकानों और गाड़ियों पर हमला किया और पत्थर बरसाए। महिलाओं की एक भीड़ कलेक्टर ऑफिस में घुसी और यहाँ भी पत्थर चलाए। कुछ महिलाओं ने कलेक्टर के सामने ही हंगामा काट दिया। हिंसा के बाद पुलिस ने कार्रवाई की है।

यह पूरा बवाल मंगलवार (10 दिसम्बर, 2024) को चालू हुआ। यहाँ परभणी रेलवे स्टेशन के बाहर लगाई गई डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर की एक प्रतिमा के पास ही पत्थर की ही संविधान की एक किताब लगाई गई थी। इसे सोपन पवार नाम के एक शख्स ने कथित तौर पर क्षतिग्रस्त कर दिया। इसके बाद इसे भीड़ ने पकड़ लिया और बुरी तरीके से पीटा। इसी घटना का कथित वीडियो वायरल है। इसमें दिखता है कि एक शख्स जमीन पर पडा है और उसके चेहरे पर एक शख्स ने पैर रखा हुआ है। इसके बाद एक और शख्स उसे लाठियों से पीटता है।

संविधान की प्रतिकृति पर हमला के आरोपित को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। हालाँकि, उसकी गिरफ्तारी के बाद भी परभणी में हिंसा हुई। मंगलवार और बुधवार दोनों दिन अम्बेडकरवादी कार्यकर्ताओं ने रैलियाँ निकाली। बुधवार (11 दिसम्बर, 2012) को परभणी में सड़क पर आई भीड़ ने आगजनी की। उन्होंने सड़क पर टायर जलाए। कुछ दुकानों में भी तोड़फोड़ की गई। यहाँ कड़ी गाड़ियों को भी निशाना बनाया गया है। कुछ लोग नीले झंडे और लाठी-डंडे हाथ में लिए नजर आए। इस प्रदर्शन में कुछ हरे झंडे और टोपी वाले लोग भी दिखे।

विरोध प्रदर्शन करने वाली कुछ महिलाएँ इस दौरान परभणी के कलेक्टर ऑफिस में घुस गईं। कलेक्टर के ऑफिस में तोड़फोड़ की गई और उनके सामने भी हंगामा किया गया। कुछ महिलाएँ यहाँ कार्रवाई की माँग को लेकर काफी उत्तेजित हो गईं। इसके बाद उन्हें बाहर ले जाया गया।

इसका एक वीडियो भी वायरल हो रहा है। मामले में पुलिस ने कानून व्यवस्था बनाने के लिए निषेधाज्ञा लागू कर दी है। कहीं-कहीं पुलिस को एक्शन भी लेना पड़ा है। मामले में दलित नेताओं ने कार्रवाई की माँग की है। पुलिस ने अभी तक 40 लोगों को इस हिंसा के संबंध में गिरफ्तार किया है।

बसपा सुप्रीमो मायावती ने भी इस मामले में बयान दिया है। मायावती ने एक्स (पहले ट्विटर) पर लिखा, “महाराष्ट्र राज्य के परभणी में स्थित भारतरत्न बाबा साहेब डा. भीमराव अम्बेडकर की प्रतिमा एवं संविधान का किया गया अपमान अति-निन्दनीय व शर्मनाक। इस घटना से पार्टी काफी दुःखी व चिन्तित भी है। वहाँ की राज्य सरकार, ऐसे जातिवादी व असामाजिक तत्वों के विरुद्ध तुरन्त सख़्त क़ानूनी कार्रवाई करे, वरना वहाँ हालात् काफी बिगड़ सकते हैं। सभी से शान्ति-व्यवस्था बनाये रखने की अपील।”

रमजान (‘शांति’ का महीना) में नमाज कर निकली भीड़ ने बुद्ध-महावीर की तोड़ी थी मूर्तियाँ, अखिलेश सरकार ने कोर्ट को बताया था ‘मनोरंजन’ के लिए थीं प्रतिमाएँ

मुस्लिमों का एक कॉन्सेप्ट है। इसका नाम है ‘उम्माह’, वैसे तो इसका अर्थ होता है राष्ट्र, लेकिन इसका प्रैक्टिकल मतलब होता है कि पूरी दुनिया के मुस्लिम एक हैं। यानि सूडान का मुस्लिम बांग्लादेश के मुस्लिम का साथ देगा, क्योंकि वह उसका इस्लामी भाई है। इसी के चलते 1920 के दशक में जब तुर्की में खलीफा को हटाया गया, तो भारत में मुस्लिमों ने विद्रोह कर दिया। यह कोई अकेली ऐसी घटना नहीं है। भारत लगातार ऐसी घटनाएँ देखता आया है। ऑपइंडिया आपके लिए 2012 की ही एक ऐसी घटना की कहानी लाया है।

यह मामला उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से जुड़ा हुआ है लेकिन इसके तार असम-म्यांमार तक जुड़े हुए हैं। घटना 2012 की है। इसकी शुरुआत होती है लखनऊ से सैकड़ों-हजारों किलोमीटर दूर असम और म्यांमार से। म्यांमार में रोहिंग्या और बौद्धों के बीच लड़ाई होती है। म्यांमार की फ़ौज रोहिंग्याओं को भागने पर मजबूर कर देती है। रोहिंग्याओं के गाँव जलाए जाते हैं। दूसरी तरफ असम में मुस्लिम 4 बोडो लड़कों को मार देते हैं। इससे दोनों समुदाय में दंगा भड़कता है। असम जल उठता है। कुछ मुस्लिम भी मारे जाते हैं।

इससे पूरे देश में रहने वाला मुस्लिम गुस्सा हो जाता है। रमजान के ‘पवित्र’ महीने के अंतिम जुमे की नमाज, यानि अलविदा की नमाज के बाद एक विरोध प्रदर्शन का ऐलान होता है। मुस्लिमों के जमीयत-उलेमा-ए-हिन्द जैसे संगठन कहते हैं कि असम और म्यांमार में मुलिमों पर जुल्म हो रहा है जिसके खिलाफ हर एक मुस्लिम सड़क पर उतरेगा। यहाँ भी उम्मा का कॉन्सेप्ट लगाया जाता है। ये तारीख थी 17 अगस्त, 2024। दिन तो पहले ही बता दिया गया है कि शुक्रवार।

फोटो साभार: The Hindu

नमाज के बाद हजारों मुस्लिमों की भीड़ सड़कों पर उतरती है। यह पूरी कार्रवाई लखनऊ की टीले वाली मस्जिद से चालू हुई। मुस्लिम भीड़ ने इस मस्जिद से निकलने के बाद तोड़फोड़ चालू की। रोड पर जो दिखा, उसके साथ बदतमीजी की। इसके बाद ये भीड़ इसी इलाके में बने महावीर पार्क (जिसे हाथी पार्क के तौर पर जाना जाता है) में घुसी। यहाँ इसने महावीर स्वामी की मूर्ति क्षतिग्रस्त की। उनकी मूर्ति के साथ बर्बरता की गई।

भगवान महावीर की यह 9 फीट ऊँची पद्मासन प्रतिमा 25 अप्रैल, 2002 को स्थापित की गई थी। तब उत्तर प्रदेश सरकार ने भगवान महावीर की 2600वीं जयंती के अवसर पर यह प्रतिमा स्थापित की थी। पहले हाथी पार्क के नाम से मशहूर इस पार्क का नाम बदलकर भगवान महावीर पार्क कर दिया गया था। भगवान महावीर की प्रतिमा को आचार्य 108 श्री विवेकसागरजी महाराज और अन्य जैन साधुओं के नेतृत्व में जैन समुदाय के सदस्यों द्वारा जुलूस के रूप में लाया गया था। लेकिन जिन जैनों का इस हिंसा से कोई लेना-देना तक नहीं था उनको भी निशाना बनाया गया।

इसी के साथ भीड़ बुद्धा पार्क में भी घुसी। यहाँ इस भीड़ ने बुद्ध की मूर्ति पर हमला किया। टोपी लगे हुए युवाओं ने ध्यान की मुद्रा में बैठे बुद्ध की मूर्ति पर हमला किया। लोहे के डंडे और साइन बोर्ड से उनकी मूर्ति को तोड़ने की कोशिश की गई। इस पूरे वाकये की तस्वीरें आज भी जब तब सामने आती हैं। बुद्ध पर होते इस हमले को देखकर आपको अफगानिस्तान के बामियान की याद आ जाएगी। वहाँ भी तालिबान (वैसे तो तालिब का मतलब छात्र होता है, लेकिन यहाँ आतंकी से है) वालों ने बुद्ध की मूर्तियों को विस्फोटक लगा कर उड़ा दिया था।

ये सब काम वहाँ हो रहा था जहाँ पर इस देश के सबसे बड़े सूबे की सरकार बैठती है। लेकिन सरकार भला उन पर क्यों कर एक्शन लेने लगती। क्योंकि सरकार थी समाजवादी पार्टी की। उसके मुखिया थे अखिलेश यादव। ये वही अखिलेश यादव थे, जिनके राज में बरेली में कांवड़ यात्रा के डीजे बंद हो जाते थे। जब पूरे दिन मुस्लिम भी ने खूब तबाही मचा ली, तब जाकर कहीं पुलिस ने उनको तितर बितर किया। इस हिंसा के बाद जैन और बुद्ध समाज ने प्रश्न उठाए। उन्होंने पूछा कि आखिर उनके आराध्य का इसमें क्या दोष था।

लेकिन जैन समाज के साथ मजाक यहीं तक नहीं सीमित था। जब हाई कोर्ट में इस बात के लिए याचिका डाली गई कि सरकार उन लोगों पर कार्रवाई करे जिन्होंने महावीर स्वामी की मूर्ति तोड़ी और नई मूर्ति भी लगवाए तो अखिलेश सरकार ने चौंकाने वाला जवाब दिया। अखिलेश सरकार के नौकरशाह ने हाई कोर्ट को कहा कि साहब वो उन मूर्तियों का कोई ख़ास धार्मिक महत्त्व थोड़े था, वो तो हमें सैर-सपाटे के लिए आने वालों की मौज के लिए लगाई गईं थी। अखिलेश सरकार के दूसरे नौकर शाह ने यह तक कह दिया कि साहब मूर्ति टूटी ही नहीं।

इस पर कोई ने फटकार लगाई। इसके बाद कोर्ट को आदेश देना पड़ा कि मूर्तियाँ या तो रिपेयर करवाओ या फिर नई लगवाओ। सरकार ने भरोसा दिया कि लगवाएँगे लेकिन जब कई दिनों तक कार्रवाई नहीं हुई, तब फिर कोर्ट ने फटकारा। कोर्ट ने 2017 में सरकार को इस बात पर भी फटकार लगाई कि आखिर उन लोगों पर क्या कार्रवाई हुई है जिहोने यह मूर्तियाँ तोड़ी थी। इस पर भी तब की सरकार ने कोई साफ़ जवाब नहीं दिया।

लेकिन ये सब कहानी अब क्यों बताई जा रही है? दरअसल, इस मामले में जिन लोगों ने जनहित याचिका लगाई थी उनके वकील थे हरि शंकर जैन। हरि शंकर जैन के ही बेटे विष्णु शंकर जैन अब संभल में लड़ाई लड़ रहे हैं। उनको धमकियाँ दी जा रही हैं, मुस्लिमों से कहा जा रहा है कि उनका चेहरा पहचान लें। उन्होंने इस मामले में शिकायत भी दर्ज करवाई है। उन्होंने इस लखनऊ वाले मामले की याद भी लोगों को दिलाई है। उन्होंने कोर्ट का वह आदेश साझा किया है।

जिस हिंदू बच्ची का पाकिस्तान में हुआ जन्म, वो भारत आकर बनी डॉक्टर, CAA के कारण बदली किस्मत: अब तक 1222 लोग बने हिंदुस्तानी

गुजरात के अहमदाबाद में पिछले 20 साल से रह रहे 56 पाकिस्तानी नागरिकों को भारतीय नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के चलते भारत की नागरिकता मिली। खुद गृह राज्य मंत्री हर्ष संघवी ने 11 दिसंबर को अहमदाबाद में एक कार्यक्रम के दौरान उन्हें नागरिकता के प्रमाण प्रत्र सौपें। इस अवसर पर, गृह राज्य मंत्री ने सभी नए नागरिकों को बधाई दी और कहा, “मुस्कुराइए, अब आप इस महान देश भारत के नागरिक हैं।”

बता दें कि इन 56 पाकिस्तानी नागरिकों में से एक प्रमुख नाम हिशा कुमारी का है। हिशा का जन्म साल 1998 में पाकिस्तान में हुआ था। वह 2013 में अपने परिवार के साथ भारत आईं और यहाँ आकर 8वीं से आगे की पढ़ाई की। 2017 में उनका एडमिशन अजमेर के मेडिकल कॉलेज में हुआ और अब वह पढ़ाई पूरी करके निकल चुकी हैं।

हिशा भारत की नागरिकता मिलने पर कहती हैं- “मुझे मेरी पहचान लौटाने के लिए देश के पीएम मोदी, गृहमंत्री अमित शाह का आभार। ये नागरिकता मिलने के बाद मैं कहीं भी अप्लाई कर सकती हूँ।” उन्होंने नागरिकता मिलने पर अपने प्रमाण पत्र के साथ अपनी तस्वीर भी दिखाई और बोलीं कि भारत का नागरिक होने पर गर्व महसूस हो रहा है।

गौरतलब है कि साल 2017 से मार्च 2024 तक के बीच में मोदी सरकार 1167 पाकिस्तानी नागरिकों को भारतीय नागरिकता का प्रमाण पत्र दे चुकी है और इन 55 लोगों को मिलाकर ये संख्या 1222 पहुँच गई है। राज्य गृहमंत्री हर्ष संघवी ने भी इस बाबत जानकारी दी कि पिछले छह महीनों में अकेले गुजरात में 50 से अधिक पाकिस्तानी हिंदुओं को यह प्रमाणपत्र मिला है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि पहले इन लोगों को दिल्ली जाकर लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता था, लेकिन अब स्थानीय स्तर पर ही उनकी समस्याओं का समाधान किया जा रहा है।