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दरवाजे पर लिखा ‘मकान बिकाऊ है’ तो जागी पुलिस, लेकिन जेल से बाहर आते ही फिर धमकाने लगा शादाब और उसक परिवार: पीड़ित दलित ने जताई अनहोनी की आशंका

मध्य प्रदेश के इंदौर की बगीचे कॉलोनी में रहने वाले एक दलित परिवार ने आरोप लगाया है कि मुस्लिम समुदाय के शादाब और कुछ लोग उन्हें लगातार धमका रहे हैं और उनकी जान को खतरा है। इस परिवार ने रविवार (17 नवंबर 2024) को अपने घर के बाहर पलायन का पोस्टर लगा दिया था। पहले पुलिस ने मामले में कार्रवाई करते हुए आरोपितों को जेल भेजा था, लेकिन अब उनकी जमानत के बाद पीड़ित परिवार बेहद डरा हुआ है। हालाँकि पुलिस ने राजेश और उनके परिवार को सुरक्षित बताया है।

दैनिक भास्कर के मुताबिक, पीड़ित परिवार के मुखिया राजेश कलमोइया ने बताया कि जमानत पर रिहा हुए आरोपित शादाब के परिवार के लोग उनके परिवार वालों को घूर-घूरकर देख रहे हैं। उन्होंने कहा, “जब से ये लोग जेल से बाहर आए हैं, हमें लग रहा है कि हमारे साथ कुछ भी अनहोनी हो सकती है। पुलिस ने पहले भरोसा दिया था कि आरोपितों पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) लगाया जाएगा, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ।”

परिवार ने दावा किया है कि उन्हें लगातार धमकियाँ मिल रही हैं। राजेश ने बताया कि पहले पुलिस उनके घर पर लगातार आती थी, लेकिन अब कई दिनों से उनकी गली में भी नजर नहीं आई। परिवार का कहना है कि ऐसे हालातों में उनके पास केवल दो विकल्प बचे हैं- या तो पलायन करें या आत्महत्या। हालाँकि पुलिस ने राजेश को सुरक्षित बताया है। स्थानीय SHO के मुताबिक राजेश की तरफ से अपनी नई शिकायतों के बारे में कोई तहरीर नहीं दी गई है।

17 नवंबर को लगाए थे पलायन के पोस्टर

राजेश ने 17 नवंबर को अपने घर के बाहर पलायन के पोस्टर लगाए थे। उनका आरोप था कि शादाब और अन्य आरोपितों ने उन्हें और उनके परिवार को परेशान किया। मामला तब बढ़ा, जब हिंदू संगठनों ने कार्रवाई की माँग की। इसके बाद पुलिस ने SC/ST एक्ट और अन्य धाराओं के तहत मुख्य आरोपित शादाब समेत 7 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी।

केस वापसी का दबाव बनाया और घर के बाहर किया धमाका

राजेश ने बताया कि शादाब और अन्य आरोपित लगातार उन पर केस वापसी का दबाव बना रहे थे। इसमें शादाब के परिवार की महिलाएँ भी शामिल थीं। राजेश के अनुसार, जब उन्होंने केस वापस लेने से मना कर दिया, तो उनके घर के बाहर विस्फोटक से धमाका किया गया। इस मामले में रईस नाम के एक अन्य व्यक्ति को भी नामजद किया गया था।

पुलिस की भूमिका पर उठ रहे सवाल

पीड़ित परिवार ने पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए कहा कि पहले तो पुलिस ने आश्वासन दिया था कि सख्त कदम उठाए जाएँगे, लेकिन अब पुलिस गायब है। परिवार ने पलायन को मजबूरी बताया और कहा कि उनकी सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की गई तो उन्हें आत्महत्या का कदम उठाना पड़ सकता है।

हाईवे जाम न करें, जनता को दिक्कत न हो: सुप्रीम कोर्ट ने किसान संगठनों को पढ़ाया ‘शांतिपूर्ण प्रदर्शन’ का पाठ, इधर दिल्ली कूच से नोएडा बॉर्डर पर हाल-बेहाल

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (2 दिसंबर 2024) को पंजाब के किसान नेता जगजीत सिंह डल्लेवाल से कहा कि किसान प्रदर्शन शांतिपूर्ण और जिम्मेदारी से किए जाएँ। कोर्ट ने साफ कहा कि प्रदर्शनकारी हाईवे जाम न करें और न ही आम जनता को परेशान करें।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने जगजीत सिंह डल्लेवाल की ओर से दायर हैबियस कॉर्पस याचिका पर सुनवाई की। याचिका में दावा किया गया था कि डल्लेवाल को खनौरी बॉर्डर से जबरन हटाकर लुधियाना के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया था। कोर्ट ने याचिका का निपटारा करते हुए कहा कि डल्लेवाल को अब रिहा कर दिया गया है और वे दोबारा आंदोलन में शामिल हो चुके हैं।

इस बीच, नोएडा की तरफ से किसानों ने दिल्ली कूच किया है। किसान संगठनों में शामिल प्रदर्शनकारियों ने महामाया फ्लाईओवर के पास लगाई गई यूपी पुलिस की बैरिकेडिंग को उखाड़ फेंका और आगे बढ़ गए। हालाँकि पुलिस ने उन्हें दलित प्रेरणा स्थल के सामने ही रोक लिया है।

डल्लेवाल का आरोप: ‘अस्पताल में नजरबंद किया गया’

जगजीत सिंह डल्लेवाल ने अपनी हिरासत को लेकर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि उन्हें जबरन अस्पताल में रखा गया और न तो मीडिया से मिलने दिया गया, न ही फोन तक पहुँचने दिया गया। उनका कहना था, “अगर मुझे जाँच के लिए भर्ती किया गया होता, तो मीडिया से मिलने की अनुमति होती। लेकिन यह असल में पुलिस हिरासत थी।”

डल्लेवाल को शुक्रवार (29 नवंबर 2024) को अस्पताल से डिस्चार्ज किया गया, जिसके बाद खनौरी बॉर्डर पर उनका जोरदार स्वागत किया गया। संयुक्त किसान मोर्चा (गैर-राजनीतिक) के वरिष्ठ नेता सरवन सिंह पंधेर ने डल्लेवाल को समर्थन देते हुए आंदोलन जारी रखने की बात कही।

प्रदर्शनों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने दी सलाह

सुप्रीम कोर्ट ने किसानों से अपील की कि वे प्रदर्शन जरूर करें, लेकिन कानून के दायरे में रहते हुए। कोर्ट ने कहा कि लोकतंत्र में शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार सबको है, लेकिन इसे जिम्मेदारी से करना चाहिए ताकि जनता को कोई असुविधा न हो। कोर्ट ने यह भी कहा कि खनौरी बॉर्डर पंजाब की ‘लाइफलाइन’ है और इसे बाधित करना सही नहीं है।

जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस उज्जल भुयान की बेंच ने डल्लेवाल से उम्मीद जताई कि वे अपने प्रदर्शनकारी साथियों को कानून का पालन करने और प्रदर्शन को व्यवस्थित तरीके से करने के लिए प्रेरित करेंगे।

बता दें कि 13 फरवरी 2024 से शुरू हुए इस आंदोलन में किसान दिल्ली की ओर मार्च कर रहे थे, लेकिन उन्हें शंभू और खनौरी बॉर्डर पर रोक दिया गया। प्रदर्शनकारियों ने केंद्र सरकार पर उनकी माँगों की अनदेखी करने का आरोप लगाया है। उनकी मुख्य माँगें हैं:

  1. न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) को कानूनी दर्जा दिया जाए।
  2. स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें लागू की जाएँ।
  3. किसानों और कृषि मजदूरों के लिए पेंशन योजना शुरू की जाए।
  4. किसानों का कर्ज माफ किया जाए।
  5. भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 2013 को फिर से लागू किया जाए।
  6. 2020-21 के किसान आंदोलन में जान गँवाने वाले किसानों के परिवारों को मुआवजा दिया जाए।

सुप्रीम कोर्ट ने प्रदर्शन की वैधता पर कोई टिप्पणी नहीं की, लेकिन यह स्पष्ट किया कि विरोध शांतिपूर्ण और व्यवस्थित होना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि अगर भविष्य में किसी कानूनी मदद की जरूरत होगी, तो उसके लिए उचित प्रक्रिया अपनाई जा सकती है।

मुस्लिमों को भारत की इंच-इंच जमीन का मालिक बनाना चाहती है TMC, सांसद कल्याण बनर्जी बोले- जिस जगह पर हो नमाज, वह बने वक्फ प्रॉपर्टी: कोलकाता रैली का Video वायरल

तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के सांसद कल्याण बनर्जी ने हर उस जगह को वक्फ घोषित करने को कहा है जहाँ पर मुस्लिम इकट्ठा होकर नमाज पढ़ते हों। उन्होंने यह बयान हजारों मुस्लिमों की भीड़ के बीच दिया है। बनर्जी खुद भी वक्फ बोर्ड पर लाए गए बिल पर बनी संयुक्त संसदीय समिति में शामिल हैं।

कल्याण बनर्जी का यह वीडियो भाजपा आईटी सेल के मुखिया अमित मालवीय ने एक्स (पहले ट्विटर) पर साझा किया है। इस वीडियो में कल्याण बनर्जी कहते हुए दिखते हैं, “जहाँ पर भी आप नमाज पढ़ते हैं, उसको वक्फ प्रॉपर्टी की तरह लिया जाना चाहिए। अगर एक जगह पर 20-25 लोग लगातार नमाज पढ़ते हैं, तो उसे भी वक्फ सम्पत्ति माना जाए।”

कल्याण बनर्जी ने नमाज वाली हर जगह को वक्फ घोषित करने की यह बात कोलकाता में आयोजित एक रैली में की, इस रैली में माँग की गई कि केंद्र सरकार वक्फ संशोधन बिल वापस करे। इस रैली की तस्वीरों में हजारों मुस्लिम दिखाई पड़ रहे हैं।

कल्याण बनर्जी के इस बयान को आधार माना जाए तो इस देश में सड़क, एयरपोर्ट, रेलवे स्टेशन और फुटपाथ समेत तमाम उन जगह को वक्फ सम्पत्ति घोषित करने की माँग की जा सकती है, जहाँ मुस्लिम नमाज पढ़ते हों। कई ऐसे सार्वजनिक मैदान भी हैं, जहाँ मुस्लिम लगातार नमाज पढ़ते हैं, कल्याण बनर्जी के बयान को आधार माना जाए तो यह भी वक्फ हो जाएँगे।

अमित मालवीय ने उनके इस बयान की आलोचना की है। अमित मालवीय ने कहा,”अगर चुनावी फायदे के लिए इस तरह के विचारों को बढ़ावा दिया जाता है, तो बंगाली हिंदू समुदाय को गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। यहाँ तक ​​कि उन्हें अपनी मातृभूमि पश्चिम बंगाल से विस्थापित होने का खतरा हो सकता है। ममता बनर्जी और TMC बंगाल में हिंदुओं का पूरी तरह सफाया सुनिश्चित करेंगी, ठीक वैसे ही जैसे पाकिस्तान और बांग्लादेश में हुआ है।”

पश्चिम बंगाल के सीरमपुर से सांसद कल्याण बनर्जी वक्फ संशोधन को लेकर बनाई गई JPC में शामिल हैं, उन पर इसकी बैठकों में हंगामा करने का आरोप भी लगा है। इससे पहले उन्होंने एक बैठक में कांच के गिलास से अपना हाथ चोटिल कर लिया था। उन्होंने ऐसा वक्फ बिल का विरोध करते हुए किया था।

संभल की जिस इमारत को मुस्लिम कहते हैं जामा मस्जिद उसकी फर्श से लेकर छत तक सब बदल दिया, कोर्ट से माँग- ASI को मिले कंट्रोल, आम लोगों को प्रवेश की हो इजाजत

उत्तर प्रदेश के संभल के शाही जामा मस्जिद बनाम हरिहर मंदिर केस में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की टीम ने कोर्ट में हलफनामा दायर कर दिया है। इस हलफनामे को दायर करते हुए अदालत को बताया गया कि कैसे 1920 से एएसआई पर ही इस मस्जिद के संरक्षण और रखरखाव की जिम्मेदारी है, लेकिन बावजूद इसके उन्हें लंबे समय से मस्जिद में जाने नहीं दिया गया।

ASI ने जहाँ अपने लिखित बयान में माँग की कि शाही जामा मस्जिद का कंट्रोल और प्रबंधन उन्हें वापस मिले। वहीं केंद्र के वकील विष्णु शर्मा ने कानून के उल्लंघन का हवाला देते हुए माँग की कि मस्जिद में आम लोगों को जाने की भी इजाजत दिया जाए।

एएसआई की ओर से अदालत में दावा किया है कि 1920 में केंद्रीय संरक्षित स्मारक घोषित की गई शाही जामा मस्जिद की संरचना में कई बार बदलाव किए गए हैं। इस हलफनामे में यह भी कहा गया है कि मस्जिद कमेटी ने एएसआई के सर्वेक्षण कार्य में रुकावट डाली। एएसआई ने स्पष्ट रूप से कहा है कि मस्जिद कमेटी ने उनकी टीम को कई बार सर्वेक्षण कार्य करने से रोका। इस दौरान केंद्र के वकील विष्णु शर्मा ने अदालत में एएसआई के जवाब के साथ कुछ तस्वीरें भी पेश कीं, जो मस्जिद में किए गए बदलावों का प्रमाण देती हैं।

बता दें कि संभल की जामा मस्जिद को लेकर हिंदू पक्ष ने दावा किया है कि ये स्थान हरिहर मंदिर का है और 1529 में यहाँ एक मस्जिद बनाई गई थी। इसी दावे के बाद कोर्ट ने सर्वे को मंजूरी दी मगर ASI अधिकारियों के अनुसार, मस्जिद तक जाने पर उन्हें लगातार अवरोधों का सामना करना पड़ा, जिसके चलते ASI को मस्जिद के वर्तमान स्वरूप और उसमें हुए परिवर्तनों की जानकारी नहीं मिल पाई।

हालाँकि पता हो कि इस मस्जिद का पहले दौरा 1998 में हुआ था और उसके बाद प्रशासन और पुलिस के सहयोग से 26 जून 2024 को ASI की टीम को मस्जिद का निरीक्षण करने का अवसर मिला था, जिसमें उन्होंने कई महत्वपूर्ण बदलाव देखे थे। इन सबके बारे में कोर्ट को अवगत कराया गया है।

एएसआई ने बताया कि मस्जिद में प्राचीन इमारतों और पुरातात्विक अवशेषों के संरक्षण अधिनियम 1958 के प्रावधानाओं का उल्लंघन हो रहा है। ASI ने बताया कि मस्जिद की सीढ़ियों पर अवैध स्टील रेलिंग लगाई गई है, जिसके खिलाफ 19 जनवरी 2018 को FIR दर्ज कराई गई थी (यह कॉपी भी कोर्ट को दी गई है)। यह रेलिंग उनकी बिना अनुमति के लगी है।

इसी तरह मुख्य हॉल के हौज का पत्थर लगाकर नवीनीकरण किया गया है, जिससे मस्जिद का मूल स्वरूप प्रभावित हुआ है। इसके अलावा, मुख्य द्वार से अंदर आते ही पुराने फर्श को बदलकर नया फर्श लगाया गया है। वहीं मुख्य हॉल के गुंबद से लोहे की चेन से कांच का झूमर लटकाया गया है।

आगे एएसआई ने यह भी कहा कि मस्जिद को इनेमल पेंट की मोटी परतों से पूरी तरह से पेंट किया गया है और प्लास्टर ऑफ पेरिस का उपयोग किया गया है, जिससे मस्जिद की ऐतिहासिकता खत्म हो रही है। इसके अलावा बता दें कि मस्जिद में एएसआई ने कई अतिरिक्त निर्माण कार्य भी देखे। जैसे मस्जिद में छोटे कमरे बंद किए जा चुके हैं। वहीं मस्जिद के 1875-76 के रेखा चित्र देखने पर भी सामने आता है कि मस्जिद के ऊपर हिस्से पर कुछ कमाननुमा स्ट्रक्चर था, जो कि अब नहीं है।

उल्लेखनीय है कि शाही मस्जिद के कमेटी के प्रमुख जफर अली ने इस हलफनामे के बाद कोर्ट में माना कि मस्जिद 1920 से एएसआई संरक्षित स्मारक है और इसमें उन्हें किसी प्रकार का बदलाव कराने की इजाजत नहीं है। लेकिन फिर भी यहाँ परिवर्तन हुए। जफर ने यह भी बताया कि मस्जिद में एक ऐसा कमरा और कुआं भी है जो 100 साल पुराना है। अब कोर्ट इस पूरे मामले में अगली सुनवाई 8 जनवरी 2025 को होनी है।

पहले चलाया बांग्लादेश में ‘मंदिरों की रक्षा कर रहे मुस्लिम’ नैरेटिव, अब कह रहा हिंदुओं पर हमलों को करें नजरअंदाज: इस्लामी कट्टरपंथियों की ढाल बना ‘The Caravan’ का पत्रकार

वामपंथी प्रोपेगेंडा मैगजीन ‘द कारवाँ’ ही नहीं, बल्कि उसमें काम कर रहे लोग भी हिंदुओं के खिलाफ घृणा और हिंदुओं के दमन की खबरों को दबाने में लगे हैं। हाल ही में ‘द कारवाँ’ के कॉन्ट्रिब्यूटिंग एडिटर सलिल त्रिपाठी ने बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे हमलों को लेकर बात करने वालों को चुप कराने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि इस मामले पर सिर्फ बांग्लादेशियों को ध्यान देना चाहिए और बाकी लोगों को इससे कोई मतलब नहीं रखना चाहिए।

ट्रंप प्रशासन और बांग्लादेश की स्थिति पर चर्चा में कूदे

हाल ही में जब जियोपॉलिटिकल एनालिस्ट जेफ एम. स्मिथ ने सुझाव दिया कि ट्रंप प्रशासन को बांग्लादेश में हिंदुओं की स्थिति पर भारत की चिंताओं को समझना चाहिए, तो सलिल ने रविवार (1 दिसंबर 2024) को एक्स पर कहा, “बांग्लादेश में जो कुछ हो रहा है, वो बांग्लादेशियों का मामला है। दूसरों को इसमें दखल नहीं देना चाहिए, जब तक उनका कोई एजेंडा न हो।”

सलिल ने सोशल मीडिया पर बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे हमलों को लेकर आवाज उठाने वालों के इरादों पर सवाल खड़े किए। इससे ऐसा लगा कि वो लोगों को इस मुद्दे पर बोलने से हतोत्साहित करना चाहते थे।

यह कोई नई बात नहीं है। वामपंथी और उदारवादी तबके अक्सर इस तरह के तरीकों का इस्तेमाल करते हैं। उनकी कोशिश होती है कि जो लोग उनके नैरेटिव के खिलाफ बोलें, उन्हें चुप कराया जाए। सलिल त्रिपाठी ने भी इसी रणनीति के तहत, बांग्लादेश में कट्टरपंथी मुस्लिमों द्वारा हिंसा के मुद्दे से चर्चा को भटकाने का प्रयास किया।

इसी तरह से सलिल ने इसी साल 6 अगस्त को ट्वीट किया था कि “युवा मुसलमान बांग्लादेश में हिंदू मंदिरों की रक्षा कर रहे हैं।” यह ट्वीट उस समय आया जब शेख हसीना को प्रधानमंत्री पद से हटाया गया था।

सलिल के ट्वीट का मकसद यह दिखाना था कि मुस्लिम हिंदू मंदिरों की रक्षा कर रहे हैं, जबकि सच्चाई यह थी कि हिंदुओं और उनके मंदिरों पर हमले हो रहे थे। इस तरह उन्होंने मुद्दे से ध्यान हटाने की कोशिश की। ऐसे में साफ है कि उनके ध्यान भटकाने वाले ट्वीट का उद्देश्य मुस्लिम भीड़ द्वारा हिंदुओं और उनके मंदिरों पर किए गए अत्याचारों से ध्यान हटाकर हिंदू पूजा स्थलों की ‘रक्षा’ करने के फोटो-ऑप्स की ओर ध्यान केंद्रित करना था।

बांग्लादेश में हिंदुओं पर लगातार हो रहे हमले

बता दें कि बांग्लादेश में इस साल 5 अगस्त को आवामी लीग प्रमुख शेख हसीना के नेतृत्व वाली सरकार के पतन के बाद से ही कट्टरपंथियों द्वारा हिंदू अल्पसंख्यकों और उनके धार्मिक व्यापारिक प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया जा रहा है। बांग्लादेश में इस समय मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार शासन देख रही है। उस पर चरमपंथियों को पराश्रय देने का आरोप है। शेख हसीना सरकार के पतन के कुछ दिनों के भीतर हिंदू मंदिरों, दुकानों और व्यवसायों पर कम से कम 205 हमले  हुए हैं।

इसी कड़ी में बांग्लादेश में इस्कॉन के संत को गिरफ्तार कर लिया गया है। उनके खिलाफ देशद्रोह का मामला चलाया जा रहा है। यहाँ तक कि हिंदू संतों को देश से बाहर भी नहीं जाने दिया जा रहा है, तो हिंदुओं की पहचान कर उन्हें निशाना बनाए जाने की भी जानकारी सामने आई।

चटगाँव में एक हिंदू युवक को ईशनिंदा के आरोप में उसकी मॉब लिंचिंग के लिए इस्लामी कट्टरपंथियों की भीड़ ने पूरे थाने को ही घेरा लिया और आर्मी की गाड़ियों तक में आग लगा दी थी।

ओपइंडिया ने पहले बताया था कि कैसे खुलना के सोनाडांगा इलाके में एक मुस्लिम भीड़ ने हिंदू लड़के उत्सव मंडल को ‘ईशनिंदा’ के आरोप में लगभग मार डाला था।

यह भी खुलासा हुआ था कि मुस्लिम छात्रों ने 60 से अधिक हिंदू शिक्षकों, प्रोफेसरों और सरकारी अधिकारियों को अपने पदों से इस्तीफा देने के लिए मजबूर किया है।

हाल ही में, मानवाधिकार कार्यकर्ता और निर्वासित बांग्लादेशी ब्लॉगर असद नूर ने बताया कि अल्पसंख्यक समुदाय को ‘जमात-ए-इस्लामी’ में शामिल होने के लिए मजबूर किया जा रहा है।

6 सितंबर को चटगाँव के कादम मुबारक इलाके में गणेश उत्सव के दौरान हिंदू भक्तों की एक शोभायात्रा पर भी हमला हुआ था।

हिंदू लड़कियों को फँसाने के लिए शादी वाली साइट का इस्तेमाल कर रहे लव जिहादी: मोहम्मद हुसैन ने राहुल नाम से बनाई प्रोफाइल, दलित लड़की को मिलने के लिए बुलाकर किया रेप

मध्य प्रदेश के जबलपुर से लव जिहाद का एक मामला सामने आया है। यहाँ एक मुस्लिम युवक ने अपनी पहचान छुपा कर एक दलित महिला का रेप किया। मुस्लिम युवक ने दलित महिला को एक मैट्रिमोनियल वेबसाइट से अपने प्रेमजाल में फँसाया था। इसके बाद उसने कई बार रेप किया और बाद में उसने शादी से भी इनकार कर दिया। पीड़िता ने इस सबंध में FIR दर्ज करवाई है। पुलिस ने आरोपित को गिरफ्तार कर लिया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक यह घटना जबलपुर के थानाक्षेत्र लॉर्डगंज की है। दलित महिला के साथ रेप करने वाले युवक का नाम मोहम्मद हुसैन है। उसने राहुल नाम बताकर दलित महिला को अपने प्रेमजाल में फँसाया और फिर रेप किया। इस संबंध में दर्ज करवाई गई शिकायत में 37 वर्षीय दलित ने बताया कि उसने डेढ़ साल पहले उन्होंने मैट्रिमोनियल साइट पर राहुल नाम की प्रोफ़ाइल देखी। इस प्रोफ़ाइल वाले युवक से पीड़िता ने बातचीत शुरू की। इसके बाद दोनों दोस्त बन गए।

एक दिन राहुल और पीड़िता एक रेस्टोरेंट में मिले। यहाँ दोनों ने एक-दूसरे को पसंद कर लिया और शादी करने पर भी सहमति जताई। पीड़िता ने बताया कि उसने राहुल नाम का विश्वास कर लिया। उसे राहुल ने 22 सितंबर, 2024 को मुलाकात के बहाने एक होटल में बुलवाया। यहाँ उसने पीड़िता से रेप किया। कुछ दिनों के बाद वह शादी करने से मुकर गया। यही नहीं, दबाव बनाने पर उसने पीड़िता को जान से मार डालने की धमकी भी दी।

इसके बाद पीड़िता को पता चला कि जिसे वो राहुल समझ रही थी वो असल में मोहम्मद हुसैन है। धोखा खाने के बाद पीड़िता पुलिस के पास पहुँची। उसने लॉर्डगंज थाने में एक FIR दर्ज करवाई। पुलिस ने इस संबंध जाँच की। इसके बाद मोहम्मद हुसैन को गिरफ्तार कर लिया गया। उस पर रेप समेत SC/ST और बाकी धाराओं में मामला दर्ज किया गया है। पुलिस ने उस वेबसाइट को भी नोटिस भेजा है जिस पर राहुल ने मोहम्मद हुसैन नाम से प्रोफाइल बनाई थी।

पुलिस यह भी पड़ताल कर रही है कि मोहम्मद हुसैन ने और कितनी लड़कियों को इसी तरह अपना शिकार बनाया है। मामले में जाँच और आगे की कानूनी कार्रवाई जारी है।

‘मैं घर के पीछे खेत में शैलेश से मिलने गई, अब्बा ने उसे पकड़ लिया…’: मुस्लिम लड़की ने बताया प्रयागराज में कैसे हुई 9वीं के छात्र की हत्या

उत्तर प्रदेश के प्रयागराज जिले में शनिवार (30 नवंबर 2024) को 9वीं में पढ़ने वाले शैलेश यादव की लाश मिली थी। हत्या के आरोप में शैलेश की कथित मुस्लिम प्रेमिका, उसके अम्मी-अब्बा और दादा सहित 5 लोगों को हिरासत में लिया गया था। एक रिपोर्ट के अनुसार मुस्लिम लड़की ने पूछताछ में कबूला है कि शैलेश की हत्या उसके ही अब्बा ने की है।

दैनिक भास्कर के मुताबिक मुस्लिम लड़की ने पुलिस को बताया है कि घटना वाली रात वह अपने घर के पीछे खेत में शैलेश से मिलने गई थी। उसके अब्बा भी पीछे-पीछे खेत में पहुँच गए और उसने शैलेश को पकड़ लिया। लड़की के अनुसार अब्बा ने उसे घर जाने को कहा। लेकिन उसे रास्ते में शैलेश की चीख सुनाई पड़ी। इसके बाद वह अम्मी-अम्मी कहते हुए तेजी से अपने घर की ओर भागी।

रिपोर्ट के अनुसार लड़की ने बताया है कि उसके अब्बा लगातार शैलेश को मार रहे थे। अँधेरा होने के कारण वह यह नहीं देख पाई कि उसके अब्बा के हाथ में कौन सा हथियार था। उल्लेखनीय है कि शैलेश के गर्दन, सिर, हाथ और सीने पर वार के कई निशान मिले हैं। पुलिस इस मामले में कड़ियाँ जोड़ने में जुटी हुई है।

नाबालिग लड़की ने शैलेश से पूर्व में भी कई बार मिलने की बात कबूली है। पुलिस ने अन्य लोगों के बयान भी दर्ज किए हैं। घटना के पहले और बाद में लड़की और उसके परिजनों की भूमिका की भी पड़ताल की जा रही है। हालाँकि लड़की का अब्बा पुलिस की जाँच में सहयोग नहीं कर रहा है। उसने पुलिस से कहा, “मुझे जेल भेज दो। आगे जो होगा देखा जाएगा।” उसने हत्या की बात नहीं कबूली है

पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार शैलेश की मौत सिर पर गहरी चोट के वजह से हुई। वार इतने जोर से किया गया था कि सिर के पीछे गहरा गड्ढा बन गया। शैलेश की जान सिर पर 3 वार के बाद ही निकल गई थी। लेकिन उसके बाद भी लगातार वार किया गया।

बताते चलें कि यह ममला प्रयागराज के उतरांव थाना क्षेत्र में पड़ने वाले इस्माइल लाला का पूरा गाँव की है। इस गाँव के रहने वाले अश्वनी कुमार यादव का 16 वर्षीय बेटा शैलेश शनिवार की शाम एक कॉल आने के बाद घर से निकला था। देर रात तक जब वह घर नहीं लौटा तो परिजनों ने उसकी तलाश शुरू की। उसका फोन भी बंद था। आखिरकार शनिवार की ही रात करीब 11 बजे उसकी लाश घर से लगभग 200 मीटर दूर एक तालाब के पास पड़ी मिली। लाश के पास एक मोबाइल फोन, एक जोड़ी चप्पल और खून से सना एक धारदार फरसा भी पड़ा था।

लिंकन, कार्टर, क्लिंटन, बुश… अपनों को ‘माफी’ देने वाले इकलौते अमेरिकी राष्ट्रपति नहीं हैं जो बायडेन, फिर लोग क्यों कह रहे ‘पलटीबाज’: जानिए क्या होता है प्रेसिडेंशियल पार्डन, हंटर का क्या था अपराध

अमेरिका के राष्ट्रपति जो बायडेन ने अपने बेटे हंटर बायडेन को 2014 से 2024 के बीच किए गए सभी अपराधों के लिए माफी (पार्डन) दे दी है। उन्हें अब इन 10 वर्षों के बीच किए गए किसी भी अपराध के लिए सजा नहीं मिलेगी। जो बायडेन ने कहा है कि उनके बेटे के साथ अन्याय हो रहा है, इसलिए उसे माफ़ी दे रहे हैं।

हंटर बायडेन पर टैक्स चोरी, बन्दूक खरीदने में गड़बड़ी समेत अन्य कई अपराध है। बायडेन के इस कदम को लेकर डोनाल्ड ट्रम्प समेत बाकी लोगों ने निशाना साधा है। हालाँकि, बायडेन ऐसे पहले राष्ट्रपति नहीं हैं, जिन्होंने अपने रिश्तेदार को माफ़ी दी हो।

हंटर बायडेन पर क्या हैं आरोप?

राष्ट्रपति जो बायडेन के बेटे हंटर बायडेन पर पहला आरोप है कि उन्होंने 2016 में से 2019 के बीच टैक्स चोरी की। उन पर आरोप है कि इस दौरान उन्होंने लगभग 14 लाख डॉलर (₹11.8 करोड़) की टैक्स चोरी की। जहाँ वह एक तरफ टैक्स चोरी कर रहे थे, वहीं दूसरी तरह उन्होंने इसी दौरान बार में नर्तकियों, वेश्याओं, कोकेन और बाकी चीजों पर लाखों डॉलर उड़ाए। उन्होंने महँगी गाड़ियों और अपनी गर्लफ्रेंड पर भी खूब पैसा उड़ाया। उनके ऊपर इसी दौरान 27000 डॉलर पोर्न वेबसाइट पर खर्च करने का भी आरोप है।

इस मामले को लेकर उनके ऊपर लॉस एंजिल्स में 9 मामले दर्ज किए गए हैं। उन्होंने इतना खर्च करने के बावजूद झूठे टैक्स रिटर्न दाखिल किए। हंटर बायडेन ने इन आरोपों में दोषी होने की बात सितम्बर, 2024 में खुद ही स्वीकार कर ली थी। इसके बाद उन्होंने अमेरिकी न्याय विभाग के साथ डील करने की कोशिश की थी जो सफल नहीं हुई। टैक्स चोरी के अलावा उनके ऊपर 2018 में एक बन्दूक खरीदने के लिए पहचान छिपाने का भी आरोप है। इस मुकदमे में उन्हें 17 वर्ष की सजा हो सकती थी। इस सजा पर फैसला दिसम्बर, 2024 में ही होना था।

हंटर बायडेन पर आरोप है कि उन्होंने 2019 में एक कोल्ट की रिवॉल्वर खरीदने के लिए अपनी पूरी जानकारी बन्दूक के डीलर को नहीं दी, जो कि एक अपराध है। अमेरिका में बदूक खरीदते समय किसी भी नागरिक को अपनी पूरी जानकारी डीलर को देनी होती है, ताकि आगे कोई घटना हो तो रिकॉर्ड निकाला जा सके। बन्दूक वाले मामले में उन्हें 25 साल तक की सजा हो सकती थी। अमेरिकी कानून के जानकारों ने बताया कि यह सजा कितनी भी होती, हंटर बायडेन को लगभग 4 साल जेल में बिताने पड़ते।

जो बायडेन ने बेटे को क्यों किया माफ?

राष्ट्रपति जो बायडेन ने 1 दिसम्बर, 2024 को अपने बेटे हंटर बायडेन को माफ़ किया। व्हाइट हाउस की तरफ से जारी एक बयान में उन्होंने कहा, “आज, मैंने अपने बेटे हंटर के लिए पार्डन पर हस्ताक्षर किए हैं। जिस दिन से मैंने पदभार संभाला है, मैंने कहा था कि मैं न्याय विभाग के निर्णय लेने में हस्तक्षेप नहीं करूँगा। मैंने अपना वादा तब भी निभाया जबकि मैंने देखा कि मेरे बेटे पर चुनिंदा और गलत तरीके से मुकदमा चलाया जा रहा है।”

बायडेन ने आगे बताया कि उनके जहाँ बाकी लोग अगर टैक्स चोरी के बाद टैक्स भर देते हैं तो उन्हें माफ़ कर दिया जाता है, वहीं उनके बेटे को इस मामले में सजा दी गई। बायडेन ने आरोप लगाया कि हंटर बायडेन के अपनी गलती मानने के बाद सजा कम करवाने के लिए की गई डील को भी उनके राजनीतिक प्रतिद्वंदियों ने धराशायी कर दिया। उन्होंने कहा कि हंटर बायडेन के खिलाफ इतना अभियान इसलिए चला क्योंकि वह उनके बेटे हैं। उन्होंने कहा कि अमेरिकी लोग इस निर्णय को समझेंगे।

उनके इस कदम पर प्रश्न उठ रहे हैं। बायडेन का यह कदम यू टर्न है। इससे पहले जून, 2024 में व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव करीन जीन पियरे ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में स्पष्ट रूप से कहा था कि राष्ट्रपति अपने बेटे को ‘पार्डन’ नहीं देंगे। यह प्रश्न उनसे कई बार पूछा गया था, उन्होंने हर बार इसको लेकर मना ही किया था।

क्या होता है ‘प्रेसिडेंशियल पार्डन’?

अमेरिकी राष्ट्रपति को संविधान में यह शक्ति दी हुई है कि वह किसी भी अमेरिकी नागरिक को उसके अपराधों में दोषी माने जाने के बाद सजा होने के बाद माफ कर सकता है। यह कुछ-कुछ भारत के राष्ट्रपति के दया याचिका वाले अधिकार से मिलता-जुलता है। इसके तहत यदि किसी व्यक्ति को सजा हुई है तो अमेरिका का राष्ट्रपति अपनी शक्ति का उपयोग करते हुए इसकी सजा का कुछ हिस्सा या फिर पूरी सजा ही खत्म कर सकता है।

हालाँकि, इससे माफ़ी पाने वाले व्यक्ति का आपराधिक रिकॉर्ड नहीं खत्म होता। जिस व्यक्ति को पार्डन दिया जाता है, उसे इस पर सहमति जतानी होती है। राष्ट्रपति कौन सी सजा माफ़ कर सकता है और कौन सी नहीं, इसको लेकर अमेरिका में बहस होती आई है। राष्ट्रपति को महाभियोग के मामलों में पार्डन का अधिकार नहीं है।

ट्रम्प ने की आलोचना

अमेरिका के नए राष्ट्रपति चुने गए डोनाल्ड ट्रम्प ने बायडेन के इस कदम पर प्रश्न उठाए हैं। डोनाल्ड ट्रम्प ने इसे अधिकारों का दुरूपयोग करार दिया है। ट्रम्प ने कहा है कि इस फैसले से न्याय की अवेहलना हुई है। रिपब्लिकन पार्टी के बड़े नेता सीनेटर जॉन बरासो ने कहा कि हंटर बायडेन का पार्डन गलत है, यह दिखाता है कि अमेरिका के भीतर नागरिकों के न्याय के दो स्तर हैं। बाकी रिपब्लिकन नेताओं ने कहा है कि इस पार्डन के जरिए जो बायडेन ने स्वीकार किया है कि उनका बेटा एक अपराधी है।

नया नहीं है ‘परिवार पार्डन’

जो बायडेन ने अपने बेटे को पार्डन दिया, यह दिखाता है कि अमेरिकी राष्ट्रपति अपने परिवार के लिए शक्तियों का उपयोग कर सकते हैं। हालाँकि, यह कोई पहला मामला नहीं है। बायडेन से पहले जॉर्ज डब्ल्यू बुश सीनियर ने अपने बेटे नील बुश को माफ़ी दिया है। इसी तरह बिल क्लिंटन ने अपने भाई रॉजर क्लिंटन को भी ड्रग्स सम्बन्धी मामलों में पार्डन दिया था। अब्राहम लिंकन ने तक ने अपने साले को पार्डन दे दिया था। जिम्मी कार्टर ने भी अपने भाई को वित्तीय गड़बड़ियों के मामले में पार्डन दिया था।

संभल में 14 हिंदुओं को इस्लामी भीड़ ने जलाकर मार डाला, मिली थी 23 हिंदू लाशें: पहले अफवाह उड़ाई इमाम को हिंदू ने मार डाला, जामा मस्जिद में साधु कर रहे पूजा… इसके बाद हुआ था नरसंहार

उत्तर प्रदेश के संभल का मस्जिद जो आज इस्लामी कट्टरपंथियों की हिंसा के लिए सुर्खियों में आया है वही मस्जिद 46 साल पहले एक हिंदू परिवार के नरसंहार मामले में केंद्र में था। उस समय अफवाह उड़ाई गई थी कि हिंदू ने इमाम को मार डाला और साधु मस्जिद में पूजा कर रहे हैं। इसी अफवाह के बाद हिंसा भड़की और नरसंहार को अंजाम दिया गया।

46 साल बाद उस बर्बरता की कहानी एक बार फिर दुनिया के सामने स्वराज्य की पत्रकार स्वाति गोयल शर्मा लेकर आई हैं। उन्होंने उस हिंदू परिवार के पीड़ितों से बात करके एक्स (ट्विटर) पर किए एक पोस्ट में बताया कि आखिर कैसे उस दिन मुस्लिम लीग के नेता मंजर शफी के समर्थकों ने अपना आतंक मचाया था। उस घटना में कुल 25 लोग मारे गए थे जिनमें से 23 हिंदू ही थे।

स्वाति अपने ट्वीट में बताती हैं कि 1978 में संभल के मस्जिद के नजदीक नक्शा बाजार के पास एक आटा मिल थी जोकि 4 बीघा में फैली हुई थी। ये मिल बनवारी लाल गोयल की थी और बनवारी संभल के प्रतिष्ठित लोगों में से एक थे। स्थानीय लोग उन्हें उनके न्यायपरक फैसलों के लिए न केवल जानते थे बल्कि अपने विवादों को सुलझाने के लिए भी वह उनके पास आते थे।

इन स्थानीयों में तमाम मुस्लिम भी होते थे। सबको पता था कि बनवारी लाल संभल से विश्व हिंदू परिषद के अध्यक्ष थे। बावजूद इसके न मुस्लिम उनसे मदद माँगने में परहेज करता था न कोई और… लेकिन 29 मार्च 1978 को जब संभल में हिंसा भड़की तो दंगाइयों को ये याद तक नहीं आया कि बनवारी लाल के कितने उपकार हैं।

उस दिन बनवारी लाल अपने कंपाउंड में ही थे। हिंसा देख उनके कर्मचारी और रिश्तेदार सब वही छिपे थे। सबको लगा था कि शायद बनवारी लाल की जान-पहचान के कारण इस हिंसा में उनके साथ भी कुछ न हो। मगर, वह सब गलत थे। उस दिन हिंसा सुबह करीबन 10 बजे मुस्लिम इलाके से भड़की और 2 घंटे में ही दंगाइयों ने मिल कंपाउंड को निशाना बना लिया।

उस कंपाउंड तक पहुँचने के लिए पहले ट्रैक्टर से मिल की दीवारें गिराईं गई और उसके बाद जलते टायर भीतर फेंके गए ताकि को बच न पाए। पत्रकार के मुताबिक उस हिंसा में 25 लोग मरे, जिनमें से 23 हिंदू थे और 14 की जिंदा जलकर मौत हुई थी। उस घटना में बनवारी लाल भी राख हो गए थे।

6 घंटे बाद जब उनके बेटे विनीत और नवनीत (घटना के समय 18 और 16 साल के थे) कंपाउंड में घुसे तो सिर्फ राख बची थी। बाकी सब खाक था। आग ऐसी लगाई गई थी कि भीतर किसी का कोई शव भी नहीं मिला। बहुत ढूँढने पर पिता की चश्मा मिला जिससे समझ आया कि अब वो इस दुनिया में नहीं रहे।

स्वाति गोयल द्वारा की गई पड़ताल से पता चलता है कि उस समय एक हरदवारी लाल ही थे जो उन आग की लपटों से बचे थे। वो भी इसलिए क्योंकि उन्होंने खुद को ड्रम में छिपाया हुआ था। उन्होंने उस दिन अपनी आँख के आगे सब कुछ बर्बाद होते देखा था।

इस घटना के बाद बनवारी लाल के तीनों बेटे नवनीत, विनीत और सुनीत 1993 तक संभल में रहे। बाद में मिल का ज्यादातर हिस्सा बेचकर दिल्ली आ गए और पिपरमिंट का बिजनेस शुरू किया। अब उस मिल का छोटा हिस्सा ही उनका हैं जहाँ दशकों से राम लीला जैसे कार्यक्रम होते हैं।

आज तीनों भाई उस घटना में हिंदुओं के मारे जाने के पीछे तत्कालीन जिलाधिकारी फरहत अली को दोषी मानते हैं। ट्वीट में विनीत गोयल के हवाले से कहा गया कि फरहत ने तब दंगाइयों का समर्थन किया था और हिंदुओं की रक्षा तक नहीं की थी। इसके अलावा वो ये भी बताते हैं कि घटना के बाद तीनों भाइयों से कुछ लोग मिले थे जिन्होंने बताया था कि इस घटना के पीछे उन लोगों का हाथ था जो उनके पिता के साथ बिजनेस में साथी थे। इसी बात को जानने के बाद तीनों भाइयों ने भविष्य में कभी दूसरे समुदाय के लोगों के साथ व्यापार नहीं किया।

गौरतलब है कि स्वाति गोयल शर्मा ने अपने ट्वीट में बताया है कि इस हिंसा का जिक्र मीडिया में शायद न के बराबर मिले। मगर Mob violence in india जैसी किताबों में उस हिंसा का जिक्र पढ़ने को मिलता है।

मोदी सरकार ने 3 साल में ब्लॉक किए 28079 URL, इनमें 10500 कर रहे थे खालिस्तानी प्रोपेगेंडा का प्रचार: मोबाइल एप्स और इस्लामी कट्टरपंथी-आतंकी संगठनों पर भी कार्रवाई

भारत सरकार ने खालिस्तानी रेफरेंडम से जुड़ी 10,500 से अधिक URLs को ब्लॉक कर दिया है। यह कार्रवाई पिछले तीन वर्षों में की गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार ने सोशल मीडिया और इंटरनेट पर फैलाए जा रहे खालिस्तानी प्रचार को रोकने के लिए यह सख्त कदम उठाया है।

खालिस्तानी रेफरेंडम और ब्लॉक की गई URLs

रिपोर्ट्स के मुताबिक, इन URLs को सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 69ए के तहत ब्लॉक किया गया। इस अधिनियम के तहत किसी भी ऑनलाइन सामग्री को राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था या देश की संप्रभुता के लिए खतरा मानते हुए ब्लॉक किया जा सकता है।

खालिस्तानी रेफरेंडम की बात करें तो यह एक विवादित वोटिंग प्रक्रिया है, जिसे अमेरिका स्थित संगठन ‘सिख्स फॉर जस्टिस’ (SFJ) द्वारा आयोजित किया जाता है। इसका नेतृत्व गुरपतवंत सिंह पन्नू करता है। इस प्रक्रिया का उद्देश्य भारत से अलग होकर एक सिख राष्ट्र बनाना है।

सोशल मीडिया पर बढ़ती कार्रवाई

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत सरकार ने पिछले तीन वर्षों में 28079 URLs को ब्लॉक किया है। इनमें से सबसे अधिक 10,976 URLs फेसबुक से, जबकि 10,139 URLs ट्विटर (अब X) से थीं। इसके अलावा, 2,211 यूट्यूब अकाउंट्स, 2,198 इंस्टाग्राम हैंडल्स, 225 टेलीग्राम अकाउंट्स और 138 व्हाट्सऐप अकाउंट्स को भी ब्लॉक किया गया।

2022 में 6,775 सोशल मीडिया अकाउंट्स ब्लॉक किए गए, 2023 में यह संख्या बढ़कर 12,483 हो गई। वहीं, 2024 में अब तक 8,821 अकाउंट्स ब्लॉक हो चुके हैं।

मोबाइल ऐप्स पर भी कार्रवाई

खालिस्तान रेफरेंडम से जुड़ी मोबाइल ऐप्स पर भी प्रतिबंध लगाया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, खुफिया एजेंसियों ने सरकार को इन ऐप्स की जानकारी दी थी, जो खालिस्तानी विचारधारा को बढ़ावा देने और जनता को भड़काने के लिए उपयोग हो रही थीं।

फेसबुक URLs की जाँच में यह पाया गया कि इनमें से अधिकांश थर्ड-पार्टी वेबसाइट्स या ऐप स्टोर्स पर यूजर्स को रीडायरेक्ट कर रही थीं। इनसे धोखाधड़ी, निवेश, और वर्क-फ्रॉम-होम जैसे फर्जीवाड़े हो रहे थे।

PFI और अन्य कट्टरपंथी समूहों पर भी नजर

सरकार ने खालिस्तानी सामग्री के अलावा, पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI), लिट्टे (LTTE), जम्मू-कश्मीर के उग्रवादी, और ‘वारिस पंजाब दे’ जैसे संगठनों से जुड़े 2,100 URLs को भी ब्लॉक किया है। यह कार्रवाई केंद्रीय खुफिया एजेंसियों की सिफारिशों के आधार पर की गई।

सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय और गृह मंत्रालय के शीर्ष अधिकारियों के बीच हाल ही में इस विषय पर चर्चा हुई। इस दौरान यह तय किया गया कि राष्ट्रीय सुरक्षा के खिलाफ काम करने वाले किसी भी ऑनलाइन कंटेंट को तुरंत ब्लॉक किया जाएगा।

यह बात साफ है कि भारत सरकार खालिस्तान के विचार को बढ़ावा देने वाले किसी भी प्रयास को बर्दाश्त नहीं करेगी। सोशल मीडिया पर इस तरह के कंटेंट को रोकने की दिशा में यह कार्रवाई एक बड़ा कदम है। इस कदम से खालिस्तानी आंदोलन को झटका लगा है और यह संदेश दिया गया है कि भारत की एकता और संप्रभुता से समझौता करने की कोई गुंजाइश नहीं है।