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जब 3 दिनों तक पाकिस्तानी आतंकियों ने मुंबई को बनाया बंधक, 26/11 के बलिदानियों को बरसी पर राष्ट्र का नमन

साल 2008, तारीख 26 नवंबर, आज से ठीक 14 साल पहले देश की आर्थिक राजधानी मुंबई पर लश्कर-ए-तैयबा के 10 आतंकियों ने एक ऐसा हमला किया था, जिसने भारत समेत पूरी दुनिया को हैरान कर दिया था। बम धमाकों और गोलीबारी के बीच एक तरह से करीब 60 घंटे तक मुंबई बंधक बनी रही।

आज भी यह आतंकी हमला भारत के इतिहास का वो काला दिन है जिसे शायद ही कोई भूला सकता है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, हमले में 160 से ज्यादा लोग मारे गए, 300 से ज्यादा घायल हुए थे। और इन आतंकियों का सामना करते हुए मुंबई पुलिस, होमगॉर्ड, ATS, NSG कमांडों सहित कुल 22 सुरक्षाबलों ने अपना बलिदान दिया था।

पाकिस्तानी आतंकी हमले को नाकाम करने में वीरगति को प्राप्त हुए सुरक्षाबलों की बात करें तो मुंबई पुलिस, एटीएस, NSG कमाण्डों में प्रमुख नाम ATS प्रमुख हेमंत करकरे, एसीपी अशोक काम्टे, एसीपी सदानंद दाते, एनएसजी के कमांडो मेजर संदीप उन्नीकृष्णन, एनकाउंटर स्पेशलिस्ट एसआई विजय सालस्कर, इंस्पेक्टर सुशांत शिंदे, एसआई प्रकाश मोरे, एसआई दुरूगड़े, एएसआई नाना साहब भोंसले, एएसआई तुकाराम ओंबले, कॉन्सटेबल विजय खांडेकर, जयवंत पाटिल, योगेश पाटिल, अंबादास पवार और एम.सी. चौधरी जैसे प्रमुख नाम हैं।

इनके अलावा होमगॉर्ड मुकेश बी जाधव, अरुण चिट्टे, हवलदार गजेंद्र सिंह, नागप्पा आर महाले, किशोर के.शिंदे, संजय गोविलकर और सुनील कुमार यादव ने भी आतंकियों का सामना करते हुए अपना बलिदान दिया था।

देश के इन वीर-बलिदानियों पर आगे बात करने से पहले उस दिन क्या हुआ था यदि उस पर संक्षेप में एक नजर डालें तो 26/11 मुंबई हमलों की छानबीन से जो कुछ सामने आया है, वह बताता है कि 10 हमलावर कराची से नाव के रास्ते मुंबई में घुसे थे।

इस नाव पर चार भारतीय भी सवार थे, जिन्हें किनारे तक पहुँचते-पहुँचते आतंकियों ने मार डाला था। रात के तकरीबन आठ बजे थे, जब ये हमलावर कोलाबा के पास कफ़ परेड के मछली बाजार पर उतरे। वहाँ से वे चार ग्रुपों में अलग-अलग बँट गए और टैक्सी लेकर आतंकी मंसूबों को अंजाम देने मुंबई में अपने टारगेट की तरफ निकल गए।

कहा तो यह भी जाता है कि इन लोगों की आपाधापी और हड़बड़ाहट देखकर कुछ मछुआरों को शक भी हुआ और उन्होंने पुलिस को जानकारी भी दी। लेकिन शुरू में मुंबई पुलिस ने इसे कोई ख़ास तवज्जो नहीं दी और न ही आगे बड़े अधिकारियों या खुफिया एजेंसियों को जानकारी दी।

मीडिया रिपोर्टों के हवाले से बात करें तो रात करीब साढ़े 9 बजे के आसपास छत्रपति शिवाजी टर्मिनल पर गोलीबारी की पहली खबर मिली। यहाँ दो आतंकियों ने ताबड़तोड़ फायरिंग कर 52 लोगों को मौत के घाट उतार दिया। 100 से ज्यादा लोग हमले में घायल भी हुए।

आतंकियों के पास एके-47 राइफलें थीं। यहीं पर हमला करने वालों में एक आतंकी अजमल आमिर कसाब भी था, जिसे बाद में मुंबई पुलिस के एएसआई तुकाराम ओंबले ने जकड़ लिया और 10 में से जीवित पकड़ा जाने वाला यही एकमात्र आतंकी था।

आगे अपने विदेशी ग्राहकों के लिए मशहूर लियोपोल्ड कैफे में दो आतंकियों ने जमकर गोलियाँ चलाईं। इस गोलीबारी में भी 10 लोग मारे गए थे। हालाँकि, जल्द ही यहाँ दोनों आतंकियों को भी सुरक्षाबलों ने ढेर कर दिया। इसके बाद हमला नरीमन हाउस बिजनेस एंड रेसीडेंशियल कॉम्प्लेक्स पर हुआ।

हमले से कुछ देर पहले ही पास के गैस स्टेशन में बड़ा धमाका भी हुआ। जिसके बाद नरीमन हाउस में मौजूद लोग बाहर की तरफ आए और इसी दौरान आतंकियों ने उन पर फायरिंग झोंक दी। सबसे बड़ा हमला होटल ताज पर था यदि आतंकी यहाँ अपने मंसूबों में पूरी तरह कामयाब होते तो आतंकी इतिहास में इस दिन की चोट और भी गहरी होती।

इन पाकिस्तानी आंतकियों से लड़ते-लड़ते देश के वीर जाँबाजों ने अपनी जान की बाजी लगा दी।  मुंबई पुलिस के बहादुर पुलिसकर्मियों, ATS के जवानों और एनएसजी कमांडो सहित तमाम सुरक्षाबलों ने इन आतंकियों का डटकर सामना किया और 10 में से 9 आतंकियों को मारकर अनगिनत लोगों की जान बचाई।

उनमें से आइए जानतें हैं कुछ बहादुर योद्धाओं के बारें में जिन्होंने अपनी जान की परवाह न कर उस दिन लोगों की सुरक्षा करते हुए खुद बलिदान हो गए थे।

मुंबई एटीएस चीफ हेमंत करकरे

मुंबई एटीएस के चीफ हेमंत करकरे जब यह आतंकी हमला हुआ उस समय अपने घर में खाना खा रहे थे, जब उनके पास आतंकी हमले को लेकर क्राइम ब्रांच ऑफिस से फोन आया। करकरे तुरंत घर से निकले और एसीपी अशोक काम्टे, इंस्पेक्टर विजय सालस्कर के साथ मोर्चा सँभाला।

हालाँकि, कामा हॉस्पिटल के बाहर चली मुठभेड़ में आतंकी अजमल कसाब और इस्माइल खान की अंधाधुंध गोलियाँ लगने से वह बलिदान हो गए। बाद में मरणोपरांत उन्हें अशोक चक्र से सम्मानित किया गया था। हेमंत करकरे ने मुंबई सीरियल ब्लास्ट और मालेगाँव ब्लास्ट की जाँच में भी अहम भूमिका निभाई थी। हालाँकि इनके ऊपर कई कई दूसरे आरोप भी थे जो बाद में इनके बदनामी का कारण भी बनें।

एसीपी अशोक काम्टे

अशोक काम्टे मुंबई पुलिस में बतौर एसीपी तैनात थे। जिस वक्त मुंबई पर आतंकी हमला हुआ, वह एटीएस चीफ हेमंत करकरे के साथ थे। कामा हॉस्पिटल के बाहर पाकिस्तानी आतंकी इस्माइल खान ने उन पर गोलियों की बौछार कर दी। तभी एक गोली उनके सिर में जा लगी। घायल होने के बावजूद उन्होंने लश्कर आतंकी इस्माइल खान को मार गिराया।

सीनियर पुलिस इंस्पेक्टर विजय सालस्कर

कभी मुंबई अंडरवर्ल्ड के लिए खौफ का दूसरा नाम रहे सीनियर पुलिस इंस्पेक्टर विजय सालस्कर भी कामा हॉस्पिटल के बाहर हुई फायरिंग में हेमंत करकरे और अशोक काम्टे के साथ आतंकियों की गोली लगने से बलिदान हो गए थे। विजय सालस्कर को भी मरणोपरांत अशोक चक्र से सम्मानित किया गया था।

एएसआई तुकाराम ओंबले

मुंबई पुलिस के एएसआई तुकाराम ओंबले का जब गिरगाँव चौपाटी पर अजमल कसाब से सामना हुआ, तब वह पूरी तरह निहत्थे थे। यह जानने के बावजूद कि सामने वाले के हाथों में एके-47 है, वह अपनी जान की परवाह किए बिना आतंकी कसाब पर टूट पड़े। इस दौरान उन्हें कसाब की बंदूक से कई गोलियाँ लगीं और वह बलिदान हो गए लेकिन कसाब से अपनी पकड़ ढीली नहीं की। बलिदानी तुकाराम ओंबले को उनकी इस जाँबाजी के लिए शांतिकाल के सर्वोच्च वीरता पुरस्कार अशोक चक्र से सम्मानित किया गया था।

मेजर संदीप उन्नीकृष्णन

मेजर संदीप उन्नीकृष्णन नेशनल सिक्यॉरिटी गार्ड्स (एनएसजी) के कमांडो थे। वह 26/11 एनकाउंटर के दौरान मिशन ऑपरेशन ब्लैक टारनेडो का नेतृत्व कर रहे थे और 51 एसएजी के कमांडर थे। जब ताज महल पैलेस और टावर्स होटल पर कब्जा जमाए बैठे आतंकियों से लड़ रहे थे तो एक आतंकी ने पीछे से उन पर हमला किया जिससे घटनास्थल पर ही वह बलिदान हो गए। मरणोपरांत 2009 में उनको अशोक चक्र से सम्मानित किया गया।

एनएसजी कमांडो गजेंद्र सिंह

एनएसजी कमांडो गजेंद्र सिंह, 51 एसएजी (स्पेशल एक्शन ग्रुप) का हिस्सा थे, उन्होंने नरीमन हाउस को खाली कराते समय वीरगति को प्राप्त की, आतंकियों द्वारा फेंका गया एक ग्रेनेड उनके पास ही फट गया, जिससे गंभीर रूप से घायल होने के कारण उन्होंने अपना बलिदान दे दिया।

शशांक शिंदे

वे छत्रपति शिवाजी टर्मिनल पुलिस स्टेशन  मुंबई के प्रभारी थे। सीएसटी में आतंकी हमला हुआ तो आतंकवादियों को उलझा कर रखा। पीछे से एक आतंकी ने उन पर हमला किया। उन्हें मरणोपरांत कीर्ति चक्र से सम्मानित किया गया था।

प्रकाश पी मोरे

प्रकाश पी मोरे, एल.टी. मार्ग थाने में तैनात पुलिस सब-इंस्पेक्टर थे। जिन्होंने अपनी अंतिम साँस तक बहादुरी से लड़ाई लड़ी और देश की रक्षा करते हुए अपने प्राणों की आहुति दे दी।

बापूसाहेब दुरूगड़े

बापूसाहेब दुरूगड़े, एल.ए.1 थाने के पुलिस सब-इंस्पेक्टर थे जो 26/11 के हमलों के दौरान बलिदान हो गए थे।

विशेष रूप से उल्लेखित इन कुछ नामों के अलावा कुल करीब 22 नाम हैं जिन्होंने मुंबई आतंकी हमले में पाकिस्तानी आतंकियों के मंसूबों को नाकाम करने और उन्हें मौत के घाट उतारने में अपना बलिदान देकर बहादुरी की मिसाल पेश की थी। इसके अलावा भी विभिन्न विभागों से जुड़ें ऐसे हजारों दूसरे सुरक्षा बलों के जवान हैं जिन्होंने अनगिनत लोगों की जान बचाने में बड़ी भूमिका निभाई। बता दें कि आतंकियों के खिलाफ मुंबई में 11 जगहों पर पुलिस और सुरक्षा बलों ने कार्रवाई की थी।

सपा MLA के बेटे ने कहा- सांसद जियाउर्रहमान बर्क हमारे साथ, सुनते ही भीड़ ने शुरू कर दी पत्थरबाजी… तमंचे की गोलियाँ, अजीब हथियार खोल रहे संभल साजिश के तार

संभल में 24 नवंबर 2024 को जामा मस्जिद का सर्वे करने आई टीम पर इस्लामी भीड़ के हमले के बाद ऑपइंडिया ने गहरी साजिश की आशंका जताते हुए रिपोर्ट प्रकाशित की थी। जैसे-जैसे पुलिस की कार्रवाई आगे बढ़ रही है इस साजिश के तार खुलने लगे हैं।

हिंसा के दौरान 5 लोगों की मौत हुई। इनकी पहचान कैफ, अयान, नईम अहमद, बिलाल और नोमान के तौर पर हुई है। मुस्लिम पक्ष का दावा है कि पुलिस फायरिंग में इनकी मौत हुई। लेकिन पुलिस ने स्पष्ट किया है कि उसने उपद्रव रोकने के लिए फायरिंग नहीं की थी। केवल लाठीचार्ज और आँसू गैस के गोले दागे गए थे।

इतना ही नहीं खबरों में बताया गया है कि पोस्टमार्टम के दौरान 2 शवों से 315 बोर की गोली निकली है। इस बोर की गोलियाँ पुलिस इस्तेमाल नहीं करती है। यह अमूमन उन तमंचों में प्रयोग किया जाता है, जिसके लाइसेंस पब्लिक को दिए जाते हैं। पुलिस ने कुछ घरों से धारदार हथियार भी बरामद किए हैं। इनमें से एक अजीब तरह का हथियार जिसके दोनों तरफ से वार किया जा सकता है।

इस हिंसा में 28 पुलिसकर्मी घायल हुए हैं, जिसमें से 1 की हालात गंभीर है। जामा मस्जिद के सदर जफर अली को पुलिस ने हिरासत में लिया है। समाजवादी पार्टी के सांसद जियाउर्रहमान बर्क और इसी पार्टी के विधायक नवाब इकबाल महमूद के बेटे सुहैल इकबाल के खिलाफ भी FIR दर्ज की गई है।

सपा सांसद, विधायक के बेटे पर FIR

दैनिक भास्कर ने जियाउर्रहमान बर्क और सुहैल इकबाल के खिलाफ कोतवाली नगर थाने में दर्ज FIR के अंश प्रकाशित किए हैं। मौके पर तैनात एक सब इंस्पेक्टर द्वारा दर्ज कराई गई FIR में कहा गया है, सुबह करीब 9 बजे अचानक से 700-800 लोगों की भीड़ सर्वे रुकवाने की नीयत से आई। भीड़ में सुहैल इकबाल भी शामिल थे। सुहैल इकबाल ने भीड़ से कहा कि सांसद जियाउर्रहमान बर्क हमारे साथ हैं। हम भी आपके साथ हैं। अपने मंसूबों को पूरा कर लो। सुहैल के इतना कहते ही भीड़ ने पुलिस पर पत्थर और गोली चलाना शुरू कर दी। इसी बीच एक उपद्रवी ने सीओ संभल काे गोली मार दी, जो उनके पैर में लगी।”

सब इंस्पेक्टर दीपक राठी की ओर से संभल कोतवाली में दर्ज कराई गई FIR में सांसद जियाउर्रहमान बर्क और सुहैल इकबाल को नामजद करते हुए 700-800 अज्ञात भीड़ को शामिल किया गया है। यह FIR भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराओं 191(2), 191(3), 190. 221, 132, 125, 324(5), 196 और 323(b) के साथ सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने वाली धारा 3/5 के तहत दर्ज की गई है।

लोकसभा स्पीकर से मिला सपा प्रतिनिधिमंडल

समाजवादी पार्टी ने पुलिसिया कार्रवाई पर सवाल खड़े करते हुए इसे मुस्लिमों के साथ अत्याचार बताने की कोशिश की है। अखिलेश यादव, अयोध्या से सांसद अवधेश प्रसाद, मामले में आरोपित जियाउर्रहमान बर्क और डिम्पल यादव ने कई समाजवादियों सहित लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात की है।

मजिस्ट्रेटी जाँच के आदेश

इस घटना पर मुरादाबाद मंडल के कमिश्नर आंजनेय सिंह का बयान सामने आया है। उन्होंने कहा कि घटना की मजिस्ट्रेटी जाँच के आदेश दिए गए हैं। आंजनेय सिंह ने कहा कि किसी भी दोषी को छोड़ा नहीं जाएगा। पुलिस पर सवाल खड़े कर रहे लोगों से उलटे उन्होंने ही पूछ लिया, “वहाँ लोग करने क्या गए थे? न तो वो नमाज़ का समय था। न तो वहाँ को स्कूल या ऑफिस था। वहाँ कोई बाजार भी नहीं था जो लोग सामान खरीदने गए थे।”

आईएएस आंजनेय सिंह के मुताबिक कुछ लोगों ने पूरे शहर को आग में झोंकने की साजिश रची है। कुछ लोगों के घरों में तोड़फोड़ के सवाल पर उन्होंने कहा, “जिस घर से लगातार पत्थर चल रहे थे उनसे कई बार दरवाजा खोलने की विनती की गई थी। क्या आप ये उम्मीद करते हैं कि कोई पुलिस को लगातार पत्थर मारे और वो हाथ जोड़े खड़े रहे?”

कमिश्नर आंजनेय सिंह ने बताया है कि संभल में अब हालात तेजी से सामान्य हो रहे हैं। उन्होंने बताया कि मुँह पर रुमाल बाँध कर हिंसा करने वालों को भी चिन्हित किया जा रहा है। उनके अनुसार 4 शवों के पोस्टमार्टम से मौत की वजह देसी बंदूकों से गोली लगना सामने आया है।

विकसित देशों ने की पर्यावरण की ऐसी-तैसी, पर क्लाइमेट चेंज से लड़ना गरीब देशों की जिम्मेदारी: दोगलई पर पश्चिम को भारत ने रगड़ा, 300 अरब डॉलर वाले COP-29 डील बताया अनुचित

अजरबैजान की राजधानी बाकू में हाल ही में एक समझौता हुआ है। यह समझौता संयुक्त राष्ट्र की जलवायु परिवर्तन वाली शाखा ने COP-29 बैठक में करवाया है। इसके तहत विश्व के विकसित और अमीर देश राजी हुए हैं कि वह 300 बिलियन डॉलर 2035 से विकासशील या गरीब देशों को देना चालू करेंगे। यह पैसा जलवायु परिवर्तन से रोकने के लिए निर्धारित किए गए लक्ष्य प्राप्त करने को दिया जाएगा। भारत ने इस समझौते पर नाराजगी जताई है। उसने इसे स्वीकार करने से इनकार कर दिया है।

क्या है समझौता?

अज़रबैजान की राजधानी बाकू में COP 29 की एक बैठक हुई है। COP 29 की इस बैठक में समझौता हुआ है कि विकसित और अमीर देश मिल कर हर साल 300 बिलियन डॉलर (लगभग ₹25.29 लाख करोड़) देंगे। 300 बिलियन डॉलर का यह लक्ष्य 2035 तक प्राप्त किया जाएगा। अभी यह नहीं साफ़ है कि यह पैसा किस साल से देना चालू किया जाएगा।

पहले यह अमीर और विकसित देश मात्र 100 बिलियन डॉलर देने पर ही राजी थे। हालाँकि, लम्बी बातचीत और बैठकों के बाद यह देश 300 बिलियन के आँकड़े तक पहुँचे। इस फैसले को यूरोपियन देशों ने क्रांतिकारी बताया है। उन्होंने कहा है कि इससे दुनिया में जलवायु परिवर्तन को रोकने में मदद मिलेगी और गरीब देशों की सहायता भी होगी।

वहीं दक्षिणी ध्रुव में स्थित देशों (अफ्रीका, एशिया और दक्षिण अमेरिका) ने इस समझौते को आधा-अधूरा बताया है। यह देश माँग कर रहे थे कि उन्हें 1.3 ट्रिलियन डॉलर (100 लाख करोड़ से अधिक) दिए जाएँ। हालाँकि, यह देश इस पर राजी नहीं हुए।

यह पैसा इन देशों को या तो कर्ज या फिर किसी प्रोजेक्ट में लगाने के लिए सहायता के तौर पर दिया जाएगा। यह पैसा वह सभी विकसित देश दे रहे हैं जिनके 19वीं, 20वीं और 21वीं शताब्दी में जरूरत से कहीं ज्यादा कोयला, तेल और बाकी ईंधन उपयोग करने समेत पेड़ काटने के कारण आज विश्व इस जलवायु की समस्या में फंसा हुआ है।

पैसा देने को राजी हुए अधिकांश देश यूरोप से ताल्लुक रखते हैं। हालाँकि, यह पैसा तब ही दिया जाएगा जब विकासशील या गरीब देश अपना कार्बन उत्सर्जन घटाएंगे और लक्ष्य प्राप्त करेंगे। विकसित देशों द्वारा दिए गए इन पैसों का इस्तेमाल अक्षय या स्वच्छ ऊर्जा के प्रोजेक्ट लगाने में किया जाएगा।

विकसित देशों का कहना है कि उन्होंने पहले 100 बिलियन डॉलर का वादा किया था जो कि 2022 में पूरा कर लिया गया था। भारत समेत बाकी विकासशील देश इस दावे को नहीं मानते हैं। उनकी नए समझौते पर भी सहमति नहीं है।

भारत क्यों हुआ नाराज?

इस समझौते के दौरान बाकू में मौजूद भारतीय प्रतिनधि चाँदनी रैना ने इसका जम कर विरोध किया। चाँदनी रैना ने इस समझौते को लेकर कहा, “भारत इस समझौते को वर्तमान स्वरूप को स्वीकार नहीं करता है। जितना पैसा जुटाने की बात की गई है, वह काफी कम है और एक मामूली धनराशि है। यह ऐसा समझौता नहीं है जिससे हमारा देश अपने अस्तित्व के लिए आवश्यक जलवायु एक्शन लिया जा सके।”

भारत ने यह समझौता करने के तरीके पर भी सवाल खड़े किए। भारत ने कहा कि सब कुछ पहले ही मैनेज किया जा चुका था और बाकू में ना किसी की सहमति ली गई और ना ही उनकी समस्याएँ सुनी गईं। इसे बजाय जल्दबाजी में समझौता कर दिया गया। भारत को समझौता होने से पहले बयान की अनुमति ना मिलने पर भी रोष जताया। भारत ने कहा कि हमने सभी जिम्मेदार संस्थाओं को इस मामले में सूचित कर दिया था लेकिन हमारी बात नहीं मानी गई।

भारत का समर्थन नाइजीरिया समेत बाकी देशों ने भी किया। नाइजीरिया ने इस समझौते में स्वीकार की गई 300 बिलियन डॉलर की धनराशि को एक मजाक करार दिया है। कई छोटे देशों ने भी भारत का समर्थन किया है। कई छोटे द्वीपीय देशों ने भी इस पूरे समझौते पर प्रश्न खड़े किए हैं।

क्यों बेईमानी जैसे हैं ये समझौते?

जलवायु परिवर्तन को लेकर मचे हो-हल्ले के बीच यह बात ध्यान देना जरूरी है कि इनमें सबसे अधिक नुकसान विकासशील देशों का ही है। विकासशील देशों ने ही इस समस्या को जन्म दिया है। अपने देशों को औद्योगिक ताकत बनान के लिए अमेरिका, फ़्रांस, ब्रिटेन, जर्मनी समेत तमाम देशों ने दुनिया भर में जंगल काटे, खूब तेल और गैस जलाई।

उन्होंने कोयले का भी भरपूर तरीके से इस्तेमाल किया। इसके जरिए उन्होंने अपने नागरिकों का जीवन स्तर बढ़ाया और अब जब उनकी समस्याएँ हल हो चुकी हैं, तब वह दूसरे देशों को ऐसा नहीं करने देना चाहते हैं। उनको भारत एवं उसके जैसे बाकी विकासशील देशों के कोयले अथवा जीवाश्म ईंधन का उपयोग करने पर समस्या है।

पश्चिमी देश भारत, चीन, नाइजीरिया और ब्राजील जैसे देशों पर दबाव बना रहे हैं कि वह अब कोयला और ऐसे ही बाकी ईंधनों का इस्तेमाल ना करें। उनका भारत पर दबाव है कि वह अभी से ही महँगी ऊर्जा की तरफ जाएँ। भारत की अर्थव्यवस्था अभी ऐसी स्थिति में नहीं है कि वह पूरी तरह हरित ऊर्जा में बदल सके।

भारत तेजी से हरित ऊर्जा की तरफ बढ़ रहा है लेकिन इसमें समय लगने वाला है। पश्चिमी देश यह पैसा देकर विकासशील देशों से उनका ऊर्जा का अधिकार तो छीन ही रहे हैं, वह अपनी जिम्मेदारी से भी भाग रहे हैं।

हिंदू परिवार की पुश्तैनी जमीन को बताया वक्फ प्रॉपर्टी, दरगाह से निकल लाठी-डंडे वाली भीड़ ने किया हमला: बरसाए पत्थर, 15 पर FIR

उत्तर प्रदेश के एटा जिले में एक हिन्दू परिवार की जमीन को वक्फ की सम्पत्ति बताते हुए मुस्लिम भीड़ ने हमला किया है। हमलावर एक दरगाह से जुड़े लोग बताए जा रहे हैं जिन्होंने पत्थरबाजी की और लाठी-डंडे चलाए। हमले में उपाध्याय परिवार के 3 सदस्य घायल हो गए हैं जिनका इलाज चल रहा है। घटना रविवार (24 नवंबर 2024) की है। नामजद किए गए 15 हमलावरों में पुलिस ने अब तक फरमान और रफीक को गिरफ्तार कर लिया है। बाकी हमलावरों की तलाश जारी है।

यह मामला एटा जिले के थानाक्षेत्र जलेसर का है। शनिवार की रात यहाँ सुनील कुमार उपाध्याय ने पुलिस में तहरीर दी है। तहरीर में उन्होंने बताया कि वसंत टाकीज के पास उनकी 24 बीघा जमीन है। इसी जमीन से थोड़ी दूर सड़क पार एक दरगाह की जमीन है। दरगाह से जुड़े लोग सुनील की पुश्तैनी जमीन पर विवाद खड़ा कर रहे थे। दरगाह कमेटी इस जमीन के वक्फ की सम्पत्ति होने का दावा कर रही थी। इसी विवाद के बाद इसी माह 6 नवबंर को स्थानीय प्रशासन ने जमीन को नाप कर मामले का निपटारा कर दिया था।

पैमाइश के दौरान वहाँ वक्फ बोर्ड से जुड़े लोग भी थे। कोई विवाद दोबारा न हो इसके लिए रविवार (24 नवंबर) को सुनील अपने परिजनों के साथ मिल कर प्रशासन द्वारा चिन्हित अपनी जमीन की बॉउंड्री करवा रहे थे। शाम लगभग 4:30 पर अचानक निर्माण कार्य के दौरान वहाँ मुस्लिम भीड़ पहुँच गई। इनके हाथों में पत्थर और लाठी -डंडे थे। भीड़ में से एक हमलावर ने सुनील के परिवार को देखते ही कहा, “आज सालों को जान से मार दो।”

इसी के बाद हिंसक भीड़ ने उपाध्याय परिवार पर हमला कर दिया। लाठी-डंडों को चलाने के साथ पत्थरबाजी भी की गई। कुछ हमलावरों ने सुनील द्वारा बनवाई गई बॉउंड्री को भी गिरा दिया। हमलावरों की तादाद लगभग 150 के आसपास बताई जा रही है। ये भीड़ दरगाह की तरफ से आ रही थी। बॉउंड्री गिराने के साथ हमलावरों ने वहाँ खड़े वाहनों और मेज कुर्सियों में भी तोड़फोड़ की। इस हिंसा से आसपास अफरातफरी का माहौल बन गया। आसपास के दुकानदारों ने डर से अपनी दुकानें बंद कर दीं।

हिंसक भीड़ की पिटाई से उपाध्याय परिवार के मोनू, संजय और सुरेश घायल हो गए हैं। इन तीनों का इलाज करवाया जा रहा है। कुछ राहगीर भी अपनी जान बचाने के लिए भागने लगे। जैसे-तैसे सुनील ने पुलिस को सूचना दी। सूचना पर पुलिस फ़ौरन ही मौके पर पहुँची। पुलिस की गाड़ियाँ आती देख कर हमलावर मौके से फरार हो गए। जाते-जाते उन्होंने सुनील और उनके परिजनों के कत्लेआम की भी धमकी दी। पीड़ित ने आरोपितों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की माँग की है।

सुनील उपाध्याय ने अपनी शिकायत में रफीक, अरमान, बबलू, वसीम, फरमान, नासिर, शाकिर, दानिश, नदीम, नासिर, अरशद, शकील, इरफ़ान, महफूज, यामीन और मुज़म्मिल को नामजद किया है। इन सभी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 191 (2), 191 (3), 190, 109, 115 (2), 352, 351 (3), 125 और 324 (4) के साथ आपराधिक कानून संसोशन अधिनियम 1932 की धारा 7 के तहत कार्रवाई की गई है।

ऑपइंडिया के पास शिकायत कॉपी मौजूद है। इस हिंसा का वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। पुलिस टीमों का गठन कर के फरार आरोपितों की तलाश में दबिश डाली गई। सोमवार (25 नवंबर) को पुलिस ने फरमान और रफीक को गिरफ्तार कर लिया है। घटनास्थल पर पुलिस फ़ोर्स तैनात कर दी गई है। अन्य आरोपितों की गिरफ्तारी के लिए दबिश दी जा रही है।

अमित ने सदरुन निशा से की लव वाली शादी, 8 साल बाद बेटे सचिन का करवा दिया खतना: निजामुद्दीन से ‘करीबी’ के बाद प्रॉपर्टी बिकवाई, दे रही धमकी

उत्तराखंड के उधमसिंह नगर जिले में एक हैरान करने वाला धर्मांतरण का मामला सामने आया है। यहाँ एक मुस्लिम महिला ने अपने हिंदू पति पर इस्लाम कबूलने का दबाव डाला और उनके 8 साल के बेटे का खतना भी करवा दिया। पीड़ित पति ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराते हुए जान का खतरा बताया है। इस मामले में पुलिस ने महिला को हिरासत में ले लिया है, जबकि मुख्य आरोपित निजामुद्दीन फरार है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, घटना उधमसिंह नगर के रुद्रपुर इलाके की है। यूपी के बलरामपुर निवासी अमित सिंह ने 10 साल पहले गोरखपुर की सदरुन निशा से प्रेम विवाह किया था। शादी के बाद दोनों पंजाब के लुधियाना में रहने लगे, जहाँ अमित नौकरी करता था। उनका एक बेटा हुआ, जिसका नाम सचिन रखा गया।

कुछ समय बाद अमित परिवार सहित उत्तराखंड के रुद्रपुर में आकर बस गया। शुरुआत में सब कुछ ठीक रहा, लेकिन स्थानीय मुस्लिम समुदाय से जुड़े लोगों ने सदरुन निशा की मुलाकात निजामुद्दीन नामक युवक से कराई। इस मुलाकात के बाद सदरुन और निजामुद्दीन के बीच नजदीकियाँ बढ़ने लगीं।

इस्लाम कबूलने, गोमांस खाने का दबाव

निजामुद्दीन से जुड़ने के बाद, सदरुन निशा ने अपने पति पर इस्लाम अपनाने और गोमांस खाने का दबाव बनाना शुरू कर दिया। जब अमित ने इनकार किया, तो सदरुन करीब एक महीने पहले अपने बेटे को साथ लेकर घर से भाग गईं और बेटे का खतना करवा दिया। कुछ समय बाद सदरुन ने लौटकर माफी माँगी और घर वापस आ गईं। हालाँकि, इस दौरान उसने अमित की पैतृक संपत्ति बिकवा दी।

शिकायतकर्ता ने बताया कि 15 नवंबर 2024 (शुक्रवार) को सदरुन निशा फिर से घर से गायब हो गईं। इस बार वह अपने साथ 70 हजार रुपये नकद, कागजात और कपड़े भी ले गई। अमित ने पुलिस में तहरीर दी कि उसकी पत्नी को निजामुद्दीन लेकर भाग गया है। साथ ही, निजामुद्दीन ने अमित को जान से मारने और शहर छोड़ने की धमकी भी दी। निजामुद्दीन ने फोन पर अमित को धमकाया है। यही नहीं, अमित को रुद्रपुर छोड़ने के लिए 1 हफ्ते का समय भी दिया गया था।

शिकायत के बावजूद स्थानीय पुलिस ने शुरुआत में इस मामले को गंभीरता से नहीं लिया। बाद में उच्चाधिकारियों के निर्देश पर FIR दर्ज की गई। रविवार (24 नवंबर 2024) को पुलिस ने सदरुन निशा को हिरासत में लिया, जबकि निजामुद्दीन फरार है। पुलिस उसकी तलाश में छापेमारी कर रही है। इस मामले की जाँच और अन्य कानूनी कार्रवाई जारी है। पीड़ित ने पुलिस से सुरक्षा की गुहार लगाई है।

नो जेंटलमैन गेम: बुमराह का एक्शन/थ्रो बॉलिंग/चकिंग… अपने ही जाल में फँसा ऑस्ट्रेलिया, नहीं पढ़ पाया ‘बूम-बूम’ का दिमाग

बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफी के पहले टेस्ट मैच के साथ ही ऑस्ट्रेलियाई मीडिया और फैंस की ओर से जसप्रीत बुमराह पर चकिंग (गेंदबाजी में गलत तरीके से गेंद फेंकने) के आरोप लगाने का पुराना खेल फिर से शुरू हो गया। लेकिन बुमराह ने इन आरोपों को नजरअंदाज कर शानदार प्रदर्शन करते हुए पर्थ टेस्ट में भारत को ऐतिहासिक जीत दिलाई। ऑस्ट्रेलियाई की पहली पारी में बुमराह (5/30) के करिश्माई प्रदर्शन ने ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाजों को पस्त कर दिया। उन्होंने मैच में कुल 8 विकेट लिए।

ये कोई पहली बार नहीं था, जब ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट ने किसी विदेशी खिलाड़ी पर इस तरह के आरोप लगाए। इससे पहले मुथैया मुरलीधरन और राजेश चौहान जैसे दिग्गज गेंदबाजों को भी इसी रणनीति के तहत निशाना बनाया गया। यह खेल ‘जेंटलमैन’ कहे जाने वाले क्रिकेट में कितना काला है, इस पर बहस जरूरी है।

बुमराह पर ‘थ्रो’ के आरोप और सच्चाई

ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ पहले टेस्ट में जसप्रीत बुमराह ने एक बार फिर साबित किया कि उनका गेम सिर्फ उनकी अनोखी गेंदबाजी एक्शन का नहीं, बल्कि उनके शानदार दिमाग और क्रिकेटिंग समझ का परिणाम है। अपने पूरे करियर में इतनी बेहतरीन बॉलिंग करने के बावजूद बुमराह की गेंदबाजी के खिलाफ सोशल मीडिया पर ‘थ्रो फेंकने’ जैसे आरोप लगाए गए।

जसप्रीत बुमराह का गेंदबाजी एक्शन और तेज गेंदबाजी का विज्ञान

जसप्रीत बुमराह का गेंदबाजी एक्शन अपनी अनोखी शैली के कारण हमेशा चर्चा में रहता है। उनका एक्शन हाइपरमोबिलिटी का नतीजा है, जिसमें उनकी कोहनी का झुकाव क्रिकेट के नियमों के तहत वैध रहता है। उनकी कोहनी 15 डिग्री से अधिक नहीं मुड़ती, और उनका एक्शन पूरी तरह से कानूनी माना जाता है। उनकी कलाई का फ्लेक्स और हाथ का कोण गेंद को अंतिम समय में दिशा देने की क्षमता पैदा करता है, जिससे बल्लेबाज को समझने में दिक्कत होती है कि गेंद अंदर आएगी, बाहर जाएगी या सीधी जाएगी।

शोएब अख्तर जैसे तेज गेंदबाज, जो 150-160 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से गेंद फेंकते थे, उनकी गति उनके शरीर की प्राकृतिक बनावट और टेक्नीक का नतीजा थी। अख्तर के मजबूत पैर, लचीला धड़, और गेंद फेंकने के समय की ऊर्जा ट्रांसफर तकनीक उनकी गति का मुख्य स्रोत थे। गेंदबाजी में रफ्तार पैदा करने के लिए ग्रिप, रन-अप और आर्म स्पीड का सही तालमेल जरूरी होता है।

बुमराह और अख्तर जैसे गेंदबाज यह गति अपनी नैसर्गिक काबिलियत और शरीर की संरचना के चलते हासिल करते हैं। यह प्रक्रिया अभ्यास और तकनीक के साथ और बेहतर होती जाती है। तेज गेंदबाजी पूरी तरह से प्राकृतिक है, और यह प्रत्येक गेंदबाज की शारीरिक क्षमताओं पर निर्भर करती है। बुमराह का एक्शन और अख्तर की गति इस बात का सबूत हैं कि तेज गेंदबाजी तकनीक और अनुकूल शरीर के मेल का परिणाम होती है।

हालाँकि बुमराह पर लग रहे आरोपों को क्रिकेट विशेषज्ञों ने खारिज कर दिया है। इंग्लैंड के पूर्व खिलाड़ी और कोच इयान पोंट ने बुमराह की गेंदबाजी एक्शन को कानूनी करार देते हुए कहा, “उनकी कोहनी का कोण नियम के तहत है। यह बेंड नहीं होता, बल्कि यह हाइपर-मोबिलिटी का नतीजा है। बुमराह का एक्शन क्रिकेट के नियमों के भीतर पूरी तरह से वैध है।”

ऑस्ट्रेलिया की पुरानी चाल

ऑस्ट्रेलियाई मीडिया का यह रवैया नया नहीं है। इससे पहले मुथैया मुरलीधरन पर भी चकिंग के आरोप लगाए गए थे। मुरलीधरन ने 800 टेस्ट विकेट लेकर क्रिकेट इतिहास में अपनी छाप छोड़ी, लेकिन उनकी अनोखी गेंदबाजी को अक्सर शक की नजरों से देखा गया।

राजेश चौहान, जिनकी ऑफ स्पिन गेंदबाजी ने भारत को कई मैच जिताए, को भी इसी तरह के आरोपों का सामना करना पड़ा। यह साफ है कि ऑस्ट्रेलिया के लिए माइंड गेम और खिलाड़ियों को मानसिक रूप से कमजोर करने की कोशिश उनकी रणनीति का हिस्सा रही है।

बुमराह का ‘दिमाग’ उनकी असली ताकत

बुमराह की गेंदबाजी सिर्फ एक्शन पर निर्भर नहीं है। पर्थ में उनके प्रदर्शन ने यह साबित किया कि उनका दिमाग उनकी सबसे बड़ी ताकत है। उनकी गेंदबाजी में योजना, सटीकता, और विरोधी की कमजोरी का फायदा उठाने की कला नजर आई।

उदाहरण के लिए, दूसरे दिन का खेल शुरू होते समय ऑस्ट्रेलियाई गेंदबाजों ने अपनी लेंथ पर ध्यान नहीं दिया, जबकि बुमराह ने पहले ही स्पेल से विकेट चटकाने की रणनीति बनाई। उन्होंने पिच की बाउंस को समझते हुए बैक-ऑफ-लेंथ गेंदें फेंकी और बल्लेबाजों को रन बनाने का कोई मौका नहीं दिया। ऑस्ट्रेलिया के मार्नस लाबुशेन जैसे दिग्गज, जो अपने रक्षात्मक खेल के लिए मशहूर हैं, बुमराह की चालाकी का शिकार हो गए। उन्होंने एक इनस्विंगर को छोड़ दिया, जो सीधे उनके पैड पर जा लगा। यह विकेट ऑस्ट्रेलिया के मीडिया और फैन्स के लिए और भी कड़वी गोली साबित हुई।

क्रिकेट में माइंड गेम और बेईमानी की कहानी ऑस्ट्रेलिया से जुड़ी रही है। चाहे वह स्लेजिंग हो, विपक्षी खिलाड़ियों की बेजा आलोचना, या फिर बॉल टैंपरिंग का मामला, ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट का ‘नो जेंटलमैन’ चेहरा बार-बार सामने आया है। स्टीव स्मिथ और डेविड वॉर्नर का बॉल टैंपरिंग कांड दुनिया भर के क्रिकेट प्रेमियों के लिए बड़ा झटका था। इसके बाद भी ऑस्ट्रेलिया ने विरोधियों के खिलाफ ‘मनोरंजन से ज्यादा विवाद’ की रणनीति अपनाई है।

जसप्रीत बुमराह ने इन आरोपों का कोई जवाब नहीं दिया। उनके लिए उनका प्रदर्शन ही जवाब था। यह रवैया उन्हें आधुनिक क्रिकेट का आदर्श बनाता है। बुमराह ने दिखाया कि असली खिलाड़ी वह है, जो मैदान पर अपने खेल से जवाब दे। उनकी रणनीति, खासकर पर्थ में, यह बताने के लिए काफी है कि वह सिर्फ एक गेंदबाज नहीं, बल्कि क्रिकेट के असली ‘मैथमैटिशियन’ हैं।

उनकी गेंदबाजी में छुपा विज्ञान उनके विरोधियों को चौंका देता है। महज 41 मैचों में 181 टेस्ट विकेटों के साथ बुमराह का शानदार औसत 20.06 है, जो इंग्लैंड के दिग्गज दाएँ हाथ के तेज गेंदबाज सिडनी बार्न्स के 16.43 औसत के अलावा (कम से कम 150 विकेट) किसी भी गेंदबाज से बेहतर है। पर्थ टेस्ट में ‘मैन ऑफ द मैच’ अवॉर्ड हासिल करते हुए टीम इंडिया को जिताना, उनकी काबिलियत का एक नमूना भर है।

क्रिकेट का असली चेहरा बदलने की जरूरत

ऑस्ट्रेलिया जैसी टीमों के रवैये से यह साफ है कि क्रिकेट को ‘जेंटलमैन’ गेम बनाए रखने की जरूरत है। खिलाड़ियों पर झूठे आरोप लगाना, मीडिया के जरिए मानसिक दबाव बनाना, और मैदान पर स्लेजिंग का सहारा लेना खेल की आत्मा को ठेस पहुंचाता है। जसप्रीत बुमराह और मुथैया मुरलीधरन जैसे खिलाड़ियों का प्रदर्शन दिखाता है कि असली क्रिकेट खेलना क्या होता है। इन दिग्गजों ने साबित किया है कि बेईमानी से नहीं, बल्कि खेल की शुद्धता से ही महानता हासिल की जाती है।

जसप्रीत बुमराह ने पर्थ टेस्ट में अपनी गेंदबाजी से ऑस्ट्रेलिया को न केवल हराया, बल्कि उनकी माइंड गेम रणनीतियों को भी विफल कर दिया। यह जीत सिर्फ एक मैच नहीं थी, यह भारतीय क्रिकेट की मानसिक ताकत का प्रतीक थी। बुमराह ने साबित किया कि असली ‘जेंटलमैन’ वह है, जो अपने प्रदर्शन से जवाब देता है, न कि आरोपों और विवादों में उलझता है। क्रिकेट को इसके असली जेंटलमैन स्वरूप में लाने के लिए खिलाड़ियों को बुमराह जैसे आदर्शों से प्रेरणा लेनी चाहिए।

उत्तराखंड की जिस सुरंग में फँसे थे 41 श्रमिक, वहाँ अब ‘बाबा बौखनाग’ का मेला: जानिए कौन हैं वे देवता जिनके सामने सिर झुकाने लौटे अंग्रेज वैज्ञानिक भी

उत्तराखंड के उत्तरकाशी में निर्माणाधीन सिल्क्यारा सुरंग में नवम्बर, 2023 में 41 श्रमिक फँस गए थे। यह श्रमिक अंदर काम करने गए थे लेकिन बीच में मलबा आने के कारण यह बाहर नहीं आ सके थे। इसके बाद इनको बचाने के लिए रेस्क्यू ऑपरेशन चलाया गया था। इस पूरे ऑपरेशन में ऑस्ट्रेलियाई रेस्क्यू विशेषज्ञ अर्नाल्ड डिक्स की मदद ली गई थी। यहीं पर स्थानीय देवता बाबा बौखनाग का एक मंदिर भी स्थापित किया गया था। श्रमिकों को 18 दिन चले राहत-बचाव ऑपरेशन के बाद सुरक्षित निकाला गया था। अर्नाल्ड डिक्स ने इसे बाबा बौखनाग की कृपा बताया था।

अब इसी सिल्क्यारा सुरंग के बाहर रेस्क्यू ऑपरेशन पूरा होने के एक वर्ष के बाद मेला लगा है। यह मेला बाबा बौखनाग के स्थान पर ही लगाया गया है। यह कार्यक्रम स्थानीय लोग और उत्तराखंड सरकार मिल कर करवा रही है। यह मेला सोमवार (25 नवम्बर, 2024) को आयोजित किया जा रहा है। इसे सिल्क्यारा सुरंग के बाहर ही आयोजित किया गया है।

बाबा की अर्चना को लौटे अर्नाल्ड

रेस्क्यू ऑपरेशन के पूरा होने में बड़ा रोल निभाने वाले अर्नाल्ड डिक्स को वापस उत्तराखंड बुलाया गया है। उन्हें बाबा बौखनाग के मेले में विशेष अतिथि बनाया गया है। अर्नाल्ड डिक्स बीते वर्ष रेस्क्यू ऑपरेशन के समय बाबा बौखनाग के मंदिर में पूजा-अर्चना करते दिखे थे।

डिक्स ने रेस्क्यू ऑपरेशन खत्म होने के बाद मंदिर में बाबा बौखनाग को जाकर धन्यवाद ज्ञापित किया था। अर्नाल्ड डिक्स एक बार फिर बाबा बौखनाग का आशीर्वाद इस मंदिर पहुँचे हैं। वह यहाँ मेले में शामिल हुए हैं और उन्होंने मीडिया से भी बात की है और अपने अनुभव साझा किए हैं।

उन्होंने स्थानीय पत्रकार देव रतूड़ी को बताया, “मुझे यहाँ पर बाबा बौखनाग के बारे में बताया गया था। मैंने बाबा से प्रार्थना की कि यहाँ 41 फँसे लोग हैं वो सुरक्षित बच जाएँ क्योंकि उन्होंने कोई गलत नहीं किया। मैंने हम लोगों के बचने के लिए भी प्रार्थना की क्योंकि हम तो उनकी सहायता कर रहे थे।”

अर्नाल्ड डिक्स ने बीते वर्ष गंगा में नहाने को लेकर अपना अनुभव भी बताया। उन्होंने बताया कि गंगा में नहा कर उन्हें हल्का महसूस हुआ। अर्नाल्ड डिक्स ने भारत से प्रगाढ़ हुए अपने सम्बन्धों को भी इसके बाद बताया। डिक्स ने कहा कि अब उनके पास एक बेटी है जो भारतीय है।

कौन हैं बौखनाग देवता?

सुरंग से श्रमिकों के निकलने को जिन बौखनाग देवता की कृपा बताया गया, वह यहाँ के खेत्रपाल देवता है। खेत्रपाल उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र में उस क्षेत्र विशेष की रक्षा करने वाले देवता को कहा जाता है। खेत्रपाल शब्द ‘क्षेत्रपाल’ शब्द का स्थानीय गढ़वाली भाषा में रूपांतरण है, गढ़वाली में ‘क्ष’ अक्षर ‘ख’ बोला जाता है।

बाबा बौखनाग को बासकी नाग का रूप माना जाता है। स्थानीय लोग बताते है कि भगवान श्रीकृष्ण यहाँ पहले पहुँचे थे और फिर सेम मुखेम गए थे। सेम मुखेम में भी नागराजा का एक मंदिर है। यहाँ इससे पहले भी मेला लगता रहा है।

उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र में हिन्दू देवी-देवताओं से इतर स्थानीय देवी-देवताओं की बड़ी मान्यता है। यहाँ वन की रक्षा करने वाले वन देवता, क्षेत्र की रक्षा करने वाले खेत्रपाल और अन्य स्थानीय देवताओं की पूजा की जाती है। हालाँकि, पूरे देश में क्षेत्र विशेष के देवता होते हैं, जिन्हें अलग-अलग नामों से जाना जाता है।

स्थानीय लोग बताते हैं यह आवश्यक नहीं है कि इन सभी देवताओं का एक निश्चित स्थान पर भव्य मंदिर बना हो। कहीं-कहीं स्थानीय देवता के नाम पर मात्र किसी पत्थर की भी पूजा हो सकती है। जहाँ पर यह सुरंग हादसा हुआ है, वहाँ भी कोई भव्य मंदिर नहीं बना था।

बौखनाग देवता के अलावा इस क्षेत्र में ऐसे कई देवता हैं, जिन्हें नागराजा और अन्य नामों से जाना जाता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि नाग शब्द वाले देवताओं का संबंध भगवान विष्णु की शैया के रूप से सेवा देने वाले भगवान शेषनाग से है।

जुमे पर रची गई थी संभल हिंसा की साजिश: सपा MP जियाउर्रहमान बर्क और MLA इकबाल महमूद के बेटे पर FIR, जामा मस्जिद का सर्वे करने आई टीम पर हुआ था हमला

उत्तर प्रदेश के संभल जिले में रविवार (24 नवंबर 2024) को हुई हिंसा के बाद पुलिस ने सख्त कार्रवाई शुरू कर दी है। इस घटना में अब तक 7 FIR दर्ज की जा चुकी हैं। हिंसा में समाजवादी पार्टी के सांसद जियाउर्रहमान बर्क और विधायक नवाब इकबाल महमूद के बेटे सुहैल इकबाल का नाम प्रमुख आरोपितों में शामिल है। पुलिस ने 2 थानाक्षेत्रों-कोतवाली नगर और नक्खासा में केस दर्ज किए हैं।

हिंसा की शुरुआत शुक्रवार (22 नवंबर) को जियाउर्रहमान बर्क और सुहैल इकबाल द्वारा भीड़ जुटाकर दिए गए कथित भड़काऊ बयानों से हुई। कोतवाली नगर इलाके में जामा मस्जिद के पास भीड़ ने हमला किया, जिसमें SDM, DSP, SP के PRO समेत लगभग 2 दर्जन पुलिसकर्मी घायल हो गए। इसके बाद नक्खासा इलाके में पत्थरबाजी हुई, जिसमें मुस्लिम महिलाएँ भी शामिल थीं। इस दौरान भीड़ ने पुलिस की एक बाइक को आग के हवाले कर दिया।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, उत्तर प्रदेश के संभल जिले रविवार (24 नवंबर 2024) को भड़की हिंसा के बाद पुलिस ने कार्रवाई शुरू कर दी है। संभल जिले में अब तक पुलिस की तरफ से 2 थानाक्षेत्रों में कुल 7 FIR दर्ज की जा चुकी है। इन केसों में समाजवादी पार्टी का सांसद जियाउर्रहमान बर्क और इसी पार्टी से विधायक नवाब इकबाल महमूद का बेटा सुहैल इक़बाल के नाम प्रमुख हैं। सभी मृतकों को रात में ही दफना दिया गया है। लगभग 2 दर्जन से अधिक आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया गया है। गिरफ्तार आरोपितों में मुस्लिम महिलाएँ भी हैं।

जियाउर्रहमान बर्क और सुहैल इक़बाल के खिलाफ तहरीर चौकी प्रभारी के पद पर तैनात एक सब इंस्पेक्टर ने दी है। अपनी तहरीर में चौकी इंचार्ज ने बताया है कि जियाउर्रहमान बर्क और सुहैल इक़बाल ने शुक्रवार (22 नवंबर 2024) को अनधिकृत तौर पर भीड़ जुटा कर भड़काऊ बयानबाजी की थी। हिंसा 2 थानाक्षेत्रों में भड़की थी। ये थानाक्षेत्र कोतवाली नगर और नक्खासा हैं। पहला हमला कोतवाली नगर इलाके में जामा मस्जिद के आसपास हुआ था। इस हमले में SDM, DSP, SP के PRO सहित लगभग 2 दर्जन पुलिसकर्मी घायल हो गए थे।

कोतवाली नगर क्षेत्र में घायल DSP, SDM, और अन्य अधिकारियों की तहरीर पर केस दर्ज किए गए हैं। वहीं, नक्खासा थाने में पुलिस वाहन जलाने और पत्थरबाजी के आरोप में FIR दर्ज हुई है। सभी केसों में सरकारी कार्य में बाधा डालना, हत्या के प्रयास, दंगा भड़काना जैसी गंभीर धाराएँ लगाई गई हैं। पुलिस अधीक्षक के अनुसार, पकड़े गए आरोपितों से पूछताछ जारी है ताकि हिंसा में शामिल अन्य लोगों की पहचान हो सके। पुलिस मामले में सख्ती बरत रही है और जल्द ही और भी गिरफ्तारी होने की उम्मीद है।

इसी दिन दूसरी पत्थरबाजी संभल के नक्खासा इलाके में हुई थी। इस पथराव में मुस्लिम महिलाएँ भी शामिल थीं। पत्थरबाजी के साथ पुलिस की एक बाइक को मुस्लिम भीड़ ने आग के हवाले कर दिया था। नक्खासा वही क्षेत्र है जहाँ FIR में नामजद जियाउर्रहमान बर्क का घर है। संभल के पुलिस अधीक्षक ने बताया कि हिंसा को जरूरी बल प्रयोग कर के लगभग 1 घंटे के अंदर ही काबू पा लिया गया था। सभी मृतकों के शवों का रात में ही अंतिम संस्कार कर दिया गया है।

इस हिंसा में अब तक कुल 7 FIR दर्ज हुई हैं। कोतवाली नगर इलाके में यह केस घायल DSP और SDM के साथ 2 चौकी प्रभारियों के साथ SHO की तहरीर पर दर्ज हुए हैं। वहीं नक्खासा थानाक्षेत्र में भी एक FIR पुलिस के वाहन फूँकने और पथराव के आरोप में दर्ज हुई है। इन सभी FIR में सरकारी काम में बाधा डालना, हत्या के प्रयास, दंगा भड़काने सहित कई अन्य गंभीर धाराओं में कार्रवाई की गई है। पकड़े गए आरोपितों से हिंसा में शामिल उनके साथियों के बारे में पूछताछ की जा रही है।

हिन्दू लड़की को खींचकर मुस्लिम युवक ले जा रहे थे जंगल, परिजनों के विरोध पर इस्लामी भीड़ भड़की: मेरठ में पत्थरबाजी, चले धारदार हथियार

उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में साम्प्रदायिक तनाव की खबर है। यहाँ एक हिन्दू लड़की को मुस्लिम युवक द्वारा छेड़े जाने के बाद दो पक्ष आमने-सामने आ गए। दोनों तरफ से पत्थरबाजी हुई है जिसे रोकने में पुलिस को काफी मशक्क्त करनी पड़ी। मुस्लिम पक्ष पर फायरिंग करने और धारदार हथियार भी चलाने का आरोप है। कुल 12 लोग घायल हुए हैं जिनका इलाज करवाया जा रहा है। गाँव में फ़ोर्स तैनात कर दी गई है। पुलिस ने एक आरोपित को गिरफ्तार कर लिया है जबकि बाकी आरोपितों की तलाश जारी है। घटना रविवार (24 नवंबर 2024) की है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक यह घटना मेरठ के थानाक्षेत्र सरधना की है। यहाँ के गाँव मेहरमती गणेशपुर निवासी एक हिन्दू युवक ने रविवार को पुलिस में तहरीर दी है। तहरीर में युवक ने बताया कि रविवार की सुबह उसकी बहन उपले बना रही थी। तभी, वहाँ मुस्लिम समुदाय के कुछ लोग पहुँच गए जो लड़की से छेड़खानी करने लगे। पीड़िता ने विरोध किया तो आरोपित उसका मुँह दबा कर जंगल की तरफ जाने लगे।

जैसे-तैसे पीड़िता आरोपितों के चंगुल से छूट कर अपने घर पहुँची और परिजनों को सारी बात बताई। इस मामले में गाँव में पंचायत बुलाई गई। पंचायत द्वारा आरोपितों से माफ़ी मँगवा कर मामले को दबा दिया गया। मगर, उसके बाद कुछ ही देर में पीड़िता के घर पर मुस्लिम भीड़ जमा हो गई। इस दौरान भीड़ के हाथों में लाठी-डंडे, धारदार हथियार और अवैध तमंचे थे। इन सभी ने पीड़िता सहित उसके अन्य परिजनों पर हमला बोल दिया।

शिकायतकर्ता के मुताबिक हिंसक भीड़ ने पीड़िता के तमाम पारिवारिक सदस्यों को पीटा। पीड़ित परिवार की चीख पुकार और शोरगुल सुन कर हिन्दू पक्ष के लोग भी जुटने लगे, लेकिन तब मुस्लिम भीड़ ने मदद के लिए आ रहे लोगों पर पत्थरबाजी शुरू कर दी। कुछ ही देर में दोनों पक्षों की तरफ से पथराव होने लगा। पीड़ित पक्ष ने आरोपितों पर धारदार हथियार चलाने और फायरिंग करने का भी आरोप लगया है।

इस बीच मामले की जानकारी पुलिस को मिली। घटनास्थल पर कई थानों की पुलिस पहुँची और विवाद को शांत करवाया। घटना के बाद डिप्टी एसपी भारी फ़ोर्स सहित गाँव में कैम्प कर रहे हैं। इस हिंसा के कुछ वीडियो भी सामने आए हैं जिसमें दोनों पक्षों को एक-दूसरे से उलझते देखा जा सकता है।

मेरठ के एसपी ग्रामीण ने बताया कि पीड़ित परिवार की तहरीर पर एक आरोपित को गिरफ्तार कर लिया गया है। कुछ अन्य हमलावर फरार हैं जिनकी तलाश में दबिश दी जा रही है। वहीं हिंसा के वायरल वीडियो के आधार पर अलग से केस दर्ज करके बवाल कर रहे आरोपितों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई अमल में लाई जाएगी। हिन्दू संगठनों ने भी इस मामले में पुलिस से आरोपितों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की माँग की है।

पाकिस्तान में एक-दूसरे को काट रहे शिया-सुन्नी, अब तक 80+ लाशें गिरी: लखनऊ के एक दंगे से जुड़ी हैं जड़ें, जानिए पूरा मामला

पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वाह सूबे में हाल ही में हुई हिंसा में 80 से अधिक लोगों की मौत हो गई। यह हिंसा इस सूबे के कुर्रम इलाके में हुई। हिंसा शिया और सुन्नी मुस्लिमों के कबीलों की इस लड़ाई के कारण बड़ा आर्थिक नुकसान भी हुआ। कई जगह दुकानें जलाई गईं। हिंसा के कारण बड़ी संख्या में परिवार यह इलाका छोड़ रहे हैं। इस इलाके की सीमा अफगानिस्तान से मिलती है। यहाँ इस लड़ाई में कबीलों के अलावा अलग-अलग लड़ाके भी शामिल हैं। शिया-सुन्नी के बीच इस हिंसा के पीछे कबीलाई लड़ाई के अलावा जमीन का विवाद भी बताया जाता है।

अभी क्या हुआ?

21 नवम्बर, 2024 को खैबर पख्तूनख्वाह के कुर्रम जिले के पारचिनार इलाके में एक जगह पर गाड़ियों के काफिलों पर हमला हुआ। यह काफिले राजधानी पेशावर से पारचिनार और पारचिनार से पेशावर की तरफ जा रहे थे। इन काफिलों में शिया लोग सवार थे। काफिलों में कई सवारी वाली वैन चल रहीं थीं। इनके साथ कुछ सुरक्षाबल के लोग भी थे।

यह काफिले जैसे ही निचले कुर्रम के इलाके में पहुँचे, इन पर आसपास की पहाड़ियों से हमला कर दिया गया। भारी फायरिंग और रॉकेट दागने के कारण इस हमले में कम से कम 43 लोगों की मौत हो गई। मरने वालों में महिलाएँ और बच्चे भी शामिल थे। यह हमला सुन्नी लड़ाकों ने किया, ऐसा बताया गया है।

हमले में बड़ी संख्या में लोग घायल भी हैं। शियाओं पर हुए हमले के पीछे 12 अक्टूबर, 2024 को हुआ एक पुराना हमला कारण बताया गया है। इस हमले में 15 सुन्नी लोगों की मौत हुई थी। शियाओं पर इस ताजा हमले के बाद इलाके में हिंसा का दौर चालू हो गया।

हमले से गुस्साए शिया कबीलों ने इसके बाद सुन्नी कबीलों को निशाना बनाना चालू कर दिया। शिया लड़ाकों ने 22 नवम्बर, 2024 को बगान बाजार और कुर्रम के निचले इलाकों को निशाना बनाया। यहाँ एक बाजार में लगभग 200 दुकानें जला दी गईं।

बड़ी संख्या में सुन्नी लोगों को अगवा किया गया। हमले में सुन्नियों की दुकानों और उनके परिवारों को निशाना बनाया गया। यह सिलसिला रविवार तक जारी रहा। इस पूरी हिंसा में 80 से अधिक मारे गए जबकि बड़ी संख्या में लोग घायल हुए। मरने वालों में ज्यादा तादाद शियाओं की है।

4 साल में 1600+ मौतें

पाकिस्तान के कुर्रम इलाके में शिया-सुन्नी की लड़ाई कोई नई बात नहीं है। पारचिनार, पाकिस्तान के उन कुछ इलाकों में है, जहाँ शिया आबादी सुन्नी से अधिक या उनके बराबर है। रिपोर्ट बताती हैं कि यहाँ शियाओं की आबादी लगभग 45% है। इसमें वह कुर्रम के ऊपरी इलाकों में बहुसंख्यक हैं। हालाँकि, निचले इलाकों में सुन्नी मजबूत हैं और यही इलाका इसे बाकी देश से जोड़ता है।

बीबीसी उर्दू की एक रिपोर्ट कहती है कि 2007-11 के बीच यहाँ शिया-सुन्नी की लड़ाई के कारण 1600 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं। यह आँकड़ा सरकारी है। बीबीसी उर्दू की रिपोर्ट कहती है कि असल आँकड़ा कहीं ज्यादा है। घायल होने वालों की संख्या 5000 से भी अधिक बताई जाती है।

नवम्बर में हुए इस ताजा हमले से पहले अक्टूबर में यहाँ हिंसा हुई थी। इसमें भी दर्जनों लोग मारे गए थे। उससे पहले सितम्बर में यहाँ 46 लोग मारे गए थे। जुलाई, 2024 में भी यहाँ 30 से अधिक मौतें हुई थीं। यह लड़ाई कई दशकों से जारी है। लड़ाई में शिया-सुन्नी कबीलों के अलावा आतंकी समूहों के शामिल होने की बात भी कही जाती है।

लखनऊ से है इस लड़ाई का कनेक्शन

लड़ाई का मूल कारण 1930 से चली आ रही दुश्मनी बताई जा रही है। 1930 के दशक में तब अविभाजित भारत में लखनऊ में शिया-सुन्नी दंगे हुए थे। लखनऊ में शिया-सुन्नी दंगों का पुराना इतिहास है। इस दंगे के दौरान शिया मौलानाओं की अपील पर पारचिनार इलाके से भी शिया लोग लड़ने के लिए लखनऊ गए थे। इन्हें रोकने के लिए यहाँ के सुन्नी मौलानाओं ने अपील की थी।

इस लड़ाई की जड़ वहीं से पड़ गई थी। इसके अलावा यहाँ रहने वाले शिया और सुन्नी कबीलाई लोग हैं। इन इलाकों में सर के बदले सर का नियम चलता है। बन्दूक रखने को यहाँ सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। कबीलाई लड़ाई में एक और मामला जमीन से जुड़ा हुआ है।

बीबीसी उर्दू की एक रिपोर्ट बताती है कि 1890 में अंग्रेजों के शासनकाल के दौरान यहाँ पर यह कबीले बसाए गए थे। इस इलाके में उसी हिसाब से जमीन भी आवंटित की गई थी। इसी जमीन पर कब्जा शिया का होगा या सुन्नी का, इसी के विवाद में लगातार हिंसा होती है।

जिन जमीनों को लेकर लड़ाई है, उनके कोई भी आधिकारिक दस्तावेज मौजूद नहीं हैं। ऐसे में मालिकाना हक़ को लेकर लड़ाई होती रहती है। जमीन पर लड़ाई इसलिए भी है, क्योंकि यही जमीन इस इलाके में उर्वरा है। यहाँ चावल, फल और बाकी चीजों की खेती होती है।

कबीलाई और दूरस्थ इलाके होने के कारण यहाँ आय के और कोई साधन नहीं है। ऐसे में जमीन की महत्ता और भी बढ़ जाती है। जमीन की यह लड़ाई पारचिनार के कम से कम 10 गाँवों में है। एक शिया परिवार की दूसरे सुन्नी परिवार से लड़ाई भी कबीलाई जंग का रूप ले लेती है। हालाँकि, मसला सिर्फ जमीन को लेकर ही नहीं है।

आपसी मतभेद भी बड़ा मामला

शिया और सुन्नी के बीच लड़ाई का मामला जमीन तक सीमित ना होकर पाकिस्तान की सीमा भी लाँघता है। गौरतलब है कि पाकिस्तान में अधिकांश आबादी सुन्नी है। जिस इलाके में यह लड़ाई हो रही है, वह तीन तरफ से अफगानिस्तान से घिरा है और यह इलाके तालिबान जैसे आतंकी संगठनों का गढ़ हैं। इन आतंकी संगठनों में सुन्नी आतंकी ही शामिल हैं।

अफगानिस्तान में 1979 से चालू हुए जिहाद के बाद इस इलाके में भी सुन्नी आतंकियों की आमद हुई है। शिया कबीलों का आरोप है कि यहाँ के रहने वाले सुन्नी बाहरी आतंकियों को बुला कर उन्हें निशाना बनाते हैं। हमले 1930 के बाद 1960, 1970 और 1990 के दशक में भी हुए हैं।

1971 में यहाँ एक मीनार के निर्माण पर शिया और सुन्नी में लड़ाई हुई थी। 1977 में एक मस्जिद के इमाम की हत्या के बाद भी हिंसा हुई। 2007 में यहाँ चालू हुए दंगों में लगभग 2000 लोग मारे गए थे। इस इलाके के कुछ गाँवों पर अल कायदा और तालिबान ने भी कब्जा करने का प्रयास किया।

अब क्या है स्थिति?

21 नवम्बर से चली आ रही यह लड़ाई 24 नवम्बर को 7 दिनों के लिए शांत हुई। खैबर पख्तूनख्वाह के मुख्य सचिव, कानून मंत्री और पुलिस मुखिया ने यहाँ मौके पर जाकर सुन्नी-शिया कबीलों से बातचीत की और समझौता करवाया। दोनों समूह 7 दिनों के लिए लड़ाई रोकने को राजी हो गए हैं। दोनों समूहों ने एक दूसरे के बंधकों को लौटाने पर भी सहमति दी है। सरकार ने इस मामले में रिपोर्ट भी माँगी है। सरकार के प्रतिनिधियों ने उम्मीद जताई है कि आगे यहाँ हिंसा देखने को नहीं मिलेगी। यह समझौता कितने दिन टिकता है, यह भविष्य के गर्भ में है।