Home Blog Page 560

जिस सामागुरी में 60% मुस्लिम, वहाँ गोमांस बाँटकर जीतती थी कॉन्ग्रेस? MP रकीबुल हुसैन के दावे से खड़ा हुआ सवाल: असम में CM सरमा गोमांस पर प्रतिबंध लगाने को तैयार, क्या साथ आएगा ‘हाथ’

क्या कॉन्ग्रेस अब तक सामागुरी में गोमांस बाँट कर जीत रही थी? यह प्रश्न असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने पूछा है। उन्होंने कहा है कि अगर कॉन्ग्रेस माँग करे कि राज्य में गोमांस बैन हो जाए तो वह एक्शन लेने को तैयार हैं। उन्होंने यह बयान कॉन्ग्रेस के आरोपों के बाद दिया है। भाजपा पर कॉन्ग्रेस नेता ने आरोप लगाया था कि वह सामागुरी सीट गोमांस बाँट कर जीती है।

कॉन्ग्रेस के आरोपों के बाद CM सरमा ने कहा कि वह राज्य में गोमांस पर बैन लगाने को तैयार हैं, बशर्ते इसके लिए असम कॉन्ग्रेस अध्यक्ष रिपुन बोरा सहमत हों। उन्होंने कहा कि अगर रिपुन बोरा सहमत हों तो अगली विधानसभा की बैठक में ही गोमांस पर बैन लगा दिया जाएगा।

CM सरमा ने कहा कि गर गोमांस पर बैन लग गया तो ना भाजपा-कॉन्ग्रेस और ना ही कोई अन्य पार्टी इसे वोटरों को पेश कर पाएगी। उन्होंने कहा कि इस बैन के बाद हिन्दू-मुस्लिम और ईसाई कोई भी गोमांस भी नहीं खा पाएँगे। CM सरमा ने रकीबुल हसन पर भी प्रश्न उठाए हैं। उन्होंने रकीबुल हुसैन से कहा है कि वह गोमांस पर बैन लगाने को पत्र लिखें।

CM सरमा ने पूछा है कि क्या सामागुरी सीट गोमांस बाँट कर जीती जा सकती है, और अगर ऐसा है तो क्या कॉन्ग्रेस अब तक सामागुरी सीट गोमांस बाँट कर जीत रही थी? उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस नेता रकीबुल हुसैन सामागुरी सीट को अच्छी तरह से जानते हैं, इसलिए उन्हें पता होगा।

रकीबुल हुसैन ने इससे पहले भाजपा के सामागुरी जीतने पर आरोप लगाया था कि उसने गोमांस बाँट कर यह जीत हासिल की है। रकीबुल हुसैन इस सीट पर पिछले लगभग ढाई दशक से विधायक थे। वह लोकसभा चुनाव में धुबरी के सांसद बन गए थे। इस सीट पर उपचुनाव में उनके बेटे तंजील हुसैन को कॉन्ग्रेस ने उतारा था।

तंजील हुसैन को हालिया उपचुनाव में करारी शिकस्त भाजपा ने दी थी। भाजपा के दिप्लु रंजन सरमा ने यहाँ तंजील को 24500 वोटों से हराया था। तंजील की यह हार इसलिए भी महत्वपूर्ण थी क्योंकि यह सीट मुस्लिम बहुल है। इस सीट पर 60% से अधिक मुस्लिम वोटर हैं। यहाँ एक 1996 में ही गैर मुस्लिम उम्मीदवार जीत सका था।

मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने सामागुरी में बीजेपी की जीत को असम की राजनीति में ‘मील का पत्थर’ करार दिया था। हार के बाद कॉन्ग्रेस के रकीबुल हुसैन ने कभी गोमांस तो कभी वोटिंग में गड़बड़ी के आरोप लगाए। हालाँकि, उनकी इन बातों CM सरमा ने ही पूछ लिया कि क्या वह गोमांस बैन किए जाने का समर्थन करते हैं।

गौरतलब है कि असम के भीतर गोमांस को अलग तरह का क़ानून है। असम में गोमांस खाया जा सकता है लेकिन उन इलाकों में गाय नहीं काटी जा सकती जहाँ पर 5 किलोमीटर के दायरे में हिन्दू, जैन या सिख रहते हैं। साथ ही में वैष्णव मठों के भी आसपास गोवध नहीं हो सकता।

जैसे ही पता चला मैं हिंदू हूँ तो लात-घूँसों से लगे मारने… कोलकाता से ढाका गए भारतीय युवक को घेर कर पीटा: पासपोर्ट-वीजा सब तैयार, फिर भी इस्कॉन के संतों को धार्मिक यात्रा पर भारत नहीं आने दे रहा बांग्लादेश

बांग्लादेश में हिंदुओं पर अत्याचार बढ़ता ही जा रहा है। हाल ही में दो बड़ी घटनाओं ने ध्यान खींचा। पहली घटना इस्कॉन से जुड़े संतों को भारत आने से रोकने से जुड़ी है, जिसमें 63 साधुओं को भारत आने से रोक लिया गया। दूसरी घटना कोलकाता के एक युवक पर हमले की है, जो बांग्लादेश में सिर्फ अपने दोस्त से मिलने गया था। उसकी भारतीय और हिंदू होने की पहचान की वजह से ढाका में हमला किया गया और 2-3 अस्पतालों में इलाज भी नहीं मिला।

इस्कॉन के साधुओं को भारत आने से रोका गया

इस्कॉन (इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर कृष्णा कॉन्शसनेस) के 63 संतों को बांग्लादेश की बेनापोल सीमा पर रोक दिया गया, जबकि उनके पास वैध पासपोर्ट और वीजा थे। उन्हें “संदिग्ध गतिविधियों” और ऊपर से मिले आदेश का हवाला देकर भारत आने नहीं दिया गया। बांग्लादेशी अधिकारियों ने बताया कि इन संतों के पास सरकार की विशेष अनुमति नहीं थी। इस्कॉन कोलकाता के उपाध्यक्ष राधारमण दास ने कहा कि ये संत धार्मिक यात्रा पर भारत आना चाहते थे, लेकिन अधिकारियों ने इसे “उनकी सुरक्षा के लिए खतरा” बताकर रोका।

यह घटना ऐसे समय में हुई है जब बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा बढ़ रही है। हाल ही में इस्कॉन से जुड़े दो संतों को भी चटगाँव में गिरफ्तार किया गया था। इसके अलावा, हिंदू संत चिन्मय कृष्ण दास की गिरफ्तारी और उनके समर्थकों के बैंक खाते फ्रीज किए जाने से तनाव और बढ़ गया है।

भारतीय युवक पर हमला, नहीं मिला इलाज

कोलकाता के सायन घोष ने दावा किया कि ढाका में उन्हें केवल इसलिए पीटा गया क्योंकि वह भारतीय हिंदू हैं। 26 नवंबर की शाम, जब वह अपने दोस्त के साथ बाहर टहल रहे थे, तब 5-6 लोगों ने उन्हें घेरकर उनके धर्म और राष्ट्रीयता पूछी। जैसे ही उन्होंने बताया कि वह भारतीय और हिंदू हैं, उन पर लात-घूँसों से हमला किया गया।

सायन ने बताया कि उनका मोबाइल फोन और बटुआ छीन लिया गया, और सिर व चेहरे पर गंभीर चोटें आईं। उन्होंने पुलिस और स्थानीय अस्पतालों से मदद माँगी, लेकिन उन्हें कोई राहत नहीं मिली। इस घटना के बाद सायन को गहरा सदमा पहुँचा, और उनके दोस्त का परिवार भी दबाव में आ गया।

PFI के खिलाफ लिखना मानहानि नहीं, केरल हाई कोर्ट ने ऑर्गनाइजर और भारत प्रकाशन के खिलाफ दर्ज केस किया रद्द: कहा- प्रतिबंधित संगठन का कोई कानूनी अस्तित्व नहीं

केरल हाई कोर्ट ने प्रतिबंधित इस्लामी चरमपंथी संगठन ‘पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया’ (PFI) के बारे में अपमानजनक लेख प्रकाशित करने के लिए मीडिया हाउस के खिलाफ शुरू की गई आपराधिक मानहानि की कार्यवाही को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि PFI भारत में प्रतिबंधित संगठन है और उसके खिलाफ मानहानि का आरोप नहीं लगाया जा सकता, क्योंकि उसका कोई कानूनी अस्तित्व नहीं है।

मामले की सुनवाई कर रहे न्यायमूर्ति पीवी कुन्हीकृष्णन ने कहा कि प्रतिबंधित संगठन मानहानि की शिकायत नहीं कर सकता है। कोर्ट ने कहा, “पीएफआई IPC की धारा 499 में परिभाषित ‘व्यक्ति’ की परिभाषा के अंतर्गत आ सकता है, लेकिन जब उसे केंद्र ने देश में प्रतिबंधित कर दिया है तो ऐसा प्रतिबंधित संगठन IPC की धारा 499 के दायरे में नहीं आएगा, क्योंकि उसका कानूनी अस्तित्व नहीं होता।”

दरअसल, पीएफआई के महासचिव मोहम्मद बशीर ने आरोप लगाया कि भारत प्रकाशन (दिल्ली) लिमिटेड ने उसके खिलाफ अपमानजनक लेख प्रकाशित किया है। आरोप था कि लेख में पीएफआई को प्रतिबंधित संगठन स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी) का नया अवतार, लव जिहाद को बढ़ावा देने वाला जैसे कई आरोप लगाए गए थे।

इसके अलावा, बशीर ने यह भी आरोप लगाया था कि उस लेख में पीएफआई को 2008 में जम्मू-कश्मीर में आतंकवादी भर्ती, बैंगलोर सीरियल ब्लास्ट, प्रोफेसर टीजे जोसेफ की हाथ काटने जैसी गंभीर वारदातों में शामिल होने का आरोप लगाया गया है। बशीर ने भारत प्रकाशन के अलावा, ऑर्गनाइजर के एडिटर, रिपोर्टर के खिलाफ आईपीसी की धारा 499 और 500 के तहत मुकदमा दर्ज कराया था।

न्यायालय ने कहा कि 27 सितंबर 2022 को केंद्र सरकार ने पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया और उसके सहयोगियों या सम्बद्ध संगठनों या मोर्चों जिसमें रिहैब इंडिया फाउंडेशन, कैंपस फ्रंट ऑफ इंडिया, ऑल इंडिया इमाम काउंसिल, नेशनल कॉन्फेडरेशन ऑफ ह्यूमन राइट्स ऑर्गनाइजेशन, नेशनल विमेंस फ्रंट, जूनियर फ्रंट, एम्पावर इंडिया फाउंडेशन और रिहैब फाउंडेशन को गैरकानूनी संघ घोषित किया है।

इसके अलावा, सुनवाई कर रहे न्यायमूर्ति पीवी कुन्हीकृष्णन ने कहा कि लेख में केवल कुछ आरोप लगाए गए हैं जो सार्वजनिक डोमेन में भी उपलब्ध हैं। इस प्रकार न्यायालय ने मानहानि की शिकायत और याचिकाकर्ताओं के खिलाफ सभी कार्यवाही को रद्द कर दिया।

9वीं में पढ़ता था 16 साल का शैलेश यादव, खून से लथपथ मिली लाश, कूचा हुआ था सिर: मौके पर उस मुस्लिम लड़की के अब्बा के मोबाइल-चप्पल मिले जिससे था ‘अफेयर’

उत्तर प्रदेश के प्रयागराज जिले में कक्षा 9 में पढ़ने वाले एक छात्र की बेरहमी से हत्या कर दी गई है। मृतक का नाम शैलेश कुमार यादव है जिनका शव शनिवार (30 नवंबर 2024) को घर के पास बरामद हुआ। हत्या की वजह शैलेश का एक मुस्लिम लड़की से अफेयर बताया जा रहा है। पुलिस ने केस दर्ज करके शैलेश की कथित प्रेमिका के अम्मी-अब्बू सहित कुल 5 आरोपितों को हिरासत में ले लिया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक यह घटना प्रयागराज के थानाक्षेत्र उतरांव की है। यहाँ के गाँव इस्माइल लाला का पूरा में अश्वनी कुमार यादव अपने परिवार के साथ रहते हैं। अश्वनी का 16 वर्षीय बेटा शैलेश यादव जिले के ही एक स्कूल में कक्षा 9 का छात्र था। शनिवार की शाम को वह अपने घर पर था। तभी अचानक एक कॉल आती है और शैलेश बात करता हुआ बाहर निकल जाता है। देर रात तक जब वो घर नहीं लौटा तो परिजनों को चिंता हुई। शैलेश का फोन भी बंद आने लगा।

नाते-रिश्तेदारी में भी जब शैलेश का कुछ पता नहीं चला तो परिजनों ने खोजबीन शुरू कर दी। कई जगहों पर तलाशने के बाद शनिवार की ही रात लगभग 11 बजे शैलेश की लाश अपने ही घर से लगभग 200 मीटर दूर तालाब के पास पड़ी मिली। लाश के पास एक मोबाइल फोन और एक जोड़ी चप्पल के साथ खून से सना एक धारदार फरसा भी पड़ा था। पुलिस की पूछताछ में ग्रामीणों ने बताया कि शैलेश का अपने ही गाँव की एक मुस्लिम लड़की से काफी समय से अफेयर था।

शैलेश और उनकी प्रेमिका फोन पर अक्सर बातें करते थे। इस बात की भनक लड़की के घर वालों को लग गई। उन्होंने शैलेश के साथ लड़की को भी दूरी बनाने की नसीहत दी। हालाँकि तमाम पाबंदियों के बावजूद शैलेश और उनकी प्रेमिका आपस में बात करते रहे। शैलेश के परिजनों ने आशंका जताई है कि लड़की के अम्मी-अब्बू ने उनके बेटे को धोखे से अपने घर बुला कर मार डाला और बाद में लाश तालाब के पास फेंक दी।

शैलेश की हत्या फावड़े से सिर पर वार करके हुई थी। ग्रामीणों को शव लहूलुहान हालात में मिला था। पुलिस ने इस आशंका के चलते लाश के पास मिली चप्पल लड़की के अब्बू को पहनाई। चप्पल संदिग्ध के पैरों में एकदम फिट आ गई। मौके से मिला मोबाइल फोन भी लड़की के अब्बू का ही निकला। आखिरकार पुलिस ने मृतक की प्रेमिका, उसके के अब्बू, अम्मी, दादा और एक अन्य युवक सहित कुल 5 लोगों को हिरासत में ले लिया है। पकड़े गए आरोपितों से पूछताछ चल रही है।

इस बीच मामला 2 समुदायों से जुड़ा होने की वजह से गाँव में तनाव फ़ैल गया है। हालत को देखते हुए मौके पर पुलिस बल तैनात कर दिया गया है। पुलिस ने शव का पोस्टमार्टम करवाने के लिए भेज दिया है। मामले में जाँच व अन्य जरूरी कानूनी कार्रवाई की जा रही है।

सैय्यद शुजा ने EVM हैक करने का किया दावा, कॉन्ग्रेसी इकोसिस्टम ने दावे का खूब किया प्रचार-प्रसार : चुनाव आयोग ने कराई FIR, पहले भी फर्जी दावों से कर चुका है गुमराह

चुनाव आयोग (ECI) ने ईवीएम (इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन) को लेकर झूठे दावे करने वाले सैय्यद शुजा के खिलाफ सख्त कार्रवाई शुरू की है और उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई है। जो खुद को साइबर विशेषज्ञ बताने वाले शुजा पर आरोप है कि उसने महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में ईवीएम हैकिंग के फर्जी दावे किए और देश में भ्रम फैलाने की कोशिश की, जिसके बाद ये कार्रवाई की गई।

चुनाव आयोग ने शुजा के दावों को ‘पूरी तरह झूठा और भ्रामक’ करार दिया है। आयोग ने दिल्ली और मुंबई पुलिस को मामले की जाँच के निर्देश दिए हैं। अधिकारियों ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसे फर्जी दावे और ईवीएम की विश्वसनीयता पर सवाल उठाने वालों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाएगी। हालाँकि उसकी इस फेक न्यूज फैलाने की चाल में ‘कॉन्ग्रेस इकोसिस्टम’ भी कदम-दर-कदम उसके साथ खड़ा रहा है।

ईवीएम हैकिंग के झूठे दावों से फैलाई सनसनी

हाल ही में महाराष्ट्र चुनावों में महा विकास अघाड़ी (एमवीए) को मिली करारी हार के बाद, कॉन्ग्रेस समर्थित एक्टिविस्ट, पत्रकार और यूट्यूबर्स ने एक वीडियो शेयर करना शुरू किया। इस वीडियो में शुजा दावा करता है कि वह ईवीएम को हैक कर सकता है और चुनाव परिणाम अपने पक्ष में मोड़ सकता है।

शुजा ने ‘फ्रीक्वेंसी आइसोलेशन’ और ‘स्पेसिफिक ऐप्स’ का इस्तेमाल कर 281 में से 288 सीटों पर चुनाव परिणाम नियंत्रित करने की बात कही। इतना ही नहीं, उसने यह भी दावा किया कि वह ₹52-53 करोड़ के बदले ईवीएम को प्रोग्राम कर सकता है।

लेकिन ईवीएम तकनीकी रूप से वायरलेस संचार में सक्षम नहीं हैं, जिससे शुजा के दावे तुरंत ही झूठ साबित हो गए। फिर भी, कॉन्ग्रेस समर्थकों ने इसे भाजपा पर हमला करने का मौका बनाया और वीडियो को सोशल मीडिया पर बड़े पैमाने पर शेयर किया।

पहले भी शुजा फैला चुका है भ्रम का जाल

शुजा के खिलाफ यह पहली कार्रवाई नहीं है। 2019 में भी उसने भारतीय चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठाने की कोशिश की थी, जब उसने लंदन से एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में 2014 के लोकसभा चुनावों को ‘हैक्ड’ बताया था। उस दौरान, कॉन्ग्रेस नेता कपिल सिब्बल भी इस कार्यक्रम में उपस्थित थे, जिससे कॉन्ग्रेस और शुजा के संबंधों पर सवाल खड़े हुए थे।

फर्जी विशेषज्ञ और कॉन्ग्रेस का समर्थन

सैय्यद शुजा का दावा है कि उसने 2009-2014 के बीच भारत इलेक्ट्रॉनिक्स कॉरपोरेशन लिमिटेड (ECIL) में काम किया, लेकिन इन दावों का कोई पुख्ता सबूत नहीं है। वह खुद को पीएचडी और बीटेक धारक बताता है, लेकिन उसकी शैक्षिक पृष्ठभूमि का कोई रिकॉर्ड नहीं है।

शुजा का नाम कॉन्ग्रेस के शीर्ष नेताओं जैसे कपिल सिब्बल और सैम पित्रोदा के साथ जोड़ा जाता रहा है। 2019 के उनके झूठे दावों को भी कॉन्ग्रेस समर्थित इकोसिस्टम ने प्रचारित किया था।

मीडिया और कॉन्ग्रेस का खेल

‘मुंबई तक’ जैसे प्लेटफॉर्म्स ने शुजा के वीडियो को बढ़ावा दिया। कॉन्ग्रेस इकोसिस्टम में शामिल एक्टिविस्ट और यूट्यूबर्स ने इसे ‘ईवीएम में गड़बड़ी के सबूत’ के रूप में पेश किया।

हालाँकि, भारत टुडे ग्रुप के एक स्टिंग ऑपरेशन ने शुजा की पोल खोल दी, जब वह ईवीएम हैकिंग का कोई सबूत नहीं दे पाया।

कॉन्ग्रेस की दोहरी नीति

दिलचस्प है कि शुजा ने हमेशा उन्हीं चुनावों को ‘फेयर’ बताया, जहाँ कॉन्ग्रेस जीती, और भाजपा की जीत को ‘हैक्ड’ करार दिया। यह कॉन्ग्रेस इकोसिस्टम की रणनीति पर सवाल खड़ा करता है, जो बार-बार चुनावों में हार को ईवीएम पर दोष देने की कोशिश करता है।

सैय्यद शुजा के झूठे दावे और कॉन्ग्रेस इकोसिस्टम की रणनीति, भारतीय लोकतंत्र और चुनाव प्रक्रिया पर हमला है। चुनाव आयोग ने इस साजिश का पर्दाफाश कर ईवीएम की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए सख्त कदम उठाए हैं। यह मामला कॉन्ग्रेस और उसके समर्थकों की चुनावी नैतिकता पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।

जातिगत आरक्षण पर टिप्पणी करना अपराध नहीं, SC-ST एक्ट लगाना गलत: बॉम्बे हाई कोर्ट, जाति ‘छिपा’ अफेयर करने वाले दलित युवक ने ब्रेकअप होने पर कर दिया था केस

बॉम्बे हाई कोर्ट ने शुक्रवार (29 नवंबर 2024) को एक महिला के खिलाफ दर्ज अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम 1989 (SC/ST एक्ट) के मामला को बंद करने के निर्णय को बरकरार रखा। महिला के खिलाफ आरोप लगाया गया था कि उसने अपने पार्टनर के साथ रोमांटिक संबंध खत्म करते समय उसे ह्वाट्सऐप पर जातिवादी मैसेज किया था।

मामले की सुनवाई करते हुए बॉम्बे हाई कोर्ट की जस्टिस उर्मिला जोशी फाल्के ने कहा कि लड़का और लड़की, दोनों के बीच आदान-प्रदान किए गए ह्वाट्सऐप संदेश में केवल जातिगत आरक्षण के बारे में विचार व्यक्त किए गए थे। इन मैसेज में से कुछ मैसेज ह्वाट्सऐप फॉरवर्ड भी थे। ये मैसेज एससी/एसटी समाज के खिलाफ दुश्मनी या घृणा की भावनाओं को बढ़ावा नहीं देते हैं।

अदालत ने कहा, “पूरी सामग्री को देखने पर पता चलता है कि संदेश केवल जाति आरक्षण प्रणाली के बारे में व्यक्त की गई भावनाओं को दर्शाते हैं। ऐसे संदेशों से कहीं भी यह नहीं पता चलता कि अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के सदस्यों के खिलाफ किसी भी तरह की दुश्मनी या घृणा या दुर्भावना को बढ़ावा देने का कोई प्रयास किया गया था।”

जस्टिस फाल्के ने आगे कहा, “(इस मामले में) अधिक से अधिक यह कहा जा सकता है कि उसका (आरोपित लड़की का) लक्ष्य केवल शिकायतकर्ता ही था। हालाँकि, आरोपित नंबर 1 (लड़की) ने ऐसा कोई शब्द नहीं लिखा, जो अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के सदस्यों के खिलाफ किसी भी तरह की दुर्भावना या दुश्मनी या घृणा को बढ़ावा दे या पैदा करे।”

दरअसल, यह मामला 29 वर्षीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर और 28 वर्षीया महिला के बीच का है। मध्य प्रदेश के रहने वाले दोनों वर्तमान में नागपुर में रहते हैं। इसमें लड़का दलित समाज से ताल्लुक रखता है। कहा जाता है कि इस जोड़े ने अपने परिवारों से छिपकर शादी एक मंदिर में शादी कर ली थी। जब महिला को पता चला कि उसका पार्टनर दलित (चंभर जाति) का है तो रिश्ते में खटास आ गई।

इसके बाद लड़के ने साथी लड़की और उसके पिता के खिलाफ एस/एसटी ऐक्ट में मुकदमा दर्ज कराया। मामले की सुनवाई करते हुए ट्रायल कोर्ट ने 5 अगस्त 2021 को महिला और उसके पिता को आरोप मुक्त कर दिया। इसके बाद शिकायतकर्ता लड़के ने ट्रायल कोर्ट के निर्णय को बॉम्बे हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।

शिकायतकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि मैसेज में समुदायों के बीच नफरत और दुश्मनी पैदा करने का प्रयास किया गया। वहीं, बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि मैसेज में जाति आरक्षण प्रणाली पर महिला ने अपने विचार रखे थे और इसमें कोई आपत्तिजनक भाषा नहीं थी। पीड़िता लड़की के वकील ने कहा कि शिकायत दर्ज कराने में काफी देरी की गई, जिससे छिपे मकसद का पता चलता है।

दोनों पक्षों को सुनने और साक्ष्य की समीक्षा करने के बाद कोर्ट इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि आरोपित महिला द्वारा भेजे गए मैसेज एससी/एसटी अधिनियम की धारा 3(1)(U) के तहत अपराध के लिए कानूनी मानदंडों को पूरा नहीं करते हैं। कोर्ट ने कहा ये कानून अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के खिलाफ दुर्भावना या घृणा को बढ़ावा देने वाली गतिविधियों को संबोधित करता है।

जस्टिस उर्मिला जोशी फाल्के ने कहा, “अत्याचार अधिनियम अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति में सुधार लाने और उन्हें अपमान और उत्पीड़न से बचाने के लिए बनाया गया है। इस प्रकार, कानून का उद्देश्य हमारे समाज के कमजोर वर्गों के खिलाफ किए गए कृत्यों को दंडित करना है, क्योंकि वे एक विशेष समुदाय से संबंधित हैं।” इसके बाद अपील खारिज कर दी गई।

मुस्लिम युवक के शव में मिली जिस बोर की गोली, उसका तमंचा संभल के दंगाइयों के पास से ही मिला: बच्चे-बुजुर्ग-औरतें सब थे हिंसा में शामिल, 7 FIR की डिटेल एक साथ

उत्तर प्रदेश के संभल जिले में रविवार (24 नवंबर 2024) को मुस्लिम भीड़ ने पुलिस पर हमला बोल दिया था। हिंसक भीड़ जामा मस्जिद का सर्वे करने वाली टीम तक पहुँचना चाह रही थी जिसे रोकते हुए कई अधिकारी व जवान घायल हो गए। इस मामले में अब तक प्रशासन की तरफ से कुल 7 FIR दर्ज हुई हैं। इन सभी FIR में हिंसक भीड़ की तादाद 800 से 900 के आसपास बताई गई है। सबने सामूहिक रूप से माना है कि हमलावर प्रशासनिक अधिकारियों की जान लेने पर आमादा थे।

इस मामले में प्रशासन की तरफ से कुल 7 केस दर्ज हुए है। इसमें से 5 मुकदमे संभल कोतवाली जबकि 2 अन्य नखासा थानाक्षेत्र में लिखे गए हैं। संभल कोतवाली क्षेत्र में दर्ज मुकदमों में से 2 केस चौकी इंचार्ज के पद पर तैनात सब इंस्पेक्टरों के साथ 1-1 मुकदमे DSP, SHO और डिप्टी कलेक्टर की तहरीर पर दर्ज हुए हैं। इन मुकदमों में सपा सांसद जियाउर्रहमान बर्क, समाजवादी पार्टी के विधायक इक़बाल महमूद के बेटे सुहैल इकबाल के अलावा 21 अन्य लोग नामजद आरोपित बनाए गए हैं। इसी के साथ 800 से 900 हमलावर अज्ञात में दिखाए गए हैं।

पहली FIR सब इंस्पेक्टर संजीव की

संभल हिंसा की पहली FIR सब इंस्पेक्टर संजीव की तरफ से दर्ज की गई है। वह कोतवाली संभल की एकता चौकी के प्रभारी हैं। उनकी FIR में बताया गया है कि 800 से 900 हमलावरों की भीड़ सर्वे रोकने के लिए आगे बढ़ रही थी। जब उन्हें रोकने की कोशिश की गई तो पत्थरबाजी शुरू हो गई। भीड़ ने मस्जिद में सर्वे नहीं होने देने का एलान कर दिया। इसी भीड़ में से आवाज आई, “हसन, अजीम, सलीम, रिहान, हैदर, वसीम, अयान… पुलिस वालों से सारे हथियार कारतूस छीन लो। इनको आग लगाकर मार डालो। कोई भी बचकर ना जाने पाए।”

भीड़ ने कई पुलिसकर्मियों के हथियार भी छीन लिए जिसमें टीयर गैस सेल और रबर बुलेट शामिल हैं। इसके बाद पुलिसकर्मियों की हत्या के इरादे से भीड़ ने फायरिंग शुरू कर दी। इस पत्थरबाजी में खुद दारोगा संजीव के साथ कुछ अन्य पुलिसकर्मी घायल हो गए। आखिरकार बल प्रयोग करके भीड़ को तितर-बितर किया गया।

दारोगा दीपक राठी की FIR में सांसद और सपा विधायक का बेटा नामजद

दूसरा केस संभल कोतवाली की ही सरथल चौकी प्रभारी दीपक राठी की तरफ से दर्ज करवाया गया है। इस तहरीर में उन्होंने 22 नवंबर को समाजवादी पार्टी के सांसद जियाउर्रहमान के जामा मस्जिद पर दिए गए भड़काऊ भाषण का जिक्र किया है। दीपक राठी ने अपनी तहरीर में यह भी बताया कि हिंसा के दिन भीड़ को समाजवादी पार्टी के विधायक इकबाल महमूद का बेटा सुहैल इक़बाल लीड कर रहा था। इस भीड़ ने पुलिस पर पत्थर फेंके और गोलियाँ भी चलाईं।

दीपक राठी की FIR में यह भी जिक्र है कि हमलावर भीड़ को यह कह कर उकसाया जा रहा था- “चिंता मत करो सांसद जियाउर्रहमान तुम्हारे साथ हैं।”

SHO की तहरीर में हिंसा का विस्तार से जिक्र

इस मामले में तीसरा केस संभल कोतवाली के SHO इंस्पेक्टर अनुज कुमार तोमर ने दर्ज करवाया है। खुद को चश्मदीद बताते हुए उन्होंने लिखा कि हिंसक भीड़ अल्लाहु अकबर का नारा लगा रही थी। इस भीड़ में 14 साल के नाबालिग से लेकर 72 साल तक का बुजुर्ग शामिल थे। भीड़ की तरफ से गोलियाँ चलाई गईं जिसके बाद पुलिस को 4 लोग घायल अवस्था में मिले। इन्हीं चारों की बाद में इलाज के दौरान मौत हो गई थी।

FIR के मुताबिक दंगाइयों के हमले का शिकार रैपिड एक्शन फ़ोर्स के जवान भी बने थे। मुस्लिम समुदाय के कुल 21 लोगों की गिरफ्तारी का भी जिक्र इसी FIR में है। इसमें से कई उपद्रवियों के पास पुलिस से लूटे गए हथियार और कुछ के पास अवैध अस्त्र बरामद हुए। ये अस्त्र 12 बोर और 315 बोर के तमंचे थे। उपद्रवियों ने पुलिस की प्राइवेट और सरकारी गाड़ियों में आगजनी और तोड़फोड़ की थी। आखिर में डीएम से परमिशन मिलने के बाद पुलिस ने बल प्रयोग कर के भीड़ को नियंत्रित किया।

डिप्टी कलेक्टर की अज्ञात हमलावरों के खिलाफ शिकायत

संभल में हिंसक भीड़ को काबू करते हुए डिप्टी कलेक्टर रमेश बाबू भी घायल हो गए थे। पथराव में उनको बाएँ पैर और कुहनी में चोटें आईं है। उन्होंने अपनी तहरीर में 800 – 900 अज्ञात हमलावरों का जिक्र किया है। रमेश बाबू ने बताया कि हिंसक भीड़ न तो अदालत का आदेश मानने के लिए तैयार थी और न ही अधिकारियों की कोई भी बात सुनने के लिए। वो सर्वे रोकने के लिए हिंसा का सहारा लेना चाहते थे। भीड़ को बार-बार निषेधाज्ञा लागू होने की नसीहत भी दी गई लेकिन उन पर कोई फर्क नहीं पड़ा।

DSP पर भी जानलेवा हमला

संभल हिंसा की 5वीं FIR डिप्टी एसपी अनुज चौधरी की तरफ से दर्ज हुई है। अनुज चौधरी के पैर में दंगाइयों की गोली लगी है। उन्होंने खुद पर हुए हमले के बड़ा कोतवाली संभल में तहरीर दी है। तहरीर में अनुज चौधरी ने बताया कि सर्वे कर रही हिंसक भीड़ को रोकने के लिए उन्होने काफी प्रयास किया। इस कोशिश के दौरान भीड़ उनके साथी कई अन्य पुलिसकर्मियों पर हमलावर हो गई।

भीड़ ने लॉ एन्ड आर्डर पूरी तरह से खत्म कर दिया और लोग डर से अपने घरों में कैद हो गए। पथराव कर रही भीड़ को काबू करने के लिए पुलिस तमाम कोशिशें कर रही थी। इसी दौरान भीड़ में से एक अज्ञात व्यक्ति ने गोली चला दी जो अनुज चौधरी के पैर में जा धंसी। घायल अनुज चौधरी को इजाज के लिए अस्पताल में भर्ती करवाया गया।

उपरोक्त 5 FIR कोतवाली संभल नगर में दर्ज हुई हैं। इसके अतिरिक्त 2 अन्य FIR पास के ही थाना नखासा में दर्ज की गई है। यह दोनों केस भी पत्थरबाजी और आगजनी से जुड़े हैं। भीड़ की हिंसा का दायरा इसी बात से समझा जा सकता है कि उसने एक साथ 2 अलग-अलग थानाक्षेत्रों में उपद्रव किया। इन दोनों जगहों पर भीड़ के टारगेट पर पुलिसकर्मी ही थे। दोनों ही स्थानों पर भीड़ ने पुलिस के साथ उनके वाहनों को निशाना बनाया।

सब इंस्पेक्टर शाह फैज़ल पर भी जानलेवा हमला

नखासा थाने में तैनात सब इंस्पेक्टर शाह फैसल पर भी हिंसक भीड़ ने तब हमला किया जब वो विवाद की सूचना पर मौके के लिए रवाना हुए थे। इस दौरान भीड़ ने सबूत मिटाने के लिए CCTV कैमरों को तोड़ डाला। लाठी-डंडों से लैस भीड़ ने पुलिस की एक प्राइवेट और दूसरी निजी बाइक में आग लगा दी। दारोगा से उनकी सरकारी पिस्टल छीनने की कोशिश हुई। नाकाम रहने पर सिपाहियों के कारतूस छीने गए।

अतिरिक्त फ़ोर्स आने के बाद ही भीड़ से घिरे पुलिसकर्मियों की जान बच पाई। इस केस में गुलाबुद्दीन, सुल्तान आरिफ, हसन, मुन्ना, फैज़ान और समद को नामजद किया गया है। इसी के साथ 150 से 200 अन्य हमलावरों को अज्ञात में दिखाया गया है।

पुलिसकर्मी की शिकायत पर महिलाएँ नामजद

संभल हिंसा की 7वीं FIR नखासा थाने में दर्ज हुई है। इस केस में पुलिसकर्मी ने बताया है कि उनके व अन्य हमराहों पर ईंट पत्थरों से हमला किया गया। इस हमले से डर कर दुकानदारों ने शटर गिरा लिए और लोकव्यवस्था पूरी तरह से भंग हो गई थी। इसी तहरीर के आधार पर पुलिस ने रुकैया, फरहाना और नजराना नाम की 3 खातूनों को गिरफ्तार किया है। हिंसा में शामिल अज्ञात हमलावरों की पहचान कर के धरपकड़ के प्रयास किए जा रहे हैं।

उपरोक्त सारे FIR में कई चीजें कॉमन हैं। सब सारे केसों का सार निकाला जाए तो इसमें कुछ बातें साफ तौर पर सामने निकल कर आ रहीं हैं।

निष्कर्ष

भीड़ प्रशसनिक अधिकारियों की कोई भी बात सुनने को तैयार नहीं थी। अलग-अलग गलियों और रास्तों से निकल कर वह मस्जिद की तरफ सधे अंदाज में बढ़ रही थी। इस भीड़ में नाबालिग बच्चों से लेकर 72 साल के बुजुर्ग भी शामिल थे लेकिन अंतर सिर्फ उम्र में था, उनकी सोच में नहीं।

सभी FIR में प्रशासनिक अधिकारियों ने बताया है कि भीड़ ने उन पर हमला किया और मार डालने की कोशिश की। कई स्थानों पर पुलिसकर्मियों के हथियार भी छीनने का प्रयास हुआ। ऐसे में यह भी माना जा सकता है कि कहीं न कहीं किसी न किसी ने भीड़ में शामिल लोगों को बिंदुवार समझाया था कि उनको क्या-क्या और कब करना है।

अल्लाहु अकबर का नारा मुख्यतः किसी स्थान पर बिखरे मुस्लिम समाज को एक जगह लाने के लिए लगाया जाता है। SHO की तहरीर में इस बात का जिक्र है कि भीड़ अल्लाहु अकबर की नारेबाजी कर रही थी। इससे माना जा रहा है कि भीड़ में कुछ लोग इस मकसद से भी शामिल थे कि अंतिम समय तक किसी को भी भटकने नहीं देना है और जो साजिश रची गई है उसको अंजाम तक पहुँचाना है। इसी वजह से बीच-बीच में उत्तेजक नारेबाजी हुई जिसे वायरल वीडियो भी देखा जा सकता है।

सभी FIR में भीड़ द्वारा पत्थर और लाठी-डंडों को हाथियार बनाए जाने का जिक्र किया गया है। इससे स्पष्ट होता है कि हमले से पहले सबको ईंट-पत्थरों के ठिकाने बताए गए होंगे। साथ ही लाठी और डंडों को किसी जगह पर तमाम लोगों के हाथों में पकड़ाया गया होगा। उनको यह भी समझाया गया होगा कि कब और किस पर कैसे हमला करना है।

सिपाहियों से हथियार छीनने वाली भीड़ ने डिप्टी एसपी अनुज चौधरी और SDM पर जानलेवा हमला किया। DSP अनुज चौधरी के खिलाफ काफी पहले से बयानबाजी की जा रही थी। गोली अनुज चौधरी के पैर में लगी और वो सुरक्षित थे। ठीक ऐसे ही डिप्टी कलेक्टर रमेश बाबू को भी मार डालने की नीयत से घेर कर पत्थर बरसाए थे। ये पत्थर उनके बाएँ पैर और कुहनी पर लगे। ऐसे में माना जा सकता है कि भीड़ को पता था कि किसे पीटना है और किसको मार डालना है।

जो तमंचा दंगाई से बरामद हुआ है उसी बोर की गोली से मौतें हुई हैं। मृतकों के शरीर में 315 बोर की गोली मिली है। यह गोली पुलिस प्रयोग नहीं करती है। यह बोर प्राइवेट रायफलों में प्रयोग होता है जो कि अवैध तमंचों में भी इस्तेमाल किया जाता है। आशंका इस बात की है कि पुलिस को बदनाम करने के लिए भीड़ में शामिल कुछ साजिशकर्ताओं ने अपने ही बीच कुछ लोगों को मारने के लिए चिन्हित कर रखा हो।

पुलिस ने सभी FIR में अपनी ओर हल्के बल प्रयोग की बात बताई है। हल्का बल में लाठीचार्ज और वाटर कैनन का इस्तेमाल शामिल होता है। हालत गंभीर होने पर टीयर गैस और पैलेट भी प्रयोग किया जाता है और अंतिम विकल्प के तौर पर भीड़ को तितर-बितर करने के लिए हवाई फायरिंग। ऐसे में यह जाँच का विषय होगा कि पुलिस के इंकार के बाद वो कौन है जो संभल में हुई मौतों का जिम्मेदार है।

पुलिस के FIR की मानें तो इस हिंसा में समाजवादी पार्टी की मिलीभगत साफ़ दिख रही है। FIR के मुताबिक समाजवादी पार्टी का सांसद जियाउर्रहमान बर्क ने हिंसा से 2 दिन पहले जुमे की नमाज के दिन भीड़ को भड़काया था। फिर रविवार को हिंसक भीड़ का नेतृत्व सपा विधायक का बेटा सुहैल इकबाल कर रहा था। वह हमलावरों को सपा सांसद के साथ होने का झांसा दे रहा था। हिंसा के बाद पुलिस कार्रवाई के विरोध में सपा का प्रतिनिधिमंडल भी लोकसभा स्पीकर ओम बिरला से मिला था। सपा के तमाम ट्वीट में दंगाइयों का बचाव और पुलिस के खिलाफ बातें लिखी हुई हैं।

इस हिंसा में आधिकारिक तौर पर 4 मौतों की पुष्टि की गई है। बताया यह भी जा रहा है कि ये मौतें तुर्क और पठानों के बीच चल रही खींचतान की वजह से हुई हैं। इन मौतों के परोक्ष रूप से जिम्मेदार भी हमलावर हैं। उन्होंने लम्बे समय तक सड़कों और गलियों को जाम रखा। पुलिस के वाहनों को आग लगा दी गई। हिंसा खत्म होने के बाद भी सड़कों से पत्थरों को बीन कर रास्ता क्लियर करवाने में प्रशासन को काफी समय लगा। इसी वजह से घायलों को इलाज मिलने में देरी हुई और मौतों का आंकड़ा बढ़ गया।

हेमा कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर SIT ने दर्ज किए यौन शोषण के 35 केस, गवाही देने वालों को मिल रही धमकी: जाँच रुकवाने सुप्रीम कोर्ट पहुँची मलयालम हिरोइन

हेमा कमिटी की रिपोर्ट में सामने आए यौन उत्पीड़न के आरोपों की जाँच कर रही केरल पुलिस की SIT ने 35 मामले दर्ज किए हैं। ये सभी मामले मलयालम फिल्म इंडस्ट्री में काम करने वाले कई लोगों के खिलाफ दर्ज किए गए हैं। जस्टिस हेमा कमिटी को दी गई गवाही के आधार पर इनमें से अधिकांश मामले यौन उत्पीड़न की घटनाओं से संबंधित हैं।

SIT ने मलयालम फिल्म इंडस्ट्री से जुड़ी कुछ बड़ी हस्तियों के खिलाफ तो 5-5 मामले भी दर्ज किए हैं। इन 35 मामलों के अलावा शिकायतकर्ताओं द्वारा किए गए खुलासे के आधार पर अभिनेता सिद्दीकी के खिलाफ दर्ज मामले सहित 24 अलग मामले भी दर्ज किए गए हैं। 35 मामलों में से प्रत्येक को गोपनीय तरीके से दर्ज किया गया है।

यहाँ तक कि इसकी प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) भी सार्वजनिक नहीं की गई है। इसके बाद कुछ लोग इस कार्रवाई के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुँचकर इस पर रोक लगाने की माँग की। इसको लेकर SIT को आशंका है कि इन मामलों के दर्ज होने के कारण ही सुप्रीम कोर्ट में इसकी जाँच को चुनौती दी गई हैं।

दरअसल, फिल्म निर्माता साजिमोन परायिल ने सुप्रीम कोर्ट में एक केरल हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ एक याचिका दाखिल की थी। हाई कोर्ट ने हेमा समिति के निष्कर्षों के आधार पर केस दर्ज करने के लिए कहा था। वहीं, अभिनेत्री माला पार्वती ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर SIT की कार्रवाई को रोकने की माँग की है। उनका कहना है कि वो कार्रवाई नहीं चाहती हैं।

केरल सरकार ने हाल ही में सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि कई महिलाएँ हेमा समिति के सामने गवाही देने के बाद कानूनी कार्रवाई करने के लिए तैयार नहीं है। इसके बावजूद आरोपितों को जवाबदेही से बचने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। हालाँकि कई शिकायतकर्ता शुरू में बयान देने या कानूनी कार्रवाई से हिचकिचा रहे थे, लेकिन SIT ने उन्हें आश्वासन दिया।

SIT के आश्वासन के बाद कई शिकायतकर्ता महिलाएँ नया बयान देने और अदालती कार्रवाई में साथ देने की बात कही है। उधर, हेमा समिति के सामने गवाही देने वालों को धमकी मिल रही है। इस पर हाई कोर्ट ने चिंता जताई है। ‘वीमेन इन सिनेमा कलेक्टिव’ की शिकायत पर हाई कोर्ट ने SIT से नोडल अधिकारी नियुक्त करके इसका समाधान निकालने के लिए कहा है।

दरअसल, हाल में मलयालम फिल्म इंडस्ट्री के काले चेहरे को बयान करने वाली जस्टिस हेमा कमेटी की रिपोर्ट सार्वजनिक हुई थी। इस रिपोर्ट में सैंकड़ों महिलाओं से बात की गई है, जिन्होंने बताया कि कैसे वो इंडस्ट्री में यौन उत्पीड़न झेल रही हैं। यह रिपोर्ट पाँच साल पहले ही केरल सरकार के पास पहुँच गई थी, लेकिन इसे सार्वजनिक इस साल अगस्त में किया गया।

कहा जा रहा है कि आरटीआई के दबाव में आकर केरल सरकार ने 295 पेजों की इस रिपोर्ट को जारी किया है, वो भी तब जब प्रारंभिक ड्राफ्ट से लगभग 60 पन्ने हटा दिए गए। ये रिपोर्ट न केवल फिल्म इंडस्ट्री में महिलाओं पर बीत रही आपबीती को बताती है, बल्कि पुरुषों के उस समूह के राज भी खोलती है जिनको लेकर कहा जाता है कि वो ही इस इंडस्ट्री पर कब्जा किए हुए हैं।

क्या है जस्टिस हेमा कमिटी

साल 2017 में 14 फरवरी को मलयालम फिल्मों की मशहूर अभिनेत्री अपनी कार से कोच्चि जा रही थीं, तभी उन्हें रास्ते में अगवा कर लिया गया। इसके बाद उनकी ही कार में उनका यौन उत्पीड़न हुआ। जब खबरें सामने आईं तो हर कोई सन्न रह गया। पुलिस ने उस समय आरोपितों को गिरफ्तार करके जेल भेज दिया, लेकिन इस घटना ने तमाम हिरोइनों की सुरक्षा पर सवाल उठा दिए। आंदोलन तेज होता गया।

जब सरकार पर दबाव पड़ा तो मजबूरन वारदात के पाँच महीने बाद जुलाई में केरल हाईकोर्ट की रिटायर्ड जस्टिस हेमा की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय कमेटी गठित हुई। इस कमिटी को जो टास्क दिया गया, उसमें पूरी मलयालम फिल्म इंडस्ट्री में महिला कलाकारों, सहयोगियों और अन्य स्टाफ की सेवा शर्तें, काम के बदले समुचित मेहनताना, शूटिंग स्थल पर सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम आदि को लेकर रिपोर्ट देना था।

कमिटी ने सैकड़ों की संख्या में महिला कलाकारों एवं अन्य महिला कर्मियों से बात की। उनके बयान रिकॉर्ड किए और फिर 2019 के आखिर में अपनी रिपोर्ट ले जाकर सीएम विजयन को दी। कमिटी ने इस रिपोर्ट के साथ इस मामले में विस्तृत जाँच के लिए न्यायाधिकरण के गठन की सिफारिश भी की। हालाँकि, केरल के सीएम ने उस पर सुनवाई तो दूर, रिपोर्ट को ही पब्लिक नहीं होने दिया।

विधानसभा में बताया गया कि अगर ये रिपोर्ट सार्वजनिक हुई तो निजता का उल्लंघन होगा। बाद में पाँच आरटीआई कार्यकर्ताओं और मीडियाकर्मियों ने केरल राज्य सूचना आयोग से संपर्क किया। इसके बाद आयोग ने कमिटी के सामने गवाही देने वाली महिलाओं की निजता को बरकरार रखते हुए कंट्रोल्ड रिपोर्ट को रिलीज करने करने की स्वीकृति दे दी। इसके बाद यह रिपोर्ट सामने आई।

क्या-क्या है हेमा कमेटी की रिपोर्ट में

255 पेज की इस रिपोर्ट में बताया गया कि कैसे मलयालम इंडस्ट्री को पुरुषों का एक समूह नियंत्रित करता है। वहीं महिलाएँ यौन उत्पीड़न का शिकार होती हैं और वो भी उन लोगों के द्वारा, जिनका इंडस्ट्री में अच्छा खासा नाम है। इसके अलावा इसमें ये भी बताया गया है कि इंडस्ट्री में शुरुआत से ही महिलाओं के साथ शोषण शुरू हो जाता है। उन्हें कभी ‘अडजस्ट’ करने को कहा जाता है तो कभी ‘कॉम्प्रोमाइज’।

जब महिलाएँ इसका विरोध करती हैं तो उन्हें टॉर्चर झेलना पड़ता है। कभी बेसिक सुविधाओं से वंचित रखा जाता है तो कभी वेतन देने में भेदभाव किया जाता है। कार्यस्थल पर उनके आगे नशे करना, दुर्व्यवहार करना, घटिया कमेंट करना भी सामान्य बात होती हैं। इसके अलावा, कॉन्ट्रैक्ट में काम की जानकारी दिए बिना ही उन्हें नग्न सीन करने के लिए मजबूर किया जाता है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि जाँच के दौरान निर्देशकों, निर्माताओं और अभिनेताओं समेत 15 बड़े शॉट्स से जुड़े एक पुरुष समूह का पता चला है। उनके अनुसार इंडस्ट्री में यही पावर ग्रुप तय करता है कि इंडस्ट्री में किसे रहना चाहिए और किसे फिल्मों में काम देना चाहिए। रिपोर्ट में इन शक्तिशाली समूह को माफिया भी बताया गया है जो अपने खिलाफ आवाज उठाने वालों का करियर बर्बाद कर देते हैं।

ICC के ‘शाह’ बने जय, पाकिस्तान की अकड़ हुई ढीली: चैंपियंस ट्रॉफी के हाइब्रिड मॉडल पर हुआ तैयार, इनकार करने पर भिखमंगा हो जाता PCB

जय शाह ने 1 दिसंबर को अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (ICC) के अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी संभाली और इस पद पर पहुँचने वाले सबसे युवा प्रशासक बन गए। जय शाह के आईसीसी के अध्यक्ष बनते ही, पाकिस्तान ने चैंपियंस ट्रॉफी 2025 को लेकर अपना रुख नरम कर लिया है। पहले वह पूरी मेज़बानी की माँग कर रहा था, लेकिन अब उसने ‘हाइब्रिड मॉडल’ को स्वीकार कर लिया है, जिसमें भारत के मैच न्यूट्रल वेन्यू पर खेले जाएँगे। हालाँकि उसने एक शर्त भी रखी है। इसके बाद लगता है कि ये मामला ICC की बैठक में सुलझ जाएगा।

जय शाह ने संभाली ICC अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी

जय शाह ने 1 दिसंबर को अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (ICC) के अध्यक्ष का पदभार संभाल लिया। वे 36 साल की उम्र में इस पद पर पहुँचने वाले सबसे युवा प्रशासक हैं। उन्होंने न्यूजीलैंड के ग्रेग बार्कले का स्थान लिया है। शाह अगस्त में निर्विरोध चुने गए थे, इस पद पर पहुंचने वाले पाँचवें भारतीय हैं। इससे पहले जगमोहन डालमिया, शरद पवार, एन श्रीनिवासन और शशांक मनोहर इस पद पर रह चुके हैं।

जय शाह ने पद संभालते हुए कहा, “मैं इस जिम्मेदारी को पाकर सम्मानित महसूस कर रहा हूँ। क्रिकेट को और समावेशी और रोमांचक बनाने के लिए मैं आईसीसी और सदस्य देशों के साथ मिलकर काम करूँगा।” उन्होंने महिला क्रिकेट के विकास और लॉस एंजेलिस ओलंपिक 2028 की तैयारियों को प्राथमिकता देने की बात कही।

पाकिस्तान ने चैंपियंस ट्रॉफी के लिए अपनाया नरम रुख

इस बीच, चैंपियंस ट्रॉफी 2025 को लेकर पाकिस्तान ने अपना रुख नरम कर लिया है। पहले वह टूर्नामेंट की पूरी मेजबानी मांग रहा था और भारत के लिए न्यूट्रल वेन्यू की मांग का विरोध कर रहा था। लेकिन अब वह ‘हाइब्रिड मॉडल’ को मानने को तैयार हो गया है। पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड (PCB) के अध्यक्ष मोहसिन नकवी ने कहा, “हमने आईसीसी को अपना पक्ष बताया है। कोशिश है कि हर किसी के लिए फायदेमंद फैसला हो।”

नकवी ने यह भी कहा कि पाकिस्तान क्रिकेट की गरिमा बनाए रखते हुए काम करेगा। हालाँकि, PCB ने माँग की है कि भविष्य में भी ICC के सभी इवेंट्स इसी हाइब्रिड मॉडल पर आधारित हों। पाकिस्तान ने यह भी कहा कि वह अपनी वित्तीय हिस्सेदारी बढ़ाने की माँग करेगा।

भारत में होने हैं तीन बड़े आईसीसी इवेंट

यहाँ ये बताना जरूरी है कि 2031 तक भारत तीन ICC इवेंट्स की मेजबानी करेगा, जिसमें 2026 का T20 वर्ल्ड कप, 2029 की चैंपियंस ट्रॉफी और 2031 का वनडे वर्ल्ड कप शामिल हैं। PCB ने साफ किया है कि वह भारत में खेलने के लिए तैयार नहीं है और न्यूट्रल वेन्यू की माँग करेगा।

वहीं, ICC ने चेतावनी दी है कि अगर पाकिस्तान हाइब्रिड मॉडल नहीं मानता, तो उसे चैंपियंस ट्रॉफी से बाहर कर दिया जाएगा। इस विवाद के चलते टूर्नामेंट का शेड्यूल अब तक जारी नहीं हो सका है। नकवी ने दुबई में बैठक के दौरान बताया कि पाकिस्तान ने चैंपियंस ट्रॉफी की पूरी तैयारी कर ली है और वह टूर्नामेंट की मेजबानी के लिए तैयार है।

हालाँकि अब यह विवाद जल्द ही ICC की कार्यकारी बैठक में सुलझ सकता है। अगर पाकिस्तान अपने रुख पर अडिग रहता है, तो उसे वित्तीय और खेल दोनों स्तरों पर नुकसान हो सकता है। वहीं, भारत ने अपने सुरक्षा कारणों के चलते पाकिस्तान में खेलने से इनकार कर दिया है। अब देखना होगा कि क्रिकेट की यह राजनीति क्या मोड़ लेती है।

अब त्रिपुरा के अस्पतालों में भी नहीं मिलेगा बांग्लादेशियों को इलाज… तिरंगे का अपमान देख हॉस्पिटलों ने किया ऐलान, कहा- देश की गरिमा सबसे पहले

बांग्लादेश में तिरंगा का अपमान होता देखने के बाद अब भारत में इस्लामी कट्टरपंथियों का विरोध शुरू हो गया है। पहले कोलकाता के डॉक्टरों ने मना किया कि वो बांग्लादेशियों का इलाज नहीं करेंगे और अब यही फैसला त्रिपुरा के अस्पतालों ने लिया है।c

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, अगरतला स्थित आईएलएस अस्पताल और कोलकाता के जेएन रे अस्पताल ने यह घोषणा की कि वे अब बांग्लादेशी मरीजों का इलाज नहीं करेंगे।

आईएलएस अस्पताल, जो कि बांग्लादेशी मरीजों के लिए एक लोकप्रिय स्वास्थ्य केंद्र रहा है, ने इस निर्णय की पुष्टि करते हुए कहा कि उन्होंने अपने हेल्प डेस्क भी बंद कर दिए हैं। अस्पताल के मुख्य परिचालन अधिकारी गौतम हजारिका ने बताया कि बांग्लादेशी में हो रही घटनाओं के बाद कुछ प्रदर्शनकारी समूह दबाव बना रहे थे कि बांग्लादेशी नागरिकों को चिकित्सा सेवाएँ प्रदान न की जाएँ। इसी के बाद अस्पताल द्वारा यह फैसला लिया गया।

इसी प्रकार से जेएन रे अस्पताल के अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि उनका यह निर्णय बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदुओं पर हो रहे हमलों और भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के प्रति अपमान को लेकर उठाया गया है। अस्पताल के निदेशक शुभ्रांशु भक्त ने कहा कि देश की गरिमा सर्वोपरि है और चिकित्सा सेवा एक महान पेशा होते हुए भी, देश की सुरक्षा और सम्मान सबसे पहले आता है।

बता दें कि बांग्लादेश में तख्तापलट होने के बाद से हिंदुओं पर हमलों की घटनाओं में लगातार इजाफा हो रहा है और पिछले कुछ दिनों से इस्लामी कट्टरपंथी भारतीय तिरंगे को अपमानित करने पर उतर आए हैं। ऐसे में भारत के लोग भी इन कृत्यों का विरोध कर रहे हैं और अपने ढंग से उनका बहिष्कार कर रहे हैं। त्रिपुरा के अस्पतालों से पहले कोलकाता के टॉप डॉक्टर्स ने साफ कहा था कि वो बांग्लादेशियों का इलाज नहीं करेंगे।