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पाकिस्तान में एक-दूसरे को काट रहे शिया-सुन्नी, अब तक 80+ लाशें गिरी: लखनऊ के एक दंगे से जुड़ी हैं जड़ें, जानिए पूरा मामला

पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वाह सूबे में हाल ही में हुई हिंसा में 80 से अधिक लोगों की मौत हो गई। यह हिंसा इस सूबे के कुर्रम इलाके में हुई। हिंसा शिया और सुन्नी मुस्लिमों के कबीलों की इस लड़ाई के कारण बड़ा आर्थिक नुकसान भी हुआ। कई जगह दुकानें जलाई गईं। हिंसा के कारण बड़ी संख्या में परिवार यह इलाका छोड़ रहे हैं। इस इलाके की सीमा अफगानिस्तान से मिलती है। यहाँ इस लड़ाई में कबीलों के अलावा अलग-अलग लड़ाके भी शामिल हैं। शिया-सुन्नी के बीच इस हिंसा के पीछे कबीलाई लड़ाई के अलावा जमीन का विवाद भी बताया जाता है।

अभी क्या हुआ?

21 नवम्बर, 2024 को खैबर पख्तूनख्वाह के कुर्रम जिले के पारचिनार इलाके में एक जगह पर गाड़ियों के काफिलों पर हमला हुआ। यह काफिले राजधानी पेशावर से पारचिनार और पारचिनार से पेशावर की तरफ जा रहे थे। इन काफिलों में शिया लोग सवार थे। काफिलों में कई सवारी वाली वैन चल रहीं थीं। इनके साथ कुछ सुरक्षाबल के लोग भी थे।

यह काफिले जैसे ही निचले कुर्रम के इलाके में पहुँचे, इन पर आसपास की पहाड़ियों से हमला कर दिया गया। भारी फायरिंग और रॉकेट दागने के कारण इस हमले में कम से कम 43 लोगों की मौत हो गई। मरने वालों में महिलाएँ और बच्चे भी शामिल थे। यह हमला सुन्नी लड़ाकों ने किया, ऐसा बताया गया है।

हमले में बड़ी संख्या में लोग घायल भी हैं। शियाओं पर हुए हमले के पीछे 12 अक्टूबर, 2024 को हुआ एक पुराना हमला कारण बताया गया है। इस हमले में 15 सुन्नी लोगों की मौत हुई थी। शियाओं पर इस ताजा हमले के बाद इलाके में हिंसा का दौर चालू हो गया।

हमले से गुस्साए शिया कबीलों ने इसके बाद सुन्नी कबीलों को निशाना बनाना चालू कर दिया। शिया लड़ाकों ने 22 नवम्बर, 2024 को बगान बाजार और कुर्रम के निचले इलाकों को निशाना बनाया। यहाँ एक बाजार में लगभग 200 दुकानें जला दी गईं।

बड़ी संख्या में सुन्नी लोगों को अगवा किया गया। हमले में सुन्नियों की दुकानों और उनके परिवारों को निशाना बनाया गया। यह सिलसिला रविवार तक जारी रहा। इस पूरी हिंसा में 80 से अधिक मारे गए जबकि बड़ी संख्या में लोग घायल हुए। मरने वालों में ज्यादा तादाद शियाओं की है।

4 साल में 1600+ मौतें

पाकिस्तान के कुर्रम इलाके में शिया-सुन्नी की लड़ाई कोई नई बात नहीं है। पारचिनार, पाकिस्तान के उन कुछ इलाकों में है, जहाँ शिया आबादी सुन्नी से अधिक या उनके बराबर है। रिपोर्ट बताती हैं कि यहाँ शियाओं की आबादी लगभग 45% है। इसमें वह कुर्रम के ऊपरी इलाकों में बहुसंख्यक हैं। हालाँकि, निचले इलाकों में सुन्नी मजबूत हैं और यही इलाका इसे बाकी देश से जोड़ता है।

बीबीसी उर्दू की एक रिपोर्ट कहती है कि 2007-11 के बीच यहाँ शिया-सुन्नी की लड़ाई के कारण 1600 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं। यह आँकड़ा सरकारी है। बीबीसी उर्दू की रिपोर्ट कहती है कि असल आँकड़ा कहीं ज्यादा है। घायल होने वालों की संख्या 5000 से भी अधिक बताई जाती है।

नवम्बर में हुए इस ताजा हमले से पहले अक्टूबर में यहाँ हिंसा हुई थी। इसमें भी दर्जनों लोग मारे गए थे। उससे पहले सितम्बर में यहाँ 46 लोग मारे गए थे। जुलाई, 2024 में भी यहाँ 30 से अधिक मौतें हुई थीं। यह लड़ाई कई दशकों से जारी है। लड़ाई में शिया-सुन्नी कबीलों के अलावा आतंकी समूहों के शामिल होने की बात भी कही जाती है।

लखनऊ से है इस लड़ाई का कनेक्शन

लड़ाई का मूल कारण 1930 से चली आ रही दुश्मनी बताई जा रही है। 1930 के दशक में तब अविभाजित भारत में लखनऊ में शिया-सुन्नी दंगे हुए थे। लखनऊ में शिया-सुन्नी दंगों का पुराना इतिहास है। इस दंगे के दौरान शिया मौलानाओं की अपील पर पारचिनार इलाके से भी शिया लोग लड़ने के लिए लखनऊ गए थे। इन्हें रोकने के लिए यहाँ के सुन्नी मौलानाओं ने अपील की थी।

इस लड़ाई की जड़ वहीं से पड़ गई थी। इसके अलावा यहाँ रहने वाले शिया और सुन्नी कबीलाई लोग हैं। इन इलाकों में सर के बदले सर का नियम चलता है। बन्दूक रखने को यहाँ सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। कबीलाई लड़ाई में एक और मामला जमीन से जुड़ा हुआ है।

बीबीसी उर्दू की एक रिपोर्ट बताती है कि 1890 में अंग्रेजों के शासनकाल के दौरान यहाँ पर यह कबीले बसाए गए थे। इस इलाके में उसी हिसाब से जमीन भी आवंटित की गई थी। इसी जमीन पर कब्जा शिया का होगा या सुन्नी का, इसी के विवाद में लगातार हिंसा होती है।

जिन जमीनों को लेकर लड़ाई है, उनके कोई भी आधिकारिक दस्तावेज मौजूद नहीं हैं। ऐसे में मालिकाना हक़ को लेकर लड़ाई होती रहती है। जमीन पर लड़ाई इसलिए भी है, क्योंकि यही जमीन इस इलाके में उर्वरा है। यहाँ चावल, फल और बाकी चीजों की खेती होती है।

कबीलाई और दूरस्थ इलाके होने के कारण यहाँ आय के और कोई साधन नहीं है। ऐसे में जमीन की महत्ता और भी बढ़ जाती है। जमीन की यह लड़ाई पारचिनार के कम से कम 10 गाँवों में है। एक शिया परिवार की दूसरे सुन्नी परिवार से लड़ाई भी कबीलाई जंग का रूप ले लेती है। हालाँकि, मसला सिर्फ जमीन को लेकर ही नहीं है।

आपसी मतभेद भी बड़ा मामला

शिया और सुन्नी के बीच लड़ाई का मामला जमीन तक सीमित ना होकर पाकिस्तान की सीमा भी लाँघता है। गौरतलब है कि पाकिस्तान में अधिकांश आबादी सुन्नी है। जिस इलाके में यह लड़ाई हो रही है, वह तीन तरफ से अफगानिस्तान से घिरा है और यह इलाके तालिबान जैसे आतंकी संगठनों का गढ़ हैं। इन आतंकी संगठनों में सुन्नी आतंकी ही शामिल हैं।

अफगानिस्तान में 1979 से चालू हुए जिहाद के बाद इस इलाके में भी सुन्नी आतंकियों की आमद हुई है। शिया कबीलों का आरोप है कि यहाँ के रहने वाले सुन्नी बाहरी आतंकियों को बुला कर उन्हें निशाना बनाते हैं। हमले 1930 के बाद 1960, 1970 और 1990 के दशक में भी हुए हैं।

1971 में यहाँ एक मीनार के निर्माण पर शिया और सुन्नी में लड़ाई हुई थी। 1977 में एक मस्जिद के इमाम की हत्या के बाद भी हिंसा हुई। 2007 में यहाँ चालू हुए दंगों में लगभग 2000 लोग मारे गए थे। इस इलाके के कुछ गाँवों पर अल कायदा और तालिबान ने भी कब्जा करने का प्रयास किया।

अब क्या है स्थिति?

21 नवम्बर से चली आ रही यह लड़ाई 24 नवम्बर को 7 दिनों के लिए शांत हुई। खैबर पख्तूनख्वाह के मुख्य सचिव, कानून मंत्री और पुलिस मुखिया ने यहाँ मौके पर जाकर सुन्नी-शिया कबीलों से बातचीत की और समझौता करवाया। दोनों समूह 7 दिनों के लिए लड़ाई रोकने को राजी हो गए हैं। दोनों समूहों ने एक दूसरे के बंधकों को लौटाने पर भी सहमति दी है। सरकार ने इस मामले में रिपोर्ट भी माँगी है। सरकार के प्रतिनिधियों ने उम्मीद जताई है कि आगे यहाँ हिंसा देखने को नहीं मिलेगी। यह समझौता कितने दिन टिकता है, यह भविष्य के गर्भ में है।

संभल में घरों से निकले हथियार, छतों से पत्थरबाजी करने वाली औरतें भी गिरफ्तार: 2 मृतकों के शरीर में मिली वो गोलियाँ जो पुलिस नहीं करती इस्तेमाल

उत्तर प्रदेश के संभल जिले में रविवार (24 नवंबर 2024) को जामा मस्जिद का सर्वे करने गई प्रशासनिक टीम पर मुस्लिम भीड़ ने हमला कर दिया था। इस हमले में अब तक चार लोगों की मौत हो चुकी है। 28 पुलिसकर्मी घायल हुए हैं जिसमें से कुछ की हालत गंभीर है। पुलिस ने दबिश दे कर कई उपद्रवियों को गिरफ्तार किया है जिसमें महिलाएँ भी शामिल हैं। शहर में इंटरनेट बंद कर दिया गया है। 2 थानों को मिला कर अब तक कुल 5 FIR दर्ज हुई है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक ,अब तक संभल में कुल 4 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है। इसमें 3 मृतकों के नाम नईम, बिलाल और नोमान हैं। इन सभी को पत्थरबाजी में शामिल बताया जा रहा है। मिल रही जानकारी के मुताबिक, इसमें से 2 लोगों को 315 बोर की गोली लगी है। एक रिटायर्ड पुलिस अधिकारी ने ऑपइंडिया को बताया कि पुलिस 315 बोर की गोली का इस्तेमाल नहीं करती है। पुलिस की पिस्टल या रायफल में से कोई भी हथियार इस बोर का नहीं होता है।

हिंसा के बाद से पुलिस लगातार दबिश दे रही है। अब तक 20 से अधिक हमलावरों को गिरफ्तार किया गया है जिसमें 2 महिलाएँ भी शामिल हैं। इन हमलावरों के घरों से हथियार भी बरामद हुए है। इसमें एक नए टाइप का भी हथियार है जिसमें दोनों तरफ से धार बनी हुई है। इन सभी के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) और गैंगस्टर एक्ट में कार्रवाई की जाएगी। हिंसा में शामिल तमाम अन्य लोगों की भी पहचान कर गिरफ्तारी के प्रयास जारी हैं।

SP आईपीएस कृष्ण कुमार विश्नोई ने बताया कि जिले की संभल तहसील क्षेत्र में एक दिन के लिए इंटरनेट सेवाएँ बाधित की गईं हैं। जिले में किसी भी बाहरी व्यक्ति अथवा नेता के बिना प्रशासनिक अनुमति के आवागमन पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। कक्षा 12 तक के स्कूलों को भी सोमवार तक के लिए बंद कर दिया गया है। इस घटना पर मुरादाबाद परिक्षेत्र के कमिश्नर IAS आंजनेय सिंह ने मृतकों के परिजनों से पूछा है कि उनके घर का सदस्य पत्थरबाजी करने क्यों गया था ?

आंजनेय सिंह ने यह भी कहा कि पुलिस पर पत्थर के साथ गोलियाँ भी बरसाई गईं हैं। उन्होंने बताया कि पुलिस की तरफ से आँसू गैस के गोले छोड़े गए हैं। लगाए जा रहे आरोपों के संबंध में जाँच के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने आगे बताया कि पूरी रिकार्डिंग पुलिस के पास मौजूद है। उन्होंने कहा कि पत्थरबाज कोई धर्म-पुण्य का काम करने नहीं गए थे। जिले में फ़िलहाल के लिए ईंट और गिट्टी आदि की खरीदारी पर रोक लगा दी गई है।

जिले के सभी निवासियों को साफ़ हिदायत दी गई है कि अगर उनकी छतों पर कोई भी पत्थर और ज्वलनशील पदार्थ मिला तो कानूनी कार्रवाई की जाएगी। नगर पालिका को भी निर्देश मिला है कि सड़क पर बिखरे किसी भी सामान को फ़ौरन जब्त करे। इस हिंसा में लगभग 28 पुलिसकर्मी घायल हुए हैं, जिनका इलाज करवाया जा रहा है। एक घायलों में SP के PRO और DSP अनुज विश्नोई भी शामिल हैं। एक कांस्टेबल के सिर में गंभीर चोट लगी है।

इस पूरे मामले में अब तक कुल 4 FIR दर्ज हुई हैं। इसमें से 3 FIR कोतवाली संभल जबकि एक अन्य नखासा थाने में हुई है। कोतवाली संभल में घायल SDM, SHO और 2 सब इंस्पेक्टरों की तहरीर पर मुकदमे दर्ज किए गए है। वहीं नखासा थाने में भी एक केस पुलिस की तहरीर पर दर्ज हुआ है। यहाँ हमलावरों ने पुलिस पर पत्थर फेंके थे। इसी दौरान पुलिस की एक बाइक को भी जला दिया गया था।

बाप पुलिस का दारोगा, बेटा दिल्ली-UP-बिहार में करता था हथियारों की सप्लाई: STF ने मेरठ में बंदूकों के साथ दबोचा, AK-47 की भी कर चुका है डिलीवरी

उत्तर प्रदेश पुलिस की स्पेशल टास्क फ़ोर्स (STF) ने हथियारों की तस्करी के एक बड़े रैकेट का खुलासा किया है। STF ने मेरठ से रोहन नाम के युवक को गिरफ्तार किया है। रोहन हथियारों की तस्करी करने वालेगिरोह का मुखिया बताया जा रहा है। उसके पिता UP पुलिस में सब इंस्पेक्टर हैं और वर्तमान में मथुरा में तैनात हैं। रोहन के पास से 17 बंदूकें और 700 कारतूस बरामद हुए हैं। यह तस्करी पंजाब से की जा रही थी। शनिवार (23 नवंबर 2024) को की गई इस कार्रवाई के बाद अब STF गिरोह के बाकी सदस्यों की तलाश में जुट गई है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक घटना मेरठ के कांकरखेड़ा थानाक्षेत्र की है। STF के पुलिस अधीक्षक बृजेश सिंह ने इस कार्रवाई की पुष्टि करते हुए मामले की जानकारी दी है। उन्होंने बताया कि STF को काफी पहले से पंजाब से अवैध हथियारों की तस्करी के इनपुट मिल रहे थे। यह तस्करी पूरे पश्चिम उत्तर प्रदेश में की जाती थी। इसी इनपुट पर STF की टीमें लम्बे समय से तस्करों की तलाश में जुटी थी।

शनिवार की आधी रात STF को एक स्कार्पिओ वाहन में तस्करों के मूवमेंट की सूचना मिली। इस इनपुट पर पुलिस ने घेराबंदी की। सूचना सही पाई गई और वाहन की घेराबंदी कर के एक युवक को गिरफ्तार कर लिया गया। इसी वाहन में सवार 4 अन्य लोग फरार होने में कामयाब रहे। स्कार्पिओ की तलाशी ली गई तो उसमें 17 बंदूकें और 700 कारतूस मिले। पुलिस ने गाड़ी और हथियारों को जब्त कर लिया।

पूछताछ में पकड़े गए युवक ने अपना नाम रोहन बताया। रोहन बागपत के थानाक्षेत्र बड़ौत का निवासी है। उसके पिता का नाम राकेश सिंह है जो इस समय मथुरा में बतौर सब इंस्पेक्टर तैनात हैं। पूछताछ में रोहन ने अपने द्वारा गिरोह बना कर अवैध हथियारों की तस्करी करना स्वीकार किया। उसने यह भी माना कि वो AK 47 तक की तस्करी कर चुका है। यह AK 47 रोहन के साथ अनिल बालियान से शामली पुलिस ने बरामद की थी। ये हथियार उसे पंजाब से मिलते थे। इन हथियारों को रोहन पूरे UP सहित दिल्ली और बिहार में भी सप्लाई करता था।

रोहन के पास से बरामद बंदूकों में सिंगल बैरल की 5 और 12 दोनाली बंदूकें बरामद हुई हैं। इसी के साथ 12 बोर के 700 कारतूस भी मिले हैं। ये बंदूकें उसने अमृतसर जिले के अटारी रोड स्थित मराठा गन हाउस से खरीदी थीं। गन हाउस का मालिक रोहन के गिरोह को फर्जी रसीदें काट कर 40 से 50 हजार रुपए प्रति बंदूक के हिसाब से बेचा करता था। यह बंदूकें रोहन आगे 80 हजार से 1 लाख रुपए के बीच बेचता था। फर्जी रसीदें अनिल बालियान नाम का व्यक्ति अपने पास रखता था।

अब तक हुई जाँच में पता चला है कि रोहन के गिरोह का नेटवर्क कई राज्यों में फैला हुआ है। रोहन का गिरोह मेरठ के शारिक व रिजवान गैंग का भी करीबी माना जाता है। इन दोनों गिरोहों में हथियारों की खरीद-फरोख्त पहले भी हो चुकी है। हथियारों के खरीदारों में बागपत के दीपक भूरा, विपिन और पिंटू दाढी आदि के नाम प्रकाश में आए हैं। गिरफ्तारी के दौरान भी बरामद हुए हथियारों को रोहन किसी को बेचने जा रहा था।

पकड़ा गया रोहन पोस्ट ग्रेजुएट है। उसने लम्बे समय तक अपने पिता की तरह सब इंस्पेक्टर की नौकरी के लिए प्रयास किया। असफल रहने पर वह ठेकेदारी करने लगा। तब उसकी मुलाकत अनिल बालियान उर्फ़ पंजी से हुई। अनिल ने ही रोहन को पैसों का लालच दे कर हथियारों की तस्करी सिखाई। काम में एक्सपर्ट हो जाने के बाद रोहन को ग्राहकों को खोजने और उनसे डील फाइनल करने का टास्क मिला था। फ़िलहाल STF इस गिरोह के फरार चल रहे अन्य सदस्यों की गिरफ्तारी के प्रयास में जुटी हुई है।

60% मुस्लिम, कॉन्ग्रेस के हुसैन परिवार का दबदबा… कुंदरकी जैसी ही है सामागुरी में BJP की जीत भी: असम-मेघालय में NDA का क्लीन स्वीप

बीजेपी की अगुवाई वाले नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस (एनडीए) ने असम और मेघालय के उपचुनावों में जबरदस्त प्रदर्शन करते हुए सभी 6 सीटों पर जीत दर्ज की। असम में 5 सीटें बीजेपी, असम गण परिषद (अगप) और यूनाइटेड पीपल्स पार्टी-लिबरल (यूपीपी-लिबरल) ने जीतीं, जबकि मेघालय में एनडीए के घटक दल नेशनल पीपल्स पार्टी (एनपीपी) ने एक सीट अपने नाम की।

असम की सामागुरी सीट पर बीजेपी को मिली जीत खास चर्चा का विषय रही। यह सीट मुस्लिम बहुल क्षेत्र में आती है, और इसे कॉन्ग्रेस का गढ़ माना जाता था। जैसे उत्तर प्रदेश के कुंदरकी में बीजेपी की अप्रत्याशित जीत ने सबको चौंकाया, वैसे ही सामागुरी में बीजेपी की सफलता ने राजनीतिक विश्लेषकों को हैरान किया।

दरअसल, सामागुरी सीट नागाँव जिले में आती है। यहाँ के सामागुरी, रुपाही और ढींग जैसे इलाकों में 60 से 92 प्रतिशत तक मुस्लिम वोटर हैं। साल 2011 के जनसंख्या के आँकड़े भी इसकी गवाही देते हैं। इस सीट पर 1981 से अब तक सिर्फ एक बार (1996) को छोड़कर मुस्लिमों को ही जीत मिली। रकीबुल हुसैन 2001, 2006, 2011, 2016 और 2021 में भी जीत हासिल कर चुके थे, इस साल के लोकसभा चुनाव में रकीबुल ने धुबरी सीट से जीत हासिल की, जिसकी वजह से यहाँ उप-चुनाव हुआ। कॉन्ग्रेस ने रकीबुल के बेटे और NSUI के सचिव-कोषाध्यक्ष तंजिल हुसैन को टिकट दिया था, लेकिन तंजिल को बुरी तरह से हार झेलनी पड़ी।

मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने सामागुरी में बीजेपी की जीत को असम की राजनीति में ‘मील का पत्थर’ करार दिया। बीजेपी के प्रत्याशी दिप्लु रंजन सरमा ने कॉन्ग्रेस के उम्मीदवार तंजील हुसैन को 24,501 वोटों से हराया। बीजेपी ने इस सीट से अल्पसंख्यक और परिवारवादी राजनीति का गुरूर तोड़ते हुए कॉन्ग्रेस के गढ़ को ध्वस्त कर दिया।

मुख्यमंत्री सरमा ने कहा कि शुरुआत में सामागुरी को ‘मुश्किल’ सीट माना गया था, लेकिन हाल के लोकसभा चुनावों में मुस्लिम बहुल करीमगंज सीट पर बीजेपी की जीत ने यह दिखा दिया कि अल्पसंख्यक समुदाय में भी पार्टी की पैठ बढ़ रही है। उन्होंने कहा, “करीमगंज में हमारी जीत ने यह साबित किया कि हर धर्म के वोट से चुनाव जीता जा सकता है। सामागुरी की जीत उसी कड़ी का हिस्सा है।”

सरमा ने कॉन्ग्रेस पर तुष्टिकरण की राजनीति करने का आरोप लगाते हुए कहा कि बीजेपी ने ‘किसी का तुष्टिकरण नहीं, बल्कि न्याय सबके लिए’ की नीति अपनाई। उन्होंने बताया कि पार्टी ने जहाँ एक ओर अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई की, वहीं दूसरी ओर अल्पसंख्यक समुदाय की 25,000 लड़कियों को ‘निजुत मोइना’ योजना का लाभ भी दिया। उन्होंने इसे बीजेपी की ‘संतुलित’ नीति करार दिया।

सामागुरी की जीत के साथ-साथ असम में बीजेपी ने बेहाली और ढोलाई सीटें भी जीतीं। असम गण परिषद ने बोंगाईगाँव और यूपीपी-लिबरल ने सिदली सीट पर जीत दर्ज की। इन चुनावी नतीजों ने असम में बीजेपी और एनडीए की मजबूत स्थिति को और पुख्ता किया है।

सामागुरी और करीमगंज जैसी सीटों पर बीजेपी की जीत दिखाती है कि बीजेपी की रणनीति धीरे-धीरे अल्पसंख्यक बहुल इलाकों में भी असर दिखा रही है। मुख्यमंत्री सरमा ने कहा, “असम की राजनीति अब इसी दिशा में आगे बढ़ेगी। यह साफ है कि आने वाले चुनावों में बीजेपी अपनी ‘न्याय सबके लिए’ नीति के दम पर और मजबूत स्थिति में उभरेगी।”

दिल पर पत्थर रखो या पहाड़ आरफा बीबी, पर सच तो यही है कि मंदिरों पर गढ़ी गई हैं मस्जिदें, तुम्हारे पुरखे भी हैं ‘महादेव’

उत्तर प्रदेश के संभल में हिंसा मामले को इस्लामी पत्रकार आरफा खानुम शेरवानी ने नया मोड़ देकर अपनी हिंदू घृणा एक बार फिर खुलकर दिखाई है। उन्होंने बड़ी चालाकी से अपने ट्वीट में मस्जिद में सर्वे करने गई टीम पर हमले की बात को छिपाते हुए सोशल मीडिया पर ये फैलाया है कि ये हिंसा इसलिए हुई क्योंकि ‘संघी’ अब हर मस्जिद के नीचे शिवलिंग खोजने लगे हैं और अदालतें भी मस्जिदों का सर्वे कराने के लिए आदेश दे रही हैं।

अपने एक ट्वीट में आरफा खानुम शेरवानी ने अयोध्या इस्लामी कट्टरपंथियों को महान दिखाते हुए उनकी पत्थरबाजी और हिंसा को जायज दिखाने का प्रयास किया है। आरफा ने अपने ट्वीट में लिखा, “भारत के मुसलमानों से भारत की सुप्रीम कोर्ट का वादा था अयोध्या सिर्फ़ एक अपवाद होगा। मुसलमानों ने दिल पर पत्थर रखकर अपने देश के अमन-चैन के लिए एक मस्जिद को क़ुर्बान किया। अब संघी अदालतें ‘हर मस्जिद के नीचे शिवलिंग’ ढूँढने को हरी झंडी दे रही हैं। सुप्रीम कोर्ट का वादा भी झूठा निकला?”

अपने अगले ट्वीट में आरफा खानुम शेरवानी ने पुलिस को विलेन के तौर पर पेश करते हुए ऐसे दिखाया कि पुलिस बेवजह मुस्लिमों पर बंदूक ताने हुए हैं और मुस्लिम नहीं बल्कि हिंदू जय श्रीराम कह कहकर हमला कर रहे हैं। आरफा ने लिखा, “‘चलाओ बे गोली चलाओ’ संघी जज एक घंटे के भीतर सैंकड़ों साल पुरानी मस्जिदों का ‘सर्वे’ करा ले रहे हैं। क़ानून की किताब नहीं जय श्रीराम के नारों के साथ ‘सर्वे टीम’ मस्जिद की ओर कूच कर रही है। संघी पुलिस गोली चला रही है। क्या यही है हिंसा और नाइंसाफ़ी की ज़मीन पर खड़ा विश्वगुरु?”

इस्लामी पत्रकार आरफा खानुम शेरवानी के इन दोनों ट्वीटों का तथ्यों से कोई लेना-देना नहीं है, उनका मकसद सिर्फ और सिर्फ एक मजहबी भीड़ के उन्माद का बचाव करना है और अपनी कुंठा निकालना है। वो अपने ट्वीट में ये तो बता रही हैं कि पुलिस ने गोली चलाई, लेकिन ये नहीं बता रहीं कि कैसे भीड़ ने छतों से पत्थरबाजी की और पुलिस पर हमले किए।

देख सकते हैं कि एक तरफ वो ट्वीट में वो ये बता रही हैं मुस्लिमों ने अपनी मस्जिद कुर्बान की, जबकि हकीकत यह है कि अयोध्या रामजन्मभूमि को हिंदुओं ने 30 साल की कानूनी लड़ाई लड़ने के बाद जीता, किसी मुस्लिम ने उस भूमि को देश में अमन-चैन की खातिर हिंदुओं को नहीं दिया। उस भूमि के लिए कारसेवकों ने अपना बलिदान दिया, अपना खून बहाया, तब जाकर उन्हें वापस उसी स्थान पर अपना मंदिर मिल पाया।

गौरतलब है कि संभल मामले में सिर्फ इस्लामी पत्रकार ही नहीं बल्कि इस्लामी नेता भी हिंसा का आरोप हिंदुओं पर मढ़ने से पीछे नहीं हट रहे हैं। पूर्व सांसद शाहिद सिद्दीकी ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में ये कहा है कि अगर ये लोग हर मस्जिद के नीचे शिवलिंग खोजेंगे तो देश और समाज में कोई शांति नहीं रह जाएगी। शायद ऐसे पत्रकार और नेताओं के मुताबिक हिंदुओं को आज के समय में अपने कानूनी अधिकारों का प्रयोग करके भी अपने धर्म और धर्मस्थलों के लिए बात नहीं करनी चाहिए और न ही ये बताना चाहिए कि कैसे इस्लामी बर्बरता के चलते हजारों मंदिर ध्वस्त किए गए, उनके मलबे पर मस्जिद खड़े किए गए। इन्हें डर है कि अगर ऐसा होता रहा तो सिर्फ मस्जिदों की दीवारों से हिंदू मंदिर के प्रतीक ही नहीं निकलेंगे बल्कि ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ की हकीकत भी सामने आ जाएगी।

UP की जिस सीट पर 64% मुस्लिम, वहाँ BJP के ‘रामवीर’ ने सबकी करवा दी जमानत जब्त: जानिए क्यों है यह जीत खास, क्या है कुंदरकी का वह गणित जिससे खिला कमल

महाराष्ट्र में भाजपा की अगुवाई वाली महायुति गठबंधन के प्रचंड जीत के बीच, अगर किसी विधानसभा सीट की सबसे अधिक चर्चा हो रही है तो वह है उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जिले की कुंदरकी सीट। उत्तर प्रदेश के जिन सात सीटों पर उपचुनाव थे, उनमें से एक सीट यह भी थी। इस सीट की खासियत ये है कि यह मुस्लिम बहुल इलाका है और यहाँ एक हिंदू क्षत्रिय ने चुनाव जीता है। इस सीट की एक और खासियत है। इस सीट पर या या सहसपुर का क्षत्रिय राजपरिवार चुनाव जीता है या फिर मुस्लिमों की तुर्क जाति।

इस बार ठाकुर रामवीर सिंह ने यहाँ जीत का परचम लहराकर भाजपा की 31 साल के वनवास को दूर किया है। इस सीट की खास बात ये है कि यहाँ पर मुस्लिमों की आबादी लगभग 64 प्रतिशत है। वहीं, 36 प्रतिशत में अन्य लोग हैं। मुस्लिमों की इतनी अधिक आबादी होने के बाद ठाकुर रामवीर सिंह को कुल 1,70,371 वोट मिले। उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वी समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार मोहम्मद रिजवान को 1,44,791 वोटों से हराया है। रिजवान को सिर्फ 25,580 वोट ही मिले।

कुंदरकी सीट पर अगर कुल विरोधियों को मिले मत को भी जोड़ दिया जाए तो वो ठाकुर रामवीर सिंह की जीत वाले मत से आधे भी नहीं हैं। यहाँ कुल 11 मुस्लिम उम्मीदवार खड़े थे। इनके बीच अकेले ठाुकर रामवीर सिंह हिंदू उम्मीदवार थे। अगर इन सभी मुस्लिम उम्मीदवारों के वोट को जोड़ भी दिया जाए तो भी वे 50 हजार के आँकड़े को पूरा नहीं कर पाते। यहाँ तीसरे नंबर पर चंद्रशेखर आजाद की पार्टी आजाद समाज पार्टी के चाँद बाबू थे, जिन्हें 14,201 वोट मिले।

चौथे स्थान पर AIMIM के मोहम्मद वारिस को कुल 8,111 मत मिले। बाकी उम्मीदवार चार दहाई का अंक भी नहीं छू पाए। हाँ, बसपा के रहफतुल्लाह को जरूर 1,099 मत मिले। बाकी लोग तीन अंकों में ही सिमट कर रह गए। अब सवाल ये है कि मुस्लिम बहुल इस सीट पर एक हिंदू उम्मीदवार कैसे जीता, वह भी लगभग डेढ़ लाख वोटों के अंतर से। इसके पीछे ठाकुर रामवीर सिंह की हर समाज में स्वीकार्यता एवं विश्वसनीयता और जातीय समीकरण प्रमुख कारण रहा।

अगर कुंदरकी सीट के इतिहास पर नजर डाले तो यहाँ रहे 13 विधायकों (वर्तमान उपचुनाव को छोड़कर) में 9 तुर्क मुस्लिम विधायक चुने गए। बाकी के चार विधायक सहसपुर बिलारी राजघराने के क्षत्रिय रहे हैं। अगर ठाकुर रामवीर सिंह को छोड़ दें तो इन लोगों के अलावा कुंदरकी सीट से कोई विधायक नहीं बना है। इस सीट पर तुर्क मुस्लिमों का वर्चस्व है। जब भी मुस्लिम प्रतिनिधित्व की बात आती है तो उसका प्रतिनिधित्व सिर्फ तुर्क मुस्लिम ही करते हैं, दूसरी मुस्लिम जातियों के नहीं।

साल 1974 में सहसपुर राजपरिवार की महारानी इंद्रमोहिनी सिंह यहाँ से चुनाव जीती थीं। साल 1985 में कॉन्ग्रेस के टिकट पर महारानी इंद्रमोहिनी की बेटी राजकुमारी रीना कुमारी यहाँ से विधायक बनीं। साल 1989 में जनता दल के टिकट पर और साल 1993 में भाजपा के टिकट पर महारानी इंद्रमोहिनी के बेटे महाराजा चंद्रविजय सिंह यहाँ से विधायक बने। इन सभी चुनावों में राजपरिवार ने तुर्क मुस्लिमों को हराया था। बाकी के चुनावों तुर्क मुस्लिम के उम्मीदवार ही जीते।

इस सीट से हाजी अकबर हुसैन जनता पार्टी से साल 1977 में, राजनारायण की पार्टी से साल 1980 में, जनता दल से साल 1991 में और बसपा से साल 1996 एवं 2007 में विधायक बने। अकबर तुर्क जाति से ताल्लुक रखते थे। इसके बाद समाजवादी पार्टी के टिकट पर यहाँ से हाजी मोहम्मद रिजवान साल 2002, साल 2012 और साल 2017 में इस सीट से विधायक बने। ये भी मुस्लिमों की तुर्क जाति से हैं। साल 2022 के विधानसभा चुनाव में यहाँ से तुर्क नेता जियाउर्रहमान बर्क जीते।

अगर यहाँ के जातीय समीकरणों की बात करें तो कुंदरकी सीट पर मतदाताओं की कुल संख्या लगभग 3.84 लाख है। इनमें मुस्लिम वोटरों की संख्या 2.45 लाख है। वहीं, हिंदू वोटरों की संख्या 1.39 लाख है। मुस्लिमों की 2.45 आबादी में 70 हजार तुर्क मुस्लिम हैं। बाकी 1.75 लाख वैसे मुस्लिम हैं, जो हिंदू से धर्मांतरित हुए हैं। इनमें सबसे अधिक 45 हजार राजपूत मुस्लिमों की संख्या है। ऐसे में यहाँ मसला तुर्क मुस्लिम बनाम राजपूत मुस्लिम का था। इसमें राजपूत मुस्लिमों को एक राजपूत नेता का साथ मिल गया और वह आसानी से जीत गया।

भाजपा ने इसी समीकरण को ध्यान में रखकर ठाकुर रामवीर सिंह को टिकट दिया था। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का ‘बँटेंगे तो कटेंगे’ का नारा पूरे देश में गूँज रहा था, तब भी यहाँ सर्वसमाज की बात हो रही थी। ठाकुर रामवीर सिंह राजपूत मुस्लिमों को अपने पालेे में मिलाने में दिन-रात एक कर दी। वे लोगों के साथ गली-गली मुहल्ले-मुहल्ले घूमे। उन्होंने विश्वास दिलाने के लिए नमाजी टोपी और अरबी गमछा तक लिया। इस तरह उन्होंने राजपूत मुस्लिमों में विश्वास दिलाया कि वे उनके लिए सदैव खड़े रहेंगे।

राजपूत मुस्लिम समाज से आने वाले यूपी भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चा के अध्यक्ष कुंवर बासित अली गाँव-गाँव में बैठकें कीं। उन्होंने नारा दिया- ‘न दूरी है न खाई है, ठाकुर रामवीर सिंह हमारे भाई हैं’। इस नारे का असर भी दिखा और हिंदू समुदाय के साथ-साथ राजपूत मुस्लिमों ने भी ठाकुर रामवीर सिंह के पक्ष में एकतरफा वोटिंग की, जिसका सुखद परिणाम आज 31 साल बाद भाजपा को देखने को मिला।

जातीय समीकरण के अलावा, ठाकुर रामवीर सिंह की छवि ने भी उनकी जीत में महत्वपूर्ण योगदान दिया। वे लगातार दो बार से भाजपा उम्मीदवार के रूप में हार का मुँह देखा है। उन्होंने तीसरी बार में आखिरकार जीत दर्ज की है। जब वे विधायक निर्वाचित नहीं हुए थे, तब वे लोगों की समस्याओं का समाधान निकालने के लिए आगे रहते थे। लोगों के लिए सड़कें, गलियाँ आदि बनवाते थे। किसी तरह की मदद माँगने वाले कोई भी लोग उनके यहाँ से खाली हाथ नहीं जाते थे।

ठाकुर रामवीर सिंह की सहज उपलब्धता और तुर्क बनाम राजपूत मुस्लिम के समीकरण ने इस जीत में बड़ी भूमिका अता की है। यह समीकरण अब भाजपा के लिए बेहद सफल और महत्वपूर्ण हो गया है। बोहरा, पसमांदा और मुस्लिम महिलाओं के एक गुट को अपनी तरफ मिलाने के बाद भाजपा और आरएसएस हिंदू से धर्मांतरित हुए मुस्लिमों को अपनी तरफ मिलाने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। देश में मुस्लिम आबादी का सर्वाधिक संख्या धर्मांतरित है। इनमें भी क्षत्रिय समाज की आबादी सबसे अधिक है।

राजपूत मुस्लिम वो लोग हैं, जिन्होंने मजबूरी वश इस्लाम अपना लिया। हालाँकि, अधिकांश लोग अपनी पुरानी पहचान से आज भी जुड़े हैं। वहीं, तुर्क मुस्लिम वो हैं, जिनके पूर्वज आक्रमणकारियों के साथ तुर्की, अरब आदि जगहों से उनके सेवक या सैनिक के रूप में यहाँ आए थे। देश में ब्राह्मण, जाट, गुर्जर, दलित, पिछड़े, क्षत्रिय आदि लोगों के मुस्लिम मत में धर्मांतरण का बड़ा हिस्सा आज भी मौजूद है, जो कश्मीर से कन्याकुमारी तक में दिख जाता है। तुर्क, शेख या सैयद मुस्लिमों की संख्या बेहद कम है।

अब भाजपा एवं संघ इस समीकरण को पूरे देश में लागू करेगी। संघ के वरिष्ठ नेता ने बताया कि इस समीकरण पर संघ का ध्यान तब गया, जब इस साल लोकसभा चुनावों के दौरान क्षत्रिय समाज अपने राजा-महाराजाओं के अपमान के विरोध में आंदोलन कर रहा था। उस दौरान धर्मांतरित हुए क्षत्रिय समाज के मुस्लिम उनका पूरा सहयोग कर रहे थे। इनमें राजस्थान से लेकर उत्तर प्रदेश और बिहार तक राजपूत मुस्लिम शामिल थे। वे इस विरोध में क्षत्रिय समाज के साथ कदम से कदम मिलाया। उस नेता का कहना था कि इस नए समीकरण ने भाजपा को रणनीतिक राह दिखाई।

इस सहयोग ने कॉन्ग्रेस के इमरान मसूद को सहारनपुर से लोकसभा सीट जीतने में मदद की थी। इसी समीकरण को ध्यान में रखते हुए सीसामऊ उपचुनाव में नसीम सोलंकी भी जीती हैं। वे पूरे चुनाव मंदिर गई हैं और लोगों को बार-बार याद दिलाया कि उनके पूर्वज हिंदू थे और क्षत्रिय मसाज से ताल्लुक रखते थे। उन्होंने अपनी मुस्लिम पहचान के बावजूद राजपूत मुस्लिम पहचान को उजागर किया और आखिरकार जीतने में कामयाब रहीं। अब देखना है कि अब नया राजनीतिक समीकरण इस देश में किस तरह का बदलाव लाता है।

वादा अच्छी जिंदगी का, पर भोजन को भी मोहताज: इस्लामी मुल्कों में घुट रही पंजाब की लड़कियों की सिसकियाँ, कुछ ही लौट पाती हैं घर

नौकरी के नाम पर खाड़ी देशों में भेजी गई 9 लड़कियों ने स्वदेश वापस आ कर 28 सितंबर 2024 को राज्यसभा सांसद बलवीर सिंह सींचेवाल से मुलाकात की। इन सभी को वापस लाने में बलवीर सिंह ने काफी मदद की थी। इस दौरान उन्होंने बताया कि खाड़ी देशों में उनको शारीरिक और मानसिक यातना के दौर से गुजरना पड़ा था। इस मुलाकात के बाद यह तथ्य प्रकाश में आया कि पंजाब और उसके आसपास एक रैकेट काफी एक्टिव है जो लड़कियों को विदेशों में नौकरी दिलाने के नाम पर खाड़ी देशों में भेज रहा है।

ओमान, ईराक, सीरिया जैसे देशों से वापस लौटी इन महिलाओं ने बताया कि उनको वहाँ अमानवीय यातनाएँ दी जाती हैं। इन यातनाओं में 20 से 22 घंटों तक काम करवाना, ठीक से खाना-पीना न देना, वापस जाने की माँग पर मारपीट करना और तहखाने में रखना जैसी प्रताड़ना शामिल हैं। इन महिलाओं पर पुरुषों की मालिश और निकाह का दबाव जैसे अनैतिक कामों का दबाव दिया जाता था। लड़कियों को दलदल में धकेल पर उन्हें भेजने वाले दलाल भी मुँह फेर लेते हैं।

आइए जानते हैं कि यह रैकेट कैसे काम करता है किस तरह से भोली-भाली लड़कियाँ इनके चंगुल में फँस जाती हैं।

बरनाला की महिला फँसी ओमान में

दलालों के इस रैकेट की शिकारों में एक महिला पंजाब के बरनाला की भी है। तलाकशुदा व 1 बच्चे की माँ इस महिला के परिजनों ने कर्ज ले कर उसे ओमान भेजा था। महिला अपने बच्चे को मायके में छोड़ कर गई थी। वहाँ जाने के कुछ ही समय बाद महिला के साथ प्रताड़ना का दौर शुरू हो गया था। ओमान में महिला से पैसों की उगाही शुरू कर दी गई। उगाही के लिए ओमान में उसे चोरी के झूठे केस में फँसाने की धमकी भी मिल रही थी।

अक्टूबर 2024 में पीड़िता ने एक रिकॉर्डिंग भेज कर बताया था कि ओमान में हर दिन उसकी पिटाई होती है। कई बार तो पूरे हफ्ते परिजनों से बात भी नहीं करने दी जाती थी। पीड़िता ने खुद को आत्महत्या के लिए मजबूर बताते हुए भारत सरकार से भी मदद की गुहार लगाई थी। महिला की माँ ने बताया कि उनकी बेटी को ओमान भेजने में एक रिश्तेदार ने मध्यस्थता निभाई थी।

दुबई में मनदीप कौर पर फर्जी केस

सितंबर 2024 में भारत दुबई से मनदीप कौर भारत लौटी थीं। वह 5 वर्षों से दुबई में रहती थी। मनदीप कौर मूलतः पंजाब के बरनाला की हैं। उनको दुबई में ड्रग्स के फर्जी केस में फँसा कर प्रताड़ित किया गया। मनदीप कौर के पास पैसे भी खत्म हो गए थे। आख़िरकार राजनैतिक प्रयासों से मनदीप कौर को वापस भारत लाया गया।

ओमान में गीता की बुरी तरह से पिटाई

मनदीप कौर के ही साथ ओमान से गीता को भी नवंबर 2024 में ओमान से भारत लाया गया था। घर की खराब आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए गीता एजेंटों के चक्कर में आ गईं। उनको ओमान भेज दिया गया था। ओमान में गीता को बंधक बना लिया गया। यहाँ गीता की कई बार पिटाई हुई। उनसे लगातर काम करवाया जाता था। गीता को ठीक से खाना-पीना भी नहीं मिलता था।

बताया जॉर्डन, भेज दिया सीरिया

पंजाब के मोगा की रहने वाली एक 32 वर्षीया महिला को जॉर्डन में नौकरी का झाँसा दे कर एजेंटों ने सीरिया भिजवा दिया था। महिला को टूरिस्ट वीजा पर भेजा गया था। एजेंटों ने महिला को अच्छा खाना और बढ़िया सैलरी का झूठा वादा किया था। पीड़िता ने बताया कि एक बहुत बड़े परिवार के लिए उनसे सुबह 4 बजे से रात 12 बजे तक उनसे काम करवाया जाता था। महज एक समय खाना दिया जाता था। जब महिला ने एजेंट से अपनी वापसी की गुहार लगाई तो उस से 2 लाख रुपयों की डिमांड की गई।

2021 में दुबई से वापस आई थीं 8 लड़कियाँ

जनवरी 2021 में दुबई में फँसी 8 लड़कियों को भारत लाया गया था। ये लड़कियाँ पंजाब के अलग-अलग हिस्सों की हैं। इन सभी को अच्छी सैलरी का लालच दे कर एजेंट अपने साथ खाड़ी देश ले गए थे। बाद में सभी को मारा-पीटा जाने लगा। ये सभी लड़कियाँ हिन्दू और सिख धर्म से हैं जो कि नवाँशहर, जालंधर, अमृतसर, लुधियाना, होशियारपुर, कपूरथला और मुक्तसर साहिब की रहने वाली हैं। वापसी के बाद इन लड़कियों ने बताया था कि वहाँ अभी भी भारत के तमाम प्रदेशों की 200 लड़कियाँ फँसी हुई हैं।

शेख ने कराया काम और किया शारीरिक शोषण

अक्टूबर 2022 में पंजाब के मुक्तसर साहिब की एक महिला के ओमान में फँसे होने की जानकारी मिली थी। तब महिला ने अपना वीडियो बना कर खुद को वहाँ से निकालने की गुहार लगाई थी। लगभग 31 वर्षीया इस महिला का आरोप था कि उसे एक शेख के घर काम पर रखा गया है। शेख दिन-रात न सिर्फ जानवरों की तरह उस से काम करवाता था बल्कि अक्सर महिला का यौन शोषण भी करता था।

रात में मालिश का दबाव

जालंधर निवासिनी 35 वर्षीया महिला ने सांसद संत बलवीर सिंह से आपबीती बताई। उसे एक एजेंट ने ओमान के मस्कट भेज दिया था। इस पीड़िता को श्रीलंका और नेपाल सहित कई अन्य देशों की लड़कियों के साथ एक कमरे में बंद कर दिया गया था। यहाँ से पीड़िता को एक परिवार में भेजा गया जिसमें 50 से अधिक सदस्य थे। ये परिवार ऊँट तक खाता था। यही खाना पीड़िता को भी खाने का दबाव बनाया जाता था। हालाँकि महिला इस से इंकार कर देती थी और चावल के साथ नमक खा कर गुजारा कर रही थी।

महिला को हरदम CCTV की नजर में रखा जाता था। जब पीड़िता ने यहाँ काम करने से मना कर दिया तब उसे एजेंट ने अपने ऑफिस में बंधक बना लिया। इस ऑफिस के बॉस ने पीड़िता सहित अन्य लड़कियों पर रात में अपनी मालिश करने का दबाव बनाया। जब पीड़िता ने ऑफिस की एक अन्य महिला स्टा से मदद माँगी तो उसे मालिश करवाने वाले व्यक्ति से निकाह करने की नसीहत दी गई।

ऊपर के कुछ उदाहरण तो महज एक बानगी भर हैं। ऐसी तमाम पीड़िताएँ भी हैं जो अभी खाड़ी देशों में प्रताड़ना झेल रहीं हैं। आइए जानते हैं कि ये महिलाएँ एजेंटों के चक्कर में पड़ कर खाड़ी देशों में कैसे पहुँच जाती हैं।

गरीब और जरूरतमंद महिलाएँ टारगेट पर

मानव तस्करी की तरह संचालित इस नेटवर्क को चलाने वाले एजेंट खासतौर पर गरीब महिलाओं को अपना टारगेट बनाते हैं। इनके निशाने पर कक्षा 10 और 12 पास महिलाएँ ज्यादातर होती हैं। गरीब और अनपढ़ महिलाओं की तलाश में दलालों का नेटवर्क ग्रामीण इलाकों में ज्यादा सक्रिय रहता है। ये लोग न सिर्फ जरूरतमंद महिलाओं बल्कि कैरियर बनाने की इच्छा रखने वाली लड़कियों को भी विदेश में अच्छी नौकरी और वेतन के साथ लक्जरी लाइफ के सपने दिखाते हैं।

पंजाब पुलिस के NRI विंग के ADG प्रवीण कुमार जागरण से बताते हैं कि एजेंटों के चक्कर में आने के बाद महिलाओं के विदेश जाने की जानकारी उन तक नहीं पहुँच पाती। इसी वजह से पुलिस यह तस्दीक नहीं कर पाती कि एजेंट जिस महिला से जो वादा कर के विदेश भेज रहे हैं वो सही है या महज झाँसा। हालाँकि जब इन महिलाओं के विदेश में किसी दिकक्त में फँस जाने की सूचना पुलिस को मिलती है, तो नियमानुसार कार्रवाई की जाती है।

विदेश भेजने के नाम पर उगाही

गाँव और शहरों में फैले एजेंट जब किसी महिला को अच्छी नौकरी व बेहतर जिंदगी का भरोसा दे कर अपने झाँसे में ले लेते हैं, तब उनसे उगाही का दौर शुरू हो जाता है। शुरुआती तौर पर पासपोर्ट, वीजा, हवाई जहाज का खर्च आदि बता कर इस महिलाओं से 60 से 70 हजार रुपए ऐंठ लिए जाते हैं। पहले से गरीब महिलाएँ ये पैसे अक्सर अपनी जमीन और गहने आदि बेच कर भरती हैं। उन्हें यह उम्मीद होती है कि विदेश में मिलने वाले अच्छे पैसों से वो जल्द ही अपना कर्ज उतार लेंगी।

सांसद बलवीर सिंह सींचेवाल के मुताबिक जिन कागजी प्रक्रियाओं की लगत अधिकतम 5 हजार है उसे ये एजेंट 60 से 70 हजार रुपये का बता कर कई गुना ज्यादा पैसे ऐंठ रहे हैं। अब तक पीड़िताओं के बयानों के आधार पर पता चला है कि एजेंट उन्हें शॉपिंग मॉल, ब्यूटी पॉर्लर और ऑफिसों में काम दिलाने का झाँसा देते हैं। घरेलू काम भी कई बार बहुत बड़े घरानों के लिए बताया जाता है।

विदेशी पैसों की चकाचौंध से आकर्षण

पंजाब के अलग-अलग शहरों व गाँवों के तमाम लोग विदेशों में बसे हुए हैं। इसमें से अधिकतर कनाडा में शिफ्ट हुए हैं। कईयों ने विदेशों में अपने कारोबार आदि जमा लिए हैं। इस से उनके पूरे परिवार की जीवन शैली में काफी बदलाव आया है। यह बदलाव महंगी गाड़ियों, ऊँची कोठियों आदि के तौर पर दिखाई देता है। यही बदलाव बाकी लोगों को भी विदेश में जा कर पैसे कमाने की दिशा में आगे बढ़ा देता है। एक अनुमान के मुताबिक खाड़ी देशों में फँसी 10 में से महज 3 महिलाएँ ही सही सलामत अपने घरों को वापस लौट पाती हैं।

विदेश में दूतावास ही सहारा

जालंधर में तैनात एक पुलिस अधिकारी ने जागरण को बताया कि वीडियो में फँसी उन्ही लड़कियों की सूचना पुलिस तक आ पाती है जो दूतावास से सम्पर्क करती हैं। दूतावास इन मामलों को आधिकारिक तौर पर भारत में भेजता है जिसके बाद स्थानीय प्रशासन सक्रिय होता है। यहाँ ध्यान रखने योग्य यह है कि जागरूकता की कमी और कई अन्य कारणों से दूसरे देशों में फँसी लड़कियाँ दूतावास तक अपनी शिकायत नहीं पहुँचा पाती हैं। उनकी मदद में विलम्ब इसी वजह से होता है।

पंजाब पुलिस के पास कोई ऐसा डाटा नहीं है जो विदेश में फँसी लड़कियों के सटीक आँकड़े दे सके। हालाँकि विदेश में फंसे लोगों के लिए भारत सरकार ने आधिकारिक ई मेल भी जारी किया है। विदेश में इस तरह की किसी भी मुसीबत में फँसे व्यक्ति के बारे में [email protected] पर मेल कर के मदद माँगी जा सकती है। इसके अलावा टोल फ्री नंबर 110041119051100 पर भी कॉल कर के सहायता माँगी जा सकती है।

पंजाब सरकार में महिला एवं बाल विकास मंत्री बलजीत कौर ने मानव तस्करी के बढ़ते इन मामलों का संज्ञान लिया है। उन्होंने कहा है विदेश में फँसी उन लड़कियों की जानकारी जुटाई जा रही है जो पंजाब से गई हैं। बलजीत कौर ने आगे बताया कि सरकार युवाओं को जागरूक करने के साथ इस मामले में जल्द ही नई पॉलिसी लाने जा रही है। उन परिजनों से भी सम्पर्क करने का प्रयास किया जा रहा है जिनके घर की महिलाएँ विदेश में हैं।

पिछले 2 वर्षों में वापस लौटीं 100 से अधिक महिलाएँ

एक आँकड़े के अनुसार पिछले 2 वर्षों में खाड़ी देशों से लगभग 104 महिलाएँ पंजाब वापस लौटी हैं। इसमें सबसे अधिक संख्या जालंधर से है। यहाँ से 23 महिलाएँ वापस लौट कर आई हैं। दूसरे और तीसरे नंबर पर कपूरथला और फ़िरोज़पुर है। यहाँ से क्रमशः 19 और 14 महिलाएँ लौट कर स्वदेश आई हैं। पंजाब के ही तरनतारन से 10 व मोगा से 8 महिलाएँ वापस लौटी हैं। लुधियाना, अमृतसर, गुरदासपुर और बरनाला से 2-2 महिलाएँ खाड़ी देशों से पंजाब वापस आई हैं।

इसी के साथ धरमकोट, फरीदकोट, रूपनगर, फजिल्का, नवाँशहर और मुक्तसर साहिब से एक-एक महिला वापस लौट कर पंजाब आई है। इन तमाम महिलाओं को सीरिया, ईराक, ओमान और दुबई आदि जगहों पर भेजी गईं थीं। इन सभी ने कहीं न कही खुद को प्रताड़ना का शिकार बताया। इन महिलाओं ने अभी खाड़ी देशों में कई अन्य लड़कियों के फँसे होने का दावा किया है।

जामा मस्जिद की गलियों में कहाँ से आकर बसी दंगाई भीड़, कैसे जमा किए इतने पत्थर… किसकी साजिश में जला संभल?

अदालत के आदेश पर 19 नवंबर 2024 को जब पहली बार संभल की जामा मस्जिद का सर्वे हुआ था, तब भी आसपास की छतों पर लोग जमा हो गए थे। लेकिन सर्वे में कोई व्यवधान नहीं आया। पर 24 नवंबर को जैसे ही टीम दोबारा सर्वे के लिए मस्जिद पहुँची तो कट्टरपंथी मुस्लिमों की भीड़ ने धावा बोल दिया। कुछ इस तरीके से हमला किया गया जैसे दंगाई इस हिंसा के लिए तैयार बैठे थे।

पत्थरबाजी हुई। आगजनी की गई। फायरिंग तक हुई जिसमें पुलिसकर्मी घायल भी हुए हैं। 3 लोगों की मौत हुई है। पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा। आँसू गैस के गोले दागने पड़े। वरिष्ठ अधिकारियों को मौके पर आकर मोर्चा सँभालना पड़ा। आखिर 5 दिनों ही ऐसा क्या हुआ कि संभल में उपद्रव हो गया? इतनी बड़ी संख्या में भीड़ कहाँ से आई? इतने पत्थर एक साथ कैसे बरसे कि उससे सड़क पट गई, ट्रैक्टरों में पत्थरों को लादकर ले जाना पड़ा?

जब इन सवालों के आप जवाब तलाशते हैं तो 19 से 24 नवंबर के बीच ही 22 नवंबर भी पड़ता है, जिस दिन जुमे पर इसी जामा मस्जिद में सामान्य से अधिक जमावड़ा देखने को मिला था। इसी बीच में सपा के स्थानीय सांसद जियाउर्रहमान बर्क का ‘मस्जिद ही रहेगी’ वाला वह बयान आया, जिसने मुस्लिमों को एक अदालती कार्रवाई के खिलाफ उकसाने का काम किया। 24 नवंबर की हिंसा के बाद भी पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव सहित सपा के अन्य नेता घटनाक्रम को इस तरह से पेश कर रहे हैं जैसे पत्थरबाजी करने वाली इस्लामी भीड़ पीड़ित हो। जैसे बिना किसी अदालती आदेश के मस्जिद का सर्वे किया जा रहा था।

मुस्लिमों के वाहनों को छोड़ दिया, पुलिस लिखी गाड़ियों में ही लगाई आग

हिंसक भीड़ ने जामा मस्जिद के पास खड़ी गाड़ियों में आग लगा दी। संभल के पुलिस अधीक्षक आईपीएस कृष्ण कुमार विश्नोई ने बताया कि इस हिंसा को पूरी तरह से सोची-समझी साजिश के तहत अंजाम दिया गया है। इस्लामी भीड़ ने उन बाइकों और कारों में आग लगाई जिस पर पुलिस लिखा हुआ था या उसका स्टीकर चिपका था। इन्ही वाहनों के बगल कई मुस्लिमों के वाहन भी खड़े थे, जिसे भीड़ ने हाथ भी नहीं लगाया।

पुलिस अधीक्षक बताया है कि घटना की वीडियोग्राफ़ी ड्रोन व अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से करवाई गई है। हमलावरों पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत भी केस दर्ज होगा। कई हमलावरों को हिरासत में लिया गया है। उनसे पूछताछ के साथ उनके खिलाफ आगे की कानूनी कार्रवाई की प्रक्रिया जारी है।

पथराव में कई पुलिसकर्मी घायल हुए हैं। इनमें पुलिस अधीक्षक मुरादाबाद के जनसम्पर्क अधिकारी (PRO), डिप्टी कलेक्टर (SDM) और डिप्टी एसपी (DSP) अनुज चौधरी शामिल हैं। हिंसा में नईम अहमद, बिलाल अंसारी और एक अन्य की मौत होने की खबर है। मौत कैसे हुई इस बारे में अभी तक कोई आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है।

अचानक ही नहीं जमा हुई हिंसक भीड़

हिंसक भीड़ में करीब 2 हजार दंगाई शामिल बताए जा रहे हैं। हिंसा के वायरल वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि भीड़ किसी भी हालत में मस्जिद में सर्वे कर रही टीम तक पहुँचना चाहती थी। रास्ते में पुलिस ने पहले बैरिकेड और बाद में समझा-बुझाकर भी भीड़ को रोकने की कोशिश की। यहाँ बड़ा सवाल ये है कि हजारों की भीड़ को एक ही दिशा और टारगेट की तरफ पीछे से कौन बढ़ा रहा था?

भीड़ लगभग एक ही तरह का नारा लगा रही थी। उनके पहनावे भी कमोबेश एक जैसे थे। इन सभी के हमले का तरीका भी एक जैसा ही था। छतों और गलियों में दीवालों की ओट ले कर पत्थरबाजी भी एकदम प्रशिक्षित तरीके से भीड़ कर रही थी। यही कारण है कि शुरुआत में पुलिस को भी पीछे हटना पड़ा। हमले के अंदाज से साफ लग रहा था कि कोई इसे कंट्रोल कर रहा है।

कहाँ से आए इतने पत्थर

हिंसक भीड़ के हमले से गलियाँ और सड़कें पत्थरों से पट गईं। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में देखा जा सकता है कि नगर निगम का ट्रैक्टर ईंट के टुकड़े और पत्थरों को ट्रालियों में भर रहा है। अगर पूरे हिंसाग्रस्त इलाके के पत्थरों को जमा किया जाए तो यह ट्रक भर से ज्यादा निकलेगा। ऐसे में सवाल बनता है कि ये पत्थर कब से जमा किए जा रहे थे और इन्हें लाया कहाँ से गया। खबर लिखे जाने तक 4 ट्राली ईंट-पत्थर बरामद किए जा चुके थे।

इन ईंट व पत्थरों को बाकायदा काट-काट कर साइज दिया गया था। वह साइज जिससे पुलिस पर फेंकने में आसानी रहे। इतना ही नहीं, हिंसक भीड़ में बुजुर्ग से लेकर नाबालिग बच्चों तक के हाथों में ईंट-पत्थर दिख रहे थे।

सपा सांसद को पुलिस की तैनाती से थी दिक्कत, नमाज़ में भारी भीड़

सर्वे के बाद संभल के सांसद जियाउर्रहमान बर्क ने कहा था, “यहाँ पर मस्जिद है, मस्जिद थी और मस्जिद ही रहेगी। हम चाहते हैं कि देश का माहौल खराब न हो।” इशारों में जियाउर्रहमान ने विष्णु शंकर जैन को सम्बोधित करते हुए कहा था, “कुछ लोग बाहर से आकर यहाँ का माहौल खराब करना चाहते हैं।”

इसी बीच शुक्रवार (22 नवम्बर, 2024) को इसी जामा मस्जिद में भारी भीड़ देखी गई थी। इसी मस्जिद में नमाज पढ़ने वाले एक वकील ने मीडिया को बताया था कि सामान्य तौर पर मस्जिद में 500-600 लोग जुमे की नमाज पढ़ने आते थे। लेकिन मुकदमे और सर्वे के बाद जुमे को 4000 से अधिक लोग पहुँचे। आखिर इस जुमे में ऐसा क्या था जो 10 गुना अधिक लोग जुट गए?

शुक्रवार को ही जुमे की नमाज़ के दौरान सपा सांसद जियाउर्रहमान बर्क ने इस्लाम को ‘शांति का मजहब’ बताते हुए पुलिस की तैनाती पर आपत्ति जताई थी।

अखिलेश ने दोहराई मुजफ्फरनगर वाली हरकत

हिंसा के बाद सपा प्रमुख अखिलेश ने हमलावरों का बचाव करते हुए प्रशासन पर ही सारा दोष मढ़ने की कोशिश की है। मुजफ्फरनगर की ही तरफ इस बार भी उन्होंने पूरी हिंसा की एक छोटी क्लिप काट कर प्रशासन को ही गुनहगार ठहराने की कोशिश की।

शायद सपा नेताओं की यह बयानबाजी ही है जिसके कारण पत्थरबाज युवकों को समझाने की कोशिश करते हुए एसपी कृष्ण कुमार विश्नाेई ने कहा कि बेटा अपना भविष्य खराब ना करो। बार-बार उन्होंने इन युवकों से कहा, “अपना भविष्य बर्बाद मत करो इन नेताओं के चक्कर में।”

महाराष्ट्र में वोट जिहाद की थी तैयारी, पर RSS ने हिंदुओं को बँटने नहीं दिया: जमीन पर अतुल लिमये ने सबको रखा ‘एक’, नतीजों में महायुति रही ‘सेफ’

महाराष्ट्र में भाजपा के नेतृत्व वाली महायुति गठबंधन ने जो ऐतिहासिक जीत हासिल की है, उसकी चौतरफा चर्चा हो रही है। इसमें सबसे अधिक चर्चा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की ‘बँटेंगे तो कटेंगे’, ‘एक रहेंगे तो नेक रहेंगे’ और उनकी महाराष्ट्र में 11 रैलियों की चर्चा हो रही है। महाराष्ट्र में उन्होंने 17 उम्मीदवारों के लिए प्रचार किया। इनमें से 15 उम्मीदवारों की जीत हुई। इनमें से एक सीट अकोला पश्चिम पर भाजपा सिर्फ 1283 वोटों से हारी है। वहीं, झारखंड में सीएम योगी ने कुल 18 सीटों पर चुनाव प्रचार किया। इनमें से 8 सीटों पर जीत मिलीं। वहीं, कई ऐसी सीटें रहीं, जहाँ विपक्षी सिर्फ कुछ हजार वोटों से जीते।

इसके अलावा, पीएम मोदी की ताबड़-तोड़ रैली और ‘एक हैं तो सेफ हैं’ जैसे नारे, ‘लाडली बहना योजना’, भाजपा सरकार की विकासवादी नीति और विपक्ष की तुष्टिकरण की राजनीति महायुति के जीत के प्रमुख कारक रहे। अगर इन सबको प्रमुख कारकों को एक तरफ रख दें और महाराष्ट्र चुनाव के दौरान राजनीतिक दलों की रणनीति पर गहन नजर डालें तो इसके पीछे एक प्रमुख कारण विपक्ष का ‘वोट जिहाद’ को समर्थन और इसके खिलाफ बना माहौल भी था। वोट जिहाद के असर को कम करने में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने बड़ी भूमिका निभाई।

हाल ही में हुए लोकसभा चुनावों में महाविकास अघाड़ी (MVA) को बड़ी सफलता मिली थी। राज्य की कुल 48 सीटों में से 14 पर इनके उम्मीदवारों ने जीत हासिल की थी। भाजपा ने इसे वोट जिहाद बताया था। भाजपा नेताओं ने आरोप लगाया था कि लोकसभा में इन 14 हिंदू उम्मीदवारों को हराने के लिए विशेष समुदाय (मुस्लिम) के लोगों ने एकजुट होकर वोट दिया था। अक्टूबर में देवेंद्र फडणवीस ने कहा था कि कुछ लोग सोचते हैं कि वे संगठित होकर हिंदुत्व को नीचे गिरा सकते हैं। इसके बाद राज्य में ‘वोट जिहाद बनाम धर्मयुद्ध’ का नारा निकल चला पड़ा।

दरअसल, भाजपा ने वोट जिहाद की जिस बात को उठाया था, वो अकारण नहीं था। इसकी सत्यता की पुष्टि करने चुनाव के दौरान कई तरह घटनाएँ सामने आईं। महाराष्ट्र के मालेगाँव में 12 लड़कों के खातों में 90 करोड़ रुपए आ गए। ये खाते धोखे से खुलवाए गए थे। भाजपा ने कहा कि इन पैसों को वोट जिहाद में इस्तेमाल में करने कि लिए भेजा गया था। मामले की जाँच हुई तो पैसे भेजने वाला व्यक्ति महाराष्ट्र का एक मुस्लिम व्यापारी सिराज अहमद निकला। बाद में ED ने उसके यहाँ छापेमारी की और 125 करोड़ रुपए की गड़बड़ी सामने आई।

भाजपा नेताओं ने आरोप लगाए कि वोट जिहाद के बड़े पैमाने पर पैसों का इस्तेमाल किया गया। इसके अलावा, अवैध रूप से महाराष्ट्र में रहने वाले बांग्लादेशी और रोहिंग्या मुस्लिमों को वोटर कार्ड बनवाए गए और उन्हें महायुति के खिलाफ वोट डालने के लिए कहा गया। महाराष्ट्र में विधानसभा चुनावों से पहले मुस्लिम वोटों को बीजेपी के खिलाफ लामबंद करने के लिए 180 से ज्यादा एनजीओ काम कर रहे थे। इन एनजीओ ने केवल मुंबई में 9 लाख मुस्लिम मतदाताओं को जोड़ा।

ये एनजीओ के लोग मुस्लिम समुदाय के बीच जाते हैं, उन्हें समझाते हैं और फिर इनका इस्तेमाल वोटिंग टर्नआउट बढ़ाने के लिए किया जाता है। इस्लामी संगठनों ने पिछले कुछ महीनों में मुस्लिम समुदाय के लोगों के बीच पहुँच बनाने के लिए कई अभियान चलाए हैं। इस दौरान इन्होंने सैंकड़ों बैठकें की, सूचना सत्र आयोजित किए और सामुदायिक कार्यक्रम किए…। हाल ही में सामने आई TISS की रिपोर्ट में कहा गया कि अवैध आप्रवासियों झुग्गी क्षेत्रों में बसाया जा रहा है। इनका राजनीतिक इस्तेमाल करने के लिए वोटर कार्ड दिलाए जा रहे हैं

रिपोर्ट में कहा गया है कि मुंबई में अवैध मुस्लिम आप्रवासियों की संख्या तेजी से बढ़ी है। मुंबई में 1961 में हिंदुओं की आबादी 88% थी, जो 2011 में घटकर 66% रह गई। इस दौरान मुस्लिम जनसंख्या 8% से बढ़कर 21% तक पहुँच गई। यदि यह प्रवृत्ति जारी रही तो अनुमान है कि 2051 तक हिंदू आबादी 54% से कम हो जाएगी और मुस्लिम आबादी लगभग 30% तक बढ़ सकती है। ये सब कुछ वोट जिहाद के तहत एक सोची-समझी साजिश के तहत जनसांख्यिकीय बदलाव के लिए किया जा रहा है। ये काम कमोबेश पूरे देश में जारी है।

लोकसभा की तरह ही इस बार भी विधानसभा चुनाव से पहले फतवे निकाले गए। विभिन्न मुस्लिम संगठनों ने क़ॉन्ग्रेस की अगुवाई वाली MVA को वोट देने की अपील की। इस फतवे को मुस्लिमों के घर-घर तक पहुँचाने के लिए जगह-जगह बैठक की गई। रैलियाँ निकाली गईं। एनजीओ को लगाया गया। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के प्रवक्ता मौलाना खलीलुर रहमान सज्जाद नोमानी ने तो यहाँ तक कहा था कि ‘जो बीजेपी का साथ दे, ऐसे लोगों का हुक्का-पानी बंद होना चाहिए।’

इसके पहले मौलाना सज्जाद नोमानी ने तो एक कार्यक्रम में कहा था कि आज वोट देने वाले हर मुसलमान को अपने समुदाय के पक्ष में अपने अधिकार का इस्तेमाल करना चाहिए। उन्होंने मुसलमानों के मन में यह डर भी भर दिया कि अगर मोदी सत्ता में आए तो सभी मज़ार और मदरसे जमींदोज कर दिए जाएँगे। मुंबई में शिवसेना (यूबीटी) द्वारा आयोजित रैली में इस्लामी झंडे भी लहराए गए। इन सब कारणों से महाराष्ट्र के मुस्लिम बहुल इलाकों में मुस्लिमों ने भारी वोटिंग की और परिणाम सामने रहा।

हालाँकि, लोकसभा चुनाव वाला खेल ही विपक्षी दलों ने विधानसभा चुनावों में भी खेलने की कोशिश की। मुस्लिमों के हक में समर्थन लेने के बाद ऑल इंडिया उलेमा बोर्ड ने अपना समर्थन कॉन्ग्रेस के नेतृत्व में बने महाविकास अघाड़ी (MVA) गठबंधन को दिया था। अपने आधिकारिक पत्र में उलेमा बोर्ड ने 17 शर्तों के साथ ये समर्थन देने की बात ही है। इनमें वक्फ बोर्ड को 1000 करोड़ रुपए देने, आरएसएस पर प्रतिबंध लगाने जैसी माँग की गई थी, पैगंबर मुहम्मद के खिलाफ बोलने वाले व्यक्ति के खिलाफ कानून लागू करने जैसी बातें शामिल हैं।

इनके अलावा, जो अन्य माँगें थीं वो हैं- वक्फ संशोधन विधेयक का विरोध करने और इसे निरस्त करना, वक्फ संपत्तियों से अतिक्रमण हटाने के लिए महाराष्ट्र विधानसभा में कानून बनाना, महाराष्ट्र बोर्ड में मुसलमानों के लिए 10% आरक्षण, राज्य में पुलिस भर्ती में शिक्षित मुसलमानों को प्राथमिकता, भाजपा नेता नीतेश राणे और रामगिरी महाराज को जेल में डालना, मौलवी सलमान अझेरी को रिहा करना, राज्य के मस्जिदों के मौलानाओं और इमामों को 15,000 रुपए प्रति माह देना।

महाविकास विकास अघाड़ी ने उलेमा बोर्ड की माँगें मान लीं और इसके आधार पर महायुति गठबंधन के लिए वोट जिहाद की रणनीति पर काम शुरू हो गया। हालाँकि, बँटेेंगे तो कटेंगे नारे के साथ राजनीति आक्रामक होती गई तो अंदर ही अंदर आरएसएस ने मोहरे बिछाने शुरू कर दिए। वोट जिहाद को लेकर किए जा रहे सारे कामों को छोटी-छोटी बैठकों के जरिए लोगों तक पहुँचाया जाने लगा। इनमें जमीनी स्तर के RSS वर्कर ने अपने काम को अद्भुत तरीके से अंजाम दिया। इसका नेतृत्व किया RSS के पश्चिम प्रांत के प्रमुख एवं सह सरकार्यवाह अतुल लिमये ने।

मुस्लिम संगठनों और नेताओं द्वारा हिंदुओं के खिलाफ दिए जाने भड़काऊ नारों का काट तैयार किया जाने लगा। इस चुनाव को वोट जिहाद बनाम धर्मयुद्ध बना दिया गया। इसे कुछ ऐसे पेश किया गया कि अगर विधानसभा चुनावों में विपक्ष की जीत के बाद हिंदुओं के मुश्किलों के पहाड़ टूट पड़ेंगे। TISS की रिपोर्ट की चर्चा की गई। जमीनी स्तर पर स्वयंसेवकों ने बताया कि विपक्षी सरकार बनते ही बांग्लादेश-रोहिंग्या की देश में आमद बढ़ जाएगी। सोशल मीडिया से लेकर अखबारों में लेख, पार्टी नेताओं के बयान और मीडिया में बहस के जरिए इन बातों को आम जनमानस तक पहुँचाया गया।

अतुल लिमये ने दीर्घकालिक पहलों में शोध दल, शोध समूह और थिंक टैंक की स्थापना की। इनमें धार्मिक अल्पसंख्यकों के जनसांख्यिकीय अध्ययन और उसके कारण नीति-निर्धारण में पड़ने वाले असर जैसे विषयों के बारे में बताया गया। उन्होंने मराठा आंदोलन जैसे मुद्दों को बेअसर कर दिया। उन्होंने मराठा समुदाय के नेताओं को विश्वास में लिया, ओबीसी मतदाताओं को पार्टी से फिर जोड़ा। इसके लिए उन्होंने हिंदुत्व के मुद्दे को आधार बनाया। सीएम योगी के ‘बँटेंगे तो कटेंगे’ का जीतना विरोध MVA के नेता करते, उतना ही जमीनी स्तर पर हिंदुओं को अपने पाले में खिंचने में RSS को सफलता मिलती।

इसका परिणाम ये हुआ कि खुद को प्रगतिशील होने का स्वांग रचने वाली बॉलीवुड अभिनेत्री स्वरा भास्कर के शौहर और शरद पवार की एनसीपी के उम्मीदवार फहाद अहमद तक चुनाव हार गए। AIMIM मालेगाँव सेंट्रल जैसी मुस्लिम बहुल सीट तक सिमट कर रह गई। यहाँ से AIMIM के मुफ्ती इस्माइल सिर्फ 162 वोटों से जीते। पार्टी ने 16 जगहों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे। इस बार खड़े 420 मुस्लिम उम्मीदवारों में सिर्फ 13 मुस्लिम विधायक बने हैं। हारने वालों में कई बड़े चेहरे शामिल हैं। ये सब भाजपा की रणनीति का कमाल है।

अतुल लिमये को उनके सहयोगी फोकस और जमीनी स्तर पर काम करने वाले नेता के रूप में जानते हैं। महाराष्ट्र के चितपावन ब्राह्मण समाज से आने वाले 54 वर्षीय अतुल लिमये ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और बहुराष्ट्रीय कंपनी में इंजीनियर रहे हैं। वे साल 2000 के शुरुआत में नौकरी छोड़कर संघ के पूर्णकालिक प्रचारक बन गए। इस तरह उन्होंने रणनीति एवं समाजसेवा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम रखा। मूल रूप से नासिक के रहने वाले लिमये ‘पश्चिमी महाराष्ट्र के प्रांत प्रचारक रहे और जल्दी ही क्षेत्र प्रचारक बन गए। उनके क्षेत्र में महाराष्ट्र, गुजरात और गोवा शामिल हैं। वे संघ में सह सरकार्यवाह हैं।

हिंदू बन मंदिर आए, ब्लेड से करने वाले थे संत की हत्या… CM योगी ने खोली मुस्लिम युवकों की साजिश, जानिए कैसे मौलाना चला रहे थे इस्लामी धर्मांतरण रैकेट

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री गोरखपुर यूनिवर्सिटी में चल रहे राष्ट्रवादी छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) के अधिवेशन में शामिल हुए। यहाँ उन्होंने दीपेश नायर को प्रा. यशवंत राव युवा पुरस्कार सम्मान से सम्मानित किया। इस दौरान योगी आदित्यनाथ ने धर्मांतरण के खिलाफ जारी लड़ाई को लेकर नागरिकों के कर्तव्यों पर भी बात की। उन्होंने इस दौरान बाटला हाउस के उस मौलवी और उसके धर्मांतरण रैकेट के बारे में भी बात की, जिसके गिरोह को कुछ समय पहले सजा हुई थी और मौलाना कलीम, मौलाना उमर समेत 12 दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी।

सीएम योगी आदित्यनाथ ने कहा, “अभी 3 महीने पहले कोर्ट ने एक कुख्यात मौलवी और उसके साथियों को उम्रकैद की सजा सुनाई थी। सजा इसलिए नहीं दी गई थी कि वो मौलवी था, बल्कि वो छद्म तरीके से धर्मांतरण करता था।” उन्होंने आगे बताया, “घटना 2019-20 की है, मेरे पास रिपोर्ट आई कि संत से मिलने 2 युवक जा रहे थे, जाँच में उनके पास से सर्जिकल ब्लेड निकली। एसपी और डीजीपी से पूछने पर पता चला कि दोनों हिंदू युवक थे। उनके पास 2 इंच की ब्लेड थी, जिससे किसी का गला भी कट जाए।”

उन्होंने आगे बताया, “मैंने पुलिस अधिकारियों से कहा कि वो इतने खतरनाक इरादों से जा रहे लोगों को हल्के में ले रहे हैं। मैंने बैकग्राउंड चेक करने के लिए बोला, तो दोनों बाहर के निकले। एक दिल्ली और एक हैदराबाद। तीसरे दिन पता चला कि वो बाटला हाउस जाते हैं। बाटला हाउस वही जगह है, जहाँ 2008 में एनकाउंटर हुआ था। मैंने पुलिस अधिकारियों से कहा कि बाटला हाउस जाने वाले युवा हिंदू नहीं है। कड़ाई से पूछताछ में पता चला कि वो हिंदू संत की हत्या करने जा रहे थे। जाँच शुरू हुई, तो बड़ा रैकेट सामने आया, जिसमें मूक-बधिर बच्चे धर्मांतरण के लिए उनके निशाने पर थे।”

सीएम योगी आदित्यनाथ ने 2 घटनाओं के बारे में बताया। पहली शिकायत गुरुग्राम से आई थी, जिसमें माँ-बाप ने शिकायत की थी कि बच्चा मूक-बधिर था। जो दिल्ली की संस्था में पढ़ाई करता था। उसे जबरन इस्लाम स्वीकार करा दिया गया। दूसरी शिकायत कानपुर से आई थी, जिसमें मूक-बधिर बच्चा उसी संस्था में पढ़ता खा। कोरोना काल में वो घर आया, तो दिन में कुछ नहीं खाता था। रख लेता था और सुबह 4 बजे खाता था। माँ को शक हुआ, जाँच हुई तो पता चला कि वो नमाज पढ़ता था।

योगी आदित्यनाथ ने आगे बताया, “जाँच में पता चला कि बाटला हाश से संचालित संस्था ऐसे बच्चों को स्मार्टफोन देकर बरगला रहा था। वो कोट-वर्ड के जरिए ट्रेनिंग देती थी और धर्मांतरण कराती थी। इसी केस का पर्दाफाश हम लोगों ने किया। उस संस्था ने 500 परिवारों को अपने चंगुल में फंसा रथा था। इसी केस में कोर्ट ने आजीवन कारावास की सजा सुनाई।” 28:20 मिनट से उस घटनाक्रम के बारे में सीएम योगी बता रहे हैं, उसे खुद सुन सकते हैं।

क्या था पूरा मामला, जिसका सीएम योगी आदित्यनाथ ने किया जिक्र

बता दें कि 11 सितंबर 2024 को लखनऊ स्थित NIA की कोर्ट ने देश में अवैध धर्मांतरण का रैकेट चलाने वाले वाले मौलाना कलीम सिद्दीकी और उमर गौतम सहित 12 दोषियों को उम्रकैद की सजा दी थी, इसके अलावा, चार दोषियों राहुल भोला, मन्नू यादव उर्फ अब्दुल मन्नान, मोहम्मद सलीम, कुणाल अशोक चौधरी उर्फ आतिफ को 10-10 साल की सजा सुनाई थी। NIA-ATS कोर्ट ने इन्हें धारा 417, 120B, 153A, 153B, 295A, 121A, 123 और अवैध धर्मांतरण की धारा 3, 4, और 5 के तहत दोषी पाया

ये सभी दोषी उत्तर प्रदेश एवं अन्य जगहों पर धर्मांतरण का रैकेट चलाते थे। ये लोगों को लालच देकर उन्हें इस्लाम में धर्मांतरित करते थे। ये दोषी लोगों को उनके मूल धर्म के बारे में भ्रम, नफरत और भय पैदा करके उनका ब्रेनवॉश करते थे। इसके बाद उन्हें इस्लाम की खूबियाँ बताते थे और मुस्लिम बनाते थे। ये यूट्यूब चैनल भी चलाते थे। इन सबको राज्य के अलग-अलग जिलों से गिरफ्तार किया गया था।

ये गिरोह उन लोगों को अपना टारगेट बनाते थे, जो आर्थिक रूप से कमजोर और दिव्यांग होते थे। इसके अलावा महिलाएँ भी इनके निशाने पर होती थीं। इनके रैकेट को चलाने के लिए इन्हें खाड़ी सहित दुनिया भर से पैसे आते थे। बहला-फुसलाकर, डरा धमकाकर और दबाव बनाकर धर्मांतरण कराते थे। धर्मांतरण करने के बाद उन पर दबाव बनाया जाता था कि वो और हिंदुओं का धर्म परिवर्तन कराएँ।

यह गिरोह इस बात का भी ख्याल रखता था कि धर्म परिवर्तन करके मुस्लिम बने लोग फिर से अपने धर्म में वापसी ना कर लें। इसके लिए उन्हें विशेष तौर पर ट्रेनिंग दी जाती थी। उन्हें देश के अलग-अलग मस्जिदों एवं मदरसों में रखा जाता था। जो इस्लाम छोड़ने की कोशिश करते, उन्हें धमकी भी दी जाती थी।

मुजफ्फरनगर के रतनपुरी थाना क्षेत्र स्थित फुलत गाँव का कहने वाला कलीम सिद्दीकी पिकेट इंटर कॉलेज से 12वीं करने के बाद मेरठ कॉलेज से बीएससी की शिक्षा ली है। इसके बाद दिल्ली के एक मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस करने लगा। बीच में ही पढ़ाई छोड़कर वह इस्लामी स्कॉलर बन गया और इस्लाम का प्रचार-प्रसार करने लगा।

कलीम सिद्दीकी दिल्ली के शाहीन बाग में 18 साल से अपना ठिकाना बना रखा था। मौलाना कलीम सिद्दीकी को 22 सितंबर 2021 को गिरफ्तार किया था। मौलाना कलीम सिद्दीकी को 562 दिनों तक जेल में रहने के बाद अप्रैल 2023 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने जमानत दे दी थी। जमानत के दौरान उस पर कई तरह की पाबंदियाँ भी लगाई गई थीं।

सीएम योगी ने दीपेश नायर को किया सम्मानित

सीएम योगी आदित्यनाथ ने ऐसे ही मामलों को लेकर सजगता से काम कर रहे युवाओं को सम्मानित किया। सीएम योगी ने दीपेश नायर को प्रा. यशवंत राव युवा पुरस्कार सम्मान से सम्मानित करते हुए कहा, “आप ही के बीच में छिपे हुए ऐसे लोग, जो छद्म रूप में धर्मांतरण की राष्ट्र विरोधी गतिविधियों को संचालित करते हैं। वो लोग सेवा की सौदेबाजी कर रहे हैं। इस पर रोक लगाना समाज के प्रबुद्ध जनों का, जागरुक नागरिकों का दायित्व बनता है, ये सिर्फ सरकार का नहीं, बल्कि हर जागरुक नागरिक का नाम होना चाहिए। ये काम दीपेश नायर जैसे नौजवानों के माध्यम से कर रहे हैं। मैं दीपेश नायर जैसे युवाओं का सम्मान करता हूँ। आपको प्रा. यशवंत राव युवा पुरस्कार सम्मान से सम्मानित करने से इस सम्मान का गौरव बढ़ा है। छद्म रूप से धर्मांतरण करने वाले लोगों को अपनी संस्था के माध्यम से रोका और रोक रहे हैं। ये सबकी जिम्मेदारी बनती है।”

सीएम योगी आदित्यनाथ अधिवेशन के आखिरी दिन मुख्य मेहमान के तौर पर पहुँचे थे। इस दौरान उन्होंने खुद के एबीवीपी से जुड़ाव को भी याद किया। सीएम योगी आदित्यनाथ ने दीपेश नायर को प्राध्यापक यशवंतराव केलकर युवा पुरस्कार से सम्मानित किया, जो सामाजिक जीवन में परिवर्तन लाने के लिए उल्लेखनीय काम करने के लिए दिया जाता है। दीपेश नायर ने सैकड़ों दिव्यांगों को उच्च शिक्षा के लिए रास्ता दिखाया है।

बता दें कि 22 नवंबर 2024 से गोरखपुर यूनिवर्सिटी में एबीवीपी के राष्ट्रीय अधिवेशन की शुरुआत हुई थी। इसमें 1500 से अधिक प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया, जो देश भर के 44 प्रांतों और मित्र राष्ट्र नेपाल से यहाँ पहुँचे। इस अधिवेशन में शिक्षा, समाज, पर्यावरण, संस्कृति जैसे विषयों पर देश भर से आए विद्यार्थियों, प्राध्यापकों और शिक्षाविदों ने विमर्श किया।