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मुस्लिम युवक के शव में मिली जिस बोर की गोली, उसका तमंचा संभल के दंगाइयों के पास से ही मिला: बच्चे-बुजुर्ग-औरतें सब थे हिंसा में शामिल, 7 FIR की डिटेल एक साथ

उत्तर प्रदेश के संभल जिले में रविवार (24 नवंबर 2024) को मुस्लिम भीड़ ने पुलिस पर हमला बोल दिया था। हिंसक भीड़ जामा मस्जिद का सर्वे करने वाली टीम तक पहुँचना चाह रही थी जिसे रोकते हुए कई अधिकारी व जवान घायल हो गए। इस मामले में अब तक प्रशासन की तरफ से कुल 7 FIR दर्ज हुई हैं। इन सभी FIR में हिंसक भीड़ की तादाद 800 से 900 के आसपास बताई गई है। सबने सामूहिक रूप से माना है कि हमलावर प्रशासनिक अधिकारियों की जान लेने पर आमादा थे।

इस मामले में प्रशासन की तरफ से कुल 7 केस दर्ज हुए है। इसमें से 5 मुकदमे संभल कोतवाली जबकि 2 अन्य नखासा थानाक्षेत्र में लिखे गए हैं। संभल कोतवाली क्षेत्र में दर्ज मुकदमों में से 2 केस चौकी इंचार्ज के पद पर तैनात सब इंस्पेक्टरों के साथ 1-1 मुकदमे DSP, SHO और डिप्टी कलेक्टर की तहरीर पर दर्ज हुए हैं। इन मुकदमों में सपा सांसद जियाउर्रहमान बर्क, समाजवादी पार्टी के विधायक इक़बाल महमूद के बेटे सुहैल इकबाल के अलावा 21 अन्य लोग नामजद आरोपित बनाए गए हैं। इसी के साथ 800 से 900 हमलावर अज्ञात में दिखाए गए हैं।

पहली FIR सब इंस्पेक्टर संजीव की

संभल हिंसा की पहली FIR सब इंस्पेक्टर संजीव की तरफ से दर्ज की गई है। वह कोतवाली संभल की एकता चौकी के प्रभारी हैं। उनकी FIR में बताया गया है कि 800 से 900 हमलावरों की भीड़ सर्वे रोकने के लिए आगे बढ़ रही थी। जब उन्हें रोकने की कोशिश की गई तो पत्थरबाजी शुरू हो गई। भीड़ ने मस्जिद में सर्वे नहीं होने देने का एलान कर दिया। इसी भीड़ में से आवाज आई, “हसन, अजीम, सलीम, रिहान, हैदर, वसीम, अयान… पुलिस वालों से सारे हथियार कारतूस छीन लो। इनको आग लगाकर मार डालो। कोई भी बचकर ना जाने पाए।”

भीड़ ने कई पुलिसकर्मियों के हथियार भी छीन लिए जिसमें टीयर गैस सेल और रबर बुलेट शामिल हैं। इसके बाद पुलिसकर्मियों की हत्या के इरादे से भीड़ ने फायरिंग शुरू कर दी। इस पत्थरबाजी में खुद दारोगा संजीव के साथ कुछ अन्य पुलिसकर्मी घायल हो गए। आखिरकार बल प्रयोग करके भीड़ को तितर-बितर किया गया।

दारोगा दीपक राठी की FIR में सांसद और सपा विधायक का बेटा नामजद

दूसरा केस संभल कोतवाली की ही सरथल चौकी प्रभारी दीपक राठी की तरफ से दर्ज करवाया गया है। इस तहरीर में उन्होंने 22 नवंबर को समाजवादी पार्टी के सांसद जियाउर्रहमान के जामा मस्जिद पर दिए गए भड़काऊ भाषण का जिक्र किया है। दीपक राठी ने अपनी तहरीर में यह भी बताया कि हिंसा के दिन भीड़ को समाजवादी पार्टी के विधायक इकबाल महमूद का बेटा सुहैल इक़बाल लीड कर रहा था। इस भीड़ ने पुलिस पर पत्थर फेंके और गोलियाँ भी चलाईं।

दीपक राठी की FIR में यह भी जिक्र है कि हमलावर भीड़ को यह कह कर उकसाया जा रहा था- “चिंता मत करो सांसद जियाउर्रहमान तुम्हारे साथ हैं।”

SHO की तहरीर में हिंसा का विस्तार से जिक्र

इस मामले में तीसरा केस संभल कोतवाली के SHO इंस्पेक्टर अनुज कुमार तोमर ने दर्ज करवाया है। खुद को चश्मदीद बताते हुए उन्होंने लिखा कि हिंसक भीड़ अल्लाहु अकबर का नारा लगा रही थी। इस भीड़ में 14 साल के नाबालिग से लेकर 72 साल तक का बुजुर्ग शामिल थे। भीड़ की तरफ से गोलियाँ चलाई गईं जिसके बाद पुलिस को 4 लोग घायल अवस्था में मिले। इन्हीं चारों की बाद में इलाज के दौरान मौत हो गई थी।

FIR के मुताबिक दंगाइयों के हमले का शिकार रैपिड एक्शन फ़ोर्स के जवान भी बने थे। मुस्लिम समुदाय के कुल 21 लोगों की गिरफ्तारी का भी जिक्र इसी FIR में है। इसमें से कई उपद्रवियों के पास पुलिस से लूटे गए हथियार और कुछ के पास अवैध अस्त्र बरामद हुए। ये अस्त्र 12 बोर और 315 बोर के तमंचे थे। उपद्रवियों ने पुलिस की प्राइवेट और सरकारी गाड़ियों में आगजनी और तोड़फोड़ की थी। आखिर में डीएम से परमिशन मिलने के बाद पुलिस ने बल प्रयोग कर के भीड़ को नियंत्रित किया।

डिप्टी कलेक्टर की अज्ञात हमलावरों के खिलाफ शिकायत

संभल में हिंसक भीड़ को काबू करते हुए डिप्टी कलेक्टर रमेश बाबू भी घायल हो गए थे। पथराव में उनको बाएँ पैर और कुहनी में चोटें आईं है। उन्होंने अपनी तहरीर में 800 – 900 अज्ञात हमलावरों का जिक्र किया है। रमेश बाबू ने बताया कि हिंसक भीड़ न तो अदालत का आदेश मानने के लिए तैयार थी और न ही अधिकारियों की कोई भी बात सुनने के लिए। वो सर्वे रोकने के लिए हिंसा का सहारा लेना चाहते थे। भीड़ को बार-बार निषेधाज्ञा लागू होने की नसीहत भी दी गई लेकिन उन पर कोई फर्क नहीं पड़ा।

DSP पर भी जानलेवा हमला

संभल हिंसा की 5वीं FIR डिप्टी एसपी अनुज चौधरी की तरफ से दर्ज हुई है। अनुज चौधरी के पैर में दंगाइयों की गोली लगी है। उन्होंने खुद पर हुए हमले के बड़ा कोतवाली संभल में तहरीर दी है। तहरीर में अनुज चौधरी ने बताया कि सर्वे कर रही हिंसक भीड़ को रोकने के लिए उन्होने काफी प्रयास किया। इस कोशिश के दौरान भीड़ उनके साथी कई अन्य पुलिसकर्मियों पर हमलावर हो गई।

भीड़ ने लॉ एन्ड आर्डर पूरी तरह से खत्म कर दिया और लोग डर से अपने घरों में कैद हो गए। पथराव कर रही भीड़ को काबू करने के लिए पुलिस तमाम कोशिशें कर रही थी। इसी दौरान भीड़ में से एक अज्ञात व्यक्ति ने गोली चला दी जो अनुज चौधरी के पैर में जा धंसी। घायल अनुज चौधरी को इजाज के लिए अस्पताल में भर्ती करवाया गया।

उपरोक्त 5 FIR कोतवाली संभल नगर में दर्ज हुई हैं। इसके अतिरिक्त 2 अन्य FIR पास के ही थाना नखासा में दर्ज की गई है। यह दोनों केस भी पत्थरबाजी और आगजनी से जुड़े हैं। भीड़ की हिंसा का दायरा इसी बात से समझा जा सकता है कि उसने एक साथ 2 अलग-अलग थानाक्षेत्रों में उपद्रव किया। इन दोनों जगहों पर भीड़ के टारगेट पर पुलिसकर्मी ही थे। दोनों ही स्थानों पर भीड़ ने पुलिस के साथ उनके वाहनों को निशाना बनाया।

सब इंस्पेक्टर शाह फैज़ल पर भी जानलेवा हमला

नखासा थाने में तैनात सब इंस्पेक्टर शाह फैसल पर भी हिंसक भीड़ ने तब हमला किया जब वो विवाद की सूचना पर मौके के लिए रवाना हुए थे। इस दौरान भीड़ ने सबूत मिटाने के लिए CCTV कैमरों को तोड़ डाला। लाठी-डंडों से लैस भीड़ ने पुलिस की एक प्राइवेट और दूसरी निजी बाइक में आग लगा दी। दारोगा से उनकी सरकारी पिस्टल छीनने की कोशिश हुई। नाकाम रहने पर सिपाहियों के कारतूस छीने गए।

अतिरिक्त फ़ोर्स आने के बाद ही भीड़ से घिरे पुलिसकर्मियों की जान बच पाई। इस केस में गुलाबुद्दीन, सुल्तान आरिफ, हसन, मुन्ना, फैज़ान और समद को नामजद किया गया है। इसी के साथ 150 से 200 अन्य हमलावरों को अज्ञात में दिखाया गया है।

पुलिसकर्मी की शिकायत पर महिलाएँ नामजद

संभल हिंसा की 7वीं FIR नखासा थाने में दर्ज हुई है। इस केस में पुलिसकर्मी ने बताया है कि उनके व अन्य हमराहों पर ईंट पत्थरों से हमला किया गया। इस हमले से डर कर दुकानदारों ने शटर गिरा लिए और लोकव्यवस्था पूरी तरह से भंग हो गई थी। इसी तहरीर के आधार पर पुलिस ने रुकैया, फरहाना और नजराना नाम की 3 खातूनों को गिरफ्तार किया है। हिंसा में शामिल अज्ञात हमलावरों की पहचान कर के धरपकड़ के प्रयास किए जा रहे हैं।

उपरोक्त सारे FIR में कई चीजें कॉमन हैं। सब सारे केसों का सार निकाला जाए तो इसमें कुछ बातें साफ तौर पर सामने निकल कर आ रहीं हैं।

निष्कर्ष

भीड़ प्रशसनिक अधिकारियों की कोई भी बात सुनने को तैयार नहीं थी। अलग-अलग गलियों और रास्तों से निकल कर वह मस्जिद की तरफ सधे अंदाज में बढ़ रही थी। इस भीड़ में नाबालिग बच्चों से लेकर 72 साल के बुजुर्ग भी शामिल थे लेकिन अंतर सिर्फ उम्र में था, उनकी सोच में नहीं।

सभी FIR में प्रशासनिक अधिकारियों ने बताया है कि भीड़ ने उन पर हमला किया और मार डालने की कोशिश की। कई स्थानों पर पुलिसकर्मियों के हथियार भी छीनने का प्रयास हुआ। ऐसे में यह भी माना जा सकता है कि कहीं न कहीं किसी न किसी ने भीड़ में शामिल लोगों को बिंदुवार समझाया था कि उनको क्या-क्या और कब करना है।

अल्लाहु अकबर का नारा मुख्यतः किसी स्थान पर बिखरे मुस्लिम समाज को एक जगह लाने के लिए लगाया जाता है। SHO की तहरीर में इस बात का जिक्र है कि भीड़ अल्लाहु अकबर की नारेबाजी कर रही थी। इससे माना जा रहा है कि भीड़ में कुछ लोग इस मकसद से भी शामिल थे कि अंतिम समय तक किसी को भी भटकने नहीं देना है और जो साजिश रची गई है उसको अंजाम तक पहुँचाना है। इसी वजह से बीच-बीच में उत्तेजक नारेबाजी हुई जिसे वायरल वीडियो भी देखा जा सकता है।

सभी FIR में भीड़ द्वारा पत्थर और लाठी-डंडों को हाथियार बनाए जाने का जिक्र किया गया है। इससे स्पष्ट होता है कि हमले से पहले सबको ईंट-पत्थरों के ठिकाने बताए गए होंगे। साथ ही लाठी और डंडों को किसी जगह पर तमाम लोगों के हाथों में पकड़ाया गया होगा। उनको यह भी समझाया गया होगा कि कब और किस पर कैसे हमला करना है।

सिपाहियों से हथियार छीनने वाली भीड़ ने डिप्टी एसपी अनुज चौधरी और SDM पर जानलेवा हमला किया। DSP अनुज चौधरी के खिलाफ काफी पहले से बयानबाजी की जा रही थी। गोली अनुज चौधरी के पैर में लगी और वो सुरक्षित थे। ठीक ऐसे ही डिप्टी कलेक्टर रमेश बाबू को भी मार डालने की नीयत से घेर कर पत्थर बरसाए थे। ये पत्थर उनके बाएँ पैर और कुहनी पर लगे। ऐसे में माना जा सकता है कि भीड़ को पता था कि किसे पीटना है और किसको मार डालना है।

जो तमंचा दंगाई से बरामद हुआ है उसी बोर की गोली से मौतें हुई हैं। मृतकों के शरीर में 315 बोर की गोली मिली है। यह गोली पुलिस प्रयोग नहीं करती है। यह बोर प्राइवेट रायफलों में प्रयोग होता है जो कि अवैध तमंचों में भी इस्तेमाल किया जाता है। आशंका इस बात की है कि पुलिस को बदनाम करने के लिए भीड़ में शामिल कुछ साजिशकर्ताओं ने अपने ही बीच कुछ लोगों को मारने के लिए चिन्हित कर रखा हो।

पुलिस ने सभी FIR में अपनी ओर हल्के बल प्रयोग की बात बताई है। हल्का बल में लाठीचार्ज और वाटर कैनन का इस्तेमाल शामिल होता है। हालत गंभीर होने पर टीयर गैस और पैलेट भी प्रयोग किया जाता है और अंतिम विकल्प के तौर पर भीड़ को तितर-बितर करने के लिए हवाई फायरिंग। ऐसे में यह जाँच का विषय होगा कि पुलिस के इंकार के बाद वो कौन है जो संभल में हुई मौतों का जिम्मेदार है।

पुलिस के FIR की मानें तो इस हिंसा में समाजवादी पार्टी की मिलीभगत साफ़ दिख रही है। FIR के मुताबिक समाजवादी पार्टी का सांसद जियाउर्रहमान बर्क ने हिंसा से 2 दिन पहले जुमे की नमाज के दिन भीड़ को भड़काया था। फिर रविवार को हिंसक भीड़ का नेतृत्व सपा विधायक का बेटा सुहैल इकबाल कर रहा था। वह हमलावरों को सपा सांसद के साथ होने का झांसा दे रहा था। हिंसा के बाद पुलिस कार्रवाई के विरोध में सपा का प्रतिनिधिमंडल भी लोकसभा स्पीकर ओम बिरला से मिला था। सपा के तमाम ट्वीट में दंगाइयों का बचाव और पुलिस के खिलाफ बातें लिखी हुई हैं।

इस हिंसा में आधिकारिक तौर पर 4 मौतों की पुष्टि की गई है। बताया यह भी जा रहा है कि ये मौतें तुर्क और पठानों के बीच चल रही खींचतान की वजह से हुई हैं। इन मौतों के परोक्ष रूप से जिम्मेदार भी हमलावर हैं। उन्होंने लम्बे समय तक सड़कों और गलियों को जाम रखा। पुलिस के वाहनों को आग लगा दी गई। हिंसा खत्म होने के बाद भी सड़कों से पत्थरों को बीन कर रास्ता क्लियर करवाने में प्रशासन को काफी समय लगा। इसी वजह से घायलों को इलाज मिलने में देरी हुई और मौतों का आंकड़ा बढ़ गया।

हेमा कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर SIT ने दर्ज किए यौन शोषण के 35 केस, गवाही देने वालों को मिल रही धमकी: जाँच रुकवाने सुप्रीम कोर्ट पहुँची मलयालम हिरोइन

हेमा कमिटी की रिपोर्ट में सामने आए यौन उत्पीड़न के आरोपों की जाँच कर रही केरल पुलिस की SIT ने 35 मामले दर्ज किए हैं। ये सभी मामले मलयालम फिल्म इंडस्ट्री में काम करने वाले कई लोगों के खिलाफ दर्ज किए गए हैं। जस्टिस हेमा कमिटी को दी गई गवाही के आधार पर इनमें से अधिकांश मामले यौन उत्पीड़न की घटनाओं से संबंधित हैं।

SIT ने मलयालम फिल्म इंडस्ट्री से जुड़ी कुछ बड़ी हस्तियों के खिलाफ तो 5-5 मामले भी दर्ज किए हैं। इन 35 मामलों के अलावा शिकायतकर्ताओं द्वारा किए गए खुलासे के आधार पर अभिनेता सिद्दीकी के खिलाफ दर्ज मामले सहित 24 अलग मामले भी दर्ज किए गए हैं। 35 मामलों में से प्रत्येक को गोपनीय तरीके से दर्ज किया गया है।

यहाँ तक कि इसकी प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) भी सार्वजनिक नहीं की गई है। इसके बाद कुछ लोग इस कार्रवाई के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुँचकर इस पर रोक लगाने की माँग की। इसको लेकर SIT को आशंका है कि इन मामलों के दर्ज होने के कारण ही सुप्रीम कोर्ट में इसकी जाँच को चुनौती दी गई हैं।

दरअसल, फिल्म निर्माता साजिमोन परायिल ने सुप्रीम कोर्ट में एक केरल हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ एक याचिका दाखिल की थी। हाई कोर्ट ने हेमा समिति के निष्कर्षों के आधार पर केस दर्ज करने के लिए कहा था। वहीं, अभिनेत्री माला पार्वती ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर SIT की कार्रवाई को रोकने की माँग की है। उनका कहना है कि वो कार्रवाई नहीं चाहती हैं।

केरल सरकार ने हाल ही में सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि कई महिलाएँ हेमा समिति के सामने गवाही देने के बाद कानूनी कार्रवाई करने के लिए तैयार नहीं है। इसके बावजूद आरोपितों को जवाबदेही से बचने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। हालाँकि कई शिकायतकर्ता शुरू में बयान देने या कानूनी कार्रवाई से हिचकिचा रहे थे, लेकिन SIT ने उन्हें आश्वासन दिया।

SIT के आश्वासन के बाद कई शिकायतकर्ता महिलाएँ नया बयान देने और अदालती कार्रवाई में साथ देने की बात कही है। उधर, हेमा समिति के सामने गवाही देने वालों को धमकी मिल रही है। इस पर हाई कोर्ट ने चिंता जताई है। ‘वीमेन इन सिनेमा कलेक्टिव’ की शिकायत पर हाई कोर्ट ने SIT से नोडल अधिकारी नियुक्त करके इसका समाधान निकालने के लिए कहा है।

दरअसल, हाल में मलयालम फिल्म इंडस्ट्री के काले चेहरे को बयान करने वाली जस्टिस हेमा कमेटी की रिपोर्ट सार्वजनिक हुई थी। इस रिपोर्ट में सैंकड़ों महिलाओं से बात की गई है, जिन्होंने बताया कि कैसे वो इंडस्ट्री में यौन उत्पीड़न झेल रही हैं। यह रिपोर्ट पाँच साल पहले ही केरल सरकार के पास पहुँच गई थी, लेकिन इसे सार्वजनिक इस साल अगस्त में किया गया।

कहा जा रहा है कि आरटीआई के दबाव में आकर केरल सरकार ने 295 पेजों की इस रिपोर्ट को जारी किया है, वो भी तब जब प्रारंभिक ड्राफ्ट से लगभग 60 पन्ने हटा दिए गए। ये रिपोर्ट न केवल फिल्म इंडस्ट्री में महिलाओं पर बीत रही आपबीती को बताती है, बल्कि पुरुषों के उस समूह के राज भी खोलती है जिनको लेकर कहा जाता है कि वो ही इस इंडस्ट्री पर कब्जा किए हुए हैं।

क्या है जस्टिस हेमा कमिटी

साल 2017 में 14 फरवरी को मलयालम फिल्मों की मशहूर अभिनेत्री अपनी कार से कोच्चि जा रही थीं, तभी उन्हें रास्ते में अगवा कर लिया गया। इसके बाद उनकी ही कार में उनका यौन उत्पीड़न हुआ। जब खबरें सामने आईं तो हर कोई सन्न रह गया। पुलिस ने उस समय आरोपितों को गिरफ्तार करके जेल भेज दिया, लेकिन इस घटना ने तमाम हिरोइनों की सुरक्षा पर सवाल उठा दिए। आंदोलन तेज होता गया।

जब सरकार पर दबाव पड़ा तो मजबूरन वारदात के पाँच महीने बाद जुलाई में केरल हाईकोर्ट की रिटायर्ड जस्टिस हेमा की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय कमेटी गठित हुई। इस कमिटी को जो टास्क दिया गया, उसमें पूरी मलयालम फिल्म इंडस्ट्री में महिला कलाकारों, सहयोगियों और अन्य स्टाफ की सेवा शर्तें, काम के बदले समुचित मेहनताना, शूटिंग स्थल पर सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम आदि को लेकर रिपोर्ट देना था।

कमिटी ने सैकड़ों की संख्या में महिला कलाकारों एवं अन्य महिला कर्मियों से बात की। उनके बयान रिकॉर्ड किए और फिर 2019 के आखिर में अपनी रिपोर्ट ले जाकर सीएम विजयन को दी। कमिटी ने इस रिपोर्ट के साथ इस मामले में विस्तृत जाँच के लिए न्यायाधिकरण के गठन की सिफारिश भी की। हालाँकि, केरल के सीएम ने उस पर सुनवाई तो दूर, रिपोर्ट को ही पब्लिक नहीं होने दिया।

विधानसभा में बताया गया कि अगर ये रिपोर्ट सार्वजनिक हुई तो निजता का उल्लंघन होगा। बाद में पाँच आरटीआई कार्यकर्ताओं और मीडियाकर्मियों ने केरल राज्य सूचना आयोग से संपर्क किया। इसके बाद आयोग ने कमिटी के सामने गवाही देने वाली महिलाओं की निजता को बरकरार रखते हुए कंट्रोल्ड रिपोर्ट को रिलीज करने करने की स्वीकृति दे दी। इसके बाद यह रिपोर्ट सामने आई।

क्या-क्या है हेमा कमेटी की रिपोर्ट में

255 पेज की इस रिपोर्ट में बताया गया कि कैसे मलयालम इंडस्ट्री को पुरुषों का एक समूह नियंत्रित करता है। वहीं महिलाएँ यौन उत्पीड़न का शिकार होती हैं और वो भी उन लोगों के द्वारा, जिनका इंडस्ट्री में अच्छा खासा नाम है। इसके अलावा इसमें ये भी बताया गया है कि इंडस्ट्री में शुरुआत से ही महिलाओं के साथ शोषण शुरू हो जाता है। उन्हें कभी ‘अडजस्ट’ करने को कहा जाता है तो कभी ‘कॉम्प्रोमाइज’।

जब महिलाएँ इसका विरोध करती हैं तो उन्हें टॉर्चर झेलना पड़ता है। कभी बेसिक सुविधाओं से वंचित रखा जाता है तो कभी वेतन देने में भेदभाव किया जाता है। कार्यस्थल पर उनके आगे नशे करना, दुर्व्यवहार करना, घटिया कमेंट करना भी सामान्य बात होती हैं। इसके अलावा, कॉन्ट्रैक्ट में काम की जानकारी दिए बिना ही उन्हें नग्न सीन करने के लिए मजबूर किया जाता है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि जाँच के दौरान निर्देशकों, निर्माताओं और अभिनेताओं समेत 15 बड़े शॉट्स से जुड़े एक पुरुष समूह का पता चला है। उनके अनुसार इंडस्ट्री में यही पावर ग्रुप तय करता है कि इंडस्ट्री में किसे रहना चाहिए और किसे फिल्मों में काम देना चाहिए। रिपोर्ट में इन शक्तिशाली समूह को माफिया भी बताया गया है जो अपने खिलाफ आवाज उठाने वालों का करियर बर्बाद कर देते हैं।

ICC के ‘शाह’ बने जय, पाकिस्तान की अकड़ हुई ढीली: चैंपियंस ट्रॉफी के हाइब्रिड मॉडल पर हुआ तैयार, इनकार करने पर भिखमंगा हो जाता PCB

जय शाह ने 1 दिसंबर को अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (ICC) के अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी संभाली और इस पद पर पहुँचने वाले सबसे युवा प्रशासक बन गए। जय शाह के आईसीसी के अध्यक्ष बनते ही, पाकिस्तान ने चैंपियंस ट्रॉफी 2025 को लेकर अपना रुख नरम कर लिया है। पहले वह पूरी मेज़बानी की माँग कर रहा था, लेकिन अब उसने ‘हाइब्रिड मॉडल’ को स्वीकार कर लिया है, जिसमें भारत के मैच न्यूट्रल वेन्यू पर खेले जाएँगे। हालाँकि उसने एक शर्त भी रखी है। इसके बाद लगता है कि ये मामला ICC की बैठक में सुलझ जाएगा।

जय शाह ने संभाली ICC अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी

जय शाह ने 1 दिसंबर को अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (ICC) के अध्यक्ष का पदभार संभाल लिया। वे 36 साल की उम्र में इस पद पर पहुँचने वाले सबसे युवा प्रशासक हैं। उन्होंने न्यूजीलैंड के ग्रेग बार्कले का स्थान लिया है। शाह अगस्त में निर्विरोध चुने गए थे, इस पद पर पहुंचने वाले पाँचवें भारतीय हैं। इससे पहले जगमोहन डालमिया, शरद पवार, एन श्रीनिवासन और शशांक मनोहर इस पद पर रह चुके हैं।

जय शाह ने पद संभालते हुए कहा, “मैं इस जिम्मेदारी को पाकर सम्मानित महसूस कर रहा हूँ। क्रिकेट को और समावेशी और रोमांचक बनाने के लिए मैं आईसीसी और सदस्य देशों के साथ मिलकर काम करूँगा।” उन्होंने महिला क्रिकेट के विकास और लॉस एंजेलिस ओलंपिक 2028 की तैयारियों को प्राथमिकता देने की बात कही।

पाकिस्तान ने चैंपियंस ट्रॉफी के लिए अपनाया नरम रुख

इस बीच, चैंपियंस ट्रॉफी 2025 को लेकर पाकिस्तान ने अपना रुख नरम कर लिया है। पहले वह टूर्नामेंट की पूरी मेजबानी मांग रहा था और भारत के लिए न्यूट्रल वेन्यू की मांग का विरोध कर रहा था। लेकिन अब वह ‘हाइब्रिड मॉडल’ को मानने को तैयार हो गया है। पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड (PCB) के अध्यक्ष मोहसिन नकवी ने कहा, “हमने आईसीसी को अपना पक्ष बताया है। कोशिश है कि हर किसी के लिए फायदेमंद फैसला हो।”

नकवी ने यह भी कहा कि पाकिस्तान क्रिकेट की गरिमा बनाए रखते हुए काम करेगा। हालाँकि, PCB ने माँग की है कि भविष्य में भी ICC के सभी इवेंट्स इसी हाइब्रिड मॉडल पर आधारित हों। पाकिस्तान ने यह भी कहा कि वह अपनी वित्तीय हिस्सेदारी बढ़ाने की माँग करेगा।

भारत में होने हैं तीन बड़े आईसीसी इवेंट

यहाँ ये बताना जरूरी है कि 2031 तक भारत तीन ICC इवेंट्स की मेजबानी करेगा, जिसमें 2026 का T20 वर्ल्ड कप, 2029 की चैंपियंस ट्रॉफी और 2031 का वनडे वर्ल्ड कप शामिल हैं। PCB ने साफ किया है कि वह भारत में खेलने के लिए तैयार नहीं है और न्यूट्रल वेन्यू की माँग करेगा।

वहीं, ICC ने चेतावनी दी है कि अगर पाकिस्तान हाइब्रिड मॉडल नहीं मानता, तो उसे चैंपियंस ट्रॉफी से बाहर कर दिया जाएगा। इस विवाद के चलते टूर्नामेंट का शेड्यूल अब तक जारी नहीं हो सका है। नकवी ने दुबई में बैठक के दौरान बताया कि पाकिस्तान ने चैंपियंस ट्रॉफी की पूरी तैयारी कर ली है और वह टूर्नामेंट की मेजबानी के लिए तैयार है।

हालाँकि अब यह विवाद जल्द ही ICC की कार्यकारी बैठक में सुलझ सकता है। अगर पाकिस्तान अपने रुख पर अडिग रहता है, तो उसे वित्तीय और खेल दोनों स्तरों पर नुकसान हो सकता है। वहीं, भारत ने अपने सुरक्षा कारणों के चलते पाकिस्तान में खेलने से इनकार कर दिया है। अब देखना होगा कि क्रिकेट की यह राजनीति क्या मोड़ लेती है।

अब त्रिपुरा के अस्पतालों में भी नहीं मिलेगा बांग्लादेशियों को इलाज… तिरंगे का अपमान देख हॉस्पिटलों ने किया ऐलान, कहा- देश की गरिमा सबसे पहले

बांग्लादेश में तिरंगा का अपमान होता देखने के बाद अब भारत में इस्लामी कट्टरपंथियों का विरोध शुरू हो गया है। पहले कोलकाता के डॉक्टरों ने मना किया कि वो बांग्लादेशियों का इलाज नहीं करेंगे और अब यही फैसला त्रिपुरा के अस्पतालों ने लिया है।c

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, अगरतला स्थित आईएलएस अस्पताल और कोलकाता के जेएन रे अस्पताल ने यह घोषणा की कि वे अब बांग्लादेशी मरीजों का इलाज नहीं करेंगे।

आईएलएस अस्पताल, जो कि बांग्लादेशी मरीजों के लिए एक लोकप्रिय स्वास्थ्य केंद्र रहा है, ने इस निर्णय की पुष्टि करते हुए कहा कि उन्होंने अपने हेल्प डेस्क भी बंद कर दिए हैं। अस्पताल के मुख्य परिचालन अधिकारी गौतम हजारिका ने बताया कि बांग्लादेशी में हो रही घटनाओं के बाद कुछ प्रदर्शनकारी समूह दबाव बना रहे थे कि बांग्लादेशी नागरिकों को चिकित्सा सेवाएँ प्रदान न की जाएँ। इसी के बाद अस्पताल द्वारा यह फैसला लिया गया।

इसी प्रकार से जेएन रे अस्पताल के अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि उनका यह निर्णय बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदुओं पर हो रहे हमलों और भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के प्रति अपमान को लेकर उठाया गया है। अस्पताल के निदेशक शुभ्रांशु भक्त ने कहा कि देश की गरिमा सर्वोपरि है और चिकित्सा सेवा एक महान पेशा होते हुए भी, देश की सुरक्षा और सम्मान सबसे पहले आता है।

बता दें कि बांग्लादेश में तख्तापलट होने के बाद से हिंदुओं पर हमलों की घटनाओं में लगातार इजाफा हो रहा है और पिछले कुछ दिनों से इस्लामी कट्टरपंथी भारतीय तिरंगे को अपमानित करने पर उतर आए हैं। ऐसे में भारत के लोग भी इन कृत्यों का विरोध कर रहे हैं और अपने ढंग से उनका बहिष्कार कर रहे हैं। त्रिपुरा के अस्पतालों से पहले कोलकाता के टॉप डॉक्टर्स ने साफ कहा था कि वो बांग्लादेशियों का इलाज नहीं करेंगे।

नीलकंठ महादेव मंदिर है बदायूँ की जामा मस्जिद, हिंदुओं ने माँगा पूजा का अधिकार: 3 दिसंबर को जिला अदालत में सुनवाई, इंतजामिया कमेटी ने कहा – यह 850 साल पुरानी

उत्तर प्रदेश के संभल के बाद अब बदायूँ जिले में जामा मस्जिद को लेकर विवाद शुरू हो गया है। हिंदू पक्ष ने दावा किया है कि बदायूँ की जामा मस्जिद असल में पौराणिक नीलकंठ महादेव मंदिर है। इसको लेकर हिंदू पक्ष ने जिला अदालत में याचिका दायर कर दी है। मामले की अगली सुनवाई मंगलवार (3 दिसंबर 2024) को तय की गई है। सरकारी पक्ष की बहस पूरी हो चुकी है, अब मस्जिद की इंतजामिया कमेटी और वक्फ बोर्ड की दलीलें सुनी जाएंगी।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, हिंदू पक्ष की तरफ से वादी मुकेश पटेल ने साल 2022 में अदालत में सबूत पेश करते हुए दावा किया था कि यह मस्जिद पहले नीलकंठ महादेव मंदिर थी। उनकी याचिका में जामा मस्जिद के अंदर हिंदुओं को पूजा का अधिकार देने की माँग की गई है। हिंदू महासभा के अधिवक्ता विवेक रेंडर इस मामले की पैरवी कर रहे हैं।

मस्जिद की इंतजामिया कमेटी ने इस दावे का जोरदार विरोध किया है। उनके वकील अनवर आलम का कहना है कि जामा मस्जिद 850 साल पुरानी है और इसका मंदिर से कोई संबंध नहीं है। अनवर आलम ने मस्जिद को 850 साल पुरानी बताते हुए हिन्दू पक्ष की याचिका को ख़ारिज करने की माँग की है। हालाँकि उन्होंने कहा कि वो अदालत में अपनी बहस को जारी रखेंगे।

जामा मस्जिद बनाम नीलकंठ महादेव मंदिर का यह विवाद बदायूँ के सिविल जज सीनियर डिवीजन फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट में चल रहा है। न्यायाधीश अमित कुमार की अदालत में इस बात पर बहस चल रही है कि यह मामला सुनवाई योग्य है या नहीं। हिन्दू पक्ष की याचिका में वक्फ बोर्ड को प्रतिवादी नंबर एक और मस्जिद इंतजामिया कमेटी को विपक्षी संख्या 2 बनाया गया है। शनिवार (29 नवंबर) को मस्जिद इंतजामिया कमेटी ने कोर्ट में अपना पक्ष रखा है। हालाँकि कमेटी की सुनवाई अभी भी पूरी नहीं हो पाई है।

अदालत ने सरकारी पक्ष की बात सुनने के बाद अब मस्जिद पक्ष की दलीलों का इंतजार शुरू कर दिया है। सभी पक्षों की बहस पूरी होने के बाद अदालत तय करेगी कि इस याचिका पर आगे सुनवाई की जाए या इसे खारिज किया जाए। मामले की अगली सुनवाई 3 दिसंबर 2024 को होगी।

महाराष्ट्र में 100186 बूथ, 12000 बूथ पर जोर लगाकर हासिल की सबसे बड़ी जीत: BJP की 12% वाली वह रणनीति जिसने 3 महीने में बदला गेम, सिर्फ 17 सीटों पर ही हार… पढ़िए कैसे पूरा हुआ मिशन

महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव 2024 में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा या BJP) की अगुवाई वाली महायुति गठबंधन ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की है। इस जीत को सुनिश्चित करने के लिए भाजपा ने चुनाव प्रचार के अंतिम समय में अपनी रणनीति बदल दी। ‘लड़की बहिन योजना’ की सफलता के बावजूद भाजपा ने परखी हुई अपनी रणनीति ‘बूथ मैनेजमेंट’ अपनाकर स्विंग वोटिंग वाले बूथों कर फोकस किया।

पन्ना प्रमुखों के माध्यम से केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने बूथ मैनेजमेंट की रणनीति को साल 2014 के लोकसभा चुनावों में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया था। इसका परिणाम आज पूरा देश ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया भी देख रही है। इसी रणनीति को महाराष्ट्र के प्रभारी और अमित शाह के खासमखास भूपेंद्र यादव ने महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में अजमाया। उनकी टीम में अश्विनी वैष्णव भी थे।

इन दोनों ने इससे पहले मध्य प्रदेश में अपनी कौशल का परिचय देते हुए एंटी इनकंबैसी को मात देते हुए जीत दिलाने में शिवराज सिंह चौहान की सहायता की थी। इसके अलावा, भाजपा के पास दो इन-हाउस एजेंसियाँ ​भी हैं, जो पार्टी की रणनीतिक निर्णय के लिए डेटा सँभालती हैं। ये एजेंसियाँ हैं- वराही एनालिटिक्स और जार्विस कंसल्टिंग। इन दोनों एजेंसियों के डेटा ने भी महाराष्ट्र चुनाव में मदद की।

भाजपा ने डेटा के आधार पर महाराष्ट्र के करीब 1,00,186 बूथों में से 12,000 बूथों की पहचान की थी, जिस पर उसे फोकस करना था। इन बूथों पर स्विंग पोलिंग होती थी। यानी मतदाता मूड या अपना हित देखकर वोट बदलते रहते थे। इसका परिणाम ये हुआ कि भाजपा ने इस चुनाव में 149 विधानसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़ा किए थे, जिनमें से 132 पर जीत हुई। यह 89 प्रतिशत की जीत है।

इस साल सितंबर में गृहमंत्री अमित शाह ने महाराष्ट्र में भाजपा नेताओं से मुलाकात की थी। इस दौरान उन्होंने अपने-अपने क्षेत्रों के मतदान केंद्रों पर ध्यान केंद्रित करने का निर्देश दिया था। उस समय जार्विस कंसल्टिंग को यह पता लगाने के लिए कहा गया था कि पिछले कुछ चुनावों में किन सीटों पर मतदान पैटर्न में बदलाव हुआ, जिसके कारण भाजपा को जीत या हार का सामना करना पड़ा।

सूत्रों के हवाले से ET ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि पार्टी के आंतरिक सर्वेक्षण में ऐसी 69 विधानसभा सीटों की पहचान की गई, जिन पर थोड़ा प्रयास करके पार्टी जीत सकती थी। जीत के आँकड़े को बढ़ाने के लिए अन्य 70 सीटों पर भी फोकस किया गया। इन सभी सीटों के डेटा का विश्लेषण किया गया और इनमें से 80 सीटों की पहचान की गई, जहाँ 3-4% स्विंग वोट भाजपा चुनाव जीती या हारी थी।

इन 80 सीटों में सबसे अधिक सीटें विदर्भ क्षेत्र से थीं। यहाँ की 31 विधानसभा सीटें थीं, जहाँ भाजपा के पक्ष या विपक्ष में स्विंग वोटिंग होती थी। अब भाजपा ने क्षेत्रवार इन सीटों की पहचान करके उनकी बूथों की पहचान करने की योजना बनाई, जहाँ स्विंग वोटिंग होती है। इन बूथों को तीन श्रेणियों- A,B और C में बाँटा गया।

A कैटेगरी में उन बूथों को रखा गया, जहाँ पार्टी जीतती है। B कैटेगरी में ऐसे बूथों को रखा गया, जहाँ मतदाताओं के मन बदलने के कारण वह जीतती या हारी है। वहीं, C कैटेगरी में उन बूथों को रखा गया जहाँ भाजपा कभी नहीं जीतती। डेटा विश्लेषण के बाद 12,000 बूथों की पहचान B कैटेगरी के लिए की गई, जो भाजपा की जीत या हार में बड़ी भूमिका निभाते हैं। भाजपा ने इन्हीं पर फोकस का निर्णय लिया।

इसके बाद भाजपा ने इन बूथों के लिए सारे संसाधन जुटाने शुरू कर दिए। भूपेंद्र यादव, अश्विनी वैष्णव और भाजपा के राष्ट्रीय संयुक्त महासचिव शिवप्रकाश टीम को सारे संसाधन उपलब्ध कराए। इस दौरान वराही एनालिटिक्स को इन 80 विधानसभा सीटों के लिए क्षेत्रीय और स्थानीय मुद्दों वाली विशेष सामग्री तैयार करने के लिए कहा गया, ताकि मतदाताओं से सीधा जुड़ा जा सके।

इसके साथ ही नागपुर, नासिक, पुणे, मुंबई में लगभग 200 कॉलर की संख्या वाले पाँच कॉल सेंटर बनाए गए। इसके बाद 1,000 कॉल करने वालों को 10 से 12 बूथ दिए गए और उनसे कहा गया कि वे एक बूथ पर सप्ताह में कम-से-कम दो बार बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं से बातचीत करें। भाजपा नेता सुमंत घैसास को कॉल सेंटर और बूथ प्रबंधन का प्रभारी बनाया गया।

वहीं, पूर्व केंद्रीय मंत्री भागवत कराड को बूथ स्तर पर टीम और समन्वय के मामले में कमियों को दूर करने के लिए कहा गया। इसके बाद काम शुरू कर दिया गया और उसकी रोजाना ट्रैकिंग भी शुरू कर दी गई। इस तरह पूरी टीम इन 80 सीटों पर फोकस करने लगी। राज्य के बाहर से भी महिला नेताओं को बुलाया गया और उन्हें 80 विधानसभा क्षेत्रों में तैनात किया गया।

इसके अलावा, पार्टी ने प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में महिला विस्तारक नियुक्त किए और उन्हें अपने विधानसभा के सभी बूथों को कवर करने के लिए एक-एक स्कूटी दी। इन महिला नेताओं को स्थानीय महिला कार्यकर्ताओं और नेताओं के साथ टिफिन मीटिंग करने के लिए कहा गया। इस दौरान महायुति के अन्य दलों की महिला नेताओं को भी शामिल किया गया।

इन महिला नेताओं ने राज्य सरकार की ‘लड़की बहन योजना’ की कम-से-कम 50 महिला लाभार्थियों से मिलने का लक्ष्य दिया। यह सब कुछ मतदान से लगभग डेढ़ महीने पहले शुरू हो चुका था। जैसे-जैसे मतदान करीब आता गया, बाहर से आई महिला नेताओं ने जमीनी कार्यकर्ताओं के साथ-साथ मतदाताओं के साथ भी तालमेल बैठा लिया और इस योजना को घर-घर तक पहुँचा दिया।

अब बारी तक अन्य पिछड़ा वर्ग को साधने की। दिवाली से करीब एक सप्ताह पहले भूपेंद्र यादव ने मुंबई में देवेंद्र फडणवीस के आवास पर ओबीसी नेताओं और विभिन्न जातियों के प्रभावशाली लोगों के साथ एक बैठक की। इस बैठक में विभिन्न मुद्दों पर चर्चा की गई और उनका समाधान किया गया। इस पूरे अभियान के दौरान भूपेंद्र यादव ओबीसी समुदाय को खुद प्रबंधित कर रहे थे।

पार्टी को पता चला कि मराठवाड़ा में कुछ सीटों पर अगर पंकजा मुंडे प्रचार करें तो भाजपा एक वर्ग को अपने साथ ला सकती है। इसके बाद भूपेंद्र यादव ने पंकजा मुंडे को चार दिनों के लिए एक हेलीकॉप्टर उपलब्ध कराया और उन्हें प्रचार करने के लिए भेजा। हेलीकॉप्टर ने एक दिन में 16 से 17 बार लैंडिंग की। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव और छत्तीसगढ़ के उपमुख्यमंत्री अरुण साव से प्रचार कराया गया।

भाजपा ने अब जनजातीय लोगों पर ध्यान केंद्रित किया। इस बार के लोकसभा चुनावों में उन्होंने भाजपा को समर्थन नहीं दिया था। जनजातीय समाज के लोगों को भाजपा से जोड़ने के लिए पार्टी ने पार्टी ने उनके बीच काम करने वाले संघ के पुराने विचारक निशांत खरे को लगाया। यह अन्य 25 आरक्षित सीटों पर पार्टी का फोकस था। इन सीटों पर जनजातीय लोगों की आबादी 25% या उससे अधिक है।

निशांत खरे ने 500 स्वयंसेवकों की एक टीम बनाई और उन्हें अपने-अपने क्षेत्रों में काम करने के लिए ट्रेनिंग दी गई। चुनाव से चार दिन पहले 40-50 स्वयंसेवकों को सभी जनजातीय क्षेत्रों में जाने और मतदान के दिन मतदाताओं को तैयार करने के लिए बाइक और पेट्रोल दी गई। मतदान के दिन स्वयंसेवकों को अपने बूथ पर अपने परिवार के सदस्यों के अलावा प्रत्येक को पाँच वोट देने का काम सौंपा गया था।

इन स्वयंसेवकों ने जनजातीय समाज के लोगों को उनके इलाकों से बाइक पर बैठाकर मतदान केंद्रों तक पहुँचाया। इससे मतदान प्रतिशत बढ़ा। वहीं, 24 एसटी आरक्षित विधानसभा सीटों में से महायुति ने 21 सीटें जीक लीं। इनमें से भाजपा ने 10, शिवसेना ने 6 और एनसीपी ने 5 सीटें मिलीं। अन्य 25 सीटों, जहाँ जनजातीय आबादी 25 प्रतिशत या उससे अधिक थी, वहाँ महायुति सभी 25 सीटें जीत लीं।

इस तरह , तीन महीने में भाजपा ने इन सीटों पर लगभग 5% वोट बढ़ा दी। A कैटेगरी में शामिल किए गए जिन 69 विधानसभा सीटों पर पार्टी को जीत का भरोसा था, उनमें से 64 सीटें मिलीं। वहीं 12,000 स्विंग बूथों वाली 80 सीटों में से भाजपा ने 68 सीटें जीतीं। इन दोनों को मिलाकर भाजपा की कुल सीटों की संख्या 132 हो गई और वह सबसे बड़ी पार्टी बनकर राज्य में उभरी।

जार्विस कंसल्टिंग के दिग्गज मोगरा ने ET को बताया, “अन्य एजेंसियों के लिए पार्टी उनकी क्लाइंट है और वे इसे एक असाइनमेंट के रूप में मानते हैं। हमारे मामले में हम पार्टी की विस्तारित शाखा हैं। हमें जो काम सौंपा गया है, उसे पूरा करना हमारा प्राथमिक कर्तव्य है।” इस तरह बाहर से आए रणनीतिकार अपने-अपने क्षेत्र में लौट गए। महाराष्ट्र में सरकार बनाने की तैयारी है और भाजपा की नजर अब दिल्ली और बिहार के चुनावों पर है।

जमीन पर बनाया तिरंगा, छात्रों से कहा इस पर लात देकर चलो: महिला पत्रकार को ‘इंडियन एजेंट’ बताकर घेरा, इंडो-बांग्ला बस पर फेंके पत्थर… बांग्लादेश में हदें पार कर रहे इस्लामी कट्टरपंथी

बांग्लादेश में हिंदुओं पर अत्याचार के साथ भारत के खिलाफ घृणा का स्तर बढ़ता ही जा रहा हैं। इस्लामी कट्टरपंथी सड़कों पर भारतीयों को निशाना बना रहे हैं, प्रशासन द्वारा हिंदू पुजारियों को पकड़ा जा रहा है, पुलिस द्वारा हिंदू पत्रकारों की आवाज दबाई जा रही है और बांग्लादेशी छात्र शैक्षणिक संस्थानों में खुलेआम तिरंगे का अपमान कर रहे हैं।

तिरंगे का अपमान

बीते कुछ दिनों में सोशल मीडिया पर ऐसी तमाम तस्वीरें सामने आई हैं जहाँ दिख रहा है कि जमीन पर तिरंगे को पेंट करवाकर उस पर छात्रों को चलवाया जा रहा है। उन्हें निर्देश दिए जा रहे हैं कि वो तिरंगे को लात मारते हुए चलें। वहीं इस्कॉन के प्रतीक और इजरायली झंडे को भी अपमानित किया जा रहा है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, ये तस्वीरें मुख्यत: बोगुरा पॉली टेक्निक इंस्टीट्यूट, बांग्लादेश यूनिवर्सिटी ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी (बीयूईटी), ढाका यूनिवर्सिटी (गणित भवन) और नोआखली साइंस एंड टेक्नोलॉजी यूनिवर्सिटी से सामने आई हैं हैं।

प्रोफेसरों ने खुद माना है कि बांग्लादेशी छात्र भारत को अपमानित करने के लिए ऐसे काम कर रहे हैं। इन तस्वीरों को देखने के बाद भारतीयों में खासी नाराजगी है। कल ही कोलकाता के टॉप डॉक्टर ने ऐसी एक तस्वीर देख ऐलान किया था कि अगर बांग्लादेश में ये सब हो रहा है तो वो भी बांग्लादेशियों का कभी इलाज नहीं करेंगे।

बांग्लादेश में हिंदू पत्रकार गिरफ्तार

गौरतलब है कि बांग्लादेश में शेख हसीना सरकार के जाने के बाद से लगातार हिंदुओं पर अलग-अलग तरह से अत्याचार की घटनाएँ बढ़ रही हैं। इस साल अगस्त में कथित छात्र प्रदर्शन के दौरान एक 17 साल के लड़के की मौत हो गई थी। अब उस मामले में ही बांग्लादेश की पुलिस ने हिंदू पत्रकार मुन्नी साहा को गिरफ्तार किया है। उन्हें इंडियन एजेंट बताते हुए इस्लामी कट्टरपंथियों ने उन्हें जनता टावर स्थित दफ्तर के बाहर घेर लिया था और बाद में पुलिस बुलाकर उन्हें अरेस्ट करवाया। उनके ऊपर हत्या का केस लगाया गया है।

बस पर बांग्लादेशियों ने किया हमला

इसी तरह मालूम हो कि बांग्लादेश के इस्लामी कट्टरपंथियों ने हिंदुओं और भारतीयों के खिलाफ घृणा दिखाते हुए एक बस को भी निशाना बनाया है। यह घटना बांग्लादेश के ब्राह्मणबारिया जिले की बिस्वा रोड से सामने आई है।

यहाँ बांग्लादेश के रास्ते कोलकाता से त्रिपुरा चलने वाली बस पर हमला किया गया। इस संबंध में त्रिपुरा के परिवहन मंत्री सुशांत चौधरी ने बताया कि एक अंतर्राष्ट्रीय पैसेंजर बस त्रिपुरा से कोलकाता जा रही थी। इसी बीच बिस्वा रोड पर एक किनारे पर चल रही बस को जानबूझकर निशाना बनाया गया। इस दौरान पत्थरबाजी भी हुई जिससे यात्री काफी घबरा गए। सीएम ने इस पर कहा- ऐसी घटनाओं के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता और न इनके होने पर इन्हें स्वीकार किया जा सकता है।

संभल में कड़ी सुरक्षा, जामा मस्जिद से लेकर गलियों-बाजारों का न्यायिक आयोग की टीम ने लिया जायजा: कहाँ से आए पत्थरबाज, किसने मुस्लिम भीड़ से करवाई हिंसा… सबकी पड़ताल

उत्तर प्रदेश के संभल जिले में रविवार (24 नंवबर 2024) को हुई हिंसा की जाँच अब शुरू हो चुकी है। इसके लिए हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय न्यायिक आयोग बनाया गया है। यह टीम रविवार (1 दिसंबर 2024) को संभल पहुँची और सबसे पहले जामा मस्जिद में जाँच की। इलाके में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए थे। आयोग को दो महीने में अपनी रिपोर्ट राज्य सरकार को सौंपनी है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, आयोग की टीम मुरादाबाद से रवाना होकर सुबह संभल पहुँची। जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक के साथ इस 3 सदस्यीय टीम ने उन जगहों का दौरा किया, जहाँ 24 नवंबर को हिंसा हुई थी। टीम ने पैदल ही बाजार और गलियों में जाकर घटनास्थल की गहराई से पड़ताल की। इसी दौरान टीम जामा मस्जिद भी पहुँची और जरूरी सबूत जुटाए।

जाँच के दौरान सुरक्षा के सख्त इंतजाम थे। हर जगह पुलिस तैनात थी। जाँच दल में इलाहाबाद हाईकोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस देवेंद्र कुमार अरोड़ा, पूर्व डीजीपी अमित मोहन प्रसाद और रिटायर्ड आईपीएस अधिकारी अरविंद कुमार जैन शामिल हैं। इनके साथ मुरादाबाद मंडल के कमिश्नर आंजनेय सिंह और डीआईजी मुनिराज भी थे। स्थानीय डीएम और एसपी ने टीम को हिंसा के दिन की घटनाओं के बारे में विस्तार से जानकारी दी।

न्यायिक आयोग की जाँच कुछ खास बिंदुओं पर केंद्रित है। न्यायिक आयोग पड़ताल कर रहा है कि 24 नवंबर की हिंसा अचानक भड़की या इसके पीछे कोई सोची समझी साजिश थी? इसी के साथ आयोग यह भी जानने का प्रयास करेगा कि घटना के समय प्रशासनिक स्तर पर तो कोई लापरवाही नहीं हुई। हिंसा की असल वजह के साथ आयोग यह भी जाँचेगा कि दोबारा ऐसा न हो उसके लिए प्रशासनिक स्तर पर क्या तैयारियाँ की गईं हैं।

जाँच फिलहाल जारी है और चश्मदीदों के बयान दर्ज किए जा रहे हैं। इसमें प्रशासनिक अधिकारियों से भी पूछताछ हो रही है। आयोग दो महीने में अपनी रिपोर्ट तैयार करेगा, जिसे सरकार को सौंपा जाएगा। इस रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।

‘मोदी को मार डालो… निज्जर को किसने मारा, भारत सरकार…’: कनाडा में मंदिर के बाहर खालिस्तानियों ने लगाए आपत्तिजनक नारे, वाणिज्य दूतावास के काम को किया बाधित

खालिस्तान समर्थकों ने 30 नवंबर 2024 को कनाडा के ऑन्टोरियो प्रांत के स्कारबोरो में स्थित लक्ष्मी नारायण मंदिर के बाहर भारत सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किया। कोर्ट के रोक के बावजूद ये विरोध प्रदर्शन हुए। खालिस्तानियों ने ऐसे समय में विरोध प्रदर्शन किया, भारतीय वाणिज्य दूतावास के अधिकारी कनाडा में रहने वाले बुजुर्ग भारतीय नागरिकों को सहायता के लिए वार्षिक शिविर आयोजित कर रहे थे।

इस शिविर में बुजुर्ग भारतीय नागरिकों को जीवन प्रमाण पत्र दिया जा रहा था। यह प्रमाण पत्र भारत सरकार से पेंशन पाने के लिए एक आवश्यक एवं महत्वपूर्ण दस्तावेज है। हालाँकि, ये शिविर खालिस्तान समर्थकों के निशाने पर आ गए हैं। इसके जरिए ये भारत सरकार के प्रयासों को बाधित करने का प्रयास कर रहे हैं। इससे पहले कनाडा में कई स्थानों पर सुरक्षा के कारण कई शिविर रद्द कर दिए गए थे।

मंदिर के बाहर प्रदर्शन के दौरान खालिस्तान समर्थकों ने खालिस्तानी झंडे लहराए और उसके समर्थन में नारे लगाए। लाउडस्पीकर पर नारे और भाषण के जरिए इस शिविर में आए बुजुर्ग लोगों को डराने की कोशिश की गई, ताकि भारत सरकार के प्रयासों में बाधा पहुँचाई जा सके। इन शिविरों में हिंदू, सिख, मुस्लिम और ईसाई सहित विभिन्न धर्म के बुजुर्ग पेंशनभोगियों को सेवा प्रदान की जाती है।

इस प्रदर्शन को कवर कर रहे नेशनल टेलीग्राफ के पत्रकार डैनियल बोर्डमैन ने इसका एक वीडियो साझा किया है। अपनी रिपोर्ट में बोर्डमैन ने कहा है, “ये खालिस्तानी जिस चीज का विरोध कर रहे हैं, वह साधारण रिवर्स रेमिटेंस है – भारतीय पेंशनभोगियों द्वारा कमाया गया पैसा कनाडा में भेजा जा रहा है। उनका उद्देश्य भारत-कनाडा संबंधों को अस्थिर करना और यहां सामाजिक सद्भाव को बाधित करना है।”

कनाडाई पत्रकार डैनियल बोर्डमैन ने आगे कहा, “ये समूह (खालिस्तान समर्थक) विदेशी शक्तियों, विशेष रूप से पाकिस्तान और चीन से प्रभावित हैं, और अराजकता फैलाने के लिए सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं।” उन्होंने अपनी रिपोर्ट में खालिस्तान समर्थकों को जमकर लताड़ लगाई।

उन्होंने कहा कि कनाडा में भारतीय दूतावास द्वारा आयोजित इन शिविरों में हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई… हर धार्मिक पृष्ठभूमि के लोग आते हैं। उन्होंने कहा, “इन शिविरों में भारत सरकार की कोई साजिश नहीं है। मैंने सिखों, हिंदुओं, मुसलमानों और ईसाइयों को शांतिपूर्वक अपनी पेंशन लेते देखा है। प्रदर्शनकारियों के दावे निराधार और हरकतें खतरनाक हैं, क्योंकि वे मंदिरों जैसे स्थानों के खिलाफ हिंसा भड़काते हैं।”

एक वीडियो में खालिस्तान समर्थकों को भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौत की कामना करते हुए नारे लगाते हुए सुना जा सका है। खालिस्तानियों ने ‘मोदी को मार डालो’ जैसे आपत्तिजनक नारे लगाते लगाए। वहीं, एक दूसरे वीडियो में खालिस्तानियों को ‘निज्जर को किसने मारा, भारत सरकार’ के नारे लगाते हुए सुना गया।

सुरक्षा के लिए कोर्ट ने उठाया कदम

इन शिविरों के आसपास बढ़ते तनाव के बीच ऑन्टोरियो में सुपीरियर कोर्ट ऑफ जस्टिस ने हस्तक्षेप किया। कोर्ट ने शिविर के दौरान प्रदर्शनकारियों को मंदिर के 100 मीटर के दायरे में इकट्ठा होने से रोकने का आदेश दिया है। अदालत ने कहा, “प्रशासनिक कांसुलर सेवाओं और पूजा के लिए मंदिर में आने वाले बुजुर्गों को डराना उनके और उस समुदाय के लिए नुकसानदेह है, जिसका प्रतिनिधित्व मंदिर करता है।”

अदालत ने टोरंटो पुलिस और ऑन्टोरियो प्रांतीय पुलिस सहित कानून प्रवर्तन एजेंसियों को निषेधाज्ञा का उल्लंघन करने वाले व्यक्तियों को गिरफ्तार करने तथा वस्तुओं और संरचनाओं को हटाने का अधिकार दिया है। इससे पहले वैंकूवर में खालसा दीवान सोसाइटी के रॉस स्ट्रीट गुरुद्वारे को भी ऐसा ही आदेश दिया गया था, जिसने पुलिस सुरक्षा में वाणिज्य दूतावास शिविर की शांतिपूर्वक मेजबानी की थी।

कनाडा में सुरक्षा चुनौतियाँ

इन शिविरों के कारण कनाडा में भारतीय राजनयिक प्रयासों की सुरक्षा को लेकर चिंताएँ बढ़ गई हैं। बता दें कि नवंबर की शुरुआत में ब्रैम्पटन में हिंदू सभा मंदिर में एक वाणिज्य दूतावास शिविर पर खालिस्तानी समर्थकों ने हमला कर दिया था। इस मामले में कई लोगों को गिरफ़्तार किया गया था। इस घटना के बाद भारतीय वाणिज्य दूतावास ने ओकविले में वैष्णो देवी मंदिर सहित कई शिविरों को रद्द कर दिया था।

इसके अलावा, हिंसा की धमकियों के कारण कुछ स्थानों पर वाणिज्य दूतावास शिविरों को स्थानांतरित करना पड़ा या आयोजन को पूरी तरह से रद्द करना पड़ा। टोरंटो में भारतीय वाणिज्य दूतावास ने सार्वजनिक रूप से अपनी चिंताएँ व्यक्त करते हुए कहा था, “यहां तक ​​कि न्यूनतम सुरक्षा गारंटी भी प्रदान नहीं की जा रही है, जिससे यह उपस्थित लोगों और आयोजकों के लिए असुरक्षित हो रहा है।”

बता दें कि ब्रैम्पटन और सरे में हिंदू मंदिरों पर खालिस्तानियों ने 3 नवंबर को हमला कर दिया था। उस समय स्थानीय लोगों की मदद के लिए एक वाणिज्य दूतावास शिविर चल रहा था। ब्रैम्पटन में खालिस्तानियों को हिंदू सभा मंदिर परिसर में लाठी लेकर घुसते हमला करते देखा गया। भारतीय उच्चायोग ने संभावित खतरों के बीच कनाडाई पुलिस से सहायता माँगी थी, लेकिन उस पर ध्यान नहीं दिया गया।

सोशल मीडिया में इस्लामी कट्टरपंथियों ने चलाया TMD (काफिरों को मार डालो) का ट्रेंड, बांग्लादेश में एक और हिंदू संत को बिना वारंट के पुलिस ने पकड़ा

बांग्लादेश में हिंदुओं पर अत्याचार लगातार बढ़ते जा रहे हैं। 29 नवंबर 2024 को वहाँ चट्टोग्राम पुलिस ने एक और हिंदू पुजारी श्री श्याम दास प्रभु को गिरफ्तार किया। ये जानकारी इस्कॉन के राधारमण दास ने अने सोशल मीडिया पर साझा की। 25 नवंबर को देशद्रोह के आरोप में चिन्मॉय दास की गिरफ्तारी के बाद ये दूसरी कार्रवाई है।

बताया जा रहा है कि श्री श्याम दास प्रभु को उस वक्त पकड़ा गया जब वो चिन्मॉय दास से मिलने जेल गए थे। उन्हें बिन किसी आधिकारिक वारंट के गिरफ्तार किया गया और सफाई दी गई कि इस प्रकार किसी को भी हिरासत में लेकर बाद में छोड़ा जा सकता है।

गौरतलब है कि एक तरफ जहाँ प्रशासन हिंदुओं को पकड़कर उन्हें सताने में लगा है तो वहीं सोशल मीडिया पर बांग्लादेश के इस्लामी कट्टरपंथी हिंदुओं को मारने का आह्वान खुलेआम कर रहे हैं। जानकारी सामने आई है कि इस्लामी कट्टरपंथी सोशल मीडिया पर एक ऐसे हैशटैग- ‘टोटल मलाऊँ डेथ’ के साथ पोस्ट साझा कर रहे हैं जिसका मतलब है कि सारे हिंदुओं को मार डाला जाए। (मलाऊँ शब्द का इस्तेमाल गैर मुस्लिमों/काफिरों के लिए किया जाता है।)

देख सकते हैं कि इस हैशटैग के भीतर 200000 से ज्यादा पोस्ट साझा हो चुके हैं और इसे करने वाले सिर्फ और सिर्फ मुस्लिम ही हैं। उनके लिए ‘मलाऊँ’ का अर्थ काफिर जैसा होता है जहाँ वो हिंदुओं को मारने का समर्थन करते हैं।

मालूम हो कि ये हैशटैग पहली बार सोशल मीडिया पर नहीं चलाया गया। अक्सर हिंदूविरोधी मानसिकता के लोगों को लामबंद करने के लिए इस तरह के हैशटैग चलाकर नफरत फैलाने का काम होता रहा है। इस बार भी ऐसा ही हो रहा है।

हिंदुओं के खिलाफ बांग्लादेशी इस्लामी कट्टरपंथियों की ऐसी घृणा को देखने के बाद लोगों ने स्थिति पर चिंता जताई है और बांग्लादेश की अंतरिम सरकार से आग्रह किया है कि वो स्थिति को संभालने के लिए कदम उठाएँ वरना हालात हाथ से निकल जाएँगे। लेकिन, अभी तक सरकार का हिंदू विरोधी घटनाओं के बाद जो रवैया रहा है उसे देख लगता है कि उन्होंने ऐसी घटनाओं के खिलाफ अपनी आँख मूंदी हुई हैं। उन्हें न हिंदुओं के खिलाफ होती हिंसा दिख रही है और न रोते-बिलखते हिंदुओं की आवाज सुनाई पड़ रही है। इस्लामी कट्टरपंथी अब भी हिंदुओं को चुन-चुनकर निशाना बना रहे हैं। इस्कॉन को बंद करने की माँग कर रहे हैं। न्याय माँगने वालों को गिरफ्तार किया जा रहा है। वहीं जो अन्याय कर रहे हैं उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हो रही है।