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सुखबीर बादल को टॉयलेट से लेकर जूठे बर्तनों तक की करनी होगी सफाई, प्रकाश सिंह बादल से छीना ‘फख्र-ए-कौम’: अकाल तख्त ने 2015 की पूरी पंजाब कैबिनेट को सुनाई सजा

पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल को सिखों की सर्वोच्च धार्मिक संस्था अकाल तख्त ने 2015 के गुरु ग्रंथ साहिब बेअदबी मामले में डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख गुरमीत राम रहीम को कथित समर्थन देने के लिए सजा सुनाई है। इस फैसले के तहत सुखबीर बादल और उनके सहयोगियों को गुरुद्वारे के किचन और बाथरूम साफ करने का दायित्व सौंपा गया है। यही नहीं, अकाल तख्त ने पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल से फक्र-ए-कौन सम्मान भी वापस ले लिया है।

अकाल तख्त के फैसले के मुताबिक, सुखबीर बादल वर्तमान में व्हीलचेयर पर हैं। सुखबीर सिंह बादल और साल 2015 में उनके कैबिनेट के साथियों को 3 दिसंबर को दोपहर 12 से 1 बजे तक गुरुद्वारे के बाथरूम-टॉयलेट साफ करने होंगे। इसके बाद उन्हें स्नान करना होगा और फिर लंगर सेवा में हाथ बंटाना होगा।

यह सजा सुखबीर बादल द्वारा अकाल तख्त के सामने बिना शर्त माफी माँगने के बाद दी गई है। उन्होंने अपने पुराने फैसलों में हुई गलतियों को स्वीकार किया है। उनका एक वीडियो भी सामने आया है। इसमें दिखता है कि ग्यानीजी उनकी गलतियाँ बताते हैं और सुखबीर बादल इसे स्वीकार करते हैं।

ग्यानी रघबीर सिंह जी उनसे पूछते हैं कि बेअदबी के विरोध में किए गए प्रदर्शन पर गोलियाँ चलाने वाले पुलिसवालों को तरक्की दी या नहीं, जिसका जवाब वह हाँ में देते हैं। इसके बाद वह कुछ केस वापस कराने सम्बन्धी प्रश्न पूछते हैं, इसका भी जवाब वह हाँ में देते हैं। इसके अलावा उनसे और भी कई प्रश्न पूछे गए। यह सभी गुनाह उन्होंने स्वीकार किए। जिसके बाद यह सजा सुनाई गई।

शिरोमणि अकाली दल में उथल-पुथल के बीच दिया था इस्तीफा

इससे पहले सुखबीर सिंह बादल ने 16 नवंबर 2024 को शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था। उन्होंने यह कदम पार्टी में चल रही उथल-पुथल और अकाल तख्त द्वारा उन्हें ‘तनखैया’ घोषित किए जाने के बाद उठाया।

‘तनखैया’ का मतलब है वह व्यक्ति जो धार्मिक भावनाओं का अपमान करता है। पार्टी के वरिष्ठ नेता दलजीत सिंह चीमा ने उनके इस्तीफे की पुष्टि करते हुए कहा था कि नए अध्यक्ष के चुनाव जल्द ही होंगे।

पार्टी की स्थिति और नया नेतृत्व

अकाली दल जो कभी पंजाब की राजनीति में मजबूत पकड़ रखता था, हालिया समय में मुश्किल दौर से गुजर रहा है। लोकसभा चुनावों में पार्टी को एक भी सीट नहीं मिली थी। सुखबीर बादल के इस्तीफे के बाद, पार्टी के कामकाज को संभालने के लिए बलविंदर सिंह भुंदर को पहले ही कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त किया गया था। अब पार्टी का कामकाज वही देखेंगे, जब तक कि नया अध्यक्ष नहीं चुना जाता।

प्रकाश सिंह बादल से वापस लिया फख्र-ए-कौम सम्मान

अकाल तख्त ने सुखबीर बादल के दिवंगत पिता और पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल से ‘फ़ख्र-ए-कौम’ का सम्मान भी वापस ले लिया है। यह फैसला भी 2015 के बेअदबी मामले को लेकर लिया गया है।

बता दें कि साल 2015 में गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी के मामले ने पंजाब की राजनीति और धार्मिक भावनाओं को झकझोर कर रख दिया था। अकाली दल, जो खुद को सिख समुदाय का प्रतिनिधि मानता है, पर इस घटना को लेकर गंभीर सवाल उठे थे। डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम को लेकर सुखबीर बादल और उनकी सरकार की भूमिका ने पार्टी की छवि को भारी नुकसान पहुँचाया।

जब हो रही जनसंख्या नियंत्रण पर बहस, तब मोहन भागवत ने यूँ ही नहीं छेड़ी 3 बच्चों की बात: फर्टिलिटी रेट के आँकड़े बता रहे हैं खतरा कितना बड़ा, TFR से ही टेंशन में हैं कोरिया-जापान

भारत वर्तमान में विश्व की सबसे बड़ी आबादी वाला देश बन चुका है। बीते कई दशकों से यह बहस होती आई है कि देश में जनसंख्या नियंत्रण के लिए कोई कानून बनाया जाना चाहिए। कई जगह अधिक बच्चे वाले परिवारों को सरकारी योजनाओं से वंचित करने सम्बन्धी कदम उठाने की भी बात हुई है। इन सबके बीच राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा है कि देश में दम्पत्तियों को 3 बच्चे पैदा करने की जरूरत है। उन्होंने इसके लिए टोटल फर्टिलिटी रेट (TFR) के संबंध में बात की है।

RSS प्रमुख ने क्या कहा?

RSS प्रमुख मोहन भागवत ने यह बयान रविवार (1 दिसम्बर, 2024) को नागपुर में एक सार्वजनिक कायर्क्रम में दिया। उन्होंने कहा, “जनसंख्या में गिरावट चिंता का विषय है। आधुनिक जनसंख्या शास्त्र कहता है कि जब किसी समाज की जनसंख्या का टोटल फर्टिलिटी रेट 2.1 से नीचे चला जाता है तो वह समाज पृथ्वी से खत्म हो जाता है, उसे कोई नहीं मारेगा। कोई संकट न होने पर भी वह समाज नष्ट हो जाता है। उस प्रकार अनेक भाषाएँ और समाज नष्ट हो गये।”

उन्होंने आगे कहा, “TFR 2.1 से नीचे नहीं जाना चाहिए, हमारे देश की जनसंख्या नीति 1998 या 2002 में तय की गई थी। लेकिन इसमें यह भी कहा गया है कि किसी समाज का TFR 2.1 से कम नहीं होनी चाहिए। अब पाॅइंट वन तो इन्सान जन्म नही ले सकता, इसलिये हमे दो से ज्यादा तीन की जरुरत है यही जनसंख्या विज्ञान कहता है।”

उनके इस बयान को लकर असदुद्दीन ओवैसी, कॉन्ग्रेस और सपा ने विरोध जताया। हालाँकि, उनका यह बयान किसी राजनीतिक मुद्दे को लेकर नहीं था। RSS मुखिया मोहन भागवत ने इस बयान में जो चिंता जताई है, वह जायज भी है और उसकी पुष्टि खुद भारत सरकार के आँकड़े करते हैं।

भारत की वर्तमान में जनसँख्या 140 करोड़ से अधिक है। ऐसे में यदि को अधिक बच्चे पैदा करने सम्बन्धी बात करे तो यह काफी अटपटा लगता है। लेकिन यह तर्क पर 100% खरा है और जिन देशों ने समय रहते इस पर एक्शन नहीं लिया, वह आज बड़ी समस्याओं में घिर चुके हैं। भारत में यह समस्या समझने के लिए पहला डाटा समझते हैं।

क्या कहते हैं आँकड़े?

दरअसल, जिस टोटल फर्टिलिटी रेट (TFR) की बात RSS प्रमुख ने की वह जनसंख्या वृद्धि का एक प्रमुख संकेतक है। 15 से 49 वर्ष की कोई महिला इन वर्षों में कितने बच्चों को जन्म देगी, वह TFR कहलाता है। देश भर की इस आयु की महिलाओं द्वारा जन्म दिए गए बच्चों की संख्या का औसत निकाला जाए तो राष्ट्रीय TFR मिलता है।

इससे यह भी पता चलता है कि भविष्य में सामाजिक और आर्थिक रूप से देश की क्या स्थिति होगी और उसकी जरूरतें क्या होगीं। भारत में टोटल फर्टिलिटी रेट जानने के लिए सरकार एक सर्वे करवाती है। यह सर्वे 1990 के दशक से हो रहे हैं। यह नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS) के नाम से जाना जाता है।

अब तक इसके 5 सर्वे हो चुके हैं। सबसे नया सर्वे 2019-20 के बीच किया गया था। इस सर्वे के अनुसार, वर्तमान में देश का TFR 1.99 है। यह आँकड़ा चिंता का विषय इसलिए है क्योंकि यह उस स्तर से कम है, जितना यह होना चाहिए। जनसंख्या विज्ञानियों के अनुसार, किसी भी समाज का औसत TFR 2.1 होना चाहिए।

यदि किसी समाज का TFR 2.1 होगा तभी वह अपनी वर्तमान जनसंख्या बरकरार रख पाएगा। इस रिप्लेसमेंट लेवल TFR कहते हैं। यदि यह आँकड़ा इससे नीचे जाता है तो जनसंख्या आगामी समय में घटती जाएगी। भारत में यह आँकड़ा 2.1 से नीचे आ चुका है। ऐसे में यह चिंता का विषय होना चाहिए।

RSS प्रमुख मोहन भागवत ने भी यही चिंता जताई। भारत से संबंधित आँकड़ों के भीतर जाया जाए, तो और भी चिंताजनक तस्वीर सामने आती है। आँकड़े दिखाते हैं कि मुस्लिमों को छोड़ कर देश के किसी भी धर्म की महिलाओं का रिप्लेसमेंट लेवल TFR 2.1 नहीं है।

मोहन भागवत tfr

इस ग्राफ से यह समस्या समझी जा सकती है। 1990 के दशक में उदारीकरण और शिक्षा का प्रचार-प्रसार बढ़ने के कारण लगातार देश में सभी समाज में तेजी से TFR में गिरावट आई है। इसका असर यह है कि हिन्दू, सिख और जैन धर्म 2 से नीचे आ चुके हैं।

ग्राफ में दिखता है कि देश के TFR में 1992-93 से अब तक 41% की कमी आ चुकी है। वर्तमान में मुस्लिमों का ही देश में TFR 2.1 के स्तर से ऊपर है। उनका TFR वर्तमान में 2.36 है।

घटता TFR समस्या क्यों?

घटता TFR वर्तमान में जापान, कोरिया, चीन समेत तमाम पश्चिमी देशों की समस्या है। जापान और कोरिया में यह समस्या विकराल रूप धारण कर चुकी है। कोरिया में वर्तमान में TFR 0.7 है। यानी औसतन एक महिला एक भी बच्चे को जन्म नहीं दे रही है। यह विश्व में सबसे कम है। कोरिया ने इस समस्या से लड़ने के लिए पुरुषों की पेड छुट्टियों में तक बढ़ोतरी की है।

इसके अलावा इस छुट्टी की अवधि 90 दिन से 120 दिन कर दी है। सरकार ने यह भी फैसला लिया है कि जिन भी घरों में 1 वर्ष के कम की आयु के बच्चे हैं, उन्हें ₹63,500/माह देगी। वहीं 2 वर्ष से कम आयु वाले बच्चों के घरों को सरकार ने ₹42000 से अधिक देने की घोषणा भी की है।

कम TFR के चलते कोरिया की जनसंख्या भी घटने लगी है। उसकी जनसंख्या 2018 में 5.18 करोड़ थी जो कि अब घट कर लगभग 5.16 करोड़ हो गई है। कोरिया को चिंता है कि यदि उसकी इसी तरह जनसंख्या घटती रही तो उसे राष्ट्रीय सुरक्षा से लेकर काम करने वाले लोगों तक की समस्या झेलनी पड़ेगी। कोरिया के जैसे ही हाल जापान का है।

जापान के पूर्व प्रधानमंत्री फुमियो किशिदा के एक वरिष्ठ सलाहकार ने हाल ही में कहा था कि यदि जापान में जन्म दर नहीं सुधरी तो देश एक दिन गायब हो जाएगा। जापान का TFR 1.26 है। यह लगातार घटता जा रहा है। इस घटते TFR के चलते जापान की लगभग 33% जनसंख्या अब 65 वर्ष या उससे अधिक है। जापान को इसके चलते श्रमिक समस्या से भी जूझना पड़ रहा है।

जापान की सरकार ने भी इसको लेकर कई कदम उठाए हैं। चीन का भी यही हाल है। चीन ने समस्या को भांपते हुए 1979 में लगाया गया एक बच्चा नियम 2016 में हटा दिया था। हालाँकि, इसके बाद भी चीन की जनसंख्या पिछले 2 साल से घट रही है।

यदि इन सब देशों के उदारहण को देखा जाए तो RSS प्रमुख की बात समय से पहले दी गई चेतावनी लगती है। RSS प्रमुख के बयान को खारिज करने वालों को भी यह उदाहरण देखने चाहिए। भारत भी समस्या रहते अगर चेत जाता है तो उसे ना आगे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए चिंता करनी होगी और ना ही उसे बूढ़ी होती जनसंख्या का दंश झेलना पड़ेगा।

‘तुम किससे पंगा ले रहे हो, हम भाई के घर के पास रहते हैं’: चैंपियंस ट्रॉफी पर पाकिस्तान के पूर्व विकेटकीपर राशिद लतीफ ने दाऊद इब्राहिम की दिखाई धौंस, ‘मुस्लिम डॉन’ की भी दे चुका है धमकी

पाकिस्तान के पूर्व क्रिकेटर राशिद लतीफ ने एक यूट्यूब शो ‘Caught Behind’ में भारत के मोस्ट वांटेड अपराधी दाऊद इब्राहिम से अपनी नजदीकी का दावा किया। दाऊद इब्राहिम 1993 मुंबई बम धमाकों का मास्टरमाइंड है, जिनमें 257 लोग मारे गए थे और 1,400 से ज्यादा घायल हुए थे।

होस्ट डॉ. नौमान नियाज़ से बात करते हुए लतीफ ने कहा, “तुम्हें क्या लगता है, तुम किससे पंगा ले रहे हो? हम भाई के घर के पास रहते हैं।” लतीफ कराची में रहते हैं, वही शहर जहाँ दाऊद इब्राहिम पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI की सुरक्षा में रह रहा है।

यह चर्चा भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (BCCI) और पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड (PCB) के बीच 2025 चैंपियंस ट्रॉफी को लेकर चल रहे विवाद पर हो रही थी। BCCI ने पाकिस्तान में खेलने से इनकार कर दिया था और माँग की थी कि भारत के मैच न्यूट्रल वेन्यू (जैसे दुबई) पर खेले जाएँ। दूसरी ओर, PCB पूरे टूर्नामेंट को पाकिस्तान में ही आयोजित करने पर अड़ा था।

जय शाह के ICC में प्रभावी भूमिका निभाने और PCB द्वारा हाइब्रिड मॉडल पर विचार करने की खबरों के बीच लतीफ ने अपनी कथित नजदीकी दिखाकर भारत को धमकी देने की कोशिश की।

यह पहली बार नहीं है जब राशिद लतीफ ने विवादित बयान दिया है। सोशल मीडिया पर उनके कई वीडियो वायरल हुए हैं, जिनमें उसका कट्टरपंथी इस्लामी पक्ष नजर आता है। एक वीडियो में लतीफ ने दावा किया था कि भारत के ज्यादातर ऐतिहासिक स्मारक उनके पूर्वजों ने बनाए हैं। उसने यह भी कहा था कि भारत में 14 डॉन हैं और वे सभी उनकी कौम से ताल्लुक रखते हैं। साथ ही उन्होंने चेतावनी दी थी कि उन्हें मजबूर न किया जाए वरना वे भी डॉन बन सकते हैं।

राशिद लतीफ का यह नया बयान BCCI और PCB के बीच 2025 चैंपियंस ट्रॉफी को लेकर चल रहे गतिरोध के बीच आया है।

बता दें कि नवंबर के पहले हफ्ते में BCCI ने आधिकारिक रूप से PCB को सूचित किया था कि भारतीय क्रिकेट टीम सुरक्षा चिंताओं के कारण पाकिस्तान यात्रा नहीं करेगी। BCCI ने भारत के मैच न्यूट्रल वेन्यू (जैसे दुबई) में कराने की इच्छा जताई थी। ICC ने 2025 चैंपियंस ट्रॉफी की मेजबानी के लिए पाकिस्तान को चुना था, लेकिन भारत-पाक के कूटनीतिक तनाव के चलते भारतीय टीम की भागीदारी पर सवाल उठने लगे। अब खबरें हैं कि PCB कुछ शर्तों के साथ हाइब्रिड मॉडल को मंजूरी देने के करीब है।

कुआँ पूजन, शादी-ब्याह, पूजा-पाठ… हरिहर मंदिर में सब होता था: संभल के बुजुर्गों ने जामा मस्जिद मानने से किया इनकार, बताया- दीवारें बनाकर हिंदुओं का प्रवेश किया बंद

उत्तर प्रदेश का संभल इस्लामी कट्टरपंथियों की हिंसा के कारण लगातार चर्चा में है। ऐसे में हर मीडियाकर्मी ग्राउंड पर जाकर अपनी पड़ताल को साझा कर रहा है। हाल में स्वराज्य पत्रकार स्वाति गोयल शर्मा भी स्थिति जानने वहाँ पहुँचीं और एक्स अकाउंट (पूर्व में ट्विटर) पर बताया कि इलाके के बुजुर्ग हिंदू और उनके पूर्वज विवादित स्थल को लेकर क्या बताते आए हैं।

स्वाति गोयल के ट्वीट के अनुसार, ये शाही जामा मस्जिद संभल के कोट इलाके में है। ये जगह दो भागों में बँटा हुआ है, एक कोट पूर्वी और दूसरा कोट गर्भी। मुख्य द्वार के सामने ज्यादातर हिंदू रहते हैं। पत्रकार ने इन्हीं कुछ हिंदुओं से मुलाकात की।

इनमें एक 66 साल के अनिल टंडन भी हैं। अनिल टंडन बताते हैं कि वो कोट पूर्वी इलाके में रहते हैं और उनके परिवार ने हमेशा उस इमारत को हरिहर मंदिर ही माना है।

टंडन ने बताया कि पहले यहाँ हरिहर मंदिर ही था। 8 साल की उम्र में वो अपने परिजनों के साथ मंदिर जाया करते थे जोकि मस्जिद के भीतर है। मगर, बाद में हिंदुओं की एंट्री परिसर में रोक दी गई। यहाँ दीवारें बना दी गई और कमरे को बंद करके ताला लटका दिया गया। अंदर एक कुंड भी है।

इसी प्रकार 75 साल के अरविंद अरोड़ा ने बताया कि उनका परिवार 1947 में लाहौर से आया था। परिवार को पता चला कि ये जगह हरिहर मंदिर है और यहाँ ज्यादातर विस्थापित पंजाबी रहते थे लेकिन बाद में माहौल बिगड़ने के बाद वो इलाके को छोड़ने लगे।

इसके बाद 90 साल की मुन्नी देवी ने बताया- “पहले अंदर कुआँ था जो खुला हुआ था, फिर आधा हिस्सा भीतर ले लिया गया और आधा बाहर रह गया। हम लोग वहाँ कुआँ पूजने जाते थे। उन्होंने कहा, “मेरे जितने बच्चे हुए सबका कुआँ वहीं पूजा गया। बाकी फिर इन्होंने कुआँ पूजना बंद करवा दिया।” मुन्नी देवी ने कहा- “हमें ये लगता नहीं है ये हरिहर मंदिर ही है। इन लोगों ने कभी अंदर जाने नहीं दिया। मगर हमारे घर में पानी उसी कुएँ से आता था।”

गौरतलब है कि स्थानीय बुजुर्गों की बातचीत से यही पता चलता है कि शाही जामा मस्जिद में पहले लोगों का आना-जान था, मगर बाद में हर चीज बंद करवा दी गई। इलाके के बुजुर्ग अब भी याद करते हैं कि कैसे अपने बचपन या युवावस्था में वो मंदिर जाते थे। उनके पुरखे उन्हें साफ कहते थे कि ये मस्जिद नहीं मंदिर है। बातचीत के दौरान कोई भीतर बने कुंड की बात बताता है तो कोई साफ कहता है कि यहाँ मंदिर तोड़कर मस्जिद बनवाया गया है।

इससे पहले बता दें कि इस स्थल को लेकर भाजपा विधायक शलभ मणि त्रिपाठी ने भी टिप्पणी की थी। उन्होंने एक्स पर पोस्ट करते हुए कहा था कि संभल में जामा मस्जिद हरि मंदिर था। जिसे समाजवादी पार्टी की सरकार ने 2012 में जामा मस्जिद में तब्दील करा दिया था। इसके अलावा ये भी कहा जा रहा है कि साल 2012 से पहले इस जगह पर हिंदू माताएँ पूजा-पाठ करने जाती थीं। इसके अलावा यहाँ शादी ब्याह के कार्यक्रम भी कराए जाते थे। बच्चा बच्चा इसे हरि मंदिर के नाम से जानता था। बाद में सपा के शफीकुर्रहमान बर्क के दबाव में उनकी पार्टी की सरकार ने यहाँ पूजा बंद करवा दी और हिंदुओं को वहाँ जाने से रोक दिया गया।

दरवाजे पर लिखा ‘मकान बिकाऊ है’ तो जागी पुलिस, लेकिन जेल से बाहर आते ही फिर धमकाने लगा शादाब और उसक परिवार: पीड़ित दलित ने जताई अनहोनी की आशंका

मध्य प्रदेश के इंदौर की बगीचे कॉलोनी में रहने वाले एक दलित परिवार ने आरोप लगाया है कि मुस्लिम समुदाय के शादाब और कुछ लोग उन्हें लगातार धमका रहे हैं और उनकी जान को खतरा है। इस परिवार ने रविवार (17 नवंबर 2024) को अपने घर के बाहर पलायन का पोस्टर लगा दिया था। पहले पुलिस ने मामले में कार्रवाई करते हुए आरोपितों को जेल भेजा था, लेकिन अब उनकी जमानत के बाद पीड़ित परिवार बेहद डरा हुआ है। हालाँकि पुलिस ने राजेश और उनके परिवार को सुरक्षित बताया है।

दैनिक भास्कर के मुताबिक, पीड़ित परिवार के मुखिया राजेश कलमोइया ने बताया कि जमानत पर रिहा हुए आरोपित शादाब के परिवार के लोग उनके परिवार वालों को घूर-घूरकर देख रहे हैं। उन्होंने कहा, “जब से ये लोग जेल से बाहर आए हैं, हमें लग रहा है कि हमारे साथ कुछ भी अनहोनी हो सकती है। पुलिस ने पहले भरोसा दिया था कि आरोपितों पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) लगाया जाएगा, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ।”

परिवार ने दावा किया है कि उन्हें लगातार धमकियाँ मिल रही हैं। राजेश ने बताया कि पहले पुलिस उनके घर पर लगातार आती थी, लेकिन अब कई दिनों से उनकी गली में भी नजर नहीं आई। परिवार का कहना है कि ऐसे हालातों में उनके पास केवल दो विकल्प बचे हैं- या तो पलायन करें या आत्महत्या। हालाँकि पुलिस ने राजेश को सुरक्षित बताया है। स्थानीय SHO के मुताबिक राजेश की तरफ से अपनी नई शिकायतों के बारे में कोई तहरीर नहीं दी गई है।

17 नवंबर को लगाए थे पलायन के पोस्टर

राजेश ने 17 नवंबर को अपने घर के बाहर पलायन के पोस्टर लगाए थे। उनका आरोप था कि शादाब और अन्य आरोपितों ने उन्हें और उनके परिवार को परेशान किया। मामला तब बढ़ा, जब हिंदू संगठनों ने कार्रवाई की माँग की। इसके बाद पुलिस ने SC/ST एक्ट और अन्य धाराओं के तहत मुख्य आरोपित शादाब समेत 7 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी।

केस वापसी का दबाव बनाया और घर के बाहर किया धमाका

राजेश ने बताया कि शादाब और अन्य आरोपित लगातार उन पर केस वापसी का दबाव बना रहे थे। इसमें शादाब के परिवार की महिलाएँ भी शामिल थीं। राजेश के अनुसार, जब उन्होंने केस वापस लेने से मना कर दिया, तो उनके घर के बाहर विस्फोटक से धमाका किया गया। इस मामले में रईस नाम के एक अन्य व्यक्ति को भी नामजद किया गया था।

पुलिस की भूमिका पर उठ रहे सवाल

पीड़ित परिवार ने पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए कहा कि पहले तो पुलिस ने आश्वासन दिया था कि सख्त कदम उठाए जाएँगे, लेकिन अब पुलिस गायब है। परिवार ने पलायन को मजबूरी बताया और कहा कि उनकी सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की गई तो उन्हें आत्महत्या का कदम उठाना पड़ सकता है।

हाईवे जाम न करें, जनता को दिक्कत न हो: सुप्रीम कोर्ट ने किसान संगठनों को पढ़ाया ‘शांतिपूर्ण प्रदर्शन’ का पाठ, इधर दिल्ली कूच से नोएडा बॉर्डर पर हाल-बेहाल

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (2 दिसंबर 2024) को पंजाब के किसान नेता जगजीत सिंह डल्लेवाल से कहा कि किसान प्रदर्शन शांतिपूर्ण और जिम्मेदारी से किए जाएँ। कोर्ट ने साफ कहा कि प्रदर्शनकारी हाईवे जाम न करें और न ही आम जनता को परेशान करें।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने जगजीत सिंह डल्लेवाल की ओर से दायर हैबियस कॉर्पस याचिका पर सुनवाई की। याचिका में दावा किया गया था कि डल्लेवाल को खनौरी बॉर्डर से जबरन हटाकर लुधियाना के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया था। कोर्ट ने याचिका का निपटारा करते हुए कहा कि डल्लेवाल को अब रिहा कर दिया गया है और वे दोबारा आंदोलन में शामिल हो चुके हैं।

इस बीच, नोएडा की तरफ से किसानों ने दिल्ली कूच किया है। किसान संगठनों में शामिल प्रदर्शनकारियों ने महामाया फ्लाईओवर के पास लगाई गई यूपी पुलिस की बैरिकेडिंग को उखाड़ फेंका और आगे बढ़ गए। हालाँकि पुलिस ने उन्हें दलित प्रेरणा स्थल के सामने ही रोक लिया है।

डल्लेवाल का आरोप: ‘अस्पताल में नजरबंद किया गया’

जगजीत सिंह डल्लेवाल ने अपनी हिरासत को लेकर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि उन्हें जबरन अस्पताल में रखा गया और न तो मीडिया से मिलने दिया गया, न ही फोन तक पहुँचने दिया गया। उनका कहना था, “अगर मुझे जाँच के लिए भर्ती किया गया होता, तो मीडिया से मिलने की अनुमति होती। लेकिन यह असल में पुलिस हिरासत थी।”

डल्लेवाल को शुक्रवार (29 नवंबर 2024) को अस्पताल से डिस्चार्ज किया गया, जिसके बाद खनौरी बॉर्डर पर उनका जोरदार स्वागत किया गया। संयुक्त किसान मोर्चा (गैर-राजनीतिक) के वरिष्ठ नेता सरवन सिंह पंधेर ने डल्लेवाल को समर्थन देते हुए आंदोलन जारी रखने की बात कही।

प्रदर्शनों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने दी सलाह

सुप्रीम कोर्ट ने किसानों से अपील की कि वे प्रदर्शन जरूर करें, लेकिन कानून के दायरे में रहते हुए। कोर्ट ने कहा कि लोकतंत्र में शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार सबको है, लेकिन इसे जिम्मेदारी से करना चाहिए ताकि जनता को कोई असुविधा न हो। कोर्ट ने यह भी कहा कि खनौरी बॉर्डर पंजाब की ‘लाइफलाइन’ है और इसे बाधित करना सही नहीं है।

जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस उज्जल भुयान की बेंच ने डल्लेवाल से उम्मीद जताई कि वे अपने प्रदर्शनकारी साथियों को कानून का पालन करने और प्रदर्शन को व्यवस्थित तरीके से करने के लिए प्रेरित करेंगे।

बता दें कि 13 फरवरी 2024 से शुरू हुए इस आंदोलन में किसान दिल्ली की ओर मार्च कर रहे थे, लेकिन उन्हें शंभू और खनौरी बॉर्डर पर रोक दिया गया। प्रदर्शनकारियों ने केंद्र सरकार पर उनकी माँगों की अनदेखी करने का आरोप लगाया है। उनकी मुख्य माँगें हैं:

  1. न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) को कानूनी दर्जा दिया जाए।
  2. स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें लागू की जाएँ।
  3. किसानों और कृषि मजदूरों के लिए पेंशन योजना शुरू की जाए।
  4. किसानों का कर्ज माफ किया जाए।
  5. भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 2013 को फिर से लागू किया जाए।
  6. 2020-21 के किसान आंदोलन में जान गँवाने वाले किसानों के परिवारों को मुआवजा दिया जाए।

सुप्रीम कोर्ट ने प्रदर्शन की वैधता पर कोई टिप्पणी नहीं की, लेकिन यह स्पष्ट किया कि विरोध शांतिपूर्ण और व्यवस्थित होना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि अगर भविष्य में किसी कानूनी मदद की जरूरत होगी, तो उसके लिए उचित प्रक्रिया अपनाई जा सकती है।

मुस्लिमों को भारत की इंच-इंच जमीन का मालिक बनाना चाहती है TMC, सांसद कल्याण बनर्जी बोले- जिस जगह पर हो नमाज, वह बने वक्फ प्रॉपर्टी: कोलकाता रैली का Video वायरल

तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के सांसद कल्याण बनर्जी ने हर उस जगह को वक्फ घोषित करने को कहा है जहाँ पर मुस्लिम इकट्ठा होकर नमाज पढ़ते हों। उन्होंने यह बयान हजारों मुस्लिमों की भीड़ के बीच दिया है। बनर्जी खुद भी वक्फ बोर्ड पर लाए गए बिल पर बनी संयुक्त संसदीय समिति में शामिल हैं।

कल्याण बनर्जी का यह वीडियो भाजपा आईटी सेल के मुखिया अमित मालवीय ने एक्स (पहले ट्विटर) पर साझा किया है। इस वीडियो में कल्याण बनर्जी कहते हुए दिखते हैं, “जहाँ पर भी आप नमाज पढ़ते हैं, उसको वक्फ प्रॉपर्टी की तरह लिया जाना चाहिए। अगर एक जगह पर 20-25 लोग लगातार नमाज पढ़ते हैं, तो उसे भी वक्फ सम्पत्ति माना जाए।”

कल्याण बनर्जी ने नमाज वाली हर जगह को वक्फ घोषित करने की यह बात कोलकाता में आयोजित एक रैली में की, इस रैली में माँग की गई कि केंद्र सरकार वक्फ संशोधन बिल वापस करे। इस रैली की तस्वीरों में हजारों मुस्लिम दिखाई पड़ रहे हैं।

कल्याण बनर्जी के इस बयान को आधार माना जाए तो इस देश में सड़क, एयरपोर्ट, रेलवे स्टेशन और फुटपाथ समेत तमाम उन जगह को वक्फ सम्पत्ति घोषित करने की माँग की जा सकती है, जहाँ मुस्लिम नमाज पढ़ते हों। कई ऐसे सार्वजनिक मैदान भी हैं, जहाँ मुस्लिम लगातार नमाज पढ़ते हैं, कल्याण बनर्जी के बयान को आधार माना जाए तो यह भी वक्फ हो जाएँगे।

अमित मालवीय ने उनके इस बयान की आलोचना की है। अमित मालवीय ने कहा,”अगर चुनावी फायदे के लिए इस तरह के विचारों को बढ़ावा दिया जाता है, तो बंगाली हिंदू समुदाय को गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। यहाँ तक ​​कि उन्हें अपनी मातृभूमि पश्चिम बंगाल से विस्थापित होने का खतरा हो सकता है। ममता बनर्जी और TMC बंगाल में हिंदुओं का पूरी तरह सफाया सुनिश्चित करेंगी, ठीक वैसे ही जैसे पाकिस्तान और बांग्लादेश में हुआ है।”

पश्चिम बंगाल के सीरमपुर से सांसद कल्याण बनर्जी वक्फ संशोधन को लेकर बनाई गई JPC में शामिल हैं, उन पर इसकी बैठकों में हंगामा करने का आरोप भी लगा है। इससे पहले उन्होंने एक बैठक में कांच के गिलास से अपना हाथ चोटिल कर लिया था। उन्होंने ऐसा वक्फ बिल का विरोध करते हुए किया था।

संभल की जिस इमारत को मुस्लिम कहते हैं जामा मस्जिद उसकी फर्श से लेकर छत तक सब बदल दिया, कोर्ट से माँग- ASI को मिले कंट्रोल, आम लोगों को प्रवेश की हो इजाजत

उत्तर प्रदेश के संभल के शाही जामा मस्जिद बनाम हरिहर मंदिर केस में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की टीम ने कोर्ट में हलफनामा दायर कर दिया है। इस हलफनामे को दायर करते हुए अदालत को बताया गया कि कैसे 1920 से एएसआई पर ही इस मस्जिद के संरक्षण और रखरखाव की जिम्मेदारी है, लेकिन बावजूद इसके उन्हें लंबे समय से मस्जिद में जाने नहीं दिया गया।

ASI ने जहाँ अपने लिखित बयान में माँग की कि शाही जामा मस्जिद का कंट्रोल और प्रबंधन उन्हें वापस मिले। वहीं केंद्र के वकील विष्णु शर्मा ने कानून के उल्लंघन का हवाला देते हुए माँग की कि मस्जिद में आम लोगों को जाने की भी इजाजत दिया जाए।

एएसआई की ओर से अदालत में दावा किया है कि 1920 में केंद्रीय संरक्षित स्मारक घोषित की गई शाही जामा मस्जिद की संरचना में कई बार बदलाव किए गए हैं। इस हलफनामे में यह भी कहा गया है कि मस्जिद कमेटी ने एएसआई के सर्वेक्षण कार्य में रुकावट डाली। एएसआई ने स्पष्ट रूप से कहा है कि मस्जिद कमेटी ने उनकी टीम को कई बार सर्वेक्षण कार्य करने से रोका। इस दौरान केंद्र के वकील विष्णु शर्मा ने अदालत में एएसआई के जवाब के साथ कुछ तस्वीरें भी पेश कीं, जो मस्जिद में किए गए बदलावों का प्रमाण देती हैं।

बता दें कि संभल की जामा मस्जिद को लेकर हिंदू पक्ष ने दावा किया है कि ये स्थान हरिहर मंदिर का है और 1529 में यहाँ एक मस्जिद बनाई गई थी। इसी दावे के बाद कोर्ट ने सर्वे को मंजूरी दी मगर ASI अधिकारियों के अनुसार, मस्जिद तक जाने पर उन्हें लगातार अवरोधों का सामना करना पड़ा, जिसके चलते ASI को मस्जिद के वर्तमान स्वरूप और उसमें हुए परिवर्तनों की जानकारी नहीं मिल पाई।

हालाँकि पता हो कि इस मस्जिद का पहले दौरा 1998 में हुआ था और उसके बाद प्रशासन और पुलिस के सहयोग से 26 जून 2024 को ASI की टीम को मस्जिद का निरीक्षण करने का अवसर मिला था, जिसमें उन्होंने कई महत्वपूर्ण बदलाव देखे थे। इन सबके बारे में कोर्ट को अवगत कराया गया है।

एएसआई ने बताया कि मस्जिद में प्राचीन इमारतों और पुरातात्विक अवशेषों के संरक्षण अधिनियम 1958 के प्रावधानाओं का उल्लंघन हो रहा है। ASI ने बताया कि मस्जिद की सीढ़ियों पर अवैध स्टील रेलिंग लगाई गई है, जिसके खिलाफ 19 जनवरी 2018 को FIR दर्ज कराई गई थी (यह कॉपी भी कोर्ट को दी गई है)। यह रेलिंग उनकी बिना अनुमति के लगी है।

इसी तरह मुख्य हॉल के हौज का पत्थर लगाकर नवीनीकरण किया गया है, जिससे मस्जिद का मूल स्वरूप प्रभावित हुआ है। इसके अलावा, मुख्य द्वार से अंदर आते ही पुराने फर्श को बदलकर नया फर्श लगाया गया है। वहीं मुख्य हॉल के गुंबद से लोहे की चेन से कांच का झूमर लटकाया गया है।

आगे एएसआई ने यह भी कहा कि मस्जिद को इनेमल पेंट की मोटी परतों से पूरी तरह से पेंट किया गया है और प्लास्टर ऑफ पेरिस का उपयोग किया गया है, जिससे मस्जिद की ऐतिहासिकता खत्म हो रही है। इसके अलावा बता दें कि मस्जिद में एएसआई ने कई अतिरिक्त निर्माण कार्य भी देखे। जैसे मस्जिद में छोटे कमरे बंद किए जा चुके हैं। वहीं मस्जिद के 1875-76 के रेखा चित्र देखने पर भी सामने आता है कि मस्जिद के ऊपर हिस्से पर कुछ कमाननुमा स्ट्रक्चर था, जो कि अब नहीं है।

उल्लेखनीय है कि शाही मस्जिद के कमेटी के प्रमुख जफर अली ने इस हलफनामे के बाद कोर्ट में माना कि मस्जिद 1920 से एएसआई संरक्षित स्मारक है और इसमें उन्हें किसी प्रकार का बदलाव कराने की इजाजत नहीं है। लेकिन फिर भी यहाँ परिवर्तन हुए। जफर ने यह भी बताया कि मस्जिद में एक ऐसा कमरा और कुआं भी है जो 100 साल पुराना है। अब कोर्ट इस पूरे मामले में अगली सुनवाई 8 जनवरी 2025 को होनी है।

पहले चलाया बांग्लादेश में ‘मंदिरों की रक्षा कर रहे मुस्लिम’ नैरेटिव, अब कह रहा हिंदुओं पर हमलों को करें नजरअंदाज: इस्लामी कट्टरपंथियों की ढाल बना ‘The Caravan’ का पत्रकार

वामपंथी प्रोपेगेंडा मैगजीन ‘द कारवाँ’ ही नहीं, बल्कि उसमें काम कर रहे लोग भी हिंदुओं के खिलाफ घृणा और हिंदुओं के दमन की खबरों को दबाने में लगे हैं। हाल ही में ‘द कारवाँ’ के कॉन्ट्रिब्यूटिंग एडिटर सलिल त्रिपाठी ने बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे हमलों को लेकर बात करने वालों को चुप कराने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि इस मामले पर सिर्फ बांग्लादेशियों को ध्यान देना चाहिए और बाकी लोगों को इससे कोई मतलब नहीं रखना चाहिए।

ट्रंप प्रशासन और बांग्लादेश की स्थिति पर चर्चा में कूदे

हाल ही में जब जियोपॉलिटिकल एनालिस्ट जेफ एम. स्मिथ ने सुझाव दिया कि ट्रंप प्रशासन को बांग्लादेश में हिंदुओं की स्थिति पर भारत की चिंताओं को समझना चाहिए, तो सलिल ने रविवार (1 दिसंबर 2024) को एक्स पर कहा, “बांग्लादेश में जो कुछ हो रहा है, वो बांग्लादेशियों का मामला है। दूसरों को इसमें दखल नहीं देना चाहिए, जब तक उनका कोई एजेंडा न हो।”

सलिल ने सोशल मीडिया पर बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे हमलों को लेकर आवाज उठाने वालों के इरादों पर सवाल खड़े किए। इससे ऐसा लगा कि वो लोगों को इस मुद्दे पर बोलने से हतोत्साहित करना चाहते थे।

यह कोई नई बात नहीं है। वामपंथी और उदारवादी तबके अक्सर इस तरह के तरीकों का इस्तेमाल करते हैं। उनकी कोशिश होती है कि जो लोग उनके नैरेटिव के खिलाफ बोलें, उन्हें चुप कराया जाए। सलिल त्रिपाठी ने भी इसी रणनीति के तहत, बांग्लादेश में कट्टरपंथी मुस्लिमों द्वारा हिंसा के मुद्दे से चर्चा को भटकाने का प्रयास किया।

इसी तरह से सलिल ने इसी साल 6 अगस्त को ट्वीट किया था कि “युवा मुसलमान बांग्लादेश में हिंदू मंदिरों की रक्षा कर रहे हैं।” यह ट्वीट उस समय आया जब शेख हसीना को प्रधानमंत्री पद से हटाया गया था।

सलिल के ट्वीट का मकसद यह दिखाना था कि मुस्लिम हिंदू मंदिरों की रक्षा कर रहे हैं, जबकि सच्चाई यह थी कि हिंदुओं और उनके मंदिरों पर हमले हो रहे थे। इस तरह उन्होंने मुद्दे से ध्यान हटाने की कोशिश की। ऐसे में साफ है कि उनके ध्यान भटकाने वाले ट्वीट का उद्देश्य मुस्लिम भीड़ द्वारा हिंदुओं और उनके मंदिरों पर किए गए अत्याचारों से ध्यान हटाकर हिंदू पूजा स्थलों की ‘रक्षा’ करने के फोटो-ऑप्स की ओर ध्यान केंद्रित करना था।

बांग्लादेश में हिंदुओं पर लगातार हो रहे हमले

बता दें कि बांग्लादेश में इस साल 5 अगस्त को आवामी लीग प्रमुख शेख हसीना के नेतृत्व वाली सरकार के पतन के बाद से ही कट्टरपंथियों द्वारा हिंदू अल्पसंख्यकों और उनके धार्मिक व्यापारिक प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया जा रहा है। बांग्लादेश में इस समय मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार शासन देख रही है। उस पर चरमपंथियों को पराश्रय देने का आरोप है। शेख हसीना सरकार के पतन के कुछ दिनों के भीतर हिंदू मंदिरों, दुकानों और व्यवसायों पर कम से कम 205 हमले  हुए हैं।

इसी कड़ी में बांग्लादेश में इस्कॉन के संत को गिरफ्तार कर लिया गया है। उनके खिलाफ देशद्रोह का मामला चलाया जा रहा है। यहाँ तक कि हिंदू संतों को देश से बाहर भी नहीं जाने दिया जा रहा है, तो हिंदुओं की पहचान कर उन्हें निशाना बनाए जाने की भी जानकारी सामने आई।

चटगाँव में एक हिंदू युवक को ईशनिंदा के आरोप में उसकी मॉब लिंचिंग के लिए इस्लामी कट्टरपंथियों की भीड़ ने पूरे थाने को ही घेरा लिया और आर्मी की गाड़ियों तक में आग लगा दी थी।

ओपइंडिया ने पहले बताया था कि कैसे खुलना के सोनाडांगा इलाके में एक मुस्लिम भीड़ ने हिंदू लड़के उत्सव मंडल को ‘ईशनिंदा’ के आरोप में लगभग मार डाला था।

यह भी खुलासा हुआ था कि मुस्लिम छात्रों ने 60 से अधिक हिंदू शिक्षकों, प्रोफेसरों और सरकारी अधिकारियों को अपने पदों से इस्तीफा देने के लिए मजबूर किया है।

हाल ही में, मानवाधिकार कार्यकर्ता और निर्वासित बांग्लादेशी ब्लॉगर असद नूर ने बताया कि अल्पसंख्यक समुदाय को ‘जमात-ए-इस्लामी’ में शामिल होने के लिए मजबूर किया जा रहा है।

6 सितंबर को चटगाँव के कादम मुबारक इलाके में गणेश उत्सव के दौरान हिंदू भक्तों की एक शोभायात्रा पर भी हमला हुआ था।

हिंदू लड़कियों को फँसाने के लिए शादी वाली साइट का इस्तेमाल कर रहे लव जिहादी: मोहम्मद हुसैन ने राहुल नाम से बनाई प्रोफाइल, दलित लड़की को मिलने के लिए बुलाकर किया रेप

मध्य प्रदेश के जबलपुर से लव जिहाद का एक मामला सामने आया है। यहाँ एक मुस्लिम युवक ने अपनी पहचान छुपा कर एक दलित महिला का रेप किया। मुस्लिम युवक ने दलित महिला को एक मैट्रिमोनियल वेबसाइट से अपने प्रेमजाल में फँसाया था। इसके बाद उसने कई बार रेप किया और बाद में उसने शादी से भी इनकार कर दिया। पीड़िता ने इस सबंध में FIR दर्ज करवाई है। पुलिस ने आरोपित को गिरफ्तार कर लिया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक यह घटना जबलपुर के थानाक्षेत्र लॉर्डगंज की है। दलित महिला के साथ रेप करने वाले युवक का नाम मोहम्मद हुसैन है। उसने राहुल नाम बताकर दलित महिला को अपने प्रेमजाल में फँसाया और फिर रेप किया। इस संबंध में दर्ज करवाई गई शिकायत में 37 वर्षीय दलित ने बताया कि उसने डेढ़ साल पहले उन्होंने मैट्रिमोनियल साइट पर राहुल नाम की प्रोफ़ाइल देखी। इस प्रोफ़ाइल वाले युवक से पीड़िता ने बातचीत शुरू की। इसके बाद दोनों दोस्त बन गए।

एक दिन राहुल और पीड़िता एक रेस्टोरेंट में मिले। यहाँ दोनों ने एक-दूसरे को पसंद कर लिया और शादी करने पर भी सहमति जताई। पीड़िता ने बताया कि उसने राहुल नाम का विश्वास कर लिया। उसे राहुल ने 22 सितंबर, 2024 को मुलाकात के बहाने एक होटल में बुलवाया। यहाँ उसने पीड़िता से रेप किया। कुछ दिनों के बाद वह शादी करने से मुकर गया। यही नहीं, दबाव बनाने पर उसने पीड़िता को जान से मार डालने की धमकी भी दी।

इसके बाद पीड़िता को पता चला कि जिसे वो राहुल समझ रही थी वो असल में मोहम्मद हुसैन है। धोखा खाने के बाद पीड़िता पुलिस के पास पहुँची। उसने लॉर्डगंज थाने में एक FIR दर्ज करवाई। पुलिस ने इस संबंध जाँच की। इसके बाद मोहम्मद हुसैन को गिरफ्तार कर लिया गया। उस पर रेप समेत SC/ST और बाकी धाराओं में मामला दर्ज किया गया है। पुलिस ने उस वेबसाइट को भी नोटिस भेजा है जिस पर राहुल ने मोहम्मद हुसैन नाम से प्रोफाइल बनाई थी।

पुलिस यह भी पड़ताल कर रही है कि मोहम्मद हुसैन ने और कितनी लड़कियों को इसी तरह अपना शिकार बनाया है। मामले में जाँच और आगे की कानूनी कार्रवाई जारी है।