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मस्जिद पर निचली अदालतें चुप रहे, कुरान पर हाई कोर्ट… वरना दंगे होंगे, गिरेंगी लाशें: ‘कलकत्ता कुरान’ मामले में एक CM ने हजारों की मुस्लिम भीड़ से कहा था – जज पर लो एक्शन

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने गुरुवार (28 नवंबर) को सुप्रीम कोर्ट को एक पत्र भेजा। इसमें मुस्लिम बोर्ड ने सर्वोच्च न्यायालय से अनुरोध किया है कि देश की निचली अदालतों को मस्जिदों से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई नहीं करने का निर्देश दे। पत्र ऐसे समय लिखा गया है, जब ट्रायल कोर्ट के आदेश पर संभल के जामा मस्जिद के सर्वे के दौरान इस्लामी भीड़ द्वारा हिंसा की गई।

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने अपने पत्र में साल 1991 के उपासना स्थल अधिनियम (प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट 1991) का हवाला दिया है। इसमें वाराणसी के ज्ञानवापी मस्जिद, मथुरा का शाही ईदगाह, धार के भोजशाला मस्जिद, लखनऊ की टीले वाली मस्जिद, संभल की शाही जामा मस्जिद और अजमेर के मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह जैसी याचिकाओं पर विचार नहीं करने का अनुरोध किया गया है।

इस इस्लामी संस्था ने अपने पत्र में आगे लिखा है, “डॉक्टर SQR इलियास (AIMPLB के राष्ट्रीय प्रवक्ता) ने भारत के मुख्य न्यायाधीश से इस मामले में तत्काल स्वत: संज्ञान लेते हुए कार्रवाई करने और निचली अदालतों को किसी भी अन्य विवाद के लिए दरवाजे खोलने से परहेज करने का निर्देश देने की अपील की है।”

पत्र में चेतावनी देते हुए कहा गया है, “संसद द्वारा पारित इस कानून (उपासना स्थल या धार्मिक स्थल अधिनियम 1991) को सख्ती से लागू करना केंद्र और राज्य सरकारों, दोनों की जिम्मेदारी है। ऐसा न करने पर पूरे देश में विस्फोटक स्थिति पैदा हो सकती है, जिसके लिए सुप्रीम कोर्ट और केंद्र सरकार जिम्मेदार होंगे।”

एक तरह से ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने कहा है कि अगर निचली अदालतों द्वारा मस्जिदों के सर्वे को मंजूरी दी जाती है तो संभल में हुई हिंसा की तरह दूसरी जगह भी हिंसा भड़क सकती है। हालाँकि, मुस्लिम भीड़ ने तब भी दंगे किए हैं, जब हाई कोर्ट ने इस्लामी मजहबी किताबों से संबंधित याचिकाओं पर विचार किया। साल 1985 का कलकत्ता कुरान याचिका इसका ज्वलंत उदाहरण है।

साल 1985 की कलकत्ता कुरान याचिका

अधिवक्ता चांदमल चोपड़ा और सीतल सिंह ने 29 मार्च 1985 को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत एक आवेदन दायर किया था। इसमें कलकत्ता हाई कोर्ट से सरकार को इस्लाम की मजहबी किताब ‘कुरान’ की हर प्रति को ‘जब्त’ करने का निर्देश देने का अनुरोध किया गया था। उन्होंने कहा कि कुरान की आयतों में काफिर (गैर-मुस्लिमों) के खिलाफ हिंसा का आह्वान किया गया है।

याचिका में तर्क दिया गया था कि कुरान की प्रत्येक प्रति दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 95 (कुछ प्रकाशनों को जब्त घोषित करने की शक्ति) और भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 153A (धार्मिक आधार पर विभिन्न समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देना) और 295A (धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने के इरादे से जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण कृत्य) के तहत ‘जब्त करने योग्य’ है।

याचिका में तर्क दिया गया कि मुस्लिम अब तक कानून का दुरुपयोग करके इस्लाम की आलोचना करने वाली किताबों पर प्रतिबंध लगाते रहे हैं। बता दें कि यूपी शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष सैयद वसीम रिजवी ने भी कुरान की 26 आयतों को हटाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए रिजवी पर 50 हजार रुपए का जुर्माना लगा दिया था।

खैर, चाँदमल चोपड़ा और सीतल सिंह द्वारा दायर याचिका सुनवाई के लिए शुरू में कलकत्ता हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति खस्तगीर जे के समक्ष आया था। हालाँकि, आज की तरह उम्मीद से उलट उस विद्वान न्यायाधीश ने आवेदन को खारिज करने के बजाय उस पर विचार किया। उन्होंने प्रतिवादी पक्षों को नोटिस भी जारी किया। इसके बाद जो हुआ, वह बेहद भयानक है।

इस याचिका के विरोध में पश्चिम बंगाल की तत्कालीन सत्ताधारी पार्टी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी), जमात-ए-इस्लामी और कलकत्ता के केरल मुस्लिम एसोसिएशन ने हथियार उठा लिए। आंदोलन को मजबूत करने के लिए एक ‘कुरान रक्षा समिति’ की स्थापना की गई। CPIM के नेतृत्व वाली बंगाल सरकार ने दावा किया कि यह याचिका दुर्भावनापूर्ण इरादे से दायर की गई है।

कॉन्ग्रेस के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने भी वामपंथियों का साथ दिया और याचिका का विरोध किया। बढ़ते राजनीतिक दबाव के चलते जस्टिस खस्तगीर ने इसे अपनी सूची से हटाकर जस्टिस सतीश चंद्रा की अदालत में भेज दिया। राज्य के महाधिवक्ता एसके आचार्य की सलाह पर मामला जस्टिस बिमल चंद्र बसाक की पीठ को सौंप दिया गया और उन्होंने 17 मई 1985 को इसे याचिका खारिज कर दी।

कलकत्ता (अब कोलकाता) में कुरान याचिका को लेकर दंगे

इतिहासकार सीताराम गोयल ने अपनी किताब ‘द कलकत्ता कुरान पिटीशन‘ की पृष्ठ संख्या 26 और 27 में लिखा है कि याचिका के बारे में जानने के बाद देश के विभिन्न हिस्सों से लेकर बांग्लादेश तक के मुस्लिमों दंगे किए। बांग्लादेश में दंगों में कई लोग कट्टरपंथी जमात-ए-इस्लामी से जुड़े थे। इन चरमपंथियों ने सरकारी संपत्ति को आग लगा दी और मिसाइलें भी फेंकी।

चेपल नवाबगंज शहर में झड़प के दौरान पुलिस को आत्मरक्षा में गोली चलानी पड़ी। इस गोली-बारी में 12 लोगों की मौत हो गई और 100 से अधिक लोग घायल हो गए। इसके एक दिन बाद जमात-ए-इस्लामी की 20,000 की भीड़ ने राजधानी ढाका में हिंसक विरोध प्रदर्शन किया। यहाँ तक ​​कि भारतीय उच्चायोग के कार्यालय पर घात लगाकर हमला करने की भी कोशिश की गई।

The Calcutta Quran Petition
कोर्ट केस हुआ कोलकाता में, मुस्लिमों ने दंगा-फसाद किया बांग्लादेश से लेकर राँची-श्रीनगर में (साभार: सीता राम गोयल की किताब, The Calcutta Quran Petition, page 26-27)

भारत के राज्य झारखंड की राजधानी राँची (उस समय बिहार का एक बड़ा शहर था) में मुस्लिमों ने काले झंडे और बैनर लेकर ‘विरोध मार्च’ निकाला। इस दौरान दंगाई भीड़ ने सरकार विरोधी नारे लगाए और दुकानों पर पत्थर फेंके और छोटे व्यापारियों के कारोबार को जबरन बंद करवाया। डरे हुए कारोबारियों ने विरोध प्रदर्शन के अगले दिन भी अपना कारोबार बंद रखा।

जम्मू-कश्मीर के श्रीनगर में भी मुस्लिमों की भीड़ ने CPI मुख्यालय में तोड़फोड़ की। एक पुल को आग लगाने का प्रयास किया गया। स्कूल-कॉलेजों, सिनेमाघरों और दुकानों को जबरन बंद करवा दिया गया। आखिरकार, पुलिस को फायरिंग करनी पड़ी और इसमें एक शख्स की मौत हो गई थी। जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन मुख्यमंत्री जीएम शाह ने तो याचिका पर सुनवाई करने वाले जज के खिलाफ ऐक्शन लेने की माँग कर डाली थी।

The Calcutta Quran Petition
कुरान पर कोर्ट में केस कैसे? जम्मू-कश्मीर के CM जज पर ही एक्शन लेने की माँग कर बैठे (साभार: सीता राम गोयल की किताब, The Calcutta Quran Petition, page 29)

सीताराम गोयल ने अपनी किताब में लिखा है, “इससे बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI), जो इस्लामी मुद्दों की हिमायती रही है, को मुस्लिम भीड़ ने ‘हिंदू सांप्रदायिकों’ के साथ जोड़ दिया है। भीड़ तो भीड़ ही होती है और जो कुछ भी वह करती है, उसकी जिम्मेदारी उन लोगों पर होती है जो उन्हें अक्सर संगठित करते हैं।”

अब, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) भी अपनी चिट्ठी में इसी तरह का संकेत देने की कोशिश की है कि यदि अदालतें हिंदू मंदिरों के ऊपर बनी मस्जिदों के वास्तविक चरित्र के बारे में सर्वे से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई जारी रखती हैं तो मुस्लिम भीड़ फिर से दंगे कर सकती है। संभल में इसकी बानगी पूरा देश ही नहीं, दुनिया भी देख चुकी है।

जिस दिल्ली में दम घोंट रही हवा, वहाँ एक घर ऐसा भी जिसका AQI रहता है 10-15: जानिए पीटर सिंह और नीनो कौर ने कैसे बसाया यह ‘स्वर्ग’

दिल्ली में जहाँ प्रदूषण का ये हाल है कि वायु गुणवत्ता सूचकांक कभी-कभी 300-400 तक पार कर जाता है वहीं इसी दिल्ली में एक घर ऐसा भी है जहाँ का वातावरण अत्यंत शुद्ध है और घर का AQI 10-15 तक रहता है। ये घर है सैनिक फार्म्स में पीटर सिंह और नीनो कौर का।

पीटर और नीनो कौर ने अपने इस घर को स्व-संवर्धन तकनीकों से निर्मित किया है। इसमें सीमेंट के बजाय चूने के मोर्टार का उपयोग किया गया है। इस घर में पेंट्स की जगह भी चूना का प्रयोग हुआ है। वहीं छत पर कंक्रीट स्लैब की जगह पत्थर की टाइलें हैं, जो गर्मियों में तापमान को नियंत्रित करने में मदद करती हैं।

इसके अलावा इस घर की खास बात हैं कि यहाँ 15,000 से अधिक पौधे हैं, जो हवा को शुद्ध करने में मदद करते हैं। ये पौधे न केवल बाहरी वायु गुणवत्ता को बेहतर बनाते हैं बल्कि अंदर की हवा को भी साफ रखते हैं। इस प्रकार, घर का AQI हमेशा 15 से नीचे रहता है।

वहीं यदि बिजली आदि की बात करें तो घर पूरी तरह से सौर ऊर्जा पर निर्भर करता है और ऑफ-ग्रिड चलता है। इस घर में पानी की बर्बादी न हो इसका भी पूरा ध्यान दिया जाता है। यहाँ वर्षा के पानी को एक 15,000-लीटर टैंक में इकट्ठा किया जाता है, जिसका उपयोग बाद में पौधों की सिंचाई के लिए किया जाता है। पानी का पुनर्चक्रण सुनिश्चित करता है कि कोई भी बूंद बर्बाद न हो।

पीटर और नीनो के इस घर में वो दोनों खुद जैविक खाद्य पदार्थ उगाते हैं। वे फसल अवशेष का उपयोग करके खाद बनाते हैं, जिससे वे मशरूम उगती है। इस तरह उनके घर में ही सारी सब्जियाँ उग जाती हैं और उन्हें बाहर की सब्जियाँ नहीं खरीदनी पड़ती।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक पीटर और नीनो ने ऐसे घर का निर्माण तब किया जब पता चला कि नीनो ब्लड कैंसर से पीड़ित हैं और उनके फेफड़े दिल्ली की जहरीले हवा झेलने लायक नहीं हैं। डॉक्टरों ने उन लोगों को दिल्ली भी छोड़ने को कहा, लेकिन ये जोड़ा दिल्ली में रहा और अपनी एक ऐसी दुनिया बनाई जो आज दिल्ली में रहने वालों के लिए एक मिसाल है।

जमीन LOC पर, याचिका अब्दुल मजीद की, जस्टिस वसीम सादिक का फैसला- 46 साल का किराया दे सेना: जानिए उस फैसले के बारे में जिसमें हाई कोर्ट ने संपत्ति का अधिकार को बताया ‘मानवाधिकार’

जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाई कोर्ट ने एक महत्पूर्ण फैसले में कहा है कि ‘संपत्ति का अधिकार’ मानव का अधिकार है। इसके साथ ही भारतीय सेना को आदेश दिया कि वह जमीन के मालिक को 46 वर्षों का बकाया किराया दे। यह जमीन सेना के नियंत्रण में साल 1978 से है। अदालत ने कहा कि संपत्ति का अधिकार संवैधानिक ही नहीं, बल्कि मानवाधिकार के दायरे में आता है।

हाई कोर्ट के जस्टिस वसीम सादिक नरगल ने कहा, “संपत्ति के अधिकार को अब न केवल संवैधानिक या वैधानिक अधिकार माना जाता है, बल्कि यह मानवाधिकारों के दायरे में आता है। मानवाधिकारों को व्यक्तिगत अधिकारों जैसे कि आश्रय, आजीविका, स्वास्थ्य, रोजगार आदि के दायरे में माना जाता है और पिछले कुछ वर्षों में मानवाधिकारों ने बहुआयामी आयाम हासिल कर लिया है।”

दरअसल, उत्तरी कश्मीर के कुपवाड़ा में नियंत्रण रेखा के पास स्थित तंगधार के निवासी अब्दुल मजीद लोन ने साल 2014 में एक याचिका दायर की थी। इसमें उन्होंने अपनी जमीन के लिए सेना से किराया दिलाने की माँग की थी। लगभग 1.6 एकड़ की यह जमीन तंगधार गाँव में स्थित है। याचिकाकर्ता लोन का कहना था कि उसे आज तक इस जमीन के लिए कोई किराया नहीं मिला।

हालाँकि, सेना ने दावा किया उसने उस जमीन पर कभी भी कब्जा नहीं किया था। हालाँकि, अदालत ने कहा कि यह दावा ‘कानून की कसौटी पर खरा नहीं उतरता और खारिज किया जाता है’। कोर्ट ने कहा, “प्रतिवादियों ने कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना याचिकाकर्ता की भूमि अधिग्रहित कर ली है, वह भी उसे किराया या मुआवजा दिए बिना। यह याचिकाकर्ता के संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन है।”

जस्टिस नरगल ने कुपवाड़ा के डिप्टी कमिश्नर को दो सप्ताह के भीतर संबंधित तहसीलदार की अध्यक्षता में राजस्व अधिकारियों की एक टीम गठित करने का भी निर्देश दिया। यह टीम ‘सेना द्वारा संबंधित भूमि पर कब्जे के संबंध में किराए के आकलन’ के करेगी। कोर्ट ने कहा कि मूल्यांकन रिपोर्ट के आधार पर रिपोर्ट प्राप्त होने की तिथि से एक महीने के भीतर याचिकाकर्ता को किराया दिया जाना चाहिए।

अपने आदेश में जस्टिस वसीम सादिक नरगल ने आगे कहा, “राज्य और उसकी एजेंसियाँ ​कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही किसी नागरिक को उसकी संपत्ति से बेदखल कर सकती हैं। मुआवजा देने का दायित्व हालाँकि अनुच्छेद 300A में स्पष्ट रूप से शामिल नहीं है, लेकिन उक्त अनुच्छेद से इसका अनुमान लगाया जा सकता है।”

चाऊश को लाकर निजामों ने डाली नींव, अब ‘शेख अंकल’ छोटी-छोटी बच्चियों को बना रहे ‘सेक्स टॉयज’: मुताह निकाह की एक विलेन खाड़ी देशों की ‘हैदराबादी आंटी’ भी

हैदराबाद में बिजनेस की तरह चल रही ‘शेख मैरिज’ और ‘मुताह निकाह’ कॉन्सेप्ट पर आज (29 नवंबर 2024) फिर आजतक पर एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई है। मृदुलिका झा ने अपनी ग्राउंड रिपोर्ट के आखिरी हिस्से में बताया है कि कैसे हैदराबाद में शेख मैरिज का चलन शुरू हुआ और कैसे आज इसे संचालित किया जा रहा है।

रिपोर्ट के मुताबिक, हैदराबाद में शेख मैरिज की नींव निजामों के काल से पड़ी। उस समय निजामों ने अपनी दौलत की रखवाली के लिए यमन से जो सैनिक ( जिन्हें चाऊश कहते थे) बुलाए थे, उन्होंने निजाम की फौज खड़ी करने के लिए हैदराबादी महिलाओं से निकाह करके बच्चे किए, जिनमें से कुछ के वंशज आज मुताह निकाह कराने के ‘ब्रोकर और एजेंट’ है।

बताया जाता है कि चूँकि चाऊशों के अपने मुल्क लौटने के बाद उनके वंशज को अरब देशों में नागरिकता नहीं मिली, इसलिए उन्होंने शेखों से अपनी बेटियों का निकाह करना शुरू कर दिया। शुरू में ये शेख मैरिज शॉर्ट-टर्म नहीं थी, मगर बाद में धीरे-धीरे ये निकाह मजे के लिए किए जाने लगे, और निकाह के साथ तलाक की तारीखें भी पक्की होने लगीं। चाऊश के वंशज खुद अपनी बेटियों के लिए ब्रोकर-एजेंट बनने लगे।

वहीं शेखों को भी पता चल गया कि उनकी जरूरत पूरा करने के लिए हैदराबाद में पूरे इंतजाम हैं। उनके मजहब के हिसाब से सेक्स वर्क के पास जाना हराम था इसलिए उन्होंने भारत में इसका विकल्प खोजा। उन्होंने निकाह करके लड़कियों को अपने साथ रखना शुरू किया। 10-15 दिन जब तक मन न भरे ये निकाह करके उनके साथ रहते, फिर उन्हें छोड़कर चले जाते। इस तरह वो अपने मजहब के मुताबिक कुछ हराम भी नहीं करते थे और उनकी जरूरत भी पूरी हो जाती थी।

मृदुलिका अपनी रिपोर्ट में इस्लामी स्कॉलरों के हवाले से बताती हैं कि चूँकि अरब में लड़की से निकाह के लिए शर्तें अलग हैं और खर्चा भी ज्यादा इसलिए हैदराबाद में अरब देशों के बूढे शेख मेडिकल वीजा पर आते हैं, यहाँ आकर वह सस्ते दामों में लड़कियाँ खरीदते हैं और फिर अपनी जरूरतों को पूरा करते हैं।

इन शेखों का हैदराबाद में कितनी खातिरदारी होती है इसका अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि क्षेत्र में स्थानीय लोग तेलुगु और उर्दू बोलते हैं, लेकिन अस्पतालों में निर्देश अरबी भाषा में लिखे गए हैं ताकि अमीर शेखों को कोई परेशानी न हो।

रिपोर्ट बताती हैं कि रमजान के वक्त हैदराबाद में शेखों का आना-जाना ज्यादा हो जाता है। वो इस महीने में भी जो मन हो वो करते हैं। वो मानते हैं जवान या वर्जिन लड़कियों के साथ संबंध बनाकर उनकी जवानी लौट आएगी। कई शेख को नब्ज देखकर आँकते हैं कि लड़की वर्जिन है या नहीं।

मालूम हो कि मुताह निकाह में लड़की का बालिग होना एक शर्त होती है, मगर बालिग होने का अर्थ 18 साल की उम्र पार करना नहीं बल्कि लड़की को पीरियड का आना है। अब ये उम्र 13 भी हो सकती है और 15 भी।

बता दें कि हैदराबाद में कई घर हैं जो मुताह निकाह के बूते अपना घर पाल रहे हैं। वो लड़कियों को कम उम्र में बेचते हैं और फिर घर चलाते हैं। हैदराबाद के बारकस इलाके को लेकर तो रिपोर्ट कहती है कि वहाँ के 100 घरों में से 33 घर में ये शेख मैरिज हुई और अब भी ये सिलसिला जारी है।

अजीब बात ये हैं कि इस मुताह निकाह को इस्लामी स्कॉलर एक तरह की लिबर्टी मानते हैं। जैसे अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में शिया थियोलॉजी के एक्सपर्ट डॉ अब्बास कहते हैं कि अगर किसी को स्थायी रिश्ते में जाने से पहले पार्टनर को परखना है तो मुताह एक तरीका हो सकता है। बशर्ते इसमें दोनों की सहमति हो।

गौरतलब है कि इससे पहले मुताह निकाह पर प्रकाशित दो रिपोर्ट में मृदुलिका झा ने पीड़िताओं की आपबीती को बताया था। अपनी रिपोर्ट में उन्होंने उस बच्ची के दर्द को उजागर किया था जिसे एक शेख प्रेगनेंट करके वापस चला गया था और बाद में उसे बच्ची को जन्म देना पड़ा था। अपनी रिपोर्ट में उन्होंने बताया था कि कैसे शेखों को हैदराबाद में ब्रोकर 20-25-50 हजार में बच्चियाँ मुहैया करवा देते हैं। परेड करवाकर लड़कियों को चुना जाता है। उनका शरीर नापा जाता है और फिर निकाह कराकर लड़कियाँ उन्हें इस्तेमाल के लिए दे दी जाती हैं। इसके अलावा रिपोर्ट में उन हैदराबादी आंटियों के बारे में भी बताया था जो अरब देशों में रहकर लड़कियों का शोषण करवाने में शेखों की मदद करती हैं या फिर हैदराबाद में रहकर लड़कियों की जानकारी मुहैया कराती हैं।

कॉन्ग्रेस को अक्टूबर में ही पता था MVA हार रही महाराष्ट्र का चुनाव, खुद के सर्वे ने ही बताया था ‘लड़की बहिन योजना’ का चल रहा जादू: फिर भी नतीजों के बाद EVM का बनाया बहाना

महाराष्ट्र और हरियाणा में मिली हार के बाद कॉन्ग्रेस ने EVM में गड़बड़ी का अपना पुराना राग अलापना शुरू कर दिया है। हालाँकि, कॉन्ग्रेस का एक गुट अपनी करारी हार के लिए EVM को दोष देने का पक्षधर नहीं है। ये वही दोनों राज्य हैं, जहाँ पाँच महीने पहले हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा को झटका लगा था। हालाँकि, दोनों राज्यों के विधानसभा चुनावों में पार्टी ने शानदार प्रदर्शन किया है।

कॉन्ग्रेस पार्टी में EVM को दोषी ठहराने के सवाल पर उभरे मतभेद स्पष्ट दिखने लगे हैं। कॉन्ग्रेस के कई नेताओं का मानना है कि महाराष्ट्र में हार से झटका नहीं लगना चाहिए था, क्योंकि विधानसभा चुनावों से पहले राज्य में कराए गए पार्टी के आंतरिक सर्वे से पता चला कि महाविकास अघाड़ी (MVA) को लोकसभा चुनावों में हासिल की गई बढ़त को बरकरार रखना मुश्किल हो सकता है।

इंडियन एक्सप्रेस को कॉन्ग्रेस के नेताओं ने बताया कि पार्टी के आंतरिक सर्वेक्षणों से पता चला था कि एकनाथ शिंदे सरकार की ‘लड़की बहिन योजना’ लोकप्रिय हो रही है। सर्वे में 88% लोगों ने कहा था कि उन्हें इस योजना के बारे में जानकारी है। 82% लोगों ने कहा था कि उनके परिवार में इस योजना की लाभार्थी है। वहीं, 17% लोगों ने माना था कि इस योजना के कारण उनका वोट का रूख बदल गया।

इस योजना को सफल होता देखकर कॉन्ग्रेस के रणनीतिकारों ने घोषणापत्र को अंतिम रूप देने के लिए आयोजित एक बैठक में महिलाओं को 3000 रुपए मासिक सहायता देने का सुझाव दिया था। हालाँकि, तब महायुति गठबंधन ने ‘लड़की बहन योजना’ के तहत दी जा रही 1,500 रुपए प्रति माह की राशि को बढ़ाकर 2,100 रुपए महीना करने का वादा किया था।

इसके बाद महिला मतदाताओं में महायुति गठबंधन के लिए समर्थन बढ़ गया। मतदान से कुछ दिन पहले कॉन्ग्रेस नेताओं ने सोयाबीन किसानों से संपर्क किया और घोषणा की कि अगर MVA सत्ता में आती है तो सोयाबीन के लिए 7,000 रुपए प्रति क्विंटल और बोनस तय करेगी। हालाँकि, MVA को इसका कोई फायदा नहीं मिला।

दरअसल, कॉन्ग्रेस पार्टी ने 20 नवंबर 2024 को हुए मतदान से चार सप्ताह से भी कम समय पहले अक्टूबर में 103 सीटों पर आंतरिक सर्वेक्षण कराए थे। इस सर्वेक्षणों में पता चला कि महाविकास अघाड़ी की 103 ‘मजबूत सीटों’ में से वह सिर्फ 44 सीटों पर ही आगे थी। वहीं, लोकसभा चुनाव के दौरान 54 सीटों पर MVA आगे थी। यानी मतदान से पहले ही परिणाम को कॉन्ग्रेस भाँप गई थी।

वहीं, उनके सर्वे में यह भी पता चला कि भाजपा के नेतृत्व वाली महायुति 103 में से 49 सीटों पर आगे चल रही है, जबकि वह 56 सीटों पर आगे निकल गई। इस सर्वे में यही एक बात MVA के पक्ष में रही कि मुस्लिम ही एकमात्र ऐसा वर्ग था, जहाँ उसे पूर्ण बढ़त हासिल थी। सामान्य, ओबीसी, एसबीसी, एससी, एसईबीसी, एसटी आदि वर्गों में एमवीए से आगे महायुति थी।

पार्टी की आंतरिक सर्वे में 57,309 लोगों से सवाल पूछे गए थे। जिन 103 सीटों पर कॉन्ग्रेस ने आंतरिक सर्वे कराई थी, उनमें से 52 पर कॉन्ग्रेस, 28 पर शिवसेना (यूबीटी), 21 पर एनसीपी शरद पवार और एक-एक सीट पर सीपीएम और समाजवादी पार्टी ने चुनाव लड़ा था। हालाँकि, इस योजना ने प्रदेश में भाजपा की गठबंधन वाली महायुति सरकार की वापसी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

हम चिन्मय कृष्ण दास के साथ, बांग्लादेश में हिंदुओं और मंदिरों की सुरक्षा हो सुनिश्चित: जानिए संत की गिरफ्तारी पर इस्कॉन को क्यों क्लियर करना पड़ा अपना स्टैंड

ISKCON ने एक बयान जारी करके स्पष्ट किया है कि वह बांग्लादेश में गिरफ्तार किए गए हिन्दू संत चिन्मय कृष्ण दास के साथ खड़ा हैं। ISKCON ने कहा है कि उन्होंने किसी भी तरह से चिन्मय कृष्ण दास से खुद को अलग नहीं किया है। उन्होंने साथ ही बांग्लादेश में प्रताड़ना के खिलाफ लड़ रहे सभी हिन्दुओं का समर्थन किया है।

गुरुवार (28 नवम्बर, 2024) को जारी किए गए एक बयान में ISKCON ने कहा, “इस्कॉन ने हिंदुओं और मंदिरों की रक्षा के लिए शांतिपूर्वक प्रदर्शन करने वाले चिन्मय कृष्ण दास के अधिकारों और स्वतंत्रता का समर्थन करने से खुद को दूर नहीं किया है और ना ही करेगा।”

ISKCON ने आगे लिखा, “हम बाकी सभी सनातनी संगठनों के साथ मिलकर हिंदुओं की सुरक्षा तथा बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के साथ शांतिपूर्ण माहौल फिर से स्थापित करने का समर्थन करते हैं। हमारे कई प्रेस बयानों और इंटरव्यू ने इस बात को साफ़ कर दिया है। हमने बस यही कहा है कि चिन्मय कृष्ण दास बांग्लादेश में हमारा अधिकारिक तौर पर प्रतिनिधित्व नहीं करते।”

यह स्पष्टीकरण बांग्लादेश ISKCON के महासचिव चारू चन्द्र दास के एक बयान के बाद आया। उन्होंने यह बयान गुरुवार को ढाका में दिया था। उन्होंने अपने बयान में कहा था, “कई महीने पहले, प्रभातक श्री कृष्ण मंदिर के प्रमुख लीलाराज गौर दास, चटगाँव में श्री श्री पुंडरीक धाम के प्रमुख गौरांग दास और चिन्मय कृष्ण दास को अनुशासनहीनता के चलते इस्कॉन के भीतर उनके पदों और सभी संगठनात्मक गतिविधियों से हटा दिया गया था। यह स्पष्ट रूप से कहा गया था कि उनके कार्य इस्कॉन का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं।”

चारू चन्द्र दास के इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर हिन्दुओं ने गुस्सा जाहिर किया था। हिन्दुओं ने कहा था कि चिन्मय कृष्ण दास पर बांग्लादेश की यूनुस सरकार की चलते ISKCON पीछे हट रहा है। हिन्दुओं ने कहा था कि जब एकता की जरूरत है, ऐसे समय में ISKCON अपने आप को चिन्मय कृष्ण दास से अलग कर रहा है। इसके बाद ISKCON ने यह स्पष्टीकरण दिया।

ISKCON के एक और एक्स (पहले ट्विटर) खाते पर चिन्मय कृष्ण दास के समर्थन में भी एक ट्वीट किया गया है। ISKCON ने लिखा, “ISKCON श्री चिन्मय कृष्ण दास के साथ खड़ा है। हम भगवान कृष्ण से सभी भक्तों की रक्षा के लिए प्रार्थना करते हैं।”

गौरतलब है कि बांग्लादेश में हिन्दू संत चिन्मय कृष्ण दास को सोमवार (25 नवम्बर, 2024) को गिरफ्तार कर लिया गया था। उन्हें मंगलवार को भी जमानत नहीं दी गई थी। बांग्लादेश की पुलिस ने हिन्दुओं पर इस्लामी कट्टरपंथियों के उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठाने वाले चिन्मय दास को कथित देशद्रोह के मामले में गिरफ्तार किया है।

वर्तमान में वह जेल में हैं। उनकी रिहाई के लिए हिन्दुओं ने प्रदर्शन किया तो उन पर भी पुलिस ने हमला किया और इस्लामी कट्टरपंथियों ने भी उन्हें निशाना बनाया। चिन्मय कृष्ण दास की गिरफ्तारी के बाद युनुस सरकार पर सवाल उठ रहे हैं। बांग्लादेश के कानून के जानकार कह रहे हैं कि चिन्मय कृष्ण दास के मामले में सही प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ है।

ईसाई आबादी 4%, विधायक बने 8, ST-आरक्षित 28 सीटों में से 8 पर कब्जा: जनजातियों के हितों के लिए बने झारखंड में मिशनरियों का गोरखधंधा, क्रिश्चियन जनसंख्या पर भी सवाल

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि आरक्षण का लाभ लेने के लिए धर्म परिवर्तन करना संविधान के साथ धोखाधड़ी है। सर्वोच्च न्यायालय ने मद्रास हाई कोर्ट के फैसले को भी सही ठहराया। इसमें हाई कोर्ट ने एक ईसाई महिला को अनुसूचित जाति (SC) का सर्टिफिकेट जारी करने का निर्देश देने से इनकार कर दिया था। महिला खुद को हिंदू बताते हुए इस सर्टिफिकेट की माँग की थी।

न्यायमूर्ति पंकज मित्तल और न्यायमूर्ति आर महादेवन की खंडपीठ ने कहा कि सेल्वारानी नाम की महिला ईसाई धर्म का पालन करती है और नियमित चर्च भी जाती है। इसके बावजूद वह नौकरी के लिए खुद को हिंदू और SC बता रही है। खंडपीठ ने कहा कि जो व्यक्ति ईसाई है और आरक्षण के लिए खुद को हिंदू बताता है, उसे SC दर्जा देना आरक्षण के उद्देश्य के खिलाफ और संविधान के साथ धोखा है।

दरअसल, याचिकाकर्ता सेल्वारानी ने केंद्रशासित प्रदेश पुडुचेरी में अपर डिवीजन क्लर्क की नौकरी के लिए आवेदन करते समय खुद के हिंदू होने का दावा किया था। सेल्वरानी ने तर्क दिया कि वह जन्म से ही हिंदू हैं और अनुसूचित जाति (SC) वर्ग के वल्लुवन जाति से ताल्लुक रखती हैं। वह मंदिरों में जाती हैं और देवी-देवताओं की पूजा करती है।

हालाँकि, राज्य सरकार के रिकॉर्ड में पाया गया है कि सेल्वारानी की माँ ईसाई थीं और वल्लुवन जाति से आने वाले उनके पिता ने भी धर्मांतरण करके ईसाई धर्म अपना लिया था। कोर्ट ने यह भी कहा कि SC/ST आरक्षण में धर्म को आधार बनाने की संवैधानिकता पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है। यह मामला भी इससे ही जुड़ा है।

दरअसल, सेल्वारानी मामले ने स्पष्ट कर दिया कि आरक्षण का लाभ लेने के लिए किस तरह से धर्म को छिपाया जा रहा है। देश के विभिन्न हिस्सों में ईसाई एवं मुस्लिम मजहब में धर्मांतरित लोग आरक्षण का लाभ लेने के लिए खुद को हिंदू बता रहे हैं या फिर हिंदू नाम रखकर सरकार को धोखा दे रहे हैं। यह उत्तर से लेकर दक्षिण भारत तक में समान रूप से चल रहा है।

बता दें कि 1950 के राष्ट्रपति के आदेश में कहा गया है कि सिर्फ हिंदुओं (बौद्ध, जैन, सिख सहित) ही SC का दर्जा मिल सकता है। हालाँकि, कॉन्ग्रेस सरकार द्वारा गठित जस्टिस रंगनाथ मिश्र आयोग ने साल 2007 में दलित ईसाइयों और मुस्लिमों को भी SC वर्ग में आरक्षण देने की सिफारिश की थी। जस्टिस रंगनाथ मिश्रा 25 सितंबर 1990 से 24 नवंबर 1991 तक भारत के मुख्य न्यायाधीश थे।

इस धर्मांतरण का असर सिर्फ नौकरी ही नहीं, बल्कि चुनावों में भी दिखता है। जनजातीय समुदाय की बहुलता वाले झारखंड में आज कई इलाकों में डेमोग्राफी बदल चुकी है। इस बार के विधानसभा चुनाव में जनजातीय समुदाय से धर्मांतरित हुए लोगों ने कई विधायकों को अपना प्रतिनिधि चुना। वहाँ ईसाई विधायकों की संख्या मुस्लिमों से सीधे दोगुनी है।

साल 2011 की जनगणना में कहा गया है कि झारखंड में 15 प्रतिशत मुस्लिम और मात्र चार प्रतिशत ईसाई हैं। जबकि, विधायकों की गिनती तो इस जनसंख्या का असर साफ दिख रहा है। झारखंड में इस बार 8 ईसाई विधायक चुने गए हैं, जबकि 4 मुस्लिम विधायक चुने गए हैं। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि क्या ईसाई में धर्मांतरित लोग अभी भी हिंदू होने का दिखावा कर रहे हैं और हिंदुओं को मिलने वाले सरकारी लाभ ले रहे हैं?

अगर आँकड़े को देखें तो यह बात सच साबित होती है। जैसा कि सेल्वारानी मामले में सेल्वारानी ने खुद के ईसाई होने की बात छुपाते हुए नौकरी पाने के लिए खुद को हिंदू और SC समुदाय का होना बताया था। झारखंड में चुने गए ईसाई एवं मुस्लिम विधायकों की संख्या कान खड़े करने वाले हैं और सरकार को आत्ममंथन के लिए विवश करने वाले हैं कि वह इस पर नीतिगत निर्णय ले।

झारखंड में इस बार कुल 81 सीटों में से 30 पर जनजातीय समाज के विधायक जीते हैं। इनमें से 28 सीटें आरक्षित हैं, जबकि भाजपा के बाबूलाल मरांडी और झारखंड मुक्ति मोर्चा की कल्पना सोरेन सामान्य सीटों से विधायक बने हैं। इन्हीं आरक्षित सीटों में ईसाई समाज के 8 विधायक भी जीते हैं। जाहिर है कि आरक्षित सीटों पर ईसाई समाज कब्जा जमा रहा है। इनमें से एक तिहाई पर उसने कब्जा कर भी लिया।

अगर मुस्लिम विधायकों की बात करें तो जामताड़ा से हराकर इरफान अंसारी ने सीता सोरेने और मधेपुर से हफीजुल हसन ने गंगा नारायण सिंह को हराया है। राजमहल सीट पर मोहम्मद ताजुद्दीन ने अनंत ओझा को हराया है। राजमहल स्वतंत्र सीट बनने के बाद पहली बार कोई मुस्लिम महिला जीती है। इससे पहले यहाँ से ईसाई समुदाय के विधायक जीतते थे। वहीं, पाकुड़ सीट पर पूर्व मंत्री आलमगीर आलम की बीवी निशत आलम जीती हैं।

किसी की जनसंख्या सिर्फ चार प्रतिशत होते हुए, आठ विधायकों को चुनना सामान्य बात नहीं है। जैसे-जैसे झारखंड में धर्मांतरित हो रहे हैं, वहाँ से भाजपा और संघ का प्रभाव भी खत्म होता जा रहा है, जैसा कि इस विधानसभा चुनाव में भी देखने को मिला। ईसाई विधायकों की जीत पर खुश ऑल इंडिया क्रिश्चियन माइनॉरिटी फ्रंट ने INDI गठबंधन को बधाई भी दी।

पूर्व लोकसभा उपाध्यक्ष करिया मुंडा ने पिछले साल माँग की थी कि अनुसूचित जनजाति समाज के जो लोग इस्लाम या ईसाई में धर्मांतरण करते हैं, उन्हें शिक्षा और सरकारी नौकरियों में आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए। उन्होंने कहा था कि धर्मांतरित लोग अपना धर्म ही नहीं, बल्कि संस्कृति, परंपरा और पूजा-पाठ के तरीके को त्याग कर दिए हैं।

पूर्व लोकसभा उपाध्यक्ष ने कहा था कि जिस तरह अनुसूचित जाति (SC) समाज के धर्मांतरित लोगों को आरक्षण का लाभ नहीं मिलता, उसी तरह से ST समुदायों के लोगों को भी यह लाभ नहीं मिलना चाहिए। उन्होंने सरकार से माँग की थी कि अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) पर एक समान कानून लागू होना चाहिए।

दरअसल, संविधान का अनुच्छेद 341 अनुसूचित जाति के उन लोगों को आरक्षण का लाभ देता है, जो हिंदू (बौद्ध, जैन, सिख सहित) हैं। किसी दूसरे धर्म को अपनाने वालों को नहीं। हालाँकि, अनुच्छेद 342 में अनुसूचित जनजातियों के लिए ऐसा प्रावधान नहीं है। इस कारण से धर्मांतरित जनजातीय लोग उन हिंदू जनजातीय लोगों के कोटा का लाभ उठाते हैं, जो अपने धर्म से दूर नहीं गए हैं।

विभिन्न तरह का लाभ लेने के लिए अपने धर्म को छिपाने की प्रवृत्ति जनजातीय समाज में भी देखने को मिल रही है, जबकि उन पर इस तरह का का कोई प्रतिबंध नहीं है। इसके पीछे ईसाई मिशनरियों की यह मंशा हो है कि वे अपनी वास्तविक आबादी को छुपाए रखें, ताकि उन पर सरकार की नजर ना पड़े या हिंदू संगठनों एवं लोगों का कोपभाजन नहीं बनना पड़े।

भाजपा नेता करिया मुंडा ने कहा था कि देश में जनजातीय आबादी करीब 8.5 करोड़ है, जिनमें से 80 लाख ईसाई और 12 लाख मुस्लिम हैं। उन्होंने साफ तौर पर आशंका जाहिर की थी कि धर्मांतरण करने वाले जनजातीय लोगों की वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है, क्योंकि वे अपने धर्म परिवर्तन के बारे में खुलकर नहीं बोलते हैं।

मुंडा ने यह भी कहा था कि जब जनजातियों को मिलने वाले लाभ की बात आती है तो ये धर्मांतरित लोग सबसे आगे होते हैं। करिया मुंडा का पिछले साल दिया गया बयान इस बार के विधानसभा चुनावों में चुने गए ईसाई एवं मुस्लिम विधायकों की संख्या से भी साफ पता चलती है। इतना ही नहीं, इससे यह भी पता चलता है कि जो लोग धर्मांतरित हो चुके हैं, वे अब भी खुद को ST ही बताते हैं।

सिर्फ झारखंड में ही नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा, महाराष्ट्र आदि जगहों पर जनजातीय समाज की महिलाओं से ईसाई या मुस्लिम समाज के लोग निकाह कर लेते हैं। इसके बाद जनजातीय समाज के लिए आरक्षित सीटों पर उस महिला को चुनाव लड़ाकर परोक्ष रूप से राजनीति को नियंत्रित करते हैं। पंचायत चुनावों में ऐसी कई घटनाएँ सामने आ चुकी हैं।

इसके अलावा, जनजातीय समाज की इन महिलाओं के नाम पर जमीनों की खरीद-बिक्री आदि भी की जाती है। इस तरह डेमोग्राफी को बदलने के साथ-साथ प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से जनजातीय समाज को मिलने वाले लाभों को हथियाने की कोशिश की जाती है। अब समय आ गया है कि सरकार SC के लिए लागू नियम को ST पर भी लागू करे और धर्मांतरित लोगों को आरक्षण आदि लाभों से वंचित करे।

महिला शिक्षकों का बनाता था अश्लील वीडियो, पूछता था मेरे साथ सेक्स कब करोगी: कर्नाटक कॉन्ग्रेस के महासचिव पर अपने ही स्कूल में यौन शोषण करने को लेकर FIR

कर्नाटक प्रदेश कॉन्ग्रेस कमिटी (KPCC) के महासचिव बी गुरप्पा नायडू के खिलाफ यौन शोषण का मामला दर्ज हुआ है। यह एफआईआर उसी स्कूल की एक पूर्व शिक्षिका ने कराई है जिसका संचालन नायडू खुद करता है। शिक्षिका का दावा है कि कॉन्ग्रेस नेता ने स्कूल की कई शिक्षिकाओं का रेप किया है। उनके अश्लील वीडियो बनाए हैं। उनको ब्लैकमेल करता है। नायडू इस स्कूल का चेयरमैन है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, एक 38 वर्षीय शिक्षिका ने इस मामले में 26 नवम्बर, 2023 को FIR दर्ज करवाई है। उसने बताया है कि 2021 से 2023 के बीच इस स्कूल में वह पढ़ाती थी। शिक्षिका ने बताया कि नायडू लगातार अपने अपने चैम्बर में बुलाता था। नायडू शिक्षिका से पूछता था कि कब वह उससे संबंध बनाने को तैयार होंगी।

FIR में शिक्षिका ने बताया कि एक दिन 2023 में एक दिन इन सबकी अति हो गई। एक दिन नायडू ने शिक्षिका को अपने चैम्बर में बुलाया और जबरदस्ती करने की कोशिश की। जब शिक्षिका ने इसका विरोध किया तो उनके साथ छेड़छाड़ की और उनको अभद्र शब्द कहे।

नायडू ने शिक्षिका को गालियाँ दी और कहा कि अगर वह उसकी बात नहीं मानती तो इसके बुरे परिणाम होंगे। शिक्षिका ने किसी तरह भाग कर खुद को बचाया। वह रोते हुए घर लौटी। इसके बाद उसने अपनी पूरी कहानी अपनी माँ को बताई और नौकरी से त्यागपत्र दे दिया।

शिक्षिका ने FIR में कहा, “स्कूल का चेयरमैन गुरप्पा नायडू एक मनचला है, जिसने कई शिक्षिकाओं का यौन शोषण किया है। उसने इस शोषण का वीडियो बनाया है और जब चाहे तब उनसे शारीरिक संबंध बनाने के लिए ब्लैकमेल करता है। सभी शिक्षिकाएँ उससे डरती हैं। पहले भी शिकायत दर्ज कराने की कोशिश की गई है, लेकिन परिणाम के डर से लोग पीछे हट गए हैं।”

शिक्षिका ने बताया है कि स्कूल में काम करने वाली महिलाएँ गरीब घरों की हैं, इसलिए वह बोलने से डरती हैं। शिक्षिका शिकायत के बाद बेंगलुरु की CK अचुकट्टू पुलिस ने FIR दर्ज कर मामले की जाँच चालू कर दी है। नायडू ने अपने खिलाफ लगे सभी आरोपों को नकारा है। उन्होंने इसे आधारहीन और साजिश बताया है।

संभल जामा मस्जिद हिंसा के बाद पहला जुमा: 70 मजिस्ट्रेट, 10 जिलों की पुलिस, PAC-RAF की 17 कंपनियाँ, 20 CCTV और ड्रोन – तैयार है UP पुलिस

उत्तर प्रदेश के संभल में हुई हिंसा के बाद 29 नवंबर को पहला जुमा है। ऐसे में पूरे इलाके में पुलिस प्रशासन अलर्ट पर है। हालातों को देखते हुए जुमे की नमाज न करवाए जाने का फैसला लिया गया था। हालाँकि बाद में कहा गया कि लोग अपने घर के पास ही नमाज को पढ़ सकते हैं। फिलहाल, जामा मस्जिद में भी बिन कड़ी सुरक्षा चेकिंग के किसी को भी भीतर नहीं जाने दिया जा रहा। लगातार मौलानाओं से कहकर शांति और सद्भाव बनाए रखने की अपील हो रही है। चप्पे-चप्पे पर हर स्थिति को संभालने के लिए पुलिस बल तैनात है और ड्रोन से निगरानी भी की जा रही है।

सामने आई जानकारी के मुताबिक, संभल में सुरक्षा लिहाज से इलाके में त्रिस्तरीय सुरक्षा व्यवस्था लागू की गई है। पुलिस प्रशासन ने 15 कंपनियाँ पीएसी (पुलिस अर्धसैनिक बल) और 2 कंपनियाँ आरएएफ (रैपिड एक्शन फोर्स) की तैनाती की है। इसके अलावा, पूरे शहर में सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए 10 जिलों की पुलिस भी सक्रिय रूप से काम कर रही है। संवेदनशील क्षेत्रों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है, जहाँ दंगा निरोधी दस्ते और महिला पुलिस बल भी तैनात हैं।

प्रशासन इस बात पर भी ध्यान दे रहा है कि कहीं कोई भड़काऊ भाषण या पोस्ट डालकर माहौल न बिगाड़ा जाए। इसके लिए जिला मजिस्ट्रेट ने पहले ही जनपद में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163 की निषेधाज्ञा को लागू किया है। जुमे की नामज को लेकर जिला मजिस्ट्रेट ने तकरीबन 70 मजिस्ट्रेट की तैनाती की है ताकि हालातों पर कड़ी नजर बनी रहें।

मामले में मुरादाबाद मंडल के कमिश्नर आंजनेय कुमार ने बताया कि जामा मस्जिद और उसके आसपास के क्षेत्रों में सुरक्षा बढ़ाई गई है। इसके अलावा, अन्य संवेदनशील स्थानों पर भी पुलिस की तैनाती की गई है ताकि किसी भी प्रकार की अप्रिय घटना से निपटा जा सके। अभी तक संभल में स्थानीयों ने प्रशासन को भरोसा दिया है कि वे शांति बनाए रखने में मदद करेंगे।

मस्जिद प्रबंधन समिति ने यह सुनिश्चित किया है कि नमाज के दौरान कोई भी अव्यवस्था न हो। सुरक्षा लिहाज से, जामा मस्जिद क्षेत्र में 20 नए सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं। इसके साथ ही, ड्रोन कैमरों का उपयोग करके पूरे इलाके की निगरानी की जाएगी। यह सुनिश्चित करने के लिए कि कोई अप्रिय घटना न हो, पुलिसकर्मी छतों पर भी तैनात रहेंगे।

गौरतलब है कि संभल में 24 नवंबर हिंसा हुई थी, उस समय मुस्लिम भीड़ ने मस्जिद के पास इकट्ठा होकर सर्वे करने गई टीम पर हमला किया था जिसके बाद पुलिस को आँसू गैस छोड़ने पड़े थे और गोली चलानी पड़ी थी। झड़प में पाँच लोगों की मौत हो गई थी और कई अन्य घायल भी हुए थे। पुलिस ने बताया कि इस दौरान पत्थरबाजी और आगजनी की घटनाएँ भी हुईं, जिसमें 20 से अधिक पुलिसकर्मी घायल हुए।

ISKCON को बांग्लादेश के इस्लामी पार्टी बता रहे ‘मिलिटेंट संगठन’, चिन्मय कृष्ण दास को खाना देने गए 2 साथी गिरफ्तार: शेख हसीना ने यूनुस सरकार को लताड़ते हुए कहा- हिन्दू संत को करो रिहा

बांग्लादेश के चटगाँव में गिरफ्तार किए गए हिन्दू संत चिन्मय कृष्ण दास के 2 और सहायकों को भी पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। यह दोनों चिन्मय कृष्ण दास को खाना देने गए थे। बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने चिन्मय कृष्ण दास की गिरफ्तारी पर यूनुस सरकार को लताड़ा है। वहीं इस बीच ISKCON को बैन करवाने के लिए बांग्लादेश की इस्लामी पार्टियों ने जोर लगाया हुआ है। उन्होंने ISKCON को एक ‘कट्टरपंथी संगठन’ करार दिया है।

रिपब्लिक की एक खबर के अनुसार, देशद्रोह के कथित मामले में जेल भेजे गए हिन्दू संत चिन्मय कृष्ण दास को जेल के भीतर खाना देने गए उनके दो सहायकों को गुरुवार (29 नवम्बर, 2024) को गिरफ्तार कर लिया गया। इन दोनों को किस आधार गिरफ्तार किया गया है, यह अभी स्पष्ट नहीं है।

चिन्मय कृष्ण दास को मंगलवार को जज काजी नजरुल इस्लाम ने जेल भेज दिया था। उन्हें जमानत भी नहीं दी गई थी। उनके खिलाफ की गई इस कार्रवाई को बांग्लादेशी वकीलों ने गैरकानूनी करार दिया है। चिन्मय कृष्ण दास की गिरफ्तारी की आलोचना तख्तापलट के कारण बांग्लादेश सत्ता से बाहर हुईं पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने की है।

शेख हसीना ने कहा है कि चिन्मय कृष्ण दास की गिरफ्तारी अवैध है और उन्हें तुरंत ही छोड़ा जाना चाहिए। उन्होंने यूनुस सरकार पर प्रश्न उठाए। शेख हसीना ने कहा, “सनातन धर्म के एक बड़े नेता को गलत तरीके से गिरफ्तार किया गया है, उन्हें तुरंत रिहा किया जाना चाहिए।”

चेख हसीना ने आगे कहा, “चटगाँव में एक मंदिर को जला दिया गया है। इससे पहले अहमदिया समुदाय की मस्जिदों, दरगाहों, चर्चों, मठों और घरों पर हमला किया गया, तोड़फोड़ की गई, लूटपाट की गई और आग लगा दी गई।” शेख हसीना ने यूनुस सरकार को सत्ता हथियाने वाला बताया है।

वहीं इस बीच बांग्लादेश ISKCON के खिलाफ षड्यंत्र तेज हो गया है। बांग्लादेश हाई कोर्ट ने हाल ही में ISKCON पर बैन लगाने की माँग करने वाली याचिका को ठुकरा दिया था। इसके बाद अब बांग्लादेश की इस्लामी पार्टियों ने ऐसी ही माँग उठाई है। जमीयत उलेमा ए बांग्लादेश के अब्दुल युसूफ ने ISKCON को ‘कट्टरपंथी संगठन’ बताया है।

इस्लामी पार्टियों ने कहा है कि यूनुस सरकार बिना देरी के ISKCON को बैन कर दे। उन्होंने ISKCON के साधु संतों को ‘हथियारबंद लड़ाके’ करार दिया है। इस्लामी पार्टियों ने यह सारी बातें एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कही हैं। यह पार्टियाँ बांग्लादेश में कड़े इस्लामी कानून चाहती हैं।