मणिपुर में हिंसा फैलाने के लम्बी चौड़ी साजिश रची गई थी। इसके लिए कुकी आतंकी संगठनों ने महिला ब्रिगेड तैयार की। उनको हथियार की ट्रेनिंग दी। उन्होंने मणिपुर में काम के लिए बाहर से आने वालों से वसूली का भी प्लान बनाया था। यहाँ तक कि कुकी संगठनों ने खुद का ड्रोन सिस्टम तक तैयार किया।
न्यूज18 को मिली एक खुफिया रिपोर्ट के अनुसार, मणिपुर में कांग्लीपाक नेशनल पार्टी (KNP), कुकी नेशनल फ्रंट (KNF) और यूनाइटेड पीपल पार्टी ऑफ़ कांग्लीपाक (UPPK) ने मणिपुर के कई इलाकों में हिंसा के लिए साजिश रची है। रिपोर्ट में बताया गया है कि यह अपनी आतंकी गतिविधियाँ फंड करने के लिए बाहर से आने वाले कामगारों से वसूली करना चाहते हैं।
यह संगठन नेपाल और बिहार से मणिपुर पहुँचने वाले व्यापारियों से ₹1-1.5 लाख/महीने का वसूलने की साजिश रच चुके हैं। इसके अलावा यह सुरक्षाबलों की गतिविधियों पर की जासूसी भी कर रहे हैं। इन संगठनों ने KCP और KNF ने कादतन और चिखांग में सुरक्षाबलों की जासूसी के लिए एक ड्रोन सिस्टम लगाया है।
सुरक्षाबलों की जासूसी और लोगों से पैसा वसूलने के अलावा इन संगठनों ने हमला करने कि भी नई तकनीक निकाली थी। कुकी संगठनों ने अपना नुकसान कम करने और सुरक्षाबलों के हाथ बाँधने के लिए महिलाओं की ब्रिगेड तैयार की थी। इन संगठनों ने महिलाओं को हथियार चलाने कीई ट्रेनिंग दी है।
इन महिलाओं को 45 दिन की विशेष ट्रेनिंग इसी काम के लिए दी गई। कुकी संगठनों ने यह सोच कर यह ट्रेनिंग दी थी कि यदि महिलाएँ सुरक्षाबलों पर हमला करेंगी तो वह वापस जवाब भी देने में हिचकिचाएँगे और बाद में विक्टिम कार्ड भी खेला जा सकेगा।
यह बात बीते दिनों में देखी भी गई है। कई बार महिलाओं ने सुरक्षाबलों का रास्ता रोका है। 30 अप्रैल 2024 को भारतीय सेना अपने साथ वो हथियार और गोला बारूद लेकर जा रहे थे, जो उन्होंने बिष्णुपुर में कुछ वाहनों से जब्त किए थे। लेकिन, इस बीच रास्ते में महिलाओं का एक ग्रुप आया और काफिला रोककर 11 उपद्रवियों को रिहा कराया।
मणिपुर में बीते कुछ दिनों में हालात फिर बिगड़ गए हैं। यह हिंसा 6 लाशें मिलने के बाद चालू हुई है। लाशें मिलने के बाद रविवार को मणिपुर के अलग-अलग हिस्सों में भारी हिंसा हुई। लोगों ने सड़कों पर उतर कर प्रदर्शन किया। कई जगह तोड़फोड़ भी हुई। कई भाजपा विधायकों के घरों को भी निशाने पर लिया गया है।
NDTV की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि यह मणिपुर सरकार में काम करने वाले हीरोजीत का परिवार था। उनके बेटे और सास के अलावा उनकी पत्नी, एक और बच्चा, पत्नी की बहन, बहन के बच्चे की भी कुकी लड़ाकों ने हत्या कर दी है।
कुकी लड़ाकों ने यह कार्रवाई CRPF से हुई एक मुठभेड़ के दौरान की थी। उन्होंने वापस लौटते समय इन 6 लोगों को अगवा कर लिया था और बाद में मार दिया। इससे पहले CRPF के साथ हुई मुठभेड़ में 11 कुकी लड़ाके मारे गए थे।
केरल के एर्नाकुलम जिले के मुनम्बम उपनगर में 404 एकड़ जमीन के वक्फ विवाद की काफी चर्चा हो रही है। इस जमीन विवाद की वजह से राजनीतिक दलों में भी सरगर्मी है। मुनम्बम में करीब 600 हिंदू और ईसाई परिवार इस जमीन पर वक्फ बोर्ड के दावे का विरोध कर रहे हैं।
वक्फ बोर्ड का कहना है कि यह जमीन 1950 में वक्फ संपत्ति के रूप में दर्ज की गई थी, जबकि यहाँ रहने वाले लोगों का दावा है कि उन्होंने इस जमीन को कानूनी रूप से दशकों पहले खरीदा था। इस विवाद ने राज्य के उपचुनावों के चलते राजनीतिक पार्टियों के बीच एक महत्वपूर्ण मुद्दा बना दिया है।
विवाद की ऐतिहासिक जड़
एर्नाकुलम जिले के मुनम्बम के तटीय क्षेत्र में वक्फ भूमि विवाद करीब 404 एकड़ जमीन का है। इस जमीन पर मुख्य रूप से लैटिन कैथोलिक समुदाय के ईसाई और पिछड़े वर्गों के हिंदू परिवार बसे हुए हैं। ये परिवार यहाँ दशकों से रह रहे हैं। केरल राज्य वक्फ बोर्ड ने 1950 के एक वक्फ डीड का हवाला देते हुए इस भूमि पर अपना स्वामित्व जताया है। दूसरी ओर, स्थानीय निवासियों का कहना है कि उन्होंने यह जमीन कानूनी रूप से फारूक कॉलेज से खरीदी थी, जिसे एक समय में इस संपत्ति का प्रबंधन सौंपा गया था।
यह विवाद 1902 से जुड़ा हुआ है, जब त्रावणकोर के शाही परिवार ने इस जमीन को एक प्रमुख व्यापारी अब्दुल सत्तार मूसा सैट को लीज पर दिया था। 1950 में, मूसा सैट के दामाद, मोहम्मद सिद्दीक सैट ने इस जमीन को वक्फ संपत्ति के रूप में दर्ज कर दिया और इसका प्रबंधन कोझिकोड के फारूक कॉलेज की प्रबंध समिति के अध्यक्ष को सौंपा। डीड में स्पष्ट रूप से लिखा गया था कि इस जमीन का उपयोग इस्लामी कानून के तहत परोपकारी और शैक्षिक उद्देश्यों के लिए किया जाएगा।
फारूक कॉलेज ने 1960 के दशक में जमीन पर बसे लोगों को हटाने की कोशिशें शुरू की, जिससे कानूनी लड़ाई छिड़ गई। इन निवासियों के पास अपने स्वामित्व के पुख्ता दस्तावेज़ नहीं थे, क्योंकि वे कई पीढ़ियों से इस जमीन पर बसे हुए थे। अंततः, कॉलेज प्रबंधन ने लोगों के साथ कोर्ट से बाहर समझौता करने का फैसला किया और बाजार मूल्य पर उन्हें जमीन के टुकड़े बेच दिए।
केंद्रीय मंत्री ने वक्फ पर लगाए ज्यादा हस्तक्षेप के आरोप
यह मामला अब एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गया है। भाजपा नेताओं खासकर केंद्रीय मंत्री सुरेश गोपी ने वक्फ बोर्ड पर ज़्यादा हस्तक्षेप का आरोप लगाया। एक चुनावी रैली में गोपी ने वक्फ के दावों को “बर्बरता” करार दिया और इसे कानूनी उपायों से रोकने का वादा किया। उन्होंने कहा, “इस बर्बरता को भारत में रोका जाएगा… सच्चे संविधान को बनाए रखने के लिए यह विधेयक संसद में पारित होगा।”
भाजपा नेता बी गोपालकृष्णन ने इसे और आगे बढ़ाते हुए कहा कि सबरीमाला और वेलंकन्नी जैसे धार्मिक स्थलों को भविष्य में इसी तरह के दावों का सामना करना पड़ सकता है। उन्होंने मतदाताओं से भाजपा का समर्थन करने का आग्रह किया ताकि ऐसे परिणामों को रोका जा सके।
मुख्यमंत्री का रुख और मुस्लिम नेताओं की प्रतिक्रिया
मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने अपनी सरकार का बचाव करते हुए कहा कि वे मुनम्बम के लंबे समय से रह रहे लोगों के साथ खड़े हैं। उन्होंने भाजपा के अभियान को लोगों को गुमराह करने का प्रयास बताया।
वहीं, मुस्लिम नेताओं जैसे समसथा समूह के सदस्यों ने वक्फ बोर्ड की तरफदारी की। ओ एम थरुवाना ने सिराज डेली में लेख लिखते हुए निवासियों के लिए न्याय और वक्फ भूमि की बिक्री में शामिल लोगों की जवाबदेही की माँग की।
‘वक्फ का मतलब वक्फ ही रहेगा’
वक्फ शब्द का मतलब है रोकना, सीमित करना और निषेध करना। इस्लामी मान्यताओं के अनुसार, जब एक बार कोई संपत्ति वक्फ के रूप में समर्पित कर दी जाती है, तो वह हमेशा के लिए धार्मिक या परोपकारी उपयोग के लिए ही रह जाती है। शरीयत कानून के अनुसार, एक बार वक्फ संपत्ति घोषित हो जाने के बाद, वह संपत्ति हमेशा वक्फ की ही मानी जाएगी।
वक्फ का तात्पर्य है कि संपत्ति का स्वामित्व व्यक्ति से हटकर अल्लाह को स्थानांतरित हो जाता है। चूँकि संपत्ति का मालिकाना हक वक्फ करने वाले व्यक्ति से अल्लाह को दे दिया जाता है, इस स्थिति में इसे कभी वापस नहीं लिया जा सकता। संपत्ति का देखभाल करने वाला ‘मुतवल्ली’ नियुक्त किया जाता है, जो वक्फ संपत्ति का प्रबंधन करता है। चूँकि ये संपत्तियाँ अल्लाह की हो चुकी है, ऐसे में जो एक बार ‘वक्फ हो गया, वो हमेशा वक्फ ही रहेगा।’
गुजरात में भी आ चुका है ऐसा मामला
कुछ समय पहले गुजरात वक्फ बोर्ड ने सूरत म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन की इमारत पर दावा किया था, क्योंकि दस्तावेज़ अपडेट नहीं किए गए थे। वक्फ के अनुसार, मुगल काल के दौरान यह इमारत एक सराय थी और हज यात्राओं के लिए उपयोग होती थी। ब्रिटिश शासन के दौरान यह संपत्ति ब्रिटिश साम्राज्य की हो गई और आजादी के बाद यह भारत सरकार के अधीन आ गई। दस्तावेज़ों के अद्यतन न होने के कारण, वक्फ बोर्ड ने दावा किया कि यह संपत्ति अब उनकी है, और जैसा कि वक्फ बोर्ड कहता है, “एक बार वक्फ, हमेशा वक्फ।”
एक और रोचक मामला गुजरात के द्वारका का है, जहाँ वक्फ बोर्ड ने देवभूमि द्वारका के बेत द्वारका के दो द्वीपों पर दावा करने के लिए गुजरात उच्च न्यायालय में अर्जी दी थी। अदालत के जज ने यह दावा सुनने से मना कर दिया और वक्फ बोर्ड को अपनी अर्जी में बदलाव के लिए कहा। कोर्ट ने बोर्ड से पूछा कि वक्फ कैसे कृष्ण नगरी की ज़मीन पर दावा कर सकता है। वहीं, केरल में एक गाँव के कई घरों पर भी वक्फ बोर्ड ने दावा ठोक दिया है।
आपकी सोसायटी में भी बन सकती है मस्जिद
वक्फ संपत्तियों के संदर्भ में एक और दिलचस्प पहलू यह है कि आपकी हाउसिंग सोसाइटी का कोई फ्लैट मालिक अपनी संपत्ति को वक्फ के रूप में दर्ज करा सकता है और वहां मस्जिद बनवा सकता है, बिना अन्य सदस्यों की सहमति के। ऐसा ही मामला सूरत की शिव शक्ति सोसाइटी में हुआ था, जहाँ एक प्लॉट मालिक ने अपने प्लॉट को गुजरात वक्फ बोर्ड में दर्ज करा दिया और वहाँ नमाज़ पढ़नी शुरू कर दी गई। ऐसे में इस तरह का मामला आपकी सोसायटी में भी आ सकता है।
छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले में एक महिला के साथ उसके बेटी और बेटे की निर्मम हत्या कर दी गई। हत्या के पीछे की वजह प्रेम प्रसंग को माना जा रहा है। आरोपित का नाम मोख्तार अंसारी है। मोख्तार के भाई आरिफ का एक नाबालिग लड़की से अफेयर था। इसी वजह से वो अपने घर पर पैसे नहीं भेजता था। मोख्तार ने इसी गुस्से में लड़की के साथ उसकी माँ और भाई को भी मार डाला। इन तीनों के कंकाल शुक्रवार (15 नवंबर 2024) को बरामद हुए थे। आरोपित को गिरफ्तार कर लिया गया है।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक घटना बलरामपुर के थानाक्षेत्र दहेज़वार का है। यहाँ शुक्रवार (15 नवंबर) को एक बंद पड़े ईंटों के प्लांट से पुलिस को 3 मानव कंकाल मिले थे। कंकाल में इनकी खोपड़ी और शरीर के कुछ अन्य हिस्से थे। कंकाल के पास साड़ी, सलवार और पैंट भी बरामद हुआ। पुलिस ने इन कंकालों की जाँच करवाई तो ये 36 वर्षीया कौशल्या, 17 साल की मुस्कान और 6 वर्षीय मिंटू के निकले। कौशल्या मुस्कान और मिंटू की माँ थी। ये तीनों 27 सितंबर से लापता चल रहे थे।
पुलिस ने केस दर्ज करके जाँच शुरू की तो पता चला कि मुस्कान का झारखंड के बरगढ़ निवासी आरिफ से अफेयर था। आरिफ कुसमी इलाके में रह कर ठेकेदारी करता था। वह कौशल्या के घर आता-जाता था। पुलिस को मृतका और आरिफ के बीच चैट व लम्बी कॉल डिटेल भी मिली। इसी आधार पर पुलिस की पड़ताल आगे बढ़ी तो हत्या का राज खुल गया। तीनों की हत्या आरिफ के 38 वर्षीय भाई मोख्तार अंसारी ने उनके गाँव से 80 किलोमीटर दूर ले जाकर की थी।
पुलिस ने मोख्तार को गिरफ्तार करके पूछताछ की तो उसने अपना गुनाह कबूल कर लिया। मोख्तार ने बताया कि उसके अब्बा को कुछ दिनों पहले साँप ने काट लिया था। इस वजह से उनकी तबियत काफी खराब रहने लगी थी। मोख्तार का भाई आरिफ इलाज के लिए पैसे नहीं भेज रहा था, जिसका कारण आरोपित मुस्कान और उसके परिवार को मानता था। इसी गुस्से में उसने मुस्कान के पूरे परिवार को खत्म करने की ठान ली।
अपनी साजिश को अंजाम देने के लिए 27 सितंबर को मोख्तार कुसमी गया। यहाँ से उसने कौशल्या, मुस्कान और मिंटू को झाँसे में लिया और अपने साथ लेकर बलरामपुर पहुँच गया। उसने पहले से तय प्लान के मुताबिक तीनों को दहेज़वार के सुनसान स्थान पर मौजूद एक झोपड़ी में रखा। जब रात में माँ के साथ उनकी बेटी और बेटा सो गए तब मोख्तार ने तीनों के सिर पर इतनी तेज कुल्हाड़ी मारी कि सिर की हड्डियाँ तक टूट गईं। इसके बाद उसने सबकी लाश पानी से भरे खेत में फेंक दी और भाग निकला।
कौशल्या, मुस्कान और मिंटू की लाश खेतों में कई दिनों तक पड़ी रही। सुनसान इलाके में तीनों की लाश के अंग पानी के साथ बहते रहे। इसी वजह से ज्यादा दुर्गंध भी नहीं आई। शुक्रवार (15 नवंबर) को खेत का मालिक फसल काटने आया, तब उसे कंगाल पड़े मिले। मामले की सूचना पुलिस को दी गई। जाँच में यह भी पता चला कि कौशल्या के पति सूरजदेव ठाकुर ने अपनी पत्नी की गुमशुदगी थाने में दर्ज करवाई थी। इस केस में सूरजदेव ने आरिफ को नामजद किया था।
पुलिस पर इस शिकायत पर कार्रवाई न करने का आरोप है। तब इस मामले में मोख्तार से भी पूछताछ हुई थी लेकिन उसने सच नहीं उगला था। कुसमी थाना प्रभारी जितेंद्र जयसवाल को कार्रवाई में लापरवाही बरतने के आरोप में लाइन हाजिर कर दिया गया है। शवों के पहचान की पुष्टि के लिए उनके सैम्पल को लैब भेजा जा रहा है जिसकी रिपोर्ट 10-15 दिनों में आ सकती है। मोख्तार को 5 दिनों के रिमांड पर लिया गया है। पुलिस यह भी जानने का प्रयास कर रही है कि हत्या में कहीं मोख्तार के अलावा कोई और तो नहीं था।
केरल के वायनाड जिले के तलापुझा गाँव में 28 अक्टूबर 2024 को कुछ परिवारों को अचानक एक गंभीर और चौंकाने वाला नोटिस मिला। इस नोटिस में केरल राज्य वक्फ बोर्ड ने दावा किया कि वे ज़मीनें जो इन परिवारों की मानी जा रही थीं, असल में वक्फ बोर्ड की संपत्ति हैं।
द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, तलापुझा गाँव के लोगों भेजे गए नोटिस में वक्फ संपत्ति के अतिक्रमण का आरोप लगाया गया है। जैसे ही यह खबर फैली, पूरे इलाके में हड़कंप मच गया। अब तक पाँच परिवारों को यह नोटिस मिला है, लेकिन वहाँ के निवासी चिंतित हैं कि जल्द ही पूरे गाँव के बाकी परिवारों को भी इसी तरह के नोटिस मिल सकते हैं।
इस नोटिस में क्या है?
वक्फ अधिनियम, 1995 की धारा 52 के तहत जारी इस नोटिस में कहा गया कि 4.7 एकड़ जमीन, जो सर्वे नंबर 47/1 और 45/1 में पंजीकृत है, को वक्फ संपत्ति के रूप में दर्ज किया गया है। नोटिस में यह बताया गया कि इस ज़मीन पर वक्फ संपत्ति का दावा है और इसके अतिक्रमण की शिकायत की गई थी। वक्फ बोर्ड ने जमीन मालिकों से कहा कि वे 16 नवंबर 2024 तक अपने लिखित जवाब पेश करें और सभी दस्तावेज़ जमा करें।
इसके अलावा, 19 नवंबर 2024 को इस मामले की ऑनलाइन सुनवाई निर्धारित की गई। नोटिस में चेतावनी दी गई कि अगर मालिकों ने जवाब नहीं दिया या सुनवाई में उपस्थित नहीं हुए, तो मामला उनकी अनुपस्थिति में ही निपटाया जाएगा। इसका सीधा मतलब यह था कि वक्फ बोर्ड अपने स्तर पर निर्णय ले लेगा और उस पर अमल कराएगा।
नोटिस साभार: द हिंदू
जमीन मालिकों ने नोटिस का किया विरोध
इस नोटिस से जमीन मालिकों में गहरी नाराज़गी है और उनमें असमंजस की स्थिति भी है। इन लोगों ने अपना वैध स्वामित्व प्रमाणित करने के लिए दशकों पुरानी कानूनी दस्तावेज़ों और निर्बाध कब्जे का हवाला दिया। इस मामले में हिंदू और मुस्लिम दोनों परिवारों ने अपनी परेशानी जाहिर की। उनका मानना है कि यह उनके भूमि अधिकारों पर अवैध दखल का प्रयास है।
नोटिस पाने वालों में तुषारा अजीत कुमार नाम की महिला भी हैं। उनका कहना है कि उनके परिवार ने 1949 से यह ज़मीन संभाली हुई है। उनके ससुर, हवलदार कुंजरमन, ने 1940 के दशक में एक ईसाई परिवार से यह ज़मीन खरीदी थी और उन्होंने इस ज़मीन के लिए सभी ज़रूरी दस्तावेज़ जमा किए थे। कुंजरमन ने पूरी प्रक्रिया के दौरान दस्तावेजों को अच्छी तरह से संभाला, जिसमें 1949 से लेकर 1960 के दशक के अंत तक के रिकॉर्ड शामिल हैं।
इस ज़मीन को बाद में उनके छह बच्चों में बाँटा गया, जिसमें तुषारा के पति, अजीत कुमार भी शामिल हैं। तुषारा ने हाल ही में इस ज़मीन का एक हिस्सा बेचने की कोशिश की थी, और उन्हें लगता है कि इसी वजह से यह विवाद खड़ा हुआ। तीन सदस्यों वाली थलापुझा हयातुल इस्लाम जमात मस्जिद समिति ने इस बिक्री पर आपत्ति जताई और दावा किया कि यह ज़मीन वक्फ बोर्ड की है। तुषारा का मानना है कि मस्जिद समिति के इन सदस्यों ने ही मामले को वक्फ बोर्ड तक पहुँचाया।
गृहिणी के तौर पर घर संभालने वाली तुषारा ने कहा कि वो इस दावे के खिलाफ मजबूती से खड़ी रहेंगी। उनका कहना था कि यह ज़मीन तभी ली जा सकती है जब वह जीवित न रहें। उनके बेटे जितुल ने वक्फ अधिनियम और उसके संशोधनों का अध्ययन करना शुरू कर दिया है और परिवार एक वकील के साथ मिलकर कानूनी लड़ाई लड़ रहा है।
हिंदुओं ही नहीं, मुस्लिम परिवारों को भी मिला नोटिस
इस नोटिस ने केवल गैर-मुस्लिम परिवारों को ही नहीं, बल्कि मुस्लिम परिवारों को भी हैरान कर दिया। 70 वर्षीय हम्सा फैज़ी भी उन्हीं में से एक हैं, जिन्हें नोटिस मिला। हम्सा फैज़ी ने बताया कि उन्होंने 1998 में यह ज़मीन 50,000 रुपये प्रति सेंट की दर से खरीदी थी और तब से सभी आवश्यक दस्तावेज़ और टैक्स रिकॉर्ड संभालते आ रहे हैं। यह ज़मीन पहले सुकीमारन और कृष्णनकुट्टी से खरीदी गई थी, जो कुनहुट्टी अलक्कंडी के बच्चे थे।
नोटिस पाने वालों में 70 साल के हमजा फैज़ी कई सालों तक जमात समिति का पद संभाल चुके हैं। उन्होंने कहा, “मेरे पास ज़मीन के सभी वैध दस्तावेज़ हैं, फिर भी मुझे नोटिस भेजा गया।” फैज़ी का घर साल 1987 में किसी अन्य व्यक्ति ने बनवाया था, जिसे उन्होंने खरीद लिया था। वो दशकों से उसी घर में रह रहे हैं। हालाँकि, स्थानीय नेताओं से उन्हें समर्थन की उम्मीद है, लेकिन उन्हें अपनी ज़मीन के भविष्य को लेकर चिंता है।
जमाल का हैरानी भरा अनुभव
जमाल के पास 15 सेंट की ज़मीन है, ने इसे एक “चौंकाने वाला अनुभव” बताया। वे पिछले 14 साल से इस संपत्ति पर रह रहे हैं और उसी जगह पर अपनी दुकान चला रहे हैं। उनके पास भी ज़मीन के सभी वैध रिकॉर्ड और टैक्स रसीदें हैं। उन्होंने बताया कि कुछ परिवारों के पास केवल 9 सेंट की ज़मीन है, जो यह दर्शाता है कि यह संपत्ति छोटे-छोटे हिस्सों में अलग-अलग मालिकों के पास बंटी हुई है।
इस विवादित ज़मीन पर सात घर और दस दुकानें हैं, जो थलापुझा पुलिस स्टेशन के पास सड़क किनारे स्थित हैं। निवासियों को चिंता है कि वक्फ बोर्ड के दावे उनके जीवन और रोज़गार को बुरी तरह से प्रभावित कर सकते हैं।
जमीनों और घरों के दस्तावेज मौजूद
तलापुझा के जमीन मालिक अपने स्वामित्व की वैधता पर जोर देते हैं। उनका कहना है कि उनके पास अपने दावे को साबित करने के लिए दशकों पुरानी दस्तावेज़ी प्रमाण हैं। थविनहाल पंचायत के रिकॉर्ड बताते हैं कि विवादित ज़मीन पर कम से कम एक इमारत का दस्तावेज़ 1948 तक का है। अधिकांश निवासियों के पास 1963 में मस्जिद समिति द्वारा उद्धृत किए गए दस्तावेज़ से पहले के टाइटल डीड हैं। इनमें से कई लोग दूसरे या तीसरे पीढ़ी के मालिक हैं, जिन्होंने नियमित रूप से ज़मीन का टैक्स चुकाया है और संपत्ति रिकॉर्ड में किसी भी वक्फ के दावे का कोई उल्लेख नहीं किया गया था।
जमीन पर रहने वाले अन्य लोगों में भी फैला डर
हालाँकि अब तक केवल पाँच परिवारों को नोटिस मिला है, लेकिन लगभग 50 अन्य परिवार जिनके पास इस 4.7 एकड़ विवादित क्षेत्र में छोटे-छोटे ज़मीन के टुकड़े हैं, वो भी आशंकित हैं कि उन्हें भी जल्द ही ऐसे नोटिस मिल सकते हैं। स्थानीय निवासियों का कहना है कि अगर वक्फ बोर्ड का यह दावा मान्य हो जाता है, तो इसका असर पूरे गाँव पर पड़ेगा और लोग अपने घरों और रोज़गार को खो सकते हैं।
एनडीए उम्मीदवार ने स्थानीय लोगों का किया समर्थन
इस विवाद ने स्थानीय नेताओं का भी ध्यान खींचा है। एनडीए उम्मीदवार नव्या हरिदास ने तलापुझा का दौरा कर प्रभावित परिवारों से मुलाकात की और उन्हें समर्थन देने का आश्वासन दिया। उन्होंने वक्फ बोर्ड को चेतावनी दी कि वह निजी संपत्ति को हड़पने नहीं देंगे। भाजपा के सूत्रों ने आरोप लगाया कि वक्फ बोर्ड, वक्फ अधिनियम में प्रस्तावित संशोधनों से पहले जल्दबाजी में जमीन पर दावे कर रहा है।
इस बीच, स्थानीय समुदाय ने एक एक्शन काउंसिल बनाई और मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन तथा मंत्री ओआर केलू को ज्ञापन सौंपा। निवासियों ने सरकार से अपने भूमि अधिकारों की सुरक्षा के लिए हस्तक्षेप की माँग की है।
‘वक्फ का मतलब वक्फ ही रहेगा’
वक्फ शब्द का मतलब है रोकना, सीमित करना और निषेध करना। इस्लामी मान्यताओं के अनुसार, जब एक बार कोई संपत्ति वक्फ के रूप में समर्पित कर दी जाती है, तो वह हमेशा के लिए धार्मिक या परोपकारी उपयोग के लिए ही रह जाती है। शरीयत कानून के अनुसार, एक बार वक्फ संपत्ति घोषित हो जाने के बाद, वह संपत्ति हमेशा वक्फ की ही मानी जाएगी।
वक्फ का तात्पर्य है कि संपत्ति का स्वामित्व व्यक्ति से हटकर अल्लाह को स्थानांतरित हो जाता है। चूँकि संपत्ति का मालिकाना हक वक्फ करने वाले व्यक्ति से अल्लाह को दे दिया जाता है, इस स्थिति में इसे कभी वापस नहीं लिया जा सकता। संपत्ति का देखभाल करने वाला ‘मुतवल्ली’ नियुक्त किया जाता है, जो वक्फ संपत्ति का प्रबंधन करता है। चूँकि ये संपत्तियाँ अल्लाह की हो चुकी है, ऐसे में जो एक बार ‘वक्फ हो गया, वो हमेशा वक्फ ही रहेगा।’
गुजरात में भी आ चुका है ऐसा मामला
कुछ समय पहले गुजरात वक्फ बोर्ड ने सूरत म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन की इमारत पर दावा किया था, क्योंकि दस्तावेज़ अपडेट नहीं किए गए थे। वक्फ के अनुसार, मुगल काल के दौरान यह इमारत एक सराय थी और हज यात्राओं के लिए उपयोग होती थी। ब्रिटिश शासन के दौरान यह संपत्ति ब्रिटिश साम्राज्य की हो गई और आजादी के बाद यह भारत सरकार के अधीन आ गई। दस्तावेज़ों के अद्यतन न होने के कारण, वक्फ बोर्ड ने दावा किया कि यह संपत्ति अब उनकी है, और जैसा कि वक्फ बोर्ड कहता है, “एक बार वक्फ, हमेशा वक्फ।”
एक और रोचक मामला गुजरात के द्वारका का है, जहाँ वक्फ बोर्ड ने देवभूमि द्वारका के बेत द्वारका के दो द्वीपों पर दावा करने के लिए गुजरात उच्च न्यायालय में अर्जी दी थी। अदालत के जज ने यह दावा सुनने से मना कर दिया और वक्फ बोर्ड को अपनी अर्जी में बदलाव के लिए कहा। कोर्ट ने बोर्ड से पूछा कि वक्फ कैसे कृष्ण नगरी की ज़मीन पर दावा कर सकता है।
आपकी सोसायटी में भी बन सकती है मस्जिद
वक्फ संपत्तियों के संदर्भ में एक और दिलचस्प पहलू यह है कि आपकी हाउसिंग सोसाइटी का कोई फ्लैट मालिक अपनी संपत्ति को वक्फ के रूप में दर्ज करा सकता है और वहां मस्जिद बनवा सकता है, बिना अन्य सदस्यों की सहमति के। ऐसा ही मामला सूरत की शिव शक्ति सोसाइटी में हुआ था, जहाँ एक प्लॉट मालिक ने अपने प्लॉट को गुजरात वक्फ बोर्ड में दर्ज करा दिया और वहाँ नमाज़ पढ़नी शुरू कर दी गई। ऐसे में इस तरह का मामला आपकी सोसायटी में भी आ सकता है।
केरल के कोझिकोड में सुन्नी सेंटर में नमाज पढ़ने की हाई कोर्ट ने अनुमति दे दी है। प्रशासन ने इस इलाके में 4 मस्जिद होने की बात कहते हुए इसके लिए इजाजत नहीं दी थी। आसपास के लोग भी इसका विरोध कर रहे थे। उनका कहना था कि नमाज के नाम पर बिना अनुमति मस्जिद बनाई जा रही है।
हाई कोर्ट ने कहा कि सिर्फ दूसरे समुदाय के कुछ लोगों के विरोध के चलते नमाज पढ़ने के लिए बनाई जा रही इमारत का उपयोग करने से नहीं रोका जा सकता है। हाई कोर्ट ने इसके साथ ही मजहबी गतिविधियों की अनुमति दे दी। केरल हाई कोर्ट के जस्टिस मुहम्मद नियास सीपी ने यह फैसला सुनाया।
उन्होंने नमाज के लिए बनाए जा रहे सुन्नी सेंटर को NOC देने के लिए भी कोझिकोड के कलेक्टर को दोबारा विचार के आदेश दिए हैं। जस्टिस नियास ने इस मामले में प्रशासन की वह दलीलें भी नकार दी जिनमें कहा गया था कि यहाँ नमाज के लिए बनाई जा रही इमारत से कानून-व्यवस्था बिगड़ने का डर है।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला केरल के कोझिकोड जिले के कडलुंदी गाँव का है। यहाँ रहने वाले केटी मुजीब के पास एक इमारत है। इस इमारत में 2004 से नमाज पढ़ी जा रही है। 2014 में मुजीब ने इस इमारत की छत की मरम्मत करने के लिए ग्राम पंचायत से NOC माँगी थी। वह उसे दे दी गई थी।
इसके कुछ दिनों बाद इस इमारत के पास रहने वाले हिन्दुओं ने शिकायत की कि यहाँ अवैध निर्माण चल रहा है। इसके बाद पंचायत ने काम रोक दिया। इसके बाद यह मामला जिला प्रशासन के पास पहुँचा, उसने भी 2016 में मुजीब की इमारत में किसी भी प्रकार की नमाज या बाकी धार्मिक गतिविधि पर रोक लगा दी।
इसके खिलाफ मुजीब कोर्ट पहुँच गया। हाई कोर्ट ने प्रशासन के आदेश पर रोक लगाई और अंतरिम तौर पर मुजीब को राहत देते हुए नमाज आयोजित करने की अनुमति दे दी। हालाँकि, कोर्ट ने मुजीब को आदेश दिया कि इस दौरान लाउडस्पीकर का उपयोग नहीं होना चाहिए और ना ही यहाँ जुमे की नमाज पढ़ी जानी चाहिए।
इस मामले में कोर्ट ने जिला कलेक्टर से इस मामले में पुलिस और प्रशासन से रिपोर्ट लेकर फैसला लेने को कहा। कोझिकोड कलेक्टर ने भी आगे इस मामले में स्थानीय हिन्दुओं के विरोध के चलते NOC जारी करने से मना कर दिया। इसके बाद मुजीब फिर कोर्ट पहुँच गया।
मामले की सुनवाई के दौरान स्थानीय हिन्दुओं की तरफ से हाई कोर्ट को बताया गया कि मुजीब इस इमारत को एक मस्जिद के जैसे चला रहा है और इसकी कोई भी अनुमति नहीं ली गई है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि यहाँ संदिग्ध लोगों का आना जाना होता है। उन्होंने मुजीब पर कोर्ट के पुराने आदेश का गलत इस्तेमाल करने का आरोप भी लगाया।
इस मामले में स्थानीय पुलिस अधिकारी और तहसीलदार द्वारा कलेक्टर को भेजी गई रिपोर्ट में भी कहा गया कि इस नई इमारत के 1 किलोमीटर के दायरे में पहले से 4 मस्जिद हैं और नई कि आवश्यकता नहीं है। इस रिपोर्ट में बताया गया कि स्थानीय हिन्दू इसका विरोध कर रहे है।
सुन्नी सेंटर को मस्जिद में बदलने का विरोध इसके बाद जिले के ADM की रिपोर्ट में भी किया गया। इसके बाद कलेक्टर ने NOC देने से इनकार कर दिया। इस मामले में कोर्ट को गाँव के सचिव ने भी कमोबेश यही बात बताई। उन्होंने कोर्ट को यह भी बताया कि जिस इमारत पर विवाद है, वह एक परिवार के रहने के लिए है ना कि नमाज का हॉल बनाने के लिए।
क्या कहा हाई कोर्ट ने अपने फैसले में?
हाई कोर्ट में जस्टिस नियास ने हिन्दू पक्ष और मुजीब की दलीलों को सुनने के बाद NOC पर लगाई गई रोक को रद्द कर दिया। जस्टिस नियास ने कहा, “जिला प्रशासन के अधिकारियों की रिपोर्ट से पता चलता है कि उन्हें दूसरे समुदाय (हिन्दुओं) द्वारा की गई आपत्तियों के कारण कानून और व्यवस्था की स्थिति की आशंका है। केवल इसीलिए कि एक समुदाय दूसरे समुदाय द्वारा मजहबी स्थल की स्थापना का विरोध करता है, यह नहीं माना जा सकता कि इससे शांति भंग होगी।”
जस्टिस नियास ने आगे कहा,”एक लोकतांत्रिक देश में जहाँ नागरिकों को अपने धर्म का पालन करने और उसे मानने का मौलिक अधिकार है, किसी भी समुदाय द्वारा मजहबी स्थल की स्थापना को केवल अन्य समूहों के विरोध के कारण रोका नहीं किया जाना चाहिए।”
जस्टिस नियास ने इस मामले में जिला कलेक्टर से कहा है कि वह NOC पर दोबारा विचार करें और कोर्ट के फैसले के हिसाब से फैसला करें। जस्टिस नियास ने इसी के साथ मुजीब को अपने हॉल को नमाज के लिए उपयोग करने की इजाजत दे दी।
उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले में अवैध तौर पर संचालित हो रहे अवैध मकबतों और मदरसों को मिलने वाली फंडिंग के खिलाफ इंटेलिजेंस ब्यूरो ने अपनी जाँच शुरू कर दी है। इस जाँच में IB का साथ उत्तर प्रदेश पुलिस की आतंकवाद निरोधक टीम (ATS) भी दे रही है। ये मदरसे और मकतब मान्यता न होने की वजह से जाँच के दायरे में हैं। इन्हें मिलने वाली फंडिंग से लेकर इसमें पढ़ने-पढ़ाने वालों को लेकर भी पड़ताल होगी।
दैनिक भास्कर के मुताबिक, जिले में 286 मकतब और अवैध तौर पर चल रहे 19 मदरसे रडार पर हैं। इस क्रम में इंटेलिजेंस ब्यूरो के अधिकारी गोंडा के अल्पसंख्यक कल्याण विभाग पहुँचे। यहाँ उन्होंने मौजूद अधिकारी से राज्य में चल रहे 286 मकतबों और बिना मान्यता के संचालित 19 मदरसों की लिस्ट ली। अब खुफ़िया विभाग इन मकतबों और मदरसों में मिलने वाले पैसों के स्रोत जानने में जुटा हुआ है। इसे चलाने वालों से यह भी पूछा जाएगा कि उन्होंने संचालन के लिए सरकारी मान्यता क्यों नहीं ली।
बता दें कि उत्तर प्रदेश पुलिस की ATS विंग पहले से ही इस दिशा में जाँच कर रही थी। अब इसमें इंटेलिजेंस ब्यूरो के भी शामिल होने से जाँच में तेजी आने और कई नए खुलासों की संभावना है। इन टीमों को शासन द्वारा जरूरी दिशा निर्देश भी मिले हैं। जाँच के बाद रिपोर्ट शासन को प्रेषित की जाएगी। शासन प्राप्त बिंदुओं के आधार पर आगे की कार्रवाई तय करेगा। गोंडा जिले के जिला समाज कल्याण अधिकारी रमेश चंद्र को भी शासन ने जाँच में सहयोग का निर्देश दिया है।
गोंडा के जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी रमेश चंद्र ने मीडिया से बताया कि जाँच एजेंसियों द्वारा माँगे गए कागजात उपलब्ध करवा दिए गए हैं। प्रशासन द्वारा मदरसे और मकतबों के संचालकों को भी साफ निर्देश दिया गया है कि वो जाँच में सहयोग करें। इन संचालकों से पूछताछ की लिस्ट में मकतब-मदरसे कब से और कैसे चलाए जा रहे आदि प्रश्न शामिल हैं। इनको चंदा देने वालों की भी लिस्ट बनाई गई है जिनसे बाद में पूछताछ की जा सकती है। इन संस्थानों में पढ़ने वाले छात्रों का भी आंकड़ा जुटाया जा रहा है।
बताते चलें कि मकतब एक ऐसा स्थान होता है, जहाँ बच्चों को कोचिंग सेंटर की तरह दीनी तालीम दी जाती है, जबकि मदरसे से डिग्री मिलती है। मकतब में सिर्फ कोचिंग दी जाती है। मकतब और मदरसों में विस्तार से अंतर जानने के लिए हमारी यह रिपोर्ट पढ़ें।
कर्नाटक के बेलगावी में एक महिला और उसकी बेटी पर वेश्यावृत्ति का आरोप लगाकर भीड़ द्वारा हमला करने का मामला सामने आया है। घटना की वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल है। राज्य पुलिस ने इस मामले को दो दिन बाद दर्ज किया। वहीं भाजपा ने इस मामले के प्रकाश में आने के बाद कॉन्ग्रेस शासित प्रदेश की कानून व्यवस्था पर सवाल खड़ा किया है।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक घटना बेलगावी के थानाक्षेत्र मालामारुति की है। यहाँ के गाँव वड्डारावाड़ी में एक महिला अपनी बेटी के साथ पिछले 4 वर्षों से रहती है। 11 नवंबर को महिला के घर में आसपास के कुछ पड़ोसी घुसे। उन्होंने महिला पर वेश्यावृत्ति का आरोप लगाया और मकान खाली करने का दबाव बनाने लगे। वो पीड़िता को कॉलगर्ल कह कर बुला रहे थे। इन सभी का कहना था कि महिला के घर में तमाम बाहरी लोगों का आना-जाना था।
महिला ने पड़ोसियों के आरोपों से इंकार किया और मकान खाली करने से मना कर दिया। इस बात पर घर में घुसे पड़ोसी भड़क उठे। उन्होंने पहले महिला और उनकी बेटी को बेरहमी से पीटा । बाद में इन्होंने महिला के कपड़े फाड़ और उसे निर्वस्त्र कर दिया। आरोपितों ने पीड़िता की पिटाई का वीडियो भी अपने मोबाइल में बना डाला। पिटाई के बाद सभी आरोपित पीड़िता को धमकी देते हुए वापास लौट गए। कुछ देर बाद महिला अपने साथ हुई प्रताड़ना की शिकायत करने पुलिस स्टेशन पहुँची।
ಬೆಳಗಾವಿಯ ವಂಟಮೂರಿ ಗ್ರಾಮದಲ್ಲಿ ಮಹಿಳೆಯನ್ನು ಬೆತ್ತಲೆಗೊಳಿಸಿ ಹಲ್ಲೆ ಮಾಡಿದ ನೀಚ ಕೃತ್ಯ ಮಾಸುವ ಮುನ್ನವೇ ದುರುಳರು ಸಾರ್ವಜನಿಕವಾಗಿ ಮಹಿಳೆಯೊಬ್ಬರ ಬಟ್ಟೆಯನ್ನು ಹರಿದು ಆಕೆಯ ಮೇಲೆ ಹಲ್ಲೆ ನಡೆಸಿ ಪೈಶಾಚಿಕ ಕೃತ್ಯ ಮೆರೆದಿದ್ದಾರೆ.
बताया जा रहा है कि पुलिस ने 2 दिनों तक पीड़िता की शिकयत को अनसुना किया। बाद में महिला की पिटाई और उसको निर्वस्त्र करने का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ तो मामला संज्ञान में लेते हुए पीड़िता को पीटने वाले 3 पड़ोसियों के खिलाफ FIR दर्ज की। इन सभी पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 115(2), 3(5), 331, 352 और 74 के तहत कार्रवाई की गई है। मामले में जाँच व अन्य जरूरी कानूनी कार्रवाई की जा रही है। BJP ने इस घटना के बाद कर्नाटक सरकार को आड़े हाथों लिया है। भाजपा का आरोप है कि कॉन्ग्रेस सरकार के दौरान प्रदेश में महिलाएँ सुरक्षित नहीं हैं।
झारखंड में केवल बांग्लादेशी-रोहिंग्या घुसपैठियों का ही आतंक नहीं है। ‘वर्ग विशेष’ का खौफ ऐसा है कि पत्रकार भी डरते हैं। रवि भास्कर नाम के एक पत्रकार ने ऑपइंडिया से बातचीत में यह डर साझा किया है। भास्कर का एक वीडियो सोशल मीडिया में वायरल हो रहा है। इसमें सवाल पूछने पर झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के प्रत्याशी निजामुद्दीन अंसारी उन्हें थप्पड़ मारने की कोशिश करते दिख रहे हैं।
ऑपइंडिया को रवि भास्कर ने बताया है कि अंसारी ने उन्हें धमकी भी दी। उनके समर्थकों ने उन्हें घेर लिया था। उनका माइक तोड़ दिया। स्थानीय ग्रामीणों के कारण उनकी जान बची। उन्होंने यह भी कहा कि यदि मौके पर ‘वर्ग विशेष’ के लोग ज्यादा होते तो उनके साथ ‘अनहोनी’ भी हो सकती थी।
घटना 17 नवंबर 2024 की है जब झारखंड मुक्ति मोर्चा के प्रत्याशी निजामुद्दीन अंसारी विधानसभा धनवार में लाव लश्कर के साथ अपना चुनाव प्रचार कर रहे थे। इसी दौरान खबर मंत्र लाइव न्यूज़ चैनल के पत्रकार रवि भास्कर ने उनसे सवाल-जवाब किया। रवि भास्कर ने निजामुद्दीन अंसारी सहित कुछ अन्य नेताओं के द्वारा पूर्व में पाला बदलने को लेकर सवाल किया। इसी सवाल पर निजामुद्दीन अंसारी भड़क उठे।
निजामुद्दीन अंसारी ने पत्रकार की तरफ थप्पड़ ताना और कहा, “मारेंगे दो थप्पड़।” इतना कहकर वो रवि भास्कर की तरफ दौड़ भी पड़े। रवि भास्कर ने JMM प्रत्याशी की इस हरकत का प्रतिरोध किया और उन्हें तमीज से पेश आने के लिया कहा। इसी दौरान मौके पर मौजूद ग्रामीणों और सुरक्षाकर्मियों ने बीच बचाव किया। न्यूज़ मंत्र लाइव ने अपने एक शो में ग्रामीणों को अपने पत्रकार को बचाने के लिए धन्यवाद भी किया है।
रवि भास्कर ने आरोप लगाया कि न सिर्फ निजामुद्दीन अंसारी बल्कि उनके तमाम समर्थक गुंडागर्दी पर उतारू हो गए थे। पत्रकार का माइक भी तोड़ दिया गया। बकौल रवि भास्कर अगर ग्रामीण बीच-बचाव न करते तो उनके साथ कोई बड़ी घटना हो सकती थी। पत्रकार के आसपास मौजूद ग्रामीणों ने भी निजामुद्दीन की इस हरकत को गलत बताया। उन्होंने कहा कि झारखंड मुक्ति मोर्चा के प्रत्याशी की हरकत बहुत ही गलत थी। एक ग्रामीण ने कहा, “निजामुद्दीन गुंडा है।”
लगता है पूरा का पूरा झारखंड मुक्ति मोर्चा ही हार की हताशा में डूब गया है।
पूर्व विधायक और वर्तमान में धनवार सीट से झामुमो प्रत्याशी निजामुद्दीन अंसारी की बौखलाहट इतनी बढ़ गई है कि वो लोकतंत्र के चौथे स्तंभ यानि कि पत्रकार बंधुओं को भी मारने और धमकाने पर उतर आए हैं।
झारखंड भाजपा ने निजामुद्दीन की इस करतूत को अपने आधिकारिक हैंडल से शेयर किया है। उन्होंने अपने कैप्शन में लिखा, “लगता है पूरा का पूरा झारखंड मुक्ति मोर्चा ही हार की हताशा में डूब गया है। पूर्व विधायक और वर्तमान में धनवार सीट से झामुमो प्रत्याशी निजामुद्दीन अंसारी की बौखलाहट इतनी बढ़ गई है कि वो लोकतंत्र के चौथे स्तंभ यानि कि पत्रकार बंधुओं को भी मारने और धमकाने पर उतर आए हैं। जरा सोचिए अभी तो ये सिर्फ प्रत्याशी हैं, कहीं धोखे से अगर ये जीत गए तो जनता पर कितना जुल्म और कहर बरपाएँगे इसका अंदाजा आप खुद लगा सकते हैं।”
वर्ग विशेष के लोग ज्यादा होते तो हो जाती अनहोनी
ऑपइंडिया ने इस घटना के बारे में पत्रकार रवि भास्कर से बात की। रवि भास्कर ने हमें बताया कि अगर निजामुद्दीन अंसारी के सहयोगियों और वर्ग विशेष के लोगों की संख्या ज्यादा होती तो उनके साथ कोई अनहोनी हो जाती। बकौल रवि भास्कर जब उनको निजामुद्दीन अंसारी के समर्थकों ने घेर लिया तब उन्होंने ग्रामीणों से अपनी जान बचाने के लिए गुहार लगाई। इस गुहार पर कई महिलाएँ विरोध करती हुई सामने आईं तब निजामुद्दीन अंसारी अपने समर्थकों सहित वहाँ से वापस लौटा।
रवि भास्कर ने बताया कि वो अपनी कवरेज चुनाव आयोग की बाकायदा अनुमति से कर रहे थे। जाते-जाते निजामुद्दीन अंसारी और उसके साथियों ने पत्रकार को धमकी भी दी है कि चुनाव के बाद उनको देख लिया जाएगा। इन्हीं ने मिल कर पत्रकार का मोबाइल भी छीन लिया था। रवि भास्कर और उनके न्यूज़ संस्थान के अन्य स्टाफ मिल कर जल्द ही मामले की पुलिस में शिकायत करने जा रहे हैं। हमें बताया गया कि इसके लिए वो सभी निजामुद्दीन अंसारी और उनके समर्थकों के खिलाफ आवेदन लिख रहे हैं। रवि भास्कर ने अन्य तमाम मीडिया संस्थानों से अपने खिलाफ हुए अत्याचार पर सहयोग की अपील की है।
नेशनल पीपुल्स पार्टी (NPP) ने मणिपुर की NDA सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया है। NPP ने यह फैसला मणिपुर में हाल ही में हुई हिंसा के बाद किया है। NPP मुखिया कोनराड संगमा ने कहा है कि मणिपुर में बिरेन सिंह की सरकार हिंसा रोकने में असफल रही है, इस कारण से वह अपना समर्थन वापस ले रहे हैं।
NPP मुखिया संगमा ने भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा को एक पत्र लिखा कर मणिपुर सरकार से समर्थन वापस लेने की जानकारी दी है। NPP ने अभी NDA में रहने या बाहर निकलने को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं की है। NPP के मणिपुर विधानसभा में 7 विधायक हैं।
NPP (National People's Party) withdraws its support to the N. Biren Singh-led Government in Manipur with immediate effect. pic.twitter.com/iJ8VpPxWD2
NPP के समर्थन वापस लेने के बाद भी राज्य में NDA सरकार को कोई खतरा नहीं है। 60 सीटों वाली मणिपुर विधानसभा में भाजपा अकेले ही बहुमत है। भाजपा के पास यहाँ 37 सीटें हैं और उसे 9 विधायकों का समर्थन भी हासिल है। हालाँकि, NPP का यह कदम स्थिति की गम्भीरता को दर्शाता है।
NPP ने मणिपुर सरकार से समर्थन तब वापस लिया है जब पिछले एक सप्ताह में राज्य के भीतर भारी हिंसा हुई है। रविवार (17 नवम्बर, 2024) को भी असम में दो लाशें नदी में मिली हैं। यह लाशें मणिपुर से बह कर आई हैं। इनमें से एक लाश वृद्ध महिला जबकि दूसरी 2 साल के एक बच्चे की है।
बच्चे की लाश के साथ काफी बर्बरता की बात सामने आई है। इस लाश से उसका सर गायब था। यह हत्या और बर्बरता करने का आरोप कुकी लड़ाकों पर लगा है। कुकी लड़ाकों ने इस परिवार के कई लोगों को मणिपुर के जिरिबाम से अगवा किया था और उसके बाद हत्या कर दी।
कुकी लड़ाकों ने इन दोनों के साथ ही 4 और परिजनों को अगवा किया था। NDTV की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि यह मणिपुर सरकार में काम करने वाले हीरोजीत का परिवार था। उनके बेटे और सास के अलावा उनकी पत्नी, एक और बच्चा, पत्नी की बहन, बहन के बच्चे की भी कुकी लड़ाकों ने हत्या कर दी है।
इन सभी को कुकी लड़ाकों ने मणिपुर के बोरोबेकरा इलाके से एक राहत कैम्प से अगवा किया था। कुकी लड़ाकों ने यह कार्रवाई CRPF से हुई एक मुठभेड़ के दौरान की थी। उन्होंने वापस लौटते समय इन 6 लोगों को अगवा कर लिया था और बाद में मार दिया। इससे पहले CRPF के साथ हुई मुठभेड़ में 11 कुकी लड़ाके मारे गए थे।
मारे गए लोग मैतेई समुदाय से थे। यह 6 लाशें मिलने के बाद राज्य में गुस्सा है। लाशें मिलने के बाद रविवार को मणिपुर के अलग-अलग हिस्सों में भारी हिंसा हुई। लोगों ने सड़कों पर उतर कर प्रदर्शन किया। कई जगह तोड़फोड़ भी हुई। कई भाजपा विधायकों के घरों को भी निशाने पर लिया गया है।
Kudos to all who converged at the official residence of Indian Home Minister to protest against gruesome torture, rape & murder of 6 Meitei women and children by #KukiTerrorists More than 200 Manipuris also got detained by Delhi policy today. Long live Manipur. United We Stand. pic.twitter.com/st1eb4gTB1
कई MLA के घर में आगजनी और हमला किया गया। इस मामले में गृह मंत्री अमित शाह के घर के बाहर मैतेई समुदाय ने रविवार (17 नवम्बर, 2024) को प्रदर्शन भी किया। उन्होंने 6 लोगों की हत्या के मामले में कार्रवाई की माँग की है।
गृह मंत्री अमित शाह ने रविवार को भी इस मामले में एक मीटिंग की थी। उन्होंने सोमवार को भी इस मसले पर उच्चाधिकारियों के साथ बैठक की है। मीडिया रिपोर्ट्स में बताया गया है कि केंद्र सरकार और भी जवान मणिपुर भेजने पर विचार कर रही है।
मध्य प्रदेश के इंदौर में एक दलित परिवार ने अपने घर के आगे पलायन का पोस्टर चिपका दिया है। पोस्टर में पलायन की वजह मुस्लिम प्रताड़ना को बताया गया है। आरोप है कि पीड़ितों पर मुस्लिमों द्वारा किसी पुराने केस में समझौते का दबाव बनाया जा रहा है। मुख्य आरोपित का नाम शादाब है जिस पर पीड़ित के घर सुतली बम फेंकने का भी आरोप है। रविवार (17 नवंबर 2024) को मामले की शिकायत दर्ज करवाई गई है। हिन्दू संगठनों के विरोध के बाद पुलिस ने 7 आरोपितों के खिलाफ केस दर्ज हुआ है।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक घटना इंदौर के बगीचे कॉलोनी की है। यहाँ राजेश कलमोइया अपने परिवार के साथ रहते हैं। वह अपने घर के ही बगल अंडे का ठेला लगा कर गुजर-बसर करते हैं। लगभग 1 माह पहले कॉलोनी में पाइप लाइन का काम हो रहा था। इसी दौरान राजेश की अपने पड़ोस में लगभग 40 वर्षों से रहने वाले शादाब शानू से बहस हुई थी। बताया जा रहा है कि शादाब लगातार राजेश को घूर रहा था जिस पर दोनों में कहासुनी हो गई थी।
इस दौरान शादाब शानू ने राजेश को गंदी-गंदी गालियाँ देते हुए धमकी दी थी। तब राजेश की शिकायत पर शादाब शानू के खिलाफ SC/ST एक्ट सहित अन्य धाराओं में मुकदमा दर्ज हुआ था। इसी मुकदमे में समझौते के लिए राजेश और उनके परिवार पर शादाब की तरफ से लगातार दबाव बनाया जा रहा था। उनको शादाब शानू की तरफ से परिवार सहित जान से मार डालने की धमकियाँ मिल रहीं थी। शुक्रवार को शादाब, रईस, इरफान, सोनू, सलीम, जल्लू, रिजवान, रेहाना और हिना राजेश की पत्नी के पास दबाव बनाने भी गए थे।
हालाँकि, राजेश ने केस वापस लेने से इंकार कर दिया था। राजेश का कहना है कि शनिवार रात लगभग पौने 3 बजे उनकी नींद घर के पास हुए एक धमाके से खुल गई। राजेश अपनी पत्नी मीनाक्षी के साथ बाहर निकले तो वहाँ उनका पड़ोसी रईस खड़ा मिला। पूछने के बावजूद रईस ने धमाका करने वाले के बारे में कुछ नहीं बताया। इसी दौरान पास एक अन्य बम पड़ा था जिसे मीनाक्षी ने देख लिया। उन्होंने फ़ौरन ही अपने पति को अंदर खींच लिया तभी धमाका हो गया।
राजेश का कहना है कि अगर थोड़ी सी देर हुई होती तो वो इस धमाके की चपेट में आकर झुलस गए होते। शनिवार को हुई इस घटना से तंग आकर राजेश ने अपने घर के बाहर पलायन का पोस्टर चिपका दिया। उन्होंने पोस्टर में लिखा, “यह मकान बिकाऊ है। मुस्लिम प्रताड़ना से परेशान।” इस मामले की जानकारी मिलते ही बजरंग दल के कार्यकर्ता राजेश के घर पहुँचे। उन्होंने शादाब और उसके साथियों पर एक्शन की माँग को लेकर प्रदर्शन शुरू कर दिया।
हिन्दू संगठन के सदस्यों का आरोप है कि राजेश के घर पर हुए धमाके में सुतली बम और कीलों का प्रयोग किया गया था। इस मामले की सूचना मिलते ही फ़ौरन ही पुलिस बल मौके पर पहुँचा। पुलिस ने कार्रवाई का भरोसा देकर नाराज लोगों को समझाया। आसपास के CCTV फुटेज को खंगाला गया। डॉग स्क्वायड को भी बुलवाया गया। घटनास्थल से बरामद कीलों और छर्रों को कब्ज़े में लेकर जाँच के लिए लैब भेज दिया गया है।
जाँच के दौरान शादाब शानू की तरफदारी करने वाले भी वहाँ पहुँच गए थे। वह राजेश के आरोपों को झूठा बता रहे थे। पुलिस ने दूसरे पक्ष को भी समझा कर वापस भेजा। फ़िलहाल इंदौर पुलिस ने इस केस में 7 आरोपितों के खिलाफ FIR दर्ज कर ली है। क्षेत्र के एडिशनल डीसीपी आनंद यादव के अनुसार, दोनों परिवार 40 साल से आमने-सामने रह रहे हैं। घटना के पीछे कहासुनी का पुराना विवाद है। पटाखे फोड़ने के आरोपों के समर्थन में अभी तक पुलिस को सबूत नहीं मिल पाए हैं। फिलहाल मामले में जाँच व अन्य जरूरी कानूनी कार्रवाई की जा रही है।