पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले के बेलडांगा में कानून-व्यवस्था की स्थिति बेहद चिंताजनक बनी हुई है। शनिवार (16 नवंबर) को कथित ‘ईशनिंदा’ का आरोप लगाते हुए इस्लामी कट्टरपंथियों की भीड़ ने हिंदू घरों पर हमले किए, जिससे इलाके में तनाव फैल गया।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस्लामी कट्टरपंथियों की भीड़ ने बड़े पैमाने पर हिंसा, तोड़फोड़ और आगजनी की। बेलडांगा के एक व्यक्ति पहचान न बताने की शर्त पर बताया कि घटनास्थल पर देसी बम फेंके गए और 20 से अधिक हिंदू घायल हुए। हालाँकि मीडिया द्वारा जारी आँकड़ों में सिर्फ 6 लोगों के घायल होने की पुष्टि की गई है। पुलिस का दावा है कि इस हिंसा में कोई जान नहीं गई।
Do you have the guts to reveal the identity of the 'two groups' who clashed over 'some condemnable mischief'? Also, clash means a violent confrontation between two parties, but what happened in Beldanga is at the best can be described as a concerted attack by one party on the… https://t.co/FwklnDa7GBpic.twitter.com/AuW9VnoLJs
स्थानीय प्रशासन ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 167 के तहत निषेधाज्ञा लागू कर दी है, जिससे पाँच से अधिक लोगों के इकट्ठा होने पर रोक लगाई गई है। इंटरनेट सेवाएँ अभी भी निलंबित हैं।
तृणमूल कॉन्ग्रेस (टीएमसी) सरकार के मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने दावा किया है कि बेलडांगा में स्थिति सामान्य हो गई है, लेकिन स्थानीय सूत्रों ने इस दावे को खारिज किया है।
Beldanga, a predominantly Musl!m area, has witnessed its third such attack this year.
The pandal’s lighting system owner was also Musl!m.
टीएमसी नेता कुणाल घोष ने सोमवार (18 नवंबर 2024) को कहा, “बेलडांगा में एक भड़काऊ घटना के कारण हिंसा हुई। हालाँकि, अब वहाँ शांति है। कुछ ‘दुष्ट ताकतें’ लोगों को भड़काने की कोशिश कर रही हैं।” उन्होंने दावा किया कि यही दुष्ट ताकतें भ्रम फैला रही हैं और हिंसा के लिए जिम्मेदार हैं।
सूत्रों के मुताबिक, इंटरनेट सेवाएँ बंद होने की वजह से हिंसा के वीडियो और तस्वीरें सोशल मीडिया पर नहीं पहुँच पा रही हैं, जिससे घटना की पूरी सच्चाई बाहर नहीं आ रही।
इसी बीच, पश्चिम बंगाल के राज्यपाल सीवी आनंद बोस ने ममता बनर्जी से इस घटना पर ‘कार्रवाई रिपोर्ट’ माँगी है। पीटीआई से बातचीत में एक अधिकारी ने बताया कि “राज्यपाल ने मुख्यमंत्री से तुरंत कार्रवाई रिपोर्ट माँगी है। वह इस घटना से बेहद आहत हैं और अपनी नाराजगी जाहिर की है। यदि आवश्यकता पड़ी, तो राज्यपाल बेलडांगा का दौरा कर सकते हैं।”
राज्यपाल सीवी आनंद बोस इस मामले पर राजभवन से नजर बनाए हुए हैं। उन्होंने अपनी बाकी सभी व्यस्तताएँ रद्द कर दी हैं ताकि बेलडांगा की स्थिति का पूरा जायजा लिया जा सके।
आंध्र प्रदेश के तिरुपति मंदिर में अब गैर-हिन्दू काम नहीं कर सकेंगे। उन्हें या तो स्वेच्छा से सेवानिवृत्ति होगी या फिर उनको आंध्र प्रदेश के किसी दूसरे विभाग में ट्रांसफर कर दिया जाएगा। यह फैसला हाल के दिनों में तिरुपति प्रसाद में ‘पशु चर्बी’ की मिलावट वाले विवाद के बाद हुआ है। यह फैसला मंदिर का प्रबंधन करने वाले तिरुपति तिरुमला देवस्थानम (TTD) ने लिया है।
सोमवार (18 नवंबर, 2024) को TTD के नए चेयरमैन बी आर नायडू की अध्यक्षता में सम्पन्न हुई बैठक में गैर हिन्दुओं को तिरुपति की सेवा में लगाने के अलावा भी कई फैसले हुए हैं। यह बैठक तिरुपति के अन्नामैया भवन में हुई। इसमें TTD के चेयरमैन बी आर नायडू के अलावा बाकी सदस्य भी शामिल हुए।
TTD ने फैसला लिया है कि उसके लिए काम करने वाले गैर हिन्दू कर्मचारियों को आंध्र प्रदेश सरकार के किसी अन्य विभाग में भेजा जाएगा या फिर उन्हें सेवानिवृत्ति दे दी जाएगी। TTD ने कहा कि वह आगामी दिनों में गैर-हिन्दू कर्मचारियों की संख्या को लेकर रिपोर्ट तैयार करेगी। इसके बाद वह एक्शन लेगी।
अलग-अलग मीडिया रिपोर्ट्स में TTD के लिए काम करने वालों की सलग संख्या बताई गई है। हिंदुस्तान टाइम्स में एक हवाले से इनकी संख्या 44 जबकि टाइम्स ऑफ़ इंडिया में इनकी संख्या 300 से अधिक बताई गई है। हालाँकि, TTD की कर्मचारी यूनियनों ने इस निर्णय का स्वागत किया है और कहा है कि यह कानूनन सही है।
TTD ने यह भी फैसला लिया है कि वह मंदिर में दर्शन के बाद नेताओं के राजनीतिक बयान देने पर भी रोक लगाएगा। TTD ने कहा है कि दर्शन के बाद राजनीतिक बयानबाजी करने वाले नेताओं पर विधिक कार्रवाई की जाएगी। TTD ने यह भी कहा है कि इसका उल्लंघन करने वालों पर विधिक कार्रवाई की जाएगी चाहे वह किसी भी पार्टी का सदस्य हो।
बोर्ड बैठक में इसके अलावा कई प्रशासनिक निर्णय भी लिए गए हैं। इस बैठक में निर्णय लिया गया है कि बोर्ड का पैसा अब निजी बैंकों में नहीं रखा जाएगा। TTD अब पैसा रखने के लिए सरकारी बैंकों में खाते खुलवाएगा। बोर्ड दर्शन का समय कम करने के लिए भी काम करेगा।
TTD ने कुछ दिनों पहले लड्डू प्रसादम में उपयोग किए जाने वाले घी पर हुए विवाद के बाद शुद्धता को लेकर भी फैसले लिए हैं। TTD ने कहा है कि अच्छी गुणवत्ता का घी लेने के लिए वह फिर से टेंडर जारी करेंगे। गौरतलब है कि हालिया रिपोर्ट्स में लड्डू में चर्बी की बात सामने आई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (19 नवंबर 2024) को मलयालम अभिनेता सिद्दीकी को एक रेप मामले में अग्रिम जमानत दे दी। यह मामला 2016 के एक कथित घटना से जुड़ा है, जिसमें एक युवा अभिनेत्री ने सिद्दीकी पर यौन शोषण का आरोप लगाया है। जस्टिस बेला त्रिवेदी और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने सिद्दीकी को दी गई 30 सितंबर की अंतरिम जमानत को स्थाई कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने पीड़ित को ही लगाई डाँट
सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा, “शिकायतकर्ता ने घटना के लगभग आठ साल बाद 2024 में एफआईआर दर्ज की। इसके अलावा, 2018 में फेसबुक पर 14 लोगों के खिलाफ यौन शोषण के आरोप लगाते हुए पोस्ट किया गया था। फिर भी वह केरल सरकार द्वारा गठित हेमा समिति के पास अपनी शिकायत लेकर नहीं गई।” जस्टिस त्रिवेदी ने कहा, “आपने फेसबुक पर पोस्ट डालने की हिम्मत दिखाई, लेकिन पुलिस के पास जाने की नहीं?”
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि शिकायतकर्ता के पुलिस में देर से शिकायत दर्ज करने और अन्य परिस्थितियों को देखते हुए यह जमानत दी जा रही है। हालाँकि, जमानत की शर्तों के तहत सिद्दीकी को अपना पासपोर्ट ट्रायल कोर्ट में जमा करना होगा और जाँच में पूरा सहयोग करना होगा।
सिद्दीकी के वकील का दावा-प्रतिष्ठा खराब करने की कोशिश
सिद्दीकी की ओर से वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने कोर्ट में दलील दी कि घटना 2016 की है, जबकि शिकायत 2024 में की गई। उन्होंने कहा, “शिकायतकर्ता ने फेसबुक पर कई लोगों पर इसी तरह के आरोप लगाए हैं। यह मेरी प्रतिष्ठा को खराब करने की कोशिश है।”
रोहतगी ने यह भी कहा कि शिकायतकर्ता ने घटना के आठ साल बाद एफआईआर दर्ज की, जबकि वह फेसबुक पर 2018 से पोस्ट कर रही थीं। उन्होंने यह भी बताया कि सिद्दीकी ने 26 अगस्त 2024 को शिकायतकर्ता के खिलाफ पहले ही शिकायत दर्ज की थी।
शिकायतकर्ता की वकील वृंदा ग्रोवर ने कोर्ट में कहा कि अभिनेत्री ने 2018 से सोशल मीडिया पर इस घटना के बारे में बोलना शुरू किया, लेकिन इंडस्ट्री में एक “सुपरस्टार” के खिलाफ जाने में उन्हें काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। ग्रोवर ने कहा, “हेमा समिति की रिपोर्ट के बाद, और जब अदालत ने महिलाओं के खिलाफ यौन शोषण के मामलों पर ध्यान देना शुरू किया, तो उन्हें अपनी शिकायत दर्ज कराने की हिम्मत मिली।” उन्होंने यह भी दावा किया कि सिद्दीकी ने 2016 में अभिनेत्री को फिल्म प्रीव्यू के बहाने एक होटल में बुलाया और वहाँ उनका यौन शोषण किया।
राज्य सरकार की तरफ से वरिष्ठ वकील ने रखा पक्ष
केरल सरकार के वरिष्ठ वकील रंजीत कुमार ने कहा कि शिकायतकर्ता ने उस समय केवल एक उभरती हुई अभिनेत्री होने के बावजूद फिल्म प्रीव्यू में शामिल होने का निमंत्रण क्यों स्वीकार किया। उन्होंने सिद्दीकी पर सबूत नष्ट करने और जाँच में सहयोग न करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा, “सिद्दीकी ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट्स डिलीट कर दिए और जाँच में कोई भी जानकारी देने से इनकार कर दिया। उनके खिलाफ आरोप गंभीर हैं और उनके प्रभाव के कारण गवाहों पर दबाव डाला जा सकता है।”
इससे पहले, केरल हाई कोर्ट ने 24 सितंबर को सिद्दीकी की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी थी। हाई कोर्ट ने कहा था कि देरी के बावजूद शिकायतकर्ता के आरोप गंभीर हैं और उनका निपटारा ट्रायल के दौरान होना चाहिए। इसके बाद, सुप्रीम कोर्ट ने 30 सितंबर को सिद्दीकी को अंतरिम जमानत दी थी।
हेमा कमेटी की रिपोर्ट में भी दर्ज है ये मामला
इस मामले का उल्लेख केरल की हेमा समिति की रिपोर्ट में भी किया गया है, जिसने मलयालम फिल्म उद्योग में यौन शोषण और लैंगिक भेदभाव के मामलों को उजागर किया। इस रिपोर्ट के सार्वजनिक होने के बाद, कई महिलाओं ने इंडस्ट्री के कई बड़े नामों के खिलाफ यौन शोषण के आरोप लगाए।
सुप्रीम कोर्ट ने यह कहते हुए सिद्दीकी को अग्रिम जमानत दी कि जाँच प्रक्रिया जारी रहेगी और ट्रायल कोर्ट अन्य शर्तें तय कर सकता है। शिकायतकर्ता की ओर से लगाई गई देरी और परिस्थितियों को जाँच के दौरान पूरी तरह से ध्यान में रखा जाएगा।
बिहार के पूर्णिया से सांसद पप्पू यादव को झारखंड में महिलाओं ने सामने से सुना दिया। पप्पू यादव CM हेमंत सोरेन की पत्नी कल्पना सोरेन के लिए ‘स्टार प्रचारक’ बन कर पहुँचे थे। कल्पना सोरेन के लिए वोट देने से महिलाओं ने मना कर दिया। महिलाओं ने कहा कि वह भाजपा को वोट देंगी। इस बातचीत का एक वीडियो भी वायरल हो रहा है।
पप्पू यादव झारखंड विधानसभा चुनाव में गांडेय सीट से झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) उम्मीदवार कल्पना सोरेन के लिए वोट माँगने सोमवार (18 नवम्बर, 2024) को पहुँचे थे। यहाँ वह इस दौरान गाड़ी की छत पर बैठक पर लोगों से वोट माँग रहे थे। उन्होंने इसी दौरान कुछ महिलाओं के समूह से JMM के लिए वोट माँगे।
उन्होंने कहा, “यहाँ से बिहार से, देश से चल के आए हैं, और अपने ख़ून से हम आशीर्वाद लेने आए हैं… दीजिएगा ना आशीर्वाद… बेटी दीजिएगा ना आशीर्वाद, ओ बिटिया दीजिएगा ना।” इसी दौरान उनमें से एक महिला ने JMM को वोट देने से मना कर दिया।
महिला ने पप्पू यादव की वोट देने की अपील पर कहा, “नहीं देंगे वोट, हम लोग भाजपा में वोट देंगे, इतना दिन JMM क्या किया। पाँच साल JMM ने कुछ नहीं किया।”
झारखंड में,यह है झामुमो के स्टार प्रचारक के सभा का सच। मोदी मय, जय भाजपा तय भाजपा pic.twitter.com/vvFyRLPC3w
इसके बाद पप्पू यादव ने वापस सवाल पूछा, उन्होंने कहा, “20 साल भाजपा रही, उसने क्या किया, तुम्हारे कहने से कुछ नहीं होगा।”
महिला तब भी भाजपा को वोट देने के रुख पर अड़ी रहीं। उन्होंने कहा, “बहुत कुछ हुआ है, मंदिर बनाया है भाजपा ने। आप जाकर देखिए रोड में किस तरह लगता है।
लगभग 1 मिनट की वोटरों और पप्पू यादव के बीच की यह बातचीत सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रही है। इस बातचीत के बाद भाजपा नेता कह रहे हैं कि झारखंड मोदीमय हो चुका है।भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने इस वीडियो को सोशल मीडिया पर साझा किया है।
वहीं पप्पू यादव ने इस चुनाव प्रचार के बाद एक्स (पहले ट्विटर) पर कपना सोरेन के जीतने की बात कही है।
कल्पना सोरेन का यह दूसरा चुनाव है। इससे पहले उन्होंने 2024 में इसी विधानसभा सीट पर हुआ उपचुनाव जीता था। JMM हेमंत सोरेन के जमीन घोटाला मामले में गिरफ्तार किए जाने के बाद उन्हें चेहरा बना रही है। हाल ही में उनकी महँगी अंगूठी और बैग को लेकर भी विवाद हुआ था।
झारखंड विधानसभा चुनाव के लिए दूसरे चरण की वोटिंग बुधवार (20 नवम्बर, 2024) को होनी है। इसके लिए झामुमो-कॉन्ग्रेस गठबंधन और भाजपा, दोनों ने अपने संसाधन झोंक दिए हैं। झारखंड विधानसभा चुनाव के नतीजे 23 नवम्बर, 2024 को आएँगे।
पप्पू यादव के साथ पहली बार ऐसी झेंपने वाली स्थिति नहीं हुई है। इससे पहले पप्पू यादव ने विश्नोई गैंग को खत्म करने की बात कही थी। फिर उन्होंने दावा किया कि विश्नोई गैंग उन्हें धमका रहा है और बाद में इस मामले से वह किनारे हो गए। उन्होंने कहा कि हमें विश्नोई गैंग मामले से कोई लेना देना नहीं है।
कर्नाटक में कॉन्ग्रेस और बीजेपी के बीच सियासी बयानबाजी तेज़ हो गई है। कॉन्ग्रेस विधायक रविकुमार गनिगा ने दावा किया कि बीजेपी ने कॉन्ग्रेस विधायकों को खरीदने के लिए ₹100 करोड़ का ऑफर दिया है। वहीं, इस दावे को उनके ही पार्टी के विधायकों ने खारिज कर दिया।
कॉन्ग्रेस विधायक ने लगाए गंभीर आरोप
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, मांड्या से कॉन्ग्रेस विधायक रविकुमार गनिगा ने कहा कि बीजेपी ने सरकार गिराने के लिए कॉन्ग्रेस विधायकों को ₹100 करोड़ का ऑफर दिया। उन्होंने बताया कि यह ऑफर चिक्कमगलुरु के विधायक थम्मैया और किट्टूर के विधायक बाबासाहेब पाटिल जैसे नेताओं को दिया गया। उन्होंने कहा, “होटल, गेस्ट हाउस और एयरपोर्ट पर मीटिंग्स हुई हैं। हमारे पास ऑडियो, वीडियो, सीडी, पेन ड्राइव और आईक्लाउड में सबूत हैं, जिन्हें जल्द मीडिया के सामने रखा जाएगा।”
गनिगा ने आगे कहा कि पहले ₹50 करोड़ का ऑफर दिया गया था, लेकिन कॉन्ग्रेस विधायकों ने उसे ठुकरा दिया। इसके बाद ₹100 करोड़ का ऑफर आया। उन्होंने बीजेपी पर आरोप लगाया कि यह पैसा पिछली सरकार में हुए भ्रष्टाचार से जुटाया गया है।
थम्मैया ने किया दावे का खंडन
गनिगा के आरोपों पर चिक्कमगलुरु से कॉन्ग्रेस विधायक एचडी थम्मैया ने साफ कहा कि उन्हें किसी ने संपर्क नहीं किया। थम्मैया ने कहा, “मुझे बीजेपी से कोई कॉल या ऑफर नहीं आया। मुझे नहीं पता कि गनिगा ने मेरा नाम क्यों लिया। आप उनसे ही पूछें। मैं पहले बीजेपी में था, लेकिन अब कॉन्ग्रेस का वफादार विधायक हूँ।”
कडूर के विधायक केएस आनंद ने भी कहा कि बीजेपी ने उनसे कोई संपर्क नहीं किया। उन्होंने कहा, “मैं कॉन्ग्रेस का वफादार नेता हूं और पार्टी के छात्र संगठन एनएसयूआई से जुड़कर राजनीति में आया हूँ। बीजेपी के नेताओं की मुझसे बात करने की हिम्मत भी नहीं हुई।”
किट्टूर के विधायक बाबासाहेब पाटिल ने यह माना कि कॉन्ग्रेस सरकार बनने के बाद बीजेपी ने उनसे संपर्क किया था, लेकिन हाल-फिलहाल में ऐसा कोई ऑफर नहीं आया। उन्होंने कहा, “बीजेपी पिछले एक साल से कॉन्ग्रेस विधायकों को तोड़ने की कोशिश कर रही है, लेकिन वे नाकाम रहे हैं। हमारी पार्टी एकजुट है।”
जहाँ एक तरफ गनिगा अपने आरोपों पर अडिग हैं, वहीं उनके पार्टी के ही विधायकों का कहना है कि ऐसा कोई ऑफर नहीं आया। बीजेपी पर आरोपों का जवाब फिलहाल बाकी है, लेकिन कॉन्ग्रेस के भीतर भी इन बयानों को लेकर सवाल उठ रहे हैं। सियासी हलचल के बीच यह देखना दिलचस्प होगा कि इस मुद्दे पर क्या सबूत सामने आते हैं और कर्नाटक की राजनीति में क्या नया मोड़ आता है।
28 अप्रैल 2006 की एक घटना है। एक फिल्म रिलीज होती है उस दिन। हर हफ्ते होते रहती है फिल्म रिलीज… लेकिन 28 अप्रैल 2006 का जिक्र इसलिए क्योंकि वो स्पेशल है। यूनाइटेड 93 (United 93) नाम की हॉलीवुड फिल्म आई थी उस दिन। जिस घटना पर यह फिल्म बनी थी, उसके 1721 दिन बाद। मतलब 5 साल से कम समय में घटना को सिनमाई पर्दे पर उतार दिया गया था।
United 93 के पहले भी कुछ फिल्में इस मुद्दे पर बनाई जा चुकी थीं। इस फिल्म का जिक्र इसलिए क्योंकि इसमें कहानी जो बुनी गई, वो सिनेमाई लकीर पर घटना को जोड़ती है। यही कारण है कि रॉटेन टोमैटोज, IMDb आदि पर इसकी रेटिंग शानदार है।
घटना इतनी बड़ी थी कि हॉलीवुड तो छोड़िए, बॉलीवुड वाले भी इसको लेकर ‘सलिमा’ बनाने लगे थे। ये घटना थी 11 सितंबर 2001 की। वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर इस्लामी आतंकी हमले की। घटना ऐसी कि ‘सलिमा’ बनाने वाले लोगों को इसमें भी My Name Is Khan टाइप कहानी और मसाला दिखने लगा था।
क्या अपने देश की इससे भी बड़ी घटना पर ‘सलिमा’ बनाने वालों की नींद टूटी? क्या उनके अंदर का कहानीकार उस घटना को बड़े पर्दे पर उतार कर जनता के सामने सच दिखा पाया? 9/11 से बड़ी घटना अपने देश में क्या सच में हुई है? उत्तर है – हाँ। और इस उत्तर के पीछे जो तर्क छिपा है, उसी के डर से डरता है ‘सलिमा’ बनाने वाला कौम।
27 फरवरी 2002 को 59 जिंदा इंसान आग में जला कर मार डाले गए थे। और यह घटना 9/11 से कहीं ज्यादा बड़ी और भयावह थी। मरने वालों की संख्या का तर्क इसके पीछे नहीं है। तर्क है घटना को अंजाम देने वालों की पहचान का। 9/11 को जिन लोगों ने अंजाम दिया, वो सब के सब ऐसे ही मजहबी मानसिकता और ट्रेनिंग लिए थे। लेकिन जिन लोगों ने साबरमती एक्सप्रेस ट्रेन को जलाया, वो सब्जी बेचने वाले से लेकर दर्जी या पेंटर से लेकर मौलवी-मौलाना और भीड़ में चलता कोई पड़ोसी हो सकता है, ऐसे लोग जिन पर हम भरोसा करते हैं।
कोई किसी को जिंदा जला कर कैसे मार सकता है? एक साथ 59 जिंदा लोगों को कैसे जलाया जा सकता है? ऐसे सवालों का जवाब है – नफरत मन में या दिल में नहीं बल्कि रूह तक उतर आए, तभी यह करने की कोई सोच भी सकता है। ‘काफिर’ की हत्या, दोजख में जलने आदि वाली नफरत पर मुहर तो कट्टर इस्लामी सोच का हिस्सा है ही, लिखित है। लेकिन गंगा-जमुनी तहजीब ‘सलिमा’ वाली कौम इस नफरत को कैसे दिखाए, इसी का नतीजा है The साबरमती Report का 8297 दिन बाद रिलीज होना। मतलब 22 साल से ज्यादा का इंतजार।
6 पैराग्राफ और 400 से ज्यादा शब्द के बाद भी The साबरमती Report की पटकथा, संगीत, अभिनय, सिनेमैटोग्राफी आदि पर नहीं लिख पाया हूँ, इसके लिए माफ कीजिए। लेकिन मैं भटका नहीं हूँ। दरअसल मुझे इस फिल्म का रिव्यू लिखना था भी नहीं। जरूरत ही नहीं। मेनस्ट्रीम मीडिया से लेकर सोशल मीडिया पर काफी कुछ लिखा जा चुका है। मैं समाज में इस फिल्म के होने की जरूरत पर लिख रहा हूँ। इतनी बड़ी हृदय विदारक और लोमहर्षक घटना, जिसे भारतीय इतिहास से कभी भुलाया नहीं जा सकता, उस पर 22 साल क्यों लग गए किसी को फिल्म बनाने में, मुझे इसमें दिलचस्पी है।
क्यों देखनी चाहिए The साबरमती Report
गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस ट्रेन नहीं जलाई गई थी बल्कि अयोध्या से जिस ट्रेन में कारसेवक आ रहे थे, उस साबरमती एक्सप्रेस को जलाई गई थी, इस अंतर को समझना है – तो देखिए यह फिल्म।
गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस को जलाए जाने के कारण मारे गए 59 लोगों में से कुछ का नाम जानना चाहते हैं – तो देखिए यह फिल्म।
ऐसी घटना जिसने भारतीय इतिहास को दो हिस्सों (भारत गोधरा से पहले, भारत गोधरा के बाद) में बाँट दिया, यह जानने को इच्छुक हैं – तो देखिए यह फिल्म।
ट्रेन में आग अपने आप नहीं लगी थी, टेक्निकल फॉल्ट के कारण नहीं लगी थी… बल्कि कट्टरपंथी मुस्लिमों ने प्लानिंग करके लगाई थी, यह सच बड़े पर्दे पर देखना है – तो देखिए यह फिल्म।
मीडिया हर एक सच जस का तस दिखा देता है, इस भ्रम में जीते हैं – तो देखिए यह फिल्म।
गंगा-जमुनी ‘सलिमा’ वाला कौम 22 साल बाद ही सही, जाग कर गोधरा के सच को लिख कर फिल्मा भी रहा, इस चेंज को देखना है – तो देखिए यह फिल्म।
कट्टर इस्लामी मानसिकता के कारण जिंदा जला कर मार डाले गए 59 लोगों में से 41 का नाम ही अभी तक सार्वजनिक हुआ है। बाकी 18 अज्ञात लोग कौन थे? इस पर मीडिया की खोजी पत्रकारिता और बॉलीवुड ‘सलिमा’ वाले कब रिसर्च करके लाएँगे फिल्म या डॉक्यूमेंट्री? यह सवाल सिर्फ सवाल न होकर देश का नैरेटिव बने, यह है आपकी मंशा, चाहते हैं यह कि वो 18 लोग सिर्फ अज्ञात बन कर न भूला दिए जाएँ? – तो देखिए यह फिल्म।
क्यों नहीं देखें The साबरमती Report
ट्रेन कैसे जल रहा, यह विजुअल देखना चाहते हैं – तो मत देखिए यह फिल्म। क्योंकि फिल्म की मूल कहानी साबरमती एक्सप्रेस को जलाए जाने की घटना को लेकर नहीं है। फिल्म गढ़ी गई है गोधरा में ट्रेन को जलाने के बाद कैसे इस अमानवीय घटना को इतिहास से मिटाने की कोशिश की गई, इस पर। पूरी फिल्म मीडिया के इसी झूठ परोसने वाले बिजनेस पर केंद्रित है।
अगर देखना चाहते हैं कि जिंदा जलने वाले लोग कैसे चिल्ला रहे हैं – तो मत देखिए यह फिल्म। वो इसलिए क्योंकि पीड़ित परिवारों को और ज्यादा प्रताड़ित करने की मंशा नहीं रही होगी कहानीकार और निर्देशक की। इसलिए आग या आग में जलते लोग इस फिल्म का हिस्सा भर हैं। हाँ यह जरूर दिखाया गया है कि ट्रेन की दो बोगियों को प्लानिंग करके जला दिया कट्टर मुस्लिम भीड़ ने। इसके बाद कैसे मीडिया ने इस खबर को लगभग मार दिया, पूरी कहानी ही इसी के इर्द-गिर्द घूमती है।
सिनेमा में दिखाई गई ‘2 कहानी’ और कहानी के पीछे का झूठ और उसके बाद निकल कर आई हकीकत के अंतर को समझ नहीं पाते हैं – तो मत देखिए यह फिल्म। यह बहुत जरूरी हिस्सा है, जिसे सिनेमा हॉल में बैठे कई दर्शक समझने में गलती करते दिखे, टिका-टिप्पणी भी की। निर्देशक ने इसी कारण से कहानी-1 और कहानी-2 लिख करके फिल्म में स्पष्ट दिखाया है और उसके बाद क्लियर भी किया है कि इन दोनों कहानियों को जानबूझ कर प्लांट किया गया था ताकि गोधरा का सच कभी सामने आ ही न पाए। कहानी-1 में मुस्लिम लड़की का कारसेवकों द्वारा अपहरण और कहानी-2 में हिंदू लड़के द्वारा कारसेवकों के ही खिलाफ गवाही देने का प्लॉट इतना मजबूत पक्ष है कि इन्हीं दो कहानियों के दम पर ‘ट्रेन में अपने आप लग गई थी आग’ वाला नैरेटिव तब का न सिर्फ मीडिया गढ़ा, बल्कि शुरुआती जाँच रिपोर्टों में भी इसे ही सच मान लिया गया था। फिल्म में इन दोनों कहानियों के झूठ का पर्दाफाश करके निर्देशक ने यह साबित कर दिया कि कहानी ही सच हो, यह जरूरी नहीं।
मीडिया रिपोर्ट में क्या कहा गया और फिल्म के अंत में सच कैसे बाहर आया, इसे नहीं समझ पा रहे हैं – तो मत देखिए यह फिल्म। कहानीकार और निर्देशक ने देश के चौथे स्तंभ मतलब मीडिया पर आँख मूँद कर भरोसा करने के मिथक को तोड़ा है। यही कारण है कि शुरुआती फिल्म में जहाँ-जहाँ ‘एक्सीडेंट के कारण ट्रेन में आग लग गई’ जैसा सीन है, उसकी स्क्रिप्ट में ध्यान से सुनेंगे तो पाएँगे कि यह मीडिया रिपोर्ट है। ऐसा कहीं नहीं कहा गया है कि यही सच है। मीडिया = सच, इस भ्रम को तोड़ने में निर्देशक के साथ-साथ कहानीकार को 10 में से 10 अंक मिलने चाहिए।
पाकिस्तानी टीम के छक्का मारने पर मुस्लिम कॉलनी में बजती तालियाँ और फूटते पटाखों के बीच मुसलमानी टोपी पहने छोटे-छोटे बच्चों का इंडिया की जीत पर जश्न मनाते सीन के बीच का अंतर नहीं समझ पाते – तो मत देखिए यह फिल्म। दृश्य माध्यम में कुछ चीजें प्रत्यक्ष कही जाती हैं, कुछ अप्रत्यक्ष। दर्शक होने के नाते इस अंतर को समझना होगा। कहानीकार प्रत्यक्ष तौर पर हीरो से बुलवा रहा है कि मुस्लिम कॉलनियों में पाकिस्तान क्रिकेट टीम के अच्छे खेलने पर पटाखे फुटना आम बात है। जबकि निर्देशक वहीं एक समानांतर दुनिया दिखा रहा है कि इसी कॉलनी के अबोध बच्चे जिन्हें पाकिस्तान या कट्टर मजहबी घुट्टी नहीं पिलाई गई है, वो इंडिया की जीत को अपनी जीत समझ कर एंजॉय कर रहा है। कट्टर मुस्लिम व्यस्क या किशोर का रवैया बनाम मुस्लिम बच्चे के रवैये को पर्दे पर कैसे दिखाया जाए, इस अंतर को समझना होगा।
ईमानदार लोग दोनों तरफ होते हैं, इस लाइन के तर्क को नहीं समझ पाते – तो मत देखिए यह फिल्म। इस सीन में कोई समस्या नहीं है फिर भी कई दर्शकों का यह कहना कि फिल्म बनाने वालों ने बैलेंस के लिए ऐसा किया, यह सच नहीं है। इसको ऐसे समझ सकते हैं – अगर दूसरी तरफ के कुछ लोग ईमानदार नहीं होते तो घरवापसी कौन कर रहा है? दूसरी तरफ के ईमानदार लोगों के लिए रास्ते बंद कर देंगे तो उनके हिस्से का भोगा हुआ सच कैसे बाहर आएगा?
हिंदी पत्रकार के इर्द-गिर्द बुनी गई है यह फिल्म लेकिन लिखी गई शुद्ध हिंदी से प्यार है – तो मत देखिए यह फिल्म। जी हाँ, हिंदी फिल्म है तो बोली गई हिंदी तो सही ही है लेकिन जहाँ हिंदी में लिखा गया है, वो हिस्सा सच में निराश करने लायक है।
जिन-जिन सीन पर विवाद, वहाँ क्या कहना चाहता है निर्देशक
‘ईमानदार लोग दोनों तरफ होते हैं’ – इस सीन पर आहत हैं तो एपीजे अब्दुल कलाम को लेकर आपके क्या विचार हैं? क्या उनको भी खारिज कर देंगे। केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान अभी तो खैर बीजेपी में हैं लेकिन उन्होंने तो शाह बानो मामले पर अपनी ही कॉन्ग्रेस पार्टी के राजीव गाँधी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था, तो क्या उनको भी खारिज कर देंगे? कहानीकार और निर्देशक बस यह कहना चाह रहे कि समाज के किसी भी तबके में अगर कोई अच्छा है तो उसे उसी नजरिए से देखा जाए। क्या इतना कहने-दिखाने की भी आजादी नहीं हो उसे?
‘मुसलमानी टोपी पहने छोटे-छोटे बच्चों का इंडिया की जीत पर जश्न’ – ध्यान रखिए कि इस सीन में जो बच्चे दिखाए गए हैं, वो किशोरावस्था में नहीं पहुँचे हैं। निर्देशक यह दिखाना चाहता है कि मजहबी कट्टरपन का जहर अभी उनके दिमाग में नहीं भरा है, अबोध हैं, भारत की जीत पर खुशियाँ मना रहे हैं। क्योंकि इसी निर्देशक ने उसी मुस्लिम कॉलनी के उन्हीं बच्चों के व्यस्क परिवार वालों को पाकिस्तानी छक्के पर तालियाँ बजाते और पटाखे छोड़ते भी दिखाया है। दृश्य माध्यम में एकदम विपरीत संदर्भों को समानांतर प्रस्तुत करके दर्शकों को सोचने पर मजबूर करने की विधा खत्म कर देना चाहते हैं क्या?
‘मीडिया रिपोर्ट और 2 झूठी कहानियाँ’ – मीडिया ने साबरमती एक्सप्रेस के जलाए जाने के बाद झूठ ही गढ़ा है, यही तो कहना चाह रहा है निर्देशक। जिस मीडिया पर आप भरोसा करते हैं, उसके दिखाए विजुअल को ही सच मान लेते हैं, उसी का तो पर्दाफाश किया गया है। साबरमती एक्सप्रेस को किसने जलाया से ज्यादा इस फिल्म का फोकस है – किसने छिपाया, किसने षड्यंत्र रचा। मीडिया इसमें विलेन है – कहानी के इस लाइन से भला क्या और कैसी दिक्कत?
कहाँ किया जा सकता था सुधार
शुरुआती डिस्क्लेमर से लेकर अंतिम के साभार वाले सीन में उल्टी-पुल्टी-टूटी-फूटी लिखी हिंदी पर ध्यान नहीं दिया गया। यह अक्षम्य तब है, जबकि पूरी फिल्म में हीरो बार-बार अपने आप को हिंदी मीडियम वाला कह रहा होता है, उसे हिंदी पत्रकार होने पर गर्व भी होता है। निर्माता-निर्देशक को बिना पैसे खर्च किए उसी से प्रूफरीड भी करवा लेना चाहिए था, अगर सच में उसे रील वाली हिंदी रियल लाइफ में भी आती है तो!
हर साल अक्टूबर से जनवरी के बीच, दिल्ली और उत्तर भारत के कई राज्यों में वायु प्रदूषण की समस्या चरम पर होती है। गिरते तापमान, धुआं, धूल, धीमी हवाएं, वाहनों से निकलने वाला धुआं और पराली जलाने जैसी वजहें मिलकर इस संकट को बढ़ाती हैं।
धुंध के चलते दिल्ली आने-जाने वाली कई फ्लाइट्स रद्द होती हैं। स्कूल बंद करने पड़ते हैं, यातायात में भारी परेशानी होती है, और आम जनजीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है। लोगों को जहरीली हवा में सांस लेना पड़ता है, जो गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बनती है। ये धुंध इतनी घनी होती है कि इसे अंतरिक्ष से भी देखा जा सकता है।
17 नवंबर को दिल्ली का एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) 441 पर पहुँच गया, जो “गंभीर” श्रेणी में आता है। इस दिन दिल्ली देश का दूसरा सबसे प्रदूषित शहर रहा। पिछले दिन का AQI 417 था। इस खराब हालात में लोग सांस लेने के लिए भी संघर्ष कर रहे हैं, जबकि राजनीतिक गलियारे में हमेशा की तरह दोषारोपण का खेल शुरू हो गया है। समाधान देने के बजाय, हर कोई अपनी जिम्मेदारी से बचने और सियासी फायदा उठाने में लगा है।
इस दौरान तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करने और अधूरी सच्चाई बताने वाले कई शोध रिपोर्ट्स सामने आती हैं। ये रिपोर्ट्स दिखने में गंभीर प्रयास लग सकती हैं, लेकिन इनमें समग्र दृष्टिकोण और पूरी सच्चाई का अभाव होता है। ये अक्सर किसी विशेष राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाने का जरिया बनती हैं।
15 नवंबर को सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (CREA) द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट इसका ताजा उदाहरण है। इस रिपोर्ट का शीर्षक था, “थर्मल पावर प्लांट्स से बढ़ता SO₂ उत्सर्जन: FGD स्थापना में देरी नहीं होनी चाहिए,” जिसे मनोजकुमार एन ने लिखा है।
इस रिपोर्ट के आधार पर कई मीडिया प्लेटफॉर्म जैसे मनीकंट्रोल, बिजनेस टुडे और द न्यू इंडियन एक्सप्रेस ने खबर चलाई कि दिल्ली-एनसीआर में थर्मल पावर प्लांट्स से प्रदूषण पराली जलाने से 16 गुना ज्यादा है।
फोटो: मनीकंट्रोल फोटो साभार: बिजनेस टुडेफोटो साभार: द न्यू इंडियन एक्सप्रेस
दिल्ली प्रदूषण: पराली से ध्यान हटाने का खेल और थर्मल पावर प्लांट्स पर नए आरोप
जैसे ही CREA की रिपोर्ट आई, कई लोगों ने इसे हाथों हाथ लिया और सोशल मीडिया पर साझा किया। रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए लेखक और स्तंभकार देविंदर शर्मा ने X (पूर्व में ट्विटर) पर लिखा, “दिल्ली के थर्मल पावर प्लांट्स पराली जलाने से 16 गुना अधिक प्रदूषण करते हैं।” इस पर ‘पत्रकार’ रवीश कुमार ने टिप्पणी की, “किसी को इन तथ्यों में दिलचस्पी नहीं है। हर किसी को बस वक्त गुजारना है और हर मुद्दे में दूसरों पर दोष डालना है। सबसे अच्छा है कि सब थाली बजाएं, सब खुश रहेंगे।”
अपनी आदत के अनुसार, रवीश ने एक बार फिर केंद्र सरकार को दोषी ठहराया और 2020 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा कोविड-19 महामारी के दौरान स्वास्थ्यकर्मियों के प्रति आभार व्यक्त करने की अपील का मजाक उड़ाया। मोदी सरकार और उसे चुनने वाले लोगों के प्रति उनकी नाराजगी, समाधान की कमी के साथ, उनके ‘कैंप’ के बाकी लोगों की तरह, बस एक तयशुदा ढर्रे पर चलती है।
ट्वीट का स्क्रीनशॉट
इस बीच, डिसीजन सपोर्ट सिस्टम (DSS) ने वायु प्रदूषण प्रबंधन पर रिपोर्ट जारी करते हुए बताया कि रविवार को दिल्ली में वाहनों से होने वाला प्रदूषण कुल प्रदूषण का लगभग 15.8% था। DSS ने यह भी कहा कि शनिवार (16 नवंबर 2024) को दिल्ली के प्रदूषण में सबसे बड़ा योगदान पराली जलाने का था, जो कुल प्रदूषण का 25% था।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के मुताबिक, इस दौरान PM2.5 मुख्य प्रदूषक था। PM2.5 ऐसे सूक्ष्म कण होते हैं जिनका व्यास 2.5 माइक्रोन या उससे कम होता है। ये इतने छोटे होते हैं कि फेफड़ों में गहराई तक पहुँचकर रक्तप्रवाह में प्रवेश कर सकते हैं, जिससे गंभीर स्वास्थ्य खतरे उत्पन्न होते हैं।
CREA रिपोर्ट: थर्मल पावर प्लांट्स और पराली जलाने की तुलना
अब देखते हैं CREA की रिपोर्ट के मुख्य दावों को। रिपोर्ट के मुताबिक, “एनसीआर के थर्मल पावर प्लांट्स पराली जलाने से 16 गुना अधिक प्रदूषण करते हैं।”
CREA का अनुमान है कि जून 2022 से मई 2023 के बीच एनसीआर के कोयला आधारित थर्मल पावर प्लांट्स ने 281 किलोटन सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂) का उत्सर्जन किया। रिपोर्ट के अनुसार, भारत के कोयला-निर्भर ऊर्जा क्षेत्र से SO₂ उत्सर्जन वैश्विक मानवजनित उत्सर्जन का लगभग 20% है। 2023 में भारत से बिजली उत्पादन के जरिए 6,807 किलोटन SO₂ का उत्सर्जन हुआ, जो तुर्की (2,206 किलोटन) और इंडोनेशिया (2,017 किलोटन) जैसे अन्य बड़े उत्सर्जकों से कहीं अधिक है।
रिपोर्ट ने दावा किया कि एनसीआर के थर्मल पावर प्लांट्स सालाना 281 किलोटन SO₂ उत्सर्जित करते हैं, जबकि पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने से 8.9 मिलियन टन चावल के भूसे को जलाकर 17.8 किलोटन SO₂ उत्सर्जित होता है। हालाँकि, पराली जलाना सिर्फ एक मौसमी समस्या है, जबकि थर्मल पावर प्लांट्स सालभर प्रदूषण फैलाते हैं।
इसके बावजूद थर्मल पावर प्लांट्स को अक्सर प्रदूषण नियंत्रण के नियमों में ढील दी जाती है और फ्ल्यू गैस डीसल्फराइजेशन (FGD) तकनीक लगाने में बार-बार मोहलत मिलती है। दूसरी ओर, पराली जलाने पर किसानों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई होती है।
दिल्ली के बदरपुर का थर्मल पॉवर प्लांट अब बंद हो चुका है, चिमनियाँ गिराई जा चुकी हैं।(फोटो साभार: हिंदुस्तान टाइम्स)
दिल्ली प्रदूषण: थर्मल पावर प्लांट्स और पराली जलाने की तुलना पर अधूरी सच्चाई
आंकड़ों के अनुसार, पराली जलाने से दिल्ली-एनसीआर में मौसमी प्रदूषण बढ़ता है, जबकि थर्मल पावर प्लांट्स सालभर चलते हैं। दिल्ली से 300 किलोमीटर के भीतर 11 कोयला आधारित थर्मल पावर प्लांट्स हैं। इसके अलावा, पंजाब का गोइंदवाल साहिब पावर प्लांट भी इस सूची में शामिल है।
FGD तकनीक से प्रदूषण घटाने की संभावना
CREA की रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि थर्मल पावर प्लांट्स में फ्ल्यू गैस डीसल्फराइजेशन (FGD) तकनीक को तेजी से लागू किया जाए, तो एनसीआर में सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂) का उत्सर्जन 93 किलोटन तक घट सकता है, यानी 67% की कमी। CREA के विश्लेषक मनोजकुमार ने कहा, “एनसीआर के थर्मल पावर प्लांट्स से 96% प्रदूषण सेकेंडरी पार्टिकुलेट के रूप में होता है, जो मुख्य रूप से SO₂ से उत्पन्न होता है। SO₂ उत्सर्जन में कमी से पार्टिकुलेट मैटर और स्वास्थ्य जोखिम दोनों को कम किया जा सकता है।”
उन्होंने यह भी बताया कि, “SO₂ का स्तर अक्सर राष्ट्रीय मानक (NAAQS) के भीतर होता है क्योंकि यह वायुमंडल में जल्दी ही सल्फेट्स में बदल जाता है। ये सल्फेट्स PM2.5 के मुख्य घटक होते हैं, जिनका लंबा जीवनकाल होता है और वे गंभीर स्वास्थ्य जोखिम पैदा करते हैं।”
तथ्यों की गलत तुलना और समस्याओं को बढ़ा चढ़ाकर बताना
थर्मल पावर प्लांट्स वायु प्रदूषण में योगदान करते हैं, इसमें कोई दो राय नहीं है। लेकिन इस विश्लेषण में तुलना का आधार उचित नहीं है। पराली जलाने का समय सितंबर के अंतिम सप्ताह से नवंबर तक सीमित है, जब दिल्ली में प्रदूषण अपने चरम पर होता है। इसके विपरीत, थर्मल पावर प्लांट्स पूरे साल चलते हैं।
दो अलग-अलग समय-सीमाओं के स्रोतों की तुलना करना उचित नहीं है। सालभर चलने वाले स्रोत के आंकड़ों को पूरे साल के औसत पर फैला दिया जाता है, जिससे इसका असर कम दिखता है। उदाहरण के लिए, यदि एक रिपोर्ट कहती है कि पराली जलाना सालाना आधार पर केवल 5% प्रदूषण का कारण बनता है, तो यह भले ही छोटा आँकड़ा लगे, लेकिन इसका मतलब यह भी हो सकता है कि उस अवधि में यह 60% प्रदूषण के लिए जिम्मेदार हो, जब यह होता है।
इसे बेहतर समझने के लिए सोचें कि वार्षिक परीक्षा के स्कोर की तुलना किसी छात्र के एकल टेस्ट स्कोर से करना अकादमिक प्रदर्शन का सही आकलन नहीं होगा। निष्पक्ष तुलना तभी हो सकती है जब दोनों को समान मापदंडों पर आंका जाए।
इसी तरह, दिल्ली और उत्तर भारत में वायु की खराब गुणवत्ता पराली जलाने के समय से मेल खाती है, जो इसके पर्यावरणीय प्रभाव को स्पष्ट रूप से दिखाती है। दूसरी ओर, अब यह भी पाया गया है कि किसान उपग्रह निगरानी से बचने के लिए पराली जलाने का समय बदल रहे हैं।
दिल्ली प्रदूषण: पराली जलाने और थर्मल पावर प्लांट्स के प्रदूषण में नई सच्चाई
रिपोर्ट्स के मुताबिक, पंजाब में पराली जलाने की घटनाओं में भारी गिरावट देखी गई है। 2021 में 79,000 से अधिक घटनाओं की तुलना में 2023 में यह संख्या घटकर लगभग 32,000 रह गई। ये आंकड़े सैटेलाइट इमेज विश्लेषण पर आधारित थे। लेकिन जल्द ही सच्चाई सामने आई कि किसान सैटेलाइट निगरानी को चकमा देने के लिए नई रणनीतियाँ अपना रहे हैं।
सैटेलाइट की निगरानी से बचने की रणनीति
NASA वैज्ञानिक हीरेन जेठवा ने बताया कि पंजाब में इस सप्ताह पराली जलाने की घटनाएँ 7,000 से अधिक हो गईं, जिसमें 400 नए मामले दर्ज हुए। उन्होंने कहा, “हम NASA के Suomi NPP और Aqua जैसे सैटेलाइट्स के दोपहर के समय के डेटा का उपयोग करते हैं, जो 1:30-2:00 बजे क्षेत्र के ऊपर से गुजरते हैं। लेकिन किसानों ने समझ लिया है कि वे इस समय के बाद पराली जलाकर निगरानी से बच सकते हैं।”
खेत में जलती पराली (फोटो साभार: न्यूज बाइट्स)
जेठवा ने बताया कि दक्षिण कोरिया के जियोस्टेशनरी सैटेलाइट से यह पुष्टि हुई है कि ज्यादातर पराली जलाने की घटनाएँ 2 बजे के बाद होती हैं, जब NASA सैटेलाइट्स क्षेत्र से गुजर चुके होते हैं। हालाँकि, जियोस्टेशनरी सैटेलाइट, जो हर पाँच मिनट में क्षेत्र की तस्वीर लेता है, इन आग की घटनाओं को रिकॉर्ड करता है।
वायु प्रदूषण में कई कारक जिम्मेदार
वायु प्रदूषण कई प्रकार के प्रदूषकों से मिलकर बनता है, जिनमें SO₂ और CO₂ जैसी गैसें, धूल, और धुआं शामिल हैं। इस समय दिल्ली और अन्य जगहों पर PM2.5 और PM10 जैसे कणों का स्तर खतरनाक रूप से बढ़ जाता है।
PM2.5: ये बेहद छोटे कण होते हैं, जिनका व्यास 2.5 माइक्रोन या उससे कम होता है। ये कण फेफड़ों में गहराई तक पहुंच सकते हैं और रक्त प्रवाह में भी प्रवेश कर सकते हैं, जिससे गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं।
PM10: ये अपेक्षाकृत मोटे कण होते हैं, जिनका व्यास 10 माइक्रोन या उससे कम होता है। ये श्वसन तंत्र में जलन पैदा कर सकते हैं और सांस की समस्याओं को बढ़ा सकते हैं, लेकिन PM2.5 जितने खतरनाक नहीं होते।
थर्मल पावर प्लांट्स इन कणों के स्रोतों में से एक हैं, लेकिन पराली जलाने, निर्माण कार्यों से उठने वाली धूल और अन्य गतिविधियां भी इन कणों के प्रमुख योगदानकर्ता हैं।
सैटेलाइट डेटा और प्रदूषण के अलग-अलग स्रोतों का विश्लेषण यह दर्शाता है कि पराली जलाने और थर्मल पावर प्लांट्स दोनों ही दिल्ली-एनसीआर के प्रदूषण में प्रमुख भूमिका निभाते हैं। लेकिन किसानों द्वारा सैटेलाइट की निगरानी से बचने के प्रयास और मौसमी एवं वार्षिक प्रदूषण के बीच गलत तुलना से प्रदूषण का सही आकलन करना मुश्किल हो जाता है। असली चुनौती यह है कि सभी स्रोतों के प्रति एक समान और न्यायपूर्ण दृष्टिकोण अपनाया जाए ताकि वायु गुणवत्ता में सुधार लाया जा सके।
गैर-बराबरी की तुलना
रिपोर्ट में बताया गया, “हालाँकि कोयले से चलने वाले पावर प्लांट्स (CFPP) के उत्सर्जन से स्वास्थ्य और पर्यावरण पर बड़ा प्रभाव पड़ता है, लेकिन इन प्लांट्स पर नियमों का पालन कराने में सख्ती पराली जलाने के मुकाबले बहुत कम है। पराली जलाने के दौरान किसानों को भारी जुर्माने और कड़ी निगरानी का सामना करना पड़ता है, वहीं CFPPs को तकनीकों जैसे FGD (Flue Gas Desulfurization) लागू करने में देरी और नियमों का बार-बार उल्लंघन करने के लिए छूट दी जाती है।”
कृषि क्षेत्र में नियमों की कमी
जबकि उद्योगों, निर्माण कार्य, और ऑटोमोबाइल्स के लिए एंटी-पाल्यूशन नियम स्थापित हैं, किसानों के लिए ऐसे नियम या तो हैं ही नहीं या उनका पालन नहीं किया जाता। एक हालिया उदाहरण कम्प्रेस्ड बायोगैस (CBG) प्लांट्स का है, जिसे पराली जलाने की समस्या का दीर्घकालिक समाधान माना गया था। लेकिन 38 में से केवल 5 प्लांट्स ही चालू हैं, और वे भी पूरी क्षमता पर नहीं चल रहे हैं। इन प्रोजेक्ट्स को किसानों के विरोध के कारण रोक दिया गया। ये प्लांट्स फसल के अवशेष, गोबर, और अन्य कृषि कचरे से बायोगैस बनाने के लिए तैयार किए गए थे। किसानों से उम्मीद की गई थी कि वे पराली जलाने की बजाय इसे इन प्लांट्स में भेजेंगे।
CBG प्लांट्स के संचालन में बाधाएँ
लुधियाना के गुंघराली गाँव में CBG प्लांट के संचालन प्रमुख पंकज सिंह ने बताया, “प्लांट को पराली की समस्या हल करने और पर्यावरण की मदद के लिए बनाया गया था। लेकिन किसान विरोध के कारण यह बंद है। 70 करोड़ रुपये खर्च कर प्लांट बनाया गया और अब भारी EMI और कर्मचारियों की सैलरी का भुगतान करना पड़ रहा है। क्षेत्र के अन्य तीन प्लांट्स भी बंद पड़े हैं, और राज्य सरकार से मदद के लिए हमने कई बार गुहार लगाई है।”
AAP का थर्मल पावर प्लांट्स पर रुख और U-Turn
थर्मल पावर प्लांट्स को लेकर आम आदमी पार्टी (AAP) का रुख समय-समय पर बदलता रहा है। 2021 में जब कोयले की कमी के कारण दिल्ली में बिजली उत्पादन प्रभावित हुआ, तब AAP ने केंद्र सरकार पर गैर-जिम्मेदाराना रवैया अपनाने का आरोप लगाया।
तत्कालीन डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया ने कहा था, “देशभर के मुख्यमंत्री केंद्र सरकार को इस मुद्दे पर आगाह कर रहे हैं, लेकिन केंद्रीय ऊर्जा मंत्री कह रहे हैं कि कोई संकट नहीं है। यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है।” उस वक्त बिजली मंत्री सत्येंद्र जैन ने कहा था कि कोयले की सप्लाई न मिलने पर दिल्ली में “कंप्लीट ब्लैकआउट” हो सकता है।
दिलचस्प बात यह है कि 2019 में AAP ने दिल्ली में कोयले से चलने वाले पावर प्लांट्स को बंद करने की घोषणा की थी। इसके बाद 2020 में AAP ने पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के थर्मल पावर प्लांट्स पर पर्यावरण नियमों के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए इन्हें तुरंत बंद करने की माँग की थी।
AAP का सुप्रीम कोर्ट में रुख
2021 में AAP सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर उत्तर प्रदेश, पंजाब और हरियाणा के 11 कोयला आधारित थर्मल पावर प्लांट्स को बंद करने का आदेश देने की अपील की थी।
AAP प्रवक्ता सौरभ भारद्वाज ने कहा था, “जब दिल्ली सरकार थर्मल पावर प्लांट्स को बंद कर सकती है, तो अन्य राज्य ऐसा क्यों नहीं कर सकते?”
हालाँकि, थर्मल पावर प्लांट्स बंद करने का दावा करने के बाद, बिजली संकट के समय AAP ने केंद्र सरकार पर दोष मढ़ना शुरू कर दिया। विशेषज्ञों का कहना है कि यह एक राजनीतिक चाल है, जहां पर्यावरण को बचाने के नाम पर विकास परियोजनाओं में रुकावट डालने की प्रवृत्ति देखी गई है।
AAP का पटाखों पर बैन भी दिल्ली में वायु गुणवत्ता सुधारने में विफल
आम आदमी पार्टी (AAP) की सरकार ने दिल्ली में वायु प्रदूषण से निपटने के लिए सितंबर में पटाखों के उत्पादन, बिक्री और उपयोग पर प्रतिबंध लगाने का फैसला किया। यह कदम उद्योग को बड़ा झटका देने वाला था और लाखों लोगों की आजीविका पर असर डाल रहा था। पर्यावरण मंत्री गोपाल राय ने सितंबर में कहा, “सर्दी के मौसम में दिल्ली में प्रदूषण बढ़ने का खतरा है। इस समय पटाखे जलाने से प्रदूषण और बढ़ जाता है।”
उन्होंने आगे कहा, “इस स्थिति को देखते हुए, जैसा कि पिछले साल हुआ था, हम सभी प्रकार के पटाखों के उत्पादन, भंडारण, बिक्री और उपयोग पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा रहे हैं, ताकि लोगों को प्रदूषण से बचाया जा सके। ऑनलाइन पटाखों की बिक्री और डिलीवरी पर भी पूरी तरह से बैन रहेगा। यह प्रतिबंध दिल्ली में 1 जनवरी 2025 तक लागू रहेगा, ताकि दिल्लीवासियों को पटाखों से होने वाले प्रदूषण से राहत मिल सके।”
हालाँकि, यह बात ध्यान देने योग्य है कि पटाखे जलाने की अनुमति केवल अरविंद केजरीवाल के तिहाड़ जेल से लौटने पर दी गई। फिर भी, इस बैन से कोई खास फर्क नहीं पड़ा क्योंकि वायु गुणवत्ता में कोई सुधार नहीं हुआ, बल्कि स्थिति और भी खराब हो सकती थी। दिल्ली सरकार ने यमुनाजी की सफाई में भी काफी काम किया, लेकिन यमुनाजी अभी भी गंदी है और वहां लोग जहरीले झाग के बीच छठ पूजा मनाने को मजबूर हुए, यह स्पष्ट रूप से पार्टी के पर्यावरण के प्रति समर्पण का संकेत है।
दिल्ली सरकार को सुप्रीम कोर्ट ने भी कड़ी आलोचना की कि उसने दिल्ली में वायु प्रदूषण की समस्या का समाधान करने के लिए सालभर पटाखों पर प्रतिबंध नहीं लगाया और पटाखों पर बैन को सही तरीके से लागू नहीं किया। कोर्ट ने यह भी देखा कि सरकार ने शादियों और चुनावों के लिए इस प्रतिबंध में छूट दी थी। AAP अधिकतर हिन्दू त्योहारों पर पटाखों के जलने को लेकर चिंतित दिखती है, बजाय इसके कि वह असली समस्या का समाधान निकालने के लिए सक्रिय कदम उठाए।
सवाल: क्यों बचाव किया जा रहा है?
विपक्ष, मीडिया और उनका पूरा तंत्र राजनीति करने के लिए तैयार है और असली समस्या की पहचान करने की बजाय जिम्मेदारी किसी और पर डालने में जुटा है। वे खुशी-खुशी दीवाली (एक हिन्दू त्योहार) को निशाना बनाएँगे, उद्योगों, पावर प्लांट्स और शायद एक दिन एलियंस को भी दोषी ठहराएँगे। यह नकारा नहीं जा सकता कि उद्योग प्रदूषण में योगदान करते हैं, लेकिन कम से कम वे देश की आर्थिक वृद्धि में योगदान देते हैं, तो फिर जलने वाले पराली से क्या हासिल होता है सिवाय प्रदूषण बढ़ाने के? इसे इस तरह से क्यों बचाया जा रहा है?
अगर थर्मल पावर प्लांट्स बंद कर दिए जाते हैं तो ये लोग क्या विकल्प देंगे? दिल्ली NCR के 3.3 करोड़ से ज्यादा निवासियों की बिजली की माँग कैसे पूरी करेंगे? अगर गाड़ियाँ भी प्रदूषण का कारण हैं, तो क्या उन्हें भी प्रतिबंधित कर दिया जाए? क्या रविश कुमार और जो लोग ऐसी कहानियां बढ़ावा दे रहे हैं, उनके पास खुद गाड़ी या एयर कंडीशनर नहीं हैं?
हम जो ऊर्जा उपयोग करते हैं, वह अभी भी मुख्य रूप से जीवाश्म ईंधन से उत्पन्न होती है। अरविंद केजरीवाल के भव्य सरकारी आवास में 50 एयर कंडीशनर, 250 टन का एयर कंडीशनिंग प्लांट, 12 बड़े झूमर और 57 सीलिंग फैन हैं। पर्यावरण के प्रति उनके इस कथित चिंतन और पावर प्लांट्स के खिलाफ विरोध को देखकर लगता है कि उन्होंने कुछ और तरीका खोज लिया है, जो बिजली देने के लिए इन एयर कंडीशनर्स के अलावा काम करता है।
औद्योगिक विस्तार देश की आर्थिक विकास के लिए जरूरी है, और उनकी पहली रणनीति ऐसी है जो भारत की आर्थिक वृद्धि को गति देने वाले साधनों पर निशाना साधती है या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रशासन पर हमला करती है, बजाय इसके कि वे इस मुद्दे का व्यावहारिक समाधान खोजें। यह सिर्फ यह दर्शाता है कि वे इस समस्या से ज्यादा अपनी राजनीतिक विपक्षी पार्टियों पर हमला करने में रुचि रखते हैं। साथ ही, वे ‘रिसर्च’ जो सभी कारकों को ध्यान में नहीं रखते और समान आधार पर नहीं किए जाते, केवल उनके अपने बयान को बढ़ावा देने के लिए होते हैं, चाहे उनके असली उद्देश्य कुछ भी हों।
उनका थर्मल पावर प्लांट्स के खिलाफ अनर्गल प्रचार पश्चिमी देशों की याद दिलाता है, जिन्होंने अब जलवायु परिवर्तन के खतरों को पहचाना है और चाहते हैं कि भारत और अन्य विकासशील देश अपने कार्बन उत्सर्जन को नियंत्रित करें, जबकि उन्होंने अपनी अर्थव्यवस्था को न केवल उपनिवेशीकरण बल्कि कोयले का उपयोग करके बढ़ाया था।
सीधे शब्दों में कहें तो इस मामले का चाहिए व्यावहारिक समाधान। जो देश के आर्थिक विकास को बाधित न करें, जो तुच्छ राजनीतिक चालों और दोषारोपण के खेलों पर आधारित न हो, जो शायद राजनीतिक पक्ष को लाभ पहुंचाते हैं लेकिन निश्चित रूप से देश और उसके लोगों के लिए नहीं, उसे प्रदूषण की समस्या से निपटने के लिए तैयार किया जाना चाहिए। थर्मल पावर प्लांट्स और अन्य प्रदूषण के स्रोतों को नियंत्रित किया जाना चाहिए, और उनकी योगदान को कम करने के लिए कदम उठाए जाने चाहिए।
हालाँकि इस मुद्दे के समाधान के लिए एक व्यापक दृष्टिकोण और प्रभावी उपायों की आवश्यकता है। केवल वे लोग जो व्यक्तिगत या राजनीतिक एजेंडे रखते हैं, यह कहकर आधे कारणों को दोषी ठहराते हैं और बाकी को नजरअंदाज करते हैं, उन्हें इसका लाभ मिलता है।
अनमोल बिश्नोई अमेरिका में पकड़ा गया है। वह गैंगस्टर लॉरेंस बिश्नोई का छोटा भाई है। बाबा सिद्दीकी की हत्या में उसकी तलाश थी। राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) ने उस पर 10 लाख का इनाम घोषित कर रखा है।
अनमोल को FBI (फेडरल ब्यूरो ऑफ़ इन्वेस्टिगेशन) ने गुरुवार (14 नवंबर 2024) को कैलिफोर्निया से हिरासत में लिया। अमेरिकी विदेश विभाग ने इस मामले में टिप्पणी से इनकार किया है। उसे प्रत्यर्पित कर भारत लाने की कोशिशों में सीबीआई जुट गई है।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक अनमोल बिश्नोई 15 मई 2022 को फर्जी कागजातों के सहारे अमेरिका चला गया था। उसने भानू नाम से पासपोर्ट बनवा रखा है। अमेरिकी एजेंसियों को उसके दस्तावेजों में एक कागज फर्जी मिला था और आखिर में उसका भांडा फूट गया। अनमोल बिश्नोई को भारत लाने के लिए CBI (केंद्रीय जाँच ब्यूरो) ने शुक्रवार (15 नवंबर 2024) को FBI के आधिकारियों से मीटिंग की है।
बताया जा रहा है कि लगभग 45 मिनट चली मीटिंग में CBI ने FBI को अनमोल बिश्नोई के खिलाफ भारत में दर्ज तमाम आपराधिक केसों के सबूत दिए गए। इन केसों में बाबा सिद्दीकी की हत्या और मुंबई में ही बॉलीवुड अभिनेता सलमान खान के घर के बाहर फायरिंग भी शामिल है।
हालाँकि अमेरिकी विदेश विभाग के अधिकारी अनमोल बिश्नोई के मुद्दे पर कुछ भी बोलने के लिए तैयार नहीं हैं। स्टेट डिपार्टमेंट के प्रवक्ता मैथ्यू मिलर से इस बावत सवाल हुआ तो उन्होंने टिप्पणी करने से इनकार दिया दिया।
बताते चलें कि अनमोल बिश्नोई पर राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) ने 10 लाख रुपए का इनाम भी घोषित कर रखा है। यह इनाम अक्टूबर 2024 में घोषित किया गया था। अनमोल साल 2022 में NIA द्वारा दर्ज 2 अलग-अलग केसों में वांटेड है। इन मुकदमों में उसके खिलाफ चार्जशीट भी लग चुकी है। इसी साल सितंबर महीने में राजस्थान पुलिस ने अनमोल बिश्नोई के खिलाफ कुल 31 केस दर्ज होने की जानकारी दी थी। इसमें से 22 मुकदमे राजस्थान में दर्ज हैं।
अनमोल के खिलाफ 6 दिसंबर 2022 को उसके खिलाफ रेड कॉर्नर नोटिस भी जारी हुआ था। साल 2023 में अनमोल को अमेरिका के कैलिफोर्निया में एक शादी समारोह में देखा गया था। दिल्ली पुलिस के भी मुताबिक जेल में बंद लॉरेंस बिश्नोई के गिरोह की कमान अनमोल बिश्नोई ही सँभालता है। यह एक संगठित अपराध वाला गिरोह है जो न सिर्फ हत्याएँ करवाता है, बल्कि दहशत बना कर उगाही भी करता है।
दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण की समस्या हर साल सर्दियों में गंभीर रूप ले लेती है, जिसमें पराली जलाने की घटनाओं को प्रमुख कारण बताया जाता है। हालाँकि, इस साल सैटेलाइट डेटा से संकेत मिले हैं कि पराली जलाने के मामलों में भारी गिरावट आई है। पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में 2023 के मुकाबले 2024 में पराली जलाने की घटनाओं में 71% तक की कमी बताई गई। लेकिन विशेषज्ञों ने इन आँकड़ों पर सवाल उठाए हैं। उनका दावा है कि किसान सैटेलाइट निगरानी से बचने के लिए समय बदलकर पराली जला रहे हैं।
सैटेलाइट से बचने की रणनीति?
विशेषज्ञों ने पाया है कि किसान अब दिन के ऐसे समय में पराली जला रहे हैं जब निगरानी करने वाले सैटेलाइट उस क्षेत्र के ऊपर नहीं होते। नासा की फायर इनफॉर्मेशन फॉर रिसोर्स मैनेजमेंट सिस्टम (FIRMS) और अन्य सैटेलाइट्स का उपयोग आग की घटनाओं की निगरानी के लिए किया जाता है। ये सैटेलाइट्स दिन में केवल कुछ घंटों के लिए क्षेत्र की तस्वीर लेते हैं।
नासा के वैज्ञानिक हीरेन जेठवा ने हाल ही में खुलासा किया कि किसान पराली जलाने के समय को इस तरह से बदल रहे हैं कि सैटेलाइट उनका पता नहीं लगा पाते। हिरण जेठवा ने बताया कि किसान अब दोपहर बाद और शाम को पराली जला रहे हैं, जब सैटेलाइट्स का निगरानी समय समाप्त हो चुका होता है।
यह निष्कर्ष दक्षिण कोरिया के जियो-स्टेशनरी सैटेलाइट GEO-KOMSAT 2A से मिले डेटा से पुष्टि हुआ, जिसने 2 बजे के बाद पंजाब में पराली जलने की घटनाओं में बढ़ोतरी दिखाई। कोरियाई जियोस्टेशनरी सैटेलाइट्स की मदद से पता चला कि किसान ज्यादातर पराली दोपहर बाद और शाम को जलाते हैं, जब नासा के सैटेलाइट वहां से गुजर चुके होते हैं।
Today first time in the season a massive increase in stubble burning incidences obesrved around noon to 2 pm. ~1000 fire counts from Suomi-NPP/VIIRS in Punjab alone (very little in Haryana). PM2.5 levels sky rocketed in Delhi reaching 1000 µg/m3 sending AQ to hazardous category. pic.twitter.com/dRaWexdwD9
रिपोर्ट्स के मुताबिक, पंजाब में 2021 में लगभग 79,000 पराली जलाने की घटनाएँ दर्ज की गई थीं, जबकि 2023 में यह घटकर 32,000 रह गई। इस साल 10 नवंबर तक यह संख्या केवल 6,611 बताई गई। हरियाणा में भी मामलों में कमी आई है। लेकिन विशेषज्ञ कहते हैं कि केवल घटनाओं की संख्या कम होने से समस्या खत्म नहीं होती।
नासा और दक्षिण कोरिया के सैटेलाइट्स से मिले डेटा में अंतर ने इन आँकड़ों को लेकर सवाल उठाए हैं। जहाँ नासा का डेटा दोपहर 1:30 से 2 बजे तक सीमित है, वहीं दक्षिण कोरियाई सैटेलाइट ने दिखाया कि पराली जलाने की ज्यादातर घटनाएँ दोपहर बाद और शाम को हुईं।
कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि आँकड़ों की गिरावट पराली जलाने के असली मामलों को नहीं दिखाती। नासा के वैज्ञानिक हिरण जेठवा के मुताबिक, “अगर पराली जलाने की घटनाओं में इतनी कमी आई है, तो एरोसोल ऑप्टिकल डेप्थ (AOD) यानी वायु में कणीय प्रदूषण के स्तर में गिरावट क्यों नहीं आई?” AOD के आँकड़े बताते हैं कि प्रदूषण का स्तर पिछले छह-सात सालों में स्थिर बना हुआ है।
दिल्ली और इसके आसपास के क्षेत्रों में वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) ‘गंभीर’ श्रेणी में बना हुआ है। शुक्रवार (15 नवंबर 2024) को दिल्ली का AQI 428 रिकॉर्ड किया गया, जो इस सीजन का सबसे खराब स्तर है।
सरकारी प्रयासों पर फिरता दिख रहा है पानी
पंजाब सरकार ने पराली जलाने की समस्या के समाधान के लिए कई कदम उठाए हैं। इसमें कंप्रेस्ड बायोगैस (CBG) प्लांट स्थापित करना भी शामिल है, जो पराली को ऊर्जा के रूप में उपयोग करने का स्थायी समाधान माना जाता है। लेकिन किसानों के विरोध के चलते केवल पाँच प्लांट ही काम कर रहे हैं, और वे भी पूरी क्षमता पर नहीं हैं। इसके अलावा, कृषि उपकरणों पर सब्सिडी देने और किसानों को जागरूक करने जैसे प्रयास भी किए गए। हरियाणा में इस दिशा में कुछ सफलता मिली है, लेकिन पंजाब में स्थिति में सुधार सीमित है।
सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद भी सुधार नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मामले में हस्तक्षेप किया है। कोर्ट ने केंद्र सरकार और वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) को निर्देश दिया कि वे स्थाई सैटेलाइट्स जैसे जियो-स्टेशनरी सैटेलाइट्स से डेटा प्राप्त करें, ताकि दिनभर के दौरान पराली जलाने की घटनाओं पर निगरानी रखी जा सके। कोर्ट ने कहा कि इस डेटा का उपयोग तुरंत कार्रवाई के लिए किया जाना चाहिए।
भले ही आँकड़ों में पराली जलाने के मामलों में कमी दिखाई गई हो, लेकिन जमीनी हकीकत और प्रदूषण के स्तर में सुधार नहीं हो सका है। किसानों द्वारा सैटेलाइट से बचने की रणनीति ने इस समस्या को और जटिल बना दिया है। दीर्घकालिक समाधान के बिना, वायु प्रदूषण से संबंधित स्वास्थ्य समस्याएँ हर साल की तरह बढ़ती रहेंगी। पराली जलाना किसानों के लिए एक सस्ता और तेज तरीका है, जिससे वे अगली फसल की बुवाई के लिए खेत तैयार कर सकते हैं। हालाँकि, पराली जलाने के लिए वैकल्पिक समाधान जैसे कि बायोडिग्रेडेबल एजेंट्स, मशीनरी, और कृषि प्रबंधन कार्यक्रम मौजूद हैं, लेकिन इनका उपयोग सीमित है।
उत्तर प्रदेश के आतंकवाद निरोधक दस्ते (ATS) ने सहारनपुर पुलिस के साथ मिलकर 30 साल से फरार चल रहे हिजबुल मुजाहिदीन के आतंकी नजीर अहमद वानी को गिरफ्तार कर लिया। नजीर, जो जम्मू कश्मीर के बड़गाम जिले का रहने वाला है, पर 1993 में उत्तर प्रदेश के देवबंद में पुलिसकर्मियों पर हमले का मामला दर्ज था। इस हमले का मकसद पुलिसकर्मियों की हत्या करना था और उस पर 25 हजार रुपए का इनाम भी घोषित था।
सहारनपुर पुलिस के मुताबिक, 26 अगस्त 1993 को देवबंद के यूनियन तिराहे पर कुछ पुलिसकर्मी सुरक्षा के लिए तैनात थे। तभी एक ग्रेनेड फेंका गया, जिससे दो पुलिसकर्मी और जय प्रकाश सैनी व सुखबीर नाम के दो नागरिक घायल हो गए थे। इस हमले के बाद पुलिस ने IPC की धारा 307 (हत्या के प्रयास) और विस्फोटक पदार्थ अधिनियम के तहत केस दर्ज किया था। जाँच में पता चला कि इस हमले का आरोपित नजीर अहमद वानी था, जो फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल कर लंबे समय से देवबंद में रह रहा था।
➡️एटीएस युनिट सहारनपुर व थाना देवबन्द की संयुक्त पुलिस टीम द्वारा ग्रेनेड हमले (बम विस्फोट) के मुकदमें में 30 वर्षों से वांछित/वारंटी 25,000/- रूपये का इनामी अभियुक्त गिरफ्तार।#UPPolice@News18UP@aajtakpic.twitter.com/4aX78KmXHW
नजीर अहमद कश्मीर के बड़गाम जिले में थानाक्षेत्र पारिमपुरा के गाँव इन्जक शरीफाबाद का रहने वाला था। वह हिजबुल मुजाहिदीन का सक्रिय आतंकी था जो फर्जी दस्तावेजों के सहारे लम्बे समय से UP के देवबंद में रह रहा था। आखिरकार 26 मई 1994 को पुलिस ने नजीर अहमद वानी को गिरफ्तार कर लिया।
तब फर्जी कागजातों के इस्तेमाल की वजह से उस पर पुलिस ने एक अन्य केस दर्ज करवाया था। यह नई देवबंद थाने में ही FIR IPC (भारतीय दंड संहिता) की धारा 467, 468 और 471 के तहत दर्ज हुई थी। साल 1994 में ही नजीर अहमद की जमानत हो गई। तब से नजीर अहमद अदालत में कभी पेश नहीं हुआ। पिछले 30 वर्षों से भी अधिक समय से वह लगातार अपना नाम और पता बदल रहा था।
सहारनपुर पुलिस प्रेसनोट
लम्बे समय से फरार वारंटी नजीर अहमद वानी के खिलाफ 20 मई 2024 को सहारनपुर की एक अदालत ने स्थाई वारंट जारी किया। इस वारंट का सहारनपुर पुलिस ने संज्ञान लिया और नजीर अहमद की गिरफ्तारी के लिए 25 हजार रुपयों का इनाम घोषित किया। आरोपित की गिरफ्तारी के लिए सहारनपुर पुलिस के साथ ATS को भी लगाया गया।
आखिरकार रविवार (17 नवंबर 2024) को पुलिस ने उसे बड़गाम जिले के हाकर मुल्ला गाँव से गिरफ्तार कर लिया, जहाँ वह रह रहा था। हाकर मुल्ला गाँव सोईबुद्ध कस्बे के पास मौजूद है। जरूरी कानूनी कार्रवाई के बाद नजीर अहमद वानी को कश्मीर से सहारनपुर लाया गया और कोर्ट के सामने पेश किया गया। अदालत ने आरोपित को जेल भेज दिया है।