Home Blog Page 5856

कॉमरेड चंदू से लेकर कन्हैया कुमार तक: जेएनयू के कपटी कम्युनिस्टों की कहानी, भाग-1

फिलहाल जो कॉन्ग्रेस सहित तमाम तथाकथित सेकुलर जमात की आँखों का तारा बना हुआ है, वह कन्हैया उस वक्त 8-10 वर्षों का होगा, जब मैं जेएनयू पहुँचा था। सन 1997 का वह मॉनसून आँसुओं से भरा हुआ था। कॉमरेड चंद्रशेखर की हत्या को भले ही चार माह बीत चुके थे, पर जेएनयू की फिजाओं में उनकी ही चर्चा और आंदोलन की बातें तारी थीं। मैं आखिरी दिन एडमिशन लेनेवाला छात्र था, क्योंकि बिहार में लालू प्रसाद के जंगलराज में मेरे प्रोफेसर पिता को तनख्वाह मिलनी बंद हो चुकी थी। हम बाढ़ को चीरते हुए जेएनयू पहुंचे थे।

जेएनयू में पहला ही दिन सांस्कृतिक आलोड़न और चौंकानेवाला था, जब रैगिंग की जगह सीनियर्स ने पूरा सहयोग दिया, पहली क्लास में टीचर ने सिगरेट पेश की, तो सोचिए दरभंगा से सीधा दिल्ली के मिंटो रोड से होते हुए जेएनयू पहुंचने वाले मुझ बंदे की क्या हालत हुई होगी? बहरहाल, विषय यहाँ वह नहीं है। अगस्त में भी चंद्रशेखर की हत्या और आंदोलन पर कैंपस उबल रहा था। और, मजे़ की बात देखिए। उस वक्त तथाकथित सेकुलरों और प्रगतिशीलों की सरकार थी।

चंद्रशेखर की शहादत के बाद जब जेएनयू के विद्यार्थी आइटीओ से लेकर बिहार भवन और रेसकोर्स रोड तक जाम कर रहे थे, तो सबसे अधिक पिटाई विद्यार्थी परिषद वालों की हुई थी। पूरे आंदोलन को अचानक SFI ने विथड्रॉ किया था क्योंकि केंद्र में संयुक्त मोर्चा की लंगड़ी सरकार थी, जिसमें वामपंथी भी शामिल थे। एक फोन हुआ येचुरी का और जेएनयू में एसएफआइ ने आंदोलन से खुद को अलग कर लिया था।

बिहार भवन पर लालू के साले साधु यादव का सामना करना हो, या आइटीओ पर सड़क जाम करना, विद्यार्थी परिषद के लोग पूरी ताकत से जमे रहे, सबसे अधिक घायल भी हुए। वामपंथियों की धोखेबाज़ी, द्रोह और मक्कारी कोई नई बात नहीं है। मैं इनको वैसे ही ‘व्यभिचारी-वामपंथी’ नहीं कहता। खुद चंदू को जब इन्होंने बेच दिया, उनकी माँ को धोखा दिया, तो मेरे जैसों के लिए नजीब हों या रोहित, इनके नाटक और नौटंकी से कोई अपरिचित नहीं। दुनिया में शायद किसी का भी यकीन कर लिया जाए, लेकिन किसी कम्युनिस्ट पर कभी नहीं।

कन्हैया कुमार भी इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए झूठे ही हैं। उन्होंने तो खैर, अपने पिता की ही कद्र नहीं की, तो लालू प्रसाद के पैरों में झुकने पर कोई आश्चर्य भी नहीं होना चाहिए। फिलहाल देश के तमाम छद्म प्रगतिशीलों, सेकुलरों, बुद्धिजीवियों आदि-इत्यादि के अनुसार कन्हैया कुमार के दो सबसे बड़े कारनामे हैं:
1. उसने देशद्रोह का काम नहीं किया है, नारे नहीं लगाए हैं। 
2. उसने सीधे देश की सत्ता को (इसे मोदी पढ़ें) चुनौती दी है। 

ये दोनों ही बातें सिरे से गलत और अहमकाना है, जिसे मैं साबित करूँगा, लेकिन पहले कुछ और बातें जाने लीजिए। मैं जेएनयू की खदान का ही उत्पाद हूँ, इसलिए मुझे न बताया जाए कि वहाँ के कम्युनिस्ट किस हद तक देशद्रोही, उत्पाती और ख़तरनाक हैं? कन्हैया तो कुछ भी नहीं, लेकिन इसके बौद्धिक पितृ-पुरुषों और माताओं से मैं उलझा हूँ, उनकी सोच किस हद तक भारत और हिंदू-विरोधी है, यह मुझे बेहतर पता है।

यह वही कैंपस है, जहां महिषासुर की जयंती मनाई जाने की कोशिश होती है, जहाँ का छात्रसंघ किसी जमाने में बाकायदा प्रस्ताव (रेजोल्यूशन) पारित करता था कि पूरा ‘उत्तर-पूर्व’ भारत के जुल्मो-सितम का शिकार है और उसे अलग होना चाहिए। यह वही जेएनयू है, जहां सीपीआई (माओवादी) की छात्र-शाखा कार्यरत है, यह वही जेएनयू है, जहाँ अफजल गुरु से लेकर गिलानी तक के लिए आँसूपछाड़ कार्यक्रम होते हैं, जहां सीआरपीएफ के जवानों के बलिदान पर हँसी-ठट्ठा होता है, जहां भारत-पाक मुशायरे में भारतीय सेना के उन जवानों के साथ मारपीट होती है, जो तुरंत कारगिल से लौटे होते हैं। ये है वहाँ के कम्युनिस्टों की करतूतें। यह सूची अंतहीन है।

अब, कन्हैया कुमार के बारे में प्रगतिशीलों के भ्रामक प्रचार नंबर एक पर कुछ तथ्य जानिए। उस दिन करीबन 20 कश्मीरी जिहादियों के साथ ही एएमयू और जामिया के लड़कों को भी जमा किया गया था। उन लोगों ने ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ के नारे भी लगाए। जब परिषद के लोगों ने विरोध किया, तो झूमाझटकी हुई, कन्हैया कुमार वहाँ पहुँचा और छात्रसंघ अध्यक्ष होने के बावजूद उसने इसे रोकना तो दूर, उनके साथ मिलकर नारे भी लगाए। यह एक तथ्य है और यह किसी शबाना, अख्तर या भास्कर के चिल्लाने से बदल नहीं जाएगा।

भ्रामक प्रचार नंबर दो पर ज़रा बात कीजिए। उस वक्त को याद कीजिए। कन्हैया कुमार को जिस तरह प्रोजेक्ट किया गया, उसे याद करने की कोशिश कीजिए। कांड के तुरंत बाद डी राजा, केजरीवाल से लेकर राहुल गांधी तक के जेएनयू-भ्रमण और भड़काऊ नारे को याद कीजिए। उस वक्त कांग्रेस के एक बड़े नेता ने लगातार कन्हैया को ग्रूम किया, इतना ही नहीं एक नेताजी ने तो उसके अकाउंट में पैसे भी भेजे। लक्ष्य एक ही था, मोदी के खिलाफ जो भी, जहाँ से भी मिले, उसे ले लो। कांग्रेस और कम्युनिस्ट तो वैसे भी एक सिक्के के दो पहलू हैं ही।

— व्यालोक पाठक
लेख का दूसरा हिस्सा यहाँ पढ़ें।

बुर्क़े की तुलना घूँघट से करने से पहले जरा भारत का इतिहास भी देख लें जावेद ‘ट्रोल’ अख़्तर

जाने-माने गीतकार और स्क्रिप्ट लेखक जावेद अख़्तर ने बुर्क़ा पर कई देशों में लगाए जा रहे प्रतिबंधों के बीच घूँघट पर प्रतिबन्ध लगाने की माँग की है। अब ट्विटर ट्रोल का रूप धारण कर चुके जावेद अख़्तर फ़िल्म इंडस्ट्री के वरिष्ठ सदस्यों में से एक हैं। कई दशकों से बॉलीवुड में काम कर रहे जावेद अख़्तर की इस सोच को देख कर समझा जा सकते है कि उन्होंने जिन तमाम फ़िल्मों का स्क्रिप्ट लेखन किया है, वो फ़िल्में क्या सन्देश देती होंगी? भले ही उनके द्वारा लिखी कई फ़िल्में सुपरहिट साबित हुईं और अमिताभ बच्चन जैसे नायकों को शिखर सम्मान मिला लेकिन ध्यान से देखें तो कहीं न कहीं ऐसी फ़िल्मों के कुछ दृश्यों में भी जावेद अख़्तर की सोच झलक ही जाती है। जैसे, विलेन हमेशा चन्दन-टीका धारी होते थे, ईमानदार दोस्त हमेशा मजहब विशेष वाला होता था और पुजारी हमेशा पाखंडी ही होते थे। यह ट्रेंड आज तक चला ही आ रहा है।

अब जावेद अख़्तर ने उसी सोच को नई पराकाष्ठा देते हुए लिखा, “देश में बुर्क़ा पहनने पर प्रतिबंध लगाने पर मुझे कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन केंद्र सरकार राजस्थान में 6 मई को होने वाले लोकसभा सीटों के लिए मतदान से पहले घूँघट प्रथा पर भी प्रतिबंध लगाए।” जावेद अख्तर के इस बयान के बाद उनके ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया, जिसके बाद उन्होंने ट्विटर पर अपनी सफ़ाई में लिखा, “कुछ लोग मेरे बयानों को तोड़-मोड़ कर पेश कर रहे हैं। मेरे हिसाब से, भले ही श्री लंका में इसे (बुर्क़ा बैन) सुरक्षा कारणों से किया जा रहा है लेकिन महिला सशक्तिकरण के लिए इसकी ज़रूरत है। चेहरे को ढँकना प्रतिबंधित होना चाहिए, चाहे वो बुर्क़ा हो या घूँघट।” डैमेज कंट्रोल में जुटे जावेद अख़्तर ने एक और ग़लती कर दी।

और हाँ, जावेद अख़्तर ने तो कई ऐसे गीत लिखे हैं जिनमें घूँघट को सुंदरता के पर्याय की तरह पेश किया गया है। ‘घूँघट में गोरी है’ से लेकर ‘घूँघट में गोरी क्यूँ जले’ तक, उनकी इन गीतों के वीडियो में नायिका ने घूँघट नहीं रखा है लेकिन गाने में इसका जिक्र है। नायिका की सुंदरता में चार चाँद लगाने वाले माध्यम की तरह घूँघट को पेश करने वाले जावेद अख़्तर को ये अब सामाजिक कुरीति लगती है क्योंकि अब बुर्क़े पर प्रतिबन्ध की माँग हो रही है या लगाई जा रही है। घूँघट तबतक अच्छा था जबतक इससे उनका व्यवसाय चल रहा था, तबतक वो इसमें सुंदरता देखते थे। अब घूँघट एक कुरीति है क्योंकि ‘उनके’ बुर्क़े पर आँच आई है।

जावेद अख़्तर ने घूँघट को न सिर्फ़ महिलाओं के दमन से जोड़कर देखा बल्कि इसे महिला सशक्तिकरण के भी ख़िलाफ़ बताया। यह अचंभित करने वाला है कि अपनी पूरी उम्र फ़िल्मों के गीत और कहानियाँ लिखते हुए बिताने वाले जावेद अख़्तर अपने ही देश की संस्कृति और इतिहास से अनजान हैं। हमनें एक लेख में बताया था कि बुर्क़ा पर अधिकतर देश इसीलिए प्रतिबन्ध लगा रहे हैं क्योंकि कई आतंकी घटनाओं में बुर्क़ा का किरदार सामने आया है। आतंकियों ने चेहरा ढँकने के लिए इसका कितनी बार प्रयोग किया लेकिन इसे प्रतिबंधित करना इतना आसान भी नहीं है। मुस्लिम संगठनों द्वारा विरोध प्रदर्शन किए जाएँगे, विपक्षी नेताओं द्वारा मुस्लिमों को बरगलाया जाएगा कि उनके अधिकार छीने जा रहे हैं और जावेद अख़्तर जैसे बुद्धिजीवी इसे हिन्दू या भारतीय परम्पराओं से जोड़ कर देखेंगे। ये सब शुरू भी हो गया है। ऐसा दुनियाभर में है।

बुर्क़ा और घूँघट के बीच समानता स्थापित करने वाले जावेद अख़्तर को सबसे पहले धार्मिक बुराई और सामाजिक कुरीति के बीच का अंतर समझना चाहिए। बुर्क़ा पहन कर आतंकी हमले की साजिश रचने वाले और ‘अल्लाहु अक़बर’ कह कर लोगों को मारने वाले इस्लामिक आतंकियों को रोकने के लिए बुर्क़ा पर प्रतिबन्ध लगाया जाता है तो तमाम मुस्लिम संगठन इसके विरोध में आ जाते हैं, यह है धार्मिक बुराई। जबकि, घूँघट भारत में एक क्षेत्रीय परम्परा है जो हर क्षेत्र में अलग-अलग कारणों से प्रयोग में आया। अगर किसी क्षेत्र में इसे जबरदस्ती थोपा जा रहा है, तो ये है सामाजिक बुराई। इसका हिन्दू धर्म से कोई लेना-देना नहीं। इसे समझने के लिए भारत के भूगोल को समझना पड़ेगा। तभी यह पता चलेगा कि यह हिन्दू धर्म से जुड़ी कोई बुराई नहीं है, जैसे बुर्क़ा एक सम्पूर्ण इस्लामिक बुराई बन गई है।

सबसे पहले तो जो लोग घूँघट को हिन्दू धर्म से जोड़ कर देखते हैं, उनसे एक सवाल यह पूछा जाना चाहिए कि क्या उन्होंने कभी किसी हिन्दू देवी को घूँघट में देखा है? क्या लक्ष्मी, दुर्गा या काली का कहीं भी घूँघट में वर्णन है, जहाँ उनका पूरा चेहरा ढँका हुआ हो? इसका जवाब है, नहीं। इसके तार भी इस्लामिक आक्रमणों से जुड़ते हैं। भारत में 11वीं सदी के बाद से जब इस्लामिक आक्रमण तेज़ हो गए, तब हिन्दू महिलाओं पर उनकी ख़ास नज़र थी। देवदत्त पटनायक जैसे कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इस्लामी आक्रांताओं से बचने के लिए उत्तर भारत में घूँघट से चेहरा ढँकने का चलन तेज़ हुआ। मुस्लिम आक्रांताओं की महिलाओं पर बुरी नज़र रहती थी। अगर पटनायक की बातों को खंगालने के लिए कुछ घटनाओं को देखें तो समझ में आता है कि आख़िर क्यों भारत में घूँघट का चलन तेज़ हुआ।

जब कई राज्यों के मुस्लिम आक्रांताओं ने मिल कर सम्राट कृष्णदेवराय की मृत्यु के बाद विजयनगर साम्राज्य को तबाह किया, तब विजयनगर जैसे सुन्दर नगर को कचरे में बदल दिया गया। एक अंतरराष्ट्रीय घुमक्कड़ ने विजयनगर की तुलना कभी उस समय दुनिया के सबसे अमीर शहर रोम से की थी। जब विजयनगर तबाह हुआ, तब वहाँ हज़ारों औरतों का बलात्कार किया गया। पुरुषों को मार डाला गया और महिलाओं के साथ सेनापतियों व सेनाओं ने थोक में बलात्कार किया। इसी तरह जब अकबर को दिल्ली का राजा बनाने के लिए युद्ध हुआ, उसके बाद लोगों को मार-मार कर उनकी खोपड़ियों का पहाड़ खड़ा किया गया। उस दौरान भी बैरम खान जैसे आततायी के नेतृत्व में अनगिनत महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार, बलात्कार किया गया, उनका उत्पीड़न किया गया। इससे यहाँ के निवासियों में भय व्याप्त हो गया।

चूँकि, उत्तर भारत लगातार बर्बर इस्लामिक आक्रमणों का गवाह बना, यहाँ घूँघट से चेहरे ढँकने की प्रथा तेज़ हो गई। वैसे घूँघट का प्रमाण भारत में सदियों से मिलता है लेकिन इसका अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग कारणों से प्रयोग किया जाता रहा है। पटनायक लिखते हैं कि दक्षिण भारत में घूँघट का चलन नहीं चला। इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि जिस प्रदेश में इस्लामिक आक्रांताओं का आतंक बढ़ा, वहाँ लोगों ने बहू-बेटियों की सुरक्षा के लिए कुछ नियम बनाए। अब इससे भी पीछे चलते हैं, बहुत पीछे। घूँघट शब्द का जन्म संस्कृत शब्द अवगुण्ठन से हुआ है। प्राचीन काल में महाराज शूद्रक द्वारा लिखी गई पुस्तक मृच्छकटिकम में इसका वर्णन है। इस पुस्तक में शूद्रक ने अवगुंठन के बारे में लिखा है कि महिलाएँ इसका प्रयोग अपने बालों की सुरक्षा के लिए करती थीं।

महाराज शूद्रक लिखते हैं कि महिलाएँ जब किसी कार्यक्रम में जाती थीं तो वो सजती-सँवरती थी और बालों को सँवारने पर उनका विशेष ध्यान होता था। इसी कारण उन्होंने अवगुंठन धारण करना शुरू किया। इससे बाल बंधे और ढँके रहते थे। हवा वगैरह से इसपर कोई नुकसान नहीं पहुँचता था। इसके अलावा राजस्थान के धूल भरे रेगिस्तान में महिलाओं द्वारा घूँघट का प्रयोग धूप द्वारा बचने के लिए भी किया गया। बाद में धीरे-धीरे घूँघट कई क्षेत्रों में या समाज में विवाहित महिलाओं की पहचान बन गई और इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि इसे कई क्षेत्रों में जबरन भी थोपा गया। लेकिन, घूँघट से आजतक किसी को कोई ख़तरा नहीं हुआ। बुर्क़ा पर प्रतिबन्ध सुरक्षा कारणों की वजह से लग रहा है, इस्लामी कुरीति तो यह है ही क्योंकि दुनियाभर में कई देशों में इस्लामिक समाज में इसका इस्तेमाल व्यापक तौर पर होता है।

घूँघट कहीं-कहीं सामाजिक कुरीति ज़रूर बन गई लेकिन जहाँ भी ऐसा हुआ, वहाँ विरोध भी किया गया। बौद्ध कथाओं के अनुसार जब यशोधरा को बड़ों के सामने घूँघट करने को कहा गया तो उन्होंने इनकार कर दिया और दरबार में जाकर इसके पीछे के कारण भी गिनाए। इसी तरह सिख गुरु अमर सिंह ने घूँघट प्रथा को हटाने के लिए अभियान चलाया। लेकिन, राजस्थान जैसे कुछ राज्यों में भौगोलिक व मौसमी परिस्थितियों के कारण आज भी इसका प्रचलन है। जावेद अख़्तर ने एक व्यापक समस्या (बुर्क़ा) की एक ऐसी चीज से तुलना करने की कोशिश की, जो एक प्रचलन है, परंपरा है। बुराइयाँ हर परम्परा, रीति और चलन में तभी आती है जब उसे जबरदस्ती थोपा जाने लगता है। जबतक उसे स्वेच्छा से स्वीकार किया जाता है, उससे किसी को कोई ख़तरा नहीं है, तबतक उसे धार्मिक या सामाजिक बुराई का जबरन रूप दे देना सही नहीं है।

बुराइयाँ हर जगह है। लेकिन, उसकी व्यापकता और उससे समाज को होने वाले ख़तरे को माप कर यह अंदाज़ा लगाया जाता है कि उस बुराई को कितनी जल्दी ख़त्म कर देना चाहिए। घूँघट प्रथा ने अगर कहीं किसी क्षेत्र में, किसी समाज में, अगर बुराई का रूप ले ही लिया है तो इसके सामाजिक अभियान चलाकर ठीक किया जा सकता है। लेकिन, जिस बुर्के का प्रयोग करके नरसंहार किया जा रहा है, वह केवल सामाजिक बुराई नहीं है बल्कि सुरक्षा की दृष्टि से भी ख़तरा है और जिस तरह से इसके समर्थन में मुस्लिम बुद्धिजीवी और संगठन खड़े हो रहे हैं, उससे लगता है कि इसे जल्द से जल्द बैन करना समय की माँग है।

अब आते हैं जावेद अख़्तर के डैमेज कंट्रोल पर। जब जावेद ने देखा कि बुर्क़ा से घूँघट की तुलना करने के लिए उनके पास कोई ख़ास तर्क नहीं हैं, उन्होंने इसे महिला सशक्तिकरण से जोड़ कर बहाने मारना शुरू कर दिया। उनका भाव यह था कि हिन्दू धर्म में इसका भी जबरन इस्तेमाल उतना ही व्यापक है, जैसा दुनियाभर के मुस्लिम समाज में। हिन्दुओं में अधिकतर क्षेत्रों में शादी के दौरान पुरुष भी अपना चेहरा ढँके रहते हैं। फेरे लेने के दौरान वर-वधू दोनों के ही चेहरों पर पर्दा होता है। क्या जावेद अख़्तर इसे भी कुरीति कहेंगे? हाँ, अगर ज़बरन कहीं किसी पुरुष का चेहरा ढक दिया जाता है तो इसे पुरुष सशक्तिकरण से भले देखिए, लेकिन जहाँ ये परम्परा ही है, उसे आप कुरीति कैसे कह सकते हैं? इसीलिए जावेद अख़्तर को समझना चाहिए कि घूँघट बुर्क़ा नहीं है।

मायावती का खुलासा: इस वजह से गठबंधन ने कॉन्ग्रेस के लिए छोड़ी VIP सीट

बसपा सुप्रीमो मायावती ने सपा के साथ गठबंधन के बाद पहली बार अमेठी और रायबरेली से कॉन्ग्रेस के खिलाफ अपने प्रत्याशी नहीं उतारा है। महागठबंधन के द्वारा रायबरेली और अमेठी की सीट कॉन्ग्रेस के लिए छोड़े जाने को लेकर मायावती ने पहली बार बोला है। मायावती ने रविवार (मई 5, 2019) को इसके पीछे का कारण बताते हुए कहा कि उन्होंने देश और जनहित में, खासकर भाजपा-आरएसएस जैसी ताकतों को कमजोर करने के लिए यूपी में अमेठी-रायबरेली लोकसभा सीट कॉन्ग्रेस के लिए छोड़ दी, ताकि इसके दोनों सर्वोच्च नेता इन्हीं सीटों से फिर से चुनाव लड़ें और इन दोनों सीटों में ही उलझ कर ना रह जाएँ। फिर कहीं भाजपा इसका फायदा यूपी के बाहर कुछ ज्यादा ना उठा ले। इसे खास ध्यान में रखकर ही, सपा-बसपा गठबंधन ने दोनों सीटें कॉन्ग्रेस के लिए छोड़ दी थीं। मायावती ने कहा कि उन्हें मुझे पूरी उम्मीद है कि महागठबंधन का एक-एक वोट हर हालत में दोनों कॉन्ग्रेस नेता को मिलने वाला है।

मायावती ने इसके लिए बकायदा महागठबंधन के समर्थकों से अपील की है कि वो लोग 6 मई को रायबरेली और अमेठी लोकसभा सीट पर होने वाले मतदान में कॉन्ग्रेस नेताओं के पक्ष में वोट करें। उन्होंने कहा, “भाजपा और कॉन्ग्रेस दोनों ही पार्टियाँ एक जैसी हैं। हमने कॉन्ग्रेस के साथ कोई समझौता नहीं किया है, लेकिन भाजपा को हराने के लिए रायबरेली और अमेठी सीट पर हमारी पार्टी का वोट कॉन्ग्रेस को मिलेगा।”

इसके साथ ही मायावती का कहना है कि महागठबंधन को जनता का पूर्ण समर्थन मिल रहा है, जिसकी वजह से भाजपा परेशान हो गई है और गठबंधन को तोड़ने की कोशिश कर रही है। उन्होंने कहा कि यह गठबंधन सिर्फ केंद्र में नया प्रधानमंत्री व नई सरकार बनाने के लिए नहीं है, बल्कि यूपी में भी भाजपा की सरकार को हटाएगा और 23 मई को देश को निरंकुश व अहंकारी शासन से मुक्ति मिल जाएगी।

₹30,000 करोड़ का गणित चिदंबरम और सुरजेवाला से पूछो: राहुल गाँधी का इंडियन एक्सप्रेस को इंटरव्यू

17वीं लोकसभा का निर्वाचन जैसे-जैसे अपनी समाप्ति की ओर बढ़ रहा है, कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ताबड़तोड़ इंटरव्यू दिए जा रहे हैं। एनडीटीवी और इंडिया टुडे के बाद इंडियन एक्सप्रेस से भी उन्होंने बात की और बताया कि कैसे उन पर परिवारवाद का आरोप राजनीतिक प्रोपेगंडा है, मनमोहन सिंह सरकार का अध्यादेश फाड़ तत्कालीन प्रधानमंत्री का अपमान करना उनकी गलती थी, और कैसे वह अनिल अंबानी और मेहुल चोकसी को एक जैसा ‘क्रोनी कैपिटलिस्ट’ मानते हैं। पेश है हर मुद्दे पर उनकी विस्तृत राय और उनके दावे:

जनता का नारा है ‘चौकीदार चोर है’

राहुल गाँधी ने दावा किया कि ‘चौकीदार चोर है’ का नारा उनकी ईजाद नहीं, छत्तीसगढ़ की एक जनसभा में स्वःस्फूर्त उत्पन्न हुआ जनता का उद्गार है। उन्होंने यह भी दावा किया कि उनके कॉन्ग्रेस अध्यक्ष होकर इसे उठा लेने से खाली इस नारे की जनता में ‘धमक’ (amplification) बढ़ गई है।

हालाँकि जब इंडियन एक्सप्रेस के साक्षात्कारकर्ता ने सवाल उठाया कि खुद राहुल गाँधी और पार्टी प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला के अलावा किसी वरिष्ठ कॉन्ग्रेस नेता को इसका प्रयोग करते नहीं सुना गया है तो वह पहले इसे नकारते नज़र आए और बाद में आक्रामक हो साक्षात्कारकर्ता से ही पूछने लगे कि इस सवाल को उठाने से मंतव्य क्या है। इसके अलावा उन्होंने यह भी दावा किया कि शायद उनकी पार्टी के नेता प्रधानमंत्री मोदी द्वारा आगे जाकर इसका ‘बदला लिए जाने’ से डर रहे हैं, पर वह (मोदी) राहुल को नहीं डरा सकते।

₹30,000 करोड़ का गणित चिदंबरम और सुरजेवाला से पूछो

राहुल हर रैली में आजकल यह दोहरा रहे हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने ‘मित्र’ अनिल अंबानी को अनुचित लाभ पहुँचाने के लिए वायुसेना के ₹30,000 करोड़ उनके ‘खाते में डाल दिए’। इस राशि पर वह कैसे पहुँचे, इसका सीधा जवाब देने से कॉन्ग्रेस अध्यक्ष बचते नजर आए। पहले तो जब साक्षात्कारकर्ता ने यह पूछा कि पूरा राफ़ेल सौदा ही ₹60,000 करोड़ का है तो इसकी 50% राशि आखिर किसी एक बिजनेसमैन को कैसे मिल गई तो उन्होंने ‘पर्याप्त दस्तावेज हैं’ का गोलमोल उत्तर दे टालने की कोशिश की।

जब साक्षात्कारकर्ता टस-से-मस नहीं हुआ तो उन्होंने सौदे में ‘प्रक्रियागत गड़बड़ियों’, द हिन्दू के द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट, जेपीसी जाँच की माँग, अनिल अंबानी की तथाकथित रक्षा उत्पादन अनुभवहीनता, उनकी आर्थिक देनदारियों आदि का हवाला देकर मामला घुमाने की कोशिश की। पर जब साक्षात्कारकर्ता ने याद दिलाया कि तत्कालीन कॉन्ग्रेस सरकार ने खुद 2-जी घोटाले में बार-बार ₹2 लाख करोड़ के गणित का मूल पूछा था तो अंत में उन्होंने माना कि उन्हें आकलन बताया गया है। यह कैसे आया इसका हिसाब पूर्व वित्तमंत्री और कॉन्ग्रेस के आर्थिक दिमाग पी चिदंबरम व प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला के ही पास है। उन्होंने एक बार फिर प्रधानमंत्री को इस मुद्दे पर सार्वजनिक बहस के लिए ललकारा।

वरिष्ठ नेताओं को एक हार के लिए निकाल नहीं सकता, अनुभव का सदुपयोग किया  

जब कॉन्ग्रेस अध्यक्ष से पूछा गया कि 2014 में पार्टी इतिहास की सबसे बड़ी हार के बाद भी संगठन में कोई बड़ी तब्दीली नहीं हुई तो राहुल एके एंटनी, अशोक गहलोत जैसे वरिष्ठ नेताओं का बचाव करते नजर आए। उन्होंने विस्तृत अनुभव का हवाला देते हुए कहा कि ऐसे कद्दावर और अनुभवी नेताओं को एक हार का ठीकरा उनके सर फोड़कर निकालना अनुचित होता। उसकी बजाय पार्टी ने उनके अनुभव का उपयोग दूसरी नेताओं की पंक्ति को मजबूत करने के लिए किया। उन्होंने मोदी के अपराजेय होने का मिथक तोड़ने का श्रेय भी कॉन्ग्रेस को दिया, और याद दिलाया कि कैसे केवल 44 लोकसभा सदस्यों वाली कॉन्ग्रेस ने मोदी सरकार के भूमि अधिग्रहण बिल का रास्ता रोक लिया था। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें उस वाकये पर गर्व महसूस होता है।

अकेले मोदी ही जिम्मेदार, इसलिए विचारधारा की बजाय उनपर हमला   

राहुल गाँधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर ही निशाना साधे रखते हुए उन्हें देश की उस स्थिति के लिए जिम्मेदार बताया जिसे वह ‘बदहाल’ कहते हैं। उन्होंने कहा कि इसीलिए वह अपने निशाने पर पूरी भाजपा की बजाय केवल नरेंद्र मोदी को रखे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री रहते हुए अपनी ही सरकार में किसी की नहीं सुनी। उन्होंने प्रधानमंत्री की नोटबंदी को देश की अर्थव्यवस्था के साथ-साथ रिजर्व बैंक की स्वायत्ता को भी नुकसान पहुँचाने वाला बताया। उन्होंने राफ़ेल के तथाकथित ‘घोटाले’ को भी ‘मोदी की मनमर्जी’ का ही दुष्परिणाम बताया।

मोदी के एक हम ही वैचारिक विरोधी, हम से है संघ को खतरा

कॉन्ग्रेस अध्यक्ष ने यह भी दावा किया कि उनकी पार्टी ही संघ की इकलौती वैचारिक विरोधी है, और इसीलिए प्रधानमंत्री ने ‘कॉन्ग्रेस-मुक्त भारत’ का नारा दे रखा है। वह किसी और पार्टी को देश से खत्म नहीं करना चाहते; केवल कॉन्ग्रेस को समाप्त करना चाहते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि 2014 के बाद कॉन्ग्रेस ने आत्म-चिंतन किया और उसके परिणामस्वरूप न केवल जमीन से नए नेताओं की पूरी पौध को लेकर आगे आई बल्कि इन नेताओं ने और इनका नेतृत्व कर रहे राहुल ने 5 साल तक भाजपा के खिलाफ लड़ाई लड़ी है। राहुल गाँधी ने यह भी जोड़ा कि यह उनकी लड़ाई का ही परिणाम है कि 2 वर्ष पहले तक मोदी सरकार को दस साल का न्यूनतम कार्यकाल देने वाले आज मोदी को पूर्ण बहुमत को लेकर भी आश्वस्त नहीं हैं।

कॉन्ग्रेस में नहीं है परिवारवाद, शाह भाजपा अध्यक्ष बने मोदी के बल पर

राहुल गाँधी ने कॉन्ग्रेस पर लगने वाले शायद सबसे पुराने आरोप परिवारवाद का भी बचाव किया। उन्होंने राजीव साटव (गुजरात कॉन्ग्रेस प्रभारी, यूथ कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और महाराष्ट्र सांसद), जोतिमणि सेन्नीमलै (करूर लोकसभा प्रत्याशी, कॉन्ग्रेस मीडिया पैनलिस्ट), माणिक टैगोर (विरुधुनगर प्रत्याशी और इसी सीट से 2009 के लोकसभा सदस्य) समेत कई कॉन्ग्रेस सदस्यों का उदाहरण देते हुए परिवारवाद के आरोप को नकारा। इसके अलावा उन्होंने सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव (मुलायम सिंह यादव के बेटे) और भाजपा सांसद पंकज सिंह (गृहमंत्री राजनाथ सिंह के बेटे) का उदाहरण दिया कि हर पार्टी में कुछ नेताओं की संतानें अपने परिवार की राजनीतिक परंपरा में भागीदार होतीं हैं।

जब साक्षात्कारकर्ता ने राहुल गाँधी से सीधे-सीधे पूछा कि उन्हें 5 साल पहले भी पता था कि कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष वही बनेंगे जबकि भाजपा में कभी यह ‘फिक्स’ नहीं होता तो राहुल गाँधी ने इसे भी चुनौती दी। उन्होंने भाजपा में अमित शाह के अध्यक्ष पद पर चुनाव को भी ‘फिक्स्ड’ बताते हुए यह आरोप लगाया कि उन्हें यह पद मोदी की जी-हुजूरी करने से और यही करने के लिए मिला है। उन्होंने अपने खिलाफ वंशवाद के आरोप को प्रपोगंडा बताते हुए सवाल किया कि क्या उनके पिछले 5 साल के संघर्ष को उनके ‘वंश की देन’ बताकर नकारा जा सकता है।

राष्ट्रीय सुरक्षा मुद्दा नहीं, बहाना है; हम भय नहीं फैलाते   

राहुल गाँधी ने राष्ट्रीय सुरक्षा को निर्वाचन की राजनीति में मुद्दा मानने से मना करते हुए साफ़ किया कि कॉन्ग्रेस इसे केवल अर्थव्यवस्था, राफेल और बेरोजगारी पर कॉन्ग्रेस के आरोपों का सामना करने से बचने का प्रधानमंत्री का बहाना मानती है। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी जनता के बीच खराब अर्थव्यवस्था, किसानों के खराब हालात और बेरोजगारी के मुद्दे पर है और मोदी उनके सवालों से बचने के लिए राष्ट्रवाद की आड़ लेना चाहते हैं। लोगों में “भाजपा आएगी तो…” का भय फैलाने के आरोप के जवाब में उन्होंने आरोप दोहराए कि भाजपा आई तो संविधान पुनर्लिखित कर दिया जाएगा, प्रधानमंत्री भ्रष्ट हैं और संस्थाओं में ‘एक खास विचारधारा’ (संघ की विचारधारा) के लोगों को भरकर संस्थाएँ बर्बाद कर रहे हैं।

उन्होंने मोदी के किए ‘नुकसान’ की भरपाई के लिए अपनी पार्टी के उपाय भी गिनाए। बकौल कॉन्ग्रेस अध्यक्ष, उनकी पार्टी एक सरल जीएसटी लाएगी। इसके अलावा उन्होंने अपनी विवादास्पद ‘न्याय स्कीम’ को नोटबंदी से हुए तथाकथित नुकसान की भरपाई बताया।

प्रज्ञा ठाकुर, सच्चर पर सवाल टाले

भाजपा की भोपाल प्रत्याशी प्रज्ञा सिंह ठाकुर के खिलाफ व्यक्तिगत रूप से प्रचार करने के सवाल पर राहुल गाँधी बचते नजर आए। उन्होंने कहा कि ‘हालाँकि’ उन्हें भोपाल में प्रचार करने से कोई परहेज नहीं है, लेकिन प्रज्ञा सिंह वैसे ही भारी अंतर से मुकाबला हार रहीं हैं। इसके अलावा सच्चर समिति की रिपोर्ट का जिक्र अपनी पार्टी के पिछले दो लोकसभा घोषणापत्रों में होने और इस बार गायब होने के बारे में भी कॉन्ग्रेस अध्यक्ष ने कोई सीधी टिप्पणी नहीं की। उन्होंने केवल यह दोहराया कि कॉन्ग्रेस भारत को “सभी का” मानती है और यहाँ तक कि भाजपा को लेकर भी वह “भाजपा मुक्त भारत” जैसी बातें नहीं करते।

मनमोहन केवल सम्मानित नहीं, प्रेम भी करता हूँ  

पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बारे में राहुल गाँधी ने कहा कि वह उनका (डॉ. सिंह का) केवल सम्मान ही नहीं करते बल्कि उन्हें दिल से चाहते भी हैं। उन्होंने मनमोहन सरकार के अध्यादेश को सार्वजानिक रूप से फाड़ने को गलती मानते हुए अफ़सोस जताया। साथ में यह भी जोड़ा कि उन्होंने यह लगता है कि मनमोहन सिंह जिस ऊँचे ‘कद’ के व्यक्तित्व हैं, वैसे व्यक्ति का राहुल गाँधी कुछ भी कर लें, असम्मान हो ही नहीं सकता। पर उन्होंने यह भी माना कि उनकी पार्टी ने यह स्वीकारना बंद कर दिया था कि 2012 आते-आते उनकी नीतियाँ स्पष्ट रूप से काम करना बंद कर चुकीं थीं, इसीलिए जनता ने उन्हें दण्डित किया।

हम न राईट, न लेफ़्ट; अनिल अंबानी-मेहुल चोकसी क्रोनी कैपिटलिस्ट   

अपनी पार्टी के चरम-वामपंथी हो जाने के आरोप को भी कॉन्ग्रेस अध्यक्ष ने सिरे से नकार दिया। उन्होंने 1990 के दशक की शुरुआत में नरसिम्हा राव-मनमोहन सिंह के आर्थिक उदारीकरण के कदम का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस लोगों की बातें लगातार सुनती रहती है और किसी भी परिस्थिति के अनुसार उपयुक्त निर्णय लेती है।

कॉर्पोरेट बिजनेसमैनों को नाम लेकर अपमानित करने के मुद्दे पर राहुल गाँधी रक्षात्मक नजर आए। उन्होंने भारतीय कॉर्पोरेट जगत को ईमानदार, मेहनती संस्था बताते हुए अनिल अंबानी, मेहुल चोकसी, विजय माल्या, नीरव मोदी को इनसे अलग ‘क्रोनी कैपिटलिस्ट’ बताया। उन्होंने कहा कि ईमानदार कॉर्पोरेट वालों का वह पूर्ण समर्थन करते हैं।

मतभेद कॉन्ग्रेस का आंतरिक लोकतंत्र; राहुल गाँधी को सबको सुनने वाले के रूप में जानें

पूर्व मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्र के खिलाफ महाभियोग लाने के मामले में निर्णय की जिम्मेदारी लेने से भी राहुल गाँधी बचते नजर आए। उन्होंने मोदी-शाह पर संवैधानिक संस्थाओं को दबाने का आरोप दोहराया। साथ में वह भी जोड़ा कि महाभोयोग का निर्णय पिछले साल की शुरुआत में की गई चार जजों की प्रेस वार्ता में दीपक मिश्र पर लगे आरोपों के द्वारा जनित सार्वजनिक मत के चलते उठाया। गौरतलब है कि उन चार जजों में से एक रंजन गोगोई इस समय भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) हैं।

इस निर्णय के खिलाफ कॉन्ग्रेस में ही उठी आवाजों के बारे में उन्होंने सफाई दी कि यह उनकी पार्टी में जीवंत लोकतंत्र और असहमति की संस्कृति का प्रतीक है। साथ ही यह पूछे जाने पर कि उनमें ऐसी कौन-सी खूबी है जो लोगों को नरेंद्र मोदी की बजाय उन्हें चुनें, उन्होंने कहा कि वह सबकी सुनते हैं, उनके दिल में करुणा है, और वह सचमुच देश के लोगों की मदद करना चाहते हैं

क्या डिंपल बाबा के चेहरे से नक़ाब उतर गया है? सोचिएगा ज़रूर!

अंग्रेजी फिल्म ‘प्राइमल फियर’ को थ्रिलर की श्रेणी में रखा जाता है और ये विलियम डैल के इसी नाम के उपन्यास पर आधारित है। यह एक वकील की कहानी है जो हमेशा ऐसे मामले अपने हाथ में लेने के चक्कर में होता है, जिसमें उसे अपना ज्यादा से ज्यादा प्रचार मिल सके। शिकागो के इस वकील मार्टिन के हाथ एक आरोन स्टैम्पलर का मुकदमा आता है। एक लोकप्रिय आर्चबिशप के क़त्ल का इल्जाम उसी के चर्च में काम करने वाले आल्टर बॉय स्टैम्पलर पर आया हुआ होता है।

जब मार्टिन इस मुवक्किल स्टैम्पलर से मिलता है तो उसे लगता है ये उन्नीस साल का हकलाने वाला लड़का तो सीधा-सादा सा है! इससे भला किसी की ऐसी जघन्य हत्या कैसे होगी? मार्टिन इस चर्चित मुक़दमे को अपने हाथ में लेता है और स्टैम्पलर को बचाने की कोशिशों में जुट जाता है। मार्टिन की पूर्व प्रेमिका उसके खिलाफ लड़ने वाली वकील होती है और वो बताने की कोशिश करती है कि ये हकलाने वाला, निरीह सा दिखता लड़का ही असल में अपराधी है। मार्टिन से ये बात हजम नहीं होती और वो अपनी तहकीकात में जुटा रहता है।

थोड़े ही दिन में उसे पता चलता है कि आर्चबिशप ने हाल ही में ऐसे फैसले लिए थे जिससे शिकागो के कई बड़े लोगों को भारी आर्थिक नुकसान हुआ होगा। वो मान लेता है कि जरूर इन भ्रष्ट अधिकारियों ने नैतिकता दिखा रहे आर्चबिशप को मरवाया होगा। थोड़ी और तहकीकात में उसे एक विडियो मिलता है जिसमें दिखता है कि उसके मुवक्किल से जबरन किसी किशोरी से सम्भोग करवाया जा रहा है। बलात्कार जैसी स्थिति के इस सबूत के हाथ लगने पर वकील मार्टिन सोच में पड़ जाता है।

पहले तो स्टैम्पलर के पास हत्या की कोई वजह नहीं थी, लेकिन अगर वो ये सबूत अदालत में रखता तो साबित हो जाता कि स्टैम्पलर इस वजह से आर्चबिशप से दुश्मनी पाले बैठा था। वो इस सबूत के साथ जब स्टैम्पलर के पास पहुँचता है तो अचानक उसमें एक परिवर्तन होता है। सीधा-सादा हकलाता सा लड़का स्टैम्पलर अचानक बदल कर किसी और ही व्यक्तित्व में सामने आता है। वो खुद को ‘रॉय’ बुलाने लगता है और स्वीकारता है कि आर्चबिशप की नृशंस तरीके से हत्या उसी ने की है क्योंकि स्टैम्पलर तो सीधा सादा सा है!

अदालती कार्रवाई में ‘मल्टीप्ल पर्सनालिटी डिसऑर्डर’ नामक मनोरोग सिद्ध हो जाता है और स्टैम्पलर मनोरोगी होने के कारण सजा से बच जाता है। आखरी दृश्य में जब स्टैम्पलर पूछता है कि मिस वनाबेल का गला तो ठीक है न? तब मार्टिन को समझ आता है कि स्टैम्पलर तो कभी मनोरोगी था ही नहीं! उसने नाटक करके मार्टिन को बुरी तरह ठगा और खुद को हत्या की सजा से साफ़ बचा लिया था। मार्टिन पूछता है कि क्या कभी ‘रॉय’ जैसा कोई हत्यारा सचमुच था भी या स्टैम्पलर लगातार नाटक कर रहा था? स्टैम्पलर चिढ़ाते हुए कहता है, स्टैम्पलर जैसा कोई नहीं था, हमेशा से ‘रॉय’ ही था!

कांग्रेसी नेता अभिषेक मनु सिंघवी की कार में किसी महिला को जज बनाने के प्रस्ताव के बारे में एक दौर में काफी चर्चाएँ रही थीं। कांग्रेसी एन डी तिवारी के जिस सुपुत्र की हाल में ही हत्या हुई, उसने तो बरसों मुकदमा लड़कर अपने लिए पिता का नाम हासिल किया था। कांग्रेस के शशि थरूर पर भी ऐसे ही मामलों के मुक़दमे जारी हैं। कभी सोचा है कि ऐसे लोगों का सरगना कैसा होगा? क्या सच में वो स्वीट से डिंपल वाले गालों वाला मासूम लगता बच्चा सा ही कोई होगा? या फिर हकीकत कुछ और है?

‘इंडिया टुडे’ ने जिस इंटरव्यू को प्रसारित नहीं किया उसके बीच से ही शायद ये तस्वीरें निकल कर आई हैं। इनमें जो भंगिमा है वो किसी खलनायक के ‘आओ कभी हवेली पर’ वाले रूप की ही याद दिलाती हैं। सोचिये कि कभी कोई मासूम, क्यूट, थोड़े कम दुनियावी समझदारी वाले ‘डिम्पल बाबा’ थे भी, या असली विद्रूपता से सिर्फ नकाब उतर गया है? सोचियेगा जरूर, क्योंकि फ़िलहाल सोचने पर जीएसटी नहीं लगता।

गहन शोध के बाद अखिलेश का ख़ुलासा: भाजपा चाहती है कि रिफाइंड तेल में ही बनें पकौड़े

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने पकौड़ों पर रिसर्च करने के बाद कुछ नए ख़ुलासे किए हैं। उन्होंने भाजपा सरकार पर कुछ नए आरोप लगाते हुए कहा कि प्रधानमंत्री जानबूझ कर पकौड़ों की बात कर रहे हैं ताकि सरसों तेल को बर्बाद किया जा सके। एक इंटरव्यू के दौरान अपने ‘पकौड़ा ज्ञान’ को जनता तक पहुँचाते हुए सपा अध्यक्ष ने कहा:

“मैने बहुत अध्ययन किया और उसके बाद पता लगा कि पकौड़ा क्यों कहा प्रधानमंत्री जी ने? भाजपा ने इसीलिए कहा कि पकौड़े तलो क्योंकि वो चाहते हैं कि रिफाइन ऑइल (Edible Oil) जो आजकल आया है, उसका कारोबार बढ़ जाए, पकौड़े उसी में अच्छे बनते हैं जब उन्हें रिफाइंड तेल (Palm Oil) में तला जाए। ये भाजपा के लोग नहीं चाहते हैं कि पकौड़े सरसो के तेल में बनें। ये चाहते हैं कि पकौड़े पाम ऑइल में बनें। अगर पाम ऑइल का प्रयोग बढ़ेगा, तो भाजपा के कारोबारी मित्रों का व्यापार बढ़ेगा।”

अखिलेश यादव का ‘पकौड़ा ज्ञान’

उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री ने केंद्र सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा कि वे पकौड़ों के माध्यम से अपने कारोबारी मित्रों को फ़ायदा पहुँचाना चाहते हैं। बता दें कि कुछ महीनों पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विभिन्न प्रकार के छोटे-बड़े रोजगार के माध्यमों का उदाहरण देते हुए कहा था कि पकौड़े तलना भी एक व्यवसाय ही है, रोज़गार ही है। उनके इस बयान के बाद विपक्ष ने हंगामा बरपाते हुए पीएम पर बेरोज़गारों से पकौड़े तलवाने का आरोप लगाया था। विपक्ष का कहना था कि प्रधानमंत्री बेरोज़गारों को पकौड़े तलने की सलाह दे रहे हैं।

‘जो लोग हमें टोंटी-टोंटी कह रहे हैं, वही हैं चिलम वाले’: अखिलेश यादव के बिगड़े बोल

जहाँ एक तरफ लोकसभा चुनाव का महासंग्राम जारी है वहीं दूसरी तरफ नेताओं का बड़बोड़ापन भी अपने चरम पर है। समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने यूपी के गोंडा में बीजेपी पर निशाना साधते हुए प्रधानमंत्री पर वार किया है। उन्होंने कहा, “मुख्यमंत्री (योगी आदित्यनाथ) और उनके कुछ अधिकारियों ने प्रधानमंत्री मोदी जी को भी चिलम सिखा दिया।” इसके आगे उन्होंने कहा, “जो लोग हमें टोंटी-टोंटी कह रहे हैं, वही हैं चिलम वाले।”

ख़बर के अनुसार, प्रतापगढ़ के जीआईसी ग्राउंड में एक जनसभा को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने अखिलेश और मायावती पर जमकर निशाना साधा था। इस दौरान उन्होंने कहा था कि प्रदेश में बसपा के शासन में ताजमहल तक सुरक्षित नहीं था और अखिलेश राज में टोंटी असुरक्षित थी। इसके अलावा उन्होंने गठबंधन की पिछली सरकारों को घेरते हुए कहा था कि कॉन्ग्रेस और उसके साथी राज्य को स्थिर सरकार नहीं दे सकते।

ऐसा पहली बार नहीं है जब अखिलेश ने पीएम मोदी के ख़िलाफ़ हमलावर रुख़ अपनाया हो। टोंटी चिलम वाले बयान के बाद उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी 180 डिग्री के पीएम हैं, वो जो भी कहते हैं, ठीक उसका उलटा ही करते हैं। वे केवल 1% आबादी के ही प्रधानमंत्री हैं।

इससे पहले उन्होंने कहा था कि पीएम की भाषा बदल गई है क्योंकि पिछले चरणों में जो भी चुनाव हुए हैं उनमें बीजेपी को एहसास हो गया है कि वो पिछड़ रही है। वे विकास, किसानों की आय के बारे बात नहीं कर रहे हैं। पीएम सिर्फ़ लोगों को गुमराह करना चाहते हैं। एसपी-बीएसपी और आरएलडी ही फ़ैसला करेगी कि कौन अगली सरकार बनाने जा रहा है और देश का अगला प्रधानमंत्री होगा।


अब ‘जय श्री राम’ बोलने पर ममता की पुलिस आपको जेल में करेगी बंद, सत्य घटना, मजाक नहीं

पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के काफिले के सामने ‘जय श्री राम’ का नारा लगाने की वजह से तीन लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया। दरअसल, ममता बनर्जी शनिवार (मई 4, 2019) को पश्चिम बंगाल के चंद्रकोण की आरामबाग सीट पर चुनाव प्रचार के लिए एक रैली करने जा रही थीं। इस दौरान जब ममता बनर्जी का काफिला चंद्रकोण के करीब पहुँंचा तो कुछ लोग ‘जय श्री राम’ का नारा लगाने लगे। जिसे सुनकर ममता भड़क गई और काफिले को वहीं पर रुकवाकर गाड़ी से उतरी और उन लोगों पर बरस पड़ी। गुस्से से आगबबूला ममता बनर्जी ने वहाँ मौजूद लोगों पर गाली देने का आरोप लगाया। ममता ने इसके लिए सीधे तौर पर भाजपा को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि भाजपा जानबूझकर ऐसे लोगों को हमारे साथ गलत व्यवहार करने के लिए भेजती है।

इसके बाद ममता ने चंद्रकोण और घाटल में रैलियों के दौरान ये मुद्दा उठाते हुए कहा, “जो लोग इस तरह से नारेबाजी कर रहे हैं, होशियार रहें क्योंकि 23 मई को चुनाव का नतीजा आने के बाद उन्हें इसका अंजाम भुगतना पड़ेगा।” इसके साथ ही ममता ने जय श्री राम बोलने वालों को चेतावनी देते हुए कहा कि जो लोग इस तरह की नारेबाजी कर रहे हैं, उन्हें ये याद रखना चाहिए कि चुनाव के बाद भी उन्हें यहीं रहना है।

ममता बनर्जी का ये वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रहा है। भाजपा की बंगाल यूनिट ने भी इस वीडियो को ट्विटर पर शेयर करते हुए लिखा कि ‘दीदी’ जय श्री राम के नारों से इतना नाराज क्यों हैं और इन नारों को गाली क्यों बता रही हैं? हालाँकि, पश्चिम बंगाल पुलिस का कहना है कि इसके संबंध में कोई गिरफ्तारी नहीं हुई है, तीन लोगों को सीएम की सुरक्षा को लेकर जाँच की गई थी, जिन्हें बाद में छोड़ दिया गया।

बता दें कि, पश्चिम बंगाल के चंद्रकोण की आरामबाग लोकसभा सीट पर 6 मई को मतदान होने वाला है। मिदनापुर के अंतर्गत आने वाला यह इलाका तृणमूल कॉन्ग्रेस का सबसे मजबूत गढ़ माना जाता है। यहाँ से भाजपा के तपन कुमार रेय, कॉन्ग्रेस की ज्योति कुमारी दास और टीएमसी की आपरूप पोद्दार उम्मीदवार हैं।

हिंदू लड़की, मुस्लिम लड़का: शादी तभी करूँगी जब दुल्हा हिंदू धर्म अपनाए और शाकाहारी बने

‘मैं तेरे प्यार में क्या-क्या न बना दिलबर… जाने ये मौसम… जाने ये मौसम…’ फ़िल्म, ज़िद्दी का यह गीत प्यार के उस आलम को बयाँ करने में काफ़ी है जिसमें प्रेम करने वाले अपनी चाहत के लिए किसी भी हद से गुज़र जाने को तैयार रहते हैं। ऐसा ही एक मामला सामने आया है जो गुजरात के सूरत का है। यहाँ एक लड़की ने अपने प्रेमी से शादी करने पर दो ऐसी शर्तें रख दीं जिस पर हैरानी होना लाज़मी था।

ख़बर के अनुसार, सूरत में एक लड़की को मुस्लिम लड़के से प्यार हो जाता है, बात जब दोनों के घर तक पहुँचती है तो काफ़ी हो-हल्ला मच जाता है, जिससे बात बिगड़ जाती है। लेकिन, शायद एक सच यह भी है कि इश्क़ पर भला किसका ज़ोर होता है, इसलिए दोनों लिव इन रिलेशनशिप में रहना चाहते थे, लेकिन परिवार वालों को ये बात भी मंज़ूर नहीं थी। कोई रास्ता सूझता न देख दोनों घर से भाग गए। लड़की के लापता होने पर उसके परिजनों ने पुलिस थाने में शिक़ायत दर्ज की, जिसके बाद पुलिस ने तीन दिनों तक खोजबीन करके दोनों को ढूँढ़ निकाला।

पुलिस द्वारा पकड़े जाने के बाद भी दोनों एक-दूसरे के साथ शादी करना चाहते थे। लेकिन लड़की ने नज़दीकी थाने में हलफनामा दायर किया जिसके अनुसार वो अपने मुस्लिम प्रेमी से शादी तभी करेगी जब वो हिन्दू धर्म को स्वीकार करने के अलावा शाकाहारी भी बनेगा। इस शर्त को पढ़कर पुलिस भी हैरान थी, क्योंकि आज तक ऐसा मामला उनके समक्ष पहले कभी नहीं आया था।

इसके अलावा लड़की के हलफ़नामे में एक एग्रीमेंट का भी उल्लेख किया गया था जिसके अनुसार मुस्लिम लड़के को अपने घरवालों की मौजूदगी में हिंदू धर्म अपनाना होगा। साथ ही इस बात पर भी ज़ोर दिया कि भविष्य में वो फिर कभी मुस्लिम नहीं बनेगा।

SC में केंद्र सरकार ने कहा: PMO द्वारा राफेल सौदे की निगरानी करना सही था

राफेल डील को लेकर दाखिल पुनर्विचार याचिका पर केंद्र सरकार ने शनिवार (मई 4, 2019) को सुप्रीम कोर्ट में जवाबी हलफनामा दाखिल किया। केन्द्र सरकार ने हलफनामे में कहा है कि प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा राफेल सौदे की निगरानी को किसी भी तरह से हस्तक्षेप के रूप में नहीं देखा जा सकता है। इसे पैरलल निगोशियेशन या दखल नहीं कहा जा सकता है। केंद्र ने हलफनामे में कहा है कि पुनर्विचार याचिकाओं पर आगे की सुनवाई का कोई आधार नहीं हैं। ऐसे में सभी याचिकाएँ खारिज की जानी चाहिए। सरकार ने कहा है कि सुरक्षा संबंधी गोपनीय दस्तावेजों के इस तरह सार्वजनिक खुलासे से देश के अस्तित्व और संप्रभुता पर खतरा है। इस मामले पर अगली सुनवाई 6 मई को होगी।

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने 14 दिसंबर 2018 को दिए गए अपने आदेश में राफेल डील को तय प्रक्रिया के तहत होना बताया था और सरकार को क्लीन चिट दी थी। अदालत ने इस फैसले में फ्रांस से 36 राफेल लड़ाकू विमान खरीदने के सौदे को चुनौती देने वाली सारी याचिकाएँ खारिज कर दी थीं। कोर्ट ने कहा था कि इस रक्षा सौदे में अदालत के दखल या जाँच की जरूरत नहीं है।

इसके बाद यशवंत सिन्हा, अरुण शौरी और प्रशांत भूषण ने 2 जनवरी 2019 को अखबार में छपे आर्टिकल के आधार पर सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिकाएँ दाखिल की थीं। हालाँकि, केंद्र सरकार ने लीक हुए गोपनीय दस्तावेज को पिटिशन के साथ पेश किए जाने पर ऐतराज जताया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 10 अप्रैल को उसे खारिज करते हुए कहा था कि वह लीक दस्तावेज के आधार पर रिव्यू पिटिशन सुनेगा।