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पैगंबर मुहम्मद एक व्यापारी थे… BJP के सत्ता में रहते मैं भारत नहीं आऊँगा: भगोड़ा ज़ाकिर नाइक

न्यूज़ पोर्टल ‘द वीक’ को दिए गए इंटरव्यू में ज़ाकिर नाइक ने कहा है कि जब तक भाजपा सत्ता में है, तब तक वह भारत नहीं आएगा। इस्लामिक उपदेशक ज़ाकिर ने नम्रता आहूजा को दिए गए इंटरव्यू में कहा कि आज का मीडिया ‘जिहाद’ शब्द का ग़लत प्रयोग कर रहा है। इसका अर्थ बुराई के ख़िलाफ़ संघर्ष करना होता है जबकि मीडिया में इसे ‘पवित्र युद्ध’ की तरह पेश किया जा रहा है। ज़ाकिर के अनुसार, ‘पवित्र युद्ध (Holy War)’ का कॉन्सेप्ट कई सौ साल पहले आया था, जब ईसाईयों ने अपने धर्म को फैलाने के लिए ज़ोर-ज़बरदस्ती की और हज़ारों लोगों के ख़ून बहाए। ज़ाकिर नाइक ने इस दौरान कॉन्ग्रेस से अपने संबंधों से जुड़े सवालों के भी जवाब दिए। उसने कहा कि वह पिछले कुछ सालों से भारत में चल रही राजनीतिक गतिविधियों से अनजान है। ज़ाकिर के अनुसार, पैगंबर मुहम्मद भी एक व्यापारी थे और ऐसा कहीं नहीं लिखा है कि एक उपदेशक व्यापारी नहीं हो सकता।

ज़ाकिर नाइक ने ‘द वीक’ को बताया कि उसे अपनी लोकप्रियता की वजह से कई भारतीय नेताओं व मंत्रियों से मिलने का मौक़ा मिला है। उसे हैदराबाद में आतंक-रोध पर आयोजित सेमीनार में बोलने का मौक़ा मिला और उसे आईपीएस अधिकारियों को सम्बोधित करने का मौक़ा मिला, इसे कॉन्ग्रेस के ख़िलाफ़ नहीं देखा जाना चाहिए। ज़ाकिर ने मोदी के बारे में कहा कि क्या वो उन सभी देशों को आतंक समर्थक मानते हैं, जिन्होंने उसे अपने यहाँ प्रवचन करने को बुलाया? उसने कहा कि सऊदी के किंग सलमान ने उसे इस्लामिक वर्ल्ड का सबसे बड़ा अवॉर्ड दिया। दुबई के शासक शेख मोहम्मद ने उसे ‘साल के सर्वश्रेष्ठ व्यक्तित्व’ का अवॉर्ड दिया, ज़ाकिर ने पूछा कि क्या मोदी इन सभी पर आरोप लगाएँगे?

‘द वीक’ पत्रिका ने लिया ज़ाकिर नाइक का इंटरव्यू (साभार: The Week)

ज़ाकिर ने कहा कि मोदी सिर्फ़ दिग्विजय पर ही क्यों आरोप लगा रहे हैं, दिग्विजय सिंह मेरे मित्र नहीं हैं। उसने कहा कि मोदी वोट बैंक के लिए ऐसा कर रहे हैं। ज़ाकिर ने कहा कि मोदी को यह जानना चाहिए कि कई देशों के राष्ट्राध्यक्षों के पास उनकी सीडी और डीवीडी पड़ी हुई हैं, तो मोदी सिर्फ़ यह क्यों कहते हैं कि उसे देखने के बाद लोग आतंकी बनते हैं। ज़ाकिर ने कहा कि मोदी को यह भी कहना चाहिए कि उसे देखने के बाद लोग प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति बनते हैं। ज़ाकिर ने कहा कि फेसबुक और सोशल मीडिया पर उसके करोड़ों फैंस हैं और उसमें 100% सही नहीं हो सकते, कुछ ग़लत भी होते हैं। उसने अपने ख़िलाफ़ प्रवर्तन निदेशालय के आरोपों को वोट बैंक की राजनीति बताया। ज़ाकिर नाइक ने कॉन्ग्रेस को लाखों रुपए देने की बात स्वीकारी। उसने दावा किया कि वह भाजपा को भी कई बार वित्तीय मदद दे चुका है।

ज़ाकिर नाइक ने ‘द वीक’ को कहा कि उसे सिर्फ़ इसीलिए निशाना बनाया जा रहा है क्योंकि सभी उपदेशकों में वह सबसे ज्यादा लोकप्रिय है और उसके वीडियोज सबसे ज्यादा देखे जाते हैं – सभी हिन्दू, ईसाई और मुस्लिम प्रवचनकर्ताओं में। उसने कहा कि उसे भारत सहित कई देशों की सरकारों द्वारा शांति का प्रचार करने और आतंकवाद के ख़िलाफ़ बोलने के लिए बुलाया जाता रहा है। उसने दावा किया कि उसे ‘नेशनल अकादमी ऑफ पुलिस, हैदराबाद’ द्वारा 2009 एवं 2013 में आमंत्रित किया जा चुका है। उसने कहा कि इस्लाम के कुछ दुश्मन सम्प्रदाय विशेष के लोगों को बहका कर आतंकी बना रहे हैं ताकि इस्लाम को बदनाम किया जा सके।

बंगाल बदहाल: सिर्फ 9 सीटों पर निर्वाचन के लिए 700+ केंद्रीय सुरक्षा बलों की कंपनियों की तैनाती

लोकसभा निर्वाचनों के अंतिम दौर में हर दल बेशक अपनी सारी ताकत झोंक देगा और कोई पार्टी किसी भी पैंतरे से पीछे नहीं रहेगी, पर बंगाल के हाल जितने बदतर हो रहे हैं, वहाँ की एक अलग ही दास्ताँ है। जहाँ जम्मू-कश्मीर जैसे आतंकवादियों से भरे पड़े प्रांत में मोटा-मोटी शांतिपूर्ण मतदान हो गया, वहीं बंगाल ने इस बार हिंसा और हत्या की हर हद को पार कर दिया है। पैंतीस साल के कॉमरेड राज में बने भय के सारे रिकॉर्ड ममता बनर्जी के 8 साल के (कु)शासन में टूटते दिख ही रहे थे। ऊपर से निर्वाचन प्रक्रिया ने ममता के जंगल राज पर मुहर लगा दी है, सो अलग। आलम यह है कि बंगाल में महज 9 सीटों पर मतदान के लिए 700 से ज्यादा कम्पनियाँ केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती होगी।

हिंसा का (ज्यादा पुराना नहीं) इतिहास

बंगाल में निर्वाचन के नाम पर हिंसा का जो नंगा-नाच हो रहा है, उसकी भयावहता का ठीक-ठाक अंदाजा शायद हमारे न्यूज़ रूम से या आपके ड्रॉइंग रूम में बैठकर नहीं लगाया जा सकता। कानून व्यवस्था लगभग ध्वस्त है, और ममता बनर्जी का सम्प्रदाय विशेष का तुष्टिकरण और तृणमूल कॉन्ग्रेस के गुंडों को खुली छूट देना राज्य को चक्की के दो पाटों में पीस रहा है।

ममता बनर्जी का फोटोशॉप कार्टून बनाने पर युवती की गिरफ़्तारी और श्रीराम के जयघोष पर गिरफ़्तारी तो आपके जेहन में ताज़ा ही होंगे। साथ ही याद दिला दें कि इसी लोकसभा के निर्वाचन के बीच में बंगाल में भाजपा कार्यकर्ता पर बम मारा गया है, निर्वाचन आयोग द्वारा तैनात अधिकारी दिनदहाड़े लापता हो गए, और आयोग के विशेष पर्यवेक्षक का कहना है कि बंगाल 15 साल पहले का बिहार बनता जा रहा है जहाँ जंगलराज चलता था

BJP ने बंगाल EC को बताया TMC का दलाल, नहीं उतरने दिया अमित शाह का हैलीकॉप्टर

पश्चिम बंगाल की राजनीति एक बार फिर से गरमा गई है। राज्य में लगातार मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग करने के आरोप लगते रहे हैं। अब भाजपा अध्यक्ष अमित शाह से जुड़ा होने के कारण मामला और भी बड़ा हो गया है। दरअसल, जाधवपुर में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के हेलीकॉप्टर को उतरने की इजाज़त नहीं दी गई, जिससे उनकी रैली भी रद्द करनी पड़ी। इसके बाद प्रदेश भाजपा में भूचाल आ गया और सभी कार्यकर्ताओं व पार्टी पदाधिकारियों ने तृणमूल कॉन्ग्रेस सहित राज्य के प्रशासन पर जम कर निशाना साधा। भाजपा ने कहा कि पश्चिम बंगाल राज्य चुनाव आयोग तृणमूल कॉन्ग्रेस की दलाली करने में लगा हुआ है। भाजपा ने राज्य चुनाव आयोग के दफ़्तर के सामने बड़ी संख्या में विरोध प्रदर्शन किया।

भाजपा के राष्ट्रीय सचिव सुनील देवधर ने अपना विरोध जताते हुए कहा:

“पुलिस, प्रशासन, जिला अधिकारी रत्नाकर राव, तृणमूल कॉन्ग्रेस (टीएमसी) के दलाल बन चुके हैं। राज्य चुनाव आयोग पक्षपात कर रही है और टीएमसी की दलाली कर रही है। पश्चिम बंगाल में गणतन्त्र नहीं, दीदी का गुण्डातन्त्र चलता है! विश्व के सबसे बड़े राजनीतिक दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष को ममता बनर्जी के बंगाल में जनसभा करने की इजाज़त नहीं है! यहाँ पुलिस-प्रशासन के ऊपर ममता जी का भाषण भारी पड़ता है। अमित शाह जी को रैली के लिए परमिशन देने के बाद इसे अंतिम समय में कैंसल कर दिया गया। इसके अलावा दक्षिण कोलकाता में योगी आदित्यनाथ की रैली के लिए भी इजाज़त नहीं दी गई।”

भाजपा ने कहा कि तृणमूल कॉन्ग्रेस लगातार अलोकतांत्रिक माध्यमों का प्रयोग कर रही है और राज्य चुनाव आयोग मूकदर्शक बन कर रह गया है। भाजपा मीडिया प्रमुख और राज्यसभा सांसद अनिल बलूनी ने पार्टी के रुख को स्पष्ट करते हुए कहा कि विरोध प्रदर्शन किया जाएगा और चुनाव आयोग में शिकायत भी दर्ज कराई जाएगी। उन्होंने बताया कि राज्य प्रशासन ने आखिरी समय पर अमित शाह के हैलीकॉप्टर को लैंड करने की इजाज़त नहीं दी। वैसे इससे पहले भी भाजपा नेताओं के हैलीकॉप्टर को लैंडिंग की इजाज़त नहीं दी गई थी। 21 जनवरी को शाह के हैलीकॉप्टर को लैंड होने की परमिशन नहीं मिली थी। उसके बाद उन्हें रैली स्थगित करनी पड़ी थी। उन्होंने 22 जनवरी को मालदा में रैली की थी।

तृणमूल कॉन्ग्रेस ने इस पूरे प्रकरण पर अपने किरदार को नकार दिया और दावा किया कि भाजपा ने ख़ुद से यह रैली रद्द कर दी क्योंकि जाधवपुर में लोगों को भीड़ नहीं जुटी थी। ममता सरकार में मंत्री पार्थ चटर्जी ने कहा कि भाजपा को रैली के फ्लॉप होने का डर था। अमित शाह ने इस पूरे घटनाक्रम पर टिप्पणी करते हुए कहा कि उनकी दूसरी जनसभा जहाँ पर थी, वह ममता बनर्जी के भतीजे की सीट है, इसीलिए उन्हें वहाँ जाने से रोक दिया गया। पश्चिम बंगाल की एक अन्य रैली में शाह ने ममता व उनके भतीजे अभिषेक पर निशाना साधा। शाह ने ‘जय श्री राम’ का उद्घोष करते हुए ममता को उन्हें गिरफ़्तार करने की चुनौती दी।

अमित शाह ने तृणमूल सुप्रीमो ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक पर निशाना साधते हुए कहा कि बंगाल में सिंडिकेट टैक्स को भतीजा टैक्स में बदल दिया गया है। उन्होंने कहा कि अगर हमें बंगाल का गौरव वापस लाना है तो हमें तृणमूल कॉन्ग्रेस सरकार को हटाना होगा जो घुसपैठियों को शरण दे रही है।

‘सावरकर का भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में कोई योगदान नहीं’, राजस्थान सरकार ने बदला पाठ्यक्रम

क्या विनायक दामोदर सावरकर एक देशभक्त नहीं थे? जहाँ ब्रिटिश राज में कई ऐसे भी नेता थे जिन्हें जेल में कई प्रकार की सुविधाएँ दी जाती थीं, वीर सावरकर को अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह में ऐसे जेल में रखा गया था, जिसे कालापानी की सजा की संज्ञा दी गई थी और जहाँ तरह-तरह की यातनाएँ भी दी जाती थीं। अब राजस्थान सरकार की नज़र में वीर सावरकर देशभक्त नहीं थे। राज्य सरकार द्वारा वीर सावरकर को ‘ब्रिटिश से माफ़ी माँगने वाला’ बताया गया है और उनके योगदानों से छेड़छाड़ की गई है। राजस्थान में अशोक गहलोत के नेतृत्व में कॉन्ग्रेस की सरकार चल रही है और सत्ता में आते ही ऐसे कई बदलाव किए जा रहे हैं, जिससे भाजपा को नीचा दिखाया जा सके, लेकिन इस चक्कर में स्वतंत्रता सेनानियों का भी अपमान किया जा रहा है।

वीर सावरकर वाले पाठ से कॉन्ग्रेस ने किया छेड़छाड़

राजस्थान के शिक्षा मंत्री गोविन्द सिंह डोटासरा ने अपनी सरकार के इस निर्णय को सही ठहराते हुए कहा, “पाठ्यक्रम की पुस्तकों में वीर सावरकर जैसे लोगों की प्रशंसा की गई थी, जिन्होंने देश के स्वतंत्रता संग्राम में कोई योगदान नहीं दिया। जब हमारी सरकार ने सत्ता संभाली, तब पुस्तकों में पढ़ाई जा रहीं इन चीजों का विश्लेषण करने के लिए एक समिति बनाई गई, जिसके बाद पुख्ता सबूतों के आधार पर ये बदलाव किए गए।” विडंबना यह कि शिक्षा मंत्री ने अपने बयान में सावरकर के नाम के साथ ‘वीर’ विशेषण भी प्रयोग किया और यह भी कहा कि देश को स्वतंत्र कराने में उनका कोई योगदान नहीं है। बता दें कि अंग्रेजों से लगातार लड़ते रहने के कारण और कालापानी की कठिन सजा झेलने के कारण सावरकर को वीर कहा जाता है। सावरकर प्रखर हिंदूवादी थे।

भाजपा सरकार के दौरान वीर सावरकर वाले पाठ में उन्हें एक महान स्वतन्त्रता सेनानी बताते हुए उनके क्रन्तिकारी जीवन पर प्रकाश डाला गया था। भाजपा की पिछली सरकार द्वारा तय किए गए पाठ्यक्रम में मुगल शासकों को सामूहिक हत्यारा कहा गया था और हिंदू शासकों के युद्धों को विशेष रूप से वर्णित किया गया था। कॉन्ग्रेस ने राज्य में सत्ता में आने के साथ ही घोषणा की थी कि भाजपा द्वारा तय किए गए पाठ्यक्रम में बदलाव किया जाएगा। छात्रों को जो नई पुस्तकें दी जा रही हैं, उनमें वीर सावरकर की जीवनी में इस बात को जोड़ दिया गया है कि सेल्यूलर जेल में अंग्रेजों की यातनाओं से वह इतने तंग आ गए थे कि उन्होंने 4 बार अंग्रेजों से माफ़ी माँगी थी। आगे बताया गया है कि बाद में सावरकर अंग्रेजों के साथ काम करने के लिए तैयार भी हो गए थे।

भाजपा नेताओं ने सावरकर वाले पाठ के साथ छेड़छाड़ करने पर आक्रोश जताया है। राजस्थान के शिक्षा मंत्री ने यह भी कहा कि सावरकर को केवल और केवल राजनीतिक फायदों के लिए पाठ्यक्रम में काफ़ी मजबूती से पेश किया गया था। उन्होंने कहा कि भाजपा ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा को आगे बढ़ाने के लिए सावरकर को महान बताया था। इससे पहले छत्तीसगढ़ की कॉन्ग्रेस सरकार पंडित दीन दयाल उपाध्याय के नाम पर चल रही योजनाओं के नाम बदलने को लेकर भी ख़बरों आई थी। सरकारी डाक्यूमेंट्स पर लगे उनके फोटोज भी हटा दिए गए थे।

रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल पनाग करेंगे मोदी की अगली सरकार के खिलाफ ‘इंकलाब’?

पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल हरचरणजीत सिंह पनाग ने सोशल मीडिया पर बहुत ही बेतुकी बात लिखी है। अपने ट्विटर अकाउंट पर उन्होंने मोदी को हटाने के लिए ‘तख्तापलट’ (coup) की बात करने वाले एक ट्वीट का जवाब देते हुए ‘इंकलाब!’ लिख दिया। इसे ट्विटर पर मोदी सरकार के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह को उनकी सहमति माना जा रहा है।

पहले कहा ‘इंकलाब’, बाद में ‘राजनीतिक इंकलाब’

राहुल शर्मा (s24_rahul) नामक एक ट्विटर यूजर ने ट्वीट किया था कि अगर मोदी दोबारा चुनाव जीत गए तो उन्हें हटाने के लिए विद्रोह, यहाँ तक कि तख्तापलट करना होगा। इसके जवाब में जनरल पनाग ने लिखा, “इंकलाब!”

इसे ट्विटर पर अधिकाँश लोगों ने देश में लोकतान्त्रिक तरीके से आ रहे संभावित जनादेश के खिलाफ विद्रोह माना। और पनाग की आलोचना शुरू हो गई। ट्विटर पर कई लोगों ने उनकी आलोचना शुरू कर दी।

जब मामला बढ़ने लगा तो परम विशिष्ट सेवा मेडल से नवाजे जा चुके जनरल साहब रक्षात्मक मुद्रा में आ गए। उन्होंने वह ट्वीट डिलीट कर दिया। साथ ही सफाई देनी शुरू कर दी कि उनका वह मतलब नहीं था जो समझा और प्रसारित किया जा रहा है। उनका अर्थ हिंसात्मक विद्रोह नहीं, राजनीतिक इंकलाब से था।

पहले भी कर चुके हैं सेना का राजनीतिकरण

जहाँ अधिकाँश राजनीतिक दल और मीडिया भी सेना का सीधे-सीधे राजनीतकरण करते दिखने से बचते हैं, लेफ्टिनेंट जनरल पनाग पहले भी सेना के मुद्दे पर, वह भी जवानों की मृत्यु पर, राजनीतिक भाषा और शैली वाले ट्वीट कर चुके हैं। लगभग डेढ़ साल पहले (अक्टूबर 2017 में) अरुणाचल के हेलीकॉप्टर हादसे में मारे गए वायुसेना के जवानों के शवों को लेकर जनरल पनाग ने भ्रामक ट्वीट किया था। उन्होंने अपने ट्वीट से ऐसा जताने की कोशिश की थी मानो सरकार अपनी मर्जी से या कंजूसी में बलिदानी जवानों के शव कार्डबोर्ड के डब्बों में भरकर ला रही है। जबकि सच्चाई यह थी कि ऐसा अरुणाचल के बिगड़ते मौसम की मजबूरियों के चलते किया गया था। हालाँकि कुछ समय में एक अन्य रिटायर्ड सैन्यकर्मी ने ही जनरल पनाग को सोशल मीडिया पर स्पष्टीकरण दे दिया, लेकिन तब तक स्वाति चतुर्वेदी जैसे ट्रॉलों को ताली बजाने का मौका मिल चुका था।

Infosys फाउंडेशन का रद्द हुआ रजिस्ट्रेशन, पिछले कुछ सालों से नहीं दिया था वार्षिक ब्यौरा

गृह मंत्रालय ने बेंगलुरु स्थित गैर सरकारी संगठन इंफोसिस फाउंडेशन का रजिस्ट्रेशन रद्द कर दिया है। एनजीओ इंफोसिस फाउंडेशन के खिलाफ विदेशी अनुदान प्राप्त करने में नियमों का उल्लंघन करने का आरोप है। दरअसल, विदेशों से सहायता लेने वाले सभी गैर-सरकारी संगठनों को विदेशी योगदान अधिनियम (एफसीआरए) के तहत रजिस्ट्रेशन करवाना आवश्यक होता है। सुधा मूर्ति इंफोसिस फाउंडेशन की चेयरपर्सन हैं।

एफसीआरए के दिशा-निर्देशों के अनुसार, रजिस्टर्ड संगठनों को प्रत्येक वित्तीय वर्ष के समाप्त होने के बाद 9 महीने के भीतर आय-व्यय विवरण, रसीदें और भुगतान खाता, बैलेंस शीट, आदि की स्कैन की गई प्रतियों के साथ ऑनलाइन वार्षिक रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होती है। मगर इंफोसिस ने पिछले कुछ सालों से विदेश से आने वाली अनुदान राशि के बारे में कोई भी जानकारी सरकार को नहीं दी। इस संबंध में संगठन से कई बार जानकारी माँगी गई, लेकिन इंफोसिस की तरफ से कोई जवाब नहीं आया। जिसके बाद गृह मंत्रालय की तरफ से 2018 में फाउंडेशन को कारण बताओ नोटिस भी जारी किया गया था। बार-बार रिमाइंडर भेजने के बाद भी संगठन की तरफ से कोई जवाब ना आने के बाद ये फैसला लिया गया।

वहीं, इस बारे में इंफोसिस फाउंडेशन का कहना है कि संगठन ने खुद गृह मंत्रालय से एफसीआरए पंजीकरण को रद्द करवाने के लिए ओवदन किया था। जिसके बाद गृह मंत्रालय ने यह कार्रवाई की। वर्ष 1996 से शिक्षा, ग्रामीण विकास, स्वास्थ्य सेवा, कला और संस्कृति आदि क्षेत्रों में काम कर रहे फाउंडेशन के जन संपर्क अधिकारी ऋषि बसु ने कहा कि 2016 में एफसीआरए में किए गए संशोधन के बाद उनका संगठन इस अधिनियम के दायरे में नहीं आता। ऋषि बसु ने कहा कि उन्होंने मंत्रालय से संपर्क कर इस पर विचार करने के लिए कहा था और उनका अनुरोध स्वीकार करने के लिए वो मंत्रालय को धन्यवाद देते हैं।

बड़ा ख़ुलासा: ‘BJP सांसद की हत्या का प्रयास करने वालों में 90% सम्प्रदाय विशेष से; प्रशासन व मीडिया ने छिपाया’

बिहार के पश्चिम चम्पारण लोकसभा क्षेत्र के सांसद संजय जायसवाल पर हमले के पीछे कुछ ऐसा है, जो मीडिया आपसे छिपा रहा है। मेनस्ट्रीम मीडिया में कहीं भी इस ख़बर की सच्चाई नहीं है। घटना के दोषियों के बारे में ‘स्थानीय लोग’ और ‘एक पक्ष’ लिख कर या तो उनकी पहचान छिपाने की कोशिश हो रही है या फिर सांसद व उनके पक्ष के दावों को छिपाया जा रहा है। इस सम्बन्ध में ऑपइंडिया ने जब सांसद को कॉल किया, तो उधर से बताया गया कि जिस बूथ पर उन पर ये हमला हुआ, उस भीड़ में 90% सम्प्रदाय विशेष से थे। मीडिया में इसे ‘सांसद पर हमला’ के रूप में प्रचारित किया गया, लेकिन सांसद जायसवाल के फेसबुक पोस्ट को देखने के बाद भी इस बात की पुष्टि होती है कि हमला करने वाले कौन लोग थे? लेकिन, सबसे पहले मामले को सिरे से जानते हैं कि क्या हुआ और कहाँ हुआ?

सांसद पर हमले के बाद क्षतिग्रस्त गाड़ी, जम्मू-कश्मीर की तरह की गई पत्थरबाज़ी

रविवार (मई 12, 2019) को बिहार के चम्पारण में लोकसभा चुनाव के छठे चरण के तहत मतदान चल रहा था। इस दौरान सांसद भी सभी बूथ पर घूम-घूम कर (प्रत्याशी को मिलने वाले अनुमति के तहत) चुनाव प्रक्रिया को देख रहे थे। तभी उन्हें सूचना मिली कि नरकटिया के बूथ संख्या 162 पर भाजपा समर्थकों को पिटाई की जा रही है। सांसद जब वहाँ पर पहुँचे और उन्होंने पूछताछ शुरू की तो भीड़ उग्र हो गई। फिर क्या था, कश्मीर में पत्थरबाज़ी के तर्ज पर सांसद पर हमला किया गया। आजतक ने अपने वीडियो में भी इस बात की पुष्टि की है कि लोग दीवार के पास खड़े होकर बड़े-बड़े पत्थर फेंक रहे हैं। सांसद ने कहा कि ऐसी स्थिति आ गई थी, जिसमें उनकी व उनके साथ जो हिन्दू समाज के लोग थे, उनकी हत्या की जा सकती थी।

इस हमले में सांसद बाल-बाल बचे और कई समर्थकों को चोटें आईं। कई भाजपा समर्थक घायल भी हुए। संजय जायसवाल के आरोप गंभीर हैं। उनके अनुसार, माहौल ऐसा हो गया था कि अगर उनके गार्ड ने गोली नहीं चलाई होती तो शायद उनकी हत्या भी हो सकती थी। सांसद को वहाँ काफ़ी देर तक बंधक बना कर भी रखा गया। पुलिस के पहुँचने के बाद भी जायसवाल को पीटने के लिए भीड़ उतारू थी, लेकिन उन्हें किसी तरह सुरक्षित जगह पर पहुँचाया जा सका। इस बारे में अधिक जानकारी देते हुए संजय जायसवाल ने मीडिया पर कुछ बड़े आरोप लगाए हैं। उनके कई घायल समर्थक अभी भी असपताल में भर्ती हैं। जायसवाल ने कहा:

सबसे दुःखद स्थिति यह रही कि अगर यही घटना किसी ऐसे बूथ पर घटी होती जहाँ 10% अल्पसंख्यक हों और 90% बहुसंख्यक हो तो अभी देश का सारा मीडिया 7 दिनों तक मोदी जी को कोस रहा होता। सबसे दुःखद स्थिति तो मोतिहारी जिला प्रशासन की है। उनके डीएसपी की गाड़ी पत्थरबाज़ी कर के पूरी तरह से तोड़ दी गई, एसडीएम की गाड़ी तोड़ दी गई। इन सबके बावजूद भी प्रशासन इसका जिक्र करने को भी तैयार नहीं है। 3 घंटे तक मुझे झूठा आश्वासन दिया गया कि केंद्रीय बलों के जवान आ रहे हैं। मुझे बताया गया कि पूर्वी चंपारण के एसपी, डीएम आ रहे हैं। जबकि, एसपी और डीएम अपने घरों में बैठे हुए थे। हाँ,अस्पताल में यह दोनों 3 घंटे जरूर खड़े रहे।

सांसद संजय जायसवाल कोई नए-नवेले नेता नहीं हैं। उनके पिता मदन प्रसाद जायसवाल तीन बार बेतिया लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। ख़ुद संजय भी 2009 और 2014 में पश्चिम चम्पारण लोकसभा क्षेत्र (नए परिसीमन के बाद बेतिया लोकसभा क्षेत्र नहीं रहा) से जीत दर्ज कर चुके हैं। ज़िले में इतना बड़ा क़द रखने के बावजूद अगर उनकी हत्या की नौबत आ जाती है और हमलावरों की भीड़ में समुदाय विशेष के होने की बात मीडिया एवं प्रशासन द्वारा छिपाई जाती है (सांसद के दावे के अनुसार), तो यह एक बहुत ही गंभीर मामला है।

एक झूठ को 100 बार बोलकर सच करने का छल: JNU के कपटी कम्युनिस्टों की कहानी, भाग-3

किसी झूठ को एक बार कहिए। आपकी पिटाई हो सकती है, निंदा तो होगी ही। उसी झूठ को 10 बार कहिए। आपकी निंदा तो होगी, लेकिन कुछ लोग होंगे जो आपके झूठ को सच मानने लगेंगे। अब उसी झूठ को किसी कपटी कम्युनिस्ट की तर्ज पर 100 या हज़ार बार बोलिए। समाज में वह झूठ तो सच के तौर पर स्थापित होगा ही, बहुत छोटा तबका ही ऐसा होगा जो व्यभिचारी वामपंथियों का सच समझ सके, उनको नकार दे, पूरी तरह।

कम्युनिस्टों का सबसे बड़ा योगदान क्या है, मानवता में? बर्बादी, चौतरफा बर्बादी, तबाही, भुखमरी व नरसंहार।

आप इतिहास देख लीजिए। पूर्व सोवियत संघ से शुरू कीजिए, चीन से होते हुए, क्यूबा, वेनेजुएला होते हुए बंगाल व केरल तक आ जाइए। ये ऐसे दुष्ट हैं कि जहाँ गए, उसको पूरी तरह बर्बाद कर दिया, मनुष्यता को रोने लायक नहीं छोड़ा, मानवता पर आठ आँसू बहाने वाला कोई नहीं बचा।

हालाँकि, और यही हालाँकि महत्वपूर्ण है। आज भी नैरेटिव क्या है? कि, कम्युनिस्ट वे होते हैं, जो समाज की बराबरी के लिए काम करते हैं, दुनिया में सबके हको-हुकूक का झंडा बुलंद करते हैं, धर्मनिरपेक्ष समाज की स्थापना करते हैं, वगैरा-वगैरा। यह नैरेटिव ठीक उसी तरह का है, जैसे इस देश के प्रथम प्रधानमंत्री ‘दुर्घटनावश हिंदू’ जवाहरलाल नेहरू ने इस देश को आधुनिक, विकासमान और महान बनाने का काम किया, जबकि इस देश में भ्रष्टाचार का विष-वृक्ष बोने वाले, निर्लज्ज वंशवाद के संस्थापक, हमारे राष्ट्र को हिंदू-विरोध में फिर से इस्लामिक बनाने की ओर धकेलने वाले अपने नेहरू चाचा ही थे।

उसी तरह का एक और नैरेटिव है कि नक्सली दरअसल गरीबी से लड़ने वाले आदिवासी-वंचित, शोषित-पीड़ित आदि-इत्यादि हैं। उसी तरह कम्युनिस्टों ने एक और नैरेटिव यह बनाया है कि वे बहुत पढ़े-लिखे, बल्कि इस दुनिया के एकमात्र पढ़े-लिखे लोग और जमात के प्रतिनिधि हैं, जो गलती से इस दीन-हीन देश को सौभाग्य पहुँचाने आ गए हैं। वे सत्य के अंतिम प्रतिनिधि से लेकर अल्लाह या जीसस तक कुछ भी हो सकते हैं।

अब देखिए सच क्या है? सच यह है कि कपटी कम्युनिस्टों ने हमेशा इस देश को बाँटने का काम किया है, तोड़ने का काम किया है और झूठ को, कोरे-सफेद झूठ को स्थापित किया है, उसके बाद कूड़े की तरह लिखे कुछ को भी विश्व-साहित्य का महान तत्व निरूपित कर दिया है।

शुरुआत के लिए यही देखें कि वामपंथी उपन्यासकारों – रोमिला, इरफान से लेकर बिपन चंद्र और मुखर्जी तक ने – यह बात बकायदा हम सबको बताई कि आर्यों ने बाहर से आकर इस देश के ‘मूलनिवासियों’ के साथ धोखाधड़ी की। हालाँकि, ये सभी द्वितीयक शोध या भाषा संबंधी उलटबाँसी का परिणाम है, किसी भी उपन्यासकार ने पुरातत्व या प्राथमिक शोध की मदद लेने की जहमत नहीं उठाई।

अब पूरी दुनिया में वह मिथ ध्वस्त हो चुका है, लेकिन आपके पाठ्य-पुस्तकों में वही कूड़ा फैलाया जा रहा है, आपकी कई पीढ़ियों को तो उसी जूठन से लाद दिया गया।

व्यभिचारी वामपंथियों ने अपने कूड़ा-लेखन की मदद से रामायण और महाभारत को मिथक बना दिया, पुराणों को इतिहास-बाह्य करार दिया, हम शुतुरमुर्ग हिंदू पागलों की तरह अपने राम और कृष्ण का ही ‘प्रमाण’ लेने लगे। आत्मघाती जो हैं।

उन्होंने सरस्वती नदी की गाथा को कल्पित सिद्ध कर दिया, पूरी सभ्यता को ही 4000 वर्षों में कसने लगे, अपने यूरोपीय आकाओं की मदद से, जिनका उच्छिष्ट खाकर ये कपटी कम्युनिस्ट और कुकर्मी कॉन्ग्रेसी जीवित रहे, इस देश को लूटते रहे, अब, आप तमाम सबूत इनके मुँह पर मारते रहिए, इनका झूठ दानवाकार बन आपके ही मुँह पर अट्टहास करता रहेगा।

है कोई रणनीति? इनसे निबटने के लिए कभी सोचा भी है, अकादमिक स्तर पर? इस जहर को काटने का कभी ख्याल भी आया है?

लेख का दूसरा हिस्सा यहाँ पढ़ें।
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— व्यालोक पाठक

‘फैक्ट-चेकर’ ने छिपाया फैक्ट, मीडिया गिरोह ने फैलाया झूठ: मोदी इंटरव्यू पर प्रतीक सिन्हा की ‘नंगई’

स्वघोषित ‘फैक्ट-चेकर’ प्रतीक सिन्हा आजकल इतने रौले में हैं कि वह झूठ ही नहीं, सामान्य से सच का भी फैक्ट-चेक करने लगे हैं। सच को भी ऐसे ‘रहस्यात्मक’ अंदाज में ट्वीट करते हैं जैसे कोई बहुत बड़ा ‘खुलासा’ कर रहे हों। मोदी के न्यूज़ नेशन को दिए इंटरव्यू पर भी उन्होंने यही ‘कला’ आजमाने की कोशिश की। बिना कोई सीधा दावा या हमला किए ऐसे दिखाया मानो इंटरव्यू में सवाल पहले से तय होना कोई दबा-छुपा गुप्त रहस्य था, कोई केजीबी-सीआईए की साजिश थी, जिसका उन्होंने पर्दाफ़ाश कर दिया।

पत्रकारिता के समुदाय विशेष ने भी सामान्य ज्ञान को “ब्रेकिंग न्यूज़” बनाने में देर नहीं लगाई

पर (प्रतीक सिन्हा और स्क्रॉल के) दुर्भाग्य से कुछ लोगों को आज भी याद है कि पत्रकारिता का असली स्वरूप क्या है। तो आदरणीय(?) प्रतीक सिन्हा जी, इंटरव्यू ऐसे ही होता है- यही नियम है इंटरव्यू का कि कोई भी औड़म-बौड़म सवाल झटके में नहीं पूछा जा सकता। इंटरव्यू में सवाल पहले से ही बताए जाते हैं, ताकि जिसका इंटरव्यू हो रहा है उसे अपने जवाब के लिए विस्तृत दस्तावेज, तथ्य आदि जुटाने का मौका मिल सके।

इंटरव्यू और प्रेस कॉन्फ्रेंस में अंतर

इंटरव्यू यानी साक्षात्कार लेने के लिए जब पत्रकारिता से ग्रेजुएशन कर रहा कोई छात्र अपने प्रिंसिपल के पास भी जाता है तो पहले से सवाल उसे बता देने होते हैं। साक्षात्कार का यही सामान्य शिष्टाचार भी होता है, और मान्य प्रणाली भी। अतः आप “अरे, देखो, मोदी के पास सवालों की लिस्ट पहले से थी” दिखाकर कोई नई बात नहीं बता रहे, बल्कि बड़े सधे तरीके से फेक न्यूज़ फैला रहे हैं, वह भी बिना खुद कोई झूठ बोले। जिन आम लोगों को पत्रकारिता के गहरे डिटेल्स नहीं पता, आप उन्हें बरगलाना चाहते थे। उन्हें ऐसा महसूस कराना चाहते हैं कि मोदी को सवाल पहले से मिले होना कोई नई या अनोखी (और गलत) बात हो गई, जबकि यही पत्रकारिता का दस्तूर है।

इंटरव्यू के पहले इंटरव्यू में किन-किन चीजों पर बात होगी, इसकी मोटी-मोटी रूपरेखा तैयार कर ली जाती है। प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री जैसे लोग, जिनका एक शब्द भी इधर-उधर होना मुसीबत कर सकता है, आम तौर पर सवालों की सूची पहले से ही ले लेते हैं। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि जिसका इंटरव्यू लिया जा रहा है उसे अपने जवाब के पक्ष में दस्तावेज, आँकड़े आदि जुटाने का समय मिल सके। फॉलो-अप सवाल भी जवाब में आए आँकड़ों/दस्तावेज के इर्द-गिर्द या फिर उनका सीधा खंडन करते हुए आँकड़े/दस्तावेज को केंद्र में रखकर ही होते हैं।

इसके अलावा उनके कार्यालय द्वारा हर सवाल की पड़ताल होती है- देखा जाता है कि कुछ ऐसा तो नहीं जिसे बिना संदर्भ के कहीं चिपका दिया जाए तो जनसामान्य के लिए ही समस्या खड़ी हो जाए। यहाँ तक कि राहुल गाँधी के एनडीटीवी को दिए गए दोनों (हिंदी और अंग्रेजी) ‘औचक’ इंटरव्यू के लिए भी एक मोटी रूपरेखा पहले से दी गई होगी।

इतने सब के बाद भी अंतिम इंटरव्यू प्रकाशित/प्रसारित होने के पहले जिसका इंटरव्यू हुआ है, उसे या उसके कार्यालय को अंतिम जाँच के लिए भेजा जाता है। वहाँ इस बात को चेक किया जाता है कि कहीं इंटरव्यू में कोई घालमेल, कुछ आगे-पीछे करना या कोई दुर्भावनापूर्ण एडिटिंग तो नहीं हुई है। याद करिए बाबा रामदेव का एनडीटीवी को ही दिया हुआ इंटरव्यू। अगर रामदेव ने उसे खुद चुपचाप रिकॉर्ड न कर लिया होता तो एनडीटीवी ने सब आगे-पीछे करके बाबा के शब्दों से ही फेक न्यूज़ चला दी थी

यह पत्रकारिता की मानक पद्धति है- स्टैंडर्ड प्रोसीजर। और इसे ‘फिक्सिंग’ वही मान सकता है जो या तो पत्रकारिता के बारे में काला अक्षर भैंस बराबर हो, या जानबूझकर बना ‘बकलोल’।

लगे हाथ आपको प्रेस कॉन्फ्रेंस के बारे में भी बता देते हैं, जिसका आप इंटरव्यू के साथ घालमेल कर रहे थे। तो जनाब! ऐसा है कि प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी पत्रकार झटके में सवाल तो पूछ सकता है लेकिन उसके भी अपने कुछ कायदे-कानून होते हैं। जैसे सवाल पहले कौन पूछेगा, कौन-कौन सवाल पूछेगा यह प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे व्यक्ति का सहायक ही तय करता है, खुद से “पहले मैं, पहले मैं” नहीं करते। इसी तरह प्रेस कॉन्फ्रेंस अगर अंडे के आयात-निर्यात पर हो रही हो तो आप “वॉट अबाउट 2002”, “इनटॉलेरेंस”, “बालाकोट का सबूत क्या है?” नहीं पूछ सकते। वहाँ आपको अंडे के व्यापार से संबंधित सवाल ही पूछ सकते हैं। आपके जैसे पत्रकार तुर्रे खाँ बनने के लिए शायद पूछ भी लें उट-पटांग लेकिन जवाब नहीं मिलेगा, इसकी गारंटी है।

अगर ‘छुपाना’ होता तो कैमरे के सामने मोदी क्यों माँगते ‘फाइल’

चलिए, पत्रकारिता के कायदे वगैरह साइड में कर दीजिए, कॉमन सेंस की बात करते हैं। अगर मोदी कोई ‘गुनाह’ कर रहे होते, उनको सवाल पहले से मालूम होने की बात को ‘छुपाना’ ही होता तो क्या वे कैमरे पर फाइल माँगते? फिर इसके अलावा उनके कविता लेकर चलने का तुक क्या था? मोदी क्या कोई कुमार विश्वास जैसे फुलटाइम कवि, पार्टटाइम नेता हैं, जो अपनी कविताओं की डायरी लेकर चलते? या वाजपेयी जैसे कविता के लिए मशहूर नेता, जो पता होता कि सामने वाला एक कविता तो पूछ ही देगा? उनका कविता वाली फाइल कैमरे पर माँगना ही अपने आप में यह बता सकता है कि उन्हें सवाल पता होने की बात छिपानी नहीं थी।

‘सवाल फिक्स थे’ से ‘Scripted interview’ तक का सफर: तथ्य-आधारित फेक न्यूज़

मशहूर गणितज्ञ, लेखक और राजनीतिक टिप्पणीकार नासिम निकोलस तालेब ने एक बार पत्रकारों के ही संदर्भ में कहा था, “The Facts are True, the News is Fake” (तथ्य सही हैं पर खबर झूठी है)। पत्रकारिता का समुदाय विशेष आज इसे ही चरितार्थ कर रहा है। पहले प्रतीक सिन्हा ने पत्रकारिता के सामान्य-से तथ्य और आम चलन को मोदी के लिए बनाया गया कोई अपवाद दिखाने की कोशिश की, और उसके ऊपर एनडीटीवी की पत्रकार झूठ की चाशनी पोतकर सीधे-सीधे फेक न्यूज़ बना देती हैं। यह और बात है कि ‘बेचारी’ समोसा पत्रकारिता के लिए आज बहुत फेमस हो गईं।

‘स्क्रिप्टेड इंटरव्यू’ का मतलब होता है सिर्फ सवाल ही तय नहीं हो बल्कि सवाल पूछने वाले ने ही जवाब भी बनाकर दिया हो – अपनी लॉबी, अपने मालिक के अनुसार। यह व्यावसायिक कदाचार होता है। पीएम को भूल जाइए, क्या अपने साथी पत्रकारों पर कदाचार जैसा संगीन आरोप लगाने के लिए सबूत है कोई कादम्बिनी शर्मा के पास? कोई सबूत है कि दीपक चौरसिया ने सवालों के जवाब भी भेजे, और मोदी को ‘ये वाली’ कविता भी भेजी कैमरे पर पढ़ने के लिए? अगर दीपक चौरसिया या न्यूज़ नेशन मानहानि का दावा कर दें तो ‘स्क्रिप्टेड’ शब्द कादम्बिनी शर्मा को भारी पड़ेगा…

‘BJP में विवाहित महिलाएँ अपने पतियों को PM मोदी के नज़दीक जाते देख घबराती हैं’

बसपा सुप्रीमो मायावती भी अब विवादित बयानों के इस दौर में खुल कर खेलने के लिए उतर आई हैं। जैसा कि हमनें पिछले कुछ दिनों में देखा है, अधिकतर विपक्षी नेताओं के विवादित बयान व अशोभनीय टिप्पणियाँ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर ही की गई है। लोकतांत्रिक तरीके से देश के प्रधानमंत्री बने नरेंद्र मोदी के लिए ‘जल्लाद’ और ‘दुर्योधन’ जैसे शब्दों का प्रायोग किया गया। इन शब्दों का प्रयोग बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी और कॉन्ग्रेस महासचिव प्रियंका गाँधी जैसे नेताओं ने भी किया। अब उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने भी कुछ ऐसा ही कहा है, जो न सिर्फ़ पीएम मोदी बल्कि सभी महिलाओं के लिए अपमानसूचक है। मायावती ख़ुद एक महिला हैं, फिर भी उनके द्वारा ऐसे बयान देना लोगों को रास नहीं आ रहा। दरअसल, मायावती ने कहा:

“नरेंद्र मोदी अलवर गैंगरेप मामले पर चुप हैं। उन्होंने इस पर अपनी गन्दी राजनीति खेलनी चाही। ऐसा उन्होंने इसीलिए किया ताकि चुनाव में उनकी पार्टी को फ़ायदा मिल सके। ये काफ़ी शर्मनाक है। वो दूसरों की पत्नियों व बहनों की इज़्ज़त कैसे कर सकते हैं, जब उन्होंने राजनीतिक फ़ायदे के लिए ख़ुद की ही पत्नी को छोड़ दिया। मुझे तो यह भी पता चला है कि भाजपा में ख़ासकर विवाहित महिलाएँ अपने पतियों को पीएम मोदी के नज़दीक जाते देख कर यह सोचते हुए काफ़ी घबराई रहती है कि कहीं मोदी अपनी पत्नी की तरह उन्हें भी अपने पति से अलग न करा दे।”

इसके बाद गोरखपुर में एक जनसभा को सम्बोधित करते हुए मायावती ने न सिर्फ़ अपने बल्कि अन्य विपक्षी नेताओं द्वारा भी मोदी को दी जाने वाली गालियों को सही ठहराया। हाल ही में प्रधानमंत्री ने कहा था कि उन्हें विपक्षी नेतागण आए दिन नई-नई गालियाँ देते रहते हैं। मायावती ने इन गालियों को स्वाभाविक करार दिया। बसपा सुप्रीमो ने कहा कि नरेंद्र मोदी को गालियाँ पड़नी स्वाभाविक है क्योंकि किसी भी व्यक्ति को गालियाँ तभी दी जाती है, जब वो गाली खाने का काम करता है। उन्होंने नरेंद्र मोदी को इस बात को ध्यान में रख कर चलने की सलाह दी।

यहाँ मायावती ने दो बड़े काण्ड किए (गेस्ट हाउस काण्ड को वो गठबंधन की घोषणा करने के दिन ही भूलने का ऐलान कर चुकी हैं)। मायावती ने पहले तो पीएम मोदी का अपमान किया और फिर नेताओं की पत्नियों को जबरन घसीटते हुए उन्हें भी अपनी ग़लत राजनीतिक बयानबाज़ी का शिकार बनाया। इसके बाद उन्होंने अपने बयान को जायज ठहराते हुए पीएम मोदी के लिए अभद्र भाषा का इस्तेमाल करने वाले सभी नेताओं को चुटकी में अपनी तरफ़ से क्लीन चिट दे दी। एक ऐसी नेत्री, जो कभी ख़ुद कुछ नेताओं के घृणित कृत्य (उसी पार्टी के नेता, जिनके साथ वह अभी गठबंधन में हैं) का शिकार बन चुकी हैं, उनकी तरफ़ से इस तरह के बयान आना राजनीति की गिरती मर्यादा का प्रमाण है।

मायावती द्वारा पीएम मोदी पर किए गए निजी हमले पर रक्षामंत्री निर्मला सीतारमण ने कड़ा रुख़ अख़्तियार किया है। उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेस आयोजित कर कहा कि मायावती का बयान उनकी बौखलाहट को स्पष्ट दर्शाता है, इसी वजह से वो पीएम मोदी पर निजी हमले कर रही हैं। प्रेस कॉन्फ्रेन्स में रक्षामंत्री ने कहा कि अपनी अभद्र टिप्पणी के लिए उन्हें प्रधानमंत्री मोदी से माफ़ी माँगनी चाहिए। पीएम मोदी और बीजेपी की महिलाओं को लेकर की गई टिप्पणी बेहद अपमानजनक है।

रक्षामंत्री ने अलवर गैंगरेप पर पीएम मोदी के उस सवाल का भी ज़िक्र किया जिसमें उन्होंने मायावती से पूछा था कि वो राजस्थान में कॉन्ग्रेस से अपना समर्थन वापस क्यों नहीं लेती? इस पर जवाब देने के बजाए मायावती ने प्रधानमंत्री मोदी पर निजी हमले कर दिया, इसके लिए उन्हें माफ़ी माँगनी चाहिए। रक्षामंत्री सीतारमण ने यह भी कहा कि मायावती जान चुकी हैं कि उनका गठबंधन पूरी तरह से फेल हो गया है, इसलिए वो परेशान हैं और असुरक्षा से घिरी हुईं हैं।

मायावती को अलवर काण्ड के लिए राजस्थान सरकार को चेतावनी देते हुए गंभीरता से बात करनी चाहिए क्योंकि वहाँ चल रही कॉन्ग्रेस सरकार को उनका समर्थन प्राप्त है। एक महिला का दर्द समझते हुए मायावती को प्रधानमंत्री की पत्नी को इन सबमें नहीं घसीटना चाहिए क्योंकि वह इन सबसे अलग और मीडिया कैमरों से दूर अपना जीवन व्यतीत कर रही हैं।