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सर्टिफाइड ‘मौलाना’ है मसूद अजहर: आतंक का मजहब भले न हो, आतंकी का मजहब स्पष्ट है

अंततः मौलाना मसूद अजहर पर संयुक्त राष्ट्र में प्रतिबंध लग ही गया। वैश्विक इस्लामिक आतंक के विरुद्ध यह छोटा ही सही लेकिन प्रभावशाली निर्णय है। भारत लगभग 10 वर्षों तक संयुक्त राष्ट्र में जैश-ए-मोहम्मद के संस्थापक मौलाना मसूद पर प्रतिबंध लगाने की लड़ाई लड़ता रहा जिसमें अब जाकर सफलता मिली है। दस वर्षों की इस मेहनत को केवल यह कहकर नकारा नहीं जा सकता कि ‘इससे कुछ नहीं होने वाला’। वैश्विक स्तर पर यह भारत की कूटनीतिक विजय है और इसके मायने केवल एक आतंकी सरगना पर प्रतिबंध लगाने तक सीमित नहीं।

मौलाना मसूद अज़हर पर प्रतिबंध के क्या मायने हैं?

पाकिस्तानी हुकूमत द्वारा पोषित आतंकी सरगना मौलाना मसूद अज़हर पर संयुक्त राष्ट्र की 1267 सैंक्शन कमेटी ने प्रतिबंध लगाया है। यह कमेटी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की उन 14 कमेटियों में से एक है जो आतंक, परमाणु प्रसार और देशों के बीच ‘कन्फ्लिक्ट’ की स्थिति में आवश्यकतानुसार किसी संगठन अथवा व्यक्ति पर प्रतिबंध लगा सकती है।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में 15 अक्टूबर 1999 को प्रस्ताव संख्या 1267 को सर्वसम्मति से पारित किया गया था और एक सैंक्शन कमेटी बनाई गई थी। सुरक्षा परिषद के पाँच स्थाई और 10 अस्थाई सदस्य, इस कमेटी के सदस्य हैं। कमेटी ने सन 1999 में मुख्यतः तालिबान और उससे जुड़े संगठनों को सूचीबद्ध किया था और उन पर प्रतिबंध लगाया था। सन 2011 में इस सूची में अल-क़ायदा को जोड़ा गया।

इसके बाद 2015 में इस कमेटी का दायरा बढ़ाकर इसमें इस्लामिक स्टेट को भी जोड़ा गया। दो साल बाद 2017 में कमेटी ने इस्लामिक स्टेट और अल कायदा की सारी संपत्तियों को सीज़ कर दिया, आतंकवादियों की यात्राओं पर प्रत्येक देश ने प्रतिबंध लगाया और उन्हें किसी भी तरह से हथियारों की सप्लाई बंद की।

इस प्रस्ताव के तहत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद किसी आतंकवादी या आतंकी संगठन को अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी या आतंकवादी संगठन घोषित कर सकती है और उस पर व्यापक प्रतिबंध लगा सकती है। प्रतिबंध का अर्थ यह है कि इस सूची में नाम शामिल होते ही संयुक्त राष्ट्र के सभी सदस्य देश प्रतिबंधित व्यक्ति या संगठन को आतंकवादी या आतंकी संगठन के रूप में सत्यापित मानकर कठोर रवैया अपनाते हैं। भले ही ऐसे आतंकी या आतंकवादी संगठन दुनिया में कहीं भी स्थित क्यों न हों उनके सारे बैंक खाते फ्रीज़ कर दिए जाएँगे, विदेशी यात्रा करने पर प्रतिबंध होगा और हथियारों की आपूर्ति निषेध हो इसे भी सुनिश्चित किया जाएगा।

अभी तक 1267-सैंक्शन कमेटी 262 आतंकियों और 83 संगठनों पर प्रतिबंध लगा चुकी है। लश्कर-ए-तय्यबा का सरगना हाफिज सईद, इस्लामिक स्टेट का चीफ अबु बक़र अल बग़दादी, अल क़ायदा का आयमन अल ज़वाहिरी और ओसामा बिन लादेन का लड़का हमज़ा पहले से ही इस सूची में है। मौलाना मसूद अज़हर पर भी वही सारे प्रतिबंध लागू होंगे जो इन पर हैं। मसूद पर प्रतिबंध तो अभी लगा है लेकिन जैश-ए-मोहम्मद को संयुक्त राष्ट्र ने 17 अक्टूबर 2001 को प्रतिबंधित किया था।

ध्यान देने वाली बात यह है कि मौलाना मसूद अज़हर कोई एक अकेला आतंकवादी नहीं है। जैश-ए-मोहम्मद आतंकी संगठन पूरी तरह से उसके परिवारवालों और परिजनों द्वारा संचालित है। मौलाना मसूद को छुड़ाने के लिए इंडियन एयरलाइन्स के विमान IC-814 की हाईजैकिंग का मास्टरमाइंड मसूद का भाई इब्राहिम अज़हर था। आज की तारीख में मौलाना मसूद के 19 रिश्तेदार जैश-ए-मोहम्मद के सदस्य हैं। इनमें मसूद के भाई, ससुरालवाले और उनकी अगली पीढ़ी भी शामिल है।

चीन के अड़ंगे से मौलाना मसूद पर प्रतिबंध लगने में हुआ विलंब

सैंक्शन कमेटी 1267 के तहत संयुक्त राष्ट्र का कोई भी सदस्य देश किसी भी आंतकवादी को वैश्विक आतंकवादी की सूची में शामिल करने का निवेदन कर सकता है, जिस पर सुरक्षा परिषद की स्थाई समिति का अनुमोदन करना जरूरी है। अगर सुरक्षा परिषद का कोई एक भी स्थाई सदस्य देश इस प्रस्ताव का वीटो करता है तो वह निवेदन पारित नहीं होगा। भारत द्वारा मौलाना को अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी घोषित कराने के प्रयास पर चीन बार-बार वीटो कर अड़ंगा लगाता रहा है।  

दस सालों में चार बार चीन ऐसी हरकत कर चुका है जिससे मौलाना मसूद पर संयुक्त राष्ट्र में प्रतिबंध नहीं लग पाया था। भारत ने मुंबई पर 26/11 के हमले के बाद 2009 में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से मौलाना मसूद को प्रतिबंधित आतंकियों की सूची में डालने का निवेदन किया था जिसे चीन ने यह कहकर लटका दिया कि मौलाना के खिलाफ पर्याप्त सबूत नहीं है। इसके बाद 2016 में पठानकोट आतंकी हमले के बाद जब भारत ने मौलाना मसूद को वैश्विक आतंकी घोषित करने के लिए प्रस्ताव प्रस्तुत किया तब भी चीन ने कहा था कि संयुक्त राष्ट्र में उसके खिलाफ पर्याप्त सबूत नहीं हैं।

फिर 2017 में चीन ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र में मौलाना मसूद के खिलाफ सर्वसम्मति नहीं बन पाई है। पुलवामा हमले के बाद मार्च 2019 में अमेरिका, ब्रिटेन और फ़्रांस ने एकमत होकर मसूद पर प्रतिबंध लगाने के लिए प्रस्ताव प्रस्तुत किया जिसे चीन कुछ तकनीकी कारणों का हवाला देकर रोकने में सफल रहा। इसके बाद अमेरिका ने स्वतंत्र रूप से 27 मार्च को प्रस्ताव प्रस्तुत किया जिसके बाद चीन पर दबाव बढ़ गया था।

अमेरिका ब्रिटेन और फ्रांस ने चीन पर दबाव डाला कि वह रेसोलुशन UNSC-1267 से तकनीकी रोक एक-दो सप्ताह में हटाए। यदि चीन ऐसा नहीं करता तो चीन को मौलाना मसूद अजहर पर प्रतिबंध लगाने के लिए काउंसिल में दूसरे प्रस्ताव का सामना करने के लिए तैयार रहने को कहा गया था।

इस पूरे मामले पर एक विदेशी डिप्लोमेट ने कहा था कि चीन को 23 अप्रैल तक का समय दिया गया था कि वह रोक हटा ले नहीं तो 1267 को दरकिनार करते हुए एक नया प्रस्ताव लाया जाएगा। ऐसा एक प्रस्ताव अनौपचारिक रूप से सभी 15 सदस्य देशों के बीच सर्कुलेट करने की चर्चा भी सामने आई थी, इस आशय के साथ कि चीन इसके दबाव में आकर आतंकी सरगना मसूद अज़हर पर अपने स्टैंड पर पुनर्विचार करे। तब चीन ने 6 मई तक का समय माँगा। अंततः अमेरिका अपने स्टैंड पर कायम रहा और चीन को झुकना पड़ा और 1 मई 2019 को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद द्वारा मौलाना मसूद अज़हर को वैश्विक आतंकी घोषित कर दिया गया।

सर्टिफाइड ‘मौलाना’ है मसूद अज़हर; पहचानने में कोई गलती न करें

मौलाना मसूद पर वैश्विक आतंकवादी होने का आधिकारिक ठप्पा लगने के साथ ही टीवी चैनल और प्रिंट मीडिया के वाले उसे ‘मसूद अज़हर’ कहने लग गए हैं। आश्चर्य की बात है कि अमेरिका की प्रतिष्ठित स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के Center for International Security and Cooperation की वेबसाइट पर मौलाना मसूद अज़हर को एक रैडिकल इस्लामिस्ट ‘स्कॉलर’ लिखा गया है। अब जब मसूद अज़हर वैश्विक आतंकी घोषित हो गया है तब पश्चिमी ‘विद्वान’ उसे क्या कहेंगे यह विचारणीय प्रश्न है।

ध्यान रहे कि प्रतिबंध ‘मौलाना’ मसूद अज़हर पर लगा है। यह नाम ही मज़हबी आतंकवाद को प्रमाणित करता है। मसूद अज़हर सर्टिफाइड ‘मौलाना’ है, और उसे उसके पूरे नाम से जाना जाता रहा है। कहने के लिए आतंक का मज़हब भले न हो लेकिन आतंकी का मज़हब स्पष्ट है और सारे मज़हब परस्त ‘मौलाना’ शब्द को छिपाने की भरपूर कोशिश करते दिखेंगे। हमारे आसपास के 90% पत्रकारों और कथित लेखकों आदि को परखिये तो इनकी प्रतिबद्धता ‘मौलाना’ के प्रति 100 टका स्पष्ट दिखेगी। आसपास नज़र भी बनाये रखिये कौन जाने कि आपके आसपास कोई मज़हबी किसी आम लड़के को पेट पर बम बाँधकर फूटने की जन्नती प्रेरणा देने में लिप्त है। सतर्क रहें, सत्यनिष्ठ रहें, मज़हबी प्रेरणाओं की सच्चाई से लोगों को अवगत कराते रहें।

‘मेरी बेटी हारी तो लोगों का लोकतंत्र से विश्वास उठ जाएगा’

लोकसभा चुनावों के बीच नतीजों को लेकर तरह-तरह की बयानबाजी देखने को मिल रही है। अभी तक EVM हैक होने जैसी चर्चा का ही बोलबाला था, लेकिन शारद पवार के बयान ने इस चर्चा को नई दिशा दे दी है। राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी (NCP) के प्रमुख शरद पवार का कहना है कि यदि उनकी बेटी सुप्रिया सुले बारामती से लोकसभा का चुनाव हार जाती हैं, तो लोगों का लोकतंत्र से भरोसा उठ जाएगा। शरद पवार के इस बयान की सोशल मीडिया पर जमकर निंदा की जा रही है।

एक टेलीविजन चैनल को दिए इंटरव्यू में शरद पवार ने बुधवार (मई 02, 2019) को कहा कि EVM से छेड़छाड़ की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता है। इसका लोकसभा चुनाव के परिणाम पर भी असर पड़ सकता है। पवार ने कहा है कि जिन राजनेताओं ने कभी विधानसभा या लोकसभा का चुनाव भी नहीं लड़ा, वो कह रहे हैं कि बारामती से NCP की उम्मीदवार हार जाएगी। इस बात से आशंका पैदा हो रही है।

एक सप्ताह पहले ही पवार ने आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू के साथ मंच साझा करते हुए माँग की थी कि VVPAT की कम से कम 50 प्रतिशत पर्चियों की गिनती की जाए। लेकिन ‘बेटी की हार’ और ‘लोकतंत्र से विश्वास का उठना’ जैसे आरोप पर भाजपा के कैबिनेट मंत्री गिरीश महाजन, विनोद तावड़े और चंद्रकांत पाटिल ने कड़ी आपत्ति जताई।

महाजन ने कहा, “पवार जानते हैं कि उनकी बेटी लोकसभा चुनाव हार रही है, इसलिए वह काफी सधे रूप से कदम उठा रहे हैं। वह EVM पर हार की जिम्मेदारी थोपने की तैयारी कर रहे हैं। भारतीय चुनाव आयोग को सभी राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी में सभी शंकाओं का निवारण करना चाहिए। यदि हम EVM में छेड़छाड़ करने में सक्षम होते तो हम मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव नहीं हारते।”

राबड़ी देवी ने पूछा, लीची कैसे खाते हैं… ‘चारा कहीं भी कैसे भी खा लीजिए’ परेश रावल ने लिए मजे

लालू प्रसाद यादव की पत्नी और बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गैर-राजनैतिक साक्षात्कार पर तंज कसा। जिसके बाद भाजपा सांसद और बॉलीवुड अभिनेता परेश रावल के साथ कई अन्य ट्विटर यूजर्स ने राबड़ी देवी और लालू यादव पर जमकर निशाना साधा।

राबड़ी देवी ने ट्वीट किया, “मोदी कल लीची के शहर मुज़फ़्फ़रपुर आए थे। लोगों ने उनके आम खाने के तरीक़े के बाद पूछा कि लीची कैसे खाते हैं? काटकर, चूसकर या वाश-बेसिन के पास खड़े होकर? पीएम ने जवाब ही नहीं दिया क्योंकि पूछने वाला कोई हीरो-हिरोइन नहीं था? जवाब नहीं सूझा क्योंकि सवाल पूर्व निर्धारित और नियोजित नहीं था।”

राबड़ी देवी के इस बयान के बाद परेश रावल ने उन्हें अपने ट्वीट में टैग करते हुए अप्रत्यक्ष रूप से चारा घोटाले का जिक्र किया। परेश रावल ने राबड़ी देवी के इस ट्वीट पर लिखा, “पर चारा तो कहीं भी कैसे भी खा सकते हैं।

परेश रावल के इस ट्वीट पर और राबड़ी देवी के तंज पर कई ट्विटर यूजर्स ने बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री का जमकर मज़ाक उड़ाया। किसी ने उन्हें परेश रावल की तरह चारा घोटाले के मुद्दे पर घेरा तो किसी ने उनके मीडिया से बातचीत के ढंग को लेकर सवाल उठाए। कुछ लोगों ने पूछा कि उनका ट्विटर अकॉउंट कौन हैंडल करता है।

शशि थरूर जी, कृपया देशहित दाँव पर लगा कर वोट मत जुगाड़िए

कॉन्ग्रेस इस समय जनता के वोट के सूखे से किस कदर जूझ रही है, यह वैसे तो दिखाए जाने की जरूरत नहीं है लेकिन, कॉन्ग्रेस नेता गाहे-बगाहे खुद अपनी हताशा का प्रदर्शन कर रहे हैं। इसमें वह किसी हद तक गिरने से नहीं चूकते हैं। इसी क्रम में कॉन्ग्रेस का आज वह ‘आइकन’ भी गिर गया, जिससे ओछेपन की उम्मीद नहीं थी। इस आइकन का ‘फैन’ मैं खुद भी हूँ।

मामले का सच्चा ‘एंगल’

इकॉनोमिक टाइम्स ने एक खबर छापते हुए लिखा है कि हिंदुस्तान ने श्री लंका को गुप्त सूचना (इंटेलिजेंस ‘टिप’) दी थी – लंका के समुदाय विशेष में से कुछ जिहादी लोग श्री लंका में आतंकवादी घटना को अंजाम देने की साजिश कर रहे हैं। श्री लंका के अफसरों ने चेतावनी गंभीरता से नहीं ली और अंजाम भुगता, ईस्टर के दिन ही सिलसिलेवार धमाके उनकी नाक के नीचे हो गए।

इस पर शशि थरूर प्रतिक्रिया देते हुए लिखते हैं, “यह दुखद है। घरेलू मुस्लिमों को तंग करने और उनसे नफरत के चलते, मुस्लिमों से जुड़े किसी भी मुद्दे पर पड़ोसी देशों में भाजपा सरकार की विश्वसनीयता को आघात पहुँचा है। (इसमें) भारत की अगली सरकार को बड़े सुधार करने होंगे।”

यह शर्मनाक है। शशि थरूर का यह बयान इसलिए शर्मनाक है क्योंकि जिस रिपोर्ट का शशि थरूर हवाला दे रहे हैं, वह स्पष्ट कह रही है कि वास्तव में लिट्टे के गृहयुद्ध से बेजार और कंगाल श्री लंका पाकिस्तान की गोद में बैठा हुआ है और वह अपने मुस्लिम समुदाय में पल रहे जिहाद पर लगाम लगा कर पाकिस्तान की दुर्दांत इंटेलिजेंस एजेंसी आईएसआई को नाराज नहीं करना चाहता था। इसका हिंदुस्तान के हिन्दू-मुस्लिम मसले से कुछ लेना-देना नहीं था।

श्री लंका इसलिए हाथ पर हाथ धरे बैठा रहा क्योंकि उसे लगा कि यह हिंदुस्तान की ‘चाल’ है, ताकि श्री लंका अपने घर के जिहादियों पर कार्रवाई करे और राष्ट्रों के परे इस्लामिक उम्माह (समुदाय) को सर्वोपरि मानने वाला पाकिस्तान बिलबिला जाए। श्री लंका पाकिस्तान को नाराज नहीं करना चाहता था, क्योंकि पाकिस्तान लिट्टे से निपटने में उसकी सहायता कर रहा था।

इसके अलावा इसमें चीन वाला दृष्टिकोण भी है। चीन, पाकिस्तान का इकलौता ‘अन्नदाता’ बचा है। हाफिज सईद के मामले में सुरक्षा परिषद को झेलाया, 10 साल मसूद अजहर को बचाता रहा (अभी भी पुलवामा का जिक्र चीन ने संयुक्त राष्ट्र के द्वारा जारी अजहर के पापों की फ़ेहरिस्त से हटवा दिया, केवल पुराने पाप ही चस्पा हैं) और पाकिस्तान से गिलगित-बाल्टिस्तान खरीद चुका है, यानी कश्मीरी का वो हिस्सा जो हमारा है। इस तरह से चीन श्री लंका के लिए भी अगर ‘बाप’ नहीं, तो कम से कम ‘चचा’ तो है ही। श्री लंका का हम्बनटोटा बंदरगाह चीन ने 99 साल के लिए लीज पर ले रखा है और उन्हीं रुपयों से श्री लंका की दाल-रोटी चल रही है।

सवाल यह है कि मेरे जैसा ‘कीबोर्ड वारियर’, ‘आर्मचेयर एक्सपर्ट’ अगर इतना सब कुछ जान और सोच सकता है, तो क्या संयुक्त राष्ट्र के सिरमौर बनने की दहलीज तक पहुँच चुके शशि थरूर को यह सब एंगल नहीं दिखे? या फिर सिर्फ इस वजह से देखकर नजरंदाज कर दिया कि इस रिपोर्ट के हौव्वे से कॉन्ग्रेस के लिए पड़े वोटों के अकाल में उन्हें कुछ ‘जिहादी बूँदों’ का योगदान मिल जाएगा?

यह राजनीतिक हमला नहीं, एक ‘प्रशंसक’ का दुःख है

शशि थरूर की जगह पर यह काम वोटों के लिए अगर राहुल गाँधी, कामरेड कन्हैया कुमार, तेजस्वी यादव या जिग्नेश मेवाणी जैसा कोई छुटभैय्या नेता करता, तो कोई आश्चर्य न होता और दुःख तो लेशमात्र नहीं। लेकिन, व्यक्तिगत तौर पर शशि थरूर मोदी के बाद मेरे दूसरे सबसे पसंदीदा नेता हैं, ट्विटर पर नरेंद्र मोदी से भी पहले उन्हें ही फॉलो किया था। साथ ही, मेरे लिए JKR (जेके रॉलिंग) के बाद दूसरे सबसे पसंदीदा लेखक और नॉन-फिक्शन में तो सबसे पहले स्थान पर शशि थरूर रहे हैं। प्रधानमंत्री मोदी पर लिखी आपकी किताब 300 पन्ने से ज्यादा पढ़ चुका हूँ। वर्ष 2017 के जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में आपको 1 मीटर की दूरी से देख पाना मेरे जीवन के सबसे यादगार पलों में था।

आप विदेश नीति को आंतरिक राजनीति से दूर रखने की बड़ी अच्छी बातें करते हैं। आप हिन्दू धर्म पर वास्तव में विश्वास या परिपालन ना करते हुए, केवल एक विचार के तौर पर जितना जाना जा सकते हैं, आप जान चुके हैं। आप निश्चित ही उदारवादी हैं, संभ्रांत हैं, आपकी ही पार्टी का एक बड़ा धड़ा राहुल गाँधी के बजाए आपको ‘पीएम मैटीरियल’ मानता है। मेरे जैसे कुछ ‘सेंटर-राईट’ लोग भी आपको तहेदिल से पसंद करते हैं। शशि थरूर जी, आपसे निवेदन है कि हमारा दिल मत तोड़िए।

मुश्किल में राहुल गाँधी: MHA के बाद विदेशी नागरिकता मामला अब सुप्रीम कोर्ट में, नामांकन रद्द की माँग

कॉन्ग्रेस पार्टी अध्यक्ष राहुल गाँधी की मुश्किलें थमने का नाम नहीं ले रही हैं। कभी वो अपने झूठ बोलने की आदत से विवादों में बने रहते हैं, तो कभी अपनी बचकानी हरक़तों से। फ़िलहाल, उन्हें लेकर जो सवाल उठ रहे हैं, वो उनकी विदेशी नागरिकता को लेकर हैं। प्रियंका गाँधी के भाई राहुल गाँधी की नागरिकता का प्रश्न अब सुप्रीम कोर्ट की दहलीज़ तक जा पहुँचा है। रिपोर्ट्स के अनुसार, हिन्दू महासभा ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाख़िल कर के उनकी ब्रिटिश नागरिकता पर आपत्ति जताई है और उनके नामांकर को रद्द करने की माँग की है।

हिन्दू महासभा की तरफ से जय भगवान गोयल ने यह याचिका दाखिल की है, जिस पर जल्द सुनवाई करने की माँग पर ज़ोर दिया गया। याचिका में यह सवाल भी उठाया गया है कि यह जानते हुए कि राहुल गाँधी की नागरिकता ब्रिटेन की है, चुनाव आयोग द्वारा उनका नामांकन क्यों स्वीकार किया गया?

बता दें कि राहुल गाँधी की ब्रिटिश नागरिकता और उनके नाम (राउल विंची) को लेकर पहले भी विवाद उठ चुके हैं। भारतीय गृह मंत्रालय ने बड़ा क़दम उठाते हुए राहुल गाँधी को नोटिस थमाकर उनकी विदेशी नागरिकता पर 15 दिनों के भीतर स्पष्टीकरण देने को कहा है।

हाल ही में राज्यसभा सांसद सुब्रह्मण्यम स्वामी ने सनसनीखेज आरोप लगाते हुए ख़ुलासा किया था कि राहुल गाँधी ने एक प्राइवेट कम्पनी के रजिस्ट्रेशन काग़ज़ात में ख़ुद को ब्रिटिश नागरिक बताया था। ये कम्पनी लंदन में स्थित है। स्वामी ने प्रधानमंत्री मोदी को पत्र लिखकर राहुल गाँधी की भारतीय नागरिकता व संसद की सदस्यता समाप्त करने की माँग की थी।

राहुल गाँधी को गृह मंत्रालय द्वारा भेजा गया नोटिस

इन डॉक्यूमेंट्स के अनुसार, राहुल गाँधी बैकॉप्स लिमिटेड नामक कम्पनी के डायरेक्टर और सेक्रटरी थे। स्वामी ने ये डॉक्यूमेंट्स ब्रिटेन के कम्पनी लॉ अथॉरिटी से निकलवाने की बात कही थी। अब गृह मंत्रालय ने बड़ा क़दम उठाते हुए राहुल को भेजे गए नोटिस में पूछा है :

“मंत्रालय ने सांसद डॉक्टर सुब्रह्मण्यम स्वामी द्वारा एक शिकायत प्राप्त की है। इसमें 2003 में लंदन में सूचीबद्ध कम्पनी ‘बैकॉप्स लिमिटेड’ का जिक्र करते हुए कहा गया है कि आप इसके डायरेक्टर और सेक्रटरी थे। इस कम्पनी का दर्ज पता – 51 सॉउथगेट स्ट्रीट, विंस्टर, हैम्पशायर, SO23 9EH है। 2005 एवं 2006 में फाइल किए गए कम्पनी के वार्षिक रिटर्न्स में आपकी जन्मतिथि 19/06/1970 दर्ज है और आपने ख़ुद को एक ब्रिटिश नागरिक बताया है। आप 15 दिनों के भीतर इस मामले को लेकर मंत्रालय को अपनी स्थिति स्पष्ट करें।”

कम्पनी केडॉक्युमेंट्स, जिसमें राहुल ने ख़ुद को ब्रिटिश बताया था

गृह मंत्रालय ने सुब्रह्मण्यम स्वामी की शिकायत की एक कॉपी भी नोटिस के साथ राहुल गाँधी को भेजी है। इससे पहले सुब्रह्मण्यम स्वामी के आरोपों का खंडन करते हुए कॉन्ग्रेस प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने कहा था कि राहुल गाँधी तभी से भारतीय नागरिक हैं, जब से उनका जन्म हुआ है। 2015 में जब सुब्रह्मण्यम स्वामी ने ये गंभीर आरोप लगाए थे, तब कॉन्ग्रेस ने कहा था कि ब्रिटिश सरकार से ज़रूर कोई ग़लती हुई है और वो उन्हें सुधार करने की अपील करेंगे। सवाल यह है कि अगर राहुल गाँधी ने ख़ुद को ब्रिटिश नागरिक बताया था, तो वह अमेठी के लिए नामांकन दाख़िल करते समय ख़ुद को भारतीय क्यों बताते हैं?

मसूद अज़हर पर ‘दिग्गी राजा’ और ‘गोभक्त’ कमलनाथ ‘परेशान’, कॉन्ग्रेस से लेकर वोटर तक हैरान!

कॉन्ग्रेस और उनके नेता आए दिन अपने बयानों से विवादों में घिरे रहते हैं। दिग्विजय सिंह इन दिनों अपने बयानों से सुर्खियाँ बटोरते नज़र आ रहे हैं। वहीं, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री गोभक्त कमलनाथ भी पीछे नहीं हैं। कॉन्ग्रेस के इन दोनों नेताओं ने अब केंद्र सरकार को ऐसे मुद्दे पर घेरने का प्रयास किया है, जिससे उनकी दिमागी स्थिति और स्पष्ट होती है।

दरअसल, पुलवामा आतंकी हमले की जिम्मेदारी लेने वाले आतंकवादी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के प्रमुख मसूद अज़हर को संयुक्त राष्ट्र ने अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी घोषित कर दिया है। संयुक्त राष्ट्र का यह फैसला भारत के लिए किसी बड़ी उपलब्धि से कम नहीं है। यह बात सर्वविदित है कि आतंकी मसूद अज़हर को वैश्विक आतंकवादी घोषित करने में भारत सरकार ने कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ी थी, बावजूद इसके कि चीन, भारत की तमाम कोशिशों पर पानी फेरते हुए उसे (मसूद अज़हर) अब तक बचाता आया था।

जैश प्रमुख को अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी घोषित करवाने के प्रयासों पर विपक्ष ने हमेशा ही हमलावर रुख़ अपनाए रखा था। अब जब संयुक्त राष्ट्र (UN) द्वारा आतंकी मसूद को वैश्विक आतंकवादी घोषित किया जा चुका है, तब भी विपक्ष शांत नहीं है।

हमेशा कुछ न कुछ कह देने की अपनी आदत से मजबूर कॉन्ग्रेस के नेता दिग्विजय सिंह ने पीएम मोदी पर निशाना साधते हुए कहा है कि मसूद को आतंकवादी घोषित करने से क्या होगा? जब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान, मोदी जी के साथ दोस्ती निभा रहे हैं, तो उन्हें अब दाऊद इब्राहिम, मसूद अज़हर और हाफ़िज़ सईद को भी भारत को सौंप देना चाहिए।  

भोपाल लोकसभा सीट से चुनाव लड़ने वाले दिग्विजय सिंह ने कहा है कि सरकार को आतंकी मसूद अज़हर पर इनाम की घोषणा करनी चाहिए, जैसा कि यूपीए के समय में लश्कर-ए-तैयबा के प्रमुख हाफ़िज़ सईद पर किया गया था।

बता दें कि पिछले महीने, पाक पीएम इमरान खान ने कहा था कि अगर पीएम मोदी लोकसभा चुनाव के बाद एक बार फिर से भारत के प्रधानमंत्री बनते हैं तो दोनों देशों के बीच बातचीत का रास्ता खुल सकता है। इसके साथ ही इमरान खान ने यह भी कहा था कि भारत में अगर कॉन्ग्रेस पार्टी की सरकार बनती है, तो वह राइट विंग वाली पार्टी, बीजेपी से डर कर कश्मीर मुद्दे को पाकिस्तान के साथ बातचीत के ज़रिए हल करने से पीछे हट सकती है।

अब बात करते हैं मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ की, जिन्होंने मसूद अज़हर को वैश्विक आंतकी घोषित किए जाने की टाइमिंग को लेकर सवाल खड़े किए हैं। उनका कहना है कि मसूद अज़हर को वैश्विक आंतकी घोषित करने की प्रक्रिया काफ़ी लंबे समय से अटकी हुई थी। अच्छा हुआ यह हो गया। लेकिन, यह चुनाव के समय हुआ, मुझे नहीं पता कि इसका चुनावों से कुछ लेना-देना है कि नहीं?

कॉन्ग्रेस नेता कमलनाथ ने, भले ही अपने इन लफ़्ज़ों में मात्र शक़ ज़ाहिर किया हो कि मसूद को वैश्विक आतंकी घोषित करने के लिए चुनाव के समय का ही चयन क्यों किया गया? लेकिन क्या इन्हें सच में नहीं मालूम है कि एक आंतकवादी को वैश्विक आंतकी घोषित करने की प्रक्रिया किसी व्यक्ति विशेष की मनमर्ज़ी पर निर्भर करती है, या इसके लिए किसी ठोस कार्रवाई की आवश्यकता भी होती है?

यह भी उल्लेखनीय है कि आतंकी मसूद को वैश्विक आतंकियों की सूची में शामिल करने का प्रस्ताव अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस ने पेश किया था। लेकिन, चीन ने हमेशा की तरह ही अपनी दोहरी नीति का अनुसरण करते हुए, अपनी वीटो पावर का इस्तेमाल कर के मसूद को वैश्विक आंतकी घोषित करने से बचाने का काम किया था, वो भी एक बार नहीं बल्कि चार बार।

भारत में विपक्ष के नेता, जिनका कि एकमात्र लक्ष्य ही मोदी सरकार को घेरना भर है, वो इन हालातों को बख़ूबी जानते और समझते हैं। लेकिन, अपनी वोट की राजनीति के मंतव्य को साधने के लिए वो जनता को भरमाने का काम करते हैं और निरंतर यह प्रचारित करने में जुटे रहते हैं कि मोदी राज में आतंकी मसूद को वैश्विक आंतकी घोषित करने से क्या होगा? साथ ही, यह सन्देश देने का भरसक प्रयास करते हैं कि पाक पीएम इमरान खान से उनका दोस्ताना व्यवहार है।अब क्या बयानवीर ‘दिग्गी’ राजा ये बताएँगे कि मोदी सरकार करे तो क्या करे?

अच्छा होता कि इनकी पार्टी का ही कोई समझदार और पढ़ा-लिखा नेता इन्हें यह समझा पाता कि हाथ पर हाथ धरे बैठे रहने से देश नहीं चलता है, लेकिन कोई समझाए भी तो कैसे, क्योंकि हाल ही में ‘दिग्गी’ ने यह बयान देकर सबको चकित कर दिया था कि नेहरू जी के बाद कॉन्ग्रेस ने लिखने-पढ़ने पर बहुत ज़्यादा ध्यान नहीं दिया। उनके इस बयान से इस बात  का अंदाज़ा बख़ूबी लगाया जा सकता है कि वो जिस पार्टी के हैं, उन्हें वो ही नहीं भाती, क्योंकि वो पार्टी पढ़ने-लिखने की आदत से दूर हो चुकी है और उसमें विचारों का आदान-प्रदान नहीं होता है। इन हालातों में अगर कॉन्ग्रेस नेता अपना मानसिक संतुलन खो रहे हैं, जैसा कि उनके बयानों से झलकता भी है, तो ये कोई नई बात नहीं है। इसे गंभीरता से लेने की तनिक भी आवश्यकता नहीं है।

वहीं, मध्य प्रदेश के CM गोभक्त कमलनाथ की ‘टाइमिंग’ वाले बयान पर एक ही बात समझ में आती है कि उनका ख़ुद का समय ही अच्छा नहीं चल रहा है। उनके भतीजे पर 1350 करोड़ रुपए की टैक्स चोरी का आरोप लगने के साथ-साथ बेटे नकुल नाथ और पत्नी प्रिया नाथ की सम्पत्ति में बढ़ोत्तरी भी उनकी चिंता का विषय बना हुआ है। साथ ही, मध्य प्रदेश में 50 ठिकानों पर छापेमारी के दौरान 281 करोड़ रुपए की बेहिसाब नकदी के रैकेट का पता लगने से जो उनकी किरकिरी हुई वो अलग।

इन सभी बातों के निष्कर्ष से यह कहा जा सकता है कि कॉन्ग्रेसी खेमे के इन वरिष्ठ बयानवीर नेताओं की चिंता का विषय कुछ और ही है, जो खुलकर तो सामने नहीं आता है, लेकिन उनके बेतुके बयान उनकी मन:स्थिति को अक्सर उजागर कर ही देते हैं।

लड़की की शॉर्ट ड्रेस, रेप की धमकी और BJP कनेक्शन: ‘भोट-कटवा कॉन्ग्रेस’ की नई वाली राजनीति

देश की सबसे ‘वरिष्ठ’ पार्टी, यानी कॉन्ग्रेस ने अब अपनी घटिया मानसिकता का परिचय देते हुए निर्दोषों को अपराधी घोषित करने का बीड़ा उठाया है। कॉन्ग्रेस के इस कुकृत्य में कुछ ऐसे लिबरल और वामपंथी भी शामिल हैं, जो ‘Cyber Bullying’ में दक्ष हो गए हैं। इन्होंने इसके लिए एक नायाब तरीका अपनाया है। उदाहरण के तौर पर मान लीजिए, अगर शशि (बदला हुआ नाम) किसी के बगीचे से चोरी-छिपे आम तोड़ कर खा जाता है और उसके नाना की बहन के दामाद के भांजे के पास जियो (Reliance Jio) का सिम है, तो आम की चोरी का दोष मुकेश अम्बानी पर मढ़ दिया जाता है।

हमने देखा है कि किस तरह से एक गिरोह विशेष स्क्रीनशॉट्स शेयर कर के किसी भी अपराधी के भाजपाई होने का दावा सिर्फ़ इसीलिए कर देता है, क्योंकि उसने 2 साल पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कोई पोस्ट लाइक किया था। अगर किसी पर कुछ आरोप भी हों, तो उसके भाई-भतीजे और फूफे की फेसबुक प्रोफाइल खंगालने के बाद मिले लेख के आधार पर उस पर भाजपाई या संघी होने का ठप्पा लगा दिया जाता है। इस खेल के ये माहिर खिलाड़ी हो चुके हैं।

ताजा मामला भी कुछ ऐसा ही है। हालाँकि, जरा अजीब है। गुरुग्राम में हुई एक घटना में जबरदस्ती पीएम मोदी, भाजपा और रिलायंस को ठूँस देने की कोशिश की गई है। कॉन्ग्रेस ने क्या किया, इसे समझने से पहले गुरुग्राम में हुई उस घटना को जान लेना आवश्यक है, जो तेज़ी से यूट्यूब और सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है। इस वीडियो के अनुसार, गुरुग्राम में कुछ युवतियों ने मिलकर एक महिला की खिंचाई की। उनका आरोप था कि उक्त महिला ने युवतियों के छोटे कपड़ों पर तंज कसते हुए, वहाँ उपस्थित लोगों से उनका रेप करने को कहा था। ये घटना का एक पक्ष है। उक्त युवतियों ने महिला की खिंचाई करने के बाद वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया। साइबर वर्ल्ड में जैसा कि आम है, उस महिला को गालियाँ पड़ीं, उसकी सोच को ‘हीन’ बताते हुए युवतियों के साथ सहानुभूति जताई जा रही है।

हालाँकि, अगर उस महिला ने ऐसा कुछ भी कहा है, जैसा युवतियों ने दावा किया है, तो इस बयान की जितनी भी निंदा की जाए कम है। लेकिन उसी समय युवतियों को इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए था कि जिस महिला का चेहरा वो सोशल मीडिया पर वायरल कर रही हैं। अगर, उस के साथ इसी आधार पर भविष्य में कुछ गलत होता है, तो उसकी ज़िम्मेदारी कौन लेगा? यदि राह चलते हुए लोग उसे पहचान कर इसी तरह की ‘Bullying’ करने लगें, तो क्या यह गलत नहीं है? यहाँ इस घटना के अलग-अलग पक्ष हो सकते हैं और सही-गलत का निर्णय उसी आधार पर किया जा सकता है, लेकिन इस मामले में एक अन्य महिला भी कूदीं हैं और उनके बारे में ये कहने में संकोच नहीं होना चाहिए कि उन्होंने इस घटना को राजनीतिक रंग से पोत दिया।

यह भी जानने लायक बात है कि क्या एक परिवार में सभी सदस्यों की विचारधारा, राजनीतिक रुझान और पसंद-नापसंद समान हो सकती हैं? अगर किसी घर में पति भाजपा समर्थक है, तो क्या पत्नी कॉन्ग्रेस समर्थक नहीं हो सकती है? अगर एक भाई मुंबई इंडियंस का फैन है, तो दूसरा कोलकाता नाइट राइडर्स का फॉलोवर क्यों नहीं हो सकता है?

किसी परिवार के एक सदस्य की विचारधारा के आधार पर ही उसी परिवार के दूसरे सदस्य को दोषी ठहरा देना किस प्रकार का चलन है? वो भी तब, जब कि उस घटना में उस विचारधारा का कुछ योगदान ही न हो। एक झूठ होता है, किसी को जबरन संघ, भाजपा और रिलायंस समर्थक घोषित कर देना। दूसरा झूठ हुआ, इन तीनों में लिंक ढूँढ कर, इसे बलात्कारी मानसिकता से जबरन जोड़ देना। इन सबसे ऊपर, तीसरा झूठ हुआ यह मान लेना कि परिवार में सबकी विचारधारा समान है।

समाजवादी पार्टी से कॉन्ग्रेस में आईं पंखुड़ी पाठक वर्तमान में कॉन्ग्रेस पार्टी की मीडिया पैनलिस्ट हैं। ‘लड़के हैं, ग़लती हो जाती है’ से लेकर ‘लड़की है, ग़लती हो जाती है’ तक के उनके सफ़र में उन्होंने कॉन्ग्रेस की मानसिकता को सिरे से आत्मसात किया है। अब जानते हैं कि पंखुड़ी पाठक ने आखिर किया क्या है? दरअसल, उन्होंने एक ट्वीट किया, जिसमें गुरुग्राम प्रकरण वाली महिला की इस कथित सोच के लिए उनके पति को ज़िम्मेदार ठहराया है। उन्होंने उस महिला के पति का सोशल मीडिया एकाउंट खंगाला और फिर ये साबित करने की कोशिश की है कि इस महिला ने अपने पति की सोच के कारण उन युवतियों से कथित तौर पर ऐसा कहा। पंखुड़ी पाठक ने अपने ट्वीट में लिखा:

“बलात्कार समर्थक आंटी के पति मोदी समर्थक हैं। वह फेसबुक पर विभिन्न प्रकार के संघी पेजों को फॉलो करते हैं। घृणा फैलाने वालों के पोस्ट्स शेयर करते हैं, फेक न्यूज़ फैलाने वाले अंशुल सक्सेना के पोस्ट शेयर करते हैं और हाँ, रिलायंस के साथ भी उनके कुछ कनेक्शन हैं। अब पता चलता है कि ‘बलात्कार समर्थक आंटी’ के अंदर ऐसा बोलने की हिम्मत कहाँ से आई।”

पंखुड़ी पाठक ने अपनी ट्वीट्स के साथ कुछ स्क्रीनशॉट्स भी शेयर किए, जिसमें उक्त महिला के पति शांतनु चक्रवर्ती ने ‘जन औषधि योजना’ का पोस्टर लगा रखा था और उनकी पिछली जॉब्स की मदद से यह दिखाया कि वो कभी रिलायंस के डिस्ट्रीब्यूशन में कार्य करते थे। इसके अलावा, पंखुड़ी पाठक ने एक स्क्रीनशॉट के माध्यम से दिखाया है कि उन्होंने अंशुल सक्सेना का पोस्ट शेयर किया था।

इन सब बातों से तीन चीजें पता चलती है। पहली, अब तक इस मामले में उक्त महिला के पति शांतनु पर किसी भी तरह का कोई आरोप नहीं लगा है, फिर भी जबरदस्ती उनका नाम इसमें घसीटा जा रहा है। दूसरी, क्या इस तरह से किसी के प्रोफाइल पर बेवजह जाकर स्क्रीनशॉट्स लेना और फिर उसे वायरल कर लोगों को उनके खिलाफ उकसाना तार्किक है? अगर वह महिला कुछ बोलने की दोषी हैं भी, तो इसमें भाजपा, आरएसएस और रिलायंस का मनगढंत सम्बन्ध जोड़कर, उन्हें किस तरह से दोषी ठहरा दिया गया है?

दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते भाजपा के 11 करोड़ सदस्य हैं। अगर इन सबके रिश्तेदारों को भी मिला दें, तो इस परिभाषा के हिसाब से देश का हर व्यक्ति किसी न कसी तरह से भाजपा समर्थक निकल आएगा। यदि कॉन्ग्रेस नेता राजीव शुक्ला पर कोई आरोप लगता है, तो क्या उसके लिए भाजपा को इस वजह से ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है कि केंद्रीय मंत्री और भाजपा नेता रविशंकर प्रसाद उनके क़रीबी रिश्तेदार हैं? क्या तहसीन पूनावाला पर लगे आरोपों के लिए भी भाजपा को ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है, क्योंकि उनके भाई शहजाद पूनावाला भाजपा नेताओं के साथ दिखते हैं और उनका पक्ष लेते रहे हैं? हर चीज में भाजपा का हाथ दिखाने के लिए किसी की ‘Stalking’ करना क्या उसकी सुरक्षा के साथ खिलवाड़ नहीं है?

जिस तरह से इस प्रकरण में कुछ युवतियों व एक महिला के बीच हुई बहस के लिए भी मोदी और रिलायंस को जिम्मेदार ठहराने की कोशिश की गई है, उससे पता चलता है कि मुद्दों के अभाव से जूझता विपक्ष, बीच चुनाव में अब बौखलाहट के मारे इसी तरह के हथकंडों के सहारे प्रचार अभियान चला रहा है। पंखुड़ी पाठक ने यह भी साबित करने की कोशिश की है कि बलात्कार के लिए उकसाना संघी और भाजपाई सोच है। उनसे पूछा जाना चाहिए कि यह निष्कर्ष उन्होंने किन तथ्यों के आधार पर निकाला है? क्या केंद्र सरकार की जनहित में जारी योजनाओं के बारे में जागरूकता फैलाना भी बलात्कारी सोच की श्रेणी में आता है? पंखुड़ी पाठक जैसी युवा राजनीतिज्ञों से इस तरह की अपेक्षा नहीं थी, लेकिन वोट कटवा कॉन्ग्रेस की सोच आज इसी प्रकार के ‘भटके हुए’ मासूम नेताओं के सहारे अपना अस्तित्व तलाश रही है।

रमजान में मतदान: ‘सुबह 5 बजे से वोटिंग हो या नहीं’ का मामला सुप्रीम कोर्ट में, चुनाव आयोग से भी सवाल

सर्वोच्च न्यायालय ने एक याचिका के आधार पर चुनाव आयोग से रमजान के दौरान मतदान का समय सुबह 5 बजे करने की माँग पर विचार करने के लिए कहा है। इस याचिका में मतदान का समय सुबह 7 बजे की बजाए 5 बजे करने की बात कही गई है।

हालाँकि, कोर्ट ने इस मामले पर चुनाव आयोग से कोई जवाब नहीं माँगा है। खबरों की मानें तो कोर्ट ने आयोग से सिर्फ़ यह जानने की कोशिश की है कि वे इस प्रकार की माँग पर गौर कर सकते हैं या नहीं?

उल्लेखनीय है कि चुनाव शुरू हो जाने के बाद सर्वोच्च न्यायालय तब तक चुनाव आयोग के काम में दखल नहीं दे सकता है, जब तक कोई बड़ी चूक या किसी नियम का उल्लंघन न हुआ हो। इसलिए, पूरा मामला चुनाव आयोग पर निर्भर करता है कि वह इस पर क्या फैसला करेगा।

बता दें कि रमजान 5 मई से शुरू हो रहे हैं। जिसके बाद तीन चरणों में 6, 12, 19 तारीख़ को चुनाव होने हैं। ऐसे में बढ़ती हुई चुनावी गर्मी देख कर कुछ लोगों ने यह याचिका दायर की है।

‘जल्द आ रहे हैं, इंशाअल्लाह’: ISIS ने दी भारत और बांग्लादेश में हमले की धमकी

इस्लामिक स्टेट से जुड़े एक आतंकी संगठन ने भारत और बांग्लादेश में हमला करने की धमकी दी है। संगठन ने चेतावनी भरा पोस्टर जारी करते हुए कहा है कि बंगाल और हिंद में खलीफा के लड़ाकों की आवाज कभी बंद नहीं हो सकती। इन पोस्टर में लिखा है कि इनके बदले की प्यास कभी शांत नहीं होगी।

दैनिक जागरण की खबर के अनुसार खुफिया विभाग के एक अधिकारी ने बताया कि अल मुरसलत नाम के संगठन ने अबु-बंगाली को बांग्लादेश में अपना मुखिया बनाया है। अबु को हमले की योजना बनाने के साथ ही नए आतंकियों को संगठन में शामिल करने की जिम्मेदारी दी गई है।

इस पोस्टर को जारी करने से पहले आतंकी संगठन ने बांग्लादेश में एक हल्का धमाका भी कराया था। ये धमाका बांग्लादेश की राजधानी ढाका में गुलिस्तां थियटर के पास हुआ था। हालाँकि इसमें किसी की जान नहीं गई थी लेकिन कुछ पुलिसकर्मी घायल जरूर हुए थे।

मीडिया खबरों की मानें तो भारत की खुफिया एजेंसियों को शक है कि आईएसआईएस इन छोटे संगठनों के साथ मिलकर बांग्लादेश में आतंकी हमला कर सकता है। जिसके कारण एजेंसियों की नजर बांग्लादेश में होने वाली हर छोटी-बड़ी गतिविधि पर बनी हुई है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार इस आतंकी संगठन ने पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश के कुछ इलाकों में पोस्टर भी बाँटे हैं और साथ ही अपने समर्थकों को एकजुट करने की कोशिश की है। बाँटे गए पोस्टर्स पर लिखा है, “जल्द आ रहे हैं, इंशाअल्लाह।”

गौरतलब है कि ये खबर उस समय सामने आई है जब आईएसआईएस के प्रमुख अबु बकर अल बगदादी का नाम एक बार फिर चर्चा में है। पाँच साल बाद बगदादी फिर एक वीडियो में नजर आया है। बगदादी ने इस वीडियो में श्री लंका में हुए ईस्टर के मौके पर आत्मघाती हमलों का जिक्र किया है। ऐसे में अंजान संगठन की ओर से जारी किए गए इन पोस्टर्स की अनदेखी करना घातक हो सकता है क्योंकि श्री लंका में भी आईएसआईएस से जुड़े एक अनजान संगठन नेशनल तौहीद जमात (एनटीजे) ने आतंकी हमले को अंजाम दिया था।

₹272 करोड़ का दलाल दीपक तलवार और UPA के केंद्रीय मंत्री हैं ‘अच्छे दोस्त’: e-mail वाला सबूत ED के पास

एयरलाइन सीट आवंटन घोटाला मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने द्वारा दाखिल किए गए आरोप पत्र पर सीबीआई की विशेष अदालत ने संज्ञान लिया है। अगस्ता वेस्टलैंड केस में आरोपित दलाल दीपक तलवार के बेटे आदित्य के ख़िलाफ़ ग़ैर ज़मानती वारंट जारी किया गया है। विशेष सीबीआई जज अनुराधा शुक्ला ने दीपक तलवार की ज़मानत याचिका पहले ही ठुकरा दी है। प्रवर्तन निदेशालय ने अदालत को बताया कि पूर्व केंद्रीय नगर विमानन मंत्री और राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी (NCP) के नेता प्रफुल्ल पटेल के दलाल दीपक तलवार से काफ़ी क़रीबी सम्बन्ध हैं। ईडी के अनुसार, दीपक तलवार ने एअर इंडिया के मुनाफे वाले मार्गाें पर सीट-बँटवारे के मामले में विदेशी निजी एयरलाइनों, जैसे एयर अरेबिया, अमीरात के पक्ष में दलाल के तौर पर काम किया था।

दीपक तलवार ने उस दौरान यूपीए सरकार में केंद्रीय मंत्री रहे प्रफुल्ल पटेल के साथ अपने संपर्कों का प्रयोग करते हुए भारतीय कम्पनी को नुकसान पहुँचाया। तलवार को विदेशी कंपनियों के पक्ष में दलाल का काम करने के लिए 272 करोड़ रुपए दिए गए थे। ईडी ने स्पेशल कोर्ट में दायर किए गए आरोप पत्र में इन सारी बातों का जिक्र किया है। मामले की अगली सुनवाई 9 मई को होगी। जाँच एजेंसी ने कहा कि उसके पास प्रफुल्ल पटेल और दीपक तलवार के बीच ईमेल से हुई बातचीत के सबूत हैं। इससे पहले ईडी ने कहा था कि जाँच से पता चला है कि तलवार के तार भगोड़ा विजय माल्या से भी जुड़े हैं।

तलवार को मिले 272 करोड़ रुपयों में से 127 करोड़ का पता एक फर्म के अकाउंट से चला है और बाकी रुपयों की स्थिति का पता लगाया जा रहा है। ईडी ने यह भी कहा है कि प्रफुल्ल पटेल सामाजिक रूप से तलवार से मिलते-जुलते रहते थे। ईडी 23 विदेशी और 33 भारतीय कंपनियों की जाँच कर रही है, जिसके तार दीपक तलवार से जुड़े हैं। तलवार को मिले किकबैक्स को इन्हीं कंपनियों के माध्यम से इधर-उधर पहुँचाया जाता था।

दीपक पर आपराधिक साज़िश रचने, जालसाजी और विदेशी चंदा विनियमन कानून की विभिन्न धाराओं के तहत आरोप तय किए गए हैं। दीपक तलवार के एनजीओ को यूरोप की एक मिसाइल निर्माता कम्पनी से 90 करोड़ रुपए विदेशी कोष में मिले, जिसका इस्तेमाल उसने अन्य कार्यों में किया। दीपक तलवार को जनवरी 2019 में दुबई से प्रत्यर्पित कर भारत लाया गया था। आइजी रैंक के एक अधिकारी के नेतृत्व में प्रवर्तन निदेशालय का एक दल, विदेश मंत्रालय के वरिष्ठ अफसर और रॉ के अफसरों की एक टीम ने इस काम को अंज़ाम दिया था। दीपक तलवार अभी जुडिसियल कस्टडी में है।

प्रफुल्ल पटेल भारतीय फुटबॉल महासंघ के अध्यक्ष हैं। यूपीए सरकार के दौरान विमानन और भारी उद्योग मंत्रालय संभालने वाले पटेल 10 वर्षों तक केंद्रीय मंत्री रहे थे। ऐसे में दीपक तलवार जैसे कॉर्पोरेट दलाल के साथ उनका नाम जुड़ना कॉन्ग्रेस और राकांपा के लिए परेशानी का सबब बन सकता है। दोनों दल महाराष्ट्र में गठबंधन कर लोकसभा चुनाव लड़ रहे हैं। उनका मुक़ाबला मज़बूत भाजपा-शिवसेना गठबंधन से है। दीपक तलवार के ख़िलाफ़ न सिर्फ़ प्रवर्तन निदेशालय बल्कि सीबीआई और आयकर विभाग भी जाँच कर रहा है। उस पर मनी लॉन्डरिंग के मामले चल रहे हैं। उस पर टैक्स चोरी का मामला भी चल रहा है।