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Fact Check: ओबामा ने कहा भारत को चाहिए अखिलेश यादव जैसा प्रधानमंत्री?

एक ओर समाजवादी पार्टी अध्यक्ष जी, यानी युवाओं की पसंद अखिलेश यादव महागठबंधन के साथ लोकसभा चुनाव की तैयारियों में व्यस्त हैं, वहीं दूसरी ओर उनकी ऑनलाइन सेना ने अध्यक्ष जी को प्रधानमन्त्री बनाने की हर संभव मुहिम छेड़ रखी है।

सोशल मीडिया पर देश में चल रहे चुनावी माहौल में अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा की अखिलेश यादव से जुड़े एक पोस्ट ने नया तहलका मचा दिया है। दरअसल, आजकल सोशल मीडिया पर बराक ओबामा का एक ‘पोस्ट’ वायरल हो रहा है। लोग इस पोस्ट को शेयर करते हुए समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव को ढेरों बधाइयाँ भी दे रहे हैं।

इस फेसबुक पोस्ट में बराक ओबामा समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव से प्रभावित नजर आ रहे हैं, लेकिन इसकी सच्चाई कुछ और ही है। इस पोस्ट में बराक ओबामा कह रहे हैं कि भारत को आगे ले जाने के लिए अखिलेश यादव जैसा प्रधानमंत्री चाहिए। इस ग्राफिक कार्ड के साथ किए दावे के मुताबिक, ओबामा ने ट्वीट किया है कि भारत को आगे ले जाने के लिए अखिलेश जैसा PM होना चाहिए। इस मैसेज के साथ ही यह भी कहा जा रहा है कि ओबामा ने अखिलेश यादव के साथ मुलाकात की एक पुरानी तस्वीर भी पोस्ट की है।

इस ग्राफिक कार्ड में अखिलेश यादव और बराक ओबामा की हाथ मिलाते हुए तस्वीर भी है। यह ‘Lucknow ki Baat’ नाम के फेसबुक पेज पर शेयर किया गया है। इसके अलावा अखिलेश यादव फैन क्लब फेसबुक ग्रुप पर भी यह ग्राफिक कार्ड पोस्ट किया गया है। इसके साथ कैप्शन लिखा गया है, “बोलो सर ओबामा को भी सही गलत का फर्क पता है।”

क्या है तस्वीर की सच्चाई?

वास्तव में बराक ओबामा ने ऐसा कोई ट्वीट नहीं किया है। बराक ओबामा द्वारा अखिलेश यादव की तारीफ करने को लेकर कोई न्यूज रिपोर्ट भी उपलब्ध नहीं है। ओबामा के आधिकारिक ट्विटर हैंडल से लेकर सोशल मीडिया में कहीं भी इस प्रकार की कोई खबर नहीं है, जिसमें बराक ओबामा ने अखिलेश यादव में भारत का प्रधानमंत्री देखा हो।

ग्राफिक कार्ड पर ओबामा और अखिलेश यादव की यह तस्वीर बराक ओबामा के जनवरी, 2015 में भारत दौरे के वक्त ली गई थी। ओबामा उस साल गणतंत्र दिवस पर मुख्य अतिथि बनकर भारत आए थे। राष्ट्रपति भवन में आयोजित रात्रि भोज के दौरान ओबामा और अखिलेश यादव एक-दूसरे से मिले थे। इस वायरल तस्वीर में गौर करने वाली सबसे बड़ी बात यह है कि इसे शेयर करने वालों ने केवल अपनी बात को सूचना का रूप दे कर फोटो के साथ पोस्ट कर दिया है और कहीं भी ओबामा के एकाउंट से किए गए ट्वीट की तस्वीर नहीं है।

राहुल गाँधी झोंपड़ी में खाना खाकर भूल गए, मोदी ने दिलाया पक्का मकान

2008 में राहुल गाँधी बुन्देलखण्ड की जिस आदिवासी महिला भुंअन बाई की झोंपड़ी में भोजन कर चर्चा में आए थे, दस साल बाद उस महिला को प्रधानमंत्री आवास योजना के अंतर्गत पक्का मकान दे दिया गया है। टीकमगढ़ के टपरियन ग्राम की भुंअन बाई के परिवार को आत्मनिर्भर बनाने में मदद का राहुल गाँधी ने वादा किया था। उस समय वह बाँदा के माधौपुर गाँव भी गए थे, टपरियन और माधौपुर को ‘गोद ‘ भी लिया था, पर दोनों ही गाँव आज तक बदहाल हैं। उस समय माधौपुर के जिस बीमार दलित अच्छे लाल से वह मिले थे, उन्हें भी घर 2017 में जाकर तत्कालीन अखिलेश सरकार की लोहिया आवास योजना में मिला था।  

‘राहुल ग्राम’ होकर भी टपरियन बेहाल, अच्छे लाल से किया था ‘बेटा बनने’ का वादा

दस साल से भी ज्यादा के बाद राहुल गाँधी ने अब जाकर टीकमगढ़ का रुख लोकसभा निर्वाचन के मद्देनजर पार्टी के प्रचार के लिए किया है, तो लोगों को उनका पिछले दौरा याद आ रहा है। टपरियन को तो जिला कॉन्ग्रेस कमेटी ने गोद भी ले लिया, जैसे माँ-बाप का नाम अपने नाम के साथ जोड़ा जाता है, वैसे ही टपरियन ने प्रवेश मार्ग पर ‘राहुल ग्राम’ लगा रखा है, लेकिन गाँव आज भी बदहाल है- मूलभूत सुविधाओं का अकाल है। कमोबेश यही हाल माधौपुर का भी है।  

भुंअन बाई के हवाले से जनसत्ता की रिपोर्ट के अनुसार राहुल गाँधी के उनके घर में खाना खाने से पहचान तो मिली लेकिन जीवन की किसी समस्या का समाधान नहीं मिला। मकान भी पिछले साल प्रधानमंत्री आवास योजना में मिला। भुंअन बाई ने यह भी बताया है कि उनके चारों बेटे बेरोजगार हैं। राहुल गाँधी के दोबारा हालचाल पूछने के सवाल पर उन्होंने साफ़ किया कि कॉन्ग्रेस से कभी कोई नहीं आया- पर मकान बनवाने के लिए भाजपा नेताओं ने जरूर सम्पर्क किया था।

कुछ ऐसा ही अच्छे लाल का भी कहना है- उन्होंने बताया कि जब राहुल आए तो उनका परिवार उसी समय के आसपास हुई बेटे की मौत के गम से बेजार था। राहुल गाँधी ने कहा था कि वह उनका बेटा तो नहीं लौटा सकते लेकिन बेटे की तरह समस्याएँ सुलझाने में मददगार जरूर बनेंगे। 2017 में जब वह ‘यूपी को यह साथ पसंद है’ का प्रचार विधानसभा निर्वाचन के लिए करने महोबा आए थे तो किसी ने उन्हें 9 साल पुराना वादा याद दिलाया। तब उनके ‘दोस्त’ अखिलेश की पहल पर डीएम साहब ने खुद गाँव आकर घर बनवाया।

टपरियन में पाँचवीं तक ही स्कूल

टपरियन के पंचायत सदस्य दशरथ के मुताबिक उनके गाँव में प्राइमरी के आगे स्कूल न होने के कारण गाँव के अधिकांश बच्चे कक्षा 5 के आगे नहीं पढ़ पाते हैं। 1500 की आबादी वाला गाँव स्कूल ही नहीं, पेयजल और बेरोजगारी की समस्या से भी दो-चार है।

PUBG और सर्जिकल स्ट्राइक्स का अंतर समझने में ‘छोटा भीम’ को अभी वक़्त लगेगा

आए दिन सेना के राजनीतिकरण करने का रोना रोने वाली कॉन्ग्रेस को अचानक चुनावों के बीचों-बीच ध्यान आता है कि उनकी सरकार ने भी ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ की थी। राफेल फ़ाइल के घोटालों की ही तरह एक बार फिर बेशर्मी से राहुल गाँधी के नेतृत्व वाली कॉन्ग्रेस पार्टी मीडिया के सामने आई है। इस बार UPA के दौरान हुई सर्जिकल स्ट्राइक का दावा करने के लिए एक ऐसे सज्जन को आगे किया गया है, जिनकी जुबान तब नहीं खुली थी जब मीडिया के सामने आस्तीनें चढ़ाकर राहुल गाँधी ने मनमोहन सिंह की ही कैबिनेट द्वारा पारित एक अध्यादेश फाड़ दिया था।

जिस तरह के कल्पनालोक में कॉन्ग्रेस पार्टी वर्तमान में जी रही है और उसी कल्पनालोक के आधार पर 2019 का चुनाव जीतने का सपना भी देख रही है, ये हर हाल में उनका अपने समर्थकों के साथ किया गया धोखा है। 5 साल तक मोदी सरकार को घेरने के लिए सर से पाँव तक का जोर लगाने वाली कॉन्ग्रेस पार्टी का हाल ये है कि उसके पास मोदी सरकार के खिलाफ मात्र एक ‘चौकीदार चोर है’ का नारा है और वो नारा भी कहीं ना कहीं मोदी सरकार की ही मार्केटिंग करता है। इसके अलावा राहुल गाँधी की अध्यक्षता वाली कॉन्ग्रेस पार्टी को जब कुछ भी ऐसा नहीं मिला, जिस पर कि वो सीना चौड़ा कर के मीडिया को बता सके, या कम से कम बता सके कि मोदी सरकार को घेरने के लिए उनके पास ‘फलाना’ तथ्य है और वो वाकई में तार्किक भी है, तब वो मनमोहन सिंह के मुँह में शब्द ठूँसकर चुनाव जीतने का यह आखिरी हथकंडा भी आजमा रही है।

UPA के दौरान 10 साल तक, 2G, आदर्श हाउसिंग, कॉमनवेल्थ और कोयला घोटाला पर जिन मनमोहन सिंह के मुँह में दही जमी रही, वही अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह अचानक से आम चुनावों के बीच प्रकट होकर कहते हैं, “रुको-रुको, याद आया कि हमने भी सर्जिकल स्ट्राइक की थी।”

वो दिन दूर नहीं जब पूरा दिन PUBG खेलने के बाद राहुल गाँधी PUBG को ही कॉन्ग्रेस द्वारा की गई सर्जिकल स्ट्राइक साबित कर देंगे। ऐसा करने के लिए उनके पास मीडिया गिरोह से लेकर नेहरुवियन सभ्यता वाले, किसी भी समय अवार्ड वापस करने वालों के गैंग स्लीपर सेल अवस्था में हर वक़्त मौजूद तो हैं ही।

जिन सैन्य एनकाउंटर्स के सर्जिकल स्ट्राइक का दावा मनमोहन सिंह कर रहे हैं, यदि उन्हें भी सर्जिकल स्ट्राइक नाम दे दिया जाए, तो इस तरह से शायद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को सबसे ज्यादा वाहवाही के हकदार हैं।

यह जानना भी आवश्यक है कि UPA के दौरान 11 सर्जिकल स्ट्राइक्स का दावा करने वाले मनमोहन सिंह वही हैं, जिनके बारे में सेना ने कहा था कि मुंबई हमलों के बाद सेना की समस्त तैयारियों के बाद भी मनमोहन सिंह पाकिस्तान पर कोई कार्यवाही करने से पीछे हट गए थे।

टाइमलाइन में थोड़ा सा पीछे जाकर देखें, तो हमें पता चलता है कि कॉन्ग्रेस के ही होनहार नेताओं की बदौलत भाजपा आज सर्जिकल स्ट्राइक जैसे मुद्दों पर जनता के बीच बढ़त (जैसा कि कॉन्ग्रेस का मानना है) बना रही है। यही वो कॉन्ग्रेस है, जो लगातार मोदी सरकार से सुबूत माँग कर उन पर सर्जिकल स्ट्राइक को जनता के बीच लाने का दबाव बनाती रही। हालात ये थे कि पाकिस्तान के F-16 विमान को मार गिराने के साक्ष्य सरकार को अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से ज्यादा देश की मीडिया और कॉन्ग्रेस को देने पड़ रहे थे।

कॉन्ग्रेस का ऐसा भस्मासुरी दौर चल रहा है, जिसमें उनका हर दाँव उनके विपरीत हो जाता है। उनके नेता कदम उठाते तो हैं, लेकिन वही कहीं ना कहीं से उनके लिए नुकसानदायक साबित हो ही जाता है।

तमाम समीकरणों को देखते हुए बेहतर अभी यही होगा कि कॉन्ग्रेस समय के हाथों में अपने भविष्य को छोड़ दे। ऐसा इसलिए, क्योंकि ‘युवा नेतृत्व’ को बदल पाने के लिए उन्हें चमचागिरी और जी हजूरी से बाहर आना होगा और ऐसा कॉन्ग्रेस जैसे सत्तापरस्त दल के लिए इस युग में तो कम से कम संभव नजर नहीं आता है।

जाकिर नाइक की ₹50 करोड़ की संपत्ति ED द्वारा जब्त

दो समुदायों के बीच नफरत पैदा करने और आतंकवादी गतिविधियों में हिस्सा लेने के लिए युवकों को उकसाने जैसे गंभीर आरोपों का सामना कर रहे विवादास्पद इस्लामी प्रचारक जाकिर नाइक को झटका देते हुए प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने मनी लांड्रिंग निरोधी कानून के तहत उसके 50.46 करोड़ रुपए की संपत्ति को जब्त कर लिया है। ईडी ने जाकिर नाइक की 193.06 करोड़ रुपए की काली कमाई पहचान ली है। फिलहाल मलेशिया में रह रहे नाइक के खिलाफ यह मामला 22 दिसंबर 2016 को दर्ज किया गया था।

2017 में घोषित हुआ था अपराधी, 2016 में भारत छोड़ भागा था

जून 2017 में एनआइए की विशेष अदालत ने जाकिर नाइक को अपराधी घोषित किया था। शीर्ष आतंकरोधी एजेंसी ने 1 अक्टूबर 2017 को जाकिर नाइक के खिलाफ घृणा फ़ैलाने वाले भाषण देने, समुदायों के बीच दुश्मनी फ़ैलाने वाले भाषण देने, और लोगों को आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होने के लिए उकसाने का भी आरोपपत्र दायर किया था। इससे पहले ही नाइक 2016 में हिंदुस्तान छोड़ भाग खड़ा हुआ था।

बांग्लादेश हमलावरों का था ‘प्रेरणास्रोत’

जाकिर नाइक भारत से तब भाग खड़ा हुआ जब 18 विदेशी नागरिकों समेत 29 लोगों को ढाका के आतंकी हमले (जुलाई 2016) में मारने वालों के प्रेरणास्रोत के तौर पर नाइक की ओर सूई घूमी। कुछ महीने पहले नाइक ने हिंदुस्तान की सरकार पर आरोप लगाते हुए यह भी दावा किया था कि उसे फँसाने के लिए हिन्दुस्तानी सरकार इंटरपोल पर उसके खिलाफ रेड कार्नर नोटिस जारी करने के लिए दबाव बना रही है।

रामलिंगम हत्या मामला: PFI कार्यालय में NIA की छापेमारी

रामलिंगम की हत्या मामले में राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) ने आज तिरुचिरापल्ली के पलकराई में पॉपुलर फ्रंट ऑफ़ इंडिया (PFI) के कार्यालय में छापेमारी की। बता दें कि 6 फरवरी, 2019 को ‘पट्टली मक्कल काची’ (PMK) के 42 वर्षीय अधिकारी रामलिंगम की हत्या के उद्देश्य से हमला कर उनका हाथ काट दिया था।

रामलिंगम को धार्मिक रूपांतरण का विरोध करने के लिए अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों के एक समूह द्वारा
पीएमके के एक अधिकारी 42-वर्षीय रामलिंगम पर, जो उस समय घर वापस जा रहे थे, उन पर हमला कर उनका हाथ काट दिया। गंभीर रूप से घायल रामलिंगम को कुंभकोणम के एक निजी अस्पताल में ले जाया गया। अस्पताल के डॉक्टरों ने रामलिंगम को शहर के सरकारी मेडिकल कॉलेज के अस्पताल में रेफर कर दिया। हालाँकि, अस्पताल ले जाते समय अत्यधिक रक्तस्राव के कारण रामलिंगम की मृत्यु हो गई। दरअसल, उन्होंने हिंदुओं के कन्वर्शन (मतांतरण) का विरोध किया था जिससे कुछ कट्टरपंथी धार्मिक संगठन उनसे परेशान हो गए थे।

पुलिस ने इस हत्या मामले में इस्लामिक कट्टरपंथी संगठन PFI के एक सदस्य समेत पाँच लोगों को गिरफ़्तार किया था। गिरफ़्तार किए गए लोगों की पहचान एस निज़ाम अली, सरबुद्दीन, रिज़वान, मोहम्मद अज़रुद्दीन और मोहम्मद रायज़ के रूप में की गई थी। अब तक ग्यारह आरोपियों को गिरफ़्तार किया गया है, जिनमें से आठ PFI के हैं

बता दें कि केरल, तेलंगाना, कर्नाटक, असम, पश्चिम बंगाल, और बिहार जैसे राज्यों में PFI सक्रिय है। झारखंड सरकार द्वारा इस साल फरवरी में आपराधिक क़ानून संशोधन अधिनियम की धारा 16 के तहत राज्य में राष्ट्र विरोधी गतिविधियों में लिप्त होने और ISIS जैसे आतंकी समूहों के साथ संबंध रखने के कारण इसे प्रतिबंधित कर दिया गया था। सरकार ने अन्य राज्यों से भी इसी तरह की कार्रवाई करने का आग्रह किया था। भाजपा नेता विनय सिंह ने आरोप लगाया था कि संगठन पीएम मोदी की हत्या की साज़िश रचने में भी शामिल था।

यह संगठन (PFI) हादिया मामले में भी सक्रिय रूप से शामिल था। इसने उच्चतम न्यायालय में मामले को आगे बढ़ाने के लिए 1 करोड़ रुपए खर्च करने का दावा भी किया था।

होमवर्क बनाम गृहकार्य में नहीं उलझती हैं अब लड़कियाँ… वो टॉप करती हैं और हेडलाइन बनती हैं

बीते कुछ सालों से लगातार लड़कियाँ हर बोर्ड परीक्षा में लड़कों को पछाड़ते हुए मीडिया को “लड़कियों ने फिर मारी बाजी” जैसी हेडलाइन लिखने पर मजबूर कर देती हैं। इसे लड़कियों के भीतर की इच्छाशक्ति और लगन समझिए या फिर ‘बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ’ जैसे अभियानों की सफलता। आप बीते कुछ सालों के रिकॉर्ड देख लीजिए – लड़कियों की छाप हर बोर्ड परीक्षा में लड़कों के मुकाबले ज्यादा प्रभावशाली रही है। आज CBSE के नतीजे इसके हालिया उदाहरण हैं। कुछ लोगों को लग सकता है कि ये बातें लिखते हुए मैं अपने भीतर हावी हुए नारीवाद के कारण लड़कों की मेहनत को कम आँकने की कोशिश कर रही हूँ। लेकिन यकीन करिए ऐसा कुछ भी नहीं है। हम जिस समाज में रहते हैं वहाँ लड़कियों का इस तरह उभरना वाकई किसी के लिए भी गर्व की बात है। जिनकी शिक्षा उचित दिशा में हुई है वो मेरी इस बात को जरूर समझ पाएँगे।

लड़कों के मुकाबले लड़कियों का अव्वल आना किसी भी प्रगतिशील समाज के लिए इसलिए इतना प्रफुल्लित करने वाला है क्योंकि लड़कियों की स्थिति ही समाज की मानसिकता का आईना होती है। अभी के समय से थोड़ा पीछे जाकर याद कीजिए। इतिहास में लड़कियों को उनके अधिकार दिलाने के लिए कितने आंदोलन हुए हैं? देश की पहली महिला डॉक्टर (आनंदी) जैसी अनेकों महिलाओं को अपनी डिग्री हासिल करने के लिए न जाने कितनी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। ऐसे में यदि इन संघर्षों के नतीजे परीक्षाओं के परिणामों में दिखने लगे हैं तो मेरे जैसे वो लोग क्यों न खुश हों, जिन्होंने देखा है कि पढ़े-लिखे माहौल में भी लड़की को होमवर्क बनाम गृह कार्य में किस तरह उलझ कर रह जाना पड़ता है। जिन्हें मालूम है कि समाज में लड़के का शिक्षित होना आम बात है लेकिन एक लड़की का शिक्षित होना पूरे समाज के लिए सफलता की बात है। आसपास देखिए और खुद सोचिए लड़की होने के जो मानदंड समाज द्वारा तय किए गए हैं, उन पर शत-प्रतिशत देते हुए लड़की की छोटी सी सफलता भी कितनी बड़ी बात है।

आज जब मैं ‘लड़कियों ने फिर मारी बाजी’ पर बात कर रही हूँ तो मैं सिर्फ़ उन लड़कियों तक सीमित नहीं हूँ जिन्होंने 500 में से 499 अंक लाकर किसी लड़के को पछाड़ा है। मैं उन सभी लड़कियों की बात कर रही हूँ जिन्होंने सामाजिक और परिवारिक जद्दोजहद के बावजूद अकादमिक क्षेत्र में आगे बढ़ने का सपना देखा और उस सपने को पूरा करने के लिए उसने अपना एक-एक पल झोंक दिया। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि लड़कों की सफलता भी उनकी लगन और मेहनत का परिणाम होती है, लेकिन इस बात में भी कोई दो-राय नहीं है कि समाज द्वारा निर्धारित नियमों और मानदंडों के बाद लड़कियों की कामयाबी किसी भी क्षेत्र में ज्यादा ‘खास’ होती है।

आमतौर पर हम देखते हैं कि नारी सशक्तिकरण की बहसों के बीच समाज का एक बड़ा तबका लड़कियों को इमोशनली वीक कहता है, और हर दूसरी बात पर उन्हें ‘तुमसे न हो पाएगा’ कह कर दरकिनार कर देता है, लेकिन कभी किसी ने सोचा है कि लड़कियों को इमोशनली वीक बताने वाला समाज कैसे और कब तैयार हुआ है? इन गुणों की सूची तैयार करने वाले ये वही लोग हैं, जिनका एक समय तक मानना था कि लड़कियों को शिक्षित करना ‘परिवार के लिए और समाज के लिए खतरनाक है।’ आज जब लड़कियों को खुद को समाज में आगे बढ़ाने का मौका मिल रहा है तो यकीनन वो सभी पुरानी भ्रांतियों को तोड़ने के लिए प्रयासरत हैं, जिनका निर्माण समाज ने उनके लिए किया है।

लड़कियों की इन बोर्ड परीक्षाओं में जीत बताती हैं कि अब वो अपने भीतर निहित मूल्यों को पहचानने और समझने लगी हैं। वो समझ चुकी हैं कि शिक्षा यदि उनका एक मात्र लक्ष्य है तो फिर उन्हें कोई नहीं रोक सकता है। आज उनका अव्वल आना बताता है कि वो न केवल खुद के औचित्य और अपने सपनों को बचाए रखने के लिए बल्कि औरों के लिए प्रेरणा बनने को भी जुझारू रूप से जुटी हुई हैं। क्लासरूम की शिक्षा और गृहणी बनने की ट्रेंनिंग की लड़ाई में वह तालमेल बिठाना सीख चुकी हैं। वह जान चुकी हैं कि जिन गुणों को गलत परिभाषित करके समाज ने उन्हें आगे बढ़ने से रोका है, उन्हें उन गुणों का इस्तेमाल अपनी बेहतरी के लिए कैसे करना है।

एक समय में लड़कियों की सृजनात्मकता को कढ़ाई, बुनाई और सिलाई के जरिए आँका जाता था, लेकिन आज लड़कियों के ये गुण उनकी उत्तर पुस्तिका में स्पष्ट देखा जाता है। एक समय में लड़कियों की लगन शक्ति और स्मरण शक्ति को अच्छी गृहणी होने का पर्याय माना जाता था, लेकिन अब उनके इन्हीं गुणों के सही प्रयोग से वह परीक्षा परिणामों में अव्वल आ रही हैं। समाज उन्हें जितना दबाने का प्रयास कर रहा है, लड़कियाँ अब उतना ही उभरने को तैयार हैं।

सीबीएसई के मुताबिक लड़कों की तुलना में 9 फीसदी अधिक लड़कियाँ इस बार पास हुईं हैं। सीबीएसई 12वीं बोर्ड में 88.70 फीसदी लड़कियाँ पास होने में सफल रहीं, जबकि लड़कों का पासिंग पर्सेंटेज 79.4 फीसदी रहा।
इस बार कुल 83.4 फीसदी बच्‍चे पास होने में सफल हुए। लेकिन पिछली बार की तरह इस बार भी लड़कियों ने बाजी मारी है। उम्मीद करती हूँ ऐसे परिणाम साल दर साल आएँगे और एक समय ऐसा आएगा जब लड़कियों का न सिर्फ शिक्षित होना बल्कि हर क्षेत्र में अव्वल होना सबके लिए ‘आम’ बात होगी। लोग समझ पाएँगे कि जिस तरह के समाज का निर्माण लड़कियों के लिए इतिहास में किया गया था, वो एक ब्लर तस्वीर जैसी थी जिसमें लड़की के अस्तित्व का पता तो उनकी शारीरिक बनावट से लग जाता था लेकिन उनके गुणों को धुंधला दिया जाता था।

3 बड़े राज्यों में BJP को मात देने वाली कॉन्ग्रेस की हालत पतली: कारण ‘पुत्र-प्रेम’ और ‘प्रदेश निकाला’

हिंदी पट्टी के तीन बड़े राज्य- मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में 2018 के अंतिम महीनों में चुनाव हुए। तीनों ही राज्यों में भाजपा की सरकारें थी। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में 15 वर्षों से भाजपा सत्ता में काबिज़ थी, राजस्थान में वसुंधरा राजे के नेतृत्व में पिछले 5 वर्षों से भाजपा की सरकार चल रही थी। जहाँ राजस्थान में पिछले कुछ चुनावों से भाजपा और कॉन्ग्रेस बारी-बारी से शासन करती आई हैं, मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान मुख्यमंत्री के रूप में अपने चौथे कार्यकाल से कुछ ही दूर रह गए। हाँ, छत्तीसगढ़ में ज़रूर कॉन्ग्रेस को एकतरफा जीत मिली लेकिन मुख्यमंत्री डॉक्टर रमन सिंह की छवि पॉजिटिव है या नेगेटिव, इसे लेकर दोनों ही प्रमुख दलों में संशय है। भाजपा के सबसे लम्बे कार्यकाल वाले मुख्यमंत्री के रूप में उन्हें जनता के बीच ‘चावल वाले बाबा’ के नाम से जाना गया। तीनों राज्यों में कॉन्ग्रेस की सरकार तो बनी लेकिन सत्ता से बाहर हुई भाजपा ने शायद हार के बाद की भी तैयारियाँ पहले से ही कर रखी थी।

सिंधिया बाहर, कर्ज माफी पर आक्रोश और शिवराज की छवि

सबसे पहले बात करते हैं मध्य प्रदेश की क्योंकि तीनो राज्यों में सबसे ज्यादा लोकसभा सीटें इसी राज्य में आती हैं। मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री कमलनाथ के बारे में हाल ही में साध्वी प्रज्ञा ने तंज कसा कि वह सिर्फ़ छिंदवाड़ा के मुख्यमंत्री हो कर रह गए हैं। एक तरह से उनकी बात बहुत हद तक सही है क्योंकि छिंदवाड़ा से कमलनाथ के पुत्र नकुल नाथ चुनाव लड़ रहे हैं और आपको बता दें कि कमलनाथ ने चुनाव प्रचार ख़त्म होने के अंतिम 2 दिन छिंदवाड़ा में गुज़ारे ताकि अपने बेटे की जीत सुनिश्चित कर सकें। नकुल नाथ अपना पहला लोकसभा चुनाव लड़ रहे हैं और पिता कमलनाथ का सारा ध्यान अपने बेटे की जीत सुनिश्चित करने पर है। छिंदवाड़ा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पिछले 40 वर्षों से यहाँ कमलनाथ सांसद हैं। बीच में एक वर्ष के लिए भाजपा ने यहाँ जीत दर्ज की थी और एक वर्ष उनकी पत्नी अलका नाथ सांसद रही थीं।

मध्य प्रदेश में कमलनाथ के काफ़ी हद तक छिंदवाड़ा और अपने पुत्र में सीमित हो जाने के कारण कॉन्ग्रेस को घाटा होना तय है। प्रदेश के उप मुख्यमंत्री और विधानसभा चुनावों के दौरान काफ़ी मेहनत करने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया को उत्तर प्रदेश की ज़िम्मेदारी दे दी गई है। इस क्रम में उनके पास न तो मध्य प्रदेश कॉन्ग्रेस कमिटी के लिए समय है और न ही सरकार के लिए। उत्तर प्रदेश का रण पूरे भारत में सबसे कठिन है और कुछ हलकों में चर्चा यह भी है कि सिंधिया को वहाँ बलि का बकरा बनाने के लिए भेजा गया है। मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के बीच फँसे सिंधिया की स्थिति का अंदाज़ा इसी बात से लगा लीजिए कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता भी उनसे नाराज़ हैं। सिंधिया को कार्यकर्ताओं ने निष्क्रिय बताया

सर्वविदित है, कमलनाथ और सिंधिया, दोनों ही एमपी में सीएम पद के दावेदार थे और राहुल गाँधी ने मुख्यमंत्री के नाम की घोषणा से पहले दोनों के साथ फोटो डालकर यह जताने की कोशिश की थी कि पार्टी में सब ठीक है। राजनीतिक विश्लेषकों का यह भी मानना है कि राज्य में सत्ता के 2 केंद्र न हो जाएँ, इसे देखते हुए सिंधिया को बाहर रखा जा रहा है। बीच में यह भी ख़बर आई थी कि कमलनाथ चाहते हैं कि दिग्विजय अगर चुनावी राजनीति में वापसी करते हैं तो वह राज्य की सबसे कठिन सीट चुनें और फलस्वरूप उन्हें भोपाल से लड़ाया गया जहाँ पिछले 8 चुनावों या यूँ कहें 30 सालों से भाजपा का कब्ज़ा है। साध्वी प्रज्ञा के आने से यहाँ मुक़ाबला और रोचक हो गया।

मध्य प्रदेश में कॉन्ग्रेस को विधानसभा चुनावों जैसी सफलता न मिलने के पीछे एक और कारण यह भी हो सकता है कि जिस कर्ज़ माफ़ी के मुद्दे पर पूरा विधानसभा चुनाव केंद्रित था, उस पर कोई ख़ास प्रोग्रेस नहीं हुई है। किसानों में आक्रोश है और आचार संहिता से पहले ही इसका बहाना बना कर अधिकतर किसानों को चुनाव बाद कर्ज़ माफ़ करने की बात कही गई। ऊपर से इसमें बड़े स्तर पर अनियमितता की ख़बरें आईं। कई किसानों का एक रुपया और दस रुपया का कर्ज़ माफ़ हुआ। भाजपा को इस आक्रोश का फायदा मिल सकता है। शिवराज सिंह चौहान की छवि चुनाव हारने के बाद और बढ़ी है क्योंकि उन्होंने क़रीबी मामला होने के बावजूद जोड़-तोड़ की कोशिश नहीं की और कॉन्ग्रेस सरकार के शपथ ग्रहण समारोह में सहर्ष गए।

राजस्थान के रण में मोदी फैक्टर महत्वपूर्ण

राजस्थान में विधानसभा चुनाव पूरी तरह वसुंधरा राजे पर केंद्रित था। कुछ विश्लेषक कहते हैं कि भाजपा ने जनता के रुख को भाँपते हुए चुनाव से ऐन पूर्व इसे वसुंधरा केंद्रित बना दिया ताकि केंद्र सरकार के विरुद्ध किसी भी तरह की नेगेटिव बातें न हो। राजस्थान में चले ‘वसुंधरा तेरी खैर नहीं, मोदी तुझसे बैर नहीं’ को इसी क्रम में देखा गया। इसीलिए राष्ट्रीय मीडिया में भी यहाँ के चुनाव परिणाम को राज्य सरकार के प्रति नाराज़गी और ‘Anti-Incumbency’ फैक्टर की वजह से कॉन्ग्रेस के पक्ष में जाना माना गया। राजस्थान में केंद्र सरकार के प्रति नाराज़गी का कोई मुद्दा ही नहीं रहा और इस बारे में बात ही नहीं हुई। इससे भाजपा को मोदी के नाम पर फिर से चुनाव में जाने का मौक़ा मिल गया।

अभी हाल ही में कॉन्ग्रेस नेता व उप-मुख्यमंत्री सचिन पायलट ने एक सभा में कहा कि राज्य में भाजपा सरकार के पाँच वर्षों में मोदी और वसुंधरा के बीच 36 का आँकड़ा चलता रहा। इस नैरेटिव के भाजपा के पक्ष में जाने की उम्मीद इसीलिए है क्योंकि अगर प्रदेश में वसुंधरा के प्रति लोगों में नाराज़गी होगी भी तो यह मोदी के प्रति सहानुभूति में बदल जाएगी। कॉन्ग्रेस ने अनजाने में ही सही, मोदी-वसुंधरा को अलग-अलग रखकर लोगों को यह अहसास दिला दिया है कि विधानसभा और लोकसभा चुनावों में अंतर है। पाकिस्तान से लगे राजस्थान में एयर स्ट्राइक के बाद यह माहौल बना है कि मोदी सरकार दुश्मनों को कड़ी भाषा में जवाब देने में सक्षम है और देश को लेकर सजग है।

मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बेटे वैभव गहलोत नकुल नाथ की तरह ही अपना पहला लोकसभा चुनाव लड़ रहे हैं और जोधपुर में उनका मुक़ाबला मौजूदा भाजपा सांसद गजेंद्र सिंह से है। कमलनाथ की तरह ही अशोक गहलोत का भी ध्यान अपने बेटे की जीत सुनिश्चित करने पर है और सामने पिछले चुनाव में 66% से भी अधिक वोट पाने वाले गजेंद्र सिंह शेखावत के होने के कारण पिता-पुत्र इस सीट को गम्भीरतापूर्वक ले रहे हैं। यहाँ से 5 बार सांसद रहे अशोक गहलोत की भी स्थिति ऐसी ही है जैसी छिंदवाड़ा में कमलनाथ की। बस अंतर इतना है कि जोधपुर में विपक्षी प्रत्याशी बहुत ज़्यादा मज़बूत है। जोधपुर से 300 किलोमीटर की दूरी पर पाकिस्तानी सीमा है और बालाकोट यहाँ भी मुद्दा है।

छत्तीसगढ़ में ‘महाराजा’ को बाहर भेजा

छत्तीसगढ़ में भाजपा की हार काफ़ी शॉकिंग थी क्योंकि अधिकतर एग्जिट पोल्स भी यहाँ भाजपा के पक्ष में खंडित जनादेश की भविष्यवाणी कर रहे थे। लेकिन, यहाँ मध्य प्रदेश और राजस्थान से अलग परिणाम आए। मुक़ाबला एकतरफा रहा और कॉन्ग्रेस को आसान जीत मिली। परिणाम यह हुआ कि मुख्यमंत्री रमन सिंह के बेटे जो कि अभी सांसद हैं, सहित राज्य के सभी 10 सांसदों का टिकट काट दिया गया। हार का खामियाज़ा उन सभी को भुगतना पड़ा और सीधा पार्टी हाईकमान द्वारा लिए गए निर्णय में पिछले चुनाव में जीती गई 10 की 10 सीटों पर नए प्रत्याशी उतारे गए। हाल में बढ़ी नक्सली घटनाओं को भी भाजपा ने मुद्दा बनाया है।

छत्तीसगढ़ को लेकर अभी अनुमान लगाना काफ़ी मुश्किल है लेकिन प्रदेश में कॉन्ग्रेस के सबसे बड़े नेता और सरजुगा के महाराजा त्रिभुनेश्वर शरण सिंह देव को ओडिशा का प्रभारी बना कर भेज दिया गया है। छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंह देव को छत्तीसगढ़ से बाहर भेजना कॉन्ग्रेस की उसी नई रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जहाँ प्रदेश के दूसरे सबसे बड़े नेता को मुख्यमंत्री के साथ टकराव रोकने के लिए किसी अन्य राज्य का प्रभार दे दिया जाता है। भाजपा ने अभी तक रमन सिंह का नाम उस आक्रामकता के साथ प्रयोग नहीं किया है, जैसा वह पिछले चुनावों में करती आई है। यहाँ भी पार्टी मोदी के नाम पर ही पूरी तरह मैदान में है और वो भी सारे नए चेहरों के साथ।

पाकिस्तान को यूरोपियन पार्लियामेंट की चेतावनी: बंद हो सकती हैं सभी सब्सिडियाँ

30 अप्रैल 2019 को यूरोपियन पार्लियामेंट के 51 सदस्यों ने सामूहिक रूप से पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान को एक पत्र लिखा और अल्पसंख्यकों पर हो रहे अत्याचारों और उनकी हत्याओं पर चिंता प्रकट की। उन्होंने इमरान खान से पाकिस्तान में रह रहे अल्पसंख्यकों की सुरक्षा का आश्वासन माँगा।

पत्र में कहा गया कि आज का पाकिस्तान मुहम्मद अली जिन्नाह के पाकिस्तान के एकदम अलग है। पत्र के अनुसार जिन्नाह एक ऐसा पाकिस्तान चाहते थे जहाँ बहुसंख्यक समुदाय विशेष के साथ ईसाई, सिख, हिन्दू, अहमदिया सभी को समान अवसर मिलें लेकिन बीते सत्तर वर्षों में पाकिस्तान के हुक्मरानों ने विभाजनकारी नीतियाँ अपनाईं जिससे पाकिस्तान में रह रहे अल्पसंख्यकों पर चरमपंथी बहुसंख्यकों द्वारा हिंसक अत्याचार किए गए।

पत्र में पाकिस्तान की आलोचना की गई और आसिया बीबी नामक ईसाई महिला पर लगाए गए ईशनिंदा के झूठे आरोपों और अतंतः दिए गए मृत्युदंड की निंदा की गई।

यूरोपियन पार्लियामेंट के सदस्यों ने पाकिस्तान से गुज़ारिश की है कि वो उन संस्थागत और संवैधानिक ढाँचों को ध्वस्त करे जिनके कारण अल्पसंख्यकों को लक्षित कर अत्याचार किए जा रहे हैं। सदस्य देशों ने कहा है कि यदि पाकिस्तान अपने यहाँ अल्पसंख्यकों पर हो रही हिंसा को बंद नहीं करता तो यूरोपियन कमीशन पाकिस्तान को दी जाने वाली हर प्रकार की सब्सिडी और व्यापार में छूट बंद करने को बाध्य होगा।

केरल: अल्पसंख्यक कॉलेज में बुर्क़ा पहनने पर लगा प्रतिबंध, मुस्लिम संगठनों ने जताई आपत्ति

श्री लंका में बुर्क़े पर प्रतिबंध लगाने की बात चल ही रही थी कि इसी बीच केरल के एक अल्पसंख्यक कॉलेज ने बुर्क़ा पहनकर आने पर पाबंदी लगाने से संबंधित सर्कुलर जारी कर दिया गया है। ख़बर के अनुसार, केरल के मल्लपुरम में चलाए जा रहे इस अल्पसंख्यक कॉलेज में बुर्के पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। यह कॉलेज मुस्लिम एजुकेशन सोसायटी द्वारा संचालित है। इस सर्कुलर के ख़िलाफ़ कुछ स्थानीय संगठनों ने आपत्ति दर्ज की है।

ऐसा माना जा रहा है कि लोकसभा चुनाव के मद्देनज़र यह फ़ैसला लिया गया है, इसलिए इसका विरोध किया जा रहा है। ज्ञात हो कि अभी कुछ रोज पहले श्री लंका में आतंकी हमला हुआ था जिसमें 300 से अधिक लोगों के मारे जाने की ख़बर थी और लगभर 500 लोग घायल हुए थे। वहाँ की सरकार ने मुँह ढकने वाले हर तरह के कपड़ों पर प्रतिबंध लगाने का फ़ैसला लिया था।

इसी के मद्देनज़र शिवसेना ने अपने अपने मुखपत्र ‘सामना’ में बाक़ायदा संपादकीय लेख के माध्यम से प्रधानमंत्री मोदी से भारत में बुर्क़े पर प्रतिबंध लगाने की माँग की थी। शिवसेना की इस माँग का समर्थन भोपाल से बीजेपी उम्मीदवार साध्वी प्रज्ञा ने भी किया था, लेकिन बीजेपी ने इस पर कोई गंभीरता न दिखाते हुए इस माँग को ख़ारिज करना उचित समझा। बीजेपी प्रवक्ता जीवीएल नरसिम्हा राव ने ‘सामना’ के संपादकीय पर अपनी प्रतिक्रिया दर्ज करते हुए कहा कि इस तरह के प्रतिबंध की आवश्यकता नहीं है। बीजेपी के अलावा एनडीए के ही एक अन्य सहयोगी रामदास आठवले ने शिवसेना की माँग को एक सिरे से ख़ारिज किया। उनका कहना था कि यह एक परंपरा का हिस्सा है, जिस पर प्रतिबंध लगाने की ज़रूरत नहीं है।

शिवसेना की माँग पर ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहालुक मुस्लिमीन (AIMIM) के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने कड़ा ऐतराज़ जताया। उन्होंने कहा कि यह हमारा मानवाधिकार है जोकि संविधान में निहित है। सभी पर हिन्दुत्व नहीं लागू किया जा सकता। हो सकता है कि कल को यह कह दिया जाए कि आपके चेहरे पर दाढ़ी ठीक नहीं है, टोपी मत पहनिए।

इशरत जहाँ एनकाउंटर: पूर्व पुलिस अधिकारी डीजी वंजारा को अदालत ने किया आरोप मुक्त

इशरत जहाँ एनकाउंटर मामले में सीबीआई की विशेष अदालत ने गुजरात के पूर्व पुलिस अधिकारी डीजी वंजारा को आरोप मुक्त कर दिया है। उनके अलावा पूर्व पुलिस अधिकारी एनके अमीन को भी आरोपों से मुक्त कर दिया गया। इससे पहले गुजरात हाई कोर्ट ने दोनों पर मुक़दमा चलाने से इनकार कर दिया था। हाई कोर्ट के इस निर्णय के बाद दोनों पूर्व पुलिस अधिकारियों ने अपने ऊपर लगे चार्जेज को हटाने की माँग की थी।

जस्टिस जेके पांड्या ने दोनों को आरोप मुक्त करते हुए कहा कि चूँकि गुजरात सरकार ने इन पर मुक़दमा चलाने की स्वीकृति नहीं दी, इसीलिए इन्हें आरोप मुक्त किया जाता है। ‘कोड ऑफ क्रिमिनल प्रोसीजर (CRPC)’ के सेक्शन 197 के अनुसार, आधिकारिक ड्यूटी के दौरान किए गए कार्य के लिए किसी सरकारी कर्मचारी के ऊपर मुक़दमा चलाने हेतु सरकार की स्वीकृति चाहिए होती है।

इसके साथ ही इनके ख़िलाफ़ सारे मामले ख़त्म कर दिए जाएँगे। पुलिस बता चुकी है कि इशरत जहाँ एक आतंकी थी, जो गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को मारने की साज़िश रचने में शामिल थी। अहमदाबाद में चली सुनवाई के दौरान सीबीआई ने अदालत को बताया कि राज्य सरकार ने दोनों के ख़िलाफ़ मुक़दमा चलाने की स्वीकृति नहीं दी है। ज्ञात हो कि मुंबई के नजदीक स्थित मुंब्रा की रहने वाली 19 वर्षीय इशरत जहाँ, जावेद शेख उर्फ प्राणेश पिल्लै, अमजद अली अकबर अली राणा और जीशान जौहर की 15 जून, 2004 को अहमदाबाद के बाहर पुलिस के साथ हुई मुठभेड़ में मौत हो गई थी।

बाद में कई लोगों ने इस एनकाउंटर को फेक बताया था। कॉन्ग्रेस नेता और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने कई मौक़ों पर इस एनकाउंटर पर सवाल खड़े किए थे। डीजी वंजारा इस मामले में 2007 से लेकर 2015 तक जुडिशल कस्टडी में थे। उन्हें 2015 में ज़मानत मिली थी। उन्हें अगस्त 2017 में सोहराबुद्दीन शेख एनकाउंटर मामले में भी बरी किया जा चुका है।