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जयाप्रदा भाजपा में शामिल, ‘भैया’ आजम खां के खिलाफ ठोक सकतीं हैं ताल

तमाम कयासों-अटकलों और हाँ-ना के बाद आखिरकार आज अभिनेत्री जयाप्रदा भाजपा में शामिल हो ही गईं। काफी समय से यह कयास लगाए जा रहे थे कि वे ऐसा कर सकतीं हैं। संकेत तभी ही मिल गए थे जब जयाप्रदा के राजनीतिक गुरु और सपा के पूर्व क्षत्रिय क्षत्रप अमर सिंह ने प्रधानमंत्री मोदी के ‘मैं भी चौकीदार’ अभियान के तहत अपने ट्विटर हैण्डल पर ‘चौकीदार’ अपने नाम में जोड़ा था। दरअसल अपने पूरे राजनीतिक कैरियर में जयाप्रदा अपने गुरु अमर सिंह की ही लकीर पर चलती आईं हैं- जब अमर सिंह को सपा की आतंरिक कलह ने किनारे कर दिया था तो जयाप्रदा को भी पार्टी ने बाहर का रास्ता दिखा दिया।

एनटीआर लाए राजनीति में

आज जयाप्रदा की राजनीतिक निष्ठा यद्यपि अमर सिंह के साथ मानी जाती है पर एक समय एनटी रामा राव उन्हें तेदेपा (तेलुगु देशम पार्टी) में काफी आग्रह के बाद लाए थे। तेदेपा ने ही जयाप्रदा को 1996 में राज्यसभा भी भेजा। पर फिर जयाप्रदा और तेदेपा सुप्रीमो चंद्रबाबू नायडू के राजनीतिक मत नहीं मिले और जयाप्रदा ने तेदेपा से इस्तीफा दे दिया।

सपा में पारी  

समाजवादी पार्टी में शामिल होने के बाद जयाप्रदा ने रामपुर लोकसभा सीट 85000 मतों से जीती। पर यहाँ उनके राजनीतिक गुरु बने अमर सिंह की रामपुर के ‘किंग’ आजम खां से नहीं बनती थी, इसलिए जयाप्रदा के भी रिश्ते आजम खां से कभी सहज नहीं रहे।

2010 में जब अमर सिंह को पार्टी के महासचिव रहते हुए भी अन्दर के ‘सपोर्ट’ की आवश्यकता पड़ी तो जयाप्रदा उनके पक्ष में खुल कर उतर आईं- और पार्टी-विरोधी गतिविधियों के आरोप में उन्हें भी सपा सुप्रीमो ने निष्कासित कर दिया।

2014 में उन्होंने रालोद का झंडा थामा और बिजनौर का लोकसभा चुनाव लड़ा, लेकिन भाजपा के कुँवर भारतेन्द्र सिंह से पार न पा सकीं।

आजम खां से अदावत  

आजम खां और जयाप्रदा की तू-तू-मैं-मैं सपा के भीतर की ‘अर्बन लेजेंड’ है। 2004 में 85000 मतों से बाजी मारने वालीं जयाप्रदा की जीत का अंतर 2009 में गिरकर 30000 बचा। इसके पीछे भी आजम खां का ‘हाथ’ हटा लेना कारण माना गया।

आमतौर पर जयाप्रदा आजम खां को ‘भैया’ कहतीं हैं, पर विवादित फिल्म पद्मावत जब रिलीज हुई तो उन्होंने चुटकी लेते हुए कहा कि फिल्म के खलनायक अलाउद्दीन खिलजी को देखकर उन्हें आजम खां याद आ गए। आजम खां भी जयाप्रदा को ‘नचनिया’ और ‘घुंघरू वाली’ कह चुके हैं।

अंध-क्षेत्रीयता: 85% आरक्षण माँग कर दिल्ली को कश्मीर बनाना चाह रहे हैं केजरीवाल

चाहे वो कोई भी पार्टी हो, स्थानीय राजनीतिक दल अक्सर अधिक के अधिक वोट पाने के चक्कर में अंध-क्षेत्रीयता को बढ़ावा देते हैं। चाहे वो महाराष्ट्र में शिवसेना या मनसे हो या फिर बंगाल में तृणमूल। इन दलों को ऐसा लगता है कि स्थानीय लोगों को ये एहसास दिला कर अपने पक्ष में लामबंद किया जा सकता है कि ‘बाहरी’ राज्यों के लोग कथित रूप से उनका हक़ मार रहे हैं। तमिलनाडु में हिंदी के विरुद्ध छेड़ा गया आंदोलन, कर्नाटक में लिंगायत समुदाय को अलग धार्मिक संप्रदाय बनाने की कोशिश, महाराष्ट्र में बिहारियों को पीट कर भगाना, असम से उत्तर भारतीयों को निकालना- ये सब उसी अंध-क्षेत्रीयता के रूप हैं। लेकिन, अभी तक ये गूँज दिल्ली नहीं पहुँची थी। वैसे तो कश्मीर को छोड़ दें तो भारत का कोई भी नागरिक देश के किसी भी हिस्से में बस सकता है।

भारत के किसी भी नागरिक को देश के किसी भी हिस्से में बिना रोक-टोक शिक्षा हासिल करने, नौकरी करने और रहने का अधिकार है। असम का कोई नागरिक तमिलनाडु में नौकरी कर सकता है। कोई बंगाली आंध्र प्रदेश के किसी कॉलेज में दाखिला ले सकता है। ऐसी ही हमारे देश की व्यवस्था है। और, दिल्ली तो इस विशाल देश की राजधानी है, देश का सबसे व्यस्त क्षेत्र है। यहाँ देश के कोने-कोने से लोग आते हैं और रहते हैं। लेकिन अब अरविन्द केजरीवाल ने दिल्ली को भी कश्मीर बनाने की वकालत शुरू कर दी है। आज कश्मीर अशांत है, वहाँ आतंकी हमले होते हैं, वहाँ से कश्मीरी पंडितों को भगा दिया जाता है, वहाँ सेना की तैनाती रखनी पड़ती है, यह सब क्यों?

ऐसा इसीलिए, क्योंकि कश्मीर में देश के दूसरे हिस्से के लोग बस नहीं सकते। वहाँ उन्हें ज़मीन ख़रीदने का अधिकार नहीं है। अगर भारत के अन्य हिस्से के लोग भी कश्मीर में जाकर बसते तो शायद आज कश्मीर की ये हालत न होती। कश्मीर पुराने समय में शांत था क्योंकि वहाँ विविधता थी, वहाँ हिन्दू, बौद्ध और मुस्लिम सभी थे। आज़ादी के बाद हमारे नीति-नियंताओं की लापरवाही के कारण वो विविधता ख़त्म हो गई। यहाँ हम केजरीवाल की बात करते हुए ये सब इसीलिए बता रहे हैं क्योंकि दिल्ली के मुख्यमंत्री ने कुछ ऐसा ही बयान दिया है जो इस डर को जायज बनाता है। आगे बढ़ने से पहले अरविन्द केजरीवाल के इस बयान को देखते हैं और समझने की कोशिश करते हैं कि उन्होंने क्या कहा और उसका परिपेक्ष्य क्या था?

अरविन्द केजरीवाल का 85% आरक्षण वाला रोना

पूर्वी दिल्ली से लोकसभा प्रत्याशी आतिशी के लिए चुनाव प्रचार करते हुए आप सुप्रीमो ने नौकरियों में दिल्ली के लोगों को आरक्षण देने की बात कही। पूर्ण राज्य का मुद्दा ज़ोर-शोर से उठा रहे केजरीवाल ने अब नौकरियों के बहाने राजनीति खेलने की ठान ली है। ऐसा इसीलिए, क्योंकि रोज़गार एक ऐसा मुद्दा है जिसका उपयोग कर किसी को भी बरगलाया जा सकता है। कॉन्ग्रेस भी इसी मुद्दे पर खेल रही है। उन्हें पता है कि बेरोज़गारी इस देश में दशकों से एक समस्या है और वो इसे अपना हथियार बनाना चाहते हैं। वो अपने हाथ में जो है, वो तो करते नहीं और जो हाथ में नहीं है, उसे करने का दावा कर चुनाव जीतना चाहते हैं। इसकी एक बानगी देखिए। जून 2018 में आई इंडियन एक्सप्रेस की एक ख़बर के मुताबिक़, दिल्ली के सरकारी स्कूलों में शिक्षकों के 42% पद रिक्त हैं।

शिक्षा व्यवस्था तो दिल्ली सरकार के आधीन है और केजरीवाल सरकार हैदराबाद से लेकर अंडमान-निकोबार तक विज्ञापन देकर दिल्ली के स्कूलों और विद्यार्थियों की सफता का अपने पक्ष में प्रचार करती है। दिल्ली के स्कूलों में 66,736 शिक्षकों के लिए जगह है लेकिन अभी इनमें से 38,926 सीटों को ही भरा जा सका है। दिल्ली सरकार की विफलता का आलम देखिए कि उन्होंने सिर्फ़ 58.2% सीटों को ही भरा। उसमे भी 17,000 से अधिक तो अतिथि शिक्षक हैं। आप बाकी के 41% सीटों पर भर्तियाँ कर योग्य लोगों को रोज़गार तो दे सकते हो न? उसके लिए तो पूर्ण राज्य की आवश्यकता नहीं है? तो फिर आरक्षण बीच में कहाँ से आ गया? दिल्ली के 1100 स्कूलों में 25,000 अतिरिक्त शिक्षकों की ज़रूरत है

जहाँ आपके पास 66,000 शिक्षकों के लिए जगह है, वहाँ आपके पास सिर्फ़ 21,000 रेगुलर शिक्षक हैं, मतलब सिर्फ़ 31% और आप पूर्ण राज्य बन जाने पर 85% आरक्षण की बात करते हो! अरविन्द केजरीवाल ने कहा:

“दिल्ली की नौकरियों और यहाँ के कॉलेजों में दिल्ली वालों को आरक्षण मिलना चाहिए। दिल्ली के छात्र/छात्राओं के लिए यहाँ के कॉलेजों में 85 प्रतिशत सीटें रिजर्व होनी चाहिए। दिल्ली के पूर्ण राज्य बनते ही मैं इसे लागू करूँगा। कैबिनेट ने प्रस्ताव पास कर दिया कि ठेके पर काम करने वालों की नौकरी पक्की की जाए लेकिन वो फाइल भी केंद्र सरकार लेकर बैठी है। दिल्ली पूर्ण राज्य बनेगा तो 24 घंटे में नौकरी पक्की करके दिखा देंगे।”

ख़ुद अरविन्द केजरीवाल का जन्म हरियाणा स्थित भिवानी में हुआ था। पढ़ाई के लिए वो पश्चिम बंगाल के खड़गपुर में गए। नौकरी उन्होंने झारखण्ड के जमशेदपुर में की। समाज सेवा उन्होंने कोलकाता में की। राजनीति वो दिल्ली में कर रहे हैं। हाँ, इलाज कराने वो बंगलुरु जाते हैं। इसके लिए उन्हें किसी आरक्षण की ज़रूरत पड़ी क्या? बाहरी और स्थानीय की राजनीति का खेल शुरू कर चुके केजरीवाल राजनीति के दलदल में इतने गहरे उतर चुके हैं कि कहीं जनता उन्हें भी बाहरी बना कर निकाल न फेंके! जब मूल रूप से एक हरियाणवी दिल्ली का मुख्यमंत्री बन सकता है, पंजाबी परिवार से आने वाली कपूरथला में जन्मीं शीला दीक्षित दिल्ली की सबसे लम्बे कार्यकाल वाली मुख्यमंत्री रह सकती हैं, एक बिहारी (मनोज तिवारी) दिल्ली में विश्व की सबसे बड़ी पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बन सकता है, तो दिल्ली के बाहर से आने वालों को यहाँ पढ़ने और नौकरी करने से क्यों रोका जाए?

महाराष्ट्र वाली घटना से सीखें केजरीवाल

2008 में कुछ ऐसा ही समय आया था जब मनसे और सपा कार्यकर्ताओं के बीच झड़प का मराठी क्षेत्रीय दलों ने ख़ूब फ़ायदा उठाया और परिणाम स्वरूप 15,000 से भी अधिक उत्तर भारतीयों को नासिक और 25,000 से भी अधिक को पुणे छोड़ कर जाना पड़ा था। इनमें से अधिकतर छोटे कामगार थे, टैक्सी ड्राइवर्स थे और छात्र थे। इस से हानि स्थानीय सिस्टम को होती है। इसकी एक बानगी देखिए। इन विवादों के कारण सबसे बड़ी भारतीय आईटी कंपनियों में से एक इनफ़ोसिस ने 3000 पदों को चेन्नई शिफ्ट कर दिया था। इस से किसका घाटा हुआ? राजनीतिक दलों के इस अंध-क्षेत्रीयता वाले हंगामे के बीच पुणे को हानि हुई, जो चेन्नई का फ़ायदा बन गया। दिल्ली में तो भला कई कम्पनियाँ स्थित हैं, उनके दफ़्तर हैं, कारखाने हैं, कहीं केजरीवाल के आरक्षण वाली माँग के कारण दिल्ली कश्मीर न बन जाए।

कुल मिलाकर देखें तो अरविन्द केजरीवाल ने जब बात बनते नहीं देखा तो ये दाँव चल कर दिल्ली वासियों को अपने पाले में करने की कोशिश की है। आज जब एक ग्लोबल विश्व की परिकल्पना साकार होती दिख रही है, दुनिया तेज़ी से सम्पूर्ण डिजिटलाइजेशन की तरफ बढ़ रही है, अरविन्द केजरीवाल पुरानी संकीर्णता को ज़िंदा कर के चुनावी फसल काटने का बीड़ा उठाए हुए हैं। जिस दिल्ली ने देश के कोने-कोने से लोगों को बुला कर अपना बना लिया, उस दिल्ली में ये चुनावी संकीर्णता शायद ही चले। साथ ही AAP सरकार यह भी जवाब दे कि ग़रीबों को केंद्र सरकार द्वारा दिया गया 10% आरक्षण अभी तक दिल्ली में क्यों रोक कर रखा गया है?

‘आप इस्लाम कबूल करें, मेरी इच्छा है कि मैं जन्नत में आपके साथ रहूँ’, न्यूजीलैंड PM से किसने कही मन की बात?

न्यूजीलैंड की मस्जिदों पर हुए हमले के बाद न्यूजीलैंड की सभी राजनीतिक पार्टियों के नेताओं ने मुस्लिम समुदाय के साथ अपनी एकजुटता व्यक्त की, जिस कारण यह सद्भावना का प्रयास दुनियाभर में सराहा गया है। लेकिन एक वीडियो सोशल मीडिया में आजकल चर्चा में है, जिसमें एक मुस्लिम युवक को भावनाओं में बहकर न्यूजीलैंड की प्रधानमंत्री को इस्लाम स्वीकारने की सलाह देते हुए देखा जा रहा है। साथ ही, इस युवक ने यह इच्छा भी व्यक्त की है कि वो मिस अर्डर्न के साथ जन्नत में रहे।

एक मुस्लिम युवक और पीएम अर्डर्न के बीच एक संवाद वायरल हुआ है, जिसमें उन्होंने न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री को इस्लाम अपनाने के लिए आमंत्रित किया है। मिस अर्डर्न ने युवक को ध्यान से सुना और मुस्कुराते हुए इस्लाम में प्रवेश करने के उनके निमंत्रण का जवाब भी दिया।

शख्स ने कहा, “सच कहूँ, जिसने मुझे यहाँ लाया है वह आप हैं। मैं पिछले तीन दिनों से हर दिन रो रहा हूँ। मैं अल्लाह से एक दुआ कर रहा हूँ और मैंने कहा कि काश अन्य नेता आपके नेतृत्व कौशल को देख सकें और मेरी एक और इच्छा है कि मैं आशा करता हूँ कि एक दिन आप इस्लाम में प्रवेश करें। मेरी इच्छा है कि मैं जन्नत में आपके साथ रहूँ।”

इस पर, मिस अर्डर्न ने जवाब देते हुए कहा, “इस्लाम मानवता सिखाता है और मुझे लगता है कि यह मेरे पास है।”

विगत दिनों न्यूजीलैंड में हुए इस हमले में मारे गए परिजनों के साथ पीएम अर्डर्न की सहानुभूति की दुनियाभर में खूब प्रशंसा हुई। आतंकी हमले के बाद पीएम ने मस्जिद का दौरा किया और शोक में डूबे परिवारों से मुलाकात की। ऐसे ही एक पीड़ित परिवार से मुलाकात के लिए पीएम जब हिजाब पहनकर पहुँची तो विश्वभर के नेताओं ने उनकी खूब तारीफ की थी।

कड़ी मेहनत का भारत को मिला परिणाम, अक्षय ऊर्जा मामले में चीन से निकला आगे

वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (WEF)द्वारा सोमवार (मार्च 25, 2019) को जारी रिपोर्ट में बताया गया कि अक्षय ऊर्जा के मामले में 115 देशों की सूची में भारत ने दो पायदान की बढ़त बनाई है। इस सूची में भारत को 76वाँ स्थान प्राप्त हुआ है। ब्रिक्स देशों में केवल भारत ही एक ऐसा देश है जिसकी स्थिति में अब तक इस मामले में सुधार देखा गया है। पर्यावरण की बिगड़ती स्थिति को सुधारने के लिहाज से भारत की अक्षय ऊर्जा बढ़ाने की यह गति निसंदेह की सराहनीय है। जिसका उल्लेख रिपोर्ट में भी है। भारत ने इस सूची में चीन को पछाड़ दिया है। चीन इस सूची में 82वें पायदान पर है।

भारत की अक्षय ऊर्जा मामले में हुई इस बढ़त के लिए राजनैतिक नेतृत्व की भी तारीफ़ जरूर होनी चाहिए। क्योंकि भारत सरकार द्वारा लगातार पर्यावरण के लिए उठाए जाने वाले कदमों के कारण ही भारत की अक्षय ऊर्जा की क्षमता 73 गीगावाट हुई है, जोकि देश की कुल ऊर्जा उत्पादन का 20 फीसदी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि जटिल और पुराने ऊर्जा सिस्टम होने के बावजूद भी भारत तेजी से अक्षय उर्जा की ओर कदम बढ़ाने के लिए काम कर रहा है।

आज भारत में अक्षय ऊर्जा का उत्पादन अब परंपरागच ऊर्जा से अधिक होने लगा है। जिसका मुख्य कारण सरकार द्वारा दी जा रही सब्सिडी है। देश में अक्षय ऊर्जा के विस्तार को देखकर लगता है कि भारत इस क्षेत्र में और अधिक तेजी से विकास करेगा। इसके लिए सुदूर के क्षेत्रों में सुरक्षाबल भी स्थानीय लोगों को अक्षय ऊर्जा के प्रयोंग के लिए जागरूक करने के लिए प्रयासरत है।

WEF की रिपोर्ट के अनुसार अक्षय ऊर्जा उत्पादन के मामले में शीर्ष स्थानों पर 10 यूरोपीय देश हैं।

  • स्वीडन
  • स्विटजरलैंड 
  • नॉर्वे
  • फिनलैंड
  • डेनमार्क
  • ऑस्ट्रिया
  • यूनाइटेड किंगडम
  • फ्रांस
  • नीदरलैंड
  • आइसलैंड

अक्षय ऊर्जा क्या है?

अक्षय ऊर्जा वह ऊर्जा है जो प्रदूषण का कारण नहीं बनती, तथा जिनके स्त्रोतों का क्षय नहीं होता या फिर जिनके स्रोतों का पुन: इस्तेमाल होता रहा है। पवन ऊर्जा, जलविद्युत ऊर्जा, ज्वारभाटा से प्राप्त ऊर्जा, बायोमास, सौर ऊर्जा आदि अक्षय ऊर्जा के कुछ उदाहरण हैं।

कुछ समय पहले आए सरकार के आँकड़ों के अनुसार देश की अक्षय ऊर्जा की स्थापित क्षमता 58, 300 मेगावॉट है। सरकार ने 2022 तक इसे बढ़ाकर 1,75,000 मेगावाट रखने का लक्ष्य रखा है। जिसमें 1,00,000 मेगावाट क्षमता सौर ऊर्जा की होगी। इसी के साथ बता दें कि आईए (अंतराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी) ने अपनी हालिया रिपोर्ट में बताया था कि 2022 तक भारत की अक्षय ऊर्जा क्षमता दोगुने से अधिक हो जाएगी।

₹72000 वाले वादे पर कॉन्ग्रेस ने फिर चली ‘चाल’: परिवार के बाद अब कर दी महिलाओं की बात

कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने कल बड़ा चुनावी वादा करते हुए देश के 20 प्रतिशत सबसे गरीब लोगों को हर साल 72000 रुपए देने का ऐलान किया था। आज उसी न्यूनतम आय योजना को लेकर कॉन्ग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हुए कल वाली घोषणा पर ‘नियम व शर्तों’ जैसी कुछ बात की। सुरजेवाला ने शुरू में वही बताया जो कल राहुल गाँधी बता चुके थे – इस योजना के तहत देश के सबसे गरीब 5 करोड़ परिवारों को लाभ मिलेगा। यानी करीब 25 करोड़ लोगों को इससे लाभ होगा। बाद में कहा कि योजना को लेकर हो रही उलझनों को सुलझाने के लिए उन्होंने ये प्रेस कॉन्फ्रेंस की है।

रणदीप सुरजेवाला ने कहा, “हम साफ करना चाहते हैं कि ये टॉप-अप स्कीम नहीं है। हर परिवार को 72,000 रुपया प्रति वर्ष मिलेगा। ये महिला केंद्रित स्कीम होगी। मतलब 72,000 रुपए कॉन्ग्रेस पार्टी घर की गृहणी के खाते में जमा करवाएगी। यह स्कीम शहरों और गाँवों, पूरे देश के गरीबों पर लागू होगी।”

राहुल की चुनावी चाल: गरीब परिवार को ₹72000 सलाना, 5 करोड़ फैमिली और 25 करोड़ आबादी को डायरेक्ट फायदा

कॉन्ग्रेस प्रवक्ता ने कहा कि उनकी सरकार ने पहले भी गरीबी को कम किया है। और अभी देश में जो 22 प्रतिशत गरीबी है, वो भी इस योजना से खत्म हो जाएगी। उन्होंने मनरेगा और किसानों की कर्जमाफी पर भी बात की।

बता दें कि, कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने सोमवार (मार्च 25, 2019) को ऐलान किया था कि अगर उनकी सरकार बनी तो देश के सबसे गरीब 20% परिवार को 72,000 रुपए सालाना मदद मिलेगी। इस न्यूनतम आय गारंटी योजना में अधिकतम 6000 रुपए महीने दिए जाएँगे। यानी अगर किसी गरीब परिवार की आय 12,000 से कम होगी, तो सरकार उसे अधिकतम 6,000 रुपए देकर उस आय को 12 हजार रुपए तक लाएगी।

मजदूर पति ने लाचार पत्नी के लिए बना डाला रिमोट कंट्रोल बेड, राष्ट्रपति ने अवॉर्ड देकर किया सम्मानित

तमिलनाडु के 42 वर्षीय मजदूर एस सरावना मुथु ने अपनी बीमार पत्नी की देखभाल के लिए एक ऐसी चीज का आविष्कार कर दिया, जिसकी हर तरफ चर्चा हो रही है। इस काम के लिए उन्हें नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन की तरफ से पुरस्कृत किया गया है। मुथु को ये अवॉर्ड 5 मार्च को गुजरात में राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद के हाथों मिला। बता दें कि लोहे का काम करने वाले एस सरावना मुथु ने अपनी बीमार पत्नी के लिए उसके बिस्तर को और अधिक आरामदायक बनाने के लिए रिमोट से चलने वाला टॉयलेट बेड बना दिया।

मुथु ने जो बनाया, उसकी कहानी साल 2014 से शुरू होती है। उस वर्ष मुथु की पत्नी की सर्जरी हुई थी, जिसकी वजह से उन्हें दो महीने बेड रेस्ट पर रहना पड़ा था। इस दौरान उन्हें बिस्तर पर काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता था। उन्हें उठकर वॉशरुम जाने के लिए काफी परेशानी उठानी पड़ती थी। अपनी पत्नी का ये दर्द सरावना से देखा नहीं गया। उन्होंने पत्नी के लिए कुछ करने की ठान ली और फिर उन्होंने अपनी पत्नी के लिए एक रिमोट कंट्रोल टॉयलेट बेड बना डाला।

टाइम्स ऑफ इंडिया से बात करते हुए मुथु ने बताया कि उन्हें बेड रेस्ट पर रहने वाले मरीजों की पीड़ा समझ में आ रही थी, कि वे कैसे हर चीज के लिए दूसरों के ऊपर निर्भर रहते हैं, यहाँ तक कि उनकी देखभाल करने वालों को भी परेशानी होती है। कई मामलों में तो मरीज की प्राइवेसी भी खतरे में पड़ जाती है। मरीजों की प्राइवेसी को ध्यान में रखते हुए और उनकी परेशानियों को कम करने के लिए मुथु ने रिमोट कंट्रोल बेड बनाने का फैसला किया।

अपने आविष्कार के साथ मुथु (दाएँ से तीसरे) – फोटो साभार: BCCL

मुथु ने फ्लश टैंक, सेप्टिक टैंक से लैस एक रिमोट कंट्रोल बेड बनाया है। रिमोट कंट्रोल बेड में तीन बटन हैं। एक बटन से बेड का बेस खुलता है, जबकि दूसरे से क्लोज़ेट खुलता है। वहीं तीसरा बटन टॉयलेट के फ्लश के लिए लगाया गया है।

मुथु ने इस बारे में बात करते हुए बताया कि इसे बनाने में शुरुआती दौर में उन्हें काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा था, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। मुथु इस उपलब्धि का श्रेय पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम को देते हैं। उनका कहना है कि अब्दुल कलाम ने ही उन्हें इसके लिए प्रेरित किया और उनसे मिलने के बाद ही उनके इस विचार को एक दिशा मिली। अब्दुल कलाम ही वो शख्स थे, जिन्होंने मुथु को उनके आविष्कार के लिए नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन में अप्लाई करने को कहा था।

वैसे देखा जाए तो मुथु ने इस आविष्कार से न केवल पुरस्कार जीता, बल्कि अपनी बीमार पत्नी की सुविधा के लिए इतनी बड़ी बात सोचकर लोगों का दिल भी जीत लिया। देखने में यह सिर्फ एक बेड है लेकिन जो परिवार ऐसे हालातों से गुजरते हैं, उनके लिए यह वरदान साबित हो सकता है। तभी तो मुथु को अब तक 385 ऐसे बेड बनाने के ऑर्डर मिल चुके हैं लेकिन संसाधनों की कमी के कारण उन्होंने सिर्फ एक ही बेड की डिलीवरी की है।

घर से दूर हैं तो बैठे-बैठे Voter ID में ऐसे बदलें अपना पता, समझें पूरी प्रक्रिया

अगर आप अपने घर से दूर हैं और अपने मताधिकार को बेकार नहीं जाने देना चाहते, तो आप काफ़ी आसानी से वोटर आईडी में अपना पता बदल कर वोट डाल सकते हैं। इसके लिए बहुत ही आसान प्रक्रिया है, जिसे हम यहाँ स्टेप बाय स्टेप समझा रहे हैं। नीचे चरणबद्ध तरीके से दिए गए स्टेप्स का अनुसरण करें और वोटर आईडी में अपना पता बदलें।

1.) सबसे पहले आपको फॉर्म 6 के बारे में जानना होगा जिसे आप इंटरनेट के माध्यम से घर बैठे भर सकते हैं। इसके माध्यम से आप अपने निर्वाचन क्षेत्र में बदलाव कर सकते हैं। आपको इस कार्य के लिए जिन डॉक्यूमेंट्स की ज़रूरत पड़ेगी, उन्हें तैयार रखें। ये डॉक्यूमेंट्स हैं- पासपोर्ट साइज फोटोग्राफ की स्कैन की हुई कॉपी, उम्र और पता के प्रूफ वाले डॉक्यूमेंट्स की स्कैन की हुई कॉपीज।

2.) डॉक्यूमेंट्स और फोटोग्राफ अपलोड करते समय आपको कुछ बातें ध्यान में रखनी है। आपको सपोर्टिंग डॉक्यूमेंट सेक्शन में जाकर क्लिक करना होगा ताकि आप अपलोड कर सकें। किसी भी फाइल का आकार 2 एमबी से ज्यादा नहीं हो, इस बात का ध्यान रखें।

उम्र प्रूफ के लिए स्वीकार्य डॉक्यूमेंट्स: जन्म प्रमाण पत्र, 5वीं, 8वीं या 10वीं का मार्कशीट, भारतीय पासपोर्ट, ड्राइविंग लइसेंस, आधार कार्ड।

अभी का पता प्रूफ करने के लिए स्वीकार्य डॉक्यूमेंट्स: ड्राइविंग लइसेंस, भारतीय पासपोर्ट, राशन कार्ड, रेंट एग्रीमेंट, आईटी असेसमेंट ऑर्डर, पानी/बजली/टेलीफोन/गैस/बिजली का बिल, बैंक/किसान/डाकघर का पासबुक।

3.) सबसे पहले राष्ट्रीय मतदाता सेवा पोर्टल (NVSP) की वेबसाइट पर जाएँ

मतदाता पोर्टल की वेबसाइट कुछ यूँ खुलेगी

4.) यहाँ “Apply online for registration of new voter/due to shifting from AC” पर क्लिक करें। ऐसा करते ही आपके सामने फॉर्म 6 खुल जाएगा, जिसे आपको भरना है।

फॉर्म 6 पर जाने के लिए यहाँ क्लिक करें

5.) ऊपर दाहिने कोने में जाकर अपनी भाषा चुनें। आप जो भी भाषा चुनेंगे, फॉर्म 6 उसी भाषा में खुलेगा। ये फॉर्म तीन भाषाओँ में उपलब्ध है- हिंदी, अंग्रेजी, मलयालम।

भाषा चुनें, ड्रॉपडाउन में जाकर नीचे-ऊपर स्क्रॉल कर के भाषा बदल सकते हैं

6.) फॉर्म 6 को 6 भागों में विभाजित किया गया है- Mandatory particulars, Address, Optional particulars, Supporting documents और Declaration में। आपको सभी विवरण भरने हैं। वैकल्पिक को आप इच्छानुसार छोड़ सकते हैं। फॉर्म भरने के बाद आपके SMS आएगा, जो इसकी पुष्टि करेगा।

7.) सबसे पहले ज़रूरी विवरण भरें, जैसे कि राज्य, निर्वाचन क्षेत्र, जिला इत्यादि। ये सारे विवरण आप अभी जिस निर्वाचन क्षेत्र में रह रहे हैं, उसी के अनुसार भरें।

अपने अभी के निर्वाचन क्षेत्र के हिसाब से ये विवरण भरें

8.) ‘पहली बार के मतदाता के रूप में’ या ‘अन्‍य सभा क्षेत्र से स्‍थानांतरण के कारण’ में से कोई एक चुनें। अगर आपने अपना निर्वाचन क्षेत्र बदला है तो दूसरा वाला विकल्प चुनें।

पहली बार वोट दाल रहे हैं या निर्वाचन क्षेत्र बदल रहे हैं? यहाँ चुनें

9.) अनिवार्य विकल्पों में नाम, उपनाम, नातेदार का नाम, उम्र, इत्यादि को अंग्रेजी और स्थानीय- दोनों ही भाषाओँ में भरें। अगर आप अपनी कीबोर्ड में टैब की दबाते हैं तो वेबसाइट आपके नाम को स्थानीय भाषा में ख़ुद से बदल देगा।

नाम, उम्र इत्यादि को अंग्रेजी व स्थानीय भाषा में भरें

10.) अब आप अपना स्थायी पता और अभी का पता सही-सही भरें।

वर्तमान पता भरें
अपना स्थायी पता सही-सही भरें

11.) अब आप अपना संपर्क विवरण भरें, जैसे की ईमेल पता, मोबाइल नंबर इत्यादि। अगर आप दिव्यांग हैं, तो वो भी इसी सेक्शन में मिलेगा।

संपर्क विवरण और निःशक्तता विवरण

12.) अब अपने डाक्यूमेंट्स अपलोड करें। इसके बारे में अधिक जानकारी के लिए ऊपर हमारे स्टेप 2 पर जाकर फिर से पढ़ें।

डाक्यूमेंट्स अपलोड करें

13.) घोषणा वाले सेक्शन को भरें। यह इस फॉर्म का अंतिम सेक्शन है। यहाँ Captcha डाल कर ‘भेजें’ वाले बटन पर क्लिक करें।

घोषणा वाला सेक्शन
Captcha डाल कर ”भेजें’ पर क्लिक करें

14.) अब आपको एक Reference Id मिलेगा। उसे नोट कर लें। इसी से आप अपने आवेदन की स्थिति पर नज़र रख सकते हैं।

रिफरेन्स आईडी को नोट कर लें

विरोध प्रदर्शन की आड़ में JNU के नक्सलियों द्वारा कुलपति की पत्नी पर हमला कहाँ तक उचित है?

देश के सबसे प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थानों में से एक नाम जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय का भी आता है। यहाँ से हर साल बड़ी तादाद में छात्र उच्च शिक्षा हासिल करके निकलते हैं। जेएनयू के क्लासरूम से लेकर वहाँ के परिसर स्थित ढाबों तक में आपको कई बुद्धिजीवियों का समूह सही और गलत पर फैसला करते दिख जाएँगे। साल 2016 में  नेशनल इंस्टीट्यूशल रैंकिंग फ्रेमवर्क, भारत सरकार द्वारा इस विश्वविद्यालय का नाम देश के टॉप 3 विश्वविद्यालयों की सूची में शामिल किया गया था और साल 2017 में जेएनयू इस सूची में दूसरे नंबर पर पहुँच गया था।

इतनी बड़ी उपलब्धि के बावजूद बीते कुछ सालों में जेएनयू की छवि को देश-विरोधी पाया गया। यहाँ बीते सालों में भारत तेरे टुकड़े होंगे जैसे नारे भी लगे और आतंकवादियों के समर्थन में आवाज़ें भी उठीं। आखिर क्या कारण है कि इन बीते सालों ने जेएनयू की छवि को पूरे देश के सामने बदल कर रख दिया? जहाँ की शिक्षा स्तर की गुणवत्ता का बखान करते कभी लोगों का मुँह नहीं थकता था, वही लोग अब इसे राजनीति का केंद्र मानने लगे हैं। आखिर क्यों?

क्योंकि एक तरफ जहाँ देशविरोधी नारे लगाने के बाद राजनीति में करियर बनाने वाले कन्हैया कुमार के उदय की वजह जेएनयू है, तो वहीं कल रात वहाँ के कुलपति की पत्नी पर हुए हमले का कारण भी जेएनयू ही है। जी हाँ, कल जेएनयू में इन तथाकथित बुद्धिजीवियों का एक भयानक चेहरा देखने को मिला। जिसने साफ़ कर दिया कि जेएनयू की विचारधारा पर लगते सवालिया निशान गलत नहीं हैं।

लोकतंत्र बचाने के नाम पर हो-हल्ला मचाने वाले इन बुद्धिजीवियों की भीड़ ने कल (मार्च 25, 2019) को जेएनयू कैंपस में चल रहे विरोध प्रदर्शन के चलते कुलपति के घर का घेराव किया। ताले, खिड़कियाँ, शीशे तोड़ डाले गए और सुरक्षाकर्मियों से मारपीट भी की गई। यहाँ कुलपति प्रो.जगदीश कुमार के घर पर न होने पर इस भीड़ ने अपना गुस्सा उनकी पत्नी पर निकाला। हालाँकि, सुरक्षाकर्मियों ने कुलपति की पत्नी को किसी तरह से उनके निवास से बाहर निकाला, मगर इस बीच वो घायल हो गई।

यहाँ जब ‘नक्सली’ शब्द का इस्तेमाल जेएनयू के इन बुद्धिजीवियों के लिए हो रहा है, तो बता दिया जाए कि ऐसा सिर्फ़ इसलिए क्योंकि इस हरकत के बाद नक्सलियों की नीतियों में और इनकी नीतियों में कोई फर्क़ नहीं रह गया है। उनकी लड़ाई की धरातल में भी अधिकारों और न्याय की माँग हैं, और यहाँ पर भी बुद्धिजीवियों के अनुसार वही स्थिति है। फर्क़ है तो सिर्फ़ इतना कि वह लोग घोषित रूप से नक्सलवादी है, जो शिक्षा को हथियार न मान कर उग्रता को विकल्प समझते हैं। लेकिन जेएनयू के यह बुद्धिजीवी, शिक्षा की आड़ में वह नक्सली नस्ल हैं जो एक शैक्षणिक संस्थान में उग्र विचारधारा को अपने अधिकार बताकर मज़बूत कर रहे हैं।

समाज का इतना प्रोग्रेसिव एजुकेशनल इंस्टीट्यूट, शिक्षा के क्षेत्र में बढ़ती तकनीक के इस्तेमाल पर इतनी नाराज़गी और गुस्सा कैसे दिखा सकता है। अगर मकसद सिर्फ़ शिक्षा का विस्तार है तो शायद कंप्यूटर आधारित प्रवेश परीक्षा से किसी को भी आपत्ति नहीं होनी चाहिए। आज देश की बड़ी-बड़ी परीक्षाएँ भी कम्प्यूटर के माध्यम से होती हैं। ऐसे में इस कदम का विरोध करना केवल मूर्खता को दर्शाता है। लेकिन अगर इसके बावजूद किसी पढ़े- लिखे समुदाय की ‘भीड़’ को इससे शिक्षा व्यवस्था में खतरा नज़र आता है, तो हर विरोध प्रदर्शन का एक तरीका होता है। जिसका अनुसरण करना इंसान की माँग की गंभीरता को दर्शाता है। बड़े-बुजुर्गों के मुँह से हमेशा सुना है कि एक पढ़ा-लिखा व्यक्ति अगर झाड़ू भी लगाएगा तो उसमें भी उसकी सभ्यता दिखेगी।

वैसे हैरानी वाली बात तो ये भी है कि घर में 400-500 छात्रों द्वारा तोड़-फोड़ करने और पत्नी के घायल होने के बावजूद कुलपति का कहना है कि बतौर शिक्षक उन उत्पाती छात्रों को माफ़ करते हुए उनके ख़िलाफ़ कोई कानूनी एक्शन नहीं लेंगे। प्रो.जगदीश कुमार का यह फैसला उनके आचरण में अपने छात्रों की फिक्र को झलकाता है। जबकि जेएनयू कैंपस में छात्रसंघ समेत अन्य छात्रों का आचरण किसी हमलावर भीड़ का चेहरा दिखाती है, जो जब चाहे उग्रता की किसी भी हद को पार सकती है।

इस पूरी घटना को जानकर ऐसा लगता है मानो जेएनयू ने अब हर चीज का विकल्प विवादों में तलाशने की ही ठान ली है। जिन चीजों में आपसी सहमति और सिस्टम के बनाए नियमों को आधार बनाकर प्रश्न उठाया जा सकता है, उस पर इतना विवाद… आखिर क्यों? विश्वविद्यालय प्रबंधन का कहना है कि कंप्यूटर आधारित प्रवेश परीक्षा का फैसला शैक्षिक और कार्यकारिणी परिषद में हुआ था। प्रवेश परीक्षा में बहुविकल्पीय प्रश्न पूछे जाएँगे। जिससे छात्रों को ज्यादा परेशानी नहीं होगी। अब इसमें विरोध की आवाजों का क्या औचित्य है, समझ नहीं आ रहा। अगर शिकायत है तो उसे मेज्योरिटी की इच्छा के अनुसार सवाल लायक बनाया जा सकता है। बेवजह माहौल को बिगाड़ना, शिक्षा और तकनीक में खाई बनाए रखने का समर्थन करना, कहाँ की समझदारी है, इसे तो जेएनयू वाले ही जान सकते हैं, जिनके लिए क्लासरूम की शिक्षा से ज्यादा हर धरनास्थल पर धरना देना नैतिक दायित्व बन चुका है।

हमें दीजिए गैर-हिंदू दर्जा, कम से कम ‘हिन्दू’ पहचान तो बचे: ‘मकड़जाल’ से बचने के लिए अय्यावली समुदाय की माँग

होली के ठीक पहले एक खबर आई, जो होली के उल्लास और चुनावी शोरगुल में दब गई। खबर थी – तमिलनाडु के अय्यावली संप्रदाय (Ayya Vazhi sect) द्वारा हिन्दू धर्म से अलग मान्यता की माँग उठाए जाने की। अय्यावली संप्रदाय ने जो कारण बताया है, वही खबर की जान है। माँग के पीछे का कारण है – तमिलनाडु का मंदिर प्रबंधन विभाग, हिन्दू रिलीजियस एण्ड चैरिटेबल एण्डॉमेंट डिपार्टमेंट (HR&CE department) के हाथों अपने संप्रदाय की परम्पराओं में छेड़-छाड़ की आशंका और उससे अपनी पहचान को बचाए रखने की कोशिश।

अपनी माँग को लेकर अय्यावली संप्रदाय के मुखिया बालप्रजापति आदिगालार साफ कहते हैं कि यह कदम उन्हें अपने संप्रदाय के विशिष्ट स्वरूप को सुरक्षित रखने के लिए उठाना पड़ रहा है। संप्रदाय के पवित्र स्थल स्वामीतोप में मीडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा, “संप्रदाय के भक्त केवल आध्यात्मिक सेवाएँ और कर्मकाण्ड करते हैं जबकि HR&CE विभाग प्रशासनिक हस्तक्षेप करना चाहता था।”

राजनीतिक तौर पर यह संप्रदाय भाजपा का परंपरागत मतदाता रहा है और 2014 के आम चुनावों में इस संप्रदाय की बड़ी संख्या वाली कन्याकुमारी लोकसभा सीट से भाजपा विजयी हुई थी। अतः भाजपा के लिए इस माँग और इसके पीछे के कारण, को नकारना मुश्किल होगा। शायद इसीलिए आदिगालार भाजपा के समर्थन को लेकर आश्वस्त हैं- उनके अनुसार भाजपा के केन्द्रीय मंत्री और नेता पोन राधाकृष्णन ने उन्हें आश्वासन दिया है कि वे संप्रदाय की विशिष्टता को बचाए रखने व HR&CE विभाग के हस्तक्षेप को दूर करने में पूरी मदद करेंगे।

हिन्दू-विरोधी रहा है HR&CE का इतिहास

HR&CE के नाम में भले ही हिन्दू हो, पर क्षेत्रीय नेताओं से लेकर राज्य के उच्च न्यायलय तक ने हिन्दुओं के मंदिरों और परम्पराओं को नुकसान पहुँचाने संबंधी टिप्पणी इस विभाग पर कर चुके हैं।

भाजपा नेता एच राजा ने यह मांग की थी कि HR&CE विभाग राज्य सरकार के हाथों में जा चुके मंदिरों के स्वामित्व की संपत्ति व चुराई गई मूर्तियों पर स्थिति स्पष्ट करे। नतीजन HR&CE विभाग के कर्मचारी संघ ने उन पर ही अपमानजनक टिप्पणी को लेकर एफआईआर कर दी। और तो और, कर्मचारी संघ के क्षेत्रीय उपाध्यक्ष उदय कुमार ने चेतावनी दी थी कि एच राजा के खिलाफ तमिलनाडु के हर जिले में अलग-अलग मुकदमा किया जाएगा। उस समय भाजपा ने यह आरोप लगाया था कि यह राज्य में उसकी विपक्षी आवाज़ को दबाने की साजिश है।

बात सिर्फ एच राजा की नहीं है। चोरी की गई मूर्तियों की वापसी में लगे तमिलनाडु के पुलिस अफसर भी चोरियों की जाँच और मूर्तियों की बरामदगी में HR&CE विभाग द्वारा मुश्किलें पैदा करने की ओर इशारा कर चुके हैं। यहाँ तक कि मद्रास हाईकोर्ट ने मूर्तियों की चोरी रोक पाने में विभाग की लगातार नाकामी से तंग आकर यह पूछ दिया था कि अगर चोरियाँ बदस्तूर जारी हैं तो इस विभाग की आवश्यकता ही क्या है। इसी मामले में अदालत ने सीबीआई जाँच की भी चेतावनी दी थी।

इसके अलावा HR&CE विभाग पर यह आरोप भी है कि यह कानूनी रूप से वैध सीमा से अधिक धन की उगाही तमिलनाडु सरकार के नीचे आने वाले मंदिरों से करता है।

यही नहीं, ढाई वर्ष पूर्व 2016 में, श्रद्धालुओं ने नवीनीकरण के नाम पर मंदिरों के पवित्र हिस्सों को खण्डित करने का आरोप लगाया था।  इसके बाद भी अदालत को हस्तक्षेप कर यह निर्देश देना पड़ा था कि हिन्दुओं की आस्था के प्रतीकों के साथ तोड़-फोड़ न की जाए। निर्देश में यह भी कहा गया था कि कोई भी निर्माण, नवीनीकरण या मरम्मत यूनेस्को द्वारा इस विषय के लिए जारी दिशा-निर्देशों के अंतर्गत ही किए जाएँ।

पहले भी हो चुकी है हिन्दू धर्म से अलग होने की माँग

जो माँग आज अय्यावली संप्रदाय कर रहा है, वही माँग विभिन्न समयों पर अन्य समुदाय भी कर चुके हैं। पिछले साल कर्नाटक की सिद्दरमैया सरकार ने ऐसी ही एक माँग को मानकर कर्नाटक के लिंगायत और वीरशैव समुदायों को अलग पंथ/संप्रदाय की मान्यता दे दी थी। नतीजन कर्नाटक में 17% आबादी वाले इस समुदाय के 4 बड़े धर्मगुरुओं ने सार्वजनिक तौर पर सिद्दरमैया और कॉन्ग्रेस को समर्थन की सार्वजनिक घोषणा की थी। यह पिछले कई दशकों में ऐसी पहली घटना थी।

माना जाता है कि इसके पीछे भी सरकारी नौकरशाही का अपने संप्रदाय और परम्पराओं में अकारण हस्तक्षेप रोकना ही लिंगायतों की इस माँग और सिद्दरमैया को समर्थन का कारण था। इसके अलावा अपने घोषणापत्र में राज्य के सभी मंदिरों को सरकारी चंगुल से मुक्त कराने का दावा करने वाली येद्दुरप्पा-नीत भाजपा तब के विधानसभा चुनावों में सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी थी।

यह जानकारी भी जरूरी है कि जब पश्चिम बंगाल में वामपंथियों का शासन था तो उनके द्वारा समर्थित शिक्षक यूनियन के उपद्रव से बचने के लिए रामकृष्ण मिशन ने भी अहिंदू दर्जे में मान्यता पाने का प्रयास किया था। इसके पीछे भी उद्देश्य यही था – सरकार द्वारा केवल हिन्दू स्कूलों पर थोपे गए नियम-कानूनों से खुद को बचाना।

Pak: सुषमा की कड़ी प्रतिक्रिया के बाद हिन्दू नाबालिग लड़कियों के जबरन धर्मान्तरण के मामले में 7 गिरफ़्तार

पाकिस्तान स्थित घोटकी में 2 नाबालिग हिन्दू लड़कियों के जबरन धर्मान्तरण के मामले में पाकिस्तान में 7 लोगों को गिरफ़्तार किया गया है। इसमें एक निक़ाह कराने वाला अधिकारी भी शामिल है। शनिवर (मार्च 23, 2019) को इस मामले के 2 अलग-अलग वीडियो के वायरल होने के बाद पाकिस्तान सरकार हरकत में आई। पाक सरकार पर भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की सक्रियता के करण भी दबाव बना हुआ था। बता दें कि भारतीय विदेश मंत्री ने मामले का स्वतः संज्ञान लेते हुए भारतीय उच्चायोग को इस मामले की रिपोर्ट सौंपने को कहा था। इसके बाद बौखलाए पाकिस्तानी मंत्री फवाद चौधरी ने सुषमा के इस काम पर आपत्ति जताई थी। सुषमा स्वराज ने पाकिस्तानी मंत्री को कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए यह जता दिया था कि हिन्दुओं की सुरक्षा के लिए भारत प्रतिबद्ध है।

वायरल हुई वीडियो में देखा जा सकता है कि लड़कियों के भाई एवं पिता नाबालिग लड़कियों के जबरन इस्लामिक धर्मान्तरण की बात कह रहे हैं। वहीं, एक मौलवी ने मामले को रफा-दफा करने के लिए कहा कि लड़कियों ने इस्लाम से ‘प्रेरित’ होकर स्वेच्छा से उसे अपनाया। 20 मार्च को लड़कियों के परिवार वालों ने इस मामले की एफआईआर भी दर्ज कराइ थी। पाकिस्तानी न्यूज़ पोर्टल डॉन में प्रकाशित ख़बर के अनुसार, पाकिस्तानी पुलिस अधिकारियों ने भी नाबालिग हिन्दू लड़कियों के घर का दौरा किया। उनकी बरामदगी के लिए सिंध के मुख्यमंत्री ने अपने पंजाबी समकक्ष से बातचीत भी की है।

दो लड़कियों के जबरन धर्मान्तरण पर Pak मंत्री ने की सुषमा को ट्रोल करने की कोशिश, हुए बेइज्जत

लेकिन, स्थानीय मेघवाल समुदाय के नेता शिव लाल ने पाकिस्तान सरकार व अधिकारियों द्वारा कही गई बातों को बस ज़बानी जमा-ख़र्च बताया। उन्होंने कहा कि अगर लड़कियों ने इस्लाम अपनाया है तो उन्हें अदालत के समक्ष क्यों नहीं पेश किया जा रहा? उन्होंने कहा कि दोनों ही लड़कियों की उम्र 18 वर्ष से कम है, अतः उनके जबरन धर्मान्तरण और शादी का मामला न्यायालय में जाएगा। स्थानीय दाहरकी पुलिस थाने के आगे नाराज़ मेघवाल समुदाय के लोगों ने धरना प्रदर्शन भी किया। अपने हाथ में बैनर लिए इन लोगों की नाराज़गी इस बात को लेकर थी कि 7 दिन बीत जाने के बावजूद उन लड़कियों को बरामद नहीं किया जा सका है।

प्रदर्शन के दौरान पीड़ित नाबालिग हिन्दू लड़कियों के पिता ने ख़ुद के शरीर पर पेट्रोल छिड़क कर आत्मदाह की कोशिश की लेकिन स्थानीय लोगों ने किसी तरह से उन्हें बचा लिया। ज्ञात हो कि होली की पूर्व संध्या पर दो किशोर हिंदू लड़कियों, 13 वर्षीय रवीना और 15 वर्षीय रीना का अपहरण करके उन्हें पाकिस्तान के सिंध प्रांत में अपने उम्र से बहुत बड़े पुरुषों से जबरन शादी करने के लिए मजबूर किया गया। हिन्दू किशोरियों पर हुए इस अत्याचार ने पूरे विश्व में लोगों को पाकिस्तान में हिन्दुओं के हालात पर सोचने के लिए मजबूर कर दिया।

‘मेरी दोनों बेटियों का धर्बमांतरण कर दिया, अब मुझे गोली मार दो’

पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी के हिन्दू सांसद रमेश कुमार वंकवानी ने कहा कि जबरन धर्मांतरण के खिलाफ तैयार किए गए विधेयक को प्राथमिकता के आधार पर असेंबली में पेश एवं पारित कराया जाना चाहिए। उन्होंने कहा, “धर्म के नाम पर नफरत की शिक्षा देने वाले सभी लोगों से प्रतिबंधित धार्मिक संगठनों की तरह निपटा जाना चाहिए।

लड़कियों के पिता का दिल दहला देने वाला वीडियो अब वायरल हुआ है। इसमें वो बेबस होकर दहाड़े मारकर रो रहे हैं और पुलिस के सामने अपनी शिकायत दर्ज कराने और दोषियों पर कार्रवाई करने का अनुरोध कर रहे हैं। इनकी दोनों बेटियों का अपहरण कर लिया गया है और उनका धर्मांतरण कर निकाह करा दिया गया। सुषमा स्वराज के ट्वीट के बाद पाकिस्तान के मंत्री फवाद चौधरी ने उन्हें ट्रोल करने की कोशिश की। लेकिन, वो ख़ुद ही अपनी बेइज्जती करा बैठे।