एक हैं भारतीय पत्रकारिता के माइकल एंजेलो प्रोपेगेंडा पत्रकार। उनका नाम है सरदेसाई, राजदीप सरदेसाई। पता नहीं कैसे लेकिन वो अक्सर ही कॉन्ग्रेस और मोदी विरोधी धड़े का पक्ष लेने के बाद भी निष्पक्ष बने रहते हैं। राजदीप लगातार अपनी निष्पक्षता का परिचय प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ अपनी अंतर्निहित घृणा और पूर्वग्रह को व्यक्त करते हुए देते रहते हैं।
मंगलवार की रात अपने शो पर, राजदीप सरदेसाई ने अभिनेता विवेक ओबेरॉय को नरेंद्र मोदी से प्रेरित फिल्म पर चर्चा करने के लिए आमंत्रित किया था। इसमें ओबेरॉय ने प्रधानमंत्री मोदी की भूमिका निभाई है। राजदीप सरदेसाई ने हमेशा की तरह पीएम मोदी से जुड़ी किसी भी बात को खारिज करने की जल्दबाजी में, सीधे तौर पर इसे एक ‘प्रोपेगेंडा फिल्म’ कह दिया, जबकि अभी तक राजदीप ने फिल्म देखी भी नहीं है बस फिल्म मोदी पर है तो हो गया प्रोपेगेंडा।
आप लोगों को याद दिला दें कि सरदेसाई ने एक बार खुद स्वीकार किया था कि उनके जैसे पत्रकार गिद्धों की तरह हैं। कल के शो पर उन्होंने यह बात साबित भी कर दी। उन्होंने फिल्म निर्माताओं के खिलाफ विपक्षी दलों के कंधों के सहारे अपना गुस्सा निकालने का प्रयास किया। राजदीप सरदेसाई ने 2019 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले फिल्म की रिलीज के समय पर विवेक ओबेरॉय से सवाल किया, क्योंकि राजदीप ने दावा किया है कि फिल्म को चुनावों को प्रभावित करने के लिए रिलीज किया जा रहा है।
राजदीप को एक ओपिनियन मेकर के रूप में बताते हुए, विवेक ओबेरॉय ने उनके द्वारा लगाए गए आरोपों का न केवल कायदे से जवाब दिया, बल्कि उनकी राजनीतिक ‘पक्षकारिता’ और राय के बारे में उन्हें आईना भी दिखाया। फिल्म की रिलीज पर विवाद का जवाब देते हुए, विवेक ओबेरॉय ने राजदीप से पूछा कि क्या उनके शो पर दर्शकों को प्रभावित करने के लिए भी प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए, जैसे उन्होंने फिल्म पर आरोप लगाए।
राजदीप सरदेसाई के तर्क पर सवाल उठाते हुए, विवेक ओबेरॉय ने पूछा कि क्या वह अपनी राय के माध्यम से चुनावों को प्रभावित नहीं कर रहे हैं और यदि उनकी फिल्म को एक ‘प्रोपेगेंडा फिल्म’ आप कह सकते हैं तो उसी तर्क को लागू करते हुए, क्या राजदीप के शो को अपनी राय से दर्शकों को प्रभावित करने के लिए प्रतिबंधित किया जा सकता है?
राजदीप ने विवेक ओबेरॉय से पूछा कि जैसे-जैसे चुनाव नज़दीक आते जा रहे हैं, उनकी फिल्म को विपक्षी नेताओं द्वारा पूर्वग्रह से ग्रसित और पीएम मोदी को महान प्रोजेक्ट करने की कोशिश की जा रही है। विवेक ने जवाब दिया कि न तो चुनाव आयोग और न ही भारत के संविधान को फिल्म बनाने और रिलीज़ करने में कोई समस्या है।
जब राजदीप अपने मक़सद में सफल होते नहीं दिखे और उनकी हताशा बढ़ने लगी, तब उन्होंने विवेक से पूछा कि क्या वह दिल पर हाथ रखकर कह सकते हैं कि फिल्म की फंडिंग राजनीतिक पार्टी द्वारा नहीं की गई? विवेक ने जवाब दिया कि उन्हें किसी भी राजनीतिक दल द्वारा वित्त पोषित नहीं किया जा रहा है। विवेक ने जवाब दिया कि एक फिल्म की फंडिंग को सत्यापित करने के लिए एक प्रणाली है और उनकी फिल्म को किसी भी राजनीतिक पार्टी द्वारा वित्त पोषित नहीं किया गया है। उन्होंने आगे कहा कि पीएम मोदी को एक नायक के रूप में दिखाने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि देश के लोग पहले से ही स्वीकार करते हैं कि पीएम मोदी वास्तव में एक ‘हीरो’ हैं।
पीएम मोदी पर एक बायोपिक बनाने के अपने फैसले को सही ठहराते हुए विवेक ने कहा, “पीएम मोदी की कहानी और दृष्टिकोण भारत में एक अरब लोगों को प्रेरित करती है, जो गर्व से भक्त कहलाने को भी तैयार हैं। मैंने महसूस किया कि एक गरीब व्यक्ति की विनम्र शुरुआत से लेकर एक अरब लोगों के प्रेरक नेता बनने तक की कहानी को दिखाया जाना चाहिए।”
वामपंथी झुकाव वाले लुटियंस मीडिया के प्रमुख चेहरों में से एक राजदीप सरदेसाई ने खुले तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति अपमान की हदें लाँघते हुए टिप्पणी की है जबकि उस समय वह गुजरात के मुख्यमंत्री थे। अभी कुछ दिन पहले ही, राजदीप सरदेसाई ने प्रधानमंत्री द्वारा दिए गए बयानों को सांप्रदायिक एंगल देने के लिए बेशर्मी से ट्विस्ट भी किया था।
मंगलवार (अप्रैल 2, 2019) को कॉन्ग्रेस पार्टी का घोषणापत्र जारी किया गया। इस घोषणापत्र को पूर्व केंद्रीय वित्त मंत्री पी चिदंबरम की अध्यक्षता वाली समिति द्वारा तैयार किया गया है। कॉन्ग्रेस अध्यक्ष ने दावा किया कि घोषणापत्र तैयार करने से पहले समाज के विभिन्न वर्गों से बातचीत की गई व देश के अलग-अलग हिस्से के लोगों से राय ली गई। हालाँकि, कॉन्ग्रेस घोषणापत्र में भारतीय सुरक्षा बलों पर लगाए गए गंभीर आरोपों के कारण पार्टी को अच्छी-ख़ासी आलोचना का सामना करना पड़ा। अपने घोषणापत्र के माध्यम से कॉन्ग्रेस ने भारतीय सेना पर घाटी में यौन हिंसा जैसे जघन्य अपराधों का आरोप लगाकर, अलगाववादियों के सुर-में-सुर मिलाने की घोषणा कर दी है।
उधर यूपीए अध्यक्षा सोनिया गाँधी अपनी पार्टी के घोषणापत्र के एक बात से ख़ासी नाराज़ बताई जा रही हैं। अमर उजाला में प्रकाशित ख़बर के अनुसार, नाराज़ सोनिया ने न सिर्फ़ घोषणापत्र तैयार करने वाली समिति के सदस्य राजीव गौड़ा को फटकार लगाई बल्कि पी चिदंबरम से भी बात करके अपनी आपत्ति दर्ज कराई। ख़बर में कहा गया है कि सोनिया गाँधी कॉन्ग्रेस घोषणापत्र के कवर पेज पर अपने बेटे राहुल गाँधी के छोटे चित्र को लेकर नाख़ुश हैं। उन्होंने पार्टी नेताओं से पूछा कि राहुल की फोटो कवर पेज पर बड़ी क्यों नहीं रखी गई?
सोनिया गाँधी ने राजीव गौड़ा को जमकर डाँट पिलाई। आजतक के अनुसार, पार्टी सूत्रों की मानें तो सोनिया की आपत्ति का कारण निम्नलिखित तीन चीजों को बताया जा रहा है:
कॉन्ग्रेस के घोषणापत्र का कवर पेज आकर्षक नहीं है।
राहुल गाँधी की तस्वीर छोटी रखी गई है।
कवर पेज पर महात्मा गाँधी की कोई फोटो नहीं है।
कॉन्ग्रेस के ताज़ा घोषणापत्र का कवर पेज
बता दें कि कॉन्ग्रेस के घोषणापत्र में कई कोरी बातें कही गई हैं, जिसका वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं है। इसके अलावा सुरक्षा जैसे संवेदनशील मुद्दे पर भी पार्टी द्वारा अनाप-शनाप बका गया है। शायद इसीलिए इस बार आलोचकों को पहले ही चुप कराने के लिए राहुल गाँधी ने कह दिया कि उनके घोषणापत्र में झूठ के लिए कोई जगह नहीं है। असुरक्षा की भावना से घिरे राहुल गाँधी ने पहले ही इसका जिक्र कर दिया, क्योंकि उन्हें पता था कि उनके झूठ को पकड़ लिया जाएगा। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर रोज बड़ी संख्या में झूठ बोलने का आरोप लगाया।
कॉन्ग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में सेना को बदनाम करने, जवानों पर आरोप लगाने के लिए अलगाववादी सुर अपना लिया, लेकिन कश्मीरी पंडितों के निष्काषन और उन पर अत्याचार के रूप में हुए एक ऐतिहासिक बर्बरता को ठीक करने के बारे में बात नहीं की है। कॉन्ग्रेस को याद होगा कि किस तरह घाटी के मुस्लिम चरमपंथियों ने हिंदुओं का नरसंहार किया था, यह घोषणा पत्र अपने आप में कॉन्ग्रेस के कश्मीर के प्रति छिपे मंसूबों का खतरनाक दस्तावेज है।
जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री ग़ुलाम नबी आज़ाद ने राज्य की पुलिस पर निशाना साधते हुए उस पर एक से बढ़कर एक आरोप लगाए हैं। कॉन्ग्रेस नेता ने न सिर्फ़ जम्मू कश्मीर पुलिस को दुश्मन बताया बल्कि कहा कि वो निहत्थे लोगों का क़त्ल करती है और ज़्यादतियाँ करती है। ग़ुलाम नबी आज़ाद ने कहा:
“जम्मू कश्मीर पुलिस भी कम दुश्मन नहीं है। उन्होंने कोई कम ज़्यादतियाँ नहीं की हैं। मैं उन पुलिसवालों को तो सलाम करता हूँ जिन्होंने अपनी जानें दी, लेकिन उसमें भी कुछ नासूर ऐसे थे जो अपने प्रमोशन और पैसे के लिए निहत्थे लोगों का क़त्ल करते थे। क्या वजह है कि 2014 तक हालात ठीक हो गए थे? क्या वजह है कि 2014 से लेकर आज तक हालात 1990-91 वाले हो गए हैं। उसके लिए अगर कोई ज़िम्मेदार है तो वो है देश का पीएम नरेंद्र मोदी।”
GN Azad,Congress in Kupwara: Vo(J&K Police) bhi kam dushman nahi hai. Unhone bhi kam zyadtiyaan nahi ki. Main salute karta hun unn police walon ko jinhone apni jaanein di, lekin usmein bhi kuch naasoor aise the jo apni promotion aur paise ke liye nihathe logon ka kathal karte the https://t.co/9fs6dctQtK
ग़ुलाम नबी आजाद का ये बयान काफ़ी चौंकाने वाला है क्योंकि वो राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं। आज़ाद यूपीए और कॉन्ग्रेस सरकारों के दौरान कई अहम मंत्रालय भी संभाल चुके हैं। ऐसे में, एक राष्ट्रीय नेता की तरफ से जम्मू कश्मीर पुलिस की आलोचना और उन पर गंभीर आरोप लगाना अप्रत्याशित है। इस से पहले इस तरह की भाषा कश्मीर के अलगाववादी और आतंकी प्रयोग करते रहे हैं। ग़ुलाम नबी आज़ाद यहीं नहीं रुके, उन्होंने पीएम मोदी की तुलना हिटलर से कर डाली।
कुपवाड़ा में चुनावी जनसभा को सम्बोधित करते हुए ग़ुलाम नबी आज़ाद ने कश्मीर समस्या के लिए पीएम मोदी को जिम्मेदार ठहराते हुए जम्मू कश्मीर पुलिस के लिए पाकिस्तान से मिलता-जुलता बयान दिया। इस से पहले जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख़्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने राज्य के लिए अलग प्रधानमंत्री की व्यवस्था वाली बात कही थी। राज्य की एक अन्य पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती भी कुछ इसी तरह के बयान दे चुकी हैं। उन्होंने कहा था कि अगर आर्टिकल 35A से कोई छेड़छाड़ की गई तो कश्मीर के लोग तिरंगा छोड़कर न जाने कौन सा झंडा उठा लेंगे।
भारत को कूटनीतिक स्तर पर एक और बड़ी सफलता मिली है। संयुक्त अरब अमीरात से पाकिस्तानी आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के आतंकी निसार का प्रत्यर्पण कराने में भारत सफल हुआ है। निसार अहमद तांत्रे जम्मू-कश्मीर के लेथपोरा स्थित सीआरपीएफ कैंप पर दिसंबर 2017 में हमले का मुख्य साज़िशकर्ता है। ये हमला 30-31 दिसंबर 2017 की रात में किया गया था। इस हमले में हमारे पाँच जवान वीरगति को प्राप्त हो गए थे। तब जवाबी कार्रवाई में तीन आतंकियों को भी मार गिराया गया था। आतंकी निसार 1 फरवरी को यूएई फ़रार हो गया था। उसे 31 मार्च को प्रत्यर्पित कर भारत लाया गया। निसार तांत्रे का भाई नूर तांत्रे भी खूँखार आतंकी था।
NIA has arrested a JeM terrorist who was absconding in 2017 Lethpora CRPF terror attack case. He had escaped to UAE on February 1, 2019. Government of India brought him back to the country on 31st March.
निसार को रविवार को विशेष विमान से दिल्ली लाया गया। उसे एनआईए (राष्ट्रीय जाँच एजेंसी) को सौंप दिया गया है। लेथपोरा हमले की जाँच एनआईए ही कर रही है। एनआईए कोर्ट के स्पेशल जज ने निसार के ख़िलाफ़ गिरफ़्तारी वॉरंट जारी किया था, जिसके आधार पर उसे यूएई से डिपोर्ट करवाया जा सका। निसार का भाई नूर तांत्रे ने ही घाटी में जैश के पाँव पसारने में मदद की थी। नूर तांत्रे को दिसंबर 2017 में हुए एक मुठभेड़ में भारतीय सुरक्षा बलों ने मार गिराया था।
Big development. Govt brings back Jaish Terrorist from UAE. NIA arrests Jaish e Muhammad terrorist Nisar Ahmed Tantray who was absconding in Lethpora CRPF terror attack case of Dec 30, 2017, escaped to UAE on Feb 1, 2019. Nisar is younger brother of Jaish commander Noor Tantray.
निसार का प्रत्यर्पण भारत और यूएई के बीच प्रगाढ़ होते संबंधों का भी प्रमाण है। यूएई ने पिछले कई दिनों में कई ऐसे आतंकियों व भगोड़ों को भारत को सौंपा है, जो यहाँ पर वॉन्टेड हैं। यूएई अब तक इन लोगों को भारत को सौंप चुका है:
अगस्ता वेस्टलैंड हेलिकॉप्टर ख़रीद मामले में रिश्वतखोरी का आरोपित क्रिश्चियन मिशेल
अगस्ता वेस्टलैंड मामले में दलाल दीपक तलवार
सीरियाई आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट के कई गुर्गे
इंडियन मुजाहिदीन का आतंकी अब्दुल वाहिद सिद्दिबापा
1993 मुंबई ब्लास्ट का आरोपित आतंकी फ़ारूख़ टकला
Photograph of Jaish terrorist Nisar Ahmed Tantray from Tral, Pulwama who was brought back to India from UAE today where he was in hiding since last month after his accomplice was arrested in Kashmir. Presently in NIA custody being interrogated. Involved in attack on CRPF in 2017. pic.twitter.com/uicO3tJxut
लेथपोरा आतंकी हमलों में जिन तीन आतंकियों को मार गिराया गया था, उनके नाम हैं- फरदीन अहमद खांडे (त्राल), मंजूर बाबा (द्रुबग्राम, पुलवामा) और अब्दुल शकूर (रावलकोट, पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर)। इसी मामले में जैश का सक्रिय आतंकी अवंतिपुरा निवासी फय्याज अहमद मैग्रे को फरवरी में गिरफ़्तार किया गया था। उसी ने लेथपोरा हमले में शामिल आतंकियों को छिपने का ठिकाना, हथियार और अन्य ख़ुफ़िया जानकारियाँ मुहैया कराई थी।
राहुल गाँधी अक्सर अपने भाषणों व बयानों में हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) को लेकर वर्तमान केंद्र सरकार पर निशाना साधते रहे हैं। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड को एक लाख करोड़ रुपए की ख़रीद का ऑर्डर मिलने वाली ख़बर को राहुल गाँधी ने ‘झूठ’ बताया था। उन्होंने यह भी बताया था कि एचएएल का कहना है कि उसे ‘एक पैसा भी नहीं मिला।’ इस मामले में राहुल गाँधी की मानें तो वे बंगलुरु जाकर एचएएल कर्मचारियों से मिले भी थे। लेकिन, ताज़ा आँकड़े राहुल गाँधी और कॉन्ग्रेस के दावों की पोल खोलते हैं। इससे उनका यह आरोप भी गलत साबित हो जाता है कि राजग सरकार एचएएल को आगे बढ़ने से रोक रही है। दरअसल, एचएएल ने वित्त वर्ष 2018-19 में रिकॉर्ड ₹19,400 के टर्नओवर का प्राप्त किया है।
So it was a canard that #HAL has been hobbled by NDA Govt. HAL announces a record turnover of over Rs 19,400 crore for 2018-19. This amounts to 6% revenue growth over 2017-18 turnover of Rs 18,284 crore & revenue growth of 3.8%. This is Greek for some.https://t.co/tuzaelvse8
पिछले वित्तीय वर्ष में एचएएल को ₹18,284 करोड़ का टर्नओवर हुआ था। इस हिसाब से इस साल कम्पनी के टर्नओवर में पिछले वित्त वर्ष के मुक़ाबले 6% की वृद्धि हुई है। 2017-18 में कम्पनी का रेवेन्यू ग्रोथ 3.8% था, जो इस वर्ष के रेवेन्यू ग्रोथ से काफ़ी कम था। हालाँकि, भारतीय वायुसेना को एचएएल को अभी ₹20,000 करोड़ देने हैं। एचएएल द्वारा वायुसेना को दिए गए एयरक्राफ्ट्स और उनकी मरम्मतों के बदले यह बकाया धनराशि है। जनवरी में एचएएल को बैंक से 781 करोड़ रुपयों का क़र्ज़ लेना पड़ा था ताकि कम्पनी के 29,000 कर्मचारियों को उनका वेतन दिया जा सके।
एचएएल द्वारा जारी किया गया आधिकारिक बयान
बिजनेस स्टैण्डर्ड से बात करते हुए एचएएल चेयरमैन आर माधवन ने कहा,”भारतीय वायुसेना को अभी भी एचएएल को बकाया भुगतान करना है। हमने उन्हें जो एयरक्राफ्ट्स, सर्विसेज, मरम्मत और हैलीकॉप्टर्स डिलीवर किए हैं, उनके एवज में उन्हें हमें भुगतान करना है। मार्च 31 तक ये बकाया ₹20,000 करोड़ है।” एचएएल के सूत्रों के अनुसार, वित्त वर्ष 2018-19 में एचएएल ने 41 नए एयरक्राफ्ट्स और हैलीकॉप्टर्स का निर्माण किया। 98 नए इंजिन्स बनाए, 213 एयरक्राफ्ट्स एवं हैलीकॉप्टर्स की मरम्मत की और 540 इंजिन्स का जीर्णोद्धार किया।
बीते वित्त वर्ष में एचएएल ने 11 सुखोई-30MKI और 7 तेजस फाइटर्स का निर्माण किया। इसके साथ ही उन्होंने 5 डोर्नियर-228 एयरक्राफ्ट्स, तीन चीता (लाइट) हैलीकॉप्टर और 15 ध्रुव (एडवांस लाइट) हैलीकॉप्टर्स का निर्माण किया। कुल मिलकर उन्होंने 41 एयरक्राफ्ट्स का निर्माण किया। इसके अलावा कम्पनी ने 15 सुखोई-30MKI की मरम्मत की, कई मिराज-2000 व जगुआर फाइटर्स का जीर्णोद्धार किया। इसके अलावा उन्होंने कई हैलीकॉप्टर्स की भी मरम्मत की।
कम्पनी ने कहा कि एचएएल के सारे रिसर्च एवं डेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स अभी ट्रैक पर हैं और भारतीय सशस्त्र बलों की ज़रूरतों के हिसाब से इस पर आगे बढ़ा जा रहा है। एचएएल ने कहा कि उसने अपने परफॉरमेंस के सारे मापदंडों को पूरा किया है, अतः भारत सरकार द्वारा ‘एक्सीलेंट’ MoU रेटिंग बने रहने की उम्मीद है। कुल मिलकर देखें तो चीजें सही ट्रैक पर है और राहुल गाँधी के दावे झूठे साबित होते नज़र आ रहे हैं, हमेशा की तरह।
आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर विवादित बयान दिया है। पुणे मिरर में प्रकाशित ख़बर के अनुसार, नायडू ने पीएम मोदी को एक खूँखार उग्रवादी बताया है। टीडीपी सुप्रीमो ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी इस देश में रहने लायक नहीं हैं। सोमवार (अप्रैल 1, 2019) को चुनाव प्रचार के दौरान एक जनसभा को सम्बोधित करते हुए नायडू ने ये बातें कहीं। आंध्र प्रदेश में लोकसभा चुनाव के साथ-साथ विधानसभा चुनाव भी होने हैं। अपने गृह जनपद मदनापल्ले में नायडू ने पीएम मोदी को लेकर अपशब्द कहे। आजतक चैनल के अनुसार, नायडू ने कहा:
“नरेंद्र मोदी कट्टर उग्रवादी हैं। वे एक अच्छे आदमी नहीं हैं। मैं यहां मौजूद अल्पसंख्यक भाइयों से एक अपील करता हूँ। अगर आप मोदी के लिए वोट करते हैं तो बहुत सारी समस्याएँ खड़ी हो जाएँगी। मोदी तीन तलाक़ अधिनियम इसलिए लेकर आए हैं ताकि आपको जेल की सलाखों के पीछे पहुँचा सकें। मैं पहला आदमी था, जिसने मोदी के इस्तीफे की माँग की थी। इसके बाद विश्व के ज्यादातर देशों ने मोदी की एंट्री अपने देश में बैन की। अब प्रधानमंत्री बनने के बाद एक बार फिर वे अल्पसंख्यकों पर हमले कर रहे हैं।”
आपको बता दें किअल्पसंख्यकों को लुभाने के लिए दिन-रात लगे नायडू लगातार ध्रुवीकरण की कोशिश में लगे हैं। आंध्र प्रदेश में उनकी प्रतिष्ठा दाँव पर लगी है और वो अल्पसंख्यक मतों के सहारे चुनावी वैतरणी पार करने का प्रयास कर रहे हैं। समुदाय विशेष को लुभाने के लिए उन्होंने जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फ़ारुक़ अब्दुल्ला को श्रीनगर से चुनाव प्रचार के लिए बुलाया। अब्दुल्ला से मुस्लिम बहुल ज़िलों में टीडीपी के लिए प्रचार करवाया गया। नायडू ने इमामों के प्रशिक्षण के लिए कॉलेज स्थापित करने, नमाज़ पढ़ने के लिए 50 स्क्वायर यार्ड का नमाज़ रूम बनवाने और ‘Almaspet Circle’ का नाम बदल कर टीपू सुल्तान के नाम पर करने सहित कई घोषणाएँ कर मुस्लिमों को लुभाने की कोशिश की।
अपने ताज़ा बयान में नायडू ने फिर से गुजरात का राग अलापा है। वह आजकल अपनी हर सभा में गुजरात का ज़िक्र कर रहे हैं। गुजरात दंगों में 2000 लोगों के मारे जाने की बात कहते हुए नायडू ने कहा कि पीएम मोदी इस देश में रहने के लिए फिट नहीं हैं। नायडू ने इससे पहले तेलंगाना के सीएम के चंद्रशेखर राव को ‘आर्थिक आतंकी’ बताया था। उन्होंने केसीआर पर सरकारी मशीनरी का दुरूपयोग करने का आरोप भी मढ़ा था। चंद्रबाबू नायडू ने भाजपा पर भगवान वेंकटेश्वर तिरुपति मंदिर का नियंत्रण छीनने के आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के माध्यम से मंदिर को हथियाना चाहती है, जिसका हम मिलकर विरोध करेंगे।
अभी कुछ दिनों पहले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नायडू की तुलना ब्लॉकबस्टर फ़िल्म बाहुबली के विलेन भल्लालदेव से की थी। राजामुंद्री में मोदी ने नायडू पर डेटा चोरी का आरोप लगाते हुए कहा था,”मुझे बताया गया कि तेदेपा ने एक नया काम शुरू किया है जो सेवा मित्र एप के जरिए साइबर अपराध से जुड़ा है। सेवा मित्र न तो कोई सेवा करता है और न ही मित्र है, बदले में यह लोगों का डेटा चोरी कर रहा है।” पीएम के आरोपों से बौखलाए नायडू ने पीएम को आतंकी बता दिया। राजग से अलग होने के बाद से नायडू लगातार ऐसे ऊल-जलूल बयान दे रहे हैं। चुनाव नजदीक आते ही इसमें तेज़ी और बढ़ गई है।
हाल ही में हवस के पादरी, बिशप फ्रेंको मुलक्कल के ऊपर बलात्कार और बरसों तक यौन शोषण करने के मामले जब सामने आए तो भारतीय लोगों का थोड़ा चौंकना लाज़मी था। अक्सर जॉन दयाल या इयान डीकोस्टा जैसे आत्मा की चोरी (सोल हार्वेस्टिंग) के क्रूसेडर अपने पास आने वाले चंदे के जोर पर सच को दबाए रखने में कामयाब हो जाते हैं। ऊपर से जब माता-रोम की सत्ता का वरदहस्त भी मिला हुआ हो तो क्या कहने! चुनावी दौर की छापेमारी में जब बिशप फ्रेंको मुलक्कल के एक करीबी पादरी के पास से अवैध रूप से इकट्ठा किए 9 करोड़ 66 लाख के लगभग रुपए भी निकल आए तो फिर इनका चुनावों को धनबल से प्रभावित करने की मंशा और औरतों के प्रति इनके नजरिए के बारे में कोई सवाल नहीं रह जाता।
थोड़े समय पहले तक का दौर देखें तो चर्च के अपराधों के बारे में कुछ भी बोलना-लिखना लगभग नामुमकिन था। हिंदी फिल्मों की जानी-मानी हस्ती, हृतिक रौशन को भी एक ट्वीट के लिए माफ़ी मांगने पर मजबूर किया गया था। ‘स्पॉटलाइट’ जैसी पुरस्कार विजेता फ़िल्में विदेशों में भले बनकर इनाम भी ले जाएँ, लेकिन भारत में ‘सिन्स’ जैसी फ़िल्में गुमनाम कर दी जाती हैं। कैथोलिक चर्च और उससे जुड़े अपराधों पर अब जाकर कुछ बात होनी शुरू हुई है। केवल पोप जॉन पॉल द्वित्तीय का दौर देखें तो उन्होंने चर्च के सौ से अधिक घृणित अपराधों के लिए माफ़ी मांगी है। इसमें गैलेलियो जैसे वैज्ञानिकों की प्रताड़ना की माफ़ी से लेकर उपनिवेशवाद के काल में चीन में किए गए अमानवीय अपराधों तक के लिए माफ़ी माँगना शामिल है।
इस सब के बावजूद अगर कहा जाए कि कैथोलिक चर्च कैसे घृणित, जघन्य, अमानवीय कुकृत्यों में लिप्त रहा है, तो इसे हजम करना मुश्किल होता है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण अल्बेनिया की टेरेसा, उन्हें मिला नॉबेल पुरस्कार और उनके कृत्यों की समीक्षा में दिख जाएगा। भारत संविधान और वैज्ञानिक विचारधारा में विश्वास करने वाला देश है और यहाँ जादू-टोने जैसी चीज़ों की कोई जगह नहीं। अंधविश्वासों के खिलाफ लड़ते हुए हाल में कई लोगों ने जान गँवाई है मगर अफ़सोस कि इसके बावजूद ‘चमत्कार’ करने वालों को जबरन ‘संत’ की उपाधि से नवाज़ा जाना जारी है।
टेरेसा पर आम जनता का ध्यान शायद 1969 में आई बीबीसी की एक डाक्यूमेंट्री फिल्म (समथिंग वंडरफुल फॉर गॉड) से शुरू हुआ था। उनका कोलकाता स्थित संस्थान पीड़ितों का इलाज नहीं करता था बल्कि उन्हें बताता था कि उन्हें पापों के लिए ईश्वरीय दंड मिला है, जिसे उन्हें बिना शिकायत झेलना चाहिए। ऐसा नहीं है कि उनकी संस्था के पास इलाज के लिए पैसे नहीं थे। हाँ ये ज़रूर है कि अल्पसंख्यक संस्थान होने के कारण उन्हें हिसाब किताब भारतीय सरकार को देने की ज़रूरत नहीं थी, और अब वो दान में मिले पैसे कहाँ हैं, इसकी कोई ख़ास खबर नहीं मिलती।
नॉबेल पुरस्कार लेते वक्त टेरेसा ने 1979 में कहा था कि आज के दौर में शांति के लिए सबसे बड़ा ख़तरा गर्भपात है। उन्होंने 1984 की भोपाल गैस त्रासदी के बाद यूनियन कार्बाइड का समर्थन किया था। वो मार्गरेट थेचर और रोनाल्ड रीगन जैसों की सरकार का समर्थन करती थीं। उन्होंने निकारगुआ जाकर वहाँ के कॉण्ट्राज का समर्थन किया था। चार्ल्स कीटिंग ने उन्हें 1.25 मिलियन डॉलर का चंदा दिया था। इसके थोड़े ही दिन बाद वो बचत और कर्ज के घोटाले के लिए पकड़ा गया और उसे सजा हुई थी। इन सब के बारे में आमतौर पर बात नहीं होती।
इस विषय पर एक वामी किस्म के लेखक (जिसने बाद में विचारधारा को त्याग दिया) क्रिस्टोफर हित्चेंस ने ‘मिशनरी पोजीशन’ नाम से 128 पन्ने की एक किताब लिखी है। वो टेरेसा को ‘घोउल ऑफ़ कोलकाता’ बुलाया करता था। हाल के दौर में एक भारतीय (जो अब विदेशों में रहते हैं) ने भी इस विषय पर लिखा है। उनकी किताब थोड़ी मोटी (400 पन्ने की) है। औरूप चटर्जी ने इस विषय पर करीब पच्चीस साल शोध किया है। वो अक्सर टीवी चैनल पर भी इस विषय पर बोलते दिख जाते हैं। टेरेसा की सच्चाई पढ़नी या जाननी हो, तो इस विषय पर किसी भारतीय की लिखी ये शायद सबसे अच्छी किताब है। किताब का नाम है Mother Teresa: The Untold Story.
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राजद सुप्रीमो लालू यादव पर बड़ा आरोप लगते हुए कहा कि वह जेल से ही चुनाव को प्रभावित कर रहे हैं। मुख्यमंत्री ने लालू यादव पर जेल से ही फोन का प्रयोग करने का भी आरोप लगाया। बता दें कि चारा घोटाला मामले में राँची स्थित बिरसा मुंडा जेल में अपनी सज़ा भुगत रहे लालू अभी स्वास्थ्य कारणों से रिम्स में भर्ती हैं। वहाँ उनका इलाज चल रहा है। महागठबंधन के कई नेताओं का वहाँ आना-जाना लगा रहता है और टिकट के दावेदारों की लाइन भी लालू से मिलने के लिए लगती है। पहले ही ऐसी ख़बर आई थी कि लालू यादव जेल से ही राजद के सारे निर्णय ले रहे हैं। उपेंद्र कुशवाहा, प्रकाश करात, जीतन राम माँझी सहित कई बड़े नेताओं ने राँची जाकर लालू से मुलाक़ात भी की थी।
अब नीतीश की शिकायत पर राँची पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए पूर्व मुख्यमंत्री लालू यादव के वार्ड में छापा मारा है। नीतीश कुमार ने कहा था, “यह तो लोगों को पता ही है कि लालू जी जेल में रहने पर भी जेल से बात करते रहते हैं। नियम है कि जेल में रहते हुए आप (फोन पर) बात नहीं कर सकते, लेकिन तथ्य सबको मालूम नहीं है।” सूचना मिलते ही सिटी एसपी व सदर डीएसपी के नेतृत्व में पुलिस ने लालू यादव के पेइंग वार्ड की गहन तलाशी ली। निरीक्षण के लिए झारखंड पुलिस के एसपी सुजाता वीणापाणि, सदर डीएसपी दीपक कुमार पांडेय, बरियातू थानेदार संजीव कुमार सहित अन्य पुलिसकर्मी पहुँचे थे। जाँच के दौरान पूरे वार्ड को खंगाला गया। कोने-कोने की गहनता से तलाशी ली गई।
उधर लालू यादव के दोनों बेटों ने नीतीश कुमार के इस आरोप पर प्रतिक्रिया देते हुए अपने पिता को फँसाने का आरोप लगाया। तेजप्रताप यादव ने कहा, “रिम्स में जहाँ मेरे पिता जी रहते हैं, वहाँ चेकिंग भी होती है। जेल के सारे नियमों का हमारे पिता पालन करते हैं।” वहीं पूर्व उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने नीतीश के आरोपों को निराधार बताया। तेजस्वी ने एक जनसभा को सम्बोधित करते हुए आगे कहा:
“हमारे पूरे परिवार को एक साजिश के तहत फँसाया गया है। झूठे मुकदमे लाद कर परिवार को राजनीति में आगे बढ़ने से रोका जा रहा है। पीएम ने बेरोज़गार युवकों को ठगने का काम किया है। उन्होंने वादा पूरा नहीं किया। झूठ बोलकर काम चलाते रहे और फिर से जनता के बीच आए हैं और मुद्दों को भटका रहे हैं। इस बार जनता इस चौकीदार को जरूर सबक सिखायेगी।”
झारखंड के जेल आईजी विरेंद्र भूषण ने तत्काल अपनी सफाई दी है कि लालू प्रसाद के द्वारा अस्पताल में मोबाइल फोन के इस्तेमाल की बात निराधार है।#LaluPrasadhttps://t.co/G4yG8r90kx
बता दें कि लालू यादव के वार्ड की पहले भी तलाशी ली जा चुकी है। झारखण्ड के मुख्यमंत्री रघुवर दास ने भी कहा था कि लालू से मिलने आने वाले लोगों के लिए जेल के नियम ताक पर नहीं रखे जा सकते। इससे पहले भी शनिवार को सदर डीएसपी दीपक पांडेय के नेतृत्व में पुलिस टीम ने लालू यादव के पेइंग वार्ड के कमरे ए 11 की गहन जाँच की थी। कुछ दिनों पहले जदयू के पूर्व अध्यक्ष और राज्यसभा से अयोग्य करार दिए गए शरद यादव भी लालू से मिले थे। फरवरी में राजद के गठबंधन साथी मुकेश साहनी ने लालू के साथ बैठक की थी।
मध्य प्रदेश में कॉन्ग्रेस पार्टी ने राफेल से जुड़े विज्ञापन को चुनाव आयोग के पास अनुमति के लिए भेजा था, जिसे आयोग ने अस्वीकार कर दिया। चुनाव आयोग ने कॉन्ग्रेस को साफ़-साफ़ कहा कि चूँकि यह मामला कोर्ट में है, राफेल के विज्ञापन का प्रयोग करना उचित नहीं होगा। लोकसभा चुनावों के ऐलान के बाद आदर्श आचार संहिता लागू हो चुकी है और चुनाव आयोग इस बार किसी भी गड़बड़ी को लेकर सख़्त नज़र आ रहा है। कई राज्यों में छापों के कारण बड़ी मात्रा में नकदी और प्रलोभन सामग्रियाँ भी ज़ब्त की गई हैं। इनका इस्तेमाल वोटरों को लुभाने के लिए किया जाने वाला था। मध्य प्रदेश कॉन्ग्रेस ने चुनाव आयोग के पास कुल 9 विज्ञापनों को अनुमति के लिए भेजा था, जिनमें से 6 पर आपत्ति जताई गई है।
मध्य प्रदेश चुनाव आयोग के अध्यक्ष वीएलके राव ने कहा कि अगर आयोग के आदेश से किसी को आपत्ति है, तो वो आगे अपील कर सकता है। बता दें कि कॉन्ग्रेस राफेल को लेकर काफ़ी सख़्त नज़र आ रही है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा राफेल मामले में केंद्र सरकार को क्लीन चिट के बावजूद कॉन्ग्रेस पार्टी इस मामले को उठाती रही है। कैग ने भी मामले में केंद्र सरकार को क्लिन चिट दिया था। कैग के अनुसार, वर्तमान डील यूपीए सरकार द्वारा नेगोशिएट की जा रही डील से सस्ती है। राफेल को लेकर कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने भी पीएम मोदी के बारे में ‘चौकीदार चोर है’ का नारा दिया है, जिसे उनके हर भाषण में सुना जा सकता है।
चुनाव आयोग पूरी निष्पक्षता से कार्य कर रहा है। भाजपा द्वारा ट्रेनों में ‘मैं भी चौकीदार’ कार्यक्रम चलाए जाने पर भी चुनाव आयोग ने आपत्ति जताई थी। इस मामले में आयोग ने रेलवे के अधिकारियों तक पर कार्रवाई करने की बात कही थी। उधर अप्रैल में चुनाव से पहले रिलीज के लिए तैयार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बायोपिक को लेकर चुनाव आयोग ने हरी झंडी दिखा दी है। विवेक ओबेरॉय अभिनीत इस फ़िल्म में प्रधानमंत्री की ज़िंदगी को उकेरा गया है। चुनाव आयोग ने कहा कि चूँकि सेंसर बोर्ड फ़िल्म को हरी झंडी दे चुका है, आयोग ये नहीं तय कर सकता कि फ़िल्म कब रिलीज होगी।
#BREAKING | प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बायोपिक को हरी झंडी, मोदी विरोधियों को करारा जवाब
फ़िल्म पर रोक लगाने के लिए दिल्ली और बॉम्बे हाईकोर्ट में भी याचिकाएँ दाखिल की गई थीं लेकिन चुनाव आयोग ने साफ़ कर दिया है कि ये आचार संहिता का उल्लंघन नहीं है। मध्य प्रदेश में ही कॉन्ग्रेस द्वारा आचार संहिता के उल्लंघन का एक और मामला सामने आया है। भारतीय जनता पार्टी ने पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह द्वारा सीहोर में एक मंदिर के बाहर पैसे बाँटे जाने को लेकर चुनाव आयोग से उनकी शिकायत कर दी है। आयोग ने इस मामले में सिंह को नोटिस भी जारी कर दिया है। दिग्विजय सिंह को मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से कॉन्ग्रेस ने मैदान में उतारा है। भाजपा ने अभी इस क्षेत्र से अपने उम्मीदवार का ऐलान नहीं किया है।
कॉन्ग्रेस ने नमो टीवी के प्रसारण को लेकर भी चुनाव आयोग से शिकायत की है। बता दें कि यूट्यूब से शुरू किया गया नमो टीवी अब डायरेक्ट टू होम पर भी दस्तक दे चुका है और उस पर पीएम मोदी से जुड़े कार्यक्रमों को प्रसारित किया जाता है। कॉन्ग्रेस की मध्य प्रदेश इकाई ने इस पर आपत्ति जताई है। इंदौर जिला प्रशासन ने चुनाव आयोग से इस मामले में मार्गदर्शन भी माँगा है। कॉन्ग्रेस ने चैनल पर पार्टी विशेष के पक्ष में राजनीतिक कंटेंट प्रसारित करने का आरोप मढ़ा है।
जौन एलिया का एक शेर है (ये बस इसलिए लिख रहा हूँ कि शेर लिख कर शुरु करने वालों को गम्भीरता से लिया जाता है):
ये मुझे चैन क्यूँ नहीं पड़ता/ एक ही शख़्स था जहान में क्या
हमारे देश के नौटंकीबाज़ जमात के लिए ये शेर, अपने अकेलेपन में, सटीक बैठता है। इनके भीतर खलबली मची हुई है। इनके साँसों की आवाजाही और धड़कनों की लब-डब तक मोदी ही मोदी है। इन्हें चैन नहीं है। ये अवार्ड वापसी दोहराना चाहते हैं, लेकिन सामाजिक अपराध का शिकार अखलाख है कि मर ही नहीं रहा इस बार। ये लम्पट मंडली इतनी बेईमान है कि ईमानदारी से नाम तक नहीं लिख रही।
अरे चिरकुटो! अगर कहना चाहते हो कि मोदी को वोट नहीं देना है, तो कौन रोक रहा है? संविधान या मोदी की पर्सनल पुलिस? खुलकर लिखो कि मोदी को वोट मत दो, भाजपा को वोट मत दो। इसमें किस बात का डर है जबकि तुम्हारी लेजिटिमेसी तो वैसे भी है नहीं। उन्हीं चार चिरकुटों के साथ उठना-बैठना, वही घिसी हुई बातें हर सेमिनार में कहना, वही कुतर्क हर रोज करना… तुम्हें सीरियसली लेता कौन है?
मैं लेता हूँ, क्योंकि तुम्हारे जैसे लम्पटों की हर एक बात पर दस आर्टिकल लिखना ज़रूरी है। तुम्हें तुम्हारे ही खेल में, तुम्हारे ही नियमों के साथ, उन्हीं संसाधनों के प्रयोग से हराना है। इसलिए कीचड़ में भी उतरूँगा, सूअरों से भी लड़ूँगा, और उनकी गर्दन उन्हीं की विष्ठा में तब तक दबाए रखूँगा जब तक कि वो ठंढे न पड़ जाएँ। मैंने भी जान से मारने की बात नहीं की, बस ठंढा करने की बात की है क्योंकि ऐसे लोगों का ज़िंदा रहना बहुत ज़रूरी है। ये हमारे समाज के वो उदाहरण है जिन्हें आने वाली पीढ़ियाँ यह कह कर याद करेंगी कि किसी भी स्थिति में इतना नहीं गिरना है कि ऐसे बन जाएँ। साथ ही, भीतर से ही कुढ़ते रहने वाले माओवंशी कामपंथी वामभक्तों की दयनीय स्थिति किस दक्षिणपंथी को पसंद नहीं!
ये दो सौ लोग जब सिग्नेचर कैम्पेन चलाते हैं, पाकिस्तान जाकर इनके मित्र नेता मोदी को हराने के लिए मदद माँगते हैं, जब सौ फ़िल्ममेकर लिखते हैं कि मोदी को वोट मत दो, तब इन्हें समाज से कुछ खास लेना-देना नहीं है। ये चुनावों से पहले एक वेबसाइट बनाते हैं, उस पर कहीं से फ़िल्मकारों की डायरेक्टरी निकाल लेते हैं, लेखकों के नाम इकट्ठा कर लेते हैं, और फिर एक स्टेटमेंट ड्राफ़्ट करके, इन्हें बिना बताए ही जारी कर देते हैं।
ये केयर फ़ॉर सोसायटी नहीं, रेलेवेंट रहने की जद्दोजहद है। इसी को शास्त्रों में फड़फड़ाना कहा गया है। ये तड़प आपसे वो सारे काम करवा लेती है जो आप शांत दिमाग से बैठकर सोचने पर तब तक नहीं करते जब तक आपके अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न नहीं लगता। असफल लोगों की एक भीड़, उस पार्टी और उस प्रधानमंत्री को नीचे लाने की कोशिश में है जिसने उनका निजी हित नहीं साधा, बल्कि जिन ग़रीबों, वंचितों, दलितों, अल्पसंख्यकों की बात ये कर रहे हैं, उनके जीवन में आमूलचूल परिवर्तन लाया है।
पता कीजिए आँकड़े कि कितने करोड़ लोगों के सर पर छत आई, कितने घरों में सिलिंडर पहुँचाया, कितने घरों को किरासन तेल के दिये से मुक्ति मिली, कितने लोगों तक सब्सिडी का पैसा सीधा खाता में पहुँचा, कितनी गलियों को सड़क, और सड़कों को हाइवे बनाया गया, कितनी औरतों को आज अँधेरे में शौच के लिए बाहर नहीं जाना पड़ता, कितने करोड़ लोग व्यवस्थित और अव्यवस्थित क्षेत्रों में रोजगार से जुड़े, कितने किसानों को क़र्ज़माफ़ी की जगह उन्हें इनेबल करने की कोशिश की गई, कितनी निर्मल गंगा हुई और कैसे यमुना को ज़िंदा करने की कोशिश जारी है, कितने आतंकी मारे गए, कितने जिले नक्सल प्रभाव से बाहर आए, उत्तरपूर्व में कितना ढाँचागत विकास हुआ…
इसलिए, पहले महीने से ही ‘विकास कहाँ है’ की बात करने वाले, अब विकास की बात कर ही नहीं रहे। आप गौर कीजिएगा कि किस तरह से वैसी बातें की जा रही हैं जिसको आप चाहकर भी क्वांटिफाय नहीं कर सकते या गिन नहीं सकते। बात इस पर अब नहीं होती कि प्रतिदिन कितने किलोमीटर सड़कें बनीं, प्रति व्यक्ति सरकार कितने लाख रूपए प्रतिवर्ष ख़र्च कर रही है, हर क्वार्टर में अर्थव्यवस्था कैसे बेहतर हो रही है, सारी रेटिंग एजेंसियाँ, वर्ल्ड बैंक और इंटरनेशनल मोनेटरी फ़ंड क्यों इस सरकार के द्वारा किए गए सुधारों को सकारात्मक बताकर सराह रहे हैं…
तब मूडीज एंजेंसी को डीलेजिटिमाइज कर दिया जाएगा। और ये काम होता कैसे हैं? ये काम हर बार एक ही कुतर्क के बहाने होता है: भारत की अर्थ व्यवस्था अगर इतनी ही अच्छी है तो लोग गरीब क्यों हैं, भूखे क्यों हैं? ये वही कुतर्क है कि आप मंगलयान भेज कर क्या करेंगे, लोग तो भूखे मर रहे हैं। ये बातें पहली बार सुनने पर ठीक-ठाक आदमी सोचने लगता है कि बात तो सही है, लेकिन यह बात बिलकुल वैसी ही है कि कोई कहे ‘कौआ तुम्हारा कान लेकर भीग गया’ और आप कौए के पीछे दौड़ रहे हैं।
भारत में गरीबी भी है, भुखमरी भी है। आप खूब चमचमाती सड़क बना लीजिए, एक पत्रकार कहीं से उसके किनारे, फोटोशॉप करके ही सही, एक गरीब परिवार को ज़मीन पर खाता दिखा देगा। उसके नीचे एक कैची कैप्शन लगा देगा: क्या हमें ऐसा विकास चाहिए? जबकि, ये दोनों दो बातें हैं। गरीबी उन्मूलन पर कार्य हो रहे हैं, लेकिन ये जो लॉबी है, वो ऐसे कुतर्क करती है जिसका सीधा अर्थ यही समझ में आता है कि हर गरीब के सामान्य होने तक, विकास के सारे कार्य बंद कर दिए जाएँ। ऐसा तो है नहीं कि सरकार ने वंचितों की बेहतरी के लिए तय पैसे को मंगलयान में लगा दिया! लोककल्याणकारी कार्यों में सरकार प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष एक लाख रुपए से ज़्यादा ख़र्च करती है। लेकिन लॉबी को उससे मतलब नहीं है, आप खूब बड़ा पुल बना देंगे ताकि आने-जाने वालों को आसानी हो, एनडीटीवी वाले इस बात पर स्टोरी कर लेंगे कि अब उन नाव चलाने वालों का क्या होगा?
भारत में समस्याएँ दशकों से हैं, लेकिन समाधान अभी ही चाहिए। और कमाल की बात यह है कि इस सरकार ने यह तो दिखा ही दिया कि पिछली सरकारों से ज्यादा तेज़ी से, पारदर्शिता से, बेहतरी से कार्य हो सकते हैं। यही कारण है कि अब विकास को कोई नहीं ढूँढता, सबको साढ़े चार साल तक गंगा की बड़ी चिंता होती थी, और ‘फ़ंड कहाँ जा रहा है’ के मनचले सवाल किए जाते थे। टीवी के एंकर एक अश्लील हँसी हँसा करते थे। लेकिन सरकारी एजेंसियाँ नाले बंद करने में लगी थी, सीवेज़ ट्रीटमेंट प्लांट बनाने में लगी थी, बीस करोड़ लीटर कचरे को गंगा में उतरने से रोकने में लगी हुई थी।
इसलिए अब नैरेटिव से विकास गायब हो चुका है, क्योंकि विकास हर जगह खड़ा है, मुस्कुरा रहा है। जिन्होंने अवसाद और फ़्रस्ट्रेशन में कैक्टस रगड़ लिया है, उन्हें नहीं दिखेगा। अब नैरेटिव में कॉन्ग्रेस पार्टी के डिम्पल वाले अध्यक्ष के ‘प्यार की राजनीति’ वाली लाइन आ गई है और उसे हमारे छद्म-बुद्धिजीवियों ने ले अपना बना लिया है।
आप बस यह सोचकर मुस्कुराइए कि हमारे बुद्धिजीवी कितने समझदार और क्रिएटिव हैं कि उन्हें राहुल गाँधी की लाइन चुरानी पड़ रही है। किस तरह की मजबूरी रही होगी इन लोगों की कि हर मुद्दा सिरे से नकार दिया गया है, क्योंकि हर बात पर आँकड़ों की भाषा विलग है, और अपील किस बात पर हो रही है: नफ़रत की राजनीति को नकारिए।
अरे लम्पटो! नफ़रत की राजनीति तो तुम लोगों ने की है। मरने वाले की जाति तुम ढूँढते हो, भले ही वो निजी रंजिश की वजह से मरा हो; वेमुला लिखकर मरता है कि उसके नाम पर राजनीति न हो, लेकिन उसकी माँ को पैसे देने का वादा करके हर मंच पर घसीटते हो; नजीब अहमद की अहमियत जब तक थी, तुमने उसे खूब मुद्दा बनाया; जुनैद को तुमने बीफ का शिकार बता दिया, जबकि वो सीट की लड़ाई थी; दंगे भड़कें इसके लिए तुमने बीफ ईंटिंग फेस्टिवल कराए, लेकिन दंगे नहीं भड़के; तुमने कठुआ कांड पर आख्यान लिखे, कैम्पेनिंग की, और गीता को भूल गए; तुमने लिंचिंग की खूब बातें की और तुम्हारे लिस्ट से पुजारी, नारंग, राजीव, अंकित जैसे हिन्दू नाम गायब रहे…
फिर तुम्हारी ज़मीन है कहाँ? तुम तो सड़े हुए लोग हो जिनकी चमड़ी से बदबू आती है क्योंकि उसके अंग-अंग से व्यक्ति विशेष से घृणा का पीब रिस रहा है। तुम्हारी कमाई क्या है? सत्ता की दलाली के बाद पाए अवार्ड जिनके मेमेंटो तुम लौटा देते हो, लेकिन पैसे और रॉयल्टी नहीं लौटाते। तुम क्या विरोध करोगे, तुम उस लायक नहीं हो, तुम्हारे विरोध में बेईमानी सनी हुई है। तुम्हारी औक़ात नहीं है विरोध करने की क्योंकि तुम भीतर से चोर हो।
ये तथाकथित लेखक और फ़िल्मकार घटनाओं को चुनकर प्रतिक्रिया देते हैं इसलिए इनके हर ट्वीट के नीचे सकारात्मक और नकारात्मक कमेंट का अनुपात दूसरी तरफ झुका हुआ होता है। नहीं, कोई आईटी सेल ऐसा नहीं करता, बस लोग उब चुके हैं। लोगों को इनकी नग्नता का एहसास हो चुका है। लोगों को पता चल चुका है कि इनके लिए किसी की मृत्यु एक मानव मात्र की मृत्यु नहीं है, बल्कि उसकी आइडेंटिटी का, उस समय की राजनैतिक परिस्थिति के साथ मैच करना ज़रूरी है, क्रांति तभी शुरु होगी। रोहित वेमुला की मौत के बाद चुनाव हो चुके थे, और एक डेंटल हॉस्पिटल में तीन दलित छात्राओं ने ख़ुदकुशी कर ली थी, ये ख़बर कभी एक ख़बर से ऊपर कुछ बन ही नहीं पाई।
ये बौद्धिक डकैत और पॉकेटमार हैं। ये बसों में रामपुरी दिखाकर पर्स झिटकने वालों के समकक्ष रखे जाने वाले लोग हैं। इन्हें मतलब अपने फ़ायदे से है, वो फ़ायदे जो भी पार्टी इन्हें देगी, या देती रही है, ये उसके लिए अपील कर देंगे। ये वो लोग हैं जिन्हें पुलवामा पर पीएम की चुप्पी पर छप्पन इंच पर सवाल करने की आज़ादी होती है, लेकिन एक्शन लेते ही शांति की याद आती है। ये बहुत ही उच्च कोटि के निम्नस्तरीय लोग हैं।
इसलिए, तरकश के तीर सँभालिए, उनकी नोक पर तर्क का लेप लगाइए, और हमेशा प्रत्यंचा तान कर रखिए कि छद्मबुद्धिजीवी के मुँह खोलने की कोशिश से पहले ही उसकी जीभ वेध दीजिए। याद है न, एकलव्य ने कुत्ते की आवाज सुन कर, एक के बाद एक सात बाण छोड़ कुत्ते का मुँह बंद कर दिया था?