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मजहब विशेष के वोटर्स को भड़काने के लिए कुरान के नाम पर फैलाई जा रही है अफवाह

“और तुम सब के सब (मिलकर) ख़ुदा की रस्सी मज़बूती से थामे रहो और आपस में (एक दूसरे) के फूट न डालो और अपने हाल (ज़ार) पर ख़ुदा के एहसान को तो याद करो जब तुम आपस में (एक दूसरे के) दुश्मन थे तो ख़ुदा ने तुम्हारे दिलों में (एक दूसरे की) उलफ़त पैदा कर दी तो तुम उसके फ़ज़ल से आपस में भाई भाई हो गए और तुम गोया सुलगती हुई आग की भट्टी (दोज़ख) के लब पर (खडे) थे गिरना ही चाहते थे कि ख़ुदा ने तुमको उससे बचा लिया तो ख़ुदा अपने एहकाम यूं वाजेए करके बयान करता है ताकि तुम राहे रास्त पर आ जाओ [कुरान३:१०३]

कुरान से ली गई ये पंक्तियाँ और लोकतंत्र का उपहास उड़ाती एक वेबसाइट अचानक लोकसभा चुनाव  से पहले चर्चा का विषय बन गई है। खुदा की अपील पढ़ने को मिल रही है इंडियन मुस्लिम वोटर (indianmuslimvoter) नाम की वेबसाइट पर। इस वेबसाइट पर जाने पर दिखता है कि बेहद ‘वैज्ञानिक’ तरीकों से ग्राफ और आँकड़े उठाकर मुस्लिम मतदाताओं के लिए वोटिंग गाइडलाइंस जारी की गई हैं। साथ ही, ‘बेहद आवश्यक’ दिशा निर्देश भी जारी किए गए हैं, इनमें से कुछ निर्देशों में किसी-किसी राज्य में किसी को भी वोट ना देने की अपील भी शामिल है।

ये हर दूसरे आम व्यक्ति, जिसे इंटरनेट इस्तेमाल करना आता है, की विशेषता होती है कि इंटरनेट पर आँकड़ों को देखकर वो इन पर विश्वास करने के लिए पहली ही नजर में तैयार हो जाता है। फिर इस वेबसाइट ने तो आँकड़ों को ‘रंगीन ग्राफ’ के माध्यम से प्रदर्शित करते हुए मुस्लिम और भाजपा के वोटर्स की संख्या को समझाया है, इसलिए इस वेबसाइट पर जाकर, दिए गए ग्राफ्स को ही ‘तथ्य’ न मान पाना किसी के लिए भी चुनौती पूर्ण हो सकता है।

अगर गौर से देखा जाए तो ये आँकड़े पेश करने वाली वेबसाइट भी उसी रोजाना TV पर आकर लोगों से TV ना देखने की अपील करने वाले जर्नलिस्ट की तरह ही लोगों के मनोविज्ञान से खेलने की कोशिश करती देखी जा सकती है, जो मोदी सरकार पर आरोप लगाने और अपने व्यक्तिगत प्रोपेगेंडा को दिशा देने के लिए अलग-अलग वेबसाइट के माध्यम से झूठे आँकड़ों को पेश कर उनके ब्रह्मसत्य होने का दावा करता है।

वेबसाइट का ‘मकसद’

इंडियन मुस्लिम वोटर वेबसाइट ने अपना मकसद स्पष्ट करते हुए लिखा है कि असली मक़सद आपको भारत में मुस्लिम मतदाताओं (वोटर) के बारे में सटीक आँकड़ो के बारे में बताना है। इस वेबसाइट के अनुसार भारत में मुस्लिम मतदाताओं के महत्व को कम करने के लिए भारत सरकार सटीक संख्या छिपाती है। वेबसाइट पर समुदाय विशेष को ‘BJP बनाम इस्लाम’ दिखाने की कोशिश की गई है और राज्यवार किस पार्टी को वोट देना है, ऐसा बताया गया है। इस वेबसाइट का एक और मक़सद है कि मुस्लिम मतदाताओं को एक साथ जोड़ सके।

तिरंगा और संसद की तस्वीरों से सजी है इस्लाम बनाम भाजपा वोटर्स वाली ये वेबसाइट

संसद और तिरंगे झंडे से सजी हुई इस वेबसाइट के होमपेज पर पहला सन्देश पढ़ने को मिलता है, “क्या आप जानते हैं कि मुस्लिम मतदाता 2019 के लोकसभा चुनावों के लिए भाजपा के मतदाताओं से अधिक हैं?” ये वेबसाइट किस तरह से लोगों को भ्रमित करने के लिए समर्पित है, इस बात का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस पर विशेष टैब बनी है जिसका शीर्षक है, “मुस्लिम किसे वोट डालें।” इस वेबसाइट को मार्च 23, 2019 को ही रजिस्टर किया गया है, यानी आम चुनाव से ठीक पहले। इस बात से ही स्पष्ट होता है कि यह किसी प्रोपेगैंडा का ही हिस्सा हो सकता है।

सेंसस और मतदान के बारे में वेबसाइट के सभी आँकड़े गलत हैं

इसके बाद रंगीन ग्राफ के माध्यम से बताया गया है कि इस देश में ‘मुस्लिमों’ के कितने वोट हैं और ‘भाजपा’ के कितने वोट हैं। इस वर्गीकरण का आधार 2014 में हुए आम चुनाव के मतदान पैटर्न्स को बताया गया है, जिनकी प्रमाणिकता इसी बात से जानी जा सकती है कि इसके रंगीन ग्राफ में भाजपा वोट की सीधे-सीधे समुदाय विशेष के वोट के साथ तुलना करके क्रमशः 11% और 12% बताया गया है। साथ ही, 39% वोट वो बताए गए हैं, जो वेबसाइट के अनुसार 2019 चुनाव में वोट नहीं दे सकते।

ये पता नहीं चल पा रहा है कि कौन सी आसमानी गणित के द्वारा निकाले गए 39% लोग वोट नहीं दे सकते। इन सभी निष्कर्षों पर पहुँचने के लिए कौन सी रिसर्च मेथोडोलोजी अपनाई गई है, इस बात का कहीं भी कोई ज़िक्र नहीं है। क्या सभी आँकड़ों के अंत में [कुरान ३:१०३] लिख देना मात्र ही इन सभी आँकड़ों को ‘तथ्यों’ में बदल देने के लिए काफी माना जाना चाहिए ?

यदि सरकारी आँकड़ों को देखें तो 2014 में कुल मतदाताओं की संख्या से लेकर प्रत्येक राज्य की वोटर संख्या भी गलत दी गई है। भाजपा को 2014 में पड़ने वाले कुल मत इस वेबसाइट के अनुसार 16.69 करोड़ बताए गए हैं, जबकि वास्तव में 2014 में भाजपा को कुल 17 करोड़ 16 लाख वोट मिले थे। इसी तरह से मुस्लिम आबादी से लेकर भाजपा को मत देने वाले लोगों तक की संख्या के लिए इस वेबसाइट ने किस सेंसस को आधार माना है यह यक्ष-प्रश्न है।

इस वेबसाइट ने दावा किया है कि सेंसस डेटा हाल ही में जारी हुआ है, जबकि वर्ष 1872 में सेंसस (जनगणना) शुरू हुआ था और तब से आज तक यह हर 10 साल में ही होता है। इस प्रकार वर्तमान में 2011 के सेंसस डेटा के आधार पर ही मतदान हो रहे हैं और इसके बाद 2021 का ही डेटा इस्तेमाल किया जाएगा।

साथ ही यह भी चिंता का विषय है कि यह वेबसाइट बड़े स्तर पर यूट्यूब से लेकर हर छोटे-बड़े सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अपने नफरत, झूठ और सांप्रदायिक विचारों के कर्क रोग को फैला रही है। यूट्यूब पर इस भ्रामक वीडियो को देखने वालों की संख्या बहुत ही कम समय में 2 लाख से ऊपर पहुँच चुकी है।

इस वेबसाइट ने अपने बारे में कोई भी जानकारी देने से मना किया है और लिखा है कि उद्देश्य सिर्फ सत्य को उजागर करना है और वो इसके लिए समर्पित हैं।

आम चुनाव के ठीक पहले कुरान के नाम पर भाजपा बनाम मुस्लिम वोट का दावा करने वाली इस तरह की वेबसाइट का तिरंगे और संसद की तस्वीरों में लिपटकर आना लोकतंत्र का भद्दा मजाक है। इन्हें चलाने वालों को यह जानना चाहिए कि वो ऐसा कर किसी का भी भला नहीं कर रहे हैं, बल्कि सांप्रदायिकता को बढ़ावा देकर उन्हीं लोगों के अंदर भय पैदा कर हैं, जिनका हितैषी होने का ये लोग दावा करते हैं।

सोनिया की इटली में है लाखों की संपत्ति, रिलायंस में शेयर्स, चुनावी हलफनामे से हुआ खुलासा

यूपीए अध्यक्ष सोनिया गाँधी की इटली में लाखों की संपत्ति है। ऐसा किसी मीडिया रिपोर्ट या विपक्ष के आरोपों में नहीं कहा गया है, खुद सोनिया गाँधी ने ऐसा बताया है। जी हाँ, नामांकन के दौरान चुनावी हलफनामे में सोनिया गाँधी ने इटली की अपनी संपत्ति का जिक्र किया है। इसमें सोनिया ने बताया है की इटली में उनकी 23,20,110 रूपए की संपत्ति है। साथ ही, सोनिया गाँधी की उच्चतम शैक्षणिक योग्यता फॉरेन लैंग्वेज (अंग्रेजी एवं फ्रेंच) में तीन वर्षीय कोर्स है।

सोनिया गाँधी ने हलफनामे में इटली की संपत्ति के बारे में बताया

सोनिया गाँधी द्वारा नामांकन के दौरान प्रस्तुत किए गए हलफनामे में जानकारी दी गई है कि उनके पास 60,000 रुपए कैश में है और 2.4 करोड़ रुपए शेयर्स में हैं। सोनिया गाँधी ने इस हलफनामे में यह भी बताया है कि उनके रिलायंस हाइब्रिड बॉन्ड्स में भी शेयर्स हैं। उन्होंने पोस्टल सेविंग्स में 72 लाख इन्वेस्ट कर रखा है।

सोनिया गाँधी की उच्चतम शिक्षा

नई दिल्ली स्थित डेरामंडी गाँव में सोनिया गाँधी की ज़मीन भी है। इस ज़मीन की क़ीमत 7,29,61,793 है। सोनिया गाँधी ने अपने बेटे राहुल गाँधी को 5 लाख रुपए का लोन भी दे रखा है। 2014 में उन्होंने राहुल गाँधी को 9 लाख रुपए का लोन दे रखा था। इकनोमिक टाइम्स ने ग़लत जानकारी दी है कि सोनिया गाँधी की इटली में साढ़े सात करोड़ की इनहेरिटेड प्रॉपर्टी है। इकनोमिक टाइम्स ने यह भी ग़लत लिखा है कि सोनिया गाँधी ने राहुल से 5 लाख का लोन ले रखा है लेकिन असल में इसका ठीक उल्टा है।

सोनिया गाँधी के पास 4.29 करोड़ की मूवेबल प्रॉपर्टी है। 2014 में ये आँकड़ा 2.81 करोड़ था। उनके ख़िलाफ़ राज्यसभा सांसद सुब्रह्मण्यम स्वामी द्वारा फाइल किया गया एक केस भी है। सोनिया गाँधी के पास कोई कार नहीं है। बता दें कि राहुल गाँधी ने भी अपने चुनावी हलफनामे में बताया था कि उनके पास कोई कार नहीं है। सोनिया गाँधी के पास 1.2 किलो सोना है और 88 किलो चाँदी है। उनके पास कुल 59 लाख की सोना-चाँदी की चीजें हैं।

बता दें कि सोनिया गाँधी ने नामांकन से पहले कलेक्ट्रेट तक रोड शो भी किया। इस दौरान उनके साथ राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी भी उपस्थित रहे। बुधवार (अप्रैल 10, 2019) को अमेठी में राहुल गाँधी के नामांकन में हिस्सा लेने के बाद भुएमऊ स्थित गेस्ट हाउस पहुँची। सोनिया आज गुरुवार को सुबह साढ़े नौ बजे पार्टी के केंद्रीय कार्यालय पहुँची। वहाँ हवन के बाद रोड शो शुरू किया गया। सोनिया का क़ाफ़िला रोड शो के दौरान रास्ता ही भटक गया था, इससे जाम लग गया। ऐन वक्त पर अधिकारियों ने स्थिति को संभाला।

वाजपेयी को भी लगता था वो अजेय हैं, मोदी को भी हराएँगे: सोनिया गाँधी

यूपीए अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने रायबरेली से पाँचवी बार नामांकन दायर करने के बाद पत्रकारों से बातचीत करते हुए कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को भी लगता था कि वो अजेय हैं लेकिन 2004 में हमने उन्हें हरा दिया। सोनिया गाँधी ने कहा कि ठीक उसी तरह नरेंद्र मोदी को भी हरा दिया जाएगा। सोनिया ने दावा किया कि नरेंद्र मोदी अजेय नहीं हैं। उन्होंने पत्रकारों को 2004 आम चुनाव की याद दिलाते हुए कहा कि उस समय वाजपेयी की जीतने की ख़ूब चर्चाएँ थी लेकिन हुआ इसके ठीक उलटा। नामांकन पर निकलने से पहले पूर्व कॉन्ग्रेस अध्यक्ष ने पार्टी मुख्यालय में हवन-पूजन भी किया।

सोनिया गाँधी ने इससे पहले 2004, 2006, 2009 और 2014 में रायबरेली से जीत दर्ज की थी। 2004 में उन्होंने सपा के उम्मीदवार को क़रीब ढाई लाख मतों से हराया था। 2006 उपचुनाव में उन्होंने सपा के उम्मीदवार को सवा चार लाख से भी अधिक मतों के अंतर से मात दी थी। 2009 में सोनिया गाँधी ने बसपा उम्मीदवार को 2,72,000 से भी अधिक मतों से हराया था। पिछ्ले आम चुनाव में मोदी लहर के बावजूद सोनिया अपना गढ़ बचाने में क़ामयाब रही थीं। सवा पाँच लाख से भी अधिक मत पाकर सोनिया ने 2014 में भाजपा उम्मीदवार को साढ़े तीन लाख मतों के अंतर से हराया था। इससे पहले फ़िरोज़ गाँधी और इंदिरा गाँधी भी रायबरेली से सांसद पहुँच चुके हैं।

सोनिया गाँधी ने नामांकन से पहले कलेक्ट्रेट तक रोड शो भी किया। इस दौरान उनके साथ राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी भी उपस्थित रहे। बुधवार (अप्रैल 10, 2019) को अमेठी में राहुल गाँधी के नामांकन में हिस्सा लेने के बाद भुएमऊ स्थित गेस्ट हाउस पहुँची। सोनिया आज गुरुवार को सुबह साढ़े नौ बजे पार्टी के केंद्रीय कार्यालय पहुँची। वहाँ हवन के बाद रोड शो शुरू किया गया। इस दौरान राहुल ने भी कहा कि भारतीय इतिहास में ऐसे कई लोग हुए हैं जो ख़ुद को अपराजेय मानते थे लेकिन अंततः उनकी हार हुई।

सोनिया गाँधी अपना नामांकन दाखिल करने के बाद दिवंगत मौलाना अली मियाँ के घर गईं। उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ एक बैठक में भी हिस्सा लिया। रायबरेली में पाँचवे चरण के तहत 6 मई को मतदान होना है और सोनिया गाँधी का मुक़ाबला भाजपा प्रत्याशी दिनेश प्रताप सिंह से है। सपा और बसपा महागठबंधन ने रायबरेली और अमेठी से उम्मीदवार नहीं उतारा है। दिनेश प्रताप भी कॉन्ग्रेस के नेता रहे हैं लेकिन पिछले वर्ष उन्होंने भाजपा का दामन थाम लिया था।

अमर उजाला में प्रकाशित एक ख़बर के अनुसार, सोनिया का क़ाफ़िला रोड शो के दौरान रास्ता ही भटक गया था, इससे जाम लग गया। ऐन वक्त पर अधिकारियों ने स्थिति को संभाला। राहुल गाँधी ने इस दौरान चौकीदार और चोर वाले नारे को फिर से दोहराया। उन्होंने कहा कि मोदी ने ग़रीबों का रुपया उद्योगपतियों को दे दिया। वहीं अगर रायबरेली सीट की बात करें तो अब तक हुए 16 लोकसभा चुनावों और तीन उपचुनावों में कॉन्ग्रेस ने यहाँ से 16 बार जीत दर्ज की है। 1977 में भारतीय लोकदल और 1996, 1998 में भाजपा ने इस सीट पर जीत दर्ज की थी। रायबरेली के अंदर 5 विधानसभा सीटें आती है जिनमें कॉन्ग्रेस और भाजपा के पास दो-दो सीटें हैं।

बांग्ला फ़िल्म के प्रदर्शन पर रोक लगाना ममता सरकार को पड़ा भारी, SC ने लगाया ₹20 लाख का जुर्माना

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को पश्चिम बंगाल सरकार पर अनिक दत्त द्वारा निर्देशित सामाजिक-राजनीतिक व्यंग्य पर आधारित फ़िल्म ‘भोबिश्योतिर भूत’ की सार्वजनिक स्क्रीनिंग पर प्रतिबंध लगाने के संबंध में 20 लाख रुपए का जुर्माना लगाया।

ख़बरों के अनुसार, अनिक दत्त द्वारा निर्देशित एक सामाजिक-राजनीतिक व्यंग्य पर आधारित यह फ़िल्म 15 फरवरी को रिलीज़ हुई थी और उसके अगले ही दिन उसे कोलकाता के सभी सिनेमाघरों से हटा दिया गया। जानकारी के अनुसार यह फ़िल्म कथित तौर पर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर व्यंग्य थी और इसीलिए फ़िल्म को सिनेमाघरों से हटा दिया गया।

न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने फ़िल्म निर्माता की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि उत्पादकों और सिनेमा हॉल के मालिकों को 20 लाख रुपए का जुर्माना दिया जाएगा, जो बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार के उल्लंघन के मुआवज़े के रूप में दिया जाएगा।

भोबिश्योतिर भूत के निर्माता ने आरोप लगाया था कि फ़िल्म को राज्य के अधिकारियों के इशारे पर सिनेमाघरों से हटवाया गया।

शीर्ष अदालत ने 15 मार्च को ममता बनर्जी सरकार को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया था कि फ़िल्म की स्क्रीनिंग पर किसी भी तरह का कोई प्रतिबंध न लगाया जाए। फिल्म के निर्देशक ने तब आरोप लगाया था कि सिंगल-स्क्रीन थिएटर मालिकों और मल्टीप्लेक्स को राज्य भर में 40 से अधिक स्क्रीन पर स्क्रीनिंग को रोकने के लिए मजबूर किया गया था।

पश्चिम बंगाल पुलिस की विशेष शाखा से फ़िल्म के निर्माता द्वारा संपर्क साधने पर पता चला कि इसके प्रदर्शन पर रोक लगाने के पीछे फ़िल्म के कंटेंट से किसी की भावना आहत न हो यह तर्क दिया गया था। साथ ही राजनीतिक और क़ानून-व्यवस्था की समस्या पैदा होने का हवाला भी दिया गया था।

फ़िल्म पर प्रतिबंध लगाने के बाद 18 फरवरी को एक विरोध-प्रदर्शन किया गया था जिसमें कई फ़िल्म कलाकार और कार्यकर्ता शामिल हुए थे।

वयोवृद्ध कलाकार सौमित्र चटर्जी ने एक पत्र लिखा है, जिसमें उन्होंने लिखा कि फ़िल्म पर रोक लगाने का फ़ैसला अलोकतांत्रिक और फ़ासीवादी नीति से ताल्लुक़ रखता है। चटर्जी ने अपने पत्र में यह भी लिखा कि स्क्रीनिंग पर रोक का फ़ैसला प्रशासन का एक ‘प्रतिशोधात्मक कृत्य’ है।

फ़िल्म ‘भोबिश्योतिर भूत’ शुरुआत से ही गंभीर विवादों का सामना कर रही है। फ़िल्म के निर्देशक अनिक दत्त और सह-निर्माता इंदिरा उन्नीनार ने हाल ही में धमकी मिलने का दावा भी किया था।

इससे पहले अनिक दत्त ने फ़िल्म फेस्टिवल स्थलों और उसके आस-पास मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के पोस्टरों के अत्यधिक उपयोग की आलोचना की थी और तर्क दिया था कि इस तरह के आयोजनों के दौरान फ़िल्मी हस्तियों को अधिक लाइमलाइट मिलनी चाहिए।

ममता बनर्जी आमतौर पर आलोचनाओं को संभाल नहीं पाती। ऐसी कई घटनाएँ सामने आई हैं, जहाँ मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने असंतोष फैलाने वाली आवाजें बुलंद करने की कोशिश की है।

पंजाब के राज्यपाल ने Queen Elizabeth के जन्मदिन पर मिले निमंत्रण को ठुकराया, बताई ये वजह

पंजाब के राज्यपाल विजयेंद्र पाल सिंह बडनोर ने ब्रिटेन की महारानी एलिज़ाबेथ के जन्मदिवस के मौके पर ब्रिटिश हाई कमीशन द्वारा आयोजित कार्यक्रम में शिरकत करने से इनकार कर दिया। बुधवार (अप्रैल 10, 2019) को क्वीन एलिज़ाबेथ ने अपना 93वाँ जन्मदिन मनाया। पंजाब के राज्यपाल ने जलियाँवाला बाग़ नरसंहार के भी इतिहास में उसी दिन होने के कारण इस कार्यक्रम में शिरकत करने से मना कर दिया। ब्रिटिश हाईकमीशन के डिप्टी हाई कमिश्नर एंड्रयू आयरे ने अपने निवास पर एक भव्य पार्टी का आयोजन किया था, इसमें बडनोर को मुख्य अतिथि के तौर पर निमंत्रित किया गया था। राज्यपाल ने कहा कि वो इस कार्यक्रम में नहीं जा सकते क्योंकि इसी दिन जलियाँवाला बाग़ हत्याकांड की 100वीं बरसी भी है।

बडनोर चंडीगढ़ केंद्र शासित प्रदेश के प्रशासक भी हैं। ब्रिटिश हाई कमीशन को भेजे पत्र में बडनोर ने लिखा:

“महारानी के जन्मदिवस के अवसर पर आपने-अपने निवास पर मुझे मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया है। इसके लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। मैं महारानी की लम्बी उम्र और अच्छी सेहत की कामना करता हूँ। हालाँकि, मेरे लिए इस कार्यक्रम में शिरकत करना गर्व की बात होती लेकिन चूँकि ये जलियाँवाला बाग़ में हुए निर्मम नरसंहार की 100वीं बरसी की पूर्व संध्या पर आयोजित किया जा रहा है, इसीलिए मैं इस कार्यक्रम में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने में असमर्थ हूँ।”

बता दें कि जलियाँवाला नरसंहार के दौरान महिलाओं, बच्चों व बुज़ुर्गों सहित सैंकड़ों निहत्थे और निर्दोष भारतीयों को मार डाला गया था। जनरल डायर के नेतृत्व में ब्रिटिश जवानों ने 13 अप्रैल 1919 को अमृसतर में इस निंदनीय कृत्य को अंजाम दिया था। अभी हाल ही में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे काले अध्याय के रूप में जाने जाने वाले इस नरसंहार के बारे में बात करते हुए ब्रिटिश मंत्री मार्क फिल्ड ने हाउस ऑफ कॉमन्स में कहा था कि उन्हे इस पर गहरा पछतावा है और जल्द ही एक माफ़ीनामा जारी किया जाएगा।

महारानी एलिज़ाबेथ ने कहा कि ये नरसंहार भारतीय-ब्रिटिश इतिहास पर एक काला धब्बा है। इसी तरह पूर्व ब्रिटिश पीएम डेविड कैमरून ने भी पंजाब दौरे के दौरान ब्रिटिश इतिहास का बहुत ही शर्मनाक वाकया बताया था। हाउस ऑफ कॉमन्स में बहस के दौरान लेबर पार्टी के प्रीत कौर गिल ने कहा कि ब्रिटिश शासन द्वारा जलियाँवाला बाग़ नरसंहार की ज़िम्मेदारी लेते हुए औपचारिक माफ़ी माँगी जानी चाहिए। लेबर पार्टी के ही वीरेंदर शर्मा ने कहा कि अब समय आ गया है जब ब्रिटिश प्रधानमंत्री सार्वजनिक रूप से इसके लिए माफ़ी माँगे।

पंजाब के राज्यपाल वीपी सिंह बडनोर 1999 और 2004 में लोकसभा सांसद बन चुके हैं। उससे पहले वो 4 बार विधायक भी रहे हैं। राजस्थान सरकार में कैबिनेट मंत्री का पद संभाल चुके बडनोर कई वर्षों तक राजस्थान भाजपा के उपाध्यक्ष भी रहे हैं। 2010 से 2016 तक राज्यसभा सांसद रहे बडनोर को अगस्त 2016 में पंजाब का राज्यपाल नियुक्त किया गया था।

आंध्र प्रदेश: चंद्रबाबू और जगमोहन के समर्थकों में हुई हिंसक झड़प, TDP नेता की मौत

बुधवार (अप्रैल 11, 2019) को आंध्र प्रदेश में हो रहे लोकसभा और विधानसभा चुनावों के बीच कई जगहों से आपसी झड़प की खबरें सामने आईं हैं। इसी बीच ANI के एक ट्वीट से पता चला कि अनंतपुर जिले के ताड़िपत्री शहर में वाईएसआरसीपी और टीडीपी के कार्यकर्ताओं के बीच हुई झड़प में टीडीपी के एक नेता एस भास्कर रेड्डी की मौत हो गई।

ANI के ट्वीट में दोनों पार्टियों के बीच हुई झड़प का वीडियो भी सामने आया है। इस वीडियो में स्पष्ट देखा जा सकता है कि दोनों दलों के समर्थक आपस मे किस बदसलूकी से लड़ रहे हैं। इस आपसी झड़प के विवाद ने इतना ज्यादा तूल पकड़ा कि पुलिस को दोनों पार्टियों के कार्यकर्ताओं पर लाठी चार्ज करना पड़ा।

20 राज्यों में 91 सीटों पर मतदान के साथ आंध्र प्रदेश में आज लोकसभा चुनावों के साथ विधानसभा चुनावों पर भी मतदान हो रहे हैं। एक ओर जहाँ टीडीपी को इस बार महागठबंधन का समर्थन मिला हुआ है वहीं जगमोहन रेड्डी की पार्टी वाईएसआरसीपी बिना किसी गठबंधन के चुनाव लड़ रही है।

बता दें कि आंध्र प्रदेश से आज सुबह मतदान शुरू होने के बाद से ही अलग-अलग तरह की खबरें आ रहीं हैं। सुबह 9:40 पर ANI के ट्वीट से ही मालूम चला था कि जनसेवा के MLA उम्मीदवार मधुसूदन गुप्ता ने अनंतपुर जिले के गूटी में एक मतदान केंद्र पर EVM को तोड़ दिया। जिसके बाद पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार भी किया।

इसके अलावा आंध्र प्रदेश में ईवीएम के खराब होने की खबरों पर सीएम चंद्रबाबू नायडू के चुनाव आयोग को पत्र लिखने संबंधी खबर भी सामने आई। अपने पत्र में उन्होंने उन केंद्रों पर दोबारा मतदान होने की बात की है जहाँ ईवीएम में खराबी की वजह से सुबह 9.30 बजे तक मतदान शुरू नहीं हो पाया था।

अरविन्द केजरीवाल ने कहा, जो काम 70 साल में नहीं हुआ, वो मोदी ने 5 साल में कर दिया #मोदी है तो मुमकिन है

लाख बार गठबंधन के लिए गिड़गिड़ाते रहने के बाद भी कॉन्ग्रेस द्वारा ठुकराए जाने के बाद आम आदमी पार्टी अध्यक्ष और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर अनाप-शनाप आरोप लगाकर आसानी से चर्चा में बने रहते हैं।

लोकसभा चुनाव का प्रथम चरण आज जारी है। इसी बीच अरविन्द केजरीवाल ने ट्विटर पर भाजपा के एक ट्वीट को रीट्वीट करते हुए कह दिया कि जो काम पाकिस्तान 70 साल में नहीं कर पाया, उसके दोस्त मोदी जी ने पाँच साल में कर दिया।

भाजपा ने अपने ट्विटर हैंडल से पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के एक बयान को शेयर किया, जिसमें उन्होंने कहा है कि वो देशभर में NRC लागू करेंगे और बौद्ध, हिन्दू और सिखों को छोड़कर देश से एक-एक घुसपैठिए को बाहर निकाल देंगे।

अरविन्द केजरीवाल ने फ़ौरन इसे रीट्वीट करते हुए अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए लिखा, “पाकिस्तान और इमरान खान भी यही चाहते हैं कि हिंदुस्तान में दंगे फैलें। इसीलिए पाकिस्तान खुल कर मोदी जी को फिर PM बनाने के लिए हर तरह की मदद कर रहा है। जो काम पाकिस्तान 70 साल में नहीं कर पाया, उसके दोस्त मोदी जी ने पाँच साल में कर दिया – हिंदुस्तान का भाईचारा खराब कर दिया।”

बता दें कि कल ही पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने एक बयान दिया था कि यदि आम चुनावों में बीजेपी (BJP) की जीत होती है, तो फिर भारत के साथ शांति वार्ता का एक बेहतर मौका हो सकता है। इमरान खान ने विदेशी पत्रकारों के साथ इंटरव्यू में कहा कि अगर बीजेपी जीतती है, तो कश्मीर मुद्दे पर किसी तरह का समझौता हो सकता है। इमरान खान के इस चौंकाने वाले बयान के बाद से ही विपक्ष और मीडिया गिरोह में बेचैनी देखने को मिल रही है।  

कॉन्ग्रेस अपने रवैए के कारण ही हिंदू इलाकों में जीरो हैं : बदरूद्दीन अजमल

लोकसभा चुनावों के मद्देनज़र असम की राजनीति में एक नया मोड़ देखने को मिला है। कुछ समय पहले तक कॉन्ग्रेस का समर्थन करने वाली AIUDF (ऑल इंडिया यूनाईटिड डेमोक्रेटिक फंड) पार्टी के प्रमुख बदरूद्दीन अजमल ने कॉन्ग्रेस पार्टी को लेकर बड़ा बयान दिया है। दरअसल, AIUDF के प्रत्याशियों के ख़िलाफ़ कॉन्ग्रेस द्वारा अपनी पार्टी के उम्मीदवार खड़े करने पर बदरूद्दिन ने कॉन्ग्रेस पर विश्वासघात का आरोप लगाया है।

याद दिला दें कि पिछले महीने AIUDF ने निर्णय लिया था कि असम की 14 लोकसभा सीटों पर वह केवल अपनी पार्टी से 3 प्रत्याशी ही उतारेगी और बाकी कि सीटें वो कॉन्ग्रेस के लिए छोड़ देगी। अजमल की मानें तो उन्होंने सेकुलर वोटों को बँटने से रोकने के लिए ऐसा किया था ताकि वो भाजपा को सत्ता से बाहर कर सकें।

लेकिन अब जब कॉन्ग्रेस ने करीमगंज, बरपेटा और डुभरी की लोकसभा सीटों पर अपने प्रत्याशी उतार दिए हैं, तो अजमल इससे नाखुश नज़र आ रहे हैं। उनका मानना है कि कॉन्ग्रेस की इस हरकत से गैर-भाजपा वोट तीन संसदीय क्षेत्रों में बँट जाएँगे।

बदरूद्दीन ने असम प्रदेश कॉन्ग्रेस कमेटी पर इल्जाम लगाया है कि वो AIUDF को खत्म करने की कोशिश कर रही है। उनका कहना है कि कॉन्ग्रेस का मकसद AIUDF को खत्म करना है, कॉन्ग्रेस के मुस्लिम नेता नहीं चाहते हैं कि कॉन्ग्रेस और AIUDF में गठबंधन हो, क्योंकि अगर ऐसा होता है तो उनका राजनैतिक भविष्य हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा।

इतना ही नहीं अजमल ने भाजपा को जहाँ अपना पहला दुश्मन बताया है तो वहीं कॉन्ग्रेस को अपना दूसरा दुश्मन करार दिया है। अजमल ने कहा, “अगर भाजपा हमारी पहली दुश्मन है तो कॉन्ग्रेस हमारी दूसरी नंबर की दुश्मन है। हमने ‘धर्मनिरपेक्षता’ के नाम पर सीटों का त्याग किया। हमारी कॉन्ग्रेस को मदद करने की कोई मंशा नहीं थी। हमने यह निर्णय असम की भाषा, संस्कृति, पहचान और हर परिप्रेक्ष्य को देखकर लिया था। हम चाहते थे कि कॉन्ग्रेस भी उन तीनों सीटों पर अपने न प्रत्याशी उतारकर हमारी तरह त्याग करे। इससे हम तीन सीटों पर जीतते, कॉन्ग्रेस 7 और बीजेपी को मुश्किल से 2 सीटें मिलती।”

कॉन्ग्रेस की कठोरता पर अजमल का कहना है कि कॉन्ग्रेस अपने रवैये के कारण ही हिंदू इलाकों में जीरो हैं। उनकी मानें तो राज्य में कॉन्ग्रेस पूरी तरह से मुस्लिम आधारित पार्टी है क्योंकि पार्टी में 25 में से 15 विधायक अल्पसंख्यक समुदाय से आते हैं।

अजमल का आरोप है कि कॉन्ग्रेस पार्टी वोटों के लिए मुस्लिम को बेवकूफ बनाकर ब्लैकमेल कर रही है। उनकी मानें तो दशकों से मुस्लिमों के वोट का इस्तेमाल करके, अब कॉन्ग्रेस को AIUDF जैसी पार्टी से डर लग रहा है कि कहीं उनके वोट न छिन जाएँ।

बदरूद्दिन अजमल ने पिछले साल एक पत्रकार के साथ मारपीट की थी और सवाल पूछने पर उसका सर फोड़ने तक की धमकी दी थी।

मोदी विरोधियों की गज भर लंबी ज़ुबान, घटिया राजनीति का प्रमाण

आज से 17वीं लोकसभा चुनाव के पहले चरण के मतदान की प्रक्रिया शुरू हो गई है। पहले चरण में कुल 545 सीटों में से 91 सीटों पर आज वोटिंग होगी। सियासी घमासान के बीच जहाँ एक तरफ मतदाता अपने प्रतिनिधि को जिताने की कोशिश में जुट गए हैं, वहीं दूसरी तरफ राजनीतिक पार्टियों के नेता अपनी ज़ुबान को क़ाबू में नहीं रख पा रहे हैं।

अपनी विविधताओं और विशालतम छवि के लिए प्रसिद्ध भारत में लोकसभा चुनाव किसी उत्सव से कम नहीं होता, इस पर दुनिया की नज़र भी बनी रहती है। चुनावी मौसम में आरोप-प्रत्यारोप का दौर कोई नई बात नहीं है। लेकिन इस चुनावी हार-जीत में जब जनता को बरगलाने का काम किया जाता है, तो वो किसी अपराध से कम नहीं होता। इसी कड़ी में अपनी भद्दी राजनीति को चमकाने के लिए कर्नाटक के मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी ने पीएम मोदी को हिटलर तक कह दिया।

चोर की दाढ़ी में तिनका

बता दें कि कुमारस्वामी का यह तीखा हमला इसलिए था क्योंकि वो आयकर विभाग की छापेमारियों से नाराज़ थे। दरअसल हाल ही में जनता दल सेक्यूलर (JDS) के लोगों पर आयकर विभाग ने छापेमारी की थी। इससे कर्नाटक के मुख्यमंत्री इतने आहत हुए कि उन्होंने अपना सारा गुस्सा पीएम मोदी पर उतारते हुए कह दिया कि वो तो हिटलर से भी ख़राब हैं!

कुमारस्वामी ने आरोप लगाते हुए पीएम मोदी को कहा कि वो देश के सबसे ख़राब प्रधानमंत्री हैं, जो लोगों की निजी संपत्तियों को ज़ब्त करने का विधेयक लाए हैं। अब ज़रा इनसे ये पूछा जाए कि आयकर विभाग क्या अपना मानसिक संतुलन खो बैठा है, जो वो लोगों की निजी संपत्तियों का ज़ब्त करने का काम करेगा? यह बात तो हर कोई जानता है कि आयकर विभाग, आय से अधिक उन संपत्तियों को ज़ब्त करने का काम करता है, जिसका हिसाब सरकार को नहीं दिया जाता। ‘चोर की दाढ़ी में तिनका’ वाली कहावत यहाँ सटीक बैठती है क्योंकि आयकर विभाग की छापेमारी का डर उन्हीं चोरों को होगा, जिनके पास चोरी का माल होगा। कुमारस्वामी अगर आयकर विभाग की छापेमारी से डरते हैं, तो मतलब साफ़ है कि उनका दामन भी दूध का धुला नहीं है।

अपने इसी डर को भगाने का एकमात्र साधन वो पीएम मोदी को मानते हैं और इसी लिए वो कभी पीएम के चमकते चेहरे के बारे में बात करते हैं, तो कभी उन्हें तानाशाह बताते हैं। असल में अपने दु:ख को छिपाने का कोई दूसरा उपाय न सूझता देख वो उन्हें कुछ भी कहने से नहीं चूकते, फिर चाहे देश के सबसे ख़राब प्रधानमंत्री का तमगा देना हो या दुनिया का ही सबसे ख़राब प्रधानमंत्री बोल देना हो।

IT विभाग और चिदंबरम में 36 का आँकड़ा

कुछ इसी तरह का डर यूपीए काल में वित्तमंत्री रहे पी चिदंबरम पर भी दिखा। उनका यह डर उस समय दिखा जब हाल ही में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ के क़रीबियों के ख़िलाफ़ आयकर विभाग द्वारा क़रीब 50 ठिकानों पर छापेमारी की गई। इस छापेमारी में करोड़ों रुपए कैश के अलावा कई महत्वपूर्ण दस्तावेज़ बरामद किए गए। पी चिदंबरम ने ट्वीट कर यह ज़ाहिर करने की कोशिश की कि उन्हें आयकर विभाग की छापेमारी से कोई डर नहीं लगता, लेकिन इसकी सच्चाई कुछ और ही थी। इसका संबंध उनकी पत्नी नलिनी चिदंबरम और पुत्र कार्ति चिदंबरम की अवैध संपत्तियों का डर से था।

सांप, बिच्छू और नीच तक कह डाला

ऐसा पहली बार नहीं हुआ है जब किसी ने पीएम मोदी पर हमलावर और अभद्र टीका-टिप्पणी की हो। कॉन्ग्रेस के मणिशंकर अय्यर ने पीएम मोदी को ‘नीच’ कहा था जिस पर सफ़ाई दी कि वो हिंदी नहीं जानते थे, इसलिए उन्होंने ‘Low Person’ का अनुवाद किया और उन्हें नीच बोल दिया। हालाँकि, अपने इस बयान पर अय्यर ने कम से कम 6 बार माफ़ी माँगने का ज़िक्र किया। उनके विवादित बयानों की फेहरिस्त में और भी विवादित बयान शामिल हैं जिसमें उन्होंने साल 2013 में नरेंद्र मोदी को सांप-बिच्छू तक कह डाला था। अपनी इस बेक़ाबू होती ज़ुबान ऐसे नेताओं के गिरते स्तर का पता चल जाता है।

पीएम मोदी के ‘काले से गोरे’ का राज बताने से भी नहीं चूके

देश के प्रधानमंत्री के ख़िलाफ़ बिगड़े बोल में एक नाम कॉन्ग्रेसी नेता अल्पेश ठाकोर का भी शामिल है। पीएम मोदी के गोरे रंग पर तंज कसते हुए अल्पेश ने कहा था कि वो 80,000 रुपए का मशरूम खाते हैं, जिससे वो काले से गोरे हो गए हैं। ये बयान गुजरात विधानसभा चुनाव के दोरान 2017 में दिया गया था। ऐसे ओछे और भद्दे बयानों के सरताज़ों से मैं कहना चाहूँगी कि पीएम मोदी के चेहरे पर ध्यान देने की बजाए अगर उनके विकास कार्यों पर ध्यान दिया होता तो शायद देश की दिशा और दशा में आए सुधारों को वो देख पाते

चुनावी दंगल के इस माहौल में आए दिन कोई न कोई ऐसा विवादित बयान दे डालता है, जिससे किरकिरी होना स्वाभाविक ही है। सबसे हैरानी की बात यह है कि इन विरोधी सुरों के तीर हमेशा पीएम मोदी पर ही छोड़े जाते हैं। बीजेपी की धुर विरोधी पार्टी कॉन्ग्रेस तो हमेशा से ही हमलावार रही है, लेकिन कुछ ऐसे नेता भी उनका साथ बख़ूबी देते हैं जिन्होंने कभी ख़ुद NDA के साथ मिलकर राजनीति की सीढ़ियाँ चढ़ीं थी। यहाँ बात ममता बनर्जी की हो रही है जो 1999 में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का हिस्सा बन गई थी। जिस गठबंधन का वो कभी हिस्सा थीं, जिसकी बदौलत वो देश की पहली रेलमंत्री बनीं, आज वही पार्टी ममता को एक आँख नहीं भाती। जिनके ख़िलाफ़ वो अभद्र भाषा का प्रयोग तो करती ही हैं साथ में उन पर निजी हमले भी करती हैं।

कुल मिलाकर देखा जाए तो एक बात तो तय है कि पीएम मोदी के ख़िलाफ़ बुलंद सुर देश की जनता का ध्यान भटकाने का ज़रिया मात्र है। ऐसा करने से वो बीते पाँच वर्षों में आए सकारात्मक बदलावों पर से जनता का ध्यान हटाना चाहती है। फ़िलहाल, यह देखना बाकी है कि विरोधियों के ये बिगड़े बोल जनता पर कितना असर डालते हैं।

प्रिय चुनाव आयोग, ये हो क्या रहा है?

चुनाव आयोग का अधिकतर समय मजाक ही उड़ाया गया है। हर पार्टी के लोगों ने समय-समय पर चुनाव आयोग को उपहास का पात्र बनाया है। कभी बिना दाँत का शेर तो कभी काग़ज़ी बाघ आदि उपनामों से इसे नवाज़ा जाता रहा है। इसके पीछे हमेशा यह दलील होती थी कि चुनाव आयोग सिर्फ बोलता है, उसकी बातों को कोई मानता नहीं।

इस बार चुनाव आयोग ने अपने आप को गम्भीरता से लिया है और कई कालजयी आदेश पारित कर दिए हैं। इनमें से प्रमुख है मोदी की बायोपिक को बैन कर देना यह कहते हुए कि यह फिल्म ‘लेवल प्लेइंग फ़ील्ड’ को डिस्टर्ब करती है। इस तर्क से तो कई लोग और मीडिया वालों को प्रतिबंधित करना होगा क्योंकि वो भी मोदी की रैलियों को टेलिकास्ट करते हैं, स्टूडियो से पक्ष लेकर बात करते हैं, इंटरव्यू चलाते हैं।

आखिर लेवल प्लेइंग फ़ील्ड है क्या? जब हर नेता रैली कर रहा है, लोकल कार्यकर्ता पैम्फलेट बाँट रहे हैं, व्यक्ति फेसबुक पर लिख रहा है, तो फिर फिल्म, वेब सीरिज़ या टीवी सीरियल्स पर रोक लगाना अपने आप में हास्यास्पद है। मीडिया में हर दिन, चौबीस घंटे पोलिटिकल स्टोरी ही चलती है जिससे वोटर प्रभावित होता है, और सबसे ज़्यादा होता है। फिर इन्हें चलने दिया जा रहा है, और फिल्म को रोक रहे हैं।

ऐसा नहीं है कि मुझे विवेक ओबरॉय की फिल्म में बहुत स्कोप दिख रहा है। मेरे हिसाब से बेकार फिल्म होगी, ‘एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ टाइप की पैरोडी। लेकिन, अभिव्यक्ति और व्यवसाय करने का मौलिक अधिकार तो सबको है, उस पर चुनाव आयोग किस तर्क से उलझ रहा है? कोई भी व्यवसायी अपने व्यवसाय को अपने फायदे के हिसाब से समय और जगह चुनकर चलाता है, फिर मोदी की फिल्म भी उस समय पर आने वाली थी, जब उसकी बात सबसे ज़्यादा हो रही हो। और तब चुनाव आयोग को याद आया कि फिल्म को रोक देना चाहिए।

फिर तो कुणाल कमरा जैसे चुटकुलेबाजों पर भी रोक लगनी चाहिए, जो अपने स्तर पर ही सही, मोदी के खिलाफ प्रचार करता दिखता है। फिर तो ज़ी न्यूज़ और एनडीटीवी पर भी रोक लगनी चाहिए क्योंकि दोनों ने अलग पाले पकड़ रखे हैं। फिर तो, तमाम यूट्यूब और फेसबुक के लोगों पर भी रोक लगनी चाहिए जो जागरुकता के नाम पर पार्टी के पक्ष या विपक्ष में लिख और बोल रहे हैं।

चुनाव आयोग का तर्क बेकार है। उसे बेहतर तर्क लाकर इस फिल्म को बैन करना चाहिए था। ये भी कह देते की मानवता को इस फिल्म से ख़तरा है, तो भी मैं ज़्यादा कन्विन्स होता बजाय इसके कि इससे लेवल प्लेइंग फ़ील्ड डिस्टर्ब हो रहा है।

ये तर्क इतना वाहियात है कि कल इसे आधार बनाकर विरोधी पार्टियाँ यह माँग कर सकती हैं कि मोदी दिन में तीन रैलियाँ कर रहा है, उनके नेता एक ही कर रहे हैं, अतः रैलियों की संख्या उनके हिसाब से तय होनी चाहिए। क्योंकि, लेवल प्लेइंग फ़ील्ड तो यहाँ भी डिस्टर्ब हो रहा है! मैं मजाक नहीं कर रहा, ये ऐसा ही कुतर्क है चुनाव आयोग का क्योंकि आज के दौर मैं हर व्यक्ति अपने मतलब की सूचनाएँ कहीं से भी पा रहा है, वैसे में चुनाव आयोग इन क्षुद्र कार्यों में अपने आप को फँसा कर संस्था की गरिमा को ही गिरा रहा है।

जिस तरह से विपक्ष में व्याकुलता है, और जिस लेवल का फ़्रस्ट्रेशन विरोधी विचारधारा के लोगों में दिखता है, इनका गिरोह चुनाव आयोग के साथ और भी क्रिएटिव माँग लेकर पहुँच सकता है। ये गिरोह यह भी कह सकता है कि मोदी सरकार ने जो भी विकास कार्य किए, वो तो भारत सरकार ने किए, अतः किसी पार्टी को उसका नाम गिनाकर वोट माँगने का हक़ नहीं होना चाहिए। चूँकि बाकी पार्टियाँ सत्ता से दूर थीं, तो वो विकास कार्य नहीं कर पाए, अतः मोदी और भाजपा को कैम्पेनिंग में भारत सरकार की उपलब्धि को अपनी उपलब्धि बताने पर मनाही होनी चाहिए।

चुनाव आयोग तो इस लाइन पर सोचने भी लगेगा कि बात तो सही है, लेवल प्लेइंग फ़ील्ड का मतलब तो यही होता है कि दोनों पक्ष के लोग एक ही मैदान में, एक ही तरह की गेंद से, उन्हीं नियमों के साथ, उन्हीं उपकरणों के साथ खेलें जो दोनों के पास हों। यहाँ तो एक पार्टी सत्ता में है, फ़ंड को ख़र्च किया है, सड़कें बनवाई हैं, जबकि दूसरी को तो मौका ही नहीं मिला। विपक्ष के गिरोह का तो यह भी दावा हो सकता है कि उन्हें बैटिंग का मौका ही नहीं मिला, तो वो रन बना ही नहीं पाए, अब तो बॉलिंग करेंगे तो हारना तय है। अतः, टॉस करके फ़ैसला करना उचित होगा। इसीलिए, खेल के संदर्भों को चुनावों में लाना कुतर्क कहा जाएगा, समझदारी नहीं।

चुनावों के समय मॉडल कोड ऑफ कन्डक्ट लगता है जिसमें पार्टियों के लिए कुछ मानक तय होते हैं कि आप क्या कर सकते है, क्या नहीं कर सकते। कोई नया विकास कार्य शुरु नहीं किया जा सकता, बोलते हुए सीधे तौर पर किसी जाति या समुदाय के लोगों से वोट की अपील नहीं की जा सकती, प्रचार के दौरान किसी को उकसाने वाली, हिंसा भड़काने वाली बातें नहीं की जा सकती आदि।

कुल मिलाकर यहाँ नैतिकता का एक दायरा बनाना होता है ताकि किसी को भी ग़ैरज़रूरी फायदा न मिले। सत्तारूढ़ पार्टी चुनावों के समय कहीं सड़कें आदि न बनवाए क्योंकि वोट देते समय व्यक्ति उससे प्रभावित हो सकता है। किसी भी समुदाय को उकसाने पर मनाही है, लेकिन कोई उकसा रहा है तो चेतावनी ही दी जा सकती है। ऐसा पहले भी खूब हुआ है, आज भी हो रहा है।

नैतिकता के तय मानक नहीं होते, संदर्भ में लोग इसे मोड़ देते हैं। चुनाव आयोग या तो हीरो बनने के चक्कर में अपनी फ़ज़ीहत करवाने पर उतारू है, या फिर उसे कई मामलों को समझने के लिए उचित समय नहीं मिल पा रहा। हाल ही में गुजरात के एक व्यक्ति ने अपने निकाह के कार्ड पर लोगों से गिफ्ट की जगह भाजपा प्रत्याशी को वोट देने की अपील की थी। चुनाव आयोग ने इसका संज्ञान लिया और उसे चेतावनी दी।

ये किस तरह की बात है? किसी ने कार्ड पर वोट देने की अपील की तो वो वोटरों को प्रभावित कर रहा है? फिर मैं अपने खाली समय में क्या कर रहा हूँ? मैं भी तो फेसबुक पर एक पार्टी और नेता को जितवाने की अपील कर रहा हूँ। फिर वो सौ, दो सौ और नौ सौ कलाकारों के साझा बयान क्या हैं? क्या उससे आम आदमी प्रभावित नहीं होता? बिलकुल होता है, क्योंकि नई सूचना आने से आप नए सिरे से सारी बातों की गणना करते हैं।

एक फिल्म से क्या प्रभाव पड़ता है? उस फिल्म को व्यक्ति एक बार देखेगा, जबकि रवीश कुमार, सुधीर चौधरी, अर्णब गोस्वामी समेत तमाम टीवी चैनलों के एंकर टीवी पर ही नहीं, टीवी के बाहर भी लगातार सीधे तौर पर वोटरों को प्रभावित करते दिखते हैं। और यह सही है। हमारी विचारधारा अलग हो सकती है लेकिन समाज में ओपिनियन लीडर्स, या वैचारिक रूप से बेहतर लोगों की ज़िम्मेदारी होती है कि वो तथ्यों के साथ अपनी बात कहें, ताकि आम जनता एक सही फ़ैसला ले सके।

क्या चुनाव आयोग को नहीं लगता कि एक विचारधारा के लोग ज़्यादा हैं इस देश में और वो टीवी, फेसबुक, यूट्यूब से लेकर हर मीडिया संस्थान और विश्वविद्यालय तक फैले हुए हैं? तो क्या चुनाव आयोग अब यह बताता चले कि जितनी पार्टियाँ हैं, उसी अनुपात में चैनल हों, उनके कार्यक्रम हों, उनके विचार हों?

किसी फिल्म को रोक देना या किसी व्यक्ति का कार्ड पकड़ लेना एक छोटी-सी बात है। इससे चुनावी प्रक्रिया पर सांकेतिक प्रभाव भी नहीं पड़ता। इससे चुनाव आयोग खबरों में भले ही बना रहेगा लेकिन वो अपना ही नाम खराब कर रहा है। अगर किसी बात पर प्रतिबंध लगाना है, तो सही तर्क होने चाहिए। यहाँ तर्क के मामले में चुनाव आयोग फिसड्डी साबित हुई है।

आम आदमी हर वक्त चुनावों की चर्चा करता फिर रहा है। पान की दुकान से लेकर चाय के नुक्कड़ तक लोग इसी चर्चा में उलझे हुए हैं। लोगों को पढ़ कर और सुन कर लोग प्रभावित होते हैं, वोट देने की इच्छा बनाते हैं। फिर तो रॉलेट एक्ट टाइप का कोई कानून ले आए चुनाव आयोग या फिर माइनोरिटी रिपोर्ट टाइप इंटेलीजेंट सिस्टम की व्यवस्था करे जहाँ आदमी के किसी कार्य को करने से पहले ही उसे रोका जा सके!

लोकतंत्र में मीडिया का एक बहुत बड़ा रोल होता है। उसकी भूमिका हर नई तकनीक के साथ व्यापक होती जाती है। अगर विवेक ओबरॉय वाली फिल्म के निर्माता किसी वेब प्लेटफ़ॉर्म से सौदा करते हुए उसे सीधे मोबाइल फोन पर उतार दें, तो चुनाव आयोग क्या कर लेगा? अगर पायरेटेड कॉपी लीक कर दी जाए, तो चुनाव आयोग क्या कर लेगा?

अगर ऐसी फ़िल्में प्रोपेगेंडा ही हैं, तो टीवी चैनलों के एंकर जो कर रहे हैं, क्या वो प्रोपेगेंडा नहीं है। हर रात चालीस मिनट तक सरकार की हर योजना को बेकार बताना भी प्रोपेगेंडा ही है। आखिर चुनाव आयोग इसके लेवल प्लेइंग फ़ील्ड का निर्धारण करेगा कैसे? क्या मीडिया संस्थानों के लिए कोई तय क़ायदा है जहाँ चुनाव आयोग सुनिश्चित कर सके कि इतने मिनट इस पार्टी की रैली, और इतने मिनट इस पार्टी की रैली कवर की जाएगी?

चुनाव आयोग ने मधुमक्खी के छाते में हाथ डाला है। प्रश्न बहुत सारे हैं, और उनके पास उत्तर होंगे नहीं। उत्तर इसलिए नहीं होंगे क्योंकि चुनाव आयोग में बैठा जो व्यक्ति इस तरह के आदेश देता है, या तर्क गढ़ता है, वो कहीं अकेला बैठा हुआ प्रतीत होता है। चुनाव आयोग जबरदस्ती का अपने आप को निष्पक्ष दिखाने के चक्कर में कुछ भी करता दिख रहा है। जबकि, उसे ऐसा करने की कोई ज़रूरत नहीं है। चुनाव आयोग का कार्य सही तरीके से चुनाव कराना है, न कि इस तरह के तर्क गढ़ना जो कि तार्किकता के पैमाने पर दो सेकेंड नहीं ठहर पाते।

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