भावनगर के गरियाधर जिले के एक गाँव में उस समय विवाद खड़ा हो गया जब एक मुस्लिम व्यक्ति के शव को हिंदू श्मशान घाट के पास विवादित भूमि में दफना दिया गया। गुजरात हाईकोर्ट ने इस मामले पर सुनवाई करते हुए शव को स्थानांतरित करने का आदेश दिया।
मुस्लिम परिवार ने कोर्ट के आदेश के बावजूद जब कब्र को नहीं हटाया, तो 27 जुलाई 2026 को अधिकारियों ने कड़ी सुरक्षा के बीच शव को विवादित भूमि से हटाकर कब्रिस्तान में स्थानांतरित कर दिया ।
आखिर मामला क्या है?
यह पूरा विवाद 11 जून 2026 को शुरू हुआ। गरियाधर तालुका के रूपावती गाँव में एक मुस्लिम व्यक्ति की मृत्यु हो गई। उसके बाद परिजनों ने शव को गाँव के कब्रिस्तान में नहीं दफनाया, बल्कि हिंदू श्मशान घाट के पास एक विवादित जमीन में दफना दिया।
हालाँकि गाँव के कब्रिस्तान में पर्याप्त जगह मौजूद था, लेकिन श्मशान घाट से सटे जमीन पर उसे सुपुर्द ए खाक किया गया। इस पर स्थानीय हिंदू ग्रामीणों ने आपत्ति जताई और आरोप लगाया कि जानबूझकर गाँव की शांति भंग करने के लिए ये किया गया।
ग्रामीणों के विरोध की वजह से मामला गरियाधर तालुका पुलिस स्टेशन तक पहुँचा। ग्रामीणों ने शव को हटाने का अनुरोध किया। इसी बीच, सरपंच की शिकायत के आधार पर गरियाधर पुलिस स्टेशन में मकबूल, मुबारक, रजाक, अल्ताफ आदि के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 196, 298, 301, 11 और 189 के तहत मामला दर्ज किया गया।
ग्राम पंचायत ने मुस्लिम परिवार को नोटिस जारी कर यह स्पष्टीकरण माँगा कि गाँव में कब्रिस्तान होने के बावजूद विवादित भूमि का उपयोग क्यों किया जा रहा है। नोटिस में यह भी कहा गया कि यदि पंचायत को संतोषजनक उत्तर नहीं मिला, तो शव को विधिवत तरीके से कब्रिस्तान में स्थानांतरित कर दिया जाएगा।
इसी बीच मुस्लिम पक्ष ने विवादित भूमि को मुस्लिम कब्रिस्तान के रूप में मान्यता देने के लिए पालीताना के डिप्टी कलेक्टर के समक्ष याचिका दायर की थी, लेकिन यह याचिका खारिज कर दी गई। इसके विरोध में मुस्लिम परिवार ने गुजरात हाईकोर्ट का रुख किया और ग्राम पंचायत के नोटिस और डिप्टी कलेक्टर के फैसले को चुनौती दी।
मुस्लिम पक्ष ने कहा कि कब्रिस्तान फूलों से भरा हुआ है। इस पर कोर्ट ने जाँच का आदेश दिया, लेकिन यह दावा झूठा निकला। याचिकाकर्ताओं ने उच्च न्यायालय के समक्ष दावा किया कि पुराने वडोदरा राज्य के गायकवाड़ी राजस्व अभिलेखों के अनुसार, विवादित भूमि का कुछ हिस्सा पहले दफनाने के काम आता था, लेकिन बाद में वह उल्लेख हटा दिया गया। याचिकाकर्ताओं ने यह भी तर्क दिया कि मौजूदा कब्रिस्तान भरा हुआ था, इसलिए उन्हें विवादित भूमि पर दफन करना पड़ा।
इन दलीलों के बाद, उच्च न्यायालय ने राजस्व और पंचायत विभागों को घटनास्थल की जाँच करने का आदेश दिया। जाँच के बाद उच्च न्यायालय को सौंपी गई रिपोर्ट में कहा गया कि गाँव का आधिकारिक मुस्लिम कब्रिस्तान लगभग 700 वर्ग मीटर क्षेत्र में फैला हुआ है, जो एक चारदीवारी से घिरा हुआ है और इसका लगभग आधा हिस्सा अभी भी खाली है।
इस रिपोर्ट ने याचिकाकर्ताओं के दावे को गलत साबित कर दिया और यह भी स्पष्ट कर दिया कि कब्रिस्तान में पर्याप्त जगह उपलब्ध होने के बावजूद, शव को विवादित भूमि पर स्थित हिंदू श्मशान घाट के पास दफनाया गया था। इसलिए न्यायालय ने उनकी दलीलों को स्वीकार नहीं किया।
पहले भी विवादित जमीन पर दफनाने का मामला सामने आया था
जाँच में पता चला कि रूपावती गाँव में इस तरह की घटना पहली बार नहीं हुई है। करीब तीन-चार साल पहले 2021-22 में, इसी परिवार ने अपने एक मृत सदस्य को इसी विवादित जमीन पर दफनाया था। उस समय भी स्थानीय हिंदू समुदाय ने विरोध जताया था।
विरोध प्रदर्शन के बाद पुलिस की मौजूदगी में दोनों समुदायों के लोगों के बीच एक बैठक हुई, जिसके बाद शव को निकालकर मूल कब्रिस्तान में ले जाया गया। यह लिखित गारंटी भी दी गई कि भविष्य में श्मशान घाट के पास किसी भी स्थान पर कोई दफन नहीं किया जाएगा। इसके बावजूद हाल ही में ऐसी ही एक घटना हुई थी।
अदालत ने शव को हटाने का आदेश दिया, लेकिन 10 दिनों तक कोई कार्रवाई नहीं होने के बाद प्रशासन ने शव को कब्रिस्तान में दफनाने की काम किया।
इस मामले में गुजरात हाईकोर्ट ने मुस्लिम परिवार की याचिका खारिज करते हुए कहा कि जब मुस्लिम समुदाय के लिए आधिकारिक कब्रिस्तान उपलब्ध है और वहाँ पर्याप्त जगह है, तो सार्वजनिक या विवादित भूमि पर मनमाने ढंग से कब्र को दफन नहीं किया जा सकता।
पहले की घटनाओं का हवाला देते हुए न्यायालय ने कहा कि मुस्लिम परिवार ने शव को स्थानांतरित करने के फैसले को चुनौती नहीं दी थी और अब चार साल बाद फिर वे अपनी मर्जी से विवादित भूमि पर कब्र को दफन कर फैसले का उल्लंघन कर रहे हैं।
अपने आदेश में अदालत ने कहा कि अगर कब्रिस्तान थोड़ा दूर होता या परिवार वहाँ नहीं पहुँच पाता, तो अदालत इस पर विचार करती, लेकिन यहाँ प्रशासन की रिपोर्ट से स्पष्ट है कि ऐसी कोई स्थिति नहीं थी, इसलिए इस तरह के दफन की अनुमति नहीं दी जा सकती।
गुजरात हाईकोर्ट ने 13 जुलाई 2026 को याचिकाकर्ताओं को आदेश दिया कि परिवार 10 दिनों के भीतर शव को कब्रिस्तान में दफन करें। न्यायालय ने यह भी कहा कि यदि परिवार निर्धारित समय सीमा के भीतर कार्रवाई नहीं करता है, तो राज्य सरकार और पंचायत व्यवस्था न्यायालय के आदेश को लागू कर सकती है।
न्यायालय ने यह भी निर्देश दिया कि यदि शव को ले जाना आवश्यक हो, तो यह पूर्ण धार्मिक रीति-रिवाजों के साथ और मृतक की गरिमा का ध्यान रखते हुए किया जाना चाहिए।
उच्च न्यायालय के आदेश के बाद भी याचिकाकर्ता मुस्लिम परिवार ने कोई कार्रवाई नहीं की। इसके बाद 27 जुलाई 2026 को गरियाधर के पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल पर पहुँचकर शव को विवादित स्थल से हटाकर कब्रिस्तान में स्थानांतरित कर दिया। पूरी प्रक्रिया की वीडियो रिकॉर्डिंग भी की गई।
उच्च न्यायालय के निर्देश के मुताबिक स्थानीय प्रशासन ने पूरी प्रक्रिया की वीडियो रिकॉर्डिंग की। शव को विवादित स्थल से निकालकर रूपावती गाँव के मूल कब्रिस्तान में सभी रीति-रिवाजों के साथ दफनाया गया।
फ्रांस-स्पेन इन दिनों अजीब तरह की आग से जूझ रहा है। दक्षिण-पश्चिम फ्रांस में फैली आग पर काबू पाना आसान नहीं रह गया है। आग फैलते हुए स्पेन के कई हिस्सों को अपनी चपेट में ले लिया है। इन इलाकों से करीब 4 लाख से ज्यादा लोगों को हटा कर सुरक्षित स्थानों पर भेजा गया है। जंगलों की आग ने बड़े पैमाने पर संपत्तियों को नुकसान पहुँचाया है। इससे बड़ी संख्या में जानवरों के मारे जाने का खतरा पैदा हो गया है।
जंगल में लगी इस आग को पायरोक्यूमुलोनिम्बस या पायरोसीबी बादल कहते हैं। इसे आम बोलचाल की भाषा में फायर क्लाउड यानी आग का बादल कहते हैं। दरअसल यह जलवायु परिवर्तन और मौसमी बदलाव का परिणाम है।
क्या होता है फायर क्लाउड
पायरोक्यूमुलोनिम्बस या पायरोसीबी बादल एक ऐसा बादल है जो आग की वजह से पैदा होते हैं। यूरोप में इस बार रिकॉर्ड तोड़ गर्मी पड़ी। फ्रांस- स्पेन के कुछ जगहों पर पारा 45 डिग्री तक पहुँचा था। अत्यधिक तापमान और शुष्क मौसम की वजह से जंगलों में आग भी लगी। इन भीषण आग की वजह से काफी ऊष्मा निकली जो तेजी से गुबार के रूप में ऊपर उठी।
ये काफी ऊपर (करीब 10-15 किलोमीटर) उठने के बाद कम वायुमंडलीय दबाव की वजह से ठंडी होकर संघनित होने लगी और बादल का रूप ले लिया। ऐसे बादल बिजली गिरने या तेज हवाएँ चलने की वजह बनते हैं। इन बादलों में स्ट्रेटोस्फीयर यानी पृथ्वी की दूसरी परत समताप मंडल को भेदने की क्षमता होती है। इसलिए नासा इसे ‘आग उगलने वाला ड्रैगन क्लाउड’ कहता है।
न्यू साउथ वेल्स विश्वविद्यालय के प्रोफेसर रिक मैक्रे के मुताबिक, आग की लपटों के भीतर तूफान बन रहा होता है और वायुमंडल के निचली सतह से ऊपर करीब 10000 क्यूबिक किलोमीटर पर इसका असर भी काफी होता है। ऐसी जगह ठंडे होकर ये संघनित होते हैं और पायरोक्यूमुलोनिम्बस बादल का निर्माण करते हैं।
ये खुद भी बिजली पैदा कर सकते हैं और तेज हवाओं के साथ आग को और भीषण बना देते हैं। इसके कारण आग बुझाना काफी मुश्किल हो जाता है। इतना ही नहीं ये काफी तेजी से आस-पास के इलाकों को अपनी चपेट में ले लेते हैं।
अब तक कहाँ कहाँ देखी गई फायर क्लाउड
21वीं सदी की शुरुआत में ऑस्ट्रेलिया में फायर क्लाउड दिखाई देने लगे थे। 2022 में अमेरिका के कैलिफोर्निया के जंगलों में लगी भीषण आग के दौरान भी ऐस फायर बादल का निर्माण हुआ था और इसकी वजह से व्यापक तबाही हुई थी। लेकिन यूरोप में पहली बार ऐसी स्थिति बनी है। इसकी वजह से वैज्ञानिक काफी चिंतित हैं।
फ्रांस का दक्षिणी पश्चिम हिस्सा फायर क्लाउड से सबसे ज्यादा प्रभावित है। बोर्डो और सौमोस के जंगलों में लगी आग ने बोर्डो शहर को अपने चपेट में ले लिया है वहीं सौमोस गाँव के ऊपर आग के बादल बन गए हैं। पेरिस के आकार से चार गुना बड़ा फायर क्लाउड गिरोंड क्षेत्र में बन गया है। इसके अलावा बिस्कारोस, फॉनटेनब्लियू का जंगल, लैंडेस, टार्न, लैकेनाउ और वार सहित फ्रांस के कई अन्य इलाके भी आग की चपेट में हैं।
स्पेन के अंदरूनी मामलों के मंत्री फर्नांडो ग्रांडे मार्लास्का ने कहा कि 27 जुलाई और 28 जुलाई 2026 आग पर काबू पाने के लिए अहम है क्योंकि 29 जुलाई से तापमान बढ़ने का अनुमान है। एविला के पहाड़ी इलाकों में अब तक की सबसे भीषण आग लगी हुई है, जिसकी वजह से 50000 हेक्टेयर भूमि राख हो चुकी है। राजधानी मैड्रिड के उत्तर पश्चिम में दो जगहों पर आग लगी हुई है इसकी वजह से 70000 हेक्टेयर भूमि जल गई है। इस साल लगी आग पिछले साल से 6 गुणा से ज्यादा है।
दरअसल दुनियाभर में जलवायु परिवर्तन की स्थिति ने मौसमी सिस्टम को बदल दिया है। यूरोप में गर्मी आम तौर पर सुहाना हुआ करता था। घरों में लोग एसी नहीं लगाते थे, लेकिन इस साल रिकॉर्डतोड़ गर्मी ने सबको बेहाल कर दिया। इसकी वजह से ऐसी परिस्थितियाँ पैदा हुई, जिससे पायरोक्यूमुलोनिम्बस क्लाउड का निर्माण हुआ। इससे वायुमंडल में बदलाव, मौसम में बदलाव और दूसरे बदलाव भी हो रहा है। मई महीने में यूरोप में बारिश होती है लेकिन इस बार बारिश की कमी से वन क्षेत्र शुष्क पड़े हैं।
मौसम विशेषज्ञ मैक्रे के मुताबिक, जल्द ही फ्रांस में गर्मी का एक और दौर शुरू हो सकता है। इसमें फिर तापमान 40 डिग्री तक पहुँच सकता है।
क्यों खतरनाक होते हैं आग के बादल
फायर क्लाउड को कंट्रोल करना धरती पर लगी किसी भी आग से ज्यादा मुश्किल है। इतना ही नहीं ये ज्यादा विनाशकारी भी होता है। क्योंकि आग ही उष्मा ही संघनित होकर बादल बनते हैं इसलिए कहा जा सकता है कि ये अपना खुद का मौसम तंत्र विकसित कर लेता है और किसी भी चीज को जला सकता है।
ये बादल काफी शक्तिशाली होते हैं और तेज हवा होने पर उसकी दिशा में जल्दी फैलते हैं यहाँ तक कि बिजली कड़कने का कारण भी बनते हैं यानी बगैर बारिश के बिजली गिरती है। ये बादल काफी बड़ा होता है इसलिए इससे पैदा होने वाली बिजली का दायरा भी काफी बड़ा होता है। यही वजह है कि दूर दराज के इलाके में बेवजह इसके गिरने से आग लग जाती है। इस दौरान अगर तेज हवाएँ चल रही हों, तो आग के लिए यह इंधन का काम करता है।
इन बादलों से लगने वाली आग का पैटर्न इतना अलग और अप्रत्याशित होता है कि इसको कंट्रोल करने की मानवीय क्षमता कम पड़ जाती है। दमकलकर्मियों के पास चाहे जितना ही अत्याधुनिक अग्निशमन साधन उपलब्ध हों, इन पर कंट्रोल करना नामुमकिन-सा होता है। ऐसे में आसपास के लोगों को दूसरी जगह शिफ्ट करना ही एकमात्र उपाय रह जाता है।
हालाँकि पायरोक्यूमुलोनिम्बस या फायर क्लाउड काफी दुर्लभ मौसमी घटना है, लेकिन 4 सालों के अंदर अमेरिका- कनाडा से लेकर यूरोप तक में देखा गया। ये पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय है, क्योंकि जलवायु परिवर्तन हर देश को किसी न किसी रूप में प्रभावित कर रही है।
देश में NEET-UG और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़े विवादों के बाद मोदी सरकार ने परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता लाने और पेपर लीक माफिया पर लगाम लगाने के उद्देश्य से बड़ा कदम उठाया है। इसके तहत लोकसभा में पब्लिक एग्जामिनेशन बिल (Public Examinations Prevention of Unfair Means Amendment Bill, 2026) पेश किया गया है।
दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्रों के लगातार प्रदर्शन, संसद मार्च, परीक्षा प्रणाली पर उठे गंभीर सवालों के बीच सरकार यह कड़ा संशोधित कानून लेकर आई है। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने इस मौके पर विपक्ष से अपील भी की है कि बच्चों के भविष्य से जुड़े इस रिफॉर्म पर राजनीति या बहानेबाजी न की जाए और यह बिल सरकार की प्राथमिकता है।
हालाँकि इससे पहले वर्ष 2024 में पहला राष्ट्रीय एंटी पेपर लीक कानून लागू किया गया था, लेकिन पिछले 2 साल में सामने आई गड़बड़ियों के बाद सरकार इस निष्कर्ष पर पहुँची कि सिर्फ कानून बनाना काफी नहीं है बल्कि जाँच, मुकदमे और सजा की प्रक्रिया को तेज करना बेहद जरूरी है।
नए संशोधन के बाद फास्ट ट्रैक कोर्ट, समयबद्ध जाँच, भारी जुर्माना और कठोर सजा के प्रावधान जोड़े गए हैं। यह विधेयक पास होकर जब कानून बनेगा तो इसका सीधा असर NEET, JEE, CUET, UGC-NET, UPSC, SSC, रेलवे भर्ती बोर्ड, बैंकिंग भर्ती परीक्षाओं और केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित अन्य सभी सार्वजनिक परीक्षाओं पर पड़ेगा।
नए संशोधन विधेयक की आवश्यकता क्यों? ये पुराने कानून से कितना अलग?
वर्ष 2024 में जब पहला राष्ट्रीय एंटी पेपर लीक कानून बनाया गया था, तब उसका मुख्य उद्देश्य संघ लोक सेवा आयोग, कर्मचारी चयन आयोग, नेशनल टेस्टिंग एजेंसी, रेलवे और बैंकिंग जैसी सार्वजनिक परीक्षाओं में धोखाधड़ी रोकना था। लेकिन बीते सालों में यह बात पूरी तरह साफ हो चुकी है कि पेपर लीक अब किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं है। इसके पीछे संगठित गिरोह, तकनीकी नेटवर्क और भारी आर्थिक लाभ कमाने वाले बड़े रैकेट सक्रिय हैं।
NEET-UG 2026 के विवाद के बाद छात्रों ने देशभर में आंदोलन शुरू किया, जिससे परीक्षा तंत्र में व्यापक सुधार की माँग तेज हो गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी परीक्षा प्रणाली को मजबूत बनाने और फास्ट ट्रैक कोर्ट जैसी व्यवस्था का संकेत दिया था। इसी के बाद केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इस संशोधन विधेयक को मंजूरी दी। सरकार का मानना है कि पुराने कानून के बावजूद परीक्षा माफिया में डर पैदा करने और व्यवस्था को पूरी तरह सुरक्षित बनाने के लिए कानूनी ढिलाई को समाप्त करना बेहद आवश्यक हो गया था।
सजा और जुर्माने के प्रावधानों में बड़ा इजाफा
नए संशोधन विधेयक संख्या 139-2026 के माध्यम से अपराधियों के लिए सजा और जुर्माने की दरों में काफी भारी बढ़ोतरी की गई है। अधिनियम की धारा 10 के तहत अनुचित साधनों का इस्तेमाल करने वालों के लिए न्यूनतम सजा को 3 साल से बढ़ाकर 5 साल कर दिया गया है, जिसे अधिकतम 10 साल तक बढ़ाया जा सकता है।
इसके साथ ही दोषियों पर अधिकतम 50 लाख रुपए तक का जुर्माना लगाया जा सकेगा। अगर बात संगठित अपराध की करें तो धारा 11 के तहत न्यूनतम सजा को 5 साल से बढ़ाकर 7 साल कर दिया गया है। 2024 के कानून में पेपर लीक या संगठित अपराध के लिए 10 लाख से 1 करोड़ रुपए तक के जुर्माने का प्रावधान था।
वहीं अब नए विधेयक में न्यूनतम जुर्माना ही 1 करोड़ रुपए से बढ़ाकर 10 करोड़ रुपए तक कर दिया गया है। कठोर सजा और 10 करोड़ रुपए जैसे भारी जुर्माने का मुख्य उद्देश्य यही है कि आर्थिक लाभ के लिए परीक्षाओं में हेरफेर करने वाले माफियाओं की कमर तोड़ी जा सके और इस तरह के अपराधों पर पूरी तरह रोक लगाई जा सके।
जाँच प्रक्रिया और स्पेशल टास्क फोर्स का गठन
पुराने 2024 के कानून में सबसे बड़ी कमी यह थी कि उसमें जाँच पूरी करने के लिए कोई निश्चित समय सीमा तय नहीं की गई थी, जिससे मामले सालों-साल खिंचते रहते थे। नए संशोधन विधेयक में इस व्यवस्था को पूरी तरह बदलते हुए जाँच के लिए 2 महीने यानी 60 दिनों की सख्त समय सीमा तय की गई है।
चाहे जाँच किसी अधिकृत पुलिस अधिकारी द्वारा की जा रही हो या किसी केंद्रीय जाँच एजेंसी द्वारा, FIR दर्ज होने, संदर्भ मिलने या अधिसूचना जारी होने के दिन से 2 महीने के अंदर जाँच पूरी करना अनिवार्य होगा। मामलों की गहन और त्वरित जाँच के लिए केंद्र सरकार को आवश्यकता पड़ने पर एक विशेष स्पेशल टास्क फोर्स (STF) गठित करने का भी अधिकार है।
पहले केंद्रीय जाँच एजेंसियाँ सामान्य प्रक्रिया के तहत काम करती थीं, लेकिन अब STF का गठन होने से पेपर लीक के मामलों में विशेषज्ञता के साथ तेजी से कार्रवाई की जा सकेगी।
स्पेशल फास्ट ट्रैक कोर्ट में 3 माह के भीतर ट्रायल
कानूनी प्रक्रिया को गति देने के लिए नए विधेयक का सबसे अहम पहलू अदालती सुनवाई को समयबद्ध बनाना है। पुराने कानून में मामलों की सुनवाई सामान्य कोर्ट में होती थी और फैसले की कोई समय सीमा नहीं थी। अब नए संशोधन के तहत राज्य सरकारें और केंद्र शासित प्रदेश संबंधित हाई कोर्ट के मुख्य जज से परामर्श करके विशेष फास्ट ट्रैक कोर्ट नामित करेंगे।
ये विशेष अदालतें इस अधिनियम के साथ-साथ भारतीय न्याय संहिता 2023 या अन्य संबंधित कानूनों के तहत दर्ज मामलों की संयुक्त सुनवाई करेंगी। इन अदालतों में प्रतिदिन सुनवाई होगी और बिना किसी उचित लिखित कारण के स्थगन नहीं दिया जाएगा। चार्जशीट दाखिल होने के बाद कोर्ट को 3 महीने के भीतर मुकदमा पूरा करके फैसला सुनाना होगा।
इतना ही नहीं संशोधन कानून लागू होने के समय जितने भी मामले लंबित होंगे, उन्हें भी इन स्पेशल Fast Track Courts में स्थानांतरित कर दिया जाएगा और उन्हें भी वहाँ पहुँचने के 3 महीने के भीतर निपटाना अनिवार्य होगा।
अपील की प्रक्रिया और संपूर्ण परीक्षा तंत्र की जवाबदेही
नए कानून के तहत हर राज्य और केंद्र शासित प्रदेश को प्रत्येक विशेष फास्ट ट्रैक कोर्ट के लिए एक या अधिक विशेष लोक अभियोजक यानी स्पेशल पब्लिक प्रॉसिक्यूटर नियुक्त करने होंगे। इन विशेष अदालतों के फैसलों, सजा या आदेश के खिलाफ संबंधित उच्च न्यायालय में दो जजों की पीठ के समक्ष अपील की जा सकेगी।
हाई कोर्ट में अपील करने के लिए सामान्यतः 30 दिनों का समय तय किया गया है, जिसे विशेष परिस्थितियों में अधिकतम 90 दिनों तक बढ़ाया जा सकता है। हाई कोर्ट को भी ऐसी अपीलों का निस्तारण याचिका दाखिल होने के 3 महीने के भीतर करना होगा। इसके अलावा नए कानून में पूरे परीक्षा तंत्र की जवाबदेही तय की गई है।
कार्रवाई सिर्फ पेपर लीक करने वाले तक सीमित नहीं होगी। यदि किसी परीक्षा आयोजित करने वाली सेवा प्रदाता एजेंसी, आईटी कंपनी, डेटा प्रबंधन संस्था, परीक्षा केंद्र संचालक या उनके वरिष्ठ अधिकारियों की मिलीभगत पाई जाती है तो उनके खिलाफ भी आपराधिक केस चलेगा।
सेवा प्रदाता एजेंसियों के लिए अधिकतम जुर्माना 1 करोड़ से बढ़ाकर 5 करोड़ रुपए कर दिया गया है और उन पर प्रतिबंध की अवधि 4 साल से बढ़ाकर 8 साल कर दी गई है। ऐसी संस्थाओं के दोषी निदेशकों या अधिकारियों को भी कम से कम 5 साल की जेल और 5 करोड़ रुपए तक के जुर्माने की सजा मिलेगी।
परीक्षा प्रणाली में तकनीकी सुधार और NTA का पुनर्गठन
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल सख्त कानून बनाने से पेपर लीक पूरी तरह नहीं रुकेगा, जब तक कि परीक्षा प्रणाली को भीतर से सुरक्षित न बनाया जाए। इसी को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार कानूनी कार्रवाई के साथ-साथ नेशनल टेस्टिंग एजेंसी में भी व्यापक संस्थागत सुधार कर रही है।
NTA के पुनर्गठन की प्रक्रिया के तहत अब तक 47 अधिकारियों की सेवाएँ समाप्त की जा चुकी हैं और कुछ के खिलाफ कानूनी व आपराधिक कार्रवाई की तैयारी चल रही है। अगले एक महीने के भीतर पूरी होने वाली इस प्रक्रिया में एजेंसी की आउटसोर्सिंग व्यवस्था की समीक्षा की जा रही है और नए वरिष्ठ प्रबंधन के साथ-साथ विषय विशेषज्ञों की नियुक्तियाँ की जा रही हैं।
साइबर सुरक्षा, डिजिटल फॉरेंसिक, टेस्ट सेंटर मैनेजमेंट, साइकोमेट्रिक्स और परीक्षा केंद्रों की निगरानी को मजबूत किया जा रहा है। इसके साथ ही भविष्य में अधिक से अधिक परीक्षाओं को कंप्यूटर आधारित यानी CBT मोड पर आयोजित करने, प्रश्नपत्रों को पूरी तरह एनक्रिप्टेड बनाने और परीक्षा केंद्रों के नियमित ऑडिट पर जोर दिया जा रहा है ताकि छात्रों का विश्वास सरकारी परीक्षा प्रणाली पर पुनः पूरी तरह बहाल हो सके।
यह 9 सितंबर 1981 की शाम थी। ‘हिंद समाचार’ समाचार पत्र समूह के 83 वर्षीय संस्थापक और मुख्य संपादक लाला जगत नारायण पटियाला से जालंधर की ओर अपनी कार से जा रहे थे। कार उनके ड्राइवर सोमनाथ चला रहे थे। एक रॉयल एनफील्ड बुलेट बाइक उनका पीछा कर रही थी, लेकिन शुरुआत में दोनों में से किसी ने इस पर ध्यान नहीं दिया।
जब वे लुधियाना से लगभग चार किलोमीटर दूर थे, तब मोटरसाइकिल ने रफ्तार बढ़ाई और कार के बगल में आ गई। चलती कार पर गोलियाँ चलाई गईं, लेकिन हमलावरों का निशाना चूक गया। सोमनाथ ने गाड़ी मोड़ने की कोशिश की, लेकिन सामने से आ रही एक बस ने रास्ता रोक दिया।
मोटरसाइकिल रुक गई। दो सशस्त्र व्यक्ति नीचे उतरे और फंसी हुई कार की ओर बढ़े। उन्होंने बिल्कुल करीब से गोलियाँ चलाईं। जगत नारायण को तीन गोलियाँ लगीं और कार के अंदर ही उनकी मौत हो गई। ड्राइवर सोमनाथ भी इस गोलीबारी में घायल हो गए।
लाला जगत नारायण की हत्या पंजाब में उग्रवाद के दौर में कोई अकारण किया गया हमला नहीं था। हमलावरों ने एक विशिष्ट व्यक्ति का पीछा किया था, उसका भागने का रास्ता बंद किया और तब तक गोलियाँ चलाईं जब तक कि वे आश्वस्त नहीं हो गए कि खाालिस्तानी आतंकवादियों के खिलाफ बार-बार लिखने वाला यह संपादक अब दोबारा कभी नहीं लिख पाएगा।
यह हमला पंजाब में उग्रवाद के दौरान प्रेस पर हुए सबसे शुरुआती और सबसे गंभीर हमलों में से एक बन गया। अगले दशक में खाालिस्तानी आतंकवादियों ने संपादकों, संवाददाताओं, रेडियो अधिकारियों और समाचार पत्र के कर्मचारियों की हत्याएँ कीं। उन्होंने डिलीवरी वाहनों पर हमले किए, अखबार बेचने वाले हॉकरों को गोलियाँ मारीं, संवाददाताओं को धमकियाँ दीं और यह तय करने वाले फरमान जारी किए कि कौन से शब्द छापे या बोले जा सकते हैं।
मीडिया अब केवल उग्रवाद को कवर नहीं कर रहा था, बल्कि वह खुद इस लड़ाई का एक मुख्य मैदान बन चुका था।
लाला जगत नारायण क्यों बने खालिस्तानी आतंकियों का निशाना?
लाला जगत नारायण ऐसे संपादक नहीं थे जिनका प्रभाव केवल एक छोटे से न्यूज़रूम तक सीमित हो। उनका हिंद समाचार समूह उर्दू भाषा में ‘हिंद समाचार’, हिंदी भाषा में ‘पंजाब केसरी’ और पंजाबी भाषा में ‘जग बाणी’ का प्रकाशन करता था। 1981 तक इन प्रकाशनों ने पंजाब और पड़ोसी राज्यों में एक बड़ा पाठक वर्ग तैयार कर लिया था।
वह पंजाब के पूर्व मंत्री, सांसद और एक प्रमुख सार्वजनिक आवाज भी थे। उनके संपादकीय लेखों ने सांप्रदायिक अलगाव का विरोध किया, जरनैल सिंह भिंडरावाले की आलोचना की और सिख राजनीति में हिंसा के बढ़ते इस्तेमाल के खिलाफ चेतावनी दी।
इस तरह के हमलों के मुख्य कारणों में से एक 1978 में अमृतसर में भिंडरावाले के समर्थकों और संत निरंकारी मिशन के बीच हुई हिंसक झड़प थी। जगत नारायण ने इस घटना से जुड़ी कार्यवाहियों के दौरान निरंकारियों का समर्थन किया था और निरंकारी अनुयायियों की हत्या की कड़ी आलोचना की थी। उनके समाचार पत्र भिंडरावाले और हिंसा को सही ठहराने के लिए धार्मिक लामबंदी का इस्तेमाल करने वालों के खिलाफ संपादकीय छापते रहे।
जगत नारायण के विरोध को सिखों के प्रति दुश्मनी के रूप में पेश नहीं किया गया था। उन्होंने लगातार यह तर्क दिया कि राजनीतिक या धार्मिक मतभेदों को हिंदू-सिख संघर्ष में नहीं बदला जाना चाहिए। हालाँकि उनकी व्यापक पहुँच ने उन्हें उन लोगों के लिए विशेष रूप से खतरनाक बना दिया जो खाालिस्तानी अलगाववाद को पंजाब की सिख आबादी की एकमात्र सर्वमान्य आवाज के रूप में चित्रित करना चाहते थे।
उनके संपादकीय हिंदी, पंजाबी और उर्दू के पाठकों तक पहुँचते थे। इसलिए उनकी हत्या से केवल बदला लेने से कहीं अधिक हासिल किया जा सकता था। यह पंजाब के हर संपादक को यह चेतावनी दे सकता था कि उग्रवादियों का विरोध करने के परिणाम क्या हो सकते हैं।
हत्या की साजिश के सिलसिले में 19 सितंबर 1981 को भिंडरावाले को गिरफ्तार किया गया था। उनकी गिरफ्तारी से हिंसा और राजनीतिक लामबंदी शुरू हो गई, लेकिन इसके तुरंत बाद उसे रिहा कर दिया गया। घटनास्थल से गिरफ्तार किए गए नछत्तर सिंह को बाद में जगत नारायण की हत्या का दोषी ठहराया गया। अदालत के रिकॉर्ड से पता चलता है कि एक अन्य आरोपित स्वर्ण सिंह को बरी कर दिया गया था, जबकि तीसरा आरोपित मुकदमे से पहले ही फरार हो गया था। हालाँकि संस्थापक की हत्या भी उनके समाचार पत्रों को खामोश नहीं कर सकी।
रमेश चंद्र ने जारी रखा अपने पिता का अभियान
लाला जगत नारायण की हत्या के बाद उनके सबसे बड़े बेटे रमेश चंद्र ने हिंद समाचार समूह का कार्यभार संभाला। उन्होंने देखा था कि आतंकवाद के खिलाफ लिखने की क्या कीमत उनके पिता को चुकानी पड़ी थी। वह यह भी जानते थे कि उसी संपादकीय नीति को जारी रखने से वह और उनका संगठन लगातार खतरे में रहेंगे। इसके बावजूद समूह ने खाालिस्तानी आतंकवादियों द्वारा की जाने वाली हिंसा के खिलाफ अपने रुख में कोई बदलाव नहीं किया।
रमेश चंद्र ने आतंकियों के खिलाफ लिखना जारी रखा और हिंदू-सिख एकता को बढ़ावा दिया। वह ‘बलिदानी परिवार फंड’ की स्थापना से भी जुड़े थे, जो आतंकवाद से प्रभावित परिवारों के लिए धन एकत्र करता था, जिसमें हिंदू और सिख दोनों पीड़ित शामिल थे।
अपने पिता की हत्या के तीन साल से भी कम समय बाद 12 मई 1984 को जालंधर में रमेश चंद्र की गोली मारकर हत्या कर दी गई। मीडिया रिपोर्टों में इस हत्या को खालिस्तानी आतंकियों द्वारा किया गया एक और बड़ा हमला बताया गया, ऐसे समय में जब पंजाब में हिंसा बहुत तेजी से बढ़ रही थी। वह एक कार्यक्रम से लौट रहे थे जब उन्हें गोलियों से भून दिया गया।
रमेश की हत्या के जरिए खाालिस्तानी आतंकवादी जो संदेश देना चाहते थे, वह साफ था। जब एक संपादक को मारने से समाचार पत्र समूह का रुख नहीं बदला, तो आतंकवादी उनकी जगह लेने वाले हर व्यक्ति के पीछे पड़ जाएँगे। लेकिन हिंद समाचार समूह का प्रकाशन जारी रहा।
इसके तीनों समाचार पत्रों की कुल साप्ताहिक प्रसार संख्या 1989 तक लगभग सात लाख प्रतियों तक पहुँच गई थी। यह संगठन उत्तरी भारत के सबसे बड़े समाचार पत्र समूहों में से एक बन गया था, लेकिन इसके कार्यालय तेजी से एक किलेबंद परिसर में बदलते जा रहे थे। इसके परिसरों के आसपास रेत के बंकर, सशस्त्र गार्ड और विशेष बैरियर लगाए गए थे। संपादक अपने साथ हथियार रखते थे। कर्मचारी अजनबियों को यह बताने से बचते थे कि वे कहाँ काम करते हैं। खतरा अब केवल मालिकों तक सीमित नहीं था।
सांप्रदायिक विभाजन के खिलाफ बोलने पर सुमीत सिंह की हत्या
खाालिस्तानी आतंकवादियों ने अपने निशानों को धर्म के आधार पर नहीं बाँटा। अलगाववादी विचारों को चुनौती देने वाले सिख पत्रकार भी उनके निशाने पर थे। सुमीत सिंह 30 वर्षीय पत्रकार थे और अपने परिवार द्वारा स्थापित एक प्रगतिशील पंजाबी साहित्यिक पत्रिका ‘प्रीत लड़ी’ के संपादक थे। वे धर्मनिरपेक्ष राजनीति, सांप्रदायिक सद्भाव और हिंदुओं तथा सिखों के बीच सहयोग का समर्थन करते थे।
22 फरवरी 1984 को खाालिस्तानी आतंकवादियों ने अमृतसर से लगभग 25 किलोमीटर दूर लोपोके गाँव में उन पर हमला किया। सुमीत सिंह के भाई द्वारा हमलावरों से हाथ जोड़कर यह कहने और यह बताने के बावजूद कि सुमीत सिंह खुद एक सिख हैं, उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई।
मीडिया रिपोर्टों में उन्हें हिंदू-सिख एकता के समर्थक के रूप में बताया गया। लेकिन खालिस्तानी आतंकियों ने उन्हें गद्दार करार दिया क्योंकि उन्होंने इस विचार को खारिज कर दिया था कि सिखों और हिंदुओं को विरोधी राजनीतिक गुटों में विभाजित होना चाहिए।
उनकी हत्या ने खालिस्तानी आतंकियों के इस अभियान के असली चेहरे को उजागर कर दिया। एक सिख पहचान उस पत्रकार की रक्षा नहीं कर सकी जिसने खाालिस्तान को खारिज कर दिया था। निर्णायक कारक पीड़ित का धर्म नहीं था, बल्कि यह था कि उसके शब्द उग्रवादी मकसद में मदद कर रहे थे या बाधा डाल रहे थे।
बलदेव सिंह मान और सिख वामपंथ का खाालिस्तान विरोध
बलदेव सिंह मान एक और सिख लेखक थे जिनकी राजनीति ने उन्हें सीधे अलगाववादियों के सामने खड़ा कर दिया था। मान एक कम्युनिस्ट कार्यकर्ता और पंजाबी प्रकाशन ‘हीरावल दस्ता’ से जुड़े संपादक थे। उन्होंने खाालिस्तानी हिंसा की निंदा करते हुए और एक धर्मतांत्रिक अलगाववादी राज्य की माँग को खारिज करते हुए लेख लिखे और सार्वजनिक सभाओं को संबोधित किया।
26 सितंबर 1986 की आधी रात से ठीक पहले अमृतसर जिले के हर्षा छीना के पास दो बंदूकधारियों ने मान पर उस समय गोलियाँ चला दीं जब वे एक रिक्शा में यात्रा कर रहे थे। वे अपनी नवजात बेटी को देखने जा रहे थे। मौके पर ही उनकी मौत हो गई। मान की हत्या कम्युनिस्ट नेता दर्शन सिंह कैनेडियन की हत्या के ठीक एक दिन बाद हुई थी। दोनों व्यक्ति सिख थे। दोनों ने खाालिस्तानी उग्रवाद के खिलाफ सार्वजनिक रूप से अभियान चलाया था।
उनकी मौतों ने यह दिखाया कि उग्रवादी सिख कम्युनिस्टों, धर्मनिरपेक्षतावादियों और वर्ग राजनीति के समर्थकों को भी क्यों खत्म करना चाहते थे। ये आवाजें इस दावे का खंडन करती थीं कि यह संघर्ष भारतीय राज्य या हिंदू समुदाय के खिलाफ सिखों द्वारा सामूहिक रूप से लड़ी जा रही लड़ाई का प्रतिनिधित्व करता है। एक सिख का सार्वजनिक रूप से खाालिस्तान का विरोध करना उस आख्यान के लिए विशेष रूप से नुकसानदेह था।
पंजाब के जिलों में रिपोर्टर बने आसान शिकार
लाला जगत नारायण, रमेश चंद्र, सुमीत सिंह और बलदेव सिंह मान की हत्याओं ने अपनी सार्वजनिक पहचान के कारण ध्यान आकर्षित किया। जिला संवाददाताओं के पास वैसी मशहूरियत, संस्थागत सुरक्षा या राजनीतिक पहुँच नहीं थी। उन्हें पहचानना भी आसान था।
एक स्थानीय संवाददाता उन्हीं लोगों के बीच रहता था जिनकी खबरें वह कवर करता था। आतंकवादी उसके घर, कार्यस्थल, परिवार और दैनिक रास्ते को जानते थे। उसे सुबह एक धमकी भरा पत्र मिल सकता था और शाम तक उसका सामना उन लोगों से हो सकता था जिन्होंने वह पत्र भेजा था।
मई 1988 तक ‘इंडिया टुडे’ ने रिपोर्ट दी कि आतंकवादियों ने पिछले सात वर्षों के दौरान पंजाब में कम से कम छह पत्रकारों की हत्या कर दी थी और लगभग एक दर्जन अन्य पर हमला किया था। मृतकों में ज्ञानी जगजीत सिंह, नरेंद्र पाल सिंह और राज्य के सबसे अधिक हिंसा प्रभावित जिलों में काम करने वाले अन्य पत्रकार शामिल थे।
ज्ञानी जगजीत सिंह गुरदासपुर के एक पत्रकार थे, जिनकी एक सशस्त्र हमले में घायल होने के बाद दिसंबर 1986 में अमृतसर के एक अस्पताल में मौत हो गई थी। वे ‘अकाली पत्रिका’ से जुड़े थे।
खाालिस्तानी आतंकवादियों द्वारा मारे गए हिंद समाचार समूह के कर्मचारियों की एक सूची में जगजीत सिंह नाम के व्यक्ति का भी नाम था। हालाँकि यह स्पष्ट नहीं है कि वे अलग-अलग प्रकाशनों में योगदान देने वाले एक ही व्यक्ति थे या दो अलग-अलग व्यक्ति थे।
नरेंद्र पाल सिंह जिन्हें मीडिया में नरिंदर पाल सिंह पाल भी कहा जाता था, तरनतारन से ‘पंजाब केसरी’ और ‘जग बाणी’ के लिए काम करते थे। वे 1987 में मारे गए थे, जब तरनतारन और सीमावर्ती जिले कड़े पहरे वाले समाचार पत्र कार्यालयों से बाहर काम करने वाले रिपोर्टरों के लिए सबसे खतरनाक स्थानों में से एक बन गए थे।
खतरा सिर्फ रिपोर्टिंग के स्तर तक सीमित नहीं था। खबरों के चयन, संपादन और प्रस्तुति के लिए जिम्मेदार डेस्क पत्रकारों को भी निशाना बनाया गया। ‘जग बाणी’ के मुख्य उप-संपादक बंत सिंह की मई 1988 में हत्या कर दी गई थी। एक डेस्क संपादक के रूप में, उन्हें उग्रवादियों की तलाश में गाँवों में जाने की आवश्यकता नहीं थी। उनका कथित अपराध समाचार पत्र में छपने वाली सामग्री से जुड़ा था।
एक महीने बाद 4 जून 1988 को स्कूटर पर आए आतंकवादियों ने होशियारपुर में एक छोटे से स्कूल के बाहर परदुमन सिंह की गोली मारकर हत्या कर दी, जिसे वे चलाते थे। वे ‘प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया’ (पीटीआई) और ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ के लिए जिले को कवर करते थे और पंजाब आधारित प्रकाशनों में भी योगदान देते थे।
पुलिस ने तुरंत कोई कारण नहीं बताया। हालाँकि मीडिया रिपोर्टों में कहा गया कि खाालिस्तान के खिलाफ लिखने के कारण अन्य पत्रकारों की भी हत्या की गई थी। उस समय परदुमन सिंह को उग्रवाद के दौरान आतंकवादियों द्वारा मारा गया आठवाँ पत्रकार बताया गया था।
अगले ही महीने हिंद समाचार समूह ने अपने समाचार संपादक इंद्रजीत सूद को खो दिया। सूद ने संगठन के भीतर वर्षों बिताए थे और जगत नारायण हत्या मामले की जाँच से जुड़ी मुकदमेबाजी में बचाव पक्ष के गवाह के रूप में भी पेश हुए थे। जुलाई 1988 तक उनके पास एक ऐसी भूमिका थी जो सीधे तौर पर इस बात को प्रभावित करती थी कि समाचार पत्रों में उग्रवादियों की मौतों और आतंकवादी हमलों को कैसे प्रस्तुत किया जाता है।
खाालिस्तान कमांडो फोर्स के चीफ लाभ सिंह की हत्या के बाद जालंधर में समूह के कड़े पहरे वाले कार्यालय के पास उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई थी।
उग्रवादियों के प्रति सहानुभूति रखने वाले मीडिया घरानों ने खुद दावा किया कि लाभ सिंह की मौत की रिपोर्टिंग के दौरान ‘जग बाणी’ में इस्तेमाल की गई भाषा के बदले में सूद की हत्या की गई थी। उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार, उनकी हत्या इसलिए की गई क्योंकि समाचार पत्र ने एक मरे हुए आतंकवादी का वर्णन उस सम्मान के बिना किया था जिसकी माँग उसके चाहने वाले करते थे।
बिना सुरक्षा के काम करने वाले संवाददाताओं तक फैले हमले
पत्रकारों पर ये हमले 1990 तक उन कस्बों तक फैल गए जहाँ जिला संवाददाता वरिष्ठ संपादकों को उपलब्ध किलेबंद कार्यालयों और व्यापक सुरक्षा के बिना काम करते थे।
नानक चंद नागपाल सुनाम के एक अनुभवी प्रेस रिपोर्टर थे। 1987 के पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के एक फैसले में उनकी पहचान उर्दू दैनिक ‘प्रताप’ के संवाददाता के तौर पर की गई थी और कस्बे से स्थानीय न्यायिक और राजनीतिक घटनाओं की रिपोर्टिंग में उनकी भूमिका दर्ज की गई थी। 1990 में संगरूर जिले में उनके घर के पास उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई थी।
जालंधर समाचार पत्र समूह के जगराँव बेस्ड पत्रकार भाग सिंह खेला की सितंबर 1990 में शेरपुर कलाँ गाँव में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। उस समय की मीडिया रिपोर्टों में उल्लेख किया गया था कि वे एक कार्यरत पत्रकार थे जिनकी पंजाब में एक खास हिंसा वाले सप्ताह में हत्या कर दी गई थी।
वामपंथी समाचार पत्र ‘नवाँ ज़माना’ से जुड़े रिपोर्टर और फोटोग्राफर बलबीर सिंह सग्गू को आतंकवादियों और पुलिस दोनों के दबाव का सामना करना पड़ा था। 1988 की इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि आतंकवादियों ने उन्हें कई साल पहले स्वर्ण मंदिर के पास अपना फोटोग्राफी स्टूडियो बंद करने के लिए मजबूर किया था। एक असाइनमेंट को कवर करने के दौरान पुलिस ने भी उनके साथ बदसलूकी की थी।
12 नवंबर 1990 को अमृतसर में गुरु नानक देव विश्वविद्यालय परिसर में सशस्त्र खाालिस्तानी आतंकवादियों ने सग्गू की गोली मारकर हत्या कर दी। उसी हमले में ‘पंजाब केसरी’ से जुड़े पत्रकार नरेंद्र शर्मा घायल हो गए थे।
अमर नाथ वर्मा की हत्या 8 फरवरी 1991 को कर दी गई थी। संयुक्त राज्य अमेरिका के विदेश विभाग के उस वर्ष के मानवाधिकार मूल्यांकन में उनकी पहचान एक पत्रकार और साप्ताहिक ‘कौमी बुलहारा’ के संपादक के रूप में की गई थी और कहा गया था कि आतंकवादियों ने उनकी हत्या कर दी थी।
ये हत्याएँ सजा की एक ऐसी व्यवस्था का हिस्सा थीं जिसमें पत्रकारों को खाालिस्तान की आलोचना करने, उनके बयानों को छापने से इनकार करने, किसी आपत्तिजनक शब्द का इस्तेमाल करने या बहिष्कार के तहत रखे गए प्रकाशन के लिए काम करने के कारण मारा जा सकता था।
हिंद समाचार के हॉकर और एजेंट भी निशाने पर थे
हिंद समाचार समूह ने सबसे लंबे समय तक चले इस अभियान का सामना किया। 1989 तक समूह ने अपने संस्थापक, उनके बेटे और सात संपादकीय कर्मचारियों को खो दिया था। इसके बाद आतंकवादियों ने अपनी रणनीति बदल दी। केवल संपादकों और रिपोर्टरों पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय, उन्होंने उस व्यवस्था पर हमला करना शुरू कर दिया जो समाचार पत्रों को प्रिंटिंग प्रेस से पाठक तक ले जाती थी।
जून 1989 में खाालिस्तान कमांडो फोर्स के आतंकवादियों ने अपने तीनों समाचार पत्रों का प्रकाशन बंद करने के आदेश को मानने से इनकार करने के बाद हिंद समाचार के कर्मचारियों और समाचार पत्र विक्रेताओं पर हमला किया। चंडीगढ़ के पास दो हमलों में चार कर्मचारी मारे गए।
अगले कुछ हफ्तों में हुए हमलों की सीरीज के दौरान अखबार बाँटने वाले सात कर्मचारियों की मौत हो गई, जिनमें किशोर छात्र भी शामिल थे। लुधियाना में जब हॉकर अखबारों के बंडल खोल रहे थे, तब एक बम विस्फोट हुआ जिसमें लगभग एक दर्जन लोग घायल हो गए।
पुलिसकर्मियों ने साइकिलों पर अखबार विक्रेताओं के साथ जाना शुरू कर दिया। अखबार डिस्ट्रीब्यूशन वाले रूट की सुरक्षा के लिए हर सुबह सैकड़ों पुलिसकर्मियों को तैनात किया जाता था। लगभग 30 हॉकरों ने काम करना बंद कर दिया, जबकि प्रसार संख्या में कथित तौर पर लगभग 60,000 प्रतियों की गिरावट आई।
पीड़ित केवल पत्रकार नहीं थे। हिंद समाचार समूह के नुकसान में शामिल लोगों में संपादक, रिपोर्टर, हॉकर, एजेंट, ड्राइवर, वितरक और सुरक्षाकर्मी शामिल थे। उनके काम अलग-अलग थे, लेकिन उन्हें निशाना बनाए जाने का कारण एक ही था। प्रत्येक ने आतंकवादियों के आदेश के बावजूद समाचार पत्रों को जनता तक पहुँचाने में मदद की कि उन्हें बंद कर दिया जाए।
18 जुलाई 1990 को गरांव के पास फिरोजपुर की ओर जा रही हिंद समाचार के समाचार पत्र वितरण वाहन पर बंदूकधारियों ने हमला कर दिया। तीन पुलिस गार्डों सहित अंदर सवार सभी पाँचों लोग मारे गए। हिंद समाचार समूह से जुड़े लगभग 40 विक्रेता, एजेंट और हॉकर मारे गए। इसका उद्देश्य केवल व्यक्तिगत कर्मचारियों को मारना नहीं था। इसका उद्देश्य प्रकाशन को आर्थिक और भौतिक रूप से असंभव बनाना था।
आतंकवादियों ने यह तय करने की कोशिश की कि किन शब्दों का इस्तेमाल करें पत्रकार
पत्रकारों पर हमलों के साथ-साथ लिखित आदेश, टेलीफोन पर धमकियाँ और कथित आचार संहिता भी जारी की गई। आतंकवादियों के बयानों में अक्सर यह चेतावनी होती थी कि समाचार पत्रों को उनके बयानों को पूरा छापना होगा। संपादन करने, छोटा करने या दावों पर सवाल उठाने पर सजा मिल सकती थी। पत्रकारों को अधिकारियों के दबाव का भी सामना करना पड़ा, जिन्होंने पुलिस के दुर्व्यवहार या उग्रवाद विरोधी अभियान में विफलताओं के बारे में रिपोर्टों पर आपत्ति जताई।
रिपोर्टर एक तरफ उस प्रशासन के बीच फंसे थे जो अनुकूल कवरेज चाहता था और दूसरी तरफ आतंकवादियों के बीच जो मानते थे कि उनके पास संपादकों को मौत की सजा देने का अधिकार है।
नवंबर 1990 में सोहन सिंह के नेतृत्व वाली पंथिक कमेटी ने पत्रकारों, संपादकों और स्तंभकारों के लिए एक कोड जारी किया। खाालिस्तान के लिए अभियान चलाने वालों को ‘उग्रवादी’ या ‘स्वतंत्रता सेनानी’ कहा जाना था, न कि आतंकवादी। सरकारी जनसंपर्क अधिकारियों को हिंदी या अंग्रेजी में सामग्री जारी न करने का आदेश दिया गया।
सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि इस फरमान में घोषणा की गई कि आपस में जुड़े 5 आतंकवादी संगठनों के नेता किसी पत्रकार या संपादक को मौत की सजा सुना सकते हैं। पंथिक कमेटी यह तय करेगी कि सजा पर अमल किया जाए या नहीं और वह किसी भी अपील पर सुनवाई भी करेगी।
उग्रवादियों ने आरोप लगाने, सजा सुनाने और उस पर अमल करने की अपनी व्यवस्था बना ली थी। एक पत्रकार को उसी संगठन द्वारा दोषी ठहराया जा सकता था जिसकी वह रिपोर्टिंग कर रहा था, जिसमें धमकी और गोली के बीच कोई कानून, सबूत या स्वतंत्र प्राधिकरण खड़ा नहीं था।
प्रसारण शब्दावली को लेकर राजेंद्र कुमार तालिब की हत्या
पत्रकारों को निशाना बनाने का खालिस्तानी आतंकियों का यह अभियान जल्द ही निजी स्वामित्व वाले समाचार पत्रों से ऑल इंडिया रेडियो तक फैल गया। चंडीगढ़ में ऑल इंडिया रेडियो के स्टेशन निदेशक राजेंद्र कुमार तालिब एक सम्मानित उर्दू कवि भी थे। 6 दिसंबर 1990 को दो आतंकवादी उनके घर में घुसे और उनकी गोली मारकर हत्या कर दी।
सोहन सिंह के नेतृत्व वाली पंथिक कमेटी का समर्थन करने वाले पाँच संगठनों ने कुछ ही दिनों में जिम्मेदारी ली। समूहों ने कहा कि उनकी तालिब से कोई व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं थी और उन्होंने उनकी हत्या को ‘ऑपरेशन मातृभाषा’ का पहला चरण बताया।
उनकी शिकायत यह थी कि ऑल इंडिया रेडियो ने उनके द्वारा थोपे गए भाषा कोड का पालन नहीं किया था। ‘इंडेक्स ऑन सेंसरशिप’ के एक अध्ययन में यह भी दर्ज किया गया कि तालिब के हत्यारों ने अपने सशस्त्र अभियान को संदर्भित करते हुए ‘आतंकवादी’ शब्द के इस्तेमाल पर आपत्ति जताई थी। उनकी हत्या का उद्देश्य यह प्रदर्शित करना था कि खाालिस्तानी संगठन एक सार्वजनिक प्रसारक द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली भाषा तय कर सकते हैं।
आतंकवादी कोड लागू करने के लिए ML मनचंदा का अपहरण
प्रसारण पर नियंत्रण हासिल करने का सबसे बर्बर प्रयास मई 1992 में हुआ। एमएल मनचंदा पटियाला में ऑल इंडिया रेडियो के स्टेशन निदेशक थे। 18 मई 1992 को बब्बर खालसा के आतंकियों ने उनका अपहरण कर लिया और सरकार के सामने माँगें रखीं।
संगठन चाहता था कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया उनकी आचार संहिता को लागू करे। माँगों में हिंदी और अन्य गैर-पंजाबी कार्यक्रमों को बंद करना शामिल था। उग्रवादियों ने आतंकवादी हमलों को अंजाम देने वालों के लिए इस्तेमाल की जाने वाली शब्दावली पर भी आपत्ति जताई और टेलीविजन प्रसारकों के पहनावे और प्रस्तुति पर नियम थोपने की कोशिश की।
वार्ता जारी रहने के दौरान मनचंदा को बंधक बनाकर रखा गया। सरकार द्वारा माँगों को स्वीकार किए बिना समय सीमा समाप्त हो गई। 27 मई को बब्बर खालसा के आतंकवादियों ने उनकी हत्या कर दी और उनका सिर धड़ से अलग कर दिया। उनका धड़ पंजाब में मिला, जबकि उनका कटा हुआ सिर हरियाणा के अंबाला में मिला।
सरकार द्वारा संगठन की समय सीमा का पालन करने में विफल रहने के बाद मनचंदा की हत्या कर दी गई थी। बब्बर खालसा ने इस हत्या का दावा किया और इसे मीडिया कोड लागू करने के अपने प्रयास से खुले तौर पर जोड़ा। कई अन्य मामलों के विपरीत, जहाँ जिम्मेदारी विवादित रही या बंदूकधारी बिना पहचान के भाग निकले, मनचंदा की हत्या के पीछे का उद्देश्य सार्वजनिक रूप से घोषित किया गया था।
आतंकवादियों ने एक सरकारी रेडियो स्टेशन के निदेशक का अपहरण कर लिया था, संपादकीय और भाषाई नीति पर बातचीत की थी और राज्य द्वारा आत्मसमर्पण न करने पर उनकी हत्या कर दी थी।
इस हत्या के विरोध में ऑल इंडिया रेडियो और दूरदर्शन के कर्मचारियों ने प्रदर्शन किया। फिर भी इस खौफ का असर दिखाई दिया। प्रसारण प्रथाएँ बदल गईं, हिंदी कार्यक्रमों को हटा दिया गया और अधिकारी आतंकवादी फरमानों का उल्लंघन करने के बारे में तेजी से सावधान हो गए।
दुश्मन बनने के लिए किसी पत्रकार को हथियार उठाने की जरूरत नहीं थी
लाला जगत नारायण की 1981 में हत्या और 1992 में एमएल मनचंदा का सिर कलम किए जाने के बीच सूचना का निर्माण और वितरण करने वाले लोगों के खिलाफ एक निरंतर अभियान चला।
निशाने के अनुसार तरीके बदलते गए। संपादकों की हत्या की गई। जिला रिपोर्टरों पर उनके घरों के पास हमले किए गए। रेडियो अधिकारियों को गोली मार दी गई या उनका अपहरण कर लिया गया। अखबार के बंडल इकट्ठा करते समय हॉकरों को मार दिया गया। डिलीवरी वाहनों पर घात लगाकर हमला किया गया। न्यूज़रूम को निर्देश और मौत की धमकियाँ देने वाले पत्र मिले।
मूल माँग एक ही रही: आत्मसमर्पण करो। किसी भी प्रकाशन से खाालिस्तानी संगठनों द्वारा चुनी गई शब्दावली का उपयोग करने की उम्मीद की जाती थी। उग्रवादी बयानों को बिना किसी बदलाव के छापना पड़ता था। अलगाववाद की आलोचना को विश्वासघात माना जा सकता था। आतंकवादी अत्याचारों की कवरेज से बहिष्कार या हत्या हो सकती थी। यहाँ तक कि किसी नापसंदगी वाले अखबार का डिस्ट्रीब्यूशन भी दंडनीय बन गया।
इसका प्रभाव उन व्यक्तिगत प्रकाशनों से परे गया जिनके कर्मचारियों की हत्या की गई थी। धमकियों ने स्व-सेंसरशिप को बढ़ावा दिया, प्रभावित जिलों से रिपोर्टिंग को कमजोर किया और उग्रवादी दावों को कम जांच के साथ प्रसारित होने दिया।
फिर भी समाचार पत्र छपते रहे। हॉकर सशस्त्र सुरक्षा के बीच अपने रास्तों पर लौटे। संपादक किलेबंद दीवारों के पीछे से काम करते रहे। रिपोर्टर उन कस्बों से अपनी रिपोर्ट भेजते रहे जहाँ हर कोई उनका नाम और पता जानता था।
जगत नारायण की हत्या इसलिए की गई क्योंकि उनके छपे हुए शब्दों ने आतंकवादी अलगाववाद के उभार को चुनौती दी थी। रमेश चंद्र की हत्या इसलिए की गई क्योंकि उनके पिता की मौत अखबार को खामोश करने में विफल रही थी। सुमीत सिंह और बलदेव सिंह मान की सिख होने के बावजूद हत्या कर दी गई क्योंकि उन्होंने सांप्रदायिक विभाजन और खाालिस्तान को खारिज कर दिया था। राजेंद्र कुमार तालिब को इसलिए गोली मारी गई क्योंकि एक प्रसारक ने उस शब्दावली का इस्तेमाल किया जिसका उग्रवादियों ने विरोध किया था। एमएल मनचंदा का सिर इसलिए कलम कर दिया गया क्योंकि ऑल इंडिया रेडियो अपनी भाषा और संपादकीय नीति बब्बर खालसा के सामने आत्मसमर्पण नहीं करेगा।
वे राइफल लेकर नहीं चलते थे और न ही सुरक्षा बलों की कमान संभालते थे। उनका अपराध हथियारों वाले आतंकियों की सत्ता को स्वीकार किए बिना संपादन, रिपोर्टिंग, प्रकाशन या प्रसारण करना था।
पंजाब उग्रवाद का कोई भी इतिहास उन पत्रकारों और मीडियाकर्मियों को शामिल किए बिना पूरा नहीं हो सकता, जिन्होंने खाालिस्तानी आतंकवादियों द्वारा यह घोषणा किए जाने के बाद भी प्रकाशन जारी रखा कि एक कॉलम, शीर्षक, प्रसारण या समाचार पत्र का बंडल मौत की सजा दे सकता है।
(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)
शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की माँग को लेकर टिका कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का प्रदर्शन आखिरकार अपनी माँग पूरी होने के बाद खत्म हो गया। करीब डेढ़ महीने तक चले इस तथाकथित ‘छात्र आंदोलन’ ने सिर्फ राजनीति ही नहीं, बल्कि सोशल मीडिया पर भी कई नए चेहरे खड़े कर दिए। इस दौरान कई पुराने इंफ्लुएंसर्स ने अपने लिए भरपूर कंटेन्ट तैयार किया, वहीं कई ऐसे लोग भी थे जिन्हें पहचान ही इस प्रदर्शन ने दिलाई।
किसी ने पीएम नरेंद्र मोदी को गाली देकर वायरल हुआ, किसी ने मीडिया को निशाना बनाकर फॉलोवर्स जुटाए, किसी ने प्रदर्शनकारियों को खाना खिलाने के वीडियो बनाए तो किसी ने पुलिस से बहस और टकराव को अपना कंटेन्ट बना लिया।
इनमें मोहम्मद जुनैद, हर्षित, उज्जवल, रिया अहिर और नीशू जैसे तथाकथित इंफ्लुएंसर्स शामिल हैं। जिनकी पोस्ट पर पहले दो-चार लाइन भी मुश्किल से आते थे, आज वही लाखों फॉलोअर्स के साथ मिलियन में रीच हासिल कर रहे हैं। पिछले डेढ़ महीने में इंस्टाग्राम के बदले हुए एल्गोरिदम ने भी इनकी लोकप्रियता बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाई।
चिंता की बात यह है कि इन सभी का कंटेन्ट किसी न किसी एजेंडे के इर्द-गिर्द घूमता है। ऐसे में इन्हें फॉलो करने वाले लाखों युवा भी धीरे-धीरे उसी सोच और उसी नैरेटिव से प्रभावित हो सकते हैं। सोशल मीडिया पर तेजी से मिली लोकप्रियता ने इन लोगों को बड़ा मंच तो दे दिया है, लेकिन यह देखना भी जरूरी है किस उस मंच का इस्तेमाल किस मकसद और किस दिशा में किया जा रहा है।
नीशु आजाद
इस प्रदर्शन में ‘जय भीम’ के नारे तो जमकर लगे। प्रदर्शन का नेतृत्व करने वाले दलित समाज से आने वाले अभिजीत दिपके ने भी खुद को ‘अंबेडकरवादी’ विचारधारा का प्रतिनिधि बताते हुए इसी सोच को आंदोलन का प्रमुख चेहरा बनाया। लेकिन इसी प्रदर्शन से 15 साल की नीशू आजाद भी सोशल मीडिया पर वायरल हुई।
Meet Voice of Neeshu the face of Gen Z protest. She said we should stop idolizing Virat Kohli because he didn't speak up for CJP. She also said Prime Minister Narendra Modi doesn't know about P of Pariksha and E of Education & is destroying the nation. She protests for a better…
नीशू का पहला वायरल वीडियो वही था, जिसमें वह एक तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की शिक्षा पर सवाल कर रही हैं, वहीं दूसरी वीडियो में वह CBSE और NEET की फुलफॉर्म तक नहीं बता पा रही थी। हैरानी की बात यह थी कि वह खुद 10वीं कक्षा की छात्रा है और उसी CJP प्रदर्शन का हिस्सा बनी हुई थी, जो NEET पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था में सुधार जैसे मुद्दों को लेकर चलाया जा रहा था।
ऐसे में सोशल मीडिया पर कई लोगों ने नीशू को ट्रोल करना शुरू कर दिया। इसके बाद नीशू ने CJP प्रदर्शन के मंच पर जगह पाने के लिए अपने पिता पर हमले की खबर फैलाई। नीशू ने रोते हुए वीडियो बनाया कि उनके पिता को मारने वाले लोग ‘बीजेपी के अंधभक्त’ हैं, बिना उनकी नाम-पहचान जाने नीशू ने यह नैरेटिव गढ़ा और प्रदर्शन में शामिल लोगों को बीजेपी के खिलाफ भड़काया। यह देखा भी गया कि धीरे-धीरे यह प्रदर्शन शिक्षा व्यवस्था के नाम पर नहीं, बल्कि बीजेपी बनाम CJP हो गया, जिसमें विपक्षी दलों के अमूमन हर चेहरे ने भाग लिया।
नीशू आजाद यहीं नहीं रुकी। और ज्यादा वायरल होने के लिए नीशू ने मीडियाकर्मियों को बयान देते हुए खुद को हिंदुओं के खिलाफ जहर तक उगला और एक दलित समाज से आते हुए भी नीशू खुद को ‘हिंदू’ मानने से इनकार कर दिया। और इतना ही नहीं, प्रदर्शन के अंत दिनों में नीशू का एक और वीडियो सामने आता है, जिसमें वह हाथ में समोसा दिखाते हुए लोगों को ‘मोदी की तेरहवीं’ का खाना खाने को कहती है।
वैसे तो इस लोकप्रियता के बाद अब नीशू के 383K फॉलोअर्स हैं, लेकिन यह जान लेते हैं कि प्रदर्शन से वायरल इंफ्लुएंसर बनी नीशू इस प्रदर्शन से पहले क्या कर रही थी? उसकी इंस्टाग्राम प्रोफाइल पर नजर डालें तो प्रदर्शन से पहले भी नीशू का अधिकतर कंटेन्ट उन लोगों को रोस्ट करने पर केंद्रित था, जो हिंदू हितों की बात करते हैं। इस कंटेन्ट पर भी नीशू को ठीक-ठाक व्यूज आ जाते थे।
लेकिन इस तरह के कंटेन्ट पर शिफ्ट होने की वजह यह थी कि नीशू जब केवल ‘अंबेडकरवाद’ का बखान कर रही थी, तब उन्हें कोई नहीं पूछता था और तब वही किसी तरह की भी ‘इंफ्लुएंसर’ की कैटेगरी में उन्हें नहीं गिना जाता था।
मोहम्मद जुनैद
अभी अगर गूगल पर टाइप करें कि ‘कौन है जुनैद?’ तो गूगल का SEO आपको सबसे पहले जंतर-मंतर के CJP प्रदर्शन से वायरल हुए ‘जुनैद भाई’ के बारे में कंटेन्ट दिखेगा। ये जुनैद भाई वैसे तो एक मामूली वकील है, लेकिन प्रदर्शन में लोगों को मुफ्त खाना-पानी, मुफ्त दवाइयाँ देते जब इनकी वीडियो वायरल हुईं, तो कब ये सोशल मीडिया पर 1 मिलियन फॉलोअर के साथ इंफ्लुएंसर बन गए पता ही नहीं लगा।
To those who are saying that the government is harassing Mohammad Junaid by interrogating him:
Let me inform them that Junaid runs a small mobile repair shop, and here is what he contributed to the CJP protest in just 33 days:
मोहम्मद जुनैद की इंस्टाग्राम प्रोफाइल देखें, तो आज उनका हर वीडियो मिलियंस व्यूज पार कर रहा है। जुनैद के इंस्टाग्राम पर केवल CJP प्रदर्शन का ही कंटेन्ट दिखाई देता है, इससे पता लगता है कि वह भी CJP प्रदर्शन का एक मुख्य चेहरा रहे हैं। प्रदर्शन में CJP ने जुनैद को अपनी ‘सेकुलर’ विचारधारा पेश करने के लिए इस्तेमाल किया, वहीं दूसरी ओर प्रदर्शन में जय श्री राम के नारों पर बवाल के वीडियो भी खूब सामने आए।
प्रदर्शन के बाद इंफ्लुएंसर के रूप में उभरे मोहम्मद जुनैद का अब रोना सामने आ रहा है, जब पुलिस ने उनसे पूछताछ शुरू की है। पूछताछ भी इसीलिए जिस पर लोगों ने शक जताया है, शक यह है कि एक मामूली वकील के तौर पर जुनैद ने हजारों की संख्या में प्रदर्शनकारियों के लिए खाने की सुविधा कैसे जुटाई? पुलिस जब जुनैद को पूछताछ के लिए ले गई तो उन्होंने अपनी सोशल मीडिया रीच का इस्तेमाल कर इसे बवाल बनाकर पेश किया। मीडिया में रोते हुए खूब इंटरव्यू भी दिए।
अब बात करें कि जुनैद प्रदर्शन से पहले क्या कर रहे थे, तो इनका पास्ट रिकॉर्ड ‘आंदोलनजीवी’ का ही रहा है। जुनैद की इंस्टाग्राम प्रोफाइल देखें तो वह पहले भी ‘फ्री फिलिस्तीन’ के प्रदशनों, बाबरी मस्जिद को दोबारा खड़ा करने, माँस की दुकानों को बंद करने का विरोध करने के लिए सड़कों पर उतरे हैं। दूसरी तरफ जुनैद अपने सोशल मीडिया पर पंडित धीरेंद्र शास्त्री जैसे हिंदू संतों का भी मजाक उड़ाते हैं। लेकिन CJP प्रदर्शन का चेहरा बनने से पहले उनका ये कंटेन्ट उतना वायरल नहीं था।
LGBTQ के उज्जवल और हर्षित
16 जून 2026 को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के पहले ही दिन LGBTQ समाज के दो चेहरे वायरल होते हैं। इनमें एक का नाम उज्जवल और दूसरे का नाम है हर्षित। छात्रों के इस प्रदर्शन में दोनों का एक वीडियो वायरल होता है, जिसमें उनकी पहचान को लेकर रिपोर्टर सवाल पूछता है तो दोनों बिफर जाते हैं। इस वायरल वीडियो के बाद सोशल मीडिया पर कहीं न कहीं उन्हें एक वायरल कंटेन्ट के रूप में पहचान मिल जाती है और इसके जरिए दोनों ने खूब फॉलोवर्स भी इकट्ठा कर लिए।
CJP प्रदर्शन में भी यूट्यूब चैनलों और कई मीडिया संस्थानों ने उज्जवल और हर्षित के जमकर इंटरव्यू किए, जो उनकी लोकप्रियता बढ़ाने का जरिया बना। एक वीडियो में उज्जवल यह भी कहते नजर आए, “आपने मुझे मीठा बोल दिया… लेकिन एप्पल का फोन बनाने वाला टिम कुक भी गे है, ChatGPT का फाउंडर भी गे ही है, AI का फाउंडर भी गे ही है, इसीलिए हम लोग आपसे ज्यादा पढ़े-लिखे हैं।”
सोशल मीडिया फॉलोइंस की बात करें तो उज्जवल के अब इंस्टाग्राम पर 17.6K फॉलोअर्स और हर्षित के 134K फॉलोअर्स हैं। पहचान की बात करें तो हर्षित खुद को एक कलाकार और उज्जवल 19 वर्षीय एक छात्र बताता है। सोशल मीडिया गतिविधियों से पता लगता है कि दोनों ही ‘ट्रांसजेंडर बिल’ का विरोध भी कर चुके हैं। लेकिन CJP प्रदर्शन से मिली सोशल मीडिया पर लोकप्रियता अब उनकी एकमात्र पहचान बन चुकी है।
रिया अहिर
जंतर-मंतर की तर्ज पर ही मुंबई में हुए प्रदर्शनों से भी एक चेहरा सामने आया, जो अब खूब वायरल है। रिया अहीर, ये वो लड़की है जिनकी पुलिस वैन को एक हाथ से रोकते तस्वीर सामने आई थी। जो रोकने का प्रयास कम और फोटोशूट ज्यादा लग रहा था। दिलचस्प बात यह है कि रिया पेशे से मॉडल ही हैं। शायद यह बात उनको भी नहीं मालूम थी कि उनकी यह तस्वीर इतनी वायरल हो जाएगी कि मीडिया में इंटरव्यू देने पड़ेंगे। लोगों ने उनकी ये तस्वीर ‘महिला शक्ति’ के रूप में प्रस्तुत की।
अब वे इस तस्वीर के पीछे संघर्ष की ‘मनगढ़ंत’ कहानी पूरे मीडिया में सुना रही हैं। रिया का कहना है कि जब उन्होंने देखा कि प्रदर्शनकारियों को पुलिस वैन में भरकर ले जाया जा रहा है, तो वह पुलिस वैन के आगे आकर उसे रोकने लग गईं। और हैरानी की बात तो यह है कि तभी उनके कैमरामैन ने वो तस्वीर खींच ली, जिसे शेयर कर अब ‘महिला शक्ति’ का उदाहरण पेश कर रहे हैं।
खैर रिया अहीर को प्रदर्शनों में मिली लोकप्रियता से उनके फॉलोअर्स की काउंटिंग अब 275K पहुँच गई है। उनका हालिया कंटेन्ट बेशक CJP प्रदर्शन की आवाज बनने और वायरल तस्वीर के फेम में दिए गए इंटरव्यू को लेकर हो, लेकिन बात करें उनके सोशल मीडिया के पास्ट रिकॉर्ड की तो उनका कंटेन्ट अधनग्न तस्वीरें अपलोड करना है। यहाँ तक कि ऐसी और तस्वीरें देखनी हैं तो उन्होंने ₹149 का इंस्टाग्राम सब्सक्रिप्शन प्लान भी चालू किया है, जिसमें उनके 9250 सब्सक्राइबर्स भी हैं। कुल बात यह है कि ‘महिला शक्ति’ का उदाहरण बनने वाली रिया अहीर सोशल मीडिया पर ‘सॉफ्ट पॉर्न’ बेचती हैं।
निष्कर्ष: कौन तय करेगा सोशल मीडिया की नई दिशा?
कुल मिलाकर, CJP का यह प्रदर्शन सिर्फ सड़कों पर हुआ एक आंदलन नहीं रहा, बल्कि सोशल मीडिया के लिए एक ऐसा मंच बन गया, जहाँ कई नए इंफ्लुएंसर्स पैदा हो गए। इन लोगों ने आंदोलन के हर पल को कंटेन्ट बनाया और देखते ही देखते लाखों लोगों तक अपनी पहुँच बना ली। सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि ये लोग वायरल कैसे हुए, बल्कि इससे भी बड़ी सवाल यह है कि वायरल होने के बाद ये अपने उस प्रभाव का इस्तेमाल किस मकसद के लिए कर रहे हैं।
इनमें से कोई ‘अंबेडकरवाद’ के नाम पर अपनी बात रख रहा है, कोई ‘फ्री फिलिस्तीन’ जैसे मुद्दों को आगे बढ़ा रहा है, कोई हिंदुओं के खिलाफ बयान देकर लोकप्रियता कमा रहा है, तो कई LGBTQ की राजनीति को अपनी पहचान बना रहा है। हर किसी का अपना-अपना एजेंडा है, लेकिन सोशल मीडिया पर इन सबकी पहुँच अब लाखों युवाओं तक हो चुकी है। ऐसे में इनके हर वीडियो और हर बयान का असर भी उतनी ही तेजी से फैल रहा है।
जरूरी नहीं कि इनके हर फॉलोअर अंबेडकरवादी हों, फ्री फिलिस्तीन का समर्थन करते हों या LGBTQ की विचारधारा से जुड़े हों। लेकिन जब किसी युवा की सोशल मीडिया फीड पर रोज़-रोज़ एक ही तरह का कंटेन्ट दिखाई देता है, तो धीरे-धीरे वही सोच सामान्य लगने लगती है। यही सोशल मीडिया की सबसे बड़ी ताकत भी है और सबसे बड़ा खतरा भी। लोग कब किसी विचार को समझकर नहीं, बल्कि सिर्फ बार-बार देखकर स्वीकार करने लगते हैं, इसका उन्हें खुद भी पता नहीं चलता।
यही वजह है कि इस पूरे प्रदर्शन का सबसे बड़ा असर शायद सड़कों पर नहीं, बल्कि सोशल मीडिया पर देखने को मिलेगा। इस आंदोलन ने कुछ ऐसे इंफ्लुएंसर्स को जन्म दिया है, जिनकी सबसे बड़ी पहचान किसी उपलब्धि से नहीं, बल्कि विवाद, टकराव और एजेंडा आधारित कंटेन्ट से बनी है। आने वाले समय में ये चेहरे सिर्फ वायरल वीडियो नहीं बनाएँगे, बल्कि लाखों युवाओं की सोच और नैरेटिव को भी प्रभावित करने की कोशिश करेंगे। यही इस पूरे घटनाक्रम की सबसे बड़ी चिंता है।
दिल्ली में महिलाओं के लिए मुफ्त बस यात्रा की व्यवस्था अब पूरी तरह डिजिटल होने जा रही है। राजधानी में 1 अगस्त से डीटीसी और क्लस्टर बसों में मुफ्त सफर का लाभ लेने के लिए पिंक सहेली स्मार्ट कार्ड (नेशनल कॉमन मोबिलिटी कार्ड- NCMC) रखना अनिवार्य होगा।
अब तक महिलाओं को बस में चढ़ने के बाद मिलने वाला कागज का पिंक टिकट 31 जुलाई तक ही मान्य रहेगा। इसके बाद केवल वैध पिंक सहेली स्मार्ट कार्ड रखने वाली महिलाएँ ही मुफ्त यात्रा कर सकेंगी। हालाँकि यदि किसी महिला के पास दिल्ली का वैध पता नहीं है, तो वह इस योजना के तहत मुफ्त बस यात्रा की पात्र नहीं होगी।
इस नई व्यवस्था का उद्देश्य टिकटिंग प्रणाली को डिजिटल बनाना, कागज आधारित टिकटों को खत्म करना और महिलाओं को एक ऐसा स्मार्ट कार्ड उपलब्ध कराना है, जिसका इस्तेमाल भविष्य में सार्वजनिक परिवहन के साथ-साथ डिजिटल भुगतान के लिए भी किया जा सके।
क्या है पिंक सहेली स्मार्ट कार्ड और क्यों किया गया लागू?
पिंक सहेली स्मार्ट कार्ड दिल्ली सरकार और दिल्ली परिवहन निगम (DTC) की नई डिजिटल टिकटिंग व्यवस्था का हिस्सा है। यह नेशनल कॉमन मोबिलिटी कार्ड (NCMC) पर आधारित स्मार्ट कार्ड है, जिसे केंद्र सरकार की ‘वन नेशन, वन कार्ड’ पहल के तहत विकसित किया गया है। इस योजना की शुरुआत राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने 2 मार्च को की थी।
अब तक महिलाओं को हर यात्रा के दौरान बस में कंडक्टर से पिंक टिकट लेना पड़ता था, लेकिन नई व्यवस्था में बस में चढ़ते समय कार्ड को टिकट मशीन पर टैप करना होगा। टैप करते ही मुफ्त यात्रा दर्ज हो जाएगी और अलग से कागज का टिकट लेने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
इससे यात्रा प्रक्रिया तेज होगी और टिकट वितरण का पूरा रिकॉर्ड भी डिजिटल रूप से दर्ज होगा। दिल्ली सरकार के अनुसार, मुफ्त बस यात्रा का लाभ केवल दिल्ली की पात्र महिला निवासियों को मिलेगा। इसी वजह से पिंक सहेली स्मार्ट कार्ड जारी करने के लिए दिल्ली के पते वाला वैध पहचान पत्र अनिवार्य रखा गया है।
दो तरह के कार्ड, मुफ्त यात्रा के साथ मिलेगी डिजिटल भुगतान की सुविधा
डीटीसी फिलहाल महिलाओं के लिए दो प्रकार के पिंक सहेली स्मार्ट कार्ड जारी कर रहा है। पहला जीरो केवाईसी (Zero KYC) कार्ड है, जिसे आधार कार्ड और ओटीपी सत्यापन के जरिए आसानी से जारी किया जाता है। यह मुख्य रूप से मुफ्त बस यात्रा के लिए बनाया गया है।
दूसरा फुल केवाईसी (Full KYC) कार्ड है, जिसमें बैंक की पूरी सत्यापन प्रक्रिया पूरी करनी होती है। इसके लिए ऑनलाइन आवेदन, दस्तावेजों की जाँच और वीडियो केवाईसी की प्रक्रिया पूरी की जाती है। सत्यापन पूरा होने के बाद यह कार्ड आवेदक के घर डाक के जरिए भेजा जाता है।
फुल केवाईसी कार्ड की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह डेबिट कार्ड की तरह भी काम कर सकता है। इसमें बैंक खाते या UPI के जरिए राशि जोड़ने के बाद इसका उपयोग दिल्ली मेट्रो, नमो भारत ट्रेनों और एनसीएमसी स्वीकार करने वाले मॉल, दुकानों तथा अन्य स्थानों पर भुगतान के लिए किया जा सकता है।
हालाँकि डीटीसी बसों में मुफ्त यात्रा के लिए कार्ड में बैलेंस होना जरूरी नहीं है। वहाँ केवल कार्ड को टैप करना पर्याप्त होगा।
कैसे बनवाएँ पिंक सहेली स्मार्ट कार्ड, कौन है पात्र?
पिंक सहेली स्मार्ट कार्ड का लाभ लेने के लिए आवेदक का दिल्ली का निवासी होना आवश्यक है। महिला के पास दिल्ली के पते वाला वैध आधार कार्ड या अन्य स्वीकृत पहचान पत्र होना चाहिए। फुल केवाईसी कार्ड बनवाने के लिए डीटीसी द्वारा अधिकृत बैंक के ऑनलाइन पोर्टल पर आवेदन करना होगा।
आवेदन के दौरान आधार कार्ड, पासपोर्ट साइज फोटो और अन्य व्यक्तिगत जानकारी देनी होगी। आवश्यकता पड़ने पर बैंक पैन कार्ड भी माँग सकता है। इसके बाद वीडियो केवाईसी पूरी होने पर कार्ड तैयार कर आवेदक के पते पर भेज दिया जाएगा।
इसके अलावा डीटीसी और दिल्ली सरकार ने शहर भर में 50 अधिकृत पिंक कार्ड वितरण केंद्र भी बनाए हैं, जहाँ पात्र महिलाएँ आवश्यक दस्तावेजों के साथ जाकर कार्ड प्राप्त कर सकती हैं। अधिकारियों के अनुसार, अब तक करीब 11 लाख कार्ड जारी किए जा चुके हैं और सरकार ने जुलाई के अंत तक यह संख्या 13 लाख तक पहुँचाने का लक्ष्य रखा है।
इसी उद्देश्य से डीटीसी बसों और डिपो में विशेष जागरूकता अभियान भी चला रही है ताकि अधिक से अधिक महिलाएँ समय रहते कार्ड बनवा सकें।
1 अगस्त से लागू होंगे नए नियम, बिना कार्ड नहीं मिलेगी मुफ्त यात्रा
डीटीसी के नए निर्देशों के अनुसार, 31 जुलाई तक महिलाओं को पहले की तरह पिंक टिकट जारी किए जाएँगे, लेकिन 1 अगस्त से यह व्यवस्था बदल जाएगी। इसके बाद केवल उन्हीं महिलाओं को मुफ्त यात्रा का लाभ मिलेगा जिनके पास वैध पिंक सहेली स्मार्ट कार्ड होगा और जो बस में चढ़ते समय उसे टिकट मशीन पर टैप करेंगी।
यदि किसी महिला के पास यह कार्ड नहीं होगा, तो उसे मुफ्त पिंक टिकट जारी नहीं किया जाएगा। ऐसी स्थिति में उसे डीटीसी और डीआईएमटीएस (क्लस्टर) बसों में सामान्य यात्रियों की तरह निर्धारित किराया देकर टिकट खरीदना होगा।
डीटीसी ने अपने सभी कंडक्टरों, प्रवर्तन कर्मचारियों और डिपो प्रबंधकों को निर्देश दिए हैं कि वे महिला यात्रियों को नई व्यवस्था की जानकारी दें, पात्र महिलाओं को कार्ड बनवाने के लिए प्रेरित करें और जिन महिलाओं के पास वैध कार्ड हो, उन्हें किसी भी स्थिति में मुफ्त यात्रा से वंचित न किया जाए।
डीटीसी ने यात्रियों के लिए अलग-अलग रंगों के स्मार्ट कार्ड भी तय किए हैं। महिलाओं के लिए गुलाबी, सामान्य यात्रियों के लिए नीला और वरिष्ठ नागरिकों, दिव्यांगजनों तथा अन्य रियायत प्राप्त यात्रियों के लिए नारंगी कार्ड निर्धारित किया गया है। हालाँकि विभाग ने स्पष्ट किया है कि नारंगी कार्ड जारी करने की प्रक्रिया अभी शुरू नहीं हुई है।
नई व्यवस्था के साथ दिल्ली सरकार सार्वजनिक परिवहन को पूरी तरह डिजिटल बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठा रही है। पिंक सहेली स्मार्ट कार्ड महिलाओं को न केवल डीटीसी और क्लस्टर बसों में मुफ्त यात्रा की सुविधा देगा, बल्कि फुल केवाईसी संस्करण के जरिए मेट्रो, नमो भारत ट्रेनों और डिजिटल भुगतान जैसी अतिरिक्त सुविधाओं का लाभ भी मिलेगा।
ऐसे में 1 अगस्त से पहले पात्र महिलाओं के लिए यह कार्ड बनवाना जरूरी हो गया है, ताकि मुफ्त यात्रा की सुविधा बिना किसी रुकावट के जारी रह सके।
राज्यों की पुलिस और देश की सेना से इतर सीआरपीएफ भारत का एक प्रमुख केन्द्रीय पुलिस बल है, जिसे आंतरिक सुरक्षा बनाए रखने का काम देश ने सौंपा है। इसकी स्थापना 27 जुलाई 1939 को ब्रिटिश शासन के दौरान क्राउन रिप्रेजेंटेटिव्स पुलिस के रूप में हुई थी।
स्वतंत्रता के बाद 28 दिसंबर 1949 को संसद ने CRPF अधिनियम के तहत इसका नाम बदलकर केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल कर दिया। यह केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय के अधीन काम करता है। जानकारी के मुताबिक, अब तक सीआरपीएफ के 2255 बहादुर जवानों ने देश की सेवा में अपने प्राणों की आहूति दी।
क्यों हुई थी सीआरपीएफ की स्थापना
ब्रिटिश सरकार ने तत्कालीन रियासतों में बढ़ती राजनीतिक अस्थिरता और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए इस बल का गठन किया था। आजादी के बाद तत्कालीन गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने इसकी भूमिका का विस्तार करते हुए इसे देश की आंतरिक सुरक्षा की सबसे महत्वपूर्ण केंद्रीय पुलिस बल के रूप में विकसित किया।
28 दिसंबर 1949 में संसद में अधिनियम के जरिए इसका नाम बदलकर केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल यानी सीआरपीएफ किया गया था। इसके बाद इसकी भूमिका भी बदल गई। इसे केन्द्र के अधीन एक सशस्त्र यूनिट बनाई गई। सरदार पटेल ने इसे भारत की जरूरतों के मुताबिक ढाला था।
देशी रियासतों के एकीकरण और देश के विभाजन के दौरान हुए दंगों के निपटने में सीआरपीएफ ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इससे पहले आजादी से पहले 1959 में हुए हॉट स्प्रिंग्स और आजादी के बाद 1965 में हुए सरदार पोस्ट की जंग में इसकी बहादुरी की गाथा आज भी गाई जाती है।
CRPF की भूमिका और जिम्मेदारियाँ
सीआरपीएफ राज्यों की कानून व्यवस्था को बनाए रखने में मदद करता है। देश में आतंकवादियों और उग्रवाद विरोधी अभियानों में सबसे आगे रहता है। नक्सल विरोधी अभियानों में सीआरपीएफ की अहम भूमिका रही, जिसके दम पर देश नक्सल मुक्त हो पाया यानी देश की आंतरिक सुरक्षा और स्थिरता बनाए रखने में इसकी भूमिका अहम है।
इसके अंतर्गत 246 बटालियन शामिल हैं। सीआरपीएफ का नेतृत्व महानिदेशक करता है और इसे चार हिस्सों में विभाजित किया गया है। जम्मू , कोलकाता, हैदराबाद और गुवाहाटी यानी उत्तर-दक्षिण, पूर्व और पश्चिम चारों क्षेत्र के लिए अलग- अलग महानिदेशक हैं जो इस अर्धसैनिक बलों को कंट्रोल करते हैं।
कानून व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी- देश के किसी भी क्षेत्र में हो रही सभाओं, विरोध प्रदर्शनों और दूसरे तरह की जमावड़े के दौरान भीड़ को नियंत्रित करना सीआरपीएफ की जिम्मेदारी है और इसके लिए इनके जवानों को तकनीकी प्रशिक्षण भी दिया जाता है।
आतंकवादियों से निपटने के लिए हर खतरे वाली जगहों पर इसकी तैनाती होती है, जहाँ ये आधुनिक शस्त्रों से लैस होते हैं और इसके लिए इन्हें खास तौर पर प्रशिक्षित किया जाता है।
नक्सल मुक्त भारत बनाने में सीआरपीएफ का अहम रोल
सीआरपीएफ की यूनिट को खास तौर पर नक्सली क्षेत्रों में लड़ने के लिए प्रशिक्षित किया गया है, इसलिए राज्य पुलिस के साथ मिलकर ये नक्सल प्रभावित राज्यों में अभियान चलाती रही हैं। स्थानीय लोगों के साथ मिलकर उनमें विश्वास पैदा करना और विकास परियोजनाओं को सुरक्षा देना भी इसका काम है।
कोबरा कमांडो बटालियन- नक्सलियों के गुरिल्ला युद्ध और जंगलों में अभियान को अंजाम देने के लिए सीआरपीएफ के कोबरा कमांडो बटालियन को बनाया गया है। ये बटालियन अपने काम को बखूबी अंजाम देता रहा है। देश को नक्सल मुक्त करने में इसकी अहम भूमिका रही है।
माओवादी नक्सलियों से जंगल में उनकी शैली में ही लड़ना कोई आसान काम नहीं है। ‘जंगल योद्धा’ के रूप में कोबरा कमांडो ने सही रणनीति अपना कर इसे निभाया। इसके लिए इन जवानों को खास प्रशिक्षण दिया गया है। 2008 से 2011 के बीच कोबरा की 10 इकाइयाँ बनाई गई। इन्हें मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, ओडिशा, झारखंड आंध्रप्रदेश समेत दूसरे वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित राज्यों में तैनात किया गया। इस बटालियन को जंगलों में अभियान चलाने में महारत हासिल है।
इतना ही नहीं सीआरपीएफ को वीआईपी सुरक्षा में भी लगाया जाता है। करीब 5.68 फीसदी सीआरपीएफ अभी भी वीआईपी सुरक्षा में लगे हुए हैं। देश के प्रधानमंत्री, केन्द्रीय मंत्रियों, लोकसभा के अध्यक्ष-उपाध्यक्ष, राज्यसभा के सभापति-उपसभापति समेत दूसरे गणमान्य लोगों की सुरक्षा में तैनात हैं।
इसके अलावा जम्मू-कश्मीर, असम, अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर, त्रिपुरा, मिजोरम जैसे राज्यों के राज्यपाल, मुख्यमंत्री समेत तमाम मंत्रियों, सांसद-विधायक आदि की सुरक्षा के लिए इन्हें तैनात किया जाता है।
वीआईपी सुरक्षा विंग- सीआरपीएफ की वीआईपी सुरक्षा विंग को वीआईपी सुरक्षा में विशेषज्ञता हासिल है। जिन्हें ये सुरक्षा प्रदान करती हैं, उनमें केंद्रीय मंत्री, राज्यपाल, मुख्यमंत्री, राजनेता, सरकारी अधिकारी, आध्यात्मिक नेता, व्यवसायी और दूसरी प्रमुख हस्तियाँ शामिल हैं। यह खास इकाई वीआईपी की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पूरी सावधानी और पेशेवर अंदाज में काम करती है।
संसद भवन की सुरक्षा का जिम्मा भी पहले सीआरपीएफ निभाती थी। इसलिए जब 2001 में संसद पर हमला हुआ था तो सीआरपीएफ के जवान भी बलिदान हुए, लेकिन अपने अदम्य साहस से आतंकियों के मंसूबों को नाकाम किया था।
सीआरपीएफ का करीब 8.5 फीसदी हिस्सा देश के अहम प्रतिष्ठानों, हैरिटेज और आवास की सुरक्षा में लगे हुए हैं। उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में खास तौर पर इन्हें लगाया गया है। यहाँ सरकारी सचिवालय, दूरदर्शन केन्द्र, बैंक, टेलीफोन एक्सचेंज, विकास परियोजनाएँ और जेलों की सुरक्षा ये करते हैं।
लोकतंत्र के लिए सबसे अहम संसदीय चुनाव के दौरान इनकी भूमिका अहम होती है। चाहे लोकसभा चुनाव हो या किसी राज्य में विधानसभा चुनाव। सीआरपीएफ हर पोलिंग बूथ से लेकर ईवीएम को सुरक्षा की जिम्मेदारी निभाता है। वोट देने आने वाले हर व्यक्ति पर उसकी नजर होती है।
यह गृह मंत्रालय, चुनाव आयोग और राज्य पुलिस के साथ समन्वय कर काम करता है। निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया को सुनिश्चित करने में सीआरपीएफ का अहम रोल है। इसके लिए इन्हें खास ट्रेनिंग दी जाती है।
पर्यावरण, आपदा और यूएन मिशन में योगदान
सीआरपीएफ की यूनिट को जू, वन्यजीव अभ्यारण्यों, राष्ट्रीय उद्यानों की रक्षा के लिए भी तैनात किया जाता है। अवैध कटाई रोकने के अभियान में भी इन्हें लगाया जाता है। देश के किसी क्षेत्र में बाढ़- बारिश आए या भूकंप और सुनामी- चक्रवात जैसे प्राकृतिक आपदा, हर समय सीआरपीएफ मुस्तैद रहता है।
राहत और बचाव कार्यों में इसकी अहम भूमिका होती है। इसके लिए भी इन्हें खास ट्रेनिंग दी जाती है ताकि मानवीय सहायता करने में कोई दिक्कत पेश न आए।
सीआरपीएफ अंतर्राष्ट्रीय मिशन में भी जाता है। यूएन के अंतरराष्ट्रीय शांतिरक्षा के प्रयास में इसका योगदान रहा है। दुनियाभर में भीड़ नियंत्रण, आतंकवाद विरोधी अभियान और कानून व्यवस्था बनाए रखने में इसकी विशेषज्ञता का उपयोग किया जाता है। अंतरराष्ट्रीय शांति मिशन पर सीआरपीएफ के पुरुष और महिला दोनों जाते हैं। इन्हें इसके लिए ट्रेनिंग दी जाती है।
दंगा नियंत्रण और वीआईपी सुरक्षा से लेकर उग्रवाद से निपटने में इसकी भूमिका अहम है यानी सीआरपीएफ का काम बहुमुखी है।
रैपिड एक्शन फोर्स – सीआरपीएफ की यूनिट रैपिड एक्शन फोर्स एक खास यूनिट है जिसे अक्टूबर 1992 में दंगों और हिंसा से निपटने के लिए बनाया गया था। यह संकट के वक्त तुरंत तैनात किया जाता है और शांति बहाल करना इसकी जिम्मेदारी होती है। आरपीएफ का अपना ध्वज भी है,जो शांति का प्रतीक है। इसे 7 अक्टूबर 2003 में तत्कालीन उपप्रधानमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी ने इसे ध्वज प्रदान किया था।
महिला बटालियन: सीआरपीएफ भारत का एकमात्र अर्धसैनिक बल है जिसमें 6 महिला बटालियन हैं। इसकी पहली महिला बटालियन का गठन 1986 में हुआ था। इसका नाम 88(एम) बटालियन है, जिसका मुख्यालय दिल्ली में है।
ये बटालियन खास तौर पर ऐसे आंदोलन या सभा जिसमें महिलाएँ ज्यादा होती हैं, वहाँ तैनात की जाती है, ताकि शांति व्यवस्था बनाने में दिक्कत न हो। इन जगहों पर पुरुष जवानों को तैनात करने में काफी दिक्कत हो सकती है, क्योंकि मामूली सी लापरवाही भी कानून-व्यवस्था की गंभीर समस्या पैदा कर सकता है। महिला बटालियन यह सुनिश्चित करती हैं कि ऐसी स्थितियों को संवेदनशीलता और कुशलता से संभाला जाए।
सीआरपीएफ की राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति प्रतिबद्धता का इतिहास रहा है। इन उपलब्धियों में सीमा पर देश की सुरक्षा करने से लेकर आंतरिक खतरों से निपटने में इसका योगदान अहम है। प्राकृतिक आपदाओं के दौरान जनता को राहत पहुँचाने और जानमाल की रक्षा में ये लगा रहता है। द
संसद की सुरक्षा से लेकर अयोध्या में हुए हमलों को नाकाम किया
संसद की सुरक्षा में तैनात सीआरपीएफ के जवानों ने 2001 में संसद में आतंकियों के हमले से रक्षा की। यही नहीं जब 2005 में अयोध्या में हमला हुआ तो उसे भी नाकाम किया। 80 के दशक में पंजाब का उग्रवाद हो या पूर्वोत्तर का संघर्ष हर जगह सीआरपीएफ ने स्थिति को नियंत्रित करने में भूमिका निभाई। यही वजह है कि इसे 2001 में प्राथमिक आंतरिक सुरक्षा बल का नाम दिया गया।
देश के अंदर उग्रवादियों से निपटने में सीआरपीएफ हमेशा आगे रहा है। यही वजह है कि नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में तैनात जवानों में एक तिहाई सीआरपीएफ के हैं। पश्चिम बंगाल से लेकर महाराष्ट्र तक और बिहार से लेकर आंध्र प्रदेश तक नक्सलवाद के उन्मूलन में इसका अहम रोल रहा।
ओडिशा, बंगाल और दक्षिण-पश्चिम राज्यों में चक्रवात आए हों या सुनामी, हर जगह सीआरपीएफ मदद के लिए सबसे आगे रहा है। 2001 का गुजरात में आए भयानक भूकंप, 2005 में आए जम्मू कश्मीर भूकंप में इसने राहत कार्यों की सबने सराहना की। हर साल बाढ़ देश के कई राज्यों को डुबोता है। ऐसे में कई गाँव और इलाके मुख्य मार्ग से कट जाते हैं। ऐसे जगहों तक राहत सामग्री बाँटने से लेकर लोगों को निकालने का काम भी सीआरपीएफ करती है।
संयुक्त राष्ट्र शांतिरक्षा अभियानों में सीआरपीएफ की अहम भूमिका रही है। श्रीलंका, हैती, कोसोवो और लाइबेरिया में सीआरपीएफ का काम काफी सराहनीय रहा।
जंतर-मंतर पर पेपर लीक के खिलाफ चल रहा छात्र आंदोलन धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद खत्म हो गया। GenZ के इस आंदोलन में गाली-गलौज, गुस्सा, पत्थरबाजी, लाठीचार्ज सब देखने को मिला लेकिन अंतत: जंतर-मंतर पर सब समाप्त हो गया। युवाओं की भावनाओं का आवेग थम गया लेकिन सियासी रस्सा-कस्सी अभी भी जारी है। वामी-इस्लामी गुट से लेकर विपक्षी राजनेता तक सब इस आंदोलन की आड़ में अब अपना-अपना हित साधने में लगे हैं।
किसी को वोट चाहिए, किसी को PM मोदी के खिलाफ माहौल बनाना है, किसी को अब हिंदू धर्म और हिंदुओं को गाली देने का मौका मिल गया है। कुछ लोग चाहते हैं कि आंदोलन की यह आग लगी रहे, उन्हें उम्मीद है कि हो सकता है कि इसमें मोदी की सरकार झुलस जाए।
यह आंदोलन छात्रों की आवाज का आंदोलन था इसमें कोई शक नहीं। लाखों छात्र हर साल अपनी उम्र के सबसे महत्वपूर्ण वर्ष किताबों, कोचिंग, मॉक टेस्ट और अनगिनत उम्मीदों के बीच बिताते हैं। उनके लिए परीक्षा जीवन की दिशा तय करने वाला मोड़ होती है। इसलिए जब किसी परीक्षा की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं, तो गुस्सा आना तो स्वाभाविक है ही। युवाओं में यह आक्रोश किसी राजनीतिक दल ने पैदा नहीं किया बल्कि उस व्यवस्था के प्रति पैदा हुआ जिस पर छात्रों ने भरोसा किया था।
अब धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दे दिया है तो अब इस आंदोलन के लिए सरकार से भिड़ गए युवाओं सामने एक चुनौती भी है। छात्र और युवाओं का एक वर्ग इस आंदोलन के लिए सड़कों से लेकर सोशल मीडिया तक पर इसलिए खड़ा हुआ क्योंकि उसने यह महसूस किया कि यह आंदोलन किसी निजी या राजनीतिक लाभ के लिए नहीं बल्कि वास्तविक समस्या के समाधान के लिए हो रहा है लेकिन अब इसके खत्म होने के बाद असली मकसद और चेहरे दिखने लगे हैं।
सरकारी विरोधी और प्रोपेगेंडाबाज लोगों ने अपने-अपने हितों के हिसाब से इंटरनेट पर प्रोपेगेंडा भरना शुरू कर दिया है। इंटरनेट पर सरकार विरोधी सामग्री की भरमार है। दरअसल, आज की पीढ़ी इंटरनेट के युग में जी रही है। पहले किसी आंदोलन को प्रभावित करने के लिए सभाएँ करनी पड़ती थीं, पोस्टर लगाने पड़ते थे और महीनों तक घूमना पड़ता था। आज एक वायरल वीडियो, एक ट्रेंडिंग हैशटैग या एक भावनात्मक पोस्ट लाखों लोगों की सोच को प्रभावित कर सकती है।
यही इस दौर की सबसे बड़ी ताकत भी है और सबसे बड़ा खतरा भी। आपमें से शायद ही कोई ऐसा होगा जिसने PM मोदी को गाली देते, सरकार का विरोध करते और आधी अधूरी जानकारी की आड़ में झूठ और प्रोपेगेंडा फैलाते लोगों के वीडियो नहीं देखे होंगे। यही एल्गोरिद्म का करिश्मा है और यही आपको आने वाले दिनों में देखने को मिलेगा। ऐसी सब कोशिशें की जाएँगी कि इस गुस्से को भड़काया जाए, चाहे इसके लिए झूठ का ही सहारा क्यों ना लेना पड़े।
ऐसे माहौल में अब GenZ की यह सबसे बड़ी जिम्मेदारी है कि वह किसी भी वायरल वीडियो को अंतिम सच न माने। हर वीडियो पूरी कहानी नहीं बताता। हर क्लिप संदर्भ नहीं बताती। हर ट्रेंड जनभावना का प्रतिनिधित्व नहीं करता। यदि युवा केवल एल्गोरिद्म के अनुसार सोचने लगेंगे तो वे अपनी सबसे बड़ी ताकत ‘स्वतंत्र सोच’ को खो देंगे।
GenZ को यह समझने की जरूरत है कि किसी भी आंदोलन में राजनीतिक दल उस मुद्दे पर अपनी राय रख सकते हैं। यह उनका अधिकार है। लेकिन यह भी उतना ही आवश्यक है कि छात्र अपनी डोर विरोधी दल के हाथों में ना दे दें। किसी भी दल का समर्थन स्वीकार करना और किसी दल का राजनीतिक मंच बन जाना इन दोनों में बहुत बड़ा अंतर है।
भारत का युवा राजनीतिक रूप से अत्यंत सक्रिय है। लगभग हर बड़ा मुद्दा कुछ ही घंटों में राजनीतिक बहस का विषय बन जाता है। यही लोकतंत्र की वास्तविकता भी है। लेकिन युवाओं के सामने चुनौती यह है कि वे स्वयं को केवल एक गुट तक सीमित न कर दें। यदि कोई सरकार अच्छा काम करती है, तो उसकी सराहना हो सकती है। यदि वही सरकार कहीं चूकती है, तो उसकी आलोचना भी होनी चाहिए।
उसी प्रकार यदि विपक्ष कोई उचित प्रश्न उठाता है, तो उस पर विचार होना चाहिए। लेकिन यदि एक गुट छात्रों के मुद्दे को केवल चुनावी हथियार बनाने की कोशिश कर रहा है तो उस पर सवाल उठने ही चाहिए। लोकतंत्र में सबसे मजबूत नागरिक वही होता है जो किसी दल का अंध समर्थक या अंध विरोधी नहीं होता। यही अब GenZ को समझने की जरूरत है।
यह तो बस शुरुआत है, कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दिपके ने पूर्व केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के शनिवार (25 जुलाई 2026) को इस्तीफा देने के बाद अपने पहले वीडियो संदेश में एक खुली चेतावनी जारी की है।
सोशल मीडिया पर साझा किए गए इस वीडियो में, दिपके ने सरकार को सीधे तौर पर चेतावनी दी और यह दावा किया कि एक केंद्रीय मंत्री का पद छोड़ना यह साबित करता है कि एकजुट जन दबाव क्या कुछ हासिल कर सकता है।
अपने मुख्य रुख को दोहराते हुए, उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि मंत्री का इस्तीफा उनकी लड़ाई का अंत नहीं है, बल्कि यह तो महज एक शुरुआत है।
Dipke just dropped a video from his bed.
Says he’s finally getting some rest after 37 days. Thanks everyone who supported them, apologises for not meeting people at Jantar Mantar because of typhoid, and even thanks the critics for asking hard questions.
बढ़ती अशांति के बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री ने इस्तीफा दिया
यह राजनीतिक तूफान तब चरम पर पहुँच गया जब केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने शनिवार (25 जुलाई 2026) को अपने इस्तीफे की घोषणा कर दी। यह फैसला NEET-UG पेपर लीक को लेकर चल रहे विरोध प्रदर्शनों और दिल्ली के जंतर-मंतर पर सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल के बीच आया है।
देश के युवाओं के नाम लिखे दो पन्नों के एक विस्तृत सार्वजनिक पत्र में, प्रधान ने कहा कि उन्होंने छात्रों के हित में और यह सुनिश्चित करने के लिए कि इस मुद्दे का राजनीतिक लाभ के लिए फायदा न उठाया जाए, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना इस्तीफा सौंप दिया है।
एक छात्र, शिक्षक और सुधार समर्थक के रूप में शिक्षा के साथ अपने चार दशक लंबे जुड़ाव को याद करते हुए, प्रधान ने अपने इस मूल विश्वास को दोहराया कि एक मजबूत, समावेशी और पारदर्शी शिक्षा प्रणाली ही एक मजबूत राष्ट्र की आधारशिला होती है।
NEET-UG परीक्षा का जिक्र करते हुए, प्रधान ने 3 मई 2026 को स्वीकार किया कि इसमें गड़बड़ियाँ हुई थीं। उन्होंने रेखांकित किया कि केंद्र सरकार ने तुरंत कार्रवाई करते हुए इसकी जाँच CBI को सौंपी, परीक्षा रद्द की और एक नई परीक्षा की तारीख तय की।
इसके अलावा उन्होंने यह भी बताया कि पूरी पारदर्शिता लाने के लिए सरकार ने अगले साल से NEET को कंप्यूटर-आधारित परीक्षा (CBT) प्रारूप में स्थानांतरित करने का निर्णय लिया है।
पूर्व मंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि सरकार का मुख्य ध्यान यह सुनिश्चित करने पर था कि 20 लाख से अधिक छात्र बिना किसी परेशानी के दोबारा परीक्षा में शामिल हो सकें।
उन्होंने इस बात पर प्रकाश डाला कि कैसे केंद्र व राज्य सरकारों, जिला प्रशासनों, छात्रों और अभिभावकों ने मिलकर 21 जून को नई परीक्षा को सफलतापूर्वक आयोजित करने के लिए तालमेल के साथ काम किया।
जंतर-मंतर पर प्रदर्शनों और सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल पर टिप्पणी करते हुए, उन्होंने युवाओं से अपील की कि वे भ्रम में न पड़ें और न ही लंबे कानूनी और राजनीतिक विवादों में खिंचे चले जाएँ।
उन्होंने आगाह किया कि राष्ट्रविरोधी ताकतों को इस स्थिति का फायदा उठाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए और छात्रों से आग्रह किया कि वे अपना ध्यान वापस अपनी पढ़ाई और करियर पर केंद्रित करें।
वामपंथी और इस्लामवादी खुलेआम धमकियां दे रहे हैं और अराजकता का आह्वान कर रहे हैं
मंत्री के इस्तीफे के बाद, इंटरनेट पर मिली-जुली प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई। हालाँकि वामपंथियों, उदारवादियों और कट्टरपंथी इस्लामवादियों की ओर से धमकियों की एक साफ़ लहर उभरती हुई दिखाई दी, जहाँ मंत्री के पद छोड़ने के बावजूद बड़े पैमाने पर सड़क आंदोलनों और अराजकता की परोक्ष धमकियाँ खुले तौर पर साझा की गईं।
सोशल मीडिया पर सत्ताधारी सरकार को निशाना बनाते हुए कई भड़काऊ पोस्ट और आक्रामक वीडियो देखने को मिले। वामपंथी प्रोपेगैंडा वेबसाइट द वायर की आरफा खानम शेरवानी ने शनिवार (25 जुलाई 2026) को एक्स पर एक रहस्यमयी ट्वीट पोस्ट किया, जिसमें उन्होंने लिखा, “धर्मेंद्र प्रधान तो बस ट्रेलर हैं…”, जिसका यह संकेत था कि यह इस्तीफा केवल एक शुरुआत थी और देश में आगे और अधिक उथल-पुथल की माँगों की तरफ इशारा किया गया था।
इसी तरह, वामपंथी विचारधारा समर्थक छात्र संगठन SFI (स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया) के सदस्यों ने प्रधान के इस्तीफे का जश्न मनाने के लिए सोशल मीडिया पर लाल रंग के प्रतीकों की बाढ़ ला दी। इंटरनेट पर प्रसारित हो रहे एक वीडियो में, SFI की एक कार्यकर्ता को प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के खिलाफ नारेबाजी करते हुए सुना गया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जिक्र करते हुए उसने कहा, “चाय वाले चाचा, अब आपका भी जाने का समय आ गया है, जाओ, जाओ, इस्तीफा दो।” यह नारा प्रधान के इस्तीफे के बाद मनाए जा रहे जश्न के बीच लगाया गया था।
अन्य इंटरनेट यूजर्स भी तुरंत इस मुहिम में शामिल हो गए ताकि सत्ताधारी सरकार के व्यापक पतन के लिए दबाव बनाया जा सके। यूजर तरुण गौतम ने विरोध प्रदर्शनों को और बढ़ाने का आह्वान करते हुए एक्स पर लिखा, “धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से ही संतुष्ट मत हो जाना। अब मोदी हैं जिन्हें जाना होगा।”
Do not settle with Dharmendra Pradhan’s resignation. It’s Modi who must go now.
एक अन्य वायरल पोस्ट में भी इसी तरह की भावना देखने को मिली, जिसमें पूरे मंत्रिमंडल के खिलाफ समर्थकों को लामबंद करने का प्रयास किया गया था, “अब धर्मेंद्र, अगला मोदी, अगला अमित शाह, अगला गडकरी, अगला अगला हम कब तक हर एक के लिए लड़ते रहेंगे, एक बार पूरी भाजपा टीम के खिलाफ खड़े हो जाओ, इनमें से किसी की भी कोई जवाबदेही नहीं है।”
Do not settle with Dharmendra Pradhan’s resignation. It’s Modi who must go now.
यहाँ तक कि इस्तीफा मिलने से उत्साहित हुए CJP के संस्थापक अभिजीत दिपके ने भी सोशल मीडिया पर एक वायरल वीडियो में देश की सुरक्षा एजेंसियों और पुलिस कर्मियों को खुली चुनौती दी।
उन्होंने लिखा, “यह तो सिर्फ 1 इस्तीफा है, 20 जुलाई और उसके बाद छात्रों पर दर्ज किए गए मामलों को वापस लो। एक कॉकरोच से पंगा मत लो। अगर हम एक मंत्री से इस्तीफा दिलवा सकते हैं, तो तुम पुलिस वाले हमारे सामने कुछ भी नहीं हो।” प्रधान के इस्तीफे के बाद यह बयान इंटरनेट पर बड़े पैमाने पर प्रसारित हुआ।
“It's just 1 resignation; withdraw cases against students on July 20 & later.
Don't mess with cockroach.
If we can make Minister resign then you cops are nothing for us.”
विपक्षी राजनीतिक नेता भी इस घोषणा के बाद तुरंत जीत का दावा करने में जुट गए। AAP के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने जनता और छात्र समुदाय को बधाई देते हुए एक बयान जारी किया, “आप सभी को बधाई। हमारे देश के युवाओं को बधाई। यह बहुत बड़ी खुशी की बात है कि आपका संघर्ष रंग लाया है। अंततः धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना ही पड़ा। यह हमारे लोकतंत्र की एक बड़ी जीत है। हमारे देश में लोगों का लोकतंत्र से भरोसा उठने लगा था। उन्हें लगता था कि सरकारें सुनती ही नहीं हैं। लोग सरकार के सामने अपनी आवाज उठाते थे और हाथ जोड़कर विनती करते थे, लेकिन सरकार कभी नहीं सुनती थी।”
VIDEO | AAP National Convenor Arvind Kejriwal (@ArvindKejriwal) says, "Congratulations to all of you. Congratulations to the youth of our country. It is a matter of great joy that your struggle has borne fruit. Dharmendra Pradhan ultimately had to resign. This is a great victory… pic.twitter.com/yXsDyNLWUQ
पंजाब के वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा ने भी सत्ताधारी पार्टी पर तीखा तंज कसते हुए कहा, “जब से देश में भाजपा सत्ता में आई है, परीक्षा के पेपर बिकने शुरू हो गए हैं। वे लीक हुए और देश भर में लाखों बच्चे इसके खिलाफ विरोध प्रदर्शन करने के लिए सड़कों पर उतर आए… भाजपा का पतन शुरू हो चुका है। आज से यही बच्चे जो विरोध प्रदर्शन कर रहे थे, जब भी कोई राज्य या राष्ट्रीय चुनाव आएगा, भाजपा को मुंहतोड़ जवाब देंगे।”
#WATCH | Chandigarh: On the resignation of Union Education Minister Dharmendra Pradhan, Punjab Finance Minister Harpal Singh Cheema says, "Ever since the BJP came to power in the country, exam papers started being sold. They were leaked, and lakhs of children across the country… pic.twitter.com/c6qhv1weJh
जहाँ एक तरफ पंजाब के मंत्री और विपक्ष के नेता केंद्रीय मंत्री के इस्तीफे से साफ तौर पर बेहद खुश नजर आ रहे थे, वहीं यह उनकी राजनीतिक बयानबाजी में दोहरे मापदंड को स्पष्ट रूप से उजागर करता है। इन राजनीतिक नेताओं या कार्यकर्ता समूहों में से किसी ने भी गैर-भाजपा शासित राज्यों में हुए इसी तरह के परीक्षा घोटालों, जैसे कि हाल ही में हुए पंजाब फार्मेसी पेपर लीक को न तो स्वीकार किया है और न ही उसकी निंदा की है।
इसके अलावा न तो CJP और न ही विपक्ष के टिप्पणीकारों ने गैर-भाजपा शासित राज्यों के शिक्षा मंत्रियों के इस्तीफे की माँग की है, जैसे कि कर्नाटक में मधु बंगारप्पा या खुद पंजाब के शिक्षा मंत्री हरजोत सिंह बैंस।
Was waiting for this.
Do you know why Abhijeet Dipke didn’t speak about the Punjab paper leak on 19 July 2026? Because the government there is led by AAP. If he can question the BJP so aggressively, why was there complete silence on Punjab?
इस चुनिंदा चुप्पी ने इस बात पर वाजिब सवाल खड़े कर दिए हैं कि क्या यह आक्रोश वास्तव में छात्रों की सुरक्षा को लेकर है या फिर महज़ किसी एक राजनीतिक दल के खिलाफ राजनीतिक माहौल का फ़ायदा उठाने के लिए है।
(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)
साल 2024 का NEET-UG पेपर लीक किसी एक व्यक्ति द्वारा प्रश्नपत्र से भरा ट्रंक खोल देने से शुरू नहीं हुआ था। केंद्रीय जाँच ब्यूरो (CBI) के अनुसार, यह एक ऐसे संगठित नेटवर्क का नतीजा था, जिसने एडमिशन कंसल्टेंट्स, करियर काउंसलिंग ऑपरेटरों, परीक्षा केंद्र के अधिकारियों, अभ्यर्थियों तक पहुँच बनाने वाले एजेंटों, सॉल्वर के रूप में नियुक्त MBBS छात्रों, गेस्ट हाउस संचालकों, ड्राइवरों, प्रिंटरों और वित्तीय बिचौलियों को एक-दूसरे से जोड़ रखा था।
दो साल बाद तरीका भले ही बदल गया, लेकिन जाँच एजेंसी के अनुसार इस पूरे कारोबारी तंत्र का अस्तित्व बना रहा। NEET-UG 2026 मामले में CBI ने कहा कि राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) द्वारा विषय विशेषज्ञ के रूप में नियुक्त लोगों ने गोपनीय प्रश्नों को निजी कोचिंग क्लासों और कोचिंग से जुड़े बिचौलियों के माध्यम से आगे पहुँचाया।
केमिस्ट्री के व्याख्याता पीवी कुलकर्णी को इस पूरे मामले में एक प्रमुख स्रोत बताया गया। जाँच के अनुसार, उनके घर पर आयोजित विशेष कक्षाओं के दौरान बताए गए प्रश्न 3 मई 2026 को आयोजित NEET-UG परीक्षा में पूछे गए प्रश्नों से मेल खाते थे।
ये दोनों मामले दिखाते हैं कि पेपर लीक को केवल सीलबंद प्रश्नपत्रों की आवाजाही में हुई चूक के रूप में नहीं देखा जा सकता। कोचिंग माफिया एक संगठित बाजार की तरह काम करता है।
यह ऐसे परिवारों की तलाश करता है जो पैसे देने को तैयार हों, गोपनीय जानकारी तक पहुँच रखने वाले अंदरूनी लोगों को खोजता है, प्रश्न हल करने या पढ़ाने में सक्षम लोगों की भर्ती करता है, उम्मीदवारों के रहने और आने-जाने की व्यवस्था करता है, पैसे और जरूरी दस्तावेज इकट्ठा करता है और परीक्षा शुरू होने से पहले ही उन्हें अनुचित लाभ पहुँचाने का काम करता है।
यहाँ कोचिंग माफिया शब्द का इस्तेमाल किया गया है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि देश के सभी कोचिंग संस्थान, शिक्षक या करियर काउंसलर परीक्षा से जुड़े अपराधों में शामिल हैं।
इस शब्द का उपयोग केवल उन संगठनों और व्यक्तियों के लिए किया गया है, जिन्होंने CBI के बयानों और अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार शिक्षा, काउंसलिंग या एडमिशन से जुड़े अपने नेटवर्क का इस्तेमाल अभ्यर्थियों की भर्ती करने और नकल या परीक्षा में धांधली कराने के लिए किया। ऑपइंडिया देशभर के पूरे कोचिंग नेटवर्क पर किसी भी तरह की आपराधिक गतिविधियों में शामिल होने का आरोप नहीं लगा रहा है।
पटना-हजारीबाग से जुड़े मुख्य मामले की शुरुआत शास्त्री नगर पुलिस स्टेशन में दर्ज एक FIR से हुई थी। इसके बाद 23 जून 2024 को यह मामला केंद्रीय जाँच ब्यूरो (CBI) को सौंप दिया गया, जहाँ एजेंसी ने एक नई FIR दर्ज की।
जाँच के दौरान CBI ने कुल 45 लोगों के खिलाफ कई चार्जशीट दाखिल कीं। इस रिपोर्ट को तैयार करने के लिए ऑपइंडिया ने मुख्य रूप से अदालत के आदेशों और FIR पर भरोसा किया है। इन सभी दस्तावेजों को लेख के अंत में उपलब्ध कराई गई एक ZIP फाइल में एक साथ जोड़ा गया है।
रिपोर्ट के मुताबिक, यह नेटवर्क 2024 की परीक्षा से पहले से था मौजूद
2024 के नीट पेपर लीक के घटनाक्रम उन दो लोगों द्वारा बनाई गई योजना से शुरू हुई जो 2015-16 से एक-दूसरे को जानते थे। CBI के अनुसार, मुख्य आरोपितों में से एक, अमित कुमार सिंह, राज कुमार सिंह उर्फ राजू सिंह को 2015-16 से जानता था।
दोनों कंसल्टेंसी या एजेंसी सेवाओं में काम करते थे जो प्रोफेशनल कोर्सेज में दाखिला दिलाने का काम करती थीं। पंकज कुमार उर्फ आदित्य उर्फ साहिल भी इसी क्षेत्र में काम करता था और 2021-22 के दौरान अमित के संपर्क में आया था।
जाँच एजेंसी ने अमित और रंजीत कुमार बेउरा उर्फ पिंटू के बीच एक पुराने जुड़ाव का भी जिक्र किया। बेउरा की जमानत कार्यवाही के दौरान, अभियोजन पक्ष ने कहा कि वे दोनों 2019 से एक-दूसरे को जानते थे और उसी साल ओडिशा यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चर एंड टेक्नोलॉजी परीक्षा में गड़बड़ी के एक मामले में गिरफ्तार हुए थे।
हालाँकि यह पुराना मामला नीट पेपर लीक से जुड़ा नहीं था, लेकिन यह इसलिए प्रासंगिक था क्योंकि CBI ने 2024 के इस ऑपरेशन को दाखिले और प्रतियोगी परीक्षाओं के इर्द-गिर्द पहले से बने संबंधों के विस्तार के रूप में पेश किया।
‘करियर एकेडमी एजुकेशन ट्रस्ट’ उम्मीदवारों की भर्ती करने वाले मुख्य चैनलों में से एक बन गया। यह 3 अगस्त 2023 को ओडिशा में रजिस्टर्ड हुआ था। बेउरा ने अदालत को बताया कि यह गरीब छात्रों को शैक्षिक सुविधाएँ और परामर्श प्रदान करने के लिए बनाया गया एक NGO था।
वहीं CBI का कहना था कि इसका इस्तेमाल नीट उम्मीदवारों की पहचान करने, उनके परिवारों से कमिटमेंट लेने और गारंटी के तौर पर असली शैक्षणिक सर्टिफिकेट और चेक इकट्ठा करने के लिए किया जाता था।
बेउरा को इस संगठन का मैनेजिंग डायरेक्टर बताया गया था। अमित प्रसाद महाराणा और धीरेन कुमार पांडा की पहचान इसके पदाधिकारियों के रूप में की गई थी। एजेंसी ने कहा कि अमित कुमार सिंह ने ओडिशा, बिहार, पश्चिम बंगाल, राजस्थान और मध्य प्रदेश से उम्मीदवारों का इंतजाम करने के लिए उनके और संजय कुमार के साथ मिलकर काम किया।
सत्रह उम्मीदवारों को हजारीबाग भेजा गया और उन्हें ‘राज गेस्ट हाउस’ या ‘सिंदूर’ स्थित एक घर में ठहराया गया। बाकी उम्मीदवार भुवनेश्वर या पटना में ही रहे। CBI ने उम्मीदवारों, कर्मचारियों और ड्राइवरों के बयानों का हवाला दिया।
एक उम्मीदवार ने करियर एकेडमी को अपने शैक्षणिक सर्टिफिकेट सौंपे थे। एक अन्य ने कहा कि महाराणा ने हल किया हुआ नीट पेपर शेयर किया था। भुवनेश्वर की एक उम्मीदवार ने बताया कि उसे एक होटल में प्रिंटेड कॉपी मिली थी और उसने पांडा की पहचान की थी।
एजेंसी ने कहा कि महाराणा ने स्कोर्पियो से उम्मीदवारों को लाने-ले जाने का काम किया, ‘होटल ट्रीफो पैलेस’ में एक प्रिंटर की व्यवस्था की और हल किए गए पेपर बांटे। CBI ने उसके खाते में 2 लाख रुपए और ‘चिरंजीवी मल्टीवेंचर प्राइवेट लिमिटेड’ (जिसमें वह डायरेक्टर था) द्वारा प्राप्त 12 लाख रुपए का हवाला दिया।
पांडा को करियर एकेडमी का ट्रेजरर बताया गया था और वह भी ट्रांसपोर्ट, होटल ट्रीफो पैलेस में पेपर बांटने और 12 लाख रुपए के भुगतान से जुड़ा हुआ था। CBI ने कहा कि गारंटी के तौर पर असली सर्टिफिकेट और चेक लिए गए थे। इससे आयोजकों को उम्मीदवारों और उनके परिवारों पर काफी दबाव बनाने का मौका मिल गया होगा।
अगली कड़ी परीक्षा प्रणाली के भीतर थी। जमालुद्दीन उर्फ जमाल हजारीबाग का एक पत्रकार था जो ‘प्रभात खबर’ से जुड़ा हुआ था और ओएसिस स्कूल द्वारा आयोजित कार्यक्रमों को नियमित रूप से कवर करता था।
गौरतलब है कि ओएसिस स्कूल वही परीक्षा केंद्र था जहाँ से प्रश्नपत्र चोरी हुआ था। CBI ने कहा कि इस वजह से वह प्रिंसिपल डॉ अहसानुल हक और वाइस-प्रिंसिपल मो इम्तियाज आलम के करीब आ गया।
एजेंसी ने 3 जून 2023 से 18 जून 2024 तक हक और जमालुद्दीन के बीच 814 कॉल्स का हवाला दिया। हालाँकि केवल कॉल की संख्या ही साजिश साबित करने के लिए काफी नहीं थी, लेकिन CBI ने इसका इस्तेमाल उनके निरंतर जुड़ाव को स्थापित करने के लिए किया।
एजेंसी के अनुसार, जमालुद्दीन ने अमित कुमार सिंह की मुलाकात हक और इम्तियाज से कराई थी। अमित ने बाद में पंकज कुमार को उनसे मिलवाया। CBI ने अमित, हक, इम्तियाज, जमालुद्दीन, पंकज, राजू सिंह और अमन कुमार सिंह की बैठकों का भी जिक्र किया।
अभियोजन पक्ष की व्यापक थ्योरी साफ थी, जमालुद्दीन ने बाहर के दाखिला नेटवर्क को उस सुरक्षित केंद्र को नियंत्रित करने वाले अधिकारियों से जोड़ा, जबकि अमित ने पंकज को उस दायरे में शामिल किया।
पेपर चोरी होने से पहले सॉल्वर और कैंडिडेट हुए इकट्ठा
एक कोरे प्रश्नपत्र का तब तक कोई खास व्यावसायिक मूल्य नहीं था जब तक कि उसे जल्दी से हल करके पैसे देने वाले उम्मीदवारों तक न पहुँचाया जाए। CBI ने कहा कि कम से कम तीन सॉल्वर ग्रुप्स को हजारीबाग लाया गया था। इसके कई सदस्य MBBS छात्र थे।
संजय कुमार को उस व्यक्ति के रूप में बताया गया जिसने सॉल्वर, लाभार्थियों, परिवहन और लॉजिस्टिक्स की व्यवस्था की थी। अभियोजन पक्ष ने कहा कि उसने AIIMS पटना के छात्र चंदन सिंह से पढ़ाई में अच्छे मेडिकल छात्रों को भर्ती करने के लिए कहा था।
पटना ग्रुप में चंदन सिंह, कुमार शानू, राहुल आनंद, करण जैन, सुरभि कुमारी, रौनक राज और अमित कुमार शामिल थे। अमित अपने कॉलेज के साथी सनोज कुमार यादव को लाया था, हालाँकि CBI ने कहा कि सनोज पेपर हल करने के लिए ‘राज गेस्ट हाउस’ के अंदर नहीं गया था।
इन छात्रों से पहले ‘इम्पर्सनेशन’ (दूसरों के स्थान पर परीक्षा देने यानी डमी कैंडिडेट बनने) के लिए संपर्क किया गया था। CBI ने कहा कि संजय चंदन, कुमार शानू, राहुल आनंद और करण जैन को एम्स पटना के पास एक फोटो स्टूडियो में ले गया।
नीट आवेदनों के लिए उनकी तस्वीरें ली गईं। रौनक राज और अमित कुमार ने व्हाट्सएप के जरिए तस्वीरें और सिग्नेचर भेजे। डमी-कैंडिडेट की योजना को बाद में छोड़ दिया गया, लेकिन इन्हीं नए लोगों को सॉल्वर के रूप में फिर से काम सौंप दिया गया।
राजस्थान ग्रुप का संबंध अमित कुमार सिंह से था। CBI ने कहा कि उसने फरवरी 2024 में भरतपुर की यात्रा की और कुमार मंगलम विश्नोई, दीपेंद्र शर्मा और अन्य मेडिकल छात्रों से मुलाकात की।
श्री जगन्नाथ पहाड़िया सरकारी मेडिकल कॉलेज के MBBS छात्र कुमार मंगलम ने एक ग्रुप का इंतजाम किया, जिसमें दीपेंद्र शर्मा, संदीप कुमार, सुरेश कुमार और इशिता शामिल थे। इनसे भी शुरुआत में संभावित डमी उम्मीदवारों के रूप में संपर्क किया गया था। कुमार मंगलम ने बाद में ट्रेन टिकटों की व्यवस्था की और ग्रुप के सदस्यों को हजारीबाग लेकर आया।
यह ऑपरेशन परीक्षा से एक सप्ताह से भी अधिक समय पहले लोगों को एक जगह से दूसरी जगह भेजने लगा था। 26 अप्रैल की रात को संजय कुमार, चंदन सिंह, कुमार शानू और राहुल आनंद गंगा दामोदर एक्सप्रेस से पटना से रवाना हुए और कोडरमा पहुँचे।
सुरभि कुमारी रांची से अलग आई थी। यह ग्रुप पहले ‘रैमसन होटल’ और फिर ‘होटल तारा टॉवर’ में रुका। बुकिंग संजय और कुमार अभिषेक द्वारा की गई थी।
अमित कुमार 2 मई को चेन्नई से रांची गया और अगले दिन कोडरमा पहुँचा। रौनक राज मुंबई से आया था। करण जैन ने कुमार अभिषेक द्वारा बुक किए गए टिकट पर पटना से यात्रा की। 3 मई को पटना ग्रुप हजारीबाग के ‘होटल श्री विनायक’ में शिफ्ट हो गया।
उनका इतनी जल्दी आना CBI के इस दावे का समर्थन करता है कि उन्हें गोपनीय सामग्री की उम्मीद में पहले से ही वहाँ तैनात किया गया था। अभियोजन पक्ष ने कहा कि तैयारियाँ ओएसिस स्कूल के भीतर भी चल रही थीं।
इम्तियाज आलम की जमानत कार्यवाही में इसके जवाबी हलफनामे में कहा गया कि 3 मई को कंट्रोल रूम में एक टूलकिट बैग रखा गया था। बाद में इन टूल्स का इस्तेमाल NTA ट्रंक के पीछे के कब्जों से छेड़छाड़ करने, उसकी पैकेजिंग खोलने और पेपर की फोटो खींचने के बाद उसे वापस वैसे ही ठीक करने के लिए किया गया था।
इम्तियाज आलम के जमानत आदेश में शामिल CBI के जवाबी हलफनामे के अनुसार, आलम ने 3 मई को कंट्रोल रूम में टूलकिट बैग रखा था। एजेंसी ने कहा कि पंकज ने बाद में ट्रंक को खोलने और उसे वापस ठीक करने के लिए उन टूल्स का इस्तेमाल किया।
उम्मीदवारों का 3 और 4 मई को हजारीबाग में जुटना शुरू हो गया था। बेउरा करियर एकेडमी के कर्मचारी देबाशीष पाणिग्रही और ड्राइवर रंजन सेठी उर्फ मानस के साथ एक एमजी हेक्टर गाड़ी से पहुँचा था।
इस गाड़ी का इस्तेमाल उम्मीदवारों को लाने-ले जाने के लिए किया गया था। बेउरा ‘एके इंटरनेशनल होटल’ में रुका। ओडिशा के उम्मीदवारों को राज गेस्ट हाउस और सिंदूर भेजा गया।
राजू सिंह राज गेस्ट हाउस का प्रबंधन करता था। CBI ने कहा कि इस परिसर को जानबूझकर खाली और उपलब्ध रखा गया था। खाने-पीने की व्यवस्था की गई थी और उम्मीदवारों व सॉल्वरों को लाने-ले जाने के लिए गाड़ियों का इस्तेमाल किया गया था।
राजू ने अपना पक्ष रखा कि उसने केवल कमरे किराए पर दिए थे और उसे इसके पीछे का मकसद नहीं पता था। पटना हाई कोर्ट ने शुरुआत में अभियोजन पक्ष के इस मामले का हवाला देते हुए जमानत देने से इनकार कर दिया था कि उम्मीदवारों को तैयार करने के लिए जानबूझकर गेस्ट हाउस उपलब्ध कराया गया था।
पटना में सिकंदर यादवेन्दु ने अखिलेश कुमार, अवधेश कुमार, शिवनंदन कुमार और उम्मीदवार अनुराग यादव के साथ तालमेल बिठाया। CBI ने कहा कि उनसे 4 मई को रात करीब 10:30 बजे सेंट करेन्स हाई स्कूल के पास उम्मीदवारों को लाने के लिए कहा गया था।
उस रात तक इस नेटवर्क की अलग-अलग शाखाएँ अपनी-अपनी जगह पर तैनात थीं, स्कूल के भीतर के अंदरूनी लोग, पास के होटलों में सॉल्वर, गेस्ट हाउसों और निजी परिसरों में उम्मीदवार, और गाड़ियाँ, प्रिंटर व ठहरने की जगह पूरी तरह तैयार थीं।
5 मई को पेपर कैसे निकाला और बांटा गया
सुबह लगभग 5:30 बजे, चंदन सिंह, राहुल आनंद, सुरभि कुमारी और करण जैन एक काले रंग की हुंडई क्रेटा कार में ‘होटल श्री विनायक’ से निकले और ‘राज गेस्ट हाउस’ पहुँचे। उनके पीछे-पीछे कुमार शानू, अमित कुमार और रौनक राज भी वहाँ पहुँचे।
CBI ने कहा कि सनोज कुमार यादव को छोड़कर पटना सॉल्वर ग्रुप का हर सदस्य चोरी का पेपर आने से पहले ही गेस्ट हाउस के अंदर मौजूद था। मोबाइल लोकेशन, ट्रैवल रिकॉर्ड और गवाहों की पहचान के जरिए राजस्थान ग्रुप के दीपेंद्र शर्मा और संदीप कुमार की मौजूदगी भी वहीं पाई गई।
2024 में NEET का पेपर कैसे लीक हुआ।
सुबह लगभग 7:40 बजे, ओएसिस स्कूल के प्रिंसिपल अहसानुल हक ने हजारीबाग में SBI के एक वॉल्ट से नीट के प्रश्नपत्रों से भरे दो ट्रंक लिए। हक NTA के सिटी कोऑर्डिनेटर भी थे। ये ट्रंक सेंटर सुपरिटेंडेंट और वाइस-प्रिंसिपल इम्तियाज आलम को सौंप दिए गए, जो सुबह लगभग 7:53 बजे स्कूल पहुँचे और उन्हें कंट्रोल रूम में रख दिया।
CBI ने पैकेजिंग चेन के जरिए चोरी हुई बुकलेट का पता लगाया। ट्रंक संख्या 13093 में 13560 से 13563 तक के बंच थे। बंच 13560 में पैकेट नंबर 38988, 38989 और 38990 शामिल थे।
पैकेट 38990 में 6136465 से 6136488 तक नंबर वाली 24 बुकलेट थीं। बुकलेट संख्या 6136488 की पहचान उस मूल कॉपी के रूप में की गई जिसकी स्कूल के अंदर नकल की गई थी।
पंकज कुमार ओएसिस स्कूल पहुँचा और उसने गार्ड रोहित राम से कहा कि वह इनोवेटिव व्यू का प्रतिनिधि है और इम्तियाज आलम से मिलने आया है। रोहित ने आलम को आवाज लगाई, जो प्रिंसिपल के ऑफिस के पास खड़े थे।
CBI ने कहा कि आलम ने इशारा किया कि पंकज को अंदर आने दिया जाए। इसके बाद पंकज स्टाफ रूम में बैठ गया। गौर करने वाली बात यह है कि ‘इनोवेटिव व्यू’ परीक्षा केंद्रों पर तैनात की गई आधिकारिक सुरक्षा और बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन एजेंसी थी।
यह स्पष्ट नहीं है कि पंकज वास्तव में उस कंपनी का प्रतिनिधित्व कर रहा था या उसने स्कूल में प्रवेश करने के लिए केवल उसके नाम का इस्तेमाल किया था। स्कूल के कर्मचारियों मोहम्मद शाकिब खान और सादुल हसन ने ध्यान दिया कि वह बाहरी व्यक्ति काफी समय से वहाँ रुका हुआ है।
शाकिब ने इसकी जानकारी आलम को और बाद में हक को दी। सादुल ने भी यह मुद्दा उठाया। CBI द्वारा उद्धृत बयानों के अनुसार, आलम इस पर चिढ़ गए और उन्होंने कर्मचारियों से कहा कि वे इस मामले को उन पर छोड़ दें। शाकिब और सादुल ने बाद में मजिस्ट्रेट के सामने बयान दिए। शाकिब ने एक टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड में पंकज की पहचान भी की।
सुबह 8:02 बजे, पंकज ने दूसरे दरवाजे से कंट्रोल रूम में प्रवेश किया। CBI ने कहा कि उसने ट्रंक 13093 के पिछले कब्जों से छेड़छाड़ करने के लिए टूलकिट का इस्तेमाल किया, बंच 13560 को बाहर निकाला और पैकेट 38990 को खोला। उसने बुकलेट 6136488 को चुना, उसके प्लास्टिक रैपिंग को काटा और एक पेंसिल की मदद से पेपर की सील को खोल दिया।
जाँच एजेंसी ने कहा कि पंकज ने एक आईफोन 13 से पहले और आखिरी पन्ने को छोड़कर हर पेज की फोटो खींची, जिसके बारे में CBI का कहना है कि इसका इस्तेमाल इस पूरे ऑपरेशन में किया गया था। उसने किसी दूसरे व्यक्ति की पहचान का इस्तेमाल करके एक सिम कार्ड भी हासिल किया था।
उसने बुकलेट को वापस पैकेट में रख दिया, बंच को ठीक किया और ट्रंक को दोबारा सील करने की कोशिश की। इस प्रक्रिया के दौरान हटाई गई प्लास्टिक की पट्टियों को टूलकिट बैग के अंदर रख दिया गया, जिसे एक अलमारी के पास छिपा दिया गया था।
CBI ने कहा कि अस्त-व्यस्त हो चुकी टेबल क्लॉथ को स्कूल के CCTV फुटेज में देखा जा सकता था। बाद में इन औजारों को जब्त कर लिया गया और पंकज ने CBI की कस्टडी में इस पूरी प्रक्रिया को दोबारा करके दिखाया।
पंकज सुबह करीब 9:23 बजे कंट्रोल रूम से बाहर निकला और करीब 9:24 बजे स्कूल परिसर से चला गया। परीक्षा दोपहर 2 बजे शुरू होने वाली थी। इस नेटवर्क के पास फोटो भेजने, पेपर हल करने, पढ़ने योग्य कॉपियाँ तैयार करने और उम्मीदवारों को उनके केंद्रों तक पहुँचाने के लिए पाँच घंटे से भी कम का समय था।
खींची गई तस्वीरों को राज गेस्ट हाउस भेजा गया। सॉल्वरों को विषयों के हिसाब से बांट दिया गया। कुमार शानू, दीपेंद्र शर्मा और संदीप कुमार को बायोलॉजी का जिम्मा सौंपा गया था। सुरभि कुमारी और रौनक राज ने केमिस्ट्री को संभाला।
चंदन सिंह, राहुल आनंद और अमित कुमार ने फिजिक्स का पेपर हल किया। करण जैन को कठिन या अधिक समय लेने वाले प्रश्न दिए गए थे। चंदन को पटना ग्रुप के लीडर और कुमार मंगलम को राजस्थान ग्रुप के लीडर के रूप में बताया गया।
एक बार जवाब तैयार हो जाने के बाद चंदन और सुरभि को नीचे ले जाया गया ताकि वे उम्मीदवारों को जवाब समझा सकें और उनके संदेह दूर कर सकें। अन्य सॉल्वर भी उनके साथ शामिल हो गए। CBI ने कहा कि जवाब याद कर लेने के बाद हल की गई कॉपियों को नष्ट करने का आदेश दिया गया था।
इसके बाद सॉल्वर वापस होटल श्री विनायक आ गए, जहाँ संजय कुमार और सनोज कुमार यादव उनका इंतजार कर रहे थे। एजेंसी ने सनोज के बयानों पर भरोसा किया, जिसमें ग्रुप के सदस्यों ने आपस में बातचीत के दौरान कहा था कि उन्होंने पेपर हल कर लिया है।
पंकज ने हल की गई सामग्री की PDF बनाई और उन्हें सिंदूर, एके इंटरनेशनल होटल, बोकारो, भुवनेश्वर और पटना में मौजूद हैंडलर्स को भेज दिया। शशिकांत पासवान ने सिंदूर ब्रांच को संभाला। एक कॉपी अमित कुमार सिंह के भाई अमन कुमार सिंह द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले व्हाट्सएप नंबर पर भेजी गई थी।
भुवनेश्वर में पंकज के भाई घनश्याम से जुड़े हैंडलर्स ने दो इलेक्ट्रीशियन, गौतम और विकास के साथ मिलकर काम किया। 2024 के इस लीक मामले में CBI की जाँच के दौरान ‘करियर एकेडमी’ सबसे व्यापक रूप से दर्ज किए गए उम्मीदवार-भर्ती और लॉजिस्टिक्स चैनलों में से एक बनकर उभरी।
पटना ब्रांच को हल किए गए विषय अलग-अलग मिले। द इंडियन एक्सप्रेस द्वारा समीक्षा की गई CBI की चार्जशीट के अनुसार, बलदेव कुमार उर्फ चिंटू को सुबह 10:50 बजे व्हाट्सएप पर हल किया हुआ बायोलॉजी का पेपर मिला।
केमिस्ट्री का पेपर सुबह 11:05 बजे और फिजिक्स का पेपर सुबह 11:40 बजे आया। यह क्रम दर्शाता है कि जैसे ही संबंधित सॉल्वर ग्रुप ने अपना हिस्सा पूरा किया, वैसे ही प्रत्येक सेक्शन को आगे भेज दिया गया।
बलदेव और नीतीश कुमार ने कथित तौर पर खेमनीचक के ‘लर्न प्ले स्कूल’ में 15 सेट प्रिंट किए। नीतीश अपने साथ एक ब्रदर प्रिंटर और एक डेल लैपटॉप लेकर आया था। करीब 30 से 32 उम्मीदवारों को दो या तीन के समूहों में इकट्ठा किया गया था।
चार्जशीट के विवरण के अनुसार प्रिंटिंग और वितरण के दौरान बलदेव, पिंटू कुमार, नीतीश कुमार, अभिमन्यु पटेल, आशुतोष कुमार और मनीष प्रकाश उसी परिसर में मौजूद थे। लर्न प्ले स्कूल लीक हुए पेपर नेटवर्क की पटना ब्रांच के लिए वितरण और जवाब याद कराने का एक प्रमुख केंद्र था।
नीतीश हल की गई बायोलॉजी की कॉपियाँ प्रतिभा कॉलोनी स्थित अपने आवास पर भी ले गया, जहाँ सात महिला उम्मीदवारों को रखा गया था। कृष्णनंदन के बेटे आशुतोष कुमार को एक कैंडिडेट एजेंट के रूप में बताया गया जो राशि सिंह को वहाँ लेकर आया था। CCTV फुटेज में नीतीश को उसे हल किए गए पेपर्स के सेट देते हुए देखा गया था।
जाँचकर्ताओं ने कहा कि परीक्षा शुरू होने से काफी पहले, सुबह 11:23 बजे के टाइमस्टैम्प के साथ लीक हुए पेपर का एक पेज नीतीश के फोन पर पाया गया था। दोपहर करीब 12:30 बजे लर्न प्ले स्कूल और नीतीश के आवास पर मौजूद उम्मीदवारों को अपने-अपने केंद्रों के लिए निकलने को कहा गया। उनकी तलाशी ली गई ताकि कोई भी प्रिंटेड कॉपी उनके साथ बाहर न जा सके।
पुलिस इंटरसेप्शन जिसने रैकेट का किया पर्दाफाश
दुपहर लगभग 2:05 बजे, शास्त्री नगर पुलिस स्टेशन के तत्कालीन SHO इंस्पेक्टर अमर कुमार को सूचना मिली कि एक संगठित गिरोह ने NEET प्रश्नपत्र की सुरक्षा शृंखला को तोड़ दिया है। उन्हें यह भी बताया गया कि इस नेटवर्क के सदस्य रजिस्ट्रेशन नंबर JH01BW0019 वाली एक सफेद रेनॉल्ट डस्टर कार में घूम रहे हैं।
पुलिस ने राजवंशी नगर मोड़ के पास डस्टर गाड़ी को रोका और सिकंदर यादवेन्दु, अखिलेश कुमार व बिट्टू कुमार को हिरासत में ले लिया। गाड़ी की आगे की सीट के पास से चार फोटोकॉपी किए गए एडमिट कार्ड मिले। ये एडमिट कार्ड अभिषेक कुमार, शिवनंदन कुमार, आयुष राज और अनुराग यादव के थे। सिकंदर के पास से दो फोन भी बरामद किए गए।
कैसे कुछ लोगों के नेटवर्क ने इस लीक में अपनी भूमिका निभाई।
FIR के अनुसार, सिकंदर ने उम्मीदवारों के इंतजाम के सिलसिले में ‘संजीव सिंह’, रॉकी, नीतीश और अमित आनंद का जिक्र किया। पुलिस ने बरामद एडमिट कार्ड का इस्तेमाल परीक्षा केंद्रों की पहचान करने के लिए किया और उम्मीदवारों को हिरासत में लेने के लिए परीक्षा के खत्म होने का इंतजार किया।
आयुष राज BSEB कॉलोनी के डीएवी पब्लिक स्कूल में परीक्षा दे रहा था। FIR के मुताबिक, उसने बताया कि उसे और लगभग 20 से 25 छात्रों को ‘लर्न बॉयज हॉस्टल’ और ‘लर्न प्ले स्कूल’ ले जाया गया था, जहाँ उन्हें हल किए गए प्रश्न दिए गए और उन्हें याद करने के लिए कहा गया। उसने यह भी कहा कि परीक्षा में आए प्रश्न उपलब्ध कराई गई सामग्री से मेल खाते थे। पुलिस ने उसका एडमिट कार्ड, टेस्ट बुकलेट और पहचान दस्तावेज जब्त कर लिए।
इसके बाद जाँचकर्ताओं ने लर्न प्ले स्कूल की तलाशी ली और छत से नीट पेपर के आधे जले और गीले टुकड़े बरामद किए। CBI ने बाद में कहा कि इन टुकड़ों की मदद से वे लीक के तार ओएसिस स्कूल को आवंटित की गई बुकलेट से जोड़ने में कामयाब रहे। इस बरामदगी ने पटना के वितरण केंद्र को हजारीबाग के पेपर से जोड़ दिया।
अपना काम पूरा करने के बाद, चंदन सिंह, कुमार शानू, राहुल आनंद, अमित कुमार और करण जैन को कुमार अभिषेक और टिंकू कुमार द्वारा हजारीबाग टाउन रेलवे स्टेशन ले जाया गया। वे वंदे भारत एक्सप्रेस में सवार हुए और रात लगभग 10 बजे पटना पहुँचे।
इस तरह मात्र एक दिन के भीतर, सॉल्वर सूर्योदय से पहले राज गेस्ट हाउस में दाखिल हुए, सुबह 8 बजे के बाद पेपर की कॉपी की गई, सुबह 11:40 बजे तक विषय-वार उत्तर पटना पहुँच गए और दोपहर 12:30 बजे तक उम्मीदवार अपने केंद्रों के लिए रवाना हो चुके थे।
मुख्य ऑर्गनाइजर और उनकी बताई गई भूमिकाएँ
CBI ने किसी एक व्यक्ति को इस पूरे नेटवर्क की हर शाखा के नियंत्रक के रूप में चिन्हित नहीं किया। जाँच एजेंसी का मामला एक बहुस्तरीय ऑपरेशन को दर्शाता है, जिसमें अलग-अलग लोगों ने परीक्षा केंद्र तक पहुँच, उम्मीदवारों की भर्ती, पेपर हल करने, वितरण और पैसों के लेनदेन को संभाला।
अमित कुमार सिंह उस चेहरे के रूप में उभरता है जिसने सबसे अधिक शाखाओं को आपस में जोड़ा था। CBI ने कहा कि वह दाखिला व्यवसाय के जरिए राजू सिंह को जानता था, उसने ही पंकज को ओएसिस स्कूल के अधिकारियों के संपर्क में लाया, उम्मीदवारों की व्यवस्था करने वालों के साथ काम किया और पटना व राजस्थान दोनों सॉल्वर ग्रुप्स को जोड़ा।
कुमार मंगलम और दीपेंद्र शर्मा को रांची में अमित से जुड़े एक फ्लैट में ठहराया गया था। एजेंसी ने यह भी कहा कि कुमार मंगलम को रत्ना खान के एक खाते से 2.4 लाख रुपए मिले थे, जिसे अमित ऑपरेट करता था। अमित ने इस फ्लैट, भुगतान और मुलाकातों के दावों का खंडन किया। उसके घर की तलाशी में कोई आपत्तिजनक सामग्री नहीं मिली।
पंकज कुमार को सुरक्षित परीक्षा केंद्र और बाहरी नेटवर्क के बीच की ऑपरेशनल कड़ी बताया गया था। CBI ने उस पर टूल्स और आईफोन खरीदने, झूठी पहचान बताकर ओएसिस स्कूल में प्रवेश करने, ट्रंक खोलने, पेपर की फोटो खींचने और हल किए गए PDF भेजने का आरोप लगाया।
एजेंसी ने उसे हजारीबाग, बोकारो, पटना और भुवनेश्वर में उम्मीदवारों के ठिकानों के साथ-साथ उसके भाई घनश्याम के खाते के जरिए ट्रांसफर किए गए पैसों से भी जोड़ा। पंकज ने इन आरोपों से इनकार किया।
हाई कोर्ट ने उसकी हिरासत की अवधि और अन्य आरोपितों के साथ समानता पर विचार करने के बाद मई 2025 में उसे जमानत दे दी। हालाँकि इस आदेश ने उसे आरोपों से बरी नहीं किया।
राकेश रंजन उर्फ रॉकी को पटना वितरण ऑपरेशन के मुख्य सरगनाओं में से एक बताया गया था। उसकी शाखा ही ‘लर्न प्ले स्कूल’, उम्मीदवारों को इकट्ठा करने, प्रिंटर, लैपटॉप और स्थानीय स्तर पर पेपर पहुँचाने का प्रबंधन करती थी।
बलदेव को विषय-वार फाइलें मिली थीं। नीतीश ने उपकरणों की व्यवस्था की और पेपर्स को अपने आवास पर ले गया। रॉकी ने इस मामले में अपनी संलिप्तता से इनकार किया और बाद में उसे जमानत मिल गई।
राजू सिंह ने राज गेस्ट हाउस उपलब्ध कराया और खाने-पीने व गाड़ियों का इंतजाम किया। उसका कहना था कि उसने केवल कमरे किराए पर दिए थे। उसकी पहली जमानत याचिका खारिज कर दी गई थी, लेकिन कस्टडी में डेढ़ साल से अधिक का समय बिताने के बाद फरवरी 2026 में उसे जमानत मिल गई।
हाईकोर्ट ने संज्ञान लिया कि अभी तक आरोप तय नहीं हुए हैं और अभियोजन पक्ष ने 589 गवाहों की सूची पेश की है। जमालुद्दीन को उस मध्यस्थ के रूप में बताया गया जिसने दाखिला नेटवर्क की मुलाकात हक और इम्तियाज से कराई थी।
हक और इम्तियाज ही उस सुरक्षित केंद्र के लिए जिम्मेदार अधिकारी थे। CBI ने कहा कि पंकज के प्रवेश को आसान बनाया गया, स्टाफ के विरोध के बावजूद उसकी मौजूदगी को नजरअंदाज किया गया और कंट्रोल रूम तक उसकी पहुँच सुनिश्चित की गई। दोनों ने इस मामले में शामिल होने से इनकार किया और अभियोजन पक्ष के घटनाक्रम पर सवाल उठाए।
‘करियर एकेडमी’ ने उम्मीदवारों का एक व्यवस्थित नेटवर्क प्रदान किया। बेउरा, महाराणा और पांडा ने उम्मीदवारों की भर्ती की, सर्टिफिकेट या चेक इकट्ठा किए, यात्रा, ठहरने और गाड़ियों की व्यवस्था की और हजारीबाग व भुवनेश्वर में पेपर बांटे।
संजय कुमार ने उम्मीदवारों और सॉल्वरों का इंतजाम किया। चंदन सिंह को पटना सॉल्वर ग्रुप के हेड के रूप में बताया गया। सिकंदर यादवेन्दु ने माता-पिता और उम्मीदवारों को पटना के हैंडलर्स से जोड़ा।
अलग गोधरा नेटवर्क ने OMR शीट को बनाया निशाना
गोधरा मामले में एक अलग तरीका अपनाया गया था। यह पेपर चुराने और उम्मीदवारों को जवाब याद कराने पर निर्भर नहीं था। CBI ने कहा कि कोचिंग से जुड़े एक नेटवर्क ने एक परीक्षा केंद्र को अपने नियंत्रण में लेने का प्रयास किया था ताकि उम्मीदवारों के जाने के बाद चुनिंदा OMR शीटों पर सही उत्तर भरे जा सकें।
इस मामले में तुषार रजनीकांत भट्ट, परशुराम बिंदनाथ रॉय, आरिफ नूर मोहम्मद वोरा, विभोर उमेश्वर प्रसाद सिंह आनंद, पुरुषोत्तम शर्मा और दीक्षित कांतिभाई पटेल को नामजद किया गया था।
तुषार भट्ट ‘ज्ञान मंदिर करियर इंस्टीट्यूट’ में काम करता था, जो एक निजी कोचिंग संस्थान था। CBI ने कहा कि उसे ‘जय जलाराम स्कूल’ में एक शिक्षक और पर्यवेक्षक के रूप में पेश किया गया था ताकि उसे डिप्टी सेंटर सुपरिटेंडेंट नियुक्त किया जा सके। स्कूल के प्रिंसिपल और NTA के सिटी कोऑर्डिनेटर पुरुषोत्तम शर्मा ने इस नियुक्ति को आसान बनाया।
दीक्षित पटेल ‘जय जलाराम एजुकेशन ट्रस्ट’ का चेयरमैन था, जो परीक्षा केंद्रों के रूप में इस्तेमाल किए जाने वाले इन स्कूलों को चलता था। अभियोजन पक्ष ने कहा कि उसने केंद्रों और अधिकारियों की व्यवस्था करने में भाग लिया था। उसके वकीलों ने कहा कि वे नियुक्तियाँ NTA द्वारा की गई थीं और उसकी संलिप्तता से इनकार किया।
CBI ने कहा कि एजेंटों ने उम्मीदवारों को निर्देश दिया था कि वे पंचमहल या वडोदरा में अपने वर्तमान पते दर्ज करें, गोधरा को अपने परीक्षा शहर के रूप में चुनें और गुजराती को माध्यम के रूप में चुनें।
इसका उद्देश्य यह संभावना बढ़ाना था कि उन्हें इस नेटवर्क के प्रभाव वाले केंद्रों में आवंटित किया जाए। उम्मीदवारों से कहा गया था कि वे केवल उन्हीं प्रश्नों के उत्तर दें जो वे जानते हैं और बाकी को खाली छोड़ दें। इसके बाद उनकी OMR शीट पर सही विकल्प भर दिए जाते हैं। परिवारों से 20 लाख रुपए से 25 लाख रुपए के बीच भुगतान करने को कहा गया था।
‘ऑपइंडिया’ द्वारा प्राप्त गुजरात हाई कोर्ट के आदेश में NEET-UG 2023 से संबंधित बयानों को भी दर्ज किया गया था। विष्णु शर्मा नाम के एक गवाह ने कहा कि उसने तीन रिश्तेदारों के लिए इस नेटवर्क से संपर्क किया था।
बयान के अनुसार, दीक्षित पटेल ने प्रति उम्मीदवार 10 लाख रुपए एडवांस माँगे थे। शर्मा ने कहा कि उसने परीक्षा के दिन तुषार भट्ट को 20 लाख रुपए का भुगतान किया था। भट्ट ने बाद में 25 लाख रुपए और माँगे और दावा किया कि काम पूरा हो चुका है।
गवाह ने यह भी कहा कि भट्ट को अपनी तस्वीर भेजने के बाद उसे 2023 में एक इनविजिलेटर के रूप में नियुक्त किया गया था। अभियोजन पक्ष ने इस बयान के आधार पर तर्क दिया कि कोचिंग और स्कूल नेटवर्क ने परीक्षा स्टाफ को प्रभावित करने के तरीके पहले ही विकसित कर लिए थे।
दीक्षित पटेल ने इस सामग्री को चुनौती दी और कहा कि यह उसे 2024 के अपराध से नहीं जोड़ती है। हाई कोर्ट ने अप्रैल 2026 में उसे बरी करने से इनकार कर दिया और माना कि यह सामग्री गंभीर संदेह पैदा करती है जिसके लिए मुकदमा जरूरी है।
संजीव मुखिया पर शक था, लेकिन CBI ने उसके खिलाफ चार्जशीट फाइल नहीं की
संजीव कुमार सिंह उर्फ संजीव मुखिया शुरुआती जाँच के दौरान सबसे ज्यादा चर्चा में रहने वाले नामों में से एक बन गया था। बिहार की आर्थिक अपराध इकाई (EOU) ने उसे एक अंतर-राज्यीय सॉल्वर गिरोह के संदिग्ध सरगना के रूप में वर्णित किया था।
रिपोर्टों में कहा गया था कि जाँचकर्ताओं का मानना था कि कई राज्यों के परीक्षा-लीक नेटवर्क में उसके संपर्क थे। लगभग 11 महीनों तक फरार रहने के बाद, आखिरकार 25 अप्रैल 2025 को EOU ने उसे पटना के सगुना मोड़ के पास से गिरफ्तार कर लिया। बिहार सरकार ने उसकी गिरफ्तारी में मदद करने वाली जानकारी देने पर 3 लाख रुपए के इनाम की घोषणा की थी।
चूँकि बिहार जाँच के दौरान उसका नाम सामने आया था, इसलिए CBI ने उसे अपनी हिरासत में ले लिया। शुरुआती रिपोर्टों में कहा गया था कि उससे अंतर-राज्यीय संपर्कों और लॉजिस्टिक्स के बारे में पूछताछ की गई थी।
NEET मामले में अगस्त 2025 में मुखिया को डिफॉल्ट बेल मिल गई क्योंकि CBI ने 90 दिनों के भीतर उसके खिलाफ चार्जशीट दाखिल नहीं की थी। हालाँकि वह बिहार पुलिस के अन्य मामलों में हिरासत में ही रहा।
23 जुलाई 2026 को, CBI ने स्पष्ट किया कि उसे NEET-UG 2024 पेपर की चोरी या आगे के वितरण से जोड़ने वाला कोई सबूत नहीं मिला है। जाँच एजेंसी ने कहा कि उसने इसमें शामिल लोगों की पहचान कर ली है और 45 आरोपितों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल कर दी है। मुखिया उन आरोपितों में शामिल नहीं था।
बिहार के जाँचकर्ताओं को शुरुआत में संजीव मुखिया पर 2024 के लीक का नेतृत्व करने का संदेह था, लेकिन CBI ने बाद में कहा कि उसे पेपर चोरी या वितरण में उसकी भूमिका का कोई सबूत नहीं मिला और उसने उसके खिलाफ कोई चार्जशीट दाखिल नहीं की।
2024 का मामला कैसे राष्ट्रीय संकट बन गया
पटना का यह मामला एक गाड़ी, चार एडमिट कार्ड और ‘लर्न प्ले स्कूल’ से जुड़े उम्मीदवारों से शुरू हुआ था। लेकिन 4 जून 2024 को परिणाम घोषित होने के बाद यह एक राष्ट्रीय विवाद बन गया।
शुरुआत में 67 उम्मीदवारों को 720 में से 720 का परफेक्ट स्कोर मिला। इसके अलावा 718 और 719 अंकों पर भी सवाल उठाए गए, जो सामान्य मार्किंग स्कीम के तहत असामान्य लग रहे थे।
NTA ने कहा कि कुछ केंद्रों पर परीक्षा के समय का नुकसान होने के कारण 1563 उम्मीदवारों को प्रतिपूरक अंक दिए गए थे। ग्रेस-मार्क्स का विवाद और पटना-हजारीबाग पेपर चोरी के तथ्य भले ही अलग-अलग थे, लेकिन दोनों एक ही सार्वजनिक संकट का हिस्सा बन गए। 13 जून को केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया कि प्रतिपूरक अंकों को वापस ले लिया जाएगा।
इन 1563 उम्मीदवारों के पास दो विकल्प थे या तो वे बिना ग्रेस मार्क्स के अपना स्कोर स्वीकार करें या 23 जून को दोबारा परीक्षा में बैठें। इसने ग्रेस-मार्क्स के सवाल को तो सुलझा दिया, लेकिन पेपर लीक के भौगोलिक विस्तार का मुद्दा अभी भी बाकी था।
देश भर में छात्रों के विरोध प्रदर्शन फैल गए। कॉन्ग्रेस सहित राजनीतिक दलों और ABVP से जुड़े संगठनों ने जवाबदेही और व्यापक जाँच की माँग की। सरकार ने 21 जून को ‘लोक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम, 2024′ को लागू कर दिया। यह कानून संगठित नकल, पेपर लीक, इम्पर्सनेशन (डमी कैंडिडेट) और परीक्षा सामग्री तक अनधिकृत पहुँच के लिए सजा का प्रावधान करता है।
22 जून को शिक्षा मंत्रालय ने परीक्षा प्रक्रिया, डेटा सुरक्षा और NTA के कामकाज में सुधारों की सिफारिश करने के लिए ISRO के पूर्व अध्यक्ष के राधाकृष्णन की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया।
उसी वीकेंड पर NTA के डायरेक्टर जनरल सुबोध कुमार सिंह को पद से हटा दिया गया। केंद्र ने CBI को व्यापक साजिश और लोक सेवकों की भूमिका सहित इस पूरे मामले की विस्तृत जाँच करने को कहा।
सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार पूछा कि सुरक्षा में चूक कब हुई, यह कितनी दूर तक फैली और क्या दागी उम्मीदवारों को बाकी छात्रों से अलग किया जा सकता है। CBI के शुरुआती आकलन में करीब 155 संदिग्ध लाभार्थियों की पहचान की गई थी।
एजेंसी ने बाद में कहा कि लीक मुख्य रूप से हजारीबाग और पटना पर केंद्रित था, जहाँ से चुनिंदा उम्मीदवारों को अंतर-राज्यीय वितरण किया गया था। 23 जुलाई 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने पूरी परीक्षा को रद्द करने से इनकार कर दिया।
कोर्ट ने माना कि उस समय उपलब्ध सामग्री से यह साबित नहीं होता कि कोई ऐसी व्यवस्थागत चूक हुई थी जिसने देश भर में परीक्षा की पवित्रता को नष्ट कर दिया हो।
कोर्ट ने यह भी नोट किया कि ऐसा कोई सबूत नहीं है जिससे पता चले कि लीक हुआ पेपर सोशल मीडिया पर फैला था या बेकाबू संख्या में उम्मीदवारों तक पहुँचा था। कोर्ट ने कहा कि बिना किसी मजबूत तथ्यात्मक आधार के 23 लाख से अधिक उम्मीदवारों के लिए दोबारा परीक्षा का आदेश नहीं दिया जा सकता।
इसके बावजूद कोर्ट ने NTA प्रणाली में गंभीर विफलताओं की पहचान की। अपने अंतिम फैसले में कोर्ट ने पेपर तैयार करने, स्टोरेज, ट्रांसपोर्ट, सेंटर की सुरक्षा, पहचान के सत्यापन और अनियमितताओं से निपटने के लिए एक मजबूत मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) बनाने का आह्वान किया। ग्रेस-मार्क्स के फैसले और फिजिक्स के एक विवादित उत्तर के समाधान के बाद परफेक्ट स्कोर पाने वालों की संख्या 67 से घटकर 17 रह गई।
CBI ने पटना-हजारीबाग शाखा में 45 लोगों के खिलाफ पाँच चार्जशीट दाखिल कीं। जाँच को समझने के लिए अदालती आदेश ही मुख्य सार्वजनिक स्रोत बने। हालाँकि मुकदमा धीमी गति से आगे बढ़ा। फरवरी 2026 तक पटना मामले में अभी भी आरोप तय नहीं हो पाए थे और अभियोजन पक्ष ने 589 गवाहों की सूची पेश की थी।
सरकार ने राधाकृष्णन समिति की सिफारिशों को लागू करना शुरू कर दिया। इन उपायों में सरकारी संस्थानों को परीक्षा केंद्र के रूप में अधिक उपयोग करना, राज्य प्रशासनों के साथ मजबूत समन्वय, NTA में स्थायी कर्मचारियों की नियुक्ति, बेहतर केंद्र आवंटन, डिजिटल निगरानी और सुधार के लिए एक संचालन समिति शामिल थी।
केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण (CCPA) ने कोचिंग के भ्रामक विज्ञापनों के खिलाफ भी दिशानिर्देश जारी किए। इसने सफलता के झूठे दावों, जानकारी छिपाने और चयन की गारंटी देने पर रोक लगा दी। नवंबर 2024 तक, CCPA ने कहा कि उसने 45 कोचिंग सेंटरों के खिलाफ कार्रवाई शुरू की थी और 18 संस्थानों पर 54.6 लाख रुपए का जुर्माना लगाया था।
इन उपायों ने परीक्षा की सुरक्षा को मजबूत किया और भ्रामक विज्ञापनों पर रोक लगाई। हालाँकि वे एडमिशन कंसल्टेंट्स और छोटे काउंसलिंग नेटवर्कों के लिए एक पूर्ण ढाँचा तैयार नहीं कर सके।
रिपोर्टों के अनुसार, ‘करियर एकेडमी’ पारंपरिक क्लासरूम के बजाय काउंसलिंग और उम्मीदवारों को संभालने के जरिए काम करती थी। 2024 के इस नेटवर्क ने गेस्ट हाउस, होटल, निजी घरों, असली सर्टिफिकेट, कोरे चेक और थर्ड-पार्टी खातों का इस्तेमाल किया। बहरहाल, 2026 के लीक ने एक और भी बड़ी कमजोरी को उजागर कर दिया, जो कि विषय-विशेषज्ञ के स्तर पर गोपनीय पहुँच का होना था।
2026 का लीक एक गेस पेपर के अंदर छिपा था
NEET-UG 2026 की सुरक्षा में लगी यह सेंध पुलिस द्वारा किसी गाड़ी को रोकने के बाद उजागर नहीं हुई थी। इसका खुलासा तब हुआ जब सीकर के एक शिक्षक को 3 मई को परीक्षा की शाम को 150 पन्नों का एक हस्तलिखित गेस पेपर मिला।
यह दस्तावेज उनके मकान मालिक के बेटे के माध्यम से उन तक पहुँचा था, जो केरल में पढ़ाई कर रहा था। शिक्षक ने इसका मिलान वास्तविक प्रश्नपत्र से किया और बड़े पैमाने पर प्रश्नों के मिलने के बाद उन्होंने अधिकारियों से संपर्क किया।
7 मई को उन्होंने NTA, गृह मंत्रालय और CBI को इसकी जानकारी भेजी। NTA के अधिकारियों ने अगले दिन उनसे संपर्क किया और वह PDF प्राप्त की। रिपोर्टों के अनुसार, उस 150 पन्नों की सामग्री में लगभग 410 प्रश्न शामिल थे। उनमें से तकरीबन 120 प्रश्न 3 मई को आयोजित परीक्षा के केमिस्ट्री के पेपर में आए थे। बायोलॉजी के भी कुछ हिस्सों के प्रसारित होने का संदेह था।
2026 में NEET का पेपर कैसे लीक हुआ।
इसे गेस पेपर कहने से बचने का एक रास्ता मिल जाता था। गोपनीय प्रश्नों को विशेषज्ञों की भविष्यवाणी या उच्च संभावना वाले रिवीजन सेट के रूप में बेचा जा सकता था। राजस्थान के स्पेशल ऑपरेशंस ग्रुप (SOG) ने देहरादून, केरल और राजस्थान में संपर्कों के माध्यम से इस फाइल का पता लगाया।
इसने उन पेड डिजिटल ग्रुप्स की भी जाँच की जिनके जरिए यह सामग्री बेची गई थी। इस जाँच से यह साबित नहीं हुआ कि सीकर का हर कोचिंग संस्थान इसमें शामिल था। लेकिन इसने यह जरूर दिखाया कि एक गोपनीय दस्तावेज एक बड़े कोचिंग हब तक पहुँच गया था और रीसेल के एक बड़े बाजार में दाखिल हो चुका था।
NTA ने 8 मई को इस सामग्री को केंद्रीय एजेंसियों के पास भेज दिया। 12 मई को, इसने परीक्षा रद्द कर दी और मामला CBI को सौंप दिया। दोबारा होने वाली परीक्षा के लिए मौजूदा रजिस्ट्रेशन और सेंटर प्राथमिकताओं को ही आगे बढ़ा दिया गया। उम्मीदवारों को दोबारा रजिस्ट्रेशन करने या कोई अन्य शुल्क देने की आवश्यकता नहीं थी।
यह निर्णय 2024 से अलग था। सुप्रीम कोर्ट ने उस परीक्षा को बरकरार रखने की अनुमति दी थी क्योंकि सबूतों से यह नहीं पता चला था कि कोई ऐसा देशव्यापी लीक हुआ था जिसे संभालना असंभव हो। वहीं 2026 में NTA इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि नौ दिनों के भीतर ही यह साफ हो गया कि इस प्रभावित परीक्षा को बचाना संभव नहीं था।
CBI ने 2026 लीक का पता NTA द्वारा नियुक्त एक्सपर्ट्स से लगाया
CBI ने 12 मई को अपना मामला दर्ज किया और कई राज्यों में ठिकानों की तलाशी ली। उसने फोन, मैसेजिंग एप्लिकेशन, बैंक रिकॉर्ड और NTA के दस्तावेजों की जाँच की। जाँच एजेंसी का यह मामला 2024 की जाँच की तुलना में लीक के मुख्य स्रोत के बहुत करीब पहुँच गया।
पंकज कुमार ने परीक्षा की सुबह एक छपी हुई बुकलेट कॉपी की थी। वहीं 2026 में CBI ने कहा कि विषय-विशेषज्ञों ने हफ्तों पहले ही गोपनीय प्रश्नों तक पहुँच बना ली थी और उन्हें कोचिंग व काउंसलिंग नेटवर्कों तक पहुँचा दिया था।
13 मई को गिरफ्तार किए गए पहले पाँच लोग नासिक के शुभम खैरनार, जयपुर के मांगीलाल बीवाल, विकास बीवाल व दिनेश बीवाल और गुरुग्राम के यश यादव थे। खैरनार ‘एसआर एजुकेशन कंसल्टेंसी’ चलाता था, जो मेडिकल दाखिले के लिए मार्गदर्शन प्रदान करती थी।
CBI ने दिल्ली की एक अदालत को बताया कि उसने यादव को वितरण के लिए पेपर हासिल करने में मदद की थी। रिपोर्टों के अनुसार, यादव को 29 अप्रैल को टेलीग्राम के जरिए फिजिक्स, केमिस्ट्री और बायोलॉजी की PDF मिल गई थीं।
मांगीलाल बीवाल के बारे में कहा गया कि उसने अपने छोटे बेटे के लिए इस नेटवर्क से संपर्क किया था। इस सौदे के लिए बातचीत की कीमत 10 लाख रुपए से 12 लाख रुपए के बीच थी।
नेटवर्क कैसे काम करता था और NEET 2026 पेपर लीक में किसने क्या भूमिका निभाई।
पुणे की मनीषा वाघमारे और अहिल्यानगर के धनंजय लोखंडे को इसके बाद गिरफ्तार किया गया। CBI का कहना था कि लोखंडे ने वाघमारे से सामग्री प्राप्त की और उसे खैरनार को सौंप दिया, जिसने इसे आगे यादव तक पहुँचाने की व्यवस्था की।
वाघमारे मेडिकल काउंसलिंग और उम्मीदवारों को इकट्ठा करने (मोबिलाइजेशन) के काम से जुड़ी थी। एजेंसी ने बाद में बताया कि वह छात्रों को NTA द्वारा नियुक्त केमिस्ट्री और बायोलॉजी के विशेषज्ञों द्वारा ली जाने वाली विशेष क्लासों में लेकर आती थी।
15 मई को CBI ने केमिस्ट्री के लेक्चरर पी वी कुलकर्णी को गिरफ्तार किया गया और उसे केमिस्ट्री शाखा का मुख्य सरगना करार दिया। कुलकर्णी NTA की ओर से परीक्षा प्रक्रिया का हिस्सा रहा था और गोपनीय प्रश्नों तक उसकी सीधी पहुँच थी। अप्रैल के आखिरी हफ्ते के दौरान, उसने वाघमारे के माध्यम से जुटाए गए छात्रों के लिए अपने पुणे स्थित निजी आवास पर विशेष सत्र आयोजित किए।
CBI के मुताबिक, कुलकर्णी प्रश्नों, उनके विकल्पों और सही उत्तरों को बोलकर लिखवाता था। छात्र उन्हें अपनी कॉपियों में लिख लेते थे। रिपोर्टों के अनुसार, यह सामग्री 3 मई के प्रश्नपत्र से पूरी तरह मेल खाती थी।
इन क्लासों में शामिल होने के लिए छात्रों ने कई-कई लाख रुपए का भुगतान किया था। इस तरीके ने हर खरीदार को NTA का कोई पहचान योग्य आधिकारिक दस्तावेज दिए बिना ही, गोपनीय पहुँच को एक निजी कोचिंग प्रॉडक्ट में तब्दील कर दिया।
16 मई को जाँच एजेंसी ने सीनियर बॉटनी शिक्षिका मनीषा गुरुनाथ मंधारे को गिरफ्तार किया। CBI का कहना था कि उन्हें NTA विशेषज्ञ के रूप में नियुक्त किया गया था और बॉटनी व जूलॉजी के पेपरों तक उनकी मुकम्मल पहुँच थी।
उन्होंने भी अपने पुणे स्थित आवास पर विशेष क्लासें ली थीं। वाघमारे यहाँ भी उम्मीदवारों को लाने का काम कर रही थी। छात्र कॉपियों में प्रश्न लिखते थे और टेक्स्टबुक्स के जरूरी हिस्सों पर निशान लगाते थे। रिपोर्टों के मुताबिक, उन प्रश्नों में से अधिकांश परीक्षा में ज्यों के त्यों आए थे।
इस प्राइवेट-रेसिडेंस मॉडल ने किसी कोचिंग सेंटर के तौर पर दिखने वाले लेन-देन की गुंजाइश को खत्म कर दिया। एक रिक्रूटर अपने निजी संपर्कों का इस्तेमाल करता था, विशेषज्ञ एक छोटे से सशुल्क (पेड) समूह को पढ़ाता था और छात्र इस लीक को सामान्य नोट्स की तरह रिकॉर्ड कर लेते थे।
इस पूरे मामले में सबसे मजबूत और डायरेक्ट इंस्टीट्यूशनल लिंक 18 मई को तब सामने आया जब CBI ने लातूर में ‘आरसीसी कोचिंग इंस्टीट्यूट’ के मालिक शिवराज मोटेगांवकर को गिरफ्तार किया।
एजेंसी के अनुसार, RCC नौ शाखाओं का संचालन करता था और नीट उम्मीदवारों को कोचिंग देता था। मोटेगांवकर को कुलकर्णी का बेहद करीबी बताया गया। संस्थान और उसके घर की तलाशी में एक केमिस्ट्री क्वेश्चन बैंक मिला, जिसमें 3 मई की परीक्षा के प्रश्न शामिल थे।
CBI ने बाद में दिल्ली की एक अदालत को बताया कि मोटेगांवकर का बेटा आदित्य कुलकर्णी के उन्हीं सत्रों में शामिल हुआ था और उसने हस्तलिखित नोट्स तैयार किए थे।
जाँचकर्ताओं ने मोटेगांवकर द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे एक फोन से 36 तस्वीरें बरामद कीं, जिनमें से पाँच एक जैसी थीं। बाकी तस्वीरों में 132 हस्तलिखित केमिस्ट्री के प्रश्न थे और उनमें से करीब 111 प्रश्न NTA के मास्टर सेट से मेल खाते थे। रिपोर्टों के अनुसार, ये तस्वीरें परीक्षा से दस दिन पहले, यानी 23 अप्रैल को ही खींच ली गई थीं।
जाँच एजेंसी ने कहा कि यह लेन-देन लातूर के ‘सिद्धिविनायक अस्पताल’ में हुआ था, जिसे बाल रोग विशेषज्ञ (पीडियाट्रिशियन) डॉ मनोज भगवानराव शिरूरे चलाते हैं। शिरूरे को 26 मई को गिरफ्तार किया गया था।
राउज एवेन्यू जिला अदालत के 24 जुलाई के एक आदेश में CBI के इस दावे का जिक्र है कि शिरूरे ने अप्रैल के तीसरे हफ्ते के दौरान अस्पताल के एक डीलक्स कमरे में आदित्य मोटेगांवकर की कुलकर्णी से मुलाकात की व्यवस्था की थी।
एजेंसी ने अस्पताल के एक कर्मचारी के बयान का हवाला दिया, जिसे शिरूरे ने यह इंतजाम करने का जिम्मा सौंपा था। इसके मुताबिक इसी बैठक के जरिए आदित्य को परीक्षा से पहले केमिस्ट्री के प्रश्न हासिल करने का मौका मिला।
CBI का दावा था कि इस पहुँच को मुमकिन बनाने के बदले शिरूरे को शिवराज मोटेगांवकर की पत्नी से 5 लाख रुपए मिले थे। यह रकम 21 मई को शिरूरे की बहन के घर से बरामद की गई थी।
अदालती आदेश के अनुसार, बहन ने जाँचकर्ताओं को बताया कि शिरूरे ने पिछली रात ही उसे यह पैसे रखने के लिए दिए थे। एजेंसी ने यह भी कहा कि शिरूरे ने दो अन्य डॉक्टरों को भी कुलकर्णी के पास भेजा था।
उनके बच्चों को 3-3 लाख रुपए का भुगतान करने के बाद केमिस्ट्री के प्रश्न मिले थे और शिरूरे को उन भुगतानों का आधा हिस्सा (कमीशन के तौर पर) मिला था। संबंधित गवाहों के बयान BNSS की धारा 183 के तहत मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज किए गए।
अदालती आदेश में कहा गया है कि गवाहों ने कुलकर्णी द्वारा दिए गए उन 42 प्रश्नों की पहचान की जो NEET-UG के पेपर में आए थे। दूसरी तरफ शिरूरे के वकीलों का कहना था कि उनके मुवक्किल, उनके उपकरणों, घर या अस्पताल से कोई भी लीक प्रश्न बरामद नहीं हुआ है और उन्होंने उनके तथा इस 5 लाख रुपए के बीच के किसी भी संबंध को खारिज किया।
फिजिक्स शाखा की कड़ियाँ NTA द्वारा नियुक्त विशेषज्ञ मनीषा संजय हवलदार तक पहुँचीं। CBI के अनुसार, फिजिक्स के पेपर तक हवलदार की पूरी पहुँच थी और उन्होंने हस्तलिखित प्रश्न मंधारे को सौंपे थे।
उन्होंने कथित तौर पर पुणे में ‘डॉ अभंग प्रभु मेडिकल एकेडमी’ के फैकल्टी मेंबर तेजस हर्षदकुमार शाह को भी फिजिक्स के प्रश्न बोलकर लिखवाए थे। शाह पर इस सामग्री को एकेडमी से जुड़े छात्रों तक पहुँचाने का आरोप था।
उपलब्ध सामग्री इस कृत्य का जिम्मेदार शाह को ठहराती है, लेकिन यह साबित नहीं करती कि एकेडमी के मैनेजमेंट ने इसके लिए कोई आधिकारिक अनुमति दी थी। यह कानूनी अंतर बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी एक फैकल्टी मेंबर की कथित संलिप्तता को स्वतः ही पूरी संस्था के खिलाफ निष्कर्ष नहीं माना जा सकता।
मई के अंत तक, CBI ने खैरनार, मांगीलाल बीवाल, विकास बीवाल, दिनेश बीवाल, यश यादव, लोखंडे, वाघमारे, कुलकर्णी, मंधारे, मोटेगांवकर, हवलदार, शिरूरे और शाह सहित कुल 13 लोगों को गिरफ्तार कर लिया था।
सार्वजनिक रूप से उपलब्ध सामग्री विषय-स्तरीय तीन मुख्य स्रोतों की पुष्टि करती है, केमिस्ट्री के लिए कुलकर्णी, बायोलॉजी के लिए मंधारे और फिजिक्स के लिए हवलदार। यह आपस में जुड़े हुए बिचौलियों को तो दिखाता है, लेकिन अभी तक यह स्थापित नहीं करता कि किसी एक अकेले व्यक्ति ने इन तीनों शाखाओं को नियंत्रित किया था।
24 जुलाई को विशेष CBI अदालत ने शिरूरे की जमानत याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि जाँच अभी एक बेहद महत्वपूर्ण चरण में है और गवाहों को प्रभावित करने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
आदेश में यह भी दर्ज किया गया कि गिरफ्तार किए गए सभी 13 आरोपित उस समय न्यायिक हिरासत में थे। यह निष्कर्ष केवल जमानत की अर्जी तक ही सीमित था और इससे दोष का अंतिम फैसला नहीं हुआ था।
इस तरह 2026 का यह नेटवर्क सोर्स के बहुत ज्यादा करीब रहकर और कहीं अधिक समय के साथ काम कर रहा था। यह प्राइवेट क्लासों, हस्तलिखित नोट्स, गेस पेपर्स और टेलीग्राम के जरिए बिक्री की व्यवस्था करने में सक्षम था। इसमें परीक्षा के दिन सिर्फ पाँच घंटे की समय-सीमा के भीतर भाग-दौड़ करने वाले सॉल्वरों के किसी बड़े गिरोह की जरूरत बहुत कम थी।
दोबारा जाँच, सुप्रीम कोर्ट और सरकार का जवाब
NTA ने 21 जून को एक नए प्रश्नपत्र और नए विषय-विशेषज्ञों के साथ NEET-UG 2026 की परीक्षा दोबारा आयोजित की। इस कैन्सलैशन के कारण 22 लाख से अधिक प्रभावित उम्मीदवारों को दूसरी परीक्षा के लिए फिर से तैयारी करने पर मजबूर होना पड़ा।
NTA के अनुसार, 21 जून को आयोजित इस री-टेस्ट में लगभग 20 लाख उम्मीदवार शामिल हुए। रद्द की गई परीक्षा के उम्मीदवार बिना किसी नए रजिस्ट्रेशन या अतिरिक्त शुल्क के इसमें बैठने के पात्र थे। इसके परिणाम 16 जुलाई को जारी किए गए।
शिरूरे की जमानत सुनवाई के दौरान, CBI के अभियोजक ने कहा कि परीक्षा रद्द करने और दोबारा परीक्षा कराने से सरकारी खजाने को 600 करोड़ रुपए से अधिक का नुकसान हुआ। अभियोजक ने यह भी बताया कि नए प्रश्नपत्रों को परीक्षा केंद्रों तक हेलीकॉप्टर के जरिए पहुँचाना पड़ा था।
अदालती आदेश में इन बातों को अभियोजन पक्ष की दलीलों के रूप में दर्ज किया गया है, न कि अदालत द्वारा स्वतंत्र रूप से निकाले गए किसी सटीक निष्कर्ष के रूप में।
यह मामला दोबारा परीक्षा होने से पहले ही सुप्रीम कोर्ट पहुँच गया था। याचिकाकर्ताओं ने परीक्षा रद्द करने, उम्मीदवारों की सुरक्षा और इस तरह की घटना की पुनरावृत्ति को रोकने की NTA की क्षमता पर सवाल उठाए।
कोर्ट ने पूछा कि 2024 के बाद किए गए सुधारों से पर्याप्त संस्थागत सीख क्यों विकसित नहीं हो सकी। अदालत चाहती थी कि जाँच एजेंसी ऐसी शारीरिक और बौद्धिक क्षमता का प्रदर्शन करे जिससे भविष्य में ऐसी किसी अन्य चूक को रोका जा सके।
यह चिंता केवल तालों और CCTV कैमरों तक सीमित नहीं थी। 2024 के मामले ने उस समय की कमजोरियों को उजागर किया था जब छपे हुए प्रश्नपत्र परीक्षा केंद्र पर पहुँच चुके थे। वहीं 2026 के मामले ने दिखाया कि विशेषज्ञों के चयन और गोपनीयता की प्रणाली अभी भी असुरक्षित बनी हुई थी।
भविष्य के लिए एक स्थायी जोखिम प्रणाली बनाई जानी चाहिए जो यह रिकॉर्ड रखे कि किसके पास पहुँच थी, कौन सा नियंत्रण विफल रहा, क्या किसी विशेषज्ञ का कोचिंग से कोई संबंध था और भविष्य में इन जैसे चेतावनी संकेतों से कैसे निपटा जाना चाहिए।
29 मई की सुनवाई के दौरान, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट को बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व्यक्तिगत रूप से इस पूरी प्रतिक्रिया और दोबारा परीक्षा कराने की प्रक्रिया की निगरानी कर रहे थे।
परीक्षा रद्द होने के बाद देश भर में विरोध प्रदर्शन हुए, जो बाद में पेपर लीक, एनटीए और मंत्रालय की जवाबदेही को लेकर एक व्यापक आंदोलन में बदल गए। इस विवाद के कारण मानसून सत्र के दौरान संसद की कार्यवाही भी बाधित हुई।
विपक्ष के सांसदों ने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की माँग की, जबकि सरकार ने कहा कि वह बहस के लिए तैयार है लेकिन उसने इस्तीफे को बहस की पूर्व शर्त के रूप में स्वीकार करने से इनकार कर दिया।
23 जुलाई को पीएम मोदी ने घोषणा की कि पेपर लीक के मामलों के लिए फास्ट-ट्रैक कोर्ट स्थापित की जाएँगी। उन्होंने कहा कि छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने वालों को सख्त से सख्त सजा दी जाएगी।
यह घोषणा एक वास्तविक कमजोरी को दूर करने के उद्देश्य से की गई थी, क्योंकि 2024 के CBI मामले में पाँच चार्जशीट तो दाखिल हो चुकी थीं, लेकिन फरवरी 2026 तक उसका मुकदमा आरोप तय होने के चरण तक भी नहीं पहुँच पाया था।
इसके बाद प्रशासनिक बदलाव भी किए गए। हायर एजुकेशन सेक्रेटरी विनीत जोशी का तबादला कर दिया गया और उनके स्थान पर नरेश पाल गंगवार को नियुक्त किया गया। सरकार ने अतिरिक्त कदम उठाने का वादा किया।
रिपोर्टों में कहा गया कि 2027 से NEET-UG पूरी तरह से कंप्यूटर आधारित फॉर्मेट की ओर बढ़ेगा। 24 जुलाई को NTA ने 47 अधिकारियों को सेवा से बर्खास्त कर दिया।
Nothing is more important than the welfare and future of our youth!
We have decided to set up fast-track courts to ensure swift and stringent punishment for those involved in paper leaks. Have directed the concerned authorities and officials to take all necessary steps in this…
कंप्यूटर आधारित परीक्षा छपे हुए प्रश्नपत्रों, उनके परिवहन और OMR शीट से जुड़े जोखिमों को कम कर सकती है। लेकिन यह अपने आप में उस विशेषज्ञ को नहीं रोक सकती जिसके पास गोपनीय प्रश्नों तक पहले से पहुँच हो और वह उन्हें किसी कोचिंग नेटवर्क तक पहुँचा दे।
2026 की केंद्रीय कमजोरी कोई छपी हुई बुकलेट नहीं थी, बल्कि अंदरूनी लोगों, कोचिंग संचालकों और उम्मीदवारों के बीच काम करने वाले बिचौलियों के संबंध थे।
कोचिंग माफिया को तोड़ने के लिए क्या बदलना होगा?
पहला सुधार यह होना चाहिए कि गोपनीय परीक्षा कार्य और कोचिंग इंडस्ट्री के बीच एक सख्त फायरवॉल बनाई जाए। NTA के किसी भी विषय-विशेषज्ञ को प्रासंगिक गोपनीयता अवधि के दौरान निजी ट्यूशन पढ़ाने, पैसे लेकर विशेष कक्षाएँ लेने, कमीशन प्राप्त करने, सलाहकार के रूप में काम करने, किसी कोचिंग व्यवसाय के साथ कमाई साझा करने या किसी करीबी रिश्तेदार द्वारा नियंत्रित संस्थान के माध्यम से काम करने की अनुमति नहीं होनी चाहिए।
केवल कागज पर घोषणा कर देना ही काफी नहीं है। NTA को कंपनी के रिकॉर्ड, प्रोफेशनल प्रोफाइल, भुगतान के लेन-देन और घोषित जुड़ावों का सत्यापन करना चाहिए।
जब तक कार्य के लिए आवश्यक न हो, किसी भी विशेषज्ञ के पास पूरे विषय के प्रश्नपत्र तक पहुँच नहीं होनी चाहिए। प्रश्न तैयार करने, समीक्षा, अनुवाद, मॉडरेशन और अंतिम चयन के काम को अलग-अलग हिस्सों में बांटा जाना चाहिए।
सिस्टम में यह रिकॉर्ड दर्ज होना चाहिए कि प्रत्येक प्रश्न तक किसने और कब पहुँच बनाई, किस डिवाइस का उपयोग किया गया, क्या इसे प्रिंट या डाउनलोड किया गया था, उत्तर को किसने मंजूरी दी और इसे मास्टर सेट में कब शामिल किया गया। किसी भी असामान्य पहुँच पर एक ऑटोमैटिक अलर्ट जारी होना चाहिए।
कोचिंग सेंटरों और एडमिशन कंसल्टेंसी दोनों का अनिवार्य रजिस्ट्रेशन होना चाहिए। 2024 का मामला दिखाता है कि केवल बड़े क्लासरूम के आधार पर तय की गई परिभाषा क्यों अपर्याप्त है।
एक ऐसा व्यवसाय जो उम्मीदवारों को तैयार करता है, मेडिकल काउंसलिंग की सुविधा देता है, दस्तावेज इकट्ठा करता है, सीटें दिलाने का दावा करता है या परिवारों और कॉलेजों के बीच बिचौलिये के रूप में काम करता है, उसे नियामक प्रणाली रेगुलेटरी सिस्टम के दायरे में आना चाहिए, भले ही वह 50 से कम छात्रों को पढ़ाता हो।
स्वामित्व और वित्त पूरी तरह से पारदर्शी होने चाहिए। नियामकों को प्रमोटरों, निदेशकों, ट्रस्टियों, संबंधित कंपनियों, अधिकृत हस्ताक्षरकर्ताओं और वास्तविक मालिकों की जानकारी होनी चाहिए। यही जानकारी सभी राज्यों में आपस में जुड़ी होनी चाहिए ताकि एक अधिकार क्षेत्र में प्रतिबंधित किया गया प्रमोटर किसी दूसरी कंपनी या रिश्तेदार के माध्यम से दोबारा काम शुरू न कर सके।
गारंटीड सिलेक्शन, कन्फर्म एमबीबीएस एडमिशन या 100 प्रतिशत सफलता जैसे वादे केवल उपभोक्ता-विज्ञापन नोटिस तक सीमित नहीं रहने चाहिए। ऐसे दावे डमी कैंडिडेट, पेपर तक पहुँच, OMR में हेरफेर या अवैध रूप से सीट की व्यवस्था करने का संकेत हो सकते हैं।
उपभोक्ता प्राधिकरणों, NTA और राज्य पुलिस द्वारा संचालित एक कॉमन प्लेटफॉर्म को असामान्य रूप से अधिक फीस, असली सर्टिफिकेट की माँग, कोरे चेक, परीक्षा शहर बदलने के निर्देश, अंकों से जुड़े भुगतान, सटीक प्रश्नों का वादा करने वाले निजी सत्रों और डमी उम्मीदवारों की व्यवस्था करने के प्रस्तावों को चिन्हित करना चाहिए।
गोधरा मामला दिखाता है कि केंद्र आवंटन में हेरफेर करने के लिए आवेदन डेटा का उपयोग कैसे किया जा सकता है। एक ही जिले में अपना वर्तमान पता बदलने वाले, एक ही शहर को चुनने वाले और एक असामान्य भाषा कॉम्बिनेशन चुनने वाले उम्मीदवारों के समूह की समीक्षा केंद्रों के आवंटन से पहले की जानी चाहिए।
इसका मतलब यह नहीं है कि उन्हें दोषी मान लिया जाए, बल्कि इससे मानवीय सत्यापन की प्रक्रिया शुरू होनी चाहिए। जब सबूत स्वयं संस्थान तक पहुँचें, तो कोचिंग संस्थानों की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।
जहाँ कोई मालिक या निदेशक इसमें भाग लेता है, संस्थागत खातों में पैसा आता है, परिसरों का जानबूझकर उपयोग किया जाता है, संगठन के माध्यम से गोपनीय प्रश्न बांटे जाते हैं या प्रबंधन विश्वसनीय चेतावनियों को नजरअंदाज करता है, वहाँ रजिस्ट्रेशन रद्द करने, कमाई को जब्त करने और दीर्घकालिक प्रतिबंध लगाने जैसे कदम उठाए जाने चाहिए।
जवाबदेही फिर भी सबूतों के आधार पर ही तय होनी चाहिए। RCC का मामला अधिक मजबूत रिपोर्ट किए गए आधार पर खड़ा है क्योंकि उसके मालिक को गिरफ्तार किया गया था और उससे जुड़े उपकरणों व परिसरों से सामग्री बरामद की गई थी।
तेजस शाह के कृत्य से स्वचालित रूप से यह साबित नहीं हो जाता कि डॉ अभंग प्रभु मेडिकल एकेडमी के प्रबंधन को फिजिक्स पेपर ट्रांसफर किए जाने के बारे में पता था।
उम्मीदवारों के डेटा को भी सुरक्षा की आवश्यकता है। कोचिंग सेंटर और सलाहकार परीक्षा के अंक, पारिवारिक आय, पसंदीदा कॉलेज, फोन नंबर, पते, पहचान दस्तावेज और परिवार की भुगतान करने की क्षमता के बारे में जानकारी रखते हैं।
यह डेटाबेस भ्रष्ट एजेंटों को हताश या आर्थिक रूप से सक्षम लक्ष्यों की पहचान करने में मदद करता है। छात्रों की जानकारी स्पष्ट सहमति के बिना दाखिला एजेंटों के साथ बेची या साझा नहीं की जानी चाहिए। नियामकों को ऑडिट करना चाहिए कि असली सर्टिफिकेट और पहचान दस्तावेज कैसे एकत्र और संग्रहीत किए जाते हैं।
एक सुरक्षित व्हिसलब्लोअर प्रणाली भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। 2026 का मामला इसलिए सामने आया क्योंकि एक शिक्षक ने गेस पेपर की जाँच की और अधिकारियों से संपर्क किया। शिक्षकों, कोचिंग कर्मचारियों, छात्रों और परीक्षा कर्मियों को एक सुरक्षित पोर्टल के माध्यम से संदिग्ध पेपर, स्क्रीनशॉट और भुगतान की माँगों को जमा करने में सक्षम होना चाहिए।
इस पोर्टल को सामग्री का टाइमस्टैम्प दर्ज करना चाहिए, मूल फाइल को सुरक्षित रखना चाहिए, पहचान की रक्षा करनी चाहिए और NTA व एक स्वतंत्र जाँच इकाई दोनों को अलर्ट करना चाहिए। प्रतिशोध के खिलाफ सुरक्षा आवश्यक है। जहाँ विश्वसनीय जानकारी किसी देशव्यापी परीक्षा को प्रभावित होने से बचाती है, वहाँ वित्तीय इनाम देना भी उचित हो सकता है।
वित्तीय जाँच पहली गिरफ्तारी के साथ ही शुरू हो जानी चाहिए। 2024 में CBI ने माता-पिता, बिचौलियों, कर्मचारियों, रिश्तेदारों, कंपनियों और थर्ड-पार्टी खातों के माध्यम से भुगतानों का पता लगाया था।
जाँचकर्ताओं को संदिग्ध फंडों को फ्रीज करना चाहिए, पेमेंट ऐप्स और कंपनी के रिकॉर्ड की जाँच करनी चाहिए और इस कमाई से खरीदी गई संपत्ति की पहचान करनी चाहिए। मुनाफे को जब्त करना किसी बदले जा सकने वाले स्थानीय हैंडलर को गिरफ्तार करने की तुलना में इस व्यावसायिक मॉडल को अधिक प्रभावी ढंग से नुकसान पहुँचा सकता है।
फास्ट-ट्रैक अदालतों को केवल रिमांड और जमानत याचिकाओं पर तेजी से कार्रवाई करने के बजाय मुकदमों को पूरा करना चाहिए। एक नामित अदालत को एक समेकित (consolidated) डिजिटल चार्जशीट, एक स्पष्ट भूमिका चार्ट, सत्यापित घटनाक्रम, वित्तीय-प्रवाह आरेख, डिवाइस के स्वामित्व का रिकॉर्ड और आवश्यक गवाहों की एक सीमित सूची मिलनी चाहिए।
एक ही FIR का वर्णन करने के लिए किसी मामले में सैकड़ों बार-बार आने वाले गवाहों की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। समय-समय पर सार्वजनिक केस-स्टेटस की जानकारी मिलने से प्रभावित छात्रों को भी यह जानने में मदद मिलेगी कि क्या आरोप तय हो चुके हैं और सबूतों को दर्ज करने की प्रक्रिया शुरू हो गई है।
तरीका बदल गया, लेकिन बाजार बच गया
2024 और 2026 के मामलों में अलग-अलग तौर-तरीकों का इस्तेमाल किया गया था। 2024 में ओएसिस स्कूल पहुँचने के बाद प्रश्नपत्र को एक सीलबंद बक्से से निकाला गया था।
राज गेस्ट हाउस में MBBS छात्र इसे हल करने के लिए इंतजार कर रहे थे। दाखिला एजेंटों ने पहले से ही अलग-अलग शहरों में उम्मीदवारों को इकट्ठा कर लिया था। यह पूरा ऑपरेशन स्पीड, परिवहन, प्रिंटर और स्थानीय हैंडलर पर निर्भर था।
2026 में CBI ने कहा कि परीक्षा से पहले ही प्रश्नपत्र के सवाल विषय-विशेषज्ञों से बाहर आ गए थे। सुबह-सुबह की जाने वाली जल्दबाजी वाली गतिविधियों की जगह निजी कक्षाओं, हस्तलिखित नोट्स, गेस पेपर्स, टेलीग्राम फाइलों और कोचिंग नेटवर्क ने ले ली थी।
इस लीक को पढ़ाई का रूप देकर आसानी से छिपाया जा सकता था और इसे एक सामान्य रिवीजन शेड्यूल में शामिल किया जा सकता था। यह तरीका इसलिए विकसित हुआ क्योंकि इसका बाजार मौजूद था। माता-पिता अभी भी पैसे देने के लिए तैयार थे। कंसलटेंट अभी भी उनकी पहचान कर सकते थे। कोचिंग संचालकों के पास उम्मीदवारों का एक बड़ा आधार था। इनसाइडर अभी भी गोपनीय सामग्री बेच सकते थे।
परीक्षा केंद्रों को सुरक्षित करने से एक रास्ता बंद हो सकता है। कंप्यूटर आधारित परीक्षा से दूसरा रास्ता बंद हो सकता है। व्यक्तिगत रूप से शिक्षकों को गिरफ्तार करने से कुछ समय के लिए यह श्रृंखला टूट सकती है। लेकिन इनमें से कोई भी कदम तब तक पर्याप्त नहीं होगा जब तक कि अंदरूनी लोगों, कोचिंग संचालकों, सलाहकारों और उम्मीदवारों को जोड़ने वाले इस पूरे व्यावसायिक नेटवर्क को खत्म नहीं कर दिया जाता।
कोई प्रश्नपत्र अपने आप किसी गोपनीय प्रणाली से निकलकर पैसे देने वाले उम्मीदवारों तक नहीं पहुँचता। 2024 में इस ऑपरेशन के लिए स्कूल के अधिकारियों, ट्रंक खोलने में सक्षम व्यक्ति, MBBS सॉल्वरों, गेस्ट-हाउस संचालकों, उम्मीदवारों को इकट्ठा करने वाले रिक्रूटर्स, प्रिंटर, ट्रांसपोर्टर्स और पैसों का लेन-देन संभालने वालों की आवश्यकता थी।
2026 में इसके लिए NTA से जुड़े विशेषज्ञों, निजी कोचिंग सत्रों, काउंसलिंग बिचौलियों, कोचिंग फैकल्टी और डिजिटल रीसेलर्स की जरूरत थी। जो व्यक्ति पेपर चुराता है या उसे लीक करता है, वह केवल पहला सप्लायर होता है।
कोचिंग माफिया उस पेपर को व्यावसायिक मूल्य प्रदान करता है। उसे पता होता है कि उम्मीदवार कहाँ मिलेंगे और कौन से परिवार इसके लिए भुगतान करेंगे। वह केंद्रों, दस्तावेजों, यात्रा और विशेष कक्षाओं की व्यवस्था कर सकता है। वह चुराए गए प्रश्नों को संभावित प्रश्नों के रूप में पेश कर सकता है और भुगतानों को कंसलटेंसी, ट्रस्टों व निजी खातों के माध्यम से रूट कर सकता है।
सरकार ने इसके लिए एक समर्पित कानून पेश किया है, परीक्षा प्रक्रियाओं का पुनर्गठन किया है, CBI जाँच के आदेश दिए हैं और फास्ट-ट्रैक कोर्ट की घोषणा की है। ये उपाय आवश्यक हैं। अगला कदम उन शिक्षा व्यवसायों को निशाना बनाना होना चाहिए जो गोपनीय पहुँच को एक बिकने वाले उत्पाद में बदल देते हैं।
कोचिंग सेंटरों और एडमिशन कंसलटेंसी का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य होना चाहिए। उनके स्वामित्व और वित्त का खुलासा होना चाहिए। NTA के विशेषज्ञों को निजी कोचिंग संबंधों से पूरी तरह दूर रखा जाना चाहिए।
प्रश्नों तक पहुँच को विभाजित किया जाना चाहिए और इसे डिजिटली ट्रेस करने योग्य बनाया जाना चाहिए। जो संस्थान जानबूझकर इसमें भाग लेते हैं, उन्हें काम करने का अधिकार खो देना चाहिए। अन्यथा परीक्षा प्राधिकरण पिछले लीक से लड़ता रहेगा जबकि कोचिंग माफिया अगले नए तरीके की तैयारी कर रहा होगा।
जिन कोर्ट डॉक्यूमेंट्स और FIR पर यह रिपोर्ट आधारित है, उन्हें इस लिंक से देखा जा सकता है।
(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)