Home Blog Page 6

गुजरात में चाँदीपुरा वायरस से 3 बच्चों की मौत, स्वास्थ्य विभाग हाई अलर्ट पर: जानिए कहाँ आई है ये खतरनाक बीमारी और कैसे कर सकते हैं बचाव

गुजरात के उत्तर और मध्य जिलों में चाँदीपुरा वायरस की दस्तक से राज्य का स्वास्थ्य विभाग पूरी तरह अलर्ट हो गया है। स्वास्थ्य मंत्री प्रफुल्ल पानसेरिया ने बताया है कि इस वायरस की वजह से अब तक 3 बच्चों की जान जा चुकी है। जिन बच्चों की रिपोर्ट पॉजिटिव आई थी, उनमें से 2 वडोदरा और गोधरा के रहने वाले थे, जबकि एक बच्चा राजस्थान का था।

राजस्थान के इस बच्चे को इलाज के लिए हिम्मतनगर के सिविल अस्पताल में भर्ती कराया गया था। राहत की बात यह है कि सरकार और डॉक्टरों की टीमें जमीन पर उतरकर स्थिति को संभालने में जुटी हैं। प्रभावित इलाकों में संदिग्ध मरीजों की लगातार जाँच की जा रही है। स्वास्थ्य मंत्री ने लोगों से अपील की है कि वे घबराएँ नहीं बल्कि थोड़ी सावधानी बरतें।

क्या है यह चाँदीपुरा वायरस

चाँदीपुरा एक बहुत ही तेजी से फैलने वाला संक्रामक वायरस है। यह वायरस मुख्य रूप से ‘रैब्डोवायरस’ परिवार से ताल्लुक रखता है। जब यह वायरस किसी के शरीर में जाता है, तो यह खून के रास्ते सीधे दिमाग पर हमला करता है। दिमाग पर असर होने के कारण यह वहाँ सूजन पैदा कर देता है।

डॉक्टरों की भाषा में इस गंभीर स्थिति को ‘एन्सेफलाइटिस’ या ‘एक्यूट एन्सेफलाइटिस सिंड्रोम’ कहा जाता है। यह बीमारी इतनी खतरनाक है कि इसमें लक्षण बहुत तेजी से उभरते हैं। कई बार तो मरीज की हालत महज 24 से 48 घंटे के भीतर ही बहुत ज्यादा गंभीर हो जाती है।

आखिर कैसे फैलता है यह संक्रमण

चाँदीपुरा वायरस मुख्य रूप से ‘सैंड फ्लाई’ यानी रेतीली मक्खी के काटने से इंसानों में फैलता है। यह बहुत ही छोटी और खून चूसने वाली मक्खी होती है। कुछ जाँचों में यह भी सामने आया है कि टिक्स और मच्छरों के जरिए भी यह आगे बढ़ सकता है। राहत की बात यह है कि यह वायरस एक इंसान से दूसरे इंसान में नहीं फैलता है।

यानी अगर कोई मरीज खाँसता या छींकता है, तो पास बैठे दूसरे व्यक्ति को इससे कोई खतरा नहीं होता है। चूंकि यह मक्खियों और मच्छरों के काटने से होता है, इसलिए मानसून के मौसम में जब नमी बढ़ती है, तब इसका खतरा और ज्यादा बढ़ जाता है।

सबसे पहले कहाँ मिला था और कैसे पड़ा चाँदीपुरा नाम

यह कोई बिल्कुल नया वायरस नहीं है। भारत में सबसे पहले साल 1965 में इस वायरस की पहचान की गई थी। महाराष्ट्र में एक जगह है जिसका नाम चाँदीपुरा है। सबसे पहली बार इसके मरीज इसी चाँदीपुरा गाँव में मिले थे। इसी वजह से डॉक्टरों और वैज्ञानिकों ने इस जगह के नाम पर ही इस वायरस का नाम ‘चाँदीपुरा वायरस’ रख दिया था। तब से लेकर अब तक देश के अलग-अलग हिस्सों में समय-समय पर इसके मामले सामने आते रहे हैं। इस बीमारी का सबसे ज्यादा असर 15 साल से कम उम्र के बच्चों पर देखने को मिलता है।

इस बीमारी के मुख्य लक्षण क्या हैं

चाँदीपुरा वायरस के लक्षण अचानक और बहुत तेजी से दिखाई देते हैं। इसमें बच्चे को बहुत तेज बुखार आता है, जो 102 डिग्री से भी ऊपर जा सकता है। इसके साथ ही तेज सिर दर्द, लगातार उल्टी होना, बहुत ज्यादा कमजोरी और सुस्ती आना इसके शुरुआती लक्षण हैं।

जैसे-जैसे संक्रमण बढ़ता है, बच्चे को दौरे पड़ने लगते हैं, शरीर में अकड़न आ जाती है और वह बेहोश भी हो सकता है। कुछ मामलों में बच्चों को सांस लेने में भी दिक्कत होने लगती है। अगर बच्चे में ऐसा कोई भी लक्षण दिखे, तो बिना देर किए उसे डॉक्टर के पास ले जाना चाहिए।

क्या है इसका इलाज और बचाव के तरीके

आपको बता दें कि चाँदीपुरा वायरस के लिए अभी तक दुनिया में कोई विशेष टीका या पक्की दवा नहीं बनी है। अस्पताल में डॉक्टर मरीज के लक्षणों को देखकर ही उसका इलाज करते हैं। बुखार कम करने की दवा दी जाती है और दौरे को रोकने के लिए जरूरी कदम उठाए जाते हैं।

शरीर में पानी की कमी न हो, इसके लिए ग्लूकोज चढ़ाया जाता है और जरूरत पड़ने पर ऑक्सीजन भी दी जाती है। इससे बचाव का सबसे अच्छा तरीका यही है कि हम अपने आसपास सफाई रखें। बच्चों को पूरी आस्तीन के कपड़े पहनाएँ, सोते समय मच्छरदानी का इस्तेमाल करें और घर के आसपास पानी या कचरा जमा न होने दें।

FIFA World Cup में मोरक्को को हराकर सेमीफाइनल में फ्रांस, एमबाप्पे और डेंबेले ने दागे शानदार गोल: अब बेल्जियम का सामना स्पेन के रेड डेविल्स से

“कहो काफ्का, कैसे हो? चहा पिला दूँ एक?”

सारा नैनीताल उसे काफ्का कांडपाल के नाम से जानने वाला हुआ। काफ्का कांडपाल जान ठैरा नैनीताल के लिटरेचर प्रेमियों की। कुमाऊँ विश्वविद्यालय के तमाम युवा लड़के जिनके हार्मोन्स ने विश्वविद्यालय की विश्वविख्यात युवतियों को देख देख कर उछाल मारना सीखा ही था, उससे प्रेम पत्र लिखाने आया करते। वो उन प्रेम पत्रों में संपूर्ण जग का प्रेम निचोड़ कर भर देता।

काफ्का कांडपाल का लिखा खत हो और लड़की ने हाँ न की हो, ऐसा कोई वाकया अबतक नैनीताल की पहाड़ियों ने नहीं देखा था। जिस जिस की बात विश्वविद्यालय को जाती कच्ची सड़क से मॉल रोड पर प्रेमिका संग टहलने तक पहुँच जाती वह काफ्का कांडपाल को महँगी शराब पिलाता। और भला क्या ही चाहिए ठैरा काफ्का कांडपाल को फिर। बताते तो यहाँ तक हैं कि पंचानबे के नेट जेआरएफ, कुमाऊँ विश्वविद्यालय के भौतिकी के कड़क प्रोफेसर पांडे ने भी गणित की मैडम को काफ्का कांडपाल के लिखें खतों द्वारा ही कैपिटल सिनेमा में साथ फिल्म देखने के लिए राजी किया था।

शहर के छात्र नेता उससे छुप कर मिला करते। वो उससे चुनाव के लिए भाषण लिखवाते। नैनीताल के खपे पुराने कम्युनिस्ट नेता हों या बीजेपी-कॉन्ग्रेस के छात्र काडर के युवा नेता, सभी पार्टियों वाले उससे अकेले में मिल भाषण लिखवा कर मंच पर बोलने की कला सीखा करते। मंच पर चढ़कर काफ्का कांडपाल का लिखा भाषण पढ़ता छात्र नेता किसी नैपोलियन सा ही प्रतीत होता। काफ्का कांडपाल का लिखा भाषण लहरों को मोड़ देने का दमखम रखता था।

काफ्का कांडपाल अच्छी खासी कमेंट्री भी कर लेने वाला ठैरा। उसकी आवाज में अलग ही जादू जो हुआ। उसके पास शब्दों का अनमोल भंडार होने वाला ठैरा। नैनीताल की ठंडी हवाओं में हॉकी और फुटबॉल को लेकर अलग ही पागलपन बहने वाला ठैरा। लोग पागल ठैरे इन खेलों के लिए। जब भी सैनिक स्कूल या सेंट जोसेफ की स्कूल टूर्नामेंट में उतरती, हाड कंपाने वाली ठंड हों या बरसात, हजारों की संख्या में लोग बच्चों का मैच देखने पहुँचते।

जब भी नैनीताल की झील से लगे बड़े मैदान में क्रिकेट या फुटबॉल के मैच खेले जाने वाले हुए, काफ्का कांडपाल ही कमेंट्री के लिए सबकी पहली पसंद होने वाला हुआ। मैच शुरू होते ही काफ्का कांडपाल अपनी अंग्रेजी की रानीखेत एक्स्प्रेस दौड़ा देता। क्या जो शब्द, क्या जो आवाज का उतार चढ़ाव होने वाला हुआ ठैरा; अहा!

काफ्का कांडपाल अब बूढ़ा हो गया है। काफ्का कांडपाल अब चीज़ें भूलने लगा है। पिछले शनिवार वो लौटते वक्त टम्टा जी के घर को अपना घर समझ,वहाँ जाकर चारपाई पर लेट गया था। फिर टम्टा जी का बड़ा लड़का उन्हें घर छोड़ कर आया। बूढ़ा हो जाने पर लोग आपको भूलने लग जाते हैं। नैनीताल अब काफ्का कांडपाल को भुलाने लगा है। नैनीताल की नई पौध अपने हीरे को नहीं पहचानती। मगर, पुराने लोग इस हीरे का मोल बखूबी जानते हैं।

काफ्का कांडपाल रोज सुबौ उठ के घर से झील का रास्ता पकड़ कर तल्लीताल को आता है। वहाँ आकर वो बस अड्डे के पास चाह की गुमटी पर जाकर चाह और एक ‘इंडियन एक्सप्रेस’ अखबार लेकर झील किनारे धूप के टुकड़े इकट्ठा करने बैठ जाता है।

झील किनारे तफरीह करने वाले उम्रदराज लोग उसको घेर लेते हैं। वो सभी जानते हैं बूढ़ा होता जा रहा काफ्का कांडपाल एक रोज सब भूल जाएगा, मगर वो अपने पसंदीदा लेखकों का लिखा साहित्य कभी नहीं भूलेगा। वह फुटबॉल का मोह आज भी नहीं छोड़ सका है। लोगों को

काफ्का कांडपाल, उनके जिद करने पर, उन्हें बार्सिलोना, रियाल मैड्रिड, मैनचेस्टर यूनाइटेड आदि क्लबों के मैचों के किस्से सुनाया करता है।। फिर इधर उधर की बातें चलती हैं। बस अड्डे पर चाय बेचने वाले नेगी की चांदी हो जाती है। यह बुड्ढे ही रोज पांच सौ की चाय उससे पी जाते हैं। यूँ ही, झील किनारे, एक और दिन फुटबॉल की बातों के साथ ढल जाता है।

खैर, नैनीताल और उसके फुटबॉल प्रेम की बात फिर कभी। आज अब आगे बात कर लेते हैं फीफा विश्व कप के क्वार्टर फाइनल दौर के मुकाबलों की।

बीती रात बोस्टन स्टेडियम में पहला क्वार्टर फाइनल मुकाबला खेला गया जहाँ शानदार फॉर्म में चल रही मोरक्को का सामना था पिछले संस्करण की उपविजेता फ्रांस से। तमाम फुटबॉल पंडितों को उम्मीदें थी कि मोरक्को अंत तक हार न मानने का जज़्बा लिए मैदान में उतरेगी और फ्रांस को कठोर टक्कर देगी। दोनों ही टीमें पिछले विश्व कप में भी दोनों ही टीमें सेमीफाइनल में आमने-सामने थीं।

फ्रेंच कोच दीदीएर देशाँ ने अपनी टीम को 4-2-3-1 की फॉर्मेशन में मैदान पर उतारा। अटैकिंग लाइन में थे घातक फॉर्म में चल रहे एमबाप्पे, डेंबेले व युवा सनसनी देसिरे दोउ। मिडफील्ड का जिम्मा संभाला था माइकल ओलीस़ संग आद्रियन राबियो और मानू कोने ने। रक्षापंक्ति में सलिबा संग उपामेकानो, जूल्स कूंदे व लुका डीने मौजूद थे। मोरक्को भी इस ही फॉर्मेशन के साथ मैदान पर उतरी थी। पिछले मैचों में बेहद जुझारू फुटबॉल खेली थी इस टीम ने। अचरफ हाकीमी के नेतृत्व में मोरक्को का हर खिलाड़ी मैदान में अपना सबकुछ झोंक देता है। प्रमुख रेफरी फाकुन्दो टेल्लो से इशारा मिलते ही पहले क्वार्टर फाइनल मुकाबले की शुरुआत हो जाती है।

लेस ब्ल्यूज़ शुरुआत से ही लगातार हमले करने लगती है। देसिरे दोउ गोल की दिशा में एक जोरदार शॉट लगाते हैं। ऐसे ही लगातार फ्रेंच टीम बारम्बार गोल मारने के प्रयास कर रही थी। जल्द ही इन प्रयासों का फायदा मिलता भी दिखता है।

एक फाउल के चलते मैच के पच्चीसवें मिनट में फ्रांस को पेनाल्टी दे दी जाती है। शांत चित्त से कीलिएन एमबाप्पे पेनाल्टी स्पॉट की दिशा में बढ़ते हैं। वह पेनाल्टी लेने के लिए तैयार थे। सामने गोलपोस्ट पर अनुभवी गोलकीपर यासीन बोनू खड़े थे। रेफरी व्हिस्ल बजाते हैं। एमबाप्पे किक लेने के लिए दौड़ लगाते हैं। वह गोलपोस्ट की बांई ओर जोरदार किक लगाते हैं। लेकिन मोरक्को के सजग प्रहरी यासीन बोनू इस किक को गोलपोस्ट के भीतर जाने से रोका लेते हैं। आश्चर्यजनक तरीके से एमबाप्पे पेनाल्टी मिस कर चुके थे। खैर खेल आगे बढ़ता है। जूल्स कूंदे व माइकल ओलीस़ फिर फ्रांस को बढ़त दिलाने के लिए कोशिश करते हैं परन्तु उन्हें सफलता नहीं मिलती। पहले हाफ की समाप्ति तक स्कोर 0-0 ही था।

दूसरे हाफ में भी फ्रेंच तूफान जारी रहता है। नतीजतन साठवें मिनट में स्टार खिलाड़ी कीलिएन एमबाप्पे एक बेहद खूबसूरत गोल लगा देते हैं। देसिरे दोउ से गेंद मिलते ही वह खूबसूरत अंदाज में गोलपोस्ट की टॉप-लेफ्ट दिशा में एक किक जड़ते हैं। अब की दफा गोलकीपर यासीन बोनू के पास एमबाप्पे की किक का कोई जवाब नहीं था।

छह मिनट पश्चात डेंबेले अकेले ही गेंद लेकर आगे बढ़ते हैं व बॉक्स के बाहर से ही गोलपोस्ट की बाँई ओर शॉट लगाते हैं। यासीन बोनू एक दफा फिर अपने बाँई ओर गोल का चुके थे। छह मिनटों में दागे गए दो गोलों के चलते स्कोर 2-0 हो गया था।

फ्रांस ने इस मैच में यासीन बोनू के गोलपोस्ट की दिशा में बाइस दफा शॉट लगाए जिसमें से नौ शॉट निशाने पर रहे। पिछले विश्व कप की ही भांति एक बार फिर फ्रांस ने मोरक्को को 2-0 से पटखनी दे दी थी। फ्रांस इस जीत के साथ सेमीफाइनल में जगह बना चुका था। लेस ब्ल्यूज़ का विजय रथ रोकने वाला हर प्रयास अबतक बेअसर ही साबित हुआ है।

अब आज देर रात भारतीय समयानुसार साढ़े बारह बजे बेहतरीन फॉर्म में चल रही बेल्जियम की टीम 2010 विश्व कप की विजेता स्पेन के सामने खड़े होगी। दांव पर होगी पिछले संस्करण की उपविजेता फ्रांस के खिलाफ सेमीफाइनल की एक सीट।

लॉस एंजेलिस स्टेडियम में होने जा रहे इस मैच में एक ओर बेल्जियम है जो धीमी शुरुआत के बाद अब अपने पिछले तीन मैचों में बारह गोल दाग चुकी है। चार्ल्स डि किटिलीरी, कप्तान यूरी टीलमान्स व लियान्द्रो ट्रोसार्ड अबतक दो दो गोल दाग चुके हैं। वहीं लुकाकू बेंच से आने के बावजूद अबतक तीन गोल स्कोर कर चुके हैं।

वहीं दूसरी ओर है स्पेन की टीम जिन्होंने अबतक इस विश्व कप के अपने पाँच मैचों में विरोधी टीमों को अपने खिलाफ एक भी गोल नहीं दागने दिया है। स्पेन के कोच लुई डे ला फुएन्ते के लिए चिंता का विषय यह होगा कि फॉरवर्ड लाइन के खिलाड़ी टीम के लिए गोल स्कोर करने में असमर्थ रहे हैं। वहीं रेड डेविल्स की खासियत यह है कि उनके बेंच पर बैठे खिलाड़ी भी मैदान पर आकर गोल दागने की काबिलियत रखते हैं।

आज एक बेहतरीन डिफेंस का सामना एक घातक अटैकिंग टीम से होगा। यह निश्चित रूप से एक बेहतरीन मैच होगा। जुनून अपने चरम पर होगा। तैयार रहिए एक अच्छी फुटबॉल प्रतियोगिता देखने के लिए।

अब माँ बगलामुखी शक्तिपीठ में चढ़ावा चोरी, 3 साल तक फर्जी समिति लेती रही चंदा: जानें क्या है पूरा विवाद और इस मंदिर की मान्यताएँ?

मध्य प्रदेश के आगर-मालवा जिले के नलखेड़ा में स्थित प्रसिद्ध माँ बगलामुखी मंदिर में दान संग्रह को लेकर एक बहुत बड़ा विवाद सामने आया है। अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे को लेकर चल रहे विवाद के बीच इस सिद्धपीठ में भी दान और चढ़ावे के कथित गबन का आरोप लगा है।

आरोप है कि मंदिर के नाम पर एक अशासकीय यानी फर्जी प्राइवेट समिति बनाकर श्रद्धालुओं से नकद राशि और सोने-चाँदी के आभूषण दान के रूप में लूटे गए। मामले की गंभीरता को देखते हुए आगर-मालवा की जिला कलेक्टर प्रीति यादव ने 7 जुलाई 2026 को तीन सदस्यीय जाँच समिति का गठन कर दिया है।

यह समिति 7 दिन के भीतर पूरे मामले की जाँच कर अपनी विस्तृत रिपोर्ट सौंपेगी, जिसके आधार पर दोषियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी। कलेक्टर कार्यालय में दर्ज कराई गई शिकायत के अनुसार, मंदिर परिसर में शासकीय प्रबंधन समिति से अलग एक गैर-सरकारी समिति काम कर रही थी।

यह समिति मंदिर परिसर में ही श्रद्धालुओं से नकद, सोना और चाँदी दान के रूप में एकत्रित कर रही थी। सबसे बड़ी गड़बड़ी यह सामने आई कि चढ़ावे की इस राशि को सरकारी खजाने में जमा करने के बजाय निजी बैंक अकाउंट में भेजा जा रहा था। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान वित्तीय रिकॉर्ड में भारी हेराफेरी की गई। श्रद्धालुओं को गुमराह करने के लिए फर्जी रसीदें भी बांटी जा रही थीं।

अफसरों की मिलीभगत से साल 2024 में बनी प्राइवेट समिति

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार, माँ बगलामुखी मंदिर प्रबंध समिति के नाम से पहले से ही एक आधिकारिक सरकारी समिति मौजूद है। चूंकि यह मंदिर पूरी तरह सरकारी प्रबंधन के अधीन है, इसलिए इसके पदेन अध्यक्ष इलाके के SDM यानी डिप्टी कलेक्टर होते हैं और इसके सचिव तहसीलदार होते हैं। मंदिर के रोजमर्रा के कामों का संचालन आउटसोर्स कर्मचारियों के माध्यम से किया जाता है।

प्रशासनिक अधिकारी समय-समय पर इसका निरीक्षण भी करते हैं। इसके बावजूद साल 2024 में कथित तौर पर अफसरों की मिलीभगत से नियम विरुद्ध जाकर ‘नलखेड़ा सुदर्शन सेवा समिति’ नाम की एक प्राइवेट समिति बना दी गई। इस फर्जी समिति के प्रमुख पाँच सदस्य पूरी तरह से प्राइवेट लोग हैं। यह फर्जी समिति करीब तीन साल से अफसरों के सामने ही लोगों से खुलेआम दान ले रही थी।

मंदिर परिसर में सात शिलालेख लगे हुए हैं। इन शिलालेखों पर 170 उन लोगों के नाम दर्ज हैं जिन्होंने चाँदी दान की थी। इसके बाद कितने लोगों ने चढ़ावा दिया, इसका कोई भी रिकॉर्ड न तो मंदिर में मौजूद है और न ही जिला प्रशासन को सौंपा गया है। इस फर्जी समिति के निर्माण के समय डिप्टी कलेक्टर मिलिंद ढोके वहाँ के SDM थे। उन्हीं के सामने यह समिति बनी और काम करती रही, लेकिन उन्होंने कोई कार्रवाई नहीं की।

दिलचस्प बात यह है कि ढोके ने खुद भी 1 किलो चाँदी दान की थी, जिसका जिक्र मंदिर के शिलालेख पर है। शिलालेख में दूसरे और तीसरे नंबर पर तत्कालीन SDM और तहसीलदार के दान देने की बात साफ लिखी है। उनके बाद आए 2 अन्य SDM सर्वेश यादव और कमल मंडलोई ने भी इस अवैध वसूली पर कोई एक्शन नहीं लिया। इस समिति का आज तक कोई ऑडिट भी नहीं हुआ है। हालाँकि समिति के सदस्यों का दावा है कि तत्कालीन SDM की देखरेख में ही समिति का बाकायदा रजिस्ट्रेशन कराया गया था।

रजत सौंदर्यीकरण के नाम पर संगठित वसूली

पड़ताल के दौरान इस प्राइवेट समिति की रसीद भी हाथ लगी है। इस रसीद पर समिति का नाम और उसका उद्देश्य ‘रजत सौंदर्यीकरण करना’ लिखा हुआ है। इसी बहाने से मंदिर के गर्भगृह का चाँदी से सौंदर्यीकरण किया जा रहा है और बाहर भी चाँदी की सीटें लगाई जा रही हैं।

जिला प्रशासन के एक अधिकारी ने बताया कि यह मामला काफी बड़ा हो सकता है क्योंकि यह पूरी तरह संगठित तरीके से चल रहा था। नकली रसीदें और अलग काउंटर बनाकर श्रद्धालुओं से नकद और गहनों के रूप में दान लिया जा रहा था। वर्तमान में इस कथित दान घोटाले में कुल कितनी रकम की हेराफेरी हुई है, इसका पूरा हिसाब लगाया जाना बाकी है।

सरकार ने दिए सख्त कार्रवाई के निर्देश

मध्य प्रदेश के संस्कृति राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) धर्मेंद्र सिंह लोधी ने कहा कि उन्हें 7 जुलाई 2026 को इस मामले की जानकारी मिली थी। इसके तुरंत बाद उनके कार्यालय ने जिला कलेक्टर को कड़ी जाँच के निर्देश जारी किए। मंत्री ने साफ कहा कि कुछ लोग, जिनका मंदिर प्रशासन से कोई सीधा संबंध नहीं था, वे मंदिर के नाम पर रसीदें छपवाकर श्रद्धालुओं से अवैध तरीके से पैसे वसूल रहे थे।

उन्होंने स्पष्ट चेतावनी दी है कि इस मामले में शामिल किसी भी कर्मचारी या अधिकारी को बख्शा नहीं जाएगा और सरकार दोषियों के खिलाफ कड़ी से कड़ी कानूनी कार्रवाई करेगी। कलेक्टर प्रीति यादव द्वारा बनाई गई 3 सदस्यीय जाँच समिति की अध्यक्षता जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी यानी CEO बीएस सोलंकी कर रहे हैं।

इस समिति में जिला कोषालय अधिकारी मनीष सोलंकी और नलखेड़ा नगर परिषद की मुख्य नगरपालिका अधिकारी मिनी अग्रवाल को सदस्य बनाया गया है। यह टीम फिलहाल मंदिर पहुँचकर सारे दस्तावेज खंगाल रही है और मुख्य रूप से चार बिंदुओं पर जाँच कर रही है।

मंदिर में कुल कितना चढ़ावा आया और उसे सरकारी खजाने में क्यों नहीं जमा कराया गया? गर्भगृह की सजावट में वास्तव में कितनी चांदी का इस्तेमाल हुआ? समिति ने अब तक कितने लोगों से चढ़ावा लिया और उसका लिखित रिकॉर्ड कहाँ है? मंदिर सरकारी होने और उसकी अपनी समिति होने के बाद भी प्राइवेट लोगों की समिति बनाना कितना सही है?

मंदिर की सुरक्षा व्यवस्था और दान पेटियाँ

शासकीय प्रबंध समिति की ओर से मंदिर में कुल 27 दान पेटियाँ रखी गई हैं। इसके अलावा ऑनलाइन तरीके से भी श्रद्धालुओं से दान राशि जमा कराने की व्यवस्था की गई है, जहाँ पॉइंट ऑफ सेल यानी POS मशीन से पक्की रसीद दी जाती है। इसी वजह से इस फर्जी समिति के गठन और उसमें शामिल अधिकारियों की भूमिका पर बड़े सवाल उठ रहे हैं। सुरक्षा के लिहाज से मंदिर परिसर में कुल 28 CCTV कैमरे लगाए गए हैं, जिनमें से 4 कैमरे फिलहाल खराब पड़े हैं।

मंदिर में सुरक्षा गार्ड और सफाईकर्मी मिलाकर कुल 20 कर्मचारी प्रतिदिन तैनात रहते हैं। ये सभी दैनिक वेतनभोगी हैं, जिन्हें आधिकारिक मंदिर समिति वेतन देती है। इस विवाद के सामने आने के बाद ‘नलखेड़ा सुदर्शन सेवा समिति’ के अध्यक्ष मनोहरलाल पंडा या कोई भी सदस्य कुछ भी बोलने से इनकार कर रहे हैं। मनोहरलाल पंडा ने मोबाइल पर चर्चा के दौरान नलखेड़ा में होने से साफ मना कर दिया और वे मीडिया के सामने भी नहीं आ रहे हैं।

मंदिर में पिछले 9 साल से पूजा कर रहे पुजारी विशाल तिवारी ने कहा कि जिला प्रशासन को इस पूरे मामले की निष्पक्ष जाँच करनी चाहिए। अगर यह शिकायत गलत भी साबित होती है, तो भी संबंधित लोगों के खिलाफ कार्रवाई हो क्योंकि इस पूरे विवाद से विश्व प्रसिद्ध मंदिर की छवि धूमिल हो रही है।

प्रतिदिन दर्शन करने आने वाले भक्त कैलाश मकवाना का कहना है कि समिति में जो लोग हैं, वे सक्षम हैं और ऐसा नहीं कर सकते। मामले की जाँच चल रही है और जल्द ही दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा। मैया सबको देख रही हैं और जो भी बेईमानी करेगा उसे सजा मिलकर रहेगी।

जानिए माँ बगलामुखी मंदिर का गौरवशाली इतिहास

नलखेड़ा में लखुंदर नदी के तट पर स्थित मां बगलामुखी मंदिर देश के प्रमुख और सबसे जाग्रत शक्तिपीठों में माना जाता है। यह पवित्र स्थल तंत्र साधना और अदालती मामलों में सफलता की कामना के लिए देशभर के श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है। यह मंदिर धार्मिक एवं तांत्रिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है। मंदिर में स्थित माँ बगलामुखी की मूर्ति पांडव कालीन मानी जाती है, जिसका स्पष्ट प्रमाण कालिका पुराण में मिलता है।

यह मंदिर 500 वर्ष से भी अधिक पुराना है। मान्यताओं के अनुसार द्वापर युग में अज्ञातवास के समय पांडवों के वैभव खो जाने पर भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें माँ बगलामुखी की साधना करने का निर्देश दिया था। पांडवों ने लखुंदर नदी के तट के समीप अपनी यात्रा को विश्राम दिया और माँ की घोर तपस्या की। तपस्या से प्रसन्न होकर माँ ने उन्हें दर्शन दिए और महाभारत युद्ध में विजयी होने का वरदान दिया।

इस मंदिर का वर्णन राजा विक्रमादित्य के काल में भी मिलता है। माँ बगलामुखी की यह अलौकिक मूर्ति किसी मानव द्वारा निर्मित नहीं है, बल्कि यह पूरी तरह स्वयंभू यानी स्वतः प्रकट हुई मूर्ति है। मंदिर के पीछे बहने वाली लखुंदर नदी का पानी वर्ष भर रहता है, जो इसके प्राकृतिक सौंदर्य को बढ़ाता है। नदी के किनारे कई संतों की समाधियाँ स्थित हैं, जिससे प्राचीन काल में यहाँ बड़ी संख्या में संतों के रहने का प्रमाण मिलता है।

मंदिर के चारों दिशाओं में श्मशान यानी मुक्तिधाम स्थित है, जो इसके एक सिद्ध तंत्र स्थल होने का पक्का सबूत है। मंदिर परिसर में 16 खंभों वाला एक सुंदर सभा मंडप बना हुआ है। इसका निर्माण संवत 1815 यानी 276 ईस्वी पूर्व पंडित ईबूजी दक्षिणी और कारीगर श्री तुलाराम ने करवाया था। इसी सभा मंडप में माँ की ओर मुख किए हुए एक कछुआ स्थापित है, जो यह दर्शाता है कि पुराने समय में यहाँ माँ को बलि चढ़ाई जाती थी।

मंदिर के ठीक सामने 32 फीट ऊँची दीपमाला स्थित है, जिसका निर्माण महाराजा विक्रमादित्य ने करवाया था। मंदिर प्रांगण में ही एक दक्षिण मुखी हनुमान मंदिर, उत्तर मुखी राधा-कृष्ण मंदिर और पूर्व मुखी भैरव जी का मंदिर स्थित है। इस मंदिर का सिंहमुखी द्वार श्रद्धालुओं के बीच बेहद प्रसिद्ध है।

10 महाविद्याओं में से एक हैं माँ बगलामुखी

हिंदू धर्म और तंत्र शास्त्र में 10 महाविद्याओं का विशेष स्थान है, जो दिव्य स्त्री शक्ति के विभिन्न रूपों को दर्शाती हैं। माँ बगलामुखी इन दस महाविद्याओं में से आठवीं महाविद्या हैं। सृष्टि की रचना के बाद ब्रह्मा जी देवताओं और दानवों के आपसी बैर से बहुत व्यथित रहते थे। दानव अधिक शक्तिशाली और क्रूर थे, जिससे देवताओं की संख्या घटने लगी। देवताओं की रक्षा के लिए समुद्र मंथन से अमृत निकाला गया और भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण कर उसे देवताओं में बांट दिया।

इसके बाद भी दानव अपने योगबल से देवगणों पर विजय पाते रहे। तब ब्रह्मा जी भगवान शंकर के पास गए, जो माता पार्वती के साथ पर्वत पर विराजमान थे। ब्रह्मा जी ने कहा कि दानव शक्ति के आगे देव शक्तियाँ निर्बल बनी हुई हैं। इस पर भगवान शंकर के मुख से क्रोध के कारण एक महान तेज उत्पन्न हुआ, जिससे संपूर्ण लोकों में कंपन शुरू हो गया। इसके बाद वह तेज एक स्त्री के रूप में बदल गया। शिव की उग्र स्वरूपा होने के कारण इस देवी के शीश पर चंद्र जटित मुकुट और ललाट पर तीसरा नेत्र था।

देवी ने शरीर पर पीले वस्त्र धारण कर रखे थे और उनके एक हाथ में शत्रु की जिह्वा तथा दूसरे हाथ में प्रलयंकर गदा थी। यही शक्ति स्वरूप पूरे विश्व में माँ बगलामुखी के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इन्हें वाणी, वाकपटुता और शत्रुओं को स्तंभित करने वाली देवी माना जाता है।

ये हैं 10 महाविद्याएँ और उनके मुख्य पहलू

काली: समय, परिवर्तन और विनाश की उग्र देवी जो दुख के चक्र से मुक्ति देती हैं। तारा: करुणा और सुरक्षा की देवी जो संकट के समय मार्गदर्शन करती हैं। त्रिपुर सुंदरी: सुंदरता और सर्वोच्च वास्तविकता का प्रतीक जो इच्छाओं को पूर्ण करती हैं। भुवनेश्वरी: भौतिक ब्रह्मांड को बनाए रखने वाली और समृद्धि देने वाली माँ। छिन्नमस्ता: आत्म-बलिदान, अहंकार के विनाश और मानसिक नियंत्रण की देवी।

धूमावती: शून्यता और संकटों से आने वाले ज्ञान और बुद्धि की वृद्ध देवी। बगलामुखी: ज्ञान, अलौकिक शक्ति और शत्रुओं की वाणी पर नियंत्रण की देवी। मातंगी: कला, संगीत, रचनात्मकता और पारंपरिक सीमाओं से परे ज्ञान की देवी। षोडशी: पूर्णता, आंतरिक शांति और उच्च चेतना की दिव्य प्रतिमूर्ति। कमलात्मिका: धन, समृद्धि, उर्वरता और वित्तीय सफलता देने वाली माँ लक्ष्मी का रूप।

इस पवित्र मंदिर के गर्भगृह में माता तीन स्वरूपों में विराजती हैं। इसमें दाईं ओर महालक्ष्मी, बाईं ओर माँ सरस्वती और मध्य में माँ बगलामुखी के दर्शन होते हैं। मंदिर का गर्भगृह 3 करोड़ रुपए से अधिक मूल्य के स्वर्ण, करीब 65 लाख रुपए की चाँदी और बहुमूल्य आभूषणों से सुसज्जित है।

‘तुम्हारी गौमाता का मीट खा रहा हूँ… ग@#D में दम हो तो रोककर दिखाओ’: इंस्टा पर वायरल होने के लिए हैदर अली के घटिया कंटेंट का काला चिट्ठा, हर वीडियो में हिंदुओं को देता है चुनौती

हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को आहत करना अब कुछ लोगों के लिए सोशल मीडिया पर वायरल होने की ट्रिक बन गई है। केरल में रहकर मजदूरी करने वाला ‘हैदर अली’ नामक एक मुस्लिम क्रिएटर का मामला इसका ताजा और सटीक उदाहरण है, जिसने हिंदू समुदाय की आस्था की प्रतीक ‘गौमाता’ को लेकर न केवल घृणा का प्रदर्शन किया, बल्कि सुनियोजित तरीके से हिंदुओं को भड़काने के लिए एक के बाद एक कई वीडियो सोशल मीडिया पर अपलोड किए।

हैदर अली, एक ही महीने के भीतर ऐसी 13-14 से अधिक वीडियो डाल चुका है। इन वीडियोज में इसने क्या दिखाया आइए सिलसिलेवार ढंग से बताएँ…

इंस्टा पर akhaidar__ यूजर आईडी से मौजूद हैदर अली के पेज पर वर्तमान में 23.5K फॉलोअर्स हैं।

हैदर अली के इंस्टा पेज का स्क्रीनशॉट

गौमांस पर हिंदुओं को चिढ़ाने वाली वीडियोज उसने 16 मई से डालनी शुरू की थी। पहली वीडियो में उसने केवल गौमांस पकते हुए दिखाया और कैप्शन में ‘गाय का मीट’ लिखा।

इस वीडियो पर रीच मिलने के बाद उसने उसी दिन एक और वीडियो अपलोड की, जिसमें वह अपनी बीवी वाहिदा खातून (बताया जा रहा नाम) से पूछता है कि वह क्या कर रही है? इस पर उसकी बीवी कहती है कि वह गौमाता का मीट पका रही है।

इसके बाद दोनों हँसते हैं और हैदर बताता है – हम केरल में हैं और बीफ खाते हैं। इस वीडियो को 5 लाख से ज्यादा व्यूज और करीब 24.4K लाइक्स मिले।

16 मई (अन्य वीडियो): एक अन्य वीडियो में वह अपनी बीवी से पूछता है, “क्या गौमाता का मीट खत्म हो गया है?” उसकी बीवी हँसते हुए कहती है, “जितना लाए थे सब खत्म हो गया है।”

हैदर वीडियो में बताता है कि उन्होंने एक वीडियो डाली थी 5 लाख के व्यूज आए हैं, अब दोबारा ये देखो पार्ट 2।

16 मई (तीसरी वीडियो): गौमांस और चावल दिखाते हुए हैदर बंगाल की शुभेंदु सरकार को चुनौती देता है और कहता है- “अंधभक्तों मैं केरल में रहकर गौमाता का मीट खा रहा हूँ, अगर G@%d में दम हो तो इसे बंद करके दिखाओ।”

17 मई: इस दिन डाली गई वीडियो में वह ढिठाई दिखाते हुए कहता है, “हमारी गौमाता का मीट खाते हुए वीडियो वायरल हुई थी। अंधभक्तों ने हमें गाली दी। पहले हमारा मछली खाने का मन था लेकिन अब हम गौमाता को ही खाएँगे, इसलिए दोबारा लेकर आए हैं। देखों कैसे कटता है ये।”

इस वीडियो पर 5.5 लाख से ज्यादा व्यूज और 30 हजार लाइक्स आए।

17 मई (दूसरी वीडियो): अपनी बीवी को बीफ काटते और पकाते दिखाते हुए वह पूछता है कि क्या बना रही हो? बीवी हँसते हुए कहती है-गौमाता का मीट।

आगे हैदर कहता है, “अंधभक्तों देख लो, अब मैं वीडियो रोज बनाऊँगा। दम है तो केरल में गौमाता का मीट बंद करके दिखा। हम केरल में है। मैं रोज वीडियो डालूँगा। तुम्हारी G@$ड जलाने को।”

18 मई: इस वीडियो में हैदर कहता है, “मैं अभी तक आपको गाय पकाते हुए दिखाता था लेकिन अब मैं गौमांस खाते हुए दिखा रहा हूँ। मुझे फॉलो कर लो क्योंकि आपको ऐसे ही कंटेंट देखने को मिलेगा।”

20 मई: गौमांस से जुड़ी वीडियोज पर आए हिंदुओं के कमेंट्स देख वह कहता है- “अंधभक्तों आज तो मैं सुबह-सुबह ही जाकर बीफ ले आया। तुम मेरे कमेंट में आकर गाली-गलौच करते हो। तुम में दम हो तो केरल में इसे बैन करके दिखाओ।”

इस वीडियो पर उसे 50 हजार से ज्यादा व्यूज मिले।

21 मई: इस दिन डाली गई वीडियो का कैप्शन था “मैं गौमांस के साथ रोटी खा रहा हूँ। अल्लाहू अकबर।”

इसमें वह कहता है- “अंधभक्तों देखो तुम्हारी गौमाता का मीट। बहुत टेस्टी है। किसे खाना है बताओ मैं लोकेशन बताऊँगा तुम आकर खाना।”

23 मई: कसाईखाने की वीडियो डालते हुए वह कहता है, “बहुत दिन से मछली खा खाकर थक गया था इसलिए अब गाय का मीट लेने आया हूँ। वीडियो जरूर शेयर होनी चाहिए क्योंकि इसे ही तो देखकर अंधभक्त जलेंगे।”

इसका कैप्शन था- “कसाई खाना पर गया था गाय का मीट लेने के लिए। अल्लाहू अकबर।”

23 मई (अन्य वीडियो): इसमें वह गौमांस खाने के लिए केरल की राजनीतिक और भौगोलिक स्थिति को जस्टिफाई करता है। वह लिखता है- “केरल पर बीजेपी का सरकार नहीं है। इसीलिए केरल का मुसलमान भाई लोग गाय का मीट खा सकता। अगर केरल पर बीजेपी का सरकार होता तो केरल पर गाय का मीट मुसलमान भाई लोग का नहीं सकता था क्योंकि सरकार ने बंद करके रख दिया होता।”

वह आगे कहता है, “अगर गाय राष्ट्रीय पशु होता तो मुसलमान भाई लोग गाय का मीट नहीं खाता।”

24 मई: चूल्हे पर बीफ पकता हुआ दिखाते हुए वह कहता है- “अंधभक्तों देखो आज संडे और हम तुम्हारी गाय माता का मीट पका रहे हैं।”

24 मई (दूसरी वीडियो): असम और बंगाल के नियमों का जिक्र करते हुए वह कहता है- “असम और बंगाल में तो इस बार गौमाता की कुर्बानी देने के नाम पर रोक लगा दी गई है। अभी मैं केरल में हूँ तो बढ़िया गाय माता का मीट खा रहा हूँ। यहाँ कुर्बानी देने की भी बहुत बढ़िया व्यवसथा हुई है।”

28 मई: थाली में बीफ और रोटी खाते हुए वह कहता है- “ये देखो अंधभक्तों मैं तुम्हारी गौ माता का मीट रोटी के साथ खा रहा हूँ। आज हमारी ईद है और मैं तो तुम्हारी गौ माता का मीट जरूर खाऊँगा।”

29 मई: कसाईखाने में लटके हुए गाय के पैर और कटते हुए मीट को दिखाते हुए उसने कहा- “सुबह-सुबह मीट की दुकान पर मीट लेने गया था। आप लोग इस वीडियो को देखिए और मजे लीजिए ताकि अंधभक्त इसे देख सकें।”

31 मई: इस वीडियो में हैदर कहता है, “अंधभक्तों क्या हाल है, देखो तुम्हारी गाय माता का मीट बिक रहा है दुकान पर। मेरी छुट्टी थी तो मैं कसाई खाने आकर 2 किलो मीट ले लिया हूँ और वीडियो भी बना लिया हूँ ताकि तुम्हें दिखा सकूँ।”

कट्टरपंथी हैदर अली में कैसे आई ये हिम्मत?

गौरतलब है कि ये सिर्फ कुछ वीडियोज हैं। हैदर का इंस्टा पेज हिंदूघृणा वाले कंटेंट से भरा हुआ है। लोग इस इस्लामी कट्टरपंथी पर कार्रवाई की माँग कर रहे हैं, लेकिन अभी तक क्या एक्शन हुआ है इसका पता नहीं चला है। आखिरी वीडियो हैदर के चैनल पर 12 जून को डाली गई थी। उससे पहले तक वह लगातार हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं का अपमान करके सस्ती लोकप्रियता बटोरने में जुटा था।

वीडियो से साफ पता चलता है कि उसका मकसद खान-पान की आदतों को शेयर करना नहीं है, बल्कि हिंदुओं के लिए ‘अंधभक्त’ जैसे शब्दों का बार-बार इस्तेमाल करना और जानबूझकर ‘तुम्हारी गौमाता” कहकर चिढ़ाना है, जो साफ करता है कि यह एक सोची-समझी हिंदुओं के प्रति घृणा है।

उसके चैनल को देख साफ पता चलता है कि गौमांस पर बनाई पहली वीडियो जब पर व्यूज और लाइक्स की संख्या लाखों पार की तो हैदर के भीतर का कट्टरपंथी अपनी हकीकत सोशल मीडिया पर दिखाने से झिझका नहीं। हिंदुओं के आलोचना करने पर वह उन्हें ‘अंधभक्त’ कह कहकर घृणा दिखाने लगा। उसे लगा कि इसी से वह वायरल होगा। उसने ‘गौ माता का मीट’ लाइन को उसने अपनी वीडियोज की रीच बढ़ाने का कीवर्ड समझ लिया।

हैरानी इस बात की है कि मेटा ने लगातार कम्युनिटी गाइडलाइंस की धज्जियाँ उड़ने पर भी इस अकॉउंट पर संज्ञान नहीं लिया। खबर लिखने तक उसका हैंडल पब्लिक है। वह लगातार हिंदुओं को चुनौती दे रहा है कि बीफ को बैन कराकर कोई दिखाए, अगर नहीं कर सकते तो वो ऐसे ही खाकर वीडियो बनाता रहेगा।

गुजरात के जावेद की टेढ़ी हड्डियाँ, ₹4 करोड़ का सालाना खर्च और PAK के ‘रैट चिल्ड्रन’: करीबी रिश्तों में निकाह से पैदा होता स्वास्थ्य संकट, जानें- क्या है जेनेटिक बीमारी MPS

मुस्लिम समाज में आपसी रिश्तदारों में निकाह आम है। ऐसे दंपति के बच्चों में आनुवांशिक बीमारियाँ ज्यादा होती हैं, क्योंकि दोषपूर्ण जीन होने की संभावना बढ़ जाती है। गुजरात का जावेद भी ऐसे ही आनुवांशिक बीमारी से जुझ रहा है। उसके अब्बू मोहम्मद आजी ने अपनी खाला की बेटी से निकाह किया था। नतीजतन जावेद को MPS IV नाम की आनुवांशिक बीमारी हो गई। 18 साल से वह हर दिन मौत की दुआ माँगते हुए जीता है। उसकी बहन भी ऐसी ही बीमारी से ग्रसित है। लेकिन वह चल फिर पाती है।

पाकिस्तान में माना जाता है कि करीब 80 फीसदी निकाह फर्स्ट कजिन और सेकेंड कजिन में होता है। इसलिए यहाँ आनुवांशिक बीमारियों के मरीज भी ज्यादा हैं। हालात तो ये है कि माइक्रोसेलफी से पीड़ित बच्चों को ‘रैट चिल्ड्रन’ कह कर उनका शोषण भी किया जाता है।

दुर्लभ बीमारी से ग्रस्त है जावेद

गुजरात के अहमदाबाद में रहने वाले 26 साल के जावेद को म्यूकोपोलीसेकेरिडोसिस टाइप IV बीमारी है। जन्मजात होने वाली इस बीमारी का पता बच्चे में तुरंत नहीं चलता। कई बार 2-4 साल में उसके लक्षण दिखते हैं। लेकिन कई बार 7-8 साल तक इसका पता चलता है। 8 साल की उम्र में जावेद को इसका पता तब चला जब वह क्रिकेट खेलते-खेलते गिर गया और दर्द से कराहने लगा। जब उठाने की कोशिश की गई लेकिन उसे उठाया नहीं जा पा रहा था।

टीचर को उसने रोते हुए कहा कि उसके घुटने और पैरों में काफी दर्द है। टीचर ने उसके अम्मी अब्बू को फोन किया। उनके पहुँचने पर जावेद को अस्पताल ले जाया गया। उसे दवा देकर भेज दिया गया। डॉक्टरों को लगा कि गिरने से उसकी मासपेशियाँ खिंच गई होंगी। लेकिन घर पहुँचने पर उसकी स्थिति ठीक होने के बजाय बिगड़ गई। जब वह उठ नहीं पाया तो मौलवी के पास भी उसके अब्बू दौड़े और उसे 10 हजार रुपए का तेल दिया लेकिन वह भी बेकार गया। 18 साल से इसी तरह वह बेड़ पर पड़ा है।

दरअसल उसे काफी रेयर बीमारी म्यूकोपॉलीसेकेराइडोसिस टाइप 4 (Mucopolysaccharidosis Type 4 या MPS IV) हो गई है। यह जेनेटिक बीमारी होती है और करीबी रिश्ते में जब शादियाँ होती हैं, तो उनके बच्चों में ये बीमारी होने की आशंका होती है। यही वजह है कि जावेद की बहन भी इसी बीमारी की शिकार है। उसके ज्वाइंट पर दर्द रहते हैं, घुटने-केहुनियाँ में सूजन आती है। उसकी हालत जावेद से बेहतर है, लेकिन उसका निकाह नहीं हो पा रहा है।

राँची की डॉक्टर श्वेता शेखर के मुताबिक, MPS कई तरह की होती है। कई MPS के मरीजों को हड्डियों के टेढ़े-मेड़े होने, सिर बढ़ा होने, पैर में कमजोरी, कम उम्र में बूढ़ा होना, आँखों, ह्रदय, साँस लेने में तकलीफ, गर्दन छोटी होना, पसलियों का टेढ़ा होना, दाँतों में खराबी समेत दूसरी दिक्कतों के साथ-साथ मानसिक बीमारी भी हो जाती है। लेकिन MPS 4 में सारी दिक्कत शारीरिक होती है। ऐसे मरीज की उम्र भी ज्यादा नहीं होती।

क्या होता है मॉर्कियो सिंड्रोम

म्यूकोपॉलीसेकेराइडोसिस टाइप 4 या मॉर्कियो सिंड्रोम (Morquio syndrome) एक दुर्लभ आनुवंशिक और जन्मजात बीमारी है। यह किसी संक्रमण या खान-पान से नहीं होती, बल्कि माता-पिता के दोषपूर्ण जीन के कारण होती है। आपसी रिश्तों, जैसे चचेरे-ममेरे-फुफेरे भाई-बहनों में जब शादियाँ होती हैं, तो इसकी संभावना काफी बढ़ जाती है। यही वजह है कि मुस्लिम देशों में ऐसे बीमारियों के मरीज ज्यादा मिलते हैं।
दरअसल यह एक ऑटोसोमल रिसेसिव (Autosomal Recessive) बीमारी है यानी माता-पिता जब आपसी रिश्तेवाले होते हैं तो दोनों में ऐसे जीन कैरी करने की संभावना होती है। ऐसे में उनके होने वाले बच्चों को ये बीमारी ज्यादा होती है।

लाइलाज है बीमारी

इस बीमारी को एंजाइम थेरेपी से थोड़ा ठीक किया जा सकता है लेकिन इसका खर्च काफी है। करीब 4 करोड़ रुपए सालाना खर्च आता है। इसलिए जावेद का इलाज नहीं हो पा रहा। इस बीमारी में शरीर में कुछ विशेष एंजाइम नहीं बनते। इसके कारण ग्लाइकोसामिनोग्लाइकैन (GAGs) नामक पदार्थ शरीर में जमा होने लगता है। धीरे-धीरे यह हड्डियों, जोड़ों, हृदय, आँखों और दूसरे अँगों को नुकसान पहुँचाता है, इसलिए जावेद 26 साल में 90 साल का हो गया है यानी उसकी हड्डियाँ उतनी कमजोर है कि तेजी से उठने बैठने पर भी टूट जाती है।

वह दर्द से तड़पता है। टेडी मेड़ी हड्डियाँ शरीर के ऊपर से दिखती हैं। बिस्तर से उठना मुश्किल होता है। उठते ही लुढ़क जाता है। जन्मजात बीमारी है। दो महीने का होने पर शरीर सूखने लगा था। शरीर बदन के मुकाबले काफी बड़ा दिखता है। चलते फिरते गिर जाता है। पैर काफी कमजोर। स्कूल छुड़ाना पड़ा क्योंकि दूर भेजना मुश्किल था। एक दिन ट्यूशन गया तो रास्ते में गिर गया। केहूनी घुटने में चोट लगी। इसके बाद वह भी छूट गया। 26 साल की हालत में हड्डियों की हालत 90 साल वाली हो गई है।

डॉक्टर श्वेता शेखर के मुताबिक, ये बीमारी लाइलाज है यानी इसे पूरी तरह ठीक नहीं किया जा सकता, लेकिन मरीज को तड़पने से बचाने के लिए एंजाइम रिप्लेसमेंट थेरेपी कराई जा सकती है। इसके अलावा ऑर्थोपेडिक सर्जरी, फिजियोथेरेपी, हार्ट और दूसरे अँगों का समय समय पर चेकअप कराना, सांस लेने में अगर दिक्कत आए तो उसे डॉक्टर को दिखाना जरूरी है। यहाँ तक कि कई बार स्पाइनल सर्जरी की भी जरूरत महसूस की जा सकती है।

कई बीमारियों को न्योता देता है करीबी रिश्तों में होने वाली शादियाँ

करीबी रिश्तेदारों में विवाह से किसी एक बीमारी का नहीं, बल्कि कई ऑटोसोमल रिसेसिव रोगों का जोखिम बढ़ जाता है। यही वजह है कि दुनियाभर में मुस्लिम समुदाय दूसरी जैनेटिक बीमारियों से भी परेशान हैं। इनमें MPS के अलग-अलग प्रकारों मसलन MPS 1, MPS IV, MPS IVA, MPS IVB के अलावा बेटा थैलिसीमिया, सिकल सेल डिजीज यानी एससीडी, सिस्टिक फाइब्रोसिस, स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी, फेनिलकेटोनुरिया, टे-सैक्स रोग समेत कई दुर्लभ मेटाबॉलिक बीमारियाँ शामिल हैं।

पाकिस्तान का बुरा हाल

पाकिस्तान की करीब 80 फीसदी जनसंख्या मुस्लिम है। यहाँ चचेरे-ममेरे-फुफेरे भाई-बहनों (फर्स्ट कजन) के बीच निकाह आम है। माना जाता है कि करीब 60% से 65% निकाह आपसी रिश्तों में होते हैं। कहा जाता है कि इससे ‘बेटियाँ घरों में रह जाएँगी’। रिश्तेदारों में निकाह का खामियाजा अगली पीढ़ी भुगतती है, जब बच्चा जेनेटिक बीमार से ग्रस्त पैदा होता है।

पाकिस्तान में ऐसे मरीजों का कोई राष्ट्रीय डेटा मौजूद नहीं है लेकिन कराची के आगा खान यूनिवर्सिटी अस्पताल, लाहौर के चिल्ड्रन अस्पताल , इस्लामाबाद के जिला केन्द्र पर ऐसे मरीज ज्यादा आते हैं। दरअसल जागरूकता और इलाज छोटे-छोटे शहरों में मौजूद ही नहीं है। ऐसे में बड़े शहरों के कुछ केन्द्रों पर ही मरीज के लिए आना मजबूरी है।

कराची के एक अध्ययन के मुताबिक, सिंध प्रांत में आनुवांशिक बीमारियों में MPS से पीड़ित 90 रोगियों में मोरक्वियो सिंड्रोम MPS IV के मरीज थे। इसके अलावा पंजाब, बलूचिस्तान जैसे प्रांत में एमपीएस के अलावा दूसरे मरीजों की संख्या ज्यादा थी।

पाकिस्तान के डॉक्टर आपसी रिश्तों में होने वाले निकाह के खिलाफ हैं। इनका मानना है कि पाकिस्तान ऐसा देश है, जहाँ फर्स्ट कजिन और सेकेंड कजिन में निकाह सबसे ज्यादा होता है। ऐसे में आनुवांशिक बीमारियों के होने का खतरा भी यहाँ ज्यादा है। इसको लेकर देश में जागरूकता बढ़ाने की बात भी डॉक्टर कहते हैं।

पाकिस्तान के ‘रैट चिल्ड्रन’ शोषण के शिकार

पाकिस्तान सिर्फ आनुवांशिक बच्चों को पैदा ही नहीं करता बल्कि उनका शोषण करने में भी अव्वल है। यहाँ आनुवांशिक बीमारी माइक्रोसेलफी से पीड़ित बच्चों को रैट चिल्ड्रन के नाम से शोषण होता है। ऐसे बच्चों का शारीरिक और मानसिक विकास रुक जाता है। ऐसे बच्चों को ‘शाह डोला के चूहे’ माना जाता है। इनको दरगाह से जुड़े लोग और आसपास के गैंग भिखारी बनाते हैं और देश भर में भीख मँगवाते हैं।

इतना ही नहीं, ठीक बच्चों को रैट चिल्ड्रन बनाकर देश भर में भीख मँगवाया जाता है। दरअसल अंधविश्वास और रूढिवादिता से ग्रसित निसंतान दंपति शाह दौला की दरगाह पर मन्नत माँगने आते हैं। उनके लिए बच्चा पैदा होने पर पहले बच्चे को दरगाह को सौंपना अनिवार्य होता है। बताया जाता है कि अगर ऐसा नहीं किया तो आने वाले बच्चे विकृति वाले होंगे। इसके बाद जब दंपति अपने बच्चों को दरगाह को सौंप देते हैं तो उन्हें फिर जिंदगी में मिलना का मौका नहीं दिया जाता। बच्चा मिलने के बाद उन्हें ‘कृत्रिम माइक्रोसेफली’ का शिकार बनाया जाता है, जिसमें खोपड़ी के सामान्य विकास को रोकने के लिए उनके सिर पर लोहे की पट्टी बाँध दी जाती है।

इन अभागे बच्चों को हरे रंग के वस्त्र पहना कर दरगाह के आसपास भीख माँगने के लिए मजबूर किया जाता है। तीर्थयात्री यह सोचकर चिंतित रहते हैं कि अगर उनकी उपेक्षा की जाए तो उनका बुरा हाल हो सकता है, इसलिए वे बच्चों के भीख के कटोरे में नकद और सिक्के भर देते हैं। माता-पिता के संरक्षण से वंचित ये अशिक्षित बच्चे दरगाह प्रशासन की दया पर निर्भर रहते हैं। बच्चों को ‘नकली चूहे’ बना कर भीख मँगवाया जाता है।

‘सतलुज’ ने उतार दिया मुखौटा: दिलजीत दोसांझ की ‘ग्लोबल सुपरस्टार’ वाली छवि के पीछे छिपी राजनीति बेनकाब, ऑपइंडिया ने पहले ही दी थी चेतावनी

वर्षों से दिलजीत दोसांझ को एक सीधे-सादे, ग्लोबल पंजाबी स्टार के रूप में पेश किया जाता रहा है। एक गायक, एक अभिनेता और एक सॉफ्ट स्पोकन हस्ती जिन्हें लाखों लोग प्यार करते हैं।

एक ऐसा व्यक्ति जो पंजाब के बारे में गाता है और प्यार, किसानों तथा पहचान की बात करता है। लेकिन हाल ही में रिलीज हुई फिल्म ‘सतलुज’ ने उस सच को सामने ला दिया है जिसे सालों के इमेज मैनेजमेंट ने पर्दे के पीछे छिपा रखा था।

‘सतलुज’: एक प्रोपेगैंडा फिल्म

‘सतलुज’ सिर्फ पंजाब के उग्रवाद के दौर की बात करने वाली फिल्म नहीं है बल्कि इसका उद्देश्य बहुत गहरा है। यह फिल्म सालों तक अटकी रही क्योंकि इसमें छिपी राजनीतिक को लेकर तरह-तरह के सवाल थे।

शुरुआत में इस फिल्म का नाम ‘घल्लूघारा’ (नरसंहार) रखा गया था। यह नाम और इसके कुछ दृश्य केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) को रास नहीं आए। इसके बाद नाम बदलकर ‘पंजाब 95’ किया गया और आखिरकार बनने के तीन साल बाद यह रिलीज हो सकी।

इस फिल्म को 3 जुलाई को Zee5 OTT प्लेटफॉर्म पर बिना किसी शोर-शराबे के ‘सतलुज’ नाम से रिलीज किया गया। लेकिन 6 जुलाई को बिना किसी सटीक कारण बताए इसे प्लेटफॉर्म से हटा दिया गया।

ध्यान देने वाली बात यह है कि यह फिल्म केवल भारतीय दर्शकों के लिए गायब हुई है, अंतरराष्ट्रीय दर्शकों के लिए नहीं, Zee5 का अंतरराष्ट्रीय पोर्टल इसे अब भी दिखा रहा है। अब सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने इस मामले की जाँच के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन किया है।

समस्या यह नहीं है कि फिल्म पंजाब में पुलिस की ज्यादतियों की बात करती है, किसी भी ईमानदार समाज में ऐसे मुद्दों पर चर्चा होनी चाहिए। समस्या ‘सतलुज’ में पंजाब के उग्रवाद के दौर को पेश करने के तरीके से है।

फिल्म में खालिस्तानी आतंकवादियों और सिख चरमपंथियों के प्रति नरम रुख अपनाया गया है जबकि भारतीय राज्य (सरकार/प्रशासन) को इकलौते विलेन के रूप में दिखाया गया है।

जब फिल्म में तत्कालीन मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या को दिखाया गया, तो उसे ‘बदले’ के रूप में दिखाया किया गया। जो लोग पंजाब उग्रवाद के इतिहास को नहीं समझते, वे इसका पूरा संदर्भ गलत समझ लेंगे। इस संदर्भ को अगर फिल्म की नजर से देखे तो उसको ऐसे दिखने की कोशिश की गई है कि वो कार ब्लास्ट सही था और वो बदला भी।

इसके अलावा जसवंत सिंह खालरा द्वारा इस मामले को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ले जाने के फैसले ने उस समय के भारतीय अधिकारियों को बेहद खराब रोशनी में दिखाया। KPS गिल, जिन्होंने पंजाब में उग्रवाद को सचमुच खत्म कर दिया, उन्हें ‘IPS बिट्टा’ नामक एक बुरे पुलिस वाले के रूप में दिखाया गया।

फिल्म में हिंदुओं की हत्याओं को कोई जगह नहीं मिली, यहाँ तक कि एक साधारण संदर्भ भी नहीं दिया गया। सख्त पुलिस कार्रवाई के पीछे की वजह कभी नहीं समझाई गई और न ही यह संकेत दिया गया कि कैसे खालिस्तानी आतंकवादी हिंदुओं, उग्रवाद का विरोध करने वाले सिखों, पुलिसकर्मियों और अधिकारियों की बेरहमी से हत्या कर रहे थे।

ऑपइंडिया ने वर्षों पहले इस पैटर्न को किया था चिन्हित

इस मोड़ पर दिलजीत की राजनीतिक विचारधारा प्रासंगिक हो जाती है। ऑपइंडिया वर्षों से कह रहा है कि उनकी सार्वजनिक छवि और उनका राजनीतिक संदेश आपस में मेल नहीं खाते।

2020 में किसानों के विरोध प्रदर्शन के दौरान यह साफ था कि आंदोलन को खालिस्तानी तत्वों ने हाईजैक कर लिया था। दिलजीत उनके पक्ष में सबसे मुखर सेलिब्रिटी आवाजों में से एक बनकर उभरे।

उन्होंने विरोध प्रोटेस्ट इकोसिस्टम पर सवाल उठाने वालों पर खुलकर हमला किया। इस अभिनेता-गायक को हमेशा की तरह लेफ्ट-लिबरल भीड़ द्वारा एक बहादुर पंजाबी ‘आइकन’ के रूप में सराहा गया।

जून 2020 में कॉन्ग्रेस के तत्कालीन लुधियाना सांसद रवनीत सिंह बिट्टू (जो बेअंत सिंह के पोते भी हैं) ने खालिस्तानी आतंकवादी संगठन सिख फॉर जस्टिस (SFJ) के गुरपतवंत सिंह पन्नू का समर्थन करने के लिए दिलजीत दोसांझ और अन्य के खिलाफ FIR दर्ज करने की माँग की थी।

बिट्टू ने भारत-चीन आमने-सामने के दौरान SFJ के भारत-विरोधी रुख और सिख सैनिकों को लुभाने के उसके प्रयास की ओर इशारा किया था। ऑपइंडिया ने रिपोर्ट की थी कि कैसे दिलजीत प्रतिबंधित खालिस्तान समर्थक अलगाववादी संगठन के समर्थन को लेकर निशाने पर आए थे।

ऑपरेशन ब्लूस्टार से लेकर जगतार सिंह जोहल तक

दिलजीत का विवादों से पुराना नाता रहा है। फिल्म ‘पंजाब 1984’ के लिए उनके द्वारा गाए गए गाने ‘रंगरुत’ के बोलों के बाद भी उन्हें आलोचना का सामना करना पड़ा था, जिसमें खुलकर बंदूकें उठाने और (1984 का) बदला लेने की बात कही गई थी।

गाने के बोल हैं ‘सोधा जालमा नु लाउना एके-47इया ने’ जिसका अनुवाद है ‘AK-47 अत्याचारियों से हिसाब चुकता करेगी’। कॉन्ग्रेस सांसद रवनीत बिट्टू ने तब उन पर ऑपरेशन ब्लूस्टार के 36 साल बाद शांति भंग करने का आरोप लगाया था।

इसके बाद खालिस्तानी आतंकवादी जगतार सिंह जोहल के लिए उनका समर्थन आया, जिसका नाम हिंदू और RSS नेताओं की हत्या के मामलों में NIA की चार्जशीट में है। जोहल को ब्रिगेडियर जगदीश कुमार गगनेजा, रविंदर गोसाईं, अमित शर्मा और अन्य की हत्या के मामले में आरोपित बनाया गया है।

दिलजीत ने जोहल के लिए प्रताड़ना के दावों और निष्पक्ष सुनवाई की बात की थी। हालाँकि निष्पक्ष सुनवाई हर किसी का कानूनी अधिकार है, लेकिन दिलजीत के समर्थन में यह चुनिंदा जल्दबाजी साफ दिखाई दे रही थी। जब पंजाब में हिंदू नेताओं की हत्या की जा रही थी, तब इस सेलिब्रिटी की अंतरात्मा कहाँ थी?

खालिस्तान की स्पष्ट निंदा करने से इनकार

अभिनेत्री से सांसद बनीं कंगना रनौत के साथ ऑनलाइन बहस के दौरान यह पैटर्न और साफ हो गया। किसान आंदोलन के दौरान कंगना ने उनसे बार-बार सिर्फ यह कहने को कहा कि वे खालिस्तान का समर्थन नहीं करते और खालिस्तानी तत्वों की निंदा करते हैं।

दिलजीत इस माँग से बचते रहे और ट्रोल सेनाओं ने सोशल मीडिया पर कंगना पर हमला कर दिया। दिलजीत ने कभी भी साफ तौर पर खालिस्तानियों की निंदा नहीं की।

पुराने विवाद अब एक पैटर्न की तरह दिखते हैं

ये उदाहरण बताते हैं कि वास्तव में एक पैटर्न है। विरोध पारिस्थितिकी तंत्र का समर्थन करना जब खालिस्तानी तत्व दिखाई दे रहे थे, सीधे पूछे जाने पर खालिस्तान की स्पष्ट निंदा करने से इनकार करना, हिंदू नेताओं की लक्षित हत्याओं के आरोपितों के प्रति सहानुभूति रखना और अब ‘सतलुज’।

‘सतलुज’ पर आई प्रतिक्रिया ने इस पूरे इकोसिस्टम को और अधिक बेनकाब कर दिया है। Zee5 से फिल्म हटाए जाने के बाद, जेल में बंद खालिस्तान समर्थक सांसद अमृतपाल सिंह की पार्टी अकाली दल (वारिस पंजाब दे) ने पूरे पंजाब में इसकी सार्वजनिक स्क्रीनिंग आयोजित करना शुरू कर दिया।

गाँवों में प्रोजेक्टर और बड़ी स्क्रीन के जरिए डाउनलोड की गई कॉपियाँ दिखाई गईं। पार्टी नेता रशपाल सिंह सोसन ने इन स्क्रीनिंग को बढ़ावा दिया और अमृतपाल सिंह का एक पुराना वीडियो भी साझा किया जिसमें वह जसवंत सिंह खालरा की तारीफ कर रहा था।

यह कोई छोटी बात नहीं है। अगर जेल में बंद खालिस्तान समर्थक सांसद अमृतपाल सिंह की पार्टी द्वारा किसी फिल्म को अपनाया और प्रसारित किया जा रहा है, तो इससे पता चलता है कि फिल्म की राजनीतिक उपयोगिता है।

उनकी पार्टी ‘सतलुज’ को सिनेमा के रूप में नहीं दिखा रही है, वो इसका इस्तेमाल राजनीतिक सामग्री के रूप में कर रही है। पंजाब पीड़ित भावना और अलगाववादी भावना के इर्द-गिर्द एक नैरेटिव को पुनर्जीवित करने के लिए दिलजीत के चेहरे और खालरा की कहानी का इस्तेमाल कर रही है।

इस तरह आतंक को ‘प्रतिरोध’ के रूप में रीपैकेज किया जाता है

‘सतलुज’ महज एक फिल्म नहीं है। यह खालिस्तानी उग्रवाद को नैतिक प्रतिरोध के रूप में रीपैकेज करने के लंबे समय से चल रहे प्रयास का नया अध्याय है। यह एक पुराना हथकंडा है जो सबसे पहले आतंकवाद के पीड़ितों को गायब करता है, फिर चरमपंथी का मानवीकरण करता है, फिर अकेले राज्य को खलनायक बनाता है और आखिर में दुष्प्रचार पर सवाल उठाने वाले किसी भी व्यक्ति को सिख-विरोधी कह देता है।

यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि खालिस्तानी दुष्प्रचार पर सवाल उठाना सिख-विरोधी नहीं बल्कि भारत-समर्थक है। यह पंजाब-समर्थक भी है। इस राज्य ने खालिस्तानी आतंकवाद के कारण बहुत कुछ झेला है।

हिंदू उग्रवाद का विरोध करने वाले सिख और पुलिसकर्मी मारे गए। परिवार तबाह हो गए। सरकार से गलतियाँ हुईं और ज्यादतियाँ भी हुईं, लेकिन वह अलगाववादियों और आतंकवादियों का महिमामंडन करने का बहाना नहीं बन सकती।

सुपरस्टार की छवि बरकरार, लेकिन राजनीति बेनकाब

दिलजीत दोसांझ के पास स्थिति साफ करने के लिए सालों का समय था। उनके पास बिना किसी चालाकी भरे शब्दों के यह कहने के लिए सालों थे कि खालिस्तान अस्वीकार्य है और पंजाब में आतंकवाद का महिमामंडन नहीं किया जा सकता। इसके बजाय हर नए विवाद ने सुई को उसी दिशा में धकेला है।

‘सतलुज’ के साथ मुखौटा उतर गया है। सुपरस्टार की छवि बनी हुई है। वैश्विक संगीत कार्यक्रम बने हुए हैं। पॉलिश की हुई PR टीम बनी हुई है। लेकिन इसके पीछे वही राजनीति और विचारधारा खड़ी है जिसके बारे में ऑपइंडिया ने सालों पहले चेतावनी दी थी।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

रामायण को ‘कार्टून’ कहा, ‘गोमूत्र’ का तंज कसा और आलोचकों को FIR से डराया: पढ़ें- कौन हैं TMC नेता नीलांजन दास, जिन्हें ममता बनर्जी के गढ़ में भीड़ ने पीटा

पश्चिम बंगाल में बीजेपी द्वारा तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के 15 साल के ‘दमनकारी शासन’ को खत्म किए हुए दो महीने हो चुके हैं लेकिन TMC नेताओं के खिलाफ जनता का गुस्सा शांत नहीं हुआ है। अभिषेक बनर्जी और कल्याण बनर्जी के बाद अब TMC नेता नीलांजन दास को भी बंगाल के लोगों के गुस्से का सामना करना पड़ा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, 8 जुलाई को कोलकाता के भवानीपुर इलाके में TMC आईटी सेल के प्रमुख और प्रवक्ता नीलांजन दास के साथ स्थानीय लोगों ने मारपीट की।

इस घटना के कई वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आए हैं। इन वीडियो में नीलांजन को लोगों के एक समूह से घिरा हुआ देखा जा सकता है। वीडियो में कुछ लोग उन्हें पीटते और घसीटते हुए भी नजर आ रहे हैं। इस दौरान नीलांजन रोते और कई बार लोगों से गुहार लगाते दिखाई देते हैं। वीडियो में नाराज स्थानीय लोगों को नीलांजन दास के लिए ‘चोर-चोर’ कहते हुए सुना जा सकता है।

कोलकाता के भवानीपुर में नीलांजन दास के साथ हुई बदसलूकी राजनीतिक रूप से इसलिए भी अहम है क्योंकि यह इलाका TMC प्रमुख ममता बनर्जी का गढ़ माना जाता है। जब दास एक पत्रकार से बात कर रहे थे, तो गुस्साई भीड़ ने उन्हें घसीटा। हालाँकि, एक पुलिस अधिकारी TMC नेता को वहाँ से सुरक्षित निकाल ले गए।

आलोचकों के खिलाफ FIR की धमकी देने से लेकर जनता के गुस्से का सामना करने तक: कौन हैं नीलांजन दास?

नीलांजन दास TMC के प्रमुख नेताओं में से एक हैं। वे पार्टी के प्रवक्ता हैं और टीवी न्यूज डिबेट में नियमित रूप से दिखाई देते हैं। नीलांजन TMC के स्टेट जनरल सेक्रेटरी हैं और पार्टी के आईटी एवं सोशल मीडिया विंग के प्रमुख भी हैं।

टीएमसी नेता नीलांजन दास का रिकॉर्ड रहा है कि वे अपनी पार्टी या ममता बनर्जी की आलोचना करने वालों के खिलाफ FIR दर्ज कराने की धमकी देते रहे हैं। नीलांजन दास को TMC की सांसद महुआ मोइत्रा का भी करीबी माना जाता है।

दिसंबर 2025 में नीलांजन दास ने लोकप्रिय X हैंडल ‘Befitting Facts’ चलाने वाले शशांक सिंह के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। शशांक सिंह ने कोलकाता में ग्लोबल फुटबॉल स्टार लियोनेल मेसी के दौरे के दौरान कथित बदइंतजामी को लेकर TMC सरकार की आलोचना करते हुए पोस्ट किए थे। इसी X यूजर ने महुआ मोइत्रा के खिलाफ भी आलोचना करते हुए पोस्ट किए थे।

नीलांजन दास द्वारा 11 दिसंबर को साइबर शिकायत दर्ज कराने के बाद शशांक सिंह को गिरफ्तार किया गया था। शिकायत में ‘Befitting Facts’ और एक अन्य X यूजर शुभम पर आरोप लगाया गया था कि उन्होंने TMC सांसद महुआ मोइत्रा पर संसद के अंदर ई-सिगरेट पीने का आरोप लगाते हुए ‘फर्जी, मनगढ़ंत और मानहानिकारक पोस्ट’ शेयर किए थे।

नीलांजन दास ने अपनी शिकायत को X हैंडल पर शेयर करते हुए लिखा था, “बीजेपी आईटी सेल के मूर्खों @subhsays और @BefittingFacts के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई है क्योंकि उन्होंने सांसद @MahuaMoitra के खिलाफ बेबुनियाद और मानहानिकारक ट्वीट किए।”

उस समय नीलांजन दास का X हैंडल भी सस्पेंड कर दिया गया था। इस साल अप्रैल में नीलांजन ने X यूजर के खिलाफ ममता बनर्जी का कार्टून पोस्ट करने को लेकर FIR दर्ज कराई थी।

जब एक X यूजर ने दास की इस उत्पीड़न करने वाली रणनीति की आलोचना करते हुए कहा कि ‘भारत एक लोकतंत्र है और TMC नेता को शर्म आनी चाहिए’ तो उन्होंने उस यूजर को ही धमकी दे डाली। इसके जवाब में नीलांजन दास ने लिखा, “4 मई के बाद आपको लोकतंत्र का असली रूप देखने को मिलेगा।”

दास जाहिर तौर पर BJP और उसके समर्थकों के खिलाफ TMC की चुनाव के बाद की हिंसक राजनीतिक बदले की कार्रवाई के बारे में बात कर रहे थे। हालाँकि, बंगाल के लोगों ने बीजेपी को शानदार जीत दिलाई और TMC को अपमानजनक हार दी।

पिछले कुछ वर्षों में नीलांजन दास ने ऑनलाइन धमकियों और FIR के जरिए TMC सरकार के कई आलोचकों को निशाना बनाया है। जून 2024 में कोलकाता की एक हाउसिंग सोसाइटी के लोगों को बीजेपी के पक्ष में वोट देने के लिए TMC सरकार द्वारा निशाना बनाया जा रहा था।

सेंट्रल कोलकाता के बेलेघाटा इलाके में स्थित ‘सनराइज हाइट्स’ के बाहर कचरा फेंका जा रहा था क्योंकि उस हाउसिंग कॉम्प्लेक्स के 543 निवासियों ने TMC के खिलाफ वोट दिया था।

बेहद बेशर्मी दिखाते हुए नीलांजन दास ने हाउसिंग सोसाइटी के बाहर कचरा फेंकने की कार्रवाई को ‘बदला लेने का अहिंसक तरीका’ बताया था।

TMC में सायोनी घोष से लेकर ममता बनर्जी तक कई हिंदू-विरोधी नेता हैं। ममता बनर्जी खुद हिंदू काफिरों से लड़ने की बात कहती रही हैं। नीलांजन दास भी TMC के टॉप हिंदू-विरोधी नेताओं में शामिल हैं।

2020 में जब देश कोविड महामारी के कारण लॉकडाउन का पालन कर रहा था, तब नीलांजन दास ने X पर एक पोस्ट किया था जिसमें उन्होंने हिंदू महाकाव्य रामायण को तंज कसते हुए कार्टून बताया था। उन्होंने ‘गोमूत्र’ वाला तंज भी कसा था।

2007 में दास ने एक X पोस्ट में वही बात दोहराई जो बात कॉन्ग्रेस कहती आई है। उन्होंने भगवान राम को भगवान ना मानते हुए एक कहा, “कौन से भगवान? रामायण महाकाव्य का एक पौराणिक पात्र।”

ऑनलाइन हिंदू-विरोध के अलावा, आलोचना करने वाली आवाजों के खिलाफ FIR की धमकियाँ देने और वैचारिक विरोधियों का अपमान करने का भी नीलांजन दास का रिकॉर्ड रहा है।

जुलाई 2025 में जब लोकप्रिय अभिनेत्री और BJP नेता रूपाली गांगुली ने तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के शासन की आलोचना की तो नीलांजन दास ममता बनर्जी के बचाव में उतर आए। हालाँकि, दास ने गांगुली की टिप्पणियों का जवाब नहीं दिया बल्कि उन्हें ‘फ्लॉप सोप अभिनेत्री’ कहकर खारिज कर दिया।

दास ने 19 जुलाई 2025 को लिखा, “भारत की सबसे वरिष्ठ महिला राजनेता को एक फ्लॉप सोप अभिनेत्री से लेक्चर लेने की जरूरत नहीं है। FO!”

अपने गुंडों जैसे व्यवहार को दिखाते हुए दास ने बंगाल में चुनाव के बाद हुई हिंसा पर एक लाइव टीवी डिबेट के दौरान वरिष्ठ सरकारी सलाहकार कंचन गुप्ता को ‘बूढ़ी चुड़ैल’ कहा था।

पश्चिम बंगाल में 4 मई के चुनाव नतीजों के बाद रिपोर्ट्स सामने आईं कि नीलांजन दास के खिलाफ कम से कम दो FIR दर्ज की गईं। एक FIR बंगाल के श्रीरामपुर में और दूसरी असम में दर्ज हुई थी। उस समय दास ने अपना X अकाउंट कुछ समय के लिए डीएक्टिवेट कर दिया था।

हैरानी की बात नहीं है कि सोशल मीडिया पर कई लोग कोलकाता में नीलांजन दास पर हुए हमले को ‘कर्मा’ बता रहे हैं क्योंकि आखिरकार वे अब उन्हीं धमकियों और डराने-धमकाने का सामना कर रहे हैं, जिनका इस्तेमाल वे वर्षों से अपनी पार्टी के आलोचकों के खिलाफ करते रहे थे।

(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।)

‘तुम्हें जहाँ से निकाला गया है, उन्हें भी वहाँ से निकालो’: पढ़ें- कैसे अयोध्या में विशाल मस्जिद ना बनने के पीछे चंदे का अकाल नहीं, जिहादी मानसिकता है असल वजह

यह खबर देश के हर नागरिक के लिए बेहद विचारणीय है। अयोध्या के धन्नीपुर में बनने वाली प्रस्तावित भव्य मस्जिद के लिए मुस्लिम समुदाय से उतने पैसे भी नहीं मिले, जितने की उम्मीद की जा रही थी। सुनने में शायद यह बात अजीब लगे लेकिन हकीकत में यह हँसने की नहीं बल्कि गहराई से सोचने की बात है। यह इस बात का स्पष्ट उदाहरण है कि एक खास समुदाय की सोच में कितना कट्टरपंथ और जिद्द बसी है।

ये मुस्लिम समुदाय सुप्रीम कोर्ट के आदेश से मिली दूसरी जगह पर एक भव्य मस्जिद, अस्पताल या लाइब्रेरी बनाने के लिए अपनी जेब से पैसा देने को तैयार नहीं हैं। वे आज भी इसी बात पर अड़े हैं कि राम जन्मभूमि की वही जमीन उनकी थी और वे उसी जमीन के मोह में फँसे हैं। यह मानसिकता केवल अयोध्या तक सीमित नहीं है, बल्कि देश में वक्फ की हर संपत्ति और विवादित ढांचे पर उनकी इसी सोच को बयाँ करती है।

चंदे का महासंकट: क्यों औंधे मुँह गिरी भव्य मस्जिद की योजना?

साल 2019 में जब सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला आया, तो उसके बाद सरकार ने अयोध्या के धन्नीपुर गाँव में मस्जिद के लिए 5 एकड़ जमीन दी थी। इस जमीन पर मुस्लिम ट्रस्ट ने बहुत बड़ा प्लान बनाया था। उन्होंने सोचा था कि यहाँ एक शानदार और भव्य मस्जिद बनेगी। साथ ही, लोगों की भलाई के लिए 300 बेड का एक बड़ा अस्पताल, एक बढ़िया लाइब्रेरी और एक बड़ा लंगर (कम्युनिटी किचन) भी तैयार किया जाएगा। पूरा नक्शा और तैयारी एकदम पक्की थी।

लेकिन असलियत में हुआ इसके ठीक उलटा। खुद मुस्लिम समाज के लोगों ने ही इस पूरे प्रोजेक्ट में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई और इससे अपना मुँह मोड़ लिया। अपनों के इस तरह साथ छोड़ने की वजह से यह बड़ा और खूबसूरत प्लान पूरी तरह ठप हो गया। अब संस्था के बड़े अधिकारियों का कहना है कि वे यहाँ कोई बड़ा प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि सिर्फ एक बहुत छोटी सी मस्जिद बनाएँगे। इस छोटी मस्जिद को खड़ा करने के लिए भी कम से कम 3 से 5 करोड़ रुपए चाहिए, लेकिन लाख कोशिशों के बाद भी समाज से सिर्फ डेढ़ करोड़ रुपए का ही चंदा मिल पाया है।

मजहबी किताबों की उल्टी व्याख्या और जमीन का मोह

देखिए, मस्जिद के लिए चंदा न मिलने की असली वजह यह बिल्कुल नहीं है कि लोगों के पास पैसे खत्म हो गए हैं। इसके पीछे असल में एक गहरी मजहबी और राजनीतिक सोच काम कर रही है। इस पुरानी और कट्टरपंथी सोच में जीत और हार का पैमाना हमारे आज के रक्षा विज्ञान से बिल्कुल अलग है। इस मानसिकता में लोग तब तक खुद को हारा हुआ मानते ही नहीं, जब तक कि उनके कब्जे से जमीन का एक छोटा सा टुकड़ा भी हमेशा के लिए न चला जाए। सीधा सा नियम समझ लीजिए… इनके लिए किसी भी तरह जमीन पर अपना कब्जा बनाए रखना ही सबसे बड़ी जीत है।

इस अजीब जिद के पीछे कुछ कट्टरपंथी विचारकों की अपनी तरह से की गई व्याख्या है। जैसे, कुरान के सूरा अल-बकरा की आयत 191 में एक जिक्र आता है कि ‘तुम्हें जहाँ से निकाला गया है, उन्हें भी वहाँ से निकालो।’ शुरुआत में यह बात सिर्फ मक्का की जमीन को वापस पाने के लिए कही गई थी, लेकिन समय के साथ कट्टरपंथी सोच के लोगों ने इसे पूरी दुनिया की जमीनों से जोड़ दिया। उनकी सोच यह बन गई कि जो जमीन एक बार ‘दार-अल-इस्लाम’ यानी इस्लामिक शासन के नीचे आ गई, वह हमेशा के लिए उन्हीं की हो गई। उसे किसी भी गैर-मुस्लिम के हाथ में जाने देना ये अपनी सबसे बड़ी मजहबी हार मानते हैं। यही वजह है कि इतिहास में सदियों पहले स्पेन (अंडालूसिया) में हुई अपनी हार का रोना ये लोग आज भी रोते हैं।

वक्फ संपत्तियों पर अवैध दावा और जमीन हड़पने की वही पुरानी नीति

यही रवैया हमें वक्फ बोर्ड और बाकी जमीनी विवादों में भी साफ देखने को मिलता है। इनकी सोच बहुत सीधी है, जिस भी सरकारी या प्राइवेट जमीन पर एक बार हक जता दिया या जिसे अपना मान लिया, उसे फिर किसी भी कीमत पर छोड़ना नहीं है। उसे छोड़ना ये अपनी नाक कटने जैसा या अपनी हार मानते हैं।

यही वजह है कि जब भी सरकार या अदालतें वक्फ की जमीनों की जाँच करने या उनके नियमों को सुधारने की कोशिश करती हैं, तो ये लोग तुरंत विरोध में खड़े हो जाते हैं और हंगामा शुरू कर देते हैं। इनके लिए जमीन हाथ से जाने का सीधा मतलब है अपनी ताकत का कम होना। पुरानी सोच के मुताबिक, जो जमीन एक बार इनके कब्जे में आ गई, उसे किसी और को देना ये अपनी सबसे बड़ी हार समझते हैं। इसी चक्कर में ये अदालती फैसलों को भी मन से स्वीकार नहीं कर पाते और हर जगह कोई न कोई नया विवाद खड़ा रखते हैं।

प्रशासनिक पेंच और अब सरकारी सहायता पर टिकी निगाहें

अयोध्या के धन्नीपुर में इस काम के समय पर शुरू न होने की वजह सिर्फ पैसों की कमी ही नहीं थी, बल्कि इस मस्जिद को बनाने वाले ट्रस्ट की अपनी कमियाँ भी थीं। सरकारी दफ्तर से नक्शा पास कराने और उसकी फीस जमा करने जैसे कागजी कामों में ही इस ट्रस्ट ने बहुत लंबा समय खराब कर दिया। छोटे-छोटे तकनीकी कामों को भी ये लोग समय पर नहीं संभाल पाए।

अब जब मुस्लिम समाज के लोगों ने इस बड़े प्रोजेक्ट को पूरी तरह नकार दिया है और चंदा देने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई, तो ये लोग अंदर ही अंदर एक नया रास्ता ढूँढ रहे हैं। ट्रस्ट के लोगों की बातों से अब ऐसा लग रहा है कि जब अपनों से कोई मदद नहीं मिली, तो इनकी नजरें सरकार की तरफ टिक गई हैं। अब ये जुगाड़ लगाने में जुटे हैं कि कैसे भी करके सरकारी मदद या विकास का पैसा मिल जाए, ताकि किसी तरह इनकी इज्जत बच सके।

एक तरफ भव्य राम मंदिर, दूसरी तरफ खोखली जिद

अगर आप इस पूरे मामले को ध्यान से देखें, तो यह एक तरफ भारत के गौरव और हमारे भव्य राम मंदिर के शानदार निर्माण को दिखाता है। वहीं दूसरी तरफ, यह कुछ लोगों की पुरानी और जिद से भरी सोच की पोल भी खोलता है। एक तरफ जहाँ देश-विदेश से करोड़ों हिंदुओं ने अपनी मर्जी से दिल खोलकर चंदा दिया और राम मंदिर का सपना पूरा कर दिखाया, वहीं दूसरी तरफ सिर्फ जिद और कट्टरपंथ के चक्कर में मुस्लिम समाज अपनी ही इस नई मस्जिद के लिए थोड़ी सी रकम भी जमा नहीं कर पाया।

चाहे वाराणसी का ज्ञानवापी मामला हो, धार की भोजशाला का विवाद हो या फिर वक्फ कानून में सुधार की बात… हर जगह सिर्फ जमीन पर अपना कब्जा जमाए रखने की यह मानसिक लड़ाई साफ दिखती है। अयोध्या के धन्नीपुर की मस्जिद का इतना बड़ा प्लान अचानक बहुत छोटा हो जाना इस बात का सबसे बड़ा सबूत है। जब तक लोग सच को स्वीकार नहीं करेंगे और अपनी सोच नहीं बदलेंगे, तब तक सिर्फ विरोध और जिद के दम पर कोई भी समाज आगे नहीं बढ़ सकता।

मुंबई की बारिश, रंग-बिरंगी जर्सियाँ और FIFA विश्व कप का नशा… जारी हैं फुटबॉल के खूबसूरत किस्से

मुंबई में बीते दो हफ्तों में जोरदार बारिश हुई है। सड़कें नदियाँ बन गई हैं। कुछ इलाकों में तो पिछले तीन दिनों से बिजली-पानी व राशन आदि की आपूर्ति नहीं हो सकी है।

तमाम बड़े शहर ठप्प पड़ गए हैं। मगर कल से बारिश थोड़ा कम हुई है। हालाँकि स्कूलों की छुट्टी कर दी गई है; सो, बच्चे वापस मैदानों की ओर लौटने लगे हैं। मैं कुछ पल ठहरकर आजाद मैदान में बच्चों को खेलते हुए देख रहा हूँ। इन कुछ पलों में जिंदगी बिल्कुल ठहर सी गई है।

मैदानों में जलभराव है, मगर इसकी चिंता किए बगैर विभिन्न राष्ट्रीय टीमों की रंग-बिरंगी जर्सियां पहने नन्हें बच्चे खुशी-खुशी फुटबॉल खेल रहे हैं। जिधर भी गेंद जा रही है पच्चीस-तीस बच्चे उधर ही छप्प-छप्प करते हुए दौड़ रहे हैं। जो थोड़े बड़े बच्चे हैं, वह बेहतरीन तरीके से खेलते नजर आ रहे हैं। पास में ही फैशन स्ट्रीट की कई दुकानों में फुटबॉल की जर्सियाँ लटकी हुई हैं। अमूमन जिन राष्ट्रों का हमने नाम भी नहीं सुना, उनकी टीमों की जर्सियाँ भी धड़ल्ले से बिक रही हैं। कोलाबा का कॉस्वे मार्केट भी रंग-बिरंगी जर्सियों से सजा हुआ है। जो लड़के-लड़कियाँ फुटबॉल के दीवाने हैं, वह जानते होंगे कि किसी रोज बड़ा होकर पैसे जोड़ कर नाईकी, एडिडास या पूमा की ओरिजनल जर्सी ले पाना उन सभी का एक ख्वाब रहता है। तब तक, बाजारों में बिक रही ऐसी ही जर्सियाँ उनके दिलों को सुकून देती हैं।

कॉर्पॉरेट दफ्तरों में भी बड़े मैचों के दिन ‘जर्सी-डे’ घोषित कर दिया जा रहा है। लोग अपनी पसंदीदा टीम की जर्सी पहने दफ्तर पहुँच रहे हैं। फुटबॉल को पागलपन की हद तक चाहने वाले केरल से तो चंद रोज पहले अर्जेंटीना-ब्राजील आदि की जर्सी पहने नन्हें बच्चों का स्कूल बसों से उतरकर कतार बनाकर विद्यालय में घुसने का विडियो भी वायरल हुआ था। कुछ दिनों के लिए फुटबॉल ने सभी को अपने आगोश में ले लिया है।

क्या आपने इस विश्व कप में हुआ इंग्लैंड बनाम मेक्सिको का मुकाबला देखा था? क्या आपने सेनेगल बनाम बेल्जियम का मुकाबला देखा था? क्या आपने पेराग्वे को जर्मनी की टीम को हराते हुए देखा था? क्या आपने अर्लिंग हालांड को ब्राजील के खिलाफ दो गोल दागते हुए देखा था? क्या आपने काबो वर्दे को पहले स्पेन, उरुग्वे और फिर अर्जेंटीना के खिलाफ शानदार तरीके से अंतिम क्षणों तक बिना हार माने वीरता से लड़ते देखा था? क्या आपने गत विजेता अर्जेंटीना को मिस्र के खिलाफ मैच की अंतिम घड़ी तक संघर्ष करते हुए देखा था?

अगर आपने इस विश्व कप में खेले जा रहे एक से बढ़कर एक मुकाबले नहीं देखे तो आप मैदान पर काफी कुछ बेहतरीन घटित होता हुआ देखने से वंचित रह गए हैं।

फुटबॉल शायद मानवों द्वारा रचित सबसे रोचक बॉल-गेम है। जीवन की ही भाँति यहाँ अंत तक कुछ भी हो सकता है, बशर्ते हम हार न मानें। फुटबॉल 90 मिनट में इतना कुछ दे जाता है कि आप कल्पना भी नहीं कर सकते। शायद इस खेल जैसा एड्रिनलिन रश किसी दूसरे खेल में नहीं।

अब, जबकि राउंड ऑफ 16 के सभी मुकाबले खेले जा चुके हैं, आज देर रात से क्वार्टर फाइनल दौर के मुकाबले खेले जाने लगेंगे। अभी तक यह टूर्नामेंट बेहद रोचक रहा है। मेजबान राष्ट्रों द्वारा संपूर्ण विश्व से मेक्सिको, अमेरिका व कनाडा पहुंचे खेलप्रेमियों का गर्मजोशी से स्वागत, एक से एक शानदार मैच। काबो वर्दे, कुराकाओ, इक्वाडोर, पेराग्वे जैसे राष्ट्रों की हार न मानने की जिद, अफ्रीकी राष्ट्रों का वैश्विक मंच पर शानदार प्रदर्शन, युवा पीढ़ी के नवीन सितारों का उदय; क्या कुछ देखने को नहीं मिला भला अबतक हमें। इस विश्व कप को शायद इतने सारे कमबैक्स, सेटबैक्स व अंतिम मिनटों में दागे इक्वलाइज़र्स के लिए याद रखा जाएगा।

खैर, कहानी अभी खत्म नहीं हुई है। अभी तो मात्र इंटरवल भर हुआ है। टूर्नामेंट आज से और भी भयंकर होने जा रहा है। अब, आज रात, पहला क्वार्टर फाइनल मुकाबला खेला जाना है। विश्व कप की चमचमाती स्वर्णिम ट्रॉफी अब विजेता से मात्र तीन जीत दूर है।

पहले क्वार्टर फाइनल में आज देर रात भारतीय समयानुसार डेढ़ बजे, बेहतरीन फॉर्म में चल रही मोरक्को की टीम पिछले संस्करण की उपविजेता फ्रांस से भिड़ने जा रही है।

मोरक्को के पास अंत तक हार न मानने का जज्बा है। फ्रांस के पास एक बवंडर की भाँति अटैक करने वाली टीम। यह निश्चित रूप से एक ब्लॉकबस्टर मैच होगा। दो बार की विजेता फ्रांस, इस विश्व कप में, अबतक सबसे संतुलित टीम नजर आई है। वह जितना बेहतरीन अटैक करती है उतना ही शानदार उनका डिफेंस भी है। रक्षापंक्ति में विलियम सालीबा के नेतृत्व में जूल्स कूंदे, उपामेकानो, कोनाटे, हर्नान्देज़ बंधु व लूका डीने जैसे खिलाड़ियों की फौज मौजूद है।

इनके पास बेंच पर चेर्की, माटेटा, थुर्रम, देसिरे दोऊ जैसे अटैकर्स हैं जो बेंच से आकर भी कुछ पलों में मैच का रुख बदलने का माद्दा रखते हैं। यह उन्हें बेहद घातक बना देता है। ऐसा प्रतीत होता है कि यह टीम विश्व कप का खिताब जीतने के मकसद से ही इस टूर्नामेंट में आई है और इनके विजय-रथ को रोकने का दुस्साहस शायद ही कोई टीम कर सकेगी। अभी तक के इनके तमाम मैच तो यही दर्शाते हैं।

वहीं, मोरक्को के पास इस्माइल साइबारी व ब्राहीम डियाज के रूप में दो भाले हैं। मोरक्को ने नीदरलैंड्स को सिर्फ हराया भर नहीं था बल्कि चारों खाने चित्त कर दिया था। उन्होंने रोनाल्ड कोमान की नीदरलैंड्स पर मैच के अंत तक ऐसा शिकंजा कसा कि नीदरलैंड्स अपना नैसर्गिक खेल खेल ही नहीं सकी।

मोरक्को को अब मात्र एक और अफ्रीकी टीम भर मानना बड़ी ग़लती होगी। वह पिछले संस्करण में सेमीफाइनल खेल चुके हैं और इस दफा भी अपने सभी मैचों में बेहतरीन अंदाज में खेलते हुए दिखे हैं।

गौरतलब है कि यह दोनों ही टीमें कतर विश्व कप के सेमीफाइनल में आमने-सामने थीं। जहां फ्रांस ने 2-0 से जीत जरूर हासिल कर ली थी परन्तु मोरक्को ने उनको उस रोज़ अल-बाएत स्टेडियम के मैदान में नब्बे मिनट चले मुकाबले में नरक के दर्शन करा दिए थे। मोरक्को पिछली बार का बदला भी लेना चाहेगा।

मोरक्को एक ऐसी टीम है जिसे आप कमतर कर के नहीं आंक सकते। वो सदैव मैदान में अपना सर्वस्व न्योछावर कर देते हैं। अचरफ हाकीमी के नेतृत्व में बोनू, बाऊदादी, अज़्ज़ेदीन ऊनाही, अमराबात व माज़ारूई जैसे खिलाड़ियों से लैस मोरक्को जरूर आज रात बड़ा शिकार करने के लिए आतुर होगी। यह मैच वाकई काफी रोचक होने जा रहा है।

एटलस लायंस क्या लेस ब्ल्यूज़ का रथ रोक सकेंगे यह पता चलेगा आज देर रात बोस्टन में होने जा रहे इस मुकाबले के बाद।

फीफा विश्व कप का महासंग्राम जारी है।
फुटबॉल के खूबसूरत किस्से भी जारी रहेंगे।
बने रहिए साथ।
वीवा ला फुटबॉल।

ऑस्ट्रेलिया के लोगों को अपना बुढ़ापा सँवारने के लिए भारत से आस, इन्वेस्ट किए ₹2800 करोड़: जानिए कौन सी स्कीम में मुनाफा पाकर AustralianSuper हुई गदगद

ऑस्ट्रेलिया की एक बहुत बड़ी कंपनी है। इसका नाम ‘ऑस्ट्रेलियनसुपर’ है। यह कंपनी वहाँ के लोगों के बुढ़ापे का पैसा यानी पेंशन संभालती है। यह ऑस्ट्रेलिया का सबसे बड़ा पेंशन फंड है। इस कंपनी ने भारत को लेकर एक बहुत बड़ा फैसला किया है। वह भारत सरकार के कामकाज और नीतियों से बहुत खुश है। इसी वजह से कंपनी ने भारत में और ज्यादा पैसा लगाने का एलान किया है।

यह कंपनी भारत की एक खास सरकारी स्कीम में पैसा लगा रही है। इस स्कीम का नाम ‘नेशनल इन्वेस्टमेंट एंड इंफ्रास्ट्रक्चर फंड’ (NIIF) है। इस बार कंपनी भारत में ₹2,800 करोड़ का नया निवेश करने जा रही है। भारत के लिए यह बहुत बड़ी बात है। इस नए निवेश को मिलाकर कंपनी अब तक भारत में बहुत सारा पैसा लगा चुकी है। अब भारत के अलग-अलग बाजारों में इस कंपनी का कुल निवेश ₹18,600 करोड़ से भी ज्यादा हो गया है। इससे साफ पता चलता है कि दुनिया का भारत पर भरोसा लगातार बढ़ रहा है।

भारत की स्कीम से मिला रिकॉर्ड तोड़ मुनाफा

यह पूरी कहानी भारत की तरक्की को दिखाती है। इस ऑस्ट्रेलियाई कंपनी ने भारत में पहली बार निवेश नहीं किया है। इससे पहले साल 2019 में भी कंपनी ने भारत की इसी एनआईआईएफ (NIIF) स्कीम पर भरोसा जताया था। तब कंपनी ने भारत में ₹1,350 करोड़ का निवेश किया था। कंपनी के मुख्य निवेश अधिकारी शॉन मैनुएल हैं। उन्होंने खुद इस निवेश को लेकर एक बड़ी बात बताई है।

शॉन मैनुएल ने कहा कि साल 2019 में किया गया वह निवेश उनके लिए वरदान साबित हुआ। वह निवेश उनकी कंपनी के इतिहास में सबसे ज्यादा मुनाफा देने वाले प्रोजेक्ट्स में से एक रहा। इस भारतीय स्कीम से कंपनी को उम्मीद से कहीं ज्यादा फायदा मिला। उन्हें यहाँ बहुत तगड़ा रिटर्न मिला। इसी शानदार मुनाफे और अच्छे अनुभव को देखकर कंपनी के लोग गदगद हो गए। यही वजह है कि वे भारत में दोबारा पैसा लगाने के लिए खुद आगे आए हैं।

ऑस्ट्रेलिया के बुजुर्गों की पेंशन बढ़ाएगा भारत

भारत और ऑस्ट्रेलिया में पेंशन का सिस्टम बिल्कुल अलग है। हमारे भारत में नौकरी करने वालों के लिए एक सरकारी व्यवस्था है। इसे हम ईपीएफओ (EPFO) कहते हैं। यहाँ हर महीने सैलरी से कटने वाला PF का पैसा एक ही सरकारी जगह जमा होता है। लेकिन ऑस्ट्रेलिया में ऐसा कोई एक बड़ा सरकारी सिस्टम नहीं है। वहाँ का नियम अलग है।

ऑस्ट्रेलिया में ऑस्ट्रेलियनसुपर जैसी बड़ी प्राइवेट कंपनियाँ यह काम करती हैं। ये कंपनियाँ लोगों की नौकरी के दौरान उनका पैसा जमा करती हैं। फिर बुढ़ापे में उन्हें पेंशन देती हैं। इसे वहाँ रिटायरमेंट फंड भी कहते हैं। अब ऑस्ट्रेलिया के आम लोग भारत पर बहुत बड़ा भरोसा कर रहे हैं। वे अपने बुढ़ापे की गाढ़ी कमाई को सुरक्षित रखना चाहते हैं।

साथ ही वे उस पैसे पर ज्यादा से ज्यादा मुनाफा भी कमाना चाहते हैं। इसके लिए उन्हें भारत सबसे सुरक्षित और अच्छा देश लग रहा है। ऑस्ट्रेलियनसुपर कोई छोटी-मोटी कंपनी नहीं है। इस अकेली कंपनी के पास ऑस्ट्रेलिया के 36 लाख से ज्यादा लोगों का पैसा जमा है। अगर इस पूरे पैसे को भारतीय रुपए में देखें, तो यह करीब ₹23,12,000 करोड़ से भी ज्यादा बनता है। यह बहुत बड़ी रकम होती है।

अब इस विशाल फंड का एक बड़ा हिस्सा भारत में आने जा रहा है। कंपनी इस पैसे को भारत के विकास से जुड़े कामों में लगाएगी। इस निवेश से दोनों देशों को बहुत बड़ा फायदा होगा। पहला फायदा ऑस्ट्रेलिया के बुजुर्गों को मिलेगा।

जब भारत की सरकारी स्कीम से कंपनी को बढ़िया मुनाफा होगा, तो वहाँ के बुजुर्गों की पेंशन की रकम बढ़ जाएगी। दूसरा बड़ा फायदा हमारे अपने देश भारत को होगा। इस विदेशी पैसे से भारत में बड़े-बड़े हाईवे, पुल, बिजली और पानी जैसे जरूरी प्रोजेक्ट्स तैयार होंगे। इससे हमारे देश का इंफ्रास्ट्रक्चर बहुत मजबूत हो जाएगा।

भारत की तारीफ में पढ़े कसीदे

ऑस्ट्रेलिया की इस बड़ी कंपनी के बड़े अधिकारियों ने भारत सरकार की खुलकर तारीफ की है। उन्होंने भारत के काम करने के तरीके को बहुत सराहा है। अधिकारियों ने बताया कि वे भारत में पैसा क्यों लगा रहे हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह भारत में हो रही तेज तरक्की है। भारत की अर्थव्यवस्था बहुत मजबूती से आगे बढ़ रही है। यहाँ का मध्यम वर्ग यानि मिडिल क्लास भी बहुत तेजी से बड़ा हो रहा है।

इसके पास सामान खरीदने और खर्च करने के लिए अच्छा पैसा है। बाजार में इस रौनक को देखकर विदेशी कंपनियाँ भारत की तरफ आकर्षित हो रही हैं। इसके अलावा एक और सबसे बड़ी बात है। वह बात है भारत सरकार के नियम और कानून। अधिकारियों ने कहा कि भारत सरकार की नीतियाँ हमेशा एक जैसी रहती हैं। यहाँ बार-बार नियम बदलते नहीं हैं। इससे विदेशी कंपनियों का काम करना आसान हो जाता है। वे सरकार पर पूरा भरोसा कर पाती हैं।

भारत सरकार ने बाहर के देशों से आने वाले पैसे के लिए अपने दरवाजे खोल दिए हैं। अब विदेशियों के लिए भारत में पैसा लगाना और बिजनेस शुरू करना बहुत आसान हो चुका है। कागजी काम भी अब ज्यादा पेचीदा नहीं रहा। भारत सरकार की इसी ईमानदारी और अच्छे माहौल को देखकर कंपनी का भरोसा मजबूत हुआ है। इसी पक्के भरोसे के कारण ऑस्ट्रेलियनसुपर ने भारत में अपना निवेश इतना ज्यादा बढ़ाने का बड़ा फैसला लिया है।

क्या है यह एनआईआईएफ (NIIF) स्कीम?

एनआईआईएफ (NIIF) स्कीम का पूरा नाम ‘नेशनल इन्वेस्टमेंट एंड इंफ्रास्ट्रक्चर फंड’ है। भारत सरकार ने इस स्कीम को साल 2015 में शुरू किया था। इसे आप सरकार का एक बहुत बड़ा गुल्लक कह सकते हैं। सरकार ने यह गुल्लक क्यों बनाया? इसका एक बहुत बड़ा कारण था। सरकार चाहती थी कि दुनिया भर के अमीर और बड़े निवेशक भारत में अपना पैसा लगाएँ। वे भारत के विकास में भागीदार बनें। इसी सोच के साथ इस खास फंड की शुरुआत की गई थी।

अब समझते हैं कि इस स्कीम में काम कैसे होता है। जब विदेशी कंपनियाँ या बड़े बैंक इस फंड में अपना पैसा डालते हैं, तो भारत सरकार उस पैसे को देश के विकास में लगाती है। इस पैसे से हमारे देश में बड़े-बड़े काम होते हैं। जैसे आलीशान और चौड़े हाईवे बनाए जाते हैं। नदियों पर मजबूत पुल तैयार होते हैं। बड़े-बड़े समुद्री बंदरगाह और नए एयरपोर्ट बनाए जाते हैं। इसके अलावा बिजली, पानी और अन्य जरूरी सुविधाएँ भी इसी पैसे से सुधारी जाती हैं। यानी विदेशियों के पैसे से हमारे देश का ढांचा मजबूत होता है।

इस स्कीम की सबसे अच्छी बात इसका सुरक्षित होना है। जब विदेशी कंपनियाँ इस सरकारी स्कीम में पैसा लगाती हैं, तो उन्हें डूबने का कोई डर नहीं रहता। मोदी सरकार उन्हें पूरी सुरक्षा देती है। साथ ही उन्हें इस पैसे पर बहुत अच्छा और तय मुनाफा भी मिलता है। दुनिया के बाकी देशों के मुकाबले भारत में निवेश करना बहुत फायदेमंद साबित हो रहा है। जब विदेशी कंपनियों को दिखता है कि उनका पैसा यहाँ पूरी तरह सुरक्षित है और कमाई भी तगड़ी हो रही है, तो वे खुद-ब-खुद भारत की तरफ खींची चली आती हैं। यही वजह है कि आज दुनिया भर के बड़े निवेशक भारत पर आँख मूंदकर भरोसा कर रहे हैं।

मेलबर्न में जुटे दोनों देशों के प्रधानमंत्री और बड़े-बड़े बिजनेसमैन

इस बहुत बड़े और ऐतिहासिक निवेश का एलान मेलबर्न शहर में किया गया। वहाँ ‘ऑस्ट्रेलिया-इंडिया सीईओ फोरम‘ नाम की एक बहुत बड़ी बैठक चल रही थी। इसी बैठक के दौरान इस निवेश की घोषणा हुई। यह मौका दोनों देशों के लिए बेहद खास था। इस बड़े कार्यक्रम में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद मौजूद थे। उनके साथ ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज भी वहाँ बैठे थे। दोनों देशों के राष्ट्रध्यक्षों का एक साथ आना इस बात का सबूत है कि यह डील कितनी बड़ी है।

इस बैठक में सिर्फ दोनों देशों के प्रधानमंत्री ही नहीं थे। उनके अलावा वहाँ दुनिया भर के दिग्गज लोग जुटे थे। बैठक में दोनों देशों के 200 से भी ज्यादा बड़े-बड़े बिजनेस लीडर्स और बिजनेसमैन शामिल हुए थे। इसके साथ ही दोनों देशों की बड़ी-बड़ी यूनिवर्सिटी के चांसलर और वाइस-चांसलर भी वहाँ आए हुए थे।

इस महा-सम्मेलन में ऑस्ट्रेलियनसुपर कंपनी के सबसे बड़े अधिकारी पॉल श्रोडर ने भी हिस्सा लिया था। उन्होंने भारत के साथ काम करने और इस नई साझेदारी को लेकर अपनी खुशी जाहिर की। उन्होंने माना कि भारत के साथ मिलकर काम करना उनके लिए फायदे का सौदा है।

मोदी के भारत में हर तरफ हैं निवेश के बड़े मौके

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस बड़ी बैठक में विदेशी निवेशकों का बहुत गर्मजोशी से स्वागत किया। उन्होंने दुनिया के सामने नए भारत की असली ताकत और खूबियों को रखा। आज का भारत बहुत तेजी से बदल रहा है। यहाँ डिजिटल क्रांति आ चुकी है और हर काम मोबाइल-इंटरनेट से चुटकियों में हो जाता है। सरकार लगातार नए और अच्छे आर्थिक सुधार कर रही है, जिससे भारत में व्यापार करना बहुत आसान और तेज हो गया है।

PM मोदी ने ऑस्ट्रेलिया की कंपनियों को भारत आने का खुला न्योता दिया। उन्होंने कंपनियों से यहाँ अपनी फैक्ट्रियाँ लगाने, प्रदूषण मुक्त बिजली बनाने और मोबाइल-कंप्यूटर की चिप (सेमीकंडक्टर) तैयार करने को कहा। आजकल भारत में इलेक्ट्रिक गाड़ियाँ (EV), ऑनलाइन बिजनेस और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) बहुत लोकप्रिय हो रहे हैं, जहाँ विदेशी कंपनियों के लिए कमाई के बहुत बड़े मौके हैं।

इस महा-बैठक में दोनों देशों के बीच रक्षा यानी देश की सुरक्षा को लेकर भी कई ऐतिहासिक फैसले हुए हैं। भारत और ऑस्ट्रेलिया मिलकर सेना से जुड़े आधुनिक सामान बनाने के लिए एक ‘डिफेंस इनोवेशन कॉरिडोर’ तैयार करेंगे। दोनों देशों ने मिलकर आतंकवाद को जड़ से खत्म करने पर बहुत जोर दिया है। एक संयुक्त रक्षा घोषणा के जरिए दोनों देशों की सेनाओं के बीच आपसी तालमेल को और मजबूत किया जाएगा, जिससे वे एक-दूसरे से नई तकनीक और हुनर सीखेंगी। इसके साथ ही समुद्री सीमाओं की सुरक्षा और निगरानी को बेहतर बनाने के लिए ‘मैरीटाइम सिक्योरिटी रोडमैप’ पर काम तेज होगा। इस दोस्ती और भरोसे को और बढ़ाने के लिए भारतीय सेना के एक अधिकारी को ऑस्ट्रेलिया के डिफेंस कॉलेज में तैनात भी किया जाएगा।

बिजली और ऊर्जा के मामले में भी दोनों देशों ने एक नया इतिहास रच दिया है। भारत में बिजली की जरूरतों को पूरा करने और इसकी कमी को दूर करने के लिए दोनों देशों के बीच यूरेनियम को लेकर एक बहुत बड़ा समझौता हुआ है। इसके तहत ऑस्ट्रेलिया अब भारत को यूरेनियम की सुरक्षित सप्लाई करेगा, जो भारत के परमाणु बिजली घरों के काम आएगा। इससे हमारे देश में बिना किसी प्रदूषण के भारी मात्रा में बिजली बनाई जा सकेगी। इतना ही नहीं, भारत ने अपनी रणनीति बदलते हुए ऑस्ट्रेलिया से एलएनजी (LNG) गैस, कोयला और डीजल जैसी चीजें भी ज्यादा मात्रा में मँगाने का फैसला किया है। इससे भारत के उद्योगों और गाड़ियों के लिए भविष्य में कभी भी ईंधन की कमी नहीं होगी।

आने वाले समय की आधुनिक तकनीक को ध्यान में रखते हुए दोनों देशों ने एक और बड़ा कदम उठाया है। दोनों देश मिलकर ‘क्रिटिकल मिनरल कॉरिडोर’ यानी जरूरी खनिजों के लिए एक खास रास्ता बनाएँगे। मोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक गाड़ियों की बैटरी और कंप्यूटर चिप्स बनाने के लिए कुछ खास खनिजों की जरूरत होती है, जो इस समझौते के बाद भारत को बहुत आसानी से मिल सकेंगे। इसके साथ ही दोनों देशों के बीच इंटरनेट पर होने वाले फ्रॉड और हैकिंग को रोकने के लिए एक खास ‘PACTS’ साइबर सुरक्षा समझौता हुआ है। प्रधानमंत्री मोदी ने साफ कहा कि भारत का बड़ा बाजार और ऑस्ट्रेलिया की बेहतरीन तकनीक मिलकर दोनों देशों के लिए बहुत फायदे का सौदा है। यह पूरा समझौता दिखाता है कि भारत अब वैश्विक मंच पर एक बहुत बड़ी महाशक्ति बनकर उभर रहा है।