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आयातित नहीं अनादि है भारत की सभ्यता, विदेशी प्रोपेगेंडा फैलाना बंद करो: मोहनजोदड़ो की पशुपति मुहर पर ‘एलामाइट प्रभाव’ बताने वाली ऑड्रे ट्रुश्के की यूँ खुली पोल

‘भारत को अपनी जड़ों से काटो, सभ्यता को उधार का साबित करो और यहाँ के निवासियों में हीनभावना भर दो…’ यही वह औपनिवेशिक फार्मूला था जिसने दशकों तक भारत के इतिहास को तोड़ने-मरोड़ने का काम किया। भारत को लेकर लगातार यह भ्रम फैलाने की कोशिश की गई कि यहाँ की सभ्यता ‘आयातित’ है।

इस भूमि की संस्कृति बाहर से आए लोगों ने बनाई। यहाँ के देवता, भाषा, ज्ञान सब बाहर से आया है। अब आप कहेंगे कि आज इसका जिक्र क्यों? वो इसलिए क्योंकि आज भी ऐसी ही कोशिशें जारी हैं।

पशुपति शिव की परंपरा से निकला ट्रुश्के का दर्द

हालिया विवाद की शुरुआत केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय के एक ट्वीट और उस पर इतिहासकार ऑड्रे ट्रुश्के (Audrey Truschke) की टिप्पणी के बाद हुई। दरअसल, बुधवार (27 मई 2026) को संस्कृति मंत्रालय ने मोहनजोदड़ो से प्राप्त ‘पशुपति मुहर’ से जुड़ा एक पोस्ट किया था।

मंत्रालय ने X पर लिखा, “भारत की अखंड और अनवरत चली आ रही सभ्यता का यह सबसे शक्तिशाली प्रतीकों में से एक!” मंत्रालय ने लिखा, “अविभाजित भारत के मोहनजोदड़ो में मिली यह लगभग 4,300 साल पुरानी स्टियाटाइट (पत्थर) की मुहर एक योग मुद्रा में बैठे व्यक्ति को दिखाती है, जिसे व्यापक रूप से शिव-पशुपति माना जाता है। यह आकृति ‘मूलबंधासन’ में बैठी दिखाई देती है और इसके चारों ओर कई जानवर बने हुए हैं।”

संस्कृति मंत्रालय ने लिखा, “भले ही प्राचीन सभ्यता से जुड़े स्थल आज आधुनिक सीमाओं के कारण अलग देशों में हों लेकिन इस विरासत का जीवंत संरक्षण आज भी भारत ही कर रहा है। पशुपति मुहर में दिखने वाली योग परंपरा, शैव प्रतीक और आध्यात्मिक सोच आज भी भारत के मंदिरों, शिव पूजा, योग परंपराओं और सांस्कृतिक जीवन में जीवित हैं।”

मंत्रालय ने लिखा, “वैदिक काल से लेकर आज के भारत तक यह सभ्यतागत धारा लगातार और बिना टूटे चली आ रही है। यह हमारी सोच, दर्शन, धार्मिक परंपराओं और सामूहिक चेतना में गहराई से बसी हुई है।”

पश्चिमी इतिहासकारों को भारत की हजारों साल की सांस्कृतिक निरंतरता अखरती है। एक ऐसी सभ्यता जिसने असंख्य आक्रमण झेले लेकिन अपनी मूल पहचान नहीं छोड़ी। यह बात पश्चिमी नजरिए के लिए असहज थी और आज भी है। ऑड्रे ट्रुश्के को भी संस्कृति मंत्रालय का यह ट्वीट नागवार गुजरा।

ऑड्रे ट्रुश्के ने इस पर जवाब देते हुए लिखा, “ये शिव नहीं हैं। अधिक संभावना है कि यह प्रोटो-एलामाइट (Proto-Elamite) प्रतीकों से प्रभावित एक आकृति है जो एक यूरेशियन देवता ‘जानवरों के स्वामी’ (Lord of Animals) को दिखाती है। भारत का इतिहास बेहद अद्भुत, शानदार और गौरवशाली है। इसलिए इसे सही तरीके से समझना और बताना बहुत जरूरी है।”

अपनी किताब में भी ट्रुश्के ने फैलाया है भ्रम

इसी से जुड़े एक अन्य ट्वीट में ट्रुश्के ने अपनी किताब ‘India: 5,000 Years of History on the Subcontinent’ में इसका विस्तार से जिक्र किए जाने की चर्चा की है। इस पुस्तक में ट्रुश्के ने लिखा है, “प्राचीन इतिहास में सांस्कृतिक प्रभावों का पता लगाना आसान नहीं होता लेकिन कुछ सीमित संकेत मिलते हैं कि सिंधु सभ्यता के कुछ पहलू पश्चिम की संस्कृतियों से प्रभावित हो सकते हैं। खासकर, सिंधु सभ्यता में एलामाइट (Elamite) संस्कृति के कुछ निशान दिखते हैं।”

वह आगे लिखती हैं, “सिंधु सभ्यता के लोगों ने एलामाइट परंपराओं से कुछ पौराणिक विचार (mythical ideas) अपनाए हो सकते हैं, चाहे उन्होंने यह सीधे सीखा हो या किसी माध्यम से। उदाहरण के लिए, सिंधु घाटी की एक प्रसिद्ध मुहर में एक प्रसिद्ध यूरेशियन ‘देवता जानवरों के स्वामी’ (Lord of the Animals) को दिखाया गया है, जो पालथी मारकर बैठा है, कमर पर उभरी हुई गाँठ जैसे वस्त्र और सिर पर सींगों वाला मुकुट पहने हुए है। यह चित्र ‘प्रोटो-एलामाइट मुहरों’ से मिलता-जुलता माना जाता है।”

ट्रुश्के की किताब का एक हिस्सा

मार्शल ने बताया- ‘शिव’

मोहनजोदड़ो की खोज 1922 में ASI के अधिकारी राखल दास बनर्जी ने की थी। यह खोज हड़प्पा में बड़ी खुदाई शुरू होने के लगभग दो साल बाद हुई। इस स्थल पर 1930 के दशक तक बड़े पैमाने पर खुदाई का काम सर जॉन मार्शल, के. एन. दीक्षित, अर्नेस्ट मैके और कई अन्य निदेशकों के नेतृत्व में किया गया।

(फोटो साभार: Harappa.com)

सर जॉन मार्शल ने 1931 में अपनी पुस्तक Mohenjo-daro and the Indus Civilization (Vol-1) में पशुपति मुहर को ‘ऐतिहासिक शिव (historic Shiva) का प्रारंभिक रूप’ (prototype of Shiva) बताया था।

उन्होंने लिखा, “इस पृथ्वी या मातृ देवी (Mother Goddess) के साथ-साथ मोहनजोदड़ो में एक पुरुष देवता भी दिखाई देता है, जिसे पहली नजर में ही ऐतिहासिक शिव के प्रारंभिक रूप (prototype) के तौर पर पहचाना जा सकता है। इस देवता का चित्रण एक*साधारण तरीके से उकेरी गई मुहर पर बेहद प्रभावशाली ढंग से किया गया है, जिसे हाल ही में मिस्टर मैके ने खोजा था।”

मार्शल ने लिखा, “यह देवता, जो तीन मुखों वाला प्रतीत होता है, एक नीचे बने भारतीय आसन पर योग की विशिष्ट मुद्रा में बैठा हुआ है। उसकी टाँगें शरीर के नीचे मुड़ी हुई हैं, एड़ी से एड़ी मिली हुई है और पैरों की उंगलियाँ नीचे की ओर मुड़ी हुई हैं। उसकी बाँहें फैली हुई हैं और हाथ घुटनों पर टिके हुए हैं, जिनमें अंगूठे सामने की ओर दिखाई देते हैं। कलाई से कंधे तक उसकी बाँहें चूड़ियों/कंगनों से ढकी हुई हैं, जिनमें 8 छोटे और 3 बड़े कंगन हैं।”

मार्शल की पुस्तक का हिस्सा

ट्रुश्के को विद्वानों ने दिखाया संस्कृति का आईना

ट्रुश्के के इन दावों की असलियत सामने लानी भी जरूरी थी और यह हुआ भी। कई लोगों ने ट्रुश्के के इन दावों की परतें उधेड़ दीं। लेखक अमीश ने X पर ट्रुश्के को जवाब देते हुए लिखा, “प्रोटो-एलामाइट? पशुपति मुहर में हाथी, भैंस और गैंडा दिखते हैं।”

उन्होंने लिखा, “प्राचीन एलाम आज के दक्षिण-पश्चिमी ईरान के इलाके में केंद्रित था। वहाँ हाथी, जल भैंसा और गैंडा प्राकृतिक रूप से पाए ही नहीं जाते थे। वैसे, ये तीनों भारत में पाए जाते हैं। इसके अलावा, मुहर में दिख रही आकृति एक योग मुद्रा में बैठी हुई है। तो क्या अब योग भी एलामाइट हो गया? सच में?”

प्रोफेसर और हिंदू परंपराओं की जानकार डॉ. लावण्या वेमसानी ने भी इस पर प्रतिक्रिया दी है और इसे विस्तार से समझाया है। उन्होंने X पर लिखा, “मैं आपको बता नहीं सकती कि पशुपति मुहर को लेकर मुझे कितने मेसेज मिले। वजह यह थी कि एक पश्चिमी इतिहासकार ने इसकी तुलना एक पूरी तरह अलग एलामाइट (Elamite) मुहर से कर दी जबकि दोनों मुहरों में साफ और बड़े अंतर दिखाई देते हैं।”

उन्होंने लिखा, “एलामाइट मुहर और पशुपति/प्रोटो-शिव मुहर बिल्कुल अलग हैं। वे एक जैसी नहीं हैं। तुलना करने लायक उनमें 1% भी समानता नहीं है। सिंधु-सरस्वती सभ्यता की पशुपति मुहर में शिव को मूलबंधासन में बैठे दिखाया गया है। यह एक कठिन योग मुद्रा है जिसे केवल अनुभवी योगी ही कर पाते हैं। यह दुनिया के प्रति सजगता और आंतरिक शांति का प्रतीक मानी जाती है।”

लावण्या वेमसानी आगे लिखती हैं, “इस मुहर में शिव के चारों ओर भारत में पाए जाने वाले जानवर दिखते हैं, जैसे बाघ, हाथी और गैंडा। यह बात उन लोगों को परेशान करती है जो भारतीय इतिहास के बारे में गलत धारणाएँ फैलाते रहे हैं। वे मानें या न मानें, भारतीय इतिहास अब उनके बनाए ढाँचों पर नहीं टिका है। सच्चाई सामने आ रही है। #ColonizedMinds को सच के सामने झुकना चाहिए और तथ्यों पर आधारित इतिहास को स्वीकार करना चाहिए।”

उन्होंने लिखा, “अगर किसी तरह तुलना करनी भी हो तो वह आकृति शिव के बैल नंदी जैसी कही जा सकती है लेकिन शिव या पशुपति नहीं। हालाँकि, यहाँ ऐसी तुलना करना भी संदर्भ से बाहर की बात है। और मुहर पर बने बाकी जानवरों का क्या? अगर किसी को ‘जानवरों का स्वामी’ दिखाना हो, तो केवल एक जानवर बनाकर बात खत्म नहीं होती। पशुपति मुहर में तो आकृति चारों ओर जानवरों से घिरी हुई दिखाई देती है।”

ऐसे ही और भी सैकड़ों लोगों ने तर्क दिए हैं और बताया है कि क्यों यह भगवान शिव की आकृति ही है। क्यों यह उस सांस्कृतिक निरंतरता का प्रतीक है जिसे पश्चिमी इतिहासकार झुठलाने की कोशिश करते हैं। जिसके लिए ‘आर्य आक्रमण’ जैसी थ्योरी गढ़ी जाती हैं।

इन विद्वानों द्वारा भारत को यह महसूस कराया गया कि उसकी अपनी कोई मौलिकता नहीं, वह हमेशा बाहरी प्रभावों का उत्पाद रहा है। इन सबके बाद भी वो सवाल जिसका जवाब आज तक इनके पास नहीं है कि अगर भारत की सभ्यता आयातित थी तो दुनिया की बाकी प्राचीन सभ्यताओं की तरह इसकी मूल पहचान खत्म क्यों नहीं हुई?

क्यों आज भी इस देश में वही मंत्र गूँजते हैं, जिनका उल्लेख हजारों वर्ष पुराने ग्रंथों में मिलता है? क्यों काशी, मथुरा, अयोध्या, प्रयाग, रामेश्वरम, पुरी और द्वारका जैसी तीर्थ परंपराएँ सदियों से जीवित हैं?

पशुपति सील से लेकर वैदिक साहित्य तक, योग से लेकर दर्शन तक, पुरातत्व से लेकर सांस्कृतिक परंपराओं तक संकेत बताते हैं कि भारत की सभ्यता की जड़ें यहीं हैं। यह कहना कि भारत ने बाहरी प्रभाव नहीं लिए भी सही नहीं है।

भारत ने दुनिया से संवाद किया, बहुत कुछ आत्मसात भी किया होगा। लेकिन आत्मसात करना और ‘आयातित’ होना दो बिल्कुल अलग बातें हैं। भारतीय सभ्यता की ताकत ही यही रही कि उसने बाहर से आने वाले विचारों को अपने भीतर पचाया लेकिन अपनी आत्मा नहीं खोई।

इतिहास पर बहस होनी चाहिए, सवाल भी पूछे जाने चाहिए लेकिन बहस के नाम पर एकतरफा प्रोपेगेंडा नहीं होना चाहिए। भारत की सभ्यता को पश्चिमी साँचे में फिट करने की जिद ऐसे वामपंथी इतिहासकारों को छोड़नी ही होगी।

यह सभ्यता ना तो किसी जहाज में भरकर आई थी, ना किसी तलवार के साथ रही। यह हिमालय की तरह यहीं खड़ी हुई, नदियों की तरह यहीं बही और हजारों वर्षों से यहीं साँस ले रही है।

सिद्धारमैया चले गए, लेकिन कर्नाटक कॉन्ग्रेस में छोड़ गए ‘शांत तूफान’: समझिए क्यों DK शिवकुमार की राह नहीं होगी आसान, राहुल गाँधी की भी बढ़ेंगी मुश्किलें

कर्नाटक में मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने इस्तीफा दे दिया है। यह लगभग तय माना जा रहा है कि डीके शिवकुमार अब राज्य के अगले मुख्यमंत्री होंगे। लंबे वक्त तक कर्नाटक में मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर खींचतान और लड़ाई चल रही थी लेकिन बीते कुछ दिनों में कॉन्ग्रेस के खेमे में शांति नजर आई है।

हालाँकि, यह शांति कर्नाटक में कितने दिन टिकेगी और यह शांति कहीं बड़े तूफान से पहले का संकेत तो नहीं, ऐसी कई अटकलें लग रही हैं। सिद्धारमैया के जाने से सवाल कॉन्ग्रेस में राहुल गाँधी के घटते कद और प्रियंका गाँधी के उभार को लेकर भी उठने लगे हैं। इन्हीं सब संकेतों को इस खबर में विस्तार से समझने की कोशिश करेंगे।

आसानी से नहीं दी कुर्सी, मजबूरी में छोड़ना पड़ा पद

सिद्धारमैया ने अपनी मर्जी से इतनी आसानी से इस्तीफा नहीं दिया है। वह तो दिल्ली अपने काम का हिसाब देने और कैबिनेट विस्तार की बात करने गए थे। लेकिन दिल्ली दरबार में उन्हें अपनी इच्छा के खिलाफ जाकर इस्तीफा देने के लिए मजबूर होना पड़ा।

दिल्ली में हुई इस अहम बैठक के दौरान सिद्धारमैया और DK शिवकुमार को काफी देर तक बाहर इंतजार भी कराया गया। इसी वजह से राजनीतिक गलियारों में तरह-तरह की अटकलें तेज हो गईं। आखिरकार राहुल गाँधी के सीधे हस्तक्षेप और उनके कहने पर वह भारी मन से पद छोड़ने के लिए तैयार हो गए।

राज्यसभा जाने से इनकार, कर्नाटक में दूसरा पावर सेंटर

कॉन्ग्रेस हाईकमान चाहता था कि सिद्धारमैया राज्य की राजनीति छोड़कर दिल्ली आ जाएँ। खबरें है कि उन्हें मल्लिकार्जुन खरगे की जगह राज्यसभा भेजने और संसद में विपक्ष का नेता बनाने का बड़ा ऑफर भी मिला था। लेकिन सिद्धारमैया ने इसे ठुकराते हुए साफ कह दिया कि राष्ट्रीय राजनीति में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं है और वे राज्य में ही रहकर अगले दो साल तक विधायक के रूप में काम करेंगे। सिद्धारमैया ने यह भी साफ कर दिया कि अगला मुख्यमंत्री आलाकमान और विधायक दल मिलकर ही तय करेंगे।

सिद्धारमैया के इस फैसले से साफ है कि वह कर्नाटक की राजनीति को इतनी आसानी से नहीं छोड़ेंगे। वह राज्य में ही डटे रहेंगे और सरकार के समानांतर एक अलग और मजबूत पावर सेंटर बन जाएँगे। अगर वह कर्नाटक की जमीन पर जमे रहते हैं, तो नए मुख्यमंत्री बनने जा रहे DK शिवकुमार के लिए बिना किसी दबाव के खुलकर राज करना बहुत मुश्किल हो जाएगा।

करीबियों पर गिरेगी गाज, तो बढ़ेगी अंदरूनी कलह

अब जब DK शिवकुमार कर्नाटक की कमान संभालेंगे, तो सरकार और संगठन में बहुत बड़े बदलाव होना तय है। राजनीतिक गलियारों में माना जा रहा है कि नई कैबिनेट से सिद्धारमैया के सबसे करीबी मंत्रियों को धीरे-धीरे बाहर का रास्ता दिखाया जा सकता है।

मंत्रियों को हटाने के अलावा सिद्धारमैया गुट के करीबियों के सरकारी काम भी रोके जा सकते हैं। अगर आने वाले दिनों में ऐसा होता है, तो पार्टी की यह आपसी लड़ाई AC कमरों से निकलकर बहुत जल्द सड़क पर आ जाएगी। यह अंदरूनी कलह नई सरकार को चैन से काम नहीं करने देगी।

राहुल गाँधी के OBC नैरेटिव पर लगा बड़ा झटका

देशभर में ओबीसी (OBC) राजनीति और जाति जनगणना की बात करने वाले राहुल गाँधी अब अपने ही इस फैसले से घिर गए हैं। सिद्धारमैया सिर्फ कर्नाटक ही नहीं, बल्कि पूरे देश में कॉन्ग्रेस के भीतर OBC समाज का सबसे बड़ा और मजबूत चेहरा माने जाते हैं।

यही वजह है कि उन्हें हटाने से पहले कॉन्ग्रेस आलाकमान के सामने एक बहुत बड़ा धर्मसंकट खड़ा हो गया था। पार्टी को अब भी यह बड़ा डर सता रहा है कि सिद्धारमैया को इस तरह हटाने से पूरे राज्य का OBC वोट बैंक कॉन्ग्रेस से बुरी तरह नाराज हो सकता है। यह फैसला राष्ट्रीय स्तर पर कॉन्ग्रेस के OBC नैरेटिव को भारी नुकसान पहुँचा सकता है।

जाते-जाते किया जाति जनगणना का ‘बारूदी विस्फोट’

सिद्धारमैया ने मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ने से ठीक पहले एक ऐसा मास्टरस्ट्रोक खेला है, जिसकी गूंज सालों तक सुनाई देगी। उन्होंने राज्य की ‘सामाजिक-आर्थिक और शिक्षा सर्वेक्षण रिपोर्ट’ यानी जाति जनगणना रिपोर्ट को सरकारी मंजूरी दे दी है। इस आखिरी दांव से उन्होंने विरोधियों को चारों खाने चित कर दिया है।

खुद ‘अहिंदा’ (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) समुदाय से आने वाले सिद्धारमैया ने इस सर्वे को मंजूर किया है। इसके जरिए उन्होंने पिछड़ों के मसीहा के रूप में राजनीति में अपनी साख बहुत बड़ी कर ली है। अब कोई भी नया मुख्यमंत्री इस सामाजिक लकीर को चाहकर भी आसानी से मिटा नहीं पाएगा।

DK शिवकुमार की अपनी ही जाति से ठनेगी रार

कर्नाटक की सत्ता और राजनीति पर हमेशा से लिंगायत और वोक्कालिगा जैसी दो अमीर और रसूखदार जातियों का कब्जा रहा है। अगले मुख्यमंत्री बनने जा रहे DK शिवकुमार खुद वोक्कालिगा समाज के बहुत बड़े नेता माने जाते हैं। लेकिन इस नए जाति सर्वे के आँकड़े आते ही राज्य का पूरा पुराना सियासी समीकरण बदल जाएगा।

इस सर्वे से पिछड़ों और दलितों की आबादी ज्यादा निकलने की उम्मीद है, जिससे रसूखदार जातियों का राजनीतिक दबदबा कम हो जाएगा। खुद शिवकुमार की अपनी ही वोक्कालिगा जाति के लोग इस सर्वे का पुरजोर विरोध कर रहे हैं। ऐसे में शिवकुमार अपनी जाति के हितों को संभालेंगे या कॉन्ग्रेस के राष्ट्रीय एजेंडे को, यह उनके लिए सबसे बड़ी परीक्षा होगी।

कॉन्ग्रेस में राहुल गाँधी की कमांड कमजोर, प्रियंका का बढ़ा कद

कर्नाटक के इस पूरे घटनाक्रम से साफ हो गया है कि कॉन्ग्रेस संगठन के भीतर अब राहुल गाँधी की पकड़ पहले जैसी मजबूत नहीं रही। राहुल गाँधी खुद सिद्धारमैया को मुख्यमंत्री पद पर बनाए रखना चाहते थे, क्योंकि सिद्धारमैया उनके OBC और जाति जनगणना वाले नैरेटिव के सबसे बड़े चेहरे थे।

लेकिन हाईकमान के आखिरी फैसले में राहुल गाँधी की पसंद को दरकिनार कर दिया गया। इसकी जगह प्रियंका गाँधी के दखल ने DK शिवकुमार की दावेदारी को मजबूत किया और अंततः फैसला शिवकुमार के पक्ष में गया, जो दिखाता है कि फैसले लेने में अब राहुल से ज्यादा प्रियंका की मर्जी भारी पड़ रही है।

यह बदलाव सिर्फ कर्नाटक तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के अन्य राज्यों में भी प्रियंका गाँधी का कद तेजी से उभरकर सामने आया है। हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू पहले से ही प्रियंका कैंप के खास माने जाते हैं, और अब DK शिवकुमार के आने से संगठन के भीतर प्रियंका गुट और मजबूत हो गया है।

केरल में भी मुख्यमंत्री चयन के दौरान राहुल के भरोसेमंद केसी वेणुगोपाल के मुकाबले प्रियंका की राय को ज्यादा तरजीह दी गई थी। सीधे शब्दों में कहें तो राहुल गाँधी भले ही पार्टी का मुख्य चेहरा और रणनीतिकार बने हुए हैं, लेकिन मुख्यमंत्रियों को चुनने और सत्ता का संतुलन बनाने की असली कमान अब प्रियंका गाँधी के हाथों में जाती दिख रही है।

बकरीद पर कई राज्यों में झड़प, रतलाम में गोवंश के अवशेष और हैदराबाद में सड़कों पर खून बहने से भड़के लोग: समझें क्यों सांप्रदायिक तनाव बढ़ा रहे इस्लामी कट्टरपंथी

बकरीद को इस्लाम के प्रमुख त्योहारों में से एक माना जाता है। मुस्लिम समाज का एक बड़ा वर्ग इसे त्याग, कुर्बानी, भाईचारे और सामाजिक सद्भाव का पर्व बताता है। हर साल त्योहार के दौरान यह भी कहा जाता है कि लोग शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मजहबी परंपराओं का पालन करते हैं और किसी को असुविधा न हो इसका ध्यान रखा जाता है।

हालाँकि 2026 के बकरीद के दौरान देश के अलग-अलग राज्यों से ऐसी कई घटनाएँ सामने आईं, जिन्होंने कानून-व्यवस्था, सांप्रदायिक सौहार्द और सार्वजनिक व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े कर दिए। कहीं हिंसक झड़पें हुईं, कहीं हत्या और हमले के आरोप लगे, कहीं धार्मिक स्थलों को लेकर विवाद खड़ा हुआ, कहीं गोवंश के अवशेष मिलने से तनाव फैल गया तो कहीं सार्वजनिक स्थानों पर खून और गंदगी फैलने को लेकर स्थानीय लोगों ने विरोध दर्ज कराया।

इन घटनाओं में कई मामलों की पुलिस जाँच जारी है, कई जगह FIR दर्ज हुई हैं और कुछ मामलों में गिरफ्तारियाँ भी हुई हैं। आइए क्रमवार उन प्रमुख घटनाओं पर नजर डालते हैं, जहाँ इस्लामी कट्टरपंथियों ने बकरीद के दौरान भी कहीं हिंसा फैलाई तो कहीं बेवजह बवाल कर सांप्रदायिक तनाव फैलाने की कोशिश की।

मध्य प्रदेश के रतलाम में गाय का कटा सिर मिलने से तनाव

मध्य प्रदेश के रतलाम में गुरुवार (28 मई 2026) को गाय का कटा हुआ सिर और शरीर के अवशेष मिलने से तनाव फैल गया। घटना के बाद स्थानीय संगठनों और लोगों में आक्रोश बढ़ गया। प्रदर्शनकारियों ने सड़क पर चक्काजाम कर कार्रवाई की माँग की और हनुमान चालीसा का पाठ किया।

प्रदर्शनकारियों ने नगर निगम पर लापरवाही का आरोप लगाते हुए सात दिन के भीतर सख्त कार्रवाई की चेतावनी दी। प्रदर्शन में शामिल गनी शक्तावत ने दावा किया कि मौके पर सिर्फ सिर नहीं बल्कि गाय के शरीर का आधा हिस्सा भी मिला था।

सूचना मिलते ही पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी मौके पर पहुँचे और स्थिति को नियंत्रित किया। प्रशासन ने जाँच के बाद दोषियों पर कार्रवाई, अवैध झोपड़ियों को हटाने और पूरे मामले की सभी पहलुओं से जाँच करने का आश्वासन दिया। कुछ लोगों को हिरासत में लेकर पूछताछ भी शुरू की गई है।

स्थानीय लोगों के अनुसार, घटना वाला क्षेत्र नगर निगम और निजी जमीन का मिश्रित हिस्सा है, जहाँ पहले भी ऐसी घटनाएँ सामने आ चुकी हैं। फिलहाल इलाके में तनाव का माहौल है, लेकिन स्थिति नियंत्रण में बताई जा रही है।

हरियाणा के नूंह आपस में ही भिड़े इस्लामी कट्टरपंथी

हरियाणा के नूंह जिले में गुरुवार (28 मई 2026) बकरीद की नमाज के बाद दो अलग-अलग गाँवों में विवाद हिंसक रूप ले गया। निजामपुर गाँव में पंचायत चुनाव से जुड़ी पुरानी रंजिश को लेकर दो पक्षों में पहले कहासुनी हुई और फिर पथराव, लाठी-डंडों तथा कुल्हाड़ियों का इस्तेमाल होने लगा। इस घटना में छह लोग घायल हुए।

दूसरी घटना सिंगार गाँव में हुई जहाँ पुरानी दुश्मनी के कारण दो पक्ष भिड़ गए। यहाँ भी करीब छह लोग घायल हुए। दोनों घटनाओं में कुल 12 लोग घायल हुए जबकि एक व्यक्ति को गंभीर हालत में मेडिकल कॉलेज रेफर करना पड़ा। पुलिस ने दोनों गाँवों में अतिरिक्त निगरानी बढ़ा दी और स्थिति को नियंत्रण में बताया।

यूपी के भदोही में नमाज के बाद युवक की पिटाई

उत्तर प्रदेश के भदोही जिले में गुरुवार (28 मई 2026) इंतेखाब आलम नामक युवक के साथ मारपीट का मामला सामने आया। आरोप है कि उसने मस्जिद में नमाज पढ़ाने वाले हाफिज से शरीयत से जुड़ा एक सवाल पूछा था। इसके बाद विवाद बढ़ गया और उस पर हमला कर दिया गया।

पुलिस के अनुसार 12 नामजद और 20 से अधिक अज्ञात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है। पीड़ित को अस्पताल में भर्ती कराया गया जबकि इलाके में अतिरिक्त पुलिस बल तैनात करना पड़ा।

मेरठ के दुर्गा मंदिर परिसर में मांस पकाने का आरोप

मेरठ में बकरीद के दिन नौचंदी मेला मैदान स्थित दुर्गा मंदिर परिसर में मांस पकाने के आरोप के बाद तनाव का माहौल बन गया। पुलिस ने मामले में आरोपित गादा खान को गिरफ्तार कर लिया है और उसे कोर्ट में पेश किए जाने की तैयारी की जा रही है।

जानकारी के अनुसार, गादा खान राजस्थान का रहने वाला है और मेले में झूला लगाकर काम कर रहा था। आरोप है कि गुरुवार (28 मई 2026) को उसने मंदिर परिसर के अंदर बकरे का मांस पकाना शुरू कर दिया, जिसके बाद स्थानीय हिंदू संगठनों और लोगों में आक्रोश फैल गया।

सूचना मिलने पर पुलिस मौके पर पहुँची और स्थिति को नियंत्रित किया। अधिकारियों ने मामले की जाँच शुरू कर दी है। घटना के बाद इलाके में तनाव को देखते हुए पुलिस निगरानी बढ़ा दी गई है।

मध्य प्रदेश के उज्जैन में हिंदू परिवार के घर के बाहर मांस मिलने का मामला

उज्जैन के गाँधीनगर इलाके में गुरुवार (28 मई 2026) को एक हिंदू परिवार के घर के बाहर पॉलीथिन में मांस का टुकड़ा मिलने के बाद तनाव का माहौल बन गया। घटना बकरीद की सुबह की बताई जा रही है, जिसके बाद स्थानीय लोगों ने इसे माहौल बिगाड़ने की कोशिश बताते हुए कार्रवाई की माँग की।

परिवार की सदस्य स्नेहलता गुप्ता के अनुसार, सुबह सफाई के कुछ समय बाद घर के गेट के पास मांस के टुकड़े पड़े मिले। सूचना मिलते ही आसपास के लोग इकट्ठा हो गए और पुलिस को बुलाया गया।

मौके पर पहुँची पुलिस ने स्थिति शांत कराई और आसपास लगे CCTV कैमरों की जाँच शुरू की। स्थानीय लोगों का कहना है कि कुछ शरारती तत्व आपसी सौहार्द बिगाड़ने की कोशिश कर रहे हैं।

वहीं, थाना प्रभारी विवेक कनोडिया ने कहा कि मामले की जाँच की जा रही है। उन्होंने आशंका जताई कि मांस का टुकड़ा किसी पक्षी या जानवर के जरिए भी वहाँ पहुँच सकता है। फिलहाल पुलिस इलाके में निगरानी बढ़ाकर सभी पहलुओं से जाँच कर रही है।

बकरीद पर हैदराबाद में हिंदू कॉलोनियों की सड़कों पर बहाया गया खून

तेलंगाना के हैदराबाद में बकरीद के दौरान का एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। वीडियो में पशुओं की कुर्बानी के बाद सड़कों पर खून बहता दिखाई दे रहा है। बताया जा रहा है कि यह दृश्य बांग्लादेश मार्केट और आसपास की कॉलोनियों तक फैल गया, जिससे स्थानीय लोगों में नाराजगी बढ़ गई।

वीडियो में कुछ महिलाएँ गुस्सा जताती और प्रशासन से सफाई व कार्रवाई की माँग करते हुए सुनाई दे रही हैं। घटना के बाद सोशल मीडिया पर भी तीखी बहस शुरू हो गई है। यह वीडियो सबसे पहले हैदराबाद बीजेपी लीगल सेल की एडवोकेट नीलम भार्गवा राम द्वारा एक्स पर साझा किया गया बताया जा रहा है।

गौरतलब है कि बकरीद से पहले रमजान पर भी इसी तरह इस्लामी कट्टरपंथियों ने हिंसा फैलाने की कोशिश की थी। रमजान को इस्लाम में सबसे पाक महीना माना जाता है। मुस्लिम दावा करते हैं कि यह माह इबादत, सब्र, जकात (दान) और सबसे बढ़कर आपसी दुश्मनी भुलाकर भाईचारे से रहने का है।

लेकिन जब शांति और रहमतों का यह पाक महीना चल रहा होता है, तब हिंसा, संघर्ष और खून-खराबे की खबरों में मुस्लिमों की संलिप्ता सामने आती है। 2026 में रमजान के दौरान भी सिर्फ इस्लामी कट्टरपंथियों ने ही नहीं, बल्कि इस्लामी मुल्कों ने भी इस महीने का लिहाज नहीं किया।

मात्र 30 दिनों में अनगिनत हत्या-लूटपाट-मारकाट-हिंसा-बलात्कार की घटनाएँ घटीं। ऑपइंडिया ने ऐसी 50 से अधिक घटनाओं को सूचीबद्ध किया था। इनमें बेहद क्रूर और निर्ममता से कहीं हिंदुओं को निशाना बना कर उनकी हत्या कर दी गई तो कहीं कट्टरपंथियों ने आपस में ही खूनी संघर्ष किया।

कहीं इन्हीं कट्टरपंथियों द्वारा हिंसा को काबू में करने की कोशिश कर रही पुलिस को पथराव का सामना करना पड़ा तो कहीं बिना किसी वजह छोटे बच्चों को सिर्फ इसलिए मारा गया क्योंकि उन्होंने मुस्लिम समाज के किसी व्यक्ति पर रंगों के त्योहार होली के अवसर पर पिचकारी मार कर खुशियाँ बाँटने की कोशिश की।

इंडियन नेवी को तीसरे एयरक्राफ्ट करियर की जरूरत, ‘सी डिनायल’ से ‘सी कंट्रोल’ में पिछड़ रहे हैं हम: जानें- क्या है समंदर में बादशाहत का ‘रूल ऑफ थ्री’ नियम

समंदर की रणनीति में एक शब्द बहुत मायने रखता है-‘सी कंट्रोल’ यानी समुद्र पर नियंत्रण। इसका सीधा सा मतलब है कि आप किसी समुद्री इलाके का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए इस तरह करें कि आपका दुश्मन वहाँ कदम रखने से भी डरे। इसके उलट एक दूसरा शब्द होता है- ‘सी डिनायल‘ यानी समुद्र में रास्ता रोकना, जो कि एक छोटा और रक्षात्मक तरीका है। इसमें आप सिर्फ दुश्मन के लिए उस इलाके को खतरनाक बना देते हैं। लेकिन अगर आपको सच में दबदबा बनाना है, तो आपको ‘सी कंट्रोल‘ चाहिए। इसके लिए आपको समंदर में लगातार मौजूदगी, मजबूत हवाई ताकत और दुश्मन को उसकी हरकतों का तुरंत जवाब देने की क्षमता की जरूरत होती है। सिर्फ खोखली धमकियों से काम नहीं चलता।

आजादी के बाद लंबे समय तक भारत हिंद महासागर को अपना एक सुरक्षित इलाका मानता रहा। इसके पीछे वजह भी थी कि इस महासागर का नाम भारत के नाम पर था, यहाँ के व्यापारिक रास्ते भारत के व्यापार को बढ़ाते थे और जब भी सुरक्षा की बात आती थी, तो छोटे द्वीप देश नई दिल्ली की तरफ देखते थे। यह सोच पूरी तरह गलत नहीं थी, लेकिन यह ताकत से ज्यादा हमारे भूगोल और उस वक्त किसी बड़े दुश्मन की गैर-मौजूदगी पर टिकी थी। अब वह शांत और आरामदायक दौर खत्म हो चुका है।

भारत के लिए 2030 से आगे की चुनौती, चीन और पाकिस्तान का घातक गठजोड़

हिंद महासागर में सुरक्षा के समीकरणों को सबसे ज्यादा चीन की पीपल्स लिबरेशन आर्मी नेवी (PLAN) ने बदला है। चीन आज तीन एयरक्राफ्ट करियर चला रहा है और 2035 तक उसकी योजना नौ एयरक्राफ्ट करियर तैनात करने की है। अपनी ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ (मोतियों की माला) रणनीति के तहत चीन ने जिबूती में अपना पहला विदेशी सैन्य अड्डा बनाने से लेकर श्रीलंका के हंबनटोटा और पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट तक अपनी पहुँच पक्की कर ली है। चीनी जासूसी जहाज, रिसर्च वेसल और पनडुब्बियाँ अब हिंद महासागर में इस कदर मँडरा रही हैं, जिसकी कल्पना एक दशक पहले नहीं की जा सकती थी।

साल 2030 तक चीन और पाकिस्तान की जुगलबंदी भारत के लिए एक बहुत बड़ी मुसीबत बनने वाली है। पाकिस्तान का ग्वादर पोर्ट चीन के लिए हिंद महासागर का एक पिछला दरवाजा बन चुका है। अगर कल को कोई टकराव होता है, तो भारत को एक साथ दो मोर्चों (टू-फ्रंट वॉर) पर लड़ना होगा। एक तरफ अरब सागर में पाकिस्तान और चीनी नौसेना का गठजोड़ होगा, तो दूसरी तरफ बंगाल की खाड़ी में चीन की सीधी चुनौती होगी। इस दोहरे संकट से निपटने के लिए भारत को अपनी समुद्री ताकत को दोगुना करना होगा, और इसके लिए तीसरा एयरक्राफ्ट करियर होना कोई लग्जरी नहीं, बल्कि बेहद जरूरी जरूरत है।

भारत ने इसके जवाब में पनडुब्बियों, युद्धपोतों और लंबी दूरी के पी-8आई समुद्री गश्ती विमानों में निवेश किया है। ‘क्वाड’ (QUAD) के जरिए अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ खुफिया जानकारी साझा करने के तंत्र को भी मजबूत किया गया है। लेकिन इन सबके बीच एक ऐसी रीढ़ की कमी खल रही है जो इस मौजूदगी को असली ताकत में बदल सके और वह रीढ़ है एक तीसरा एयरक्राफ्ट करियर।

Rule of Three: क्यों दो एयरक्राफ्ट करियर काफी नहीं

दुनिया भर की नौसेनाओं की रणनीति में ‘रूल ऑफ थ्री’ (तीन का नियम) चलता है। इसका सीधा गणित यह है कि अगर आपके पास तीन एयरक्राफ्ट करियर होंगे, तब जाकर आप हर वक्त एक करियर को अरब सागर में और दूसरे को बंगाल की खाड़ी में तैनात रख पाएँगे। समंदर में जंग के जहाज हर समय तैयार नहीं रह सकते, उन्हें समय-समय पर मरम्मत, मेंटेनेंस और अपग्रेड की जरूरत होती है। जब एक जहाज यार्ड में मरम्मत के लिए जाता है, तो उसकी जगह लेने के लिए दूसरा जहाज तैयार होना चाहिए।

वर्तमान में भारत के पास दो एयरक्राफ्ट करियर हैं पहला आईएनएस विक्रमादित्य और दूसरा आईएनएस विक्रांत। इसका मतलब यह है कि किसी भी आम दिन पर भारत की प्रभावी ताकत डेढ़ करियर की ही होती है। अगर इनमें से एक भी मेंटेनेंस के लिए गया, तो पूरा एक समुद्री मोर्चा खाली हो जाएगा।

चिंता की बात यह भी है कि आईएनएस विक्रमादित्य का ढाँचा 1982 का है। भले ही इसका आधुनिकीकरण किया गया है, लेकिन 2035 के आसपास इसका एक बड़ा स्ट्रक्चरल ऑडिट होना है। इसके बाद यह 2052 तक सेवा दे पाएगा या 2037 में ही रिटायर हो जाएगा, इस पर सस्पेंस है। दूसरी ओर कोचीन शिपयार्ड द्वारा करीब 20,000 करोड़ रुपए की लागत से स्वदेशी रूप से बनाया गया आईएनएस विक्रांत ही हमारे भविष्य का इकलौता पक्का हिस्सा है।

ऐसे में सिर्फ एक भरोसेमंद करियर के दम पर भारत का हिंद महासागर का राजा बने रहने का दावा बहुत कमजोर नजर आता है। नए एयरक्राफ्ट करियर को बनने में कम से कम 10 से 12 साल का समय लगता है। इसलिए तीसरे करियर को लेकर जो फैसला हमें आज ले लेना चाहिए था, उसमें पहले ही देरी हो चुकी है।

निकोबार प्रोजेक्ट के बाद नेवी की परमानेंट तैनाती की मजबूरी

भारत सरकार इस समय अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में खासकर ग्रेट निकोबार में एक बहुत बड़ा रणनीतिक प्रोजेक्ट शुरू कर रही है। यहाँ एक इंटरनेशनल ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल, मिलिट्री एयरपोर्ट और नौसैनिक अड्डा विकसित किया जा रहा है। जैसे ही यह निकोबार प्रोजेक्ट पूरी तरह ऑन होगा, वैसे ही इस पूरे इलाके में भारत को चौबीसों घंटे परमानेंट नौसैनिक तैनाती की जरूरत पड़ेगी।

निकोबार द्वीप समूह की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि यह दुश्मन के गले की हड्डी बन सकता है। लेकिन केवल जमीन पर बेस बना देने से बात नहीं बनेगी। समंदर में घूमता हुआ एक एयरक्राफ्ट करियर जो हवाई ताकत और सुरक्षा का घेरा दे सकता है, उसकी बराबरी कोई जमीनी बेस नहीं कर सकता। निकोबार प्रोजेक्ट की सुरक्षा और वहाँ से पूरे इलाके पर नजर रखने के लिए एक डेडिकेटेड एयरक्राफ्ट करियर बैटल ग्रुप की मौजूदगी अनिवार्य हो जाएगी। यह भारत के ‘सी डिनायल’ के नजरिए को ‘सी कंट्रोल’ में बदल देगा।

मलक्का स्ट्रेट की चाबी यानी चीन की दुखती रग पर हाथ

दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापारिक रास्ता मलक्का जलडमरूमध्य (Malacca Strait) है। चीन का लगभग 80 प्रतिशत तेल आयात इसी संकरे रास्ते से होकर गुजरता है। इसे चीन की ‘मलक्का दुविधा’ (Malacca Dilemma) कहा जाता है, क्योंकि चीन को हमेशा यह डर सताता है कि किसी युद्ध की स्थिति में भारत या उसके सहयोगी इस रास्ते को बंद कर सकते हैं।

अगर भारत के पास तीसरा एयरक्राफ्ट करियर होता है, तो भारत मलक्का स्ट्रेट के ठीक मुहाने पर अपनी ऐसी ताकत तैनात कर सकता है जिसे हिलाना चीन के लिए नामुमकिन होगा। एक एयरक्राफ्ट करियर बैटल ग्रुप केवल एक लड़ाकू जहाज नहीं होता, बल्कि यह अपने साथ दर्जनों लड़ाकू विमान, पनडुब्बी-रोधी हेलीकॉप्टर और मिसाइल क्रूजर लेकर चलता है। मलक्का स्ट्रेट से निकलने वाले हर चीनी जहाज और पनडुब्बी पर भारत का पूरा कंट्रोल होगा। यह चीन के खिलाफ भारत का सबसे बड़ा तुरुप का पत्ता होगा, जिससे चीन कभी भी भारत पर सीधा हमला करने की हिम्मत नहीं कर पाएगा।

लाल सागर संकट के बाद भारत को महसूस हुई कमी

बता दें कि कुछ समय पहले हुए लाल सागर (Red Sea) संकट ने भारत को एक बहुत बड़ा सबक दिया है। जब 2023-24 में हूथी विद्रोहियों ने कमर्शियल जहाजों पर ड्रोन और मिसाइलों से हमले शुरू किए, तो पूरे वैश्विक व्यापार में हड़कंप मच गया। जहाजों को अफ्रीका के ‘केप ऑफ गुड होप’ से घूमकर जाना पड़ा, जिससे समय और ईंधन का खर्च बेहद बढ़ गया। भारतीय निर्यातकों और आयातकों को इसका भारी नुकसान उठाना पड़ा।

भारत का 90 प्रतिशत से अधिक व्यापार समंदर के रास्ते होता है और हम अपनी जरूरत का 83 से 88 प्रतिशत कच्चा तेल इन्हीं समुद्री रास्तों से मँगाते हैं। हॉरमुज की खाड़ी, अदन की खाड़ी और लाल सागर जैसे चोकपॉइंट्स भारत की आर्थिक सुरक्षा की जीवनरेखा हैं। जब लाल सागर में यह संकट आया, तो अमेरिका ने तुरंत अपने एयरक्राफ्ट करियर स्ट्राइक ग्रुप्स वहाँ तैनात कर दिए और व्यापारिक रास्तों को काफी हद तक सुरक्षित रखा।

भारत अपनी नौसैनिक क्षमता के बावजूद वहाँ कोई एयरक्राफ्ट करियर तैनात नहीं कर सका क्योंकि हमारे पास अतिरिक्त जहाज ही नहीं था। हमें अमेरिकी एयरक्राफ्ट करियर की छत्रछाया में रहना पड़ा। भारत जैसे महात्वाकांक्षी देश के लिए जो खुद को इस पूरे क्षेत्र का ‘नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर’ (सुरक्षा प्रदाता) कहता है, सुरक्षा के लिए दूसरों पर निर्भर रहना सही नहीं है।

पनडुब्बी Vs एयरक्राफ्ट करियर, क्या है इस बहस की हकीकत

कई रक्षा विशेषज्ञ यह तर्क देते हैं कि एयरक्राफ्ट करियर बहुत महंगे होते हैं और आज के जमाने में मिसाइलों और ड्रोनों के दौर में ये आसानी से निशाना बन सकते हैं। उनका कहना होता है कि भारत को करियर के बजाय पनडुब्बियों पर ज्यादा पैसा खर्च करना चाहिए। यह तर्क सुनने में अच्छा लगता है, लेकिन व्यावहारिक रूप से अधूरा है।

पनडुब्बी और एयरक्राफ्ट करियर दो अलग-अलग काम करते हैं। पनडुब्बी का काम है छिपकर हमला करना और दुश्मन का रास्ता रोकना (सी डिनायल)। वह समंदर में भारत के दोस्तों को भरोसा नहीं दिला सकती और न ही खुलेआम अपनी ताकत का प्रदर्शन कर सकती है। इसके विपरीत, एक एयरक्राफ्ट करियर समंदर में भारत की जीती-जागती ताकत का प्रतीक होता है। यह सिर्फ एक हथियार नहीं, बल्कि कूटनीति का एक बहुत बड़ा जरिया है।

जब भारत का एक एयरक्राफ्ट करियर बैटल ग्रुप बंगाल की खाड़ी में सिंगापुर, जापान या ऑस्ट्रेलिया के जहाजों के साथ युद्धाभ्यास करता है, तो श्रीलंका, मालदीव, बांग्लादेश और मॉरीशस जैसे पड़ोसी देशों को एक साफ संदेश जाता है कि भारत उनकी सुरक्षा के लिए एक विश्वसनीय और सक्षम साथी है। चीन अपनी तीन एयरक्राफ्ट करियर्स के दम पर इन्हीं छोटे देशों को डराने और लुभाने की कोशिश कर रहा है। यह लड़ाई सिर्फ मिलिट्री की नहीं, बल्कि इस धारणा की भी है कि इस इलाके का असली चौधरी कौन है।

इसके अलावा एयरक्राफ्ट करियर केवल युद्ध के लिए नहीं होते। हिंद महासागर में जब भी कोई प्राकृतिक आपदा आती है, तो यह जहाज एक तैरते हुए अस्पताल और कमांड सेंटर के रूप में तब्दील हो सकता है। यह जितनी जल्दी मेडिकल टीमें, हेलीकॉप्टर और राहत सामग्री पहुँचा सकता है, उतनी तेजी से कोई और प्लेटफॉर्म काम नहीं कर सकता।

तीसरे एयरक्राफ्ट करियर से कोचीन शिपयार्ड की स्वदेशी ताकत को बचाना जरूरी

तीसरे एयरक्राफ्ट करियर की मांग के पीछे सिर्फ रणनीतिक ही नहीं, बल्कि एक बहुत बड़ा आर्थिक और औद्योगिक कारण भी है। आईएनएस विक्रांत को बनाकर कोचीन शिपयार्ड ने भारत को दुनिया के उन चुनिंदा देशों की कतार में खड़ा कर दिया है जो खुद का एयरक्राफ्ट करियर बना सकते हैं। इस लिस्ट में हमारे अलावा केवल अमेरिका, ब्रिटेन, रूस, फ्रांस, इटली और चीन ही शामिल हैं।

लेकिन यह इंजीनियरिंग का हुनर, सप्लायर्स का नेटवर्क और कुशल कारीगरों की टीम अपने आप बची नहीं रहती। अगर कोचीन शिपयार्ड को तुरंत अगले एयरक्राफ्ट करियर का ऑर्डर नहीं मिला, तो यह पूरी चेन टूट जाएगी। जो काबिलियत हमने सालों की मेहनत और अरबों रुपए खर्च करके हासिल की है, वह खत्म हो जाएगी और भविष्य में जब हमें नया जहाज बनाना होगा, तो हमें फिर से शून्य से शुरुआत करनी पड़ेगी। इसलिए तीसरा करियर देश की आत्मनिर्भरता और रक्षा उद्योगों को जिंदा रखने के लिए एक जरूरी निवेश है।

अभी एयरक्राफ्ट करियर के मामले में कहाँ है देश?

भारतीय नौसेना के स्वर्णिम इतिहास से लेकर वर्तमान ताकत की रीढ़ बने चारों विमानवाहक पोतों (एयरक्राफ्ट करियर) की खासियतें, मारक क्षमता और उनकी खास बातें भी जानना अहम है।

आईएनएस विक्रमादित्य (INS Vikramaditya): वर्तमान में भारतीय नौसेना की सबसे बड़ी ताकत आईएनएस विक्रमादित्य है। मूल रूप से रूसी नौसेना के ‘एडमिरल गोर्शकोव’ को भारत ने बड़े स्तर पर मॉडिफाई करके नवंबर 2013 में बेड़े में शामिल किया था। लगभग 44,500 टन वजनी यह तैरता हुआ किला करीब 284 मीटर लंबा है। इसकी सबसे बड़ी खासियत इसका ‘शॉर्ट टेक-ऑफ बट अरेस्टेड रिकवरी’ (STOBAR) सिस्टम और स्की-जंप डेक है, जो लड़ाकू विमानों को कम दूरी में उड़ान भरने में मदद करता है।

यह विशाल पोत अपने साथ घातक मिग-29के (MiG-29K) लड़ाकू विमान, कामोव (Kamov) एंटी-सबमरीन हेलीकॉप्टर और चेतक हेलीकॉप्टर्स सहित करीब 30 से अधिक एयरक्राफ्ट ले जाने में सक्षम है। आधुनिक रडार, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सूट और एंटी-मिसाइल डिफेंस सिस्टम से लैस विक्रमादित्य अरब सागर में भारत की सुरक्षा का सबसे मजबूत कवच है।

आईएनएस विक्रांत (INS Vikrant) यानी स्वदेशी आत्मनिर्भरता का गौरव: आईएनएस विक्रांत भारत के रक्षा इतिहास का सबसे गौरवशाली मील का पत्थर है। यह भारत में डिजाइन और निर्मित होने वाला पहला स्वदेशी एयरक्राफ्ट करियर (IAC-1) है, जिसे कोचीन शिपयार्ड ने बनाया और सितंबर 2022 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को समर्पित किया। लगभग 45,000 टन विस्थापन क्षमता वाला यह अत्याधुनिक युद्धपोत करीब 262 मीटर लंबा है।

विक्रांत की ताकत इसकी स्वदेशी तकनीक है, जिसमें परिष्कृत ऑटोमेशन और एडवांस नेटवर्क सिस्टम शामिल हैं। यह युद्धपोत मिग-29के लड़ाकू विमानों के साथ-साथ अमेरिका से लिए गए खतरनाक एमएच-60आर (MH-60R) रोमियो हेलीकॉप्टर्स और स्वदेशी एएलएच (ALH) हेलीकॉप्टर्स को तैनात करता है। इसमें 2,200 से अधिक कंपार्टमेंट हैं, और इसकी टॉप स्पीड 28 नॉट (लगभग 52 किमी/घंटा) है। विक्रांत बंगाल की खाड़ी में भारत के ‘सी कंट्रोल’ का मुख्य जरिया है।

पहला आईएनएस विक्रांत (INS Vikrant – R11) यानी 1971 की जंग का महानायक: अतीत के पन्नों को पलटें तो भारत का पहला विमानवाहक पोत ‘आईएनएस विक्रांत (R11)’ देश की संप्रभुता का प्रतीक था। ब्रिटिश नौसेना के पूर्व ‘एचएमएस हरक्यूलिस’ को भारत ने 1957 में खरीदा और 1961 में इसे कमिशन किया गया। लगभग 21,000 टन वजनी इस छोटे लेकिन बेहद आक्रामक करियर की खासियत इसका स्टीम कैटापुल्ट सिस्टम था, जिससे विमानों को लॉन्च किया जाता था।

INS विक्रांत की असली ताकत और वीरता 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में देखने को मिली। विक्रांत पर तैनात सी-हॉक (Sea Hawk) लड़ाकू विमानों और एलिट (Alize) पनडुब्बी-रोधी विमानों ने तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) की समुद्री नाकेबंदी कर दी थी। विक्रांत के विमानों ने चिटगाँव और कॉक्स बाजार के बंदरगाहों पर बमबारी करके पाकिस्तानी फौज की कमर तोड़ दी थी, जिसने अंततः भारत को एक ऐतिहासिक जीत दिलाई। ये काफी समय पहले ही रिटायर्ड होकर तोड़ा जा चुका है। एक मशहूर 2 व्हीलर कंपनी ने इसके स्क्रैप को मिलाकर बाइक सीरीज ही लॉन्च कर दी थी, जो काफी लोकप्रिय भी हुआ है।

आईएनएस विराट (R22) यानी ग्रैंड ओल्ड लेडी ऑफ द सी: भारत का दूसरा ऐतिहासिक विमानवाहक पोत आईएनएस विराट था, जिसे नौसेना में बेहद सम्मान के साथ ‘ग्रैंड ओल्ड लेडी’ कहा जाता था। ब्रिटिश नौसेना के ‘एचएमएस हर्म्स’ को भारत ने 1987 में अपनी सेवा में शामिल किया था। लगभग 28,700 टन वजनी यह करियर अपनी वर्टिकल टेक-ऑफ क्षमता के लिए मशहूर था। इसकी सबसे बड़ी यूएसपी इस पर तैनात होने वाले ‘सी हैरियर’ (Sea Harrier) जंप-जेट लड़ाकू विमान थे, जो सीधे ऊपर की ओर उड़ान भर सकते थे और हवा में एक जगह रुक सकते थे।

INS विराट ने 1989 में श्रीलंका में ‘ऑपरेशन पवन’ और 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान ‘ऑपरेशन तलवार’ में महत्वपूर्ण रणनीतिक भूमिका निभाई थी। 30 साल तक भारतीय नौसेना और उससे पहले ब्रिटिश नौसेना में सेवा देने के बाद, यह दुनिया में सबसे लंबे समय तक काम करने वाला युद्धपोत बना और 2017 में इसे ससम्मान विदाई दी गई।

शान के लिए नहीं बल्कि सुरक्षा के लिए जरूरी है तीसरा एयरक्राफ्ट करियर?

बहरहाल आने वाले कुछ साल इस बात का फैसला करेंगे कि हिंद महासागर एक ऐसा इलाका रहेगा जहाँ भारत अपनी शर्तें तय करेगा, या फिर एक ऐसा समंदर बन जाएगा जहाँ भारत को दूसरों की शर्तों पर समझौता करना पड़ेगा।

साल 2030 तक चीन और पाकिस्तान की नौसैनिक जुगलबंदी भारत के लिए जो चक्रव्यूह रचने जा रही है, उसे भेदने का एकमात्र रास्ता हमारी नौसैनिक हवाई ताकत को बढ़ाना है। निकोबार प्रोजेक्ट की सफलता और मलक्का स्ट्रेट पर हमारी मजबूत पकड़ इस बात पर निर्भर करेगी कि हमारे पास समंदर में तैरते हुए कितने एयरफील्ड हैं।

तीसरे एयरक्राफ्ट करियर की माँग किसी शान-ओ-शौकत के लिए नहीं है। यह भारत की आर्थिक सुरक्षा, हमारे व्यापारिक रास्तों की रक्षा और समंदर में हमारी साख को बनाए रखने की एक अनिवार्य जरूरत है। हिंद महासागर में साख और सम्मान उसी का होता है जिसके पास 65,000 टन का मुड़ता हुआ रनवे और उस पर तैनात लड़ाकू विमानों की गर्जना होती है। भारत को यह फैसला अब बिना किसी देरी के एक मिशन मोड में लेना ही होगा।

वैसे, हम जिस तीसरे एयरक्राफ्ट करियर की बात कर रहे हैं, उसका नाम है INS विशाल, जो अभी तक नौकरशाही के चक्कर में कम से कम डेढ़ दशक से लटका हुआ है। उम्मीद है कि भारत सरकार इस दिशा में जल्द से जल्द फैसला लेकर इंडियन नेवी को ‘रूल ऑफ थ्री’ के तहत ‘सी डिनायल’ से ‘सी कंट्रोल’ की स्थिति में लाएगी।

बाँध में पानी घटते ही बाहर आया सदियों पुराना पांडवकालीन कांबरेश्वर मंदिर, रहस्यमई जलमग्न शिवलिंग है खास पहचान: जानें पुणे में क्यों उमड़े श्रद्धालु और क्या है इतिहास

महाराष्ट्र के पुणे जिले के भोर तालुका में इन दिनों एक ऐसा दृश्य देखने को मिल रहा है, जिसने लोगों की उत्सुकता बढ़ा दी है। भाटघर बाँध का जलस्तर कम होते ही पानी के भीतर छिपा सदियों पुराना कांबरेश्वर मंदिर एक बार फिर दुनिया के सामने आ गया है। साल के अधिकांश महीनों तक पानी में डूबा रहने वाला यह मंदिर हर वर्ष कुछ समय के लिए ही दिखाई देता है।

यही वजह है कि इसे देखने के लिए श्रद्धालुओं, पर्यटकों, फोटोग्राफरों और इतिहास प्रेमियों की भीड़ उमड़ पड़ती है। यह मंदिर केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि प्राचीन भारतीय स्थापत्य कला, इंजीनियरिंग और इतिहास का जीवंत उदाहरण भी माना जाता है।

पानी में वर्षों तक डूबे रहने के बावजूद इसका मजबूत ढाँचा आज भी लोगों को हैरान कर देता है। मंदिर की रहस्यमयी बनावट, पानी में स्थित शिवलिंग और इससे जुड़ी मान्यताएँ इसे और भी खास बना देती हैं।

भाटघर बाँध का जलस्तर घटते ही सामने आया मंदिर

पुणे के भोर तालुका में स्थित ब्रिटिशकालीन भाटघर बाँध इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ है। बाँध में पानी का स्तर काफी नीचे पहुँच गया है, जिसके कारण इसके कैचमेंट एरिया में मौजूद कई हिस्से दिखाई देने लगे हैं। इन्हीं में सबसे प्रमुख है कांबरे गाँव का ऐतिहासिक कांबरेश्वर मंदिर

वेलवंडी नदी पर बने इस मंदिर का अधिकांश हिस्सा हर साल मानसून के बाद पानी में डूब जाता है। जैसे-जैसे बारिश का पानी बढ़ता है, मंदिर पूरी तरह जलमग्न हो जाता है और कई महीनों तक दिखाई नहीं देता। गर्मियों के मौसम में जब बाँध का जलस्तर घटता है, तब धीरे-धीरे मंदिर का शिखर नजर आने लगता है और फिर पूरा मंदिर सामने आ जाता है।

(फोटो साभार: NDTV)

स्थानीय लोगों के अनुसार, मई के आखिर और जून की शुरुआत में यह मंदिर सबसे स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। यही समय होता है जब बड़ी संख्या में लोग यहाँ पहुँचते हैं। ग्रामीण हर साल मंदिर की सफाई करते हैं और वर्षों से चली आ रही परंपरा के अनुसार धार्मिक अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं। इसके बाद श्रद्धालुओं के लिए मंदिर को खोला जाता है।

अंग्रेजों के बाँध निर्माण के बाद पानी में समा गया मंदिर

कांबरेश्वर मंदिर की कहानी केवल धार्मिक नहीं, बल्कि ऐतिहासिक भी है। बताया जाता है कि वर्ष 1928 में अंग्रेजों ने लॉयड डैम यानी आज के भाटघर बाँध का निर्माण कराया था। बाँध बनने के बाद आसपास का बड़ा क्षेत्र जलमग्न हो गया। कांबरे गाँव को दूसरी जगह बसाना पड़ा, लेकिन मंदिर को वहीं छोड़ दिया गया।

तब से हर वर्ष मानसून के दौरान यह मंदिर पानी में डूब जाता है और गर्मियों में फिर बाहर दिखाई देता है। दशकों से यही क्रम जारी है। समय के साथ यह मंदिर स्थानीय लोगों के लिए केवल पूजा का स्थान नहीं रहा, बल्कि उनकी सांस्कृतिक पहचान और विरासत का प्रतीक बन गया है।

इतिहासकारों का मानना है कि यह मंदिर बेहद प्राचीन है। स्थानीय लोग इसे पांडव काल से जोड़ते हैं और मानते हैं कि इसका निर्माण महाभारत काल में हुआ था। हालाँकि कई इतिहास विशेषज्ञ इसे हेमाडपंती शैली का मंदिर मानते हैं।

मंदिर की बनावट, पत्थरों की संरचना और निर्माण शैली इस बात की ओर इशारा करती है कि इसे मध्यकालीन भारतीय स्थापत्य शैली में तैयार किया गया होगा।

मंदिर की बनावट आज भी इंजीनियरों को करती है हैरान

कांबरेश्वर मंदिर की सबसे बड़ी खासियत इसकी मजबूती है। वर्षों तक पानी में डूबे रहने के बावजूद यह मंदिर आज भी मजबूती से खड़ा है। लगातार पानी की लहरों, गाद और मौसम के प्रभाव के बाद भी इसकी मुख्य संरचना सुरक्षित दिखाई देती है।

मंदिर की दीवारों को बड़े-बड़े तराशे हुए पत्थरों से बनाया गया है। पत्थरों को बिना आधुनिक तकनीक के इतनी मजबूती से जोड़ा गया कि सदियों बाद भी उनका संतुलन बना हुआ है। मंदिर के शिखर और ऊपरी हिस्से में चूना पत्थर, रेत और पकी हुई ईंटों का उपयोग किया गया है।

विशेषज्ञों का कहना है कि उस समय की निर्माण तकनीक बेहद उन्नत थी। यही कारण है कि लगातार पानी में रहने के बावजूद मंदिर पूरी तरह क्षतिग्रस्त नहीं हुआ। हालाँकि समय के साथ कुछ हिस्सों में टूट-फूट जरूर हुई है, लेकिन इसकी नींव और मुख्य ढाँचा अब भी मजबूत दिखाई देता है।

मंदिर को देखने के लिए हर साल आर्किटेक्चर के छात्र, इंजीनियर, शोधकर्ता और इतिहासकार यहाँ पहुँचते हैं। उनके लिए यह मंदिर केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि प्राचीन भारतीय इंजीनियरिंग का मास्टरपीस है।

पानी से भरा गर्भगृह और रहस्यमयी शिवलिंग

कांबरेश्वर मंदिर का गर्भगृह इसे और भी रहस्यमयी बना देता है। मंदिर पूरी तरह बाहर आने के बाद भी इसके भीतर घुटनों तक पानी भरा रहता है। इसी पानी के बीच भगवान शिव का स्वयंभू शिवलिंग स्थापित है।

श्रद्धालु मंदिर के अंदर जाकर पानी में हाथ डालकर शिवलिंग को स्पर्श करते हैं और भगवान शिव का आशीर्वाद लेते हैं। भक्तों के लिए यह अनुभव बेहद भावुक और आध्यात्मिक माना जाता है। मंदिर में माता पार्वती और नंदी महाराज की प्रतिमाएँ भी मौजूद हैं।

(फोटो साभार: NDTV)

पहले मंदिर तक पहुँचने के लिए पाँच सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती थीं, लेकिन हर साल जमा होने वाली मिट्टी और गाद के कारण अब वे सीढ़ियाँ दब चुकी हैं। गाँव वाले हर वर्ष मंदिर से गाद हटाने और सफाई करने का काम करते हैं ताकि श्रद्धालुओं को दर्शन में परेशानी न हो।

मंदिर के सामने नंदी की प्रतिमा और एक खुला आँगन है। यहाँ वीरगळ यानी शहीद योद्धाओं की स्मृति में बनाई गई पत्थर की शिलाएँ भी मौजूद हैं, जो इस स्थल के ऐतिहासिक महत्व को और बढ़ाती हैं।

पर्यटन, आस्था और इतिहास का अनोखा संगम बना मंदिर

कांबरेश्वर मंदिर अब केवल स्थानीय लोगों तक सीमित नहीं रह गया है। हर साल जब यह पानी से बाहर आता है, तब दूर-दूर से लोग इसे देखने पहुँचते हैं। सुबह और शाम के समय मंदिर और वेलवंडी नदी का दृश्य बेहद आकर्षक दिखाई देता है। सूर्योदय और सूर्यास्त के दौरान यहाँ का नजारा पर्यटकों और फोटोग्राफरों के लिए खास आकर्षण बन जाता है।

स्थानीय प्रशासन और ग्राम पंचायत लोगों से मंदिर की पवित्रता बनाए रखने की अपील भी करते हैं। गाँव वालों का कहना है कि यह केवल घूमने की जगह नहीं, बल्कि उनकी आस्था और परंपरा का केंद्र है। इसलिए यहाँ आने वाले लोगों को धार्मिक मर्यादा और संस्कृति का सम्मान करना चाहिए।

ग्रामीणों ने श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए मंदिर तक पहुँचने वाले रास्ते को भी सुरक्षित बनाया है। हर साल मंदिर खुलने के बाद यहाँ पूजा-पाठ और धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। हजारों श्रद्धालु पानी में मौजूद शिवलिंग के दर्शन के लिए यहाँ पहुँचते हैं।

सदियों पुरानी विरासत की जीवित मिसाल है कांबरेश्वर मंदिर

कांबरेश्वर मंदिर आज भी इस बात का प्रमाण है कि भारतीय प्राचीन स्थापत्य कला कितनी उन्नत और टिकाऊ थी। पानी में वर्षों तक डूबे रहने के बावजूद इसका अस्तित्व बना रहना किसी चमत्कार से कम नहीं माना जाता। हर साल कुछ दिनों के लिए पानी से बाहर आने वाला यह मंदिर मानो समय के भीतर छिपी एक कहानी को फिर से जीवित कर देता है।

भोर तालुका का यह प्राचीन शिव मंदिर आज भी लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर रहा है और यह साबित करता है कि भारत की ऐतिहासिक धरोहरें केवल पत्थरों की इमारतें नहीं, बल्कि सदियों पुरानी सभ्यता और संस्कृति की जीवित पहचान हैं।

बुंदेलखंड की धरती के लिए सूरज की जो किरणें थी अभिशाप, अब वही साबित हो रही वरदान: जानें बंजर जमीन से सोलर एनर्जी कैसे बदल रही किसानों का भविष्य

बुंदेलखंड की पहचान कभी सिर्फ सूखे, पलायन और बदहाली से जुड़ी रही। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में फैला यह क्षेत्र हर साल भीषण गर्मी झेलता है, जहाँ तापमान कई बार 47 डिग्री तक पहुँच जाता है। बारिश कम होने और जमीन के पथरीले होने की वजह से खेती हमेशा संकट में रही। लेकिन अब यही तेज धूप और विशाल खाली जमीन बुंदेलखंड की सबसे बड़ी ताकत बन गई है।

जिस इलाके को कभी विकास की दौड़ में पीछे माना जाता था, वही आज देश के सबसे बड़े सोलर (सौर) ऊर्जा केंद्रों में शामिल होने की तैयारी कर रहा है। बता दें कि बुंदेलखंड में साल के करीब 300 दिन तेज धूप रहती है, जो सौर ऊर्जा उत्पादन के लिए आदर्श मानी जाती है। यही वजह है कि जो धूप कभी किसानों के लिए मुसीबत थी, वही अब हजारों करोड़ रुपये के निवेश और रोजगार का आधार बन रही है।

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार और उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने सौर ऊर्जा परियोजनाओं पर बड़ा दाँव लगाया है, जिसके बाद बुंदेलखंड की तस्वीर तेजी से बदल रही है। बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे के किनारे भी बड़े स्तर पर सोलर परियोजनाओं की योजना तैयार की गई है। सरकार का लक्ष्य इस पूरे क्षेत्र को ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर के रूप में विकसित करना है, ताकि उत्तर प्रदेश की बिजली जरूरतों का बड़ा हिस्सा स्वच्छ ऊर्जा से पूरा हो सके।

4995 मेगावाट के 8 सोलर पार्कों से बदलता बुंदेलखंड

बुंदेलखंड में जिस जमीन को कभी खेती के लिए अनुपयोगी माना जाता था, अब उसी जमीन पर 4995 मेगावाट बिजली बनाने की क्षमता के 8 बड़े सोलर पार्क विकसित किए जा रहे हैं। केंद्र सरकार की सोलर पार्क योजना के तहत उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में इन परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है। इनमें सबसे बड़ा 1200 मेगावाट का सोलर पार्क जालौन में प्रस्तावित है।

इसके अलावा चित्रकूट में 800 मेगावाट, झाँसी और ललितपुर में 600-600 मेगावाट, छतरपुर में 950 मेगावाट, बरेठी में 630 मेगावाट और कल्पी में 65 मेगावाट क्षमता की परियोजनाएं शामिल हैं। इन सभी परियोजनाओं को मिलाकर बुंदेलखंड देश के बड़े सौर ऊर्जा क्लस्टरों में शामिल हो रहा है।

उत्तर प्रदेश सरकार और यूपी नेडा (UPNEDA) इन परियोजनाओं के जरिए बुंदेलखंड को सौर ऊर्जा हब के रूप में विकसित करने की योजना पर काम कर रहे हैं। सरकार का फोकस उन इलाकों पर है जहाँ लगातार सूखा, कम बारिश और सिंचाई संकट की वजह से खेती प्रभावित रही। यही वजह है कि बड़ी मात्रा में उपलब्ध बंजर और कम उत्पादक जमीन को सौर परियोजनाओं के लिए चिन्हित किया गया।

वैसे बुंदेलखंड में साल के करीब 300 दिन तेज धूप रहती है, जिसे सोलर पावर उत्पादन के लिए आदर्श माना जाता है। इसी प्राकृतिक स्थिति को आधार बनाकर केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार और उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने इस इलाके में बड़े स्तर पर सौर निवेश बढ़ाने की रणनीति तैयार की है।

कबरई से बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे तक, सोलर कॉरिडोर का विस्तार

बुंदेलखंड में सौर ऊर्जा परियोजनाओं का विस्तार सिर्फ झाँसी और जालौन तक सीमित नहीं है। महोबा के कबरई में भी बड़े सोलर प्लांट पर काम चल रहा है, जिसे इस पूरे क्षेत्र के ऊर्जा नेटवर्क का अहम हिस्सा माना जा रहा है। कबरई प्लांट को बुंदेलखंड में तेजी से बढ़ रहे सोलर इंफ्रास्ट्रक्चर से जोड़कर देखा जा रहा है।

इसके साथ ही करीब 296 किलोमीटर लंबे बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे के किनारे 450 से 500 मेगावाट क्षमता की सोलर परियोजनाएँ विकसित करने की योजना भी तैयार की गई है। उत्तर प्रदेश सरकार एक्सप्रेसवे और सोलर परियोजनाओं को जोड़कर ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर मॉडल पर काम कर रही है।

इसका मकसद बिजली उत्पादन, ट्रांसमिशन और औद्योगिक निवेश को एक साथ बढ़ाना है। इसी वजह से एक्सप्रेसवे से जुड़े इलाकों में जमीन चिन्हित करने और निजी कंपनियों की भागीदारी बढ़ाने की प्रक्रिया तेज की गई है।

यूपी पीपीटीसीएल के प्रबंध निदेशक मयूर महेश्वरी ने कहा, “चरखारी, डकोर, बांगरा, बमौर, बिरधा, जैतपुर, हमीरपुर, बांदा और मड़ावरा उपकेंद्र जल्द हो जाएँगे। ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर-2 परियोजना के तहत पहली बार सोलर प्लांट से हरित ऊर्जा की सफल निकासी शुरू होना प्रदेश की विद्युत व्यवस्था के लिए उपलब्धि है।”

बंजर जमीन अब किसानों की कमाई का नया जरिया

बुंदेलखंड में खेतों में भी सोलर लग रहे हैं। इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक झाँसी और आसपास के कई गाँवों में किसान अपनी जमीन सोलर कंपनियों को लीज पर दे रहे हैं। किसानों का कहना है कि खेती से सालभर में जितनी कमाई नहीं हो पाती थी, उससे ज्यादा रकम अब तय किराये के रूप में मिल रही है।

कई किसानों ने बताया कि कम बारिश और सिंचाई संकट की वजह से खेती लगातार घाटे में जा रही थी। ऐसे में सोलर कंपनियों के साथ 25 से 30 साल तक के अनुबंध उनके लिए स्थायी आय का जरिया बन गए हैं।

रिपोर्ट में ऐसे किसानों का भी जिक्र है जिनकी जमीन पहले बंजर या कम उत्पादक मानी जाती थी। उन्हीं जमीनों पर अब बड़े स्तर पर सोलर परियोजनाएँ विकसित हो रही हैं। झाँसी, ललितपुर, जालौन और महोबा जैसे जिलों में कंपनियां किसानों से सीधे समझौते कर रही हैं। किसानों का कहना है कि पहले फसल बारिश पर निर्भर रहती थी और हर साल नुकसान का डर बना रहता था, लेकिन अब उन्हें निश्चित आय मिल रही है।

इसी वजह से कई गाँवों में खेती छोड़कर जमीन लीज पर देने का मॉडल तेजी से बढ़ा है। सरकार भी उन इलाकों को प्राथमिकता दे रही है जहाँ पानी की कमी और कम उत्पादन की वजह से खेती लंबे समय से प्रभावित रही है।

EC के SIR अभियान पर SC की मुहर: निष्पक्ष चुनाव, नागरिकता जाँच और संवैधानिक पावर पर ‘सुप्रीम’ फैसला, जानें कोर्ट ने क्या कुछ कहा

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (27 मई 2026) को भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के मतदाता सूचियों के विशेष गहन संशोधन (SIR) कराने के फैसले को सही ठहराया है। अदालत ने कहा कि इस कवायद का मकसद देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों को मजबूत करना है। यह फैसला चुनाव आयोग द्वारा पिछले साल बिहार में एसआईआर (SIR) प्रक्रिया शुरू करने के निर्णय को चुनौती देने वाली कई याचिकाओं पर आया है।

चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की पीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा कि चुनाव आयोग के पास संविधान के अनुच्छेद 324 के साथ-साथ लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 और इसके तहत बने नियमों के तहत ऐसा संशोधन करने का संवैधानिक अधिकार है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि विशेष गहन संशोधन सीधे तौर पर मतदाता सूचियों की ‘अखंडता, सटीकता और शुद्धता’ सुनिश्चित करने से जुड़ा है, जो लोकतांत्रिक प्रक्रिया की बुनियाद है।

सुप्रीम कोर्ट ने चार मुख्य सवाल तय किए

अदालत ने SIR अभ्यास की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं के एक समूह पर अपना फैसला सुनाते हुए (pdf), विचार के लिए चार प्रमुख प्रश्नों को चिन्हित किया।

  1. क्या चुनाव आयोग के पास विवादित (Impugned) विशेष गहन पुनरीक्षण कराने की शक्ति है?
  2. क्या यह SIR अभ्यास किसी वैध उद्देश्य पर आधारित है, और यदि हां, तो क्या चुनाव आयोग द्वारा अपनाए गए उपाय उस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए उचित और अनुपातिक हैं?
  3. क्या चुनाव आयोग द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 और मतदाता पंजीकरण नियम, 1960  के प्रावधानों के विपरीत या उनके उल्लंघन में है?
  4. क्या अपने संवैधानिक दायित्व मतदाता सूची के निर्माण और रखरखाव के तहत और संबंधित वैधानिक शर्तों के पालन में, चुनाव आयोग को उन व्यक्तियों की नागरिकता स्थिति की जाँच करने का अधिकार है जो मतदाता सूची में शामिल होने या बने रहने के इच्छुक हैं?

कोर्ट ने कहा कि ECI के पास SIR कराने का संवैधानिक अधिकार है

पहले मुद्दे पर विचार करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि चुनाव आयोग के पास (SIR) कराने का पूर्ण अधिकार है। कोर्ट ने माना कि यह प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 324 और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21(3) के तहत विधिवत रूप से अधिकृत है। साथ ही, अदालत ने उन दलीलों को खारिज कर दिया जिनमें कहा गया था कि यह अभ्यास मौजूदा चुनाव कानूनों का उल्लंघन करता है।

कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा, “विवादित SIR न तो जन प्रतिनिधित्व अधिनियम और न ही 1960 के नियमों को निष्प्रभावी करता है, बल्कि यह अनुच्छेद 324 के संवैधानिक जनादेश को और अधिक प्रभावी बनाता है।”

फैसले का एक अंश

पीठ ने आगे स्पष्ट किया कि यदि परिस्थितियाँ ऐसी हों कि आवश्यकता महसूस हो, तो चुनाव आयोग  को सामान्य मतदाता सूची पुनरीक्षण से अलग प्रक्रिया अपनाने की अनुमति है।

अदालत के अनुसार, आयोग अपने संवैधानिक और वैधानिक अधिकारों के तहत स्थिति के अनुसार अधिक सख्त या विशेष प्रक्रिया लागू कर सकता है, बशर्ते उसका उद्देश्य मतदाता सूची की शुद्धता और विश्वसनीयता सुनिश्चित करना हो।

कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि जब तक चुनाव आयोग कानून के दायरे में काम करता है, विशेष शक्ति के प्रयोग के लिए कारण दर्ज करता है, और अधिनियम या नियमों में किसी स्पष्ट निषेध का उल्लंघन नहीं करता, तब तक केवल इस आधार पर कि उसने सामान्य पुनरीक्षण से अलग प्रक्रिया अपनाई है, उस निर्णय को रद्द नहीं किया जा सकता।

न्यायालय ने यह भी कहा कि SIR को सीधे स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों की संवैधानिक आवश्यकता से जोड़ा जाना चाहिए। पीठ ने टिप्पणी की कि “स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव केवल मतदान की प्रक्रिया पर निर्भर नहीं करते, बल्कि वे मतदाता सूची की शुद्धता, सटीकता और शुचिता पर भी आधारित होते हैं।”

जजों ने यह भी उल्लेख किया कि पिछली बार व्यापक पुनरीक्षण को दो दशकों से अधिक समय बीत चुका है और इस दौरान तेज़ शहरीकरण, जनसंख्या प्रवास तथा मतदाता सूचियों में बड़े पैमाने पर नामों के जुड़ने और हटने जैसी परिस्थितियों ने एक नए सत्यापन अभ्यास को उचित ठहराया है।

कोर्ट ने कहा कि SIR का एक जायज मकसद है

दूसरे प्रश्न पर विचार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने माना कि SIR अभ्यास के पीछे का उद्देश्य न केवल वैध है, बल्कि संवैधानिक रूप से आवश्यक भी है।

कोर्ट ने कहा कि आयोग द्वारा जिस उद्देश्य को प्राप्त करने की कोशिश की जा रही है, मतदाता सूची की सटीकता, पूर्णता और शुद्धता को बहाल करना वह न केवल वैध है, बल्कि चुनाव आयोग को दिए गए संवैधानिक दायित्व का अभिन्न हिस्सा है।

अदालत ने यह भी कहा कि SIR को लेकर यह तर्क स्वीकार नहीं किया जा सकता कि इसका कोई उचित उद्देश्य नहीं है या यह राजनीतिक रूप से प्रेरित है। पीठ ने स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग द्वारा दिए गए कारणों का एक ‘प्रत्यक्ष और तार्किक संबंध’ एक विश्वसनीय और निष्पक्ष चुनावी प्रक्रिया को बनाए रखने से है।

फैसले का एक अंश

तीसरे पहलू पर विचार करते हुए, पीठ ने यह भी जांचा कि SIR के दौरान अपनाए गए तरीके उद्देश्य के अनुपात में हैं या नहीं। अदालत ने पाया कि चुनाव आयोग द्वारा अपनाए गए उपाय जैसे घर-घर जाकर सत्यापन और अद्यतन फॉर्मों का संग्रह उचित और तर्कसंगत हैं।

कोर्ट ने कहा कि “ये उपाय न केवल निर्धारित उद्देश्य से तार्किक रूप से जुड़े हुए हैं, बल्कि वास्तव में उसी को प्राप्त करने के लिए स्वाभाविक रूप से तैयार किए गए हैं।”

अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि फिजिकल वेरिफिकटीओन से पुराने या डुप्लीकेट प्रविष्टियों की पहचान करने में मदद मिलती है, जबकि मानकीकृत फॉर्मों से पूरे निर्वाचन क्षेत्रों में एक समान और निष्पक्ष जांच सुनिश्चित होती है।

फैसले में यह भी कहा गया कि इस प्रक्रिया में पर्याप्त प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपाय मौजूद हैं, जैसे अधिकारियों द्वारा जांच, संदिग्ध मामलों में नोटिस जारी करना, सुनवाई का अवसर और अपील की व्यवस्था।

कोर्ट ने कहा कि “ये सभी प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपाय अपनाए गए साधनों और प्राप्त किए जाने वाले उद्देश्य के बीच तर्कसंगत संबंध को और मजबूत करते हैं।”

अंत में इस मुद्दे को समाप्त करते हुए अदालत ने कहा, “हम संतुष्ट हैं कि विवादित SIR का मतदाता सूची की शुद्धता और सटीकता सुनिश्चित करने से प्रत्यक्ष और निकट संबंध है।”

कोर्ट ने SIR प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिका खारिज की

तीसरे मुद्दे की जाँच करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उन दावों को खारिज कर दिया कि SIR प्रक्रिया मतदाता पंजीकरण नियम, 1960 के नियम 21A (Rule 21A) का उल्लंघन करती है।

याचिकाकर्ताओं ने यह तर्क दिया था कि इस प्रक्रिया में पर्याप्त सुरक्षा उपायों के बिना नामों को मतदाता सूची से हटाया जा सकता है। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि SIR ढांचे के भीतर भी नोटिस जारी करना, जाँच, सुनवाई का अवसर और कारण सहित निर्णय जैसे सभी आवश्यक प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपाय उपलब्ध हैं।

इस आधार पर कोर्ट ने माना कि प्रक्रिया कानून के अनुरूप है और इसमें मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा के लिए पर्याप्त मौजूद हैं।

फैसले का एक अंश

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ये सुरक्षा उपाय प्रक्रिया के विभिन्न चरणों में फैले हुए हैं, जिनमें गणना, प्रारूप मतदाता सूची का प्रकाशन और दावा-आपत्ति की प्रक्रिया शामिल हैं।

पीठ ने कहा कि “कानूनी ढाँचा किसी कठोर या एकल प्रक्रिया प्रारूप की माँग नहीं करता, बल्कि कार्रवाई में निष्पक्षता सुनिश्चित करने की अपेक्षा करता है।”

अदालत ने चुनाव आयोग द्वारा अपनाई गई दस्तावेज सत्यापन प्रणाली को भी सही ठहराया। पीठ के अनुसार, दस्तावेज़ों की आवश्यकता का उद्देश्य ‘प्रशासनिक एकरूपता और साक्ष्यगत विश्वसनीयता’ सुनिश्चित करना है।

याचिकाकर्ताओं ने इस बात पर आपत्ति जताई थी कि राशन कार्ड और वोटर ID कार्ड जैसे दस्तावेजों को स्वीकार्य सूची से बाहर रखा गया है। हालाँकि, कोर्ट ने इस मामले में चुनाव आयोग के विवेकाधिकार में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।

अदालत ने टिप्पणी की कि “मतदाता सूची के सत्यापन के लिए किन दस्तावेजों को स्वीकार किया जाएगा और उनके साक्ष्य मानक क्या होंगे, यह निर्णय स्वाभाविक रूप से आयोग के विवेकाधिकार के दायरे में आता है।”

अंत में कोर्ट ने कहा कि दस्तावेज़ी ढाँचा न तो मनमाना है और न ही अवैध। पीठ ने निष्कर्ष देते हुए कहा, “हम मानते हैं कि आयोग द्वारा निर्धारित दस्तावेज व्यवस्था उसके संवैधानिक जनादेश के अनुरूप एक सुविचारित प्रशासनिक विवेक का प्रयोग है।”

फैसले का एक अंश

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ECI वोटर रोल के लिए कर सकता है नागरिकता की जाँच

चौथे मुद्दे पर विचार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मतदाता सूची तैयार करने के दौरान चुनाव आयोग के पास सीमित उद्देश्य के लिए नागरिकता से जुड़े प्रश्नों की जाँच करने का अधिकार है, ताकि यह तय किया जा सके कि किसी व्यक्ति को मतदाता सूची में शामिल किया जाए या नहीं।

हालाँकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग द्वारा की गई ऐसी जाँच या निष्कर्ष किसी व्यक्ति की नागरिकता के अंतिम निर्धारण के बराबर नहीं होंगे। पीठ ने कहा, “यह केवल आयोग की शक्तियों के दायरे से संबंधित मामला नहीं है, बल्कि यह इस बात से जुड़ा है कि इन शक्तियों का प्रयोग उस क्षेत्र में किस प्रकार किया जाए जो सीधे नागरिकता की स्थिति को प्रभावित करता है।”

फैसले का एक अंश

कोर्ट ने चुनाव आयोग की इस दलील को स्वीकार किया कि संविधान के अनुच्छेद 325 और 326 के साथ-साथ जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 16 के तहत आयोग को यह अधिकार प्राप्त है कि वह यह सत्यापित कर सके कि कोई व्यक्ति मतदाता पंजीकरण के लिए निर्धारित शर्तों को पूरा करता है या नहीं।

साथ ही पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि नागरिकता एक गंभीर संवैधानिक विषय है और इसका अंतिम और निर्णायक निर्धारण केवल चुनाव आयोग द्वारा नहीं किया जा सकता।

न्यायाधीशों ने स्पष्ट किया कि यदि चुनाव आयोग को किसी व्यक्ति की नागरिकता को लेकर संदेह होता है, तो उसे इस मामले को नागरिकता अधिनियम के तहत सक्षम प्राधिकरण के पास अंतिम निर्णय के लिए भेजना अनिवार्य होगा।

न्यायालय के अंतिम निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने आगे कई सवालों पर स्पष्टता देते हुए संदिग्ध नागरिकता और अफवाहों पर आधारित दावों से जुड़े मामलों के लिए स्पष्ट सुरक्षा उपाय निर्धारित किए।

कोर्ट ने कहा, “जिन मामलों में आयोग संतुष्ट नहीं है कि कोई व्यक्ति मतदाता सूची में शामिल होने की वैधानिक शर्तें पूरी करता है, तो उसका यह कर्तव्य होगा कि वह ऐसे व्यक्ति को कानून के अनुसार निर्णय के लिए केंद्र सरकार के सक्षम प्राधिकरण को भेजे।”

पीठ ने यह भी जोड़ा कि चुनाव आयोग के निष्कर्ष केवल चुनावी उद्देश्यों तक सीमित रहेंगे और उनसे किसी व्यक्ति की नागरिकता का अंतिम निर्धारण नहीं होगा।

कोर्ट ने चुनाव आयोग को यह भी निर्देश दिया कि वह चार सप्ताह के भीतर उन सभी मामलों को सक्षम प्राधिकरण के पास भेजे, जिनमें 2003 की मतदाता सूची से नाम नागरिकता संबंधी आधार पर हटाए गए थे।

साथ ही नागरिकता अधिनियम के तहत सक्षम प्राधिकरण को निर्देश दिया गया कि वह प्रभावित व्यक्तियों को उचित नोटिस और सुनवाई का अवसर देकर इन मामलों का निर्णय करे।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि बाद में यह पाया जाता है कि जिन लोगों के नाम हटाए गए थे वे वास्तव में भारतीय नागरिक हैं, तो उनके नाम मतदाता सूची में पुनः बहाल किए जाने चाहिए।

मामले की पृष्ठभूमि

विवाद की शुरुआत पिछले वर्ष तब हुई जब चुनाव आयोग ने बिहार विधानसभा चुनावों से पहले मतदाता सूचियों के SIR का आदेश दिया। इस प्रक्रिया को एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) और नेशनल फेडरेशन फॉर इंडियन विमेन (NFIW) सहित कई संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।

याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि SIR प्रक्रिया से मतदाताओं के नाम मनमाने तरीके से हटाए जा सकते हैं और इससे लाखों वास्तविक नागरिकों का मताधिकार छिन सकता है।

वहीं चुनाव आयोग ने इस कदम का बचाव करते हुए कहा कि यह संशोधन मतदाता सूची से डुप्लीकेट, गलत और अयोग्य प्रविष्टियों को हटाने के लिए आवश्यक था।

शुरुआत में 1 अगस्त को प्रकाशित बिहार की ड्राफ्ट मतदाता सूची से लगभग 65 लाख नाम हटाए गए थे। बाद में अपील और सुधार प्रक्रिया के बाद यह संख्या घटकर लगभग 47 लाख रह गई।

लंबे समय तक चली सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने बीच में संतुलित सुरक्षा उपाय भी जोड़े। अदालत ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया कि वह एक औपचारिक नोटिस जारी करे, जिसमें स्पष्ट रूप से कहा जाए कि SIR प्रक्रिया के तहत तैयार की जा रही संशोधित मतदाता सूचियों में आधार को पहचान प्रमाण के रूप में स्वीकार किया जाएगा।

बिहार में SIR प्रक्रिया 30 सितंबर को पूरी कर ली गई। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, संशोधन से पहले बिहार में 7.89 करोड़ मतदाता थे, जबकि प्रक्रिया पूरी होने के बाद यह संख्या घटकर 7.42 करोड़ रह गई।

बाद में चुनाव आयोग ने इस प्रक्रिया का विस्तार अन्य राज्यों में भी किया और 27 अक्टूबर को पश्चिम बंगाल, केरल और तमिलनाडु में इसे लागू करने की अधिसूचना जारी की। इसी के बाद नए कानूनी विवाद खड़े हुए और अंततः सुप्रीम कोर्ट ने अपने अंतिम फैसले में इस अभ्यास को बरकरार रखा।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

सनातन के स्त्री प्रतीकों के प्रति तिरस्कार, हिंदू विरोध और घृणा का लंबा दौर: जब इस्लाम में अनिवार्य नहीं तो गाय की कुर्बानी पर क्यों मुस्लिमों का इतना जोर?

भारत कई धर्मों और संस्कृतियों वाला देश है। संविधान के अनुसार भारत एक पंथनिरपेक्ष देश है लेकिन यहाँ की सांस्कृतिक जड़ें लंबे समय से सनातन परंपराओं और मान्यताओं से जुड़ी रही हैं। ऐसे में कई बार धार्मिक मान्यताओं के टकराव से जुड़े मुद्दे विवाद का कारण बनते हैं जिनमें ‘गो हत्या’ का मुद्दा भी शामिल है।

ईद-उल-अजहा यानी बकरीद के मौके पर मुस्लिम समुदाय में कुर्बानी की परंपरा निभाई जाती है जिसमें आमतौर पर बकरों समेत कुछ अन्य जानवरों की कुर्बानी दी जाती है। हालाँकि, समय-समय पर गाय की कुर्बानी को लेकर भी विवाद सामने आते रहे हैं। कई मामलों में अदालतों तक यह मामला पहुँचा जहाँ गाय की कुर्बानी की अनुमति की माँग की गई।

इसी बीच, हाल ही में कलकत्ता हाई कोर्ट ने उन याचिकाओं को खारिज कर दिया जिनमें बकरीद के मौके पर गाय और बैलों की कुर्बानी पर रोक लगाने वाले नोटिफिकेशन को चुनौती दी गई थी। इन याचिकाओं में तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) और माकपा (CPIM) से जुड़े पक्ष भी शामिल थे।

दरअसल, पश्चिम बंगाल में BJP सरकार ने ईद-उल-अजहा के दौरान गाय और बैलों की कुर्बानी पर रोक लगाने का नोटिफिकेशन जारी किया था। हाई कोर्ट ने इस फैसले को सही ठहराते हुए कहा कि गाय की कुर्बानी न तो ईद-उल-अजहा का अनिवार्य हिस्सा है और न ही इस्लाम में इसे जरूरी बताया गया है। इससे पहले, 27 मई को मद्रास हाई कोर्ट ने भी इसी तरह का फैसला सुनाया था।

संविधान में गो-संरक्षण और अदालतों के अहम फैसले

भारत के संविधान में गायों की सुरक्षा को लेकर विशेष प्रावधान किया गया है। संविधान के अनुच्छेद 48 के तहत राज्य सरकारों को यह प्रयास करने के लिए कहा गया है कि गाय, बछड़ों और दूध देने या खेती में उपयोग होने वाले पशुओं के वध पर रोक लगाई जाए। यह प्रावधान राज्य के नीति निदेशक तत्वों (DPSP) का हिस्सा है। हालाँकि, यह कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है लेकिन सरकारों को कानून और नीतियाँ बनाते समय इसका पालन करने की सलाह दी गई है।

देश के कई राज्यों में गो हत्या पर रोक लगाने वाले कानून लागू हैं लेकिन केरल, कुछ पूर्वोत्तर राज्यों और पश्चिम बंगाल (अब तक) में गोहत्या पर पूर्ण प्रतिबंध लागू नहीं है।

गोहत्या को लेकर अदालतों में भी कई महत्वपूर्ण फैसले आए हैं। 1975 में मोहम्मद हनीफ कुरैशी & अन्य बनाम बिहार राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की संविधान पीठ ने उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश में गो हत्या पर प्रतिबंध को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई की थी। याचिकाकर्ताओं ने इसे मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बताया था।

हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि गाय की कुर्बानी इस्लाम की अनिवार्य मजहबी प्रथा का हिस्सा नहीं है। इसलिए अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का सवाल इस मामले में लागू नहीं होता। इसके बाद 2005 में गुजरात राज्य बनाम मिर्जापुर मोती कुरैशी कसाब जमात मामले में सुप्रीम कोर्ट की 7 जजों की पीठ ने भी अहम फैसला सुनाया। अदालत ने बॉम्बे एनिमल प्रिजर्वेशन (गुजरात संशोधन) अधिनियम, 1994 को संवैधानिक रूप से वैध माना। इस कानून के तहत गायों और बैलों के वध पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया गया था जिसे कोर्ट ने सही ठहराया।

संविधान और अदालतें मानती हैं कि गो हत्या ना हो लेकिन मुस्लिम समुदाय नहीं

ईद-उल-अजहा इस्लामी मान्यता के अनुसार पैगंबर इब्राहिम द्वारा अल्लाह के प्रति समर्पण की याद में मनाई जाती है। मान्यता है कि इब्राहिम अपने पुत्र इस्माइल की कुर्बानी देने के लिए तैयार हो गए थे। हालाँकि, आज मुस्लिम समुदाय ठीक उसी तरह उनका अनुसरण नहीं करता। कुरान के अनुसार ईद-उल-अजहा पर बकरा, भेड़, गाय, भैंस और ऊँट की कुर्बानी दी जा सकती है।

हालाँकि, कुरान में कहीं भी विशेष रूप से गाय की कुर्बानी को अनिवार्य नहीं बताया गया है, भले ही गोमांस का सेवन ‘हलाल’ माना जाता हो। जहाँ एक ओर संविधान के नीति निदेशक तत्व (DPSP) और अदालतों ने गो हत्या पर रोक लगाने की बात कही है। वहीं, मुस्लिम समुदाय का एक वर्ग इन प्रावधानों की अनदेखी करते हुए गायों की कुर्बानी देता है जिसे हिंदू भावनाओं को ठेस पहुँचा सके।

जो हिंदुओं के लिए ‘अघ्न्या’ वो मुस्लिमों के लिए ‘हलाल’

हिंदू सनातन परंपरा में गाय को गौ माता के रूप में पूजनीय माना जाता है। गाय को मातृत्व, पोषण, पवित्रता, अहिंसा और जीवनदायिनी का प्रतीक माना गया है। वेदों में गाय को ‘अघ्न्या’ कहा गया है, जिसका अर्थ है- ‘जिसे मारा या नुकसान नहीं पहुँचाया जाना चाहिए’। हिंदू ग्रंथों, विशेष रूप से ‘ऋग्वेद’ और ‘अथर्ववेद’ में गाय को समृद्धि, पवित्रता, दिव्यता और जीवन-निर्वाह से जोड़ा गया है। वैदिक यज्ञों और अन्य धार्मिक अनुष्ठानों में दूध और उससे बने उत्पादों का विशेष महत्व बताया गया है।

ऋग्वेद (1.164.27) में लिखा है– ‘अघ्न्येयं सा व॑र्धतां महते सौभ॑गाय’ जिसमें साफ तौर पर कहा गया है कि गाय को अघ्न्येयं (जिसे नहीं मारा जाना चाहिए) गाय स्वास्थ्य और समृद्धि लाती है। कुछ वैदिक व्याख्याओं में गोवध करने वालों के लिए कठोर दंड का उल्लेख भी मिलता है।

हालाँकि, सदियों के इस्लामी आक्रमणों, ब्रिटिश उपनिवेशवाद और दशकों के कॉन्ग्रेस शासन के बाद राजनीतिक लाभ के लिए मुसलमानों को खुश करने के लिए हिंदू मान्यताओं, परंपराओं और गौरव को दबा दिया गया है। दूसरी ओर मुस्लिमों का जोर गाय की कुर्बानी पर ही रहता है।

सनातन के स्त्री प्रतिनिधित्व का इस्लामी अपमान

नवंबर 2023 में अमरेली सेशंस कोर्ट ने 3 मुस्लिम पुरुषों कासिम हाजी सोलंकी, सत्तार इस्माइल सोलंकी और अकरम हाजी सोलंकी को गाय की हत्या के लिए आजीवन कारावास की सजा सुनाई। अमरेली सेशंस कोर्ट की छापेमारी के दौरान, एक मुखबिर की सूचना पर बहारपारा गाँव के मोताखटकीवाड इलाके में एक घर पर छापा मारा गया। पुलिस ने तीनों नामजद मुस्लिम पुरुषों के घर से 40 किलो मांस बरामद किया।

मार्च 2025 में एक पुलिस को उत्तर प्रदेश के शामली जिले के एक गाँव में एक खेत में बछड़े के अवशेष मिले। समीर नामक एक व्यक्ति को राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत आजीवन कारावास की सजा दी गई क्योंकि उसने पिछले साल होली के मौसम में जंगल में दो बछड़ों और एक गाय को मार डाला था।

इसी साल फरवरी में गुजरात के सूरत में गाय की हत्या रोकने के लिए चलाए जा रहे एक अभियान के दौरान एक मुस्लिम भीड़ ने हिंदू गौ रक्षकों और पुलिस पर धारदार हथियारों से हमला किया। मुस्लिम कसाई इस्लामी महीने रमजान के दौरान गायों को काटना चाहते थे जबकि राज्य में गाय की हत्या पर सख्त प्रतिबंध है।

27 फरवरी को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के जालौन में हिंदू त्योहार नवरात्रि के दौरान गायों की हत्या करने पर सिकंदर, सैय्यद अली और हसनैन की हिरासत को बरकरार रखा। आरोपी तिकड़ी को 31 मार्च को गिरफ्तार किया गया था जब पुलिस ने लगभग 2-3 क्विंटल गोमांस, चाकू और अन्य सामग्री जब्त की। ऐसे कई मामले सामने आए हैं जिनमें गायों के अवशेष नालियों और सुनसान जगहों पर फेंके हुए मिले और जाँच में मुस्लिम व्यक्ति दोषी पाए गए।

पिछले कुछ वर्षों में मंदिरों के सामने मांस के टुकड़े फेंकने की घटनाओं में काफी वृद्धि हुई है और अधिकतर मामलों में मुसलमान ही दोषी पाए गए हैं। असम के मुस्लिम बहुल धुबरी में 2025 में बकरीद के दिन एक हनुमान मंदिर के पास गाय का सिर मिला था।

असम के श्रीभूमि जिले में एक हिंदू बहुल इलाके में स्थित हिंदू मंदिर के पास भी बकरीद के दिन एक गाय की हत्या की गई। गोलपारा में हजरत अली और 4 अन्य लोगों ने काली मंदिर के पास गाय का कटा हुआ सिर फेंका। जून 2025 में असम के लखीमपुर में एक नमाज स्थल के पास गाय की खोपड़ियाँ मिलने के बाद 7 मुस्लिम पुरुषों को गिरफ्तार किया गया। अक्टूबर 2024 में कट्टरवादियों ने नवरात्रि जुलूस के दौरान हिंदुओं पर मांस के टुकड़े फेंके। 2021 में दिल्ली के कालिंदी कुंज में 4 गायों की हत्या की गई और उनके अवशेष मंदिर के पास फेंक दिए गए।

ऑपइंडिया ने हाल के वर्षों में उत्तर प्रदेश, झारखंड और अन्य राज्यों से ऐसी ही घटनाएँ दर्ज की हैं जिनमें हिंदू मंदिरों के अंदर गोमांस, कटे हुए सिर और अन्य अवशेष फेंके गए जो साफ तौर पर हिंदुओं और उनकी धार्मिक आस्था का मजाक उड़ाने का कृत्य है।

ईद पर गाय की हत्या और मंदिरों में गाय के अवशेष फेंकने के अलावा ऐसे मामले भी सामने आए हैं जिनमें मुसलमानों को हिंदुओं को गोमांस भरे समोसे बेचते हुए पकड़ा गया। अप्रैल 2024 में गुजरात पुलिस ने वडोदरा के एक समोसे की दुकान ‘हुसैनी समोसा सेंटर‘ पर छापा मारा और गोमांस (गाय के मांस) से भरे समोसे बेचने के आरोप में दुकान मालिक इमरान यूसुफ कुरैशी और नईम शेख सहित छह लोगों को गिरफ्तार किया।

अप्रैल 2023 में, गुजरात के नवासी में अहमद मोहम्मद और चाचा अजीम भाई द्वारा चलाई जा रही एक खाने की दुकान में गोमांस से भरे समोसे बेचे जा रहे थे, जिन्हें चिकन और मटन समोसे बताकर बेचा जा रहा था।

पिछले कुछ वर्षों में लव जिहाद के हजारों मामले सामने आए हैं, जिनमें मुस्लिम युवक हिंदू महिलाओं को प्रेम का नाटक करके और कभी-कभी धार्मिक पहचान छुपाकर फँसाते हैं, विवाह का बहाना बनाकर शारीरिक संबंध बनाते हैं, ब्लैकमेल करते हैं, हिजाब या बुर्के जैसे इस्लामी पहनावे को थोपते हैं और अंततः उन्हें इस्लाम कबूल करने और उनसे शादी करने पर मजबूर करते हैं। अधिकतर ऐसे मामलों में एक सामान्य बात यह पाई गई है कि हिंदू महिलाओं को जबरन गोमांस खिलाया जाता है।

दुर्गा पूजा, नवरात्रि और छठ से लेकर गंगा, यमुना और सरस्वती जैसी पवित्र नदियों की देवी के रूप में पूजा तक हिंदू धर्म में दिव्य स्त्री प्रतिनिधित्व को विशेष महत्व दिया गया है। इसके विपरीत, इस्लामी परंपरा में महिलाओं को द्वितीय श्रेणी की नागरिक के रूप में देखा जाता है जिनकी पहचान उनके पुरुष ‘संरक्षकों’ के इर्द-गिर्द घूमती है।

इस्लामी ग्रंथों में मुस्लिम महिलाओं के लिए पूरा शरीर ढकना, घर पर नमाज पढ़ना, किसी पुरुष महरम के साथ ही बाहर जाना अनिवार्य बताया गया है और पुरुषों को चार पत्नियाँ रखने और पत्नी को मारने-पीटने तक की अनुमति दी गई है।

जहाँ एक ओर मुस्लिम पुरुषों को अपनी महिलाओं की रक्षा करना और उन्हें लगभग छुपाकर रखना अनिवार्य है, वहीं इस्लामी ग्रंथ काफिर महिलाओं को युद्ध की लूट या माल-ए-गनीमत के रूप में स्वीकार्य मानते हैं। वास्तव में, कई समकालीन इस्लामी विद्वानों ने यह भी टिप्पणी की है कि इस्लाम मुसलमानों को काफिरों या गैर-मुसलमानों के विरुद्ध जिहाद के दौरान महिलाओं को यौन दासी बनाने और अपमानजनक कृत्य के रूप में बलात्कार करने की अनुमति देता है।

यह विकृत मानसिकता कि काफिर महिलाएँ काफिर पुरुषों और उनके धर्म को अपमानित करने का साधन हैं, दुनिया भर के कट्टरपंथी मुसलमानों में समान रूप से पाई जाती है। रेप जिहाद के मामलों से लेकर भारत में हिंदू महिलाओं को निशाना बनाने वाले मुस्लिम बलात्कार गिरोहों और ब्रिटेन में पाकिस्तानी मुस्लिम ग्रूमिंग गैंग तक इस्लामवादी धार्मिक विजय और वर्चस्व स्थापित करने के साधन के रूप में रेप को हथियार की तरह इस्तेमाल करते हैं।

केरल के लव जिहाद मामले और हाल ही के TCS नासिक कन्वर्जन जिहाद मामले से यह भी पता चलता है कि कभी-कभी मुस्लिम महिलाएँ भी अपने हम-मजहब पुरुषों की हिंदू महिलाओं को रेप जिहाद और इस्लाम में धर्मांतरण का निशाना बनाने में सहायता करती हैं। गाय की हत्या हो या काफिर महिलाओं का बलात्कार इस्लामवादी गैर-मुसलमानों, विशेष रूप से मूर्तिपूजक हिंदुओं का अपमान करना अपना धार्मिक कर्तव्य मानते हैं क्योंकि कुरान में मूर्तिपूजा को सबसे बड़ा पाप बताया गया है।

ये कुछ ताजा उदाहरण हैं जो यह दिखाते हैं कि इस्लामी आक्रमणकारियों के हिंदू पीड़ितों की चौथी और पाँचवीं पीढ़ी के वंशज किस प्रकार हिंदुओं के प्रति अपनी घृणा प्रकट करते हैं। भूलिए मत, मध्यकाल में भी जब इस्लामी बर्बर आक्रमणकारी भारत पर चढ़ाई करते थे तो वे अक्सर अपनी सेनाओं के आगे गायों को रखते थे, यह जानते हुए कि हिंदू गायों की पूजा करते हैं और उन पर आक्रमण नहीं करेंगे।

(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)

मुस्लिमों को कवर फायर, हिंदुओं से खुली नफरत: बकरीद पर ‘The Wire’ में अपूर्वानंद का जहरीला लेख, जानिए- दिल्ली दंगों वाले ‘प्रोफेसर’ के ‘सेलेक्टिव सेक्युलरिज्म’ का सच

हमारे देश में कुछ ऐसे पढ़े-लिखे लोग हैं जो खुद को बहुत उदारवादी (लिबरल) कहते हैं। लेकिन इनका एक तय एजेंडा बन चुका है। इनका काम सिर्फ दो हैं। पहला- इस्लामी कट्टरपंथ और पुरानी कुप्रथाओं का आँख मूँदकर समर्थन करना। दूसरा- हिंदू त्योहारों और रीतियों के खिलाफ बातें करना। इनकी सारी बड़ी-बड़ी डिग्रियाँ और ज्ञान सिर्फ इसी एक काम में खर्च होते हैं। दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर अपूर्वानंद के एक लेख ने इस चेहरे को फिर से सबके सामने ला दिया है।

बकरीद से ठीक पहले प्रोफेसर अपूर्वानंद ने ‘द वायर‘ (The Wire) पर एक लेख लिखा। यह कोई निष्पक्ष लेख नहीं है, बल्कि एकतरफा रोना है। इस लेख की हर बात में देश के सिस्टम और हिंदुओं के प्रति साफ गुस्सा दिखता है। पूरे लेख में बस एक ही खेल खेला गया है। किसी भी तरह मुसलमानों को ‘बेचारा और पीड़ित’ साबित किया जाए। वहीं दूसरी तरफ, हिंदुओं और देश की चुनी हुई सरकार को ‘विलेन’ (दोषी) बना दिया जाए।

इस तरह की सोच को ‘अर्बन नक्सल’ मानसिकता कहा जाता है, जिसका सच सामने आना बहुत जरूरी है। इसलिए हम प्रोफेसर साहब के इस लेख का सीधा और बिंदुवार विश्लेषण कर रहे हैं। हम हवा में बात नहीं करेंगे, बल्कि तथ्यों और सबूतों के साथ बताएँगे कि सच क्या है और फैलाया जा रहा झूठ क्या है।

कानून के शासन से लिबरलों को इतनी चिढ़ क्यों?

अपूर्वानंद का तर्क- “बकरीद करीब आ रही है। हमें यह कैसे पता चलता है? यह किसी स्थानीय मौलवी की बात नहीं है, बल्कि भारतीय जनता पार्टी के नेताओं, मंत्रियों और बीजेपी-नीत सरकारों के मुख्यमंत्रियों के बयान हैं, जो सभी मुसलमानों को चेतावनी और धमकियों से भरे होते हैं… पश्चिम बंगाल में, मंत्री दिलीप घोष ने हिंदी में चेतावनी दी कि सब कुछ ‘कानून के मुताबिक’ होना चाहिए और किसी को भी इसका उल्लंघन करने की इजाजत नहीं दी जाएगी। लेकिन किस संदर्भ में और किसे वे यह बात कह रहे थे?”

द वायर के लेख का एक पैराग्राफ

जवाब- अपूर्वानंद के इस प्रोपेगेंडा को पढ़कर यह समझना मुश्किल नहीं है कि उन्हें असल में इस बात से चिढ़ है कि आखिर भारत का प्रशासनिक तंत्र मुस्लिम समुदाय से कानून का पालन करने को कह ही कैसे रहा है। दशकों तक मुस्लिम तुष्टिकरण की गंदी राजनीति देखने वाले इन अर्बन नक्सलियों को यह बात हजम नहीं हो रही है कि देश में सबके लिए एक कानून (Rule of Law) लागू हो रहा है। वे चाहते हैं कि अल्पसंख्यकों को विशेष अधिकार मिले रहें और उन्हें सड़कों पर मनमर्जी करने की खुली छूट हो। जब सरकारें कहती हैं कि त्योहार कानून के दायरे में रहकर मनाएँ, तो इन्हें इसमें ‘चेतावनी’ और ‘धमकी’ नजर आने लगती है।

सड़कों को बंधक बनाने की वकालत क्यों?

अपूर्वानंद का तर्क- हर कोई जानता है कि ये चेतावनियाँ बकरीद से पहले मुसलमानों को निशाना बनाकर दी गई थीं। इससे पहले भी, मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने धमकी दी थी कि किसी को भी सड़कों पर नमाज पढ़ने की इजाजत नहीं दी जाएगी… उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने मुसलमानों को चेतावनी दी कि उन्हें सड़कों पर नमाज पढ़ने की इजाजत नहीं दी जाएगी। उन्होंने कहा कि अगर वे यह संदेश नहीं समझते हैं, तो उन्हें दूसरे तरीकों से ‘समझाया जाएगा’। हम सभी जानते हैं कि वे ‘दूसरे तरीके’ क्या हैं।

द वायर के लेख का एक पैराग्राफ

जवाब- सड़क घेरकर सामूहिक रूप से नमाज पढ़ने की जिद का समर्थन केवल एक अराजक मानसिकता का व्यक्ति ही कर सकता है। उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल की सरकारों ने साफ किया है कि सड़कें आम जनता, एम्बुलेंस और यातायात के लिए हैं, न कि किसी मजहबी गतिविधि को रोककर सार्वजनिक व्यवस्था ठप करने के लिए। क्या अपूर्वानंद को लगता है कि राहगीरों का रास्ता रोकना कोई मजहबी अधिकार है? जब यूपी के मुख्यमंत्री कानून के उल्लंघन पर ‘प्रशासनिक कार्रवाई’ की बात करते हैं, तो उसे ‘दूसरे तरीके’ कहकर डराने का नैरेटिव गढ़ना बंद होना चाहिए। कानून का डंडा अपराधियों और उपद्रवियों पर चलता है, शांतिपूर्ण नागरिकों पर नहीं।

‘सनातन भावनाओं’ का सम्मान करने की सलाह से मिर्ची क्यों लगी?

अपूर्वानंद का तर्क- असम के मुख्यमंत्री ने मुसलमानों को सलाह दी कि वे कुर्बानी ‘ठीक ढंग से’ करें। उन्होंने उन मुस्लिम आवाजों की तारीफ की जिन्होंने गाय की कुर्बानी के खिलाफ अपील की थी। हिमंता बिस्वा सरमा तो यहाँ तक कह गए कि बकरीद को आखिरकार कुर्बानी से पूरी तरह मुक्त हो जाना चाहिए। उन्होंने ऐलान किया कि मुसलमान ‘सनातन भावनाओं’ का सम्मान कर रहे हैं, और उन्होंने कहा कि इससे समाज में शांति बनी रहेगी।

द वायर के लेख का एक पैराग्राफ

जवाब- भारत जैसे विविधता वाले देश में अगर कोई मुख्यमंत्री सामाजिक सौहार्द बनाए रखने के लिए बहुसंख्यक समाज की ‘सनातन भावनाओं’ और गोवंश के सम्मान की अपील करता है, तो वामपंथियों के पेट में मरोड़ क्यों उठने लगती है? असम के मुख्यमंत्री ने समाज में शांति और भाईचारे के लिए यह बात कही। लेकिन अपूर्वानंद जैसों को समाज में शांति नहीं, बल्कि तनाव पसंद है। वे चाहते हैं कि ऐसी बातें उठती रहें जिससे ध्रुवीकरण हो और उनका बुद्धिजीवी होने का धंधा चलता रहे।

गौ-तस्करी और अवैध गतिविधियों का खुला बचाव

अपूर्वानंद का तर्क- ऐसे Video घूम रहे हैं जिनमें हम देखते हैं कि गाड़ियों को रोका जा रहा है और उन पर हमला किया जा रहा है, इस शक पर कि गायों को कुर्बानी के लिए गैर-कानूनी तरीके से ले जाया जा रहा है। लेकिन अब यह मामला सिर्फ गायों तक ही सीमित नहीं रहा। बकरियों को भी जब्त किया जा रहा है। दिल्ली में, बकरीद से ठीक पहले, नेहरू हिल पार्क में लोगों की आवाजाही पर रोक लगा दी गई थी… ‘गौ रक्षक’ टोलियाँ बनाई जा रही हैं।”

द वायर के लेख का एक पैराग्राफ

जवाब- इस देश में गोवंश की हत्या और उसकी तस्करी पर कानूनी प्रतिबंध है। अपूर्वानंद बड़ी चालाकी से अवैध गौ-तस्करी को ‘कुर्बानी के लिए परिवहन’ का मासूम नाम दे रहे हैं। हकीकत यह है कि अवैध रूप से ले जाए जा रहे जानवरों को रोकना कानूनन सही है। यह वामपंथी प्रोफेसर इस बात से पूरी तरह अनजान बन जाते हैं कि कैसे अवैध गौ-तस्करी को रोकते वक्त इस्लामी भीड़ द्वारा पुलिस और आम नागरिकों पर जानलेवा हमले किए जाते हैं। नेहरू हिल पार्क जैसी सार्वजनिक जगहों पर अगर प्रशासन अवैध खरीद-बिक्री और गंदगी रोकने के लिए सुरक्षा बढ़ाता है, तो उसे ‘मुसलमानों पर पाबंदी’ के रूप में दिखाना इनकी कुंठा को दर्शाता है।

मक्का के सच और PETA के अभियान से चिढ़

अपूर्वानंद का तर्क- एक टेलीविजन चैनल तो यह जाँचने के लिए मक्का तक चला गया कि क्या वहाँ गायों और ऊँटों की कुर्बानी दी जा रही है… पीटा (PETA) ने एक अभियान शुरू किया, जिसमें एक बकरी लोगों से गुहार लगाती है कि वे उसकी कुर्बानी न दें… PETA के इस अभियान में बकरियों के प्रति करुणा कम है, और मुसलमानों के प्रति द्वेष ज्यादा है। क्या PETA कामाख्या मंदिर या देवघर में भी ऐसा ही कोई अभियान चला सकता है, जहाँ रस्मों के दौरान कई जानवरों की कुर्बानी दी जाती है? उसने ऐसा कभी नहीं किया।

द वायर के लेख का एक पैराग्राफ

जवाब – जब कोई मीडिया चैनल यह दिखाता है कि मूल इस्लामी देशों (जैसे सऊदी अरब या मक्का) में भी स्थानीय कानूनों और व्यवस्था के तहत ही चीजें होती हैं, तो भारतीय लिबरलों का झूठ बेनकाब हो जाता है। इसलिए वे मीडिया को कोसने लगते हैं। रही बात PETA की, तो जब होली पर पानी बचाने या दिवाली पर पटाखे न फोड़ने के ज्ञान भरे ज्ञान-पत्र PETA द्वारा जारी किए जाते हैं, तब अपूर्वानंद जैसों की आँखें क्यों नहीं खुलतीं? तब उन्हें वो पोस्ट कभी हिंदू-विरोधी नहीं लगते। और तो और होली पर तरुण हत्याकांड में क्यों चुप रहें, जिसमें एक हिंदू युवक की मुस्लिमों द्वारा पीट-पीटकर हत्या कर दी गई। इसमें भी तो इस्लामी कट्टरपंथियों को पीड़ित दिखाते हुए अपूर्वानंद ने एक लेख छापा था।

द वायर के लेख का एक पैराग्राफ

बकरीद पर बकरे काटे जाने को सही ठहराने के लिए उन्होंने कामाख्या और देवघर जैसे पवित्र देवस्थानों को बदनाम करने की कोशिश की। वे यह भूल गए कि जहाँ भी हिंदू समाज में ऐसी कुछ प्राचीन परंपराएँ बची भी हैं, वहाँ सड़कों पर सरेआम खून नहीं बहाया जाता, न ही बीच सड़क पर जानवरों को काटा जाता है। इसके विपरीत, पशु क्रूरता के खिलाफ खुद हिंदू समाज के ही लोग सबसे पहले अदालतों और सुधार आंदोलनों में आगे आते हैं।

हिंदू त्योहारों पर कीचड़ उछालने का घिनौना प्रयास

अपूर्वानंद का तर्क- कई हिंदू भोलेपन से पूछते हैं कि सड़कों पर नमाज पढ़ी ही क्यों जानी चाहिए। वे नमाज पर लगी पाबंदियों को सही कदम मानते हैं… लेकिन वे कभी यह नहीं पूछते कि हर मंगलवार को हनुमान मंदिरों के बाहर सड़कें घंटों तक क्यों बंद रहती हैं। लगभग हर हिंदू त्योहार के दौरान, सड़कों पर मूर्तियाँ और जुलूस ही छाए रहते हैं… चाहे गणेश चतुर्थी हो, रथ यात्रा हो, राम नवमी हो, दुर्गा पूजा हो… सड़कें सिर्फ एक दिन के लिए ही नहीं, बल्कि अक्सर कई-कई दिनों तक लगातार बंद रहती हैं। और फिर एक महीने तक चलने वाली कांवड़ यात्रा भी है…

द वायर के लेख का एक पैराग्राफ

जवाब- एक बकरीद और सार्वजनिक स्थानों पर मनमानी को सही ठहराने के लिए अपूर्वानंद ने हिंदुओं के लगभग सभी प्रमुख त्योहारों- गणेश चतुर्थी, रथ यात्रा, राम नवमी, दुर्गा पूजा और काँवड़ यात्रा पर सवाल खड़े कर दिए। लेकिन इस वामपंथी प्रोफेसर ने यह छुपा लिया कि हिंदुओं के त्योहारों में सड़कों पर दिखने वाली भीड़ साल में केवल एक बार, एक निश्चित समय के लिए होती है, और वह भी पूरी तरह प्रशासन द्वारा तय किए गए रूट और अनुमति (Permission) के अनुसार होती है। हिंदू समाज सरकारी व्यवस्था का सम्मान करता है। DJ की आवाज से लेकर जुलूस के रास्ते तक, सब कुछ पुलिस तय करती है।

इसके उलट, सड़क घेरकर हर हफ्ते पढ़ी जाने वाली शुक्रवार की नमाज का कोई अंत नहीं होता। देश के किसी भी हिस्से में, किसी भी मुख्य मार्ग पर अचानक हजारों की इस्लामी भीड़ इकट्ठा होकर ट्रैफिक ठप कर देती है। मस्जिद से अचानक ईंट-पत्थर लेकर पुलिसकर्मियों और आम नागरिकों पर हमला होने लगता है। यह नजारा उत्तर प्रदेश के बरेली और अन्य जिलों में बखूबी देखने को मिला था। मुस्लिम बहुल इलाकों से शुक्रवार को गुजरना आम नागरिकों के लिए कितना बड़ा सिरदर्द बन जाता है, यह वहाँ रहने वाले लोग ही इस वामपंथी को बेहतर समझा सकते हैं।

‘मुस्लिम संयम’ बनाम ‘मस्जिदों के बाहर पथराव’ का कड़वा सच

अपूर्वानंद तर्क- मुसलमान अपने त्योहारों के दौरान कोई हंगामा या उन्माद नहीं मचाते… वे कभी भी मंदिरों के सामने से जुलूस निकालते हुए बलि नहीं देते… सिर्फ हिंदू ही मस्जिदों के सामने जोर-जोर से संगीत बजाने, मस्जिद परिसर में घुसने और मुसलमानों के धार्मिक प्रतीकों का अपमान करने के अधिकार की माँग करते हैं… मुसलमानों में उनके त्योहारों के दौरान एक तरह का संयम देखने को मिलता है। लेकिन बदकिस्मती से, इन मौकों पर, हिंदू समाज के भीतर मुसलमानों के प्रति जो नफरत छिपी होती है…

द वायर के लेख का एक पैराग्राफ

जवाब – यह केवल एक अर्बन नक्सल का ही शुतुरमुर्गी विचार हो सकता है जो जमीनी हकीकत से आँखें मूँदकर यह दावा करे कि मुस्लिम त्योहारों पर ‘संयम’ दिखता है। क्या अपूर्वानंद को नहीं पता कि रामनवमी या दुर्गा पूजा विसर्जन के दौरान देश के दर्जनों राज्यों में हिंदू शोभायात्राओं पर मस्जिदों और मुस्लिम छतों से पत्थरों, पेट्रोल बमों और तलवारों से हमले किए जाते हैं? क्या हनुमान जयंती के जुलूसों पर होने वाली हिंसक घटनाओं में भी उन्हें हिंदुओं की ही गलती नजर आती है?

मोहर्रम के जुलूसों में लहराई जाने वाली नंगी तलवारों और हथियारों से क्या आम जनता को कोई असुविधा या डर महसूस नहीं होता? हिंदुओं को ‘मानसिक बीमार’ बताने वाले अपूर्वानंद ताजिया जुलूसों के दौरान होने वाली सरेआम हिंसा और आगजनी पर पूरी तरह मौन साध लेते हैं, क्योंकि वहाँ उनके एजेंडे को ‘पीड़ित कार्ड’ खेलने का मौका नहीं मिलता।

वैचारिक घृणा और दंगों की साजिश का पुराना इतिहास

इन खुद को ‘ज्ञानी’ समझने वाले झोलाछापों का दिमाग पूरी तरह खोखला हो चुका है। इनका दोहरा चरित्र देखना हो, तो सबरीमाला मंदिर वाले मामले को याद कर लीजिए। तब यही वामपंथी कोर्ट के फैसलों का पन्ना लेकर कूद पड़े थे। हिंदू परंपराओं को ‘पिछड़ा’ और ‘महिलाओं का विरोधी’ बताने के लिए इन्होंने अपनी पूरी एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया था। लेकिन जैसे ही बकरीद आती है, इनकी बोलती बंद हो जाती है। जब सड़कों को जाम किया जाता है और बीच राह पर खुलेआम पशुबलि दी जाती है, तब इन्हें अचानक ‘मजहबी आजादी’ याद आने लगती है। तब ये सारा ज्ञान भूलकर दुबक जाते हैं।

आज बकरीद पर हिंदुओं के त्योहारों को ज्ञान देने वाले इस प्रोफेसर अपूर्वानंद का पुराना ट्रैक रिकॉर्ड भी देख लीजिए। यह कोई पहली बार नहीं है जब यह नफरत उगल रहा है। दिल्ली में जो हिंदू विरोधी दंगे हुए थे, उनकी चार्जशीट में भी इस प्रोफेसर का नाम आ चुका है। इन पर दंगों की साजिश रचने और भीड़ को भड़काने के बेहद गंभीर आरोप लगे थे।

ऐसे में ‘द वायर’ (The Wire) जैसी बदनाम वेबसाइट पर बैठकर इस प्रोफेसर का यह लेख लिखना कोई समाज सुधार की बात नहीं है। यह सीधे-सीधे भारत के कानून को ठेंगा दिखाना है। यह देश के बहुसंख्यक समाज को पूरी दुनिया में बदनाम करने की एक घटिया और सोची-समझी साजिश है।

बंगाल में ‘डिटेक्ट-डिलीट-डिपोर्ट’ का असर: बांग्लादेश बॉर्डर पर लगने लगी घुसपैठियों की कतारें, जानें- शुभेंदु सरकार ने कैसे की भगाने की तैयारी

पश्चिम बंगाल में नई बीजेपी सरकार बनने के बाद अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों के खिलाफ बड़ा अभियान शुरू हो गया है। राज्य सरकार ने ‘डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट’ यानी पहचान करो, रिकॉर्ड हटाओ और वापस भेजो नीति लागू करने की शुरुआत कर दी है।

इसी के बाद उत्तर 24 परगना जिले के बिथारी-हकीमपुर बॉर्डर पर सैकड़ों बांग्लादेशी नागरिकों की भीड़ देखने को मिली, जो भारत छोड़कर अपने देश वापस जाना चाहते हैं।

इनमें कई लोग ऐसे हैं जो सालों से बिना वैध दस्तावेजों के पश्चिम बंगाल में रह रहे थे और अलग-अलग जगहों पर मजदूरी, घरेलू काम, होटल और निर्माण कार्य में लगे हुए थे। सरकार द्वारा होल्डिंग सेंटर बनाए जाने और जाँच तेज होने के बाद इन लोगों में डर का माहौल बन गया है। कई लोगों ने कहा कि वे गिरफ्तार होने या जबरन डिपोर्ट किए जाने से पहले खुद ही वापस लौटना चाहते हैं।

सरकार की कार्रवाई

मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने इस मुद्दे पर कड़ा रुख अपनाते हुए साफ कहा कि अवैध तरीके से रह रहे बांग्लादेशी नागरिक जल्द से जल्द राज्य छोड़ दें। कल्याणी में एक प्रशासनिक बैठक के बाद उन्होंने कहा, “जल्दी-जल्दी भागो, नहीं तो सरकार जो करना होगा वो करेगी।”

उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिया कि अवैध प्रवासियों की पहचान और उन्हें वापस भेजने की प्रक्रिया तेज की जाए। मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि ऐसे लोगों को जेल में रखने की जरूरत नहीं है। उन्होंने कहा कि कानून पहले से मौजूद था, लेकिन राजनीतिक कारणों से उसका इस्तेमाल नहीं किया गया।

शुभेंदु अधिकारी ने कहा, “क्या वे हमारे रिश्तेदार हैं कि देश उनके खाने, कपड़े और दवाइयों का खर्च उठाए? अगर वे बांग्लादेशी हैं तो उनके देश को उन्हें स्वीकार करना चाहिए।”

सरकार का कहना है कि पुलिस सीधे ऐसे लोगों को BSF के हवाले कर सकती है। इसके बाद BSF और बांग्लादेश बॉर्डर गार्ड (BGB) मिलकर पहचान की पुष्टि करेंगे और फिर उन्हें वापस भेजा जाएगा।

होल्डिंग सेंटर बनने के बाद बढ़ा डर

राज्य सरकार ने मालदा और मुर्शिदाबाद में पहले दो होल्डिंग सेंटर शुरू किए हैं। इन सेंटरों में उन लोगों को रखा जाएगा जिनके पास भारत में रहने के वैध दस्तावेज नहीं हैं और जिनकी डिपोर्टेशन प्रक्रिया चल रही है।

सरकारी आदेश जारी होने के 48 घंटे के भीतर ही इन सेंटरों को तैयार कर लिया गया। सोमवार तक 12 संदिग्ध बांग्लादेशी नागरिकों को वहाँ भेजा भी जा चुका है।

इसी के बाद बड़ी संख्या में लोग बॉर्डर की ओर पहुँचने लगे। बॉर्डर पर पुरुष, महिलाएँ और बच्चे अपने सामान के साथ दिखाई दिए। BSF जवान पहले उनकी पहचान की जाँच कर रहे हैं, फिर औपचारिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद उन्हें बांग्लादेश अधिकारियों को सौंपा जा रहा है।

एक BSF अधिकारी ने बताया कि हर व्यक्ति से पूछताछ की जाती है, फिंगरप्रिंट लिए जाते हैं और फोटो रिकॉर्ड किया जाता है। इसके बाद उनकी नागरिकता और पृष्ठभूमि की पुष्टि होती है।

हमें डर था कि पकड़ लिए जाएँगे: काँप रहे घुसपैठिए

भारत छोड़कर लौट रहे कई लोगों ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि वे डर की वजह से वापस जा रहे हैं। खुलना की रहने वाली तकलीमा खातून ने बताया कि वह दो साल पहले घोजाडांगा बॉर्डर के जरिए भारत आई थी और घरेलू काम करती थी।

उसने कहा, “मैं नहीं चाहती कि मुझे होल्डिंग सेंटर भेजा जाए या जबरन धक्का देकर निकाला जाए। इसलिए मैं खुद वापस जा रही हूँ।” सतखीरा के शाहिदुल गाजी ने कहा कि वह तीन साल पहले एक दलाल की मदद से भारत आया था और राजमिस्त्री का काम करता था।

उसने कहा, “मेरे पास कोई नागरिकता दस्तावेज नहीं है। सैकड़ों लोगों की तरह मुझे भी अब लौटना पड़ रहा है।” जेसोर के मोहम्मद अली शेख ने बताया कि वह करीब सात साल से कोलकाता के मेटियाब्रुज इलाके में रह रहा था और होटल में काम करता था।

उसने कहा कि नई सरकारी नीति और होल्डिंग सेंटर की खबर के बाद उसने वापस लौटने का फैसला किया। एक अन्य महिला नुसरत बीबी ने कहा कि वो और उसका पति मजदूरी के लिए भारत आए थे, लेकिन अब माहौल बदल चुका है। सरकार कभी भी पकड़कर वापस भेज सकती थी, इसलिए हमने खुद लौटने का फैसला किया।

बीजेपी सरकार के लिए बड़ा चुनावी मुद्दा था अवैध घुसपैठ

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने अवैध बांग्लादेशी घुसपैठ, सीमा सुरक्षा और जनसंख्या बदलाव को बड़ा मुद्दा बनाया था। पार्टी ने वादा किया था कि सत्ता में आने पर अवैध प्रवासियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।

नई सरकार बनने के तुरंत बाद सुवेंदु अधिकारी ने डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट नीति लागू करने की घोषणा कर दी। सरकार का दावा है कि इससे राज्य में लंबे समय से चली आ रही अवैध घुसपैठ की समस्या पर रोक लगेगी।

पिछली TMC सरकार ने राजनीतिक फायदे के लिए अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों के खिलाफ सख्ती नहीं दिखाई। पार्टी का कहना है कि कई लोग फर्जी दस्तावेज बनवाकर सरकारी योजनाओं का लाभ भी उठा रहे थे।

बीजेपी नेताओं का दावा है कि इससे राज्य के संसाधनों पर दबाव बढ़ा, जनसंख्या संतुलन बदला और सुरक्षा एजेंसियों के लिए खतरे पैदा हुए। वहीं TMC पहले भी ऐसे आरोपों को राजनीति से प्रेरित बताती रही है।

अमित शाह ने डिटेक्ट-डिलीट-डिपोर्ट को बताया था NDA की पॉलिसी

डिटेक्ट-डिलीट-डिपोर्ट पर चर्चा नई या सिर्फ बंगाल तक सीमित नहीं है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने दिसंबर 2025 में संसद में इसे NDA की पॉलिसी बताया था। अमित शाह ने तब घुसपैठ के मुद्दे पर कड़ी कार्रवाई की बात की थी। उन्होंने कहा था कि क्या कोई भी देश का लोकतंत्र सुरक्षित रह सकता है, जब देश का प्रधानमंत्री-मुख्यमंत्री कौन हो, यह घुसपैठिए तय करेंगे। उन्होंने कहा था, “हम घुसपैठियों को डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट करेंगे।”

झारखंड चुनाव से पहले भी एक अखबार के साथ बातचीत में शाह ने इस नीति का जिक्र किया था। नवंबर 2024 में शाह ने कहा था, “हमने ये वादा किया है कि डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट, ये तीन हमारी नीति होगी। एक सर्वे करके सबसे पहले घुसपैठियों को आइडेंटिफाई किया जाएगा, उसके बाद में मतदाता सूची से उनका नाम डिलीट किया जाएगा। और अंततोगत्वा डिपोर्ट करने की भी कार्रवाई हम करेंगे”

क्या है ‘डिटेक्ट-डिलीट-डिपोर्ट’ पॉलिसी?

‘डिटेक्ट-डिलीट-डिपोर्ट’ पॉलिसी का मतलब है पहचान करो, रिकॉर्ड हटाओ और वापस भेजो। यानी सरकार सबसे पहले यह पता लगाएगी कि देश में कौन लोग अवैध तरीके से रह रहे हैं और उनके पास वैध नागरिकता या रहने के दस्तावेज हैं या नहीं। गृह मंत्रालय और सरकार के पुराने आँकड़ों में अलग-अलग समय पर देश में लाखों से लेकर करोड़ों तक अवैध बांग्लादेशियों के होने का दावा किया गया है।

इस नीति का दूसरा हिस्सा कार्रवाई से जुड़ा है। जिन लोगों के दस्तावेज सही नहीं पाए जाते, उन्हें होल्डिंग सेंटर्स में रखा जा सकता है। देश में बंगाल के अलावा असम, दिल्ली, अलवर, अमृतसर और गोवा में होल्डिंग सेंटर्स बने हुए हैं।

इसके बाद पहचान पूरी होने पर ऐसे लोगों को BSF या तटीय इलाकों में कोस्ट गार्ड के जरिए बांग्लादेश वापस भेजा जा सकता है। सरकार का कहना है कि इसका मकसद अवैध घुसपैठ पर रोक लगाना और उन इलाकों में डेमोग्राफिक बदलाव को नियंत्रित करना है, जहाँ लंबे समय से इस मुद्दे को लेकर बहस होती रही है।

सुरक्षा एजेंसियों के सामने बड़ी चुनौती

पश्चिम बंगाल की बांग्लादेश से लगती लंबी सीमा लंबे समय से सुरक्षा एजेंसियों के लिए चुनौती रही है। कई बार मानव तस्करी, मवेशी तस्करी, फर्जी दस्तावेज और आतंकी नेटवर्क से जुड़े मामलों में भी अवैध घुसपैठ का मुद्दा सामने आता रहा है।

अब केंद्र और राज्य दोनों में एक जैसी राजनीतिक सोच होने के कारण कार्रवाई तेज होती दिखाई दे रही है। सरकार ने पहचान पत्रों की जाँच, दस्तावेज सत्यापन और बॉर्डर निगरानी को भी मजबूत करने के संकेत दिए हैं।

हालाँकि इस अभियान को लेकर राजनीतिक बहस भी तेज हो गई है। एक तरफ बीजेपी इसे राष्ट्रीय सुरक्षा और कानून व्यवस्था का मुद्दा बता रही है, वहीं विपक्षी दल इसे मानवीय संकट और राजनीतिक ध्रुवीकरण से जोड़कर देख रहे हैं।