‘भारत को अपनी जड़ों से काटो, सभ्यता को उधार का साबित करो और यहाँ के निवासियों में हीनभावना भर दो…’ यही वह औपनिवेशिक फार्मूला था जिसने दशकों तक भारत के इतिहास को तोड़ने-मरोड़ने का काम किया। भारत को लेकर लगातार यह भ्रम फैलाने की कोशिश की गई कि यहाँ की सभ्यता ‘आयातित’ है।
इस भूमि की संस्कृति बाहर से आए लोगों ने बनाई। यहाँ के देवता, भाषा, ज्ञान सब बाहर से आया है। अब आप कहेंगे कि आज इसका जिक्र क्यों? वो इसलिए क्योंकि आज भी ऐसी ही कोशिशें जारी हैं।
पशुपति शिव की परंपरा से निकला ट्रुश्के का दर्द
हालिया विवाद की शुरुआत केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय के एक ट्वीट और उस पर इतिहासकार ऑड्रे ट्रुश्के (Audrey Truschke) की टिप्पणी के बाद हुई। दरअसल, बुधवार (27 मई 2026) को संस्कृति मंत्रालय ने मोहनजोदड़ो से प्राप्त ‘पशुपति मुहर’ से जुड़ा एक पोस्ट किया था।
मंत्रालय ने X पर लिखा, “भारत की अखंड और अनवरत चली आ रही सभ्यता का यह सबसे शक्तिशाली प्रतीकों में से एक!” मंत्रालय ने लिखा, “अविभाजित भारत के मोहनजोदड़ो में मिली यह लगभग 4,300 साल पुरानी स्टियाटाइट (पत्थर) की मुहर एक योग मुद्रा में बैठे व्यक्ति को दिखाती है, जिसे व्यापक रूप से शिव-पशुपति माना जाता है। यह आकृति ‘मूलबंधासन’ में बैठी दिखाई देती है और इसके चारों ओर कई जानवर बने हुए हैं।”
संस्कृति मंत्रालय ने लिखा, “भले ही प्राचीन सभ्यता से जुड़े स्थल आज आधुनिक सीमाओं के कारण अलग देशों में हों लेकिन इस विरासत का जीवंत संरक्षण आज भी भारत ही कर रहा है। पशुपति मुहर में दिखने वाली योग परंपरा, शैव प्रतीक और आध्यात्मिक सोच आज भी भारत के मंदिरों, शिव पूजा, योग परंपराओं और सांस्कृतिक जीवन में जीवित हैं।”
मंत्रालय ने लिखा, “वैदिक काल से लेकर आज के भारत तक यह सभ्यतागत धारा लगातार और बिना टूटे चली आ रही है। यह हमारी सोच, दर्शन, धार्मिक परंपराओं और सामूहिक चेतना में गहराई से बसी हुई है।”
One of the most powerful symbols of India’s unbroken civilizational continuity!
— Ministry of Culture (@MinOfCultureGoI) May 27, 2026
Discovered at Mohenjo-daro in undivided India this steatite seal, about 4,300-year-old, shows a seated figure in yogic posture (widely seen as Shiva-Pashupati) seated in Mulabandhasana, surrounded… pic.twitter.com/MxgoEGilxu
पश्चिमी इतिहासकारों को भारत की हजारों साल की सांस्कृतिक निरंतरता अखरती है। एक ऐसी सभ्यता जिसने असंख्य आक्रमण झेले लेकिन अपनी मूल पहचान नहीं छोड़ी। यह बात पश्चिमी नजरिए के लिए असहज थी और आज भी है। ऑड्रे ट्रुश्के को भी संस्कृति मंत्रालय का यह ट्वीट नागवार गुजरा।
ऑड्रे ट्रुश्के ने इस पर जवाब देते हुए लिखा, “ये शिव नहीं हैं। अधिक संभावना है कि यह प्रोटो-एलामाइट (Proto-Elamite) प्रतीकों से प्रभावित एक आकृति है जो एक यूरेशियन देवता ‘जानवरों के स्वामी’ (Lord of Animals) को दिखाती है। भारत का इतिहास बेहद अद्भुत, शानदार और गौरवशाली है। इसलिए इसे सही तरीके से समझना और बताना बहुत जरूरी है।”
This isn't Shiva. It's more likely adapted from proto-Elamite iconography, showing an Eurasian deity "lord of animals."
— Audrey Truschke (@AudreyTruschke) May 27, 2026
Indian history is amazing, wonderful, and fantastic — It's well worth getting it right. https://t.co/UJeLh1WjzM
अपनी किताब में भी ट्रुश्के ने फैलाया है भ्रम
इसी से जुड़े एक अन्य ट्वीट में ट्रुश्के ने अपनी किताब ‘India: 5,000 Years of History on the Subcontinent’ में इसका विस्तार से जिक्र किए जाने की चर्चा की है। इस पुस्तक में ट्रुश्के ने लिखा है, “प्राचीन इतिहास में सांस्कृतिक प्रभावों का पता लगाना आसान नहीं होता लेकिन कुछ सीमित संकेत मिलते हैं कि सिंधु सभ्यता के कुछ पहलू पश्चिम की संस्कृतियों से प्रभावित हो सकते हैं। खासकर, सिंधु सभ्यता में एलामाइट (Elamite) संस्कृति के कुछ निशान दिखते हैं।”
वह आगे लिखती हैं, “सिंधु सभ्यता के लोगों ने एलामाइट परंपराओं से कुछ पौराणिक विचार (mythical ideas) अपनाए हो सकते हैं, चाहे उन्होंने यह सीधे सीखा हो या किसी माध्यम से। उदाहरण के लिए, सिंधु घाटी की एक प्रसिद्ध मुहर में एक प्रसिद्ध यूरेशियन ‘देवता जानवरों के स्वामी’ (Lord of the Animals) को दिखाया गया है, जो पालथी मारकर बैठा है, कमर पर उभरी हुई गाँठ जैसे वस्त्र और सिर पर सींगों वाला मुकुट पहने हुए है। यह चित्र ‘प्रोटो-एलामाइट मुहरों’ से मिलता-जुलता माना जाता है।”

मार्शल ने बताया- ‘शिव’
मोहनजोदड़ो की खोज 1922 में ASI के अधिकारी राखल दास बनर्जी ने की थी। यह खोज हड़प्पा में बड़ी खुदाई शुरू होने के लगभग दो साल बाद हुई। इस स्थल पर 1930 के दशक तक बड़े पैमाने पर खुदाई का काम सर जॉन मार्शल, के. एन. दीक्षित, अर्नेस्ट मैके और कई अन्य निदेशकों के नेतृत्व में किया गया।

सर जॉन मार्शल ने 1931 में अपनी पुस्तक Mohenjo-daro and the Indus Civilization (Vol-1) में पशुपति मुहर को ‘ऐतिहासिक शिव (historic Shiva) का प्रारंभिक रूप’ (prototype of Shiva) बताया था।
उन्होंने लिखा, “इस पृथ्वी या मातृ देवी (Mother Goddess) के साथ-साथ मोहनजोदड़ो में एक पुरुष देवता भी दिखाई देता है, जिसे पहली नजर में ही ऐतिहासिक शिव के प्रारंभिक रूप (prototype) के तौर पर पहचाना जा सकता है। इस देवता का चित्रण एक*साधारण तरीके से उकेरी गई मुहर पर बेहद प्रभावशाली ढंग से किया गया है, जिसे हाल ही में मिस्टर मैके ने खोजा था।”
मार्शल ने लिखा, “यह देवता, जो तीन मुखों वाला प्रतीत होता है, एक नीचे बने भारतीय आसन पर योग की विशिष्ट मुद्रा में बैठा हुआ है। उसकी टाँगें शरीर के नीचे मुड़ी हुई हैं, एड़ी से एड़ी मिली हुई है और पैरों की उंगलियाँ नीचे की ओर मुड़ी हुई हैं। उसकी बाँहें फैली हुई हैं और हाथ घुटनों पर टिके हुए हैं, जिनमें अंगूठे सामने की ओर दिखाई देते हैं। कलाई से कंधे तक उसकी बाँहें चूड़ियों/कंगनों से ढकी हुई हैं, जिनमें 8 छोटे और 3 बड़े कंगन हैं।”

ट्रुश्के को विद्वानों ने दिखाया संस्कृति का आईना
ट्रुश्के के इन दावों की असलियत सामने लानी भी जरूरी थी और यह हुआ भी। कई लोगों ने ट्रुश्के के इन दावों की परतें उधेड़ दीं। लेखक अमीश ने X पर ट्रुश्के को जवाब देते हुए लिखा, “प्रोटो-एलामाइट? पशुपति मुहर में हाथी, भैंस और गैंडा दिखते हैं।”
उन्होंने लिखा, “प्राचीन एलाम आज के दक्षिण-पश्चिमी ईरान के इलाके में केंद्रित था। वहाँ हाथी, जल भैंसा और गैंडा प्राकृतिक रूप से पाए ही नहीं जाते थे। वैसे, ये तीनों भारत में पाए जाते हैं। इसके अलावा, मुहर में दिख रही आकृति एक योग मुद्रा में बैठी हुई है। तो क्या अब योग भी एलामाइट हो गया? सच में?”
Proto-Elamite?
— Amish Tripathi (@authoramish) May 28, 2026
The Pashupati seal has an elephant, a water buffalo and a rhinoceros. Ancient Elam was centred in southwestern Iran. Elephants, water buffalos and rhinoceroses are not native to ancient Elam. BTW, they are native to India. Also, the figure is seated in a Yogic… https://t.co/UgSJV8uL08
प्रोफेसर और हिंदू परंपराओं की जानकार डॉ. लावण्या वेमसानी ने भी इस पर प्रतिक्रिया दी है और इसे विस्तार से समझाया है। उन्होंने X पर लिखा, “मैं आपको बता नहीं सकती कि पशुपति मुहर को लेकर मुझे कितने मेसेज मिले। वजह यह थी कि एक पश्चिमी इतिहासकार ने इसकी तुलना एक पूरी तरह अलग एलामाइट (Elamite) मुहर से कर दी जबकि दोनों मुहरों में साफ और बड़े अंतर दिखाई देते हैं।”
उन्होंने लिखा, “एलामाइट मुहर और पशुपति/प्रोटो-शिव मुहर बिल्कुल अलग हैं। वे एक जैसी नहीं हैं। तुलना करने लायक उनमें 1% भी समानता नहीं है। सिंधु-सरस्वती सभ्यता की पशुपति मुहर में शिव को मूलबंधासन में बैठे दिखाया गया है। यह एक कठिन योग मुद्रा है जिसे केवल अनुभवी योगी ही कर पाते हैं। यह दुनिया के प्रति सजगता और आंतरिक शांति का प्रतीक मानी जाती है।”
लावण्या वेमसानी आगे लिखती हैं, “इस मुहर में शिव के चारों ओर भारत में पाए जाने वाले जानवर दिखते हैं, जैसे बाघ, हाथी और गैंडा। यह बात उन लोगों को परेशान करती है जो भारतीय इतिहास के बारे में गलत धारणाएँ फैलाते रहे हैं। वे मानें या न मानें, भारतीय इतिहास अब उनके बनाए ढाँचों पर नहीं टिका है। सच्चाई सामने आ रही है। #ColonizedMinds को सच के सामने झुकना चाहिए और तथ्यों पर आधारित इतिहास को स्वीकार करना चाहिए।”
उन्होंने लिखा, “अगर किसी तरह तुलना करनी भी हो तो वह आकृति शिव के बैल नंदी जैसी कही जा सकती है लेकिन शिव या पशुपति नहीं। हालाँकि, यहाँ ऐसी तुलना करना भी संदर्भ से बाहर की बात है। और मुहर पर बने बाकी जानवरों का क्या? अगर किसी को ‘जानवरों का स्वामी’ दिखाना हो, तो केवल एक जानवर बनाकर बात खत्म नहीं होती। पशुपति मुहर में तो आकृति चारों ओर जानवरों से घिरी हुई दिखाई देती है।”
I cannot tell you how many messages I received about the Pashupati seal and some western historian denying it by bringing out a comparison with a totally unrelated Elamite seal even though there are stark differences between the two seals.
— Dr. Lavanya Vemsani Ph.D. (@ProfVemsani) May 28, 2026
The Elamite seal is completely…
ऐसे ही और भी सैकड़ों लोगों ने तर्क दिए हैं और बताया है कि क्यों यह भगवान शिव की आकृति ही है। क्यों यह उस सांस्कृतिक निरंतरता का प्रतीक है जिसे पश्चिमी इतिहासकार झुठलाने की कोशिश करते हैं। जिसके लिए ‘आर्य आक्रमण’ जैसी थ्योरी गढ़ी जाती हैं।
इन विद्वानों द्वारा भारत को यह महसूस कराया गया कि उसकी अपनी कोई मौलिकता नहीं, वह हमेशा बाहरी प्रभावों का उत्पाद रहा है। इन सबके बाद भी वो सवाल जिसका जवाब आज तक इनके पास नहीं है कि अगर भारत की सभ्यता आयातित थी तो दुनिया की बाकी प्राचीन सभ्यताओं की तरह इसकी मूल पहचान खत्म क्यों नहीं हुई?
क्यों आज भी इस देश में वही मंत्र गूँजते हैं, जिनका उल्लेख हजारों वर्ष पुराने ग्रंथों में मिलता है? क्यों काशी, मथुरा, अयोध्या, प्रयाग, रामेश्वरम, पुरी और द्वारका जैसी तीर्थ परंपराएँ सदियों से जीवित हैं?
पशुपति सील से लेकर वैदिक साहित्य तक, योग से लेकर दर्शन तक, पुरातत्व से लेकर सांस्कृतिक परंपराओं तक संकेत बताते हैं कि भारत की सभ्यता की जड़ें यहीं हैं। यह कहना कि भारत ने बाहरी प्रभाव नहीं लिए भी सही नहीं है।
भारत ने दुनिया से संवाद किया, बहुत कुछ आत्मसात भी किया होगा। लेकिन आत्मसात करना और ‘आयातित’ होना दो बिल्कुल अलग बातें हैं। भारतीय सभ्यता की ताकत ही यही रही कि उसने बाहर से आने वाले विचारों को अपने भीतर पचाया लेकिन अपनी आत्मा नहीं खोई।
इतिहास पर बहस होनी चाहिए, सवाल भी पूछे जाने चाहिए लेकिन बहस के नाम पर एकतरफा प्रोपेगेंडा नहीं होना चाहिए। भारत की सभ्यता को पश्चिमी साँचे में फिट करने की जिद ऐसे वामपंथी इतिहासकारों को छोड़नी ही होगी।
यह सभ्यता ना तो किसी जहाज में भरकर आई थी, ना किसी तलवार के साथ रही। यह हिमालय की तरह यहीं खड़ी हुई, नदियों की तरह यहीं बही और हजारों वर्षों से यहीं साँस ले रही है।
















