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जिस कॉन्ग्रेस ने बनाया FCRA, वही अब विदेशी फंडिंग को लेकर BJP सरकार को घेर रही: NGOs की अवैध फंडिंग रोकने पर क्यों मचा बवाल?

कान्ग्रेस पार्टी इन दिनों मोदी सरकार पर विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम यानी FCRA के गलत इस्तेमाल का आरोप लगा रही है। कान्ग्रेस का कहना है कि सरकार FCRA के जरिए नागरिक समाज समूहों और गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) पर दबाव बना रही है और राजनीतिक असहमति को रोकने की कोशिश कर रही है।

हालाँकि, FCRA का इतिहास काफी पुराना है। यह कानून पहली बार 1976 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की सरकार के दौरान लाया गया था। इसके बाद राजीव गाँधी सरकार ने 1980 के दशक में इसमें बड़े बदलाव किए। 2010 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली UPA सरकार ने नया FCRA कानून लागू किया, जिसने NGOs के विदेशी फंड पर निगरानी और सरकारी नियंत्रण को और बढ़ाया।

इंदिरा गाँधी के समय आया FCRA

FCRA की शुरुआत 1976 में हुई थी। उस समय देश में प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के नेतृत्व में आपातकाल लगा हुआ था। नागरिक स्वतंत्रताएं सीमित थीं, विपक्षी नेताओं को MISA यानी आंतरिक सुरक्षा रखरखाव अधिनियम के तहत जेल में रखा गया था और प्रेस पर भी कड़े प्रतिबंध थे।

इसी दौर में विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम, 1976 संसद में लाया गया। इसका उद्देश्य देश में आने वाले विदेशी पैसे और उसके इस्तेमाल को नियंत्रित करना था।

1976 के कानून के तहत साफ तौर पर इन लोगों के लिए विदेशी मेहमाननवाजी और विदेशी चंदे पर रोक लगा दी गई थी:

(a) चुनाव लड़ने वाला उम्मीदवार,
(b) पंजीकृत अखबार का संवाददाता, कॉलम लिखने वाला, कार्टूनिस्ट, संपादक, मालिक, प्रिंटर या प्रकाशक,
(c) न्यायाधीश, सरकारी कर्मचारी या किसी निगम का कर्मचारी,
(d) किसी भी विधानमंडल का सदस्य,
(e) राजनीतिक दल या उसका कोई पदाधिकारी।

पत्रकारों को कानून के तहत इस प्रतिबंधित सूची में शामिल किया जाना इंदिरा गाँधी की मंशा को साफ तौर पर दिखाता है। इसका उद्देश्य राजनीतिक विरोधियों, व्यंग्य लिखने वालों, स्वतंत्र पत्रकारों और नागरिक अधिकार समूहों को विदेशों से आर्थिक मदद मिलने से रोकना था। इस तरह आपातकाल के दौरान उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि सार्वजनिक जीवन में आर्थिक रूप से टिके रहने के लिए सरकार का नियंत्रण बना रहे।

राजीव गाँधी सरकार ने बढ़ाया सरकारी नियंत्रण

आपातकाल खत्म होने और जनता पार्टी सरकार के कार्यकाल के बाद कान्ग्रेस फिर सत्ता में लौटी। प्रधानमंत्री राजीव गाँधी के समय 1985 में FCRA में महत्वपूर्ण बदलाव किए गए।

इससे पहले संगठन कुछ परिस्थितियों में पूर्व सूचना या सामान्य अनुमति के आधार पर विदेशी योगदान ले सकते थे। लेकिन 1985 के संशोधन के बाद विदेशी फंड लेने वाले संगठनों के लिए गृह मंत्रालय (MHA) के साथ औपचारिक पंजीकरण जरूरी कर दिया गया।

इस बदलाव के बाद FCRA NGOs के लिए एक स्थायी और नौकरशाही आधारित निगरानी व्यवस्था बन गया। विदेशी फंड लेने वाले संगठनों को अब सरकार के सामने पंजीकरण और नियमों का पालन करना जरूरी था।

2010 में मनमोहन सिंह सरकार ने बनाया नया FCRA

FCRA में सबसे बड़ा बदलाव 2010 में हुआ। प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली UPA सरकार और तत्कालीन गृह मंत्री पी. चिदंबरम के कार्यकाल में विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम, 2010 लागू किया गया।

इस कानून ने 1976 के पुराने FCRA को पूरी तरह खत्म कर उसकी जगह नया कानून लागू किया। नए कानून में NGOs और दूसरे संगठनों को मिलने वाले विदेशी फंड पर सरकार का नियंत्रण और बढ़ गया।

1976 के कानून के तहत FCRA पंजीकरण एक बार मिलने के बाद तब तक जारी रहता था, जब तक उसे रद्द नहीं किया जाता। लेकिन 2010 के कानून में पंजीकरण की अवधि 5 साल कर दी गई।

इसका मतलब था कि NGOs को अपना FCRA पंजीकरण समय-समय पर नवीनीकृत कराना पड़ता था। इससे सरकार के पास पंजीकरण को रोकने, उसमें देरी करने या उसे मंजूर नहीं करने का अधिकार और प्रभाव बढ़ गया।

2010 के FCRA की धारा 5 में ‘राजनीतिक प्रकृति के संगठन’ नाम की एक नई श्रेणी जोड़ी गई। इसके तहत सरकार को ऐसे संगठनों को विदेशी फंड लेने से रोकने की शक्ति मिली, जिन्हें राजनीतिक प्रकृति का माना जाता था। इसमें उन समूहों पर भी असर पड़ सकता था जो सरकारी नीतियों, बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स या दूसरी सरकारी योजनाओं के खिलाफ प्रदर्शन करते थे।

2010 के कानून की धारा 8 में विदेशी फंड के प्रशासनिक खर्च पर भी सीमा लगाई गई। इसके तहत किसी संगठन को मिले विदेशी योगदान का अधिकतम 50 प्रतिशत ही प्रशासनिक खर्च में इस्तेमाल किया जा सकता था। इसमें संगठन के संचालन, वेतन और रिसर्च जैसे खर्च शामिल थे। इस तरह सरकार ने NGOs के विदेशी फंड के इस्तेमाल पर एक और वित्तीय सीमा तय कर दी।

कुडनकुलम विवाद में FCRA का इस्तेमाल

2011 से 2013 के बीच तमिलनाडु में कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा संयंत्र और आनुवंशिक रूप से संशोधित यानी (जीएम) फसलों के फील्ड ट्रायल जैसे मुद्दों को लेकर विरोध प्रदर्शन हुए।

कुडनकुलम में पीपुल्स मूवमेंट अगेंस्ट न्यूक्लियर एनर्जी यानी (PMANE) के नेतृत्व में बड़े स्तर पर परमाणु विरोधी आंदोलन हुआ। इन प्रदर्शनों के कारण रूस की मदद से बनाए जा रहे परमाणु रिएक्टरों को शुरू करने में देरी हुई।

उस समय UPA सरकार के कई वरिष्ठ अधिकारियों ने इन प्रदर्शनों के पीछे विदेशी फंडिंग को जिम्मेदार बताया।

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने एक इंटरव्यू में कहा था कि कुडनकुलम में हो रहे विरोध प्रदर्शनों में विदेशी NGOs की भूमिका थी। उन्होंने कहा था कि इनमें से कई NGOs अमेरिका और स्कैंडिनेवियाई देशों से फंड प्राप्त करते हैं और भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरी तरह नहीं समझते।

करीब 4000 NGOs पर कार्रवाई

कुडनकुलम आंदोलन के दौरान गृह मंत्रालय ने करीब 4,000 NGOs के FCRA पंजीकरण रद्द किए थे। कुडनकुलम आंदोलन को फंड देने वाले बताए गए कुछ संगठनों के बैंक खाते फ्रीज किए गए और उनके वित्तीय रिकॉर्ड की जाँच भी कराई गई।

पर्यावरण से जुड़े कुछ विदेशी नागरिकों को भारत से बाहर भेजा गया या उन्हें वीजा देने से इनकार किया गया। सरकार का कहना था कि इन लोगों ने स्थानीय विकास विरोधी प्रदर्शनों में हिस्सा लेकर अपने वीजा नियमों का उल्लंघन किया था।

तत्कालीन गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने भी कुडनकुलम आंदोलन के दौरान विदेशी फंड के इस्तेमाल को लेकर कार्रवाई की बात कही थी। उन्होंने कहा था कि जाँच में धन के गलत इस्तेमाल की जानकारी सामने आई है और इसलिए FCRA के तहत मामले दर्ज करने का फैसला लिया गया।

आज कान्ग्रेस के विरोध के बीच पुराना इतिहास

आज कान्ग्रेस मोदी सरकार पर FCRA का इस्तेमाल NGOs और नागरिक समाज संगठनों को दबाने के लिए करने का आरोप लगा रही है। कान्ग्रेस FCRA संशोधन विधेयक का विरोध कर रही है और उसका कहना है कि इससे नागरिक संगठनों की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है।

लेकिन FCRA का इतिहास बताता है कि विदेशी फंड पर सरकारी निगरानी किसी एक सरकार तक सीमित नहीं रही है। इसकी शुरुआत 1976 में इंदिरा गांधी सरकार के दौरान हुई। 1985 में राजीव गांधी सरकार ने इसमें महत्वपूर्ण बदलाव किए और 2010 में मनमोहन सिंह सरकार ने नया FCRA कानून लागू किया।

इसके बाद भाजपा सरकार के समय भी FCRA में बड़े बदलाव किए गए। इनमें 2020 और 2026 के महत्वपूर्ण संशोधन शामिल हैं। इन बदलावों का मुख्य उद्देश्य विदेशी सरकारों और संगठनों से मिलने वाले पैसे के जरिए भारत की घरेलू राजनीति, नीतिगत फैसलों या सामाजिक आंदोलनों को प्रभावित करने की संभावना को रोकना बताया गया है।

FCRA की निगरानी का एक तर्क यह भी है कि विदेशी फंड का इस्तेमाल देश में अस्थिरता पैदा करने वाली गतिविधियों, उग्रवाद, अवैध धार्मिक धर्मांतरण या कट्टरपंथी संगठनों को आर्थिक मदद देने के लिए न हो।

इस पूरे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि FCRA को लेकर सरकारी नियंत्रण की व्यवस्था अचानक मोदी सरकार के समय शुरू नहीं हुई। यह कानून करीब 5 दशकों से अलग-अलग सरकारों के कार्यकाल में लगातार बदलता और मजबूत होता रहा है। ऐसे में आज कान्ग्रेस द्वारा FCRA को लेकर उठाए जा रहे सवालों के साथ इस कानून के पुराने इतिहास को भी देखना जरूरी है।

नेपाल में हिंदू राष्ट्र की माँग से ईसाई मिशनरी के खिलाफ मोर्चे तक, अब हिंसा के पीड़ित हिंदुओं के लिए आमरण अनशन: जानें- कौन हैं विनय यादव?

नेपाल की राजधानी काठमांडू के मैतीघर मंडला में एक शख्स पिछले 10 दिनों से अन्न त्यागकर बैठा है। यह कोई बड़ा राजनीतिक मंच नहीं लगा है, न ही चुनावी सभा हो रही है, उसके हाथ में बस अपनी माँगों की एक लंबी सूची है और दावा है कि जब तक सरकार इन्हें नहीं मानती, वह अपना अनशन खत्म नहीं करेगा।

यह शख्स हैं नेपाल के राजनीतिक और सामाजिक कार्यकर्ता विनय यादव। उनकी सबसे बड़ी माँग सुनसरी के देवानगंज में हुई हिंसा के पीड़ितों को न्याय दिलाना और सरकार के साथ हुए समझौते को लागू कराना है। लेकिन कहानी सिर्फ इतनी नहीं है।

विनय यादव जिन मुद्दों को लेकर अनशन पर बैठे हैं, उनमें नेपाल को फिर से हिंदू राष्ट्र घोषित करने की माँग, मुस्लिम आरक्षण खत्म करना, मुस्लिम आयोग को भंग करना, अवैध घुसपैठ पर कार्रवाई और हिंदुओं के खिलाफ हिंसा के मामलों में दोषियों पर कड़ी कार्रवाई जैसे मुद्दे शामिल हैं।

यही वजह है कि उनका मौजूदा आमरण अनशन सिर्फ एक स्थानीय घटना को लेकर किया जा रहा विरोध नहीं है बल्कि नेपाल की धार्मिक पहचान, राजनीति और नागरिक अधिकारों से जुड़े कई सवालों को एक साथ सामने ला रहा है।

26 जुलाई 2026 की रात सुनसरी जिले के देवानगंज ग्रामीण नगरपालिका के कप्टानगंज में लाउडस्पीकर, डीजे और कावड़ यात्रा को लेकर विवाद के बाद हिंसा भड़क गई थी। हालात बिगड़ने पर पुलिस की कार्रवाई और गोलीबारी हुई, जिसमें चार लोगों की मौत हो गई। इसके बाद सरकार और पीड़ित परिवारों के बीच 7-सूत्रीय समझौता हुआ।

मृतकों को शहीद का दर्जा, परिवारों को 10 लाख नेपाली रुपए की सहायता, एक सदस्य को रोजगार, घायलों का मुफ्त इलाज और निष्पक्ष जाँच जैसे वादे किए गए। विनय यादव अब सवाल उठा रहे हैं कि इन वादों पर अमल कहाँ तक पहुँचा?

यही सवाल उन्हें मैतीघर मंडला तक लेकर आया है। लेकिन जिस व्यक्ति ने अपनी जान दाँव पर लगाकर यह आंदोलन शुरू किया है, वह आखिर कौन है? नेपाल की राजनीति में उसकी पहचान क्या है और किन-किन मुद्दों पर वह पहले भी सरकारों के खिलाफ मोर्चा खोल चुका है?

चीन के सीमा अतिक्रमण से लेकर पोखरा एयरपोर्ट में भ्रष्टाचार, BRI के विरोध से लेकर मदरसा विधेयक के खिलाफ आंदोलन और नेपाल को हिंदू राष्ट्र बनाने की माँग तक, विनय यादव की राजनीतिक सक्रियता का दायरा काफी बड़ा रहा है। आइए जानते हैं कौन हैं विनय यादव और क्यों इस समय उनका आमरण अनशन नेपाल में चर्चा का विषय बना हुआ है।

कौन हैं विनय यादव?

विनय यादव नेपाल के राजनीतिक और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। वह राष्ट्रीय एकता दल के अध्यक्ष हैं और राष्ट्रीय एकता अभियान नाम के नागरिक मंच के मुख्य संयोजक और नेता भी हैं।

राष्ट्रीय एकता दल और राष्ट्रीय एकता अभियान की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक, विनय लंबे समय से नेपाल की संप्रभुता, सीमा सुरक्षा, सनातन धर्म की रक्षा, नेपाल को फिर से हिंदू राष्ट्र घोषित करने और नागरिक अधिकारों जैसे मुद्दों को लेकर आंदोलन करते रहे हैं। उनका राजनीतिक और सामाजिक अभियान सड़कों से लेकर संसद तक अलग-अलग मुद्दों को उठाने पर केंद्रित रहा है।

उनके समर्थक उन्हें ऐसे नेता के तौर पर पेश करते हैं, जिन्होंने राष्ट्रीय हित और नागरिक अधिकारों से जुड़े कई आंदोलनों में सक्रिय भूमिका निभाई है।

पोखरा एयरपोर्ट में भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर आंदोलन

नेपाली मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, उनके प्रमुख आंदोलनों में पोखरा इंटरनेशनल एयरपोर्ट के निर्माण में भ्रष्टाचार को सामने लाने का प्रयास शामिल है। बताया जाता है कि इस मामले की निष्पक्ष जाँच कराने और इसमें शामिल लोगों के खिलाफ कार्रवाई की माँग को लेकर उन्होंने आंदोलन किया।

इसके अलावा पोखरा इंटरनेशनल एयरपोर्ट से अंतरराष्ट्रीय उड़ानें शुरू कराने के लिए भी उन्होंने लगातार दबाव बनाया। इसी तरह भैरहवा स्थित गौतम बुद्ध इंटरनेशनल एयरपोर्ट से नियमित अंतरराष्ट्रीय उड़ानें संचालित करने की माँग को लेकर भी वह सक्रिय रहे हैं।

देश में आर्थिक संकट का हवाला देते हुए विनय ने सांसदों को मिलने वाले संसदीय विकास कोष के वितरण को रोकने की माँग को लेकर भी आंदोलन किया। उनके मुताबिक, आर्थिक संकट के समय इस तरह के फंड के इस्तेमाल पर सवाल उठना जरूरी है।

चीन और सीमा विवाद पर भी मुखर रहे हैं विनय

नेपाल की उत्तरी सीमा पर चीन के अतिक्रमण का मुद्दा भी विनय के आंदोलनों में प्रमुख रहा है। खास तौर पर गोरखा जिले के चुमनुब्री में रुइला पास और हुमला जिले में नेपाली जमीन पर चीनी अतिक्रमण को लेकर उन्होंने आवाज उठाई थी।

फरवरी 2022 में राष्ट्रीय एकता अभियान के नेतृत्व में काठमांडू स्थित संयुक्त राष्ट्र कार्यालय तक प्रदर्शन किया गया था। वहाँ हुमला में चीन के कथित अतिक्रमण को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान खींचने के लिए ज्ञापन सौंपा गया। उनके समर्थकों का दावा है कि इस आंदोलन के बाद सरकार ने मामले की जाँच के लिए समिति बनाने की दिशा में कदम उठाया।

विनय ने भूमि प्रबंधन, सहकारी और गरीबी निवारण मंत्रालय पर भी कथित रूप से अतिक्रमित नेपाली जमीन वापस लेने और संयुक्त सीमा निरीक्षण कराने के लिए दबाव बनाया।

इसके अलावा उन्होंने चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव यानी BRI परियोजना को नेपाल के हितों के खिलाफ बताते हुए इसे रद्द करने की माँग को लेकर काठमांडू में बड़ा प्रदर्शन किया। चीन से अनावश्यक हथियार खरीदने की प्रक्रिया को रद्द करने की माँग को लेकर भी उन्होंने रक्षा मंत्रालय पर दबाव बनाया। बीरगंज में चीनी नागरिकों द्वारा कथित रूप से चलाए जा रहे अवैध व्यावसायिक गतिविधियों को बंद कराने के लिए भी उनके आंदोलन का दावा किया जाता है।

मुस्लिम आयोग और मुस्लिम आरक्षण के खिलाफ भी आंदोलन

विनय के राजनीतिक एजेंडे का एक महत्वपूर्ण हिस्सा नेपाल में धार्मिक और सामाजिक नीतियों से जुड़ा है। वह मुस्लिम आयोग को भंग करने और नेपाल को फिर से हिंदू राष्ट्र घोषित करने की माँग को लेकर लगातार आंदोलन करते रहे हैं। उनका आरोप है कि मुस्लिम आयोग एक खास विचारधारा को बढ़ावा देता है।

इसी तरह वह मुस्लिम आरक्षण खत्म करने की माँग भी उठा रहे हैं। मौजूदा आमरण अनशन में भी यह मुद्दा उनकी प्रमुख माँगों में शामिल है।

उनके समर्थकों के अनुसार, विनय सनातन धर्म और वैदिक परंपराओं की रक्षा के लिए भी लगातार अभियान चलाते रहे हैं। वह नेपाल को हिंदू राष्ट्र घोषित करने की माँग को लेकर नागरिक आंदोलनों में सक्रिय रहे हैं।

मदरसा विधेयक से लेकर ईसाई मिशनरी कार्यक्रम तक

विनय ने मधेश प्रदेश सरकार द्वारा लाए गए मदरसा विधेयक का भी विरोध किया था। उनके आंदोलन के कारण इस विधेयक को रोकने का दावा उनके समर्थकों की ओर से किया जाता है।

इसके अलावा एक टेलीविजन कार्यक्रम को बंद कराने के लिए भी उन्होंने अभियान चलाया था। उनके अनुसार, यह कार्यक्रम ईसाई मिशनरियों से जुड़ा हुआ था और इसमें चर्चित अभिनेता राजेश हमाल की जाति को लेकर सवाल उठाए गए थे। विनय ने इस कार्यक्रम का विरोध करते हुए इसे बंद कराने की माँग की थी।

मधेश प्रदेश के तत्कालीन भौतिक पूर्वाधार विकास मंत्री जितेंद्र सोनल पर भी विनय के समर्थकों ने आरोप लगाया था कि कमीशन के कारण उपभोक्ता समितियों का भुगतान रोका गया। विनय ने इन भुगतानों को जारी कराने के लिए आंदोलन किया था।

अब जिंदगी दाँव पर लगाकर न्याय की माँग

विनय यादव का मौजूदा आंदोलन उनके पुराने राजनीतिक और सामाजिक अभियानों से अलग है, क्योंकि इस बार उन्होंने अपनी जान तक दाँव पर लगा दी है। मैतीघर मंडला में आमरण अनशन के दसवें दिन उनकी सेहत लगातार चिंता का विषय बनी हुई है।

उनका कहना है कि देवानगंज की हिंसा में मारे गए लोगों और उनके परिवारों को न्याय मिलना चाहिए और सरकार के साथ हुए सात-सूत्रीय समझौते को लागू किया जाना चाहिए। विनय के समर्थकों का कहना है कि आमरण अनशन उन लोगों का शांतिपूर्ण हथियार है, जिनकी आवाज सत्ता तक नहीं पहुँचती। वहीं, सरकार के सामने अब सवाल यह है कि एक नागरिक की जिंदगी दाँव पर लगने के बाद भी क्या वह बातचीत का रास्ता खोलेगी?

मुस्लिम आरक्षण खत्म करने से हिंदुओं को न्याय तक… जानें- क्या हैं नेपाल में 9 दिन से आमरण अनशन पर बैठे विनय यादव की माँगें और उन्होंने ऑपइंडिया को क्या बताया?

नेपाल की राजधानी काठमांडू के मैतीघर मंडला में राष्ट्रीय एकता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष विनय यादव आमरण अनशन पर बैठे हैं। शुक्रवार (7 अगस्त 2026) को उनके अनशन का नौवाँ दिन है। सुनसरी के देवानगंज में ‘हिंदू नरसंहार’ के पीड़ितों को न्याय दिलाने और सरकार के साथ हुए समझौते को लागू कराने की माँग को लेकर उन्होंने अन्न का त्याग कर दिया है।

विनय यादव का संघर्ष केवल एक घटना तक सीमित नहीं है। वह नेपाल में मुस्लिम आरक्षण खत्म करने, मुस्लिम आयोग को भंग करने, अवैध घुसपैठ पर कार्रवाई करने और हिंदू समुदाय के खिलाफ हुई हिंसा के दोषियों पर सख्त कानूनी कार्रवाई की माँग भी उठा रहे हैं।

देवानगंज में 26 जुलाई 2026 की रात लाउडस्पीकर के इस्तेमाल, डीजे बजाने और कावड़ यात्रा को लेकर हिंदुओं और मुस्लिमों के बीच हिंसा भड़की थी। इस झड़प और भीड़ को नियंत्रित करने के लिए की गई पुलिस कार्रवाई में गोलीबारी भी हुआ और इस घटना में 4 लोगों की मौत हो गई।

इसके बाद सरकार ने पीड़ित परिवारों के साथ सात-सूत्रीय समझौता किया। मृतकों को शहीद का दर्जा, परिवारों को 10 लाख नेपाली रुपए की राहत, एक सदस्य को रोजगार, घायलों के मुफ्त इलाज और निष्पक्ष जाँच जैसे भरोसे दिए गए। विनय यादव का कहना है कि इन आश्वासनों को अब कागज से निकालकर जमीन पर उतारने का समय आ गया है।

उनका सवाल सीधा है कि अगर सरकार ने पीड़ित परिवारों से समझौता किया है, तो उसके हर बिंदु पर कार्रवाई कब होगी? अगर हिंसा हुई है, तो दोषियों को कानून के सामने कब लाया जाएगा? और अगर नेपाल में धार्मिक हिंसा रोकनी है, तो ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए स्थायी सुरक्षा व्यवस्था कब तैयार होगी?

आमरण अनशन पर बैठ विनय यादव

ऑपइंडिया से क्या बोले विनय यादव?

इस आंदोलन के केंद्र में सुनसरी की घटना है। राष्ट्रीय एकता दल का कहना है कि हिंसा में मारे गए लोगों के परिवारों को सिर्फ आश्वासन नहीं बल्कि न्याय चाहिए। संगठन ने सरकार से घटना की स्वतंत्र, निष्पक्ष और समयबद्ध जाँच कराने की मांग की है।

माँग है कि दोषियों पर बिना किसी राजनीतिक या सामाजिक दबाव के कानून के अनुसार कार्रवाई हो और जाँच रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए। संगठन का कहना है कि यदि जाँच ही पारदर्शी नहीं होगी तो पीड़ित परिवारों का सरकार और कानून-व्यवस्था पर भरोसा कैसे कायम होगा?

विनय यादव ने ऑपइंडिया से बातचीत में कहा है, “घटना के बाद हमने शांतिपूर्ण प्रदर्शन किया और सरकार को 24 घंटे का अल्टीमेटम दिया और विभिन्न माध्यमों से अपनी माँगें सरकार तक पहुँचाईं। लेकिन जब हमारी माँगों पर कोई ठोस पहल नहीं हुई, तब हमें मजबूर होकर आमरण अनशन शुरू करना पड़ा।”

उन्होंने आगे कहा, “हमारी मुख्य माँगों में सुनसरी घटना की निष्पक्ष जाँच, दोषियों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई, पीड़ित परिवारों को न्याय, मृतकों को शहीद घोषित करना, घायलों का पूर्ण उपचार, सीमावर्ती क्षेत्रों में अवैध गतिविधियों पर प्रभावी नियंत्रण तथा हमारे द्वारा उठाए गए अन्य नीतिगत विषयों पर सरकार द्वारा गंभीर पहल शामिल है।”

उनका कहना है कि जब तक सरकार माँगों पर सम्मानजनक, लिखित और कार्यान्वयन योग्य सहमति नहीं देती, तब तक यह आमरण अनशन जारी रहेगा।

सरकार के 7-सूत्रीय समझौते पर भी सवाल

देवानगंज हिंसा के बाद नेपाल सरकार ने पीड़ित परिवारों के साथ सात-सूत्रीय समझौता किया था। राष्ट्रीय एकता दल अब सरकार से इसी समझौते को पूरी तरह और तत्काल लागू करने की मांग कर रहा है।

इसमें मृतकों को शहीद का दर्जा देने की प्रक्रिया पूरी करना, प्रत्येक पीड़ित परिवार को 10 लाख नेपाली रुपए की राहत राशि देना, परिवार के एक योग्य सदस्य को रोजगार उपलब्ध कराना और घायलों का मुफ्त इलाज शामिल है।

राष्ट्रीय एकता दल का माँग पत्र

इसके अलावा घटना की स्मृति में मेमोरियल पार्क बनाने और समझौते में तय अन्य सुविधाओं को भी लागू करने की माँग की गई है। संगठन का कहना है कि राहत की घोषणा कर देना पर्याप्त नहीं है। पीड़ित परिवारों तक सहायता पहुँचे और समझौते के प्रत्येक बिंदु का प्रभाव जमीन पर दिखाई दे, तभी न्याय का भरोसा पैदा होगा।

मुस्लिम आरक्षण और मुस्लिम आयोग की समाप्ति की माँग

राष्ट्रीय एकता दल की सबसे स्पष्ट नीतिगत माँगों में नेपाल में मुस्लिम आरक्षण समाप्त करना और मुस्लिम आयोग को भंग करना शामिल है। विनय यादव ने ऑपइंडिया से कहा, “हमारा मुद्दा किसी धर्म विशेष के नेपाली नागरिकों से नहीं है। हमारी चिंता मुख्य रूप से सीमावर्ती क्षेत्रों से होने वाली अवैध घुसपैठ, अवैध बसावट, नागरिकता के दुरुपयोग तथा गैरकानूनी गतिविधियों को लेकर है।”

मुस्लिम आरक्षण समाप्त करने की माँग को लेकर विनय यादव ने कहा, “हमारा मानना है कि राज्य के सभी नागरिकों के साथ समान व्यवहार होना चाहिए। इसलिए आरक्षण और विशेष प्रावधानों जैसे विषयों की संविधान, समानता के सिद्धांत और राष्ट्रीय आवश्यकता के आधार पर समीक्षा होनी चाहिए। यह एक नीतिगत विषय है, जिस पर सरकार और संबंधित पक्षों के बीच गंभीर संवाद होना चाहिए।”

अवैध घुसपैठ पर भी सरकार को घेर रहा आंदोलन

राष्ट्रीय एकता दल ने रोहिंग्या और बांग्लादेशी नागरिकों को वापस भेजने की माँग भी उठाई है। आधिकारिक पत्र में संगठन ने अवैध आव्रजन और सीमा पार होने वाली अवैध गतिविधियों को राष्ट्रीय सुरक्षा के संदर्भ में गंभीर मुद्दा बताया है।

इसके साथ ही संगठन ने कथित ‘जिहादी’ गतिविधियों के मामलों में मृत्युदंड का प्रावधान करने वाले कानून की माँग की है। यह माँग भी सरकार के सामने औपचारिक बातचीत के जरिए रखने की बात कही गई है।

इन माँगों पर किसी भी निर्णय को नेपाल के संविधान और कानून की प्रक्रिया से गुजरना होगा लेकिन आंदोलन ने इन्हें अब राष्ट्रीय राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है।

नेपाल में मुस्लिम आरक्षण

नेपाल में मुस्लिम आरक्षण को लेकर इन दिनों बहस तेज है लेकिन इसका इतिहास समझने के लिए एक जरूरी तथ्य पहले जानना होगा नेपाल में मुस्लिमों के लिए शुरू से कोई अलग तय प्रतिशत वाला आरक्षण नहीं रहा है। सरकारी नौकरियों में समावेशी आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था की नींव 2007 में पड़ी, जब सिविल सर्विस में खुली प्रतियोगिता से भरी जाने वाली सीटों में से 45% को समावेशी श्रेणियों के लिए रखा गया। इसमें महिलाओं, आदिवासी-जनजाति, मधेसी, दलित, दिव्यांग और पिछड़े क्षेत्रों के लोगों को अलग-अलग हिस्से मिले लेकिन मुस्लिमों के लिए अलग श्रेणी नहीं थी।

बड़ा बदलाव 2015 के नेपाल संविधान से आया। संविधान के अनुच्छेद 42 में आर्थिक, सामाजिक या शैक्षिक रूप से पिछड़े मुस्लिमों को राज्य के निकायों में समानुपातिक समावेशी सिद्धांत के आधार पर भागीदारी का अधिकार दिया गया। यानी मुस्लिम समुदाय को संवैधानिक तौर पर समावेशी प्रतिनिधित्व या आरक्षण का अधिकार मिला।

नेपाल के संविधान (2015) के अनुच्छेद 264 के तहत ‘राष्ट्रीय मुस्लिम आयोग’ की स्थापना की गई। इसे कानूनी जामा पहनाने के लिए संसद ने ‘मुस्लिम आयोग अधिनियम, 2074 (2017)’ पारित किया। इस कानून की प्रस्तावना में लिखा है कि यह आयोग मुस्लिम समुदाय के इतिहास व संस्कृति की पहचान, उनके अधिकारों की रक्षा, और उनके आर्थिक-सामाजिक सशक्तीकरण के लिए सरकार को सुझाव देगा। आयोग के मुताबिक, 2011 की जनगणना में नेपाल की मुस्लिम आबादी करीब 4.4% थी। 2021 में यह बढ़कर 5.09% हो गई थी।

आरक्षण को लेकर बहस आज भी खत्म नहीं हुई है। मार्च 2025 में प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने संसद में कहा था कि थारू और मुस्लिम समुदाय से जुड़ी आरक्षण संबंधी मांगों को संघीय सिविल सेवा कानून के जरिए संबोधित किया जाएगा। यानी आज की असली बहस यह है कि मुस्लिमों के लिए मौजूदा समानुपातिक प्रतिनिधित्व की व्यवस्था पर्याप्त है या सरकारी नौकरियों में अलग और स्पष्ट मुस्लिम कोटा होना चाहिए। इसी व्यवस्था के विरोध में अब नेपाल में मुस्लिम आरक्षण और मुस्लिम आयोग खत्म करने की माँग भी उठ रही है।

सांसद ने सदन में उठाया अनशन का मुद्दा

अब यह आमरण अनशन का मुद्दा नेपाल की संसद तक भी पहुँच चुका है। राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी की सांसद खुशिबू ओली ने प्रतिनिधि सभा में इस मुद्दे को उठाते हुए सरकार से प्रदर्शनकारी पक्षों के साथ तत्काल बातचीत करने की अपील की।

इस बीच नेशनल मधेसी कमीशन के चेयरमैन विनय दत्ता भी मैतीघर मंडला पहुँचे। उन्होंने विनय यादव से मुलाकात की और सुनसरी घटना की निष्पक्ष जाँच तथा दोषियों पर कानूनी कार्रवाई की जरूरत बताई।

नेपाल सरकार की और से अब तक क्या हुआ?

मैतीघर मंडला में 9 दिन से जारी अनशन अब नेपाल सरकार के लिए सीधी चुनौती बन चुका है। एक तरफ देवानगंज हिंसा के पीड़ित परिवारों के लिए किए गए सात-सूत्रीय समझौते को लागू करने का सवाल है, दूसरी तरफ मुस्लिम आरक्षण, मुस्लिम आयोग, अवैध घुसपैठ और धार्मिक हिंसा जैसे मुद्दों पर आंदोलनकारी पक्षों से बातचीत की माँग है। राष्ट्रीय एकता दल ने साफ किया है कि वह केवल आश्वासन से पीछे हटने वाला नहीं है।

विनय यादव ने बताया है कि अब तक सरकार की ओर से कुछ स्तर पर संपर्क हुआ है। जिला प्रशासन के माध्यम से हमारा माँग-पत्र लिया गया है और संवाद की प्रारंभिक प्रक्रिया शुरू हुई है। उन्होंने कहा, “हमने सरकार से स्पष्ट कहा है कि केवल मौखिक आश्वासन पर्याप्त नहीं है।”

यादव का कहना है, “हम चाहते हैं कि सरकार आधिकारिक स्तर पर वार्ता करे, लिखित सहमति दे और उस सहमति को समयबद्ध तरीके से लागू करे। यदि सरकार सकारात्मक पहल करती है, तो हम भी लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण तरीके से समाधान निकालने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। हमारा आंदोलन पूरी तरह शांतिपूर्ण है और इसका उद्देश्य केवल न्याय, सुरक्षा तथा हमारी माँगों पर गंभीर सरकारी पहल सुनिश्चित करना है।”

जहाँ फाँसी पर चढ़े थे काकोरी कांड के सेनानी ठाकुर रोशन सिंह, वहाँ 60 साल से चल रहा ‘नेहरू’ अस्पताल: अब नाम बदलने के लिए अनिश्चितकालीन धरना शुरू

19 दिसंबर 1927 की वह सुबह इलाहाबाद (अब प्रयागराज) की साउथ मलाका जेल के लिए एक भारी सुबह थी। फाँसी घर में एक क्रांतिकारी को तख्ते की ओर ले जाया जा रहा था, नाम था ठाकुर रोशन सिंह।

उनका ‘जुर्म’ बस इतना था कि उन्होंने अंग्रेज हुकूमत के खजाने को लूटकर आज़ादी की लड़ाई के लिए हथियार और संसाधन जुटाने की हिम्मत दिखाई थी, यही था मशहूर काकोरी काण्ड। पंडित राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खाँ और शचीन्द्रनाथ बख्शी के साथ मिलकर अंग्रेजों की नींद उड़ा देने वाले रोशन सिंह को इसी जेल में फाँसी की सजा सुनाई गई थी और उसी जेल की चारदीवारी में उनकी जिंदगी का आखिरी अध्याय पूरा हुआ।

जब उनका पार्थिव शरीर बाहर लाया गया, तो जेल के फाटक पर हजारों लोग जुट आए थे। वह भीड़ उस दौर की जनभावना की एक जीती-जागती मिसाल थी। मगर आजाद भारत में इस जगह को याद रखना तो दूर, इसका इतिहास ही धीरे-धीरे गुमनामी में धकेल दिया गया।

ब्रिटिश काल के बाद साउथ मलाका जेल को नैनी में स्थापित कर दिया गया। वर्षों तक इस जगह को बिसारने के बाद जेल को अस्पताल में बदल दिया गया और नाम रखा गया- स्वरूप रानी नेहरू अस्पताल। इसके बाद तो जैसे लोगों को रोशन सिंह की सुध ही नहीं रही।

अब महुआ डाबर संग्रहालय परिवार के प्रमुख शाह आलम खान ने इस अस्पताल का नाम बदलकर ठाकुर रोशन सिंह के नाम पर करने की माँग उठाई है। इसे लेकर अनिश्चितकालीन धरना भी शुरू कर दिया गया है।

गांधी के असहयोग आंदोलन वापस लेने पर दुखी थे रोशन सिंह

रोशन सिंह का जन्म 22 जनवरी 1892 को शाहजहाँपुर जिले के नबादा गाँव में हुआ था। पिता का नाम था ठाकुर जंगी सिंह और माता थीं कौशल्या देवी। बचपन से ही उनका स्वभाव निडर और तेज-तर्रार रहा।

1922 में चौरी चौरा काण्ड के बाद जब महात्मा गाँधी ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया। इससे देशभर के अनगिनत युवाओं की तरह रोशन सिंह भी बहुत दुखी हुए और क्रांति की राह पकड़ ली।

बरेली गोलीकांड में जेल गए रोशन सिंह

असहयोग आंदोलन में उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर और बरेली जिले के ग्रामीण क्षेत्र में इनका अद्भुत योगदान रहा। बरेली में ठाकुर रोशन सिंह ने एक पुलिस वाले की रायफल छीनकर जबर्दस्त फायरिंग शुरू कर दी थी जिसके कारण हमलावर पुलिस को उल्टे पाँव भागना पड़ा। मुकदमा चला और ठाकुर को सेंट्रल जेल बरेली में दो साल की सजा़ काटनी पड़ी।

बरेली में हुए एक गोली-काण्ड में सजा काटने के बाद वे हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) से जुड़ गए। उनके रौबीले व्यक्तित्व और निशानेबाजी में महारत को देखते हुए राम प्रसाद बिस्मिल ने उन्हें संगठन के साथियों को हथियार चलाना सिखाने की जिम्मेदारी सौंपी।

काकोरी कांड नहीं था असल फाँसी की वजह

1922 में गया कॉन्ग्रेस अधिवेशन के दौरान कॉन्ग्रेस के भीतर विचारों का मतभेद सामने आया। इसके बाद मोतीलाल नेहरू और चितरंजन दास ने मिलकर स्वराज पार्टी बना ली।

उस समय कॉन्ग्रेस के इन नेताओं के पास आर्थिक संसाधनों की कमी नहीं थी, लेकिन दूसरी ओर क्रांतिकारी संगठन के पास मजबूत विचारधारा, संविधान और जोशीले युवाओं की बड़ी टोली तो थी, पर सबसे बड़ी कमी पैसों की थी।

इसी आर्थिक संकट से निपटने के लिए क्रांतिकारियों ने आयरलैंड के स्वतंत्रता सेनानियों की रणनीति अपनाई। उन्होंने धन जुटाने के लिए डकैती करने का फैसला किया, जिसे संगठन की भाषा में ‘एक्शन’ कहा जाता था।

इस योजना के तहत पहला एक्शन 25 दिसंबर 1924 को पीलीभीत जिले की बिसलपुर तहसील के बमरौली गाँव में किया गया। निशाना बने बलदेव प्रसाद, जो शक्कर कारोबारी और सूद पर पैसे उधार देने का काम करते थे।

इस डकैती में क्रांतिकारियों को करीब ₹4,000 और कुछ सोने-चाँदी के जेवर मिले। हालांकि, इस दौरान मोहनलाल पहलवान नाम के व्यक्ति ने उनका विरोध किया। जवाब में ठाकुर रोशन सिंह ने गोली चलाई, जिससे मोहनलाल की मौके पर ही मौत हो गई। बाद में यही घटना ठाकुर रोशन सिंह को फाँसी की सजा मिलने की सबसे बड़ी वजह बनी।

काकोरी काण्ड में रोशन सिंह खुद मौजूद नहीं थे, फिर भी अंग्रेज सरकार ने संगठन में उनकी भूमिका और प्रभाव को देखते हुए उन्हें बिस्मिल, अशफाक उल्ला खाँ और राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी के साथ फाँसी की सजा दी।

रोशन सिंह ने फाँसी से पहले लिखा भावुक पत्र

6 दिसंबर 1927 को इलाहाबाद की मलाका (नैनी) जेल की काल-कोठरी से ठाकुर रोशन सिंह ने अपने एक मित्र को पत्र लिखा। उन्होंने लिखा कि उन्हें उम्मीद है कि इसी सप्ताह फाँसी हो जाएगी और उनके लिए कोई दुःख न करे।

उनका मानना था कि जन्म लेने वाले हर व्यक्ति को एक दिन मरना ही है, इसलिए इंसान को ऐसा जीवन जीना चाहिए कि अंत समय में उसे कोई पछतावा न हो और भगवान का स्मरण बना रहे।

उन्होंने यह भी लिखा कि पिछले दो वर्षों से परिवार से दूर रहने के दौरान उन्हें ईश्वर की भक्ति करने का भरपूर अवसर मिला। उन्होंने अपने पत्र में धर्म के लिए प्राण देने वालों की तुलना तपस्या करने वाले ऋषि-मुनियों से करते हुए लिखा कि शास्त्रों में ऐसे बलिदान को सर्वोच्च माना गया है। पत्र के अंत में उन्होंने अपना प्रसिद्ध शेर लिखा:

‘ज़िंदगी ज़िंदा-दिली को जान ऐ रोशन!

वरना कितने ही यहां रोज़ फ़ना होते हैं।‘

जब क्रांतिकारियों की चीखों से गूँजती थी जेल

साउथ मलाका जेल कोई साधारण जेल नहीं थी। काकोरी काण्ड से जुड़े कई क्रांतिकारियों को यहीं रखा गया था, यहीं पूछताछ के नाम पर उनका उत्पीड़न किया जाता था। अंग्रेज हुकूमत के लिए यह जेल क्रांतिकारियों को ‘सबक सिखाने’ का एक हथियार भर थी।

आजादी के बाद जैसे-जैसे प्रशासनिक जरूरतें बदलती गईं, इस जेल को नैनी शिफ्ट कर दिया गया। इसके बाद साउथ मलाका जेल की जगह बरसों तक वीरान पड़ी रही। वह जमीन, जिसने एक क्रांतिकारी की आखिरी साँसें देखी थीं, धीरे-धीरे इतिहास के पन्नों से मिटती चली गई।

कॉन्ग्रेस सरकार ने बनाया अस्पताल, नाम रखा गया नेहरू की माँ के नाम पर

आज़ादी के बाद, प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के और कॉन्ग्रेस सरकार के दौर में, 1961 में इसी साउथ मलाका जेल परिसर की जमीन पर मोतीलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज खड़ा किया गया। इसका उद्घाटन तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के हाथों हुआ।

सवाल यह उठता है कि जिस ज़मीन पर एक क्रांतिकारी को फाँसी दी गई हो, उसका नाम आखिर किसके नाम पर रखा जाए? जवाब मिला नेहरू परिवार से जुड़े नाम में।

1963 में जब मेडिकल कॉलेज पूर्व गवर्नर हाउस की इमारत में शिफ्ट हुआ, तो यही जेल परिसर पूरी तरह अस्पताल में बदल दिया गया और इसका नाम रखा गया ‘स्वरूप रानी नेहरू चिकित्सालय’।

नाम सोचते वक्त रोशन सिंह और उनकी शहादत का जिक्र तक नहीं हुआ, जिस मिट्टी पर उनका खून बहा था, वहाँ उनका नाम दर्ज करने की जरूरत तक महसूस नहीं की गई। इसके बाद पूरे छह दशक तक हालात वैसे ही बने रहे- न कोई स्मारक, न कोई पहचान, बस एक ‘नेहरू’ नाम जो पूरे किस्से पर भारी पड़ता रहा। 2024 में योगी सरकार ने आकर तस्वीर बदली।

योगी सरकार में मिली पहली पहचान

2024 में योगी आदित्यनाथ सरकार ने उसी अस्पताल परिसर के मुख्य द्वार के पास जहाँ रोशन सिंह को फाँसी दी गई थी, उनकी प्रतिमा स्थापित करवाई। यह फैसला ऐसे समय आया जब देश ‘आज़ादी का अमृत महोत्सव’ मना रहा था और सरकार गुमनाम और उपेक्षित स्वतंत्रता सेनानियों को सामने लाने की मुहिम चला रही थी।

2026 में काकोरी ट्रेन एक्शन (9 अगस्त 1925) की शताब्दी वर्षगाँठ भी है, जिसे देखते हुए काकोरी से जुड़े शहीदों को सम्मान देने पर जोर बढ़ गया था। दशकों बाद पहली बार सरकारी स्तर पर उस बलिदान को औपचारिक पहचान मिली, जिसे कॉन्ग्रेस के शासनकाल में जानबूझकर भुला दिया गया था।

अब उठी अस्पताल का नाम बदलने की माँग, आखिर क्यों?

स्मारक बनने के बाद अब यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि जब पूरा परिसर ही रोशन सिंह की शहादत की धरती है, तो अस्पताल का नाम आज भी नेहरू परिवार के नाम पर क्यों टिका हुआ है?

इस माँग को उठाने वालों में सबसे मुखर आवाज़ हैं बस्ती के महुआ डाबर क्षेत्र के शाह आलम खान, जो 1857 की क्रांति के उस दौर से जुड़े परिवार से आते हैं, जब 10 जून 1857 को मनोरमा नदी पार कर रहे अंग्रेज अफसरों पर महुआ डाबर, अमिलहा, मुहम्मदपुर और नकहा गाँवों के वीरों ने धावा बोल दिया था।

इस हमले के प्रमुख नायकों में क्रांतिवीर पिरई खान भी शामिल थे, जिन्होंने अपने साथियों गुलाब खाँ, अमीर खाँ, वज़ीर खाँ, जफर अली के साथ मिलकर अंग्रेज अफसरों को घेरकर मार गिराया था।

इस हमले से बौखलाई अंग्रेज हुकूमत ने बदला लेने में कोई कसर नहीं छोड़ी और 20 जून 1857 को बस्ती में मार्शल लॉ लगा दिया गया। 3 जुलाई को महुआ डाबर गाँव को चारों ओर से घेरकर जला दिया गया, गाँव को ‘गैरचिरागी’ घोषित कर संपत्ति जब्त कर ली गई।

कई लोगों के सिर कलम किए गए और 18 फरवरी 1858 को गाँव के कई क्रांतिकारियों को सरेआम फाँसी पर लटका दिया गया। शाह आलम खान उसी बलिदानी विरासत के वशंज है। पिछले करीब ढाई दशकों से वे 1857 और काकोरी जैसे आंदोलनों से जुड़े गुमनाम क्रांतिकारियों का इतिहास खोजने, दस्तावेज़ जुटाने और नई पीढ़ी तक पहुँचाने के काम में लगे हैं।

इसी मकसद से उन्होंने महुआ डाबर संग्रहालय की स्थापना की, जहाँ स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े दुर्लभ दस्तावेज़ों और तस्वीरों को सहेजा गया है। वे समय-समय पर चौरी चौरा विद्रोह और काकोरी ट्रेन एक्शन जैसी ऐतिहासिक घटनाओं पर प्रदर्शनियाँ भी आयोजित करते रहे हैं, और लगातार यह माँग उठाते रहे हैं कि क्रांतिकारियों के परिवारों को उनका हक और सम्मान मिले।

अब उन्हीं की अगुवाई में महुआ डाबर संग्रहालय परिवार के बैनर तले एसआरएन अस्पताल परिसर में अनिश्चितकालीन धरना शुरू किया गया है, जिसकी माँग है कि अस्पताल का नाम बदलकर ‘अमर शहीद ठाकुर रोशन सिंह चिकित्सालय’ रखा जाए। उनका तर्क सीधा-सा है- जिस ज़मीन ने एक क्रांतिकारी की शहादत देखी, उस ज़मीन पर आज भी उसका नाम गायब है, जबकि एक राजनीतिक परिवार का नाम पीढ़ियों से चस्पा है।

पुरानी सरकारों की चुप्पी पर सवाल

यहाँ सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि जब यह तथ्य किसी से छिपा नहीं था कि यह जगह काकोरी के शहीद की फाँसी-स्थली है, तो दशकों तक सत्ता में रही कॉन्ग्रेस समेत बाद की सरकारों ने कभी इस दिशा में कदम क्यों नहीं उठाया?

क्या यह महज संयोग था, या फिर एक सोची-समझी कोशिश कि क्रांतिकारियों के बलिदान की जगह हर बार एक ही परिवार की विरासत को आगे बढ़ाया जाए? अब जब योगी सरकार ने स्मारक बनवाकर पहला कदम उठा दिया है, स्थानीय स्तर पर यह माँग जोर पकड़ रही है कि सम्मान अधूरा न रह जाए और अस्पताल का नाम भी बदला जाए।

एक पर हमला तो तीनों देंगे जवाब, पाकिस्तान-सऊदी और तुर्किये का नया रक्षा गठबंधन: जानिए ‘मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट’ के बारे में सब कुछ

मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध और बढ़ते सुरक्षा संकट के बीच पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये ने एक महत्वपूर्ण रक्षा समझौते ‘मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट’ पर हस्ताक्षर किए हैं। इस समझौते के तहत यदि तीनों देशों में से किसी एक पर हमला होता है, तो उसे तीनों देशों पर हमला माना जाएगा।

इसका उद्देश्य सामूहिक सुरक्षा को मजबूत करना, रक्षा सहयोग बढ़ाना और क्षेत्रीय स्थिरता को बढ़ावा देना है। यह समझौता ऐसे समय हुआ है जब पश्चिम एशिया लगातार संघर्षों, मिसाइल हमलों और जियोपॉलिटिकल तनावों का सामना कर रहा है।

मक्का में हुई तीन देशों की अहम बैठक

यह समझौता सऊदी अरब के शहर मक्का में आयोजित बैठक के दौरान हुआ। बैठक में सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस और प्रधानमंत्री मोहम्मद बिन सलमान, तुर्किये के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोआन और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ शामिल हुए।

शहबाज शरीफ अपने तीन दिवसीय दौरे पर एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल के साथ सऊदी अरब पहुँचे थे, जिसमें पाकिस्तान के फौज प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर भी शामिल थे।

तीनों नेताओं ने क्षेत्रीय सुरक्षा, रक्षा सहयोग, आर्थिक संबंधों और भविष्य की रणनीतिक साझेदारी पर विस्तृत चर्चा की। इस दौरान मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर किए गए, जिसे तीनों देशों की सामूहिक सुरक्षा के लिए एक बड़ा कदम माना जा रहा है।

समझौते में क्या-क्या प्रावधान हैं?

पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के अनुसार, इस समझौते का मुख्य उद्देश्य किसी भी प्रकार की आक्रामक कार्रवाई के खिलाफ सामूहिक प्रतिरोध क्षमता को मजबूत करना है। सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान यह है कि यदि तीनों देशों में से किसी एक पर हमला होता है, तो उसे तीनों देशों पर हमला माना जाएगा।

समझौते में रक्षा सहयोग के सभी क्षेत्रों को मजबूत करने की बात कही गई है। इनमें संभावित रूप से संयुक्त सैन्य अभ्यास, सैनिकों का प्रशिक्षण, रक्षा तकनीक का आदान-प्रदान और खुफिया जानकारी साझा करना शामिल हो सकता है। हालाँकि इन सभी व्यवस्थाओं का विस्तृत खाका अभी सार्वजनिक नहीं किया गया है।

आधिकारिक बयान के अनुसार, इस समझौते का उद्देश्य क्षेत्र में शांति, सुरक्षा और स्थिरता को बढ़ावा देना है और इसे किसी विशेष देश के खिलाफ गठबंधन के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया है।

यह समझौता अभी क्यों महत्वपूर्ण माना जा रहा है?

पिछले कुछ सालों में मिडिल ईस्ट लगातार संघर्षों से जूझ रहा है। ईरान, इजरायल, गाजा, लेबनान और यमन से जुड़े घटनाक्रमों ने पूरे क्षेत्र की सुरक्षा व्यवस्था को प्रभावित किया है।

सऊदी अरब के तेल प्रतिष्ठानों और महत्वपूर्ण बुनियादी ढाँचे पर ड्रोन तथा मिसाइल हमलों की घटनाएँ भी सामने आती रही हैं। ऐसे माहौल में रियाद अपनी सुरक्षा साझेदारियों को केवल पारंपरिक सहयोगियों तक सीमित नहीं रखना चाहता और नए रक्षा सहयोग विकसित कर रहा है।

क्षेत्रीय संघर्षों के कारण होर्मुज और समुद्री व्यापार भी प्रभावित हुआ है, जिससे ऊर्जा आपूर्ति और वैश्विक बाजारों पर असर पड़ा है। ऐसे समय में तीनों देशों का यह रक्षा समझौता क्षेत्रीय सुरक्षा ढाँचे में एक महत्वपूर्ण बदलाव के रूप में देखा जा रहा है।

तीनों देशों की ताकत क्या है?

इस नए रक्षा सहयोग की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें शामिल तीनों देशों की अपनी अलग-अलग रणनीतिक क्षमता है। सऊदी अरब दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादक देशों में शामिल है और आर्थिक रूप से बेहद मजबूत माना जाता है। साथ ही इस्लाम के दो सबसे पवित्र स्थलों की मौजूदगी के कारण उसका मजहबी और क्षेत्रीय प्रभाव भी काफी व्यापक है।

तुर्किये नाटो का सदस्य है और उसके पास नाटो की दूसरी सबसे बड़ी सेना है। हाल के वर्षों में उसने रक्षा उत्पादन, ड्रोन तकनीक और सैन्य उद्योग के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है।

वहीं पाकिस्तान दुनिया का एकमात्र परमाणु हथियार संपन्न मुस्लिम देश है और लंबे समय से सैन्य दृष्टि से महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है। हालाँकि विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान की परमाणु क्षमता इस समझौते का औपचारिक हिस्सा नहीं है और उसका परमाणु प्रतिरोध मुख्य रूप से भारत-केंद्रित बना रहेगा।

पुराने रक्षा सहयोग का विस्तार

यह समझौता पूरी तरह नया नहीं है, बल्कि पिछले वर्ष पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच हुए द्विपक्षीय रक्षा समझौते का विस्तार माना जा रहा है। उस समझौते में भी दोनों देशों ने कहा था कि किसी एक पर हमला दोनों पर हमला माना जाएगा। अब तुर्किये को इसमें शामिल कर त्रिपक्षीय सुरक्षा व्यवस्था बनाई गई है।

तीनों देशों के बीच पहले से भी सैन्य सहयोग मौजूद रहा है। पाकिस्तान दशकों से सऊदी सेना को प्रशिक्षण और तकनीकी सहायता देता रहा है। वहीं तुर्किये और पाकिस्तान रक्षा उपकरणों, युद्धपोतों और प्रशिक्षण विमानों के क्षेत्र में सहयोग करते रहे हैं। 2023 में सऊदी अरब ने तुर्किये से बड़े पैमाने पर ड्रोन खरीदने का समझौता भी किया था।

भारत समेत दुनिया की नजर

इस समझौते पर भारत भी करीबी नजर बनाए हुए है। भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि भारत इस घटनाक्रम पर नजर रख रहा है और आगे की जानकारी साझा की जाएगी।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह त्रिपक्षीय सहयोग आगे संस्थागत रूप लेता है और संयुक्त सैन्य गतिविधियाँ बढ़ती हैं, तो यह पश्चिम एशिया और दक्षिण एशिया की सुरक्षा राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

फिलहाल यह समझौता सामूहिक सुरक्षा और रक्षा सहयोग तक सीमित बताया गया है तथा इसे किसी विशेष देश के खिलाफ सैन्य गठबंधन के रूप में घोषित नहीं किया गया है।

कॉकरोच जनता पार्टी की नई राष्ट्रीय कार्यकारिणी में AAP के पुराने चेहरों को मिली जगह: जानिए CJP की टीम में कौन-कौन नेता हैं शामिल

‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) ने अपनी राष्ट्रीय कार्यकारिणी का ऐलान कर दिया है। महाराष्ट्र में संस्थापक अभिजीत दीपके के घर पर हुई बैठक के बाद 6 अगस्त 2026 को इसकी घोषणा हुई। पार्टी अब देश भर में अपने संगठन का विस्तार करेगी। इसके लिए ‘क्या बोलती पब्लिक‘ नाम से एक नया अभियान भी शुरू किया जाएगा।

यह पार्टी युवाओं की एक ऐसी आवाज बनने का दावा कर रही है जो सरकार पर दबाव बनाएगी। लेकिन हैरानी की बात यह है कि इसे आगे बढ़ाने वाले ज्यादातर लोग आम आदमी पार्टी (AAP) के पुराने नेता ही हैं।

इस पार्टी की शुरुआत सोशल मीडिया पर एक तंज के रूप में हुई थी। मई 2026 के बीच में देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने कोर्ट में एक टिप्पणी की थी। उन्होंने कहा था कि जिन युवाओं को नौकरी नहीं मिलती, वे ‘कॉकरोच‘ की तरह आरटीआई, सोशल मीडिया और पत्रकारिता में आ जाते हैं और समाज के ‘परजीवी’ बन जाते हैं।

इसी बयान के विरोध में दिल्ली के जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी नाम से एक बड़ा प्रदर्शन हुआ, जिससे यह संगठन चर्चा में आ गया। इसके बाद पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने भी नीट पेपर लीक और शिक्षा सुधारों की मांग को लेकर 26 दिन की भूख हड़ताल शुरू कर दी, जिससे यह आंदोलन और बड़ा हो गया।

ऑपइंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, इस पार्टी ने छात्रों के असली मुद्दों का सहारा जरूर लिया। लेकिन इसका असली मकसद ‘लॉटिविज्म’ यानी हँसी-मजाक के जरिए सिर्फ बीजेपी और मोदी सरकार के खिलाफ राजनीतिक विरोध तैयार करना है।

CJP का कहना है कि आने वाले छह महीनों में वह राज्यों और शहरों में अपनी कमेटियाँ बनाएगी। लेकिन जिस तरह से यह प्रेशर ग्रुप आगे बढ़ रहा है, उससे साफ पता चलता है कि यह भविष्य में एक नई राजनीतिक पार्टी बनने की तैयारी कर रहा है, जिसका एकमात्र एजेंडा बीजेपी का विरोध करना है।

कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) अब पूरी तरह से बीजेपी के विरोध की राजनीति पर उतर आई है। इस बात को विस्तार से समझने से पहले यह जानना जरूरी है कि इस पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी (NWC) में कौन-कौन लोग शामिल हैं।

पार्टी की नई टीम में कई अहम नाम सामने आए हैं। संस्थापक अभिजीत दीपके (30 वर्ष) को पार्टी का राष्ट्रीय संयोजक बनाया गया है। आशुतोष रांका (30 वर्ष) और सौरव दास (27 वर्ष) को सह-संयोजक की जिम्मेदारी दी गई है।

संगठन को संभालने के लिए भी कई लोगों को पद दिए गए हैं। अजिंक्य शिंडे (35 वर्ष) राष्ट्रीय संगठन प्रभारी बनाए गए हैं, जबकि दीपक बालियान (26 वर्ष) संगठन सह-प्रभारी हैं। आफ़रीन नवाज (34 वर्ष) राष्ट्रीय सचिव, विजय रेड्डी मल्लंगी (30 वर्ष) मीडिया प्रमुख और रत्ना सिंह (31 वर्ष) कानूनी मामलों की जिम्मेदारी संभालेंगी। इसके अलावा शोध और नीति का काम वैष्णवी गौर (29 वर्ष) देखेंगी। रोहन देशपांडे (31 वर्ष) टेक्नोलॉजी और योगेश इंगले (33 वर्ष) वित्त विभाग संभालेंगे।

पार्टी ने देश के अलग-अलग हिस्सों के लिए जोनल प्रमुख भी नियुक्त किए हैं। इनमें उत्तर भारत के लिए दीपक बालियान, दक्षिण के लिए विजय रेड्डी मल्लंगी, पूर्व और पूर्वोत्तर के लिए अंकित भारद्वाज तथा पश्चिम भारत के लिए योगेश इंगले को जिम्मेदारी सौंपी गई है।

CJP यानी ‘AAP’ की नई टीम: कैसे आम आदमी पार्टी का चेहरा बन गई है कॉकरोच जनता पार्टी

जब से ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ यानी CJP बनी है, तब से यह बात सामने आ रही है कि यह आम आदमी पार्टी (AAP) का ही नया रूप है। CJP के राष्ट्रीय संयोजक और संस्थापक अभिजीत दीपके साल 2020 से 2023 के बीच ‘आप’ के सोशल मीडिया कोऑर्डिनेटर रह चुके हैं। इसके बाद साल 2023 में वे अमेरिका चले गए थे और बोस्टन यूनिवर्सिटी से पब्लिक रिलेशंस में एमएस की डिग्री ली थी।

दिल्ली विधानसभा चुनाव 2020 के दौरान कई रिपोर्ट्स में उन्हें ‘आप’ की सोशल मीडिया और डिजिटल प्रचार टीम का हिस्सा बताया गया था। रिपोर्ट्स के मुताबिक, वे मीम्स, छोटे वीडियो और डिजिटल कंटेंट बनाने वाले मुख्य लोगों में शामिल थे। उनका काम अरविंद केजरीवाल का प्रचार करना और राजनीतिक विरोधियों को जवाब देना था।

अभिजीत दीपके ‘आप’ के चुनाव वॉर-रूम और सोशल मीडिया अभियानों का भी हिस्सा रहे हैं। मीडिया इंटरव्यू में वे युवाओं और पहली बार वोट देने वालों के लिए बनाई जाने वाली चुनावी रणनीतियों पर चर्चा करते नजर आए थे। उन्होंने चुनाव प्रचार के दौरान ‘आप’ की आईटी और मीडिया टीमों के साथ मिलकर काम किया था।

अभिजीत दीपके को ‘आप’ नेता और दिल्ली के पूर्व डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया का करीबी भी माना जाता है। दीपके ‘आप’ के वॉर-रूम का हिस्सा रहे हैं और उनका रुख हमेशा से बीजेपी के खिलाफ रहा है। हमने देखा है कि कैसे आम आदमी पार्टी ने CJP के प्रदर्शनों का खुलकर समर्थन किया था। खुद ‘आप’ प्रमुख अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया जंतर-मंतर पहुँचे थे और इन ‘कॉकरोच’ प्रदर्शनकारियों के साथ एकजुटता दिखाई थी।

दूसरी ओर, CJP के सह-संयोजक आशुतोष रांका ने आईआईटी कानपुर और लंदन स्कूल ऑफ इकॉनॉमिक्स से पढ़ाई की है। वे लंदन में मैकिन्से कंपनी में मैनेजमेंट कंसलटेंट के रूप में भी काम कर चुके हैं। पिछले साल भारत लौटने के बाद वे जयपुर में पर्यावरण, शिक्षा सुधार और युवाओं के मुद्दों से जुड़े अभियानों में सक्रिय रहे हैं। नीट विवाद के दौरान CJP से जुड़ने के बाद आशुतोष रांका को काफी प्रसिद्धि मिली थी।

आशुतोष रांका राजनीति के लिए कोई नया नाम नहीं हैं। उनका सबसे बड़ा राजनीतिक परिचय यह है कि वे पहले आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता रह चुके हैं। इस दौरान उन्होंने शराब नीति घोटाले के आरोपों पर अरविंद केजरीवाल और पार्टी का कड़ाई से बचाव किया था और इन आरोपों को राजनीति से प्रेरित बताया था। रांका साल 2025 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में भी ‘आप’ के साथ सक्रिय रूप से जुड़े हुए थे।

आशुतोष रांका इससे पहले ‘दप्रिंट’ और ‘न्यूजलॉन्ड्री’ जैसे मीडिया पोर्टल्स के लिए लेख भी लिख चुके हैं।

CJP द्वारा राष्ट्रीय संगठन प्रभारी बनाए गए अजिंक्य शिंडे भी ‘आप’ के ही एक पदाधिकारी हैं। उन्होंने पूर्णकालिक ‘आप’ सदस्य बनने के लिए अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दिया था। शिंडे ‘आप’ की महाराष्ट्र युवा विंग के प्रदेश अध्यक्ष और राज्य समिति के सदस्य रह चुके हैं।

मई 2025 के आसपास यह जानकारी सामने आई थी कि अजिंक्य शिंडे ने CJP में संगठन की जिम्मेदारी संभालने से पहले ‘आप’ के गोवा सह-प्रभारी के रूप में भी काम किया था। हकीकत तो यह है कि कई रिपोर्ट्स यह इशारा करती हैं कि शिंडे अभी भी ‘आप’ की महाराष्ट्र युवा विंग के संयोजक के रूप में अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं।

CJP ने मीडिया प्रमुख और दक्षिण क्षेत्र की जिम्मेदारी विजय रेड्डी मल्लंगी को सौंपी है। इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है कि वे तेलंगाना में आम आदमी पार्टी के एक सक्रिय सदस्य हैं।

सोशल मीडिया पर उनके कई ऐसे वीडियो और फोटो मौजूद हैं, जो यह दिखाते हैं कि उन्होंने पिछले साल ‘आप’ के लिए चंदा जुटाने, नेताओं का समर्थन करने और चुनावी अभियानों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था।

CJP के वित्त प्रमुख योगेश इंगले भी महाराष्ट्र के पुणे में आम आदमी पार्टी के एक पदाधिकारी बताए जाते हैं।

इसके अलावा, CJP के पूर्व और उत्तर क्षेत्र के प्रभारी अंकित भारद्वाज भी पहले आम आदमी पार्टी के लिए एक स्वयंसेवक (वॉलंटियर) के रूप में काम कर चुके हैं।

इन सारी बातों से यह बिल्कुल साफ हो जाता है कि CJP ने अपनी राष्ट्रीय कार्यकारिणी में ज्यादातर मौजूदा या पुराने ‘आप’ नेताओं को ही जगह दी है। इस तरह से इस पार्टी ने अप्रत्यक्ष रूप से खुद को आम आदमी पार्टी की ‘युवा विंग’ के रूप में ही स्थापित कर लिया है।

‘कॉकरोच जनता पार्टी’ की हकीकत: युवाओं की आड़ में आम आदमी पार्टी का नया राजनीतिक चेहरा

भले ही CJP यह दावा करती रही है कि उसके सदस्यों का पुराना राजनीतिक इतिहास कोई मायने नहीं रखता और उनका संगठन पूरी तरह से ‘स्वतंत्र’ है। लेकिन सच्चाई यह है कि जिन लोगों को संगठन में पद दिए गए हैं, उनका पुराना नाता किसी खास पार्टी और उसकी विचारधारा से रहा है। इससे साफ पता चलता है कि CJP कोई नया संगठन नहीं है, बल्कि यह आम आदमी पार्टी का ही एक बढ़ा हुआ रूप है।

ऑपइंडिया ने पहले भी यह विश्लेषण किया था कि CJP हँसी-मज़ाक और कॉमेडी के परदे के पीछे किस तरह से सोची-समझी रणनीति के तहत विपक्ष के एजेंडे को आगे बढ़ाती है। यह संगठन न्यायपालिका, चुनाव आयोग, बड़े उद्योगपतियों, मीडिया और पार्टी बदलने वाले नेताओं को निशाना बनाता है। यह संगठन व्यंग्य और कॉमेडी की आड़ में राजनीतिक संदेश देने का काम करता है। यह बात बिल्कुल साफ हो चुकी है कि CJP आधुनिक और ‘कूल’ दिखने वाला सिर्फ एक ऐसा प्रयोग है जिसका एकमात्र मकसद बीजेपी का विरोध करना है।

इन ‘कॉकरोच’ कहे जाने वाले लोगों ने मई महीने में ही अपनी राजनीतिक सोच और मोदी विरोध को पूरी तरह साफ कर दिया था। जब उन्होंने इंस्टाग्राम पर बीजेपी के साथ खुद की फॉलोअर्स बढ़ाने की होड़ शुरू की थी, तभी उनकी मंशा समझ आ गई थी। जब जंतर-मंतर पर प्रदर्शन हुआ, तो CJP ने हर उस शख्स का स्वागत किया जो बीजेपी का विरोधी है। इनमें महुआ मोइत्रा, चंद्रशेखर आजाद, कीर्ति आजाद जैसे नेता शामिल थे। इसके अलावा योगेंद्र यादव जैसे इस्लामो-वामपंथी भी इसमें शामिल हुए, जिन्होंने जंतर-मंतर और संसद की तरफ जाने वाले रास्तों पर CJP के कब्जा करने पर अपनी खुशी जाहिर की थी।

इसी मंच से कुणाल कामरा ने माँ सीता पर अपमानजनक टिप्पणियाँ की थीं। दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रोफेसर नंदिता नारायण ने ‘बस नाम रहेगा अल्लाह का’ गाना गाया और पाकिस्तानी शायर फैज अहमद फैज की इस्लामी वर्चस्ववादी कविता ‘हम देखेंगे’ का गुणगान किया। इसके अलावा AISA, SFI और अन्य वामपंथी छात्र संगठनों ने ‘आजादी-आजादी’ और ‘ब्राह्मणवाद से आजादी’ जैसे देशविरोधी नारे भी लगाए।

CJP को प्रकाश राज, स्वरा भास्कर, शबाना आजमी, अरुंधति रॉय और निवेदिता मेनन जैसे जाने-माने हिंदू विरोधी और बीजेपी विरोधी ‘एक्टिविस्टों’ का भी पूरा समर्थन मिला।

असल बात तो यह है कि 20 जुलाई को हुए हिंसक CJP प्रदर्शन के दौरान समाजवादी पार्टी, आजाद समाज पार्टी और दूसरे बीजेपी विरोधी दलों के कार्यकर्ता भी इस तथाकथित ‘छात्र आंदोलन’ में खुलकर शामिल हुए थे। इस प्रदर्शन में MACOCA के आरोपित और ‘आप’ से जुड़े गैंगस्टर हाजी अफजल ने भी हिस्सा लिया था।

CJP के बड़े नेता यह दावा करते रहे हैं कि जुलाई के प्रदर्शन के दौरान हर राजनीतिक विचारधारा के लोगों ने उनका समर्थन किया था। लेकिन इन सब बातों के बाद, जब CJP ने अपने सबसे बड़े पदों पर आम आदमी पार्टी के पुराने पदाधिकारियों को ही बिठा दिया है, तो इस बात पर पक्की मुहर लग जाती है कि जिसकी आशंका पहले से जताई जा रही थी, वही सच है। यानी CJP और कुछ नहीं, बल्कि आम आदमी पार्टी की ही ‘बी-टीम’ है।

‘मदरसा वेतन विधेयक’ को योगी सरकार ने लिया वापस, मुस्लिम तुष्टीकरण के लिए अखिलेश 2016 में लाए थे बिल: जानिए क्या थे इसके प्रावधान और कानूनी अड़चनें

उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने साल 2016 के समाजवादी पार्टी सरकार के एक विवादित ‘मदरसा वेतन विधेयक’ को पूरी तरह खारिज कर दिया है। अखिलेश यादव की सरकार ने तब मदरसों के वेतन से जुड़ा यह बिल पास कराया था। लेकिन राज्यपाल और राष्ट्रपति की आपत्तियों के कारण यह बिल कभी कानून नहीं बन पाया था।

मदरसा वेतन विधेयक‘ इसलिए विवादों में था क्योंकि इसमें नियम बनाया गया था कि वेतन मिलने में देरी होने पर अधिकारियों पर सीधे आपराधिक केस दर्ज होगा। साथ ही, मदरसा कर्मचारियों को सामान्य कानूनी जाँच से विशेष छूट दी जा रही थी। राज्यपाल राम नाईक ने इसे संविधान के समानता के अधिकार के खिलाफ माना था।

योगी सरकार का मानना है कि जो बिल संविधान की कसौटी पर खरा नहीं उतरा, उसे फाइल में लटकाकर रखने का कोई मतलब नहीं है। करीब दस साल तक ठंडे बस्ते में रहने के बाद इस ‘मदरसा वेतन विधेयक’ को विधानसभा और विधान परिषद से वापस ले लिया गया है। इस प्रकार योगी सरकार ने तुष्टीकरण से जुड़े इस पुराने और विवादित अध्याय को हमेशा के लिए बंद कर दिया है।

क्या था 2016 का मदरसा वेतन विधेयक?

साल 2016 में जब उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार थी, तब अखिलेश यादव सरकार ने मदरसों के स्टाफ के लिए एक नया ‘मदरसा वेतन विधेयक’ पास कराया था। इस बिल का मकसद सिर्फ एक खास वर्ग (मुस्लिमों) को खुश करना और उसका तुष्टीकरण करना था। सरकार का दावा था कि इससे मदरसों के शिक्षकों को समय पर सैलरी मिलेगी।

लेकिन इस बिल के जरिए सपा सरकार ने नियमों को ताक पर रख दिया था। इस बिल में ऐसे नियम बनाए गए थे जो बाकी सभी नागरिकों और सरकारी कर्मचारियों के लिए लागू होने वाले कानूनों से बिल्कुल अलग थे। इससे साफ पता चलता है कि सरकार हर बार की तरह सिर्फ वोट बैंक की राजनीति कर रही थी।

जैसे ही यह ‘मदरसा वेतन विधेयक’ सदन में आया, इस पर बड़ा विवाद खड़ा हो गया। जानकारों और विरोधियों ने कहा कि यह बिल संविधान के समानता के अधिकार के खिलाफ है। एक खास समुदाय को फायदा पहुँचाने के लिए बनाई गई ऐसी नीतियों से देश का सामान्य कानून कमजोर होता है।

किन प्रावधानों पर सबसे ज्यादा विवाद हुआ?

‘मदरसा वेतन विधेयक’ में मदरसा शिक्षकों की सैलरी को लेकर एक बेहद अजीब और एकतरफा नियम बनाया गया था। नियम यह था कि अगर मदरसे के कर्मचारियों को समय पर सैलरी नहीं मिली, तो सरकारी अधिकारियों पर सीधे आपराधिक केस दर्ज कर दिया जाएगा। उस समय समाजवादी पार्टी सरकार का पूरा जोर बस एक खास वर्ग को खुश करने और उनके वोट बैंक को साधे रखने पर था।

इस बिल का दूसरा बड़ा विवादित हिस्सा यह था कि इसने मदरसा स्टाफ को आम कानून और पुलिस कार्रवाई से पूरी तरह सुरक्षित कर दिया था। आम सरकारी कर्मचारियों और मदरसों के स्टाफ के लिए कानून के अलग-अलग पैमाने तय कर दिए गए थे। यह साफ-साफ एक वर्ग विशेष को फायदा पहुँचाने और बाकी जनता के अधिकारों की अनदेखी करने का खेल था। सपा सरकार की नीतियाँ हमेशा से तुष्टीकरण के इर्द-गिर्द ही घूमती रही हैं।

इसी वजह से कानून के जानकारों और विरोधियों ने इस पर तीखा सवाल उठाया था। उन्होंने पूछा था कि क्या देश का संविधान सिर्फ एक खास समुदाय (मुस्लिमों) के लिए अलग से कानून बनाने की इजाजत देता है। क्या समानता के अधिकार को ताक पर रखकर सिर्फ एक वर्ग को विशेष सुरक्षा देना सही है। यही वो कानूनी और राजनीतिक पेंच था जिसके चलते यह ‘मदरसा वेतन विधेयक’ कभी कानून नहीं बन पाया और आखिरकार योगी सरकार ने इसे पूरी तरह दफन कर दिया।

राज्यपाल ने मंजूरी क्यों नहीं दी?

जब यह विवादित ‘मदरसा वेतन विधेयक’ विधानसभा और विधान परिषद दोनों जगहों से पास हो गया, तब इसे मंजूरी के लिए तत्कालीन राज्यपाल राम नाईक के पास भेजा गया। नियम के मुताबिक राज्यपाल ऐसे बिलों को पास कर देते हैं और वह कानून बन जाता है। लेकिन इस मामले में ऐसा नहीं हुआ। राज्यपाल ने तुरंत इस पर साइन करने से इनकार कर दिया। राज्यपाल ने साफ देखा कि यह बिल संविधान के नियमों और समानता के अधिकार के खिलाफ है।

राज्यपाल को इस बात पर पूरा शक था कि सपा सरकार सिर्फ एक समुदाय को खुश करने और अपना वोट बैंक बचाने के लिए यह नियम लाई है। इसलिए उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 200 का इस्तेमाल किया। राज्यपाल ने इस तुष्टीकरण वाले बिल को अपनी मंजूरी देने की बजाय राष्ट्रपति के पास भेज दिया। नियम यह है कि जब तक राष्ट्रपति ऐसे किसी विवादित बिल पर अपनी मुहर नहीं लगाते, वह कानून नहीं बन सकता।

राष्ट्रपति भवन में जाँच के दौरान भी यह साफ हो गया कि यह बिल पूरी तरह गलत है। यही वजह रही कि दोनों सदनों से पास होने के बावजूद यह बिल कभी कानून नहीं बन पाया। समाजवादी पार्टी की मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति की यह चाल शुरू में ही धरी रह गई।

अनुच्छेद 200 में क्या व्यवस्था है?

जब ‘मदरसा वेतन विधेयक’ राज्यपाल के पास पहुँचा, तो संविधान ने उन्हें पूरी ताकत दी थी कि वे इसकी जाँच करें। संविधान का अनुच्छेद 200 राज्यपाल को यह अधिकार देता है कि अगर कोई बिल देश के संविधान या कानून के खिलाफ हो, तो वे उसे रोक सकते हैं। राज्यपाल राम नाईक ने तुरंत भांप लिया कि यह बिल देश के मूल सिद्धांतों के साथ खिलवाड़ कर रहा है। इसलिए उन्होंने बिल पर साइन करने से साफ मना कर दिया और इसे राष्ट्रपति के पास भेज दिया।

इस पूरे विवाद की सबसे बड़ी जड़ संविधान का अनुच्छेद 14 बना। यह अनुच्छेद देश के हर नागरिक को कानून के सामने एक समान मानने की गारंटी देता है। लेकिन सपा सरकार का यह बिल ठीक इसके उलट था। इसमें एक खास समुदाय और मदरसा कर्मचारियों के लिए अलग और विशेष नियम बनाए गए थे। आलोचकों और जानकारों ने सवाल उठाया कि क्या देश का कानून सिर्फ एक वर्ग को बचाने के लिए बन सकता है। क्या समानता के अधिकार को कुचलकर सिर्फ वोट बैंक की राजनीति करना सही है।

चूंकि यह बिल अपनी शुरुआत से ही कानूनी पेंच में फँस गया था और कभी कानून नहीं बन पाया, इसलिए अदालत को इस पर फैसला देने की जरूरत ही नहीं पड़ी। सपा सरकार की मुस्लिम तुष्टीकरण वाली यह नीति कागज पर ही दम तोड़ गई। दस साल तक यह बिल फाइलों में धूल फाँकता रहा और आखिरकार योगी सरकार ने इसे पूरी तरह दफन कर दिया।

राज्यपाल के पास जाने के बाद यह बिल राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए रुक गया था। राष्ट्रपति भवन से इस बिल पर कोई हरी झंडी नहीं मिली। केंद्र सरकार के स्तर पर भी इसकी जाँच की गई थी। जाँच में सामने आया कि इस बिल में कई कानूनी कमियाँ और पेंच हैं। इसी वजह से यह बिल आगे नहीं बढ़ पाया। दस साल बीतने के बाद भी यह कभी कानून नहीं बन सका।

योगी सरकार ने इसे वापस क्यों लिया?

योगी आदित्यनाथ की सरकार का साफ कहना है कि जो बिल दस साल तक पास न हो सके, उसे ढोने का कोई मतलब नहीं है। जिस बिल को संवैधानिक मंजूरी ही न मिली हो, उसे रिकॉर्ड में रखने का क्या फायदा। इसी सोच के साथ योगी कैबिनेट ने ‘मदरसा वेतन विधेयक’ वापस लेने का बड़ा फैसला किया।

इसके बाद इस बिल को विधानसभा और विधान परिषद दोनों जगहों से आधिकारिक तौर पर वापस ले लिया गया। सरकार के इस कदम से इस पूरे मामले की विधायी प्रक्रिया हमेशा के लिए खत्म हो गई है। अब यह साफ हो गया है कि यह विवादित बिल भविष्य में कभी भी कानून नहीं बन पाएगा।

योगी सरकार का कहना है कि कानून बनाते समय संविधान के समानता सिद्धांत और प्रशासनिक संतुलन का ध्यान रखना जरूरी होता है। किसी खास वर्ग (मुस्लिमों) के हितों की रक्षा करना सरकार की जिम्मेदारी है। लेकिन ऐसी व्यवस्था भी नहीं बनाई जा सकती जो दूसरे वर्गों से अलग कानूनी ढांचा तैयार करे। सरकार का दावा है कि इसी वजह से पुराने विधेयक को समाप्त करना आवश्यक था।

PM मोदी की ‘लोकल’ अपील से वैश्विक बाजार तक: राष्ट्रीय हथकरघा दिवस पर जानिए भारत के बुनकरों और हथकरघा उद्योग की पूरी कहानी

भारत में हर साल 7 अगस्त को राष्ट्रीय हथकरघा दिवस मनाया जाता है। यह दिन सिर्फ पारंपरिक कपड़ों का उत्सव नहीं, बल्कि उन लाखों बुनकरों और कारीगरों को सम्मान देने का अवसर भी है, जो पीढ़ियों से देश की समृद्ध बुनाई परंपरा को जीवित रखे हुए हैं।

राष्ट्रीय हथकरघा दिवस 2026 के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी देशवासियों से #NationalHandloomDay के साथ अपने ‘गेट रेडी विद मी’ (GRWM) वीडियो साझा कर भारतीय हथकरघा उत्पादों को बढ़ावा देने की अपील की है।

एक ओर सरकार नई योजनाओं, डिजिटल प्लेटफॉर्म और वैश्विक बाजार के जरिए इस क्षेत्र को मजबूत करने पर जोर दे रही है, वहीं आधुनिक डिजाइन और फैशन की दुनिया में भी भारतीय हथकरघा अपनी अलग पहचान बना रहा है।

1905 के स्वदेशी आंदोलन से जुड़ा है राष्ट्रीय हथकरघा दिवस

राष्ट्रीय हथकरघा दिवस हर साल 7 अगस्त को मनाया जाता है। इस तारीख का संबंध 1905 में शुरू हुए स्वदेशी आंदोलन से है। उस समय देशवासियों ने विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार कर भारतीय उत्पादों को अपनाने का संकल्प लिया था। हथकरघा उद्योग उस आंदोलन का एक मजबूत आधार बना था।

इसी ऐतिहासिक महत्व को देखते हुए वर्ष 2015 में पीएम मोदी ने राष्ट्रीय हथकरघा दिवस की शुरुआत की। तब से यह दिन बुनकरों के योगदान को सम्मान देने और लोगों को भारतीय हथकरघा उत्पाद अपनाने के लिए प्रेरित करने का अवसर बन गया है।

हथकरघा उद्योग से भारत में जुड़े हैं कितने लोग ?

हथकरघा उद्योग सिर्फ सांस्कृतिक पहचान नहीं बल्कि करोड़ों लोगों की आजीविका का भी आधार है। 2019-20 की चौथी अखिल भारतीय हथकरघा जनगणना के अनुसार देश में लगभग 31.45 लाख हथकरघा परिवार हैं और करीब 35.22 लाख बुनकर एवं संबद्ध श्रमिक इस क्षेत्र से जुड़े हुए हैं।

इनमें लगभग 8.48 लाख लोग बुनाई से पहले और बाद के काम, जैसे धागा तैयार करना, रंगाई, वार्पिंग और फिनिशिंग जैसी गतिविधियों में लगे हैं। सबसे खास बात यह है कि इस क्षेत्र में 72 प्रतिशत से अधिक यानी लगभग 25.46 लाख महिलाएँ काम करती हैं। यही वजह है कि हथकरघा उद्योग महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण का भी बड़ा माध्यम माना जाता है।

इसके अलावा लगभग 28.20 लाख करघों में से करीब 90 प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्रों में मौजूद हैं, जिससे साफ है कि यह उद्योग गाँवों की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाता है।

सरकार किन योजनाओं से दे रही है बुनकरों को सहारा?

सरकार हथकरघा क्षेत्र को मजबूत करने के लिए कई योजनाएं चला रही है। इनमें सबसे प्रमुख राष्ट्रीय हथकरघा विकास कार्यक्रम (NHDP) और कच्चा माल आपूर्ति योजना (RMSS) हैं।

NHDP के तहत छोटे क्लस्टरों को आधुनिक करघे, बेहतर कार्यशाला, डिजाइन सहायता, उत्पाद विकास और विपणन जैसी सुविधाएँ दी जाती हैं। वर्ष 2021-22 से जून 2026 तक 357 क्लस्टर स्वीकृत किए जा चुके हैं। वर्कशेड निर्माण और इलेक्ट्रॉनिक जैक्वार्ड जैसी तकनीकों से बुनकरों की उत्पादकता और आय में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

सरकार रियायती ब्याज दर पर ऋण, बीमा योजनाएँ, छात्रवृत्ति, मेगा क्लस्टर विकास और विशेष अवसंरचना परियोजनाओं के जरिए भी बुनकरों की मदद कर रही है। जनवरी 2025 में शुरू किए गए ई-पहचान पोर्टल के माध्यम से नए बुनकरों का पंजीकरण आसान हुआ है और जुलाई 2026 तक करीब 84 हजार अतिरिक्त श्रमिकों को ई-पहचान कार्ड की मंजूरी मिल चुकी है।

पारंपरिक बुनाई को मिल रही आधुनिक पहचान

आज भारतीय हथकरघा सिर्फ पारंपरिक साड़ियों या कपड़ों तक सीमित नहीं है। आधुनिक फैशन, डिजाइन और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने इसे नई पहचान दी है।

हाल के वर्षों में फेमिना मिस इंडिया, भारत टेक्स, IFFI गोवा और ‘वीव द फ्यूचर 4.0’ जैसे आयोजनों में भारतीय हथकरघा को नए अंदाज में प्रस्तुत किया गया। चंदेरी, बनारसी, जामदानी, महेश्वरी, इकत, कोटा डोरिया और कई अन्य पारंपरिक बुनाई शैलियों को आधुनिक फैशन के साथ जोड़कर दुनिया के सामने पेश किया गया।

इसी दिशा में हैंडलूम हैकाथॉन 2026 भी शुरू किया गया है, जिसमें विद्यार्थी, स्टार्टअप, डिजाइनर और बुनकर मिलकर इस क्षेत्र के लिए नए तकनीकी और व्यावहारिक समाधान तैयार कर रहे हैं।

वैश्विक बाजार में बढ़ रही भारतीय हथकरघा की पहचान

भारतीय हथकरघा उत्पादों की माँग अब विदेशों में भी लगातार बढ़ रही है। वर्ष 2025-26 में भारत का हथकरघा निर्यात लगभग 1330.96 करोड़ रुपए रहा। संयुक्त अरब अमीरात, अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन और स्पेन प्रमुख निर्यात बाजार रहे।

सरकार खरीदारों का भरोसा बढ़ाने के लिए हैंडलूम मार्क, इंडिया हैंडलूम ब्रांड और जीआई टैग जैसी व्यवस्थाओं को भी मजबूत कर रही है। जून 2026 तक 29402 हैंडलूम मार्क पंजीकरण और 2305 इंडिया हैंडलूम ब्रांड पंजीकरण जारी किए जा चुके थे।

डिजिटल प्लेटफॉर्म भी इस बदलाव में बड़ी भूमिका निभा रहे हैं। GeM पोर्टल से करीब 1.50 लाख बुनकर और संस्थाएँ जुड़ चुकी हैं, जबकि IndiaHandmade प्लेटफॉर्म हजारों कारीगरों को सीधे ग्राहकों तक पहुँचने का अवसर दे रहा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संदेश

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रीय हथकरघा दिवस पर स्थानीय कपड़ों को बढ़ावा देने की अपील की है। उन्होंने देशवासियों को संबोधित करते हुए सोशल मीडिया पर वीडियो शेयर किया।

इसमें उन्होंने जनता से अपील करते हुए देश की पारंपरिक शिल्पकला और स्थानीय बुनाई को बढ़ावा देने के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म का उपयोग करने का आग्रह किया। उन्होंने नागरिकों से स्थानीय कपड़ों की लोकप्रियता बढ़ाने के लिए हैशटैग के साथ अपने ‘गेट रेडी विद मी’ (GRWM) वीडियो शेयर करने की अपील की।

प्रधानमंत्री ने गुरुवार को एक्स प्लेटफॉर्म पर लिखा, “7 अगस्त राष्ट्रीय हथकरघा दिवस है। आइए भारत की हथकरघा विविधता को लोकप्रिय बनाएँ। अपने पसंदीदा हथकरघा उत्पादों के वीडियो, जिनमें GRWM वीडियो भी शामिल हैं, सोशल मीडिया पर साझा करें। #NationalHandloomDay का उपयोग करना न भूलें।”

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने 7 अगस्त 2026 को दिल्ली के राष्ट्रपति भवन सांस्कृतिक केंद्र में 12वें राष्ट्रीय हथकरघा दिवस समारोह के अवसर पर देश के 22 उत्कृष्ट बुनकरों और शिल्पकारों को प्रतिष्ठित संत कबीर हथकरघा और राष्ट्रीय हथकरघा पुरस्कार प्रदान किए।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने सभा को संबोधित करते हुए कहा, “हमारे कृषि क्षेत्र में भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था के सबसे सुंदर और मानवीय उद्योग बनने की संभावनाएँ बढ़ी हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि हथकरघा क्लस्टरों को आधुनिक प्रौद्योगिकी और सामाजिक प्रशिक्षण के तरीकों से जोड़ा जा रहा है। किसानों की संख्या बढ़ाने के लिए सरकार ने कई पारदर्शी कदम उठाए हैं।”

उन्होंने आगे कहा, “किसानों ने अपनी मेहनत का सीधा लाभ प्राप्त करने के रास्ते खोज लिए हैं। जैसा कि कानून मंत्री ने उल्लेख किया है, भारतीय कृषि क्षेत्र की अंतरराष्ट्रीय छवि उभर रही है। सरकार इसे एक सत्यापित सांस्कृतिक अर्थव्यवस्था बनाने के लिए कड़ी मेहनत कर रही है। हथकरघा और घरेलू वस्त्र क्षेत्रों में आर्थिक विकास की संभावनाएँ हैं।”

भविष्य की ओर बढ़ता भारतीय हथकरघा

भारतीय हथकरघा केवल कपड़ा बनाने की कला नहीं, बल्कि देश की सांस्कृतिक विरासत, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और लाखों परिवारों की आजीविका का आधार है। समय के साथ यह क्षेत्र भी तेजी से बदल रहा है। नई तकनीक, बेहतर डिजाइन, सरकारी योजनाएँ, डिजिटल बाजार और अंतरराष्ट्रीय पहचान मिलकर इसे नई दिशा दे रहे हैं।

राष्ट्रीय हथकरघा दिवस 2026 इस बात का संदेश देता है कि परंपरा और आधुनिकता साथ-साथ चल सकती हैं। यदि बुनकरों को लगातार तकनीकी सहायता, बेहतर बाजार और मजबूत सरकारी समर्थन मिलता रहा, तो भारतीय हथकरघा आने वाले वर्षों में न केवल देश की सांस्कृतिक पहचान को और मजबूत करेगा, बल्कि वैश्विक वस्त्र बाजार में भी अपनी अलग और स्थायी जगह बनाएगा।

‘प्रदर्शन के नाम पर शहर को बंधक नहीं बना सकते, जंतर-मंतर बंद करने पर विचार करो’: दिल्ली HC की सख्त टिप्पणी, जानें- क्यों सुरक्षा के लिहाज से खतरनाक माना जा रहा यह धरना स्थल

दिल्ली हाई कोर्ट ने शुक्रवार (7 अगस्त 2026) को जंतर-मंतर को विरोध-प्रदर्शनों के स्थल के रूप में जारी रखने पर गंभीर सवाल उठाते हुए केंद्र सरकार से पूछा कि आखिर इस स्थान को बंद करने पर विचार क्यों नहीं किया जा रहा है। कोर्ट ने कहा कि किसी भी विरोध-प्रदर्शन के कारण पूरे शहर को अनावश्यक रूप से बंधक नहीं बनाया जाना चाहिए।

यह टिप्पणी उस याचिका पर सुनवाई के दौरान की गई, जिसमें ऑल इंडिया दलित क्रिश्चियन राइट्स प्रोटेक्शन कमेटी ने जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन की अनुमति देने के लिए दिल्ली पुलिस को निर्देश देने की माँग की थी। इसी मुद्दे से जुड़ी एक जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट भी सुनवाई कर रहा है, जिसमें जंतर-मंतर के बजाय विरोध-प्रदर्शनों के लिए वैकल्पिक स्थल तय करने की माँग की गई है।

जंतर-मंतर बंद क्यों नहीं कर देते?: हाई कोर्ट ने सरकार से पूछा सवाल

मामले की सुनवाई जस्टिस अमित महाजन की एकल पीठ ने की। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि विरोध-प्रदर्शनों के कारण शहर के आम लोगों को परेशानी उठानी पड़ती है और सरकार को इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। जस्टिस महाजन ने कहा कि इस तरह के प्रदर्शन शहर के बीचों-बीच नहीं होने चाहिए, हालाँकि अंतिम फैसला सरकार का है।

उन्होंने सवाल किया कि आखिर पूरे शहर को अनावश्यक रूप से बंधक क्यों बनाया जाए और सरकार जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल के रूप में बंद क्यों नहीं कर देती। यह मामला ऑल इंडिया दलित क्रिश्चियन राइट्स प्रोटेक्शन कमेटी की ओर से दायर याचिका से जुड़ा था।

समिति की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता संजय घोष ने कोर्ट को बताया कि उन्होंने जुलाई में जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति के लिए आवेदन दिया था, लेकिन दिल्ली पुलिस ने अब तक न तो उसे मंजूर किया है और न ही खारिज किया है। उन्होंने कहा कि प्रदर्शन में अधिकतम 75 लोगों के शामिल होने की बात आवेदन में स्पष्ट रूप से कही गई थी।

इसके बावजूद पुलिस आवेदन पर निर्णय नहीं ले रही है। इस पर कोर्ट ने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) चेतन शर्मा से पूछा कि सरकार इस स्थल को बंद करने पर विचार क्यों नहीं करती। जस्टिस महाजन ने दोहराया कि उनकी व्यक्तिगत राय में इस तरह के प्रदर्शन दिल्ली शहर के भीतर नहीं होने चाहिए।

पुलिस, केंद्र और याचिकाकर्ता के तर्क: कोर्ट ने कहा- शहर को बंधक नहीं बनाया जा सकता

ASG चेतन शर्मा ने कोर्ट को बताया कि यही मुद्दा पहले से सुप्रीम कोर्ट के विचाराधीन है, जहाँ यह तय होना है कि क्या जंतर-मंतर को विरोध-प्रदर्शन के लिए नामित स्थल बने रहना चाहिए। इस पर जस्टिस महाजन ने कहा कि उनकी राय में ऐसा नहीं होना चाहिए।

सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता संजय घोष ने सवाल उठाया कि क्या केंद्र सरकार का यह रुख है कि दिल्ली में कहीं भी विरोध-प्रदर्शन नहीं हो सकते। इस पर जस्टिस महाजन ने कहा कि यह निर्णय पुलिस को लेना है कि वह शहर के भीतर प्रदर्शन की अनुमति दे सकती है या नहीं।

जवाब में घोष ने कहा कि यदि सरकार यह स्पष्ट कह दे कि दिल्ली में लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण प्रदर्शन नहीं होंगे तो वे उसे स्वीकार कर लेंगे। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह यह नहीं कह रही कि प्रदर्शन लोकतांत्रिक हैं या अलोकतांत्रिक, बल्कि उसका सवाल केवल इतना है कि ऐसे आयोजनों से पूरे शहर को परेशानी क्यों झेलनी पड़े।

इस पर संजय घोष ने सुप्रीम कोर्ट के शाहीन बाग फैसले का हवाला देते हुए कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है। जस्टिस महाजन ने इसका जवाब देते हुए कहा कि अधिकार अपनी जगह हैं, लेकिन शहर को बंधक बनाकर नहीं रखा जा सकता।

सुनवाई के दौरान ASG चेतन शर्मा ने यह भी बताया कि जंतर-मंतर क्षेत्र में फिलहाल दंड प्रक्रिया संहिता (CRPC) की धारा 144 लागू है और 15 अगस्त नजदीक होने के कारण सुरक्षा व्यवस्था और अधिक कड़ी कर दी गई है।

उन्होंने कहा कि कई बार 75 लोगों का प्रदर्शन देखते-देखते 75 हजार लोगों की भीड़ में बदल जाता है और ऐसी स्थिति में सुरक्षा एजेंसियों के सामने गंभीर चुनौती खड़ी हो जाती है। इस पर जस्टिस महाजन ने फिर कहा कि उनकी व्यक्तिगत राय में शहर के भीतर ऐसे प्रदर्शन नहीं होने चाहिए क्योंकि इससे एंबुलेंस सहित आम लोगों की आवाजाही प्रभावित होती है।

इसके बाद ASG शर्मा ने कहा कि कई बार प्रदर्शनकारियों के अनुच्छेद 19(1)(a) के अधिकारों को अन्य नागरिकों के अधिकारों से ऊपर मान लिया जाता है, जिससे आम जनता को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

अंत में दिल्ली हाई कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को निर्देश दिया कि वह ऑल इंडिया दलित क्रिश्चियन राइट्स प्रोटेक्शन कमेटी के आवेदन पर 8 अगस्त तक निर्णय ले और इसी निर्देश के साथ याचिका का निस्तारण कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट में भी जंतर-मंतर के खिलाफ याचिका, वैकल्पिक प्रदर्शन स्थल की माँग

जंतर-मंतर को लेकर विवाद केवल दिल्ली हाई कोर्ट तक सीमित नहीं है। इससे पहले सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने भी एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार और संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी किया था।

यह याचिका सतीश चंद कौशिक ने दायर की है, जिसमें कहा गया है कि जंतर-मंतर अब विरोध-प्रदर्शनों के लिए उपयुक्त स्थान नहीं रह गया है और इसके स्थान पर कोई वैकल्पिक स्थल तय किया जाना चाहिए। याचिका में तर्क दिया गया है कि जंतर-मंतर पर होने वाले प्रदर्शनों से स्थानीय निवासियों को लगातार असुविधा होती है।

याचिकाकर्ता का कहना है कि क्षेत्र में आने-जाने के रास्ते बाधित हो जाते हैं, आवश्यक वस्तुओं और दवाइयों की आपूर्ति प्रभावित होती है तथा मेडिकल सेवाओं और एंबुलेंस की आवाजाही में भी रुकावट आती है। इसलिए विरोध-प्रदर्शनों के लिए किसी ऐसे स्थान की व्यवस्था की जानी चाहिए जहाँ नागरिकों को कम से कम असुविधा हो।

सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य जज की अध्यक्षता वाली पीठ ने भी माना कि याचिका में उठाए गए मुद्दे महत्वपूर्ण हैं। कोर्ट ने कहा कि याचिका में यह बताया गया है कि जंतर-मंतर अब प्रदर्शन के लिए उपयुक्त स्थल नहीं रह गया है क्योंकि वहाँ आने-जाने में गंभीर दिक्कतें होती हैं और चिकित्सा संबंधी आवश्यक सेवाओं की आपूर्ति भी प्रभावित होती है।

मुख्य जज ने इसे महत्वपूर्ण चिंता का विषय बताया। याचिकाकर्ता की ओर से यह भी कहा गया कि प्रधानमंत्री आवास तक प्रस्तावित एक राजनीतिक मार्च के मद्देनजर पहले जैसी अप्रिय घटनाओं से बचना जरूरी है। हालाँकि सुप्रीम कोर्ट ने प्रस्तावित कार्यक्रम पर कोई टिप्पणी करने से इनकार करते हुए कहा कि ऐसी परिस्थितियों से निपटना संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों का दायित्व है। इसके बाद कोर्ट ने मामले को अलग से सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया।

कॉकरोचों ने की संसद में घुसने की कोशिश

गौरतलब है कि कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन के दौरान संसद में घुसने की भी कोशिश हुई थी, जो कि जंतर-मंतर से करीब 3 से 4 किलोमीटर की दूरी पर है। दिल्ली पुलिस ने अपने बयान में कहा था कि प्रदर्शन के लिए केवल जंतर-मंतर पर धरना देने की अनुमति दी गई थी। संसद की ओर मार्च निकालने या तय प्रदर्शन स्थल से आगे बढ़ने की इजाजत नहीं थी।

दिल्ली पुलिस के मुताबिक, कई हफ्तों तक प्रदर्शन शांतिपूर्वक चलता रहा और इस दौरान प्रदर्शन स्थल को जबरन खाली नहीं कराया गया। हालात तब बिगड़े, जब प्रदर्शनकारियों का एक समूह संसद का सत्र चलने के दौरान संसद की ओर बढ़ने लगा और रास्ते में लगाए गए सुरक्षा बैरिकेड्स को पार करने की कोशिश की।

पुलिस ने कहा कि प्रदर्शनकारियों से कई बार घोषणा करके तय जगह पर ही रहने की अपील की गई। इसके बावजूद कुछ लोग आगे बढ़ते रहे। इस दौरान बैरिकेड्स को नुकसान पहुँचाया गया, पुलिस को निशाना बनाया गया और कई पुलिसकर्मियों, जिनमें वरिष्ठ और बुजुर्ग अधिकारी भी शामिल थे, को घरेकर धक्का-मुक्की और बदसलूकी की गई।

Meta पर ₹5000 करोड़ का जुर्माना, जानें क्या है न्यू मेक्सिको में बच्चों की सुरक्षा से खिलवाड़ का मामला: इससे बच्चों में बढ़ रहा डिप्रेशन व सुसाइड जैसा खतरा, दुनियाभर में मुकदमे झेल रही कंपनी

सोशल मीडिया ऐप्स का असर आज के बच्चों और युवाओं के दिमाग पर बहुत गहरा पड़ रहा है। मेटा, जो फेसबुक और इंस्टाग्राम जैसी बड़ी ऐप्स चलाती है, इस समय दुनिया भर में कानूनी मामलों और सरकारी जाँच का सामना कर रही है।

अमेरिका की अदालतों से लेकर यूरोप की एजेंसियों और भारत में बच्चों की सुरक्षा के मुद्दों तक, मेटा पर आरोप है कि उसने अपने फायदे और कमाई के लिए बच्चों की सुरक्षा और सेहत को नुकसान पहुँचाया। हाल ही में न्यू मेक्सिको की एक अदालत ने मेटा पर 567 मिलियन डॉलर (करीब 4,700 करोड़ रुपए) का भारी जुर्माना लगाया है।

यह फैसला टेक कंपनियों के काम करने के तरीके, उनके एल्गोरिदम, AI चैटबॉट्स और बच्चों के यौन शोषण को रोकने में उनकी नाकामी पर एक बड़ा सबक है। ऐप्स के अंदर जानबूझकर ऐसे फीचर्स डाले जाते हैं जो बच्चों को घंटों फोन से चिपकाए रखते हैं। इससे बच्चों में तनाव, नींद न आना, डिप्रेशन और आत्महत्या जैसे मामले सामने आ रहे हैं।

न्यू मेक्सिको की अदालत ने मेटा को ‘पब्लिक न्यूसेंस’ (सार्वजनिक उपद्रव) फैलाने का दोषी माना है, जिसका मतलब है कि सोशल मीडिया की ये कमियाँ अब सिर्फ किसी एक इंसान की दिक्कत नहीं हैं, बल्कि पूरे समाज के लिए खतरा बन चुकी हैं।

इसके साथ ही भारत जैसे देश में भी, जहाँ करोड़ों बच्चे इंटरनेट चलाते हैं, ऑनलाइन बाल यौन शोषण और सुरक्षा का मुद्दा बहुत गंभीर रूप ले चुका है। इन सभी मामलों और अदालती फैसलों से यह साफ हो गया है कि अब दुनिया भर की सरकारें और अदालतें टेक कंपनियों की मनमानी को चुपचाप बर्दाश्त करने के मूड में नहीं हैं। 

न्यू मेक्सिको के कोर्ट का ऑर्डर और 567 मिलियन डॉलर की पेनाल्टी

अमेरिका के न्यू मेक्सिको स्थित सांता फे की एक कोर्ट ने मेटा के खिलाफ कड़ा फैसला सुनाते हुए कंपनी को 567 मिलियन डॉलर (4,700 करोड़ रुपए से अधिक) की भारी राशि किशोर मानसिक स्वास्थ्य कोष (Teen Mental Health Fund) में जमा करने का आदेश दिया है।

इसके साथ ही जज ब्रायन बीडशेड ने मेटा को अपने प्लेटफॉर्म्स के काम करने के बुनियादी तरीकों में बदलाव करने का निर्देश दिया है ताकि कम उम्र के यूजर्स को सुरक्षा दी जा सके। कोर्ट ने अपने निष्कर्ष में साफ कहा कि मेटा अपने प्लेटफॉर्म्स के जरिए बच्चों और किशोरों के स्वास्थ्य और जीवन की सुरक्षा को नुकसान पहुँचाने के लिए पूरी तरह जिम्मेदार है।

यह पूरी कानूनी कार्रवाई न्यू मेक्सिको के अटॉर्नी जनरल रॉल टॉरेज द्वारा शुरू की गई थी, जिन्होंने आरोप लगाया था कि उसने अपने प्रोडक्ट्स को इस तरह डिजाइन किया कि युवाओं को उनकी लत लग जाए। साथ ही कंपनी अपने प्लेटफॉर्म्स पर बच्चों को यौन उत्पीड़न, ऑनलाइन ग्रूमिंग और शोषण से बचाने के बुनियादी तंत्र को लागू करने में भी पूरी तरह नाकाम रही।

कोर्ट का यह 567 मिलियन डॉलर का फैसला इस पूरे केस के दूसरे चरण की सुनवाई के बाद सामने आया है। इससे ठीक पाँच महीने पहले इसी मुकदमे के प्रथम चरण में न्यू मेक्सिको की एक जूरी ने मेटा को 375 मिलियन डॉलर का भुगतान करने का आदेश दिया था।

जूरी ने अपने जाँच निष्कर्षों में माना था कि मेटा ने फेसबुक और इंस्टाग्राम की सुरक्षा के बारे में झूठे और भ्रामक दावे करके उपभोक्ता संरक्षण कानूनों का सीधा और गंभीर उल्लंघन किया है। कोर्ट ने अपने फैसले के तहत पाँच वर्षों के लिए लागू रहने वाली एक बेहद सख्त डिक्री भी जारी की है।

इसके तहत मेटा को न्यू मेक्सिको में किशोरों द्वारा फेसबुक और इंस्टाग्राम के उपयोग की एक निश्चित मासिक समय-सीमा तय करनी होगी, बार-बार भेजे जाने वाले नोटिफिकेशंस पर कड़े प्रतिबंध लगाने होंगे, अनजान वयस्कों द्वारा नाबालिगों से सीधे संपर्क साधने के रास्तों को ब्लॉक करना होगा, AI चैटबॉट्स पर कड़े सुरक्षा नियम लागू करने होंगे और बाल यौन शोषण सामग्री से जुड़ी रिपोर्टों की बहुत ही गहनता से समीक्षा करनी होगी।

क्या है पब्लिक न्यूसेंस लॉ और मेटा ने अपने बचाव में क्या दलीलें दी?

न्यू मेक्सिको की इस कोर्ट में चली तीन हफ्ते की बिना जूरी वाली सुनवाई का मुख्य केंद्र यह तय करना था कि क्या मेटा के प्लेटफॉर्म्स ने राज्य के कानून के तहत एक पब्लिक न्यूसेंस की स्थिति पैदा की है।

अमेरिकी न्याय प्रणाली में सार्वजनिक उपद्रव का कानून ऐतिहासिक रूप से उन गतिविधियों के खिलाफ इस्तेमाल किया जाता रहा है जो आम जनता के स्वास्थ्य, सुरक्षा या सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाती हैं, जैसे कि मुख्य रास्तों को अवरुद्ध करना या नदियों और हवा में जहरीला कचरा फैलाना।

हालाँकि हाल के वर्षों में अमेरिकी राज्यों ने तंबाकू कंपनियों, ओपिओइड दवा निर्माताओं, जलवायु परिवर्तन के मामलों, ई-सिगरेट कंपनियों और अब AI व सोशल मीडिया दिग्गजों को कटघरे में खड़ा करने के लिए इस कानून का व्यापक उपयोग शुरू कर दिया है।

जज ब्रायन बीडशेड ने अपने लिखित फैसले में एक बहुत ही प्रभावी तुलना करते हुए लिखा कि जिस प्रकार किसी कारखाने से निकलने वाला जहरीला धुआँ आसपास के वातावरण और स्वच्छ हवा के सार्वजनिक अधिकार को दूषित करता है, ठीक उसी प्रकार मेटा के प्लेटफॉर्म्स के हानिकारक प्रभाव केवल फोन की स्क्रीन या इंटरनेट तक सीमित नहीं रहते।

ये हानिकारक प्रभाव डिजिटल दुनिया से बाहर निकलकर वास्तविक दुनिया में फैलते हैं और प्रभावित बच्चों, उनके परिवारों, स्कूलों, अस्पतालों और पूरी कानून प्रवर्तन प्रणाली पर एक बहुत बड़ा सामाजिक बोझ और संकट खड़ा करते हैं।

दूसरी ओर मेटा ने मुकदमे की सुनवाई के दौरान अपना बचाव करते हुए दलील दी कि उसने ऐसा कोई पब्लिक न्यूसेंस पैदा नहीं किया है क्योंकि उसने हवा या पानी जैसी किसी सार्वजनिक संपत्ति में सीधे तौर पर कोई रुकावट नहीं डाली है।

मेटा के वकीलों का यह भी कहना था कि न्यू मेक्सिको के युवा केवल उनकी ऐप्स का उपयोग नहीं करते हैं, बल्कि वे अन्य कंपनियों के डिजिटल ऐप्स भी चलाते हैं, इसलिए केवल मेटा को इस स्थिति के लिए दोषी ठहराना गलत है।

कंपनी ने कोर्ट से माँगी गई पाबंदियों और सुरक्षात्मक उपायों का विरोध करते हुए कोर्ट फाइलिंग्स में कहा कि इनमें से कई बदलाव तकनीकी रूप से असंभव या बेहद कठिन हैं और इन नियमों के कारण कंपनी को मजबूरन उस पूरे राज्य से ही अपनी सेवाएँ समेटनी पड़ सकती हैं।

इसके अतिरिक्त मेटा ने अमेरिकी कानून ‘कम्युनिकेशंस डिसेंसी एक्ट’ की धारा 230 के तहत कानूनी छूट का दावा किया, जो सामान्य तौर पर इंटरनेट प्लेटफॉर्म्स को उनके यूजर्स द्वारा पोस्ट किए गए कंटेंट के दायित्व से सुरक्षा देती है।

हालाँकि जज बीडशेड ने धारा 230 के इस बचाव को पूरी तरह से खारिज कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राज्य यहाँ किसी तीसरे पक्ष द्वारा पोस्ट की गई सामग्री के लिए मेटा को दोषी नहीं ठहरा रहा है, बल्कि वह कंपनी द्वारा खुद डिजाइन किए गए प्लेटफॉर्म फीचर्स, लत लगाने वाले तंत्र और उसकी अपनी आंतरिक कार्यप्रणाली को चुनौती दे रहा है।

AI चैटबॉट्स की अश्लील बातचीत और चाइल्ड सेफ्टी से जुड़ा गंभीर खतरा

मुकदमे के दौरान कोर्ट के सामने पेश की गई इंटरनल रिपोर्ट्स ने यह खुलासा किया कि मेटा के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) चैटबॉट्स बच्चों की सुरक्षा के लिए एक नया और बेहद गंभीर खतरा बन रहे थे। रिपोर्ट्स में यह बात साबित हुई कि कंपनी के AI चैटबॉट्स कम उम्र के बच्चों के साथ रोमांटिक, कामुक और अश्लील बातचीत कर सकते थे।

प्लेटफॉर्म पर विज्ञापनों के जरिए धोखाधड़ी और प्रतिबंधित सामान बेचे जाने से होने वाली कमाई की जाँच के बीच इस AI फीचर के दुरुपयोग ने कोर्ट की चिंता को और बढ़ा दिया।

जज बीडशेड ने अपने आदेश में मेटा को निर्देश दिया कि वह न्यू मेक्सिको के किसी भी बच्चे को मेटा के AI चैटबॉट्स के साथ किसी भी प्रकार की रोमांटिक, कामुक या यौन बातचीत में शामिल होने से रोकने के लिए पुख्ता तकनीकी दीवारें खड़ी करे।

कोर्ट ने यह भी तय करने का आदेश दिया कि कोई भी वयस्क यूजर किसी बच्चे के साथ अश्लील बातचीत का करने के लिए मेटा के चैटबॉट्स का इस्तेमाल न कर सके। यह मामला केवल AI चैटबॉट्स तक ही सीमित नहीं है, बल्कि प्लेटफॉर्म पर फैलने वाले बाल यौन शोषण सामग्री और बच्चों को निशाना बनाने वाले पीडोफाइल्स से भी सीधे जुड़ा हुआ है।

राज्य के अटॉर्नी जनरल ने पुख्ता सबूतों के साथ आरोप लगाया कि फेसबुक और इंस्टाग्राम पर सुरक्षा की इतनी भयंकर कमियाँ थीं कि गलत नीयत रखने वाले वयस्कों को नाबालिग बच्चों तक पहुँचने और उनका शोषण करने का खुला अवसर मिल रहा था।

कोर्ट ने अपने आदेश में मेटा को निर्देश दिया है कि वह अपने प्लेटफॉर्म्स पर बाल यौन शोषण से जुड़ी शिकायतों और रिपोर्टों की समीक्षा प्रक्रिया को मजबूत और तेज करे। हालाँकि मेटा ने इस फैसले के बाद जारी अपने आधिकारिक बयान में कहा कि वह इस निर्णय के खिलाफ ऊपरी अदालत में अपील दायर करेगी।

मेटा का दावा है कि वह अपने प्लेटफॉर्म्स को सुरक्षित बनाने के लिए लगातार काम कर रही है। कंपनी का कहना है कि वह किशोरों की सुरक्षा से जुड़े अपने रिकॉर्ड को लेकर आश्वस्त है और कोर्ट में अपने तथ्यों का बचाव करती रहेगी, लेकिन कोर्ट के फैसले में सामने आए तथ्य उसके इन दावों की पोल खोलते हैं।

यूरोपीय आयोग की कड़ी जाँच और दुनियाभर की सरकारी एजेंसियों का बढ़ता दबाव

अमेरिका में चल रहे इन मुकदमों के अलावा, यूरोपीय संघ (EU) में भी मेटा के खिलाफ नियमों की घेराबंदी लगातार सख्त होती जा रही है। यूरोपीय आयोग ने औपचारिक रूप से घोषणा की है कि वह मेटा के दो बड़े सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स, फेसबुक और इंस्टाग्राम के खिलाफ अपने नए और बेहद सख्त ‘डिजिटल सर्विसेज एक्ट’ (DSA) के तहत जाँच शुरू कर रहा है।

यह जाँच मुख्य रूप से बाल सुरक्षा से जुड़े गंभीर जोखिमों और कंपनी द्वारा अपने वैधानिक दायित्वों की अनदेखी करने पर केंद्रित है। यूरोपीय संघ का यह लैंडमार्क कानून यह अनिवार्य बनाता है कि टेक कंपनियों को अपने प्लेटफॉर्म्स से गैर-कानूनी, अश्लील और नुकसानदेह सामग्री को हटाने के लिए तुरंत और ठोस कदम उठाने होंगे।

साथ ही नाबालिगों की प्राइवेसी और सुरक्षा का उच्चतम स्तर सुनिश्चित करना होगा। यदि कोई कंपनी इन नियमों का उल्लंघन करती पाई जाती है, तो उस पर उसकी वैश्विक कुल कमाई के 6 प्रतिशत तक का वित्तीय जुर्माना लगाया जा सकता है।

यूरोपीय संघ के नियामकों का मानना है कि फेसबुक और इंस्टाग्राम के कई फीचर्स इस तरह डिजाइन किए गए हैं जो बच्चों में ऐप की लत और अवांछनीय व्यवहार को बढ़ावा देते हैं, जिससे उनके मानसिक विकास और मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा नकारात्मक असर पड़ रहा है।

इसके अतिरिक्त यूरोपीय आयोग इस बात की भी जाँच कर रहा है कि क्या मेटा के पास उपयोगकर्ताओं की सही उम्र का सत्यापन करने के लिए कोई विश्वसनीय तंत्र मौजूद है या नहीं, और क्या उसके एल्गोरिदम कम उम्र के बच्चों को उनकी इच्छा के बिना भी खतरनाक या अनुचित कंटेंट की ओर धकेल रहे हैं।

लगातार बढ़ते इस वैश्विक दबाव का असर मेटा के व्यावसायिक भविष्य पर भी साफ दिखाई दे रहा है। कंपनी ने अपने शेयरधारकों और निवेशकों को औपचारिक रूप से चेतावनी दी है कि अमेरिका और यूरोपीय संघ में युवाओं के सोशल मीडिया उपयोग और बाल सुरक्षा से जुड़े ये कानूनी मामले और नियामक प्रतिबंध उसके व्यवसाय को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकते हैं।

मानसिक स्वास्थ्य पर असर और टीनएजर्स की मौतों पर लीगल एक्शन

सोशल मीडिया कंपनियों द्वारा अपने वित्तीय लाभ के लिए युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य को दाँव पर लगाने का यह मुद्दा अब सिर्फ सरकारी एजेंसियों या राज्य के मुकदमों तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि इसका सबसे भयानक पहलू उन आम परिवारों की कहानियों में दिखता है जिन्होंने अपने बच्चों को खो दिया है।

हाल ही में अमेरिका की डेलावेयर सुपीरियर कोर्ट में चार नाबालिग बच्चों के परिवारों ने एक बड़ा केस दर्ज कराया है। यह मुकदमा मेटा, टिकटॉक, स्नैपचैट और यूट्यूब की मूल कंपनी गूगल के खिलाफ एक साथ दायर किया गया है।

याचिका में आरोप लगाया गया है कि इन प्लेटफॉर्म्स के वर्षों के रेग्युलर और अत्यधिक इस्तेमाल से पैदा हुए गंभीर मानसिक खतरों के कारण उन चारों बच्चों ने आत्महत्या जैसा खौफनाक कदम उठा लिया।

यह मुकदमा जुलाई 2024 से सितंबर 2025 के बीच केवल 14 महीनों की अवधि के भीतर अपनी जान गँवाने वाले चार अलग-अलग राज्यों के बच्चों- लीवी कास्त्रो (13 वर्ष), रिव केलेहर (14 वर्ष), नथैनिएल चैम्बर्स (17 वर्ष) और डॉसन होल्डन (18 वर्ष) के परिवारों की तरफ से दाखिल किया गया है।

पीड़ित परिवारों का प्रतिनिधित्व कर रहे ‘सोशल मीडिया विक्टिम्स लॉ सेंटर’ के संस्थापक वकील मैथ्यू बर्गमैन ने स्पष्ट रूप से कहा कि कंपनियों के बड़े अधिकारियों के तमाम खोखले दावों और झूठे आश्वासनों के बावजूद ये ऐप्स बच्चों की जिंदगी छीन रहे हैं।

कोर्ट में दाखिल शिकायत के अनुसार, इन चारों टीनएजर्स ने सोशल मीडिया की भयंकर लत, नींद की गंभीर कमी, गहरा अवसाद, चिंता और आत्महत्या के विचारों जैसी भयानक मानसिक स्थितियों का सामना किया। अमेरिका के 33 से अधिक राज्यों के अटॉर्नी जनरल ने मिलकर कैलिफोर्निया की संघीय कोर्ट में मेटा के खिलाफ एक साझा मुकदमा दर्ज कराया हुआ है।

इसमें 33 राज्यों का एक समूह शामिल है जिसने आरोप लगाया कि मेटा जानती थी कि उसके प्लेटफॉर्म्स पर मौजूद लाइक्स का सिस्टम और लगातार स्क्रॉल होने वाला डिजाइन किशोरों के दिमाग को आकर्षित करके उन्हें नियंत्रित कर लेता है।

साल 2021 में कंपनी की ही एक पूर्व कर्मचारी फ्रांसिस हॉगेन द्वारा लीक किए गए अंदरूनी गुप्त दस्तावेजों ने संसद और पूरी दुनिया के सामने यह उजागर कर दिया था कि इंस्टाग्राम किशोरियों के मन में अपने शरीर को लेकर हीन भावना पैदा कर रहा है और कंपनी को इसकी पूरी जानकारी होने के बावजूद उसने मुनाफे के लिए इसे छिपाए रखा।

भारत में बाल यौन शोषण, कानूनी ढाँचा और डिजिटल सुरक्षा की स्थिति

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर बाल सुरक्षा और यौन शोषण का यह संकट केवल अमेरिका या यूरोप के विकसित देशों तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत जैसे विशाल डिजिटल बाजार वाले देश के लिए यह एक बड़ी चुनौती प्रस्तुत करता है।

भारत में आज करोड़ों छोटे बच्चे और किशोर रोजाना इंस्टाग्राम, फेसबुक और व्हाट्सएप का सक्रियता से इस्तेमाल करते हैं। डिजिटल साक्षरता की कमी और पर्याप्त निगरानी के अभाव के कारण भारतीय बच्चे ऑनलाइन साइबर बुलिंग, ऑनलाइन ग्रूमिंग और बाल यौन शोषण सामग्री के आसान शिकार बन जाते हैं।

हालाँकि भारत में इस प्रकार के अपराधों से निपटने के लिए एक सख्त कानूनी ढाँचा मौजूद है, जिसमें मुख्य रूप से ‘प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंसेस’ यानी पॉक्सो एक्ट (POCSO Act, 2012) और ‘इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट’ (IT Act, 2000) शामिल हैं।

भारतीय कानून के तहत ऑनलाइन बाल यौन शोषण सामग्री (CSAM) को देखना, खोजना, डाउनलोड करना, अपने फोन या कंप्यूटर में स्टोर करना, या किसी अन्य को भेजना एक गैर-जमानती गंभीर अपराध है। ऐसी सामग्री का केवल स्टोरेज या कंजप्शन भी पॉक्सो कानून की धारा 15 और आईटी एक्ट की धारा 67B के तहत दंडनीय अपराध है।

इसके अलावा भारत सरकार के ‘इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (इंटरमीडियरी गाइडलाइन्स एंड डिजिटल मीडिया एथिक्स कोड) रूल्स, 2021’ के तहत मेटा जैसी टेक कंपनियों (इंटरमीडियरीज) पर यह सख्त कानूनी दायित्व डाला गया है कि किसी भी शिकायत या सरकारी निर्देश के मिलने के 24 घंटे के भीतर वे बाल यौन शोषण से जुड़ी किसी भी सामग्री को अपने प्लेटफॉर्म से तुरंत हटाएँ और उसकी पहुँच को ब्लॉक करें।

जाँच एजेंसी CBI ने भी देशभर में ऑनलाइन फैल रहे बाल यौन शोषण रैकेट्स का पर्दाफाश करने के लिए ‘ऑपरेशन मेघ चक्र’ जैसे अभियान चलाकर बड़े पैमाने पर छापेमारी की है।