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कॉन्ग्रेस का चहेता था रेपिस्ट तरुण तेजपाल: सोनिया गाँधी उसे बचाना चाहती थीं, कपिल सिब्बल ने दिए थे तहलका को ₹5 लाख डोनेशन

2013 के रेप मामले में तहलका के पूर्व प्रधान संपादक तरुण तेजपाल को दोषी ठहराए जाने से बार फिर राजनीति शुरू हो गई है। विशेषकर कॉन्ग्रेस, पत्रकारिता और सार्वजनिक जीवन के प्रभावशाली व्यक्तियों के साथ उनके संबंधों पर चर्चा हो रही है। घटना के 12 साल से अधिक समय बीत जाने के बाद बॉम्बे उच्च न्यायालय की गोवा बेंच ने उन्हें दोषी करार दिया। दरअसल इस मामले में 2021 में निचली अदालत ने उन्हें बरी कर दिया था। इस फैसले को पलटते हुए हाईकोर्ट में उन्हें दोषी ठहराया ।

अदालत ने तेजपाल को 10 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई और उन्हें आत्मसमर्पण करने के लिए समय दिया। तेजपाल ने कहा है कि वह इस फैसले को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देंगे।

यह मामला नवंबर 2013 का है, जब तहलका पत्रिका में काम करने वाली एक युवती ने तेजपाल पर गोवा के बंबोलिम स्थित ग्रैंड हयात होटल में पत्रिका के ‘थिंक’ कार्यक्रम के दौरान लिफ्ट में यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था। ये आरोप 7 और 8 नवंबर को दो दिन की घटनाओं से संबंधित थे।

आरोप सामने आने के बाद तेजपाल ने तहलका के प्रधान संपादक पद से इस्तीफा दे दिया और कहा कि वह संगठन से खुद को अलग करना चाहते हैं। उन्हें 30 नवंबर 2013 को गिरफ्तार किया गया था और बाद में जमानत पर रिहा कर दिया गया था।

कानूनी लड़ाई कई सालों तक चली। तेजपाल पर बलात्कार, यौन उत्पीड़न और निर्वस्त्र करने की कोशिश समेत कई आरोप लगे। मई 2021 में गोवा की एक सत्र अदालत ने उन्हें सभी आरोपों से बरी कर दिया। इस फैसले की आलोचना हुई थी। इसमें जाँच को लेकर भी सवाल उठे थे। बॉम्बे हाई कोर्ट ने अब उस बरी करने के फैसले को पलटते हुए तेजपाल को दोषी ठहराया है। अदालत के इस फैसले ने एक बार फिर ‘तहलका’ के पूर्व प्रमुख के करियर और पत्रिका से जुड़े पूरे सिस्टम को जाँच के दायरे में ला दिया है।

कपिल सिब्बल ने दिए तहलका को 5 लाख रुपए का दान

जैसे-जैसे तहलका और तरुण तेजपाल की स्टोरी लोगों के बीच गई, वैसे-वैसे इस वामपंथी मीडिया संस्थान को समर्थन देने वाले राजनीतिक संबंधों की भी गहन जाँच होने लगी। तहलका के संदर्भ में एक नाम जो फिर से सामने आया है, वह है पूर्व केंद्रीय कानून मंत्री और वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल का। नवंबर 2013 में, जब तेजपाल के खिलाफ यौन उत्पीड़न का मामला सुर्खियों में छाया हुआ था, तब कपिल सिब्बल ने द संडे एक्सप्रेस को बताया कि उन्होंने 2003 में तेजपाल को 5 लाख रुपए दान किए थे, जब तहलका ने अपना प्रिंट संस्करण शुरू किया था।

कपिल सिब्बल तहलका के साथ अपने वित्तीय संबंधों के बारे में पूछे गए सवालों का जवाब दे रहे थे। कंपनी रजिस्ट्रार के पास उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार, तहलका का प्रकाशन करने वाली कंपनी अनंत मीडिया प्राइवेट लिमिटेड में सिब्बल के पास 80 शेयर थे, जो उस समय 0.04 प्रतिशत हिस्सेदारी के बराबर थे। हालाँकि, कपिल सिब्बल ने कहा कि तहलका में हिस्सेदारी रखने और प्रिंट संस्करण शुरू करने के लिए भुगतान करने के बावजूद, वह खुद को प्रकाशन में हिस्सेदार नहीं मानते।

तहलका में मेरा कोई हिस्सा नहीं है- कपिल सिब्बल

5 लाख रुपये के भुगतान के बारे में बताते हुए सिब्बल ने कहा, “जब 2003 में तरुण ने मुझसे मदद माँगी, तब मैं एक वकील था… मैंने उसकी मदद की। मैंने 2003 में 5 लाख रुपए का दान दिया। मैंने शेयरों के लिए आवेदन नहीं किया था और न ही मुझे कोई शेयर आवंटित किए गए हैं।”

सिब्बल ने कहा कि यह दान प्रेस की स्वतंत्रता में उनके विश्वास से जुड़ा है। उन्होंने कहा, “यह दान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और प्रेस की स्वतंत्रता के प्रति मेरी प्रतिबद्धता है, क्योंकि भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार द्वारा भ्रष्टाचार को उजागर करने के बाद चलाए गए दमनकारी अभियान में इन लोगों ने सब कुछ खो दिया था।”

यह दान तब आया जब तहलका की वेबसाइट ने तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण और एनडीए सरकार के खिलाफ विवादास्पद ऑपरेशन वेस्ट एंड चलाया था। इस ऑपरेशन ने तहलका को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई और रक्षा सौदों में कथित भ्रष्टाचार को लेकर राजनीतिक तूफान भी खड़ा कर दिया।

कंपनी के रिकॉर्ड से यह भी पता चला कि कपिल सिब्बल के पास अभी भी 80 शेयर हैं। 2010-11 तक उनकी हिस्सेदारी 0.08 प्रतिशत थी, जो 2011-12 में कंपनी में नए शेयर निवेश के बाद घटकर 0.04 प्रतिशत रह गई। कपिल सिब्बल ने तेजपाल के साथ पारिवारिक संबंध की अटकलों को भी खारिज करते हुए कहा, “जो गलत जानकारी फैलाई जा रही है वह झूठी और जानबूझकर फैलाई गई है। तरुण तेजपाल मेरा भतीजा नहीं है।”

उसी रिपोर्ट के अनुसार, तेजपाल और उनके परिवार के सदस्यों के पास तेहलका में लगभग 19% हिस्सेदारी थी, जबकि उद्योगपति और तृणमूल कॉन्ग्रेस के राज्यसभा सदस्य केडी सिंह के पास उस समय प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष हिस्सेदारी के माध्यम से लगभग 65% हिस्सेदारी थी।

हालाँकि कपिल सिब्बल ने तहलका में पर्याप्त हिस्सेदारी होने से इनकार किया, लेकिन उनके अपने बयान ने इस बात की पुष्टि की कि जब पत्रिका प्रिंट मीडिया में प्रवेश कर रही थी तब उन्होंने तेजपाल को आर्थिक रूप से समर्थन दिया था।

तहलका और विवादास्पद ऑपरेशन वेस्ट एंड

तेजपाल पर रेप मामले से पहले, तहलका ने विवादास्पद और मानहानि वाले स्टिंग ऑपरेशनों के माध्यम से अपनी प्रतिष्ठा बनाई थी। यह मार्च 2001 की बात है। वामपंथी मीडिया संगठन तहलका ने रक्षा प्रतिष्ठानों और राजनीतिक हलकों में भ्रष्टाचार को ‘उजागर’ करने का फैसला किया। इसकी सबसे अहम जाँच में से एक ‘ऑपरेशन वेस्ट एंड’ थी , जिसे रक्षा खरीद में कथित भ्रष्टाचार को उजागर करने के लिए शुरू किया गया था।

उन्होंने ‘वेस्ट एंड इंटरनेशनल’ नाम से एक फर्जी कंपनी बनाई और भारत सरकार को हैंडहेल्ड थर्मल कैमरे और इमेजर बेचने का काम शुरू किया। ‘पत्रकार’ अनिरुद्ध बहल और मैथ्यू सैमुअल ने ‘हथियार डीलरों’ का रूप धारण किया और ‘ऑपरेशन वेस्ट एंड’ नामक अपने इस गुप्त अभियान के तहत रक्षा अनुबंध हासिल करने की कोशिश की। तहलका की टीम ने रक्षा सौदों में शामिल उच्च पदस्थ अधिकारियों और राजनेताओं के साथ हुई बातचीत को रिकॉर्ड करने के लिए गुप्त कैमरों और ऑडियो रिकॉर्डिंग उपकरणों का इस्तेमाल किया।

गुप्त जाँच कई महीनों तक चली। कुछ प्रमुख राजनेता, नौकरशाह और सेना के जवान रक्षा सौदों में रिश्वत लेते और कमीशन पर चर्चा करते कैमरे में कैद हुए। जल्द ही तहलका पर जालसाजी के आरोप लगे, सबूतों की प्रामाणिकता में कमी आई और सनसनी फैलाने के लिए अधिकारियों को रिश्वत देने के माध्यम से उसने नैतिकता का उल्लंघन किया।

खबरों के मुताबिक, तहलका के पत्रकारों ने भ्रष्टाचार को उजागर करने के अलावा भी अपने स्टिंग ऑपरेशन को कई और तरीकों से आगे बढ़ाया। अनिरुद्ध बहल और मैथ्यू सैमुअल ने कॉल गर्ल्स का इंतजाम किया और तीन रक्षा अधिकारियों के साथ आपत्तिजनक वीडियो बनाए। इस खुलासे से हंगामा मच गया और तहलका के खिलाफ जनभावना भड़क उठी, क्योंकि इससे नैतिक सवाल उठे और समाचार पोर्टल की नैतिक श्रेष्ठता को चुनौती मिली। माधवराव सिंधिया और चंद्र शेखर जैसे राजनेताओं ने भी तहलका की आलोचना की।

उस समय की रिपोर्टों में यह भी आरोप लगाया गया था कि तहलका के पत्रकारों ने ऑपरेशन के दौरान महिलाओं और शराब का इस्तेमाल किया था। इन तरीकों की राजनीतिक नेताओं ने आलोचना की और यह सवाल उठाया कि क्या पत्रिका ने कथित भ्रष्टाचार को उजागर करने और सनसनीखेज फुटेज तैयार करने के उद्देश्य से सारी सीमाएँ लाँघ दी थी।

मेजर जनरल अहलूवालिया मानहानि मामले

ऑपरेशन वेस्ट एंड से जुड़े सबसे गंभीर विवादों में से एक मेजर जनरल एमएस अहलूवालिया से संबंधित था। तहलका ने सेना अधिकारी पर रक्षा सौदों में भ्रष्टाचार में संलिप्त होने का आरोप लगाया था। अहलूवालिया ने आरोपों से इनकार किया और बाद में तहलका और रिपोर्ट से जुड़े लोगों के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दायर किया।

यह मामला दो दशकों से अधिक समय तक चला। जुलाई 2023 में, दिल्ली उच्च न्यायालय ने तहलका, तरुण तेजपाल और उसके दो पत्रकारों को अहलूवालिया को हुए मानहानि के नुकसान के लिए 2 करोड़ रुपए का हर्जाना देने का निर्देश दिया। न्यायालय ने कहा कि अधिकारी 23 वर्षों से अधिक समय से बदनामी झेल रहे थे और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों ने उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचाया था।

अदालत ने पाया कि गंभीर भ्रष्टाचार के आरोपों से अहलूवालिया की प्रतिष्ठा धूमिल हुई है और कहा कि ‘इस स्तर पर माफी माँगना न केवल अपर्याप्त है बल्कि महत्वहीन भी है।‘

यह विवाद तब और भी गंभीर हो गया जब अहलूवालिया ने पैसों की माँग के आरोपों पर तहलका ने जो आरोप लगाए थे, वे गलत साबित हुए। मामले से जुड़ी रिपोर्टों के अनुसार, कार्यवाही के दौरान तहलका के कथित माँग को लेकर शुरुआती दावा बदल गया। सेना की जाँच अदालत में पत्रकार मैथ्यू सैमुअल ने भी कथित तौर पर स्वीकार किया कि अहलूवालिया ने न तो पैसों की माँग की थी और न ही महँगी व्हिस्की की। इसके बाद दिल्ली उच्च न्यायालय ने हर्जाने के आदेश के खिलाफ तहलका की पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी।

जहाँ एक ओर तहलका ने भारतीय रक्षा प्रतिष्ठान के भीतर भ्रष्टाचार की काली सच्चाई को उजागर करने का प्रयास किया, वहीं दूसरी ओर मेजर जनरल एमएस अहलूवालिया को फँसाने में उसने पत्रकारिता की नैतिकता और ईमानदारी की अपनी ही कमी को उजागर कर दिया। 

फर्जी स्टिंग ऑपरेशन? कॉन्ग्रेस ने जाँच आयोग को क्यों बंद किया: सोनिया गाँधी ने तहलका और तरुण तेजपाल को कैसे बचाना चाहा

मार्च 2001 में ‘ऑपरेशन वेस्ट एंड’ स्टिंग ऑपरेशन के बाद सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में जाँच आयोग का गठन किया था। फरवरी 2013 तक, तहलका ने यह कहते हुए जाँच में भाग लेने से इनकार कर दिया कि उनके पास आगे भाग लेने के लिए संसाधन नहीं हैं। तेजपाल ने दावा किया था कि तहलका ने जाँच के लिए दो साल ‘समर्पित’ किए थे और अब आगे भाग नहीं लेगी।

उन्होंने यह भी कहा था कि सभी टेप और सबूत जमा कर दिए गए हैं, और कुछ भी जोड़ने की आवश्यकता नहीं है। जब उनसे जाँच के वित्तीय अनियमितताओं वाले हिस्से में तहलका की भागीदारी के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि यदि तहलका का निवेशक चाहे तो भाग ले सकता है, लेकिन पोर्टल स्वयं भाग नहीं लेगा।

दिलचस्प बात यह है कि 2004 में कॉन्ग्रेस के सत्ता में आते ही, यूपीए सुप्रीमो सोनिया गाँधी और नाममात्र के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने तहलका के स्टिंग ऑपरेशन की प्रामाणिकता की जाँच कर रहे जस्टिस फुकन आयोग को भंग कर दिया। बाद में एक किताब में खुलासा हुआ कि जाँच आयोग के काम करते समय ही सोनिया गाँधी ने पी चिदंबरम को एक लंबा पत्र लिखकर निर्देश दिया था कि तहलका के निवेशकों, फर्स्ट ग्लोबल को परेशान न किया जाए और उसके साथ ‘निष्पक्ष’ व्यवहार किया जाए।

दरअसल न्यायमूर्ति फुकन गंभीर थे और उन्होंने किसी को भी मामले में देरी नहीं करने दी। जैसे ही उन्होंने घोषणा की कि टेप जाँच के लिए भेजे जा रहे हैं, तहलका टीम ने आयोग की कार्यवाही से वॉकआउट करने का फैसला किया। समता पार्टी की तत्कालीन अध्यक्ष जया जेटली ने अपनी किताब में लिखा है, “…जब आयोग अभी भी काम कर रहा था, तब यूपीए और राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की प्रमुख सोनिया गाँधी ने वित्त मंत्री पी चिदंबरम को 25/27 सितंबर 2004 को एक आधिकारिक पत्र लिखा, जिसकी एक कॉपी मुझे विपक्ष के एक उच्च पदस्थ सूत्र ने दी। इसमें उन्होंने उनसे यह सुनिश्चित करने का अनुरोध किया कि तहलका के फाइनेंसर फर्स्ट ग्लोबल के साथ ‘अन्यायपूर्ण या अनुचित व्यवहार’ न किया जाए।

उन्होंने अपनी किताब में फिर लिखा, “दरअसल, वह वही बात कह रही थीं जो मैं तहलका के उस व्यक्ति को समझाने की कोशिश कर रही थी जो मुझे फँसाने के उद्देश्य से मदद माँग रहा था। यहाँ फिर से विडंबना ही हाथ लगी। ”

फुकन आयोग की रिपोर्ट वाजपेयी सरकार को सौंपी गई थी, लेकिन संसद में पेश होने से पहले ही कॉन्ग्रेस सत्ता में आ गई। रिपोर्ट में पाया गया था कि जॉर्ज फर्नांडीस, जिन्होंने स्टिंग ऑपरेशन के बाद रक्षा मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था, किसी भी भ्रष्टाचार में शामिल नहीं थे और उन्हें क्लीन चिट दे दी गई थी।

कॉन्ग्रेस सरकार रिपोर्ट को पेश नहीं करना चाहती थी। लेकिन बढ़ते दबाव के आगे झुकते हुए, उसने केवल प्रस्तुत की गई रिपोर्ट का 41 पृष्ठों का सारांश पेश करने का फैसला किया, जिसमें फर्नांडिस को निर्दोष पाया गया था।

कॉन्ग्रेस सरकार ने आयोग की रिपोर्ट को पूरी तरह से पेश क्यों नहीं होने दिया और उसे सिरे से खारिज क्यों कर दिया, और जाँच आयोग को भंग क्यों कर दिया? क्योंकि उस समय कपिल सिब्बल ने रिपोर्ट के आधिकारिक रूप से सार्वजनिक होने से पहले ही फॉरेंसिक रिपोर्ट के आधार पर तहलका टेपों को प्रामाणिक घोषित कर दिया था।

हालाँकि, फॉरेंसिक विश्लेषण में कई कट और एडिटिंग सामने आईं, जिससे साबित हुआ कि तहलका टेपों के साथ छेड़छाड़ की गई थी। अगर आयोग की रिपोर्ट पूरी तरह से पेश की जाती, तो यह बात सामने आ जाती, इसीलिए कॉन्ग्रेस के खास आदमी कपिल सिब्बल ने यह सुनिश्चित किया कि ऐसा न हो। इस पूरे मामले में तहलका के वकील प्रशांत भूषण ही थे।

संक्षेप में, यदि उस समय के तथ्यों का सही मूल्यांकन किया जाए, तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि बलात्कार के दोषी ठहराए गए तरुण तेजपाल कॉन्ग्रेस के मीडिया गुर्गे थे, जिन्हें कॉन्ग्रेस ने पैसे दिए, संरक्षित किया और उकसाया, ताकि भाजपा सरकार को बदनाम किया जा सके और उसे गिराया जा सके।

धर्म प्रचार का अधिकार, लेकिन बल-लालच-धोखे से धर्मांतरण अपराध: गुजरात HC ने खारिज की ASHA कार्यकर्ताओं पर धर्म परिवर्तन का दबाव डालने वाली महिला की याचिका

गुजरात हाई कोर्ट ने हाल ही में कहा है कि किसी व्यक्ति को अपने धर्म का प्रचार करने का अधिकार है, लेकिन बल, लालच, धोखे या दबाव से जुड़े ऐसे काम, जिनका उद्देश्य धर्म परिवर्तन कराना हो, कानून के तहत अपराध हो सकते हैं।

कोर्ट एक महिला स्वास्थ्यकर्मी की याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिस पर अपने अधीन काम करने वाली ASHA कार्यकर्ताओं पर ईसाई धर्मांतरण के लिए दबाव बनाने का आरोप है। हाई कोर्ट ने FIR और चार्जशीट को रद्द करने से इनकार कर दिया और मामले को ट्रायल कोर्ट के सामने आगे बढ़ने की अनुमति दे दी।

क्या था मामला?

यह मामला गुजरात के आनंद जिले में स्थित बामणवा प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में काम करने वाली एक महिला स्वास्थ्यकर्मी के खिलाफ लगाए गए आरोपों से जुड़ा है। उसके खिलाफ एक ASHA फैसिलिटेटर और चार अन्य ASHA कार्यकर्ताओं ने शिकायत की थी।

शिकायत के अनुसार, करीब तीन साल तक ASHA कार्यकर्ताओं को सरकारी काम और स्वास्थ्य से जुड़ी आधिकारिक बैठकें खत्म होने के बाद भी रुकने के लिए कहा जाता था। इसके बाद उनसे ईसाई मजहब के बारे में बात की जाती थी, उन्हें बाइबल पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया जाता था और बताया जाता था कि हिंदू धर्म में की जाने वाली मूर्ति पूजा गलत है।

शिकायत में आगे कहा गया कि महिला अपने मोबाइल फोन पर ASHA कार्यकर्ताओं को यूट्यूब पर ईसाई मजहब से जुड़े वीडियो दिखाती थी। इन वीडियो में जीसस क्राइस्ट के वापस आने, मौजूदा दुनिया के खत्म होने के बाद एक नई दुनिया बनने और ईसाई मजहब की अलग-अलग शिक्षाओं के बारे में बताया जाता था।

महिलाओं ने कहा कि जब हिंदू कर्मचारी वीडियो देखने या ऐसी चर्चाओं को सुनने से इनकार करती थीं, तो उन्हें काम से जुड़े परिणाम भुगतने की धमकी दी जाती थी। शिकायत के अनुसार, उन्हें बताया जाता था कि उनका मासिक भत्ता या वेतन काटा जा सकता है और उनकी नौकरी भी जा सकती है।

शिकायत में कहा गया कि इससे महिलाएँ लगातार मानसिक दबाव में रहती थीं। मामले में वडोदरा की एक घटना का भी जिक्र किया गया है। महिलाओं को बताया गया था कि उन्हें सरकारी स्वास्थ्य विभाग की एक बैठक के लिए वहाँ ले जाया जा रहा है। लेकिन वडोदरा पहुँचने के बाद उन्हें पता चला कि वहाँ एक बड़ा ईसाई कार्यक्रम आयोजित किया गया था।

शिकायत के अनुसार, महिलाओं को सरकारी बैठक के नाम पर वहाँ ले जाया गया था, जहाँ धर्मांतरण की कोशिश के तहत नाटक और भाषण आयोजित किए गए थे।

आरोपित महिला ने किया हाई कोर्ट का रुख

मामले में आरोपित महिला ने FIR और चार्जशीट को रद्द कराने की माँग को लेकर गुजरात हाई कोर्ट का रुख किया। उसके वकील ने कोर्ट को बताया कि वह Jehovah’s Witnesses की अनुयायी है और बाइबल की शिक्षाओं का प्रचार करना उसकी धार्मिक मान्यता का हिस्सा है।

वकील ने दलील दी कि संविधान का अनुच्छेद 25 हर व्यक्ति को अपने धर्म को मानने, उसका पालन करने और उसका प्रचार करने का मौलिक अधिकार देता है। बचाव पक्ष ने कहा कि किसी को धर्म परिवर्तन के लिए न तो मजबूर किया गया और न ही कोई लालच दिया गया।

उसका कहना था कि महिला ने केवल कर्मचारियों को मजहबी साहित्य दिया था और उन्हें सार्वजनिक रूप से उपलब्ध सामग्री दिखाई थी। वकील ने यह भी कहा कि वडोदरा का कार्यक्रम स्वेच्छा से आयोजित था। बचाव पक्ष ने आगे दावा किया कि शिकायत व्यक्तिगत दुश्मनी की वजह से दर्ज कराई गई थी।

उसने यह सवाल भी उठाया कि क्या शिकायतकर्ता दूसरे कर्मचारियों की ओर से शिकायत दर्ज करा सकती थी। एक और दलील यह दी गई कि जिला मजिस्ट्रेट से पहले अनुमति लिए बिना चार्जशीट दाखिल की गई थी और इसलिए पूरी कार्रवाई को रद्द कर दिया जाना चाहिए।

पुलिस की जाँच और बैंक लेन-देन

सरकारी वकील ने याचिका का विरोध किया और कोर्ट को जाँच के दौरान जुटाए गए सबूतों के बारे में बताया। सरकार के अनुसार, पुलिस को पता चला कि शिकायतकर्ता और अन्य महिलाओं को What the Holy Bible Teaches नाम की बाइबल की प्रतियाँ दी गई थीं। आरोपित महिला का मोबाइल फोन और लैपटॉप भी जाँच के लिए FSL भेजा गया है।

सरकारी वकील ने कहा कि आरोपित महिला सीधे Jehovah’s Witnesses of India (JWI) नाम के संगठन से जुड़ी हुई थी। सरकार ने बताया कि संगठन के साथ उसके संबंधों और वित्तीय लेन-देन की जाँच में करोड़ों रुपए के लेन-देन का भी पता चला है।

कोर्ट के सामने रखी गई जानकारी के अनुसार, JWI के एक खाते से आरोपित महिला के ICICI बैंक खाते में 10 करोड़ रुपए से अधिक जमा किए गए थे। बाद में इस खाते से 7 करोड़ रुपए से अधिक निकाले गए। इसी तरह JWI की ओर से उसके HDFC बैंक खाते में 20 करोड़ रुपए से अधिक जमा किए गए थे, जिनमें से 19 करोड़ रुपए से अधिक निकाल लिए गए।

पुलिस ने आरोपित महिला के घर की तलाशी के दौरान बड़ी मात्रा में ईसाई मजहब और बाइबल से संबंधित साहित्य भी बरामद किया। बरामद सामग्री में गुजराती और हिंदी भाषा की बाइबल की किताबें, बाइबल के अध्ययन और Jehovah’s Witnesses से संबंधित किताबें, साथ ही 2025 Great Convention–Devotion to Jehovah से जुड़े पर्चे शामिल थे। पुलिस ने कई किताबें, डायरियाँ और नोटबुक भी बरामद कीं।

गुजरात हाई कोर्ट ने क्या कहा?

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद गुजरात हाई कोर्ट ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 25 लोगों को अपने धर्म को मानने और उसका प्रचार करने का अधिकार देता है। हालाँकि यह अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अधीन है।

कोर्ट ने कहा कि स्वेच्छा से अपने धर्म का प्रचार करने पर कोई रोक नहीं है। लेकिन जब इसमें बल, धोखा, लालच, धमकी या अधिकार का गलत इस्तेमाल शामिल हो, तो ऐसी गतिविधियों को संविधान के तहत सुरक्षा नहीं मिलती और ये अपराध हो सकती हैं।

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी दूसरे धर्म या मूर्ति पूजा की आलोचना करते हुए अपने संप्रदाय को श्रेष्ठ बताना भारतीय धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों के खिलाफ है। कोर्ट ने इस दलील को भी खारिज कर दिया कि शिकायतकर्ता को मामला दर्ज कराने का अधिकार नहीं था।

कोर्ट ने कहा कि अवैध धर्म परिवर्तन से जुड़े गंभीर मामलों में ‘पीड़ित व्यक्ति’ यानी ‘Aggrieved person’ के अर्थ को व्यापक रूप से समझना होगा। कोर्ट ने कहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए कोई भी पीड़ित व्यक्ति या संगठन पुलिस के पास जा सकता है।

हाई कोर्ट ने जिला मजिस्ट्रेट से पहले अनुमति लेने से जुड़ी दलील को भी खारिज कर दिया। राज्य सरकार ने ऐसे दस्तावेज कोर्ट के सामने पेश किए, जिनसे पता चला कि आनंद के जिला मजिस्ट्रेट ने 6 मार्च 2026 को जरूरी कानूनी मंजूरी दे दी थी।

कोर्ट ने यह भी कहा कि हालांकि आरोपी महिला के पास ASHA कार्यकर्ताओं के वेतन पर सीधा नियंत्रण नहीं था, लेकिन वह उनकी सुपरवाइजर थी। उसने अपने पद का इस्तेमाल ASHA कार्यकर्ताओं को प्रभावित करने या उन पर दबाव बनाने के लिए किया था या नहीं, इसकी जाँच ट्रायल कोर्ट में की जाएगी।

हाई कोर्ट ने कहा कि जाँच के दौरान जुटाए गए सबूत पहली नजर में यह दिखाते हैं कि अपराध बनता है। इसलिए Bhajan Lal मामले में तय किए गए सिद्धांतों के तहत इस चरण पर FIR और चार्जशीट को रद्द नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने महिला की याचिका खारिज कर दी और ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि वह मामले की स्वतंत्र रूप से और कानून के अनुसार सुनवाई करे।

FCRA Bill को ‘ईसाई संस्थानों की लूट’ बताने वाले बिशप जोसेफ डिसूजा के दावों की खुली पोल, द वायर ने फिर फैलाया वही नैरेटिव: कानून में पूजा स्थलों की सुरक्षा का स्पष्ट प्रावधान

वामपंथी प्रोपेगेंडा पोर्टल द वायर ने शुक्रवार (7 अगस्त 2026)  को एक क्लिप शेयर की, जिसमें ऑल इंडिया क्रिश्चियन काउंसिल (AICC) का अध्यक्ष और गुड शेफर्ड चर्च ऑफ इंडिया के प्राइमेट आर्कबिशप जोसेफ डिसूजा फॉरेन कॉन्ट्रिब्यूशन अमेंडमेंट बिल, 2026 (FCRA Bill 2026) को ईसाई संस्थानों की लूट और चोरी और संघ परिवार का एजेंडा बताते हुए नजर आया।

जिस पॉडकास्ट में करण थापर ने जोसेफ डिसूजा का इंटरव्यू लिया था, वह 4 महीने पहले 2 अप्रैल 2026 को प्रसारित हुआ था। डिसूजा जो घोटाले का आरोपित और विदेशी फंडिंग प्राप्त ईसाई पादरी हैं, उसको द वायर बार-बार FCRA संशोधनों को लेकर मोदी सरकार को निशाना बनाने के लिए इस्तेमाल कर रहा है। ये संशोधन संदिग्ध और अवैध फंडिंग, अवैध धर्मांतरण और अन्य गतिविधियों पर शिकंजा कसेंगे।

क्लिप शेयर करके द वायर उन आरोपों और झूठ की मुहिम में शामिल हो गया, जिन्हें कई निहित स्वार्थ वाले समूह FCRA बिल के खिलाफ लगातार आगे बढ़ा रहे हैं। यह क्लिप डिसूजा द्वारा पत्रकार करण थापर को दिए गए एक इंटरव्यू से ली गई थी।

इंटरव्यू की शुरुआत थापर इस घोषणा के साथ करता हैं कि FCRA बिल में कठोर और देखने में असंवैधानिक उपाय शामिल हैं, जिस पर डिसूजा बिल को लेकर अपने खुद के निराधार दावे जोड़ता हैं।

द वायर पर घोटाले के आरोपित जोसेफ डिसूजा ने FCRA को कहा ईसाई संस्थानों की लूट और चोरी

थापर की बात से सहमति जताते हुए डिसूजा ने दावा किया कि अगर यह बिल पास हो जाता है, तो इससे वह संभव हो सकेगा जिसे भारतीय ईसाई समुदाय और वैश्विक ईसाई समुदाय की कानूनी लूट को बढ़ावा मिलेगा।

अपने गंभीर आरोप को समझाते हुए डिसूजा ने दावा किया कि यह बिल ईसाई संस्थानों की संपत्तियों और परिसंपत्तियों पर कब्जा करने की एक चाल है। उसने आगे दावा किया कि बिल के तहत प्रस्तावित डेजिग्नेटिड अथॉरिटी को उन संगठनों के विदेशी योगदान और संपत्तियों पर स्थायी नियंत्रण लेने की व्यापक शक्तियाँ दी गई हैं, जिनका विदेशी योगदान पंजीकरण रद्द, समर्पित या समाप्त हो जाता है।

जोसेफ डिसूजा ने आगे दावा किया कि यह बिल प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन करता है, क्योंकि डेजिग्नेटिड अथॉरिटी के फैसले न्यायिक समीक्षा या न्यायिक जाँच के अधीन नहीं हैं।

ईसाई चर्च के प्रति RSS की ऐतिहासिक दुश्मनी

डिसूजा ने आरोप लगाया कि सरकार इस प्रावधान का गलत इस्तेमाल कर सकती है। वह किसी संगठन के नवीनीकरण आवेदन को समय पर मंजूर नहीं करके या उस पर कार्रवाई नहीं करके ऐसा कर सकती है, जिससे संगठन की संपत्तियाँ जब्त हो जाएँगी।

उसने FCRA बिल को अल्पसंख्यक अधिकारों पर सीधा हमला बताते हुए इसे देश के ईसाई संस्थानों को हड़पने के RSS के एजेंडे को आगे बढ़ाने वाला बताया।

उउसने बिल लाने के पीछे सरकार की वैचारिक मंशा होने का आरोप लगाया। उसने दावा किया कि RSS की मदर टेरेसा और ईसाई चर्च के प्रति ऐतिहासिक दुश्मनी ही FCRA बिल के पीछे की वजह है।

बिल को अल्पसंख्यक अधिकारों के लिए खतरा बताते हुए आर्कबिशप ने इसकी तुलना नाजी जर्मनी में बनाए गए यहूदी मामलों के कार्यालय, जिसे रेफरेट IV B4 कहा जाता था, से की। यह कार्यालय यहूदी लोगों की संपत्तियों, संस्थानों, सिनेगॉग और उनकी हर चीज को हड़पने के लिए बनाया गया था।

ईसाई समुदाय को कमजोर करना

आर्कबिशप ने आरोप लगाया कि सरकार की आर्थिक लूट करने और ईसाई समुदाय को कमजोर करने की साजिश को FCRA बिल का रूप दिया गया है। उसने विदेशी फंडिंग से जुड़ी राष्ट्रीय सुरक्षा की चिंताओं को खारिज कर दिया और RSS पर आतंकवाद का आरोप लगाया।

उसने दावा किया कि ईसाई संगठनों की विदेशी फंडिंग की जाँच जरूरी नहीं है, क्योंकि ईसाई आतंकवादी गतिविधियों में शामिल नहीं हैं। डिसूजा ने इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि बिल का उद्देश्य चर्चों में आने वाले उस विदेशी धन और उससे होने वाली आय को नियंत्रित करना है, जिसका इस्तेमाल धर्मांतरण के लिए किया जाता है।

उसने आगे दावा किया कि भारत में ईसाई संगठन धर्मांतरण की गतिविधियों में शामिल होते हैं और सरकार को आधुनिक ईसाई धर्म की कोई समझ नहीं है। उसने धमकी दी कि बिल लाकर सरकार वैश्विक स्तर पर और संयुक्त राष्ट्र में एक बड़ा विवाद खड़ा कर देगी।

उसने कहा कि इस कार्रवाई के वैश्विक स्तर पर असर होंगे और अंतरराष्ट्रीय संगठनों की ओर से प्रतिक्रिया और विरोध का सामना करना पड़ेगा। आर्कबिशप ने धमकी दी कि अगर बिल संसद में पास हो गया, तो ईसाई संगठन देश और दुनिया की अदालतों का रुख करेंगे, अपने वैश्विक साझेदारों को उनकी अदालतों में जाने देंगे।

जोसेफ डिसूजा – हिंदुओं के खिलाफ नफरत का अभियान चलाने वाला व्यक्ति, 296.6 करोड़ रुपए निजी बैंक खातों में डायवर्ट करने का आरोप

डिसूजा खुद को दलितों और हाशिए पर मौजूद समुदायों की आवाज के रूप में पेश करता हैं, लेकिन FCRA बिल पर चर्चा में वह कोई निष्पक्ष आवाज नहीं है। अतीत में उन्हें विदेशी फंडिंग और वित्तीय अनियमितताओं को लेकर जाँच का सामना करना पड़ा है।

वह और उसके पश्चिमी सहयोगी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह नैरेटिव आगे बढ़ाने के लिए कुख्यात है कि वो भारत के उन उत्पीड़ित, पिछड़े या अछूत समुदायों से आता है, जिन्होंने बाद में ईसाई धर्म अपना लिया।

गुड शेफर्ड चर्च और उससे जुड़े संगठनों के तहत स्कूलों, अस्पतालों और सामाजिक सेवा संगठनों समेत उसके संस्थानों के नेटवर्क को विदेशी फंडिंग मिलती है और हजारों अन्य NGO की तरह पिछले वर्षों में FCRA अनुपालन जाँच का सामना कर चुका है।

जोसेफ डिसूजा ने दलित फ्रीडम नेटवर्क की सह-स्थापना की थी, जिसका बाद में नाम बदलकर डिग्निटी फ्रीडम नेटवर्क (DFN) कर दिया गया। यह नेटवर्क अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और यूनाइटेड किंगडम में प्रमुख शाखाएँ संचालित करता है।

इन संगठनों से जुड़ी उसकी वेबसाइट और प्रचार सामग्री भारत की बेहद नकारात्मक तस्वीर पेश करती हैं और भारत में दलितों और ईसाइयों को कीड़ों की तरह मारा जा रहा है जैसे झूठ फैलाती हैं।

तेलंगाना CID और प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने मनी लॉन्ड्रिंग और वित्तीय गबन से जुड़े गंभीर आरोपों के संबंध में आरोप लगाए जाने के बाद जोसेफ डिसूजा जाँच के घेरे में आया।

उस पर और उसके बेटे जोश लॉरेंस डिसूजा पर गरीब दलित बच्चों की मुफ्त शिक्षा और कल्याण के लिए जुटाए गए लगभग 296.6 करोड़ रुपए के विदेशी फंड को फर्जी बिलों और शेल कंपनियों के जरिए निजी बैंक खातों, फिक्स्ड डिपॉजिट और महंगी रियल एस्टेट में निवेश करने के लिए डायवर्ट करने का आरोप लगाया गया।

डिसूजा उन प्रमुख लोगों में से एक हैं, जिन्होंने भारत को बदनाम करने के लिए ईसाइयों के खिलाफ बढ़ती नफरत का झूठ फैलाया। ऑपइंडिया ने डिसूजा, उसके घोटाले और उसके विदेशी फंडिंग पर विस्तृत रिपोर्ट की है।

आर्कबिशप के झूठ का पर्दाफाश

FCRA बिल को लेकर डर फैलाने वाली बातें उन वर्गों की ओर से आ रही हैं, जिन्हें नए कानून के तहत वैध जाँच का सामना करना पड़ सकता है। हालाँकि वास्तविकता उन बातों से काफी अलग है, जिस तरह कुछ निहित स्वार्थ वाले समूह इसे पेश कर रहे हैं।

प्रस्तावित बिल स्पष्ट रूप से सभी पूजा स्थलों को सरकारी कब्जे, धर्मनिरपेक्षीकरण या किसी दूसरे उद्देश्य में बदले जाने से सुरक्षा देता है।

सरकार को चर्चों और धार्मिक संस्थानों पर कब्जा करने की व्यापक शक्तियाँ दिए जाने के दावों की सच्चाई का पता प्रस्तावित बिल को सीधे पढ़कर लगाया जा सकता है। प्रस्तावित बिल में एक प्रावधान इस प्रकार है:

“उप-धारा (6) में निहित किसी भी बात के बावजूद, नामित प्राधिकरण (डेजिग्नेटिड अथॉरिटी), जहाँ उसके पास स्थायी रूप से निहित कोई संपत्ति या उसका कोई हिस्सा पूजा स्थल है, वहाँ ऐसी संपत्ति या उसके हिस्से का प्रबंधन या संचालन ऐसे व्यक्ति को, ऐसे तरीके से और ऐसी शर्तों पर सौंपेगा, जो निर्धारित की जा सकती हैं और यह सुनिश्चित करेगा कि ऐसे पूजा स्थल का धार्मिक स्वरूप बरकरार रहे।“

जैसा कि इस प्रावधान से स्पष्ट है, डेजिग्नेटिड अथॉरिटी किसी चर्च के भौतिक पूजा स्थल को तोड़ या बंद नहीं कर सकता, भले ही वह अपना विदेशी योगदान लाइसेंस खो दे।

प्रस्तावित कानून के तहत डेजिग्नेटिड अथॉरिटी  की भूमिका केवल उन विदेशी फंड से जुड़ी कमर्शियल या विकास संबंधी परिसंपत्तियों के प्रबंधन तक सीमित है, जब FCRA पंजीकरण रद्द, समर्पित या समाप्त हो जाता है। इसका उद्देश्य सार्वजनिक सेवाओं की निरंतरता सुनिश्चित करना है।

डिसूजा के दावे के विपरीत, डेजिग्नेटिड अथॉरिटी  द्वारा पारित कोई भी आदेश प्रशासनिक समीक्षा और जिला न्यायाधीश के समक्ष न्यायिक अपील के अधीन रहेगा। इसके अलावा, केंद्र की पूर्व अनुमति के बिना राज्य स्तर की एजेंसियों को स्थानीय मुकदमे शुरू करने से रोक दिया गया है। यह मनमानी स्थानीय कार्रवाई के खिलाफ एक स्पष्ट सुरक्षा उपाय है।

FCRA बिल ईसाई धर्म समेत किसी भी धर्म के लिए विदेशी फंडिंग पर रोक नहीं लगाता। चर्च, मंदिर, मस्जिद और गुरुद्वारे समेत पूजा स्थल वास्तविक धार्मिक कार्यों के लिए विदेशी दान प्राप्त करते रहेंगे।

बिल तभी लागू होता है, जब प्राप्त विदेशी फंड का इस्तेमाल उस तरीके से नहीं किया जाता, जैसा घोषित किया गया था। इससे संबंधित संगठन अपना लाइसेंस या FCRA पंजीकरण खो सकता है।

केंद्र सरकार बिल को लेकर हितधारकों की चिंताओं को दूर करने के लिए सभी संबंधित पक्षों से संपर्क कर रही है। सरकार ने बार-बार स्पष्ट किया है कि कानून किसी भी तरह के धार्मिक पक्षपात से मुक्त है और इसका स्वरूप गैर-भेदभावपूर्ण है।

जोसेफ डिसूजा पर खुद अधिकारियों ने FCRA नियमों के उल्लंघन का लगाया है आरोप

जाँचकर्ताओं के अनुसार, गृह मंत्रालय (MHA) ने नेटवर्क से जुड़े प्रमुख संगठनों के FCRA लाइसेंस नियामकीय उल्लंघनों के कारण पहले निलंबित और बाद में रद्द कर दिए थे।

इसके बावजूद विदेशी फंड अप्रत्यक्ष माध्यमों से भारत में आते रहे। FCRA लाइसेंस रद्द होने का मतलब था कि संगठन सीधे विदेशी दान प्राप्त नहीं कर सकते थे। जाँचकर्ताओं ने आरोप लगाया कि इसके बाद डिसूजा ने अपनी व्यावसायिक इकाई OMBF (ओम बुक्स फाउंडेशन) का इस्तेमाल एक वैकल्पिक रास्ते के रूप में किया।

आरोपों के अनुसार, प्रिंटिंग और पब्लिशिंग सेवाओं के लिए बढ़े-चढ़े और फर्जी बिल तैयार किए गए और उन्हें विदेशों में मौजूद संबंधित या कथित रूप से संबद्ध संगठनों को भेजा गया।

इन लेनदेन को वैध व्यावसायिक गतिविधियों के रूप में पेश किया गया, जिससे यह दिखाया जा सके कि विदेशी संगठनों ने किताबों और प्रकाशनों का ऑर्डर दिया था। जाँचकर्ताओं का दावा है कि इस व्यवस्था का इस्तेमाल सीधे विदेशी योगदान पर लगी पाबंदियों के बावजूद विदेशी फंड को भारत में भेजते रहने के लिए किया गया।

जाँचकर्ताओं ने आरोप लगाया कि ऊपर बताई गई गतिविधियों के जरिए जुटाए गए लगभग 296.6 करोड़ रुपए को रियल एस्टेट और अन्य परिसंपत्तियों में निवेश के माध्यम से मनी लॉन्ड्रिंग की गई।

प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) के तहत जाँच करते हुए प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने पाया कि जोसेफ डिसूजा, उसके बेटे जोश लॉरेंस डिसूजा और करीबी सहयोगियों ने इन गतिविधियों से जुड़े फंड का इस्तेमाल करके महंगे जमीन के टुकड़े, कमर्शियल संपत्तियाँ और लग्जरी विला खरीदे थे।

जिसे ED ने अपराध से अर्जित आय (proceeds of crime) के रूप में वर्गीकृत किया, उस पर कार्रवाई के तहत ED ने 12 प्रमुख अचल संपत्तियों को अटैच और फ्रीज किया। इनकी संयुक्त बाजार कीमत 15 करोड़ रुपए से अधिक आंकी गई थी।

इस वित्तीय नेटवर्क का संचालन मॉडल सीधा, लेकिन जटिल था, विदेशी दर्शकों के सामने भारत की गरीबी और सामाजिक समस्याओं को चिंताजनक तरीके से पेश करना, ताकि दान आकर्षित किया जा सके।

इसके बाद इन फंड को कागजी लेनदेन और फर्जी बिलों के जरिए निजी संपत्तियों और ऐशो-आराम वाली जीवनशैली में डायवर्ट किया गया, बजाय इसके कि इनका इस्तेमाल उन लाभार्थियों के लिए किया जाता, जिनके लिए ये फंड जुटाए गए थे।

राजनीतिक संबंध, भारतीय लेफ्ट-लिबरल इकोसिस्टम और कॉन्ग्रेस के साथ वैचारिक तालमेल

जोसेफ डिसूजा के आलोचकों का कहना है कि उसका प्रभाव मजहबी गतिविधियों से आगे तक फैला हुआ है और उसने भारत के राजनीतिक तथा मीडिया इकोसिस्टम के कुछ हिस्सों के साथ करीबी संबंध बनाए रखे हैं।

उसका दावा है कि जब भी वित्तीय आरोपों से जुड़ी कानूनी कार्रवाई तेज होती है, तो राजनीतिक समर्थन तंत्र ऐसी कार्रवाइयों को राजनीतिक या वैचारिक रूप से प्रेरित बताने के लिए सक्रिय हो जाते हैं। जोसेफ डिसूजा का वरिष्ठ कॉन्ग्रेस नेतृत्व के साथ संबंध कई वर्षों पुराना है।

2004 के आम चुनाव के बाद, जब अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार चुनाव हार गई और सोनिया गाँधी के नेतृत्व में यूनाइटेड प्रोग्रेसिव अलायंस (UPA) सत्ता में आया, तब डिसूजा ने अमेरिका में चर्च नेटवर्क को पत्र लिखकर इस नतीजे को दैवीय न्याय (Divine Justice) और एक बड़ा चमत्कार बताया था।

उस समय डिसूजा ऑल इंडिया क्रिश्चियन काउंसिल के वैश्विक अध्यक्ष के रूप में काम कर रहा था। ब्रेकिंग इंडिया  के अनुसार, इन दावों और संबंधित दस्तावेजों पर किताब के अध्याय 8 में चर्चा की गई है।

यह हाल के घटनाक्रमों को भी लगातार राजनीतिक तालमेल के सबूत के रूप में पेश करता है। वक्फ प्रशासन से जुड़े सुधारों पर बहस के दौरान राहुल गाँधी ने कुछ बिशपों और चर्च समूहों द्वारा उठाई गई चिंताओं को दोहराया और कहा कि वक्फ बिल के बाद सरकार संभावित रूप से चर्च की संपत्तियों को निशाना बना सकती है।

इस तरह के राजनीतिक बयान जोसेफ डिसूजा जैसे लोगों से जुड़ी ED और CID की चल रही जाँच को मजहबी उत्पीड़न के मुद्दे के रूप में पेश करने का काम करते हैं, जिससे एक राजनीतिक सुरक्षात्मक नैरेटिव तैयार होता है। हालाँकि यह स्थापित कानूनी निष्कर्ष के बजाय राजनीतिक व्याख्या और अलग-अलग दृष्टिकोणों का मामला है।

मूल रूप से, द वायर ने न केवल एक ऐसे बिशप को मंच दिया, बल्कि बार-बार उनके निराधार आरोपों और खुले झूठ को भी आगे बढ़ाया, जिन्होंने ईसाई उत्पीड़न को लेकर झूठ फैलाते हुए भारत विरोधी और हिंदू विरोधी अभियान चलाया, जिन पर करोड़ों रुपए के घोटाले का आरोप है और जिन्होंने खुद FCRA नियमों का उल्लंघन किया है। यह सब प्रस्तावित FCRA संशोधनों के बारे में झूठ फैलाने के लिए किया गया, जो उसके जैसे घोटालेबाजों पर शिकंजा कसेंगे।

कॉन्ग्रेस-NSUI को घुसाकर छात्र आंदोलन को कमजोर कर रही सरकार, छात्रों ने कहा- हमें बाँटने की हो रही कोशिश: सुप्रीम कोर्ट पहुँचा मामला, CBI जाँच की माँग

झारखंड में सरकारी नौकरियों की परीक्षाओं में धांधली और अनियमितताओं के खिलाफ चल रहा छात्रों का आंदोलन लगातार जारी है। राजधानी राँची के जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में पिछले करीब 15 दिनों से लगातार अनिश्चितकालीन धरना और भूख हड़ताल कर रहे युवाओं और राज्य सरकार के बीच हुई बातचीत का अब तक कोई ठोस परिणाम नहीं निकल सका है।

पहली वार्ता के बाद समाधान की उम्मीद लगाए बैठे अभ्यर्थियों को तब बड़ा झटका लगा जब राज्य सरकार की नीयत और कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े होने लगे। आंदोलनकारी छात्र नेताओं ने बाकायदा एक प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाकर सरकार पर आरोप लगाया है कि वह उनके आंदोलन को कुचलने और बाँटने की राजनीति कर रही है।

छात्रों का कहना है कि सरकार बातचीत के नाम पर महज समय बर्बाद कर रही है और आंदोलन में दरार पैदा करने की कोशिश की जा रही है। इस बीच JPSC-JSSC परीक्षा में हुई गड़बड़ियों का मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुँच गया है, जहाँ परीक्षा रद्द करने और पूरे मामले की CBI जाँच की माँग की गई है। 

झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) और झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (JSSC) की परीक्षाओं में पारदर्शिता की माँग को लेकर छात्र लगातार आंदोलनरत हैं। आंदोलन के दबाव में आकर राज्य सरकार ने छात्र प्रतिनिधियों को बातचीत के लिए बुलाया था। छात्र नेताओं के अनुसार, सरकार के प्रतिनिधिमंडल के साथ पहले दौर की बैठक आयोजित की गई।

इस वार्ता के दौरान अभ्यर्थियों के प्रतिनिधिमंडल ने अपनी माँगों को विस्तार से रखा। सरकारी प्रतिनिधिमंडल ने छात्रों की बातों को सुनने के बाद यह भरोसा दिलाया था कि इन माँगों को मुख्यमंत्री के समक्ष रखा जाएगा और जल्द ही दूसरे दौर की निर्णायक वार्ता होगी, लेकिन इसके बाद भी कोई समाधान सामने नहीं आ सका, जिससे अभ्यर्थियों में भारी असंतोष फैल गया।

प्रदर्शनकारी नेताओं का कहना है कि सरकार ने उनकी बात सुनी जरूर है, लेकिन किसी माँग पर तत्काल कार्रवाई या स्पष्ट समयसीमा नहीं दी गई है। इसलिए आंदोलन जारी रहेगा।

प्रेस कॉन्फ्रेंस में फूटा छात्रों का गुस्सा, सरकार की नीयत पर उठाए सवाल 

वार्ता के नाम पर किसी ठोस फैसले तक न पहुँचने से आक्रोशित आंदोलनकारी छात्रों ने राँची में प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित कर सरकार की मंशा की पोल खोली। छात्र नेता रवींद्र पासवान ने संवाददाताओं से बात करते हुए कहा कि झारखंड भर में फैलाए जा रहे भ्रम और अफवाहों को दूर करने के लिए उन्हें मीडिया के सामने आना पड़ा है।

रवींद्र पासवान ने कहा कि पिछले 15 दिनों से प्रदेश का युवा सड़क पर बैठकर अपने अधिकार और भविष्य की लड़ाई लड़ रहा है। पहले दौर की वार्ता में छात्रों ने बेहद संयम और तर्कों के साथ सरकार के सामने अपनी माँगें रखी थीं। छात्रों को उम्मीद थी कि सरकार उनकी जायज माँगों पर संवेदनशीलता दिखाएगी, लेकिन इसके विपरीत सरकार के नए कदमों ने छात्रों को बेहद निराश और दुखी कर दिया है।

छात्र नेताओं ने सीधे तौर पर कहा कि सरकार जिस तरह का रवैया अपना रही है, उससे उसकी नीयत साफ नहीं लगती और ऐसा लगता है कि युवाओं के भविष्य के साथ अब भी खिलवाड़ किया जा रहा है। 

NSUI और कॉन्ग्रेस को बीच में लाने और आंदोलन में विभाजन की साजिश का आरोप 

प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान छात्र नेताओं ने सरकार द्वारा खेले जा रहे राजनीतिक दाँव-पेच पर कड़ा ऐतराज जताया। छात्र नेता रवींद्र पासवान ने आरोप लगाया कि पहले दौर की वार्ता के बाद अचानक सरकार ने छह से सात अन्य छात्र संगठनों से ज्ञापन स्वीकार करने का नाटक शुरू कर दिया।

उन्होंने सवाल उठाया कि जब वास्तविक अभ्यर्थी 15 दिनों से बारिश और धूप में सड़कों पर आंदोलन और भूख हड़ताल कर रहे हैं, तब अचानक अन्य संगठनों को सामने लाने की क्या वजह है? उन्होंने विशेष रूप से सत्ताधारी गठबंधन में शामिल कॉन्ग्रेस की छात्र इकाई नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (NSUI) को बीच में घसीटने पर कड़ा हमला बोला।

पासवान ने सवाल किया कि NSUI सत्ताधारी दल का हिस्सा है, वे किस तरह की माँगें करेंगे? क्या वे सरकार की नीतियों के खिलाफ सड़क पर उतरकर संघर्ष कर रहे थे? छात्रों का आरोप है कि सरकार इस छात्र आंदोलन को दो-तीन अलग-अलग गुटों में बाँटकर कमजोर करना चाहती है ताकि मुख्य माँगों से ध्यान भटकाया जा सके। 

नेहा बोरा के ढपली गैंग ने भी बनाया अपना अलग मंच

इसी बीच ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की ढपली गैंग झारखंड की सोरेन सरकार के कंट्रोल्ड विपक्ष की तरह काम कर रही है। यहाँ इनलोंगों ने अपना अलग ही मंच तैयार किया हुआ है, जबकि प्रदर्शन कर रहे अभ्यर्थियों ने इन्हें अपने मंच पर जगह देने से साफ इंकार किया था।

गौरतलब है कि शुक्रवार (7 अगस्त 2026) को AISA की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा को जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में प्रदर्शन कर रहे अभ्यर्थियों को संबोधित करने के दौरान विरोध का सामना करना पड़ा था। प्रदर्शनकारियों ने उसे मंच से नीचे उतार दिया था और उन पर स्याही फेंकी थी।

बोरा अभ्यर्थियों के समर्थन में प्रदर्शन स्थल पर पहुँची थीं। हालाँकि उनकी मौजूदगी का प्रदर्शनकारियों के एक वर्ग ने विरोध किया। आंदोलनकारी लगातार यह कहते रहे हैं कि उनका आंदोलन किसी भी राजनीतिक दल या बाहरी संगठन से पूरी तरह अलग रहेगा।

जयराम महतो का निर्जला अनशन, सरकार पर लगाए गंभीर आरोप

छात्रों के आंदोलन को समर्थन देते हुए डुमरी से विधायक और JLKM नेता जयराम महतो रविवार (9 अगस्त 2026) की सुबह पुराना विधानसभा परिसर के बाहर 24 घंटे के निर्जला अनशन पर बैठ गए हैं। उन्होंने कहा है कि इस दौरान वह पानी तक ग्रहण नहीं करेंगे।

महतो ने कहा है कि विधायक होने के नाते छात्रों के मुद्दे पर अपनी जिम्मेदारी निभाना जरूरी है और उनका यह कदम आंदोलन के समर्थन में सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश है। उन्होंने सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा कि उन्हें इस मामले की सच्चाई सामने आने का डर है।

महतो के मुताबिक, अगर बड़े पैमाने पर सीटों की खरीद-फरोख्त जैसी बातें सामने आ रही हैं तो इसकी निष्पक्ष जाँच जरूरी है। जयराम महतो ने यह भी आरोप लगाया कि सरकार आंदोलन कर रहे सभी छात्र संगठनों के साथ समान रूप से बातचीत नहीं कर रही है और सरकार की बातचीत मुख्य रूप से अपने गठबंधन से जुड़े छात्र संगठनों के साथ हो रही है।

10 अगस्त को ‘विधानसभा मार्च’ का ऐलान 

सरकार की ओर से कथित तौर पर आंदोलन को कमजोर करने की कोशिशों के बावजूद छात्र नेताओं ने दोटूक शब्दों में कहा कि झारखंड का पूरा छात्र समाज एकजुट है। छात्र नेताओं ने स्पष्ट किया कि किसी भी तरह के राजनीतिक षड्यंत्र या विभाजनकारी चालों से छात्र आंदोलन डगमगाने वाला नहीं है, बल्कि पूरा अभ्यर्थी वर्ग एक ही मंच पर मुस्तैदी से खड़ा है।

उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि सरकार ने समय रहते उनकी संवैधानिक और जायज माँगों को आधिकारिक रूप से स्वीकार नहीं किया, तो आंदोलन उग्र रूप ले लेगा। इसी कड़ी में अभ्यर्थियों ने 10 अगस्त को प्रस्तावित ‘विधानसभा मार्च’ का ऐलान दोहराया है।

छात्र नेताओं का दावा है कि इस मार्च में शामिल होने के लिए पूरे झारखंड के कोने-कोने से लगभग 50 हजार से 1 लाख तक छात्र राँची पहुँचेंगे। यह प्रदर्शन पूरी तरह से निर्णायक होगा और उस दिन सरकार को छात्रों की माँगों पर आधिकारिक मुहर लगानी ही पड़ेगी तथा अपनी जवाबदेही तय करनी होगी। 

JPSC धाँधली का मामला पहुँचा सुप्रीम कोर्ट, आयोग भंग करने की माँग

झारखंड का यह छात्र आंदोलन केवल राँची की सड़कों तक ही सीमित नहीं रहा है, बल्कि परीक्षा में हुई अनियमितताओं का मामला सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुँच गया है। 14वीं JPSC सिविल सर्विसेज प्रारंभिक परीक्षा 2025 में बड़े पैमाने पर हुई गड़बड़ियों, OMR शीट में हेरफेर और धांधली के आरोपों को लेकर सुप्रीम कोर्च में एक जनहित याचिका दायर की गई है।

इस जनहित याचिका में परीक्षा को पूरी तरह से रद्द करने और पूरे मामले की निष्पक्ष जाँच CBI से कराने की माँग की गई है। इसके साथ ही जनहित याचिका में यह भी माँग उठाई गई है कि झारखंड लोक सेवा आयोग की कार्यप्रणाली पूरी तरह संदेहास्पद हो चुकी है, इसलिए वर्तमान आयोग को तत्काल भंग किया जाना चाहिए।

याचिका में सुप्रीम कोर्ट से परीक्षा से जुड़े सभी भौतिक और इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड सुरक्षित रखने का निर्देश देने की भी माँग की गई है। इसमें मूल OMR शीट, कार्बन कॉपी, प्रश्नपत्र, आंसर-की, अटेंडेंस शीट, बायोमेट्रिक रिकॉर्ड, CCTV फुटेज, डिस्पैच रजिस्टर, परीक्षा केंद्रों की रिपोर्ट, स्कैनिंग रिकॉर्ड, मूल्यांकन डेटा और रिजल्ट से जुड़ा डेटा शामिल है।

याचिका में माँग की गई है कि किसी सेवानिवृत्त जज की अध्यक्षता में एक स्वतंत्र विशेषज्ञ समिति का गठन कर नई पारदर्शी परीक्षा आयोजित की जानी चाहिए।

परीक्षा प्रणाली में संस्थागत सुधार और अभ्यर्थियों की प्रमुख माँगें

आंदोलनकारी अभ्यर्थियों ने सरकार और प्रशासन के सामने बेहद स्पष्ट और ठोस माँगें रखी हैं। इनमें प्रमुख रूप से JPSC सिविल सर्विसेज प्रारंभिक परीक्षा को तुरंत रद्द करना, JSSC द्वारा आयोजित विवादित परीक्षाओं की पारदर्शी जाँच कराना और अब तक हुई सभी धाँधलियों की CBI जाँच शामिल है।

इसके अलावा छात्र माँग कर रहे हैं कि OMR शीट की कार्बन कॉपी को सार्वजनिक किया जाए, श्रेणीवार (UR, EWS, BC-I, BC-II, SC, ST) कट-ऑफ अंक जारी किए जाएँ और परीक्षा कराने वाली आरोपित एजेंसियों व माफियाओं के खिलाफ कठोर कानूनी कार्रवाई की जाए।

अभ्यर्थियों का कहना है कि जब तक चयन आयोगों में पारदर्शी सुधार लागू नहीं किए जाते और जवाबदेही तय नहीं होती, तब तक राज्य के लाखों छात्रों का भविष्य अंधकार में ही रहेगा। 

हेडलाइन से फैलाया भ्रम, वीडियो में खुद ही मान ली सच्चाई: जानिए कैसे इंडियन एक्सप्रेस ने RDI फंड पर बेबुनियाद रिपोर्ट छापकर गढ़ा ‘फर्जी घोटाला’

शुक्रवार (7 अगस्त 2027) को इंडियन एक्सप्रेस ने एक ‘खोजी रिपोर्ट’ प्रकाशित की , जिसमें मोदी सरकार की प्रमुख पहल, अनुसंधान, विकास और नवाचार (आरडीआई) कोष में भ्रष्टाचार और हितों के टकराव की जानकारी दी गई।

लेकिन इस लेख की हेडलाइन काफी विवादित थी। इसका शीर्षक था, ‘सरकारी तकनीकी निधि पैनल से जुड़ी कंपनियों को 2,192 करोड़ रुपये की मंजूरी मिली, जिनमें से 62% हिस्सेदारी उन्हीं की है’। अखबार पढ़ने वाले अधिकांश पाठक, जो सिर्फ हेडलाइन देखकर आगे बढ़ जाते हैं वे यह समझ सकते हैं कि मोदी सरकार किसी न किसी तरह से हाई लेवल के घोटाले में शामिल थी।

ऑनलाइन ‘जाँच रिपोर्ट’ पढ़ने में 18 मिनट लगते हैं, जिससे कम ध्यान देने वाले अधिकांश पाठक पढ़ना नहीं चाहते हैं, लेकिन एक बार जब आप किसी ‘बड़े घोटाले’ को उजागर करने की उम्मीद में अपना कीमती समय लगा देते हैं, तो आपको केवल निराशा ही हाथ लगती है।

क्योंकि इससे आपको कुछ भी हासिल नहीं होता। आप खुद से यह सवाल पूछने पर मजबूर हो जाते हैं कि आखिर इन ‘पत्रकारों’ अमिताभ सिन्हा और संदीप सिंह ने ऐसी रिपोर्ट लिखी ही क्यों?

9इंडियन एक्सप्रेस के पेज का स्क्रीनशॉर्ट)

जो लोग इस योजना से परिचित नहीं हैं, उनके लिए बता दें कि आरडीआई फंड भारत के अनुसंधान एवं विकास (आर एंड डी) पारिस्थितिकी तंत्र के लिए एक क्रांतिकारी कदम है। इस योजना के लिए 1 लाख करोड़ रुपये का कोष निर्धारित किया गया था। इसका व्यापक उद्देश्य भारत के नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र में निवेश को गति देना और उभरते क्षेत्रों में कार्यरत भारतीय निजी संस्थाओं को सहयोग प्रदान करना था। इसी उद्देश्य से, इन कंपनियों को दीर्घकालिक, कम लागत वाले ऋण देने और स्वीकृत करने के लिए 12 सदस्यीय निवेश समिति (आईसी) का गठन किया गया है।

समिति के एक सदस्य सरकारी प्रतिनिधि हैं और इसलिए उन्हें मतदान का अधिकार नहीं है। शेष 11 सदस्य प्रौद्योगिकी और निजी इक्विटी के निजी क्षेत्र के विशेषज्ञ हैं और उन्हें मतदान का अधिकार प्राप्त है। इससे स्पष्ट है कि इन विशेषज्ञों की विभिन्न उद्योगों से जुड़ी कई कंपनियों में हिस्सेदारी और हित होंगे।

और यह वह बात थी जिसे मोदी सरकार ने योजना की परिकल्पना करते समय ही भाँप लिया था। इसीलिए सरकार ने हितों के टकराव के मामलों को रोकने के लिए सुरक्षा उपाय लागू किए थे। निम्नलिखित कुछ सुरक्षा उपाय इस प्रकार हैं:-

  • प्रत्येक प्रस्ताव का स्वतंत्र विशेषज्ञ मूल्यांकन।
  • सभी हितों को अनिवार्य रूप से बताया जाना।
  • जहाँ भी किसी प्रकार का संभावित टकराव हो, वहाँ अनिवार्य रूप से स्वयं को अलग रखना होगा।
  • अनुमोदन केवल पात्र सदस्यों के भारी बहुमत से ही संभव है।
  • सरकारी अधिकारी तकनीकी योग्यता का निर्धारण नहीं करते हैं, और सदस्य सचिव को मतदान का अधिकार नहीं होता है।
  • विधिवत प्रक्रिया के बाद अंतिम अनुमोदन प्रौद्योगिकी विकास बोर्ड के पास होता है।
  • इंडियन एक्सप्रेस ने स्वीकार किया है कि इसमें कोई ‘गलत काम’ नहीं हुआ है।
  • तो, उस लेख को पढ़ने में 18 मिनट लगाने से पहले, इंडियन एक्सप्रेस हिंदी का इसी मुद्दे पर बना एक मिनट का वीडियो देखें। इसमें दावा किया गया है कि जिन 15 कंपनियों को ऋण स्वीकृत किए गए थे, उनके निवेशक उस निवेशक समिति के सदस्य थे।

इसके बाद वीडियो में आरोप लगाया गया है कि सरकारी योजना से लाभान्वित होने वाली 7 अन्य कंपनियों के भी निवेशक समिति से संबंध थे। ठीक है, तो क्या हुआ?

क्या इन निवेशकों ने ‘हितों के टकराव’ में लिप्त होकर उन कंपनियों के लिए ऋण स्वीकृत करने में भूमिका निभाई, जिनमें उनके हित निहित थे? इसका उत्तर है नहीं।

और हैरानी की बात है, इंडियन एक्सप्रेस ने भी स्वीकार किया है कि उन निवेशकों ने खुद को इस मामले से अलग कर लिया है। अब, अखबार द्वारा अपने यूट्यूब चैनल पर प्रकाशित इस 6 मिनट के लंबे वीडियो को देखिए। यह भी इसी मुद्दे पर है।

पत्रकार अमिताभ सिन्हा ने स्वीकार किया, “हालात का पहले से ही अनुमान लगा लिया गया था और हितों के टकराव की स्थिति को कम करने के लिए पर्याप्त कदम उठाए गए थे। चयन समिति के सदस्यों को उन कंपनियों के मूल्यांकन प्रक्रिया से खुद को अलग रखना पड़ा जिनमें उनका हित जुड़ा हुआ था और यह प्रक्रिया सभी सदस्यों और सभी कंपनियों के लिए अपनाई गई थी। इसलिए इसमें कोई गड़बड़ी नहीं हुई है।”

वीडियो में आगे उन्होंने स्वीकार किया, “…हितों के टकराव की ऐसी संभावित स्थितियाँ उत्पन्न हो सकती हैं क्योंकि जिन लोगों को इस पारिस्थितिकी तंत्र का अच्छा ज्ञान है या जो इस पारिस्थितिकी तंत्र में काम कर रहे हैं, उनका इस पारिस्थितिकी तंत्र में हित होना स्वाभाविक है। वे इस पारिस्थितिकी तंत्र से जुड़े होंगे। इसलिए इस तरह की स्थिति से निपटने का सबसे अच्छा तरीका है पहले से ही घोषणाएँ करना, उचित पारदर्शिता का पालन करना और अनिवार्य रूप से स्वयं को अलग रखना, और ऐसा लगता है कि इन सभी का पालन किया गया है ।”

इसके बाद साथी ‘पत्रकार’ संदीप सिंह कॉन्ग्रेस राज्यसभा सांसद प्रवीण चक्रवर्ती के इस बयान पर अड़े रहे कि ‘अतिरिक्त सुरक्षा उपाय’ किए जाने चाहिए थे। जैसा कि अपेक्षित था, कोई विशिष्ट सिफारिशें या सुझाव नहीं दिए गए, बल्कि अस्पष्ट राजनीतिक बयानबाजी ही सुनने को मिली।

सिंह इसका फायदा उठाते हुए चतुराई से ‘निजी लोगों को दिया गया सार्वजनिक धन’ वाक्यांश पर जोर देते हैं। इसका क्या मतलब है? क्या यह दिखावे और वोटों के लिए बांटा जा रहा मुफ्त पैसा है? नहीं, यह एक ऋण है और भारत के भविष्य पर एक दाँव है।

इसके अलावा, वे इस बारे में बात करते हैं कि कितने निवेशकों का किन कंपनियों में हित था, लेकिन हितों के टकराव का एक भी उदाहरण साबित करने में पूरी तरह विफल रहते हैं। अब, मैं आपको बताता हूँ कि इंडियन एक्सप्रेस ने कल जो घटिया ‘गहन विश्लेषण’ प्रकाशित किया था, उसमें क्या लिखा है।

मैं आपको इस कष्ट और ‘प्रीमियम सब्सक्रिप्शन’ से बचाना चाहता हूँ। ‘जांच रिपोर्ट’ किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचती। इसमें जांच समिति के 7 अलग-अलग सदस्यों, सौरभ श्रीवास्तव, केआरएस जमवाल, गोपाल श्रीनिवासन, सुधीर मेहता, संजय नायक, आनंद देशपांडे और देबाशीष भट्टाचार्य और ऋण प्राप्त करने वाली कंपनियों में उनकी हिस्सेदारी के बारे में बात की गई है।

लेख में उनका बयान भी शामिल है। लेकिन यह घटिया और लगभग मूर्खतापूर्ण रिपोर्ट यह साबित करने में विफल रहती है कि ये सदस्य उन कंपनियों के मूल्यांकन प्रक्रिया का हिस्सा थे जिनमें उन्होंने निवेशक के रूप में काम किया था।

जब हितों के टकराव का कोई सबूत ही नहीं है, तो फिर इस राजनीतिक रूप से प्रेरित और सनसनीखेज शीर्षक का क्या मतलब है? एक पाठक के रूप में, आप सोचने पर मजबूर हो जाते हैं – अगर प्रचार एक कला है, तो यह दैनिक अखबार निश्चित रूप से इसमें माहिर है। लेकिन हमें इसकी तारीफ करनी ही चाहिए।

हालाँकि वे कुछ भी साबित नहीं कर पाए, लेकिन उन्होंने अस्थायी रूप से नैरेटिव बनाने में कामयाब रहे। मैंने यूट्यूब पर टिप्पणियाँ देखीं जिनमें ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की कथित ‘साहसिक पत्रकारिता’ के लिए प्रशंसा की जा रही थी। उनकी सनसनीखेज हेडलाइन ने शौकिया राजनीतिक उत्साही लोगों को यह विश्वास दिला दिया कि जहाँ कोई घोटाला नहीं है, वहाँ भी घोटाला मौजूद है।

और मेरे दोस्तों, इस तरह से एक बेबुनियाद कहानी गढ़ी जाती है, जिसमें दुर्भावनापूर्ण इरादा छिपा होता है। भारत वर्तमान में अपने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 0.8% अनुसंधान एवं विकास पर खर्च कर रहा है। यह 2010 के बाद से भारत द्वारा किया गया सबसे अधिक निवेश है।

जब हम सही दिशा में प्रगति कर रहे हैं, तो कुछ निहित स्वार्थ समूह इस घटनाक्रम से स्पष्ट रूप से असंतुष्ट हैं। इंडियन एक्सप्रेस के नवीनतम ‘खोजी लेख’ से यह बात स्पष्ट हो जाती है।

नैहाटी के ‘सिंडिकेट राज’ पर कानून का शिकंजा: पूर्व TMC विधायक सनत डे गिरफ्तार, वसूली-जमीन कब्जे से लेकर 2021 की हिंसा तक के गंभीर आरोप

पश्चिम बंगाल में तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के नेताओं की दबंगई और आपराधिक कारनामों पर कानून का शिकंजा कसना शुरू हो गया है। उत्तर 24 परगना जिले के नैहाटी विधानसभा क्षेत्र से TMC के पूर्व विधायक सनत डे को पुलिस ने शनिवार (8 अगस्त) को गिरफ्तार कर लिया है।

सनत डे पर इलाके में संगठित रूप से जबरन वसूली का सिंडिकेट चलाने, अवैध रूप से लोगों की जमीनों पर कब्जा करने, साल 2021 के विधानसभा चुनावों के बाद हुए भीषण राजनीतिक खून-खराबे और बीजेपी कार्यकर्ताओं पर जानलेवा हमलों में शामिल होने के गंभीर आरोप हैं।

पुलिस की कई टीमें लंबे समय से सनत डे की तलाश में जगह-जगह छापेमारी कर रही थीं। आखिरकार शनिवार (8 अगस्त 2026) को पुलिस ने गुप्त सूचना के आधार पर उत्तर 24 परगना के दत्तपुकुर इलाके में एक ठिकाने पर दबिश देकर उसे धर दबोचा। गिरफ्तारी के बाद उसे नैहाटी थाने लाया गया और फिर बैरकपुर उपमंडलीय अदालत में पेशी के लिए ले जाया गया।

दत्तपुकुर के गुप्त ठिकाने से नाटकीय गिरफ्तारी और पुलिस स्टेशन पर फूटा जनआक्रोश

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सनत डे के खिलाफ नैहाटी और आसपास के थानों में पिछले कई महीनों से रंगदारी, मारपीट और डराने-धमकाने की दर्जनों शिकायतें पेंडिंग थीं। जब पुलिस की टीमों ने उनके घर और संभावित ठिकानों पर छापेमारी शुरू की तो वे पुलिस को चकमा देकर फरार हो गए थे। लेकिन शनिवार की सुबह दत्तपुकुर में पुलिस ने घेरकर गिरफ्तार कर लिया।

जैसे ही सनत डे को पुलिस गाड़ी में बैठाकर नैहाटी थाने लेकर पहुँची, वहाँ का माहौल पूरी तरह गरमा गया। लंबे समय से उनके अत्याचारों से पीड़ित स्थानीय लोग और बीजेपी कार्यकर्ता थाने के बाहर जमा हो गए।

जब पुलिस उसे गाड़ी से उतारकर अंदर ले जा रही थी, तो भीड़ ने ‘चोर-चोर’ के जोरदार नारे लगाए और उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की माँग की। सनत डे के खिलाफ इलाके में गुस्सा इतना गहरा था कि कुछ महीने पहले जब वो नैहाटी के विजयनगर में एक दफ्तर का उद्घाटन करने पहुँचे थे, तो जनता ने उस पर सरेआम अंडे फेंके थे और काले झंडे दिखाए थे।

2021 की खूनी पोस्ट-पोल वायलेंस और बीजेपी कार्यकर्ताओं पर बर्बर अत्याचार

पश्चिम बंगाल में 2021 के विधानसभा चुनाव नतीजों के बाद राज्यभर में तृणमूल कॉन्ग्रेस के कार्यकर्ताओं और नेताओं द्वारा जो हिंसा की गई थी, सनत डे को नैहाटी क्षेत्र में उसका मुख्य सूत्रधार माना जाता है। चुनाव खत्म होते ही बीजेपी के समर्थकों और कार्यकर्ताओं के घरों को चुन-चुनकर निशाना बनाया गया, दुकानें लूटी गईं और परिवारों को बेघर कर दिया गया।

बीजेपी महिला मोर्चा की स्थानीय नेता जिनिया चक्रवर्ती ने सनत डे की गिरफ्तारी पर बताया कि केवल बीजेपी से जुड़े होने के कारण 2021 के चुनावों के बाद उनके घर पर TMC के गुंडों ने कई बार हमला किया और तोड़फोड़ की।

इलाके के दर्जनों बीजेपी कार्यकर्ताओं को अपनी जान बचाने के लिए महीनों तक जंगलों और दूसरे राज्यों में छिपकर रहना पड़ा था। सनत डे पर आरोप है कि उसने नैहाटी में विरोध की हर आवाज को दबाने के लिए पुलिस प्रशासन का दुरुपयोग किया और विपक्षी कार्यकर्ताओं पर झूठे मुकदमे दर्ज कराए।

बिना निवेश का धंधा: वसूली का सिंडिकेट और जमीन हड़पने का समानांतर साम्राज्य

नैहाटी और बैरकपुर का औद्योगिक इलाका लंबे समय से TMC के सिंडिकेट राज का शिकार रहा है। सनत डे पूर्व राज्य मंत्री पार्थ भौमिक का बेहद करीबी माना जाता था और वो पहले नैहाटी नगरपालिका का अध्यक्ष भी रह चुका हैं। पार्षद से लेकर विधायक बनने तक के अपने सफर में उसने इलाके में गुंडागर्दी और वसूली का एक बड़ा ताना-बाना तैयार कर लिया था।

बीजेपी नेता देबर्घ्य घोष और स्थानीय निवासियों का कहना है कि सनत डे का मुख्य काम ही व्यापारियों, बिल्डरों और आम लोगों से गुंडा टैक्स वसूलना था। विधायक बनने के बाद उसका यह अवैध कारोबार कई गुना बढ़ गया था।

जो कोई भी उसे रंगदारी देने से इनकार करता, उसकी जमीन पर कब्जा कर लिया जाता था या उसके निर्माण कार्य को रोक दिया जाता था। इलाके में यह बात आम थी कि नैहाटी में कोई भी ईंट बिना सनत डे के कट (कमीशन) के नहीं रखी जा सकती थी।

2024 का उपचुनाव और 2026 में जनता का करारा जवाब

सनत डे की राजनीतिक पृष्ठभूमि देखें तो जब 2024 में पार्थ भौमिक बैरकपुर से लोकसभा चुनाव जीतकर सांसद बने, तो नैहाटी विधानसभा सीट खाली हो गई। इसके बाद हुए उपचुनाव में TMC ने सनत डे को टिकट दिया और वह विधायक चुना गया। हालाँकि विधायक बनने के बाद भी उसके रवैये में कोई बदलाव नहीं आया।

लेकिन जनता के सब्र का बाँध आखिरकार टूट गया। हाल ही में संपन्न हुए 2026 के विधानसभा चुनाव में नैहाटी की जनता ने सनत डे को पूरी तरह से नकार दिया। बीजेपी उम्मीदवार सुमित्रो चटर्जी ने उन्हें 10000 से अधिक वोटों के बड़े अंतर से करारी शिकस्त दी।

TMC की सत्ता खिसकते ही और चुनावी नतीजों में हार मिलते ही सनत डे का राजनीतिक संरक्षण खत्म हो गया, जिसके बाद पीड़ित लोग खुलकर सामने आने लगे और पुलिस को कानूनी शिकंजा कसना पड़ा।

कमर में रस्सी बाँधकर घुमाना काफी नहीं, मिले कठोरतम सजा- मंत्री अर्जुन सिंह

सनत डे की गिरफ्तारी पर नोआपाड़ा से विधायक और राज्य सरकार के मंत्री अर्जुन सिंह ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए पुलिस प्रशासन का धन्यवाद किया। अर्जुन सिंह ने साफ शब्दों में कहा, “सनत डे नैहाटी में मुख्य रूप से अवैध वसूली करने वाले व्यक्ति के रूप में जाने जाते हैं। विधायक बनते ही उनका यह बिना निवेश वाला धंधा और तेजी से फलने-फूलने लगा था।”

अर्जुन सिंह ने आगे कहा, “उन्हें गिरफ्तार करके पुलिस ने सही कदम उठाया है, लेकिन सिर्फ गिरफ्तार कर लेना या कमर में रस्सी बाँधकर कोर्ट ले जाना ही काफी नहीं होगा। नैहाटी की जनता ने जो अत्याचार झेला है, उसके लिए सनत डे को अदालत से कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए। नैहाटी के लोग अपने ऊपर हुए अत्याचारों को कभी माफ नहीं करेंगे।”

सनत डे की गिरफ्तारी से यह साफ हो गया है कि तृणमूल कॉन्ग्रेस के शासनकाल में जिस तरह से दबंगई, कट-मनी कल्चर और चुनावी हिंसा को बढ़ावा दिया गया, अब कानून का डंडा उन सभी नेताओं पर चलना शुरू हो गया है। नैहाटी की जनता अब राहत की साँस ले रही है और उम्मीद कर रही है कि दशकों से चला आ रहा सिंडिकेट राज अब पूरी तरह खत्म होगा।

न्यूजलॉन्ड्री पर यौन उत्पीड़न के आरोप? रेपिस्ट तरुण तेजपाल के बचाव के पुराने रिकॉर्ड के बीच पूर्व कर्मचारियों ने खोली पोल

न्यूजलॉन्ड्री और उसके सह-संस्थापक अभिनंदन सेखरी इन दिनों चर्चा में हैं। अभिनंदन सेखरी पर ना केवल रेप के आरोपित का बचाव करने वाले रवैये के आरोप है, बल्कि उन पर महिलाओं के साथ गलत व्यवहार करने और कंपनी के अंदर यौन उत्पीड़न का माहौल बनाने के गंभीर आरोप लगे हैं।

तहलका के संस्थापक तरुण तेजपाल को साल 2013 में अपनी सहकर्मी के साथ दुष्कर्म करने का दोषी पाया गया है। अदालत ने उन्हें 10 साल की सजा सुनाई है। यह वही तरुण तेजपाल हैं जिनका इंटरव्यू साल 2012 में अभिनंदन सेखरी ने लिया था। कुछ लोग यह कह सकते हैं कि उस साल उन पर दुष्कर्म के आरोप नहीं लगे थे। इसलिए उनका इंटरव्यू लेना शायद गलत नहीं लगा हो। लेकिन इसके सबूत बताते हैं कि बात ऐसी नहीं थी। मीडिया जगत के बड़े लोगों को तरुण तेजपाल की हरकतों के बारे में पहले से ही पूरी जानकारी थी।

आरोपित के गलत कामों को देखकर लोग सिर्फ चुपचाप तमाशा नहीं देखते रहे। उन्होंने नए-नए शब्दों और तकनीकी भाषा का इस्तेमाल करके उसके इस गंदे व्यवहार को सही ठहराने की कोशिश की। इस मामले में सबसे कुख्यात बयान जाने-माने ‘पत्रकार’ विनोद मेहता का था। उन्होंने तरुण तेजपाल द्वारा किए गए यौन उत्पीड़न को ‘बिना सहमति के शारीरिक संबंध बनाने की इच्छा’ (non-consensual carnal favour) जैसा अजीब नाम दिया था।

बात सिर्फ यहीं तक नहीं रुकी। साल 2014 में न्यूजलॉन्ड्री के सह-संस्थापक अभिनंदन सेखरी की बहन निरुपमा ने भी आगे आकर तरुण तेजपाल का खुला बचाव किया था। वह इतने पर ही नहीं रुकीं। उन्होंने और आगे बढ़कर उस पीड़ित महिला के चरित्र पर ही कीचड़ उछालना शुरू कर दिया, जिसके साथ गलत हुआ था। उस समय उन्होंने अपने बयान में कहा, “सबसे पहले मैं साफ कर देना चाहती हूँ कि मैं आपको पीड़िता नहीं मानती। सिवाय इसके कि आप ‘बबलगम फेमिनिज्म’ की पीड़िता हों, जिसके बारे में मैं आगे विस्तार से बात करूँगी।”

जब कोई संस्था दुष्कर्म के आरोपित का तुरंत बचाव करने के लिए दौड़ पड़ती है, तो इससे उसकी असलियत सामने आ जाती है। इससे पता चलता है कि कंपनी के भीतर किस तरह का माहौल चल रहा है। न्यूजलॉन्ड्री ने एक ऐसा लेख छापा था जिसमें दुष्कर्म को सही ठहराने की कोशिश की गई थी। उस लेख के छपने के बाद उन्हें पीड़ित महिला के दर्द पर रत्तीभर भी पछतावा नहीं हुआ।

बाद में उन्होंने उस लेख को चुपचाप हटा दिया और एक आम सा माफीनामा या ‘आत्म-चिंतन’ नोट लिख दिया। इससे साफ पता चलता है कि इस व्यवस्था के अंदर गंदगी कितनी गहरी तक फैली हुई थी। यह सारा काला चिट्ठा तब खुला जब तरुण तेजपाल को अदालत से सजा हुई। न्यूजलॉन्ड्री में काम कर चुकीं कुछ पूर्व महिला कर्मचारियों ने इसके बाद कंपनी पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने बताया कि कंपनी के भीतर यौन उत्पीड़न का माहौल खुलेआम मौजूद है। इस पूरे और संवेदनशील मामले को सबसे पहले पत्रकार साईकिरण कन्नन ने दुनिया के सामने उजागर किया था।

सुमेधा मित्तल के ट्वीट का स्क्रीनशॉट

न्यूजलॉन्ड्री की पूर्व वरिष्ठ पत्रकार सुमेधा मित्तल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (ट्विटर) पर एक पोस्ट शेयर किया है। उन्होंने अपनी इस पोस्ट में लिखा है, “मुझे उम्मीद है कि वह दिन भी जरूर आएगा जिस दिन यह कंपनी अपने ही न्यूजरूम के अंदर हुई यौन उत्पीड़न की शिकायतों पर भी उतनी ही गंभीरता से विचार करेगी और सोचेगी।”

सुमेधा मित्तल के X प्रोफाइल का स्क्रीनशॉट

सुमेधा मित्तल की यह प्रतिक्रिया तब आई जब कंपनी ने साल 2014 में छपे उस लेख को चुपचाप हटा दिया, जिसे अभिनंदन सेखरी की बहन ने लिखा था और जिसमें दुष्कर्म के आरोपित का बचाव किया गया था। एक पूर्व कर्मचारी का खुलकर सामने आना और यह कहना कि कंपनी के अंदर यौन उत्पीड़न (POSH) की शिकायतों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई, बेहद गंभीर चिंता का विषय है।

इससे कई बड़े और कड़े सवाल खड़े होते हैं। कंपनी के भीतर ऐसी कितनी यौन उत्पीड़न की शिकायतें दर्ज की गई थीं? उन शिकायतों पर प्रबंधन ने क्या कदम उठाए और क्या कार्रवाई की गई? क्या न्यूजलॉन्ड्री के मैनेजमेंट ने उन मामलों पर पर्दा डालकर अपने ही लोगों और तरुण तेजपाल जैसे लोगों को बचाने की कोशिश की थी?

प्रियंका ईश्वरी की एक्स प्रोफाइल का स्क्रीनशॉट

प्रियंका ईश्वरी के ट्वीट का स्क्रीनग्रैब

न्यूजलॉन्ड्री की एक और पूर्व कर्मचारी प्रियंका ईश्वरी ने भी इस मामले पर खुलकर अपनी बात रखी है। उन्होंने लिखा, “उम्मीद है कि वे सीनियर पत्रकारों को यह सिखाएँगे कि काम के सिलसिले में होने वाली कॉल पर महिला एडिटर्स पर चिल्लाएँ नहीं और उन्हें ‘कब से देख रहा हूँ मैं तेरेको’ जैसी बातें कहकर धमकाएँ नहीं। क्या पुरुष रिपोर्टरों को महिला सहयोगियों के साथ पेशेवर तरीके से पेश आने और ऑफिस को ‘लड़कों का लॉकर रूम’ न बनाने की ट्रेनिंग देने की उम्मीद करना बहुत बड़ी बात है?”

इन महिलाओं के बयानों से यह साफ पता चलता है कि न्यूजलॉन्ड्री के भीतर महिलाओं से नफरत करने वाला और जहरीला पुरुषवादी माहौल मौजूद है। इसमें एक और गौर करने वाली बात यह है कि कई जाने-माने अपराधी और दुष्कर्म का बचाव करने वाले लोग इस संस्था में आसानी से नौकरी पा लेते हैं। इसका उदाहरण #MeToo के आरोपित विक्रम किलपडी हैं, जिन्होंने तरुण तेजपाल की तरह तहलका में काम किया था।

लेख का स्क्रीनशॉट

लमत आर हसन नाम की एक महिला पत्रकार ने बताया था कि साल 2005 में विक्रम ने उनके साथ दुष्कर्म करने की लगभग कोशिश की थी। उन्होंने अपनी आपबीती सुनाते हुए बताया कि वह काफी हिंसक हो गए थे। उन्होंने उनके बाल खींचे, कलाई पकड़ी, दीवार से सटाया और फिर बिस्तर पर धकेल दिया। खुद को छुड़ाने की उनकी सारी कोशिशें नाकाम हो गईं। वह रोने लगीं, तब जाकर उसने उन्हें छोड़ा और यह किसी रेप होने के सबसे करीब का अनुभव था।

खुद न्यूजलॉन्ड्री के अपने खुलासे के मुताबिक, यही आदमी न्यूजलॉन्ड्री में भी काम कर चुका था।

अगर मेरी याददाश्त सही है, तो मैं न्यूजलॉन्ड्री के प्रधान संपादक रमन कृपाल से जुड़ी एक घटना को याद कर सकता हूँ। उन्होंने नैनीताल में 65 साल के मोहम्मद उस्मान द्वारा एक नाबालिग लड़की के साथ हुए रेप को ‘प्रेम संबंध’ और ‘छोटी घटना’ कहकर कम करके आंका था।

न्यूजलॉन्ड्री के ट्वीट का स्क्रीनशॉट

रमन कृपाल, जिन्हें पहले आपराधिक मानहानि के मामले में दोषी ठहराया जा चुका है, उन्होंने झिझकते हुए एक दिखावे के लिए माफी माँगी। यहाँ तक कि न्यूजलॉन्ड्री को भी एक स्पष्टीकरण जारी करना पड़ा था। जब बातचीत बिना स्क्रिप्ट के होती है, तो लोग अक्सर वही बोल देते हैं जो उनके दिल और दिमाग में चल रहा होता है।

न्यूजलॉन्ड्री के प्रधान संपादक के पद पर रहते हुए रमन कृपाल का एक नाबालिग बच्चे के बलात्कार के बारे में इस तरह की बात कहना हमें साफ तस्वीर दिखाता है। इससे हमें यह स्पष्ट अंदाजा हो जाता है कि उस खास संस्था के अंदर क्या चीज ‘सामान्य’ मानी जाती है।

महिलाओं के अधिकारों और नारीवाद का चुनिंदा समर्थन करने वाले लोग इन तमाम सालों में अपने खुद के घर को ठीक नहीं कर पाए। लेकिन वे दुनिया भर की हर बात पर दूसरों को बड़ी-बड़ी बातें सिखाने और खुद को नैतिक रूप से बेहतर दिखाने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं।

शायद अभिनंदन सेखरी और उनकी टीम जिम्मेदारी लेना शुरू कर सकती है। मैं जानता हूँ कि यह वामपंथी-उदारवादी इकोसिस्टम के लिए सबसे मुश्किल काम है, लेकिन (बदलाव के लिए) वह इस बात की कोशिश कर सकते हैं।

PARAM 8000 से परम रुद्र और अब परम प्रज्ञा: भारत ने कैसे बनाई अपनी सुपरकंप्यूटिंग ताकत, AI के दौर में क्यों अहम है यह यात्रा

आज की दुनिया में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI सबसे जरूरी चीज बन गया है। एआई को चलाने के लिए सिर्फ डेटा या अच्छे सॉफ्टवेयर की जरूरत नहीं होती है। इसके लिए बहुत ज्यादा कंप्यूटिंग पावर की जरूरत पड़ती है। बड़े-बड़े AI मॉडल तैयार करने हों या मौसम का हाल जानना हो, इन सभी कामों के पीछे हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग (HPC) की बड़ी भूमिका होती है। नई दवाइयाँ खोजने और अंतरिक्ष से जुड़े जटिल कामों में भी इसकी बहुत जरूरत पड़ती है।

भारत इस क्षेत्र में लगातार आगे बढ़ रहा है। शनिवार (8 अगस्त) को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बड़ा कदम उठाया है। उन्होंने आईआईटी दिल्ली के 57वें दीक्षांत समारोह के दौरान ‘PARAM प्रज्ञा’ का उद्घाटन किया है। यह एक AI-पावर्ड हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग सुविधा है। इसे IIT दिल्ली के सोनीपत कैंपस में लगाया गया है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (DST) की 2025-26 की रिपोर्ट के मुताबिक, इसकी क्षमता 250 AI PF/8 PF दर्ज की गई है।

लेकिन ‘PARAM प्रज्ञा’ को सिर्फ एक नया सुपरकंप्यूटर समझना सही नहीं है। इसके पीछे भारत की दशकों लंबी एक खास यात्रा जुड़ी हुई है। इसकी शुरुआत ‘PARAM 8000’ सुपरकंप्यूटर से हुई थी। आज देश के अलग-अलग रिसर्च संस्थानों में ‘PARAM’ नाम के कई सुपरकंप्यूटर शानदार काम कर रहे हैं।

सुपरकंप्यूटर क्या है और भारत को इसकी जरूरत क्यों पड़ी

सामान्य कंप्यूटर हमारे रोजमर्रा के कामों को आसानी से संभाल लेते हैं। लेकिन जब किसी समस्या को हल करने के लिए अरबों-खरबों गणनाओं की जरूरत हो, तो सामान्य कंप्यूटर बहुत समय लेते हैं। ऐसे बड़े और कठिन कामों को बहुत तेजी से पूरा करने के लिए सुपरकंप्यूटर का इस्तेमाल किया जाता है। यह हजारों प्रोसेसिंग यूनिट को एक साथ जोड़कर काम करता है।

भारत की इस स्वदेशी सुपरकंप्यूटिंग यात्रा में ‘C-DAC’ (सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ एडवांस्ड कम्प्यूटिंग) की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण रही है। सी-डैक का शुरुआती उद्देश्य ऐसा सुपरकंप्यूटर बनाना था जो एक सेकंड में एक अरब गणनाएँ यानी एक गीगाफ्लॉप की क्षमता हासिल कर सके। इसी कोशिश का नतीजा था कि साल 1990 में ‘PARAM 8000’ बनकर तैयार हुआ। यहीं से ‘PARAM’ नाम की पूरी सुपरकंप्यूटर सीरिज की मजबूत नींव पड़ी थी।

इसकी तकनीक पैरेलल कंप्यूटिंग के विचार पर काम करती है। इसका मतलब होता है कि किसी बड़े और भारी काम को एक ही प्रोसेसर पर डालने के बजाय, उसे छोटे-छोटे हिस्सों में बाँट दिया जाता है। इसके बाद बहुत सारे प्रोसेसर मिलकर उस काम को एक साथ बहुत तेजी से पूरा करते हैं। इसी वजह से ‘PARAM’ को भारत की पैरेलल कंप्यूटिंग यात्रा का मुख्य आधार माना जाता है।

भारत को यह तकनीक बनाने की जरूरत सिर्फ अपनी तकनीकी ताकत दिखाने के लिए नहीं थी। उस समय देश को दूसरे देशों से अत्याधुनिक कंप्यूटिंग सिस्टम और तकनीक हासिल करने में बहुत कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था। इसलिए वैज्ञानिक शोध और देश को तकनीक के मामले में पूरी तरह आत्मनिर्भर बनाने के लिए खुद की क्षमता विकसित करना बहुत जरूरी हो गया था।

इसी सोच के साथ देश में ‘PARAM 8000’ की शुरुआत हुई थी। इसके बाद भारत ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और अपनी कंप्यूटिंग क्षमता को गीगाफ्लॉप से आगे बढ़ाकर टेराफ्लॉप और फिर पेटाफ्लॉप के स्तर तक पहुँचा दिया।

PARAM 8000 से PARAM प्रज्ञा तक: कैसे बदलती गई सुपरकंप्यूटिंग?

PARAM को किसी एक मशीन का नाम समझना सही नहीं है। यह भारत में अलग-अलग समय पर विकसित और तैनात किए गए हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग सिस्टम की एक लंबी श्रृंखला है। हर नई पीढ़ी में कंप्यूटिंग पावर, प्रोसेसर आर्किटेक्चर, नेटवर्किंग, स्टोरेज और एप्लिकेशन की क्षमता बढ़ती गई।

PARAM 8000 इस यात्रा का शुरुआती बड़ा पड़ाव था। इसके बाद PARAM 10000 आया, जिसकी पीक परफॉरमेंस 100 गीगाफ्लॉप्स थी। 2002 में PARAM पद्मा ने 1 टेराफ्लॉप की सीमा पार की।

C-DAC के अनुसार PARAM पद्मा दुनिया के टॉप 500 सुपरकंप्यूटरों की सूची में शामिल होने वाला पहला भारतीय सिस्टम था। इसके बाद 2008 में PARAM युवा आया, जिसने नवंबर 2008 की TOP500 सूची में 69वीं रैंक हासिल की।

इसके बाद PARAM युवा-II सहित कई और सिस्टम विकसित हुए और भारत की कम्प्यूटिंग क्षमता लगातार बढ़ती गई। आगे चलकर PARAM सिद्धि, PARAM प्रवेगा, PARAM ब्रह्मा, PARAM शक्ति, PARAM संगनक, PARAM गंगा और PARAM रुद्र जैसे सिस्टम सामने आए।

PARAM Yuva-II के बाद PARAM Siddhi-AI और PARAM Pravega जैसे सिस्टम भारत की सुपरकंप्यूटिंग यात्रा में अगला चरण बने। PARAM Siddhi-AI ने खास तौर पर AI और मशीन लर्निंग वर्कलोड्स के लिए भारत की कम्प्यूटिंग क्षमता को मजबूत किया, जबकि PARAM Pravega जैसे सिस्टम ने अकादमिक और वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग उपलब्ध कराई।

आज उपलब्ध सरकारी आंकड़े इस विकास को और साफ करते हैं। DST के अनुसार NSM के तहत तैनात प्रमुख सिस्टम में PARAM सिद्धि 6.5 PF/210 PF AI, PARAM प्रवेगा 3.3 PF, PARAM रुद्र के कई 3 PF सिस्टम और PARAM ब्रह्म, PARAM युक्ति, PARAM शक्ति, PARAM संगनक तथा PARAM गंगा जैसे सिस्टम शामिल हैं।

यहां PF यानी पेटा फ्लॉप को समझना भी जरूरी है। फ्लॉप का मतलब फ्लोटिंग पॉइंट ऑपरेशन पर सेकंड है, यानी कंप्यूटर एक सेकंड में कितनी गणितीय गणनाएँ कर सकता है। 1 पेटाफ्लॉप का अर्थ लगभग एक क्वाड्रिलियन यानी 10^15 फ्लोटिंग-पॉइंट ऑपरेशन प्रति सेकंड है।

इसलिए जब किसी मशीन की क्षमता 3 पेटाफ्लॉप कही जाती है तो इसका मतलब है कि उसकी गणना क्षमता एक सेकंड में खरबों-खरबों फ्लोटिंग-पॉइंट ऑपरेशन के स्तर की है।

लेकिन AI के बढ़ते इस्तेमाल के साथ सिर्फ सामान्य HPC परफॉर्मेंस पर्याप्त नहीं रह गई। AI वर्कलोड में GPU और AI एक्सेलरेटर की भूमिका बढ़ी और इसी वजह से AI- स्पेसिफिक कंप्यूटिंग कैपेसिटी को अलग तरीके से मापना और डिजाइन करना भी महत्वपूर्ण हो गया। इसी बदलते दौर में PARAM प्रज्ञा जैसी सुविधा सामने आती है।

PARAM प्रज्ञा और PARAM रुद्र में अंतर

‘PARAM प्रज्ञा’ एक आधुनिक सुपरकंप्यूटिंग सुविधा है, जिसे खासतौर पर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग के लिए तैयार किया गया है। इसे IIT दिल्ली के सोनीपत कैंपस में स्थापित किया गया है। सरकारी रिपोर्ट के अनुसार इसकी क्षमता 250 AI PF/8 PF बताई गई है। यहाँ 250 एआई पेटाफ्लॉप्स का आँकड़ा देखकर इसे सामान्य क्षमता न समझें, क्योंकि AI के कार्यों में गणना का तरीका अलग होता है। आज के दौर में बड़े एआई मॉडल को प्रशिक्षित करने और मुश्किल रिसर्च कार्यों के लिए ऐसी ही भारी-भरकम कंप्यूटिंग शक्ति की जरूरत होती है।

भले ही ‘PARAM प्रज्ञा’ और ‘PARAM रुद्र’ दोनों भारत के नेशनल सुपरकंप्यूटिंग मिशन का हिस्सा हैं, लेकिन दोनों अलग मशीनें हैं। ‘PARAM रुद्र‘ भारत की स्वदेशी हार्डवेयर क्षमता का एक बड़ा उदाहरण है। इसके सर्वर को पूरी तरह देश में ही डिजाइन और निर्मित किया गया है। इसके साथ ही इसमें सी-डैक का स्वदेशी सॉफ्टवेयर और त्रिनेत्र तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कुछ समय पहले ही ऐसे तीन सिस्टम देश को समर्पित किए थे।

दूसरी तरफ ‘PARAM प्रज्ञा’ मुख्य रूप से एआई और आधुनिक कंप्यूटिंग की जरूरतों को पूरा करती है। आसान शब्दों में समझें तो ‘PARAM रुद्र’ भारत के स्वदेशी हार्डवेयर और निर्माण कौशल को दर्शाता है, जबकि ‘PARAM प्रज्ञा’ एआई आधारित आधुनिक शोध और तकनीक की नई माँगों को पूरा करने का काम करती है।

नेशनल सुपरकंप्यूटिंग मिशन ने भारत की पूरी तस्वीर कैसे बदली?

भारत की सुपरकंप्यूटिंग यात्रा में सबसे बड़ा बदलाव नेशनल सुपरकंप्यूटिंग मिशन यानी NSM के साथ आया। 25 मार्च 2015 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली कैबिनेट कमेटी ऑन इकोनॉमिक अफेयर्स ने नेशनल सुपरकंप्यूटिंग मिशनको मंजूरी दी थी।

इसके लिए सात साल में 4500 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया था। मिशन का उद्देश्य देश के एकेडमिक और रिसर्च इन्स्टिच्यूशन को हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग सुविधाओं से जोड़ना और भारत को वर्ल्ड क्लास कम्प्यूटिंग पावर वाले देशों की श्रेणी में ले जाना था।

इस मिशन को DST और तत्कालीन डिपार्ट्मन्ट ऑफ इलेक्ट्रानिक्स एण्ड इनफार्मेशन टेक्नॉलजी, यानी बाद में MeitY, ने मिलकर आगे बढ़ाया। इसका इम्प्लिमेंटेशन C-DAC, पुणे और IISc, बेंगलुरु के जरिए किया गया। शुरुआत में 70 से ज्यादा HPC  फैसिलिटीज का नेटवर्क बनाने की योजना थी, जिन्हें नेशनल नॉलेज नेटवर्क के जरिए जोड़ा जाना था।

मोदी सरकार के दौर में इसका एक महत्वपूर्ण बदलाव यह रहा कि लक्ष्य केवल विदेशी सिस्टम खरीदकर उन्हें देश में लगाने तक सीमित नहीं रहा। सरकार ने डिजाइन, असेंबली, मैन्युफैक्चरिंग, सॉफ्टवेयर स्टैक और महत्वपूर्ण घटक को देश में विकसित करने पर भी जोर दिया।

इसका उदाहरण 2019 में IIT-BHU में स्थापित PARAM शिवाय है। यह देश का पहला इंडिजिनस असेंबलड सुपर कंप्यूटर था और इसकी अधिकतम कंप्यूटिंग क्षमता 837 टेराफ्लॉप्स थी। बाद में PARAM शक्ति, PARAM ब्रह्म और अन्य सिस्टम भी अलग-अलग संस्थानों में लगाए गए।

अगले चरण में रुद्र  सर्वर, स्वदेशी सॉफ्टवेयर स्टैक और HPC इंटरकनेक्ट जैसे कॉम्पोनेंट्स पर काम आगे बढ़ा। DST के मुताबिक नवंबर 2025 तक NSM के तहत 37 सुपरकंप्यूटर और लगभग 39 पेटाफ्लॉप्स की क्यूम्यलेटिव क्षमता तैयार की जा चुकी थी। इनका इस्तेमाल 260 से ज्यादा संस्थानों के 14000 से ज्यादा  यूजर कर रहे थे और 27500 लोगों को HPC में ट्रैनिंग दी गई थी।

सरकार के अगस्त 2025 के आंकड़ों के अनुसार इन सिस्टमों ने 10000 से ज्यादा रिसर्चर्स को सपोर्ट  किया था, जिनमें 1700 से अधिक PhD स्टूडेंट्स शामिल थे। इनका इस्तेमाल दवा की खोज, आपदा प्रबंधन, जलवायु मॉडलिंग, खगोल विज्ञान, कम्प्यूटेशनल केमिस्ट्री, फ्लूइड डाइनैमिक्स और मटेरियल्स रिसर्च जैसे क्षेत्रों में किया गया।

इस तरह NSM का महत्व सिर्फ मशीनों की संख्या में नहीं है। इसका बड़ा उद्देश्य भारत में सुपरकंप्यूटिंग का पूरा इकोसिस्टमतैयार करना है मशीन, सॉफ्टवेयर, स्किल्ड मैनपावर, रिसर्च यूजर और स्वदेशी टेक्नोलॉजी सभी को साथ लेकर।

भारत के लिए PARAM प्रज्ञा और पूरी PARAM यात्रा का असली मतलब क्या है?

सुपरकंप्यूटर का फायदा केवल वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं होता। मौसम की बेहतर भविष्यवाणी से लेकर चक्रवात और बाढ़ के मॉडल, नई दवाओं की खोज, एयरोस्पेस डिजाइन, क्लाइमेट रिसर्च, मैटेरियल साइंस, एग्रीकल्चर मॉडलिंग और AI तक, इनका इस्तेमाल कई क्षेत्रों में हो सकता है।

उदाहरण के लिए किसी नए मॉलिक्यूल को दवा के रूप में इस्तेमाल करने से पहले उसके व्यवहार को कम्प्यूटेशनल सिम्युलेशन के जरिए समझने में HPC मदद कर सकता है। इसी तरह मौसम मॉडल में बड़ी मात्रा में एटमॉस्फेरिक डेटा को प्रोसेस करके फोर्कैस्ट को बेहतर बनाने की कोशिश की जाती है।

AI के आने के बाद इसकी जरूरत और बढ़ गई है। बड़े AI मॉडल्स को ट्रेन करने के लिए हजारों GPU और बहुत ज्यादा कम्प्यूटिंग पावर की आवश्यकता हो सकती है। इसलिए जिस देश के पास मजबूत HPC इंफ्रास्ट्रक्चर होगा, उसके लिए AI रिसर्च,साइंस कम्प्यूटिंग और एडवांस्ड टेक्नॉलॉजी में अपनी क्षमता बढ़ाना आसान होगा।

भारत ने इस दिशा में केवल इन्फ्रास्ट्रक्चर खड़ा करने की कोशिश नहीं की है, बल्कि स्किल्ड मैनपावर तैयार करने पर भी जोर दिया है। NSM के तहत हजारों रिसर्चस्टूडेंट्स को HPC ट्रैनिंग दी गई है।

इससे यह इकोसिस्टम केवल कुछ सरकारी प्रयोगशालाओं  तक सीमित नहीं रहता, बल्कि विश्वविद्यालय, IIT, अनुसंधान संस्थान, स्टार्टअप और अन्य शोधकर्ता तक पहुँचता है।

अब अगर भारत की स्थिति को दुनिया के संदर्भ में देखें तो तस्वीर अभी भी चुनौतीपूर्ण है। नवंबर 2025 की TOP500 सूची में दुनिया के सबसे तेज सुपरकंप्यूटरों में अमेरिका, चीन, जापान और यूरोप की कई मशीनें शीर्ष स्थानों पर थीं। भारत का शक्ति क्लाउड सिस्टम उस सूची में 28वें स्थान पर था, जिसकी Rmax परफॉरमेंस 84.31 पेटाफ्लॉप्स दर्ज की गई थी।

इसका मतलब साफ है भारत ने लंबी दूरी तय की है, लेकिन सबसे शक्तिशाली वैश्विक सुपरकंप्यूटिंग प्रणालियों की दौड़ में अभी आगे जाना बाकी है। यही वजह है कि PARAM प्रज्ञा को केवल एक नए सुपरकंप्यूटर के उद्घाटन के तौर पर देखना अधूरा होगा। यह उस यात्रा का नया पड़ाव है जो PARAM 8000 से शुरू हुई थी।

शुरुआती दौर में भारत का लक्ष्य था कि उसे सुपरकंप्यूटिंग के लिए दूसरों पर निर्भर न रहना पड़े। इसके बाद लक्ष्य बनाया कि देश के वैज्ञानिकों और शैक्षणिक संस्थानों तक यह कंप्यूटिंग शक्ति पहुँचे। अब AI के दौर में चुनौती यह है कि भारत अपनी AI-रेडी HPC क्षमता, स्वदेशी हार्डवेयर, सॉफ्टवेयर, स्किल्ड मैनपावर और रिसर्च इकोसिस्टम को अगले स्तर तक ले जाए।

PARAM 8000 ने भारत को यह भरोसा दिया कि देश अपनी सुपरकंप्यूटिंग मशीन बना सकता है। PARAM युवा और उसके बाद के सिस्टम ने कंप्यूटिंग क्षमता बढ़ाई। नेशनल सुपरकंप्यूटिंग मिशन ने इस क्षमता को देश के अलग-अलग संस्थानों तक पहुँचाया।

PARAM रुद्र ने स्वदेशी हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर की दिशा में बड़ा कदम दिखाया। और PARAM प्रज्ञा जैसी AI-फोकस्ड फैसिलिटी यह संकेत देती है कि भारत अब अगली पीढ़ी की कम्प्यूटिंग जरूरतों के हिसाब से अपने इन्फ्रास्ट्रक्चर को ढाल रहा है।

इसलिए PARAM की कहानी सिर्फ सुपरकंप्यूटरों की कहानी नहीं है। यह भारत की वैज्ञानिक आत्मनिर्भरता के सफर की कहानी है। जहाँ एक समय देश को अत्याधुनिक कंप्यूटिंग शक्ति हासिल करने में मुश्किल आती थी, वहीं आज भारत अपने सुपरकंप्यूटर डिजाइन, असेंबल, मैन्युफैक्चर और डिप्लॉय करने की क्षमता को लगातार मजबूत कर रहा है।

UPI पेमेंट पर टैक्स लगने वाला है? नहीं, कॉन्ग्रेसी और लेफ्ट-लिबरल इकोसिस्टम ने नए कानून को लेकर आपको गुमराह किया

पिछले कुछ दिनों से विपक्षी नेता और लेफ्ट-लिबरल गैंग के लोग यह अफवाह फैला रहे हैं कि मोदी सरकार ने यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) से होने वाले लेन-देन पर शुल्क लगाने के लिए कानून बनाया है जबकि अब तक UPI लेन-देन मुफ्त रहे हैं। कानून को लेकर फैलाई जा रही इस अफवाह से बने माहौल का फायदा उठाने के लिए कई मुख्यधारा के मीडिया प्लेटफॉर्म भी भ्रामक और अटकलों पर आधारित हेडलाइन प्रकाशित कर रहे हैं।

संसद ने हाल ही में कराधान और अन्य कानून संशोधन विधेयक, 2026 को पारित किया। इसके बाद UPI लेन-देन पर कर लगाने को लेकर झूठे दावे फैलने लगे। विपक्ष के साथ-साथ लेफ्ट-लिबरल गैंग ने भी मोदी सरकार को निशाना बनाना शुरू कर दिया। उनका आरोप था कि मोदी सरकार अमेरिका के दबाव में काम कर रही है।

कॉन्ग्रेस सांसद जयराम रमेश ने X पर एक लंबा पोस्ट लिखा। इसमें उन्होंने दावा किया कि अब आम लोगों को UPI लेन-देन करने की कीमत चुकानी पड़ेगी। सांसद ने दावा किया कि मोदी सरकार ने अपने ‘अच्छे दोस्त डोनाल्ड ट्रंप’ के दबाव में UPI लेन-देन पर कर लगाने वाला कानून पारित किया है।

जयराम ने X पर लिखा, “दरअसल, इस संशोधन को लाने की असली वजह शायद और भी ज्यादा चिंताजनक है। यह अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि की 2026 की उस रिपोर्ट के बाद आया है, जिसमें UPI और RuPay के मुफ्त होने की आलोचना की गई है और आरोप लगाया गया है कि इनकी वजह से Visa और MasterCard जैसे अमेरिकी पेमेंट प्लेटफॉर्म बाजार से बाहर हो गए हैं। क्या प्रधानमंत्री अपने अच्छे दोस्त डोनाल्ड ट्रंप के दबाव में UPI को कमजोर करने और डिजिटल भुगतान क्षेत्र को अमेरिकी कंपनियों के लिए खोलने की कोशिश कर रहे हैं?”

कॉन्ग्रेस सांसद की पोस्ट पर कमेंट करते हुए वामपंथी प्रोपेगेंडा पोर्टल ‘द वायर’ के संस्थापक संपादक एमके वेणु ने भी इस झूठ को आगे बढ़ाया और सरकार को गरीब-विरोधी दिखाने की कोशिश की। वेणु ने दावा किया कि पीएम मोदी ने अपने ‘फ्रैंड के दबाव’ में ‘गरीब भारतीयों’ द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले UPI लेन-देन पर टैक्स लगाने का फैसला किया है। यहाँ ‘फ्रैंड’ से स्पष्ट रूप से उनका इशारा अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की ओर था।

कई मुख्यधारा के मीडिया पोर्टल भी ऐसी भ्रामक हेडलाइन के साथ लेख प्रकाशित कर रहे हैं, जिनसे यह संकेत मिलता है कि सरकार वास्तव में UPI लेन-देन पर टैक्स लगाने जा रही है। विधेयक को लोकसभा में पेश किए जाने के बाद रॉयटर्स ने ‘डिजिटल पेमेंट पर मर्चेंट फीस की वापसी का रास्ता साफ कर रहा भारत’ हेडलाइन से एक लेख प्रकाशित किया। इस लेख की हेडलाइन से ऐसा लगता है कि UPI लेन-देन पर टैक्स जल्द ही हकीकत बनने वाला है।

रॉयटर्स की खबर का स्क्रीनशॉट

इसी तरह, लोकसभा में कानून पारित होने के बाद द टेलीग्राफ ने भी एक लेख प्रकाशित किया, जिसकी हेडलाइन थी, “लोकसभा ने बैंकों और सेवा प्रदाताओं को UPI लेन-देन पर शुल्क लगाने की अनुमति देने वाले विधेयक को मंजूरी दी।”

Screenshot via The Telegraph

कुछ मीडिया पोर्टलों ने दावा किया कि केवल ₹2,000 तक के UPI भुगतान ही मुफ्त होंगे और इससे अधिक की किसी भी रकम के लेन-देन पर टैक्स लगेगा।

सोशल मीडिया पोस्ट और मीडिया रिपोर्ट्स के कारण आम लोगों में डर और भ्रम की स्थिति पैदा हो गई। भ्रामक हेडलाइन और पोस्ट की वजह से लोग यह मानने लगे कि UPI भुगतान पर टैक्स लगाया जा रहा है। इन दावों ने न केवल डिजिटल भुगतान को लेकर गलत जानकारी फैलाई बल्कि यह भी कहा गया कि सरकार ने अमेरिका के दबाव में यह फैसला लिया है। हालाँकि, लेफ्ट-लिबरल प्रोपेगेंडा और मीडिया में किए जा रहे दावों से हकीकत काफी अलग है।

क्या नए कानून में UPI लेन-देन पर टैक्स लगाया गया है?

कराधान और अन्य कानून संशोधन विधेयक, 2026 को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 4 अगस्त 2026 को लोकसभा में पेश किया था। विपक्ष के अलग-अलग मुद्दों को लेकर किए जा रहे हंगामे के बीच यह विधेयक 6 अगस्त 2026 को पारित हुआ। इस विधेयक के जरिए 2025 के आयकर अधिनियम, 2026 के वित्त अधिनियम और 2007 के पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट समेत कुछ मौजूदा कानूनों में बदलाव किए गए हैं। इसी 2007 के कानून में किए गए बदलाव को लेकर सबसे ज्यादा विवाद हो रहा है।

विधेयक में पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट की धारा 10A को हटा दिया गया है। यह धारा बैंकों और पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर्स को सरकार की ओर से अधिसूचित डिजिटल भुगतान माध्यमों, जैसे UPI और RuPay डेबिट कार्ड से किए गए लेन-देन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लेने से कानूनी तौर पर रोकती थी। MDR वह शुल्क है, जो किसी डिजिटल भुगतान को प्रोसेस करने के बदले व्यापारी से लिया जाता है। अब तक इसी प्रावधान के कारण UPI भुगतान पर प्रोसेसिंग शुल्क नहीं लिया जा सकता था।

हालाँकि, इस प्रावधान को हटाने का मतलब यह नहीं है कि अब डिजिटल भुगतान पर अपने आप टैक्स लग जाएगा। इस बदलाव के बाद केंद्र सरकार के पास यह तय करने का अधिकार होगा कि किन डिजिटल भुगतान माध्यमों पर शुल्क लगाया जा सकता है और किन पर नहीं।

सीधे शब्दों में कहें तो विधेयक खुद UPI या किसी अन्य डिजिटल भुगतान पर कोई टैक्स नहीं लगाता। इसमें सिर्फ उस कानूनी रोक को हटा दिया गया है, जो डिजिटल भुगतान पर शुल्क लगाने से रोकती थी। यानी अगर भविष्य में सरकार कुछ डिजिटल लेन-देन पर शुल्क लगाने का फैसला करती है, तो वह इसके लिए अलग से अधिसूचना जारी कर सकती है।

संशोधन की जरूरत क्यों पड़ी?

देश में डिजिटल पेमेंट को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने UPI और RuPay से होने वाले लेन-देन पर MDR (Merchant Discount Rate) हटा दिया था। यानी डिजिटल भुगतान करने पर व्यापारियों से प्रोसेसिंग फीस नहीं ली जाती थी। लेकिन इन डिजिटल लेन-देन को चलाने में खर्च होता है, जिसे सरकार बैंकों और पेमेंट कंपनियों को सब्सिडी या दूसरे प्रोत्साहनों के जरिए पूरा करती है।

इसका नतीजा यह हुआ कि पिछले कुछ वर्षों में UPI लेन-देन की संख्या में काफी बढ़ोतरी हुई। खास बात यह है कि सरकार की ओर से दी जाने वाली आर्थिक मदद सिर्फ छोटे व्यापारियों और ₹2,000 तक के छोटे लेन-देन के लिए उपलब्ध है। दूसरी ओर, बैंकों और पेमेंट कंपनियों का खर्च लगातार बढ़ रहा है। इसमें सर्वर को बनाए रखना, ऑनलाइन सुरक्षा यानी साइबर सिक्योरिटी सुनिश्चित करना और पूरे पेमेंट सिस्टम को सुचारू रूप से चलाना शामिल है।

एक संसदीय समिति ने भी कहा है कि MDR के बिना पूरे UPI सिस्टम को आर्थिक रूप से लंबे समय तक चलाना मुश्किल होता जा रहा है, क्योंकि सरकार की सब्सिडी इंडस्ट्री के वास्तविक खर्च का केवल एक छोटा हिस्सा ही पूरा करती है। RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने भी साफ कहा है कि इतने बड़े UPI सिस्टम को हमेशा पूरी तरह मुफ्त चलाना संभव नहीं है। सिस्टम की सुरक्षा बनाए रखने और इसके नेटवर्क को आगे बढ़ाने के लिए पैसे की जरूरत होती है। हालाँकि, उन्होंने यह भी कहा कि इस समय किसी तरह के शुल्क को लेकर अटकल लगाना जल्दबाजी होगी। सरकार की ओर से आधिकारिक अधिसूचना जारी होने के बाद ही स्थिति साफ होगी।

अगर भविष्य में सरकार MDR लागू करने का फैसला करती भी है, तो इसका असर आम लोगों या छोटे कारोबारियों पर पड़ने की संभावना कम है। डिजिटल पेमेंट में ₹2,000 से ज्यादा के लेन-देन पर टैक्स लगने की चर्चा पेमेंट्स काउंसिल ऑफ इंडिया (PCI) की ओर से दिए गए एक प्रस्ताव के बाद शुरू हुई। PCI गैर-बैंकिंग पेमेंट कंपनियों का प्रतिनिधित्व करने वाला एक उद्योग संगठन है। इस संगठन ने पिछले साल सरकार से UPI पर जीरो-MDR की नीति पर दोबारा विचार करने की अपील की थी।

PCI के मुताबिक, सरकार की ओर से हर साल दी जाने वाली करीब ₹1,500 करोड़ की सब्सिडी UPI सिस्टम को चलाने और उसका विस्तार करने के वास्तविक खर्च का केवल एक छोटा हिस्सा है। संगठन ने पूरे UPI इकोसिस्टम को चलाने और विस्तार देने का सालाना खर्च करीब ₹10,000 करोड़ बताया था।

PCI ने सरकार से सुझाव दिया था कि MDR सिर्फ बड़े कारोबारियों से लिया जाए, जिनका सालाना टर्नओवर ₹50 करोड़ से ज्यादा है। इसके अलावा ₹2,000 से ज्यादा के लेन-देन पर 0.3% से 0.5% तक MDR लगाने का प्रस्ताव दिया गया था।

इसका मतलब यह हुआ कि अगर किसी बड़े रिटेल स्टोर या ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर ₹2,000 से ज्यादा का भुगतान किया जाता है, तो उस बड़े कारोबारी से बैंक डिजिटल भुगतान को प्रोसेस करने के लिए मामूली MDR ले सकता है। लेकिन यह सिर्फ एक प्रस्ताव है और सरकार ने इसे अभी लागू नहीं किया है।

इसलिए फिलहाल जो डिजिटल लेन-देन अब तक बिना किसी शुल्क के हो रहे थे, वे बिना शुल्क के ही जारी रहेंगे, जब तक सरकार की ओर से कोई नया बदलाव अधिसूचित नहीं किया जाता।

साथ ही, ऊपर दी गई जानकारी से यह भी साफ है कि कानून में किया गया यह बदलाव अमेरिका या किसी दूसरे बाहरी दबाव की वजह से नहीं है। यह एक आर्थिक और राजकोषीय कदम है, न कि UPI की भुगतान नीति में अचानक किया गया कोई बड़ा बदलाव। UPI से जुड़ा यह प्रावधान सरकार की ओर से किए गए कई अन्य कानूनी और आर्थिक बदलावों वाले एक बड़े पैकेज का सिर्फ एक हिस्सा है।

‘F*cking Old Man तुम्हें थप्पड़ पड़ेगा’: कौन है PM मोदी को गाली देने और मारने की बात करने वाली CEO मुग्धा प्रधान, नेटिजन्स ने लताड़ा तो इंस्टा डिलीट कर भागी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर iThrive की CEO और फाउंडर मुग्धा प्रधान का एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। वीडियो में यह महिला पीएम मोदी और केंद्र सरकार के कामकाज को लेकर काफी गुस्से में नजर आती दिखाई दे रही है। इसी दौरान मुग्धा प्रधान वीडियो में कहती हैं कि अगर वह पीएम मोदी से मिलेंगी तो उन्हें ‘एक थप्पड़’ देंगी। बता दें कि जंतर-मंतर पर हुई उग्र प्रदर्शन और हिंसा को मुग्धा प्रदान सपोर्ट करती नजर आती है और गालीबाजों पर कार्रवाई को लेकर ये भड़क जाती है, जिसके बाद इनकी भड़ास वीडियो में साफ दिखाई देती है।

वीडियो में मुग्धा प्रधान अन्य मुद्दों को भी कहती नजर आती है। इसके अलावा, वीडियो वायरल होने के बाद सोशल मीडिया पर मुग्धा प्रधान पर नेटीजन्स का गुस्सा फूट पड़ा है। लोग इस महिला की आलोचना कर रहे हैं। मुग्धा प्रधान कोई सामान्य सोशल मीडिया यूजर नहीं हैं। वह हेल्थ और वेलनेस कंपनी iThrive की फाउंडर और CEO हैं। वह फंक्शनल न्यूट्रिशन के क्षेत्र में काम करती हैं। उनके पास फूड साइंस और न्यूट्रिशन में मास्टर डिग्री है। इतनी पढ़ी-लिखी होने के बावजूद भी गाली देने वालों को ये सपोर्ट करती है और भारत के प्रधानमंत्री के खिलाफ बयानबाजी करती है। आईए जानते हैं, मुग्धा प्रधान ने क्या-क्या कहा है।

वीडियो में क्या भड़ास निकाल रही है मुग्धा प्रधान?

Viral Video में मुग्धा प्रधान काफी गुस्से में नजर आ रही है, ऐसा लग रहा है कि वीडियो से बाहर निकलते ही किसी ना किसी को लपेट ही देंगी। वीडियों में मुग्धा प्रधान कहती हैं, मैं उन सभी बूढ़े आदमियों को थप्पड़ मारना चाहती हूँ जो सोचते हैं कि उन्हें औरतों और बच्चों के गुस्से को दबाने का हक है। जरा देखिए लोग क्या-क्या कर जाते हैं। आपको गाली गंदी लगती है, पर इस देश की सड़कें देखिए, जिन्हें मिसाल बनना चाहिए। मैं प्रकृति के बीच टहलने गई थी और एक पेड़ के नीचे कचरे के ढेर लगे थे। आप उस गंदगी को साफ़ क्यों नहीं कर सकते? आपको वह गंदगी क्यों नहीं दिखती? बेवकूफ लोग।”

इससे आगे मुग्धा प्रधान कहती है, “आपके अंदर ही गंदगी है तो आपको बाहर की गंदगी कैसे दिखेगी? प्रकृति में जो कुछ भी दिख रहा है, उसे एक गंदा शब्द कहा जा रहा है और मुझे लगता है कि आख़िरकार कोई आपको वह सच कह रहा है जिसके आप हकदार हैं और इसीलिए आपको इतना बुरा लग रहा है कि देश के PM होकर आप बैठकर कह रहे हैं कि आप माफ कर रहे हैं। अगर मैं आपसे मिली तो मैं आपको एक ‘माफ करने वाला’ थप्पड़ जरूर मारूँगी। एक बूढ़ा आदमी जिसे वहाँ नहीं होना चाहिए, निकल जाओ, मेरे देश से निकल जाओ, अपनी सत्ता से हट जाओ, निकल जाओ, अब समय आ गया है कि युवा लोग जिम्मेदारी संभालें।”

मुग्धा प्रधान ने पहले भी पीएम मोदी को लेकर एक वीडियो जारी किया था। इसमें ये बार-बार गाली देने वालों को सपोर्ट करती नजर आ रही है और पीएम मोदी के खिलाफ अपनी भड़ास निकालती दिख रही है।

कौन हैं PM मोदी को ‘थप्पड़’ मारने की इच्छा रखने वाली मुग्धा प्रधान?

PM मोदी को ‘थप्पड़’ मारने की इच्छा रखने वाली मुग्धा प्रधान पुणे से जुड़ी फंक्शनल न्यूट्रिशनिस्ट हैं। वह हेल्थ और वेलनेस के क्षेत्र में काम करती हैं। मुग्धा प्रधान ने iThrive नाम की कंपनी शुरू की। आज वह इसी कंपनी की CEO भी हैं।

iThrive का काम हेल्थ, न्यूट्रिशन और वेलनेस से जुड़ा है। कंपनी लोगों की स्वास्थ्य समस्याओं को लेकर फंक्शनल न्यूट्रिशन का तरीका अपनाने की बात करती है। इसमें सिर्फ बीमारी के लक्षणों पर ध्यान देने के बजाय उसके पीछे के कारणों को समझने की कोशिश की जाती है। लेकिन मुग्धा की इस वीडियो को देखकर लगता है कि उन्हें खुद ट्रीटमेंट की जरूरत है।

iThrive की वेबसाइट के मुताबिक, मुग्धा प्रधान के पास MSc फ़ूड साइंस और न्यूट्रिशन की डिग्री है। उन्होंने 2001 में अपनी मास्टर डिग्री पूरी की थी। इसके बाद उन्होंने कॉरपोरेट सेक्टर में भी काम किया। वह Flipkart की शुरुआती HR टीम का हिस्सा रह चुकी हैं। बाद में उन्होंने हेल्थ और न्यूट्रिशन के क्षेत्र में काम शुरू किया।

मुग्धा प्रधान साल 2017 में तीन बड़ी स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ चुकी है। मुग्धा ने क्लिनिकल डिप्रेशन, मोटापे और Hashimoto’s thyroiditis यानी एक ऑटोइम्यून बीमारी का जिक्र भी किया है।

मुग्धा प्रधान की प्रोफाइल में उन्हें दो बार TEDx स्पीकर बताया गया है। वह ‘Health, Inc.’ नाम की किताब की लेखिका भी हैं। कंपनी की वेबसाइट के अनुसार, यह किताब ग्लोबल हेल्थकेयर सिस्टम और उसके काम करने के तरीके पर आधारित है।

PM मोदी पर टिप्पणी करने वाली मुग्धा प्रधान पर नेटीजन्स का फूटा गुस्सा

वीडियो वायरल होने के बाद सोशल मीडिया यूजर्स ने सिर्फ मुग्धा प्रधान के बयान पर ही सवाल नहीं उठाए। कुछ लोगों ने iThrive के कारोबार और उसकी छवि को भी चर्चा में ला दिया। कुछ यूजर्स का कहना है कि हेल्थ और वेलनेस कंपनी के प्रमुख व्यक्ति का सार्वजनिक व्यवहार कंपनी की छवि पर असर डाल सकता है। कुछ पोस्ट में लोगों से पूछा गया कि क्या वे ऐसी कंपनी के उत्पाद खरीदना चाहेंगे जिसकी CEO इस तरह की भाषा का इस्तेमाल करती हैं।

एक यूजर लिखते हैं, iThrive कंपनी की सीईओ PM मोदी को बुरा-भला कहने में लगी हुई हैं। ऐसा लगता है कि उन्हें खुद ही बेहतर सप्लीमेंट्स की ज़रूरत है। सोचने वाली बात यह है कि जब कंपनी की सबसे बड़ी अधिकारी सबके सामने इतनी ज़्यादा नफ़रत और संयम की कमी दिखाती हैं, तो इससे उस ब्रांड की समझदारी और विश्वसनीयता के बारे में क्या पता चलता है?”

अभिजीत मजूमदार लिखते हैं, ” पीएम मोदी के लिए अपशब्दों का इस्तेमाल करने वाली मुग्धा प्रदान को देखकर ऐसा लगता है कि उन्हें मानसिक स्वास्थ्य संबंधी मदद की बहुत जरूरत है। वह बहुत परेशान और अस्थिर लग रही हैं। क्या कोई उनके ब्रांड और उसके प्रोडक्ट्स पर भरोसा कर सकता है?”

राकेश कृष्णन सिंहा लिखते हैं, “एक और पाखंडी से मिलिए। हेल्थ और वेलनेस कंपनी ‘iThrive’ की CEO और फाउंडर मुग्धा प्रधान, जंतर-मंतर पर हो रहे विरोध प्रदर्शनों को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपशब्द कह रही हैं। इस गंदी ज़बान वाली महिला को देखकर ऐसा लगता है जैसे वह किसी गटर में ही पैदा हुई हो। ये सभी नकली लोग FCRA की वजह से बहुत हताश हैं। FCRA जैसे जवाबदेही कानूनों के कारण, बकवास करने और भोले-भाले लोगों को ठगने के उनके सपने पूरे करना मुश्किल होता जा रहा है। उनकी स्पीच, उनकी बेकाबू हताशा भरी बकवास और उनकी साइट पर लिखी बातों को देखिए – सब कुछ एक-दूसरे के बिल्कुल उलट है। ‘सत्-चित्-आनंद’ तो कुछ ही सेकंड में फुस्स हो गया।”

एक यूजर ने फंडिंग को लेकर भी आरोप लगाया है, जिसमें दावा किया है, “iThrive की इस महिला को हांगकांग स्थित ‘फंग स्ट्रैटेजिक इन्वेस्टमेंट्स’ से निवेश मिला है। यही वजह है कि वह हमारे माननीय प्रधानमंत्री के लिए अपशब्दों का इस्तेमाल कर रही हैं। ऐसा लगता है कि वह चीन की एक ‘एसेट’ (मोहरा) हैं। कृपया उचित कानूनी कार्रवाई करें।”

‘iThrive’ की सीईओ मुग्धा प्रधान की कंपनी को हांगकांग की एक फर्म ‘फंग स्ट्रेटेजिक इन्वेस्टमेंट्स’ से पैसा मिलता है। जाँच करने पर पता चलता है कि ‘फंग स्ट्रेटेजिक इन्वेस्टमेंट्स’ (जिसे फंग इन्वेस्टमेंट्स भी कहते हैं) कोई आम कंपनी नहीं है। यह हांगकांग के बहुत अमीर फंग परिवार का निजी पारिवारिक निवेश दफ्तर है, जो उनके विशाल ‘फंग ग्रुप’ के लिए काम करता है। इस पूरी संस्था के मुख्य मालिक और फैसले लेने वाले डॉक्टर विक्टर के फंग (चेयरमैन) और डॉक्टर विलियम फंग (डिप्टी चेयरमैन) हैं, जो दोनों आपस में भाई हैं। यह फंग ग्रुप मुख्य रूप से सामान सप्लाई करने के व्यापार से जुड़ा हुआ है।

वित्तीय (Financial) दस्तावेजों के मुताबिक, पुणे की इस हेल्थ स्टार्टअप ‘iThrive’ में कुछ व्यक्तिगत लोगों ने पैसे लगाए हैं। इनमें फंग स्ट्रेटेजिक इन्वेस्टमेंट्स के कार्यकारी निदेशक राजेश रनावत और एनबी वेंचर्स के प्रबंध निदेशक नीलेश भटनागर के नाम शामिल हैं। राजेश रनावत ने इसमें एक निजी निवेशक के तौर पर पैसा लगाया था।

CJP के प्रदर्शन में PM मोदी को दी गई गालियाँ, उन्होंने किया था माफ

हाल ही में दिल्ली के जंतर-मंतर पर नीट (NEET) पेपर लीक और अन्य मुद्दों को लेकर ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) के नेतृत्व में विरोध प्रदर्शन किया गया था। इस प्रदर्शन के दौरान कुछ नाबालिग बच्चों और युवाओं द्वारा PM मोदी और उनकी दिवंगत माता को गालियाँ तक दी गई थीं।

गाली गलौज का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद काफी विवाद हुआ और एक नाबालिग लड़की के खिलाफ शिकायत भी दर्ज कराई गई थी। विवाद बढ़ने और बच्ची द्वारा अपनी गलती पर रोते हुए देश से माफी माँगने के बाद, PM मोदी ने इंस्टाग्राम पर एक वीडियो संदेश जारी किया। इस वीडियो में उन्होंने इन युवाओं को माफ करने का ऐलान किया था।

उन्होंने कहा था, “एक कल्चरल शौक है कि हमारी बेटियाँ इस प्रकार की भाषा कैसे बोल सकती है? लेकिन समय है इन बच्चों को गले लगा के राह दिखाने का। एक गुमराह बच्चे हैं। उनको राह दिखाना हमारा काम है। मेरे मन में एक ही भाव है। कभी-कभी दाँतों तले हमारी जीभ आ जाती है। खून निकल आता है। लेकिन हम दाँत तोड़ते नहीं है। क्योंकि दाँत भी हमारे हैं। जीभ भी हमारी है। बच्चे भी हमारे हैं। उन्हें राह दिखाना हमारा काम है।”