दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्रों के लगातार प्रदर्शन, संसद मार्च, परीक्षा प्रणाली पर उठे गंभीर सवालों के बीच सरकार यह कड़ा संशोधित कानून लेकर आई है। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने इस मौके पर विपक्ष से अपील भी की है कि बच्चों के भविष्य से जुड़े इस रिफॉर्म पर राजनीति या बहानेबाजी न की जाए और यह बिल सरकार की प्राथमिकता है।
हालाँकि इससे पहले वर्ष 2024 में पहला राष्ट्रीय एंटी पेपर लीक कानून लागू किया गया था, लेकिन पिछले 2 साल में सामने आई गड़बड़ियों के बाद सरकार इस निष्कर्ष पर पहुँची कि सिर्फ कानून बनाना काफी नहीं है बल्कि जाँच, मुकदमे और सजा की प्रक्रिया को तेज करना बेहद जरूरी है।
नए संशोधन विधेयक की आवश्यकता क्यों? ये पुराने कानून से कितना अलग?
वर्ष 2024 में जब पहला राष्ट्रीय एंटी पेपर लीक कानून बनाया गया था, तब उसका मुख्य उद्देश्य संघ लोक सेवा आयोग, कर्मचारी चयन आयोग, नेशनल टेस्टिंग एजेंसी, रेलवे और बैंकिंग जैसी सार्वजनिक परीक्षाओं में धोखाधड़ी रोकना था। लेकिन बीते सालों में यह बात पूरी तरह साफ हो चुकी है कि पेपर लीक अब किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं है। इसके पीछे संगठित गिरोह, तकनीकी नेटवर्क और भारी आर्थिक लाभ कमाने वाले बड़े रैकेट सक्रिय हैं।
NEET-UG 2026 के विवाद के बाद छात्रों ने देशभर में आंदोलन शुरू किया, जिससे परीक्षा तंत्र में व्यापक सुधार की माँग तेज हो गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी परीक्षा प्रणाली को मजबूत बनाने और फास्ट ट्रैक कोर्ट जैसी व्यवस्था का संकेत दिया था। इसी के बाद केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इस संशोधन विधेयक को मंजूरी दी। सरकार का मानना है कि पुराने कानून के बावजूद परीक्षा माफिया में डर पैदा करने और व्यवस्था को पूरी तरह सुरक्षित बनाने के लिए कानूनी ढिलाई को समाप्त करना बेहद आवश्यक हो गया था।
सजा और जुर्माने के प्रावधानों में बड़ा इजाफा
नए संशोधन विधेयक संख्या 139-2026 के माध्यम से अपराधियों के लिए सजा और जुर्माने की दरों में काफी भारी बढ़ोतरी की गई है। अधिनियम की धारा 10 के तहत अनुचित साधनों का इस्तेमाल करने वालों के लिए न्यूनतम सजा को 3 साल से बढ़ाकर 5 साल कर दिया गया है, जिसे अधिकतम 10 साल तक बढ़ाया जा सकता है।
इसके साथ ही दोषियों पर अधिकतम 50 लाख रुपए तक का जुर्माना लगाया जा सकेगा। अगर बात संगठित अपराध की करें तो धारा 11 के तहत न्यूनतम सजा को 5 साल से बढ़ाकर 7 साल कर दिया गया है। 2024 के कानून में पेपर लीक या संगठित अपराध के लिए 10 लाख से 1 करोड़ रुपए तक के जुर्माने का प्रावधान था।
वहीं अब नए विधेयक में न्यूनतम जुर्माना ही 1 करोड़ रुपए से बढ़ाकर 10 करोड़ रुपए तक कर दिया गया है। कठोर सजा और 10 करोड़ रुपए जैसे भारी जुर्माने का मुख्य उद्देश्य यही है कि आर्थिक लाभ के लिए परीक्षाओं में हेरफेर करने वाले माफियाओं की कमर तोड़ी जा सके और इस तरह के अपराधों पर पूरी तरह रोक लगाई जा सके।
जाँच प्रक्रिया और स्पेशल टास्क फोर्स का गठन
पुराने 2024 के कानून में सबसे बड़ी कमी यह थी कि उसमें जाँच पूरी करने के लिए कोई निश्चित समय सीमा तय नहीं की गई थी, जिससे मामले सालों-साल खिंचते रहते थे। नए संशोधन विधेयक में इस व्यवस्था को पूरी तरह बदलते हुए जाँच के लिए 2 महीने यानी 60 दिनों की सख्त समय सीमा तय की गई है।
चाहे जाँच किसी अधिकृत पुलिस अधिकारी द्वारा की जा रही हो या किसी केंद्रीय जाँच एजेंसी द्वारा, FIR दर्ज होने, संदर्भ मिलने या अधिसूचना जारी होने के दिन से 2 महीने के अंदर जाँच पूरी करना अनिवार्य होगा। मामलों की गहन और त्वरित जाँच के लिए केंद्र सरकार को आवश्यकता पड़ने पर एक विशेष स्पेशल टास्क फोर्स (STF) गठित करने का भी अधिकार है।
पहले केंद्रीय जाँच एजेंसियाँ सामान्य प्रक्रिया के तहत काम करती थीं, लेकिन अब STF का गठन होने से पेपर लीक के मामलों में विशेषज्ञता के साथ तेजी से कार्रवाई की जा सकेगी।
स्पेशल फास्ट ट्रैक कोर्ट में 3 माह के भीतर ट्रायल
कानूनी प्रक्रिया को गति देने के लिए नए विधेयक का सबसे अहम पहलू अदालती सुनवाई को समयबद्ध बनाना है। पुराने कानून में मामलों की सुनवाई सामान्य कोर्ट में होती थी और फैसले की कोई समय सीमा नहीं थी। अब नए संशोधन के तहत राज्य सरकारें और केंद्र शासित प्रदेश संबंधित हाई कोर्ट के मुख्य जज से परामर्श करके विशेष फास्ट ट्रैक कोर्ट नामित करेंगे।
ये विशेष अदालतें इस अधिनियम के साथ-साथ भारतीय न्याय संहिता 2023 या अन्य संबंधित कानूनों के तहत दर्ज मामलों की संयुक्त सुनवाई करेंगी। इन अदालतों में प्रतिदिन सुनवाई होगी और बिना किसी उचित लिखित कारण के स्थगन नहीं दिया जाएगा। चार्जशीट दाखिल होने के बाद कोर्ट को 3 महीने के भीतर मुकदमा पूरा करके फैसला सुनाना होगा।
इतना ही नहीं संशोधन कानून लागू होने के समय जितने भी मामले लंबित होंगे, उन्हें भी इन स्पेशल Fast Track Courts में स्थानांतरित कर दिया जाएगा और उन्हें भी वहाँ पहुँचने के 3 महीने के भीतर निपटाना अनिवार्य होगा।
अपील की प्रक्रिया और संपूर्ण परीक्षा तंत्र की जवाबदेही
नए कानून के तहत हर राज्य और केंद्र शासित प्रदेश को प्रत्येक विशेष फास्ट ट्रैक कोर्ट के लिए एक या अधिक विशेष लोक अभियोजक यानी स्पेशल पब्लिक प्रॉसिक्यूटर नियुक्त करने होंगे। इन विशेष अदालतों के फैसलों, सजा या आदेश के खिलाफ संबंधित उच्च न्यायालय में दो जजों की पीठ के समक्ष अपील की जा सकेगी।
हाई कोर्ट में अपील करने के लिए सामान्यतः 30 दिनों का समय तय किया गया है, जिसे विशेष परिस्थितियों में अधिकतम 90 दिनों तक बढ़ाया जा सकता है। हाई कोर्ट को भी ऐसी अपीलों का निस्तारण याचिका दाखिल होने के 3 महीने के भीतर करना होगा। इसके अलावा नए कानून में पूरे परीक्षा तंत्र की जवाबदेही तय की गई है।
कार्रवाई सिर्फ पेपर लीक करने वाले तक सीमित नहीं होगी। यदि किसी परीक्षा आयोजित करने वाली सेवा प्रदाता एजेंसी, आईटी कंपनी, डेटा प्रबंधन संस्था, परीक्षा केंद्र संचालक या उनके वरिष्ठ अधिकारियों की मिलीभगत पाई जाती है तो उनके खिलाफ भी आपराधिक केस चलेगा।
सेवा प्रदाता एजेंसियों के लिए अधिकतम जुर्माना 1 करोड़ से बढ़ाकर 5 करोड़ रुपए कर दिया गया है और उन पर प्रतिबंध की अवधि 4 साल से बढ़ाकर 8 साल कर दी गई है। ऐसी संस्थाओं के दोषी निदेशकों या अधिकारियों को भी कम से कम 5 साल की जेल और 5 करोड़ रुपए तक के जुर्माने की सजा मिलेगी।
परीक्षा प्रणाली में तकनीकी सुधार और NTA का पुनर्गठन
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल सख्त कानून बनाने से पेपर लीक पूरी तरह नहीं रुकेगा, जब तक कि परीक्षा प्रणाली को भीतर से सुरक्षित न बनाया जाए। इसी को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार कानूनी कार्रवाई के साथ-साथ नेशनल टेस्टिंग एजेंसी में भी व्यापक संस्थागत सुधार कर रही है।
NTA के पुनर्गठन की प्रक्रिया के तहत अब तक 47 अधिकारियों की सेवाएँ समाप्त की जा चुकी हैं और कुछ के खिलाफ कानूनी व आपराधिक कार्रवाई की तैयारी चल रही है। अगले एक महीने के भीतर पूरी होने वाली इस प्रक्रिया में एजेंसी की आउटसोर्सिंग व्यवस्था की समीक्षा की जा रही है और नए वरिष्ठ प्रबंधन के साथ-साथ विषय विशेषज्ञों की नियुक्तियाँ की जा रही हैं।
साइबर सुरक्षा, डिजिटल फॉरेंसिक, टेस्ट सेंटर मैनेजमेंट, साइकोमेट्रिक्स और परीक्षा केंद्रों की निगरानी को मजबूत किया जा रहा है। इसके साथ ही भविष्य में अधिक से अधिक परीक्षाओं को कंप्यूटर आधारित यानी CBT मोड पर आयोजित करने, प्रश्नपत्रों को पूरी तरह एनक्रिप्टेड बनाने और परीक्षा केंद्रों के नियमित ऑडिट पर जोर दिया जा रहा है ताकि छात्रों का विश्वास सरकारी परीक्षा प्रणाली पर पुनः पूरी तरह बहाल हो सके।


