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‘द वायर’ के समर्थन में आई PM मोदी से बदसलूकी करने वाली नार्वे की प्रोपेगेंडाबाज हेले लिंग: जानें- कैसे विदेशी ‘एक्टिविस्ट’ और वामपंथी मीडिया मिलकर दे रहे भारत विरोधी नैरेटिव को हवा

PM मोदी के नॉर्वे दौरे के दौरान एक पब्लिसिटी स्टंट करके सुर्खियाँ बटोरने वाली नॉर्वे की तथाकथित ‘पत्रकार’ हेले लिंग ने वामपंथी प्रोपेगैंडा आउटलेट ‘द वायर’ का समर्थन किया है। उन्होंने भारत से जुड़ी जानकारी के लिए एक भरोसेमंद स्रोत के तौर ‘द वायर’ को माना है। इस समर्थन से ये साफ हो गया है कि पीएम मोदी के दौरे के दौरान नॉर्वे में जो हेले लिंग ने प्रधानमंत्री मोदी से बदसलूकी थी, उसकी पटकथा पहले ही राजनीतिक नैरेटिव गढ़ने के लिए वामपंथी प्रोपेगेंडाबाजों ने लिख रखी थी

हेले लिंग के ‘द वायर’ को दिए गए समर्थन ने एक बार फिर इस बात की चर्चा छेड़ दी है कि भारत का वाम-उदारवादी मीडिया तंत्र विदेशी टिप्पणीकारों और प्रकाशनों का उपयोग करके भारत के लोकतांत्रिक संस्थानों और नेतृत्व को निशाना बनाने वाले दुष्प्रचार को बढ़ावा देता है।

ताजा विवाद तब शुरू हुआ जब द वायर ने शुक्रवार, 29 मई को X पर अपनी स्थापना के 11 साल पूरे होने का जश्न मनाते हुए एक पोस्ट किया, जबकि टेक फॉग और मेटा जैसे विवादों में भी यह पत्रिका फर्जी खबरों और गलत सूचनाओं से घिरी रही है। इस पोस्ट को साझा करते हुए नॉर्वेजियन पत्रकार हेले लिंग ने लिखा, “मैं द वायर की जितनी भी तारीफ करूँ कम है। भारत के बारे में पढ़ने के लिए मैं आगे भी इस पर ही भरोसा करूँगी।”

इस पोस्ट ने तुरंत लोगों का ध्यान आकर्षित किया, क्योंकि लिंग खुद इस महीने की शुरुआत में भारत को बदनाम करने की कोशिश कर चुकी हैं। उन्होंने जबरदस्ती प्रोटोकॉल को तोड़ते हुए पीएम मोदी को परेशान करने की कोशिश की।

हेले लिंग कौन हैं, और वह अचानक इतनी प्रसिद्ध क्यों हो गईं?

नॉर्वेजियन प्रकाशन डैग्सविसन के साथ काम करने वाली हेले लिंग 18 मई तक सोशल मीडिया पर कोई नहीं जानता था। काफी कम उनके फॉलोवर्स थे। उन्होंने भारत-नॉर्वे के संयुक्त बयान कार्यक्रम के दौरान पीएम मोदी से बदसलूकी की।

उस समय, X पर लिंग के मुश्किल से 800 फॉलोअर्स थे, और उनका अकाउंट महीनों से निष्क्रिय था। हालांकि, भारत में कथित ‘मानवाधिकार उल्लंघन’ के संबंध में प्रधानमंत्री मोदी से सवाल पूछने को लेकर वामपंथी मीडिया काफी उत्साहित दिखा। घटना के वीडियो भारतीय विपक्षी हलकों और वाम-उदारवादी सोशल मीडिया नेटवर्क पर तेजी से वायरल किया गया।

संयुक्त बयान के बाद जब प्रधानमंत्री मोदी बिना कोई जवाब दिए चले गए, तो लिंग ने चिल्लाकर कहा, “प्रधानमंत्री मोदी, आप दुनिया की सबसे स्वतंत्र प्रेस के सवाल का जवाब क्यों नहीं देते?” बाद में उन्होंने गर्व से ऑनलाइन पोस्ट किया कि उन्हें उनसे जवाब की उम्मीद भी नहीं थी।

इसके तुरंत बाद वह मोदी विरोधी टिप्पणीकारों और मीडिया में छा गई। कई विपक्षी नेताओं ने भी उनके वीडियो को खूब प्रचारित किया। कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी ने क्लिप साझा करते हुए लिखा, “जब छिपाने के लिए कुछ नहीं होता, तो डरने के लिए भी कुछ नहीं होता।”

(साभार-एक्स)

टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा और प्रचारक राणा अय्यूब ने भी लिंग की सराहना की। राणा अय्यूब ने पोस्ट किया, “प्रधानमंत्री मोदी की नॉर्वे यात्रा के दौरान भारतीय लोकतंत्र का प्रदर्शन देखने को मिला।”

नॉर्वे स्थित भारतीय दूतावास ने बाद में स्पष्ट किया कि यह भारत और नॉर्वे के प्रधानमंत्रियों का संयुक्त बयान था। पत्रकारों के सवाल जवाब और मीडिया ब्रीफिंग शाम में विदेश मंत्रालय को करना पहले से तय था।

लिंग की अचानक भारत में बढ़ी दिलचस्पी

खास बात यह है कि लिंग ने पहले भारत को गहराई से अध्ययन भी नहीं किया था। भारत पर उसकी अधिकांश कवरेज टैरिफ, व्यापार या भूकंप जैसी सामान्य वैश्विक घटनाओं से जुड़ी थी। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा के दौरान वह अचानक भारत के लोकतंत्र और राजनीतिक व्यवस्था पर सवाल उठाने लगी। खबरों को आक्रामक रूप से प्रकाशित करना शुरू कर दिया।

आलोचकों ने लिंग की सोशल मीडिया गतिविधियों की भी जानकारी दी। मई 2026 में उसने विवाद पर सोशल मीडिया में बहस से ठीक पहले, एक्स प्रीमियम वेरिफिकेशन खरीदा था। इससे साबित होता है कि उनके इर्द-गिर्द फैला वायरल अभियान स्वाभाविक नहीं था और इसे राजनीतिक संदेश के लिए सुनियोजित तरीके से बढ़ाया गया था। भारत की राजनीति और लोकतंत्र में अचानक गहरी दिलचस्पी दिखाने से पहले उन्होंने अपने सोशल मीडिया अकाउंट्स पर भारत के बारे में शायद ही कोई पोस्ट किया था, जिससे इस बात को लेकर अटकलें तेज हो गईं कि भारतीय मामलों पर उनकी इस नई सक्रियता के पीछे कौन या क्या हो सकता है।

(साभार-एक्स)

विदेश मंत्रालय के अधिकारियों ने लिंग को करारा जवाब दिया

नॉर्वे स्थित भारतीय दूतावास ने बाद में लिंग को विदेश मंत्रालय द्वारा आयोजित आधिकारिक मीडिया ब्रीफिंग में आमंत्रित किया । इस बातचीत के दौरान, लिंग ने एक बार फिर लोकतंत्र और मानवाधिकारों से संबंधित जटिल प्रश्न पूछकर भारतीय अधिकारियों को घेरने का प्रयास किया।

हालाँकि, विदेश मंत्रालय के सचिव सिबी जॉर्ज ने दृढ़ता से जवाब दिया और उन्हें बार-बार याद दिलाया कि जब वह जवाब दे रहे हों तो उन्हें बीच में दखल नहीं देना चाहिए।

जॉर्ज ने कहा, “आपने मुझसे सवाल पूछा है, मुझे इसका जवाब देने दीजिए,”

जब लिंग ने बार-बार टोकना जारी रखा, तो उन्होंने कहा, “कृपया मुझे बीच में न टोकें। यह मेरी प्रेस कॉन्फ्रेंस है।”

जॉर्ज ने भारत के संवैधानिक ढाँचे, व्यापक मतदाता भागीदारी और कोविड महामारी और जी20 की अध्यक्षता के दौरान देश के वैश्विक योगदान का हवाला देते हुए भारत की लोकतांत्रिक साख का बचाव किया।

उन्होंने कहा, “हमें इस बात पर गर्व है कि हम 5000 साल पुरानी सभ्यता वाला देश हैं।”

उन्होंने चुनिंदा रिपोर्टिंग को लेकर भी कहा, “लोग कुछ अज्ञानी और नासमझ गैर-सरकारी संगठनों द्वारा प्रकाशित एक-दो समाचार रिपोर्ट पढ़ते हैं और फिर आकर सवाल पूछते हैं। चिंता मत कीजिए। हमें लोकतंत्र होने पर गर्व है।”

जब तक जॉर्ज ने अपना विस्तृत जवाब पूरा किया, तब तक खबरों के अनुसार लिंग कमरे से बाहर जा चुकी थी।

फर्जी खबरें फैलाने और मनगढ़ंत कहानियां गढ़ने में उस्ताद है ‘द वायर’

हेले लिंग ने द वायर का समर्थन किया है। उसके ताजा बयान से ‘द वायर’ की पत्रकारिता से जुड़े रिकॉर्ड की आलोचना फिर से तेज हो गई है। पिछले कई वर्षों से, द वायर पर भ्रामक रिपोर्टें, अधूरी पुष्टि वाली खबरें और भारतीय सरकार तथा हिंदू संगठनों को निशाना बनाने वाली राजनीतिक रूप से प्रेरित कहानियाँ प्रकाशित करने के आरोप लगते रहे हैं।

यह प्लेटफॉर्म अक्सर तथ्यात्मक रिपोर्टिंग के बजाय कथा-निर्माण को प्राथमिकता देता है, खासकर संवेदनशील सांप्रदायिक या राजनीतिक मुद्दों में। इस प्रकाशन को पहले भी कई विवादास्पद रिपोर्टों के लिए कानूनी नोटिस, मानहानि के मुकदमे और सार्वजनिक खंडन का सामना करना पड़ा है।

इसके सबसे चर्चित विवादों में से एक गृह मंत्री अमित शाह के बेटे जय शाह को निशाना बनाने वाली एक रिपोर्ट से जुड़ा था। इस रिपोर्ट के कारण द वायर के खिलाफ 100 करोड़ रुपये का मानहानि का मुकदमा दायर किया गया।

एक और बड़ा विवाद तब हुआ, जब इस प्लेटफॉर्म ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की, जिसमें केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल पर पीरामल समूह में निवेश को लेकर वित्तीय गड़बड़ी का आरोप लगाया गया। इसमें दावा किया गया था कि उन्होंने प्रधानमंत्री कार्यालय को पूरी तरह से अंधेरे में रखा।

पीरामल समूह ने तुरंत एक आधिकारिक बयान जारी कर रिपोर्ट को ‘पूरी तरह से निराधार’ और ‘सिद्धांतहीन’ बताया। स्वतंत्र मीडिया निगरानी संस्थाओं ने बाद में रिपोर्ट में वित्तीय गडबड़ी की बात को हटा कर संरचनात्मक अनियमितता की बात की। पोर्टल ने शिरडी इंडस्ट्रीज नामक एक डिफॉल्टिंग कंपनी के बारे में रोहिणी सिंह द्वारा लिखे गए एक लेख में गोयल पर फिर से निशाना साधा, लेकिन बुनियादी तथ्य-जाँच से पता चला कि संबंधित कॉर्पोरेट ऋण गोयल के सार्वजनिक पद संभालने से वर्षों पहले लिए गए थे।

केंद्रीय उत्पाद शुल्क और सीमा शुल्क बोर्ड (सीबीईसी) ने भी अतीत में अडानी समूह के बारे में ‘तथ्यात्मक और कानूनी रूप से गलत’ रिपोर्टिंग के लिए द वायर की सार्वजनिक रूप से आलोचना की थी।

इस प्लेटफॉर्म को इससे जुड़े कुछ पत्रकारों और टिप्पणीकारों के आचरण और रिपोर्टिंग शैली के लिए भी बार-बार आलोचना का सामना करना पड़ा।

यह प्रकाशन वस्तुनिष्ठ रिपोर्टिंग की बजाय कथा गढ़ने को प्राथमिकता देने की अपनी आदत के लिए जाना जाता है, खासकर जब बात मुस्लिम समुदाय के सदस्यों द्वारा किए गए जघन्य अपराधों की हो। वर्षों से यह संगठन लगातार ऐसी घटनाओं को छिपाने का प्रयास करता रहा है अक्सर अपराधियों को पीड़ित और वास्तविक पीड़ितों को हमलावर के रूप में पेश करता है।

यह पैटर्न नया नहीं है। 2002 के गोधरा नरसंहार और 2020 के हिंदू विरोधी दिल्ली दंगों से लेकर उदयपुर में कन्हैयालाल की क्रूर हत्या तक, ‘द वायर’ का इतिहास रहा है कि वह प्रतिक्रियावादी हिंदू आक्रोश को उन इस्लामी हमलों से कहीं बड़ा खतरा बताता है, जिन्होंने असल में आक्रोश को जन्म दिया था।

समन्वय और वैश्विक कथा-निर्माण से संबंधित प्रश्न

हेले लिंग ने जिस तरह से द वायर पर अपना विश्वास जताया है। इससे ये सवाल उठ रहा है कि कैसे कुछ अंतरराष्ट्रीय प्रचारक, तथाकथित पत्रकार और द वायर और न्यूजलॉन्ड्री जैसे वामपंथी भारतीय मीडिया के कुछ वर्ग मिलकर अक्सर भारत विरोधी आख्यानों को बढ़ावा देते हैं।

नॉर्वे यात्रा के दौरान कुछ भारतीय पत्रकारों और लिंग के बीच आपसी साँठगाँठ पर भी सवाल उठाए गए। लिंग ने हिंदू पत्रकार सुहासिनी हैदर से जुड़े वीडियो साझा किए, वहीं हैदर ने भी लिंग के वीडियो को ऑनलाइन प्रसारित किया।

इस तरह की घटनाएँ दर्शाती हैं कि कैसे भारत-विरोधी प्रोपेगेंडा प्रचारित करने वाले वैश्विक संस्थाएँ और लोग चुनिंदा भारतीय मीडिया प्लेटफार्मों पर तेजी से निर्भर होते जा रहे हैं।

द वायर और इसी तरह के कुछ डिजिटल प्लेटफॉर्म अक्सर उन विदेशी टिप्पणीकारों के लिए संदर्भ बिंदु बन जाते हैं जो वैश्विक मंच पर भारत को निशाना बनाना चाहते हैं।

इसलिए लिंग के समर्थन को लेकर खड़ा विवाद महज एक सोशल मीडिया पोस्ट तक सीमित नहीं रह गया है। यह एक व्यापक तंत्र को दर्शाता है जहाँ विदेशी टिप्पणीकार, विपक्षी राजनेता, सक्रिय पत्रकार और वैचारिक मीडिया मंच मिलकर भारत की छवि और संस्थानों के खिलाफ वैश्विक स्तर पर बयानबाजी करते हैं।

(यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

पार्टी में बड़ी जिम्मेदारी, केजरीवाल-मान-सिसोदिया के साथ तस्वीरें: कौन है AAP नेता अशोक ओझा, जो अपनी ही पार्टी के नेताओं को IB के नाम पर धमकाने के आरोप में हुआ गिरफ्तार

गुजरात में आईबी (इंटेलिजेंस ब्यूरो) के नाम पर आम आदमी पार्टी (AAP) के नेताओं और कार्यकर्ताओं को धमकियाँ दिए जाने का मुद्दा उठाकर अरविंद केजरीवाल, गोपाल इटालिया और दुर्गेश पाठक ने भारी हंगामा खड़ा किया था। सोशल मीडिया पर पोस्ट की गईं, सवाल उठाए गए और पूरी घटना को राजनीतिक रंग दिया गया। लेकिन जाँच आगे बढ़ते ही पूरा खेल पलट गया। जिस ‘आईबी कॉल’ को लेकर परोक्ष रूप से सरकार और प्रशासन पर निशाना साधा जा रहा था, उसमें अब आप (AAP) का वडोदरा शहर अध्यक्ष अशोक ओझा ही आरोपित के रूप में सामने आया है।

खास बात यह है कि अशोक ओझा कोई ऐसा चेहरा नहीं है जिसे पार्टी में कोई न जानता हो। गुजरात में आप का संगठन खड़ा करने की प्रक्रिया के दौरान अशोक ओझा लगातार पार्टी के शीर्ष नेताओं के आसपास देखा जाता रहा है। वह लंबे समय से गुजरात आप में सक्रिय है और पार्टी के शीर्ष नेतृत्व तक उसकी सीधी पहुँच है।

अरविंद केजरीवालके साथ अशोक ओझा

अरविंद केजरीवाल से लेकर इसुदान गढ़वी, गोपाल इटालिया और पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान तथा मनीष सिसोदिया तक, अशोक ओझा कई मौकों पर पार्टी के बड़े चेहरों के साथ नजर आया है। गुजरात में पार्टी संगठन के विस्तार के काम के दौरान भी वह सक्रिय रहा और कई बार दिल्ली जाकर भी पार्टी का काम संभाला।

गोपाल राय और भगवंत मान के साथ अशोक ओझा

गुजरात आप के संगठन से जुड़े कई महत्वपूर्ण कार्यक्रमों में उसकी उपस्थिति देखी गई है। पार्टी के राष्ट्रीय नेताओं के साथ उसके संपर्कों और नजदीकी के प्रमाण के रूप में कई तस्वीरें और कार्यक्रमों के रिकॉर्ड मौजूद हैं। गुजरात में आप के प्रभारी के रूप में काम कर चुके गोपाल राय के साथ भी वह कई बार देखा गया था। संक्षेप में कहें तो अशोक ओझा केवल शहर स्तर का पदाधिकारी नहीं था, बल्कि पार्टी के बड़े नेताओं के साथ सीधा संपर्क रखने वाला और संगठन में पहचान रखने वाला चेहरा था।

मनीष सिसोदिया और मनोज सोरठिया के साथ अशोक ओझा

इसके अलावा गुजरात के आम आदमी पार्टी के कई नेताओं के साथ भी उसके अच्छे संबंध हैं। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष इसुदान गढ़वी के साथ भी उसके संबंध करीबी हैं। इसके अलावा गोपाल इटालिया और मनोज सोरठिया के साथ भी वह कई बार दिखाई देता है। इन सभी नेताओं के साथ उसकी तस्वीरें भी इस समय उपलब्ध हैं।

क्या है पूरा मामला, जिसपर राजनीतिक रोटियाँ सेंक रही थी केजरीवाल एंड कंपनी

इस पूरे मामले की शुरुआत तब हुई जब आम आदमी पार्टी के कुछ नेताओं ने दावा करना शुरू किया कि गुजरात में उनके कार्यकर्ताओं और नेताओं को इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) के नाम पर फोन करके धमकाया जा रहा है। मामला तब और ज्यादा चर्चा में आया जब दिल्ली के पूर्व विधायक और आप नेता दुर्गेश पाठक ने सोशल मीडिया पर सार्वजनिक रूप से आरोप लगाया कि गुजरात में काम कर रहे आप कार्यकर्ताओं को एक विशेष नंबर से फोन आ रहे हैं और फोन करने वाला खुद को आईबी का अधिकारी बता रहा है।

कुछ ही समय में आप के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने भी इस मुद्दे को हाथ में ले लिया। केजरीवाल ने सोशल मीडिया पर पोस्ट करके दावा किया था कि उनके एक कार्यकर्ता को इस प्रकार का फोन आया था। उन्होंने आगे यह भी दावा किया था कि उन्होंने खुद उस नंबर पर फोन करके पूछा था कि क्या वे आईबी से बोल रहे हैं? और सामने से सकारात्मक जवाब मिलने के बाद जैसे ही उन्होंने बताया कि वे अरविंद केजरीवाल बोल रहे हैं, तो फोन काट दिया गया। इसके बाद केजरीवाल ने सार्वजनिक रूप से सवाल किया था कि एक राज्य से दूसरे राज्य में राजनीतिक काम करने जाने वाले नागरिकों का आईबी द्वारा वेरिफिकेशन किस कानून के तहत किया जाता है।

आप के अन्य नेताओं ने भी इस मुद्दे को आगे बढ़ाया। सोशल मीडिया पर पोस्ट की गईं, बयान दिए गए और पूरे मामले को ऐसा रंग दिया गया जैसे कोई सरकारी एजेंसी राजनीतिक कार्यकर्ताओं को निशाना बना रही हो। परिणामस्वरूप यह मुद्दा राजनीतिक चर्चा का विषय बन गया।

हालाँकि इस बीच आणंद के आप कार्यकर्ता केशव चौहान को भी इसी तरह का फोन आने की बात कहे जाने पर मामला पुलिस तक पहुँच गया। केशव चौहान ने आणंद साइबर क्राइम पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई। शिकायत के आधार पर साइबर क्राइम पुलिस ने मोबाइल नंबर, कॉल डिटेल्स और तकनीकी डेटा की जाँच शुरू की।

जांच के दौरान सबसे पहला चौंकाने वाला खुलासा तब हुआ जब जिस नंबर को लेकर हंगामा मचाया जा रहा था, वह नंबर आणंद के नितिन डोबरिया के नाम पर होने की बात सामने आई। पुलिस ने जब नितिन डोबरिया से पूछताछ शुरू की तो पूरी कहानी ने एक अलग ही मोड़ ले लिया। पूछताछ के दौरान नितिन डोबरिया ने बताया कि उसने वडोदरा शहर आप अध्यक्ष अशोक ओझा के कहने पर फोन किए थे और कुछ मामलों में खुद को आईबी अधिकारी के रूप में पेश किया था।

इस खुलासे के बाद पुलिस ने अशोक ओझा से भी पूछताछ शुरू की। जिसके बाद जाँच में सामने आया कि यह पूरा मामला किसी बाहरी एजेंसी या राजनीतिक विरोधियों से जुड़ा नहीं था, बल्कि आप की आंतरिक गुटबाजी और संगठन के भीतर की राजनीतिक प्रतिस्पर्धा से जुड़ा हुआ था।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, दिल्ली के नेता दुर्गेश पाठक को वडोदरा और गुजरात में अधिक सक्रिय भूमिका दिए जाने के बाद स्थानीय स्तर पर असंतोष पैदा हुआ था। जाँच में यह दावा किया गया कि अशोक ओझा को डर था कि केंद्रीय नेतृत्व के बढ़ते हस्तक्षेप से स्थानीय संगठन में उसका वर्चस्व कम हो सकता है। इसी वजह से फर्जी आईबी अधिकारी का खेल रचा गया था, ताकि कुछ नेताओं पर दबाव बनाया जा सके।

अंततः जिस मुद्दे पर आप के शीर्ष नेताओं ने सार्वजनिक रूप से हंगामा मचाया था, जिस मुद्दे को लेकर सोशल मीडिया पर सरकार और प्रशासन के खिलाफ सवाल उठाए गए थे, उसी मामले में अब आप के अपने ही एक शहर अध्यक्ष और उसके साथी की गिरफ्तारी होने की बात सामने आई है।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट ऑपइंडिया गुजराती में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

जनगणना में मातृभाषा का एक जवाब तय करता है देश का बजट, शिक्षा नीति और राजनीतिक प्रतिनिधित्व: जानिए उर्दू-अरबी से लेकर 19000 भाषाई पहचान के पीछे की पूरी कहानी

कल्पना कीजिए कि जनगणना अधिकारी आपके घर आता है और आपसे एक साधारण-सा सवाल पूछता है ‘आपकी मातृभाषा क्या है?’ आप बिना ज्यादा सोचे जवाब दे देते हैं। शायद हिंदी, उर्दू, भोजपुरी, मैथिली, तमिल या कोई दूसरी भाषा।

आपको लगता है कि यह सिर्फ एक औपचारिक जानकारी है, लेकिन हकीकत में आपके द्वारा बोला गया यह एक शब्द आने वाले वर्षों में सरकारी नीतियों, स्कूलों, शिक्षकों की भर्ती, भाषा अकादमियों के बजट और यहाँ तक कि राजनीति तक को प्रभावित कर सकता है।

भारत जैसे विशाल देश में जनगणना सिर्फ लोगों की गिनती नहीं है। यह सरकार के लिए एक ऐसा दस्तावेज है जो बताता है कि देश किस दिशा में बदल रहा है। कितने लोग कौन-सी भाषा बोलते हैं, किस राज्य में किस भाषा का प्रभाव बढ़ रहा है, किन भाषाओं को संरक्षण की जरूरत है और किन भाषाओं के आधार पर नई योजनाएँ बनाई जा सकती हैं, इन सभी सवालों के जवाब जनगणना से ही निकलते हैं।

यही वजह है कि हर जनगणना के बाद भाषा से जुड़े आँकड़े राजनीतिक बहस का हिस्सा बन जाते हैं। कोई भाषा समूह अपनी संख्या बढ़ने को अपनी ताकत बताता है, तो कोई यह सवाल उठाता है कि आखिर इन आँकड़ों का इस्तेमाल बाद में कहाँ और कैसे होता है। उर्दू और अरबी को लेकर होने वाली बहस भी इसी बड़े सवाल का हिस्सा है।

19 हजार से ज्यादा मातृभाषाएँ, लेकिन आखिर सरकार गिनती कैसे करती है?

अधिकांश लोगों को लगता है कि भारत में कुछ दर्जन भाषाएँ ही होंगी, लेकिन 2011 की जनगणना में लोगों ने अपनी मातृभाषा के रूप में 19,569 अलग-अलग नाम बताए थे। इनमें भाषाएँ भी थीं, बोलियाँ भी थीं और कई स्थानीय नाम भी शामिल थे।

यहीं से जनगणना का सबसे दिलचस्प और महत्वपूर्ण हिस्सा शुरू होता है। सरकार इन सभी जवाबों को ज्यों का त्यों नहीं मान लेती। भाषाविद, विशेषज्ञ और जनगणना अधिकारी इन नामों की जाँच करते हैं, उन्हें वर्गीकृत करते हैं और देखते हैं कि कौन-सी बोली किस बड़ी भाषा से जुड़ी हुई है।

इस पूरी प्रक्रिया के बाद 19,569 नामों को व्यवस्थित कर 1369 मानकीकृत मातृभाषाओं में बदला गया। इनमें से केवल वे भाषाएँ अलग श्रेणी में रखी गईं जिन्हें कम से कम 10,000 लोग बोलते थे। इस तरह देश में 121 भाषाएँ ऐसी पाई गईं जिन्हें 10,000 से ज्यादा लोग बोलते हैं।

यही वह डेटा है जो बाद में सरकारी मंत्रालयों, शिक्षा विभागों, भाषा आयोगों और नीति निर्माताओं तक पहुँचता है। दूसरे शब्दों में कहें तो किसी भाषा की पहचान और उसकी सरकारी हैसियत काफी हद तक इस बात पर निर्भर करती है कि जनगणना में उसकी उपस्थिति कितनी मजबूत दिखाई देती है।

भाषा की गिनती आखिर इतनी महत्वपूर्ण क्यों है? सरकार इन आँकड़ों का क्या करती है?

बहुत से लोगों के मन में सवाल आता है कि आखिर सरकार को यह जानने की जरूरत ही क्यों पड़ती है कि कौन-सी भाषा कितने लोग बोलते हैं। इसका जवाब सीधा है नीतियाँ बनाने के लिए।

2011 की जनगणना के अनुसार भारत में 121 भाषाएँ दर्ज की गई थीं। इनमें 22 अनुसूचित भाषाएँ और 99 गैर-अनुसूचित भाषाएँ थीं। सरकार इन आंकड़ों का इस्तेमाल यह समझने के लिए करती है कि किन क्षेत्रों में किस भाषा में शिक्षा की जरूरत है, किस भाषा में सरकारी सेवाएँ उपलब्ध करानी चाहिए और किन भाषाओं के संरक्षण पर अधिक ध्यान देना चाहिए।

उदाहरण के लिए अगर किसी जिले में बड़ी संख्या में लोग उर्दू बोलते हैं तो वहाँ उर्दू माध्यम की कक्षाओं, उर्दू शिक्षकों और उर्दू में शैक्षणिक सामग्री की माँग बढ़ सकती है। इसी तरह अगर किसी राज्य में किसी क्षेत्रीय भाषा के बोलने वालों की संख्या तेजी से बढ़ती है तो उस भाषा में सरकारी वेबसाइट, सूचना सामग्री और सार्वजनिक सेवाएँ उपलब्ध कराने की जरूरत महसूस होती है।

आज डिजिटल युग में इन आँकड़ों का महत्व और बढ़ गया है। सरकारी ऐप, ऑनलाइन पोर्टल, डिजिटल भुगतान सेवाएँ और AI आधारित प्लेटफॉर्म भी भाषाई डेटा के आधार पर विकसित किए जा रहे हैं। यानी जनगणना का डेटा सिर्फ कागजों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सीधे सरकारी फैसलों और बजट आवंटन को प्रभावित करता है।

अनुसूचित भाषाएँ क्या होती हैं और उर्दू को विशेष महत्व क्यों मिलता है?

भारत के संविधान की आठवीं अनुसूची में 22 भाषाओं को शामिल किया गया है। इनमें हिंदी, बांग्ला, तमिल, तेलुगु, मराठी, गुजराती, पंजाबी, कन्नड़, मलयालम, उर्दू और अन्य भाषाएँ शामिल हैं।

इन भाषाओं को संवैधानिक मान्यता प्राप्त है। इसका मतलब यह नहीं कि बाकी भाषाएँ महत्वहीन हैं, लेकिन अनुसूचित भाषाओं को सरकारी स्तर पर कुछ अतिरिक्त अवसर और संरक्षण मिल सकता है।

उदाहरण के लिए संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) और कई अन्य परीक्षाओं में इन भाषाओं का उपयोग किया जा सकता है। साहित्य, अनुवाद, शिक्षा और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भी इन्हें विशेष महत्व मिलता है।

उर्दू इसी सूची में शामिल है। यही कारण है कि उर्दू को लेकर अक्सर राजनीतिक और सामाजिक बहस देखने को मिलती है। कुछ राज्यों में उर्दू शिक्षकों की भर्ती होती है, उर्दू संस्थान चलाया जाता हैं और उर्दू साहित्य के प्रचार-प्रसार के लिए बजट आवंटित किया जाता है।

समर्थकों का कहना है कि यह संविधान द्वारा मान्यता प्राप्त भाषा है, इसलिए उसका संरक्षण सरकार की जिम्मेदारी है। दूसरी ओर आलोचक पूछते हैं कि क्या इन योजनाओं का लाभ वास्तव में भाषा को मिल रहा है या फिर इन्हें राजनीतिक संदेश देने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। यही वह जगह है जहाँ भाषा, पहचान और राजनीति एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं।

अरबी, उर्दू और दूसरी भाषाओं का सवाल

जब भी भाषा की राजनीति और सरकारी मान्यता की चर्चा होती है, तब एक सवाल बार-बार उठता है कि अगर उर्दू को संवैधानिक मान्यता मिल सकती है तो भोजपुरी, राजस्थानी, गढ़वाली या दूसरी भाषाओं को क्यों नहीं। इसका जवाब काफी हद तक जनगणना के आंकड़ों और भाषाई आबादी से जुड़ा होता है।

किसी भाषा को बोलने वालों की संख्या जितनी अधिक होती है, उसकी मान्यता, प्रतिनिधित्व और सरकारी सुविधाओं की माँग उतनी ही मजबूत मानी जाती है। यही वजह है कि जनगणना के दौरान भाषाई आंकड़ों को बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है और कई भाषाई संगठन लोगों से अपनी मातृभाषा सही नाम से दर्ज कराने की अपील करते हैं।

इसी संदर्भ में उर्दू और अरबी का उदाहरण अक्सर चर्चा में आता है। दो भाषाएँ पूरी तरह अलग हैं। उर्दू भारत की आठवीं अनुसूची में शामिल एक मान्यता प्राप्त भाषा है, जबकि अरबी को यह दर्जा प्राप्त नहीं है।

2011 की भाषाई जनगणना के अनुसार अरबी बोलने वालों की संख्या लगभग 55 हजार दर्ज की गई थी, जबकि उर्दू बोलने वालों की संख्या करोड़ों में है। यही बड़ा कारण है कि दोनों भाषाओं की सरकारी और संवैधानिक स्थिति अलग-अलग है।

अरबी का उपयोग मुख्य रूप से इस्लामी ग्रंथ, इस्लामी साहित्य और कुछ विशेष शैक्षणिक संस्थानों तक सीमित है। इसके विपरीत उर्दू भारत के कई राज्यों में बोली, पढ़ी और लिखी जाती है तथा उसका अपना साहित्य, पत्रकारिता, कविता और सांस्कृतिक इतिहास मौजूद है। इसी आधार पर उर्दू से जुड़ी विभिन्न सरकारी योजनाएँ और संस्थागत व्यवस्थाएँ चलाई जाति हैं।

भाषाई पहचान और जनसंख्या के महत्व को समझने के लिए मैथिली, बोडो, डोगरी और संथाली का उदाहरण भी महत्वपूर्ण है। लंबे आंदोलनों और पर्याप्त भाषाई आधार के बाद इन चार भाषाओं को 2004 में आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया था। इससे साफ होता है कि भाषा केवल सांस्कृतिक पहचान का विषय नहीं रहती, बल्कि राजनीतिक प्रतिनिधित्व, सरकारी संसाधनों, शिक्षा और प्रशासनिक मान्यता से भी जुड़ जाती है।

यही कारण है कि उर्दू और अरबी को अक्सर एक साथ जोड़कर देखे जाने के बावजूद उनकी संवैधानिक स्थिति, उपयोग और भाषाई जनसंख्या में बड़ा अंतर है। किसी भी भाषाई बहस को समझने के लिए इन तथ्यों और जनगणना के आंकड़ों को अलग-अलग नज़रिए से देखना जरूरी है।

भाषा संबंधी जनगणना का डेटा कहाँ-कहाँ इस्तेमाल होता है?

अक्सर लोग सोचते हैं कि भाषा संबंधी आँकड़े सरकारी फाइलों में बंद हो जाते होंगे। लेकिन सच इससे  बिल्कुल अलग है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के बाद मातृभाषा आधारित शिक्षा पर विशेष जोर दिया गया है। इसका मतलब है कि सरकार को यह जानना जरूरी है कि किस क्षेत्र में कौन-सी भाषा बोली जाती है।

इसी डेटा के आधार पर पाठ्य पुस्तकें तैयार होती हैं, शिक्षकों की भर्ती होती है और कई जगह स्थानीय भाषाओं में पढ़ाई शुरू की जाती है। लेकिन अब मामला सिर्फ शिक्षा तक सीमित नहीं है।

AI और डिजिटल तकनीक के दौर में भाषाई डेटा की अहमियत और बढ़ गई है। 2024-25 में आदिवासी भाषाओं के लिए AI आधारित अनुवाद तकनीक विकसित करने के लिए 3.12 करोड़ रुपए की परियोजना को मंजूरी दी गई। इसका उद्देश्य अंग्रेजी और हिंदी से जनजातीय भाषाओं तथा जनजातीय भाषाओं से हिंदी-अंग्रेजी में अनुवाद को आसान बनाना है।

सरकारी ऐप, वेबसाइट, डिजिटल भुगतान प्लेटफॉर्म और ऑनलाइन सेवाएँ भी अब भाषाई डेटा के आधार पर विकसित की जा रही हैं। यानी जनगणना में दर्ज एक भाषा आने वाले वर्षों में तकनीकी विकास का हिस्सा भी बन सकती है।

क्या जनगणना के आँकड़े राजनीति को प्रभावित करते हैं?

लोकतंत्र में संख्या की अपनी ताकत होती है। जिस समूह की संख्या अधिक होती है, उसकी माँगों को राजनीतिक दल अधिक गंभीरता से लेते हैं। यही कारण है कि भाषा के आँकड़े भी राजनीतिक महत्व रखते हैं।

मान लीजिए कि किसी भाषा को बोलने वालों की संख्या एक राज्य में तेजी से बढ़ती दिखाई देती है। ऐसे में उस भाषा को लेकर नई माँगें उठ सकती हैं, जैसे स्कूलों में पढ़ाई, सरकारी नौकरियों में अवसर, सांस्कृतिक संस्थान या सरकारी सहायता।

यही वजह है कि कई भाषाई संगठन लोगों से अपील करते हैं कि वे जनगणना में अपनी भाषा सही तरीके से दर्ज कराएँ। उन्हें पता होता है कि आने वाले वर्षों में यही आँकड़े उनके पक्ष में तर्क बन सकते हैं।

लेकिन यह भी सच है कि केवल संख्या के आधार पर कोई नीति नहीं बनती। सरकारें प्रशासनिक जरूरत, संवैधानिक प्रावधान, शिक्षा व्यवस्था और उपलब्ध संसाधनों को भी ध्यान में रखती हैं। फिर भी जनगणना के आँकड़े किसी भी बहस की शुरुआती नींव जरूर बन जाते हैं।

आखिर आम आदमी को इससे क्या फर्क पड़ता है?

कई लोगों को लगता है कि भाषा की गिनती केवल सरकारी फाइलों का विषय है, लेकिन इसका असर सीधे आम नागरिकों तक पहुँचता है। आपके बच्चे को किस भाषा में किताब मिलेगी, किसी क्षेत्र में किस भाषा के शिक्षक नियुक्त होंगे, सरकारी वेबसाइट किस भाषा में उपलब्ध होगी, प्रतियोगी परीक्षाओं में कौन-कौन से भाषा विकल्प होंगे और किन भाषाओं के संरक्षण के लिए बजट दिया जाएगा।

इन सभी सवालों का संबंध कहीं न कहीं भाषाई आंकड़ों से जुड़ा होता है। यही कारण है कि जनगणना में दिया गया एक छोटा-सा जवाब आगे चलकर बड़े फैसलों का आधार बन सकता है। भाषा की गिनती केवल सांख्यिकी नहीं, बल्कि शिक्षा, संस्कृति, प्रशासन और राजनीति के भविष्य का संकेत भी होती है।

भारत जैसे बहुभाषी देश में जनगणना हमें यह समझने का मौका देती है कि हमारी भाषाएँ कहाँ खड़ी हैं, कौन-सी भाषाएँ आगे बढ़ रही हैं और किन्हें संरक्षण की जरूरत है। इसलिए भाषा की गिनती को केवल आंकड़ा समझना भूल होगी।

यह लोकतंत्र की उस प्रक्रिया का हिस्सा है जो तय करती है कि आने वाले वर्षों में सरकारी संसाधन किस दिशा में जाएँगे और किसे कितना प्रतिनिधित्व मिलेगा।

भारत-Pak सीमा पर मौजूद ‘हरामी नाला’ बेहद अहम, यहाँ का दलदल ही नहीं पानी भी खतरनाक: समझें- क्यों ये घुसपैठ के लिहाज से है बेहद संवेदनशील

भारत-पाकिस्तान सीमा की सुरक्षा की बात होती है तो ज्यादातर लोगों के मन में राजस्थान का रेगिस्तान या जम्मू-कश्मीर की पहाड़ियाँ आती हैं, लेकिन गुजरात के कच्छ में स्थित ‘हरामी नाला’ ऐसा इलाका है, जहाँ सीमा की निगरानी करना सबसे मुश्किल कामों में से एक माना जाता है।

दलदल समुद्री पानी, बदलते ज्वार-भाटा और लगातार बदलती भौगोलिक स्थिति के कारण यह क्षेत्र सुरक्षा एजेंसियों के लिए बड़ी चुनौती बना रहता है। हाल ही में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इस संवेदनशील इलाके का दौरा कर यहाँ सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा की और कई महत्वपूर्ण परियोजनाओं का उद्घाटन व शिलान्यास किया।

क्या है हरामी नाला और क्यों है इतना महत्वपूर्ण?

हरामी नाला गुजरात के कच्छ क्षेत्र में स्थित करीब 22 किलोमीटर लंबा समुद्री चैनल है, जो भारत और पाकिस्तान के बीच सीमा का हिस्सा बनता है। इसका बड़ा हिस्सा अरब सागर के खारे पानी से घिरा रहता है, जबकि लगभग आठ किलोमीटर का क्षेत्र दलदली जमीन से भरा हुआ है।

इस इलाके की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहाँ ज्वार-भाटा आने के साथ पानी की गहराई, दिशा और दलदल की स्थिति लगातार बदलती रहती है। इसी वजह से यहाँ स्थायी निशान या सीमा चिन्ह स्थापित करना बेहद मुश्किल होता है। समुद्री धारा और रास्ते बार-बार बदलने के कारण इस क्षेत्र को नेविगेट करना भी काफी कठिन माना जाता है।

कैसे पड़ा हरामी नाला नाम?

हरामी नाला नाम सुनने में भले अजीब लगे, लेकिन इसके पीछे स्थानीय लोगों का अनुभव जुड़ा हुआ है। कहा जाता है कि इस क्षेत्र की स्थिति ऐसी है की आप इसका अनुमान नहीं लगा सकते। यहाँ आने वाला व्यक्ति कभी भी सही अंदाजा नहीं लगा सकता कि आगे क्या स्थिति मिलेगी।

समुद्री रास्ते, दलदल और पानी की गहराई लगातार बदलते रहते हैं। इसी कारण स्थानीय बोलचाल में इसे ‘हरामी नाला‘ कहा जाने लगा। समय के साथ यही नाम प्रचलित हो गया और आज यह पूरे देश में इसी नाम से जाना जाता है।

घुसपैठ और तस्करी के लिए इस्तेमाल होता रहा है यह रास्ता

हरामी नाला लंबे समय तक पाकिस्तान से होने वाली घुसपैठ के लिए आसान रास्ता माना जाता रहा है। इस इलाके की स्थिति का फायदा उठाकर आतंकवादी, तस्कर और घुसपैठिएँ भारतीय सीमा में घुसने की कोशिश करते रहे हैं।

सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार, कई बार पाकिस्तानी मछुआरे भी अनजाने में या जानबूझकर भारतीय सीमा में प्रवेश करते हुए पकड़े गए हैं। इस क्षेत्र में संदिग्ध नावों की गतिविधियाँ भी समय-समय पर सामने आती रही हैं।

पाकिस्तानी मछुआरे (फोटो साभार – NBT)

सबसे बड़ा उदाहरण साल 2008 के मुंबई आतंकी हमले का है। जाँच एजेंसियों के अनुसार 26/11 हमले में शामिल आतंकियों का समूह समुद्री रास्ते से भारत में दाखिल हुआ था। इसके बाद इस पूरे क्षेत्र की सुरक्षा को और मजबूत किया गया। तब से BSF लगातार यहाँ निगरानी बढ़ा रही है।

BSF के सामने हर दिन खड़ी रहती हैं कई चुनौतियाँ

हरामी नाला में सीमा की निगरानी करना बेहद कठिन काम है। यहाँ दलदल इतना गहरा होता है कि कई बार BSF की गश्ती नावें भी फंस जाती हैं। ज्वार उतरने के बाद पानी कम हो जाने पर नावों का संचालन मुश्किल हो जाता है।

दलदली जमीन पर जवानों को विशेष गमबूट पहनकर चलना पड़ता है। जमीन में मौजूद छोटे-छोटे शंख और समुद्री जीव पैरों को नुकसान पहुँचा सकते हैं। इसके अलावा केकड़े, उड़ने वाले कीट, तेज हवाएँ और खारा पानी जवानों की मुश्किलें बढ़ा देते हैं।

यहाँ दूर-दूर तक कोई आबादी नहीं है। गर्मी के मौसम में तापमान काफी अधिक हो जाता है, जबकि समुद्री हवाएँ और बदलता मौसम लगातार चुनौती पैदा करते हैं। इसके बावजूद BSF के जवान चौबीसों घंटे सीमा की निगरानी करते हैं।

तैरती चौकियाँ और आधुनिक तकनीक से हो रही निगरानी

हरामी नाला में स्थायी चौकियाँ बनाना आसान नहीं है क्योंकि दलदली जमीन निर्माण कार्य के लिए उपयुक्त नहीं है। इसी कारण BSF यहाँ तैरती हुई पोस्ट और अस्थायी निगरानी केंद्रों का इस्तेमाल करती है।

दलदली क्षेत्र में जवान हर कुछ दूरी पर अस्थायी स्टैंड बनाकर निगरानी करते हैं। हाई टाइड आने पर वे ऊँचे प्लेटफॉर्म पर चढ़कर चौकसी जारी रखते हैं ताकि किसी भी संदिग्ध गतिविधि पर नजर रखी जा सके।

इसके अलावा BSF के विशेष ‘क्रोकोडाइल कमांडो’ भी इस क्षेत्र में तैनात रहते हैं। आधुनिक कैमरों, नौकाओं और तकनीकी उपकरणों की मदद से पूरे इलाके की निगरानी की जाती है।

अमित शाह के दौरे से क्यों बढ़ी चर्चा?

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने हाल ही में हरामी नाला क्षेत्र का दौरा कर यहाँ सुरक्षा व्यवस्थाओं का जायजा लिया। उन्होंने भारत-पाक सीमा पर स्थित बॉर्डर आउटपोस्ट G-7 का उद्घाटन किया और सीमा सुरक्षा बल के जवानों से मुलाकात की।

दौरे के दौरान उन्होंने हरामी नाला क्षेत्र में बनाए गए आधुनिक ऑब्जर्वेशन पोस्ट टावर का भी उद्घाटन किया। करीब 9.5 मीटर ऊँचे इस टावर में अत्याधुनिक सर्विलांस कैमरे लगाए गए हैं, जिनकी मदद से सीमा पर दूर तक निगरानी रखी जा सकेगी।

इसके अलावा चिड़ियामोड़-बियारबेट लिंक रोड और BSF के लिए नई आधारभूत सुविधाओं की शुरुआत भी की गई। सरकार का मानना है कि इन परियोजनाओं से सुरक्षा बलों की आवाजाही आसान होगी और सीमा पर निगरानी क्षमता में बड़ा सुधार आएगा।

गृह मंत्री ने यह भी कहा कि तकनीकी और भौगोलिक चुनौतियों के बावजूद इस पूरे क्षेत्र में मजबूत सुरक्षा तंत्र विकसित किया गया है और भविष्य में भी सीमा सुरक्षा को और मजबूत किया जाएगा।

सीमा सुरक्षा की दृष्टि से बेहद अहम है हरामी नाला

हरामी नाला केवल एक समुद्री चैनल नहीं बल्कि भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा बेहद संवेदनशील क्षेत्र है। पाकिस्तान सीमा के निकट स्थित होने, दलदली भूभाग और समुद्री पहुँच के कारण यह सुरक्षा एजेंसियों के लिए हमेशा विशेष महत्व रखता है।

BSF के जवान कठिन परिस्थितियों में यहां दिन-रात निगरानी कर रहे हैं। आधुनिक तकनीक और नए बुनियादी ढाँचे के जुड़ने से अब इस क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था और मजबूत होने की उम्मीद है। यही कारण है कि हरामी नाला को भारत-पाक सीमा के सबसे चुनौतीपूर्ण और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण इलाकों में गिना जाता है।

दिल्ली जिमखाना क्लब और CIA के जासूस: राष्ट्रीय सुरक्षा में सेंध की इनसाइड स्टोरी

अगर किसी परमाणु संपन्न राष्ट्र या दुनिया की उभरती हुई महाशक्ति की राष्ट्रीय सुरक्षा में सेंध लगानी हो, तो उसके सैन्य ठिकानों पर बम गिराने की आवश्यकता नहीं होती। इसके लिए बस उस देश के सबसे रसूखदार, औपनिवेशिक काल के एलीट क्लब की सदस्यता लेना ही काफी है, जहाँ शाम ढलते ही देश के नीति-निर्माता अपनी सुरक्षा और गरिमा को स्कॉच के पेग में घोल देते हैं।

यह सब कुछ वास्तविक घटनाओं पर आधारित कहानियाँ हैं, जो यह दर्शाती हैं कि कैसे देश की राजधानी दिल्ली के केंद्र में स्थित एक एलीट क्लब दशकों तक विदेशी जासूसों का खेल का मैदान बना रहा। इस पूरी गाथा के केंद्र में ‘दिल्ली जिमखाना क्लब’ (DGC) है, जिसे बचाने के लिए इसके रसूखदार सदस्यों ने अपनी पूरी ताकत लगा रखी है।

अध्याय 1: लुटियंस दिल्ली की ‘मधुशाला’ और राष्ट्रीय सुरक्षा का अलार्म

साल 2026 की शुरुआत दिल्ली जिमखाना क्लब के लिए एक बड़े झटके के साथ हुई। भारत सरकार के भूमि और विकास कार्यालय (L&DO) ने इस 113 साल पुराने क्लब को खाली करने का सख्त आदेश जारी कर दिया। इस कड़े कदम के पीछे राष्ट्रीय सुरक्षा, रक्षा बुनियादी ढांचे को मजबूत करना और जनहित जैसे गंभीर कारण रहे हैं।

यह क्लब प्रधानमंत्री आवास (7 लोक कल्याण मार्ग) से महज़ कुछ ही मीटर की दूरी पर, 27.3 एकड़ के बेहद संवेदनशील और रणनीतिक क्षेत्र में फैला हुआ है। आम जनता के लिए यह केवल रईसों के मनोरंजन का अड्डा हो सकता है, लेकिन भारत सरकार के लिए यह हमेशा से एक बड़ा राष्ट्रीय सुरक्षा जोखिम रहा है।

साल 2020 में कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय ने अदालत में इस क्लब की कार्यप्रणाली पर एक बेहद तीखा बयान देते हुए कहा था, “यह क्लब व्यायामशाला से मधुशाला बन चुका है।” यह एक ऐसी ‘रियासत’ बनकर रह गया था, जहाँ देश की संभ्रांत नौकरशाही और विदेशी राजनयिकों का ऐसा घालमेल था, जो सुरक्षा तंत्र की आँखों में धूल झोंकने के लिए पर्याप्त था।

शीत युद्ध (Cold War) के दौरान, दिल्ली जिमखाना क्लब एक ऐसा संपर्क क्षेत्र (कॉन्टैक्ट ज़ोन) था, जहाँ राजनयिकों के भेष में घूम रहे विदेशी जासूस बिना किसी सरकारी पाबंदी या इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) जैसी खुफिया संस्थाओं की नजरों में आए, भारतीय जनरलों और नौकरशाहों से आसानी से मिल सकते थे।

अध्याय 2: टी-72 टैंक और टेनिस कोर्ट का जादुई ‘ड्रॉप’

यह घटना साल 1978 की है। भारतीय सेना ने सोवियत संघ से पहली बार उस दौर के सबसे आधुनिक और खतरनाक टी-72 टैंक (T-72/T-72M) मँगाए थे। करीब 41 टन वजनी यह फौलादी टैंक उस समय अमेरिकी रक्षा मंत्रालय (पेंटागन) और सीआईए (CIA) के लिए एक बड़ा रहस्य बना हुआ था। आखिर इस टैंक में ऐसा क्या था जिसने अमेरिका की नींद उड़ा रखी थी? इसके मुख्य तीन कारण थे-

मजबूत फ्रंट आर्मर (Glacis Armour): यह सिर्फ स्टील की चादर नहीं थी, बल्कि हाई-कार्बन स्टील और पॉलीयुरेथेन की कई परतों से बनी एक ऐसी सुरक्षा ढाल थी, जिसे भेदना बेहद मुश्किल माना जाता था।
लेजर रेंजफाइंडर और ऑटो-लोडर सिस्टम: इसमें लक्ष्य की दूरी नापने और गोला लोड करने का काम मशीन खुद करती थी, जिससे टैंक दुश्मन पर बहुत तेजी से प्रहार कर सकता था।
125mm स्मूथबोर गन: उस दौर में यह दुनिया की सबसे घातक टैंक गनों में शुमार थी, जो कुछ ही सेकंड में दुश्मन के टैंक को मलबे में बदल सकती थी।

सीआईए इस टैंक का पूरा ब्योरा (जिसे खुफिया भाषा में ‘SOVMAT’ कहा जाता था) हर हाल में हासिल करना चाहती थी। उन्होंने एक भारतीय सैन्य अधिकारी को रिश्वत देकर टैंक को सीमा पार पाकिस्तान भगाने की भी योजना बनाई थी, जो विफल रही।

तभी मैदान में सीआईए का एक शातिर फील्ड एजेंट रॉबर्ट बेयर उतरा, जो नई दिल्ली में अमेरिकी दूतावास में तैनात था। बेयर ने अपनी प्रसिद्ध आत्मकथा ‘सी नो इविल’ (See No Evil) में इस खतरनाक घटनाक्रम का जिक्र किया है।

बेयर के एक भारतीय एजेंट ने सेना के लॉकर से टी-72 के बेहद गोपनीय मैनुअल्स चुरा तो लिए थे, लेकिन एक बड़ी शर्त थी। उन मैनुअल्स को सिर्फ दो घंटे के भीतर वापस सैन्य तिजोरी में रखना था, इससे पहले कि सार्जेंट की ड्यूटी बदले और राज़ खुले। बेयर मैनुअल लेकर भागा, लेकिन भारत की खुफिया एजेंसी ‘इंटेलिजेंस ब्यूरो’ (IB) की पाँच गाड़ियाँ उसका पीछा कर रही थीं।

समय तेज़ी से खत्म हो रहा था और केवल 17 मिनट बचे थे। बेयर ने तत्परता दिखाते हुए अपनी गाड़ी सीधे दिल्ली जिमखाना क्लब के गेट के भीतर घुसा दी। पीछे-पीछे आईबी की गाड़ियाँ भी आ गईं। बेयर ने बिना गाड़ी रोके उसे सीधे टेनिस कोर्ट के बीच के पतले बजरी वाले पैदल रास्ते पर दौड़ा दिया, जहाँ आईबी की गाड़ियाँ पीछे आने में असमर्थ थीं।

बेयर ने उन मैनुअल्स को एक टेनिस बैग में डाला और इमली के पेड़ों के बीच से होते हुए गेस्ट हाउस नंबर तीन के पास झाड़ियों के पीछे छिपे अपने एजेंट की तरफ फेंक दिया। इसके बाद पीछा कर रहे आईबी के जासूसों को भ्रमित करने के लिए बेयर सीधे जिमखाना क्लब के बार में चला गया। वहाँ वह थ्री-पीस सूट पहने अकेले बैठे एक बेहद प्रतिष्ठित और निर्दोष भारतीय सज्जन के बगल में बैठ गया और वेटर को आवाज़ देकर दो डबल स्कॉच का ऑर्डर दे दिया।

जब आईबी के जासूस हाँफते हुए बार में घुसे, तो उन्होंने बेयर को उस भारतीय संभ्रांत व्यक्ति के साथ गंभीर चर्चा करते देखा। आईबी का पूरा ध्यान उस बेकसूर भारतीय पर टिक गया कि आखिर बेयर इतनी हड़बड़ी में उससे क्या बात करने आया था। इस ड्रामे ने सीआईए के एजेंट को इतना समय दे दिया कि वह मैनुअल लेकर सुरक्षित वापस जा सका और उन्हें सेना के लॉकर में रख दिया।

इस चोरी का परिणाम यह हुआ कि 1982 में सीआईए ने इस मैनुअल के जरिए निष्कर्ष निकाला कि शुरुआती टी-72 वर्जन की रात में लड़ने की क्षमता पश्चिमी समकक्ष टैंकों की तुलना में सीमित थी। यह रणनीतिक कमजोरी सीआईए ने तुरंत अमेरिकी डिफेंस इंडस्ट्री और अपने फ्रंटलाइन पार्टनर पाकिस्तान की सेना के साथ साझा कर दी।

अध्याय 3: पंजाब का जंगल, ‘चोर दरवाज़ा’ और मोर का अवैध शिकार

सैन्य अधिकारियों के लिए नियम बेहद कड़े थे। वे किसी विदेशी नागरिक से सीधे नहीं मिल सकते थे और मिलने पर उन्हें तुरंत सरकार को इसकी रिपोर्ट करनी होती थी। ऐसे में सीआईए के लिए सीधे सैन्य अधिकारियों को अपने जाल में फँसाना लगभग असंभव था।

रॉबर्ट बेयर ने अपनी किताब के पृष्ठ संख्या 75 पर लिखा है कि उन्होंने इस कड़े सिस्टम में एक ‘चोर दरवाज़ा’ खोज निकाला। बेयर को पता चला कि भारतीय सैन्य अधिकारियों को शिकार करने का अत्यधिक शौक है।

इसके बाद बेयर ने अपनी एक शिकारी वाली पहचान बनाई, सिविलियन नंबर प्लेट वाली एक मिलिट्री जीप खरीदी और पंजाब के जंगलों में डेरा डाल दिया। वहाँ उसकी मुलाकात ‘सिंह’ नाम के एक रसूखदार भारतीय सैन्य अधिकारी से हुई, जो भारत-सोवियत दोस्ती के सख्त खिलाफ था। दोनों के बीच दोस्ती गहरी हो गई। वे सप्ताहांत (वीकेंड) पर पंजाब के जंगलों और यहाँ तक कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के निजी एस्टेट में अवैध रूप से भारत के राष्ट्रीय पक्षी ‘मोर’ का शिकार करने लगे।

बेयर ने सिंह को एक बेहद कीमती इतालवी बन्दूक (Browning Double-barrel) उपहार में दी। बाद में, नई दिल्ली के सीआईए स्टेशन प्रमुख ‘वाइल्ड बिल’ को भी इस शिकार यात्रा में शामिल किया गया और ‘सिंह’ को पूरी तरह से अपने साथ मिला लिया गया। इसके बाद सिंह ने अनजाने में भारत के सोवियत सैन्य उपकरणों और रक्षा व रणनीतिक कमियों की सभी संवेदनशील जानकारियां सीआईए को सौंप दीं।

अध्याय 4: हनीट्रैप और मद्रास कैफ़े की कड़वी हकीकत

सीआईए का यह एलीट नेटवर्क सिर्फ दिल्ली या पंजाब तक ही सीमित नहीं था। 1980 के दशक के मध्य में, जब श्रीलंका का गृहयुद्ध अपने चरम पर था, तब भारत की बाह्य खुफिया एजेंसी रॉ (R&AW) के मद्रास स्टेशन प्रमुख के.वी. उन्नीकृष्णन थे।

उन्नीकृष्णन को श्रीलंका (कोलंबो) में उनकी तैनाती के दौरान सीआईए ने एक एयर होस्टेस के ज़रिए बेहद शातिर तरीके से हनीट्रैप में फँसा लिया था। उनकी कुछ आपत्तिजनक तस्वीरें और वीडियो रिकॉर्ड कर लिए गए थे, जिसके बाद ब्लैकमेलिंग का वह खेल शुरू हुआ जिसने भारत के राष्ट्रीय हितों को गहरे जख्म दिए।

उन्नीकृष्णन ने लगभग दो साल तक सीआईए के लिए काम किया। उन्होंने भारत की सबसे गुप्त नीतियों जैसे तमिल उग्रवादियों (LTTE) को भारत द्वारा दी जा रही हथियारों की ट्रेनिंग और श्रीलंका शांति समझौते को लेकर भारत सरकार की रणनीति की पूरी फाइलें सीआईए को सौंप दीं।

सीआईए ने यह संवेदनशील जानकारी श्रीलंकाई सरकार तक पहुँचाई, जिसके कारण बाद में भारतीय शांति सेना (IPKF) को वहाँ भारी सैन्य और मानवीय नुकसान झेलना पड़ा। जब तक आईबी की काउंटर-इंटेलिजेंस विंग ने उन्हें मुंबई से गिरफ्तार किया, तब तक देश का बहुत बड़ा नुकसान हो चुका था। इस घटना के बाद उन्हें सेवा से बर्खास्त कर तिहाड़ जेल भेज दिया गया था।

अध्याय 5: जासूसों के अन्य पसंदीदा ‘अड्डे’ और कराची कनेक्शन

राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसियों के रडार पर केवल दिल्ली जिमखाना क्लब ही नहीं, बल्कि एलीट कल्चर के ऐसे कई अन्य ठिकाने भी रहे हैं:

दिल्ली गोल्फ क्लब: लुटियंस दिल्ली के केंद्र में 170 एकड़ में फैला यह गोल्फ क्लब देश के सेवानिवृत्त जनरलों, खुफिया प्रमुखों और नौकरशाहों का अनौपचारिक अड्डा रहा है। यहाँ ‘सॉफ्ट कल्टीवेशन’ के ज़रिए विदेशी राजनयिक खेल-खेल में देश की नीतियां उगलवा लेते थे।

जयपुर पोलो ग्राउंड (दिल्ली): प्रधानमंत्री आवास के ठीक सामने स्थित यह मैदान खेल और सत्ता के मेलजोल का बड़ा केंद्र हुआ करता था, जिस पर कुछ समय पहले ही मोदी सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा कारणों से कड़ा एक्शन लिया है।

कराची जिमखाना क्लब (पाकिस्तान): दिल्ली जिमखाना की ही तरह औपनिवेशिक काल का यह क्लब पाकिस्तान के कराची शहर के केंद्र में स्थित है। यहाँ भी अमेरिकी और पश्चिमी राजनयिक वहाँ के स्थानीय अधिकारियों और सैन्य कर्मियों को प्रभावित करने तथा खुफिया नेटवर्क तैयार करने के लिए सोशल नेटवर्किंग का सहारा लेते थे।

इसके अलावा लुटियंस दिल्ली के संभ्रांत इलाकों जैसे ‘गोल्फ लिंक्स’ के बंगले हमेशा से खुफिया निगरानी के मुख्य केंद्र रहे हैं। पूर्व रॉ अधिकारी मलय कृष्ण धर ने अपनी पुस्तक ‘ओपन सीक्रेट्स‘ में खुलासा किया है कि कैसे राजीव गाँधी सरकार के दौरान राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह और गृह मंत्री के बीच की तनातनी को रिकॉर्ड करने के लिए राष्ट्रपति भवन तक को टैप किया गया था। हालाँकि ऐसा नहीं है कि भारत ने कभी ऐसी रणनीतियाँ नहीं अपनाईं। मलय कृष्ण लिखते हैं कि कई बार मणिपुर के उग्रवादियों और एक पुलिस कांस्टेबल से जानकारी निकलवाने के लिए शराब को भी एक टूल की तरह इस्तेमाल किया जाता था।

परंतु खुफिया एजेंसियों के इस जिमखाना जैसे ढीले एलीट सुरक्षा सिस्टम का फायदा उठाकर साल 2004 में रॉ (R&AW) के संयुक्त सचिव रबिंदर सिंह, सीआईए के एजेंट डेविड वकाला की मदद से जाली पासपोर्ट पर काठमांडू के रास्ते अमेरिका भागने में सफल रहे। इस घटना को रॉ के पूर्व विशेष सचिव अमर भूषण ने अपनी चर्चित पुस्तक ‘एस्केप टू नोव्हेयर’ (Escape to Nowhere) में विस्तार से बताया है।

ये एलीट क्लब सुरक्षा के लिए क्यों हैं संवेदनशील?

विदेशी ताकतों के लिए ये जिमखाना जैसे संभ्रांत क्लब राष्ट्रीय सुरक्षा के सबसे बड़े ‘सॉफ्ट टारगेट’ क्यों रहे हैं? इसके तीन मुख्य रणनीतिक कारण हैं-

  1. प्रोटोकॉल का भय न होना: एक सरकारी दफ्तर में विदेशी राजनयिकों से मिलने के लिए कड़े नियम होते हैं, लेकिन जिमखाना या गोल्फ क्लब की हरी घास पर स्कॉच का ग्लास हाथ में लिए राजनयिक और रक्षा अधिकारी बिना किसी लिखित अनुमति के आपस में सुरक्षा नीतियां साझा कर लेते हैं।
  2. सॉफ्ट कल्टीवेशन: टेनिस, पोलो या गोल्फ जैसे खेलों और शिकार जैसे निजी शौकों को जरिया बनाकर विदेशी एजेंसियाँ धीरे-धीरे अधिकारियों को अपना कर्जदार बना लेती हैं। इसकी शुरुआत गोल्फ स्टिक्स उधार लेने या बन्दूक उपहार में देने से होती है और अंत देशद्रोह पर जाकर होता है।
  3. रणनीतिक निकटता: ये सभी एलीट क्लब राजधानी दिल्ली के केंद्र यानी प्रधानमंत्री आवास और संवेदनशील रक्षा मुख्यालयों के ठीक बगल में स्थित हैं। ऐसे संवेदनशील क्षेत्रों में सुरक्षा ऑडिट के बिना विदेशी नागरिकों की बेरोकटोक आवाजाही किसी भी देश के लिए आत्मघाती कदम है।

यही कारण है कि साल 2026 में भारत सरकार ने इस औपनिवेशिक दौर से मिले विशेषाधिकार वाले सुरक्षित ठिकाने का पट्टा खत्म करने और उसे खाली कराने का यह बड़ा फैसला लिया है। आखिर किसी भी संप्रभु देश के लिए कुछ चुनिंदा रईसों के मनोरंजन और शराब की महफिलों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा (National Security) होती है। देश की सुरक्षा से बढ़कर कोई विशेषाधिकार नहीं हो सकता।

फर्जी पुलिस कॉल, ‘डिजिटल अरेस्ट’ और UPI से ठगी पर RBI की सर्जिकल स्ट्राइक: आ रहा ‘Kill Switch’, समझें- AI कैसे करेगा ट्रांजैक्शन की निगरानी

भारत में पिछले कुछ वर्षों में डिजिटल पेमेंट ने जिंदगी को बेहद आसान बना दिया है। अब पैसे भेजने के लिए बैंक की लाइन में लगने की जरूरत नहीं पड़ती बस मोबाइल उठाइए और कुछ सेकेंड में UPI, इंटरनेट बैंकिंग या IMPS के जरिए पैसा एक खाते से दूसरे खाते में भेज दीजिए।

हालाँकि, जितनी तेजी से डिजिटल पेमेंट बढ़ा है, उतनी ही तेजी से डिजिटल फ्रॉड के मामले भी सामने आए हैं। अब धोखेबाज मोबाइल या सिस्टम को हैक नहीं करते बल्कि डर, लालच और दबाव बनाकर खुद उनसे पैसे ट्रांसफर करवा लेते हैं।

इसी बढ़ते खतरे को देखते हुए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) अब एक बड़े सुरक्षा तंत्र पर काम कर रहा है। RBI ने मई 2026 में जारी वार्षिक रिपोर्ट में बताया है कि वह एक ‘किल स्विच’ (Kill Switch) सुविधा और सभी डिजिटल पेमेंट मोड के लिए ‘स्विच ऑन-स्विच ऑफ’ सिस्टम लाने की संभावना तलाश रहा है।

इसके अलावा, पहली बार बड़े मूल्य के कुछ डिजिटल ट्रांजैक्शन में थोड़ी देरी यानी ‘कूलिंग पीरियड’ देने पर भी विचार हो रहा है ताकि ठगी होने से पहले लोगों को सोचने और पहचानने का समय मिल सके।

क्या है ‘किल स्विच’ और यह कैसे करेगा काम?

कल्पना कीजिए कि किसी दिन अचानक आपको पुलिस अधिकारी, CBI, ED या किसी सरकारी एजेंसी के नाम पर वीडियो कॉल आती है। सामने वाला कहता है कि आपके खिलाफ गंभीर मामला दर्ज है और गिरफ्तारी से बचना है तो तुरंत पैसा किसी खाते में भेजिए। डर और घबराहट में बहुत से लोग बिना सोचे पैसे ट्रांसफर कर देते हैं। RBI का मानना है कि ऐसे मामलों में अगर ग्राहक को तुरंत बैंकिंग लेन-देन रोकने का विकल्प मिल जाए, तो बड़ी ठगी टाली जा सकती है।

यहीं पर ‘किल स्विच’ काम आएगा। आसान भाषा में समझें तो यह एक तरह का ‘इमरजेंसी बटन’ होगा। अगर किसी व्यक्ति को लगे कि उसके साथ डिजिटल फ्रॉड हो सकता है तो वह अपने बैंक ऐप, इंटरनेट बैंकिंग या दूसरे माध्यम से इस सुविधा को सक्रिय कर सकेगा। इसके बाद खाते से होने वाले सभी डेबिट ट्रांजैक्शन यानी पैसे निकलने की प्रक्रिया तुरंत बंद हो सकती है।

इसका मतलब यह होगा कि UPI पेमेंट, बैंक ट्रांसफर, कार्ड पेमेंट, इंटरनेट बैंकिंग या दूसरे डिजिटल माध्यमों से पैसा भेजना अस्थायी रूप से रुक जाएगा। यानी अगर कोई ठग आपको दबाव में पैसा ट्रांसफर कराने की कोशिश कर रहा है तो आप एक क्लिक में पूरा खाता ‘फ्रीज’ जैसे मोड में डाल सकते हैं और बाद में स्थिति सामान्य होने पर सेवाओं को फिर चालू कर सकते हैं।

यह प्रस्ताव नया जरूर है लेकिन इसकी सोच पूरी तरह नई नहीं है। गृह मंत्रालय (MHA) की एक उच्च स्तरीय समिति पहले भी ‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसे मामलों को रोकने के लिए ऐसे सिस्टम पर विचार कर चुकी है।

‘स्विच ऑन-स्विच ऑफ’ सिस्टम क्या होगा, आप खुद तय करेंगे कौन सी सेवा चलेगी?

अभी कार्ड पेमेंट में ग्राहकों को कुछ नियंत्रण पहले से मिलता है। जैसे कोई ग्राहक घरेलू कार्ड ट्रांजैक्शन, अंतरराष्ट्रीय पेमेंट या ‘टैप एंड पे’ जैसी सुविधा को बैंक ऐप से बंद या चालू कर सकता है। जरूरत पड़ने पर कार्ड लिमिट भी बदल सकता है।

अब RBI इसी मॉडल को पूरे डिजिटल पेमेंट सिस्टम तक बढ़ाने पर विचार कर रहा है। इसका मतलब है कि भविष्य में ग्राहक खुद तय कर सकते हैं कि उनके खाते से कौन-कौन सी सेवाएँ सक्रिय रहें और कौन सी बंद।

उदाहरण के लिए अगर कोई व्यक्ति रोज UPI इस्तेमाल नहीं करता तो वह इसे बंद रख सकता है और जरूरत पड़ने पर कुछ मिनट के लिए चालू कर सकता है। कोई व्यक्ति अंतरराष्ट्रीय कार्ड इस्तेमाल नहीं करता तो वह उस सुविधा को स्थायी रूप से बंद रख सकता है। ATM से निकासी, इंटरनेट बैंकिंग, UPI, कार्ड उपयोग और दूसरे भुगतान चैनलों पर भी ऐसा नियंत्रण मिल सकता है।

इसका फायदा यह होगा कि अगर किसी ठग के पास आपकी बैंक डिटेल या फोन तक पहुँच भी बन जाए तब भी वह हर सेवा का इस्तेमाल नहीं कर पाएगा। यानी सुरक्षा की एक अतिरिक्त परत जुड़ जाएगी। RBI का मानना है कि इससे उपभोक्ताओं का भरोसा बढ़ेगा और डिजिटल ठगी के मामलों को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी।

आखिर ट्रांजैक्शन में RBI क्यों चाहता है ‘एक घंटे का इंतजार’?

RBI के एक पेपर में यह भी सुझाव दिया गया है कि कुछ बड़े डिजिटल ट्रांजैक्शन को तुरंत पूरा करने के बजाय थोड़ी देर से प्रोसेस किया जाए। प्रस्ताव के मुताबिक, ₹10,000 से अधिक के कुछ व्यक्ति-से-व्यक्ति (P2P) भुगतान, खासकर जब पहली बार किसी व्यक्ति, एकल स्वामित्व (Sole Proprietorship) या साझेदारी फर्म (Partnership Firm) को पैसा भेजा जा रहा हो तो उस ट्रांजैक्शन में करीब एक घंटे का समय लग सकता है।

सुनने में यह लोगों को असुविधा जैसा लग सकता है लेकिन RBI इसके पीछे एक आसान तर्क दे रहा है। आज फ्रॉड इतनी तेजी से होते हैं कि लोगों को सोचने का मौका ही नहीं मिलता। फोन पर धमकी, डर और जल्दी का माहौल बनाकर पैसे तुरंत ट्रांसफर करा लिए जाते हैं। लेकिन अगर ट्रांजैक्शन पूरा होने से पहले थोड़ा समय मिले तो ग्राहक सोच सकता है कि कहीं सामने वाला ठग तो नहीं, परिवार से बात कर सकता है या ट्रांजैक्शन कैंसल भी कर सकता है।

AI करेगा निगरानी, हर ट्रांजैक्शन को मिलेगा रिस्क स्कोर

RBI केवल ‘किल स्विच’ या देरी पर ही काम नहीं कर रहा है। इस साल एक और बड़ी पहल शुरू होने की उम्मीद है, जिसका नाम है Digital Payments Intelligence Platform (DPIP)। यह एक ऐसा प्लेटफॉर्म होगा जो कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी AI की मदद से हर डिजिटल ट्रांजैक्शन को रीयल टाइम में खतरे के आधार पर स्कोर देगा।

सीधे शब्दों में कहें तो अगर किसी ट्रांजैक्शन में धोखाधड़ी की आशंका होगी, तो सिस्टम उसे ज्यादा जोखिम वाला मान सकता है। इससे बैंकों और भुगतान प्रणाली को समय रहते चेतावनी मिलने में मदद हो सकती है।

RBI के सर्वे के अनुसार, भारत में 52% लोगों ने डिजिटल पेमेंट को अपनाया है और इसका सबसे बड़ा कारण इसकी गति और सुविधा है। वहीं, 67% व्यापारियों ने कहा कि डिजिटल पेमेंट ने उनके कारोबार पर सकारात्मक असर डाला है। इसी तेजी के साथ सुरक्षा की जरूरत भी बढ़ी है।

यही कारण है कि RBI अब ऐसी व्यवस्था बनाने की कोशिश कर रहा है, जिसमें डिजिटल भुगतान की सुविधा बनी रहे लेकिन ठगी करने वालों के लिए रास्ता कठिन हो जाए। आने वाले समय में संभव है कि पैसे भेजने की रफ्तार थोड़ी धीमी हो लेकिन इसके बदले लोगों के खातों की सुरक्षा पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हो जाए।

One Nation One Helpline: 112 डायल करते ही मिलेगी पुलिस, एम्बुलेंस और फायर ब्रिगेड की सेवा, जानें SC के निर्देश पर केंद्र सरकार ने बनाया कैसा धाकड़ प्लान

भारत में अब इमरजेंसी नंबरों को लेकर बहुत बड़ा बदलाव होने जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर एक ऐतिहासिक और बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने देश के सभी राज्यों को एक सख्त आदेश दिया है। इसके तहत अगले तीन महीने में सभी पुराने हेल्पलाइन नंबर बंद कर दिए जाएँगे।

अब आपको अलग-अलग सेवाओं के लिए अलग नंबर याद नहीं रखने होंगे। पुलिस के लिए 100, फायर ब्रिगेड के लिए 101 और एम्बुलेंस के लिए 102 या 108 नंबर बंद हो जाएँगे। इसके साथ ही नेशनल हाईवे इमरजेंसी (1033) और महिला हेल्पलाइन (1091) को भी खत्म कर दिया जाएगा। इन सभी की जगह अब पूरे देश में सिर्फ एक ही सिंगल नंबर ‘112’ काम करेगा। मुसीबत के समय आपको बस इसी एक नंबर पर कॉल करना होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला ‘सेवलाइफ फाउंडेशन’ की याचिका पर दिया। कोर्ट ने कहा कि हादसे के बाद तुरंत इलाज मिलना हर नागरिक का अधिकार है। यह हमारे संविधान के ‘जीने के अधिकार’ (अनुच्छेद 21) के तहत आता है। देश में हर साल लाखों लोग समय पर इलाज न मिलने से जान गंवा देते हैं। संकट के समय एक-एक मिनट किसी कीमती दवा की तरह होता है।

इस बड़े फैसले को लागू करने के लिए मोदी सरकार पूरी तरह तैयार है। गृह मंत्रालय ने इसके लिए ‘इमरजेंसी रिस्पॉन्स सपोर्ट सिस्टम’ (ERSS) का मास्टरप्लान बनाया। आइए आसान भाषा में समझते हैं कि यह पूरा सिस्टम कैसे काम करेगा और इससे आम जनता को क्या बड़े फायदे होंगे।

पुराना सिस्टम क्यों हो गया फेल और नए नंबर ‘112’ की क्यों पड़ी जरूरत?

भारत में पहले हर मुसीबत के लिए अलग-अलग नंबर होते थे। बहुत साल पहले पूरे देश में सिर्फ एक ही सरकारी टेलीकॉम कंपनी थी। उसी समय पुलिस के लिए 100 और फायर ब्रिगेड के लिए 101 जैसे नंबर बनाए गए थे। उस दौर में ये नंबर सिर्फ संपर्क करने के लिए थे। तब तुरंत मदद पहुँचाने वाला कोई आधुनिक सिस्टम नहीं था।

धीरे-धीरे समय बदला और शहरों की आबादी बढ़ गई। इसके साथ ही अपराध और सड़क हादसे भी तेजी से बढ़े। इस समस्या से निपटने के लिए अलग-अलग राज्यों ने कई नए नंबर चालू कर दिए। इससे आम जनता के बीच भारी भ्रम फैल गया।

मुसीबत के समय लोग घबराहट में भूल जाते थे कि कौन सा नंबर मिलाना है। इस भ्रम और देरी के कारण कई बार मरीजों की जान तक चली जाती थी। इसी बड़ी दिक्कत को हमेशा के लिए खत्म करने के लिए अब पूरे देश में सिर्फ एक नंबर ‘112’ लागू किया जा रहा है।

जस्टिस वर्मा कमेटी की सिफारिश और सरकार का बड़ा मास्टरप्लान

इस नए इमरजेंसी सिस्टम की कहानी साल 2012 के दिल्ली निर्भया कांड से जुड़ी है। उस दर्दनाक घटना के बाद सरकार ने एक हाई-लेवल कमेटी बनाई थी। इस कमेटी के अध्यक्ष देश के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस जे एस वर्मा थे। कमेटी ने सरकार को एक बहुत जरूरी सलाह दी थी।

कंपनी ने कहा था कि भारत में एक ऐसा इमरजेंसी सिस्टम होना चाहिए जो केवल फोन न सुने। वह फोन आते ही तुरंत मदद के लिए गाड़ी को मौके पर रवाना भी करे।

जस्टिस वर्मा कमेटी की इसी सलाह पर सरकार के गृह मंत्रालय ने काम शुरू किया। मंत्रालय ने ‘नेशनल इमरजेंसी रिस्पॉन्स सिस्टम‘ नाम का एक बड़ा प्रोजेक्ट तैयार किया। इसके लिए दूरसंचार विभाग ने ‘112’ नंबर जारी किया। यह नंबर अमेरिका के ‘911’ नंबर की तरह ही काम करता है।

इस पूरे सिस्टम को भारतीय और हाईटेक बनाने के लिए सरकार की खास संस्था सी-डैक (C-DAC) की मदद ली गई। सी-डैक ने इसके लिए एक बेहद आधुनिक सॉफ्टवेयर तैयार किया है। अब यह सॉफ्टवेयर देश के सभी राज्यों को दिया जा रहा है।

कैसे काम करेगा ‘112’ का डिजिटल चक्र? कदम-दर-कदम समझें पूरी प्रक्रिया

मोदी सरकार और सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर यह नया सिस्टम तैयार हो रहा है। यह पूरी तरह से एक केंद्रीयकृत यानी सेंट्रलाइज्ड सिस्टम होगा। इसके तहत हर राज्य और केंद्र शासित प्रदेश में एक हाईटेक कॉल सेंटर बनाया जाएगा। इस कॉल सेंटर को ‘पब्लिक सेफ्टी आंसरिंग पॉइंट’ (PSAP) नाम दिया गया है।

यह कॉल सेंटर साल के 365 दिन और 24 घंटे लगातार काम करेगा। यहाँ पर खास तौर पर ट्रेनिंग पाए हुए एक्सपर्ट एजेंट्स तैनात रहेंगे। मुसीबत में फँसा कोई भी नागरिक सिर्फ एक कॉल करके इनसे मदद पा सकेगा।

इस सिस्टम से संपर्क करने के लिए सिर्फ फोन कॉल ही एकमात्र जरिया नहीं है। नागरिक कई अन्य डिजिटल माध्यमों से भी मदद माँग सकते हैं। इसके लिए फिक्स लैंडलाइन, मोबाइल फोन, साधारण SMS और ईमेल की सुविधा मिलेगी।

इसके अलावा चैट, सरकारी बसों या गाड़ियों में लगे पैनिक बटन और इंटरनेट कॉलिंग का भी इस्तेमाल किया जा सकता है। सरकार ने इसके लिए विशेष तौर पर ‘112 इंडिया’ मोबाइल ऐप भी बनाया है। आने वाले समय में इसे स्मार्ट डिवाइस (IoT) से भी जोड़ दिया जाएगा।

कॉल सेंटर में आपकी शिकायत आते ही कंप्यूटर कैसे करेगा काम?

जैसे ही आप 112 नंबर पर कॉल या मैसेज करेंगे, यह सिस्टम तुरंत काम शुरू कर देगा। आपका कॉल ऑटोमैटिक तरीके से सीधे किसी खाली कॉल एजेंट के पास पहुँच जाएगा। आधुनिक तकनीक की मदद से उस एजेंट के कंप्यूटर स्क्रीन पर आपकी जरूरी जानकारियाँ दिखने लगेंगी। स्क्रीन पर तुरंत आपका नाम और आपकी सटीक लोकेशन आ जाएगी। इसका सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि आपको अपनी लोकेशन समझाने में समय बर्बाद नहीं करना पड़ेगा।

कॉल उठाने वाला एजेंट आपकी बात सुनकर तुरंत मामले की गंभीरता को समझेगा। वह कंप्यूटर पर आपकी शिकायत की एक डिजिटल केस फाइल तैयार करेगा। इसके बाद तय नियमों के हिसाब से आपकी इमरजेंसी को अलग कैटेगरी में बांटा जाएगा। केस फाइल बनते ही यह सारी जानकारी कुछ ही सेकंड में ‘डिस्पैचर’ के पास पहुँच जाएगी। डिस्पैचर उसी कॉल सेंटर में बैठने वाला वह अधिकारी होता है जो मदद के लिए तुरंत गाड़ी रवाना करता है।

GIS मैप और डिस्पैच सिस्टम: घटनास्थल पर तुरंत पहुंचेगी एम्बुलेंस

डिस्पैचर अधिकारी के पास तीन बड़ी कंप्यूटर स्क्रीन वाला डेस्क होता है। इन स्क्रीन पर एक डिजिटल नक्शा चलता रहता है। इस तकनीक को जियोग्राफिक इंफॉर्मेशन सिस्टम (GIS) कहते हैं। इस नक्शे पर राज्य की सभी पुलिस गाड़ियाँ, फायर ब्रिगेड और एम्बुलेंस दिखाई देती हैं। अधिकारी को तुरंत पता चल जाता है कि कौन सी गाड़ी इस समय कहाँ पर है। वह बिना समय गंवाए घटनास्थल के सबसे पास वाली गाड़ी को तुरंत मौके पर रवाना कर देता है।

इसके साथ ही घटना की पूरी जानकारी स्थानीय पुलिस स्टेशन को भी डिजिटल तरीके से भेज दी जाती है। इससे पुलिस वहाँ की कानून व्यवस्था को तुरंत संभाल लेती है। मदद के लिए भेजी गई गाड़ी मौके पर पहुँचकर कार्रवाई शुरू करती है। गाड़ी में एक खास डिवाइस लगी होती है, जिसे मोबाइल डेटा टर्मिनल (MDT) कहते हैं। इस डिवाइस के जरिए मौके की सारी रिपोर्ट सीधे मुख्य कॉल सेंटर को मिलती रहती है। जब पुलिस स्टेशन को पूरी कार्रवाई की रिपोर्ट मिल जाती है, तभी सिस्टम में उस केस को बंद किया जाता है।

केंद्रीय बजट में सरकार की बड़ी घोषणा और स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार

मोदी सरकार ने सड़क हादसों में होने वाली मौतों को रोकने के लिए बजट में एक बहुत बड़ा फैसला लिया है। सरकार ने देश के सभी जिला अस्पतालों में इमरजेंसी और ट्रॉमा केयर की क्षमता को 50 प्रतिशत तक बढ़ाने की घोषणा की है। इसके तहत अब देश के हर बड़े जिला अस्पताल में आधुनिक सुविधाओं से लैस ‘इमरजेंसी एंड ट्रॉमा केयर सेंटर’ बनाए जा रहे हैं।

सरकार का सबसे ज्यादा ध्यान डॉक्टरों और पैरामेडिकल स्टाफ को विशेष इमरजेंसी ट्रेनिंग देने पर है। इस नए मेडिकल सिस्टम को सीधे ‘नेशनल ट्रॉमा रजिस्ट्री’ से जोड़ा जा रहा है। इसका सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि जब भी एम्बुलेंस किसी घायल मरीज को लेकर अस्पताल के लिए निकलेगी, तो ‘112’ सिस्टम के जरिए अस्पताल को मरीज की हालत की पूरी जानकारी पहले ही मिल जाएगी। इससे डॉक्टर मरीज के आने से पहले ही जरूरी वेंटिलेटर या ऑपरेशन थिएटर तैयार रख सकेंगे और इलाज में एक सेकंड की भी देरी नहीं होगी।

एम्बुलेंस के लिए कड़े नियम: GPS ट्रैकिंग और राष्ट्रीय कोड अनिवार्य

अभी देश में चल रही कई सरकारी और प्राइवेट एम्बुलेंस में लाइफ सपोर्ट सिस्टम यानी जीवन रक्षक उपकरणों की बहुत कमी है। इस बड़ी कमी को दूर करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक बहुत सख्त नियम बनाया है। अब देश की हर एक रजिस्टर्ड एम्बुलेंस को राष्ट्रीय एम्बुलेंस कोड ‘AIS-125’ के नियमों का पालन करना ही होगा। इस कोड के तहत एम्बुलेंस गाड़ी का डिजाइन और उसमें जरूरी मेडिकल मशीनों का होना तय किया जाता है।

इसके साथ ही अदालत ने सभी सरकारी और प्राइवेट एम्बुलेंस में जीपीएस (GPS) और गाड़ी ट्रैक करने वाली डिवाइस (VLTD) लगाना अनिवार्य कर दिया है। इन सभी एम्बुलेंस गाड़ियों को सीधे ‘112’ के केंद्रीय नेटवर्क से लाइव जोड़ा जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों को आदेश दिया है कि वे हर महीने इन एम्बुलेंस की जाँच करें। इस जाँच में देखा जाएगा कि एम्बुलेंस कितनी देर में पहुँचती है, गाड़ी की हालत कैसी है और कितने मरीजों की जान बचाई गई। राज्यों को इसकी पूरी रिपोर्ट हर महीने केंद्र सरकार को सौंपनी होगी।

‘PM-RAHAT’ योजना से मुफ्त इलाज: पैसे की कमी से नहीं जाएगी किसी की जान

अक्सर सड़क हादसों के बाद गरीब मरीजों को बहुत परेशानी होती है। उन्हें प्राइवेट अस्पतालों में इलाज के लिए भटकना पड़ता है। इसी बड़ी दिक्कत को दूर करने के लिए केंद्र सरकार ने एक बड़ा कदम उठाया है। सरकार अपनी ‘PM-RAHAT’ योजना को सीधे ‘112’ इमरजेंसी सिस्टम से जोड़ने जा रही है। इस योजना का सबसे बड़ा मकसद दुर्घटना के शिकार लोगों को तुरंत राहत देना है। हादसे के बाद के पहले एक घंटे को ‘गोल्डन आवर’ कहा जाता है। इस दौरान मरीज को पूरी तरह कैशलेस यानी बिल्कुल मुफ्त इलाज दिया जाएगा।

इस नए सिस्टम के लागू होने से अस्पताल अपनी मनमानी नहीं कर सकेंगे। यदि कोई घायल मरीज अस्पताल पहुँचता है, तो डॉक्टर तुरंत उसका इलाज शुरू करेंगे। अस्पताल प्रशासन शुरुआत में पैसों की माँग करके इलाज में देरी नहीं कर सकता है। पुलिस वेरिफिकेशन का काम भी डिजिटल तरीके से कंप्यूटर पर अपने आप पीछे चलता रहेगा। केंद्र सरकार के अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी ने कोर्ट को बताया कि कुछ राज्यों ने अभी तक इस योजना को चालू नहीं किया है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त नाराजगी जताई है। कोर्ट ने सभी राज्यों को आठ हफ्ते का समय देते हुए इसे अनिवार्य रूप से लागू करने का आखिरी अल्टीमेटम दिया है।

‘नेक इंसानों’ (Good Samaritans) के लिए नया कानून और शिकायत निवारण तंत्र

भारत की सड़कों पर अक्सर लोग हादसों के समय पीड़ितों की मदद नहीं करते हैं। वे पुलिस की पूछताछ और कोर्ट-कचहरी के चक्करों से डरते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने जनता के इस डर को ‘रिएक्टिव पैरालिसिस’ यानी डर की वजह से पैदा हुई लाचारी कहा है। वैसे कानूनन मददगारों की सुरक्षा के लिए मोटर व्हीकल एक्ट में धारा 134A पहले से मौजूद है। इसके बावजूद जमीन पर लोगों का डर कम नहीं हो रहा था।

अब सुप्रीम कोर्ट ने आम जनता के इस डर को हमेशा के लिए खत्म करने का फैसला किया है। कोर्ट ने सभी राज्यों को एक बड़ा और नया निर्देश जारी किया है। इसके तहत अगले तीन महीने के भीतर जिला और राज्य स्तर पर एक विशेष शिकायत निवारण प्रणाली (Grievance Redressal System) बनाई जाएगी। इसके लिए हर जगह विशेष नोडल अधिकारियों की तैनाती होगी।

अगर कोई भी पुलिसकर्मी या अस्पताल का कर्मचारी घायल की जान बचाने वाले किसी मददगार को परेशान करेगा, तो उसकी खैर नहीं होगी। गवाही देने के लिए दबाव बनाने या पैसों की माँग करने पर उस कर्मचारी के खिलाफ तुरंत कड़ा एक्शन लिया जाएगा।

बहुभाषी प्रचार और फीडबैक सिस्टम: आम जनता तक पहुँचाई जाएगी जानकारी

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों को आदेश दिया है कि इस पूरे ऐतिहासिक बदलाव की जानकारी देश के हर एक नागरिक तक पहुँचनी चाहिए। इसके लिए सरकार को विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं में बड़े पैमाने पर मास-मीडिया कैंपेन (विज्ञापनों) की शुरुआत करनी होगी। TV, रेडियो, अखबारों और Social Media के जरिए लोगों को बताया जाएगा कि अब मुसीबत में सिर्फ 112 डायल करना है।

इस सिस्टम को पूरी तरह पारदर्शी और जवाबदेह बनाने के लिए एक विशेष Feedback मैकेनिज्म भी तैयार किया गया है। आपातकालीन सेवा का लाभ लेने के बाद कॉल सेंटर के एजेंट या कंप्यूटर सिस्टम के जरिए यूजर से फीडबैक (राय) लिया जाएगा। अगर किसी गाड़ी को पहुँचने में देरी हुई या सेवा अच्छी नहीं थी, तो उस फीडबैक के आधार पर पूरे सिस्टम को सुधारा जाएगा। अदालत अब से चार महीने बाद इस पूरे मामले पर राज्यों की अनुपालन रिपोर्ट की समीक्षा करेगी।

‘बकरीद पर हिंदुओं की कुर्बानी देने लगे कट्टरपंथी…’ सूर्या को चाकू घोंपने का Video वायरल, गाजियाबाद पुलिस ने 3 को किया गिरफ्तार: पढ़ें- असद के खिलाफ FIR की डिटेल्स

उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद से एक बेहद सनसनीखेज और कलेजा कँपा देने वाला मामला सामने आया है। यहाँ खोड़ा थाना क्षेत्र में बकरीद के दिन एक 17 वर्षीय हिंदू किशोर, सूर्या चौहान की उसके ही पूर्व परिचित मुस्लिम दोस्तों ने बेरहमी से चाकुओं से गोदकर हत्या कर दी। इस खौफनाक वारदात को अंजाम देने से ठीक पहले कट्टरपंथी हमलावरों ने पीड़ित से पूछा, “क्या तुमने कभी बकरा हलाल होते देखा है? आज तुझे दिखाते हैं।”

यह कहते ही उन्होंने सूर्या पर ताबड़तोड़ चाकुओं से हमला कर दिया। नोएडा के फोर्टिस अस्पताल में इलाज के दौरान तड़प-तड़प कर इस हिंदू लड़के ने दम तोड़ दिया। पुलिस की FIR कॉपी ऑपइंडिया के पास मौजूद है, जो इस पूरी खौफनाक साजिश की गवाही दे रही है। पुलिस ने अब तक 3 नामजद आरोपितों को गिरफ्तार किया और 2 संदिग्धों को हिरासत में लिया है।

पुरानी रंजिश का बदला और ‘बकरीद’ पर साजिश

मृतक सूर्या चौहान मूल रूप से एटा का रहने वाला था। वह नवनीत विहार, खोड़ा में अपनी माँ, बड़े भाई यश चौहान और छोटी बहन के साथ रहता था। उसके पिता कौशलेंद्र की पहले ही मृत्यु हो चुकी है। सूर्या 11वीं कक्षा का छात्र था। जानकारी के मुताबिक, करीब 8 महीने पहले सूर्या का पड़ोस में रहने वाले असद नाम के युवक से किसी बात पर मामूली विवाद हुआ था।

इसी पुरानी रंजिश का बदला लेने के लिए असद ने बकरीद के पवित्र दिन को चुना। 28 मई की दोपहर को असद ने सूर्या को फोन किया। उसने सूर्या को बकरीद की पार्टी के बहाने मिलने के लिए चौधरी स्कूल के पास वाली गली नंबर 2 में बुलाया।

चश्मदीदों का खुलासा: ‘आज हिंदू की कुर्बानी देंगे’

सूर्या अपने दोस्त आयुष और विक्की के साथ असद से मिलने पहुँचा था। विक्की और आयुष ने आँखों देखा हाल बताते हुए बेहद चौंकाने वाला खुलासा किया। विक्की ने बताया कि जैसे ही वे गली में पहुँचे, वहाँ पहले से ही असद, नवाब, फरहान, आतिफ और सारिक समेत 5 से 6 मुस्लिम युवक हथियारों के साथ घात लगाकर बैठे थे।

आते ही उन्होंने सूर्या को चारों तरफ से दबोच लिया। इसके बाद उन्होंने सांप्रदायिक और हिंसक टिप्पणी करते हुए पूछा कि क्या कभी बकरा हलाल होते देखा है? चश्मदीदों के मुताबिक, आरोपितों ने चिल्लाते हुए कहा कि आज बकरीद है और आज कुर्बानी इस हिंदू लड़के की देंगे।

यह कहते ही सभी आरोपितों ने सूर्या पर बड़े चाकुओं से हमला बोल दिया। उन्होंने सूर्या के पेट, सीने और शरीर के अन्य हिस्सों पर ताबड़तोड़ कई वार किए। हमला इतना बर्बर था कि चाकुओं की गोदने की वजह से सूर्या की आंतें तक बाहर आ गईं।

मौके पर चीख-पुकार और शोर मच गया। शोर सुनकर पास ही मौजूद सूर्या का भाई यश चौहान और उसकी माँ दौड़ते हुए घटना स्थल की तरफ भागे। परिजनों को अपनी तरफ आता देख सभी मुस्लिम हमलावर खून से लथपथ सूर्या को तड़पता हुआ छोड़कर मौके से फरार हो गए।

फोर्टिस अस्पताल में तोड़ा दम, इलाके में सांप्रदायिक तनाव

परिजन आनन-फानन में गंभीर रूप से घायल सूर्या को नोएडा के सेक्टर-62 स्थित फोर्टिस अस्पताल लेकर पहुँचे। वहाँ डॉक्टरों की तमाम कोशिशों के बावजूद अगले दिन यानी 29 मई को दोपहर करीब 12 बजे सूर्या ने दम तोड़ दिया। सूर्या की मौत की खबर जैसे ही खोड़ा इलाके में फैली, वहाँ भारी रोष और सांप्रदायिक तनाव की स्थिति बन गई।

पीड़ित परिवार का रो-रोकर बुरा हाल है। वे बार-बार अपने बेटे को याद कर इंसाफ की गुहार लगा रहे हैं। खोड़ा नगर पालिका की पूर्व अध्यक्ष रीना भाटी और विभिन्न हिंदू संगठनों के लोग तुरंत मौके पर जमा हो गए।

पुलिस की FIR कॉपी और तीन नामजद अभियुक्त गिरफ्तार

मृतक के भाई यश चौहान द्वारा दी गई तहरीर के अनुसार, यह FIR जानलेवा हमला कर हत्या करने के प्रयास के संबंध में दर्ज कराई गई थी। प्रार्थना पत्र में कहा गया है कि 28 मई को दोपहर करीब 3:30 बजे शिकायतकर्ता का भाई सूर्या अपने दोस्त आयुष (पुत्र मनोज भारती, निवासी नवनीत विहार, खोड़ा) के साथ जा रहा था। तभी खोड़ा की शर्मा डेरी वाली गली में लोकप्रिय विहार का रहने वाला अशद (पुत्र नवाब) मिला।

FIR कॉपी की एक प्रति

अशद ने अचानक सूर्या के साथ गाली-गलौज करते हुए झगड़ा शुरू कर दिया और फिर जान से मारने की नीयत से उसके पेट में चाकू से ताबड़तोड़ हमला कर दिया। इस जानलेवा हमले में सूर्या गंभीर रूप से घायल हो गया, जिसके बाद उसे इलाज के लिए नोएडा के अस्पताल में भर्ती कराया गया। पीड़ित पक्ष ने पुलिस से इस मामले में रिपोर्ट दर्ज कर सख्त कानूनी कार्रवाई करने की माँग की।

इन्दिरापुरम के सहायक पुलिस आयुक्त (ACP) श्री अभिषेक श्रीवास्तव ने मामले की आधिकारिक बाइट जारी करते हुए बताया, “दिनांक 28.05.2026 को खोड़ा थाना क्षेत्र में एक किशोर को चाकू लगने की घटना सामने आई थी। इलाज के दौरान 29 मई को उसकी मृत्यु हो गई। परिजनों की तहरीर के आधार पर मुकदमा दर्ज कर टीमें गठित की गई थीं। आज पुलिस टीम ने तीन नामजद अभियुक्तों को गिरफ्तार कर लिया है। इसके अतिरिक्त दो अन्य संदिग्धों को भी हिरासत में लिया गया है। पूछताछ और साक्ष्यों के आधार पर अग्रिम वैधानिक कार्रवाई की जा रही है।”

सुरक्षा के लिहाज से पूरे खोड़ा क्षेत्र में भारी पुलिस बल तैनात किया गया है। पुलिस आसपास के सीसीटीवी (CCTV) कैमरों की फुटेज खंगाल रही है। एक वीडियो वायरल हो रही है, जिसमें हिंदू युवक सूर्या को घेरे कुछ मुस्लिम हमलावर दिखाई दे रहे हैं। दावा किया जा रहा है कि इस Video में ही मुस्लिम हमलावर सूर्या पर हमला कर रहे हैं।

सोशल मीडिया पर फूटा गुस्सा: ‘बुलडोजर चलाओ, एनकाउंटर करो’

इस नृशंस हत्या का Video और खबर सामने आते ही सोशल मीडिया पर नेटिजन्स का गुस्सा उबल पड़ा है। लोग इस घटना की तुलना सीधे इस्लामी कट्टरपंथ से कर रहे हैं। X पर हिंदुत्व नर्व (@HindutvaNerve) नामक हैंडल ने लिखा, “गाजियाबाद में एक हिंदू लड़के को बकरीद पर दीनी तालीम वालों ने इस तरह चाकुओं से गोदा कि उसकी आंतें बाहर आ गईं। मुस्लिम लड़के ने कहा था कि आज कुर्बानी हिंदू लड़के की देंगे। योगी आदित्यनाथ जी से विनती है कि इनका एनकाउंटर हो।” बता दें कि X ने इस पोस्ट को हटा दिया है।

वहीं डॉ उदिता त्यागी ने तीखा तंज कसते हुए लिखा, “तुम गाय-गाय चिल्लाते रहे, उन्होंने तुम्हारे बेटों की बलि देनी शुरू कर दी।”

एक अन्य यूजर ने RJ सायमा को टैग करते हुए लिखा, “हम आपसे डरते हैं… क्योंकि आप ईद पर घर बुलाकर मर्डर करते हैं?”

हिंदू संगठनों की माँग: हत्यारों के घरों पर चले बुलडोजर

घटना स्थल पर मौजूद हिंदू संगठनों के कार्यकर्ताओं में इस हत्या को लेकर गहरा आक्रोश है। उन्होंने योगी सरकार और स्थानीय प्रशासन से माँग की है कि सभी फरार आरोपितों को जल्द से जल्द पकड़ा जाए। हिंदू समाज का कहना है कि यह केवल दो गुटों की लड़ाई नहीं, बल्कि बहुसंख्यक समाज की आस्था और सुरक्षा पर सीधा प्रहार है।

संगठनों ने चेतावनी दी है कि यदि मुख्य आरोपित असद समेत सभी दोषियों के घरों पर तुरंत बुलडोजर नहीं चलाया गया और उन्हें सख्त सजा नहीं मिली, तो वे उग्र आंदोलन के लिए बाध्य होंगे। फिलहाल पुलिस स्थिति को नियंत्रण में बता रही है और मुख्य आरोपित की तलाश में लगातार दबिश दे रही है।

नरेंद्र मोदी स्टेडियम से SVP स्पोर्ट्स एन्क्लेव तक: समझें भारत का स्पोर्ट्स कैपिटल बनने की दिशा में कैसे आगे बढ़ रहा है अहमदाबाद

केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने गुरुवार (28 मई 2026) को अहमदाबाद में 2030 कॉमनवेल्थ गेम्स, 2036 ओलंपिक्स और अन्य अंतरराष्ट्रीय खेल आयोजनों की तैयारियों की समीक्षा की। इस दौरान उन्होंने एक बार फिर इस बात पर जोर दिया कि अहमदाबाद को भारत की स्पोर्ट्स कैपिटल के रूप में विकसित करने के लिए तेजी से काम हो रहा है। आमतौर पर लोग ऐसे बयानों को राजनीतिक भाषण का हिस्सा मानकर भूल जाते हैं। लेकिन अहमदाबाद के मामले में बात थोड़ी अलग है, क्योंकि यहां सिर्फ दावे नहीं हैं, बल्कि उनके पीछे दिखने वाले सबूत भी हैं।

मोटेरा का विश्वप्रसिद्ध स्टेडियम है, नारनपुरा का विशाल स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स है, शहर भर में बन रहे नए स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स हैं, स्पोर्ट्स एन्क्लेव है, खेल महाकुंभ है, नेशनल गेम्स हैं और कॉमनवेल्थ गेम्स तथा ओलंपिक्स को ध्यान में रखकर तैयार हो रहा इन्फ्रास्ट्रक्चर है। इस सब को मिलाकर जब देखा जाता है, तब समझ में आता है कि अहमदाबाद में सिर्फ सीमित स्पोर्ट्स प्रोजेक्ट्स खड़े नहीं हो रहे हैं, बल्कि खेलों को केंद्र में रखकर शहर के लिए एक नई पहचान बनाने की कोशिश हो रही है।

अहमदाबाद का इतिहास देखा जाए तो शहर ने समय-समय पर अपनी पहचान बदलने की अनोखी क्षमता दिखाई है। एक समय था जब इसे ‘भारत का मैनचेस्टर’ कहा जाता था। कपड़ा मिलें इसकी अर्थव्यवस्था का आधार थीं। फिर धीरे-धीरे शहर ने व्यापार, उद्योग, वित्तीय गतिविधियों और आधुनिक इन्फ्रास्ट्रक्चर के केंद्र के रूप में अपनी नई पहचान बनाई। गुजरात की आर्थिक राजधानी के रूप में अहमदाबाद का स्थान मजबूत होता गया।

लेकिन अब शहर के लिए एक और नई पहचान बनाने की प्रक्रिया चल रही है। एक ऐसी पहचान, जो सिर्फ व्यापार या उद्योग तक सीमित नहीं है, बल्कि खेल, युवा शक्ति, अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं और वैश्विक स्तर की सुविधाओं से जुड़ी है। आज अगर पिछले पांच-छह वर्षों के विकास कार्यों को एक साथ रखा जाए, तो साफ दिखता है कि अहमदाबाद को केवल एक और मेट्रो शहर के रूप में नहीं, बल्कि खेलों को केंद्र में रखकर विकसित किए जा रहे एक विशिष्ट शहर के रूप में देखा जा रहा है।

अहमदाबाद में कैसे हुई स्पोर्ट्स सिटी की शुरुआत

अहमदाबाद के स्पोर्ट्स कैपिटल नैरेटिव की बात करें तो 2022 एक महत्वपूर्ण साल के रूप में सामने आता है। गुजरात में नेशनल गेम्स का आयोजन हुआ और पूरे राज्य में खेलों को लेकर नया उत्साह देखने को मिला। इसी कार्यक्रम के दौरान अमित शाह ने कहा था कि अहमदाबाद जल्द ही दुनिया की सबसे बड़ी स्पोर्ट्स सिटी बनेगा। उस समय कई लोगों ने इस बयान को एक महत्वाकांक्षी दावे के रूप में देखा। लेकिन इसके बाद जिस गति से प्रोजेक्ट्स आगे बढ़े, उसने इस बयान को एक अलग ही मायने दे दिए।

नेशनल गेम्स ने एक महत्वपूर्ण बात साफ कर दी। बड़े खेल आयोजन सिर्फ स्टेडियमों से नहीं होते। इसके लिए खिलाड़ियों, ट्रेनिंग, आवास, परिवहन, सहायक सुविधाओं और शहरव्यापी इन्फ्रास्ट्रक्चर की जरूरत होती है। अहमदाबाद में उस समय पहले से चल रहे कई स्पोर्ट्स प्रोजेक्ट्स को भी नेशनल गेम्स के बाद अधिक स्पष्ट दिशा और गति मिली। आने वाले वर्षों में अन्य सुविधाओं के विकास के साथ स्पोर्ट्स कैपिटल का विचार अधिक स्पष्ट रूप से आकार लेता गया।

दुनिया के सबसे बड़े क्रिकेट स्टेडियम से मिली वैश्विक पहचान

अगर अहमदाबाद के स्पोर्ट्स विजन का कोई एक प्रतीक चुनना हो, तो वह निस्संदेह नरेंद्र मोदी स्टेडियम है। एक लाख से अधिक दर्शकों की क्षमता वाला यह स्टेडियम दुनिया का सबसे बड़ा क्रिकेट स्टेडियम है। लेकिन इसकी महत्ता सिर्फ इसके आकार में नहीं है। इसकी महत्ता इसमें है कि इसने अहमदाबाद को वैश्विक खेल के नक्शे पर ऐसी पहचान दिलाई, जो शायद पहले कभी नहीं मिली थी।

नरेंद्र मोदी क्रिकेट स्टेडियम

विश्व कप के मैच, अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट और वैश्विक स्तर के कार्यक्रमों ने लाखों लोगों का ध्यान अहमदाबाद की तरफ खींचा। लेकिन स्पोर्ट्स कैपिटल के नजरिए से देखा जाए तो नरेंद्र मोदी स्टेडियम एक अंतिम उपलब्धि नहीं, बल्कि शुरुआत थी। स्टेडियम ने शहर को दिखाया कि खेल सिर्फ मनोरंजन या प्रतियोगिता तक सीमित नहीं है, यह शहर की ब्रांडिंग, निवेश, पर्यटन और वैश्विक प्रतिष्ठा से भी जुड़ा है। आज जब स्पोर्ट्स कैपिटल की बात होती है, तब यह स्टेडियम पूरे विजन का प्रतीक बनकर सामने आता है।

मोटेरा में खड़ा हो रहा भविष्य का स्पोर्ट्स इकोसिस्टम

अगर नरेंद्र मोदी स्टेडियम इस उपलब्धि का प्रवेश द्वार है, तो सरदार वल्लभभाई पटेल (SVP) स्पोर्ट्स एन्क्लेव इसकी आत्मा है। पिछले कुछ वर्षों में अहमदाबाद के स्पोर्ट्स विजन को लेकर जो भी चर्चा हुई है, उसके केंद्र में यह प्रोजेक्ट लगातार रहा है। स्पोर्ट्स एन्क्लेव को सिर्फ एक स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स के रूप में देखना इसके साथ अन्याय करने जैसा होगा। वास्तव में इसकी कल्पना एक संपूर्ण स्पोर्ट्स सिटी के रूप में की गई है। 236 एकड़ से अधिक क्षेत्र में फैले इस प्रोजेक्ट को भविष्य के बड़े अंतरराष्ट्रीय खेल आयोजनों को ध्यान में रखकर डिजाइन किया जा रहा है।

मोटेरा इलाके में विकसित किए जा रहे इस विशाल प्रोजेक्ट में एक्वैटिक्स सेंटर, इनडोर एरिना, टेनिस फैसिलिटीज, एथलीट्स विलेज, ट्रेनिंग सेंटर्स और अन्य कई सुविधाएँ शामिल हैं। दुनिया के सफल ओलंपिक शहरों में जिस तरह का एकीकृत (इंटीग्रेटेड) स्पोर्ट्स इन्फ्रास्ट्रक्चर देखने को मिलता है, वैसा ही मॉडल अहमदाबाद में खड़ा करने का प्रयास हो रहा है। यहां खिलाड़ियों को सिर्फ प्रतियोगिता के लिए मैदान नहीं, बल्कि ट्रेनिंग, आवास, रिकवरी और प्रदर्शन सुधारने के लिए विभिन्न सुविधाएं भी एक ही इकोसिस्टम में उपलब्ध कराने का विचार है।

SVP Sports (फोटो साभार: TOI)

इस प्रोजेक्ट का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह खेलों को शहर के विकास के साथ जोड़ता है। आमतौर पर भारत में खेलों के लिए अलग स्टेडियम या मैदान बनाए जाते हैं। लेकिन स्पोर्ट्स एन्क्लेव के पीछे का विचार अलग है। यहां खेल को एक संपूर्ण इकोसिस्टम के रूप में देखा जा रहा है। शायद यही कारण है कि इस प्रोजेक्ट को अहमदाबाद स्पोर्ट्स विजन का सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ माना जाता है।

वीर सावरकर स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स

विजन और वास्तविकता के बीच की दूरी अक्सर लंबी होती है। लेकिन वीर सावरकर स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स उस दूरी को काफी हद तक कम करता है। लगभग ₹825 करोड़ की लागत से तैयार यह कॉम्प्लेक्स देश के सबसे बड़े और आधुनिक स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स में से एक माना जाता है। यहाँ स्विमिंग, इनडोर गेम्स, विभिन्न ट्रेनिंग सुविधाएं और खिलाड़ियों के लिए जरूरी कई व्यवस्थाएँ उपलब्ध हैं।

वीर सावरकर स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स

सितंबर 2025 में इसके उद्घाटन के समय अमित शाह ने कहा था कि अहमदाबाद स्पोर्ट्स कैपिटल बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। इस बयान के पीछे का सबसे बड़ा कारण शायद यही कॉम्प्लेक्स था, क्योंकि यहां खेल के लिए आधुनिक सुविधाएं सिर्फ योजना के स्तर पर नहीं हैं, बल्कि वास्तविक रूप में मौजूद हैं। स्पोर्ट्स कैपिटल के विचार को यदि कोई व्यक्ति छूने योग्य वास्तविकता के रूप में देखना चाहे, तो वीर सावरकर स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स इसका सबसे मजबूत उदाहरण है।

सिर्फ मोटेरा नहीं, पूरा अहमदाबाद बन रहा है स्पोर्ट्स हब

कई शहर एक बड़ा स्टेडियम बना सकते हैं। कई शहर एक भव्य स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स भी खड़ा कर सकते हैं। लेकिन स्पोर्ट्स कैपिटल बनने के लिए सिर्फ कुछ मेगा प्रोजेक्ट्स काफी नहीं हैं। इसके लिए खेल शहर के हर कोने में पहुंचने चाहिए। शायद यही कारण है कि अहमदाबाद म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन (AMC) पिछले कुछ वर्षों से शहरव्यापी स्पोर्ट्स इन्फ्रास्ट्रक्चर पर विशेष ध्यान दे रही है।

शहर में 10 नए स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स और 27 नए प्लेग्राउंड्स विकसित करने की योजना सिर्फ एक सरकारी घोषणा नहीं है। यह स्पोर्ट्स कैपिटल विजन को शहर के विभिन्न क्षेत्रों तक पहुंचाने का प्रयास है। नए वाडज से लेकर राणिप, निकोल, नरोडा, वटवा, सरखेज और अन्य क्षेत्रों तक खेल की सुविधाएँ पहुँचाने का प्रयास हो रहा है। यह दर्शाता है कि स्पोर्ट्स इन्फ्रास्ट्रक्चर अब सिर्फ शहर के प्रीमियम इलाकों तक सीमित नहीं है।

AMC के आँकड़ों के मुताबिक, शहर में पहले से ही दर्जनों जिमनेजियम, स्केटिंग रिंक, टेनिस कोर्ट, स्पोर्ट्स सेंटर्स और रीक्रीएशन फैसिलिटीज कार्यरत हैं। नए प्रोजेक्ट्स इस नेटवर्क को और मजबूत बनाने वाले हैं। स्पोर्ट्स कैपिटल का मतलब सिर्फ अंतरराष्ट्रीय मैच नहीं है। इसका मतलब यह भी है कि शहर के आम युवाओं को अपने घर के पास खेल की अच्छी सुविधा मिल सके। अहमदाबाद में वर्तमान में जो प्रक्रिया चल रही है, उसमें इन दोनों बातों को एक साथ जोड़ने का प्रयास दिखाई देता है।

खेल महाकुंभ: इमारतें ही नहीं, खिलाड़ी भी जरूरी हैं

स्पोर्ट्स कैपिटल की चर्चा अक्सर स्टेडियमों और इमारतों के इर्द-गिर्द रुक जाती है। लेकिन कोई भी शहर सिर्फ इन्फ्रास्ट्रक्चर से स्पोर्ट्स कैपिटल नहीं बन सकता। उसके पीछे खिलाड़ी होने चाहिए, खेल की संस्कृति होनी चाहिए, बच्चों और युवाओं को खेल की तरफ आकर्षित करने वाला ढांचा होना चाहिए।

गुजरात में खेल महाकुंभ वर्षों से यह काम कर रहा है। लाखों छात्रों और युवाओं को एक प्रतिस्पर्धी ढाँचा प्रदान करने वाला यह कार्यक्रम राज्य की खेल संस्कृति को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। बड़े स्टेडियम और स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स एक तरफ हैं, लेकिन दूसरी तरफ खेल महाकुंभ जैसी पहलें हैं, जो नए खिलाड़ी तैयार करती हैं। स्पोर्ट्स कैपिटल बनने के लिए दोनों जरूरी हैं। अहमदाबाद के मामले में दिलचस्प बात यह है कि यहां इन्फ्रास्ट्रक्चर और ग्रासरूट्स स्पोर्ट्स कल्चर दोनों पर एक साथ काम होता दिख रहा है।

स्पोर्ट्स जोन और बदलता शहर

अहमदाबाद की स्पोर्ट्स स्टोरी सिर्फ स्टेडियमों तक सीमित नहीं है। शहर के कुछ हिस्सों में खेल को केंद्र में रखकर अर्बन प्लानिंग भी की जा रही है। स्पोर्ट्स प्रिसिंक्ट कॉरिडोर प्रोजेक्ट इसका एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। SVP स्पोर्ट्स एन्क्लेव की ओर जाने वाला यह 7 किमी का कॉरिडोर सिर्फ सड़क विकास का प्रोजेक्ट नहीं है, यह खेल को शहर की पहचान से जोड़ने का प्रयास है।

दुनिया के कई बड़े स्पोर्ट्स शहरों में स्पोर्ट्स डिस्ट्रिक्ट्स देखने को मिलते हैं, जहाँ खेल सिर्फ इवेंट्स तक सीमित नहीं रहते, बल्कि शहर के सार्वजनिक जीवन और डिजाइन का हिस्सा बन जाते हैं। अहमदाबाद में भी अब इस तरह की विचारधारा दिखने लगी है। यह स्पोर्ट्स कैपिटल विजन को और मजबूत बनाता है।

अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं की ओर बढ़ता अहमदाबाद

स्पोर्ट्स कैपिटल की पहचान के लिए अंतरराष्ट्रीय इवेंट्स भी जरूरी होते हैं। पिछले कुछ वर्षों में अहमदाबाद ने इस दिशा में भी उल्लेखनीय प्रगति की है। एशियन एक्वैटिक्स चैंपियनशिप जैसी प्रतियोगिताओं ने शहर की क्षमता को प्रदर्शित किया है। 2029 में आयोजित होने वाले वर्ल्ड पुलिस एंड फायर गेम्स भी इसी यात्रा की एक महत्वपूर्ण कड़ी बनने जा रहे हैं।

इस प्रकार की प्रतियोगिताओं का लाभ सिर्फ प्रतिष्ठा तक सीमित नहीं होता। वे शहर को वैश्विक मानकों के अनुसार काम करने का अवसर देती हैं। आयोजन की क्षमता बढ़ती है, इन्फ्रास्ट्रक्चर और मजबूत होता है तथा खिलाड़ियों और प्रशासन दोनों को अंतरराष्ट्रीय अनुभव मिलता है। स्पोर्ट्स कैपिटल बनने की दिशा में आगे बढ़ने वाले किसी भी शहर के लिए यह प्रक्रिया अत्यंत महत्वपूर्ण होती है।

कॉमनवेल्थ गेम्स, ओलंपिक्स और अगले दशक का रोडमैप

इस पूरी यात्रा का सबसे महत्वाकांक्षी अध्याय अभी आगे है। कॉमनवेल्थ गेम्स और ओलंपिक्स को ध्यान में रखकर जो प्लानिंग की जा रही है, वह सिर्फ खेल तक सीमित नहीं है। इसमें परिवहन, शहरी विकास, खिलाड़ियों के लिए सुविधाएं, सार्वजनिक स्थान और इन्फ्रास्ट्रक्चर के कई पहलू जुड़े हुए हैं।

आज स्पोर्ट्स एन्क्लेव, एथलीट्स विलेज, एक्वैटिक्स इन्फ्रास्ट्रक्चर, नए स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स और अर्बन स्पोर्ट्स प्लानिंग को देखा जाए तो समझ में आता है कि शहर सिर्फ आज के लिए तैयार नहीं हो रहा है, वह अगले दशकों को ध्यान में रखकर खुद को ढाल रहा है। शायद यही बात अहमदाबाद की स्पोर्ट्स स्टोरी को अन्य शहरों से अलग बनाती है।

नई पहचान की ओर बढ़ता शहर

दुनिया का सबसे बड़ा क्रिकेट स्टेडियम, ओलंपिक-ग्रेड स्पोर्ट्स एन्क्लेव, ₹825 करोड़ का आधुनिक स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स, शहरव्यापी स्पोर्ट्स इन्फ्रास्ट्रक्चर, 10 नए स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स, 27 प्लेग्राउंड्स, खेल महाकुंभ जैसी ग्रासरूट्स स्पोर्ट्स मूवमेंट, अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं का आयोजन और कॉमनवेल्थ गेम्स तथा ओलंपिक्स को ध्यान में रखकर की जा रही प्लानिंग।

यह सब एक साथ देखने पर साफ होता है कि अहमदाबाद में चल रही प्रक्रिया को सिर्फ कुछ अलग-अलग प्रोजेक्ट्स के रूप में देखना सही नहीं है। वास्तव में यहां एक संपूर्ण स्पोर्ट्स इकोसिस्टम तैयार हो रहा है। एक ऐसा इकोसिस्टम, जो खेल को केवल एक प्रतियोगिता के रूप में नहीं, बल्कि शहर के भविष्य, युवा शक्ति, वैश्विक पहचान और विकास के केंद्र के रूप में देखता है।

अहमदाबाद की यह यात्रा अभी पूरी नहीं हुई है। कई प्रोजेक्ट्स अभी निर्माणाधीन हैं और कई लक्ष्य अभी आगे हैं। लेकिन इतना तय कहा जा सकता है कि पिछले कुछ वर्षों में शहर ने जो दिशा चुनी है, वह इसे सिर्फ क्रिकेट के शहर से आगे ले जा रही है। शायद यही कारण है कि आज जब अहमदाबाद स्पोर्ट्स कैपिटल की बात होती है, तो यह सिर्फ एक नारा नहीं, बल्कि धीरे-धीरे आकार लेती एक वास्तविकता जैसा लगता है।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट गुजराती में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

आयातित नहीं अनादि है भारत की सभ्यता, विदेशी प्रोपेगेंडा फैलाना बंद करो: मोहनजोदड़ो की पशुपति मुहर पर ‘एलामाइट प्रभाव’ बताने वाली ऑड्रे ट्रुश्के की यूँ खुली पोल

‘भारत को अपनी जड़ों से काटो, सभ्यता को उधार का साबित करो और यहाँ के निवासियों में हीनभावना भर दो…’ यही वह औपनिवेशिक फार्मूला था जिसने दशकों तक भारत के इतिहास को तोड़ने-मरोड़ने का काम किया। भारत को लेकर लगातार यह भ्रम फैलाने की कोशिश की गई कि यहाँ की सभ्यता ‘आयातित’ है।

इस भूमि की संस्कृति बाहर से आए लोगों ने बनाई। यहाँ के देवता, भाषा, ज्ञान सब बाहर से आया है। अब आप कहेंगे कि आज इसका जिक्र क्यों? वो इसलिए क्योंकि आज भी ऐसी ही कोशिशें जारी हैं।

पशुपति शिव की परंपरा से निकला ट्रुश्के का दर्द

हालिया विवाद की शुरुआत केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय के एक ट्वीट और उस पर इतिहासकार ऑड्रे ट्रुश्के (Audrey Truschke) की टिप्पणी के बाद हुई। दरअसल, बुधवार (27 मई 2026) को संस्कृति मंत्रालय ने मोहनजोदड़ो से प्राप्त ‘पशुपति मुहर’ से जुड़ा एक पोस्ट किया था।

मंत्रालय ने X पर लिखा, “भारत की अखंड और अनवरत चली आ रही सभ्यता का यह सबसे शक्तिशाली प्रतीकों में से एक!” मंत्रालय ने लिखा, “अविभाजित भारत के मोहनजोदड़ो में मिली यह लगभग 4,300 साल पुरानी स्टियाटाइट (पत्थर) की मुहर एक योग मुद्रा में बैठे व्यक्ति को दिखाती है, जिसे व्यापक रूप से शिव-पशुपति माना जाता है। यह आकृति ‘मूलबंधासन’ में बैठी दिखाई देती है और इसके चारों ओर कई जानवर बने हुए हैं।”

संस्कृति मंत्रालय ने लिखा, “भले ही प्राचीन सभ्यता से जुड़े स्थल आज आधुनिक सीमाओं के कारण अलग देशों में हों लेकिन इस विरासत का जीवंत संरक्षण आज भी भारत ही कर रहा है। पशुपति मुहर में दिखने वाली योग परंपरा, शैव प्रतीक और आध्यात्मिक सोच आज भी भारत के मंदिरों, शिव पूजा, योग परंपराओं और सांस्कृतिक जीवन में जीवित हैं।”

मंत्रालय ने लिखा, “वैदिक काल से लेकर आज के भारत तक यह सभ्यतागत धारा लगातार और बिना टूटे चली आ रही है। यह हमारी सोच, दर्शन, धार्मिक परंपराओं और सामूहिक चेतना में गहराई से बसी हुई है।”

पश्चिमी इतिहासकारों को भारत की हजारों साल की सांस्कृतिक निरंतरता अखरती है। एक ऐसी सभ्यता जिसने असंख्य आक्रमण झेले लेकिन अपनी मूल पहचान नहीं छोड़ी। यह बात पश्चिमी नजरिए के लिए असहज थी और आज भी है। ऑड्रे ट्रुश्के को भी संस्कृति मंत्रालय का यह ट्वीट नागवार गुजरा।

ऑड्रे ट्रुश्के ने इस पर जवाब देते हुए लिखा, “ये शिव नहीं हैं। अधिक संभावना है कि यह प्रोटो-एलामाइट (Proto-Elamite) प्रतीकों से प्रभावित एक आकृति है जो एक यूरेशियन देवता ‘जानवरों के स्वामी’ (Lord of Animals) को दिखाती है। भारत का इतिहास बेहद अद्भुत, शानदार और गौरवशाली है। इसलिए इसे सही तरीके से समझना और बताना बहुत जरूरी है।”

अपनी किताब में भी ट्रुश्के ने फैलाया है भ्रम

इसी से जुड़े एक अन्य ट्वीट में ट्रुश्के ने अपनी किताब ‘India: 5,000 Years of History on the Subcontinent’ में इसका विस्तार से जिक्र किए जाने की चर्चा की है। इस पुस्तक में ट्रुश्के ने लिखा है, “प्राचीन इतिहास में सांस्कृतिक प्रभावों का पता लगाना आसान नहीं होता लेकिन कुछ सीमित संकेत मिलते हैं कि सिंधु सभ्यता के कुछ पहलू पश्चिम की संस्कृतियों से प्रभावित हो सकते हैं। खासकर, सिंधु सभ्यता में एलामाइट (Elamite) संस्कृति के कुछ निशान दिखते हैं।”

वह आगे लिखती हैं, “सिंधु सभ्यता के लोगों ने एलामाइट परंपराओं से कुछ पौराणिक विचार (mythical ideas) अपनाए हो सकते हैं, चाहे उन्होंने यह सीधे सीखा हो या किसी माध्यम से। उदाहरण के लिए, सिंधु घाटी की एक प्रसिद्ध मुहर में एक प्रसिद्ध यूरेशियन ‘देवता जानवरों के स्वामी’ (Lord of the Animals) को दिखाया गया है, जो पालथी मारकर बैठा है, कमर पर उभरी हुई गाँठ जैसे वस्त्र और सिर पर सींगों वाला मुकुट पहने हुए है। यह चित्र ‘प्रोटो-एलामाइट मुहरों’ से मिलता-जुलता माना जाता है।”

ट्रुश्के की किताब का एक हिस्सा

मार्शल ने बताया- ‘शिव’

मोहनजोदड़ो की खोज 1922 में ASI के अधिकारी राखल दास बनर्जी ने की थी। यह खोज हड़प्पा में बड़ी खुदाई शुरू होने के लगभग दो साल बाद हुई। इस स्थल पर 1930 के दशक तक बड़े पैमाने पर खुदाई का काम सर जॉन मार्शल, के. एन. दीक्षित, अर्नेस्ट मैके और कई अन्य निदेशकों के नेतृत्व में किया गया।

(फोटो साभार: Harappa.com)

सर जॉन मार्शल ने 1931 में अपनी पुस्तक Mohenjo-daro and the Indus Civilization (Vol-1) में पशुपति मुहर को ‘ऐतिहासिक शिव (historic Shiva) का प्रारंभिक रूप’ (prototype of Shiva) बताया था।

उन्होंने लिखा, “इस पृथ्वी या मातृ देवी (Mother Goddess) के साथ-साथ मोहनजोदड़ो में एक पुरुष देवता भी दिखाई देता है, जिसे पहली नजर में ही ऐतिहासिक शिव के प्रारंभिक रूप (prototype) के तौर पर पहचाना जा सकता है। इस देवता का चित्रण एक*साधारण तरीके से उकेरी गई मुहर पर बेहद प्रभावशाली ढंग से किया गया है, जिसे हाल ही में मिस्टर मैके ने खोजा था।”

मार्शल ने लिखा, “यह देवता, जो तीन मुखों वाला प्रतीत होता है, एक नीचे बने भारतीय आसन पर योग की विशिष्ट मुद्रा में बैठा हुआ है। उसकी टाँगें शरीर के नीचे मुड़ी हुई हैं, एड़ी से एड़ी मिली हुई है और पैरों की उंगलियाँ नीचे की ओर मुड़ी हुई हैं। उसकी बाँहें फैली हुई हैं और हाथ घुटनों पर टिके हुए हैं, जिनमें अंगूठे सामने की ओर दिखाई देते हैं। कलाई से कंधे तक उसकी बाँहें चूड़ियों/कंगनों से ढकी हुई हैं, जिनमें 8 छोटे और 3 बड़े कंगन हैं।”

मार्शल की पुस्तक का हिस्सा

ट्रुश्के को विद्वानों ने दिखाया संस्कृति का आईना

ट्रुश्के के इन दावों की असलियत सामने लानी भी जरूरी थी और यह हुआ भी। कई लोगों ने ट्रुश्के के इन दावों की परतें उधेड़ दीं। लेखक अमीश ने X पर ट्रुश्के को जवाब देते हुए लिखा, “प्रोटो-एलामाइट? पशुपति मुहर में हाथी, भैंस और गैंडा दिखते हैं।”

उन्होंने लिखा, “प्राचीन एलाम आज के दक्षिण-पश्चिमी ईरान के इलाके में केंद्रित था। वहाँ हाथी, जल भैंसा और गैंडा प्राकृतिक रूप से पाए ही नहीं जाते थे। वैसे, ये तीनों भारत में पाए जाते हैं। इसके अलावा, मुहर में दिख रही आकृति एक योग मुद्रा में बैठी हुई है। तो क्या अब योग भी एलामाइट हो गया? सच में?”

प्रोफेसर और हिंदू परंपराओं की जानकार डॉ. लावण्या वेमसानी ने भी इस पर प्रतिक्रिया दी है और इसे विस्तार से समझाया है। उन्होंने X पर लिखा, “मैं आपको बता नहीं सकती कि पशुपति मुहर को लेकर मुझे कितने मेसेज मिले। वजह यह थी कि एक पश्चिमी इतिहासकार ने इसकी तुलना एक पूरी तरह अलग एलामाइट (Elamite) मुहर से कर दी जबकि दोनों मुहरों में साफ और बड़े अंतर दिखाई देते हैं।”

उन्होंने लिखा, “एलामाइट मुहर और पशुपति/प्रोटो-शिव मुहर बिल्कुल अलग हैं। वे एक जैसी नहीं हैं। तुलना करने लायक उनमें 1% भी समानता नहीं है। सिंधु-सरस्वती सभ्यता की पशुपति मुहर में शिव को मूलबंधासन में बैठे दिखाया गया है। यह एक कठिन योग मुद्रा है जिसे केवल अनुभवी योगी ही कर पाते हैं। यह दुनिया के प्रति सजगता और आंतरिक शांति का प्रतीक मानी जाती है।”

लावण्या वेमसानी आगे लिखती हैं, “इस मुहर में शिव के चारों ओर भारत में पाए जाने वाले जानवर दिखते हैं, जैसे बाघ, हाथी और गैंडा। यह बात उन लोगों को परेशान करती है जो भारतीय इतिहास के बारे में गलत धारणाएँ फैलाते रहे हैं। वे मानें या न मानें, भारतीय इतिहास अब उनके बनाए ढाँचों पर नहीं टिका है। सच्चाई सामने आ रही है। #ColonizedMinds को सच के सामने झुकना चाहिए और तथ्यों पर आधारित इतिहास को स्वीकार करना चाहिए।”

उन्होंने लिखा, “अगर किसी तरह तुलना करनी भी हो तो वह आकृति शिव के बैल नंदी जैसी कही जा सकती है लेकिन शिव या पशुपति नहीं। हालाँकि, यहाँ ऐसी तुलना करना भी संदर्भ से बाहर की बात है। और मुहर पर बने बाकी जानवरों का क्या? अगर किसी को ‘जानवरों का स्वामी’ दिखाना हो, तो केवल एक जानवर बनाकर बात खत्म नहीं होती। पशुपति मुहर में तो आकृति चारों ओर जानवरों से घिरी हुई दिखाई देती है।”

ऐसे ही और भी सैकड़ों लोगों ने तर्क दिए हैं और बताया है कि क्यों यह भगवान शिव की आकृति ही है। क्यों यह उस सांस्कृतिक निरंतरता का प्रतीक है जिसे पश्चिमी इतिहासकार झुठलाने की कोशिश करते हैं। जिसके लिए ‘आर्य आक्रमण’ जैसी थ्योरी गढ़ी जाती हैं।

इन विद्वानों द्वारा भारत को यह महसूस कराया गया कि उसकी अपनी कोई मौलिकता नहीं, वह हमेशा बाहरी प्रभावों का उत्पाद रहा है। इन सबके बाद भी वो सवाल जिसका जवाब आज तक इनके पास नहीं है कि अगर भारत की सभ्यता आयातित थी तो दुनिया की बाकी प्राचीन सभ्यताओं की तरह इसकी मूल पहचान खत्म क्यों नहीं हुई?

क्यों आज भी इस देश में वही मंत्र गूँजते हैं, जिनका उल्लेख हजारों वर्ष पुराने ग्रंथों में मिलता है? क्यों काशी, मथुरा, अयोध्या, प्रयाग, रामेश्वरम, पुरी और द्वारका जैसी तीर्थ परंपराएँ सदियों से जीवित हैं?

पशुपति सील से लेकर वैदिक साहित्य तक, योग से लेकर दर्शन तक, पुरातत्व से लेकर सांस्कृतिक परंपराओं तक संकेत बताते हैं कि भारत की सभ्यता की जड़ें यहीं हैं। यह कहना कि भारत ने बाहरी प्रभाव नहीं लिए भी सही नहीं है।

भारत ने दुनिया से संवाद किया, बहुत कुछ आत्मसात भी किया होगा। लेकिन आत्मसात करना और ‘आयातित’ होना दो बिल्कुल अलग बातें हैं। भारतीय सभ्यता की ताकत ही यही रही कि उसने बाहर से आने वाले विचारों को अपने भीतर पचाया लेकिन अपनी आत्मा नहीं खोई।

इतिहास पर बहस होनी चाहिए, सवाल भी पूछे जाने चाहिए लेकिन बहस के नाम पर एकतरफा प्रोपेगेंडा नहीं होना चाहिए। भारत की सभ्यता को पश्चिमी साँचे में फिट करने की जिद ऐसे वामपंथी इतिहासकारों को छोड़नी ही होगी।

यह सभ्यता ना तो किसी जहाज में भरकर आई थी, ना किसी तलवार के साथ रही। यह हिमालय की तरह यहीं खड़ी हुई, नदियों की तरह यहीं बही और हजारों वर्षों से यहीं साँस ले रही है।