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UPI पेमेंट पर टैक्स लगने वाला है? नहीं, कॉन्ग्रेसी और लेफ्ट-लिबरल इकोसिस्टम ने नए कानून को लेकर आपको गुमराह किया

पिछले कुछ दिनों से विपक्षी नेता और लेफ्ट-लिबरल गैंग के लोग यह अफवाह फैला रहे हैं कि मोदी सरकार ने यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) से होने वाले लेन-देन पर शुल्क लगाने के लिए कानून बनाया है जबकि अब तक UPI लेन-देन मुफ्त रहे हैं। कानून को लेकर फैलाई जा रही इस अफवाह से बने माहौल का फायदा उठाने के लिए कई मुख्यधारा के मीडिया प्लेटफॉर्म भी भ्रामक और अटकलों पर आधारित हेडलाइन प्रकाशित कर रहे हैं।

संसद ने हाल ही में कराधान और अन्य कानून संशोधन विधेयक, 2026 को पारित किया। इसके बाद UPI लेन-देन पर कर लगाने को लेकर झूठे दावे फैलने लगे। विपक्ष के साथ-साथ लेफ्ट-लिबरल गैंग ने भी मोदी सरकार को निशाना बनाना शुरू कर दिया। उनका आरोप था कि मोदी सरकार अमेरिका के दबाव में काम कर रही है।

कॉन्ग्रेस सांसद जयराम रमेश ने X पर एक लंबा पोस्ट लिखा। इसमें उन्होंने दावा किया कि अब आम लोगों को UPI लेन-देन करने की कीमत चुकानी पड़ेगी। सांसद ने दावा किया कि मोदी सरकार ने अपने ‘अच्छे दोस्त डोनाल्ड ट्रंप’ के दबाव में UPI लेन-देन पर कर लगाने वाला कानून पारित किया है।

जयराम ने X पर लिखा, “दरअसल, इस संशोधन को लाने की असली वजह शायद और भी ज्यादा चिंताजनक है। यह अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि की 2026 की उस रिपोर्ट के बाद आया है, जिसमें UPI और RuPay के मुफ्त होने की आलोचना की गई है और आरोप लगाया गया है कि इनकी वजह से Visa और MasterCard जैसे अमेरिकी पेमेंट प्लेटफॉर्म बाजार से बाहर हो गए हैं। क्या प्रधानमंत्री अपने अच्छे दोस्त डोनाल्ड ट्रंप के दबाव में UPI को कमजोर करने और डिजिटल भुगतान क्षेत्र को अमेरिकी कंपनियों के लिए खोलने की कोशिश कर रहे हैं?”

कॉन्ग्रेस सांसद की पोस्ट पर कमेंट करते हुए वामपंथी प्रोपेगेंडा पोर्टल ‘द वायर’ के संस्थापक संपादक एमके वेणु ने भी इस झूठ को आगे बढ़ाया और सरकार को गरीब-विरोधी दिखाने की कोशिश की। वेणु ने दावा किया कि पीएम मोदी ने अपने ‘फ्रैंड के दबाव’ में ‘गरीब भारतीयों’ द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले UPI लेन-देन पर टैक्स लगाने का फैसला किया है। यहाँ ‘फ्रैंड’ से स्पष्ट रूप से उनका इशारा अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की ओर था।

कई मुख्यधारा के मीडिया पोर्टल भी ऐसी भ्रामक हेडलाइन के साथ लेख प्रकाशित कर रहे हैं, जिनसे यह संकेत मिलता है कि सरकार वास्तव में UPI लेन-देन पर टैक्स लगाने जा रही है। विधेयक को लोकसभा में पेश किए जाने के बाद रॉयटर्स ने ‘डिजिटल पेमेंट पर मर्चेंट फीस की वापसी का रास्ता साफ कर रहा भारत’ हेडलाइन से एक लेख प्रकाशित किया। इस लेख की हेडलाइन से ऐसा लगता है कि UPI लेन-देन पर टैक्स जल्द ही हकीकत बनने वाला है।

रॉयटर्स की खबर का स्क्रीनशॉट

इसी तरह, लोकसभा में कानून पारित होने के बाद द टेलीग्राफ ने भी एक लेख प्रकाशित किया, जिसकी हेडलाइन थी, “लोकसभा ने बैंकों और सेवा प्रदाताओं को UPI लेन-देन पर शुल्क लगाने की अनुमति देने वाले विधेयक को मंजूरी दी।”

Screenshot via The Telegraph

कुछ मीडिया पोर्टलों ने दावा किया कि केवल ₹2,000 तक के UPI भुगतान ही मुफ्त होंगे और इससे अधिक की किसी भी रकम के लेन-देन पर टैक्स लगेगा।

सोशल मीडिया पोस्ट और मीडिया रिपोर्ट्स के कारण आम लोगों में डर और भ्रम की स्थिति पैदा हो गई। भ्रामक हेडलाइन और पोस्ट की वजह से लोग यह मानने लगे कि UPI भुगतान पर टैक्स लगाया जा रहा है। इन दावों ने न केवल डिजिटल भुगतान को लेकर गलत जानकारी फैलाई बल्कि यह भी कहा गया कि सरकार ने अमेरिका के दबाव में यह फैसला लिया है। हालाँकि, लेफ्ट-लिबरल प्रोपेगेंडा और मीडिया में किए जा रहे दावों से हकीकत काफी अलग है।

क्या नए कानून में UPI लेन-देन पर टैक्स लगाया गया है?

कराधान और अन्य कानून संशोधन विधेयक, 2026 को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 4 अगस्त 2026 को लोकसभा में पेश किया था। विपक्ष के अलग-अलग मुद्दों को लेकर किए जा रहे हंगामे के बीच यह विधेयक 6 अगस्त 2026 को पारित हुआ। इस विधेयक के जरिए 2025 के आयकर अधिनियम, 2026 के वित्त अधिनियम और 2007 के पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट समेत कुछ मौजूदा कानूनों में बदलाव किए गए हैं। इसी 2007 के कानून में किए गए बदलाव को लेकर सबसे ज्यादा विवाद हो रहा है।

विधेयक में पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट की धारा 10A को हटा दिया गया है। यह धारा बैंकों और पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर्स को सरकार की ओर से अधिसूचित डिजिटल भुगतान माध्यमों, जैसे UPI और RuPay डेबिट कार्ड से किए गए लेन-देन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लेने से कानूनी तौर पर रोकती थी। MDR वह शुल्क है, जो किसी डिजिटल भुगतान को प्रोसेस करने के बदले व्यापारी से लिया जाता है। अब तक इसी प्रावधान के कारण UPI भुगतान पर प्रोसेसिंग शुल्क नहीं लिया जा सकता था।

हालाँकि, इस प्रावधान को हटाने का मतलब यह नहीं है कि अब डिजिटल भुगतान पर अपने आप टैक्स लग जाएगा। इस बदलाव के बाद केंद्र सरकार के पास यह तय करने का अधिकार होगा कि किन डिजिटल भुगतान माध्यमों पर शुल्क लगाया जा सकता है और किन पर नहीं।

सीधे शब्दों में कहें तो विधेयक खुद UPI या किसी अन्य डिजिटल भुगतान पर कोई टैक्स नहीं लगाता। इसमें सिर्फ उस कानूनी रोक को हटा दिया गया है, जो डिजिटल भुगतान पर शुल्क लगाने से रोकती थी। यानी अगर भविष्य में सरकार कुछ डिजिटल लेन-देन पर शुल्क लगाने का फैसला करती है, तो वह इसके लिए अलग से अधिसूचना जारी कर सकती है।

संशोधन की जरूरत क्यों पड़ी?

देश में डिजिटल पेमेंट को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने UPI और RuPay से होने वाले लेन-देन पर MDR (Merchant Discount Rate) हटा दिया था। यानी डिजिटल भुगतान करने पर व्यापारियों से प्रोसेसिंग फीस नहीं ली जाती थी। लेकिन इन डिजिटल लेन-देन को चलाने में खर्च होता है, जिसे सरकार बैंकों और पेमेंट कंपनियों को सब्सिडी या दूसरे प्रोत्साहनों के जरिए पूरा करती है।

इसका नतीजा यह हुआ कि पिछले कुछ वर्षों में UPI लेन-देन की संख्या में काफी बढ़ोतरी हुई। खास बात यह है कि सरकार की ओर से दी जाने वाली आर्थिक मदद सिर्फ छोटे व्यापारियों और ₹2,000 तक के छोटे लेन-देन के लिए उपलब्ध है। दूसरी ओर, बैंकों और पेमेंट कंपनियों का खर्च लगातार बढ़ रहा है। इसमें सर्वर को बनाए रखना, ऑनलाइन सुरक्षा यानी साइबर सिक्योरिटी सुनिश्चित करना और पूरे पेमेंट सिस्टम को सुचारू रूप से चलाना शामिल है।

एक संसदीय समिति ने भी कहा है कि MDR के बिना पूरे UPI सिस्टम को आर्थिक रूप से लंबे समय तक चलाना मुश्किल होता जा रहा है, क्योंकि सरकार की सब्सिडी इंडस्ट्री के वास्तविक खर्च का केवल एक छोटा हिस्सा ही पूरा करती है। RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने भी साफ कहा है कि इतने बड़े UPI सिस्टम को हमेशा पूरी तरह मुफ्त चलाना संभव नहीं है। सिस्टम की सुरक्षा बनाए रखने और इसके नेटवर्क को आगे बढ़ाने के लिए पैसे की जरूरत होती है। हालाँकि, उन्होंने यह भी कहा कि इस समय किसी तरह के शुल्क को लेकर अटकल लगाना जल्दबाजी होगी। सरकार की ओर से आधिकारिक अधिसूचना जारी होने के बाद ही स्थिति साफ होगी।

अगर भविष्य में सरकार MDR लागू करने का फैसला करती भी है, तो इसका असर आम लोगों या छोटे कारोबारियों पर पड़ने की संभावना कम है। डिजिटल पेमेंट में ₹2,000 से ज्यादा के लेन-देन पर टैक्स लगने की चर्चा पेमेंट्स काउंसिल ऑफ इंडिया (PCI) की ओर से दिए गए एक प्रस्ताव के बाद शुरू हुई। PCI गैर-बैंकिंग पेमेंट कंपनियों का प्रतिनिधित्व करने वाला एक उद्योग संगठन है। इस संगठन ने पिछले साल सरकार से UPI पर जीरो-MDR की नीति पर दोबारा विचार करने की अपील की थी।

PCI के मुताबिक, सरकार की ओर से हर साल दी जाने वाली करीब ₹1,500 करोड़ की सब्सिडी UPI सिस्टम को चलाने और उसका विस्तार करने के वास्तविक खर्च का केवल एक छोटा हिस्सा है। संगठन ने पूरे UPI इकोसिस्टम को चलाने और विस्तार देने का सालाना खर्च करीब ₹10,000 करोड़ बताया था।

PCI ने सरकार से सुझाव दिया था कि MDR सिर्फ बड़े कारोबारियों से लिया जाए, जिनका सालाना टर्नओवर ₹50 करोड़ से ज्यादा है। इसके अलावा ₹2,000 से ज्यादा के लेन-देन पर 0.3% से 0.5% तक MDR लगाने का प्रस्ताव दिया गया था।

इसका मतलब यह हुआ कि अगर किसी बड़े रिटेल स्टोर या ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर ₹2,000 से ज्यादा का भुगतान किया जाता है, तो उस बड़े कारोबारी से बैंक डिजिटल भुगतान को प्रोसेस करने के लिए मामूली MDR ले सकता है। लेकिन यह सिर्फ एक प्रस्ताव है और सरकार ने इसे अभी लागू नहीं किया है।

इसलिए फिलहाल जो डिजिटल लेन-देन अब तक बिना किसी शुल्क के हो रहे थे, वे बिना शुल्क के ही जारी रहेंगे, जब तक सरकार की ओर से कोई नया बदलाव अधिसूचित नहीं किया जाता।

साथ ही, ऊपर दी गई जानकारी से यह भी साफ है कि कानून में किया गया यह बदलाव अमेरिका या किसी दूसरे बाहरी दबाव की वजह से नहीं है। यह एक आर्थिक और राजकोषीय कदम है, न कि UPI की भुगतान नीति में अचानक किया गया कोई बड़ा बदलाव। UPI से जुड़ा यह प्रावधान सरकार की ओर से किए गए कई अन्य कानूनी और आर्थिक बदलावों वाले एक बड़े पैकेज का सिर्फ एक हिस्सा है।

‘F*cking Old Man तुम्हें थप्पड़ पड़ेगा’: कौन है PM मोदी को गाली देने और मारने की बात करने वाली CEO मुग्धा प्रधान, नेटिजन्स ने लताड़ा तो इंस्टा डिलीट कर भागी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर iThrive की CEO और फाउंडर मुग्धा प्रधान का एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। वीडियो में यह महिला पीएम मोदी और केंद्र सरकार के कामकाज को लेकर काफी गुस्से में नजर आती दिखाई दे रही है। इसी दौरान मुग्धा प्रधान वीडियो में कहती हैं कि अगर वह पीएम मोदी से मिलेंगी तो उन्हें ‘एक थप्पड़’ देंगी। बता दें कि जंतर-मंतर पर हुई उग्र प्रदर्शन और हिंसा को मुग्धा प्रदान सपोर्ट करती नजर आती है और गालीबाजों पर कार्रवाई को लेकर ये भड़क जाती है, जिसके बाद इनकी भड़ास वीडियो में साफ दिखाई देती है।

वीडियो में मुग्धा प्रधान अन्य मुद्दों को भी कहती नजर आती है। इसके अलावा, वीडियो वायरल होने के बाद सोशल मीडिया पर मुग्धा प्रधान पर नेटीजन्स का गुस्सा फूट पड़ा है। लोग इस महिला की आलोचना कर रहे हैं। मुग्धा प्रधान कोई सामान्य सोशल मीडिया यूजर नहीं हैं। वह हेल्थ और वेलनेस कंपनी iThrive की फाउंडर और CEO हैं। वह फंक्शनल न्यूट्रिशन के क्षेत्र में काम करती हैं। उनके पास फूड साइंस और न्यूट्रिशन में मास्टर डिग्री है। इतनी पढ़ी-लिखी होने के बावजूद भी गाली देने वालों को ये सपोर्ट करती है और भारत के प्रधानमंत्री के खिलाफ बयानबाजी करती है। आईए जानते हैं, मुग्धा प्रधान ने क्या-क्या कहा है।

वीडियो में क्या भड़ास निकाल रही है मुग्धा प्रधान?

Viral Video में मुग्धा प्रधान काफी गुस्से में नजर आ रही है, ऐसा लग रहा है कि वीडियो से बाहर निकलते ही किसी ना किसी को लपेट ही देंगी। वीडियों में मुग्धा प्रधान कहती हैं, मैं उन सभी बूढ़े आदमियों को थप्पड़ मारना चाहती हूँ जो सोचते हैं कि उन्हें औरतों और बच्चों के गुस्से को दबाने का हक है। जरा देखिए लोग क्या-क्या कर जाते हैं। आपको गाली गंदी लगती है, पर इस देश की सड़कें देखिए, जिन्हें मिसाल बनना चाहिए। मैं प्रकृति के बीच टहलने गई थी और एक पेड़ के नीचे कचरे के ढेर लगे थे। आप उस गंदगी को साफ़ क्यों नहीं कर सकते? आपको वह गंदगी क्यों नहीं दिखती? बेवकूफ लोग।”

इससे आगे मुग्धा प्रधान कहती है, “आपके अंदर ही गंदगी है तो आपको बाहर की गंदगी कैसे दिखेगी? प्रकृति में जो कुछ भी दिख रहा है, उसे एक गंदा शब्द कहा जा रहा है और मुझे लगता है कि आख़िरकार कोई आपको वह सच कह रहा है जिसके आप हकदार हैं और इसीलिए आपको इतना बुरा लग रहा है कि देश के PM होकर आप बैठकर कह रहे हैं कि आप माफ कर रहे हैं। अगर मैं आपसे मिली तो मैं आपको एक ‘माफ करने वाला’ थप्पड़ जरूर मारूँगी। एक बूढ़ा आदमी जिसे वहाँ नहीं होना चाहिए, निकल जाओ, मेरे देश से निकल जाओ, अपनी सत्ता से हट जाओ, निकल जाओ, अब समय आ गया है कि युवा लोग जिम्मेदारी संभालें।”

मुग्धा प्रधान ने पहले भी पीएम मोदी को लेकर एक वीडियो जारी किया था। इसमें ये बार-बार गाली देने वालों को सपोर्ट करती नजर आ रही है और पीएम मोदी के खिलाफ अपनी भड़ास निकालती दिख रही है।

कौन हैं PM मोदी को ‘थप्पड़’ मारने की इच्छा रखने वाली मुग्धा प्रधान?

PM मोदी को ‘थप्पड़’ मारने की इच्छा रखने वाली मुग्धा प्रधान पुणे से जुड़ी फंक्शनल न्यूट्रिशनिस्ट हैं। वह हेल्थ और वेलनेस के क्षेत्र में काम करती हैं। मुग्धा प्रधान ने iThrive नाम की कंपनी शुरू की। आज वह इसी कंपनी की CEO भी हैं।

iThrive का काम हेल्थ, न्यूट्रिशन और वेलनेस से जुड़ा है। कंपनी लोगों की स्वास्थ्य समस्याओं को लेकर फंक्शनल न्यूट्रिशन का तरीका अपनाने की बात करती है। इसमें सिर्फ बीमारी के लक्षणों पर ध्यान देने के बजाय उसके पीछे के कारणों को समझने की कोशिश की जाती है। लेकिन मुग्धा की इस वीडियो को देखकर लगता है कि उन्हें खुद ट्रीटमेंट की जरूरत है।

iThrive की वेबसाइट के मुताबिक, मुग्धा प्रधान के पास MSc फ़ूड साइंस और न्यूट्रिशन की डिग्री है। उन्होंने 2001 में अपनी मास्टर डिग्री पूरी की थी। इसके बाद उन्होंने कॉरपोरेट सेक्टर में भी काम किया। वह Flipkart की शुरुआती HR टीम का हिस्सा रह चुकी हैं। बाद में उन्होंने हेल्थ और न्यूट्रिशन के क्षेत्र में काम शुरू किया।

मुग्धा प्रधान साल 2017 में तीन बड़ी स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ चुकी है। मुग्धा ने क्लिनिकल डिप्रेशन, मोटापे और Hashimoto’s thyroiditis यानी एक ऑटोइम्यून बीमारी का जिक्र भी किया है।

मुग्धा प्रधान की प्रोफाइल में उन्हें दो बार TEDx स्पीकर बताया गया है। वह ‘Health, Inc.’ नाम की किताब की लेखिका भी हैं। कंपनी की वेबसाइट के अनुसार, यह किताब ग्लोबल हेल्थकेयर सिस्टम और उसके काम करने के तरीके पर आधारित है।

PM मोदी पर टिप्पणी करने वाली मुग्धा प्रधान पर नेटीजन्स का फूटा गुस्सा

वीडियो वायरल होने के बाद सोशल मीडिया यूजर्स ने सिर्फ मुग्धा प्रधान के बयान पर ही सवाल नहीं उठाए। कुछ लोगों ने iThrive के कारोबार और उसकी छवि को भी चर्चा में ला दिया। कुछ यूजर्स का कहना है कि हेल्थ और वेलनेस कंपनी के प्रमुख व्यक्ति का सार्वजनिक व्यवहार कंपनी की छवि पर असर डाल सकता है। कुछ पोस्ट में लोगों से पूछा गया कि क्या वे ऐसी कंपनी के उत्पाद खरीदना चाहेंगे जिसकी CEO इस तरह की भाषा का इस्तेमाल करती हैं।

एक यूजर लिखते हैं, iThrive कंपनी की सीईओ PM मोदी को बुरा-भला कहने में लगी हुई हैं। ऐसा लगता है कि उन्हें खुद ही बेहतर सप्लीमेंट्स की ज़रूरत है। सोचने वाली बात यह है कि जब कंपनी की सबसे बड़ी अधिकारी सबके सामने इतनी ज़्यादा नफ़रत और संयम की कमी दिखाती हैं, तो इससे उस ब्रांड की समझदारी और विश्वसनीयता के बारे में क्या पता चलता है?”

अभिजीत मजूमदार लिखते हैं, ” पीएम मोदी के लिए अपशब्दों का इस्तेमाल करने वाली मुग्धा प्रदान को देखकर ऐसा लगता है कि उन्हें मानसिक स्वास्थ्य संबंधी मदद की बहुत जरूरत है। वह बहुत परेशान और अस्थिर लग रही हैं। क्या कोई उनके ब्रांड और उसके प्रोडक्ट्स पर भरोसा कर सकता है?”

राकेश कृष्णन सिंहा लिखते हैं, “एक और पाखंडी से मिलिए। हेल्थ और वेलनेस कंपनी ‘iThrive’ की CEO और फाउंडर मुग्धा प्रधान, जंतर-मंतर पर हो रहे विरोध प्रदर्शनों को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपशब्द कह रही हैं। इस गंदी ज़बान वाली महिला को देखकर ऐसा लगता है जैसे वह किसी गटर में ही पैदा हुई हो। ये सभी नकली लोग FCRA की वजह से बहुत हताश हैं। FCRA जैसे जवाबदेही कानूनों के कारण, बकवास करने और भोले-भाले लोगों को ठगने के उनके सपने पूरे करना मुश्किल होता जा रहा है। उनकी स्पीच, उनकी बेकाबू हताशा भरी बकवास और उनकी साइट पर लिखी बातों को देखिए – सब कुछ एक-दूसरे के बिल्कुल उलट है। ‘सत्-चित्-आनंद’ तो कुछ ही सेकंड में फुस्स हो गया।”

एक यूजर ने फंडिंग को लेकर भी आरोप लगाया है, जिसमें दावा किया है, “iThrive की इस महिला को हांगकांग स्थित ‘फंग स्ट्रैटेजिक इन्वेस्टमेंट्स’ से निवेश मिला है। यही वजह है कि वह हमारे माननीय प्रधानमंत्री के लिए अपशब्दों का इस्तेमाल कर रही हैं। ऐसा लगता है कि वह चीन की एक ‘एसेट’ (मोहरा) हैं। कृपया उचित कानूनी कार्रवाई करें।”

‘iThrive’ की सीईओ मुग्धा प्रधान की कंपनी को हांगकांग की एक फर्म ‘फंग स्ट्रेटेजिक इन्वेस्टमेंट्स’ से पैसा मिलता है। जाँच करने पर पता चलता है कि ‘फंग स्ट्रेटेजिक इन्वेस्टमेंट्स’ (जिसे फंग इन्वेस्टमेंट्स भी कहते हैं) कोई आम कंपनी नहीं है। यह हांगकांग के बहुत अमीर फंग परिवार का निजी पारिवारिक निवेश दफ्तर है, जो उनके विशाल ‘फंग ग्रुप’ के लिए काम करता है। इस पूरी संस्था के मुख्य मालिक और फैसले लेने वाले डॉक्टर विक्टर के फंग (चेयरमैन) और डॉक्टर विलियम फंग (डिप्टी चेयरमैन) हैं, जो दोनों आपस में भाई हैं। यह फंग ग्रुप मुख्य रूप से सामान सप्लाई करने के व्यापार से जुड़ा हुआ है।

वित्तीय (Financial) दस्तावेजों के मुताबिक, पुणे की इस हेल्थ स्टार्टअप ‘iThrive’ में कुछ व्यक्तिगत लोगों ने पैसे लगाए हैं। इनमें फंग स्ट्रेटेजिक इन्वेस्टमेंट्स के कार्यकारी निदेशक राजेश रनावत और एनबी वेंचर्स के प्रबंध निदेशक नीलेश भटनागर के नाम शामिल हैं। राजेश रनावत ने इसमें एक निजी निवेशक के तौर पर पैसा लगाया था।

CJP के प्रदर्शन में PM मोदी को दी गई गालियाँ, उन्होंने किया था माफ

हाल ही में दिल्ली के जंतर-मंतर पर नीट (NEET) पेपर लीक और अन्य मुद्दों को लेकर ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) के नेतृत्व में विरोध प्रदर्शन किया गया था। इस प्रदर्शन के दौरान कुछ नाबालिग बच्चों और युवाओं द्वारा PM मोदी और उनकी दिवंगत माता को गालियाँ तक दी गई थीं।

गाली गलौज का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद काफी विवाद हुआ और एक नाबालिग लड़की के खिलाफ शिकायत भी दर्ज कराई गई थी। विवाद बढ़ने और बच्ची द्वारा अपनी गलती पर रोते हुए देश से माफी माँगने के बाद, PM मोदी ने इंस्टाग्राम पर एक वीडियो संदेश जारी किया। इस वीडियो में उन्होंने इन युवाओं को माफ करने का ऐलान किया था।

उन्होंने कहा था, “एक कल्चरल शौक है कि हमारी बेटियाँ इस प्रकार की भाषा कैसे बोल सकती है? लेकिन समय है इन बच्चों को गले लगा के राह दिखाने का। एक गुमराह बच्चे हैं। उनको राह दिखाना हमारा काम है। मेरे मन में एक ही भाव है। कभी-कभी दाँतों तले हमारी जीभ आ जाती है। खून निकल आता है। लेकिन हम दाँत तोड़ते नहीं है। क्योंकि दाँत भी हमारे हैं। जीभ भी हमारी है। बच्चे भी हमारे हैं। उन्हें राह दिखाना हमारा काम है।”

अरुणाचल की 27 रणनीतिक जगहें आधिकारिक नक्शे में शामिल, चीन की ‘नाम बदलो और दावा करो’ नीति को भारत का करारा जवाब: जानें क्या है इतिहास

सीमा सुरक्षा, प्रशासनिक पहचान और देश की संप्रभुता के मामले में भारत सरकार ने बड़ा और ऐतिहासिक कदम उठाया है। केंद्रीय गृह मंत्रालय की देखरेख में और अरुणाचल प्रदेश सरकार के साथ लंबे विचार-विमर्श के बाद भारत की आधिकारिक मानचित्र संस्था ‘सर्वे ऑफ इंडिया’ ने राज्य की 27 बेहद महत्वपूर्ण और रणनीतिक जगहों को देश के आधिकारिक राष्ट्रीय नक्शे में शामिल कर लिया है।

इन सभी जगहों को उनके असली, स्थानीय और प्रामाणिक नामों के साथ दर्ज किया गया है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब पड़ोसी देश चीन काफी समय से अरुणाचल प्रदेश की अलग-अलग जगहों के मनगढ़ंत और फर्जी चीनी नाम रखकर उन पर अपना झूठा दावा ठोकने की कोशिश कर रहा था।

भारत का यह कदम केवल कागजों पर नाम दर्ज करने का मामूली काम नहीं है बल्कि यह चीन की ‘कार्टोग्राफिक आक्रामकता’ यानी नक्शा-बाजी का एक बेहद करारा, संस्थागत और स्थायी जवाब है। इस कदम से न केवल हमारे दूर-दराज के सीमावर्ती इलाकों की वास्तविक पहचान को कानूनी और संवैधानिक मजबूती मिली है, बल्कि आम नागरिकों, सेना और स्थानीय प्रशासन के बीच इन क्षेत्रों को लेकर सटीक और सही जानकारी हमेशा के लिए स्थापित हो गई है।

अब इस पूरे मामले को विस्तार से समझते हैं कि भारत के इस कदम के पीछे क्या वजहें हैं, इन 27 जगहों का इतिहास क्या है और इसका अंतरराष्ट्रीय स्तर पर क्या असर पड़ेगा।

सर्वे ऑफ इंडिया द्वारा जारी अरुणाचल प्रदेश का नया अपडेटेड आधिकारिक मानचित्र (साभार: surveyofindia)

चीन का ‘नाम बदलो और दावा करो’ एजेंडा और भारत का करारा पलटवार

चीन पिछले कई सालों से एक सोची-समझी रणनीति के तहत अरुणाचल प्रदेश को ‘जंगनान’ या ‘दक्षिणी तिब्बत’ बताकर उसके अलग-अलग इलाकों के नाम बदलने का नाटक करता आ रहा था। चीन के नागरिक मामलों के मंत्रालय ने सबसे पहले साल 2017 में अरुणाचल की 6 जगहों के तथाकथित चीनी नामों की पहली सूची जारी की थी।

इसके बाद अपनी इस नापाक चाल को आगे बढ़ाते हुए उसने 2021 में 15 जगहों, 2023 में 11 जगहों और मार्च 2024 में 30 जगहों के फर्जी नाम घोषित किए थे। चीन की इस हरकत को अंतरराष्ट्रीय मामलों में ‘सलामी स्लाइसिंग’ और ‘मानचित्र आक्रामकता’ कहा जाता है।

इसके तहत चीन दुनिया के सामने कागजी भ्रम फैलाकर यह साबित करने की कोशिश करता है कि ये इलाके ऐतिहासिक रूप से उसके नियंत्रण में रहे हैं। भारत सरकार ने हर बार चीन की इन हरकतों को सिरे से खारिज किया और साफ कहा कि किसी दूसरे देश द्वारा कागजों पर फर्जी नाम लिख देने से अरुणाचल की जमीनी हकीकत नहीं बदल जाएगी।

इतिहास के पन्नों से: 1959 की पहली मुठभेड़ और 1962 की जंग के मुख्य केंद्र

सर्वे ऑफ इंडिया के नए नक्शे में जिन 27 जगहों को शामिल किया गया है, उनमें से कई ऐसी हैं जिनका भारत और चीन के सीमा विवाद के इतिहास से बहुत गहरा संबंध रहा है। इनमें सबसे प्रमुख और ऐतिहासिक नाम ‘लॉन्गजू’ (Longju) का है, जो वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी एलएसी के बिल्कुल पास स्थित है।

लॉन्गजू वही ऐतिहासिक स्थान है जो 1962 की भारत-चीन जंग से भी तीन साल पहले, यानी 1959 में दोनों देशों के बीच पहला बड़ा सैन्य संघर्ष बिंदु बना था, जब चीनी सेना ने भारतीय सीमा में घुसपैठ की कोशिश की थी। इसी लॉन्गजू के पास ऊपरी सुबनसिरी जिले में स्थित ‘माजा’ (Maja) गाँव को भी आधिकारिक नक्शे पर प्रमुखता से दर्शाया गया है।

इसके अलावा पश्चिमी क्षेत्र में स्थित ‘थाग ला’ (Thag La) दर्रा इस पूरी सूची का एक और सबसे संवेदनशील हिस्सा है। थाग ला दर्रा और उसके पास की नमका चू घाटी वही इलाका है, जहाँ से 20 अक्टूबर 1962 को चीन ने भारत पर बड़े पैमाने पर हमला शुरू किया था।

इन दो ऐतिहासिक स्थानों के साथ-साथ बेहद दुर्गम और ऊँचाई पर स्थित दर्रों जैसे ‘डजो ला’ (Dzo La), ‘रिजा ला’ (Riza La) और ‘पुकुर ला’ (Pukur La) को भी नक्शे में जगह दी गई है। ये दर्रे भारतीय सुरक्षा बलों की आवाजाही, निगरानी और गश्त के लिहाज से बेहद अहम माने जाते हैं।

हालाँकि अब भारत ने केवल बयानों और कूटनीतिक विरोध तक सीमित रहने के बजाय आगे बढ़कर काम किया है। सर्वे ऑफ इंडिया के नक्शे में इन 27 जगहों को उनके वास्तविक भारतीय नामों के साथ दर्ज करके भारत ने चीन के मनगढ़ंत दावों की पूरी तरह हवा निकाल दी है।

वीरता के प्रतीक: जसवंत सिंह और त्रिलोक सिंह थापा की शौर्य गाथा

भारत सरकार द्वारा जारी सूची में केवल पहाड़, नदियाँ और दर्रे ही शामिल नहीं हैं, बल्कि इसमें भारत माता के उन वीर सपूतों के स्मारक भी शामिल किए गए हैं जिन्होंने देश की सीमाओं की रक्षा करते हुए अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया था। इस सूची में तावांग के रास्ते में स्थित ‘जसवंत गढ़’ (Jaswant Garh) को आधिकारिक रूप से दर्ज किया गया है।

जसवंत गढ़ 1962 के युद्ध के अमर नायक राइफलमैन जसवंत सिंह रावत (महावीर चक्र) की बेमिसाल बहादुरी की याद दिलाता है। उन्होंने अकेले ही 72 घंटे तक चीनी सेना की पूरी टुकड़ी को रोके रखा था और दर्जनों दुश्मनों को ढेर करने के बाद वीरगति प्राप्त की थी।

आज भी भारतीय सेना और स्थानीय लोग जसवंत गढ़ को एक पवित्र मंदिर की तरह पूजते हैं। इसी तरह ऊपरी क्षेत्र में बने ‘शेर-ए-थापा स्मारक’ (Sher-e-Thapa Memorial) को भी सर्वे ऑफ इंडिया के नक्शे पर औपचारिक जगह दी गई है।

यह स्मारक 1962 की जंग में सुबनसिरी सेक्टर के पास चीनी सेना के दाँत खट्टे करने वाले सूबेदार त्रिलोक सिंह थापा और उनकी बहादुर टुकड़ी के अप्रतिम शौर्य का प्रतीक है। इन युद्ध स्मारकों को देश के नक्शे में शामिल करने का सीधा संदेश यह है कि भारत अपने बलिदानियों की पावन भूमि और अपनी सीमा के एक-एक इंच हिस्से का सम्मान करता है।

जमीन से जुड़ाव: सेना के आपूर्ति रास्ते और स्थानीय बस्तियों की सुरक्षा

नक्शे में जोड़ी गई कई जगहें ऐसी हैं जो अरुणाचल प्रदेश के प्रशासनिक कामकाज, वहाँ रहने वाली स्थानीय जनजातियों के जीवन और हमारी सेना के लॉजिस्टिक्स यानी रसद प्रबंधन के लिए रीढ़ की हड्डी की तरह काम करती हैं। उदाहरण के तौर पर चांगलांग जिले में मौजूद ‘जयरामपुर’ का नाम इस सूची में विशेष रूप से शामिल है।

जयरामपुर पूर्वी अरुणाचल प्रदेश और म्यांमार सीमा की ओर जाने वाले सुरक्षा बलों की आवाजाही, राशन और सैन्य हथियारों की आपूर्ति के लिए एक बहुत बड़ा रणनीतिक सेंटर है।

इसी तरह लोहित जिले में स्थित ‘कमलांग नगर’, जो प्रसिद्ध कमलांग वाइल्डलाइफ सेंचुरी के करीब है, और ‘सनपुरा’ जैसे प्रशासनिक इलाकों को भी आधिकारिक नक्शे पर पक्की पहचान दी गई है। इसके अलावा इस सूची में ‘सांम्भो सरोवर’ नामक एक बेहद खूबसूरत और ऊँचाई पर स्थित प्राकृतिक झील को शामिल किया गया है।

साथ ही बीसा, बड़ा कुंदन, छोटा कुंदन, धन बारी, प्रीतनगर, बौद्धमंदिर, टेरितनगर, रामनगर, सागर, पद्मा, ज्योतिनगर, बैसाखी, छोटा रोपुक, बड़ा रोपुक और शिवाजी नगर जैसे बसे हुए गाँवों को उनके असली नामों के साथ चिन्हित किया गया है।

इन सभी गाँवों को नक्शे में जोड़ने से वहाँ के स्थानीय जनजातीय समुदायों और उनकी पारंपरिक पहचान को सुरक्षा और सम्मान दोनों मिलता है।

कानूनी ताकत: कागजी दावों के खिलाफ भारत की सबसे बड़ी ढाल

किसी भी आजाद और संप्रभु देश के लिए उसका आधिकारिक नक्शा सिर्फ भूगोल की रेखाएँ नहीं होता, बल्कि वह उसकी संवैधानिक संप्रभुता, प्रशासनिक नियंत्रण और कानूनी अधिकारों का सबसे मजबूत प्रमाण होता है।

जब भारत का आधिकारिक नक्शा बनाने वाला संस्थान यानी सर्वे ऑफ इंडिया किसी जगह को अपने नक्शे में प्रामाणिक नाम के साथ दर्ज करता है, तो उसे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कानूनी मान्यता मिल जाती है।

इसका पहला बड़ा फायदा यह होगा कि भारत के सभी सरकारी दस्तावेजों, जमीन के रिकॉर्ड, विकास योजनाओं, राजस्व खातों और सेना के ऑपरेशन्स में अब केवल और केवल इन्हीं असली नामों का इस्तेमाल किया जाएगा, जिससे भविष्य में किसी भी तरह के भ्रम की कोई गुंजाइश नहीं रहेगी।

दूसरा बड़ा फायदा यह होगा कि जब भी चीन किसी अंतरराष्ट्रीय मंच या बहुपक्षीय बैठक में अपने मनगढ़ंत नक्शों के आधार पर झूठे दावे करने की कोशिश करेगा, तब भारत के पास अपने सरकारी, राजपत्रित और वैज्ञानिक रूप से सर्वे किए गए आधिकारिक नक्शों का ठोस सबूत मौजूद होगा।

जानकारों का कहना है कि भारत का यह कदम यह दिखाता है कि देश अब केवल रक्षात्मक रहने के बजाय अपनी सीमाओं और अधिकारों को बहुत मजबूती से सामने रख रहा है।

27 जगहों का पूरा लेखा-जोखा: दर्रे, झील, स्मारक और 21 गाँव

सर्वे ऑफ इंडिया द्वारा जारी इस नए और अपडेटेड मानचित्र में कुल मिलाकर 27 महत्वपूर्ण भौगोलिक स्थलों को जगह दी गई है, जिन्हें चार मुख्य श्रेणियों में बाँटकर समझा जा सकता है।

पहली श्रेणी में चार प्रमुख पर्वतीय दर्रे यानी पास शामिल हैं, जिनके नाम डजो ला, रिजा ला, पुकुर ला और थाग ला हैं। दूसरी श्रेणी में एक प्राकृतिक जल निकाय यानी बेहद ऊँचाई पर स्थित पवित्र झील सांम्भो सरोवर है। तीसरी श्रेणी में हमारे वीर जवानों के शौर्य की याद दिलाने वाला ऐतिहासिक शेर-ए-थापा मेमोरियल शामिल है।

चौथी और सबसे बड़ी श्रेणी में 21 अलग-अलग आबाद गाँव, प्रशासनिक इलाके और बस्तियाँ हैं, जिनमें लॉन्गजू, माजा, बीसा, बड़ा कुंदन, छोटा कुंदन, धन बारी, प्रीतनगर, बौद्धमंदिर, जयरामपुर, टेरितनगर, रामनगर, जसवंत गढ़, सागर, पद्मा, ज्योतिनगर, बैसाखी, छोटा रोपुक, बड़ा रोपुक, शिवाजी नगर, सनपुरा और कमलांग नगर शामिल हैं।

इन सभी 27 स्थानों को उनके सटीक अक्षांश-देशांतर (Latitude-Longitude) और प्रामाणिक भारतीय नामों के साथ राष्ट्रीय सर्वे नेटवर्क में दर्ज कर लिया गया है, जिससे भविष्य में कोई भी विदेशी ताकत इनकी पहचान को बदल नहीं सकेगी।

अरुणाचल प्रदेश की इन 27 जगहों को देश के आधिकारिक राष्ट्रीय नक्शे में जोड़कर भारत ने चीन समेत पूरे विश्व को एक बहुत ही स्पष्ट और सख्त संदेश दे दिया है। भारत ने फिर से यह साफ दिया है कि अरुणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न, अविभाज्य और अटूट हिस्सा था, है और हमेशा रहेगा।

सीमावर्ती इलाकों में नई ऑल-वेदर सड़कों, सुरंगों, पुलों और एडवांस लैंडिंग ग्राउंड्स के निर्माण के साथ-साथ ‘वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम’ और अब नक्शों के इस सुदृढ़ीकरण से भारत की मजबूत और स्पष्ट विदेश नीति साफ नजर आती है।

योगी सरकार ने शुरू किया ‘नशा विरोधी अभियान’, UP के सभी कॉलेज-यूनिवर्सिटी में रोज होगी नशे के खिलाफ शपथ: 500 मीटर दायरे में नशीले पदार्थों की बिक्री पर रोक

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार जल्द ही सभी यूनिवर्सिटी और कॉलेजों में नशे के खिलाफ बड़ा अभियान शुरू करने जा रही है। यह अभियान सरकारी और निजी दोनों संस्थानों में चलेगा। हर कार्यदिवस की शुरुआत दो मिनट की नशा विरोधी शपथ से होगी। कैंपस में नियमित जाँच भी की जाएगी।

यूनिवर्सिटी और कॉलेज के 500 मीटर के दायरे में नशीले पदार्थों की बिक्री पर रोक रहेगी। छात्रों को जागरूक करने के लिए कई कार्यक्रम होंगे। इनमें मैराथन, मार्च, भाषण, निबंध और पेंटिंग प्रतियोगिताएँ शामिल हैं। नुक्कड़ नाटक भी होंगे। अगर किसी छात्र में नशे की आदत के संकेत मिलते हैं तो उसकी पहचान की जाएगी। उसे काउंसलिंग दी जाएगी।

यह अभियान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नशा मुक्त भारत के आह्वान को आगे बढ़ाने के लिए शुरू किया जा रहा है। सरकार का लक्ष्य इसे जन आंदोलन बनाना है। इसके साथ ही ‘विकसित भारत-विकसित उत्तर प्रदेश’ के संकल्प को भी आगे बढ़ाया जाएगा। अभियान की निगरानी के लिए पूरे प्रदेश को 5 जोन में बांटा गया है। हर जोन में एक वरिष्ठ विभागीय अधिकारी को नोडल अधिकारी बनाया जाएगा।

विधानसभा में हुई बैठक, तैयार हुआ पूरा प्लान

अभियान को लेकर विधानसभा परिसर में अहम बैठक हुई। इसमें प्रदेश के सभी राज्य विश्वविद्यालयों के कुलसचिव और परीक्षा नियंत्रक शामिल हुए। बैठक की अध्यक्षता उच्च शिक्षा मंत्री योगेंद्र उपाध्याय ने की। बैठक में अभियान को प्रभावी बनाने पर चर्चा हुई। इसे लगातार चलाने की योजना बनाई गई। साथ ही यह तय किया गया कि अभियान का असर जमीन पर भी दिखना चाहिए।

इसके लिए पूरा एक्शन प्लान तैयार किया गया। उच्च शिक्षा मंत्री योगेंद्र उपाध्याय ने कहा कि युवा विकसित भारत की सबसे बड़ी ताकत हैं। युवाओं को नशे से दूर रखना बहुत जरूरी है। इससे प्रदेश और देश का भविष्य मजबूत होगा। उन्होंने कहा कि यूनिवर्सिटी और कॉलेज केवल पढ़ाई की जगह नहीं हैं। यहाँ छात्रों को अच्छे संस्कार और अनुशासन भी मिलना चाहिए। इन संस्थानों को राष्ट्र निर्माण की नींव बनाया जाएगा। नशा विरोधी अभियान भी इसी सोच का हिस्सा है।

बैठक में कई विधायक और अधिकारी मौजूद रहे

बैठक में उच्च शिक्षा के प्रमुख सचिव एमपी अग्रवाल मौजूद रहे। विधायक उमेश द्विवेदी भी बैठक में शामिल हुए। बाबूलाल तिवारी, मानवेंद्र सिंह और चंद्र शर्मा भी मौजूद रहे। धर्मेंद्र भारद्वाज, अरुण पाठक और हरि सिंह ढिल्लों ने भी बैठक में हिस्सा लिया। बैठक में अवनीश कुमार और प्रदेश महामंत्री संजय राय भी मौजूद रहे।

इसके अलावा उच्च शिक्षा विभाग के वरिष्ठ अधिकारी भी बैठक में शामिल हुए। सभी ने अभियान को सही तरीके से लागू करने पर जोर दिया। अभियान की लगातार निगरानी की बात भी कही गई।

हर दिन दो मिनट की शपथ, हर हफ्ते 10 मिनट की बात

सभी सरकारी और निजी यूनिवर्सिटी और कॉलेजों में हर कार्यदिवस की शुरुआत से पहले छात्रों को दो मिनट की नशा विरोधी शपथ दिलाई जाएगी। इसका मकसद छात्रों को नशे के नुकसान के बारे में बताना है। साथ ही उन्हें नशे से दूर रहने का संकल्प दिलाना है। हर शिक्षक सप्ताह में एक कक्षा के आखिरी 10 मिनट नशामुक्त जीवन पर चर्चा के लिए देंगे।

इस दौरान छात्रों से बातचीत की जाएगी। उन्हें नशे से होने वाले नुकसान बताए जाएँगे। उन्हें मोटिवेट भी किया जाएगा। सरकार चाहती है कि नशे के खिलाफ जागरूकता सिर्फ किसी एक दिन के कार्यक्रम तक सीमित न रहे। यह छात्रों की रोज की पढ़ाई और बातचीत का हिस्सा बने।

मैराथन और नुक्कड़ नाटक से होगा जागरूकता अभियान

नशे के खिलाफ ‘रन फॉर नशा मुक्ति’ कार्यक्रम कराया जाएगा। इसके साथ मैराथन और जागरूकता मार्च भी होंगे। छात्रों के लिए भाषण प्रतियोगिताएँ कराई जाएँगी। निबंध और पेंटिंग प्रतियोगिताएँ भी होंगी। नाटक और नुक्कड़ नाटक के जरिए नशे के नुकसान समझाए जाएँगे। इन कार्यक्रमों में ज्यादा से ज्यादा छात्रों को जोड़ने की कोशिश होगी। छात्रों में अच्छी सोच और जीवन के अच्छे मूल्यों को बढ़ाने के लिए शैक्षिक भ्रमण भी कराए जाएँगे।

छात्रों को सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और प्रेरणादायक जगहों पर ले जाया जाएगा। कैंपस और सार्वजनिक जगहों पर होर्डिंग लगाए जाएँगे। दीवारों पर पेंटिंग बनाई जाएगी। सोशल मीडिया पर भी अभियान चलाया जाएगा। ज्यादा से ज्यादा छात्रों को ‘माई भारत’ पोर्टल से जोड़ने की कोशिश होगी।

5 जोन में होगी निगरानी, प्रिंसिपल की भी जिम्मेदारी

नशा विरोधी अभियान की निगरानी के लिए पूरे उत्तर प्रदेश को 5 जोन में बांटा गया है। हर जोन में एक वरिष्ठ विभागीय अधिकारी नोडल अधिकारी होगा। वह अपने जोन में अभियान की निगरानी करेगा। यूनिवर्सिटी स्तर पर भी वरिष्ठ नोडल अधिकारी होगा। कॉलेज स्तर पर प्रिंसिपल को जिम्मेदारी दी जाएगी।

हर फैकल्टी में भी एक अलग नोडल अधिकारी बनाया जाएगा। ये अधिकारी अभियान के काम की नियमित जाँच करेंगे। इसका मकसद यह है कि अभियान सिर्फ कागजों पर न चले। कॉलेज और यूनिवर्सिटी में इसका सही तरीके से पालन हो।

कॉलेजों के 500 मीटर तक नशे की बिक्री पर रोक

सरकार ने नशीले पदार्थों की उपलब्धता रोकने के लिए सख्त कदम उठाए हैं। सभी यूनिवर्सिटी और कॉलेजों के 500 मीटर के दायरे में नशीले पदार्थों की बिक्री पर रोक रहेगी। इसके लिए नियमित जाँच की जाएगी। हॉस्टल की भी जाँच होगी। कैंटीन और पूरे कैंपस की जाँच की जाएगी।

नशीले पदार्थों को कैंपस तक पहुँचने से रोकने पर खास ध्यान दिया जाएगा। ऑनलाइन डिलीवरी और कूरियर के जरिए आने वाले सामान की भी एंट्री गेट पर जाँच होगी। इसका मकसद कैंपस के अंदर नशीली चीजों की पहुँच को रोकना है।

नशे के संकेत मिलने पर छात्र की होगी काउंसलिंग

अगर किसी छात्र में नशे की आदत के संकेत मिलते हैं तो उसकी पहचान की जाएगी। ऐसे छात्र को काउंसलिंग दी जाएगी। जरूरत पड़ने पर उसके माता-पिता को भी बुलाया जाएगा। माता-पिता के साथ बातचीत की जाएगी। छात्र को नशे की आदत से बाहर निकालने की कोशिश होगी।

सरकार का जोर सिर्फ कार्रवाई करने पर नहीं है। छात्रों को सही रास्ते पर लाना भी इस अभियान का बड़ा हिस्सा है। इस पहल का मकसद छात्रों को स्वस्थ और अच्छा माहौल देना है। युवाओं को पढ़ाई के साथ स्वास्थ्य, अनुशासन और जिम्मेदारी से जोड़ने की कोशिश होगी।

जल्द आएगी एकीकृत युवा नीति

उत्तर प्रदेश सरकार जल्द ही एक एकीकृत युवा नीति भी लाने जा रही है। इस नीति में युवाओं को सबसे ज्यादा महत्व दिया जाएगा। सरकार का कहना है कि युवा ही आगे नेतृत्व करेगा। युवा ही नई संभावनाएँ पैदा करेगा। शिक्षा, स्वास्थ्य, स्किलिंग और रोजगार पर खास ध्यान दिया जाएगा। इन क्षेत्रों में युवाओं के लिए नए अवसर बनाने की कोशिश होगी।

नशा विरोधी अभियान को भी युवा सशक्तीकरण की इसी सोच से जोड़कर देखा जा रहा है। सरकार चाहती है कि युवा नशे से दूर रहें। वे अपनी ऊर्जा सही दिशा में लगाएँ। देश में भी नशे के खिलाफ अभियान का दायरा बढ़ रहा है। केंद्र सरकार के आँकड़ों के अनुसार ‘नशा मुक्त भारत अभियान’ लगातार आगे बढ़ रहा है।

जुलाई 2026 में सरकार ने बताया था कि सामुदायिक भागीदारी और देशभर में चलाए गए जागरूकता कार्यक्रमों के जरिए यह अभियान 29.32 करोड़ से ज्यादा लोगों तक पहुँच चुका है। सरकार के अनुसार अभियान 7.81 करोड़ से ज्यादा युवाओं और 5.24 करोड़ महिलाओं तक भी पहुँचा है। इसके अलावा 17 लाख शैक्षणिक संस्थानों सहित 23 करोड़ से ज्यादा लोगों तक अभियान की पहुँच बताई गई है।

इसका मकसद ज्यादा से ज्यादा लोगों को नशे के खिलाफ जागरूक करना है। 18 अगस्त 2026 को ‘नशा मुक्त भारत अभियान’ की छठी वर्षगाँठ है। इस मौके पर देशभर में मादक पदार्थों के दुरुपयोग के खिलाफ राष्ट्रीय संकल्प कार्यक्रम प्रस्तावित है। सरकार ने इस कार्यक्रम में 12 करोड़ से ज्यादा लोगों के संकल्प लेने की संभावना जताई है।

पीएम मोदी ने शुरू किया ‘नशा मुक्त युवा फॉर विकसित भारत’ अभियान

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘नशा मुक्त युवा फॉर विकसित भारत संकल्प अभियान’ की शुरुआत की। उन्होंने देशभर में हुई एक बड़ी वीडियो कॉन्फ्रेंस को संबोधित किया। इस कार्यक्रम से 28 हजार से ज्यादा स्थान जुड़े थे। कार्यक्रम में एक करोड़ से ज्यादा युवा भी जुड़े। पीएम मोदी ने कहा कि आज पूरा देश एक बड़े संकल्प के लिए एक साथ आया है।

पीएम मोदी ने कहा कि नशामुक्ति सिर्फ एक व्यक्ति की सेहत का मामला नहीं है। इसका असर परिवार पर भी पड़ता है। समाज पर भी असर होता है। इसका असर पूरे देश पर पड़ता है। पीएम मोदी ने कहा कि विकसित भारत के लिए युवाओं का स्वस्थ रहना जरूरी है। युवा शारीरिक और मानसिक रूप से मजबूत हों। उनमें आत्मविश्वास हो। वे नशीले पदार्थों जैसी बुरी आदतों से दूर रहें।

काशी से शुरू हुई पहल अब राष्ट्रीय अभियान बनी

पीएम मोदी ने बताया कि इस पहल की शुरुआत पिछले साल काशी से हुई थी। वहाँ इसे एक प्रायोगिक परियोजना के रूप में शुरू किया गया था। काशी घोषणा के तहत 125 से ज्यादा आध्यात्मिक संगठनों और कई गैर सरकारी संगठनों ने इसमें सहयोग किया। अब यह पहल राष्ट्रीय परियोजना बन गई है। प्रधानमंत्री ने नशा विरोधी शपथ लेने वाले लाखों युवाओं की तारीफ की। उन्होंने कहा कि युवाओं ने नशे से दूर रहने का संकल्प लिया है।

साथ ही वे स्कूल, कॉलेज और समाज में नशामुक्त जीवन का संदेश भी दे रहे हैं। पीएम मोदी ने 100 सप्ताह के रोडमैप की भी बात की। इसके तहत हर आने वाले रविवार को अलग-अलग गतिविधियाँ होंगी। इनमें कला, संस्कृति, खेल और ध्यान से जुड़े कार्यक्रम शामिल होंगे। उन्होंने कहा कि आने वाले 100 रविवार नशामुक्त भारत की दिशा में 100 मजबूत कदम होंगे।

जिस कॉन्ग्रेस ने बनाया FCRA, वही अब विदेशी फंडिंग को लेकर BJP सरकार को घेर रही: NGOs की अवैध फंडिंग रोकने पर क्यों मचा बवाल?

कान्ग्रेस पार्टी इन दिनों मोदी सरकार पर विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम यानी FCRA के गलत इस्तेमाल का आरोप लगा रही है। कान्ग्रेस का कहना है कि सरकार FCRA के जरिए नागरिक समाज समूहों और गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) पर दबाव बना रही है और राजनीतिक असहमति को रोकने की कोशिश कर रही है।

हालाँकि, FCRA का इतिहास काफी पुराना है। यह कानून पहली बार 1976 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की सरकार के दौरान लाया गया था। इसके बाद राजीव गाँधी सरकार ने 1980 के दशक में इसमें बड़े बदलाव किए। 2010 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली UPA सरकार ने नया FCRA कानून लागू किया, जिसने NGOs के विदेशी फंड पर निगरानी और सरकारी नियंत्रण को और बढ़ाया।

इंदिरा गाँधी के समय आया FCRA

FCRA की शुरुआत 1976 में हुई थी। उस समय देश में प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के नेतृत्व में आपातकाल लगा हुआ था। नागरिक स्वतंत्रताएं सीमित थीं, विपक्षी नेताओं को MISA यानी आंतरिक सुरक्षा रखरखाव अधिनियम के तहत जेल में रखा गया था और प्रेस पर भी कड़े प्रतिबंध थे।

इसी दौर में विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम, 1976 संसद में लाया गया। इसका उद्देश्य देश में आने वाले विदेशी पैसे और उसके इस्तेमाल को नियंत्रित करना था।

1976 के कानून के तहत साफ तौर पर इन लोगों के लिए विदेशी मेहमाननवाजी और विदेशी चंदे पर रोक लगा दी गई थी:

(a) चुनाव लड़ने वाला उम्मीदवार,
(b) पंजीकृत अखबार का संवाददाता, कॉलम लिखने वाला, कार्टूनिस्ट, संपादक, मालिक, प्रिंटर या प्रकाशक,
(c) न्यायाधीश, सरकारी कर्मचारी या किसी निगम का कर्मचारी,
(d) किसी भी विधानमंडल का सदस्य,
(e) राजनीतिक दल या उसका कोई पदाधिकारी।

पत्रकारों को कानून के तहत इस प्रतिबंधित सूची में शामिल किया जाना इंदिरा गाँधी की मंशा को साफ तौर पर दिखाता है। इसका उद्देश्य राजनीतिक विरोधियों, व्यंग्य लिखने वालों, स्वतंत्र पत्रकारों और नागरिक अधिकार समूहों को विदेशों से आर्थिक मदद मिलने से रोकना था। इस तरह आपातकाल के दौरान उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि सार्वजनिक जीवन में आर्थिक रूप से टिके रहने के लिए सरकार का नियंत्रण बना रहे।

राजीव गाँधी सरकार ने बढ़ाया सरकारी नियंत्रण

आपातकाल खत्म होने और जनता पार्टी सरकार के कार्यकाल के बाद कान्ग्रेस फिर सत्ता में लौटी। प्रधानमंत्री राजीव गाँधी के समय 1985 में FCRA में महत्वपूर्ण बदलाव किए गए।

इससे पहले संगठन कुछ परिस्थितियों में पूर्व सूचना या सामान्य अनुमति के आधार पर विदेशी योगदान ले सकते थे। लेकिन 1985 के संशोधन के बाद विदेशी फंड लेने वाले संगठनों के लिए गृह मंत्रालय (MHA) के साथ औपचारिक पंजीकरण जरूरी कर दिया गया।

इस बदलाव के बाद FCRA NGOs के लिए एक स्थायी और नौकरशाही आधारित निगरानी व्यवस्था बन गया। विदेशी फंड लेने वाले संगठनों को अब सरकार के सामने पंजीकरण और नियमों का पालन करना जरूरी था।

2010 में मनमोहन सिंह सरकार ने बनाया नया FCRA

FCRA में सबसे बड़ा बदलाव 2010 में हुआ। प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली UPA सरकार और तत्कालीन गृह मंत्री पी. चिदंबरम के कार्यकाल में विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम, 2010 लागू किया गया।

इस कानून ने 1976 के पुराने FCRA को पूरी तरह खत्म कर उसकी जगह नया कानून लागू किया। नए कानून में NGOs और दूसरे संगठनों को मिलने वाले विदेशी फंड पर सरकार का नियंत्रण और बढ़ गया।

1976 के कानून के तहत FCRA पंजीकरण एक बार मिलने के बाद तब तक जारी रहता था, जब तक उसे रद्द नहीं किया जाता। लेकिन 2010 के कानून में पंजीकरण की अवधि 5 साल कर दी गई।

इसका मतलब था कि NGOs को अपना FCRA पंजीकरण समय-समय पर नवीनीकृत कराना पड़ता था। इससे सरकार के पास पंजीकरण को रोकने, उसमें देरी करने या उसे मंजूर नहीं करने का अधिकार और प्रभाव बढ़ गया।

2010 के FCRA की धारा 5 में ‘राजनीतिक प्रकृति के संगठन’ नाम की एक नई श्रेणी जोड़ी गई। इसके तहत सरकार को ऐसे संगठनों को विदेशी फंड लेने से रोकने की शक्ति मिली, जिन्हें राजनीतिक प्रकृति का माना जाता था। इसमें उन समूहों पर भी असर पड़ सकता था जो सरकारी नीतियों, बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स या दूसरी सरकारी योजनाओं के खिलाफ प्रदर्शन करते थे।

2010 के कानून की धारा 8 में विदेशी फंड के प्रशासनिक खर्च पर भी सीमा लगाई गई। इसके तहत किसी संगठन को मिले विदेशी योगदान का अधिकतम 50 प्रतिशत ही प्रशासनिक खर्च में इस्तेमाल किया जा सकता था। इसमें संगठन के संचालन, वेतन और रिसर्च जैसे खर्च शामिल थे। इस तरह सरकार ने NGOs के विदेशी फंड के इस्तेमाल पर एक और वित्तीय सीमा तय कर दी।

कुडनकुलम विवाद में FCRA का इस्तेमाल

2011 से 2013 के बीच तमिलनाडु में कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा संयंत्र और आनुवंशिक रूप से संशोधित यानी (जीएम) फसलों के फील्ड ट्रायल जैसे मुद्दों को लेकर विरोध प्रदर्शन हुए।

कुडनकुलम में पीपुल्स मूवमेंट अगेंस्ट न्यूक्लियर एनर्जी यानी (PMANE) के नेतृत्व में बड़े स्तर पर परमाणु विरोधी आंदोलन हुआ। इन प्रदर्शनों के कारण रूस की मदद से बनाए जा रहे परमाणु रिएक्टरों को शुरू करने में देरी हुई।

उस समय UPA सरकार के कई वरिष्ठ अधिकारियों ने इन प्रदर्शनों के पीछे विदेशी फंडिंग को जिम्मेदार बताया।

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने एक इंटरव्यू में कहा था कि कुडनकुलम में हो रहे विरोध प्रदर्शनों में विदेशी NGOs की भूमिका थी। उन्होंने कहा था कि इनमें से कई NGOs अमेरिका और स्कैंडिनेवियाई देशों से फंड प्राप्त करते हैं और भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरी तरह नहीं समझते।

करीब 4000 NGOs पर कार्रवाई

कुडनकुलम आंदोलन के दौरान गृह मंत्रालय ने करीब 4,000 NGOs के FCRA पंजीकरण रद्द किए थे। कुडनकुलम आंदोलन को फंड देने वाले बताए गए कुछ संगठनों के बैंक खाते फ्रीज किए गए और उनके वित्तीय रिकॉर्ड की जाँच भी कराई गई।

पर्यावरण से जुड़े कुछ विदेशी नागरिकों को भारत से बाहर भेजा गया या उन्हें वीजा देने से इनकार किया गया। सरकार का कहना था कि इन लोगों ने स्थानीय विकास विरोधी प्रदर्शनों में हिस्सा लेकर अपने वीजा नियमों का उल्लंघन किया था।

तत्कालीन गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने भी कुडनकुलम आंदोलन के दौरान विदेशी फंड के इस्तेमाल को लेकर कार्रवाई की बात कही थी। उन्होंने कहा था कि जाँच में धन के गलत इस्तेमाल की जानकारी सामने आई है और इसलिए FCRA के तहत मामले दर्ज करने का फैसला लिया गया।

आज कान्ग्रेस के विरोध के बीच पुराना इतिहास

आज कान्ग्रेस मोदी सरकार पर FCRA का इस्तेमाल NGOs और नागरिक समाज संगठनों को दबाने के लिए करने का आरोप लगा रही है। कान्ग्रेस FCRA संशोधन विधेयक का विरोध कर रही है और उसका कहना है कि इससे नागरिक संगठनों की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है।

लेकिन FCRA का इतिहास बताता है कि विदेशी फंड पर सरकारी निगरानी किसी एक सरकार तक सीमित नहीं रही है। इसकी शुरुआत 1976 में इंदिरा गांधी सरकार के दौरान हुई। 1985 में राजीव गांधी सरकार ने इसमें महत्वपूर्ण बदलाव किए और 2010 में मनमोहन सिंह सरकार ने नया FCRA कानून लागू किया।

इसके बाद भाजपा सरकार के समय भी FCRA में बड़े बदलाव किए गए। इनमें 2020 और 2026 के महत्वपूर्ण संशोधन शामिल हैं। इन बदलावों का मुख्य उद्देश्य विदेशी सरकारों और संगठनों से मिलने वाले पैसे के जरिए भारत की घरेलू राजनीति, नीतिगत फैसलों या सामाजिक आंदोलनों को प्रभावित करने की संभावना को रोकना बताया गया है।

FCRA की निगरानी का एक तर्क यह भी है कि विदेशी फंड का इस्तेमाल देश में अस्थिरता पैदा करने वाली गतिविधियों, उग्रवाद, अवैध धार्मिक धर्मांतरण या कट्टरपंथी संगठनों को आर्थिक मदद देने के लिए न हो।

इस पूरे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि FCRA को लेकर सरकारी नियंत्रण की व्यवस्था अचानक मोदी सरकार के समय शुरू नहीं हुई। यह कानून करीब 5 दशकों से अलग-अलग सरकारों के कार्यकाल में लगातार बदलता और मजबूत होता रहा है। ऐसे में आज कान्ग्रेस द्वारा FCRA को लेकर उठाए जा रहे सवालों के साथ इस कानून के पुराने इतिहास को भी देखना जरूरी है।

नेपाल में हिंदू राष्ट्र की माँग से ईसाई मिशनरी के खिलाफ मोर्चे तक, अब हिंसा के पीड़ित हिंदुओं के लिए आमरण अनशन: जानें- कौन हैं विनय यादव?

नेपाल की राजधानी काठमांडू के मैतीघर मंडला में एक शख्स पिछले 10 दिनों से अन्न त्यागकर बैठा है। यह कोई बड़ा राजनीतिक मंच नहीं लगा है, न ही चुनावी सभा हो रही है, उसके हाथ में बस अपनी माँगों की एक लंबी सूची है और दावा है कि जब तक सरकार इन्हें नहीं मानती, वह अपना अनशन खत्म नहीं करेगा।

यह शख्स हैं नेपाल के राजनीतिक और सामाजिक कार्यकर्ता विनय यादव। उनकी सबसे बड़ी माँग सुनसरी के देवानगंज में हुई हिंसा के पीड़ितों को न्याय दिलाना और सरकार के साथ हुए समझौते को लागू कराना है। लेकिन कहानी सिर्फ इतनी नहीं है।

विनय यादव जिन मुद्दों को लेकर अनशन पर बैठे हैं, उनमें नेपाल को फिर से हिंदू राष्ट्र घोषित करने की माँग, मुस्लिम आरक्षण खत्म करना, मुस्लिम आयोग को भंग करना, अवैध घुसपैठ पर कार्रवाई और हिंदुओं के खिलाफ हिंसा के मामलों में दोषियों पर कड़ी कार्रवाई जैसे मुद्दे शामिल हैं।

यही वजह है कि उनका मौजूदा आमरण अनशन सिर्फ एक स्थानीय घटना को लेकर किया जा रहा विरोध नहीं है बल्कि नेपाल की धार्मिक पहचान, राजनीति और नागरिक अधिकारों से जुड़े कई सवालों को एक साथ सामने ला रहा है।

26 जुलाई 2026 की रात सुनसरी जिले के देवानगंज ग्रामीण नगरपालिका के कप्टानगंज में लाउडस्पीकर, डीजे और कावड़ यात्रा को लेकर विवाद के बाद हिंसा भड़क गई थी। हालात बिगड़ने पर पुलिस की कार्रवाई और गोलीबारी हुई, जिसमें चार लोगों की मौत हो गई। इसके बाद सरकार और पीड़ित परिवारों के बीच 7-सूत्रीय समझौता हुआ।

मृतकों को शहीद का दर्जा, परिवारों को 10 लाख नेपाली रुपए की सहायता, एक सदस्य को रोजगार, घायलों का मुफ्त इलाज और निष्पक्ष जाँच जैसे वादे किए गए। विनय यादव अब सवाल उठा रहे हैं कि इन वादों पर अमल कहाँ तक पहुँचा?

यही सवाल उन्हें मैतीघर मंडला तक लेकर आया है। लेकिन जिस व्यक्ति ने अपनी जान दाँव पर लगाकर यह आंदोलन शुरू किया है, वह आखिर कौन है? नेपाल की राजनीति में उसकी पहचान क्या है और किन-किन मुद्दों पर वह पहले भी सरकारों के खिलाफ मोर्चा खोल चुका है?

चीन के सीमा अतिक्रमण से लेकर पोखरा एयरपोर्ट में भ्रष्टाचार, BRI के विरोध से लेकर मदरसा विधेयक के खिलाफ आंदोलन और नेपाल को हिंदू राष्ट्र बनाने की माँग तक, विनय यादव की राजनीतिक सक्रियता का दायरा काफी बड़ा रहा है। आइए जानते हैं कौन हैं विनय यादव और क्यों इस समय उनका आमरण अनशन नेपाल में चर्चा का विषय बना हुआ है।

कौन हैं विनय यादव?

विनय यादव नेपाल के राजनीतिक और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। वह राष्ट्रीय एकता दल के अध्यक्ष हैं और राष्ट्रीय एकता अभियान नाम के नागरिक मंच के मुख्य संयोजक और नेता भी हैं।

राष्ट्रीय एकता दल और राष्ट्रीय एकता अभियान की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक, विनय लंबे समय से नेपाल की संप्रभुता, सीमा सुरक्षा, सनातन धर्म की रक्षा, नेपाल को फिर से हिंदू राष्ट्र घोषित करने और नागरिक अधिकारों जैसे मुद्दों को लेकर आंदोलन करते रहे हैं। उनका राजनीतिक और सामाजिक अभियान सड़कों से लेकर संसद तक अलग-अलग मुद्दों को उठाने पर केंद्रित रहा है।

उनके समर्थक उन्हें ऐसे नेता के तौर पर पेश करते हैं, जिन्होंने राष्ट्रीय हित और नागरिक अधिकारों से जुड़े कई आंदोलनों में सक्रिय भूमिका निभाई है।

पोखरा एयरपोर्ट में भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर आंदोलन

नेपाली मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, उनके प्रमुख आंदोलनों में पोखरा इंटरनेशनल एयरपोर्ट के निर्माण में भ्रष्टाचार को सामने लाने का प्रयास शामिल है। बताया जाता है कि इस मामले की निष्पक्ष जाँच कराने और इसमें शामिल लोगों के खिलाफ कार्रवाई की माँग को लेकर उन्होंने आंदोलन किया।

इसके अलावा पोखरा इंटरनेशनल एयरपोर्ट से अंतरराष्ट्रीय उड़ानें शुरू कराने के लिए भी उन्होंने लगातार दबाव बनाया। इसी तरह भैरहवा स्थित गौतम बुद्ध इंटरनेशनल एयरपोर्ट से नियमित अंतरराष्ट्रीय उड़ानें संचालित करने की माँग को लेकर भी वह सक्रिय रहे हैं।

देश में आर्थिक संकट का हवाला देते हुए विनय ने सांसदों को मिलने वाले संसदीय विकास कोष के वितरण को रोकने की माँग को लेकर भी आंदोलन किया। उनके मुताबिक, आर्थिक संकट के समय इस तरह के फंड के इस्तेमाल पर सवाल उठना जरूरी है।

चीन और सीमा विवाद पर भी मुखर रहे हैं विनय

नेपाल की उत्तरी सीमा पर चीन के अतिक्रमण का मुद्दा भी विनय के आंदोलनों में प्रमुख रहा है। खास तौर पर गोरखा जिले के चुमनुब्री में रुइला पास और हुमला जिले में नेपाली जमीन पर चीनी अतिक्रमण को लेकर उन्होंने आवाज उठाई थी।

फरवरी 2022 में राष्ट्रीय एकता अभियान के नेतृत्व में काठमांडू स्थित संयुक्त राष्ट्र कार्यालय तक प्रदर्शन किया गया था। वहाँ हुमला में चीन के कथित अतिक्रमण को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान खींचने के लिए ज्ञापन सौंपा गया। उनके समर्थकों का दावा है कि इस आंदोलन के बाद सरकार ने मामले की जाँच के लिए समिति बनाने की दिशा में कदम उठाया।

विनय ने भूमि प्रबंधन, सहकारी और गरीबी निवारण मंत्रालय पर भी कथित रूप से अतिक्रमित नेपाली जमीन वापस लेने और संयुक्त सीमा निरीक्षण कराने के लिए दबाव बनाया।

इसके अलावा उन्होंने चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव यानी BRI परियोजना को नेपाल के हितों के खिलाफ बताते हुए इसे रद्द करने की माँग को लेकर काठमांडू में बड़ा प्रदर्शन किया। चीन से अनावश्यक हथियार खरीदने की प्रक्रिया को रद्द करने की माँग को लेकर भी उन्होंने रक्षा मंत्रालय पर दबाव बनाया। बीरगंज में चीनी नागरिकों द्वारा कथित रूप से चलाए जा रहे अवैध व्यावसायिक गतिविधियों को बंद कराने के लिए भी उनके आंदोलन का दावा किया जाता है।

मुस्लिम आयोग और मुस्लिम आरक्षण के खिलाफ भी आंदोलन

विनय के राजनीतिक एजेंडे का एक महत्वपूर्ण हिस्सा नेपाल में धार्मिक और सामाजिक नीतियों से जुड़ा है। वह मुस्लिम आयोग को भंग करने और नेपाल को फिर से हिंदू राष्ट्र घोषित करने की माँग को लेकर लगातार आंदोलन करते रहे हैं। उनका आरोप है कि मुस्लिम आयोग एक खास विचारधारा को बढ़ावा देता है।

इसी तरह वह मुस्लिम आरक्षण खत्म करने की माँग भी उठा रहे हैं। मौजूदा आमरण अनशन में भी यह मुद्दा उनकी प्रमुख माँगों में शामिल है।

उनके समर्थकों के अनुसार, विनय सनातन धर्म और वैदिक परंपराओं की रक्षा के लिए भी लगातार अभियान चलाते रहे हैं। वह नेपाल को हिंदू राष्ट्र घोषित करने की माँग को लेकर नागरिक आंदोलनों में सक्रिय रहे हैं।

मदरसा विधेयक से लेकर ईसाई मिशनरी कार्यक्रम तक

विनय ने मधेश प्रदेश सरकार द्वारा लाए गए मदरसा विधेयक का भी विरोध किया था। उनके आंदोलन के कारण इस विधेयक को रोकने का दावा उनके समर्थकों की ओर से किया जाता है।

इसके अलावा एक टेलीविजन कार्यक्रम को बंद कराने के लिए भी उन्होंने अभियान चलाया था। उनके अनुसार, यह कार्यक्रम ईसाई मिशनरियों से जुड़ा हुआ था और इसमें चर्चित अभिनेता राजेश हमाल की जाति को लेकर सवाल उठाए गए थे। विनय ने इस कार्यक्रम का विरोध करते हुए इसे बंद कराने की माँग की थी।

मधेश प्रदेश के तत्कालीन भौतिक पूर्वाधार विकास मंत्री जितेंद्र सोनल पर भी विनय के समर्थकों ने आरोप लगाया था कि कमीशन के कारण उपभोक्ता समितियों का भुगतान रोका गया। विनय ने इन भुगतानों को जारी कराने के लिए आंदोलन किया था।

अब जिंदगी दाँव पर लगाकर न्याय की माँग

विनय यादव का मौजूदा आंदोलन उनके पुराने राजनीतिक और सामाजिक अभियानों से अलग है, क्योंकि इस बार उन्होंने अपनी जान तक दाँव पर लगा दी है। मैतीघर मंडला में आमरण अनशन के दसवें दिन उनकी सेहत लगातार चिंता का विषय बनी हुई है।

उनका कहना है कि देवानगंज की हिंसा में मारे गए लोगों और उनके परिवारों को न्याय मिलना चाहिए और सरकार के साथ हुए सात-सूत्रीय समझौते को लागू किया जाना चाहिए। विनय के समर्थकों का कहना है कि आमरण अनशन उन लोगों का शांतिपूर्ण हथियार है, जिनकी आवाज सत्ता तक नहीं पहुँचती। वहीं, सरकार के सामने अब सवाल यह है कि एक नागरिक की जिंदगी दाँव पर लगने के बाद भी क्या वह बातचीत का रास्ता खोलेगी?

मुस्लिम आरक्षण खत्म करने से हिंदुओं को न्याय तक… जानें- क्या हैं नेपाल में 9 दिन से आमरण अनशन पर बैठे विनय यादव की माँगें और उन्होंने ऑपइंडिया को क्या बताया?

नेपाल की राजधानी काठमांडू के मैतीघर मंडला में राष्ट्रीय एकता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष विनय यादव आमरण अनशन पर बैठे हैं। शुक्रवार (7 अगस्त 2026) को उनके अनशन का नौवाँ दिन है। सुनसरी के देवानगंज में ‘हिंदू नरसंहार’ के पीड़ितों को न्याय दिलाने और सरकार के साथ हुए समझौते को लागू कराने की माँग को लेकर उन्होंने अन्न का त्याग कर दिया है।

विनय यादव का संघर्ष केवल एक घटना तक सीमित नहीं है। वह नेपाल में मुस्लिम आरक्षण खत्म करने, मुस्लिम आयोग को भंग करने, अवैध घुसपैठ पर कार्रवाई करने और हिंदू समुदाय के खिलाफ हुई हिंसा के दोषियों पर सख्त कानूनी कार्रवाई की माँग भी उठा रहे हैं।

देवानगंज में 26 जुलाई 2026 की रात लाउडस्पीकर के इस्तेमाल, डीजे बजाने और कावड़ यात्रा को लेकर हिंदुओं और मुस्लिमों के बीच हिंसा भड़की थी। इस झड़प और भीड़ को नियंत्रित करने के लिए की गई पुलिस कार्रवाई में गोलीबारी भी हुआ और इस घटना में 4 लोगों की मौत हो गई।

इसके बाद सरकार ने पीड़ित परिवारों के साथ सात-सूत्रीय समझौता किया। मृतकों को शहीद का दर्जा, परिवारों को 10 लाख नेपाली रुपए की राहत, एक सदस्य को रोजगार, घायलों के मुफ्त इलाज और निष्पक्ष जाँच जैसे भरोसे दिए गए। विनय यादव का कहना है कि इन आश्वासनों को अब कागज से निकालकर जमीन पर उतारने का समय आ गया है।

उनका सवाल सीधा है कि अगर सरकार ने पीड़ित परिवारों से समझौता किया है, तो उसके हर बिंदु पर कार्रवाई कब होगी? अगर हिंसा हुई है, तो दोषियों को कानून के सामने कब लाया जाएगा? और अगर नेपाल में धार्मिक हिंसा रोकनी है, तो ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए स्थायी सुरक्षा व्यवस्था कब तैयार होगी?

आमरण अनशन पर बैठ विनय यादव

ऑपइंडिया से क्या बोले विनय यादव?

इस आंदोलन के केंद्र में सुनसरी की घटना है। राष्ट्रीय एकता दल का कहना है कि हिंसा में मारे गए लोगों के परिवारों को सिर्फ आश्वासन नहीं बल्कि न्याय चाहिए। संगठन ने सरकार से घटना की स्वतंत्र, निष्पक्ष और समयबद्ध जाँच कराने की मांग की है।

माँग है कि दोषियों पर बिना किसी राजनीतिक या सामाजिक दबाव के कानून के अनुसार कार्रवाई हो और जाँच रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए। संगठन का कहना है कि यदि जाँच ही पारदर्शी नहीं होगी तो पीड़ित परिवारों का सरकार और कानून-व्यवस्था पर भरोसा कैसे कायम होगा?

विनय यादव ने ऑपइंडिया से बातचीत में कहा है, “घटना के बाद हमने शांतिपूर्ण प्रदर्शन किया और सरकार को 24 घंटे का अल्टीमेटम दिया और विभिन्न माध्यमों से अपनी माँगें सरकार तक पहुँचाईं। लेकिन जब हमारी माँगों पर कोई ठोस पहल नहीं हुई, तब हमें मजबूर होकर आमरण अनशन शुरू करना पड़ा।”

उन्होंने आगे कहा, “हमारी मुख्य माँगों में सुनसरी घटना की निष्पक्ष जाँच, दोषियों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई, पीड़ित परिवारों को न्याय, मृतकों को शहीद घोषित करना, घायलों का पूर्ण उपचार, सीमावर्ती क्षेत्रों में अवैध गतिविधियों पर प्रभावी नियंत्रण तथा हमारे द्वारा उठाए गए अन्य नीतिगत विषयों पर सरकार द्वारा गंभीर पहल शामिल है।”

उनका कहना है कि जब तक सरकार माँगों पर सम्मानजनक, लिखित और कार्यान्वयन योग्य सहमति नहीं देती, तब तक यह आमरण अनशन जारी रहेगा।

सरकार के 7-सूत्रीय समझौते पर भी सवाल

देवानगंज हिंसा के बाद नेपाल सरकार ने पीड़ित परिवारों के साथ सात-सूत्रीय समझौता किया था। राष्ट्रीय एकता दल अब सरकार से इसी समझौते को पूरी तरह और तत्काल लागू करने की मांग कर रहा है।

इसमें मृतकों को शहीद का दर्जा देने की प्रक्रिया पूरी करना, प्रत्येक पीड़ित परिवार को 10 लाख नेपाली रुपए की राहत राशि देना, परिवार के एक योग्य सदस्य को रोजगार उपलब्ध कराना और घायलों का मुफ्त इलाज शामिल है।

राष्ट्रीय एकता दल का माँग पत्र

इसके अलावा घटना की स्मृति में मेमोरियल पार्क बनाने और समझौते में तय अन्य सुविधाओं को भी लागू करने की माँग की गई है। संगठन का कहना है कि राहत की घोषणा कर देना पर्याप्त नहीं है। पीड़ित परिवारों तक सहायता पहुँचे और समझौते के प्रत्येक बिंदु का प्रभाव जमीन पर दिखाई दे, तभी न्याय का भरोसा पैदा होगा।

मुस्लिम आरक्षण और मुस्लिम आयोग की समाप्ति की माँग

राष्ट्रीय एकता दल की सबसे स्पष्ट नीतिगत माँगों में नेपाल में मुस्लिम आरक्षण समाप्त करना और मुस्लिम आयोग को भंग करना शामिल है। विनय यादव ने ऑपइंडिया से कहा, “हमारा मुद्दा किसी धर्म विशेष के नेपाली नागरिकों से नहीं है। हमारी चिंता मुख्य रूप से सीमावर्ती क्षेत्रों से होने वाली अवैध घुसपैठ, अवैध बसावट, नागरिकता के दुरुपयोग तथा गैरकानूनी गतिविधियों को लेकर है।”

मुस्लिम आरक्षण समाप्त करने की माँग को लेकर विनय यादव ने कहा, “हमारा मानना है कि राज्य के सभी नागरिकों के साथ समान व्यवहार होना चाहिए। इसलिए आरक्षण और विशेष प्रावधानों जैसे विषयों की संविधान, समानता के सिद्धांत और राष्ट्रीय आवश्यकता के आधार पर समीक्षा होनी चाहिए। यह एक नीतिगत विषय है, जिस पर सरकार और संबंधित पक्षों के बीच गंभीर संवाद होना चाहिए।”

अवैध घुसपैठ पर भी सरकार को घेर रहा आंदोलन

राष्ट्रीय एकता दल ने रोहिंग्या और बांग्लादेशी नागरिकों को वापस भेजने की माँग भी उठाई है। आधिकारिक पत्र में संगठन ने अवैध आव्रजन और सीमा पार होने वाली अवैध गतिविधियों को राष्ट्रीय सुरक्षा के संदर्भ में गंभीर मुद्दा बताया है।

इसके साथ ही संगठन ने कथित ‘जिहादी’ गतिविधियों के मामलों में मृत्युदंड का प्रावधान करने वाले कानून की माँग की है। यह माँग भी सरकार के सामने औपचारिक बातचीत के जरिए रखने की बात कही गई है।

इन माँगों पर किसी भी निर्णय को नेपाल के संविधान और कानून की प्रक्रिया से गुजरना होगा लेकिन आंदोलन ने इन्हें अब राष्ट्रीय राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है।

नेपाल में मुस्लिम आरक्षण

नेपाल में मुस्लिम आरक्षण को लेकर इन दिनों बहस तेज है लेकिन इसका इतिहास समझने के लिए एक जरूरी तथ्य पहले जानना होगा नेपाल में मुस्लिमों के लिए शुरू से कोई अलग तय प्रतिशत वाला आरक्षण नहीं रहा है। सरकारी नौकरियों में समावेशी आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था की नींव 2007 में पड़ी, जब सिविल सर्विस में खुली प्रतियोगिता से भरी जाने वाली सीटों में से 45% को समावेशी श्रेणियों के लिए रखा गया। इसमें महिलाओं, आदिवासी-जनजाति, मधेसी, दलित, दिव्यांग और पिछड़े क्षेत्रों के लोगों को अलग-अलग हिस्से मिले लेकिन मुस्लिमों के लिए अलग श्रेणी नहीं थी।

बड़ा बदलाव 2015 के नेपाल संविधान से आया। संविधान के अनुच्छेद 42 में आर्थिक, सामाजिक या शैक्षिक रूप से पिछड़े मुस्लिमों को राज्य के निकायों में समानुपातिक समावेशी सिद्धांत के आधार पर भागीदारी का अधिकार दिया गया। यानी मुस्लिम समुदाय को संवैधानिक तौर पर समावेशी प्रतिनिधित्व या आरक्षण का अधिकार मिला।

नेपाल के संविधान (2015) के अनुच्छेद 264 के तहत ‘राष्ट्रीय मुस्लिम आयोग’ की स्थापना की गई। इसे कानूनी जामा पहनाने के लिए संसद ने ‘मुस्लिम आयोग अधिनियम, 2074 (2017)’ पारित किया। इस कानून की प्रस्तावना में लिखा है कि यह आयोग मुस्लिम समुदाय के इतिहास व संस्कृति की पहचान, उनके अधिकारों की रक्षा, और उनके आर्थिक-सामाजिक सशक्तीकरण के लिए सरकार को सुझाव देगा। आयोग के मुताबिक, 2011 की जनगणना में नेपाल की मुस्लिम आबादी करीब 4.4% थी। 2021 में यह बढ़कर 5.09% हो गई थी।

आरक्षण को लेकर बहस आज भी खत्म नहीं हुई है। मार्च 2025 में प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने संसद में कहा था कि थारू और मुस्लिम समुदाय से जुड़ी आरक्षण संबंधी मांगों को संघीय सिविल सेवा कानून के जरिए संबोधित किया जाएगा। यानी आज की असली बहस यह है कि मुस्लिमों के लिए मौजूदा समानुपातिक प्रतिनिधित्व की व्यवस्था पर्याप्त है या सरकारी नौकरियों में अलग और स्पष्ट मुस्लिम कोटा होना चाहिए। इसी व्यवस्था के विरोध में अब नेपाल में मुस्लिम आरक्षण और मुस्लिम आयोग खत्म करने की माँग भी उठ रही है।

सांसद ने सदन में उठाया अनशन का मुद्दा

अब यह आमरण अनशन का मुद्दा नेपाल की संसद तक भी पहुँच चुका है। राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी की सांसद खुशिबू ओली ने प्रतिनिधि सभा में इस मुद्दे को उठाते हुए सरकार से प्रदर्शनकारी पक्षों के साथ तत्काल बातचीत करने की अपील की।

इस बीच नेशनल मधेसी कमीशन के चेयरमैन विनय दत्ता भी मैतीघर मंडला पहुँचे। उन्होंने विनय यादव से मुलाकात की और सुनसरी घटना की निष्पक्ष जाँच तथा दोषियों पर कानूनी कार्रवाई की जरूरत बताई।

नेपाल सरकार की और से अब तक क्या हुआ?

मैतीघर मंडला में 9 दिन से जारी अनशन अब नेपाल सरकार के लिए सीधी चुनौती बन चुका है। एक तरफ देवानगंज हिंसा के पीड़ित परिवारों के लिए किए गए सात-सूत्रीय समझौते को लागू करने का सवाल है, दूसरी तरफ मुस्लिम आरक्षण, मुस्लिम आयोग, अवैध घुसपैठ और धार्मिक हिंसा जैसे मुद्दों पर आंदोलनकारी पक्षों से बातचीत की माँग है। राष्ट्रीय एकता दल ने साफ किया है कि वह केवल आश्वासन से पीछे हटने वाला नहीं है।

विनय यादव ने बताया है कि अब तक सरकार की ओर से कुछ स्तर पर संपर्क हुआ है। जिला प्रशासन के माध्यम से हमारा माँग-पत्र लिया गया है और संवाद की प्रारंभिक प्रक्रिया शुरू हुई है। उन्होंने कहा, “हमने सरकार से स्पष्ट कहा है कि केवल मौखिक आश्वासन पर्याप्त नहीं है।”

यादव का कहना है, “हम चाहते हैं कि सरकार आधिकारिक स्तर पर वार्ता करे, लिखित सहमति दे और उस सहमति को समयबद्ध तरीके से लागू करे। यदि सरकार सकारात्मक पहल करती है, तो हम भी लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण तरीके से समाधान निकालने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। हमारा आंदोलन पूरी तरह शांतिपूर्ण है और इसका उद्देश्य केवल न्याय, सुरक्षा तथा हमारी माँगों पर गंभीर सरकारी पहल सुनिश्चित करना है।”

जहाँ फाँसी पर चढ़े थे काकोरी कांड के सेनानी ठाकुर रोशन सिंह, वहाँ 60 साल से चल रहा ‘नेहरू’ अस्पताल: अब नाम बदलने के लिए अनिश्चितकालीन धरना शुरू

19 दिसंबर 1927 की वह सुबह इलाहाबाद (अब प्रयागराज) की साउथ मलाका जेल के लिए एक भारी सुबह थी। फाँसी घर में एक क्रांतिकारी को तख्ते की ओर ले जाया जा रहा था, नाम था ठाकुर रोशन सिंह।

उनका ‘जुर्म’ बस इतना था कि उन्होंने अंग्रेज हुकूमत के खजाने को लूटकर आज़ादी की लड़ाई के लिए हथियार और संसाधन जुटाने की हिम्मत दिखाई थी, यही था मशहूर काकोरी काण्ड। पंडित राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खाँ और शचीन्द्रनाथ बख्शी के साथ मिलकर अंग्रेजों की नींद उड़ा देने वाले रोशन सिंह को इसी जेल में फाँसी की सजा सुनाई गई थी और उसी जेल की चारदीवारी में उनकी जिंदगी का आखिरी अध्याय पूरा हुआ।

जब उनका पार्थिव शरीर बाहर लाया गया, तो जेल के फाटक पर हजारों लोग जुट आए थे। वह भीड़ उस दौर की जनभावना की एक जीती-जागती मिसाल थी। मगर आजाद भारत में इस जगह को याद रखना तो दूर, इसका इतिहास ही धीरे-धीरे गुमनामी में धकेल दिया गया।

ब्रिटिश काल के बाद साउथ मलाका जेल को नैनी में स्थापित कर दिया गया। वर्षों तक इस जगह को बिसारने के बाद जेल को अस्पताल में बदल दिया गया और नाम रखा गया- स्वरूप रानी नेहरू अस्पताल। इसके बाद तो जैसे लोगों को रोशन सिंह की सुध ही नहीं रही।

अब महुआ डाबर संग्रहालय परिवार के प्रमुख शाह आलम खान ने इस अस्पताल का नाम बदलकर ठाकुर रोशन सिंह के नाम पर करने की माँग उठाई है। इसे लेकर अनिश्चितकालीन धरना भी शुरू कर दिया गया है।

गांधी के असहयोग आंदोलन वापस लेने पर दुखी थे रोशन सिंह

रोशन सिंह का जन्म 22 जनवरी 1892 को शाहजहाँपुर जिले के नबादा गाँव में हुआ था। पिता का नाम था ठाकुर जंगी सिंह और माता थीं कौशल्या देवी। बचपन से ही उनका स्वभाव निडर और तेज-तर्रार रहा।

1922 में चौरी चौरा काण्ड के बाद जब महात्मा गाँधी ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया। इससे देशभर के अनगिनत युवाओं की तरह रोशन सिंह भी बहुत दुखी हुए और क्रांति की राह पकड़ ली।

बरेली गोलीकांड में जेल गए रोशन सिंह

असहयोग आंदोलन में उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर और बरेली जिले के ग्रामीण क्षेत्र में इनका अद्भुत योगदान रहा। बरेली में ठाकुर रोशन सिंह ने एक पुलिस वाले की रायफल छीनकर जबर्दस्त फायरिंग शुरू कर दी थी जिसके कारण हमलावर पुलिस को उल्टे पाँव भागना पड़ा। मुकदमा चला और ठाकुर को सेंट्रल जेल बरेली में दो साल की सजा़ काटनी पड़ी।

बरेली में हुए एक गोली-काण्ड में सजा काटने के बाद वे हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) से जुड़ गए। उनके रौबीले व्यक्तित्व और निशानेबाजी में महारत को देखते हुए राम प्रसाद बिस्मिल ने उन्हें संगठन के साथियों को हथियार चलाना सिखाने की जिम्मेदारी सौंपी।

काकोरी कांड नहीं था असल फाँसी की वजह

1922 में गया कॉन्ग्रेस अधिवेशन के दौरान कॉन्ग्रेस के भीतर विचारों का मतभेद सामने आया। इसके बाद मोतीलाल नेहरू और चितरंजन दास ने मिलकर स्वराज पार्टी बना ली।

उस समय कॉन्ग्रेस के इन नेताओं के पास आर्थिक संसाधनों की कमी नहीं थी, लेकिन दूसरी ओर क्रांतिकारी संगठन के पास मजबूत विचारधारा, संविधान और जोशीले युवाओं की बड़ी टोली तो थी, पर सबसे बड़ी कमी पैसों की थी।

इसी आर्थिक संकट से निपटने के लिए क्रांतिकारियों ने आयरलैंड के स्वतंत्रता सेनानियों की रणनीति अपनाई। उन्होंने धन जुटाने के लिए डकैती करने का फैसला किया, जिसे संगठन की भाषा में ‘एक्शन’ कहा जाता था।

इस योजना के तहत पहला एक्शन 25 दिसंबर 1924 को पीलीभीत जिले की बिसलपुर तहसील के बमरौली गाँव में किया गया। निशाना बने बलदेव प्रसाद, जो शक्कर कारोबारी और सूद पर पैसे उधार देने का काम करते थे।

इस डकैती में क्रांतिकारियों को करीब ₹4,000 और कुछ सोने-चाँदी के जेवर मिले। हालांकि, इस दौरान मोहनलाल पहलवान नाम के व्यक्ति ने उनका विरोध किया। जवाब में ठाकुर रोशन सिंह ने गोली चलाई, जिससे मोहनलाल की मौके पर ही मौत हो गई। बाद में यही घटना ठाकुर रोशन सिंह को फाँसी की सजा मिलने की सबसे बड़ी वजह बनी।

काकोरी काण्ड में रोशन सिंह खुद मौजूद नहीं थे, फिर भी अंग्रेज सरकार ने संगठन में उनकी भूमिका और प्रभाव को देखते हुए उन्हें बिस्मिल, अशफाक उल्ला खाँ और राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी के साथ फाँसी की सजा दी।

रोशन सिंह ने फाँसी से पहले लिखा भावुक पत्र

6 दिसंबर 1927 को इलाहाबाद की मलाका (नैनी) जेल की काल-कोठरी से ठाकुर रोशन सिंह ने अपने एक मित्र को पत्र लिखा। उन्होंने लिखा कि उन्हें उम्मीद है कि इसी सप्ताह फाँसी हो जाएगी और उनके लिए कोई दुःख न करे।

उनका मानना था कि जन्म लेने वाले हर व्यक्ति को एक दिन मरना ही है, इसलिए इंसान को ऐसा जीवन जीना चाहिए कि अंत समय में उसे कोई पछतावा न हो और भगवान का स्मरण बना रहे।

उन्होंने यह भी लिखा कि पिछले दो वर्षों से परिवार से दूर रहने के दौरान उन्हें ईश्वर की भक्ति करने का भरपूर अवसर मिला। उन्होंने अपने पत्र में धर्म के लिए प्राण देने वालों की तुलना तपस्या करने वाले ऋषि-मुनियों से करते हुए लिखा कि शास्त्रों में ऐसे बलिदान को सर्वोच्च माना गया है। पत्र के अंत में उन्होंने अपना प्रसिद्ध शेर लिखा:

‘ज़िंदगी ज़िंदा-दिली को जान ऐ रोशन!

वरना कितने ही यहां रोज़ फ़ना होते हैं।‘

जब क्रांतिकारियों की चीखों से गूँजती थी जेल

साउथ मलाका जेल कोई साधारण जेल नहीं थी। काकोरी काण्ड से जुड़े कई क्रांतिकारियों को यहीं रखा गया था, यहीं पूछताछ के नाम पर उनका उत्पीड़न किया जाता था। अंग्रेज हुकूमत के लिए यह जेल क्रांतिकारियों को ‘सबक सिखाने’ का एक हथियार भर थी।

आजादी के बाद जैसे-जैसे प्रशासनिक जरूरतें बदलती गईं, इस जेल को नैनी शिफ्ट कर दिया गया। इसके बाद साउथ मलाका जेल की जगह बरसों तक वीरान पड़ी रही। वह जमीन, जिसने एक क्रांतिकारी की आखिरी साँसें देखी थीं, धीरे-धीरे इतिहास के पन्नों से मिटती चली गई।

कॉन्ग्रेस सरकार ने बनाया अस्पताल, नाम रखा गया नेहरू की माँ के नाम पर

आज़ादी के बाद, प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के और कॉन्ग्रेस सरकार के दौर में, 1961 में इसी साउथ मलाका जेल परिसर की जमीन पर मोतीलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज खड़ा किया गया। इसका उद्घाटन तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के हाथों हुआ।

सवाल यह उठता है कि जिस ज़मीन पर एक क्रांतिकारी को फाँसी दी गई हो, उसका नाम आखिर किसके नाम पर रखा जाए? जवाब मिला नेहरू परिवार से जुड़े नाम में।

1963 में जब मेडिकल कॉलेज पूर्व गवर्नर हाउस की इमारत में शिफ्ट हुआ, तो यही जेल परिसर पूरी तरह अस्पताल में बदल दिया गया और इसका नाम रखा गया ‘स्वरूप रानी नेहरू चिकित्सालय’।

नाम सोचते वक्त रोशन सिंह और उनकी शहादत का जिक्र तक नहीं हुआ, जिस मिट्टी पर उनका खून बहा था, वहाँ उनका नाम दर्ज करने की जरूरत तक महसूस नहीं की गई। इसके बाद पूरे छह दशक तक हालात वैसे ही बने रहे- न कोई स्मारक, न कोई पहचान, बस एक ‘नेहरू’ नाम जो पूरे किस्से पर भारी पड़ता रहा। 2024 में योगी सरकार ने आकर तस्वीर बदली।

योगी सरकार में मिली पहली पहचान

2024 में योगी आदित्यनाथ सरकार ने उसी अस्पताल परिसर के मुख्य द्वार के पास जहाँ रोशन सिंह को फाँसी दी गई थी, उनकी प्रतिमा स्थापित करवाई। यह फैसला ऐसे समय आया जब देश ‘आज़ादी का अमृत महोत्सव’ मना रहा था और सरकार गुमनाम और उपेक्षित स्वतंत्रता सेनानियों को सामने लाने की मुहिम चला रही थी।

2026 में काकोरी ट्रेन एक्शन (9 अगस्त 1925) की शताब्दी वर्षगाँठ भी है, जिसे देखते हुए काकोरी से जुड़े शहीदों को सम्मान देने पर जोर बढ़ गया था। दशकों बाद पहली बार सरकारी स्तर पर उस बलिदान को औपचारिक पहचान मिली, जिसे कॉन्ग्रेस के शासनकाल में जानबूझकर भुला दिया गया था।

अब उठी अस्पताल का नाम बदलने की माँग, आखिर क्यों?

स्मारक बनने के बाद अब यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि जब पूरा परिसर ही रोशन सिंह की शहादत की धरती है, तो अस्पताल का नाम आज भी नेहरू परिवार के नाम पर क्यों टिका हुआ है?

इस माँग को उठाने वालों में सबसे मुखर आवाज़ हैं बस्ती के महुआ डाबर क्षेत्र के शाह आलम खान, जो 1857 की क्रांति के उस दौर से जुड़े परिवार से आते हैं, जब 10 जून 1857 को मनोरमा नदी पार कर रहे अंग्रेज अफसरों पर महुआ डाबर, अमिलहा, मुहम्मदपुर और नकहा गाँवों के वीरों ने धावा बोल दिया था।

इस हमले के प्रमुख नायकों में क्रांतिवीर पिरई खान भी शामिल थे, जिन्होंने अपने साथियों गुलाब खाँ, अमीर खाँ, वज़ीर खाँ, जफर अली के साथ मिलकर अंग्रेज अफसरों को घेरकर मार गिराया था।

इस हमले से बौखलाई अंग्रेज हुकूमत ने बदला लेने में कोई कसर नहीं छोड़ी और 20 जून 1857 को बस्ती में मार्शल लॉ लगा दिया गया। 3 जुलाई को महुआ डाबर गाँव को चारों ओर से घेरकर जला दिया गया, गाँव को ‘गैरचिरागी’ घोषित कर संपत्ति जब्त कर ली गई।

कई लोगों के सिर कलम किए गए और 18 फरवरी 1858 को गाँव के कई क्रांतिकारियों को सरेआम फाँसी पर लटका दिया गया। शाह आलम खान उसी बलिदानी विरासत के वशंज है। पिछले करीब ढाई दशकों से वे 1857 और काकोरी जैसे आंदोलनों से जुड़े गुमनाम क्रांतिकारियों का इतिहास खोजने, दस्तावेज़ जुटाने और नई पीढ़ी तक पहुँचाने के काम में लगे हैं।

इसी मकसद से उन्होंने महुआ डाबर संग्रहालय की स्थापना की, जहाँ स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े दुर्लभ दस्तावेज़ों और तस्वीरों को सहेजा गया है। वे समय-समय पर चौरी चौरा विद्रोह और काकोरी ट्रेन एक्शन जैसी ऐतिहासिक घटनाओं पर प्रदर्शनियाँ भी आयोजित करते रहे हैं, और लगातार यह माँग उठाते रहे हैं कि क्रांतिकारियों के परिवारों को उनका हक और सम्मान मिले।

अब उन्हीं की अगुवाई में महुआ डाबर संग्रहालय परिवार के बैनर तले एसआरएन अस्पताल परिसर में अनिश्चितकालीन धरना शुरू किया गया है, जिसकी माँग है कि अस्पताल का नाम बदलकर ‘अमर शहीद ठाकुर रोशन सिंह चिकित्सालय’ रखा जाए। उनका तर्क सीधा-सा है- जिस ज़मीन ने एक क्रांतिकारी की शहादत देखी, उस ज़मीन पर आज भी उसका नाम गायब है, जबकि एक राजनीतिक परिवार का नाम पीढ़ियों से चस्पा है।

पुरानी सरकारों की चुप्पी पर सवाल

यहाँ सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि जब यह तथ्य किसी से छिपा नहीं था कि यह जगह काकोरी के शहीद की फाँसी-स्थली है, तो दशकों तक सत्ता में रही कॉन्ग्रेस समेत बाद की सरकारों ने कभी इस दिशा में कदम क्यों नहीं उठाया?

क्या यह महज संयोग था, या फिर एक सोची-समझी कोशिश कि क्रांतिकारियों के बलिदान की जगह हर बार एक ही परिवार की विरासत को आगे बढ़ाया जाए? अब जब योगी सरकार ने स्मारक बनवाकर पहला कदम उठा दिया है, स्थानीय स्तर पर यह माँग जोर पकड़ रही है कि सम्मान अधूरा न रह जाए और अस्पताल का नाम भी बदला जाए।

एक पर हमला तो तीनों देंगे जवाब, पाकिस्तान-सऊदी और तुर्किये का नया रक्षा गठबंधन: जानिए ‘मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट’ के बारे में सब कुछ

मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध और बढ़ते सुरक्षा संकट के बीच पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये ने एक महत्वपूर्ण रक्षा समझौते ‘मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट’ पर हस्ताक्षर किए हैं। इस समझौते के तहत यदि तीनों देशों में से किसी एक पर हमला होता है, तो उसे तीनों देशों पर हमला माना जाएगा।

इसका उद्देश्य सामूहिक सुरक्षा को मजबूत करना, रक्षा सहयोग बढ़ाना और क्षेत्रीय स्थिरता को बढ़ावा देना है। यह समझौता ऐसे समय हुआ है जब पश्चिम एशिया लगातार संघर्षों, मिसाइल हमलों और जियोपॉलिटिकल तनावों का सामना कर रहा है।

मक्का में हुई तीन देशों की अहम बैठक

यह समझौता सऊदी अरब के शहर मक्का में आयोजित बैठक के दौरान हुआ। बैठक में सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस और प्रधानमंत्री मोहम्मद बिन सलमान, तुर्किये के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोआन और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ शामिल हुए।

शहबाज शरीफ अपने तीन दिवसीय दौरे पर एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल के साथ सऊदी अरब पहुँचे थे, जिसमें पाकिस्तान के फौज प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर भी शामिल थे।

तीनों नेताओं ने क्षेत्रीय सुरक्षा, रक्षा सहयोग, आर्थिक संबंधों और भविष्य की रणनीतिक साझेदारी पर विस्तृत चर्चा की। इस दौरान मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर किए गए, जिसे तीनों देशों की सामूहिक सुरक्षा के लिए एक बड़ा कदम माना जा रहा है।

समझौते में क्या-क्या प्रावधान हैं?

पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के अनुसार, इस समझौते का मुख्य उद्देश्य किसी भी प्रकार की आक्रामक कार्रवाई के खिलाफ सामूहिक प्रतिरोध क्षमता को मजबूत करना है। सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान यह है कि यदि तीनों देशों में से किसी एक पर हमला होता है, तो उसे तीनों देशों पर हमला माना जाएगा।

समझौते में रक्षा सहयोग के सभी क्षेत्रों को मजबूत करने की बात कही गई है। इनमें संभावित रूप से संयुक्त सैन्य अभ्यास, सैनिकों का प्रशिक्षण, रक्षा तकनीक का आदान-प्रदान और खुफिया जानकारी साझा करना शामिल हो सकता है। हालाँकि इन सभी व्यवस्थाओं का विस्तृत खाका अभी सार्वजनिक नहीं किया गया है।

आधिकारिक बयान के अनुसार, इस समझौते का उद्देश्य क्षेत्र में शांति, सुरक्षा और स्थिरता को बढ़ावा देना है और इसे किसी विशेष देश के खिलाफ गठबंधन के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया है।

यह समझौता अभी क्यों महत्वपूर्ण माना जा रहा है?

पिछले कुछ सालों में मिडिल ईस्ट लगातार संघर्षों से जूझ रहा है। ईरान, इजरायल, गाजा, लेबनान और यमन से जुड़े घटनाक्रमों ने पूरे क्षेत्र की सुरक्षा व्यवस्था को प्रभावित किया है।

सऊदी अरब के तेल प्रतिष्ठानों और महत्वपूर्ण बुनियादी ढाँचे पर ड्रोन तथा मिसाइल हमलों की घटनाएँ भी सामने आती रही हैं। ऐसे माहौल में रियाद अपनी सुरक्षा साझेदारियों को केवल पारंपरिक सहयोगियों तक सीमित नहीं रखना चाहता और नए रक्षा सहयोग विकसित कर रहा है।

क्षेत्रीय संघर्षों के कारण होर्मुज और समुद्री व्यापार भी प्रभावित हुआ है, जिससे ऊर्जा आपूर्ति और वैश्विक बाजारों पर असर पड़ा है। ऐसे समय में तीनों देशों का यह रक्षा समझौता क्षेत्रीय सुरक्षा ढाँचे में एक महत्वपूर्ण बदलाव के रूप में देखा जा रहा है।

तीनों देशों की ताकत क्या है?

इस नए रक्षा सहयोग की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें शामिल तीनों देशों की अपनी अलग-अलग रणनीतिक क्षमता है। सऊदी अरब दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादक देशों में शामिल है और आर्थिक रूप से बेहद मजबूत माना जाता है। साथ ही इस्लाम के दो सबसे पवित्र स्थलों की मौजूदगी के कारण उसका मजहबी और क्षेत्रीय प्रभाव भी काफी व्यापक है।

तुर्किये नाटो का सदस्य है और उसके पास नाटो की दूसरी सबसे बड़ी सेना है। हाल के वर्षों में उसने रक्षा उत्पादन, ड्रोन तकनीक और सैन्य उद्योग के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है।

वहीं पाकिस्तान दुनिया का एकमात्र परमाणु हथियार संपन्न मुस्लिम देश है और लंबे समय से सैन्य दृष्टि से महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है। हालाँकि विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान की परमाणु क्षमता इस समझौते का औपचारिक हिस्सा नहीं है और उसका परमाणु प्रतिरोध मुख्य रूप से भारत-केंद्रित बना रहेगा।

पुराने रक्षा सहयोग का विस्तार

यह समझौता पूरी तरह नया नहीं है, बल्कि पिछले वर्ष पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच हुए द्विपक्षीय रक्षा समझौते का विस्तार माना जा रहा है। उस समझौते में भी दोनों देशों ने कहा था कि किसी एक पर हमला दोनों पर हमला माना जाएगा। अब तुर्किये को इसमें शामिल कर त्रिपक्षीय सुरक्षा व्यवस्था बनाई गई है।

तीनों देशों के बीच पहले से भी सैन्य सहयोग मौजूद रहा है। पाकिस्तान दशकों से सऊदी सेना को प्रशिक्षण और तकनीकी सहायता देता रहा है। वहीं तुर्किये और पाकिस्तान रक्षा उपकरणों, युद्धपोतों और प्रशिक्षण विमानों के क्षेत्र में सहयोग करते रहे हैं। 2023 में सऊदी अरब ने तुर्किये से बड़े पैमाने पर ड्रोन खरीदने का समझौता भी किया था।

भारत समेत दुनिया की नजर

इस समझौते पर भारत भी करीबी नजर बनाए हुए है। भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि भारत इस घटनाक्रम पर नजर रख रहा है और आगे की जानकारी साझा की जाएगी।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह त्रिपक्षीय सहयोग आगे संस्थागत रूप लेता है और संयुक्त सैन्य गतिविधियाँ बढ़ती हैं, तो यह पश्चिम एशिया और दक्षिण एशिया की सुरक्षा राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

फिलहाल यह समझौता सामूहिक सुरक्षा और रक्षा सहयोग तक सीमित बताया गया है तथा इसे किसी विशेष देश के खिलाफ सैन्य गठबंधन के रूप में घोषित नहीं किया गया है।

कॉकरोच जनता पार्टी की नई राष्ट्रीय कार्यकारिणी में AAP के पुराने चेहरों को मिली जगह: जानिए CJP की टीम में कौन-कौन नेता हैं शामिल

‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) ने अपनी राष्ट्रीय कार्यकारिणी का ऐलान कर दिया है। महाराष्ट्र में संस्थापक अभिजीत दीपके के घर पर हुई बैठक के बाद 6 अगस्त 2026 को इसकी घोषणा हुई। पार्टी अब देश भर में अपने संगठन का विस्तार करेगी। इसके लिए ‘क्या बोलती पब्लिक‘ नाम से एक नया अभियान भी शुरू किया जाएगा।

यह पार्टी युवाओं की एक ऐसी आवाज बनने का दावा कर रही है जो सरकार पर दबाव बनाएगी। लेकिन हैरानी की बात यह है कि इसे आगे बढ़ाने वाले ज्यादातर लोग आम आदमी पार्टी (AAP) के पुराने नेता ही हैं।

इस पार्टी की शुरुआत सोशल मीडिया पर एक तंज के रूप में हुई थी। मई 2026 के बीच में देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने कोर्ट में एक टिप्पणी की थी। उन्होंने कहा था कि जिन युवाओं को नौकरी नहीं मिलती, वे ‘कॉकरोच‘ की तरह आरटीआई, सोशल मीडिया और पत्रकारिता में आ जाते हैं और समाज के ‘परजीवी’ बन जाते हैं।

इसी बयान के विरोध में दिल्ली के जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी नाम से एक बड़ा प्रदर्शन हुआ, जिससे यह संगठन चर्चा में आ गया। इसके बाद पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने भी नीट पेपर लीक और शिक्षा सुधारों की मांग को लेकर 26 दिन की भूख हड़ताल शुरू कर दी, जिससे यह आंदोलन और बड़ा हो गया।

ऑपइंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, इस पार्टी ने छात्रों के असली मुद्दों का सहारा जरूर लिया। लेकिन इसका असली मकसद ‘लॉटिविज्म’ यानी हँसी-मजाक के जरिए सिर्फ बीजेपी और मोदी सरकार के खिलाफ राजनीतिक विरोध तैयार करना है।

CJP का कहना है कि आने वाले छह महीनों में वह राज्यों और शहरों में अपनी कमेटियाँ बनाएगी। लेकिन जिस तरह से यह प्रेशर ग्रुप आगे बढ़ रहा है, उससे साफ पता चलता है कि यह भविष्य में एक नई राजनीतिक पार्टी बनने की तैयारी कर रहा है, जिसका एकमात्र एजेंडा बीजेपी का विरोध करना है।

कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) अब पूरी तरह से बीजेपी के विरोध की राजनीति पर उतर आई है। इस बात को विस्तार से समझने से पहले यह जानना जरूरी है कि इस पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी (NWC) में कौन-कौन लोग शामिल हैं।

पार्टी की नई टीम में कई अहम नाम सामने आए हैं। संस्थापक अभिजीत दीपके (30 वर्ष) को पार्टी का राष्ट्रीय संयोजक बनाया गया है। आशुतोष रांका (30 वर्ष) और सौरव दास (27 वर्ष) को सह-संयोजक की जिम्मेदारी दी गई है।

संगठन को संभालने के लिए भी कई लोगों को पद दिए गए हैं। अजिंक्य शिंडे (35 वर्ष) राष्ट्रीय संगठन प्रभारी बनाए गए हैं, जबकि दीपक बालियान (26 वर्ष) संगठन सह-प्रभारी हैं। आफ़रीन नवाज (34 वर्ष) राष्ट्रीय सचिव, विजय रेड्डी मल्लंगी (30 वर्ष) मीडिया प्रमुख और रत्ना सिंह (31 वर्ष) कानूनी मामलों की जिम्मेदारी संभालेंगी। इसके अलावा शोध और नीति का काम वैष्णवी गौर (29 वर्ष) देखेंगी। रोहन देशपांडे (31 वर्ष) टेक्नोलॉजी और योगेश इंगले (33 वर्ष) वित्त विभाग संभालेंगे।

पार्टी ने देश के अलग-अलग हिस्सों के लिए जोनल प्रमुख भी नियुक्त किए हैं। इनमें उत्तर भारत के लिए दीपक बालियान, दक्षिण के लिए विजय रेड्डी मल्लंगी, पूर्व और पूर्वोत्तर के लिए अंकित भारद्वाज तथा पश्चिम भारत के लिए योगेश इंगले को जिम्मेदारी सौंपी गई है।

CJP यानी ‘AAP’ की नई टीम: कैसे आम आदमी पार्टी का चेहरा बन गई है कॉकरोच जनता पार्टी

जब से ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ यानी CJP बनी है, तब से यह बात सामने आ रही है कि यह आम आदमी पार्टी (AAP) का ही नया रूप है। CJP के राष्ट्रीय संयोजक और संस्थापक अभिजीत दीपके साल 2020 से 2023 के बीच ‘आप’ के सोशल मीडिया कोऑर्डिनेटर रह चुके हैं। इसके बाद साल 2023 में वे अमेरिका चले गए थे और बोस्टन यूनिवर्सिटी से पब्लिक रिलेशंस में एमएस की डिग्री ली थी।

दिल्ली विधानसभा चुनाव 2020 के दौरान कई रिपोर्ट्स में उन्हें ‘आप’ की सोशल मीडिया और डिजिटल प्रचार टीम का हिस्सा बताया गया था। रिपोर्ट्स के मुताबिक, वे मीम्स, छोटे वीडियो और डिजिटल कंटेंट बनाने वाले मुख्य लोगों में शामिल थे। उनका काम अरविंद केजरीवाल का प्रचार करना और राजनीतिक विरोधियों को जवाब देना था।

अभिजीत दीपके ‘आप’ के चुनाव वॉर-रूम और सोशल मीडिया अभियानों का भी हिस्सा रहे हैं। मीडिया इंटरव्यू में वे युवाओं और पहली बार वोट देने वालों के लिए बनाई जाने वाली चुनावी रणनीतियों पर चर्चा करते नजर आए थे। उन्होंने चुनाव प्रचार के दौरान ‘आप’ की आईटी और मीडिया टीमों के साथ मिलकर काम किया था।

अभिजीत दीपके को ‘आप’ नेता और दिल्ली के पूर्व डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया का करीबी भी माना जाता है। दीपके ‘आप’ के वॉर-रूम का हिस्सा रहे हैं और उनका रुख हमेशा से बीजेपी के खिलाफ रहा है। हमने देखा है कि कैसे आम आदमी पार्टी ने CJP के प्रदर्शनों का खुलकर समर्थन किया था। खुद ‘आप’ प्रमुख अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया जंतर-मंतर पहुँचे थे और इन ‘कॉकरोच’ प्रदर्शनकारियों के साथ एकजुटता दिखाई थी।

दूसरी ओर, CJP के सह-संयोजक आशुतोष रांका ने आईआईटी कानपुर और लंदन स्कूल ऑफ इकॉनॉमिक्स से पढ़ाई की है। वे लंदन में मैकिन्से कंपनी में मैनेजमेंट कंसलटेंट के रूप में भी काम कर चुके हैं। पिछले साल भारत लौटने के बाद वे जयपुर में पर्यावरण, शिक्षा सुधार और युवाओं के मुद्दों से जुड़े अभियानों में सक्रिय रहे हैं। नीट विवाद के दौरान CJP से जुड़ने के बाद आशुतोष रांका को काफी प्रसिद्धि मिली थी।

आशुतोष रांका राजनीति के लिए कोई नया नाम नहीं हैं। उनका सबसे बड़ा राजनीतिक परिचय यह है कि वे पहले आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता रह चुके हैं। इस दौरान उन्होंने शराब नीति घोटाले के आरोपों पर अरविंद केजरीवाल और पार्टी का कड़ाई से बचाव किया था और इन आरोपों को राजनीति से प्रेरित बताया था। रांका साल 2025 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में भी ‘आप’ के साथ सक्रिय रूप से जुड़े हुए थे।

आशुतोष रांका इससे पहले ‘दप्रिंट’ और ‘न्यूजलॉन्ड्री’ जैसे मीडिया पोर्टल्स के लिए लेख भी लिख चुके हैं।

CJP द्वारा राष्ट्रीय संगठन प्रभारी बनाए गए अजिंक्य शिंडे भी ‘आप’ के ही एक पदाधिकारी हैं। उन्होंने पूर्णकालिक ‘आप’ सदस्य बनने के लिए अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दिया था। शिंडे ‘आप’ की महाराष्ट्र युवा विंग के प्रदेश अध्यक्ष और राज्य समिति के सदस्य रह चुके हैं।

मई 2025 के आसपास यह जानकारी सामने आई थी कि अजिंक्य शिंडे ने CJP में संगठन की जिम्मेदारी संभालने से पहले ‘आप’ के गोवा सह-प्रभारी के रूप में भी काम किया था। हकीकत तो यह है कि कई रिपोर्ट्स यह इशारा करती हैं कि शिंडे अभी भी ‘आप’ की महाराष्ट्र युवा विंग के संयोजक के रूप में अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं।

CJP ने मीडिया प्रमुख और दक्षिण क्षेत्र की जिम्मेदारी विजय रेड्डी मल्लंगी को सौंपी है। इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है कि वे तेलंगाना में आम आदमी पार्टी के एक सक्रिय सदस्य हैं।

सोशल मीडिया पर उनके कई ऐसे वीडियो और फोटो मौजूद हैं, जो यह दिखाते हैं कि उन्होंने पिछले साल ‘आप’ के लिए चंदा जुटाने, नेताओं का समर्थन करने और चुनावी अभियानों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था।

CJP के वित्त प्रमुख योगेश इंगले भी महाराष्ट्र के पुणे में आम आदमी पार्टी के एक पदाधिकारी बताए जाते हैं।

इसके अलावा, CJP के पूर्व और उत्तर क्षेत्र के प्रभारी अंकित भारद्वाज भी पहले आम आदमी पार्टी के लिए एक स्वयंसेवक (वॉलंटियर) के रूप में काम कर चुके हैं।

इन सारी बातों से यह बिल्कुल साफ हो जाता है कि CJP ने अपनी राष्ट्रीय कार्यकारिणी में ज्यादातर मौजूदा या पुराने ‘आप’ नेताओं को ही जगह दी है। इस तरह से इस पार्टी ने अप्रत्यक्ष रूप से खुद को आम आदमी पार्टी की ‘युवा विंग’ के रूप में ही स्थापित कर लिया है।

‘कॉकरोच जनता पार्टी’ की हकीकत: युवाओं की आड़ में आम आदमी पार्टी का नया राजनीतिक चेहरा

भले ही CJP यह दावा करती रही है कि उसके सदस्यों का पुराना राजनीतिक इतिहास कोई मायने नहीं रखता और उनका संगठन पूरी तरह से ‘स्वतंत्र’ है। लेकिन सच्चाई यह है कि जिन लोगों को संगठन में पद दिए गए हैं, उनका पुराना नाता किसी खास पार्टी और उसकी विचारधारा से रहा है। इससे साफ पता चलता है कि CJP कोई नया संगठन नहीं है, बल्कि यह आम आदमी पार्टी का ही एक बढ़ा हुआ रूप है।

ऑपइंडिया ने पहले भी यह विश्लेषण किया था कि CJP हँसी-मज़ाक और कॉमेडी के परदे के पीछे किस तरह से सोची-समझी रणनीति के तहत विपक्ष के एजेंडे को आगे बढ़ाती है। यह संगठन न्यायपालिका, चुनाव आयोग, बड़े उद्योगपतियों, मीडिया और पार्टी बदलने वाले नेताओं को निशाना बनाता है। यह संगठन व्यंग्य और कॉमेडी की आड़ में राजनीतिक संदेश देने का काम करता है। यह बात बिल्कुल साफ हो चुकी है कि CJP आधुनिक और ‘कूल’ दिखने वाला सिर्फ एक ऐसा प्रयोग है जिसका एकमात्र मकसद बीजेपी का विरोध करना है।

इन ‘कॉकरोच’ कहे जाने वाले लोगों ने मई महीने में ही अपनी राजनीतिक सोच और मोदी विरोध को पूरी तरह साफ कर दिया था। जब उन्होंने इंस्टाग्राम पर बीजेपी के साथ खुद की फॉलोअर्स बढ़ाने की होड़ शुरू की थी, तभी उनकी मंशा समझ आ गई थी। जब जंतर-मंतर पर प्रदर्शन हुआ, तो CJP ने हर उस शख्स का स्वागत किया जो बीजेपी का विरोधी है। इनमें महुआ मोइत्रा, चंद्रशेखर आजाद, कीर्ति आजाद जैसे नेता शामिल थे। इसके अलावा योगेंद्र यादव जैसे इस्लामो-वामपंथी भी इसमें शामिल हुए, जिन्होंने जंतर-मंतर और संसद की तरफ जाने वाले रास्तों पर CJP के कब्जा करने पर अपनी खुशी जाहिर की थी।

इसी मंच से कुणाल कामरा ने माँ सीता पर अपमानजनक टिप्पणियाँ की थीं। दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रोफेसर नंदिता नारायण ने ‘बस नाम रहेगा अल्लाह का’ गाना गाया और पाकिस्तानी शायर फैज अहमद फैज की इस्लामी वर्चस्ववादी कविता ‘हम देखेंगे’ का गुणगान किया। इसके अलावा AISA, SFI और अन्य वामपंथी छात्र संगठनों ने ‘आजादी-आजादी’ और ‘ब्राह्मणवाद से आजादी’ जैसे देशविरोधी नारे भी लगाए।

CJP को प्रकाश राज, स्वरा भास्कर, शबाना आजमी, अरुंधति रॉय और निवेदिता मेनन जैसे जाने-माने हिंदू विरोधी और बीजेपी विरोधी ‘एक्टिविस्टों’ का भी पूरा समर्थन मिला।

असल बात तो यह है कि 20 जुलाई को हुए हिंसक CJP प्रदर्शन के दौरान समाजवादी पार्टी, आजाद समाज पार्टी और दूसरे बीजेपी विरोधी दलों के कार्यकर्ता भी इस तथाकथित ‘छात्र आंदोलन’ में खुलकर शामिल हुए थे। इस प्रदर्शन में MACOCA के आरोपित और ‘आप’ से जुड़े गैंगस्टर हाजी अफजल ने भी हिस्सा लिया था।

CJP के बड़े नेता यह दावा करते रहे हैं कि जुलाई के प्रदर्शन के दौरान हर राजनीतिक विचारधारा के लोगों ने उनका समर्थन किया था। लेकिन इन सब बातों के बाद, जब CJP ने अपने सबसे बड़े पदों पर आम आदमी पार्टी के पुराने पदाधिकारियों को ही बिठा दिया है, तो इस बात पर पक्की मुहर लग जाती है कि जिसकी आशंका पहले से जताई जा रही थी, वही सच है। यानी CJP और कुछ नहीं, बल्कि आम आदमी पार्टी की ही ‘बी-टीम’ है।