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फादर्स डे पर ‘ट्रांस डैड’ की कहानी छापने वाले न्यूयॉर्क टाइम्स पर भड़के लोग: समझें- मुख्यधारा की संस्कृति में ट्रांसजेंडर एक्टिविज्म को कैसे बढ़ावा दे रहा वेस्टर्न मीडिया

न्यूयॉर्क टाइम्स (NYT) ने पूरी तरह से एक्टिविज्मको पत्रकारिता का रूप दे दिया है। न्यूयॉर्क टाइम्स का एक्टिविज्म इतना अलग-अलग तरह का है कि एक दिन यह अखबार कट्टरपंथियों का मानवीय चेहरा दिखाता है, तो दूसरे दिन खास जेंडर रोल (लिंग भूमिकाओं) वाले त्योहारों में ‘वोक एजेंडा’ घुसा देता है। इस साल फादर्स डे के मौके पर न्यूयॉर्क टाइम्स ने एक गेस्ट एस्से (अतिथि निबंध) प्रकाशित किया, जिसमें ‘ट्रांस डैड’ को एक सामान्य बात के रूप में दिखाया गया। हालाँकि फादर्स डे पर न्यूयॉर्क टाइम्स के इस ट्रांस एक्टिविज्म पर लोग भड़क गए और उसे जमकर खरी-खोटी सुनाने लगे।

यह लेख ज़ैक एलाम्स द्वारा लिखा गया है, जो जन्म से एक महिला हैं लेकिन खुद को ‘ट्रांस’ पुरुष मानती हैं। यह लेख हन्ना जैकब्स के चित्रों के साथ एक कॉमिक-स्ट्रिप (चित्रकथा) के रूप में सामने आया है।

‘टू माई डॉटर, माई जेंडर वॉज नेवर कॉम्प्लिकेटेड’ (मेरी बेटी के लिए, मेरा जेंडर कभी उलझा हुआ नहीं था) शीर्षक वाले इस लेख के लेखक ज़ैक एलाम्स को लंदन के एक एडिटर और मोशन डिजाइनर के रूप में बताया गया है। एलाम्स 18 साल की उम्र से एक ट्रांस पुरुष के रूप में रह रहे हैं। न्यूयॉर्क टाइम्स के इस लेख में एलाम्स ने अपनी ‘पत्नी’ के साथ इलियट नाम की बेटी की परवरिश के अनुभवों को याद किया।

न्यूयॉर्क टाइम्स में 21 जून 2026 को प्रकाशित इस लेख ने न केवल जन्मजात महिलाओं को पुरुष मानकर पिता के रूप में बच्चों की परवरिश करने को सामान्य बताया, बल्कि पीड़ित होने की कहानी (विक्टिमहुड नैरेटिव) को भी आगे बढ़ाया। लेख में ‘पिता बनने’ को इस रूप में पेश किया गया है कि इसने ज़ैक एलाम्स को एक जैविक महिला से ट्रांस पुरुष में बदलने (ट्रांसिशनिंग) के लिए जेंडर-चेंज प्रोसीजर (लिंग परिवर्तन प्रक्रिया) से गुजरने और अपनी खुद की बनाई पहचान को पूरी तरह से अपनाने के बाद मिलने वाले व्यक्तिगत तानों से उबरने में मदद की।

एलाम्स इस बात पर जोर देते हैं कि एक माता-पिता के रूप में ट्रांस पुरुषों को ‘मोटी चमड़ी’ (सहनशील) होने की जरूरत होती है। न्यूयॉर्क टाइम्स का यह लेख एलाम्स की छोटी बेटी द्वारा अपने ट्रांस डैड की सेक्सुअलिटी को सहजता से स्वीकार करने को मददगार और प्रगतिशील के रूप में दिखाता है।

इस लेख में सार्वजनिक या रोजमर्रा के पलों की कुछ कहानियां शामिल हैं, जिसमें एलाम्स की बेटी एलाम्स के शरीर और अतीत के बारे में सवाल पूछती है या टिप्पणी करती है। मुख्य बातचीत इस प्रकार है-

सड़क पर चलते हुए बेटी पूछती है, “डैड, आपके पास कितने समय तक ब्रेस्ट (स्तन) थे?”

एक पूल पर: “अगर आप एक महिला थीं तो आपकी मूँछें कैसे उग आईं?”

खेल के मैदान पर बेटी कहती है, “मैं बड़ी होकर दाढ़ी बढ़ाना चाहती हूँ।” दूसरा बच्चा जवाब देता है, “तुम दाढ़ी नहीं बढ़ा सकतीं। तुम एक लड़की हो।” बेटी जवाब देती है, “मेरे डैड ने बढ़ाई थी और वह एक लड़की थे।”

हालाँकि न्यूयॉर्क टाइम्स ने जेंडर ट्रांजिशन या सेक्स चेंज प्रोसीजर जैसे जटिल मुद्दों को बच्चे द्वारा आसानी से समझने और ‘ट्रांस डैड’ के रूप में कही जाने वाली बातों की सामाजिक स्वीकृति पर जोर दिया, लेकिन सोशल मीडिया पर लोगों ने इसके समय और जानबूझकर की गई रूपरेखा पर सवाल उठाए।

कई लोगों ने एक बड़े पारंपरिक त्योहार का इस्तेमाल एक जैविक महिला की ‘ट्रांसजेंडर’ पहचान और पेरेंटिंग के अनुभव को केंद्र में रखने और ‘डैड’ शब्द को फिर से परिभाषित करने के लिए न्यूयॉर्क टाइम्स की आलोचना की। ‘ट्रांस लोग भी डैड और मॉम होते हैं’ जैसी बात को धीरे से बढ़ावा देने के लिए कॉमिक फॉर्मेट का इस्तेमाल दिलचस्प है। इस फॉर्मेट ने बच्चे के जेंडर से जुड़े सवालों को ‘मजेदार’ और बच्चों के बीच ‘जेंडर-सेंसिटाइजेशन’ (लिंग संवेदीकरण) के लिए शेयर करने लायक बना दिया, क्योंकि छोटे बच्चों को यह समझाने से बेहतर क्या हो सकता है कि जेंडर-अफर्मिंग सर्जरी (GAS) से गुजरना सामान्य और इच्छा के योग्य है।

फादर्स डे पर ट्रांसजेंडर वोक नैरेटिव लाने के लिए न्यूयॉर्क टाइम्स की आलोचना करते हुए, ‘एंड वोकनेस’ ने एक्स (X) पर लिखा, “फादर्स डे पर न्यूयॉर्क टाइम्स। हम मीडिया से जितनी नफरत करते हैं, वह काफी नहीं है।”

लेखक एलेक्स बेरेन्सन ने आलोचना और कटाक्ष को मिलाते हुए लिखा, “मैं @nytimes को इस फादर्स डे पर पुरुषों और पिता बनने के प्रति सांस्कृतिक अभिजात वर्ग (कल्चरल एलीट) के नजरिए को पूरी तरह से पकड़ने के लिए बधाई देना चाहता हूँ – हाँ, टाइम्स के लिए, डैड बनना कुछ ऐसा है जो आप अपने स्तनों को कटवाने के बाद बेहतर महसूस करने के लिए करते हैं। इसे खुद से नहीं गढ़ा जा सकता।”

मशहूर पॉडकास्टर केटी मिलर ने लिखा, “न्यूयॉर्क टाइम्स ने फादर्स डे के लिए ट्रांस डैड होने के बारे में कार्टून प्रकाशित किए। इस तरह वे हमारे बच्चों को भ्रष्ट करने की कल्पना करते हैं।”

इस बीच फॉक्स बिजनेस के पत्रकार चार्ल्स गैस्परिनो ने लिखा, “प्रोग्रेसिव लेफ्ट और देश के बाकी हिस्सों (मान लीजिए करीब 80% अमेरिकी) के बीच की खाई फादर्स डे पर @nytimes की इस बकवास के कारण कभी इतनी चौड़ी नहीं रही। और आप हैरान होते हैं कि ट्रम्प क्यों चुने गए। टू माई डॉटर, माई जेंडर वॉज नेवर कॉम्प्लिकेटेड।”

कई अन्य लोगों ने न्यूयॉर्क टाइम्स के इस लेख को पुरुषों को मिटाने और फादर्स डे को ‘ट्रांस डैड्स डे’ में बदलने का एक प्रयास बताया। फादर्स डे पर गैर-जैविक/ट्रांस दृष्टिकोण को अनुकूल कवरेज देने में अमेरिका और उसके बाहर के कई अन्य पुराने मीडिया घराने भी न्यूयॉर्क टाइम्स के साथ शामिल हो गए हैं। यह न्यूयॉर्क टाइम्स द्वारा पिता या माँ से जुड़े पारंपरिक अवसरों, यानी लिंग भूमिकाओं का जश्न मनाने वाले दिनों का उपयोग करके मुख्यधारा में ‘ट्रांस डैड’, ‘ट्रांस मॉम’ या ‘ट्रांस पेरेंट्स’ के विचार को थोपने और सामान्य बनाने का एक सीधा प्रयास है।

हालाँकि ट्रांस एक्टिविस्ट पूरे अमेरिका और कई यूरोपीय देशों के स्कूलों में इन कहानियों को आक्रामक रूप से बढ़ावा दे रहे हैं, लेकिन उनके मीडिया सहयोगी जेंडर को लेकर भ्रमित माताओं और वोक लोगों को मंच दे रहे हैं ताकि क्रॉस-सेक्स हार्मोन इंजेक्शन, प्यूबर्टी ब्लॉकर्स, GAS और ‘ट्रांस पेरेंटहुड’ के इस्तेमाल को वास्तविक जैविक जेंडर और रिश्तों के बराबर और सामान्य, और कभी-कभी उससे बेहतर साबित किया जा सके।

रणनीति वोक जेंडर विचारधारा को रोजमर्रा के सांस्कृतिक प्रतीकों में शामिल करने की है। अब ट्रांस एक्टिविस्ट ट्रांसजेंडर पहचान, जेंडर फ्लुइडिटी (लिंग की चंचलता) को सामान्य बनाने के लिए पारंपरिक त्योहारों और भूमिकाओं को एक माध्यम के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं और ‘पेरेंट’ को जैविक सेक्स से अलग करने के लिए फादर्स डे से बेहतर अवसर और क्या हो सकता था। यह जबरन थोपा गया समावेशन (इंक्लूजन) है।

पारंपरिक रूप से ‘जेंडर’ और ‘सेक्स’ शब्दों का इस्तेमाल एक-दूसरे की जगह किया जाता रहा है और यह एक वैज्ञानिक और तार्किक रूप से स्वीकृत तथ्य रहा है कि केवल दो ही जेंडर होते हैं जिन्हें सामान्य माना जा सकता है। इसके विपरीत, ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को सामान्य से अलग और विसंगति माना जाता है। नॉन-बाइनरी और ‘जेंडर फ्लुइड’ लोग दावा करते हैं कि वे पारंपरिक सर्वनामों (प्रोनाउन्स) के साथ सहज नहीं हैं क्योंकि वे जेंडर पहचान से जुड़े हैं। इसके कारण ‘They/Them’ और ‘Xe/Xhrer’ जैसे नए सर्वनामों का आविष्कार हुआ।

अमेरिका और यूरोप इस जेंडर-अफर्मेशन और इससे जुड़ी राजनीतिक बहसों का केंद्र रहे हैं, यह सड़न दुनिया भर के कई देशों में फैल चुकी है।

स्पष्ट रूप से डोनाल्ड ट्रम्प की सत्ता में वापसी ने अमेरिका में ट्रांस एक्टिविज्म की लहर को धीमा कर दिया होगा। ‘वोकनेस’ खत्म नहीं हुई है, बल्कि यह सतह के नीचे सुलग रही है। रिपब्लिकन के सत्ता से बाहर होते ही, ट्रांसजेंडर पहचान को सामान्य बनाने का काम फिर से पूरे जोर-शोर से शुरू हो जाएगा।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

इतिहास की भूल सुधार या नई सियासी जंग? ‘सुहरावर्दी एवेन्यू’ के ‘गोपाल मुखर्जी रोड’ बनने से लगी कॉन्ग्रेसियों के ‘अंग विशेष’ में आग: जानें इस मामले का ‘बंगाल के कसाई’ और नेहरु से खास कनेक्शन

पश्चिम बंगाल की राजनीति में ‘नाम बदलने’ के एक फैसले ने देशव्यापी बहस छेड़ दी है। कोलकाता की ऐतिहासिक और बेहद व्यस्त सड़कों में से एक ‘सुहरावर्दी एवेन्यू’ (Suhrawardy Avenue) का नाम अब बदलकर ‘गोपाल मुखर्जी रोड’ (Gopal Mukherjee Road) कर दिया गया है। कोलकाता नगर निगम (KMC) द्वारा जारी इस आधिकारिक नोटिफिकेशन के बाद जहाँ भारतीय जनता पार्टी (BJP) इसे ‘ऐतिहासिक न्याय’ और ‘हिंदुओं के स्वाभिमान की बहाली’ बताकर जश्न मना रही है, वहीं कॉन्ग्रेस और वामपंथी खेमे में इसके खिलाफ तीखा विरोध देखा जा रहा है।

कॉन्ग्रेस इस फैसले को भाजपा की ‘ध्रुवीकरण की राजनीति’ करार दे रही है और सोशल मीडिया पर आम हिंदुओं को भाजपा कार्यकर्ता बताकर उनका मजाक उड़ा रही है। कॉन्ग्रेस का तर्क है कि यह सड़क ‘बंगाल के कसाई’ कहे जाने वाले हुसैन शहीद सुहरावर्दी के नाम पर नहीं, बल्कि उसके चाचा और कलकत्ता विश्वविद्यालय के पहले मुस्लिम कुलपति (VC) डॉ. हसन सुहरावर्दी के नाम पर थी।

लेकिन क्या वाकई इतिहास इतना सीधा और साफ है? क्या सिर्फ नाम का अंतर होने से एक देशद्रोही और अंग्रेजों के मददगार परिवार का दाग धुल जाता है? क्या कॉन्ग्रेस का इस सुहरावर्दी परिवार से लगाव सिर्फ आज का है या इसके तार देश के बंटवारे, जवाहरलाल नेहरू और पूर्व कार्यवाहक राष्ट्रपति हिदायतुल्लाह तक जुड़े हुए हैं? आइए इस पूरी कड़वी हकीकत, दफन इतिहास और ‘गोपाल पाठा’ के शौर्य की कहानी को विस्तार से समझते हैं।

कौन था हसन सुहरावर्दी? अंग्रेजों की चाटुकारिता और ‘सर’ की उपाधि का सच

कॉन्ग्रेस का इकोसिस्टम आज चिल्ला-चिल्लाकर कह रहा है कि सुहरावर्दी एवेन्यू का नाम साल 1933 में डॉ. हसन सुहरावर्दी के सम्मान में रखा गया था, जो एक बड़े सर्जन और शिक्षाविद थे। लेकिन इतिहास के पन्नों को पलटें तो समझ आता है कि हसन सुहरावर्दी को अंग्रेजों ने ‘सर’ (Sir) की उपाधि और यह सड़क उनके किसी ‘अकादमिक योगदान’ के लिए नहीं, बल्कि भारत की एक महान बेटी और स्वतंत्रता सेनानी के साथ गद्दारी करने के इनाम में दी थी।

बात 6 फरवरी 1932 की है। कलकत्ता विश्वविद्यालय का दीक्षांत समारोह (Convocation) चल रहा था। मंच पर ब्रिटिश गवर्नर सर स्टेनली जैक्सन (Sir Stanley Jackson) भाषण दे रहा था। उसी समय 21 साल की एक निडर बंगाली स्वतंत्रता सेनानी बीना दास (Bina Das) अपनी डिग्री लेने के बहाने वहाँ पहुँचीं। उनके पास एक रिवॉल्वर थी, जिसे उन्होंने अपनी पोशाक में छुपा रखा था। भारत माँ को गुलामी की जंजीरों से आजाद कराने के संकल्प के साथ बीना दास ने गवर्नर स्टेनली जैक्सन पर एक के बाद एक 5 गोलियाँ दाग दीं।

गवर्नर जैक्सन ने किसी तरह झुककर अपनी जान बचाई। इसी दौरान वहाँ मौजूद विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति डॉ. हसन सुहरावर्दी ने देशभक्त बीना दास को पीछे से दबोच लिया और उन्हें ब्रिटिश पुलिस के हवाले कर दिया।

इतिहास की गवाही: हसन सुहरावर्दी ने एक क्रूर ब्रिटिश अधिकारी की जान बचाने के लिए अपने ही देश की एक क्रांतिकारी बेटी को अंग्रेजों के क्रूर शिकंजे में सौंप दिया। इस ‘वफादारी’ से खुश होकर ब्रिटिश हुकूमत ने हसन सुहरावर्दी को ‘सर’ (Knighthood) की उपाधि से नवाजा और साल 1933 में उनके घर के सामने वाली सड़क का नाम ‘सुहरावर्दी एवेन्यू’ रख दिया।

इस घटना के बाद बीना दास को 9 साल की कठोर जेल हुई। उनके साथ जुड़ीं अन्य महिला क्रांतिकारियों, जैसे कमला दासगुप्ता (जिन्होंने रिवॉल्वर का इंतजाम किया था), को लंबे समय तक जेल की कालकोठरी में यातनाएँ सहनी पड़ीं। कॉन्ग्रेस आज जिस हसन सुहरावर्दी के नाम का बचाव कर रही है, वह असल में अंग्रेजों का वो पिट्ठू था जिसने भारतीय क्रांतिकारियों के खून और आंसुओं की कीमत पर ब्रिटिश सरकार से जागीरें और सम्मान पाया था। इतना ही नहीं, हसन सुहरावर्दी मुस्लिम लीग और ‘द्वि-राष्ट्र सिद्धांत’ (Two-Nation Theory) का कट्टर समर्थक था और उसकी बेटी बाद में पाकिस्तान जाकर वहाँ की राजनीति में सक्रिय हो गई।

‘बंगाल के कसाई’ हुसैन सुहरावर्दी से क्या था हसन का रिश्ता?

भाजपा और राष्ट्रवादी विचारकों का कहना है कि सुहरावर्दी चाहे ‘हसन’ हो या ‘हुसैन’ दोनों एक ही कट्टरपंथी और भारत-विरोधी सुहरावर्दी परिवार के सदस्य थे। हसन सुहरावर्दी रिश्ते में हुसैन शहीद सुहरावर्दी (Huseyn Shaheed Suhrawardy) का सगा चाचा था। और यह हुसैन शहीद सुहरावर्दी कौन था? इसे इतिहास ‘बंगाल का कसाई’ (Butcher of Bengal) के नाम से जानता है।

साल 1946 में जब मोहम्मद अली जिन्ना ने भारत के टुकड़े करने के लिए ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ (प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस) का आह्वान किया, तब बंगाल का मुख्यमंत्री यही हुसैन शहीद सुहरावर्दी था। 16 अगस्त 1946 को कोलकाता की सड़कों पर हिंदुओं का जो कत्लेआम हुआ, उसकी पूरी स्क्रिप्ट इसी हुसैन सुहरावर्दी ने लिखी थी।

हुसैन ने मुख्यमंत्री रहते हुए पुलिस को बैरकों में रहने का आदेश दिया और मुस्लिम लीग के गुंडों को खुली छूट दे दी। देखते ही देखते कोलकाता की सड़कें हिंदुओं की लाशों से पट गईं, माताओं-बहनों की अस्मत लूटी गई और घरों को फूंक दिया गया। इस नरसंहार के पीछे इसी सुहरावर्दी परिवार का हाथ था।

नेहरू का ‘सुहरावर्दी प्रेम’ और कॉन्ग्रेस का पुराना तुष्टिकरण

अब सवाल उठता है कि कॉन्ग्रेस को इस सुहरावर्दी परिवार से इतनी हमदर्दी क्यों है? आर्काइवल रिकॉर्ड्स और ऐतिहासिक दस्तावेज बताते हैं कि हसन सुहरावर्दी जब इंग्लैंड में पढ़ाई कर रहा था, तब उसकी मुलाकात जवाहरलाल नेहरू से हुई थी। दोनों के बीच गहरी दोस्ती थी जो जीवनभर रही।

यही वजह थी कि जब दिसंबर 1948 में यानी देश के बँटवारे और कोलकाता नरसंहार के दो साल बाद जब ‘बंगाल के कसाई’ हुसैन शहीद सुहरावर्दी पर भारत सरकार ने इनकम टैक्स (आयकर) की देनदारी का शिकंजा कसा, तो प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू खुद उसके बचाव में उतर आए। नेहरू ने तत्कालीन वित्त मंत्री जॉन मथाई और पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री डॉ. बी.सी. रॉय को व्यक्तिगत रूप से पत्र लिखे। नेहरू ने चिंता जताई कि सुहरावर्दी पर कार्रवाई करने से ‘राजनीतिक परिणाम’ खराब हो सकते हैं, इसलिए मामले को रफा-दफा किया जाए या ढील दी जाए।

यह वही हुसैन सुहरावर्दी था जो भारत में करोड़ों की संपत्ति और अपनी काली यादें छोड़कर बाद में पाकिस्तान भाग गया और वहाँ का प्रधानमंत्री बना। कॉन्ग्रेस के इसी सुहरावर्दी प्रेम के कारण दशकों तक कोलकाता के दिल में हिंदुओं के हत्यारों और स्वतंत्रता सेनानियों के गद्दारों के परिवार का नाम चमकता रहा।

हिदायतुल्लाह कनेक्शन: कार्यवाहक राष्ट्रपति और पाकिस्तान जाने वाला परिवार

कॉन्ग्रेस के शासनकाल में तुष्टिकरण की जड़ें कितनी गहरी थीं, इसका एक और उदाहरण मोहम्मद हिदायतुल्लाह (M. Hidayatullah) का देश के शीर्ष पदों पर बैठना है। हिदायतुल्लाह भारत के मुख्य न्यायाधीश और बाद में कॉन्ग्रेस सरकार के दौरान देश के कार्यवाहक राष्ट्रपति (Acting President) भी बने।

यहाँ हिदायतुल्लाह और सुहरावर्दी परिवार के तार जोड़ना महत्वपूर्ण है। हसन सुहरावर्दी की बेटी शाइस्ता सुहरावर्दी का निकाह मोहम्मद इकरामुल्लाह से हुआ था। शाइस्ता सुहरावर्दी मोरक्को में पाकिस्तान की राजदूत रही थी। उसके शौहर मोहम्मद इकरामुल्लाह पाकिस्तान के लिए लगा और मोहम्मद अली जिन्नाह का बहुत करीबी था। हिदायतुल्लाह इसी इकारामुल्लाह का सगा छोटा भाई था।

एक तरफ इकरामुल्लाह पाकिस्तान का पहला विदेश सचिव था और बाद में कनाडा, फ्रांस, पुर्तगाल और यूके में पाकिस्तान का राजदूत था और 1963 में मरा, तो दूसरी तरफ मोहम्मद हिदायतुल्लाह यहाँ भारत में न्यापालिका में सीढ़ियाँ चढ़ता रहा। आजीद से पहले वो सेंट्रल प्रोविंस का जज था और 1954 में वो नागपुर हाई कोर्ट का चीफ जस्टिस बना, जो उस समय देश का सबसे कम उम्र का चीफ जस्टिस था।

साल 1956 में वो एमपी का चीफ जस्टिस बना और 1968 में भारत का चीफ जस्टिस। इसके बाद 1969 में वो कार्यवाहक राष्ट्रपति रहा, जब देश में इंदिरा गाँधी की सरकार थी और फिर CJI पद से रिटायर होने के बाद 1979 में देश का उप राष्ट्रपति भी बना। इस बीच 1982 में कुछ समय वो देश का कार्यवाहक राष्ट्रपति एक बार फिर से बना। तब भी केंद्र में इंदिरा गाँधी की ही सरकार थी। सोचिए सुहरावर्दी परिवार की जड़ें देश में कहाँ से कहाँ तक फैली रही और कॉन्ग्रेस कैसे उसे पालती-पोसती रही। आज के जमाने में भी सवाल पूछ लिए जाए तो शायद कॉन्ग्रेसियों के पास कोई ढंग का जवाब न हो।

हकीकत यह है कि हिदायतुल्लाह का परिवार भी उसी सुहरावर्दी नेटवर्क और मुस्लिम लीग की विचारधारा से गहराई से प्रभावित था। देश के विभाजन के बाद हिदायतुल्लाह के परिवार के कई करीबी लोग और रिश्तेदार भारत छोड़कर पाकिस्तान चले गए थे और वहाँ बड़े पदों पर आसीन हुए। लेकिन इसके बावजूद कॉन्ग्रेस ने उन्हें भारत के सर्वोच्च संवैधानिक पदों तक पहुँचाया। यही कारण है कि आज जब सुहरावर्दी के नाम पर चोट होती है, तो कॉन्ग्रेस के पूरे इकोसिस्टम को दर्द होता है।

कौन थे गोपाल पाठा? जिन्होंने कोलकाता के हिंदुओं को कटने से बचाया

अब बात करते हैं उस महानायक की, जिनके नाम पर अब इस सड़क का नाम ‘गोपाल मुखर्जी रोड’ रखा गया है। कोलकाता के लोग उन्हें आदर और गर्व से ‘गोपाल पाठा’ (Gopal Patha) कहते हैं। ‘पाठा’ बांग्ला शब्द है जिसका अर्थ होता है बकरा। गोपाल जी का कॉलेज स्ट्रीट पर मीट का पारिवारिक व्यवसाय था, इसलिए लोग उन्हें प्यार से इस नाम से बुलाते थे।

16 अगस्त 1946 को जब हुसैन शहीद सुहरावर्दी के गुंडों ने हिंदुओं का सामूहिक संहार शुरू किया, तब हिंदू समाज नेतृत्वविहीन और असहाय था। उस समय महज 5 फीट 4 इंच के कद वाले गोपाल पाठा हिंदुओं के रक्षक बनकर सामने आए। उन्होंने नारा दिया, “अगर वो हमारा एक मारेंगे, तो हम उनके दस मारेंगे। हम कायरों की तरह नहीं मरेंगे।”

गोपाल पाठा ने स्थानीय युवाओं को एकजुट किया और ‘भारतीय जातीय वाहिनी’ (Indian National Force) नाम का एक संगठन बनाया। उन्होंने कसाई सुहरावर्दी के दंगाइयों को करारा जवाब दिया। गोपाल पाठा और उनके साथियों के इसी पराक्रम का परिणाम था कि मुस्लिम लीग का कोलकाता को पूरी तरह से पाकिस्तान में मिलाने और हिंदुओं को खदेड़ने का मंसूबा मिट्टी में मिल गया। उन्होंने अपनी जान पर खेलकर हजारों हिंदू परिवारों, माताओं और बहनों की रक्षा की।

सितंबर 1946 में महात्मा गाँधी कोलकाता आए। उन्होंने दंगा प्रभावित इलाकों का दौरा किया और हिंदू-मुस्लिम दोनों पक्षों से शांति की अपील करते हुए अपने-अपने हथियार उनके चरणों में सरेंडर करने को कहा। मुस्लिम लीग के गुंडों ने अपने कुछ जंग लगे हथियार गाँधी जी के सामने रख दिए।

जब गाँधी जी के दूत गोपाल पाठा के पास पहुँचे और उनसे हथियार डालने को कहा, तो गोपाल पाठा ने गाँधी जी के सामने जाने से साफ मना कर दिया। उन्होंने संदेश भिजवाया, “मैं अपने हथियार गाँधी जी के चरणों में क्यों रखूँ? जब हम पर हमले हो रहे थे, हमारी महिलाओं को उठाया जा रहा था, तब गाँधी जी कहाँ थे? क्या गाँधी जी हमारी महिलाओं की सुरक्षा की गारंटी लेंगे? अगर कोई अपराधी मेरी बहन पर हाथ उठाएगा, तो मैं उसकी कलाई काट दूँगा, यह मेरी नजर में हिंसा नहीं, मेरा धर्म है। मैं हथियार नहीं डालूँगा।”

गोपाल पाठा ने अंत तक हथियार सरेंडर नहीं किए, क्योंकि वे जानते थे कि कायरता से शांति नहीं खरीदी जा सकती।

गोपाल मुखर्जी रोड हिंदुओं के सम्मान की बहाली, ये बीजेपी सरकार का साहसिक कदम

दशकों तक पश्चिम बंगाल में वामपंथियों और तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) का राज रहा, जिन्होंने तुष्टिकरण की राजनीति के चलते गोपाल पाठा जैसे नायक को इतिहास की किताबों से गायब कर दिया और गद्दारों के नाम पर बनी सड़कों को सहेज कर रखा।

लेकिन पश्चिम बंगाल की वर्तमान भाजपा सरकार और मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने कोलकाता नगर निगम के माध्यम से ‘सुहरावर्दी एवेन्यू’ का नाम बदलकर ‘गोपाल मुखर्जी रोड’ करके एक ऐतिहासिक भूल को सुधारा है।

मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने इस फैसले पर ट्वीट करते हुए लिखा, “दशकों तक हमारे शहर की एक मुख्य सड़क का नाम उस व्यक्ति (या परिवार) के नाम पर रहा जिसने राजनीतिक लाभ के लिए निर्दोष नागरिकों के नरसंहार की साजिश रची और सत्ता का दुरुपयोग किया। वीर गोपाल मुखर्जी के नाम पर इस सड़क का नामकरण कर, जिन्होंने हजारों मासूमों की जान बचाई, आखिरकार इतिहास के साथ न्याय किया गया है। यह समय पश्चिम बंगाल के असली नायकों को याद करने और उन्हें सम्मान देने का है।”

नाम बदलना क्यों है हिंदुओं का वास्तविक सम्मान?

कॉन्ग्रेस आज भले ही ‘हसन’ और ‘हुसैन’ के नाम का तकनीकी खेल खेलकर हिंदुओं का मजाक उड़ाए, लेकिन सच यही है कि हसन सुहरावर्दी ने देश की बेटी बीना दास को गिरफ्तार करवाकर अंग्रेजों से वफादारी निभाई थी, और उसी के परिवार ने भारत मां के टुकड़े किए थे। ऐसे किसी भी व्यक्ति या परिवार का नाम स्वतंत्र भारत की सड़कों पर होना देश के स्वतंत्रता सेनानियों और विभाजन के शिकार हुए लाखों निर्दोष हिंदुओं का अपमान था।

भाजपा सरकार ने गोपाल पाठा के नाम पर सड़क का नाम रखकर यह साबित किया है कि अब देश अपने रक्षकों का सम्मान करेगा, न कि भक्षकों और गद्दारों का। यह फैसला केवल एक सड़क का नाम बदलना नहीं है, बल्कि यह बंगाली हिंदुओं के खोए हुए गौरव, पराक्रम और आत्मसम्मान को वापस लौटाने वाला एक क्रांतिकारी कदम है, जिसके लिए वर्तमान सरकार निश्चित रूप से बधाई की पात्र है।

‘मेड इन इंडिया’ का ग्लोबल ‘स्पंदन’: पेरिस में मोदी-मैक्रों ने क्यों थाम लिया इस स्टार्टअप का हाथ?

फ्रांस के नीस शहर में आयोजित ‘भारत इनोवेट्स 2026’ के मंच से राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों का संबोधन भारत-फ्रांस संबंधों में एक नए अध्याय की शुरुआत है। उन्होंने वैश्विक समुदाय को स्पष्ट संदेश दिया कि यूरोप को अब भारत के प्रति अपने पुराने दृष्टिकोण को छोड़ना होगा। मैक्रों की इन बातों के गहरे आर्थिक और रणनीतिक मायने हैं। रक्षा सौदों में ‘मेक इन इंडिया’ को प्राथमिकता, भारतीय स्टार्टअप्स के लिए वित्तीय सहयोग और अत्याधुनिक AI तकनीक साझा करने जैसे कदम यह साबित करते हैं कि भारत अब सिर्फ तकनीक का उपभोक्ता नहीं, बल्कि फ्रांस के साथ कंधे से कंधा मिलाकर भविष्य की रूपरेखा तैयार करने वाला एक बराबर का साझेदार है।

फ्रांस अब कूटनीतिक वादों के साथ-साथ ‘फ्रेंच टेक’, ‘चूज़ फ्रांस’ और ‘फ्रांस 2030’ जैसे अपने प्रमुख तकनीकी अभियानों के दरवाजे भारतीय स्टार्टअप्स के लिए पूरी तरह से खोल रहा है। इसके अलावा, आगामी ‘विवाटेक समिट 2026’ (VivaTech 2026) में दोनों देश मिलकर भारतीय इनोवेशन को यूरोपीय बाजार में बड़े पैमाने पर लॉन्च करने की तैयारी में हैं।

नीतियों और समझौतों से परे, इस तकनीकी साझेदारी की असली और जमीनी तस्वीर तब दुनिया के सामने आई, जब इसी समिट का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया।

इस प्रदर्शनी में उत्तराखंड के युवाओं द्वारा तैयार किया गया एक ऐसा नवाचार भी शामिल था, जिसने पेरिस में फ्रांस के राष्ट्रपति को भी अचंभे में डाल दिया। वायरल हो रहे इस वीडियो में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों को एक छोटी सी डिवाइस के बारे में बेहद बारीकी से समझाते हुए नजर आ रहे हैं। यह डिवाइस करोड़ों लोगों की जान बचाने वाला स्वदेशी ‘स्पंदन ईसीजी’ (Spandan ECG) है। यह भारत के उस स्टार्टअप का कमाल है, जिसने अपनी तकनीक से वैश्विक मंच पर अपना लोहा मनवाया है।

सौरभ बडोला, रजत जैन, साबित रावत और नितिन चंदोला की कोर टीम ने मिलकर ‘स्पंदन’ (Spandan) को विकसित किया है। माचिस की डिब्बी के आकार का यह पोर्टेबल ईसीजी उपकरण हृदय संबंधी असामान्यताओं का शुरुआती चरण में ही पता लगाने में सक्षम है। इस नवाचार का मुख्य उद्देश्य स्वास्थ्य सेवाओं को सुलभ बनाना और सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में अंतिम छोर तक चिकित्सा सुविधाएँ (Last-mile connectivity) पहुँचाना है, ताकि समय रहते लोगों की जान बचाई जा सके।

यह डिवाइस उत्तराखंड के युवाओं की मेहनत का परिणाम है। इनकी कंपनी ‘सनफॉक्स टेक्नोलॉजी’ (Sunfox Technologies) ने जिस तरह से हेल्थ-टेक के क्षेत्र में क्रांति लाई है, वह काबिले तारीफ है। यह उपकरण न केवल पोर्टेबल है, बल्कि दिल की समस्याओं को घंटों पहले भांप लेने का दावा करता है।

इस सफर की शुरुआत ‘शार्क टैंक इंडिया’ (Shark Tank India) के मंच से हुई थी, जहाँ से इस आइडिया ने देश भर में पहचान बनाई। इसके बाद, माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने लोकप्रिय रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ (Mann Ki Baat) में भारत के स्वदेशी मेडिकल नवाचारों और स्टार्टअप्स के प्रयासों की सराहना की थी, जिसमें ‘स्पंदन’ जैसे अभिनव उपकरणों की भूमिका को महत्वपूर्ण माना गया। आज ‘मन की बात’ से शुरू हुआ यह सफर पेरिस में फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों तक पहुँच चुका है।

उत्तराखंड की इस स्टार्टअप कंपनी ने अपनी अनोखी तकनीक से अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का मान बढ़ाया है। हिमालय की दुर्गम चोटियों और चारधाम यात्रा के कठिन रास्तों पर यह पोर्टेबल ईसीजी मशीन आज हजारों श्रद्धालुओं की ‘लाइफ-लाइन’ बनी हुई है।

पेरिस में आयोजित दुनिया के सबसे बड़े टेक्नोलॉजी इवेंट्स में से एक, ‘विवाटेक 2026’ (VIVATECH 2026) में सनफॉक्स टेक्नोलॉजी ने अपने उत्पादों का लोहा मनवाया। इस दौरान प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति मैक्रों ने कंपनी के स्टॉल का दौरा किया। मजे की बात यह है कि इस बार ‘विवाटेक’ में भारत को ‘सेंटर ऑफ अट्रैक्शन’ बनाया गया था, जहाँ देश के 20 चुनिंदा स्टार्टअप्स को अपनी तकनीक दिखाने का मौका मिला।

दोनों नेताओं ने इस तकनीक के सामाजिक प्रभाव को काफी करीब से समझा। कंपनी के सीईओ रजत जैन ने प्रधानमंत्री को बताया कि कैसे उनके पोर्टेबल ईसीजी उपकरण कम संसाधनों वाले क्षेत्रों में भी हृदय रोगों की जांच को आसान बना रहे हैं। खास तौर पर चारधाम यात्रा मार्गों पर कंपनी का मुफ्त कार्डियक मॉनिटरिंग कार्यक्रम एक मिसाल बन चुका है।

दिलचस्प बात यह रही कि प्रधानमंत्री मोदी ने स्पंदन के संस्थापकों से यह भी पूछा कि क्या यह तकनीक अमरनाथ यात्रा जैसे दुर्गम और लो-नेटवर्क वाले इलाकों में भी काम कर सकती है। कंपनी का आत्मविश्वास से भरा जवाब था कि इसे कठिन भौगोलिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर ही विकसित किया गया है।

फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों भी इस तकनीक से काफी प्रभावित दिखे और उन्होंने फ्रांस में इसके संभावित उपयोग पर चर्चा की। अब सनफॉक्स यूरोपीय मानकों के अनुसार ‘सीई’ (CE) सर्टिफिकेशन हासिल करने की प्रक्रिया में है, जिससे यूरोप के बाजार में भी ‘मेड इन इंडिया’ की गूंज सुनाई देगी। इसके अलावा, कंपनी अब ‘कार्डियक अमाइलॉइडोसिस’ (Cardiac Amyloidosis) जैसी दुर्लभ बीमारियों पर शोध के लिए फ्रांस की एक संस्था के साथ मिलकर काम कर रही है।

यह कहना गलत नहीं होगा कि उत्तराखंड की गलियों से निकला यह स्टार्टअप अब पूरी दुनिया के दिल की धड़कन सुरक्षित करने की राह पर है। ‘मन की बात’ से शुरू हुआ यह सफर आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के बढ़ते दबदबे की कहानी कह रहा है।

कुलदेवी का आशीर्वाद, झरने का चमत्कार और सैंकड़ों कश्मीरी पंडितों की आस्था: पढ़िए J&K में लगने वाला खीर भवानी मेला क्यों है सबसे खास, किसकी होती है पूजा

जम्मू-कश्मीर के गांदरबल जिले के तुलमुल्ला गाँव में आज से वार्षिक माता खीर भवानी मेले की शुरुआत हो गई। ज्येष्ठ अष्टमी के अवसर पर आयोजित होने वाला यह मेला कश्मीरी पंडित समुदाय का सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन माना जाता है।

हर वर्ष हजारों श्रद्धालु देश के विभिन्न राज्यों से यहाँ पहुँचकर माता रग्न्या देवी के दर्शन करते हैं, पवित्र झरने में खीर अर्पित करते हैं और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।

इस वर्ष भी जम्मू से हजारों श्रद्धालु संगठित काफिलों में घाटी पहुँचे हैं। प्रशासन की ओर से सुरक्षा, चिकित्सा शिविर, हेल्प डेस्क, यातायात नियंत्रण, साफ-सफाई और आपातकालीन सेवाओं के व्यापक इंतजाम किए गए हैं। मंदिर परिसर और यात्रा मार्गों पर विशेष निगरानी रखी गई ताकि श्रद्धालु शांतिपूर्ण वातावरण में पूजा कर सकें।

हालाँकि खीर भवानी मेला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं है। यह कश्मीर की प्राचीन धार्मिक परंपराओं, कश्मीरी पंडित समुदाय की सांस्कृतिक पहचान, विस्थापन की स्मृतियों और घाटी की साझा सामाजिक विरासत से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। यही कारण है कि यह मेला आज भी धार्मिक, ऐतिहासिक और सामाजिक, तीनों स्तरों पर विशेष महत्व रखता है।

सदियों पुराना तीर्थ: क्या है माता खीर भवानी मंदिर का इतिहास?

माता खीर भवानी मंदिर जम्मू-कश्मीर के गांदरबल जिले के तुलमुल्ला गाँव में स्थित है और इसे कश्मीर के सबसे पवित्र शक्ति स्थलों में गिना जाता है। यह मंदिर देवी रग्न्या या राग्न्या भगवती को समर्पित है, जिन्हें शक्ति का स्वरूप और कश्मीरी पंडित समुदाय की कुलदेवी माना जाता है।

मंदिर की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि काफी प्राचीन मानी जाती है। इस स्थल के ऐतिहासिक संदर्भ कल्हण की राजतरंगिणी, भृगु संहिता और अबू-अल-फजल की ऐन-ए-अकबरी जैसे ग्रंथों में मिलते हैं। समय के साथ यह स्थान केवल पूजा का केंद्र नहीं बल्कि कश्मीरी हिंदू समाज के सांस्कृतिक जीवन का भी प्रमुख आधार बन गया।

वर्तमान मंदिर संरचना डोगरा शासनकाल में विकसित हुई। माना जाता है कि महाराजा प्रताप सिंह ने इसके आधुनिक स्वरूप के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, जबकि बाद में महाराजा हरि सिंह के समय इसका संरक्षण और विस्तार किया गया।

मंदिर की वास्तु संरचना पारंपरिक मंदिरों से कुछ अलग है क्योंकि यहाँ पूजा का केंद्र कोई विशाल गर्भगृह नहीं बल्कि मंदिर परिसर के बीच स्थित एक प्राकृतिक पवित्र झरना है, जिसके चारों ओर धार्मिक गतिविधियाँ संपन्न होती हैं। एक कथा यह भी है कि रावण के भक्ति भाव से प्रसन्न होकर माँ रग्न्या प्रकट हुई थीं।

इसके बाद रावण ने उनकी स्थापना कुलदेवी के रूप में करवाई। हालाँकि रावण के व्यवहार और बुरे कर्म के चलते देवी नाराज हो गईं और रावण की नगरी छोड़कर चली गईं। इसके बाद भगवान राम ने जब रावण का वध किया तो राम ने हनुमान से कहा कि वह देवी की स्‍थापना किसी उपयुक्त स्थान पर करवाएँ। इसके बाद हनुमान की मदद यहाँ स्थापना कराई गई

खीर का प्रसाद, ज्येष्ठ अष्टमी और मंदिर से जुड़ी प्रमुख मान्यताएँ

इस मंदिर की सबसे विशिष्ट परंपरा देवी को चावल की खीर खीर अर्पित करने की है। इसी वजह से इस स्थान को ‘खीर भवानी’ के नाम से जाना जाता है। श्रद्धालु मंदिर परिसर में स्थित पवित्र झरने के पास पहुँचकर खीर, दूध, फूल और अन्य प्रसाद अर्पित करते हैं। मान्यता है कि माता रग्न्या देवी भक्तों की रक्षा करती हैं और उनके जीवन में समृद्धि और शांति लाती हैं।

ज्येष्ठ अष्टमी का दिन विशेष महत्व रखता है। इसी दिन वार्षिक मेले का आयोजन होता है और इसे देवी की विशेष पूजा का अवसर माना जाता है। सुबह से ही श्रद्धालु पारंपरिक परिधान पहनकर मंदिर पहुँचते हैं, भजन-कीर्तन करते हैं और पूजा-अर्चना में भाग लेते हैं।

कई परिवारों के लिए यह केवल व्यक्तिगत श्रद्धा का विषय नहीं बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही पारिवारिक परंपरा का हिस्सा भी है।

रहस्यमयी झरना: माता खीर भवानी मंदिर की सबसे अनोखी परंपरा और उससे जुड़ी मान्यताएँ

माता खीर भवानी मंदिर की सबसे विशिष्ट और चर्चित पहचान मंदिर परिसर के बीच स्थित पवित्र प्राकृतिक झरना है। इसी झरने के चारों ओर पूरा धार्मिक अनुष्ठान संपन्न होता है और यही इस मंदिर को अन्य शक्ति स्थलों से अलग बनाता है। स्थानीय परंपरा में इस झरने को ‘स्यंध’ (Syandh) कहा जाता है और इसे अत्यंत पवित्र माना जाता है।

इस झरने से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध मान्यता इसके पानी के रंग को लेकर है। ऐसा माना जाता है कि इस झरने का पानी क्षेत्र की समृद्धि के आधार पर रंग बदलता है और इसे घाटी के भविष्य, सामाजिक परिस्थितियों या बड़े परिवर्तनों से जोड़कर देखा जाता है। सामान्य परिस्थितियों में पानी का रंग हल्का, साफ या दूधिया दिखाई देना शुभ माना जाता है।

वहीं गहरा, धुंधला या काला रंग कठिन समय या अशुभ संकेत के रूप में देखा जाता है। इस मान्यता को लेकर समुदाय में कई पीढ़ियों से कहानियाँ और स्मृतियाँ प्रचलित रही हैं। 1990 में कश्मीरी पंडितों के बड़े पैमाने पर पलायन से ठीक पहले इसका पानी कथित तौर पर काला हो गया था।

किसी प्राकृतिक आपदा की स्थिति में कुंड का जल काला हो जाता है। इससे यह संकेत मिलता है कि जम्मू-कश्मीर में कोई विपत्ति आने वाली है। 2014 की बाढ़ और कारगिल युद्ध के दौरान कुंड के जल का रंग क्रमशः काला और लाल हो गया था। हालाँकि यह कुंड घाटी की उन्नति का संकेत भी देता है।

कहा जाता है कि जब अनुच्छेद-370 हटाया गया था तब कुंड का जल हरे रंग का हो गया था। जल का यह हरा रंग कश्मीर की उन्नति और खुशहाली का प्रतीक माना गया।

धार्मिक मान्यता के अनुसार, यह झरना केवल जल का स्रोत नहीं बल्कि देवी रग्न्या की उपस्थिति और कृपा का प्रतीक है। मंदिर में आने वाले श्रद्धालु इस झरने में खीर, दूध, पुष्प और प्रसाद अर्पित करते हैं। इसी परंपरा के कारण इस तीर्थ का नाम ‘खीर भवानी’ पड़ा। पूजा के दौरान श्रद्धालु झरने के चारों ओर परिक्रमा करते हैं और शांति तथा समृद्धि की प्रार्थना करते हैं।

पलायन के बाद भी कायम रहा रिश्ता: कश्मीरी पंडितों के लिए क्यों खास है यह मेला?

खीर भवानी मेला कश्मीरी पंडित समुदाय के लिए केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि उनकी सामूहिक पहचान का भी हिस्सा है। दशकों तक घाटी में रहने वाले कश्मीरी पंडितों के सामाजिक जीवन में यह मेला विशेष स्थान रखता था। परिवारों के लिए यह वार्षिक धार्मिक और सामुदायिक मिलन का अवसर होता था।

लेकिन 1990 के दशक की शुरुआत में कश्मीर में आतंकवाद, लक्षित हिंसा, हत्याओं, धमकियों और असुरक्षा के माहौल के बीच बड़ी संख्या में कश्मीरी पंडितों को घाटी छोड़कर पलायन करना पड़ा। इस घटना ने समुदाय की सामाजिक संरचना और सांस्कृतिक जीवन को गहराई से प्रभावित किया। करीब 5 लाख कश्मीरी हिंदुओं ने अपनी मिट्टी से दूर होने का दर्द झेला।

लगातार नरसंहार और प्रताड़ना के चलते उन्हें घाटी से भागने को मजबूर होना पड़ा। विस्थापन के बाद भी खीर भवानी मेला समुदाय की स्मृति और धार्मिक परंपरा का केंद्र बना रहा। आज भी बड़ी संख्या में लोग हर वर्ष इस मेले में शामिल होकर अपनी जड़ों और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ाव महसूस करते हैं।

बदलते समय में मेले की नई भूमिका

खीर भवानी मेले की एक महत्वपूर्ण पहचान इसकी सामाजिक भूमिका भी है। कई वर्षों से स्थानीय मुस्लिम समुदाय इस आयोजन में सहयोग करता रहा है। श्रद्धालुओं के स्वागत, व्यवस्थाओं और स्थानीय स्तर पर सहयोग की परंपरा को घाटी के सामाजिक संबंधों और साझा संस्कृति के उदाहरण के रूप में देखा जाता है।

इसी वजह से इस मेले को अक्सर कश्मीरियत यानी साझा सांस्कृतिक विरासत और सहअस्तित्व से भी जोड़ा जाता है। इस वर्ष प्रशासन ने सुरक्षा के विशेष इंतजाम किए। मंदिर परिसर के आसपास अतिरिक्त सुरक्षा बलों की तैनाती की गई, मेडिकल कैंप लगाए गए और सहायता केंद्र बनाए गए।

आगामी अमरनाथ यात्रा को देखते हुए भी सुरक्षा व्यवस्थाओं को और मजबूत किया गया। इन व्यवस्थाओं का उद्देश्य केवल आयोजन को सफल बनाना नहीं बल्कि श्रद्धालुओं के बीच भरोसा और सुरक्षा की भावना को बनाए रखना भी है।

आस्था से आगे: क्यों विशेष है खीर भवानी मेला?

माता खीर भवानी मेला कश्मीर की उन परंपराओं में शामिल है जहाँ धर्म, इतिहास और समाज एक-दूसरे से जुड़ते दिखाई देते हैं। तुलमुल्ला स्थित यह मंदिर केवल एक तीर्थस्थल नहीं बल्कि कश्मीरी पंडित समुदाय की आस्था, सांस्कृतिक निरंतरता और ऐतिहासिक स्मृति का केंद्र है।

आज भी जब हजारों श्रद्धालु यहाँ पहुँचकर माता रग्न्या देवी को खीर अर्पित करते हैं, तो यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं होता, यह उस परंपरा को जीवित रखने का प्रयास भी होता है जिसने समय के कई उतार-चढ़ाव देखे हैं, लेकिन अपनी पहचान को बनाए रखा है।

यमाल मुस्कुराया, सालाह चमके और काबो वर्दे ने दुनिया रोक दी: FIFA विश्व कप में अंडरडॉग्स की रात

गुजरे दिनों फीफा (FIFA) विश्व कप में जो खेल प्रेमियों को देखने मिला, वह किसी जादू से कम नहीं था। एक के बाद एक लगातार रोमांचक मुकाबले, जो आपको रात भर सोने न दें।

सर्वप्रथम, बीती रात अटलांटा स्टेडियम में 2010 विश्व कप विजेता स्पेन का मुकाबला पिछले संस्करण में अर्जेंटीना को चौंका चुकी सऊदी अरब की टीम से था। पिछले मैच में हुई गलतियों से सबक लेते हुए स्पेनिश टीम के कोच लुई डे ला फुएन्ते ने अपनी प्लेइंग इलेवन में कुछ बदलाव किए। मिडफील्ड में दानी ओल्मो को अधिक आक्रामक भूमिका दी गई, जिससे पेड्री को आगे बढ़कर खेल रचने की अधिक स्वतंत्रता मिली।

वहीं लेफ्ट विंग पर गावी की जगह एलेक्स बाएना को मौका दिया गया। साथ ही चोट से उबरकर लामीन यमाल भी टीम में वापसी कर रहे थे।

इस बार स्पेनिश टीम अपने पिछले मैच की तुलना में कहीं अधिक संतुलित और आत्मविश्वास से भरी नजर आ रही थी। मैच के शुरुआती मिनटों से ही स्पेन ने विपक्षी गोलपोस्ट पर दबाव बनाना शुरू कर दिया। रोड्री, पेड्री और दानी ओल्मो लगातार फॉरवर्ड लाइन के लिए मौके तैयार कर रहे थे।

मैच के दसवें मिनट में ही लामीन यमाल ने शानदार गोल दागकर स्पेन को बढ़त दिला दी। इसके बाद सऊदी अरब की टीम कुछ संभल पाती, उससे पहले ही सेंट्रल फॉरवर्ड मिकेल ओयारजाबाल ने दो गोल दागकर मैच के पच्चीसवें मिनट से पहले ही स्पेन को 3-0 से आगे कर दिया।

स्पेन का दबदबा पूरे मैच में साफ दिखाई दे रहा था। पहले हाफ में ही उसने मुकाबले की दिशा लगभग तय कर दी थी। दूसरे हाफ की शुरुआत में एक और गोल के साथ स्पेन की बढ़त 4-0 हो गई। लामीन यमाल की वापसी ने टीम के आक्रमण को अतिरिक्त धार दी थी। यह मैच 4-0 से जीतकर स्पेन ग्रुप एच में शीर्ष स्थान पर पहुंच गया।

मैं खबर पढ़ रहे तमाम साथियों का ध्यान एक उन्नीस वर्षीय खिलाड़ी की ओर भी दिलाना चाहूंगा, जिसे शायद उतनी चर्चा नहीं मिलती जितनी वह डिजर्व करता है। इस खिलाड़ी का नाम है पाऊ कुबार्सी।

कम उम्र में ही पाऊ कुबार्सी स्पेन की रक्षापंक्ति के महत्वपूर्ण सदस्य बन चुके हैं। डिफेंस में उनका संयम, पोजिशनिंग और खेल की समझ उन्हें अपनी पीढ़ी के सबसे प्रतिभाशाली सेंटर-बैक खिलाड़ियों में शामिल करती है। बड़े मंच पर जिस परिपक्वता के साथ वह खेलते हैं, वह वाकई प्रशंसनीय है।

आगे, रात साढ़े बारह बजे लॉस एंजिलिस स्टेडियम में केविन डी ब्रुएना की बेल्जियम का मुकाबला ईरान की टीम से था। यहां एक ऐसा परिणाम सामने आया जिसकी बहुत कम लोगों ने कल्पना की होगी। ईरान ने बेल्जियम जैसी मजबूत टीम को 0-0 की बराबरी पर रोक दिया। इस नतीजे के बाद ग्रुप जी की स्थिति और भी रोचक हो गई।

इसके बाद मियामी में ग्रुप एच के एक अन्य मुकाबले में मार्सेलो बिएल्सा की उरुग्वे को काबो वर्दे का सामना करना था। उरुग्वे के लिए यह मैच जीतना बेहद जरूरी था। दूसरी ओर, काबो वर्दे पहले ही इस विश्व कप में स्पेन के खिलाफ प्रभावशाली प्रदर्शन कर सबका ध्यान अपनी ओर खींच चुकी थी।

मार्सेलो बिएल्सा ने अपनी टीम को 4-2-3-1 फॉर्मेशन के साथ मैदान में उतारा। उगार्ते और वालवर्दे टीम के लिए यह मैच जीतना चाहते थे। वहीं काबो वर्दे के गोल की जिम्मेदारी एक बार फिर उनके अनुभवी गोलकीपर वोज़िन्हा के कंधों पर थी।

मैच शुरू होते ही काबो वर्दे ने भी आक्रामक इरादे दिखाए। दोनों टीमें लगातार हमले करती नजर आईं। मैच के इक्कीसवें मिनट में काबो वर्दे को उरुग्वे के गोलपोस्ट से लगभग तीस मीटर दूर फ्री-किक मिली। डिफेंसिव मिडफील्डर केविन पीना ने शानदार राइट-फुटेड शॉट लगाया और गेंद सीधे गोलपोस्ट में जा समाई। पूरी दुनिया को चौंकाते हुए काबो वर्दे ने बढ़त हासिल कर ली।

हालाँकि उरुग्वे ने हार नहीं मानी। मैच के चवालीसवें मिनट में मैक्सिमिलियानो अराउजो ने हेडर के जरिए बराबरी दिलाई। इसके ठीक एक मिनट बाद अराउजो के पास पर अगुस्तिन कानोब्बियो ने गोल कर उरुग्वे को 2-1 की बढ़त दिला दी। पहला हाफ समाप्त होते-होते उरुग्वे वापसी कर चुका था।

दूसरे हाफ में काबो वर्दे ने तीन बदलाव किए और उनका असर भी दिखा। सब्स्टीट्यूट खिलाड़ी हेलियो वरेला ने गोल कर स्कोर 2-2 कर दिया। इसके बाद दोनों टीमों ने जीत के लिए पूरा जोर लगाया, लेकिन कोई और गोल नहीं हो सका।

मैच 2-2 की बराबरी पर समाप्त हुआ। उरुग्वे के लिए यह निराशाजनक परिणाम था, जबकि काबो वर्दे के लिए विश्व कप इतिहास का एक यादगार क्षण। जिस साहस और अनुशासन के साथ उन्होंने पूरे मैच में संघर्ष किया, वह प्रशंसा के योग्य है।

आगे, वैंकूवर में ग्रुप जी के मुकाबले में मिस्र ने न्यूज़ीलैंड को 3-1 से हराकर अपने समूह में शीर्ष स्थान हासिल कर लिया। स्टार खिलाड़ी मोहम्मद सालाह ने भी गोल दागकर दर्शकों को झूमने का मौका दिया।

अब आज रात विश्वविजेता अर्जेंटीना भारतीय समयानुसार रात साढ़े दस बजे डल्लास में ऑस्ट्रिया के खिलाफ मैदान में उतरेगी। एक बार फिर दुनिया की निगाहें लियो मेस्सी पर होंगी। वहीं पिछले संस्करण की उपविजेता फ्रांस रात ढाई बजे फिलाडेल्फिया में इराक का सामना करेगी।

इन सभी मुकाबलों पर आपकी नजर बनी रहनी चाहिए क्योंकि इस बार विश्व कप में शानदार फुटबॉल देखने को मिल रही है। आगे भी कई रोमांचक मुकाबले बाकी हैं। बने रहिए साथ। फुटबॉल की खबरों का सिलसिला जारी रहेगा।

बंगाल की BJP सरकार ने पेश किया पहला पूर्ण बजट, 1 लाख सरकारी नौकरी से लेकर महिला आरक्षण और राजनीतिक हिंसा पीड़ितों की मदद तक: जानें- शुभेंदु अधिकारी सरकार ने जनता को दी कौन-कौन सी सौगातें

पश्चिम बंगाल में पहली बार सत्ता में आई BJP सरकार ने अपना पहला बजट पेश किया गया। वित्त वर्ष 2026-27 के लिए यह ₹4.38 लाख करोड़ का है। राज्य सरकार ने प्रशासनिक कामकाज में पारदर्शिता लाने, तेजी से विकास करने और डिजिटल तकनीक को बढ़ावा देने के लिए ‘वेस्ट बंगाल इम्पैक्ट AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) मिशन’ शुरू किया है।

शुभेंदु सरकार ने 1 लाख खाली पदों पर भर्ती की घोषणा की साथ ही महिलाओं के लिए 33% आरक्षण की भी घोषणा की। उन्होंने 36,000 करोड़ रुपये की ‘अन्नपूर्णा योजना’ जैसी बड़ी योजनाओं को लागू करने की बात कही, साथ ही राजनीतिक हिंसा के शिकार लोगों और परिवार का भी ख्याल रखा है।

वित्त मंत्री स्वप्न दासगुप्ता ने राज्य की पहली BJP सरकार के पहले पूर्ण बजट में कई अहम घोषणाएँ कीं। रोजगार बढ़ाने से लेकर सरकारी कर्मचारियों के महँगाई भत्ते में बढ़ोतरी, महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण, 1 लाख खाली पदों में भर्ती के साथ- साथ बेरोजगारी भत्ता देने की भी घोषणा की। पूरे बजट में हर तबके का ध्यान रखा गया, किसानों, बुजुर्गों, छात्रों, बेरोजगारों, महिलाओं और बुजुर्गों के साथ-साथ नौकरीपेशा लोगों का भी पूरा ख्याल रखा।

शुभेंदु सरकार के बजट में जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को विशेष सम्मान देते हुए उनकी जयंती (6 जुलाई) को राज्य में सरकारी अवकाश की घोषणा की है। इसके साथ ही उनके पैतृक आवास के जीर्णोद्धार और उनकी 125 फीट ऊँची प्रतिमा स्थापित करने की भी घोषणा की है।

DA में अतिरिक्त 20 फीसदी की बढ़ोतरी

वित्त मंत्री स्वप्र दासगुप्ता ने बजट पेश करते हुए घोषणा की कि राज्य सरकार के कर्मचारियों, अर्ध-सरकारी कर्मचारियों, गैर-शिक्षण कर्मचारियों और पेंशनभोगियों, जिन्हें अभी तक 18 प्रतिशत की दर से महँगाई भत्ता मिलता है, उन्हें अब अतिरिक्त 20 प्रतिशत महँगाई भत्ता मिलेगा यानी कुल महँगाई भत्ता बढ़कर 38 फीसदी हो जाएगा। DA की नई दरें 1 अक्टूबर, 2026 से लागू होंगी। इससे लाखों सरकारी कर्मचारियों और रिटायर हो चुके लोगों को सीधा फायदा होगा। कर्मचारी लंबे समय से DA बढ़ाने की माँग कर रहे थे।

उन्होंने कहा, “MLA फंड को ₹70 लाख से बढ़ाकर ₹1 करोड़ कर दिया गया है। होम गार्ड और NBF कर्मियों के मासिक वेतन में ₹2,000 की बढ़ोतरी की गई है। सिविल डिफेंस वॉलंटियर्स को हर महीने 20 दिन के काम की गारंटी दी जाएगी। अर्ध-सरकारी और गैर-शिक्षण कर्मचारियों को 20 प्रतिशत अतिरिक्त महँगाई भत्ता मिलेगा। आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं के साथ-साथ आशा वर्कर्स के मासिक मानदेय में भी ₹5,000 की बढ़ोतरी की गई है।”

‘संग्रामी भत्ता’ के जरिए राजनीतिक हिंसा से पीड़ितों को मदद

बजट में राज्य पुलिस बल के लिए कुल 20000 कर्मचारियों की भर्ती की घोषणा की गई है। इससे निश्चित रूप से रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और साथ ही कानून-व्यवस्था भी मजबूत होगी। एक नए ‘संग्रामी भत्ता’ (संघर्ष करने वालों या पीड़ित लोगों के लिए भत्ता) की भी घोषणा की गई है। सरकार ने साफ कहा है कि यह भत्ता उन लोगों को दिया जाएगा जो राजनीतिक विचारधारा या राजनीतिक हिंसा के शिकार हुए हैं। योजना का मकसद राजनीतिक हिंसा के पीड़ितों और उनके परिवारों के प्रति समर्थन दिखाना है।

साथ ही, उच्च शिक्षा ले रही अविवाहित छात्राओं को ₹50,000 की एकमुश्त सहायता राशि मिलेगी। मिड-डे मील पकाने वालों का भत्ता ₹1,000 बढ़ाया जाएगा, और प्राइमरी स्कूलों में मिड-डे मील के लिए प्रति छात्र आवंटन को बढ़ाकर ₹10 किया जा रहा है।

1 लाख नौकरी और बेरोजगारी भत्ता का ऐलान

विधानसभा में बजट पेश करते हुए राज्य के वित्त मंत्री स्वपन दासगुप्ता ने कहा, “21 से 45 साल की उम्र के योग्य, पढ़े-लिखे और बेरोजगार युवाओं को हर महीने भत्ता देने के लिए अक्टूबर 2026 में ‘भरोसा’ योजना शुरू की जाएगी। इस योजना के तहत, ग्रेजुएट युवाओं को ₹3,000 का भत्ता मिलेगा, जबकि दूसरों को ₹2,000 मिलेंगे। यह योजना उन परिवारों के उम्मीदवारों के लिए होगी जिनकी सालाना आय ₹1 लाख से कम है और जो अभी किसी दूसरी सोशल सिक्योरिटी स्कीम का फायदा नहीं उठा रहे हैं।”

इसके अलावा 100 मेधावी छात्रों के लिए ‘स्वामी विवेकानंद मेरिट स्कीम’ का प्रस्ताव भी बजट में है। उच्च शिक्षा प्राप्त कर रही अविवाहित छात्राओं के लिए ₹50,000 की एकमुश्त आर्थिक सहायता देने की घोषणा भी की गई है।

सरकारी नौकरी की परीक्षा की तैयारी के लिए ₹30,000 की एकमुश्त ग्रांट मिलेगी। ये रकम सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त कॉलेजों के छात्रों को दी जाएगी। सालों से सरकारी नौकरियों में भर्ती की दिक्कतों को देखते हुए शुभेंदु सरकार ने अधिकतम आयुसीमा में 5 साल की छूट देने की घोषणा की है। बजट में KYC-कंप्लायंट जॉब कार्ड धारकों को 125 दिन का रोजगार देने का प्रस्ताव है और 100 दिन की काम वाली योजना के लिए ₹14,000 करोड़ का आवंटन किया गया है।

AI मिशन पर बंगाल

राज्य के सरकारी विभागों के कामकाज को पूरी तरह से पेपरलेस (कागज-रहित) बनाना और दक्षता बढ़ाने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल करना है। बंगाल के पुलिस विभाग के लिए एक खास AI सेल बनाया जा रहा है, जो पुलिसिंग, अपराध नियंत्रण और जाँच में AI का अधिक से अधिक इस्तेमाल करेगा। इसके अलावा, राज्य सरकार ‘बंगाल सिलिकॉन वैली’ प्रोजेक्ट के तहत डेटा सेंटर्स और AI से जुड़े उद्योगों के लिए ₹30,000 करोड़ का निवेश करवाने जा रही है। इससे रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे।

बजट के दौरान राज्य के वित्त मंत्री ने राज्य में नए आईआईटी और एम्स बनाने की घोषणा की। उन्होंने कहा कि उत्तर बंगाल में एक आईआईटी और एक एम्स स्थापित किया जाएगा। कल्याणी के पास एक नया ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट बनाने के साथ-साथ एक आईआईएम स्थापित करने का प्रस्ताव भी है।

पश्चिम बंगाल के बजट में ‘बंगाल एआई मिशन’ के तहत भूमि अधिग्रहण और सरकारी कामकाज को डिजिटल बनाने पर विशेष जोर दिया गया है। हालाँकि, इसका मुख्य लक्ष्य डिजिटलाइजेशन के अलावा औद्योगिकीकरण को बढ़ावा देना और बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा करना है। निवेश को आकर्षित करने,भूमि अधिग्रहण को सरल बनाने और सिंगल-विंडो सिस्टम के लिए एक नई औद्योगिक नीति लागू की गई है।

1 किलोमीटर के दायरे में शराब की कोई दुकान नहीं होगी

अस्पतालों, शिक्षण संस्थानों या धार्मिक स्थलों के 1 किलोमीटर के दायरे में शराब की कोई दुकान नहीं होगी। बजट में राज्य सरकार ने यह घोषणा की गई है। मिड-डे मील रसोइयों के लिए ₹1,000 का भत्ता बढ़ाने की घोषणा की गई है। साथ ही पैरा-टीचर्स का मासिक सैलरी ₹5,000 बढ़ाया गया है।

किसान परिवार को मिलेंगे ₹36000 सालाना

बजट में हर किसान परिवार को ₹3,000 प्रति माह की आर्थिक सहायता देने की घोषणा की गई है यानी सालाना हर परिवार को ₹36000 रुपए मिलेंगे। वित्त मंत्री ने बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों के लिए ₹1200 करोड़ की लागत वाले एक मास्टर प्लान की घोषणा की और कहा कि इससे बाढ़ की आशंका वाले इलाके का स्थायी विकास सुनिश्चित किया जाएगा। बजट में बुज़ुर्गों, विधवाओं और दिव्यांगों के लिए मासिक भत्ते में 500 रुपए की बढ़ोतरी की घोषणा की गई।

महिलाओं के लिए बड़ी घोषणाएँ

बजट के माध्यम से महिलाओं को सशक्त करने की शुभेन्दु सरकार ने पहल की है। इस दौरान सरकारी नौकरियों में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण की घोषणा की गई है यानी 1 लाख सरकारी नौकरी मिलने पर उसमें 33000 महिलाओं को नौकरी मिलेगी।

इसके अलावा अन्नपूर्णा योजना की घोषणा की गई है, जिसके लिए राज्य सरकार ने ₹36,000 करोड़ आवंटित किए हैं। योजना के तहत महिलाओं को हर महीने ₹3,000 दिए जाएँगे, जो सीधे बैंक खातों में जमा किया जाएगा। बजट में गर्भवती माताओं के लिए ₹21,000 की आर्थिक सहायता देने की घोषणा की गई है साथ ही उन्हें छह न्यूट्रिशन किट मिलेंगी।

टोल फ्री हेल्पलाइन नंबर जारी किया गया ताकि किसी तरह की सहायता के लिए सीधा संपर्क किया जा सके और मदद पहुँचाने में देरी न हो। इससे प्रशासन को कानून-व्यवस्था दुरुस्त रखने में मदद मिलेगी। महिलाओं की सुरक्षा के लिए ‘दुर्गा स्क्वाड’ शुरू करने की घोषणा की गई है। अक्टूबर में दुर्गा पूजा से पहले 16000 नए कॉन्स्टेबल तैनात किए जाएँगे।

पश्चिम बंगाल के बजट (2026) में खनन (माइनिंग) गतिविधियों के लिए सेंट्रलाइज्ड ई-ऑक्शन प्रक्रिया लागू करने और आदिवासी बहुल क्षेत्र झारग्राम में एक नई ‘ट्राइबल यूनिवर्सिटी’ स्थापित करने की घोषणा की गई है। इससे स्थानीय जनजातीय युवाओं को उच्च शिक्षा, रोजगार-उन्मुख पाठ्यक्रम, और रिसर्च की सुविधा मिलेगी।

राज्य में रेत और दूसरे खनिजों की नीलामी में पारदर्शिता लाने और अवैध खनन और सिंडिकेट राज को खत्म करने के लिए यह व्यवस्था शुरू की गई है। खदानों की डिजिटल मैपिंग और सीसीटीवी कवरेज के माध्यम से अवैध गतिविधियों पर लगाम लगाने का प्रावधान है।

सालार मसूद की दरगाह पर 10 साल में आए चढ़ावे का नहीं मिला हिसाब, ‘घोटाले’ से जुड़ा सपा के पूर्व मंत्री का भी नाम: जानिए कैसे खुला पूरा मामला और कमेटी ने क्या कहा

उत्तर प्रदेश के बहराइच की सालार मसूद दरगाह एक बार फिर विवादों में है। इस बार मामला दरगाह पर आने वाले चढ़ावे और उसके वित्तीय रिकॉर्ड से जुड़ा है। आरोप है कि दरगाह में पिछले कई वर्षों में आए चढ़ावे और दान का पूरा हिसाब उपलब्ध नहीं है। जिलाधिकारी की ओर से रिकॉर्ड माँगे जाने के बाद भी कई सालों का वित्तीय ब्योरा नहीं मिल पाया।

इसके बाद दरगाह में बड़े वित्तीय घोटाले की आशंका जताई जा रही है। मामले में भाजपा (बीजेपी) नेताओं ने करोड़ों रुपए की हेराफेरी का आरोप लगाया है, जबकि समाजवादी पार्टी के पूर्व मंत्री यासर शाह का नाम भी विवाद में सामने आया है। दूसरी तरफ दरगाह इंतजामिया कमेटी सभी आरोपों को बेबुनियाद बता रही है।

दरगाह के चढ़ावे को लेकर बवाल

बहराइच की सालार मसूद दरगाह को देश की प्रसिद्ध दरगाहों में गिना जाता है। यहाँ हर साल लाखों मुस्लिम पहुँचते हैं और नकद दान के अलावा सोना, चाँदी और अन्य कीमती वस्तुएँ चढ़ाते हैं। हाल के दिनों में दरगाह के चढ़ावे और संपत्तियों के प्रबंधन को लेकर सवाल उठने लगे।

विवाद तब और बढ़ गया जब दरगाह से जुड़े कुछ लोगों और भाजपा नेताओं ने आरोप लगाया कि दरगाह में आने वाले चढ़ावे का सही हिसाब-किताब नहीं रखा गया। आरोप यह भी है कि वर्षों से जमा हुई धनराशि और अन्य संपत्तियों के उपयोग में गंभीर अनियमितताएँ हुई हैं। इसी बीच कुछ पुश्तैनी खादिमों ने दावा किया कि दरगाह में चढ़ाई गई सोने-चाँदी की कीमती ज्वेलरी अब दिखाई नहीं दे रही है। उनका कहना है कि अगर आभूषण सुरक्षित हैं तो उन्हें सार्वजनिक रूप से दिखाया जाना चाहिए।

भाजपा के आरोप

विवाद को लेकर भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष कुँवर बासिल अली ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात की और पूरे मामले की SIT से जाँच कराने की माँग की है।कुँवर बासिल अली का आरोप है कि दरगाह वक्फ नंबर-19 की बेशकीमती संपत्तियों और चढ़ावे के प्रबंधन में बड़े स्तर पर अनियमितताएँ हुई हैं।

बासित अली ने माँग की है कि पिछले लगभग 20 वर्षों के वित्तीय लेनदेन की निष्पक्ष जाँच कराई जाए। उनका आरोप है कि दरगाह में आने वाले दान, चढ़ावे और चंदे की रकम में बड़े पैमाने पर हेराफेरी की गई है। उनका कहना है कि मामले की निष्पक्ष जाँच होने पर करोड़ों रुपए के वित्तीय गड़बड़ी का सच सामने आ सकता है।

मामला बढ़ने के बाद प्रदेश सरकार के प्रभारी मंत्री दिनेश प्रताप सिंह ने भी जिलाधिकारी अक्षय त्रिपाठी से विस्तृत रिपोर्ट माँगी है। रिपोर्ट 15 दिनों के भीतर देने को कहा गया है। इससे साफ है कि प्रशासन भी आरोपों को गंभीरता से देख रहा है।

डीएम ने माँगा ब्योरा, लेकिन रिकॉर्ड नहीं मिला

बहराइच के जिलाधिकारी अक्षय त्रिपाठी ने दरगाह के वित्तीय रिकॉर्ड की जानकारी माँगी तो कई सवाल खड़े हुए। जाँच के दौरान यह बात सामने आई कि पिछले 10 वर्षों के चढ़ावे और आय-व्यय से जुड़े कई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, दरगाह प्रबंधन की ओर से पूरा वित्तीय ब्योरा प्रस्तुत नहीं किया जा सका।

इसी वजह से बड़े वित्तीय गोलमाल या घोटाले की आशंका जताई जा रही है। जिलाधिकारी ने मामले को गंभीर मानते हुए उत्तर प्रदेश सुन्नी वक्फ बोर्ड को पत्र भेजकर जाँच की आवश्यकता बताई है। जाँच में एक कर्मचारी की नियुक्ति पर भी सवाल उठे हैं, जबकि वर्तमान समय में 170 कर्मचारियों के काम करने का दावा कमेटी कर रही है। अब सवाल यह उठ रहा है कि अगर दरगाह में हर साल बड़ी मात्रा में चढ़ावा आता रहा है, तो उसका पूरा लेखा-जोखा कहाँ है और रिकॉर्ड उपलब्ध क्यों नहीं है।

सपा के पूर्व मंत्री की मिलीभगत के आरोप

इस पूरे विवाद में समाजवादी पार्टी के नेता और पूर्व कैबिनेट मंत्री यासर शाह का नाम भी सामने आया है। भाजपा नेताओं ने आरोप लगाया है कि दरगाह की इंतजामिया कमेटी में शामिल कुछ लोगों के साथ मिलकर वित्तीय अनियमितताओं को संरक्षण दिया गया।

कुँवर बासित अली ने मुख्यमंत्री से की गई शिकायत में यासर शाह की भूमिका की भी जाँच कराने की माँग की है। उनका आरोप है कि दरगाह से जुड़े आर्थिक मामलों में पूर्व मंत्री की भी भूमिका रही है और इसकी निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए।

दरगाह कमेटी ने क्या सफाई दी?

वहीं दरगाह इंतजामिया कमेटी ने सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया है। कमेटी के वरिष्ठ सदस्य एडवोकेट दिलशाद अहमद का कहना है कि भ्रष्टाचार और गबन के आरोप पूरी तरह निराधार हैं।

कमेटी का दावा है कि दरगाह का हर वित्तीय लेनदेन नियमों के अनुसार होता है और सभी प्रक्रियाएँ वक्फ बोर्ड के नियमों के तहत संचालित की जाती हैं। कमेटी के अनुसार, चढ़ावे की गिनती सीसीटीवी कैमरों की निगरानी में होती है और पूरी प्रक्रिया रिकॉर्ड की जाती है। इसलिए हेराफेरी की संभावना नहीं है। कमेटी ने यह भी कहा है कि कर्मचारियों की नियुक्तियाँ और अन्य प्रशासनिक कार्य भी पूरी पारदर्शिता के साथ किए जाते हैं।

कब-कब विवादों में रही सालार मसूद दरगाह?

बहराइच की सालार मसूद दरगाह पिछले कुछ वर्षों में कई बार विवादों में रही है। 2025 में दरगाह में लगने वाले जेठ मेले और उर्स को लेकर भी बड़ा विवाद खड़ा हुआ, जब बहराइच प्रशासन ने कानून-व्यवस्था के मद्देनजर मेले की अनुमति देने से इनकार कर दिया। इसके बाद मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुँचा और कई दिनों तक राजनीतिक व सामाजिक बहस का विषय बना रहा।

जून 2026 में एक नया विवाद तब सामने आया, जब प्रदेश सरकार के मंत्री अनिल राजभर ने दरगाह परिसर का भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) से सर्वे कराने की माँग की। उनका कहना था कि दरगाह के ऐतिहासिक और पुरातात्विक पहलुओं की जाँच होनी चाहिए।

दिल्ली पुलिस ने कुछ गलत नहीं किया: जानिए कैसे पुलिसवालों के खिलाफ हिंसा भड़काने के लिए झूठ का जाल बुन रहे हैं अभिजीत दिपके

दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्र परीक्षाओं में गड़बड़ी के नाम पर शुरू हुआ प्रदर्शन अब पूरी तरह राजनीतिक अखाड़े में तब्दील हो चुका है। सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर अभिजीत दिपके और उनकी संस्था ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) पर शनिवार (20 जून 2026) को तय समय सीमा समाप्त होने के बाद भी जबरन सड़क रोकने और दिल्ली पुलिस के खिलाफ दुष्प्रचार करने के गंभीर आरोप लगे हैं। दिल्ली पुलिस ने नियम के मुताबिक शाम को अनुमति खत्म होने पर प्रदर्शनकारियों को शांति से हटने को कहा था, लेकिन दिपके और उनके साथियों ने वहां से हटने के बजाय सोशल मीडिया पर ‘विक्टिम कार्ड’ खेलना शुरू कर दिया।

प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि प्रशासन ने रात में उनकी बिजली काट दी और पानी-टॉयलेट की सुविधाएँ बंद कर दीं, जिसे बाद में बहाल कर दिया गया। हद तो तब हो गई जब अभिजीत दिपके ने सोशल मीडिया पर वीडियो और पोस्ट डालकर जनता को उकसाते हुए कहा, “पुलिस मुझे गिरफ्तार करने वाली है। मैं आप सभी से अपील करता हूँ कि अगर मुझे गिरफ्तार भी कर लिया जाए, तब भी देश भर में यह शांतिपूर्ण प्रदर्शन रुकना नहीं चाहिए!” दिल्ली पुलिस ने साफ किया है कि उनकी तरफ से कोई बल प्रयोग या शारीरिक कार्रवाई नहीं की गई है, बल्कि केवल कानून का पालन करने की हिदायत दी गई थी।

जानकारों का मानना है कि यह दिल्ली पुलिस के खिलाफ एक सोची-समझी ‘डॉग व्हिसलिंग’ (भीड़ को उकसाने की नीति) है, ताकि पुलिस को बल प्रयोग के लिए मजबूर किया जा सके। इस फ्लॉप शो को हिट बनाने के लिए अब इसमें परीक्षाओं के मूल मुद्दे को भटकाकर ‘मेरा लिंग, मेरी मर्जी’ और पुरुषों के साड़ी पहनने जैसे अजीबोगरीब वामपंथी एजेंडे शामिल कर लिए गए हैं।

यह रणनीति ठीक वैसी ही है जैसी अतीत में किसान आंदोलन के दौरान लाल किले की हिंसा और साल 2020 के दिल्ली दंगों से पहले अपनाई गई थी, जहाँ अफवाहें फैलाकर पुलिसकर्मियों पर जानलेवा हमले किए गए थे। सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेशों के बावजूद जंतर-मंतर पर टेंट गाड़ने और सड़कों को अनिश्चितकाल के लिए ब्लॉक करने की इस जिद के सामने दिल्ली पुलिस ने गजब के संयम और पेशेवर रवैये का परिचय दिया है। आइए, इस पूरे मामले को विस्तार से समझने की कोशिश करते हैं।

दिल्ली पुलिस का बेमिसाल संयम Vs अभिजीत दिपके का खतरनाक विक्टिम कार्ड

दिल्ली के ऐतिहासिक जंतर-मंतर से लेकर सोशल मीडिया के डिजिटल प्लेटफॉर्म्स तक, पिछले कुछ दिनों से एक बेहद सोची-समझी स्क्रिप्ट को अमलीजामा पहनाने की कोशिश की जा रही है। यह स्क्रिप्ट कोई नई नहीं है, बल्कि देश ने इसे पहले भी कई आंदोलनों के दौरान बार-बार देखा है। इस खेल का सीधा सा नियम है- पहले किसी मुद्दे के नाम पर प्रदर्शन की अनुमति माँगो, प्रशासन जब सहयोग करते हुए अनुमति दे दे तो चुपचाप प्रदर्शन करो, लेकिन जैसे ही अनुमति का निर्धारित समय समाप्त हो जाए, तो वहाँ से हटने के बजाय वहीं पर खूँटा गाड़कर बैठ जाओ। इसके बाद जब पुलिस कानून के दायरे में रहकर आपको वहाँ से हटने की हिदायत दे, तो तुरंत मोबाइल का कैमरा ऑन करो, चेहरे पर लाचारी का भाव लाओ और सोशल मीडिया पर ‘विक्टिम कार्ड’ खेलते हुए अफवाहें फैलाना शुरू कर दो।

इस बार इस पूरी पटकथा के मुख्य सूत्रधार बने हैं सोशल मीडिया के जरिए अपनी राजनीतिक जमीन तलाश रहे अभिजीत दिपके। इस पूरे ड्रामे के बीच जो सबसे बड़ा सच दबाने की कोशिश की जा रही है, वो यह है कि दिल्ली पुलिस ने पूरे मामले में रत्ती भर भी कुछ गलत नहीं किया है। पुलिस ने तो प्रदर्शनकारियों को पूरा सहयोग दिया, लेकिन दिपके और उनके साथी जानबूझकर कानून व्यवस्था को ऐसी स्थिति में धकेलना चाहते हैं जहाँ पुलिस को मजबूरन बल प्रयोग करना पड़े और इन्हें अपनी फ्लॉप हो चुकी राजनीति को चमकाने का एक नया बहाना मिल जाए।

नियमों को ठेंगा और जंतर-मंतर को पिकनिक स्पॉट बनाने की सोची-समझी जिद

हमारा देश और इसकी व्यवस्था किसी एक व्यक्ति की सनक से नहीं, बल्कि स्थापित कानूनों और नियमों से चलती है। दिल्ली का जंतर-मंतर भले ही देश में विरोध प्रदर्शनों का एक प्रमुख केंद्र रहा हो, लेकिन वहाँ किसी भी आयोजन के लिए दिल्ली पुलिस और स्थानीय प्रशासन से एक निश्चित समय सीमा तक की लिखित अनुमति लेनी अनिवार्य होती है।

अभिजीत दिपके की संस्था ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ को भी इसी नियम के तहत जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की बकायदा अनुमति दी गई थी। उन्होंने दिनभर वहाँ अपना कार्यक्रम किया भी, लेकिन असली तमाशा तब शुरू हुआ जब अनुमति का समय समाप्त हो गया। जैसे ही शाम को तय वक्त खत्म हुआ, पुलिस ने एक बेहद सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत उन्हें शांतिपूर्वक वहाँ से जाने के लिए कहा।

यह एक ऐसा नियम है जो देश के हर आम और खास नागरिक पर समान रूप से लागू होता है। मगर दिपके ने कानून का सम्मान करने के बजाय वहाँ से हटने से साफ इनकार कर दिया और सोशल मीडिया को अपना नया हथियार बना लिया। उन्होंने इंटरनेट पर यह दुष्प्रचार शुरू कर दिया कि प्रशासन ने उनकी बिजली काट दी है और पानी-टॉयलेट की सुविधाएँ बंद कर दी हैं, जबकि हकीकत यह थी कि सुरक्षा और कानून व्यवस्था को बनाए रखने के लिए कुछ समय की प्रशासनिक मुस्तैदी के बाद सभी आवश्यक नागरिक सुविधाएँ बहाल थीं।

सोचने वाली बात यह है कि जब आपके पास उस जगह पर रुकने की कोई कानूनी वैधता ही नहीं बची, तो आप वहाँ जबरन क्यों डटे हुए हैं? दिपके और उनके मुट्ठी भर साथी अब जंतर-मंतर की उस संवेदनशील सड़क पर क्रिकेट खेल रहे हैं। यह दृश्य अपने आप में हास्यास्पद और गंभीर दोनों है। क्या जंतर-मंतर जैसी संवेदनशील जगह प्रदर्शन के लिए है या उसे किसी पिकनिक स्पॉट या खेल के मैदान में तब्दील कर दिया जाना चाहिए?

असल में प्रदर्शनकारियों की तरफ से यह दलील देना कि “अगर हमें जंतर-मंतर से हटाना है तो प्रदर्शन के लिए कोई स्थायी जगह दो” ये कुछ और नहीं बल्कि वहाँ अवैध रूप से टेंट गाड़ने की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। यह ठीक उसी पुराने ढर्रे पर चल रहा है जो कभी अन्ना आंदोलन के शुरुआती दिनों में देखा गया था, जहाँ शुरुआत में प्रशासन प्रदर्शनकारियों को नजरअंदाज करता है, फिर वह जगह एक पिकनिक स्पॉट में बदलती है और देखते ही देखते वहाँ पक्के तंबू तन जाते हैं। इसके बाद धीरे-धीरे वामपंथी विचारधारा के सेलिब्रिटी, विपक्ष के तमाम बड़े नेता और खास एजेंडे वाले चेहरे वहाँ अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेकने और कैमरे के सामने फोटो खिंचवाने पहुँचने लगते हैं ताकि किसी न किसी बहाने यह पूरा तमाशा राष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियों में बना रहे।

झूठी गिरफ्तारी का खौफ पैदा कर दिल्ली पुलिस के खिलाफ डॉग व्हिसलिंग का खेल

अभिजीत दिपके ने हद तो तब कर दी जब उन्होंने सोशल मीडिया पर बाकायदा एक भावुक पोस्ट साझा करते हुए लिखा कि पुलिस उन्हें किसी भी वक्त गिरफ्तार करने वाली है। उन्होंने अपने समर्थकों से अपील कर डाली कि अगर वे गिरफ्तार भी हो जाएँ, तो देशव्यापी शांतिपूर्ण प्रदर्शन थमना नहीं चाहिए।

अब इस पूरे बयान के पीछे छिपी क्रूर सच्चाई को समझिए। दिल्ली पुलिस ने दिपके या उनके साथियों पर न तो कोई लाठी चलाई, न ही उन्हें शारीरिक रूप से वहाँ से घसीटकर हटाया। पुलिस के जवान बेहद शालीनता से कानून का पालन करने की अपील कर रहे थे, लेकिन दिपके इस बात को बखूबी जानते हैं कि जब तक वे खुद को एक ‘बेचारे’ और ‘सताए हुए’ एक्टिविस्ट के रूप में पेश नहीं करेंगे, तब तक उन्हें सोशल मीडिया पर लाइक्स, शेयर्स और री-ट्वीट्स की वो अटेंशन नहीं मिलेगी जिसके वो भूखे हैं।

यह पूरी कवायद सीधे तौर पर दिल्ली पुलिस के खिलाफ ‘डॉग व्हिसलिंग’ यानी इशारों-इशारों में अपनी हिंसक भीड़ को उकसाने की एक बेहद खतरनाक कोशिश है। जब आप अपने मंच से यह झूठ फैलाते हैं कि पुलिस आपके खिलाफ दमनकारी नीति अपना रही है और आपको जेल में डालने वाली है, तो आप अनजाने में नहीं, बल्कि जानबूझकर अपने समर्थकों के दिलों में कानून के रखवालों के प्रति नफरत और गुस्से का जहर घोल रहे होते हैं। आप उस भीड़ को इस बात के लिए तैयार कर रहे होते हैं कि वे पुलिसकर्मियों को अपना दुश्मन समझें और उन पर हमला कर दें। इतिहास गवाह है कि इस तरह की गैर-जिम्मेदाराना बयानबाजी और अफवाहों का अंत हमेशा बेहद हिंसक और दुखद रहा है।

अतीत के खूनी सबक और उकसावे की राजनीति का भुक्तभोगी इतिहास

जब हम दिपके की इस उकसावे वाली रणनीति को देखते हैं, तो हमें अतीत की उन दो बड़ी और भयावह घटनाओं को कभी नहीं भूलना चाहिए जिन्होंने दिल्ली को हिलाकर रख दिया था। सबसे पहला उदाहरण है किसान आंदोलन के नाम पर हुई लाल किले की हिंसा। उस आंदोलन के दौरान भी प्रदर्शनकारियों ने महीनों तक दिल्ली की सीमाओं को बंधक बनाए रखा, सड़कों पर तंबू गाड़े और अपनी समानांतर व्यवस्था खड़ी कर ली। दिल्ली पुलिस ने महीनों तक असीम धैर्य का परिचय दिया, लेकिन आंदोलन के तथाकथित नेताओं और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स ने लगातार यह झूठ फैलाया कि सरकार और पुलिस किसानों को कुचलना चाहती है।

इस उकसावे का अंतिम परिणाम देश ने 26 जनवरी के पावन दिन देखा, जब दिल्ली की सड़कों पर सरेआम तलवारें लहराई गईं, बैरिकेड्स तोड़े गए और लाल किले की प्राचीर पर चढ़कर देश के तिरंगे का अपमान करते हुए एक धार्मिक ध्वज फहरा दिया गया। उस दिन सैकड़ों पुलिसकर्मियों को ट्रैक्टरों से कुचलने का प्रयास किया गया, उन्हें ऊँचाइयों से नीचे खाई में धकेल दिया गया, लेकिन पुलिस ने तब भी संयम नहीं खोया।

ठीक ऐसा ही खूनी खेल साल 2020 के दिल्ली दंगों के दौरान भी खेला गया था। नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के विरोध की आड़ में शाहीन बाग जैसी जगहों पर सड़कें रोकी गईं और इंटरनेट पर यह अफवाहें फैलाई गईं कि पुलिस एक खास समुदाय को निशाना बना रही है। मंचों से भड़काऊ और जहरीले भाषण दिए गए जिसका नतीजा उत्तर-पूर्वी दिल्ली में भीषण हिंदू विरोधी दंगों के रूप में सामने आया।

उस हिंसा में पेट्रोल बमों और अवैध हथियारों से पूरी दिल्ली को दहला दिया गया, जिसमें दिल्ली पुलिस के हेड कांस्टेबल रतन लाल की बेरहमी से हत्या कर दी गई और आईबी अधिकारी अंकित शर्मा के शरीर पर चाकुओं के अनगिनत घाव कर उनकी लाश को नाले में फेंक दिया गया।

यह दोनों ऐतिहासिक उदाहरण इस बात के गवाह हैं कि जब-जब दिपके जैसे लोग पुलिस के खिलाफ अफवाहें फैलाकर जनता को उकसाते हैं, तब-तब उसका खामियाजा सड़क पर खड़े आम पुलिस के जवानों को अपनी जान देकर चुकाना पड़ता है।

फ्लॉप शो को हिट बनाने का आखिरी पैंतरा और भटकता हुआ एजेंडा

दरअसल, अभिजीत दिपके और उनके सहयोगियों की असली हताशा और बौखलाहट इस बात से पैदा हो रही है कि उनका यह पूरा आंदोलन जनता के बीच बुरी तरह ‘फ्लॉप’ साबित हुआ है। इस आंदोलन की शुरुआत में रणनीतिकारों को यह पूरी उम्मीद थी कि दिल्ली पुलिस पहले ही दिन जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति देने से इनकार कर देगी, जिससे उन्हें तुरंत हंगामा करने, खुद को पीड़ित दिखाने और मीडिया की सुर्खियाँ बटोरने का मौका मिल जाएगा।

लेकिन दिल्ली पुलिस ने बेहद समझदारी दिखाते हुए उनकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया और उन्हें नियमपूर्वक प्रदर्शन करने की इजाजत दे दी, जिसके कारण उनका पहला प्रदर्शन पूरी तरह बेअसर रहा। इसके बाद उन्होंने लखनऊ, पुणे, नागपुर और जयपुर जैसे अन्य बड़े शहरों में भी इस तरह के प्रदर्शन आयोजित करने की कोशिश की, लेकिन देश के जागरूक युवाओं और आम जनता ने इस नौटंकी को पूरी तरह खारिज कर दिया।

जब दिपके ने देखा कि छात्र आंदोलन और परीक्षाओं की पारदर्शिता के नाम पर शुरू हुआ यह तमाशा पूरी तरह बिखर रहा है, तो उन्होंने इस आंदोलन के मूल मुद्दे को ही बदल दिया। जो प्रदर्शन देश के छात्रों की परीक्षाओं और उनके भविष्य को लेकर शुरू हुआ था, उसमें अचानक ‘मेरा लिंग, मेरी मर्जी’, ‘मेरा जेंडर, मेरी मर्जी’ और पुरुषों के साड़ी पहनने जैसे बेहद अजीबोगरीब और भटकाने वाले वामपंथी एजेंडे शामिल कर लिए गए।

जब देश के आम छात्रों ने देखा कि उनके नाम पर कुछ लोग अपनी व्यक्तिगत और वैचारिक राजनीति चमका रहे हैं, तो उन्होंने इस आंदोलन से पूरी तरह दूरी बना ली। अब जब इस आंदोलन के पास न तो भीड़ बची है और न ही जनता का समर्थन, तो इनके पास सिर्फ एक ही आखिरी पैंतरा बचा है कि जैसे भी हो, पुलिस को उकसाकर बल प्रयोग करने पर मजबूर किया जाए ताकि गिरती हुई राजनीतिक साख को दोबारा जिंदा किया जा सके।

क्या दिल्ली पुलिस इस राजनीतिक चक्रव्यूह को भेदने के लिए तैयार है?

यह पूरा मामला अब किसी कानून व्यवस्था की समस्या से ज्यादा एक विशुद्ध राजनीतिक मसला बन चुका है। देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट दिशा-निर्देश हैं कि कोई भी व्यक्ति या समूह विरोध प्रदर्शन के अधिकार के नाम पर सार्वजनिक सड़कों, फुटपाथों या सरकारी जगहों को अनिश्चितकाल के लिए ब्लॉक नहीं कर सकता।

कानून के मुताबिक, यदि कोई प्रदर्शनकारी समय सीमा खत्म होने के बाद भी स्वेच्छा से उस जगह को खाली नहीं करता है, तो प्रशासन के पास कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए हल्का बल प्रयोग करने का पूरा अधिकार है।

लेकिन दिल्ली पुलिस अभिजीत दिपके के इस चक्रव्यूह और उनकी गहरी साजिश को अच्छी तरह समझती है। पुलिस जानती है कि दिपके और उनके साथी इसी ताक में बैठे हैं कि कब कोई पुलिसकर्मी उन पर हाथ उठाए या लाठी चलाए, और कब वे उस फुटेज को दुनिया भर में दिखाकर खुद को लोकतंत्र का सिपाही घोषित कर सकें।

यही वजह है कि दिल्ली पुलिस ने गजब के धैर्य, पेशेवर रवैये और प्रशासनिक सहयोग का परिचय दिया है। पुलिस ने बिना किसी बल प्रयोग के केवल संवाद और कानून के दायरे में रहकर स्थिति को संभाला है। अब देश के युवाओं और जागरूक नागरिकों को यह तय करना होगा कि क्या वे सोशल मीडिया पर बैठकर देश में अराजकता फैलाने वाले ऐसे फ्लॉप नेताओं के भड़काऊ वीडियो के बहकावे में आएँगे या फिर धरातल पर मुस्तैदी से अपनी ड्यूटी कर रही दिल्ली पुलिस के इस बेमिसाल संयम और सच का साथ देंगे।

जो कभी AIMIM-कॉन्ग्रेस का रहा था प्रचार, उसके पोस्टर अब CJP के प्रदर्शन में चमके: जानिए कौन है US से युवाओं को भड़काने और पुलिस को धमकाने वाला उस्मान अली?

जैसा कि 20 जून 2026 को दिल्ली का जंतर-मंतर एक बार फिर विवादित NEET मुद्दे पर नए विरोध प्रदर्शनों का केंद्र बन गया, तो इसी बीच ऑपइंडिया ने अमेरिका में रहने वाले सोशल मीडिया ‘एक्टिविस्ट’ की प्रदर्शनों में छाप का पता लगाया। इसमें पता चला कि उसका असर सिर्फ डिजिटल दुनिया तक ही सीमित नहीं था बल्कि दिल्ली की सड़कों तक भी फैला हुआ था।

कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का यह प्रदर्शन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान और सरकार के खिलाफ NEET से जुड़ी शिकायतों को लेकर युवाओं के मुद्दों पर केंद्रित कर एक आंदोलन की तरह पेश किया गया। लेकिन ग्राउंड रिपोर्टिंग में ऐसे सबूत मिले कि इस आंदोलन को ऐसे लोग हवा दे रहे थे जिनका इसमें कोई सीधा मतलब भी नहीं निकलता था औऱ हजारों मील दूर से युवाओं को उकसा रहे थे।

ऐसा ही एक व्यक्ति उस्मान फैजान अली का नाम सामने आया, जो अमेरिका में रहता है और खुद को सोशल मीडिया एक्टिविस्ट बताता है। वह सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के जरिए भारतीय युवाओं को भड़काने, उन्हें संगठित करने और अधिकारियों के साथ टकराव के लिए भावनात्मक रूप से प्रेरित करने का काम कर रहा था।

जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान कई लोग ऐसे पोस्टर और प्लेकार्ड लिए हुए दिखाई दिए, जिन पर सोशल मीडिया कमेंटेटर ध्रुव राठी, एक्टिविस्ट अभिजीत दिपके और अभिनेत्री राखी सावंत की तस्वीरें लगी थीं। लेकिन इन पोस्टरों को ध्यान से देखने पर एक खास बात सामने आई। कई पोस्टरों पर एक दाढ़ी वाले व्यक्ति की तस्वीर भी प्रमुखता से छपी हुई थी, जिसकी पहचान ‘इंडियन उस्मान फैजान अली- फ्रॉम USA’ के रूप में की गई थी।

इस खुलासे के बाद कई सवाल खड़े हो गए। सबसे बड़ा सवाल यह था कि जिस प्रदर्शन को छात्रों और स्थानीय कार्यकर्ताओं का आंदोलन बताया जा रहा था, उसमें विदेश में रहने वाले एक ‘एक्टिविस्ट’ की तस्वीर वाले पोस्टर आखिर क्यों दिखाई दे रहे थे? और उससे भी जरूरी बात यह है कि उन पोस्टरों को लेकर चल रहे लोगों में से कितने लोग वास्तव में जानते थे कि उस्मान फैजान अली कौन हैं?

जब ऑपइंडिया ने प्रदर्शन स्थल पर मौजूद कई प्रदर्शनकारियों से बात की, तो उनके जवाब चौंकाने वाले थे। कई लोगों ने माना कि उन्हें उस्मान फैजान अली के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। एक युवा प्रदर्शनकारी ने खुलकर बताया कि उसे यह पोस्टर आयोजकों की तरफ से दिया गया था और उसे यह भी नहीं पता था कि पोस्टर पर जिसकी तस्वीर लगी है, वह कौन है। अन्य प्रदर्शनकारियों से भी इसी तरह के जवाब मिले।

यह विरोधाभास एक व्यापक रणनीति की ओर इशारा करता है। अली किसी आंदोलन को स्वाभाविक रूप से खड़ा करने के बजाए उसे हाईजैक करने की कोशिश करते दिख रहे हैं, आक्रोश पैदा कर रहे हैं और जमीनी स्तर पर आसानी से प्रभावित होने वाले युवाओं को सुनियोजित प्रचार सामग्री वितरित करके जनता के गुस्से को निर्देशित कर रहे हैं।

उनकी सोशल मीडिया गतिविधियों पर नजर डालने से भी ऐसा ही पैटर्न दिखाई देता है। उस्मान अली मुख्य रूप से @bbm_india_ नाम के इंस्टाग्राम अकाउंट के जरिए सक्रिय हैं और पिछले कई हफ्तों से CJP के प्रदर्शनों से जुड़ी बेहद भावनात्मक और उग्र कंटेन्ट साझा कर रहे हैं। उस्मान के वीडियो सिर्फ प्रदर्शनकारियों का समर्थन करने तक सीमित नहीं हैं। इनमें बार-बार यह माहौल बनाने की कोशिश की जाती है कि यह आंदोलन नाराज युवाओं और भारतीय सरकार के बीच एक बड़ी लड़ाई है।

उस्मान के कंटेंट में भावनात्मक भाषा, आक्रामक संदेश और युवाओं को यह विश्वास दिलाने की कोशिश बार-बार दिखाई देती है कि वे किसी ऐतिहासिक आंदोलन का हिस्सा हैं। इसका उद्देश्य साफ नजर आता है। किसी सार्वजनिक मुद्दे को लेकर लोगों की नाराजगी को बड़े पैमाने पर ऐसे आंदोलन में बदलना, जो गुस्से और टकराव से प्रेरित हो।

इसका एक प्रमुख उदाहरण 1 जून 2026 को देखने को मिला, जब उस्मान अली ने दिल्ली पुलिस को संबोधित करते हुए एक वीडियो पोस्ट किया। इस वीडियो में शांतिपूर्ण प्रदर्शन की अपील करने के बजाय चेतावनी जैसा लहजा दिखाई दिया। उन्होंने दिल्ली पुलिस से कहा कि CJP कार्यकर्ताओं और अभिजीत दिपके के समर्थकों को जंतर-मंतर पर जुटने की अनुमति देने से पहले बड़ी संख्या में पुलिस बल तैनात किया जाए।

वीडियो में उन्होंने बार-बार लोगों की ऐसी ‘सुनामी’ आने की बात कही, जिसे रोकना या नियंत्रित करना अधिकारियों के लिए मुश्किल होगा। उस्मान अली के बयान में यह संदेश देने की कोशिश दिखाई दी कि भीड़ इतनी बड़ी होगी कि प्रशासन के किसी भी प्रयास को पीछे छोड़ सकती है।

यहाँ उस्मान की भाषा काफी ध्यान देने वाली थी। शांतिपूर्ण और कानूनी तरीके से लोकतांत्रिक भागीदारी को बढ़ावा देने के बजाय, उस्मान अली ऐसा माहौल बनाने की कोशिश कर रहा है कि जिससे टकराव पैदा हो। CJP के समर्थकों तक यह संदेश पहुँचाने की कोशिश की गई कि वे एक ऐसी ताकत का हिस्सा हैं जो सरकार को चुनौती देने की क्षमता रखती है।

इस तरह की भावनात्मक और आक्रामक भाषा का इस्तेमाल अक्सर वे लोग करते हैं जो भीड़ को भावनात्मक रूप से भड़काना चाहते हैं और समर्थकों को धीरे-धीरे अधिक आक्रामक रवैया अपनाने के लिए प्रेरित करते हैं।

स्थिति को और गंभीर बनाने वाली बात यह है कि ये संदेश विदेश में बैठे एक व्यक्ति की ओर से दिए जा रहे थे। एक तरफ भारतीय युवाओं को सड़कों पर उतरने, पुलिस कार्रवाई का सामना करने और कानूनी जोखिम उठाने के लिए प्रेरित किया जा रहा था, वहीं दूसरी तरफ इन संदेशों को देने वाला व्यक्ति खुद विदेश में सुरक्षित माहौल में मौजूद था और किसी भी संभावित परिणाम से दूर था।

उस्मान अली का चिट्ठा सिर्फ इतना ही नहीं है। जब से CJP को सोशल मीडिया पर पहचान और समर्थन मिलने लगा, तब से वह ‘कॉकरोचेज’ को संगठित और सक्रिय करने के लिए लगातार ऐसे भड़काऊ पोस्ट साझा कर रहा है। बीते दिन भी उस्मान ने एक नया वीडियो पोस्ट किया, जिसमें जमीन पर चल रही घटनाओं को प्रभावित करने की कोशिश दिखाई दी। इस बार उन्होंने सार्वजनिक रूप से दिल्ली पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों से प्रदर्शन की अनुमति देने की अपील की। हालाँकि इस अपील के साथ एक अप्रत्यक्ष चेतावनी जैसा संदेश भी जुड़ा हुआ था।

वीडियो में बार-बार यह संकेत दिया गया कि अगर प्रदर्शनकारियों को रोका गया, तो इससे अशांति और अस्थिरता की स्थिति पैदा हो सकती है। इस तरह के संदेशों के जरिए उस्मान ने प्रशासन पर दबाव बनाने और समर्थकों के बीच तनावपूर्ण माहौल तैयार करने की कोशिश की।

यह अली का ऐसा तरीका है जिससे वह खुद को सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराए जाने से बचा लेता है, लेकिन लोगों की भावनाओं को भड़काता भी रहता है। वह खुलकर हिंसा की बात नहीं करता, लेकिन बार-बार ऐसा माहौल बनाता है कि अगर प्रशासन कोई कार्रवाई करेगा तो टकराव होना तय है। इसका असर यह होता है कि लोगों में तनाव बढ़ता है, पुलिस और प्रशासन पर भरोसा कम होता है और उसके समर्थक हर सरकारी कार्रवाई को अपने ऊपर अत्याचार की तरह देखने लगते हैं। और यह सब वह अमेरिका में बैठकर कर रहा है, जबकि खुद को भारत में लोकतंत्र बचाने की लड़ाई लड़ने वाला बताता है।

अली की सोशल मीडिया गतिविधियों को देखने पर लगता है कि यह कोई एक-दो बार की बात नहीं है, बल्कि काफी समय से चला आ रहा उसका तरीका है। उसके सोशल मीडिया अकाउंट्स पर ज्यादातर पोस्ट लोगों के गुस्से को बढ़ाने, विपक्षी विचारों को ज्यादा से ज्यादा फैलाने और राजनीतिक मतभेदों को संघर्ष और विरोध की नजर से दिखाने पर केंद्रित रहती हैं।

उसका यूट्यूब चैनल “Button Ballot Movement by Osman Faizan Ali” भी उसके राजनीतिक मकसदों की झलक देता है। हालाँकि आज यह चैनल ज्यादा सक्रिय नहीं है, लेकिन पुराने वीडियो और सामग्री से पता चलता है कि वह लंबे समय से विदेश में रहते हुए भी भारतीय राजनीति को प्रभावित करने की कोशिश करता रहा है।

13 मई 2024 को अपलोड की गई एक ऑडियो रिकॉर्डिंग में उस्मान अली ने हैदराबाद और सिकंदराबाद के मतदाताओं से सीधे अपील की थी। इस रिकॉर्डिंग में उसने लोगों से कहा कि वे रणनीतिक तरीके से AIMIM और कॉन्ग्रेस उम्मीदवारों को वोट दें, ताकि भाजपा को हराया जा सके। उसके संदेश का फोकस किसी खास नीति, योजना या विकास के मुद्दे पर नहीं था, बल्कि एक राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी को संगठित वोटिंग के जरिए हराने पर था।

यह ऑडियो रिकॉर्डिंग दिखाती है कि उस्मान अली का ‘एक्टिविज्म’ केवल छात्र मुद्दों या सामाजिक अभियानों तक सीमित नहीं हैं। इसके बजाय यह एक ऐसे पैटर्न की ओर इशारा करती है, जिसमें वह विदेश में रहते हुए भारत की राजनीतिक बहस और चुनावी परिणामों को प्रभावित करने की कोशिश करते दिखाई देते हैं।

आज के समय में उस्मान का CJP के प्रति समर्थन किसी पुराने वैचारिक जुड़ाव या लंबे समय से चली आ रही प्रतिबद्धता का परिणाम नहीं लगता। बल्कि ऐसा प्रतीत होता है कि वह युवाओं के एक वर्ग के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रहे इस वायरल इंटरनेट ट्रेंड का फायदा उठाने की कोशिश कर रहा है। समय और हालात के साथ उसकी राजनीतिक स्थिति और रुख भी बदलते रहे हैं।

जैसा कि 2024 में देखा गया था, उस्मान अली हैदराबाद और सिकंदराबाद के मतदाताओं से AIMIM और कॉन्ग्रेस उम्मीदवारों का समर्थन करने की खुलकर अपील कर रहे थे, ताकि भाजपा को हराया जा सके। ऐसे में CJP के प्रति उनका मौजूदा समर्थन किसी ठोस वैचारिक प्रतिबद्धता से अधिक राजनीतिक अवसरवाद जैसा प्रतीत होता है। ऐसा लगता है कि उसकी सक्रियता किसी तय विचारधारा या सिद्धांतों पर आधारित नहीं है। बल्कि वह उन आंदोलनों और मुद्दों के साथ जुड़ता दिखाई देता है, जिनसे उसे सबसे ज्यादा लोगों का ध्यान और समर्थन मिलने की संभावना होती है। 2024 तक अली AIMIM और कॉन्ग्रेस के समर्थन में प्रचार कर रहा था और भाजपा को चुनावी तौर पर चुनौती देने की बात कर रहा था। वहीं आज वह CJP के नेतृत्व वाले आंदोलन का खुलकर समर्थन करता नजर आ रहा है।

जंतर-मंतर पर हुई घटनाओं से पता चलता है कि सोशल मीडिया ने राजनीतिक लामबंदी के तरीके को कैसे बदल दिया है। पहले विरोध प्रदर्शनों का संचालन मुख्य रूप से जमीन पर मौजूद लोग करते थे और वे अपने कामों के लिए जवाबदेह होते थे। लेकिन आज, हज़ारों किलोमीटर दूर बैठे एक्टिविस्ट एक बटन दबाकर नैरेटिव बना सकते हैं, प्रोपेगैंडा तैयार कर सकते हैं, कैंपेन का मैटीरियल बाँट सकते हैं और बड़ी भीड़ के व्यवहार को प्रभावित कर सकते हैं।

इस मामले की सबसे चिंताजनक बात यह है कि जिन युवाओं को निशाना बनाया जा रहा है, उनमें से कई को पूरी जानकारी भी नहीं है। जंतर-मंतर पर उस्मान अली के पोस्टर लेकर चल रहे कई प्रदर्शनकारियों को यह तक नहीं पता था कि वह कौन हैं। इसके बावजूद वे अनजाने में उस्मान की छवि और संदेश को आगे बढ़ाने का काम कर रहे थे।

इसी वजह से कई गंभीर सवाल खड़े होते हैं। कितने युवा ऐसे कंटेंट को देख रहे हैं, बिना यह समझे कि उसके पीछे की मंशा क्या है? कितनों को संस्थाओं के साथ टकराव को एक सकारात्मक या वांछनीय परिणाम के रूप में देखने के लिए प्रेरित किया जा रहा है? और कितने लोग यह समझते हैं कि उन्हें जोखिम उठाने के लिए प्रोत्साहित करने वाले लोग अक्सर खुद उन परिणामों का सामना नहीं करते?

जंतर-मंतर का यह प्रदर्शन एक नए तरह की राजनीति की तस्वीर दिखाता है, जहाँ विदेश में बैठे सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर स्थानीय मुद्दों और लोगों की नाराजगी का इस्तेमाल अपने बड़े राजनीतिक मकसदों के लिए करने की कोशिश करते हैं। लगातार भड़काऊ कंटेंट दिखाकर, सरकारी संस्थाओं को दुश्मन की तरह पेश करके और प्रदर्शनों को सरकार के साथ सीधी लड़ाई बताकर, उस्मान फैजान अली जैसे लोग लोगों की नाराजगी को संगठित विरोध में बदलने की कोशिश करते हैं।

जबकि धरने-प्रदर्शन में शामिल लोगों को गिरफ्तारी, कानूनी कार्रवाई या हालात बिगड़ने पर हिंसा जैसी मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है, वहीं विदेश में बैठकर लोगों को उकसाने वाले लोग इन खतरों से दूर रहते हैं। ऐसे में जोखिम युवाओं को उठाना पड़ता है, जबकि पहचान और राजनीतिक फायदा सोशल मीडिया पर सक्रिय लोगों को मिलता है।

इसलिए जंतर-मंतर प्रदर्शन में उस्मान फैजान अली की तस्वीर का प्रमुखता से दिखना सिर्फ एक सामान्य बात नहीं है। यह दिखाता है कि विदेश में बैठा एक सोशल मीडिया एक्टिविस्ट किस तरह भारत के एक आंदोलन से खुद को जोड़ने, युवाओं में गुस्सा बढ़ाने और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए उन्हें टकराव की ओर धकेलने की कोशिश कर रहा है।

यह घटना याद दिलाती है कि सोशल मीडिया के दौर में राजनीतिक हलचल सिर्फ सड़कों पर मौजूद लोगों से नहीं बनती। अब ऐसे लोग भी उस पर असर डाल रहे हैं, जो हजारों किलोमीटर दूर बैठे हैं, लेकिन इंटरनेट के जरिए लोगों को प्रभावित करने, संगठित करने और आंदोलनों को दिशा देने की कोशिश कर रहे हैं।

(मूलरूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है, जिसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)

हर पीढ़ी अपने पिता के खिलाफ विद्रोह करती है: तुर्गनेव का उपन्यास और भारतीय परिवारों का बदलता चेहरा

कुछ किताबें अपने समय की कहानी कहती हैं। कुछ किताबें अपने समाज का दस्तावेज़ बन जाती हैं। और कुछ किताबें ऐसी होती हैं जो समय और भूगोल दोनों को पार कर जाती हैं। वे मनुष्य के स्वभाव को समझने की चाबी बन जाती हैं।

इवान तुर्गनेव का 1862 में प्रकाशित उपन्यास Fathers and Sons ऐसी ही एक कृति है। पहली नज़र में यह रूस के एक विशेष ऐतिहासिक दौर की कहानी लगती है। एक ऐसा रूस जो सामंतवाद से आधुनिकता की ओर बढ़ रहा था। जहाँ पुरानी अभिजात संस्कृति और नई वैज्ञानिक चेतना के बीच टकराव शुरू हो चुका था। लेकिन यदि आप इस उपन्यास को केवल रूस की कहानी समझते हैं तो आप इसकी सबसे बड़ी शक्ति को नहीं समझते।

क्योंकि यह पुस्तक वास्तव में किसी देश की ना होकर हर परिवार की कहानी है। यह पिता और पुत्र की कहानी है। यह परंपरा और आधुनिकता की कहानी है। यह उस क्षण की कहानी है जब एक पीढ़ी दुनिया को बदलना चाहती है और दूसरी पीढ़ी उसे बचाकर रखना चाहती है। और इसी कारण, फादर्स डे पर शायद Fathers and Sons से अधिक प्रासंगिक कोई उपन्यास नहीं हो सकता।

बाज़ारोव: वह युवक जो हर मूर्ति तोड़ देना चाहता था

उपन्यास का केंद्रीय पात्र येवगेनी बाज़ारोव है। रूसी साहित्य के इतिहास में शायद ही कोई पात्र इतना प्रभावशाली रहा हो। बाज़ारोव स्वयं को निहिलिस्ट कहता है। आज यह शब्द बहुत लोगों को केवल दार्शनिक अवधारणा जैसा लग सकता है, लेकिन तुर्गनेव के समय में इसका अर्थ था, हर उस चीज़ को नकार देना जिसे समाज पवित्र मानता है।

परंपरा? नकार दो।
कला? बेकार।
कविता? समय की बर्बादी।
धर्म? अंधविश्वास।
रोमांस? रासायनिक प्रतिक्रिया।

बाज़ारोव का सबसे प्रसिद्ध कथन है –  “एक अच्छा केमिस्ट बीस कवियों से अधिक उपयोगी है।”

यह पूरी एक पीढ़ी का घोषणापत्र था। आज के भारत में भी हमें ऐसे बाज़ारोव हर जगह दिखाई देते हैं। वे सोशल मीडिया पर हैं। विश्वविद्यालयों में हैं। स्टार्टअप्स में हैं। वे हर स्थापित सत्य से प्रश्न पूछते हैं। वे कहते हैं कि यदि कोई परंपरा तर्क की कसौटी पर खरी नहीं उतरती तो उसे बचाए रखने का कोई कारण नहीं।

वे वंश, जाति, कुल, परंपरा, सामाजिक प्रतिष्ठा और सांस्कृतिक रूढ़ियों को चुनौती देते हैं। और ठीक वैसे ही जैसे उपन्यास में होता है, पुरानी पीढ़ी उन्हें अक्सर अहंकारी, विद्रोही या संस्कारहीन मानती है। लेकिन तुर्गनेव की महानता यह है कि वे बाज़ारोव का उपहास नहीं उड़ाते। वे उसके भीतर की ईमानदारी को पहचानते हैं। बाज़ारोव झूठ नहीं बोलता।

वह जो मानता है, उसी पर जीता है। समस्या उसके विचारों में नहीं, उसके पूर्ण आत्मविश्वास में है। उसे लगता है कि मनुष्य को पूरी तरह तर्क से समझा जा सकता है। और यहीं से उसकी त्रासदी शुरू होती है।

निकोलई: वह पिता जिसे इतिहास अक्सर भूल जाता है

उपन्यास के सबसे कम चर्चित लेकिन सबसे महत्वपूर्ण पात्रों में से एक हैं निकोलई किर्सानोव। वे कोई महान दार्शनिक नहीं हैं। कोई योद्धा नहीं हैं। कोई क्रांतिकारी नहीं हैं। वे केवल एक पिता हैं। और शायद इसी कारण इतने महत्वपूर्ण हैं। निकोलई उस पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं जो बदलती दुनिया को देखकर घबराती भी है और उसे स्वीकार भी करना चाहती है। वे अपने बेटे अर्कादी से प्रेम करते हैं। इतना प्रेम कि जब बेटा विश्वविद्यालय से लौटता है तो उनकी खुशी छिपाए नहीं छिपती। लेकिन उसी क्षण उन्हें यह भी महसूस होता है कि उनका बेटा अब पहले वाला नहीं रहा।

उसकी भाषा बदल गई है। उसके विचार बदल गए हैं। उसके आदर्श बदल गए हैं। आज का भारत ऐसे निकोलई से भरा पड़ा है। वे पिता जो अपने बच्चों को विदेश भेजते हैं। उनके लिए लैपटॉप खरीदते हैं। उन्हें अपनी पसंद का करियर चुनने देते हैं। लेकिन भीतर कहीं यह भय भी रहता है कि कहीं आधुनिकता की दौड़ में उनका बच्चा उनसे दूर न हो जाए।

निकोलई किसी विचारधारा का प्रतिनिधित्व नहीं करते। वे उस मौन प्रेम का प्रतिनिधित्व करते हैं जो पिता अक्सर व्यक्त नहीं कर पाते।

पावेल: परंपरा की आखिरी तलवार

यदि निकोलई उदार परंपरा हैं, तो पावेल किर्सानोव उसकी कठोरता हैं। वे सम्मान, मर्यादा, प्रतिष्ठा और शिष्टाचार की दुनिया से आते हैं। उनके लिए जीवन केवल उपयोगिता का प्रश्न नहीं है। उनके लिए कुछ मूल्य ऐसे हैं जिनकी रक्षा किसी भी कीमत पर होनी चाहिए।

जब बाज़ारोव इन मूल्यों का मज़ाक उड़ाता है तो पावेल इसे केवल वैचारिक असहमति नहीं मानते। उन्हें लगता है कि यह पूरी सभ्यता पर हमला है। यहीं से दोनों के बीच तनाव बढ़ता है। और अंततः यह तनाव उस प्रसिद्ध द्वंद्व युद्ध तक पहुँचता है।

वह द्वंद्व जो वास्तव में दो व्यक्तियों का नहीं था

Fathers and Sons का सबसे प्रतीकात्मक अध्याय है पावेल और बाज़ारोव का द्वंद्व। सतह पर यह दो व्यक्तियों की लड़ाई है। लेकिन वास्तव में यह दो युगों की लड़ाई है। एक तरफ वह दुनिया है जो सम्मान, संस्कृति और परंपरा में विश्वास करती है। दूसरी तरफ वह पीढ़ी है जो विज्ञान, प्रयोग और उपयोगिता को सर्वोच्च मानती है।

द्वंद्व में कोई महान विजय नहीं होती। कोई निर्णायक परिणाम नहीं निकलता।

और शायद यही तुर्गनेव का संदेश था। इतिहास में भी ऐसा ही होता है। पुरानी पीढ़ी नई को पूरी तरह हरा नहीं सकती। नई पीढ़ी पुरानी को पूरी तरह मिटा नहीं सकती। अंततः दोनों को साथ रहना पड़ता है। आज भारत में भी यही संघर्ष दिखाई देता है।

एक ओर वे लोग हैं जो मानते हैं कि हमारी सभ्यता की जड़ें ही हमारी शक्ति हैं। दूसरी ओर वे लोग हैं जो मानते हैं कि भविष्य केवल नवाचार और वैज्ञानिक सोच से बनेगा। लेकिन वास्तविक भारत इन दोनों के बीच कहीं खड़ा है।

ओडिंत्सोवा: जहाँ तर्क पहली बार हारता है

उपन्यास का सबसे सुंदर और सबसे मानवीय हिस्सा है बाज़ारोव और अन्ना ओडिंत्सोवा का संबंध। यहाँ पहली बार बाज़ारोव अपने ही सिद्धांतों से टकराता है। जिस व्यक्ति ने प्रेम को केवल जैविक प्रक्रिया कहा था, वही प्रेम में पड़ जाता है। जिस व्यक्ति ने भावनाओं को कमजोरी कहा था, वही भावनाओं के सामने असहाय हो जाता है।

ओडिंत्सोवा उसे अस्वीकार कर देती है। लेकिन असली चोट अस्वीकृति नहीं है। असली चोट यह है कि बाज़ारोव को पहली बार महसूस होता है कि वह उतना तार्किक नहीं है जितना वह समझता था।

यह साहित्य का एक कालजयी क्षण है। क्योंकि यह केवल बाज़ारोव की कहानी नहीं है। यह हम सबकी कहानी है। हम अपने बारे में अनेक सिद्धांत बनाते हैं। हमें लगता है कि हम पूरी तरह व्यावहारिक हैं। फिर जीवन में कोई व्यक्ति आता है और हमें पता चलता है कि हम उतने मजबूत नहीं हैं जितना हमने सोचा था।

बाज़ारोव की मृत्यु: उपन्यास का सबसे बड़ा पाठ

महान साहित्य अक्सर अपने अंतिम अध्यायों में अपनी सबसे बड़ी बात कहता है। बाज़ारोव किसी क्रांति में नहीं मरता। वह किसी युद्ध का नायक नहीं बनता। वह इतिहास बदलते हुए नहीं मरता। वह एक साधारण संक्रमण का शिकार होकर मर जाता है।

यह दृश्य पढ़ते समय पाठक को झटका लगता है। इतना विशाल व्यक्तित्व। इतने बड़े विचार। इतनी तीखी बुद्धि। और अंत? इतना साधारण? लेकिन तुर्गनेव यहीं अपना सबसे गहरा संदेश देते हैं।

मनुष्य विचारधाराओं से बड़ा नहीं होता। मृत्यु के सामने निहिलिज्म भी छोटा पड़ जाता है। अंतिम क्षणों में बाज़ारोव किसी दर्शन की बात नहीं करता। वह अपने माता-पिता को याद करता है। वह प्रेम को याद करता है। वह मनुष्य बन जाता है। यहीं उसका अहंकार टूटता है। और यहीं उसकी मानवता जन्म लेती है। 

भारत के ड्राइंग रूम में आज भी जीवित है यह उपन्यास

यदि आप ध्यान से देखें तो Fathers and Sons आज के भारत में हर दिन घट रहा है। जब बेटा कहता है कि परंपरा को तर्क से परखा जाना चाहिए। जब पिता कहते हैं कि हर चीज़ किताबों से नहीं सीखी जा सकती। जब परिवार के भोजन की मेज़ पर राजनीति बहस बन जाती है। जब नई पीढ़ी व्यक्तिगत स्वतंत्रता की बात करती है। जब पुरानी पीढ़ी सामाजिक जिम्मेदारी की। तब कहीं न कहीं तुर्गनेव का उपन्यास जीवित हो उठता है।

इस उपन्यास की सबसे बड़ी विशेषता यह नहीं कि यह आधुनिकता का समर्थन करता है। और न ही यह कि यह परंपरा की रक्षा करता है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह संवाद का पक्ष लेता है। तुर्गनेव किसी को खलनायक नहीं बनाते। वे हमें बताते हैं कि हर पीढ़ी अधूरी है। युवाओं के पास ऊर्जा होती है, लेकिन अनुभव नहीं। बुजुर्गों के पास अनुभव होता है, लेकिन कभी-कभी परिवर्तन का साहस नहीं। समाज तब आगे बढ़ता है जब दोनों एक-दूसरे को सुनते हैं।

हर बाज़ारोव को एक निकोलई की आवश्यकता होती है

फादर्स डे पर Fathers and Sons पढ़ना केवल एक साहित्यिक अनुभव नहीं है। यह अपने परिवार को समझने का प्रयास है। यह अपने पिता को नए दृष्टिकोण से देखने का अवसर है। यह समझने का अवसर है कि जिन लोगों से हम कभी-कभी असहमत होते हैं, उन्हीं लोगों ने हमें दुनिया को चुनौती देने का साहस भी दिया है। तुर्गनेव अंततः हमें यही सिखाते हैं कि सभ्यताएँ केवल विचारों से नहीं बनतीं। वे संबंधों से बनती हैं।

तर्क आवश्यक है। लेकिन तर्क अकेला पर्याप्त नहीं। मनुष्य को मनुष्य बनाए रखने के लिए प्रेम चाहिए। करुणा चाहिए। स्मृतियाँ चाहिए। और शायद एक पिता चाहिए, जो भले ही आपकी हर बात से सहमत न हो, लेकिन फिर भी आपके लौटने का इंतज़ार करता रहे।

क्योंकि हर घर में एक बाज़ारोव होता है। और हर बाज़ारोव की कहानी के पीछे कहीं न कहीं एक निकोलई खड़ा होता है। शांत, धैर्यवान, लगभग अदृश्य।

लेकिन पूरी कहानी को थामे हुए।