आरबीआई के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा है कि भारत का रुपया ने ओवरवैल्यूड नहीं बल्कि अंडरवैल्यूड स्थिति में आ चुका है। ‘बिजनेस लाइन’ के साथ बातचीत के दौरान उन्होंने कहा कि ये रुपए की कमजोरी नहीं बल्कि भू राजनीतिक तनाव, अमेरिकी डॉलर का मजबूत होना और उभरते बाजारों में आई अस्थिरता की वजह से हुआ है।
रुपए को मापने का तरीका
आरबीआई के गवर्नर का कहना है कि भारतीय रुपया NEER और REER सूचकांकों के आधार पर अंडरवैल्यूड स्थिति में आ चुका है। दरअसल ये दोनों रुपए मापने के दो पैमाने हैं।
NEER यानी नॉमिनल इफेक्टिव एक्सचेंज रेट, जो बगैर महँगाई की जोड़े दूसरे देशों की करेंसी के आधार पर रुपए के बाहरी वैल्यू को आँकता है। वहीं REER यानी रियल इफेक्टिव एक्सचेंज रेट जब रुपए की वैल्यू बताता है तो व्यापारिक साझेदारों के बीच महँगाई के अंतर को भी जोड़ता है। अगर REER 100 से ऊपर है तो करेंसी ओवरवैल्यूड है, और 100 से नीचे है तो अंडरवैल्यूड है।
आरबीआई के गवर्नर आम तौर पर बाजार के अस्थिर होने पर रुपए की कीमत को लेकर बयान देने से बचते हैं। ब्लूमबर्ग ने आरबीआई के गवर्नर के बयान को ‘रेयर सार्वजनिक बयान’ कहा है।
The article shows that the rupee is now more undervalued than the yuan.
This means Indian goods may have gained a price advantage over Chinese goods. But price alone cannot secure competitiveness. pic.twitter.com/VHih28PFPq
रुपये में कमजोरी का कारण घरेलू अर्थव्यवस्था की कमजोरी नहीं है। इसके वैश्विक कारण हैं। भू-राजनीतिक तनाव, मजबूत डॉलर और वैश्विक अस्थिरता का इससे पता चलता है। आरबीआई व्यापार को कंट्रोल नहीं करता, बल्कि रुपए के अत्यधिक उतार-चढ़ाव को डॉलर की खरीद-बिक्री कर, मौद्रिक नीति के द्वारा या विदेशी मुद्रा भंडार का इस्तेमाल कर रोकता है।
भारतीय रुपया इस वित्त वर्ष यानी 2025-26 के दौरान पिछले 14 साल में सबसे ज्यादा गिरा है। कहा तो ये भी जा रहा है कि एशिया में सबसे ज्यादा भारत का रुपया गिरा है। यूएस ईरान के बीच जंग का असर दुनिया के तेल बाजार पर काफी पड़ा है। हॉर्मुज स्ट्रेट से आवाजाही प्रभावित होने पर दुनियाभर में तेल की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि देखी गई। भारत तेल का सबसे बड़े आयातक देशों में एक है। इसलिए भारत का रुपया कमजोर हुआ। इसकी कीमत में करीब 11 फीसदी तक गिरावट दर्ज की गई। 1 डॉलर की कीमत 96 रुपए से ऊपर तक चला गया। इससे व्यापार घाटे में वृद्धि हुई।
क्या होता है रुपए का ओवरवैल्यूड और अंडरवैल्यूड होना
आम बोलचाल की भाषा में रुपए का ओवरवैल्यूड और अंडरवैल्यूड होने का मतलब है उसकी वास्तविक आर्थिक ताकत और बाजार में उसकी कीमत में अंतर होना। उदाहरण के लिए भारतीय अर्थव्यवस्था के हिसाब से 1 डॉलर की कीमत 80 रुपए हो, लेकिन वह 74 रुपए में मिल रहा हो, तो रुपए ओवरवैल्यूड मानी जाएगी।
इसी तरह अगर 1 डॉलर की कीमत 80 रुपए हो, लेकिन वह 84 रुपए में मिल रहा हो, तो रुपए अंडरवैल्यूड मानी जाएगी।
आरबीआई सिर्फ डॉलर के मुकाबले रुपए का क्या भाव है सिर्फ इस आधार पर रुपए की वैल्यू नहीं आँकता, बल्कि दुनिया के करीब 40 व्यापारिक देशों की करेंसी को सामने रख कर रुपए के वैल्यू को मापता है।
ओवरवैल्यूड होने से विदेशों में घूमना, पढ़ना-लिखना अपेक्षाकृत सस्ता हो जाता है। विदेश से आने वाले सामान जैसे मोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक सामान, तेल और गैस सस्ते हो जाते हैं, महँगाई को भी कुछ हद तक कंट्रोल करना आसान हो जाता है। लेकिन निर्यात पर असर पड़ता है क्योंकि विदेश में सामान महँगा हो जाता है। इससे व्यापार घाटा बढ़ जाता है।
वहीं दूसरी ओर रुपए के अंडरवैल्यूड होने पर कच्चा तेल, गैस, इलेक्ट्रोनिक सामान जो विदेशों से आते हैं, वे महँगी हो जाती है। पेट्रोल- डीजल के दाम बढ़ जाते हैं और महँगाई बढ़ती है। लेकिन इसका फायदा यह है कि निर्यात में बढ़ोतरी होती है और व्यापार घाटा को पाटने में मदद मिलती है। भारतीय सामान विदेशों में सस्ते हो जाते हैं। विदेशी निवेशकों के लिए भारत में संपत्ति या शेयर खरीदना सस्ता हो जाता है, जिससे निवेश बढ़ सकता है।
दोनों ही स्थितियों में ‘बहुत ज्यादा’ से बचने की कोशिश की जाती है। बहुत ज्यादा मजबूत रुपया भी अर्थव्यवस्था के लिए समस्या बन सकता है, क्योंकि इससे निर्यात प्रभावित हो सकता है। वहीं रुपए में नियंत्रित सीमा तक कमजोर हो, तो इससे निर्यात और घरेलू उद्योगों को फायदा मिल सकता है। लेकिन यदि गिरावट बहुत तेज हो जाए, तो आयात महँगा होने और महँगाई बढ़ने जैसी समस्याएँ पैदा हो सकती हैं।
चीन के युआन से भी भारत का रुपया हुआ सस्ता
अमेरिकी फेडरल रिजर्व के ‘RBEER’ इंडेक्स के मुताबिक, नवंबर 2024 में 1 डॉलर की कीमत 84.4 रुपए थी, तब NEER सूचकांक 91.68 पर था। इसका मतलब यह था कि 2015-16 से लेकर अब तक भारत के प्रमुख व्यापारिक साझेदारों की करेंसी के मुकाबले रुपए में लगभग 8.3% की गिरावट आ चुकी थी। फिर भी चीनी युआन की वैल्यू भारतीय रुपए से अधिक थी।
लेकिन मई 2026 की बात करें, जब रुपये-डॉलर की विनिमय दर औसतन 95.5 थी। NEER न केवल रिकॉर्ड निचले स्तर 77.19 पर आ गया, बल्कि REER भी गिरकर 89.08 पर पहुँच गया। हालाँकि जून में दोनों में थोड़ी रिकवरी हुई है, फिर भी 91.26 का REER रुपये की विनिमय दर में 8.7% की महत्वपूर्ण कमजोरी को दर्शाता है।
जून 2026 आते आते रुपये का इंडेक्स गिरकर 90.15 पर आ गया है, जबकि युआन 92.24 पर है यानी पिछले 6 साल में पहली बार युआन की कीमत भारतीय रुपए से ज्यादा हो गई है।
इसका फायदा ये होगा कि चीनी वस्तुओं से भारतीय वस्तुएँ विदेशी बाजार में प्रतिस्पर्धा की स्थिति में आ गई हैं। उनकी कीमत कम होने पर विदेशी बाजार में भारतीय पैठ बढ़ेगी।
इतना ही नहीं भारतीय निर्यात को नई गति मिलेगी। भारत के टेक्सटाइल, जूते, दवाईयाँ, ऑटो पार्ट्स और दूसरे सामान चीन से सस्ते हो जाएँगे।
आयात महँगा होने की वजह से घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा मिलेगा और देश के अंदर सामान थोड़े सस्ते होंगे। कुल मिलाकर भारत के लिए फायदे की स्थिति बन रही है।
हाल ही में सबस्टैक (Substack) पर प्रकाशित एक खोजी रिपोर्ट में खुलासा किया गया है कि कुछ प्रमुख अमेरिकी पत्रकारों को चीन-यूनाइटेड स्टेट्स एक्सचेंज फाउंडेशन (CUSEF) की ओर से चीन की प्रायोजित यात्राओं पर भेजा गया। रिपोर्ट में कहा गया है कि इन यात्राओं का मकसद अमेरिकी मीडिया में चीन के पक्ष में माहौल बनाना था।
यह रिपोर्ट नताली विंटर्स ने लिखी है। इसमें उन अमेरिकी पत्रकारों के नाम भी बताए गए हैं, जिन्होंने ये प्रायोजित यात्राएँ की थीं। इस सूची में भारतीय मूल की अमेरिकी पत्रकार, कॉलम लेखक और नीति विश्लेषक शिखा डालमिया का नाम भी शामिल है।
यह रिपोर्ट अमेरिका के फॉरेन एजेंट्स रजिस्ट्रेशन एक्ट (FARA) के तहत दाखिल दस्तावेजों पर आधारित हैं। इन दस्तावेजों के मुताबिक, CUSEF ने वॉशिंगटन की कुछ लॉबिंग फर्मों को इस उद्देश्य से नियुक्त किया था कि अमेरिकी मीडिया में चीन के पक्ष में सकारात्मक खबरें और संदेश बढ़ाए जा सकें।
The names include:
– Ezra Klein, New York Times columnist – Matthew Yglesias, Vox co-founder – Ronald Brownstein, CNN senior political analyst – Bradford Plumer, New York Times reporter – Marjorie Miller, former Associated Press vice president
नताली विंटर्स के मुताबिक, FARA के दस्तावेजों में उन अमेरिकी पत्रकारों के नाम सीधे नहीं लिखे गए थे, जिन्हें चीन की ओर से प्रायोजित यात्राओं पर भेजा गया था। इन पत्रकारों की पहचान करने के लिए उन्होंने FARA के रिकॉर्ड का मिलान पुरानी यात्रा सूची, कार्यक्रमों के ब्रोशर और लॉबिंग से जुड़े दस्तावेजों से किया।
उन्होंने चीन एक्सचेंज कार्यक्रमों में शामिल लोगों की पुरानी सूची देखी, मीडिया से जुड़े आंतरिक दस्तावेजों की जाँच की और उन पत्रकारों के आर्टिकल भी पढ़े, जो उन्होंने चीन यात्रा के बाद लिखे थे। विंटर्स के मुताबिक, इन आर्टिकल में चीन को लेकर अपेक्षाकृत सकारात्मक रुख दिखाई देता है।
इन आर्टिकल्स में शिखा डालमिया का एक आर्टिकल भी शामिल था, जिसकी हेडलाइन है- “China Bashing is for Losers“,यह लेख फोर्ब्स (Forbes) में प्रकाशित हुआ था। शिखा डालमिया ने यह लेख उसी साल लिखा था, जिस साल उन्होंने चीन की यात्रा की थी। इस आर्टिकल में उन्होंने कहा था कि उस समय चुनावी माहौल में चीन की आलोचना करना अमेरिका की दोनों बड़ी राजनीतिक पार्टियों के लिए एक तरह का ‘राजनीतिक चलन’ बन गया था।
Forbes का स्क्रीनशॉट
उन्होंने लिखा, “रिपब्लिकन और डेमोक्रेट, दोनों ही चीन विरोधी रुख अपनाकर अपने ही नुकसान की नींव रख रहे हैं। चीन को लगातार निशाना बनाने के बजाय उन्हें उसके साथ व्यापार के फायदों पर बात करनी चाहिए। चीन को लेकर ज्यादा समझदारी वाला नजरिया अपनाने के पक्ष में सिर्फ मजबूत आर्थिक वजह ही नहीं, बल्कि मजबूत राजनीतिक वजह भी हैं।”
इससे पहले आर्टिकल में शिखा डालमिया ने विस्तार से यह तर्क दिया था कि चीन की लगातार आलोचना करना अमेरिकी नेताओं और देश, दोनों के लिए नुकसानदायक हो सकता है।
कौन है शिखा डालमिया?
शिखा डालमिया भारतीय मूल की अमेरिकी पत्रकार, कॉलम लेखर और नीति विश्लेषक हैं। उनके लेख Reason, The Week, The New York Times, The Wall Street Journal, USA Today और Bloomberg Opinion जैसे प्रकाशनों में छप चुके हैं।
शिखा डालमिया अपने उन आर्टिकल्स के लिए भी जानी जाती हैं, जिनमें उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, बीजेपी और हिंदुत्व विचारधारा की आलोचना की है। उन्होंने कई आर्टिकल्स में यह भी दावा किया कि मोदी सरकार ने भारत के उदार लोकतांत्रिक संस्थानों को कमजोर किया, धार्मिक बहुलता को नुकसान पहुँचाया और बहुसंख्यक राजनीति को बढ़ावा दिया।
फरवरी 2020 में, जब तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत दौरे पर आए थे, तब शिखा डाल्मिया ने “While Trump Was Praising Modi for Religious Freedom, Modi-Supporting Hindus Slaughtered Muslims in the Streets” हेडलाइन के साथ एक आर्टिकल लिखा था।
उस आर्टिकल में उन्होंने दिल्ली के हिंदू-विरोधी दंगों के बारे में लिखा और दंगों का अपना ही तोड़-मरोड़कर और लीपा-पोती किया हुआ वर्जन पेश किया। उन्होंने दावा किया कि नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे लोगों और ‘हिंदू उग्रवादियों’ के बीच झड़प हुई थी।
उस आर्टिकल में शिखा डालमिया ने नागरिकता संशोधन कानून (CAA) को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ऐसी योजना बताया, जिसका उद्देश्य “भारत के 14 करोड़ मुस्लिमों में से बड़ी संख्या को नागरिकता के अधिकार से वंचित करना औऱ संभवत: उन्हें डिटेंशन कैंपों में भेजना” था।
Reason का स्क्रीनशॉट
डालमिया ने लिखा, “हिंदू उग्रवादियों ने उत्तर-पूर्वी दिल्ली में मुस्लिमों के घरों पर पेट्रोल बम फेंके, एक मस्जिद में आग लगा दी और उस पर हिंदू झंडा फहरा दिया। साथ ही मुस्लिमों की दुकानों में लूटपाट की।”
इसके अलावा डालमिया ने लिखा कि मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद “भारत में मुस्लिम विरोधी हिंसा एक दुखद लेकिन आम बात बन गई है।” उन्होंने यह भी आलोचना की कि तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत यात्रा के दौरान देश में कथित रूप से बिगड़ते मानवाधिकारों के मुद्दे पर मोदी सरकार की आलोचना नहीं की।
इससे एक महीने पहले, जनवरी 2020 में, उन्होंने “Indian Prime Minister Modi’s Lawless Reign of Terror” हेडलाइन से एक और आर्टिकल लिखा था। इसमें उन्होंने दावा किया कि प्रधानमंत्री मोदी ने अपने ‘गुजरात मॉडल’ को पूरे देश में लागू किया है।
आर्टिकल में डालमिया ने आरोप लगाया कि 2002 के गुजरात दंगों के दौरान इसी मॉडल के कारण “कुछ ही दिनों में 1,000 से अधिक पुरुषों, महिलाओं और बच्चों, जिनमें ज्यादातर मुसलमान थे, की हत्या हुई।” गुजरात दंगों के लिए पीएम मोदी को दोषी ठहराना डालमिया की उस तथाकथित वामपंथी-उदारवादी लॉबी की एक अजीब विशेषता है, जिसका वह खुद हिस्सा हैं।
Reason का स्क्रीनशॉट
इसके बाद शिखा डालमिया ने जेएनयू (JNU) में हुई छात्र हिंसा को प्रधानमंत्री मोदी के ‘निजी उग्रवादियों’ की कार्रवाई बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) के सदस्य कैंपस में हिंसा पर उतर आए और उन्होंने मुस्लिम छात्रों व अपने कमरों में डॉ. भीमराव आंबेडकर की तस्वीर रखने वाले छात्रों को निशाना बनाया।
प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा ही नहीं, बल्कि शिखा डालमिया ने अपने कई आर्टिकल्स में हिंदुत्व विचारधारा की भी आलोचना की है। “Hinduism sheds its gentle image in the name of nationalism” हेडलाइन वाले एक आर्टिकल में डालमिया ने दावा किया कि ‘हिंदुत्व-हिंदू राष्ट्रवाद’ की वजह से भारत में धार्मिक स्वतंत्रता पर खतरा बढ़ रहा है।
The Times का स्क्रीनशॉट
इसके बाद शिखा डालमिया ने एक और दावा किया कि भारत के विभाजन के बाद से “हिंदू उग्रवादी” लगातार मुस्लिमों के खिलाफ हिंसा करते रहे हैं। उन्होंने इस दावे को अपने आर्टिकल में तथ्य के तौर पर पेश किया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति डालमिया की आलोचना 2014 में और तेज हो गई, जब मोदी भारी बहुमत से देश के प्रधानमंत्री चुने गए। प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी की अमेरिका यात्रा पर भी डालमिया ने निराशा जताई। डालमिया ने दावा किया कि यह यात्रा भारत और अमेरिका के रिश्तों को मजबूत करने के लिए नहीं थी, बल्कि उनके मुताबिक यह प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता हासिल करने, खुद की छवि को बढ़ाने और अपने अहंकार को संतुष्ट करने की कोशिश थी।
The Week का स्क्रीनशॉट
एक इंटरव्यू में, जिसमें उनके साथ वाम-उदारवादी विचारों वाले सिद्धार्थ वरदराजन भी शामिल थे, शिखा डालमिया ने सबसे पहले यह कहते हुए हैरानी जताई कि ‘ मोदी जैसे व्यक्ति’ भारत के प्रधानमंत्री कैसे बन गए।
इसके बाद उन्होंने अपनी राय रखते हुए दावा किया कि भारत की स्थिति पाकिस्तान जैसी हो गई है, जहाँ अल्पसंख्यकों के धार्मिक अधिकार कम हो रहे हैं। डालमिया और सिद्धार्थ वरदराजन ने मिलकर प्रधानमंत्री मोदी के शासन में भारत में आए बदलावों की आलोचना की और कहा कि उनके अनुसार देश की स्थिति पहले से खराब हुई है।
प्रधानमंत्री मोदी और हिंदुत्व को लेकर शिखा डालमिया की लगातार आलोचनाओं को चीन की ओर से प्रायोजित यात्राओं से जुड़े खुलासे के संदर्भ में देखा गया है।
(मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में लिखी गई है, जिसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)
Gen Z यानी स्क्रीन की दुनिया में पलती पीढ़ी जिसके लिए वीडियो, फ्रैंड चैटिंग, ओटीटी, कुछ खास तरह के रियलिटी शो, स्टेंडअप कॉमेडी लुभाते हैं। इसका असर यह है कि Gen Z अमर्यादित शब्दों का इस्तेमाल धड़ल्ले से करने लगे हैं। पेपर लीक मुद्दे पर जंतर मंतर पर हुए आंदोलन में भी यह दिखा। ये पीढ़ी आगे चल कर सांसद, विधायक, मंत्री भी बनेगी। क्या ऐसी भाषा ही ‘आम’ बन जाएगी।
पिछले कुछ वर्षों में तकनीक ने इंसानी व्यवहार को जिस तेजी से बदला है, शायद ही इतिहास में ऐसा पहले कभी हुआ हो। आज स्थिति यह है कि बड़ी संख्या में लोग अपने परिवार, दोस्तों या पड़ोसियों की तुलना में मोबाइल, सोशल मीडिया और एआई चैटबॉट्स से अधिक संवाद कर रहे हैं।
यह बदलाव केवल संचार का नहीं, बल्कि समाज में पहचान, लोकप्रियता, आत्मसम्मान और सफलता की परिभाषा का भी है। मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि यह परिवर्तन विशेष रूप से Gen Z यानी लगभग 1997–2012 के बीच जन्मी पीढ़ी में सबसे अधिक दिखाई देता है।
इंसानों से ज्यादा मशीनों से संवाद
पहले बच्चे स्कूल से लौटकर परिवार, पड़ोस और दोस्तों के साथ समय बिताते थे। आज कई युवाओं के दिन की शुरुआत और अंत स्मार्टफोन से होता है। बातचीत सोशल मीडिया चैट, एआई चैटबॉट और ऑनलाइन गेमिंग पर हो रही है। हर Gen Z के साथ ऐसा नहीं है कि उनके साथ घर पर बात करने वाले परिजन मौजूद नहीं है। बल्कि परिजनों से बात न कर, घर के किसी कोने में अपने स्मार्ट फोन या टैब, लैपटॉप के साथ ये बिजी हैं।
घर में कौन आया, कौन गया या किसी अहम बातों से इन्हें मतलब नहीं। बस दोस्त, चैटिंग और ऑनलाइन गेम ही इनकी दुनिया है। आज के भागदौड़ भरी दुनिया में एकल फेमिली में माता पिता जॉब कर रहे होते हैं तो Gen Z अकेले भी पड़ जाते हैं। अकेलापन होने पर भी इंसान के बजाय मशीन से बात करना आसान लगने लगता है। कोई हो या न हो, एआई हमेशा उपलब्ध है, इसलिए कई युवा उससे भावनात्मक बातचीत भी करने लगे हैं।
मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि इससे तत्काल राहत मिल सकती है, लेकिन यदि वास्तविक सामाजिक रिश्ते कमजोर पड़ने लगें तो लंबे समय में भावनात्मक विकास प्रभावित होता है।
क्या एक बार फिर गुरुकुल की जरूरत बच्चों को है
प्राचीन काल में बच्चों को शुरुआती लालन-पालन के बाद शिक्षा-दीक्षा के लिए गुरु के पास भेज दिया जाता था। यहाँ वे नैतिक मूल्यों से लेकर तमाम तरह की शिक्षा ग्रहण करते थे। हमारे रामायण महाभारत काल में भी गुरुकुल की महत्ता बताई गई है।
कौरव और पांडव के गुरु द्रोणाचार्य थे, जिनके सबसे प्रिय शिष्य अर्जुन हुए, क्योंकि उन्होंने गुरु के ज्ञान को सबसे ज्यादा मेहनत कर अमली जामा पहनाया। वे सबसे अच्छे तीरंदाज बने। वैसे ही उनके बेटे अभिमन्यु के गुरु स्वयं श्रीकृष्ण थे। उन्होंने काफी कम उम्र में ही अपनी वीरता का लोहा मनवाया।
आगे के दौर में संयुक्त परिवार में बच्चों को नैतिक मूल्यों की शिक्षा मिलती थी। उस पर न सिर्फ माता-पिता बल्कि पूरे परिवार और समाज की नजर होती थी। धीरे-धीरे ये दौर भी पीछे छूट गया और अब एकल फैमिली में घर की जिम्मेदारियों के साथ-साथ बच्चों को संभालने की जिम्मेदारी भी अहम है। समाज का रोल बदल गया है।
अब कोई किसी बच्चे को प्रोत्साहित नहीं करता और न ही गलत करने पर डाँटता है। हर घर खुद में सिमट कर रह गए हैं। बच्चों में स्मार्ट फोन और दूसरे इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की आदत खुद ब खुद नहीं पड़ी है। बच्चों को पेरेंट्स ने ही दिया है।
कई बार अपने काम में बिजी पेरेंट्स छोटे से बच्चे को मोबाइल में राइम्स सुनने के लिए दे देते हैं। धीरे धीरे बच्चा राइम्स से छोटे मोटे गेम्स खेलने लगता है और फिर मोबाइल को छोड़ना नहीं चाहता। ये लत ऐसी लगती है कि स्कूल कॉलेज तक बच्चा ऑनलाइन और ऑफलाइन वीडियो गेम, चैटिंग, ओटीटी तक पहुँच जाता है।
क्लास 11 में पढ़ने वाले बच्चे आरव की माँ मोनिका बानी (बदला हुआ नाम) का कहना है कि उन्होंने थक हार कर बच्चे को अब बोर्डिंग स्कूल में भेज दिया है। उनका बच्चा पढ़ने में काफी अच्छा रहा है। वह फुटबॉल भी काफी अच्छा खेलता है, लेकिन जब से वीडियो गेम की आदत लगी, उसका रिजल्ट खराब होने लगा। वह रात-रात भर मोबाइल में लगा रहता था। वह काफी गुस्सैल हो गया था। उसकी भाषा खराब हो गई थी।
अब ऐसे बोर्डिंग स्कूल में डाल दिया है, जहाँ मोबाइल बच्चों के लिए बैन है। उनका मानना है कि बच्चों के लिए फिर से गुरुकुल की आवश्यकता है। आज के दौर में बच्चों को संभालना काफी मुश्किल है क्योंकि इंटरनेट उनकी रेंज में है और मोबाइल का अच्छा और बुरा दोनों के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।
शिक्षा का बाजारीकरण
स्कूल ही बच्चों की पर्सनालिटी निर्माण का आधार होते हैं। लेकिन आज सरकारी स्कूलों का स्तर निम्नतम हो गया है। प्राइवेट स्कूल पैसे कमाने का धँधा बन गए हैं। स्कूलों की फीस देना निम्न और मध्यम वर्ग की जेब पर भारी है। आँकड़े बताते हैं कि माध्यमिक स्तर (9वीं और 10वीं कक्षा) पर स्कूल छोड़ने की दर करीब 11.5% तक पहुँच जाती है।
शिक्षा मंत्रालय के आँकड़ों के मुताबिक, 14 से 18 वर्ष की आयु के 2 करोड़ से अधिक बच्चे स्कूल से बाहर हैं और कक्षा 1 में प्रवेश लेने वाले 100 बच्चों में से केवल 62 बच्चे ही कक्षा 12 तक पहुँच पाते हैं। ऐसे में ये Gen Z कहाँ जाएँगे और क्या करेंगे। जाहिर है इनकी भाषा भी भद्दी होती है और ये भीड़ का हिस्सा बन कर रह जाते हैं।
इनके अलावा जो सरकारी स्कूलों का हाल है, वहाँ पढ़ने वाले बच्चों के स्तर को देखकर ही अंदाजा लगाया जा सकता है। न तो शिक्षक को बच्चों से मतलब है और न ही बच्चों को पढ़ने से। कोई पढ़ाई का माहौल नहीं और न ही खेलकूद की सुविधा। ऐसे में जो यहाँ से निकलते हैं उनमें विरले ही जीवन में सफलता हासिल कर पाते हैं।
प्राइवेट स्कूलों का हाल ये है कि ये मात्र कमाई का अड्डा बन गए हैं। कुछ जाने माने स्कूलों को छोड़ दे तो बाकी स्कूलों में शिक्षकों का स्तर काफी कम है। दरअसल उन्हें वेतन के नाम पर न्यूनतम पैसे दिए जाते हैं। जब टीचर अपने दाल-चावल की हिसाब लगाता रहेगा, तो पढ़ाएगा क्या। उसका ध्यान बच्चों को पढ़ाने पर कैसे टिकी रहेगी। नतीजा स्कूलों का गिरता स्तर। इतना ही नहीं स्कूलों में अब जीवन मूल्यों को पढ़ाया नहीं जाता, सिर्फ ‘रोबॉटिक बच्चे’ बनाए जा रहे हैं। इन्हें सामाजिक मूल्यों की परवाह नहीं।
दिल्ली विश्वविद्यालय के मनोवैज्ञानिक प्रोफेसर नवीन सिंह का मानना है कि वैल्यू सिस्टम में गिरावट का दौर है ये। पहले विरोध प्रदर्शन के दौरान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सकारात्मक रुख देखने को मिलता था। भूख हड़ताल, अनशन, बैनर और पोस्टर में माँगें होती थी। कोई गाली गलौज नहीं होता था।
पर्सनल अटैक की भी सीमाएँ थी, लेकिन अब वैल्यू सिस्टम दरकता हुआ दिख रहा है। दिल्ली के जंतर मंतर पर हुआ छात्रों के धरना प्रदर्शन में रचनात्मकता के नाम पर भद्दी भद्दी गालियाँ और अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल इंटरटेनंमेंट और हताशा दोनों का मिक्चर था। यहाँ तक कि सोशल अवेयनेंस की भी कमी थी।
उनका कहना है कि छात्रों ने शिक्षा मंत्री के इस्तीफे को मुख्य मुद्दा बनाया, लेकिन कहीं भी शिक्षा व्यवस्था में सुधार की बात नहीं की। कहीं भी शिक्षा के बाजारीकरण पर कोई वक्तव्य नहीं दिया। शिक्षा के निजीकरण और कोचिंग संस्थानों पर कोई बात नहीं कही। नीट पेपर लीक 2026 में भी आरोपित केमिस्ट्री का टीचर कोचिंग संस्थान ही चला रहा था। अपने कोचिंग के बच्चों को उसने पेपर सॉल्व करवाए थे।
अब सवाल उठता है कि आखिर स्कूलों में पढ़ने के बावजूद बच्चों को कोचिंग क्यों जाना पड़ता है। क्यों परीक्षा पास करने के कोचिंग संस्थानों में सिखाए जा रहे टिप्स बच्चों के लिए जरूरी हैं? स्कूलों की पढ़ाई का स्तर इतना निम्न क्यों है, इस पर छात्र नेताओं का ध्यान क्यों नहीं था। दरअसल ये जमीन की समस्याओं से पैदा हुआ जेन जी आंदोलन नहीं था। अमेरिका में बैठे अभिजीत दिपके कॉकरोच जनता पार्टी बनाते हैं और सोशल मीडिया पर शिक्षा मंत्री के नीट पेपर लीक पर इस्तीफा माँगते हैं। यह आंदोलन बस इतने तक ही सीमित रहा।
मेहनती और फोकस Gen Z की भी कमी नहीं
इसका मतलब ये हरगिज नहीं है कि सभी Gen Z अपना वक्त बर्बाद कर रहे हैं। कम उम्र में बड़ी सफलता पाना भी उनका लक्ष्य है। यही वजह है कि हर परीक्षा में इतनी ज्यादा प्रतियोगिता है। NEET की ही बात कर लें, तो हर साल सरकारी मेडिकल कॉलेजों में एडमिशन का कट ऑफ हाई होता जा रहा है। बच्चे जी जान से सालों तैयारी करते हैं। उनका हर मिनट का हिसाब होता है। यानी Gen Z अगर ठान लें, तो आसमान में भी सुराख कर दें।
हाल में जंतर मंतर पर प्रदर्शन के दौरान भी उन्होंने इसे साबित किया है। लेकिन आंदोलन की सफलता के बाद उनकी पार्टी पर भी सवाल उठे हैं। क्या NEET परीक्षा को लेकर आत्महत्या करने वाले परीक्षार्थियों के प्रति ‘प्रेम’ सिर्फ उनकी माँग का एक हिस्सा भर था, जिसे पूरी होते ही ये पार्टियों में बिजी हो गए।
नेपाल में भ्रष्टाचार के मुद्दे पर लड़ते हुए सत्ता को उखाड़ फेंका। हालाँकि इनके तरीके पर सवाल हो सकता है। हिंसा और आगजनी करना और अराजकता फैलाने की इजाजत किसी को भी नहीं दी जा सकती, लेकिन इनकी सामाजिक मर्यादा की परिभाषा ही अलग है। गालियों में बातें करना, मीम्स और दूसरे तरीके इन्हें आते हैं। ये इसे सामान्य मानते हैं।
आज ‘वायरल’ होना कई युवाओं के लिए ‘सफल’ होने का पर्याय बन गया है। इसका प्रभाव यह है कि कई बार वास्तविक उपलब्धियों की तुलना में डिजिटल लोकप्रियता अधिक महत्वपूर्ण दिखाई देने लगती है। पहले समाज सर्टिफिकेट देता था, अब एल्गोरिद्म। एक समय था जब किसी व्यक्ति की पहचान उसके शिक्षक, पड़ोसी, गाँव या समाज तय करते थे।
आज यह भूमिका काफी हद तक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के एल्गोरिद्म निभा रहे हैं। वीडियो वायरल हुआ या ज्यादा व्यू मिले तो आप सफल, वरना असफल। एक तरह से कहा जाए, तो डिजिटल पहचान और वास्तविक व्यक्तित्व की जंग छिड़ जाती है। वास्तविकता से अलग हट कर डिजिटल व्यक्तित्व उसे दूसरी ही दुनिया में ले जाते हैं। जहाँ खुद को वह जैसा चाहता है, फटाफट बना लेता है।
मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर असर
यह मानसिकता युवाओं के आत्मविश्वास को भी प्रभावित करती है। सोशल मीडिया और एआई से उनका भावनात्मक जुड़ाव समाज को एक अलग दिशा की ओर ले जा रहा है। स्क्रीन टाइम ज्यादा होने से मानसिक और शारीरिक असर भी पड़ रहा है।
गाजियाबाद के मशहूर ऑर्थोपेडिक डॉक्टर आशुतोष झा के मुताबिक, स्क्रीन टाइम अधिक होने से उनके मानसिक विकास पर असर पडता है। जल्दी थकावट होती है और जिस वजह से स्क्रीन टाइम लंबा चला है उस पर उनका दिमाग सोचता रहता है। इससे बाकी चीजें पीछे छूट जाती हैं। शरीर पर भी स्क्रीम टाइम पर बुरा असर पड़ता है।
आम तौर पर मोबाइल देखते वक्त आप नीचे देखते हैं। आँख के बराबर में मोबाइल नहीं होता। इससे गर्दन को छुकने की आदत पड़ जाती है। धीरे धीरे शरीर का पॉस्चर खराब हो जाता है। रीढ़ की हड्डियाँ टेढ़ी होने लगती है। क्योंकि जेन जी शारीरिक विकास के दौर से गुजर रहे होते हैं। ऐसे में शारीरिक बनावट पर भी ये असर डालता है।
कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि Gen Z भी समाज का हिस्सा हैं। समाज में होने वाली गिरावट का असर उन पर भी पड़ा है। लेकिन ये उम्र कुछ ठानने और करने की है। वह सकारात्मक भी हो सकता है और नकारात्मक भी। Gen Z न तो केवल ‘मोबाइल में खोई हुई पीढ़ी’ है और न ही ‘सबसे प्रतिभाशाली पीढ़ी’। यह ऐसी पीढ़ी है जो अभूतपूर्व डिजिटल अवसरों और नई मनोवैज्ञानिक चुनौतियों—दोनों के बीच बड़ी हुई है।
लोकप्रियता का पैमाना अब समाज से अधिक एल्गोरिद्म तय कर रहे हैं, और वास्तविक पहचान कई बार डिजिटल पहचान से प्रतिस्पर्धा कर रही है, इसलिए भविष्य की सबसे बड़ी चुनौती तकनीक को छोड़ना नहीं, बल्कि उसके साथ स्वस्थ संतुलन बनाना है। परिवार, स्कूल, समाज, नीति-निर्माता और तकनीकी कंपनियाँ यदि मिलकर डिजिटल साक्षरता, आलोचनात्मक सोच और वास्तविक मानवीय संवाद को बढ़ावा दें, तो यही पीढ़ी भारत के लोकतंत्र, अर्थव्यवस्था और समाज को नई दिशा देने की क्षमता रखती है।
उत्तर प्रदेश में साल 2027 के विधानसभा चुनाव को अभी थोड़ा वक्त बाकी है, लेकिन सूबे की राजनीति में सरगर्मी अभी से अपने चरम पर है। सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सत्ता की हैट्रिक लगाने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। राजनीति की इस बिसात पर एक तरफ मुख्यमंत्री खुद ताबड़तोड़ दौरे कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ पार्टी का मजबूत संगठन हर एक बूथ तक अपनी गहरी पैठ बना रहा है।
अगर पिछले कुछ महीनों के आँकड़ों पर नजर डालें, तो साफ पता चलता है कि सरकार ने उत्तर प्रदेश की तस्वीर बदलने के लिए खजाने का मुँह खोल दिया है। विकास के इन पहियों और संगठन की ताकत के आगे विपक्ष फिलहाल केवल बयानबाजी में ही उलझा नजर आ रहा है।
मुख्यमंत्री के तूफानी दौरे और ताबड़तोड़ रैलियाँ
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पिछले कुछ महीनों के दौरान राज्य के अलग-अलग जिलों का लगातार और तूफानी दौरा किया है। इसमें कुल 43 जिले शामिल हैं। मुख्यमंत्री ने मई 2026 में गोरखपुर, प्रयागराज, बिजनौर, वाराणसी, देवरिया, महाराजगंज, मऊ और सहारनपुर का दौरा किया। इसके अलावा, जून में हाथरस, आजमगढ़, अलीगढ़, बलरामपुर, गौतम बुद्ध नगर, पीलीभीत, अयोध्या, देवरिया, गोंडा, फिरोजाबाद, कुशीनगर, महोबा, संत कबीर नगर, उन्नाव, झांसी, हमीरपुर, ललितपुर, वाराणसी, मुरादाबाद और गाजियाबाद का दौरा किया।
बात करें जुलाई की तो मुख्यमंत्री ने वाराणसी, बांदा, चित्रकूट, मैनपुरी, अमरोहा, बहराइच, बाराबंकी, बिजनौर, बुलंदशहर, इटावा, कुशीनगर, शामली, प्रतापगढ़, अयोध्या, सुल्तानपुर, बस्ती, आगरा, फतेहपुर, संभल, प्रयागराज, गाजियाबाद और श्रावस्ती का दौरा करने करोड़ों की सौगात और विकास परियोजनाओं का शिलान्यास किया।
इन तमाम जनसभाओं और दौरों के दौरान सिर्फ भाषण ही नहीं दिए गए, बल्कि जनता को सीधे तौर पर लाभ भी पहुँचाया गया। स्थानीय कार्यक्रमों में जरूरतमंदों को सरकारी योजनाओं के तहत चेक, घरों की चाबियाँ, लैपटॉप, आयुष्मान कार्ड और तमाम तरह के प्रमाण पत्र बाँटे गए। इन मंचों से मुख्यमंत्री ने हमेशा से कानून-व्यवस्था की तारीफ करते हुए एक बहुत बड़ा और लोकप्रिय नारा दिया- ‘नो कर्फ्यू, नो दंगा, यूपी में अब सब चंगा।’
हजारों करोड़ की विकास परियोजनाओं की ऐतिहासिक सौगात
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के इन दौरों का सबसे बड़ा उद्देश्य उत्तर प्रदेश के हर कोने तक विकास की रोशनी पहुँचाना रहा है। पिछले कुछ महीनों में जितने भी जिलों का दौरा किया गया, वहाँ हजारों करोड़ रुपए की विकास परियोजनाओं का लोकार्पण और शिलान्यास किया गया। अगर इन सभी बड़ी परियोजनाओं की लागत को जोड़ा जाए, तो यह आँकड़ा लगभग 36,877 करोड़ रुपए के आसपास बैठता है।
इसमें गौतमबुद्धनगर में अकेले 6,750 करोड़ रुपए के भारी-भरकम निवेश वाली इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण परियोजनाओं को शामिल कर लिया जाए, तो कुल सौगात और निवेश का यह आँकड़ा 19,200 करोड़ रुपए से भी ज्यादा हो जाता है। इन पैसों से राज्य में शानदार सड़कें, आधुनिक अस्पताल, बेहतरीन कनेक्टिविटी, सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट और युवाओं के लिए रोजगार के नए रास्ते तैयार हो रहे हैं। इसके अलावा, शिक्षकों के लिए करोड़ों का बीमा, होमगार्ड्स के लिए मुफ्त स्वास्थ्य सुविधाएं और स्टार्टअप फंड जैसे बड़े कदम उठाकर सरकार ने यह साबित कर दिया है कि उसका फोकस समाज के हर वर्ग के उत्थान पर है।
सुरक्षा का मजबूत माहौल
जनसभाओं के दौरान मुख्यमंत्री योगी विपक्षी दलों, खास तौर पर समाजवादी पार्टी और कॉन्ग्रेस पर पूरी तरह आक्रामक नजर आए। उन्होंने पुरानी सरकारों के दौर की याद दिलाते हुए जनता को बताया कि कैसे पहले गरीबों के हक पर डाका डाला जाता था और त्योहारों के समय दंगे कराए जाते थे। मुख्यमंत्री ने बड़े साफ शब्दों में कहा कि आज का उत्तर प्रदेश माफियाओं से मुक्त है और यहाँ कानून का राज है।
उन्होंने युवाओं के भविष्य, किसानों की खुशहाली और महिलाओं की सुरक्षा को अपनी सरकार की सबसे बड़ी प्राथमिकता बताया। विपक्ष के पास आज जनता को गिनाने के लिए कोई ठोस काम नहीं बचा है, इसलिए वे केवल झूठे नैरेटिव गढ़ने में लगे हैं। वहीं दूसरी ओर, योगी सरकार ने अपने विकास कार्यों और भ्रष्टाचार मुक्त शासन के दम पर आम जनता के दिलों में एक अटूट विश्वास पैदा कर दिया है।
भाजपा संगठन की ताकत: बूथ स्तर तक सक्रियता का मेगा प्लान
सरकार के विकास कार्यों के साथ-साथ पार्टी का संगठन भी 2027 के चुनाव में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहता है। भाजपा की सबसे बड़ी ताकत उसका अनुशासित और मजबूत संगठन है। इसी रणनीति के तहत पार्टी ने उत्तर प्रदेश की सभी 403 विधानसभा सीटों पर एक साथ ऐतिहासिक बूथ सम्मेलनों का आयोजन किया था। इस मेगा अभियान के जरिए राज्य के 1,77,516 मतदान केंद्रों को सीधे तौर पर कवर किया गया, जो अब तक का सबसे बड़ा बूथ-स्तरीय संगठनात्मक अभियान माना जा रहा है।
इस अभियान की कमान खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य और प्रदेश के अन्य वरिष्ठ नेताओं ने संभाली थी। पार्टी लगातार अपने बूथ अध्यक्षों, शक्ति केंद्र प्रमुखों और मंडल स्तर के पदाधिकारियों को ट्रेनिंग, संवाद और समीक्षा बैठकों के जरिए अपडेट रख रही है। हर बूथ पर एक ऐसा मजबूत कार्यकर्ता तंत्र तैयार किया जा रहा है जो घर-घर जाकर सरकार की योजनाओं की जानकारी दे सके और नए मतदाताओं को पार्टी के साथ जोड़ सके।
कमजोर सीटों पर विशेष फोकस और मजबूत डेटाबेस
पार्टी ने अपनी चुनावी रणनीति को धार देते हुए राज्य की सभी 403 सीटों को चार अलग-अलग श्रेणियों में बाँटा है। इनमें से उन लगभग 61 सीटों पर विशेष नजर रखी जा रही है जहाँ पिछले कुछ चुनावों में पार्टी को सफलता नहीं मिल पाई थी। इन सभी सीटों पर नए सिरे से बूथ मैनेजमेंट तैयार किया जा रहा है, स्थानीय जातीय समीकरणों का बारीकी से अध्ययन हो रहा है और संभावित उम्मीदवारों का सर्वे कराया जा रहा है।
इसके अलावा, भाजपा अपने करीब 2.5 करोड़ प्राथमिक सदस्यों का एक बहुत ही सटीक और सत्यापित डेटाबेस तैयार कर रही है। प्रदेश स्तर से लेकर बूथ स्तर तक लगातार रिपोर्ट मँगाई जा रही है। वृक्षारोपण अभियानों, डिजिटल ट्रेनिंग कैंपों और कारगिल विजय दिवस जैसे आयोजनों के माध्यम से कार्यकर्ताओं को लगातार मैदान में सक्रिय रखा जा रहा है ताकि चुनावी मशीनरी में कभी भी सुस्ती न आने पाए।
क्या है 2027 के चुनाव की पूरी तस्वीर?
उत्तर प्रदेश का यह राजनीतिक परिदृश्य इस बात का सबसे बड़ा सबूत है कि भारतीय जनता पार्टी साल 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर बेहद गंभीर है और वह किसी भी मोर्चे पर ढिलाई बरतने के मूड में नहीं है। एक तरफ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ लगातार जिलों के चक्कर काटकर विकास कार्यों की झड़ी लगा रहे हैं और जनता के बीच सीधा संवाद स्थापित कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ पार्टी का अनुशासित संगठन बूथ स्तर पर अपनी पकड़ को और अधिक मजबूत कर रहा है।
विपक्ष के खेमे में आज भी आपसी बिखराव और मजबूत मुद्दों की भारी कमी साफ दिखाई देती है, जबकि NDA सरकार ने बुनियादी ढांचे, कानून-व्यवस्था, धार्मिक पर्यटन और महिला-युवा-शिक्षक कल्याणकारी योजनाओं के जरिए अपनी जमीन बेहद मजबूत कर ली है। हालाँकि महँगाई या स्थानीय स्तर की कुछ छोटी-मोटी समस्याओं जैसे मुद्दे विपक्ष उठाता जरूर है, लेकिन जिस तरह से भाजपा ने समय से पहले अपनी पूरी संगठनात्मक ताकत झोंक दी है और ताबड़तोड़ विकास परियोजनाओं को जमीन पर उतार दिया है, उससे यह साफ हो जाता है कि 2027 की यह राजनीतिक लड़ाई बेहद रोमांचक होगी। सत्ता की हैट्रिक लगाने के लिए भाजपा ने अपनी पूरी ताकत लगा दी है और अब देखना यह होगा कि जनता इस दमदार विकास और सुशासन के मॉडल पर कितनी बड़ी मुहर लगाती है।
देश के सबसे प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों में शामिल आईआईटी मद्रास (IIT Madras) के डायरेक्टर प्रोफेसर वी. कामकोटि इन दिनों अचानक सुर्खियों में आ गए हैं। वजह उनका कोई नया वैज्ञानिक शोध या तकनीकी उपलब्धि नहीं, बल्कि एक तीखा राजनीतिक विवाद है। कॉन्ग्रेस नेता प्रियंका गाँधी द्वारा प्रोफेसर कामकोटि को ‘गौमूत्र एक्सपर्ट’ (Gaumutra Expert) कहे जाने के बाद से पूरे देश में शैक्षणिक और राजनीतिक गलियारों में एक नई बहस छिड़ गई है। दरअसल, पीएम मोदी ने परीक्षा में सुधार के लिए एक हाई पॉवर्ड कमेटी बनाने का ऐलान किया, जिसकी कमान उन्होंने नंदन नीलकेणि को सौंपी। इस कमेटी में प्रोफेसर कामकोटि का भी नाम है।
इसी बात को लेकर लोकसभा में कॉन्ग्रेस नेता प्रियंका गाँधी वाड्रा ने तंज कसा था। उन्होंने कमेटी में शामिल प्रोफेसर कामकोटि को गौमूत्र विशेषज्ञ कह कर उन्हें नीचा दिखाने की कोशिश की। एक तरफ जहाँ कॉन्ग्रेस की वरिष्ठ नेता के इस बयान को लेकर सोशल मीडिया से लेकर मुख्यधारा के मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर काफी तीखी प्रतिक्रियाएँ देखने को मिल रही हैं, वहीं दूसरी तरफ लोग यह सवाल भी पूछ रहे हैं कि आखिर प्रोफेसर कामकोटि हैं कौन? वे देश की वैज्ञानिक और तकनीकी प्रगति में क्या भूमिका निभाते रहे हैं और उनके पास क्या-क्या डिग्रियाँ व अनुभव हैं?
कौन हैं प्रोफेसर वी. कामकोटि?
प्रोफेसर वी. कामकोटि का पूरा नाम वेझिनाथन कामकोटि है। वे भारत के अग्रणी और सबसे सम्मानित कंप्यूटर वैज्ञानिकों में से एक गिने जाते हैं। वर्तमान में वे भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मद्रास (IIT Madras) के डायरेक्टर (Director) के पद पर कार्यरत हैं। जनवरी 2022 में उन्होंने आईआईटी मद्रास के डायरेक्टर के रूप में कमान संभाली थी।
आईआईटी मद्रास देश का वह संस्थान है जो शिक्षा मंत्रालय की एनआईआरएफ (NIRF) रैंकिंग में लगातार कई सालों से भारत का नंबर वन इंजीनियरिंग और ओवरऑल शैक्षणिक संस्थान बना हुआ है। ऐसे विश्वस्तरीय संस्थान का नेतृत्व करना अपने आप में यह साबित करता है कि प्रोफेसर कामकोटि की क्षमताएँ और उनका अनुभव कितना ऊँचा है।
वे न केवल कंप्यूटर साइंस के विद्वान हैं, बल्कि भारत सरकार की कई महत्वपूर्ण नीतियों, राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीतियों और डिजिटल पहलों में सलाहकार के रूप में भी जुड़े रहे हैं।
शैक्षणिक योग्यता और आईआईटी मद्रास से जुड़ाव
प्रोफेसर कामकोटि की पूरी शैक्षणिक यात्रा असाधारण योग्यताओं और शोध से भरी रही है। उन्होंने कंप्यूटर साइंस और इंजीनियरिंग (Computer Science and Engineering) विषय में अपनी उच्च शिक्षा प्राप्त की है। आइए उनके शैक्षणिक सफर को संक्षेप में जानते हैं-
एम.एस. (M.S.) और पीएचडी (Ph.D.): प्रोफेसर कामकोटि ने आईआईटी मद्रास से ही कंप्यूटर साइंस और इंजीनियरिंग में अपनी एम.एस. और पीएचडी की डिग्रियाँ हासिल कीं। उनका शोध मुख्य रूप से जटिल गणनाओं, कंप्यूटर आर्किटेक्चर और सिस्टम सुरक्षा पर आधारित था। फैकल्टी के रूप में शुरुआत: वर्ष 2001 में वे आईआईटी मद्रास के कंप्यूटर साइंस एंड इंजीनियरिंग विभाग में बतौर फैकल्टी सदस्य शामिल हुए। प्रशासनिक जिम्मेदारियाँ: डायरेक्टर बनने से पहले उन्होंने आईआईटी मद्रास में कई महत्वपूर्ण प्रशासनिक और शैक्षणिक पदों को संभाला। वे जेईई (JEE) के चेयरमैन रह चुके हैं, जिसके तहत देशभर के लाखों छात्रों के लिए आईआईटी में प्रवेश की परीक्षा आयोजित की जाती है। इसके अलावा उन्होंने इंडस्ट्रियल कंसल्टेंसी एंड स्पॉन्सर्ड रिसर्च (ICSR) के एसोसिएट डीन के रूप में भी काम किया।
कंप्यूटर आर्किटेक्चर और ‘शक्ति’ माइक्रोप्रोसेसर के जनक
विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में प्रोफेसर कामकोटि का सबसे बड़ा योगदान भारत को सेमीकंडक्टर और माइक्रोप्रोसेसर के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाना माना जाता है।
माइक्रोप्रोसेसर डेवलपमेंट प्रोग्राम: प्रोफेसर कामकोटि आईआईटी मद्रास के ‘माइक्रोप्रोसेसर डेवलपमेंट प्रोग्राम’ का नेतृत्व करते हैं।
स्वदेशी ‘शक्ति’ (SHAKTI) प्रोसेसर: उनके ही मार्गदर्शन में भारत का पहला व्यावसायिक स्तर का स्वदेशी माइक्रोप्रोसेसर ‘शक्ति’ विकसित किया गया था। इस सफलता ने भारत को दुनिया के उन चुनिंदा देशों की कतार में ला खड़ा किया जो खुद का माइक्रोप्रोसेसर डिजाइन करने में सक्षम हैं।
इन्फॉर्मेशन सिक्योरिटी: वे कंप्यूटर आर्किटेक्चर के साथ-साथ इन्फॉर्मेशन सिक्योरिटी (सूचना सुरक्षा) और वीएलएसआई (VLSI) डिजाइन के विशेषज्ञ हैं। वे आईआईटी मद्रास में ‘इन्फॉर्मेशन सिक्योरिटी एजुकेशन एंड अवेयरनेस प्रोग्राम’ का भी नेतृत्व कर रहे हैं।
आज जब पूरी दुनिया सेमीकंडक्टर चिप्स की किल्लत और साइबर सुरक्षा की चुनौतियों से जूझ रही है, तब प्रोफेसर कामकोटि का शोध भारत को डिजिटल रूप से सुरक्षित और आत्मनिर्भर बनाने में बहुत बड़ी भूमिका निभा रहा है।
राष्ट्रीय सुरक्षा और सरकारी समितियों में प्रोफेसर कामकोटि की भूमिका
प्रोफेसर कामकोटि केवल प्रयोगशालाओं और कक्षाओं तक सीमित नहीं रहे हैं, बल्कि भारत सरकार ने उनके अनुभव का उपयोग देश की सुरक्षा और आर्थिक नीतियों को तय करने में भी किया है:
राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड (NSAB): प्रोफेसर कामकोटि भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड के सदस्य के रूप में अपनी सेवाएँ दे चुके हैं। यहाँ वे साइबर सुरक्षा, डिजिटल सर्विलांस और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े तकनीकी पहलुओं पर महत्वपूर्ण सुझाव देते रहे हैं।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) टास्क फोर्स के चेयरमैन: वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय द्वारा गठित ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस टास्क फोर्स’ के वे चेयरमैन रह चुके हैं। इस टास्क फोर्स का मुख्य काम यह तय करना था कि भारत में एआई का इस्तेमाल आर्थिक विकास, रक्षा और जन-कल्याण के लिए कैसे किया जा सकता है।
बैंकिंग और वित्तीय क्षेत्र में देते हैं योगदान
डिजिटल तकनीक और सुरक्षा में अपनी पकड़ के कारण देश की शीर्ष वित्तीय संस्थाएं भी प्रोफेसर कामकोटि के मार्गदर्शन पर भरोसा करती हैं:
नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE): वे एनएससी की टेक्नोलॉजी कमेटी के सदस्य के रूप में काम करते हैं, ताकि देश का सबसे बड़ा शेयर बाजार तकनीकी रूप से सुरक्षित और तेज बना रहे।
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI): वे आरबीआई की विभिन्न तकनीकी समितियों से भी जुड़े रहे हैं, जो देश के बैंकिंग नेटवर्क और डिजिटल पेमेंट सिस्टम को सुरक्षित रखने के लिए नीतियाँ बनाती हैं।
शोध, रिसर्च पेपर्स और R&D प्रोजेक्ट्स
अगर उनके शोध और अकादमिक योगदान की बात करें तो आँकड़े हैरान करने वाले हैं-
150 से अधिक रिसर्च पेपर्स: अंतरराष्ट्रीय स्तर के प्रतिष्ठित जर्नल्स और सम्मेलनों में उनके 150 से अधिक शोध पत्र (Research Papers) प्रकाशित हो चुके हैं।
पीएचडी और मास्टर स्कॉलर्स का मार्गदर्शन: उन्होंने दर्जनों पीएचडी और मास्टर डिग्री के छात्रों को रिसर्च गाइड के रूप में मार्गदर्शन दिया है। उनके पढ़ाए छात्र आज दुनिया भर की टेक कंपनियों और रिसर्च लैबों में ऊँचे पदों पर हैं।
50 से अधिक प्रोजेक्ट्स का नेतृत्व: उन्होंने उद्योग जगत और केंद्र सरकार द्वारा वित्तपोषित लगभग 50 अनुसंधान एवं विकास (R&D) परियोजनाओं का सफल नेतृत्व किया है।
प्रोफेसर कामकोटि को मिल चुके हैं ढेरो पुरस्कार और राष्ट्रीय सम्मान
विज्ञान और शिक्षा क्षेत्र में उनके अभूतपूर्व योगदान के लिए उन्हें देश-विदेश में कई प्रमुख पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है-
डीआरडीओ अकादमिक एक्सीलेंस अवॉर्ड (DRDO Academic Excellence Award): रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन द्वारा उनके योगदान को मान्यता देने के लिए। आईईएसए टेक्नो विजनरी अवॉर्ड (IESA Techno Visionary Award): इलेक्ट्रॉनिक्स और सेमीकंडक्टर क्षेत्र में अभूतपूर्व काम के लिए। अब्दुल कलाम टेक्नोलॉजी इनोवेशन नेशनल फेलोशिप: तकनीकी नवाचारों को बढ़ावा देने के लिए मिलने वाली यह देश की बेहद प्रतिष्ठित फेलोशिप है। एसीसीएस लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड (ACCS Lifetime Achievement Award): कंप्यूटर और कम्यूनिकेशन टेक्नोलॉजी में जीवनभर के योगदान के लिए।
इसके अलावा आईबीएम फैकल्टी अवॉर्ड (IBM Faculty Award) और वासविक इंडस्ट्रियल रिसर्च अवॉर्ड (VASVIK Award) भी उन्हें मिल चुके हैं।
प्रियंका गाँधी के बयान से उपजा विवाद
इतने शानदार और विशाल वैज्ञानिक रिकॉर्ड वाले एक शीर्ष शोधकर्ता पर राजनीति का यह तंज तब शुरू हुआ जब कॉन्ग्रेस नेता प्रियंका गाँधी ने अपने एक बयान में प्रोफेसर कामकोटि को ‘गौमूत्र एक्सपर्ट’ कहकर संबोधित कर दिया।
इस बयान के बाद मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक तीखी प्रतिक्रियाएँ देखने को मिलीं। लोगों ने सवाल उठाया कि देश के एक शीर्ष वैज्ञानिक और आईआईटी मद्रास के डायरेक्टर के लिए इस तरह की शब्दावली का प्रयोग करना कितना सही है? विवाद बढ़ते ही कई प्रमुख समाचार चैनलों, अखबारों और डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्मों पर प्रोफेसर कामकोटि की डिग्रियों और प्रियंका गाँधी की टिप्पणी के बीच तुलनात्मक रिपोर्टें प्रकाशित होने लगीं।
Priyanka Gandhi referred to IIT Madras Director Prof. V. Kamakoti as a “Gaumutra expert.”
However, Prof. Kamakoti is one of India’s most accomplished computer scientists and academicians.
Holds M.S. and Ph.D. degrees in Computer Science and Engineering from IIT Madras. Joined… pic.twitter.com/rF3GaRMDnX
राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी का शैक्षणिक बैकग्राउंड भी जानना अहम
विवाद के तूल पकड़ने के बाद अब लोग गाँधी परिवार के प्रमुख नेताओं की शैक्षणिक योग्यताओं की चर्चा भी कर रहे हैं। अगर प्रियंका गाँधी की शैक्षणिक पृष्ठभूमि की बात करें तो उन्होंने दिल्ली के जीसस एंड मैरी कॉलेज से मनोविज्ञान (Psychology) में स्नातक (Bachelor’s Degree) किया है। इसके बाद उन्होंने बौद्ध अध्ययन (Buddhist Studies) में स्नातकोत्तर (Master’s Degree) की डिग्री प्राप्त की।
निजी जीवन में बात करें तो प्रियंका गाँधी किस धर्म (हिंदू-पारसी-क्रिश्चियन) को मानती हैं, यही साफ नहीं है और वो विदेश से बौद्ध अध्ययन पढ़कर लौटी हैं जबकि खुद भारत बौद्ध धर्म का केंद्र है। ऐसे में उनका हिंदू वैज्ञानिक पर टिप्पणी हिंदूफोबिया या हिंदुओं से नफरत से भी जोड़कर देखा जा सकता है।
वहीं उनके भाई राहुल गाँधी की शिक्षा की बात करें तो उन्होंने शुरुआती पढ़ाई भारत में करने के बाद विदेश का रुख किया था। राहुल गाँधी ने सेंट स्टीफंस कॉलेज (दिल्ली) में दाखिला लिया था, लेकिन सुरक्षा कारणों से उन्हें वहाँ से हटना पड़ा। इसके बाद वे अमेरिका के हार्वर्ड यूनिवर्सिटी गए और बाद में रोलोन्स कॉलेज से उन्होंने 1994 में अपनी बैचलर डिग्री पूरी की। इसके बाद वर्ष 1995 में उन्होंने ब्रिटेन की कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के ट्रिनिटी कॉलेज से डेवलपमेंट स्टडीज में एम.फिल (M.Phil) किया।
जिन्हें साइंस का ‘S’ भी नहीं पता वो उड़ा रहे विद्वान का उपहार
अब सवाल यह उठ रहा है कि जिस व्यक्ति ने अपनी पूरी जिंदगी कंप्यूटर आर्किटेक्चर, वीएलएसआई डिजाइन, सेमीकंडक्टर और साइबर सिक्योरिटी जैसे जटिल वैज्ञानिक विषयों को समझने और सिखाने में बिता दी, जिसने देश को पहला स्वदेशी माइक्रोप्रोसेसर ‘शक्ति’ दिया, उसे नीचा दिखाने के लिए ‘गौमूत्र विशेषज्ञ‘ जैसा तंज कसा जा रहा है।
देखा जाए तो राजनीति और मीडिया के गलियारों में अब इस बात का खुलकर उपहास उड़ाया जा रहा है कि जिन नेताओं ने विज्ञान और मॉडर्न टेक्नोलॉजी की ‘एबीसीडी’ भी नहीं पढ़ी है, जिनकी पूरी पढ़ाई साइकोलॉजी, बुद्धिस्ट स्टडीज या डेवलपमेंट स्टडीज जैसे विषयों में हुई है, वे भारत के एक शीर्ष कंप्यूटर वैज्ञानिक और आईआईटी डायरेक्टर की काबिलियत पर तंज कस रहे हैं और उन्हें गौमूत्र एक्सपर्ट बता रहे हैं।
भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा में गुरु का स्थान ईश्वर से भी सर्वोपरि माना गया है। प्रतिवर्ष आषाढ़ मास की पूर्णिमा तिथि को पूरे भारत और विश्व भर में फैले सनातन धर्मावलंबियों द्वारा ‘गुरु पूर्णिमा’ का पर्व अत्यंत श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के साथ मनाया जाता है। इस पावन तिथि को ‘व्यास पूर्णिमा’ के नाम से भी जाना जाता है।
हमारे देश में ज्ञान अर्जन और आध्यात्मिक उन्नति को जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य माना गया है और इस लक्ष्य की प्राप्ति केवल एक समर्थ गुरु के मार्गदर्शन से ही संभव है। ‘गुरु’ शब्द दो अक्षरों के मेल से बना है- ‘गु’ का अर्थ है अंधकार या अज्ञान, और ‘रु’ का अर्थ है प्रकाश या ज्ञान।
अर्थात जो जीव को अज्ञान रूपी अंधकार से निकालकर ज्ञान रूपी दिव्य प्रकाश की ओर ले जाए, वही सच्चा गुरु है। गुरु पूर्णिमा का यह पावन अवसर केवल एक त्यौहार या कर्मकांड मात्र नहीं है, बल्कि यह उस महान गुरु-शिष्य परंपरा के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का एक वार्षिक उत्सव है, जिसने युगों-युगों से भारत की ज्ञान सम्पदा को अक्षुण्ण रखा है।
वर्षा ऋतु के इस सुहावने मौसम में जब आकाश बादलों से आच्छादित होता है और आषाढ़ की पूर्णिमा का चंद्रमा अपनी पूरी कांति के साथ चमकता है, तब शिष्य अपने गुरुदेव के चरणों में शीश नवाकर उनके द्वारा दिखाए गए ज्ञान के मार्ग पर चलने का संकल्प लेते हैं।
महर्षि वेदव्यास का प्राकट्य और वेद विभाजन का महान ऐतिहासिक कार्य
गुरु पूर्णिमा के पर्व का सीधा संबंध महर्षि वेदव्यास के जन्म से है। पौराणिक मान्यता और शास्त्रों के अनुसार, आषाढ़ मास की पूर्णिमा तिथि को ही महर्षि कृष्णद्वैपायन व्यास का जन्म हुआ था। वे महर्षि पराशर और माता सत्यवती के पुत्र थे। यमुना नदी के एक द्वीप पर जन्म लेने और साँवले वर्ण का होने के कारण उन्हें प्रारंभ में ‘कृष्णद्वैपायन’ कहा गया।
आगे चलकर उन्होंने बदरिकाश्रम में कठिन तपस्या की, जिसके कारण उन्हें ‘बादरायण’ भी कहा जाता है। द्वापर युग के अंत में जब ज्ञान की शाखाएँ लुप्त हो रही थीं और आम मानव की स्मरण शक्ति तथा बुद्धि कमजोर हो रही थी, तब महर्षि व्यास ने ज्ञान के अथााह सागर को संरक्षित करने का युगांतरकारी बीड़ा उठाया।
उन्होंने अनादि काल से मौखिक रूप से चले आ रहे एक ही विशाल वेद ज्ञान को समेटकर उसे चार भागों में वर्गीकृत किया। इस महान कार्य के कारण ही उन्हें‘वेदव्यास’ की उपाधि से विभूषित किया गया। वेदव्यास जी ने मंत्रों की प्रकृति, यज्ञीय उपयोगिता और स्वर-विधान के आधार पर वेद साहित्य को ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद में विभाजित किया।
उन्होंने ऋग्वेद का ज्ञान अपने शिष्य पैल को, यजुर्वेद का ज्ञान वैशंपायन को, सामवेद का ज्ञान जैमिनी को और अथर्ववेद का ज्ञान सुमंतु को सौंपा। इसके साथ ही उन्होंने पौराणिक कथाओं और इतिहास के संरक्षण का दायित्व अपने शिष्य रोमहर्षण सूत जी को प्रदान किया।
इस प्रकार वेदव्यास जी ने मौखिक परंपरा को एक सुव्यवस्थित ढाँचा दिया, जिससे भावी पीढ़ियाँ ज्ञान के इस विशाल भंडार को सुगमता से समझ और सुरक्षित रख सकें।
ज्ञान के इस महान संरक्षण कार्य के कारण ही महर्षि वेदव्यास को जगत का प्रथम और सार्वभौमिक गुरु माना गया है। यही कारण है कि उनकी जन्म तिथि आषाढ़ पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा अथवा गुरु पूर्णिमा के रूप में समूचे भारतवर्ष में मनाया जाता है।
सनातन संस्कृति, उपनिषद और महाग्रंथों में गुरु तत्व का दर्शन
सनातन ग्रंथों में गुरु केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक चेतना, एक तत्व और आध्यात्मिक प्रकाश का प्रतीक है। उपनिषदों, पुराणों और स्मृतियों में गुरु तत्व की व्याख्या अत्यंत गूढ़ और व्यापक रूप से की गई है। तैत्तिरीयोपनिषदमें स्पष्ट निर्देश दिया गया है- ‘आचार्यदेवो भव’, अर्थात आचार्य या गुरु को देवतुल्य मानकर उनका आदर करना चाहिए।
श्वेताश्वतरोपनिषद में यह कहा गया है कि जिस साधक की ईश्वर में पराभक्ति होती है और जैसी भक्ति ईश्वर में होती है, वैसी ही भक्ति यदि गुरु में हो, तो उस महात्मा के द्वारा बताए गए उपनिषदों के सारे गूढ़ अर्थ स्वयं प्रकाशित होने लगते हैं। स्कंद पुराण के अंतर्गत आने वाले गुरु गीता ग्रंथ में गुरु की महिमा का विशद वर्णन करते हुए कहा गया है कि गुरु ही ब्रह्मा हैं, गुरु ही विष्णु हैं और गुरु ही साक्षात महेश्वर शिव हैं। गुरु ही परब्रह्म स्वरूप हैं, इसलिए ऐसे श्री गुरुदेव को बारंबार प्रणाम है।
श्रीमद्भगवद्गीता के चौथे अध्याय में भगवान श्री कृष्ण स्वयं अर्जुन को ज्ञान प्राप्ति का रहस्य समझाते हुए कहते हैं कि उस परम ज्ञान को प्राप्त करने के लिए तत्वदर्शी ज्ञानियों और गुरुओं के पास जाना चाहिए। नम्रतापूर्वक प्रणाम करके, निष्कपट भाव से प्रश्न पूछकर और उनकी सेवा करके ज्ञान की प्राप्ति होती है, क्योंकि वे तत्वदर्शी गुरु ही ज्ञान का उपदेश दे सकते हैं।
इसी प्रकार रामचरितमानस में संत तुलसीदास जी बालकांडके प्रारंभ में ही गुरु वंदना करते हुए लिखते हैं कि गुरु के चरण कमलों की धूल अमिय मूरिमय चूरन चारू है, जो संपूर्ण भवरोगों के परिवार को शांत करने वाली है।
सनातन दर्शन में यह माना गया है कि व्यक्ति स्वयं अपने बल पर अविद्या और माया के जाल से बाहर नहीं निकल सकता। जैसे किसी घने अंधकारमय जंगल में मार्ग तलाशने के लिए एक पथप्रदर्शक की आवश्यकता होती है, ठीक उसी तरह संसार रूपी भवसागर को पार करने के लिए गुरु रूपी नाविक की अत्यंत आवश्यकता होती है।
व्यास पूर्णिमा का पौराणिक इतिहास और ग्रंथों की रचना यात्रा
महर्षि वेदव्यास का भारतीय साहित्य और दर्शन में योगदान केवल वेदों के विभाजन तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने महर्षि पराशर से प्राप्त ज्ञान और स्वयं की प्रचंड तपस्या के बल पर मानव समाज के सर्वांगीण विकास के लिए अनेकों अमर ग्रंथों का सृजन किया।
जब उन्होंने देखा कि वेदों की भाषा अत्यंत गूढ़, संस्कृतनिष्ठ और सर्वसाधारण के लिए समझने में कठिन है, तब उन्होंने सामान्य जनमानस तक नैतिक मूल्य, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के सिद्धांतों को पहुँचाने के लिए अठारह पुराणों की रचना की।
भागवत पुराण, विष्णु पुराण, शिव पुराण, अग्नि पुराण जैसे महान ग्रंथ व्यास जी की ही अनुपम देन हैं, जिनमें रूपकों, आख्यानों और कथाओं के माध्यम से परम तत्व का ज्ञान बहुत ही सरल रूप में प्रस्तुत किया गया है। वेदव्यास जी का सबसे महान ऐतिहासिक और दार्शनिक अवदान महाभारत महाकाव्य है।
एक लाख श्लोकों से युक्त इस विशाल ग्रंथ को पंचम वेद भी कहा जाता है। महाभारत केवल एक युद्ध की गाथा नहीं है, बल्कि यह मानव समाज, राजनीति, मनोविज्ञान, धर्म और दर्शन का एक जीवित कोष है। कथा के अनुसार, जब व्यास जी ने संपूर्ण महाभारत का ढाँचा अपने मन में रच लिया, तो उन्होंने इसके लेखन के लिए भगवान श्री गणेश से प्रार्थना की।
श्री गणेश जी ने शर्त रखी कि व्यास जी बिना रुके कथा सुनाएँगे और व्यास जी ने शर्त रखी कि गणेश जी हर श्लोक को समझकर ही लिखेंगे। इस प्रकार दो महाचेतनाओं के मिलन से इस अमर ग्रंथ की रचना हुई। इसी महाभारत के भीष्म पर्व के अंतर्गत श्रीमद्भगवद्गीता जैसा अनुपम दर्शन रत्न अंतर्निहित है, जो आज भी संपूर्ण विश्व को निष्काम कर्मयोग का संदेश दे रहा है।
इसके अतिरिक्त व्यास जी ने वेदांत दर्शन के आधारस्तंभ ‘ब्रह्मसूत्र’की रचना की, जिसमें 555 सूत्रों के माध्यम से उपनिषदों के दर्शन को एक सूत्र में पिरोया गया है। ज्ञान के इस विशाल वटवृक्ष को रोपने वाले महर्षि व्यास के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए ही इस तिथि को व्यास पूर्णिमा नाम से पूजा जाता है।
बौद्ध, जैन और योग परंपरा में आषाढ़ पूर्णिमा का पावन संदर्भ
गुरु पूर्णिमा का पावन पर्व केवल वैदिक या हिंदू परंपरा तक ही सीमित नहीं है, बल्कि भारत की अन्य प्रमुख आध्यात्मिक धाराओं जैसे बौद्ध, जैन और योग परंपरा में भी इसका बहुत बड़ा ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व है। बौद्ध धर्म के इतिहास में आषाढ़ पूर्णिमा की तिथि एक मील का पत्थर मानी जाती है।
बोधगया में पीपल के वृक्ष के नीचे महाबोधि ज्ञान प्राप्त करने के पश्चात, भगवान बुद्ध ने वाराणसी के निकट सारनाथ में इसी आषाढ़ पूर्णिमा के दिन अपने प्रथम पाँच शिष्यों (पंचवर्गीय भिक्षुओं) को पहला उपदेश दिया था। इस ऐतिहासिक घटना को बौद्ध साहित्य में ‘धम्मचक्कप्पवत्तन सुत्त’ यानी ‘धर्मचक्र प्रवर्तन’ कहा जाता है।
इसी दिन प्रथम संघ की स्थापना हुई थी और भगवान बुद्ध ने एक गुरु के रूप में अपने ज्ञान की रश्मियों को संसार में बाँटना प्रारंभ किया था। इसलिए बौद्ध समुदाय इस दिन को धर्मचक्र दिवस और गुरु पूर्णिमा के रूप में अत्यंत श्रद्धा से मनाता है। इसी प्रकार जैन धर्म की परंपरा में भी इस तिथि का विशेष पौराणिक महत्व है।
जैन मान्यताओं के अनुसार, 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर ने केवलज्ञान प्राप्त करने के पश्चात आषाढ़ पूर्णिमा के दिन ही इंद्रभूति गौतम (गौतम स्वामी) को अपना प्रथम शिष्य स्वीकार किया था। इसके साथ ही भगवान महावीर ने अपने प्रथम गणधर की स्थापना की और गुरु-शिष्य परंपरा का सूत्रपात किया।
इसके अलावा योग परंपरा और हठयोग के इतिहास में आषाढ़ पूर्णिमा को अत्यंत अनोखा स्थान प्राप्त है। योगिक संस्कृति के अनुसार, इसी दिन भगवान शिव ‘आदिगुरु’ के रूप में प्रकट हुए थे। कांतिसरोवर के तट पर उन्होंने अपने हजारों वर्षों के मौन को तोड़ा था और योग का संपूर्ण विज्ञान अपने प्रथम सात शिष्यों (‘सप्तऋषि’) कहते हैं, को प्रदान किया था।
इस प्रकार योग परंपरा में भी आषाढ़ पूर्णिमा को ही इस धरती पर प्रथम गुरु के आगमन और योग ज्ञान के प्रथम वितरण का पर्व माना जाता है।
चातुर्मास का शुभारंभ और गुरु-शिष्य संबंध का आध्यात्मिक मर्म
आषाढ़ पूर्णिमा का दिन भारतीय ऋतुचक्र और आध्यात्मिक साधना की दृष्टि से भी बहुत महत्वपूर्ण मोड़ पर आता है। इसी तिथि से ‘चातुर्मास’ यानी चार महीनों के विशेष संयम और साधना काल का शुभारंभ होता है। आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद और आश्विन- ये चार महीने वर्षा ऋतु के महीने होते हैं।
प्राचीन काल में नदियाँ उफान पर होती थीं, रास्ते दुर्गम हो जाते थे और छोटे-छोटे कीट-पतंगों की उत्पत्ति के कारण भ्रमण करना कठिन होता था। इसलिए जैन, बौद्ध और सनातन परंपरा के साधु-संत, संन्यासी तथा परिव्राजक इस तिथि से एक ही स्थान पर रुककर चार महीनों के लिए प्रवास करते थे।
इस दौरान वे घूमना-फिरना बंद करके एक जगह रहकर केवल स्वाध्याय, ध्यान, तपस्या और अपने शिष्यों को ज्ञान दान देने का कार्य करते थे। साधक भी इस अवधि में गुरु के सानिध्य में रहकर अपनी आंतरिक चेतना को जागृत करते थे। गुरु-शिष्य का संबंध संसार के अन्य सभी लौकिक संबंधों से सर्वथा भिन्न और अलौकिक होता है।
यह संबंध किसी रक्त-संबंध, स्वार्थ या सांसारिक लेनदेन पर आधारित नहीं होता, बल्कि यह आत्मिक रूपांतरण का संबंध है। सनातन दर्शन में कहा गया है कि शिष्य एक कच्चे घड़े के समान होता है और गुरु उस कुम्हार की तरह होता है जो बाहर से सहारा देकर भीतर से उसे सुंदर रूप प्रदान करता है।
गुरु शिष्य की कमियों, अहंकार और अज्ञान को अपनी ज्ञान रूपी छैनी से काटकर उसमें से दिव्य स्वरूप को निखारते हैं। पूर्णिमा का चंद्रमा जिस प्रकार पूर्णता और कांति का प्रतीक है, उसी प्रकार गुरु पूर्णिमा यह संदेश देती है कि गुरु का सानिध्य प्राप्त करके शिष्य का मन भी अज्ञान के बादलों से मुक्त होकर ज्ञान के पूर्ण चंद्रमा की तरह चमक सकता है।
आधुनिक युग में गुरु पूर्णिमा की प्रासंगिकता
आज के आधुनिक और डिजिटल युग में गुरु पूर्णिमा का महत्व पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है। विज्ञान और तकनीक के इस दौर में इंटरनेट और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के माध्यम से सूचनाओं का असीमित भंडार हमारी पहुँच में है, लेकिन केवल जानकारी प्राप्त कर लेना ही वास्तविक ज्ञान नहीं होता।
ज्ञान वह प्रकाश है, जो व्यक्ति को सही निर्णय लेने, जीवन के उद्देश्य को समझने और सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है और यह प्रकाश केवल एक योग्य गुरु ही प्रदान कर सकता है। आज का मनुष्य भौतिक रूप से समृद्ध होने के बावजूद मानसिक तनाव, अकेलेपन, दिशाहीनता और मूल्यों के संकट से जूझ रहा है।
ऐसे समय में गुरु केवल शिक्षा देने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि जीवन का सच्चा मार्गदर्शक बनकर सामने आता है। वह अपने अनुभव, आदर्शों और संस्कारों के माध्यम से शिष्य को धैर्य, संयम, विवेक और सही-गलत में अंतर करने की क्षमता प्रदान करता है। गुरु ही व्यक्ति के भीतर छिपी संभावनाओं को जागृत कर उसे आत्मविकास की दिशा में अग्रसर करता है।
गुरु पूर्णिमा हमें यह संदेश देती है कि चाहे हम विज्ञान, तकनीक और भौतिक उन्नति की कितनी भी ऊँचाइयों तक क्यों न पहुँच जाएँ, अपने गुरु, शिक्षकों और जीवन में सही दिशा दिखाने वाले प्रत्येक मार्गदर्शक के प्रति श्रद्धा, सम्मान और कृतज्ञता का भाव कभी कम नहीं होना चाहिए।
यही विनम्रता और कृतज्ञता मनुष्य के चरित्र को महान बनाती है और समाज में ज्ञान, नैतिकता, सद्भाव और शांति की मजबूत नींव स्थापित करती है।
सच्ची खोजी पत्रकारिता की पहचान यह होती है कि वह लोगों के सामने छिपे हुए तथ्य लेकर आती है। इसके विपरीत, किसी खास एजेंडे के तहत की जाने वाली पत्रकारिता की पहचान यह है कि वह पहले से ही एक नतीजा तय कर लेती है और फिर अपनी बात को सही साबित करने के लिए सामान्य घटनाओं और तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करती है।
न्यूजलॉन्ड्री की रिपोर्ट-‘CJP के प्रदर्शन के पास पत्थरों से भरा ट्रक कहाँ से आया? हमने पता लगाया’ इसी तरह के एजेंडा को सिद्ध करने वाली पत्रकारिता का एक सटीक उदाहरण है।
साभार: न्यूजलॉन्ड्री
न्यूजलॉन्ड्री ने अपनी इस रिपोर्ट में शब्दों का ऐसा हेर-फेर किया, जिससे पाठकों को ये लगे कि दिल्ली पुलिस ने जानबूझकर पत्थरों से भरा डंपर ट्रक संसद मार्ग थाने के पास खड़ा किया था।
रिपोर्ट बिना कोई सबूत पेश किए, यह दिखाने की कोशिश करती है कि पुलिस का मकसद 20 जुलाई को होने वाले CJP के प्रदर्शनकारियों को हिंसा के लिए उकसाना था या फिर उन्हें झूठे मामलों में फँसाना था।
दिलचस्प बात यह है कि न्यूजलॉन्ड्री ने अपनी रिपोर्ट में साजिश को साबित करने के लिए जो बिंदु दिए हैं वही उनकी पूर कहानी को खारिज करते हैं।
सामान्य पुलिस कार्रवाई को न्यूजलॉन्ड्री ने दिखाया सनसनीखेज
न्यूजलॉन्ड्री की अपनी ही रिपोर्ट के मुताबिक, 16 जुलाई की सुबह करीब 4:15 बजे फिरोजशाह रोड और कस्तूरबा गाँधी मार्ग के चौराहे पर इस डंपर ट्रक ने एक मारुति ईको गाड़ी को टक्कर मार दी थी। इस हादसे में ईको सवार सात लोग घायल हुए थे और केस भी दर्ज हुआ था। हादसे के बाद क्षतिग्रस्त ईको और टक्कर मारने वाले डंपर ट्रक-दोनों को जब्त करके संसद मार्ग थाने लाया गया था।
अब यहाँ ये समझने की जरूरत है कि सड़क हादसों से जुड़े किसी भी आपराधिक मामले में पुलिस की कार्रवाई ठीक इसी तरह होती है।
जिन गाड़ियों से एक्सीडेंट होता है और लोग घायल होते हैं, उन्हें पुलिस सबूत के तौर पर ज़ब्त करती है। और, जब तक कानूनी औपचारिकताएँ, गाड़ियों की जाँच, बीमा की कागजी कार्रवाई और कोर्ट की प्रक्रियाएँ पूरी नहीं हो जातीं, तब तक वे गाड़ियाँ पुलिस की हिरासत में ही रहती हैं।
ऐसे में जब न्यूजलॉन्ड्री जैसे संस्थान बार-बार ट्रक को हाईलाइट करते हैं कि चार दिन बाद भी डंपर संसद मार्ग के पास क्यों खड़ा था और मारुति ईको कहाँ थी?
तो, क्या साफ तौर पर वह सवाल नहीं उठा रहे कि दिल्ली पुलिस ने ही प्रदर्शनकारियों को पत्थर फेंकने पर मजबूर किया…?
गाड़ियों की दुर्दशा बयां करती हैं असली कहानी
हकीकत यह है कि 16 जुलाई को जो टक्कर हुई थी ऐसी भयावह घटना थी कि उसमें गाड़ी का पिछला हिस्सा पूरी तरह चकनाचूर हो गया था। दोनों गाड़ियाँ इस मामले में अहम सबूत थीं। उन्हें पुलिस हिरासत में रखना कोई अनोखी बात नहीं थी बल्कि यह कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा थी। अगर दिल्ली पुलिस इनमें से किसी भी गाड़ी को छोड़ देती तो उलटा उनकी जाँच करने के ढंग पर ही सवाल खड़े होते।
बावजूद इस तथ्य के न्यूजलॉन्ड्री ने अपनी रिपोर्ट में बार-बार ‘पत्थरों से भरा ट्रक’ शब्द इस्तेमाल किया ताकि लोगों के मन में छवि बने कि दंगे जैसी स्थिति पैदा करने में पुलिस का हाथ था।
ट्रक में पत्थर नहीं है असली सच्चाई
खोजी पत्रकारिता की आड़ में की गई ये रिपोर्ट खुद बताती है कि एक्सीडेंट के वक्त डंपर ट्रक ‘निर्माण सामग्री’ लेकर जा रहा था और एक्सीडेंट के कारण उसे जब्त करके वहाँ खड़ा किया गया।
खुद ट्रक के पुराने मालिक और हादसे में घायल पीड़ितों ने इस बात की पुष्टि की है कि एक्सीडेंट के समय डंपर में क्या था।
इसके अलावा ये बताने की जरूरत नहीं है कि निर्माण कार्य में इस्तेमाल होने वाले डंपर का काम ईंट-बजरी और पत्थर ले जाना होता है। ऐसे में अगर जब्त किए गए ट्रक में पत्थर मिला तो यह कोई हैरान करने वाली घटना नही है।
न्यूजलॉन्ड्री ने बस इसे सनसनीखेज बनाकर ऐसे पेश किया है कि लोगों के मन में संदेह खड़ा हो और वो पुलिस की भूमिका पर शक करने लगें।
पुलिसकर्मियों के अलग-अलग बयानों को पेश किया साजिश की तरह
न्यूजलॉन्ड्री की पूरी रिपोर्ट इस बात के इर्द-गिर्द घूमती है कि अलग-अलग पुलिस अधिकारियों ने ट्रक को खाली करने या उसे खड़ा करने की जगह को लेकर थोड़े अलग-अलग बयान दिए।
अब ये समझने की जरूरत है कि प्रशासनिक अधिकारियों के अलग-अलग बयानों पर स्पष्टीकरण तो माँगा जा सकता है लेकिन इससे किसी आपराधिक साजिश के सबूत नहीं मिल जाते।
भारत के पुलिस थानों में जगह की कमी, जाँच की ज़रूरत, अदालत के निर्देशों या प्रशासनिक सहूलियत के हिसाब से ज़ब्त गाड़ियों को हटाना या दूसरी जगह पार्क करना एक आम बात है।
संसद मार्ग पुलिस स्टेशन दिल्ली के सबसे व्यस्त इलाकों में से एक है, जहाँ गाड़ियों के लिए अनगिनत पार्किंग की जगह नहीं होती।
इसके बावजूद, न्यूजलॉन्ड्री ने पुलिस के इस सामान्य-से प्रशासनिक फैसले को एक बड़ी और गहरी साजिश का रूप देने की कोशिश की है।
रिपोर्ट में सिर्फ मनगढ़ंत बातें और इशारे हैं, लेकिन सबूत का एक भी अंश नहीं है।
क्या चाहता था न्यूजलॉन्ड्री
न्यूजलॉन्ड्री की बनाई इस कहानी पर विश्वास करने के लिए पाठकों को एक सिर्फ काल्पनिक बातें सोचनी पड़ेगी। जैसे- दिल्ली पुलिस को एक्सीडेंट के दिन ही बात पहले से पता होगी कि शांतिपूर्ण प्रोटेस्ट के नाम पर इकट्ठा हो रही भीड़ चार दिन बाद यानी 20 जुलाई को अचानक हिंसक रूप ले लेगी। या सीजेपी प्रदर्शनकारी खुद आकर उस जब्त डंपर से पत्थर उठाएँगे और पुलिस पर ही हमला कर देंगे, ताकि पुलिस का बनाया प्लान कामयाब हो सके!
यह कोई खोजी पत्रकारिता नहीं बल्कि सिर्फ एक मनगढ़ंत कहानियाँ हैं, जिसके जरिए पाठकों को इस दिशा में भ्रमित करने का प्रयास किया जा रहा है कि वो हर चीज को आपस में जोड़ें और ये समझें कि इनका पत्थरों से भरे ट्रक का संसद मार्ग पर दिखना और फिर पत्थरबाजी होने के बीच कुछ तो कनेक्शन जरूर है।
मनगढ़ंत कहानियाँ बनाईं, नहीं पूछा असली सवाल
न्यूजलॉन्ड्री ने अपने एजेंडे को फैलाने के लिए ट्रक में रखे पत्थरों, गुमनाम सूत्रों और मनगढ़ंत दावों पर पूरी रिपोर्ट कर डाली लेकिन वो असली सवाल पूछना भूल गए।
अपनी रिपर्ट में उन्होंने एक भी बार ये पूछना उचित नहीं समझा कि प्रदर्शन के दौरान दिल्ली पुलिस के जवानों के ऊपर किसने और क्यों हमला किया।
क्या उनके इस रवैये से ये साफ नहीं होता कि वो सिर्फ ये साबित करने की जुगत में है किसी भी तरह सीजेपी प्रदर्शन में हिंसा करने वाले उपद्रवियों का अपराध कम दिखाई दे और सवाल खड़े हो तो सिर्फ पुलिस पर।
डंपर ट्रक को लेकर कहानी साफ थी कि एक गंभीर एक्सीडेंट के बाद गाड़ियाँ पुलिस कस्टडी में ली गईं। न्यूजलॉन्ड्री ने केवल कुछ एक्सक्लूजिव देने की चाह में अपनी रिपोर्ट को ऐसे पेश किया कि लोग नियम-कानून पर ही सवाल उठा दें।
अयोध्या की श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने राम मंदिर के प्रशासनिक ढाँचे को मजबूत करने के लिए एक बड़ा कदम उठाया है। ट्रस्ट ने मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) की नियुक्ति से पहले जगदीश आफले को पहला सचिव नियुक्त किया है। जगदीश आफले की नियुक्ति पर 2 सितंबर को होने वाली ट्रस्ट की बैठक में औपचारिक मुहर लगेगी।
इसके साथ ही जगदीश आफले ट्रस्ट के भारतीय स्टेट बैंक (SBI) खातों का अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता भी बनाया गया है। काफी समय से राम मंदिर में दान चारो विवाद को लेकर ट्रस्ट की कार्यप्रणाली में ये बदलाव किया गया है और सचिव की नियुक्ति को भी इसी प्रक्रिया का हिस्सा माना गया है।
CEO से पहले सचिव की नियुक्ति क्यों हुई
राम मंदिर ट्रस्ट ने पहले ही CEO, सचिव और प्रवक्ता जैसे नए प्रशासनिक पद बनाने का फैसला किया था। लेकिन CEO की नियुक्ति की प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हो सकी है।
ट्रस्ट के अनुसार CEO पद के लिए करीब 5200 आवेदन मिले हैं। इन आवेदनों की जाँच और चयन की प्रक्रिया रिटायर्ड जस्टिस प्रमोद कोहली की अध्यक्षता वाली समिति कर रही है। इस प्रक्रिया में समय लगना तय है। ऐसे में प्रशासनिक काम प्रभावित न हो, इसलिए पहले सचिव की नियुक्ति कर दी गई।
कौन है जगदीश आफले?
जगदीश आफले महाराष्ट्र के पुणे के रहने वाले हैं। वह पेशे से इलेक्ट्रिकल इंजीनियर हैं। जगदीश आफले ने IIT मुबंई से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में बीटेक और एमटेक की पढ़ाई की है। इसके बाद उन्होंने कई बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों में काम किया है। यूरोप और अमेरिका की कंपनियों में भी उन्होंने लंबे समय तक अपनी सेवाएँ दी है।
रिटार्यड के बाद वह भारत लौट आए। जब राम मंदिर निर्माण का रास्ता साफ हुआ तो जगदीश आफले ने अपने पेशेवर अनुभव को मंदिर निर्माण के लिए समर्पित कर दिया। उन्होंने बिना किसी वेतन के प्रोजेक्ट मैनेजर की जिम्मेदारी संभाली। मंदिर निर्माण की निगरानी और परियोजना प्रबंधन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
RSS से है पुराना जुड़ाव
बता दें कि जगदीश आफले बचपन से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़े रहे हैं। राम मंदिर निर्माण का फैसला आने के बाद संघ ने उन्हें परियोजना प्रबंधन की जिम्मेदारी सौंपी थी।
तभी से वह अयोध्या में रहकर मंदिर निर्माण से जुड़े सभी प्रमुख कार्यों की देखरेख कर रहे हैं। वह तीर्थ क्षेत्र भवन में अपनी पत्नी के साथ रह रहे हैं। उनके अनुभव और लंबे जुड़ाव को देखते हुए ट्रस्ट ने अब उन्हें सचिव की नई जिम्मेदारी सौंपी है।
बैंक खातों के संचालन की जिम्मेदारी मिली
जगदीश आफले को केवल सचिव ही नहीं बनाया गया है। उन्हें ट्रस्ट की ओर से भारतीय स्टेट बैंक में अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता भी नियुक्त किया गया है। पूर्व महासचिव चंपत राय और ट्रस्टी डॉ अनिल मिश्रा के पद छोड़ने के बाद बैंक खातों के संचालन को लेकर नई व्यवस्था की जरूरत थी।
इसी कारण ट्रस्ट ने उनका नाम SBI को भेजा। शुरुआती दौर में कानूनी प्रक्रियाओं के चलते कुछ देरी हुई, लेकिन बाद में नया प्रस्ताव भेजे जाने के बाद बैंक ने मंजूरी दे दी। अब ट्रस्ट के खातों का संचालन सामान्य रूप से शुरू हो गया है।
बता दें कि 6 जुलाई को हुई ट्रस्ट की बैठक में तत्कालीन महासचिव चंपत राय और ट्रस्टी डॉ अनिल मिश्रा के इस्तीफे स्वीकार किए गए थे। इसके बाद अधिकृत हस्ताक्षरकर्ताओं में बदलाव का फैसला लिया गया।
पहले अंतरिम महासचिव कृष्ण मोहन और जगदीश आफले के नाम SBI को भेजे गए थे। लेकिन ट्रस्ट डीड के प्रावधानों के आधार पर बैंक ने यह सवाल उठाया कि आफले ट्रस्टी नहीं हैं। इसके बाद कानूनी राय माँगी गई, जिससे कुछ समय के लिए खाता संचालन प्रभावित हो गया। बाद में ट्रस्ट ने नया प्रस्ताव भेजा और SBI ने उसे मंजूरी दे दी।
बैंक खातों के संचालन में आई रुकावट का असर ट्रस्ट के वित्तीय कामकाज पर भी पड़ा। करीब एक हजार कर्मचारियों का जून महीने का वेतन समय पर जारी नहीं हो सका था।
इसके अलावा ट्रस्ट से जुड़ी कई आउटसोर्सिंग एजेंसियों के भुगतान में भी देरी हुई। हालाँकि SBI के मुख्य महाप्रबंधक दिपेश राज ने साफ कहा था कि बैंक और ट्रस्ट के बीच कोई विवाद नहीं है। उन्होंने कहा कि ट्रस्ट के खातों से सभी जरूरी लेन-देन SBI की ओर से किए जा रहे हैं।
2 सितंबर की बैठक में लगेगी औपचारिक मुहर
श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की 2 सितंबर को होने वाली बैठक में जगदीश आफले की नियुक्ति पर औपचारिक मंजूरी दी जाएगी। इसके बाद वह सचिव के रूप में अपनी जिम्मेदारियाँ संभालेंगे।
वहीं CEO और प्रवक्ता की नियुक्ति की प्रक्रिया भी आगे बढ़ेगी। ट्रस्ट का मानना है कि नए प्रशासनिक ढांचे से वित्तीय पारदर्शिता बढ़ेगी और मंदिर का प्रशासन पहले से ज्यादा व्यवस्थित और मजबूत होगा।
दान चोरी के मामले के बाद बदला प्रशासनिक ढांचा
हाल ही में राम मंदिर में दान राशि की कथित चोरी का मामला सामने आया था। इसके बाद ट्रस्ट की कार्यप्रणाली और वित्तीय व्यवस्था को लेकर कई सवाल उठे। इसी के बाद ट्रस्ट ने प्रशासनिक ढांचे को और मजबूत बनाने का फैसला किया। सचिव पद का सृजन और उस पर नियुक्ति इसी बदलाव का हिस्सा है। आने वाले समय में ट्रस्ट प्रवक्ता की भी नियुक्ति करेगा, ताकि सभी आधिकारिक जानकारियाँ एक तय व्यवस्था के तहत सार्वजनिक की जा सकें।
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने सोमवार (27 जुलाई 2026) को घोषणा की कि वह 15वीं-16वीं शताब्दी के रहस्यवादी कवि-संत गुरु रविदास जी की 650वीं जयंती (प्रकाश पर्व) मनाने के लिए एक राष्ट्रव्यापी कार्यक्रम शुरू करने जा रही है। ‘समरसता संकल्प अभियान’ (सामाजिक समरसता और संकल्प के लिए अभियान) 29 जुलाई 2026 से 20 फरवरी 2027 तक लगभग सात महीनों तक चलेगा।
गुरु पूर्णिमा के अवसर पर वाराणसी के सीर गोवर्धनपुर स्थित उनकी जन्मस्थली पर इसका आधिकारिक उद्घाटन होगा। उत्तर प्रदेश के समाज कल्याण मंत्री असीम अरुण ने जानकारी दी कि 28 और 29 जुलाई को विशेष कार्यक्रमों के बीच इसकी शुरुआत की जाएगी। 28 जुलाई को सीर गोवर्धनपुर में पवित्र माटी का पूजन किया जाएगा।
गुरु रविदास स्मारक परिसर से 131 कलशों को एक भव्य जुलूस में औपचारिक पूजा के लिए उनके जन्मभूमि मंदिर ले जाया जाएगा। इसके लिए उत्तर प्रदेश के विभिन्न राज्यों और जिलों से कलश लेकर टीमें वाराणसी में एकत्र होंगी। प्रत्येक गाँव को इस मिट्टी से भरे 104 कलश सौंपे जाएँगे और अन्य 27 कलश दूसरे राज्यों में भेजे जाएँगे।
उत्तर प्रदेश के 98 संगठनात्मक जिला इकाइयों और छह क्षेत्रीय प्रभागों तथा 27 अन्य राज्यों के भाजपा प्रतिनिधि कलश प्राप्त करेंगे और फिर उन्हें विभिन्न मंदिरों और संत सम्मेलनों में ले जाएँगे। माघ पूर्णिमा और गुरु रविदास जयंती के अवसरों पर भारत के विभिन्न हिस्सों में कई कार्यक्रम आयोजित किए जाएँगे।
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और डेरा सचखंड बल्लां के प्रमुख व गुरु रविदास जन्म स्थान मंदिर के प्रमुख संत निरंजन दास सभी इस औपचारिक शुरुआत के अवसर पर मौजूद रहेंगे।
दीपोत्सव से लेकर महीने भर की यात्रा तक, भाजपा ने बनाई कई कार्यक्रमों की योजना
भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव तरुण चुघ और दुष्यंत कुमार गौतम ने जानकारी देते हुए बताया कि वाराणसी से पूरे भारत में 131 कलश भेजे जाएँगे। 21,000 स्थानों पर सामाजिक समरसता की पहल की जाएगी और 51,000 मंदिरों में दीपोत्सव मनाया जाएगा। एक ‘गुरु रविदास महाराज समरसता दीप अभियान’ आयोजित किया जाएगा, जिसके तहत रविदास घाट और उनके स्मारक स्थल पर 11,000 दीपक जलाए जाएँगे। 29 जुलाई को भाजपा के सभी मंडल और संत को समर्पित मंदिर दीपोत्सव मनाएँगे।
पार्टी पदाधिकारियों ने रेखांकित किया कि मोदी सरकार ने गुरु रविदास की विरासत को सहेजने के लिए उनके मूल स्थान, तीर्थ मार्गों, हवाई अड्डों, विशेष ट्रेनों का विकास किया है और उनसे जुड़े कई स्थलों का जीर्णोद्धार किया है। चुघ के अनुसार, इस हालिया प्रयास का उद्देश्य समानता, सामाजिक शांति और जन जागरूकता पर उनके उपदेशों का प्रसार करना है।
उन्होंने ध्यान दिलाया कि उस दौर में सिकंदर खान लोदी, तुगलक और तैमूर या तमेरलेन देश भर में “धर्मांतरण कराने और मंदिरों को ध्वस्त करने में लगे हुए थे।” गौतम ने कहा, “उस समय उनका एक ही नारा था ‘तलवार या कुरान’। उस मध्यकालीन काल में लोगों के पास अपने विचार व्यक्त करने का कोई साधन नहीं था और हर तरफ व्यापक संकट का माहौल था।”
उन्होंने आगे कहा कि “गोस्वामी तुलसीदास, कबीर दास, संत तुकाराम, गुरु नानक और चैतन्य महाप्रभु सहित भक्ति आंदोलन के कई महान संत उभरे,” जिन्होंने “संस्कृत में संरक्षित ज्ञान और मूल्यों को अपनी-अपनी क्षेत्रीय भाषाओं के माध्यम से जनता तक पहुँचाया, जिससे सार्वजनिक जागरूकता पैदा हुई और पूरे देश में समाज को नई दिशा मिली।”
भाजपा प्रवक्ता ने बताया कि गुरु रविदास ने उस समय बहुत महत्वपूर्ण योगदान दिया था और इसलिए कबीर द्वारा उन्हें ‘संत शिरोमणि गुरु रविदास जी’ की उपाधि दी गई थी। गौतम के अनुसार, समतावादी समाज की उनकी 650 साल पुरानी अवधारणा अपने समय से काफी आगे थी। साल 1837 में अब्राहम लिंकन ने गुलामी के खिलाफ एक अभियान शुरू किया था और डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने संविधान बनाते समय समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के मूल्यों को स्थापित किया था।
उन्होंने कहा उन लोगों से बहुत पहले गुरु रविदास पहले ही ‘छोटे-बड़े सब बसे’ का संदेश दे चुके थे। उन्होंने एक जातिविहीन समाज और ‘बेगमपुरा’ की कल्पना की थी, एक ऐसी जगह जहाँ न दुख है और न ही कोई कष्ट।
भाजपा अनुसूचित जाति मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष लाल सिंह आर्य ने जोर देकर कहा कि इसका उद्देश्य सभी समूहों के बीच सामाजिक समरसता को बढ़ावा देना और यह सुनिश्चित करना है कि विकसित भारत के निर्माण में हर समुदाय शामिल हो। उन्होंने कहा कि संत का मार्ग ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास, सबका प्रयास’ की आधारशिला के रूप में कार्य करता है और यह मिशन सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय एकता के लिए एक व्यापक आंदोलन बन जाएगा।
आर्य ने जोर देकर कहा, “गुरु रविदास ने मानव कल्याण, समानता और सामाजिक समरसता के लिए काम किया। वे धर्मांतरण के खिलाफ थे। उनके संदेश और विचारों को 650 जयंती कार्यक्रमों के माध्यम से लोगों तक पहुँचाया जाएगा।” उन्होंने खुलासा किया कि इस उद्देश्य के लिए 20 से 23 जुलाई तक राज्य स्तरीय कार्यशालाएँ, 25 से 27 जुलाई तक जिला स्तरीय कार्यशालाएँ और 19 जुलाई को दिल्ली में एक राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन किया गया था। ये तैयारियाँ 18 राज्यों में हुईं।
अभियान के मुख्य रूप से पाँच चरण निर्धारित हैं। राष्ट्रीय, राज्य, जिला और मंडल स्तर पर 29 जुलाई से 10 सितंबर तक ‘श्री गुरु रविदास महाराज कलश वंदन अभियान’ चलाया जाएगा।
उत्तर प्रदेश के 98 संगठनात्मक जिला इकाइयों और छह क्षेत्रीय प्रभागों तथा 27 अन्य राज्यों के भाजपा प्रतिनिधि इन कलशों को प्राप्त करेंगे और फिर उन्हें विभिन्न मंदिरों और संत सम्मेलनों में ले जाएँगे। 29 जुलाई से 31 अगस्त तक एक ‘संत संपर्क अभियान’ भी चलाया जाएगा, जिसमें संतों, महात्माओं, गुरुओं और महंतों से आशीर्वाद देने का अनुरोध किया जाएगा।
5 अक्टूबर से 5 नवंबर तक श्री गुरु रविदास महाराज समरसता यात्रा’ जालंधर से वाराणसी के लिए रवाना होगी, जो जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, चंडीगढ़, हरियाणा, दिल्ली और मध्य प्रदेश से होकर गुजरेगी। 26 नवंबर से 15 जनवरी तक ‘श्री गुरु रविदास महाराज छात्रवास संपर्क अभियान’ प्रस्तावित है।
इसके अलावा, छात्र, छात्रावास और धार्मिक संगठन संपर्क अभियान और जुलूसों में भाग लेंगे। भाजपा गुरबाणी पाठ और भजन संध्या का आयोजन करने के लिए भी तैयार है। इसके शीर्ष नेता समरसता संकल्प सभा को संबोधित करेंगे और पार्टी को कम से कम 25,000 लोगों की उपस्थिति सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया है।
महत्वपूर्ण मोड़ पर लिया गया अहम निर्णय
साल 2027 की शुरुआत में उत्तर प्रदेश और पंजाब सहित पाँच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। हालाँकि भाजपा नेताओं ने इस यात्रा का इन चुनावों से किसी भी तरह के संबंध का कड़ाई से खंडन किया है। पार्टी ने अतीत में भी बड़े पैमाने पर गुरु रविदास जयंती मनाई है।
द इंडियन एक्सप्रेस ने अंदरूनी सूत्रों के हवाले से रिपोर्ट दी है कि यह पहली बार है जब उनके अनुयायी दलित समुदाय, जिन्हें रविदासिया कहा जाता है और जो पंजाब तथा उत्तर प्रदेश में भारी संख्या में केंद्रित हैं, से जुड़ने के लिए इतना लंबा अभियान तैयार किया गया है।
उत्तर प्रदेश में दलितों की आबादी 21% है और राज्य की 403 विधानसभा सीटों में से 84 सीटें उनके लिए आरक्षित हैं। 2022 के विधानसभा चुनावों में भाजपा और उसकी सहयोगी अपना दल (सोनेलाल) ने मिलकर 63 अनुसूचित जाति (एससी) सीटें जीती थीं, जबकि तत्कालीन समाजवादी पार्टी के नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन को 20 सीटें मिली थीं।
पंजाब की 117 सदस्यीय विधानसभा में जहाँ दलितों की आबादी 32% है, इस समुदाय के लिए 34 सीटें आरक्षित हैं। 2022 के विधानसभा चुनावों में भगवा पार्टी इनमें से एक भी सीट हासिल नहीं कर पाई थी। पंजाब के दोआबा क्षेत्र में 12 लाख से अधिक रविदासिया रहते हैं, जिसमें कपूरथला, होशियारपुर, नवांशहर और जालंधर जिले शामिल हैं। इस क्षेत्र में दलितों की आबादी लगभग 45% है, जो राज्य के औसत से कहीं अधिक है।
दिलचस्प बात यह है कि 2022 के विधानसभा चुनावों की तारीख को 14 फरवरी से बदलकर 20 फरवरी कर दिया गया था, जब पार्टियों ने आपत्ति जताई थी कि तारीखों का गुरु रविदास जयंती से टकराव होगा, जिसके कारण बड़ी संख्या में रविदासिया वाराणसी जाते हैं। उत्तर प्रदेश और पंजाब की राजनीति में दलितों की प्रमुखता ने आगामी चुनावों से पहले समुदाय पर भाजपा का विशेष ध्यान आकर्षित किया है।
विशेष रूप से जालंधर और वाराणसी के बीच यह यात्रा पंजाब और उत्तर प्रदेश के बीच के शहरों और गांवों, विशेष रूप से बड़ी दलित आबादी वाले क्षेत्रों में रुकेगी।
मोदी सरकार ने गुरु रविदास का ऐतिहासिक सम्मान कैसे किया
बता दें कि 1 फरवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गुरु रविदास की 649वीं जयंती मनाने के लिए पंजाब पहुँचे थे। वे जालंधर में वैश्विक रविदासिया समुदाय के एक प्रमुख आध्यात्मिक केंद्र अत्यधिक प्रभावशाली डेरा सचखंड बल्लां गए, जहाँ उन्होंने माथा टेका और सार्वजनिक समारोहों में भाग लिया।
20वीं शताब्दी की शुरुआत में स्थापित डेरा सचखंड बल्लां धीरे-धीरे दलित सशक्तिकरण का एक केंद्र बन गया, विशेष रूप से SC समुदाय की उस जाति के बीच जो ऐतिहासिक रूप से छुआछूत का शिकार रहे हैं और आमतौर पर चमड़ा उद्योग से जुड़े हैं। इसके प्रमुख संत निरंजन दास को इस वर्ष पद्म श्री से सम्मानित किया गया है।
इसी तरह सरकार की ओर से इस महीने अमृतसर और वाराणसी के बीच पहली सीधी एसी ट्रेन ‘संत रविदास एक्सप्रेस’ शुरू की गई है, जिससे पीएम मोदी के संत निरंजन दास से मिलने के कुछ महीनों बाद रविदासिया समुदाय की एक पुरानी इच्छा पूरी हुई है। हर साल अनगिनत श्रद्धालु मुख्य रूप से दोआब क्षेत्र से गुरु रविदास की जयंती मनाने के लिए सीर गोवर्धनपुर जाते हैं।
बरसों से श्रद्धालु इस मार्ग पर सीधी ट्रेन का इंतजार कर रहे थे, खासकर डिब्बों में वातानुकूलन (एसी) की सुविधा के साथ। संत रविदास एक्सप्रेस यात्रा के आराम में सुधार करेगी और वार्षिक उत्सवों के दौरान भारी भीड़ के दबाव को कम करेगी। उनकी 650वीं जयंती के लिए एक विशेष टेंट सिटी की भी योजना बनाई जा रही है, जिसके एक बड़े समागम होने का अनुमान है।
पीएम मोदी 23 फरवरी 2024 को वाराणसी में पूज्य संत की 647वीं जयंती के अवसर पर शामिल हुए और उन्होंने इस अवसर पर भाषण दिया। उन्होंने संत रविदास संग्रहालय की आधारशिला भी रखी और सीर गोवर्धनपुर में उनके मंदिर के पास एक पार्क में उनकी मूर्ति का अनावरण किया।
साल 2022 में रविदास जयंती पर पीएम मोदी ने दिल्ली के करोल बाग स्थित श्री गुरु रविदास विश्राम धाम मंदिर का भी दौरा किया था। उन्होंने ‘शब्द कीर्तन’ में भाग लिया और संत को समर्पित भजनों की धुन पर उत्साहपूर्वक ‘झीका’ बजाया था।
(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)
ओडिशा सरकार ने कंधमाल जिले के फूलबनी में स्थित सरकारी मेडिकल कॉलेज और अस्पताल का नाम बदलकर पूज्य हिंदू नेता और आध्यात्मिक व्यक्तित्व, स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती के नाम पर रखने का फैसला किया है। सोमवार (27 जुलाई 2026) को इस कदम की घोषणा करते हुए मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी ने कहा कि इस फैसले का उद्देश्य क्षेत्र के जनजातीय समुदायों के लिए स्वामी जी के जीवनभर के समर्पण, सेवा और बलिदान को सम्मानित करना है, ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए उनकी स्मृति सुरक्षित रहे।
मेडिकल संस्थान के नामकरण के साथ ही मुख्यमंत्री ने मुख्यमंत्री विशेष सहायता (सीएमएसए) कोष से ₹13 करोड़ के अनुदान को मंजूरी दी है। यह वित्तीय आवंटन स्वामी जी के आश्रम, आश्रम स्कूल और जलेस्पटा स्थित कन्याश्रम के व्यापक विकास और संरक्षण के लिए निर्देशित किया गया है।
Govt medical college in Phulbani to be named after Laxmanananda Saraswati, announces #Odisha CM
CM sanctions Rs 13 crore for development of Jaleshpeta Ashram founded by the late VHP leader pic.twitter.com/E0uERltZXA
मुख्यमंत्री कार्यालय के एक आधिकारिक बयान के मुताबिक, “यह राशि स्वामी जी के आश्रम की विरासत को सहेजने और उनकी स्मृतियों को जीवित रखने के लिए आवंटित की गई है।” इस वित्तीय पैकेज का उद्देश्य स्थानीय छात्रों की बेहतर सेवा के लिए परिसर में शैक्षणिक और आवासीय दोनों प्रकार की ढांचागत सुविधाओं को मजबूत करना है।
जलेस्पटा परिसर में रहने और सीखने की स्थितियों में सुधार के उद्देश्य से स्वीकृत ₹13 करोड़ के विकास पैकेज के तहत कई प्रमुख बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं की रूपरेखा दी गई है। स्वीकृत राशि में से ₹5 करोड़ विशेष रूप से 300 सीटों वाले नए बालिका छात्रावास के निर्माण के लिए रखे गए हैं, जबकि ₹3 करोड़ स्वामी जी के विरासत स्थल के संरक्षण और ऐतिहासिक रखरखाव के लिए तय किए गए हैं।
लंबे समय से चली आ रही बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए, जलेस्पटा आश्रम, इसके स्कूल और आवासीय सुविधाओं के लिए एक विश्वसनीय पानी की आपूर्ति सुनिश्चित करने के उद्देश्य से एक मेगा रिवर लिफ्ट परियोजना के लिए ₹60 लाख आवंटित किए गए हैं। शेष धनराशि कक्षाओं के निर्माण, चारदीवारी बनाने, शौचालय सुविधाओं का विस्तार करने और मौजूदा छात्रावास भवनों के जीर्णोद्धार सहित आवश्यक कार्यों को पूरा करेगी।
स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती का जीवन और मिशन
स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती एक प्रमुख समाज सुधारक थे जिन्होंने अपने जीवन के चार दशक से अधिक समय ओडिशा में जनजातीय आबादी के कल्याण, शिक्षा और आध्यात्मिक संरक्षण के लिए समर्पित कर दिए। वनवासियों को सशक्त बनाने में गहरा विश्वास रखते हुए, उन्होंने हिमालय में वर्षों की तपस्या से लौटने के तुरंत बाद 1966 में चकपाद में एक आश्रम की स्थापना की।
यह समझते हुए कि सामाजिक उत्थान के लिए शिक्षा महत्वपूर्ण थी, उन्होंने स्थानीय युवाओं को स्नातक स्तर तक की संरचित शिक्षा प्रदान करने के लिए गुरुकुल संस्कृति विद्यालय की स्थापना की। शिक्षा से परे, स्वामी जी सांस्कृतिक संरक्षण के लिए गहराई से प्रतिबद्ध थे। वे गोहत्या के खिलाफ सक्रिय रूप से अभियान चलाते थे और पारंपरिक जगन्नाथ यात्राओं जैसी पहलों के माध्यम से स्वदेशी समुदायों को उनकी विरासत से फिर से जोड़ने के आंदोलनों का नेतृत्व करते थे।
स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती का जीवन और मिशन
स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती एक प्रमुख समाज सुधारक थे जिन्होंने अपने जीवन के चार दशक से अधिक समय ओडिशा में जनजातीय आबादी के कल्याण, शिक्षा और आध्यात्मिक संरक्षण के लिए समर्पित कर दिए। वनवासियों को सशक्त बनाने में गहरा विश्वास रखते हुए, उन्होंने हिमालय में वर्षों की तपस्या से लौटने के तुरंत बाद 1966 में चकपाद में एक आश्रम की स्थापना की।
यह समझते हुए कि सामाजिक उत्थान के लिए शिक्षा महत्वपूर्ण थी, उन्होंने स्थानीय युवाओं को स्नातक स्तर तक की संरचित शिक्षा प्रदान करने के लिए गुरुकुल संस्कृति विद्यालय की स्थापना की। शिक्षा से परे, स्वामी जी सांस्कृतिक संरक्षण के लिए गहराई से प्रतिबद्ध थे। वे गोहत्या के खिलाफ सक्रिय रूप से अभियान चलाते थे और पारंपरिक जगन्नाथ यात्राओं जैसी पहलों के माध्यम से स्वदेशी समुदायों को उनकी विरासत से फिर से जोड़ने के आंदोलनों का नेतृत्व करते थे।
ईसाई मिशनरियों के निशाने पर थे स्वामी जी
स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती के आरएसएस (RSS) के साथ करीबी संबंध थे और वे विश्व हिंदू परिषद (VHP) से जुड़े हुए थे। वे चकपाद में आश्रम स्थापित करके 35 वर्षों से जनजातीय समाज के बीच हिंदुत्व के प्रति जागरूकता फैला रहे थे। वे आदिवासियों के ईसाई धर्मांतरण के खिलाफ मुखर थे और सुदूर क्षेत्रों में धर्मांतरण के प्रयासों के खिलाफ सक्रिय रूप से काम करते थे, जागरूकता पैदा करते थे और जनजातीय समुदायों से जुड़ने के प्रयासों का नेतृत्व करते थे।
कंधमाल के जनजातीय इलाकों में आक्रामक धार्मिक धर्मांतरण के उनके सक्रिय विरोध ने उन्हें स्थानीय असामाजिक तत्वों का निशाना बना दिया। जैसे-जैसे वे स्कूलों, कन्या आश्रमों और सामुदायिक कार्यक्रमों की स्थापना के लिए काम कर रहे थे, जनजातीय आबादी के बीच उनका बढ़ता प्रभाव क्षेत्र में काम कर रहे ईसाई धर्मांतरण नेटवर्क और नक्सलियों के लिए एक बड़ी बाधा के रूप में देखा गया, जो हमेशा आदिवासियों के मुख्यधारा के समाज का हिस्सा बनने के विरोधी थे।
जन्माष्टमी के दिन अपने ही आश्रम में हिंदू नेता और समाज सेवी की हुई थी नृशंस हत्या
साल 2008 वह समय था जब ओडिशा में माओवादी हिंसा अपने चरम पर थी। स्वामी जी के काम को लेकर बढ़ा तनाव 23 अगस्त 2008 की रात, जन्माष्टमी के दिन त्रासदी में बदल गया। जब स्वामी जी तुमुडीबंध के कन्या आश्रम में थे और छोटे छात्रों तथा भक्तों से घिरे हुए थे, तब एके-47, देशी हथियारों और धारदार हथियारों से लैस नक्सलियों के एक सशस्त्र समूह ने परिसर पर हमला कर दिया।
80 वर्षीय संत की उनके चार शिष्यों के साथ, जिनमें एक छोटा बच्चा भी शामिल था, बेरहमी से हत्या कर दी गई। यह भीषण हमला, जिसमें स्वामी जी के शरीर पर कुल्हाड़ियों से वार किया गया था, ने पूरे क्षेत्र में दहशत फैला दी। यह घटना आवासीय परिसर में रह रही लगभग 130 छोटी स्कूली छात्राओं के सामने हुई।
हालाँकि माओवादियों ने बाद में इस हमले की जिम्मेदारी ली, लेकिन इस घटना ने ग्रामीण ओडिशा में नक्सली समूहों और मिशनरी गतिविधियों के आपस में जुड़ने को लेकर गहरी चिंताएँ पैदा कर दीं। आलोचकों और स्थानीय समुदाय के नेताओं ने ध्यान दिलाया कि क्षेत्र में शामिल स्थानीय माओवादी समिति के सदस्यों का एक बड़ा हिस्सा धर्मांतरित ईसाई थे, जिससे यह सवाल उठा कि क्या हिंदू नेताओं को निशाना बनाने वाले लोगों को कवर देने के लिए माओवादी बैनर का इस्तेमाल किया गया था।
साल 2007 में कंधमाल में हिंदू आदिवासियों और धर्मांतरित ईसाइयों के बीच सांप्रदायिक दंगे हुए थे, जो एसटी (ST) दर्जे की माँग कर रहे थे। 24 दिसंबर को ईसाइयों ने एक दुर्गा पूजा स्थल पर हमला करके तोड़फोड़ की थी और स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती पर भी हमला किया था जब उन्होंने बीच-बचाव करने की कोशिश की थी। इससे हिंसक झड़पें हुईं जहाँ कई घरों को आग के हवाले कर दिया गया।
साल 2015 में 2007 के दंगों की जाँच कर रहे जस्टिस वासुदेव पाणिग्रही आयोग ने अपनी रिपोर्ट सौंपी थी। रिपोर्ट में इलाके में हिंसा के पीछे ‘धड़ल्ले से हो रहे ईसाई धर्मांतरण’ को कारण बताया गया था। पूर्व जज ने बताया था कि ओडिशा में कड़े धर्मांतरण विरोधी कानूनों के बावजूद धड़ल्ले से मिशनरी गतिविधियाँ जारी हैं। घने जंगलों वाले छोटे से जिल कंधमाल में 1200 से अधिक चर्च और 300 से अधिक ईसाई संगठन हैं।
अक्टूबर 2013 में स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या के आरोप में कुल आठ लोगों जिनमें 7 धर्मांतरित ईसाई और पुलारी रामा राव नाम का एक माओवादी नेता शामिल था, को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। इस मामले में दो अन्य माओवादी नेता दुन्ना केशव राव और सब्यसाची पांडा भी आरोपित थे। दोनों जेल में बंद हैं और फिलहाल कंधमाल में हुई हत्या सहित कई अन्य मामलों में विचाराधीन हैं।
मीडिया ने एक बुजुर्ग हिंदू नेता और उनके 4 शिष्यों की हत्या को किया नजरअंदाज
साल 2008 के इस हत्याकांड के बाद कंधमाल में व्यापक दुख और गुस्सा फैल गया, जिससे गंभीर सांप्रदायिक हिंसा और नागरिक अशांति पैदा हुई। इसलिए, स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती और उनके 4 अनुयायियों की शुरुआती सामूहिक हत्या को खबरों में प्राथमिकता नहीं दी गई, लेकिन जब हिंदुओं ने विरोध प्रदर्शन किया, तो विरोध प्रदर्शनों का स्वरूप ही एक मुद्दा बन गया। हिंदू विरोध प्रदर्शनों को हिंसक बताकर मूल हत्याकांड को भुला दिया गया। ‘पत्रकारों’ ने इन विरोध प्रदर्शनों की तुलना गोधरा कांड के बाद गुजरात में हुए दंगों से की।
फूलबनी मेडिकल कॉलेज और अस्पताल का नाम बदलने तथा जलेस्पटा की सुविधाओं के लिए समर्पित धन आवंटित करने सहित राज्य की हालिया पहल, स्वामी जी की विरासत को पहचानने के एक आधिकारिक प्रयास को दर्शाती है। स्वास्थ्य सेवा और शैक्षणिक विकास को उनके नाम से जोड़कर, राज्य प्रशासन कंधमाल में जनजातीय शिक्षा, कल्याण और समाज सेवा में उनके योगदान को औपचारिक रूप से सम्मानित करना चाहता है।
(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)