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रिसिन जहर बनाने की साजिश, विदेशी फंडिंग और ISIS हैंडलर से साँठगाँठ: NIA कोर्ट ने सबूत देख खारिज की जिहादी डॉक्टर की बेल याचिका, पढ़ें अदालत ने क्या कहा

गुजरात के अहमदाबाद की एक विशेष NIA अदालत ने 2025 के आईएसआईएस Ricin आतंकी साजिश मामले में मुख्य आरोपित जिहादी डॉ सैयद अहमद मोहिउद्दीन की नियमित जमानत याचिका खारिज कर दी। सैयद अहमद मोहिउद्दीन की ओर से पेश अधिवक्ता- के एम दस्तूर ने दलील दी कि उनका मुवक्किल निर्दोष है और उसे झूठे मामले में फँसाया गया है।

बचाव पक्ष ने कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री से किसी आतंकी संगठन के साथ उसके संबंध स्थापित नहीं होते और न ही यह साबित होता है कि उसका लोगों को नुकसान पहुँचाने का इरादा था।

बचाव पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि मोहिउद्दीन को यह जानकारी नहीं थी कि उन बैगों के अंदर क्या था, जिनमें हथियार बरामद किए गए थे और उसे Ricin तैयार करने की प्रक्रिया की भी कोई जानकारी नहीं थी।

अदालत को आरोपित के खिलाफ प्रथम दृष्टया सामग्री मिली

विशेष न्यायाधीश (एनआईए) हेमंग आर रावल ने कहा कि मामले में गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) की धारा 16, 17, 18, 18-B और 20, भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 61(2) और आर्म्स एक्ट के तहत गंभीर आरोप लगाए गए हैं।

अदालत ने कहा कि जाँच में 2025 के आईएसआईएस Ricin आतंकी साजिश मामले के आरोपित जिहादी मोहिउद्दीन के खिलाफ प्रथम दृष्टया सामग्री सामने आई है और मामले में आरोप पत्र दाखिल किया जा चुका है।

अदालत ने कहा कि डॉक्टर मोहिउद्दीन पर बिना आवश्यक अनुमति के हैदराबाद स्थित अपने घर में एक प्रयोगशाला स्थापित करने का आरोप है। जाँचकर्ताओं के अनुसार, वहाँ अरंडी के बीज और रसायनों का इस्तेमाल कर Ricin तैयार किया गया था।

अदालत ने कहा कि मोहिउद्दीन के मेडिकल बैकग्राउंड को देखते हुए यह नहीं कहा जा सकता कि वह Ricin की प्रकृति से पूरी तरह अनजान था। Ricin एक अत्यधिक जहरीला जैविक विष है, जिसमें बड़े पैमाने पर मौतें करने की क्षमता होती है।

अभियोजन का दावा- डॉक्टर हैंडलर के साथ मिलकर कर रहा था काम

जमानत याचिका का विरोध करते हुए विशेष लोक अभियोजक एम जी कपाड़िया ने अदालत को बताया कि मोहिउद्दीन गंभीर अभियोजन का सामना कर रहा है और वह बिना लाइसेंस के तीन पिस्तौल तथा 30 जिंदा कारतूस लेकर मेहसाणा की ओर यात्रा कर रहा था। अभियोजन ने कहा कि यह तथ्य और अन्य साक्ष्य व्यापक साजिश में उसकी संलिप्तता को दर्शाते हैं।

अभियोजन के अनुसार, मोहिउद्दीन ने अपने हैदराबाद स्थित आवास को अरंडी के बीजों से रिसिन निकालने के लिए एक गुप्त प्रयोगशाला में बदल दिया था।

अभियोजन ने बताया कि उसके मोबाइल फोन में अबू खदीजा नामक एक टेलीग्राम यूजर के साथ बातचीत मिली, जिसे वांछित आरोपित बताया गया है। इन बातचीत में रिसिन तैयार करने के लिए एसीटोन, अरंडी के बीज और हथियार हासिल करने को लेकर चर्चा हुई थी।

गौरतलब है कि रिसिन एक अत्यधिक जहरीला प्रोटीन है, जो अरंडी के पौधे, Ricinus communis, से प्राप्त होता है। रिसिन कोई वायरस या बैक्टीरिया नहीं है, बल्कि यह एक लेक्टिन विष है, जो कोशिकाओं में प्रोटीन के निर्माण को बाधित करता है। इसके सेवन से अंगों का काम करना बंद हो जाने और तेजी से मौत होने की आशंका रहती है।

रिसिन निकालने की प्रक्रिया में अरंडी के बीजों को पीसना, उनका तेल निकालना और फिर बचे हुए पदार्थ को रासायनिक प्रक्रिया से गुजारकर रिसिन-युक्त गूदे को अलग करना शामिल है। हालाँकि यह एक जटिल प्रक्रिया है, लेकिन इसके लिए बुनियादी प्रयोगशाला उपकरण, दस्ताने और एसीटोन जैसे सामान की आवश्यकता होती है।

सरकारी पक्ष ने कोर्ट को आगे बताया कि मोहिउद्दीन एक मजहबी वजह के नाम पर अबू खदीजा की मदद करने के लिए तैयार हुआ था। दोनों टेलीग्राम से संपर्क में आए थे। बाद में उसने अपना काम शुरू करने के लिए लगभग 4 लाख अमेरिकी डॉलर (तकरीबन 3.3 करोड़ रुपये) की माँग भी की थी। अपनी योजना के सिलसिले में वह दिल्ली गया, जहाँ उसने पैसों, फंडिंग और आगे के काम और योजनाओं पर बात की।

इसके अलावा, मोहिउद्दीन ने अबू खदीजा के कहने पर एक कसम ली, उसका वीडियो बनाकर अपने हैंडलर को भेजा। फिर उसने अब्दुल वाजिद और नावेद पामिदी से भी ऐसी ही कसम दिलवाकर अपना गिरोह/नेटवर्क बढ़ाने की कोशिश की। उसने जहर तैयार करने की तस्वीरें और वीडियो भी अबू खदीजा को भेजे थे।

अदालत ने मोहिउद्दीन पर लगे आरोपों को दर्ज किया

अदालत में पेश चार्जशीट के सारांश के अनुसार, मोहिउद्दीन 2025 में टेलीग्राम के माध्यम से अबू खदीजा के संपर्क में आया और उसकी मदद करने के लिए सहमत हुआ। उसने कारोबारी गतिविधियों के लिए करीब 4 लाख अमेरिकी डॉलर की माँग की और अगस्त 2025 में एक सहयोगी से मिलने तथा योजनाओं और फंडिंग पर चर्चा करने के लिए दिल्ली की यात्रा की।

अदालत ने यह भी दर्ज किया कि मोहिउद्दीन सितंबर 2025 में अहमदाबाद गया और मेहसाणा के छत्राल के पास एक पूर्व निर्धारित स्थान से 1.90 लाख रुपए की राशि हासिल की, जिसे आतंकी गतिविधियों से प्राप्त धन बताया गया। बाद में उसने एक शपथ रिकॉर्ड की और उसे अपने हैंडलर के साथ साझा किया। नेटवर्क के विस्तार के प्रयासों के तहत अन्य लोगों को भी इसी तरह की शपथ दिलाई गई।

आरोपपत्र में आगे कहा गया है कि मोहिउद्दीन ने अरंडी के बीज, तेल निकालने वाले उपकरण और एसीटोन जैसे रसायन हासिल किए। अदालत ने अभियोजन के इस पक्ष को दर्ज किया कि इन सामग्रियों का इस्तेमाल उसके हैदराबाद स्थित आवास में बनी प्रयोगशाला में रिसिन तैयार करने के लिए किया गया था।

आरोप पत्र में रिसिन को रासायनिक हथियार सम्मेलन की अनुसूची-I में सूचीबद्ध अत्यधिक जहरीला जैविक विष बताया गया है।

अदालत ने यह भी दर्ज किया कि मोहिउद्दीन ने अतिरिक्त धन और सामग्री हासिल करने की व्यवस्था की थी और नवंबर 2025 में अहमदाबाद जाने की योजना बनाई थी, जहाँ उसे आतंकी वारदात के लिए उन्नत हथियार प्राप्त हुए। इन आरोपों के आधार पर अदालत ने कहा कि आरोप गंभीर हैं और प्रथम दृष्टया मामले में उसकी संलिप्तता दिखाई देती है।

मोहिउद्दीन रिसिन आतंकी साजिश से अवगत था, उसे पता था कि बैग में हथियार थे

अदालत ने ISIS रिसिन आतंकी साजिश के आरोपित सैयद अहमद मोहिउद्दीन के हथियारों के बारे में जानकारी नहीं होने संबंधी बचाव पक्ष की दलील को खारिज कर दिया। अदालत ने तीन पिस्तौल, 30 जिंदा कारतूस, भारतीय और अमेरिकी मुद्रा तथा चार लीटर अरंडी के तेल वाली एक बोतल की बरामदगी का उल्लेख किया।

न्यायाधीश ने कहा कि आरोपपत्र में मौजूद सामग्री से संकेत मिलता है कि मोहिउद्दीन अबू खदीजा के निर्देशों पर काम कर रहा था और हथियार किसी अनुचित उद्देश्य के लिए हासिल किए गए थे।

अदालत ने यह भी कहा कि रिकॉर्ड से मोहिउद्दीन, अबू खदीजा और अन्य आरोपितों के बीच साजिश के संकेत मिलते हैं।

अदालत ने कहा, “इस प्रकार, आवेदक-आरोपित के खिलाफ लगाए गए आरोप गंभीर प्रकृति के प्रतीत होते हैं और प्रथम दृष्टया संबंधित अपराध में आवेदक-आरोपित की संलिप्तता को दर्शाते हैं।”

विशेष एनआईए अदालत ने आगे इस बात पर जोर दिया कि आरोपित सैयद अहमद मोहिउद्दीन एक डॉक्टर है। इसलिए, यह नहीं कहा जा सकता कि वह अपने द्वारा तैयार किए गए पदार्थ रिसिन से बिल्कुल अनजान था, जो एक जहरीला जैविक विष है और बड़े पैमाने पर लोगों की हत्या करने की क्षमता रखता है। इसके अलावा, सक्षम प्राधिकारी से किसी लाइसेंस/अनुमति के बिना आवेदक-आरोपित के आवास पर प्रयोगशाला का अस्तित्व प्रथमदृष्टया आवेदक-आरोपित की दुर्भावनापूर्ण मंशा को दर्शाता है।

अदालत ने यह भी कहा कि आरोपित जिहादी मोहिउद्दीन ने कथित तौर पर दिल्ली और अहमदाबाद सहित विभिन्न स्थानों की यात्रा की, जहाँ उसने ऑपरेटिव्स से मुलाकात की और छिपाकर रखी गई खेपें हासिल कीं।

इसके अलावा आरोपित से तीन पिस्तौल, 30 जिंदा कारतूस, भारतीय और अमेरिकी मुद्रा तथा चार लीटर अरंडी के तेल वाली एक बोतल की बरामदगी प्रथमदृष्टया “यह दर्शाती है कि आवेदक-आरोपित की मंशा पवित्र या किसी मानवीय उद्देश्य के लिए नहीं थी।”

आरोपपत्र का हवाला देते हुए विशेष एनआईए अदालत ने कहा कि आरोपित डॉ सैयद अहमद मोहिउद्दीन मुख्य वांछित आरोपित के संपर्क में था और उसके निर्देशों के अनुसार काम कर रहा था। इसके परिणामस्वरूप रिसिन तैयार किया गया और हथियारों के रूप में पिस्तौल की खरीद तथा उन्हें अपने कब्जे में रखने की कार्रवाई की गई। इसलिए अदालत ने बचाव पक्ष की इस दलील को खारिज कर दिया कि मोहिउद्दीन को बैग और उनमें मौजूद हथियारों के बारे में कोई जानकारी नहीं थी।

अदालत ने कहा, “आवेदक-आरोपित से हथियारों की बरामदगी प्रथम दृष्टया यह स्पष्ट करती है कि उक्त हथियार अनुचित उद्देश्य के लिए हासिल किए गए थे। इसलिए आवेदक-आरोपित के अधिवक्ता की यह दलील कि आवेदक-आरोपित को बैग और उसके अंदर मौजूद सामग्री के बारे में कोई जानकारी नहीं थी, इस अदालत द्वारा स्वीकार किए जाने योग्य नहीं है।”

अदालत ने आगे कहा, “इसके अलावा, आरोपित नंबर 1 के मोबाइल फोन से बरामद वीडियो भी आवेदक-आरोपित की दुर्भावनापूर्ण मंशा को दर्शाता है और यह नहीं बताता कि आवेदक-आरोपित किसी पवित्र मार्ग पर चल रहा था या मानवता की भलाई कर रहा था।”

आरोपों की गंभीरता और UAPA की धारा 43D(5) के तहत लगाए गए प्रतिबंधों को ध्यान में रखते हुए विशेष न्यायाधीश हेमंग आर रावल ने जमानत देने से इनकार कर दिया। अदालत ने बिना किसी लागत संबंधी आदेश के जमानत याचिका खारिज कर दी।

अदालत ने आदेश दिया, “उपरोक्त तथ्यों और गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम की धारा 43D(5) की कठोरता को ध्यान में रखते हुए, यह अदालत आवेदक-आरोपित के पक्ष में इस अदालत को प्रदत्त विवेकाधीन अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल न करना उचित समझती है। अतः वर्तमान आवेदन को बिना किसी लागत संबंधी आदेश के खारिज किया जाता है।”

मामले की पृष्ठभूमि

बता दें कि यह मामला तब सामने आया जब गुजरात एटीएस ने आईएसआईएस-खुरासान प्रांत (ISKP) से जुड़े नेटवर्क के सिलसिले में तीन लोगों को गिरफ्तार किया। जाँचकर्ताओं के अनुसार, समूह के सदस्यों ने अहमदाबाद, दिल्ली और लखनऊ में भीड़भाड़ वाले बाजारों तथा धार्मिक या संगठनात्मक स्थलों की रेकी की थी और संभावित आतंकी हमले के लिए इस्तेमाल की जा सकने वाली जानकारी जुटाई थी।

चीन में चिकित्सा की पढ़ाई करने वाले तेलंगाना के डॉक्टर मोहिउद्दीन को हथियारों, गोला-बारूद और अरंडी के तेल के साथ गिरफ्तार किया गया था। जाँचकर्ताओं ने कहा कि वह हैदराबाद स्थित अपने आवास पर अरंडी के बीजों से रिसिन तैयार करने की कोशिश कर रहा था। एटीएस ने ISKP से जुड़े एक अफगान हैंडलर के साथ उसकी बातचीत का भी पता लगाया था। इसके बाद जाँच में फंडिंग, अन्य सदस्यों और व्यापक नेटवर्क से संभावित संबंधों की भी पड़ताल की गई।

15 अगस्त से ‘पब्लिसिटी स्टंट’ करने के लिए अभिजीत दीपके फिर तैयार, झारखंड पर बोलते वक्त पड़ गए थे बीमार: समझिए CJP की अवसरवादी राजनीति को

राजनीतिक प्रोपगेंडा फैलाने की दिशा में जब किसी की ‘प्रासंगिकता’ खत्म होने लगती है, तो वह नया पैंतरा आजमाने में कोई कसर नहीं छोड़ता। यही हाल इन दिनों तथाकथित ‘क्रांतिकारी’ और कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दीपके का है। दिल्ली के जंतर-मंतर पर डेढ़ महीने तक चले ‘हाई-प्रोफाइल प्रदर्शन’ के बाद अब दीपके को अचानक 15 अगस्त के मौके पर देश के ग्रामीण स्कूलों और बच्चों की याद आई है।

दीपके ने 10 अगस्त 2026 को एक वीडियो बनाते हुए घोषणा की है कि वे 15 अगस्त से ग्रामीण इलाकों के सरकारी स्कूलों में ‘सोशल ऑडिट’ का एक राष्ट्रव्यापी अभियान चलाएँगे।

पहली नजर में किसी को भी यह ‘छात्र हित’ और ‘सामाजिक सुधार’ की दिशा में उठाया बड़ा कदम लग सकता है। लेकिन, हकीकत में यह केवल अवसरवाद की राजनीति, पब्लिसिटी की भूख और एक सुनियोजित एजेंडा है।

कैसे? आइए बताएँ…

जंतर-मंतर प्रदर्शन और झारखंड में अंतर

पिछले दिनों लगभग डेढ़ महीने जंतर-मंतर पर छात्र हित के नाम पर दीपके के नेतृत्व में एक प्रदर्शन चला। इस दौरान मुद्दा छात्रों को बनाया गया, लेकिन मंच पर विपक्ष के बड़े-बड़े नेता और वामपंथी चेहरों का आना-जाना लगा रहा… ये सब लोग वहाँ कोई छात्रों के लिए नहीं, बल्कि दीपके की सराहना करने पहुँच रहे थे कि उन्होंने एक ऐसा माहौल बनाया है जहाँ न केवल लोग केंद्र सरकार की निंदा कर रहे हैं बल्कि उनके विरुद्ध गाली-गलौच से भी गुरेज नहीं कर रहे।

डेढ़ महीने तक चले इस प्रदर्शन में असली NEET छात्रों के हाथ क्या आया? ये अलग चर्चा का मुद्दा है। लेकिन हाँ! इस बीच अभिजीत दीपके जैसे लोग हीरो जरूर बन गए।

सामान्य छात्र उनसे आगे के लिए भी उम्मीद लगाए बैठा था। यही वजह हुई कि 25 जुलाई से जब झारखंड में पेपर लीक के खिलाफ प्रदर्शन ने जोर पकड़ा तो वहाँ के बच्चों को उम्मीद जगी कि सीजेपी वाले यहाँ भी उनके समर्थन में जरूर आएँगे और यहाँ भी सरकार से जवाबदेही माँगने में उनका साथ देंगे। लेकिन हुआ उलटा।

अभिजीत दीपके ने झारखंड जाना तो दूर, शुरुआत में इस प्रदर्शन को लेकर कोई सुध ही नहीं ली। बाद में जब सोशल मीडिया पर थू-थू शुरू हुई तो अचानक कुछ जगह एक वीडियो कॉल की रिकॉर्डिंग वायरल की गई कि हाँ, दीपके ने झारखंड प्रदर्शनकारियों से बात करके साथ देने का आश्वासन दिया है।

बाद में झारखंड में आंदोलन पर बैठे युवा लगातार अभिजीत दीपके से सवाल पूछते रहे- “आप हमारे बीच कब आ रहे हैं? कब हमारे लिए आवाज उठाओगे” मगर दीपके ने सिर्फ यही बहाने लगाए – अभी हम बीमार हैं, मेरी टीम में सब बीमार हैं, मुझे टायफाइड हो गया है आदि-आदि।

जंतर-मंतर प्रोटेस्ट का रूप और झारखंड प्रदर्शन पर दीपके का रवैया देखने वाले लोगों को ज्यादा समझने में देर नहीं लगी कि खेल है क्या।

सबको साफ होने लगा कि जंतर-मंतर पर विपक्ष के हर नेता से मिलकर हाथ मिलाने वाले दीपके का असली मकसद छात्र हित नहीं बल्कि सिर्फ भाजपा विरोध था। क्योंकि अगर ये बात झूठ होती तो झारखंड में विपक्षी गठबंधन को देखते हुए दीपके इस मुद्दे पर फूँक-फूँक कर कदम नहीं रखते।

उन्हें पता था अगर वह वहाँ चले जाएँगे तो एक तो उनके एजेंडे को नुकसान होगा और दूसरा उन्हें वामपंथी इकोसिस्टम से वो ‘माइलेज’ नहीं मिलता जो दिल्ली के जंतर-मंतर पर मिला था।

गिरती साख बचाने में जुटे दीपके

अब झारखंड आंदोलन में अपने दोगलेपन के उजागर होने और अपनी गिरती साख को बचाने के लिए अब दीपके ने 15 अगस्त (स्वतंत्रता दिवस) का मौका चुना है।

वह ग्रामीणों और अभिभावकों से कह रहे हैं कि वे स्कूलों में जाएँ, वीडियो बनाएँ और CJP के लिंक पर फॉर्म भरकर भेजें। यानी सारी मेहनत ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोग करे और और सोशल मीडिया पर एक बार फिर से ‘क्रांति’ का क्रेडिट CJP का आईटी सेल ले ले।

जंतर-मंतर पर दिखाई गई आक्रामकता, झारखंड में साधी गई चुप्पी और 15 अगस्त के इस नए शिगूफे को जोड़कर देखें, तो तस्वीर पूरी तरह साफ हो जाती है। दीपके का मकसद छात्रों का हित नहीं, बल्कि सिर्फ एक खास राजनीतिक एजेंडे के तहत ऐसे अभियानों का फायदा उठाना है।

वह छात्रों के असंतोष को भुनाकर अपनी राजनीतिक दुकान चलाना चाहते हैं। ‘स्कूल ऑडिट’ के नाम पर फॉर्म और वीडियो मँगवाने के नाम पर अपने सोशल मीडिया पेज की रीच बढ़ाने और प्रासंगिक बने रहने और क्रांतिकारी दिखन का स्टंट करना चाहते हैं।

दीपके जैसे लोग 5 मिलियन के साथ सोशल इन्फ्लुएंसर भले बन जाएँ, लेकिन जननेता बनने की उनमें क्षमता नहीं है। उनकी छवि का निर्माण सिर्फ पीआर जैसी चीजों के जरिए ही हो सकता है।

‘गोली मार दो, लेकिन पूरा ‘वंदे मातरम’ नहीं गाएँगे’: 76 साल बाद भी नहीं बदला कॉन्ग्रेसियों का चरित्र, इस्लामी कट्टरपंथियों को खुश करने के लिए करते हैं ‘राष्ट्रगीत’ से घृणा

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का मूल मंत्र और मातृभूमि की भक्ति का सबसे बड़ा प्रतीक ‘वंदे मातरम’ कॉन्ग्रेस ने एक बार फिर से घृणा दिखानी शुरू कर दी है। एक तरफ जहाँ देश इस कालजयी रचना के 150 वर्ष पूरे होने का उत्सव मना रहा है और केंद्र की मोदी सरकार इसे राष्ट्रगान के समकक्ष सम्मान दिलाने तथा लाल किले से लेकर पूरे देश में इसके सभी छंदों के सामूहिक गायन को प्रोत्साहन दे रही है, वहीं दूसरी तरफ कॉन्ग्रेस पार्टी का रुख आज भी वैसा ही है जैसा स्वतंत्रता संग्राम के समय था।

कॉन्ग्रेस का यह चरित्र दशकों बाद भी नहीं बदला है। जब भी वंदे मातरम के पूर्ण रूप से गायन या इसके सम्मान की बात आती है, कॉन्ग्रेस और उसके तुष्टिकरण वाले सहयोगी दल विरोध में खड़े हो जाते हैं। हाल ही में केरल से सामने आए विरोध ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि कॉन्ग्रेस के नेताओं के भीतर राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम को लेकर किस हद तक घृणा भरी हुई है, जहाँ उसके नेता यहाँ तक कहने से नहीं हिचकिचा रहे कि भले ही उन्हें गोली मार दी जाए, लेकिन वे पूरा वंदे मातरम नहीं गाएँगे।

लाल किले से गूँजेगा पूरा ‘वंदे मातरम’, लेकिन केरल में कॉन्ग्रेस का उग्र विरोध

भारत के 80वें स्वतंत्रता दिवस (15 अगस्त 2026) के ऐतिहासिक अवसर पर एक अभूतपूर्व दृश्य देखने को मिलने जा रहा है। रक्षा मंत्रालय द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, इतिहास में पहली बार लाल किले प्राचीर से प्रधानमंत्री के आगमन पर पूरे वंदे मातरम के सभी छंदों का गायन किया जाएगा।

इस वर्ष स्वतंत्रता दिवस समारोह का मुख्य विषय ‘वंदे मातरम के 150 वर्ष’ और ‘विकसित भारत@2047 के लिए युवा शक्ति’ रखा गया है। इसके तहत गृह मंत्रालय के प्रोटोकॉल और राष्ट्रीय कार्यान्वयन समिति के निर्देशों के तहत देश भर में राष्ट्रीय गीत के सभी 6 छंदों का सामूहिक गायन सुनिश्चित किया जा रहा है।

यहाँ तक कि आमंत्रण पत्रों पर भी इसके पूरे बोल छापे गए हैं ताकि सभी नागरिक साथ में गा सकें। लेकिन एक तरफ जहाँ पूरा देश इस ऐतिहासिक क्षण का साक्षी बनने के लिए तैयार है, वहीं केरल की UDF समर्थित राजनीति और कॉन्ग्रेस नेताओं ने इसके खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।

केरल के मुख्य सचिव विश्वनाथ सिन्हा द्वारा 6 अगस्त को जारी उस सर्कुलर के बाद विवाद खड़ा हो गया, जिसमें स्वतंत्रता दिवस के कार्यक्रमों में वंदे मातरम को पूरा गाने का प्रशासनिक निर्देश दिया गया था। इस निर्देश के आते ही केरल में सत्ता और विपक्ष दोनों के बीच घबराहट फैल गई।

केरल के स्वास्थ्य मंत्री के मुरलीधरन ने स्पष्ट रूप से कह दिया कि राज्य में सरकारी कार्यक्रमों के दौरान राष्ट्रीय गीत के सभी छंद नहीं गाए जाएँगे और केवल पारंपरिक रूप से चले आ रहे शुरुआती दो छंद ही गाए जाएँगे।

इससे भी आगे बढ़कर कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ सांसद राजमोहन उन्नीथन ने विवादित बयान देते हुए कहा, “हम इस जीवन में वंदे मातरम का पूरा गायन स्वीकार नहीं कर सकते। नरेंद्र मोदी हमें गोली मारने की धमकी दें, तब भी ‘वंदे मातरम’ को पूरा नहीं गाया जाएगा।”

उन्होंने यहाँ तक आरोप लगाया कि राज्यपाल और राजभवन लोकतंत्र को कमजोर करने की राजनीति कर रहे हैं। इस पूरे घटनाक्रम ने यह उजागर कर दिया है कि कॉन्ग्रेस सरकार और उसके नेताओं के लिए राष्ट्रगीत का पूरा गायन एक प्रशासनिक निर्देश नहीं बल्कि एक ऐसा मुद्दा है, जिसका विरोध करने के लिए वे किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं।

क्यों होती है अंतिम छंदों से समस्या? तुष्टिकरण और वोट बैंक का गणित

वंदे मातरम के पूर्ण रूप से गायन का विरोध नया नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक लंबा तुष्टिकरण का इतिहास छिपा हुआ है। वंदे मातरम के शुरुआती दो छंदों में भारत भूमि के प्राकृतिक सौंदर्य- सस्य श्यामलाम्, मलयज शीतलाम्, सुजलाम्, सुफलाम् की वंदना की गई है, जिन पर किसी को आपत्ति नहीं होती।

विरोधियों की समस्या इसके बाद के छंदों से शुरू होती है। बाद के छंदों में बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने भारत माता को दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती के रूप में चित्रित किया है और माँ दुर्गा की दश प्रहरण धारिणी (दस हाथों में शस्त्र धारण करने वाली) शक्ति के रूप में मातृभूमि का आह्वान किया है।

केरल में कॉन्ग्रेस, CPI(M) और उनके राजनीतिक सहयोगी इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग का हमेशा से यह रुख रहा है कि बाद के हिस्सों में हिंदू देवी-देवताओं से जुड़े आह्वान, प्रतीक और धार्मिक चित्र (इमेजरी) शामिल हैं। इनका तर्क रहा है कि एक धर्मनिरपेक्ष राज्य में ऐसे धार्मिक प्रतीकों वाले छंदों को आधिकारिक राष्ट्रीय गायन का हिस्सा नहीं बनाया जाना चाहिए।

वास्तव में यह विरोध वैचारिक न होकर शुद्ध रूप से वोट बैंक और तुष्टिकरण का गणित है। मुस्लिम कट्टरपंथियों को खुश करने के लिए कॉन्ग्रेस और उसके वामपंथी सहयोगियों ने हमेशा यह नैरेटिव गढ़ा कि बाद की पंक्तियाँ ‘एकेश्वरवाद’ (एक खुदा) के सिद्धांत के खिलाफ हैं।

इसी मुस्लिम लीग और कट्टरपंथी वोट बैंक के दबाव में VD सतीशन के नेतृत्व वाली UDF और कॉन्ग्रेस राजनीति आज भी पस्त नजर आ रही है। CPI(M) और पिनराई विजयन ने भी तुरंत इस पर राजनीति शुरू कर दी और सरकार पर संघ परिवार के राजनीतिक एजेंडे के आगे झुकने का आरोप लगा दिया।

इस तुष्टिकरण की राजनीति का ही नतीजा है कि देश के राष्ट्रीय गीत को काँट-छाँटकर आधा-अधूरा करने की वकालत आज भी कॉन्ग्रेस द्वारा खुलकर की जा रही है।

बंकिमचंद्र का कालजयी सृजन और स्वतंत्रता संग्राम में वंदे मातरम का योगदान

वंदे मातरम केवल एक गीत नहीं है, यह भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की प्राणवायु और राष्ट्रभक्ति का वह अमर स्वर है जिसने करोड़ों भारतीयों के दिलों में क्रांति की ज्वाला प्रज्वलित की थी। इस कालजयी रचना की रचना बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने 7 नवंबर 1875 को की थी और बाद में इसे उनके प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनंदमठ’ में शामिल किया गया था।

इस गीत की रचना का समय वह था जब ब्रिटिश हुकुमत भारत में अपने पैर पसार रही थी और भारतीयों पर ब्रिटिश राष्ट्रगान ‘गॉड सेव द क्वीन’ गाने का दबाव बनाया जा रहा था। बंकिमचंद्र ने ब्रिटिश हुकुमत के इस औपनिवेशिक सांस्कृतिक थोपने के जवाब में अपनी मातृभूमि की संप्रभुता और शक्ति का जयघोष करते हुए वंदे मातरम की रचना की थी।

150 साल पहले रचे गए इस गीत ने देखते ही देखते पूरे देश को एक सूत्र में पिरो दिया। 1896 में भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने स्वयं इसे स्वरबद्ध करके पहली बार गाया था। इसके बाद बंगाल विभाजन (1905) के दौरान यह अंग्रेजों के खिलाफ भारतीय प्रतिरोध का सबसे बड़ा नारा और प्रतीक बन गया।

स्वतंत्रता संग्राम के दौरान मतंगिनी हाजरा जैसी वीरांगनाओं से लेकर भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव जैसे अनगिनत क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश पुलिस की लाठियाँ खाते और फाँसी के फंदे को चूमते समय मुख से वंदे मातरम का ही उद्घोष किया था। यह गीत भारत की राष्ट्रीय एकता, गौरव और औपनिवेशिक दासता के खिलाफ स्वाभिमान का प्रतीक बना।

लेकिन जिस गीत ने भारत माता की स्वतंत्रता के लिए लाखों युवाओं को बलिदान होने की प्रेरणा दी, उसी गीत को आज कॉन्ग्रेस नेताओं द्वारा खारिज किया जा रहा है।

नेहरू और कॉन्ग्रेस की घृणा: कैसे आधा-अधूरा कर दिया गया राष्ट्रगीत

वंदे मातरम को लेकर कॉन्ग्रेस का यह घृणास्पद और समझौतावादी चरित्र नया नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें जवाहरलाल नेहरू और तत्कालीन कॉन्ग्रेस नेतृत्व की ऐतिहासिक भूलों में छिपी हैं। 1937 में जब देश में प्रांतीय चुनाव हुए और कई राज्यों में कॉन्ग्रेस की सरकारें बनीं, तब मुस्लिम लीग और मोहम्मद अली जिन्ना ने वंदे मातरम  के गायन पर कड़ा ऐतराज जताया।

जिन्ना का तुष्टिकरण करने और मुस्लिम लीग को मनाने के चक्कर में जवाहरलाल नेहरू और कॉन्ग्रेस नेतृत्व ने राष्ट्रगीत के साथ घोर समझौता कर लिया। 1937 के कोलकाता अधिवेशन में नेहरू की अध्यक्षता में कॉन्ग्रेस ने वंदे मातरम के केवल शुरुआती दो छंदों को ही स्वीकार करने और बाकी छंदों को आधिकारिक कार्यक्रमों से हटाने का प्रस्ताव पारित कर दिया।

तर्क यह दिया गया कि बाद के छंदों में हिंदू देवी-देवताओं का उल्लेख है जिससे गैर-हिंदुओं की भावनाएँ आहत हो सकती हैं। यह भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में तुष्टिकरण की राजनीति की सबसे बड़ी शुरुआत थी। आगे चलकर जब संविधान सभा में राष्ट्रगान चुनने की बात आई, तो जवाहरलाल नेहरू ने वंदे मातरम को राष्ट्रगान बनाने से साफ मना कर दिया।

उन्होंने तर्क दिया कि वंदे मातरम की धुन ऐसी नहीं है जिसे बैंड पर बजाया जा सके या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रगान के रूप में प्रस्तुत किया जा सके। जिस गीत ने देश को आजादी की लड़ाई में एकजुट किया था, उसे नेहरू और कॉन्ग्रेस के इस रवैये के कारण मुख्य राष्ट्रगान का दर्जा नहीं मिल सका और उसे काट-छाँटकर केवल दो पंक्तियों तक सीमित कर दिया गया।

डॉ राजेंद्र प्रसाद की सोच और मोदी सरकार की ऐतिहासिक पहल

कॉन्ग्रेस के इस रवैये के विपरीत भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद वंदे मातरम के पूर्ण सम्मान के सबसे बड़े पक्षधर थे। 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा के अंतिम दिन डॉ राजेंद्र प्रसाद ने ऐतिहासिक वक्तव्य देते हुए स्पष्ट रूप से घोषणा की थी कि ‘जन गण मन’ भले ही भारत का राष्ट्रगान (National Anthem) होगा, लेकिन ‘वंदे मातरम’, जिसने स्वतंत्रता संग्राम में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है, को भी ‘जन गण मन’ के बिल्कुल समान दर्जा और सम्मान दिया जाएगा।

लेकिन कॉन्ग्रेस की उत्तरवर्ती सरकारों ने डॉ राजेंद्र प्रसाद की इस भावना और आदेश को ठंडे बस्ते में डाल दिया। दशकों तक वंदे मातरम उपेक्षित रहा और इसके गायन को लेकर विवाद खड़े किए जाते रहे। वर्षों बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने डॉ राजेंद्र प्रसाद की उस सोच को वास्तविक रूप से धरातल पर उतारने का संकल्प लिया है।

मोदी सरकार ने राष्ट्रगीत के 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर संसद में इसके इतिहास, महत्व और योगदान पर 10 घंटे की विशेष चर्चा आयोजित करने का निर्णय लिया, जहाँ स्वयं प्रधानमंत्री मोदी ने इस बहस की शुरुआत की।

यही नहीं केंद्र सरकार संसद में ‘राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम (संशोधन) विधेयक, 2026’ (The Prevention of Insults to National Honour (Amendment) Bill, 2026) लेकर आई, जो राज्यसभा से पारित हो चुका है। इस विधेयक के माध्यम से वंदे मातरम को राष्ट्रगान के समान कानूनी और संवैधानिक दर्जा दिया गया है।

अब वंदे मातरम का अपमान करना या इसके गायन में बाधा डालना एक गंभीर आपराधिक अपराध माना जाएगा, जिसके लिए 3 साल तक की जेल की सजा और जुर्माने का प्रावधान है।

आज भी बेनकाब होता कॉन्ग्रेस का घृणास्पद रवैया

आज जब देश अपनी आजादी की 80वीं वर्षगाँठ और वंदे मातरम के 150 साल का जश्न मना रहा है, तब राष्ट्रवाद और तुष्टिकरण के बीच का अंतर पूरी तरह बेनकाब हो चुका है।

एक तरफ वर्तमान मोदी सरकार राष्ट्रीय प्रतीकों, स्वतंत्रता सेनानियों के त्याग और वंदे मातरम जैसे पवित्र स्तोत्र को उसका खोया हुआ संवैधानिक सम्मान वापस दिलाने के लिए प्रतिबद्ध है, वहीं दूसरी तरफ कॉन्ग्रेस अपने उसी पुराने तुष्टिकरण के रास्ते पर चल रही है।

केरल में कॉन्ग्रेस सांसद का यह कहना कि ‘गोली मार दो, लेकिन पूरा वंदे मातरम् नहीं गाएँगे’, कोई अनजाने में दिया गया बयान नहीं है। यह कॉन्ग्रेस की उसी दशकों पुरानी मानसिकता का विस्तार है, जहाँ राष्ट्रीय गौरव और राष्ट्रगीत के सम्मान से ऊपर वोट बैंक की राजनीति को रखा जाता है।

जवाहरलाल नेहरू से शुरू हुआ वंदे मातरम के प्रति उपेक्षा और कटौती का सिलसिला आज राहुल गाँधी और उनके सहयोगियों के दौर में भी जारी है। इससे स्पष्ट होता है कि साल बीत गए, दशक बीत गए, सत्ता के समीकरण बदल गए, लेकिन कॉन्ग्रेस का चरित्र नहीं बदला।

जिस राष्ट्रगीत ने स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों की नींव हिला दी थी, उससे आज भी कॉन्ग्रेस को घृणा है। लाल किले से पूरे वंदे मातरम का गूँजना जहाँ 140 करोड़ भारतीयों के स्वाभिमान और राष्ट्रीय पुनर्जागरण का प्रतीक है, वहीं कॉन्ग्रेस का इसका विरोध करना यह सिद्ध करता है कि उसके लिए राष्ट्र हित से बड़ा आज भी तुष्टिकरण का एजेंडा ही है।

CJP प्रदर्शन में पेलट गन से लाठीचार्ज तक सब ‘तानाशाही’ था, झारखंड में छात्रों पर वही कार्रवाई ‘सामान्य’: लेफ्ट-लिबरल पाखंड का पर्दाफाश

झारखंड की राजधानी राँची में सोमवार (10 अगस्त) को हजारों छात्र विधानसभा का घेराव करने के लिए एक बड़ा मार्च निकाला। ये सभी छात्र अलग-अलग सरकारी भर्ती परीक्षाओं में हुई गड़बड़ियों और अनियमितताओं के खिलाफ जोरदार विरोध प्रदर्शन कर रहे थे। जैसे-जैसे राज्य में छात्रों का यह आंदोलन और तेज होता गया, राँची पुलिस ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा है कि किसी भी आपातकालीन यानी इमरजेंसी की स्थिति में प्रदर्शनकारी छात्रों के खिलाफ पैलेट गन का इस्तेमाल किया जा सकता है।

राँची के सिटी एसपी पारस राणा ने मीडिया से बातचीत करते हुए बताया कि सुरक्षा के मद्देनजर शहर में भारी पुलिस बल को तैनात किया गया। उन्होंने भरोसा दिलाया कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले छात्रों को किसी भी प्रकार की असुविधा का सामना नहीं करना पड़ेगा। हालाँकि, उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि यदि प्रदर्शनकारियों में से किसी ने भी हिंसा का रास्ता अपनाया, तो पुलिस तुरंत उनके खिलाफ उचित कानूनी कार्रवाई करेगी।

सिटी एसपी ने अपने बयान में आगे कहा, “प्रदर्शन में छात्रों की संख्या बहुत ज्यादा होगी। इसलिए राँची पुलिस के सभी जवानों को साफ निर्देश दिए गए हैं कि यदि प्रदर्शनकारी शांति बनाए रखते हैं, तो उन्हें कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए। लेकिन अगर कोई भी व्यक्ति हिंसा फैलाने की कोशिश करता है, तो उसके खिलाफ सख्त कानूनी कदम उठाए जाएँगे।”

सोशल मीडिया पर एक वीडियो काफी तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें कुछ पुलिसकर्मी हथियार के रूप में पैलेट गन पकड़े हुए नजर आ रहे हैं। इस वायरल वीडियो को लेकर जब सवाल पूछा गया, तो एसपी पारस राणा ने स्पष्ट किया कि जिसे लोग पैलेट गन समझ रहे हैं, असल में वह पेंटबॉल गन है। इस गन से नरम और रंगीन गेंदें चलाई जाती हैं, जिनका इस्तेमाल हंगामा करने वाले और उपद्रवी लोगों की पहचान करने के लिए उन पर रंग छिड़कने के लिए किया जाता है।

हालाँकि, इसके साथ ही अधिकारी ने यह भी साफ कर दिया कि पुलिस के पास पैलेट गन भी मौजूद हैं, लेकिन उनका उपयोग केवल बेहद गंभीर और आपातकालीन परिस्थितियों में ही किया जाएगा। उन्होंने दोहराया कि यदि पुलिसकर्मी पैलेट गन साथ लेकर चल रहे हैं, तो वह पूरी तरह से केवल इमरजेंसी के लिए है, जबकि वायरल वीडियो में दिखने वाला हथियार पैलेट गन नहीं बल्कि पेंटबॉल गन ही है।

खास बात यह है कि पैलेट गन 12-बोर की पंप-एक्शन शॉटगन होती हैं, जो छर्रों से भरे कारतूसों को फायर करती हैं। पैलेट गन को भीड़ को नियंत्रित करने वाले कम घातक या गैर-घातक उपकरणों के रूप में वर्गीकृत किया गया है। ये दंगा-नियंत्रण करने वाली विशेष इकाइयों के मानक उपकरणों का एक अहम हिस्सा होती हैं।

दिलचस्प बात यह है कि झारखंड मुक्ति मोर्चा और कॉन्ग्रेस गठबंधन सरकार की इस लापरवाही के प्रति वाम-उदारवादी गिरोह का रवैया बिल्कुल अलग रहा है। यह रवैया तब देखने को मिला जब पिछले महीने जुलाई में दिल्ली में ‘कॉकसरोच जनता पार्टी’ (CJP) के विरोध प्रदर्शन के दौरान यही लोग गुस्से से उबल पड़े थे, जबकि हफ्तों से चल रहे छात्रों के इस विरोध प्रदर्शन पर वे पूरी तरह चुप और उदासीन बने हुए हैं।

CJP विरोध प्रदर्शनों के दौरान प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पेलेट गन के इस्तेमाल की अफवाहों पर दिल्ली पुलिस को खलनायक बनाने वाला एंटी-BJP गिरोह झारखंड छात्र आंदोलन के दौरान चुप

बहुत समय पहले की बात नहीं है, जब 20 जुलाई को चलो संसद मार्च के दौरान CJP विरोध प्रदर्शन हिंसक हो गया था, तब दिल्ली पुलिस को लाठीचार्ज और अन्य कड़े कदम उठाकर जवाब देने के लिए मजबूर होना पड़ा था।

वाम-उदारवादी गिरोह ने दावा किया था कि दिल्ली पुलिस ने निर्दोष प्रदर्शनकारी छात्रों के खिलाफ पेलेट गन का इस्तेमाल किया, जबकि इस मार्च में एंटी-BJP राजनीतिक दलों के समर्थकों की भरमार थी।

कॉन्ग्रेस, समाजवादी पार्टी और अन्य INDI गठबंधन दलों से लेकर उनके वैचारिक समर्थकों तक, सभी ने 20 जुलाई का विरोध प्रदर्शन हिंसक होने के बाद पेलेट गन के कथित इस्तेमाल को लेकर दिल्ली पुलिस को बदनाम किया।

उस समय CJP के प्रवक्ता सौरव दास ने दावा किया था कि दिल्ली पुलिस ने शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पेलेट गन का इस्तेमाल किया था। उन्होंने एक वीडियो साझा किया था, जिसमें एक प्रदर्शनकारी के शरीर पर निशान दिखाई दे रहे थे।

शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर पेलेट गन के इस्तेमाल से सार्वजनिक रूप से इनकार करने के बावजूद दिल्ली पुलिस को खलनायक बनाने का सिलसिला जारी रहा। दिल्ली पुलिस ने कहा था, “सोमवार को दिल्ली पुलिस द्वारा शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पेलेट गन के इस्तेमाल के दावे पूरी तरह झूठे और भ्रामक हैं। दिल्ली पुलिस के पास न तो पेलेट गन हैं और न ही चल रहे विरोध प्रदर्शन के दौरान उनका इस्तेमाल किया गया। जनता से अनुरोध है कि किसी भी अपुष्ट या भ्रामक जानकारी को साझा या प्रसारित न करें।”

CJP समर्थकों ने रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) के जवानों की भीड़ द्वारा हत्या करने की कोशिश तक की थी और बाद में उन्हें पहचानने और निशाना बनाने के लिए उनके वीडियो और तस्वीरें ऑनलाइन प्रसारित की थीं।

पुलिसकर्मियों पर CJP प्रदर्शनकारियों द्वारा पत्थरबाजी के खिलाफ पुलिस की कार्रवाई को एंटी-BJP गिरोह ने छात्रों के खिलाफ राज्य दमन, उनके प्रदर्शन के अधिकार को कुचलना, बर्बर बल के जरिए असहमति को दबाना और न जाने क्या-क्या बताया था।

हालाँकि कॉन्ग्रेस-JMM गठबंधन द्वारा शासित झारखंड में आपात स्थिति के दौरान छात्र विरोध प्रदर्शनों पर पेलेट गन के इस्तेमाल के लिए तैयार होने की राँची पुलिस की स्वीकारोक्ति पर यही गिरोह पूरी तरह चुप हो गया है।

ऐसा लगता है कि पेलेट गन तभी खराब हैं, जब BJP शासित राज्यों में पुलिस प्रदर्शनकारियों के खिलाफ उनका इस्तेमाल करती है। यहाँ तक कि वामपंथी मीडिया को भी राँची पुलिस द्वारा आपात स्थिति में इस्तेमाल के लिए पेलेट गन ले जाने से कोई समस्या नहीं है। शांतिपूर्ण असहमति पर कार्रवाई को लेकर उनकी अधिकतम प्रतिक्रिया केवल BJP सरकारों के लिए आरक्षित है।

जबकि दिल्ली पुलिस ने पेलेट गन के इस्तेमाल से इनकार किया है, आधिकारिक SOP और सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियाँ अन्य नरम उपायों के बाद असाधारण परिस्थितियों में इनके इस्तेमाल की अनुमति देती हैं।

हालाँकि जब गैर-BJP राज्यों में पुलिस खुले तौर पर हिंसक होने पर विरोध प्रदर्शनों को दबाने के लिए इन्हीं पेलेट गनों के इस्तेमाल के लिए तैयार होने की बात कहती है, तो यही वाम-उदारवादी तंत्र बड़े पैमाने पर चुप रहता है। दिल्ली पुलिस ने भी सख्त कदम मनोरंजन के लिए नहीं उठाए थे।

CJP का विरोध प्रदर्शन एक महीने से अधिक समय तक जारी रहा और पुलिस ने जंतर-मंतर से एक भी कॉकरोच को जबरन नहीं हटाया, यहाँ तक कि अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठे जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को भी अस्पताल केवल अदालत के आदेश पर भेजा गया था।

20 जुलाई को प्रदर्शन के हिंसक होने के बाद ही दिल्ली पुलिस और RAF ने SOP के अनुसार कार्रवाई की और हिंसक CJP प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज किया, जो मूल रूप से एक अनुपातिक आपातकालीन कार्रवाई थी।

हालाँकि CJP विरोध प्रदर्शन के दौरान दिल्ली पुलिस की ज्यादतियों के राजनीतिक उपयोग को देखते हुए, कॉन्ग्रेस के नेतृत्व वाले विपक्ष ने संसद के बाहर विरोध प्रदर्शन जारी रखा है। गृह मंत्री अमित शाह के इस मुद्दे पर बयान देने तक वह सदन को ठीक से चलने नहीं दे रहा है।

CJP विरोध प्रदर्शन खत्म हुए तीन सप्ताह से अधिक समय हो चुका है, फिर भी घरेलू और विदेशी वामपंथी मीडिया दिल्ली पुलिस-CJP प्रकरण को शांतिपूर्ण असहमति का क्रूर दमन के रूप में पेश करना जारी रखता है। पेलेट गन के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाने या उसके लिए अधिक सख्त SOP की माँग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएँ दायर की गई हैं।

CJP विरोध प्रदर्शन के दौरान जो कुछ भी गलत था, वह झारखंड छात्र आंदोलन के दौरान सही हो गया: उदारवाद का पाखंड

सामूहिक रूप से, वही वाम-उदारवादी गिरोह जो झारखंड के छात्र विरोध प्रदर्शनों पर चुप रहा है, अभी भी CJP के हिंसक विरोध प्रदर्शनों पर दिल्ली पुलिस की प्रतिक्रिया को BJP के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के डर से प्रेरित अधिनायकवादी अतिरेक का प्रतीक बताने में जुटा हुआ है।

अब जब झारखंड में JMM-कॉन्ग्रेस के नेतृत्व वाले प्रशासन ने JPSC और JSSC में भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर लाठियाँ और पानी की बौछारें छोड़ी हैं और यहाँ तक कि पेलेट गन के इस्तेमाल के लिए तैयार होने की बात भी कही है, तो सभी विपक्षी दलों और उनके मीडिया के चाटुकारों ने आँखें मूंद ली हैं।

यह सिर्फ पेलेट गन के इस्तेमाल की बात नहीं है, उदारवादी गिरोह ने झारखंड के छात्र विरोध प्रदर्शनों पर पाखंडपूर्ण चुप्पी बनाए रखी है। उनकी सीमित टिप्पणी भी दिखावटी है, ठीक वैसे ही जैसे झारखंड के छात्र प्रदर्शनकारियों को CJP का समर्थन था। साफ है कि एंटी-BJP तंत्र लोकतंत्र, असहमति और संवैधानिक अधिकारों आदि पर नैतिकता का पाठ तभी पढ़ाता है, जब BJP सरकार का नेतृत्व कर रही हो।

झारखंड पुलिस ने कंटीले तार लगाए हैं, राँची में छात्रों पर लाठीचार्ज किया है, पुलिसकर्मी पेलेट गन ले जा रहे हैं और यहाँ तक कि अमन चोपड़ा और ऑपइंडिया के केशव मलान समेत पत्रकारों को भी धमकाया है, वह भी तब जब छात्र शांतिपूर्ण तरीके से प्रदर्शन कर रहे हैं, जबकि उदारवादी लोग CJP की उस भीड़ के खिलाफ केंद्र सरकार की पुलिस कार्रवाई का आरोप लगा रहे थे, जिसने पत्थरबाजी की थी।

9 अगस्त को JPSC सुधारों को लेकर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से सवाल पूछने के बाद झारखंड पुलिस ने ऑपइंडिया के एक रिपोर्टर को वहाँ से हटा दिया। पुलिस ने उसे उस मंच के पास जाने से भी रोक दिया, जहाँ मुख्यमंत्री सोरेन एक कार्यक्रम के दौरान बैठे थे और यह जगह विरोध प्रदर्शन स्थल से कुछ ही किलोमीटर दूर थी।

पत्रकार अमन चोपड़ा के खिलाफ झारखंड में छात्र विरोध प्रदर्शनों को कवर करने के लिए मामला दर्ज किया गया है। उन्हें पुलिस ने हिरासत में लिया और उनसे पूछताछ की। चोपड़ा ने कहा है कि उन्हें राँची में चल रहे विरोध प्रदर्शन को कवर करने से प्रतिबंधित किया गया है।

जाहिर है कि लोकतंत्र और प्रेस की स्वतंत्रता पर तभी खतरा मंडराता है या वे तब खतरे में पड़ती हैं, जब देश की सत्ता बीजेपी के पास होती है। राँची में पत्रकारों के खिलाफ हुई पुलिस कार्रवाई के ठीक उलट, दिल्ली पुलिस ने सीजेपी (CJP) प्रदर्शनों के सिलसिले में किसी भी मीडियाकर्मी पर कोई मामला दर्ज नहीं किया था, जबकि उस दौरान जमीन पर वामपंथी पत्रकारों का एक ऐसा धड़ा भी मौजूद था जो सरासर गलत और मनगढ़ंत खबरें फैला रहा था।

हकीकत तो यह थी कि निष्पक्ष रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों को सीजेपी प्रदर्शनकारियों द्वारा ‘गोदी मीडिया’ कहकर लेबल किया गया और उनके साथ बदसलूकी की गई। वामपंथियों द्वारा सोशल मीडिया पर इसी ओछी हरकत का जश्न मनाया गया था। उदारवादी सोच और तर्क के हिसाब से, जब गैर-बीजेपी सरकारें पैलेट गन का इस्तेमाल करती हैं, पत्रकारों पर मुकदमे दर्ज करती हैं और उन्हें डराती-धमकाती हैं, शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर लाठीचार्ज करवाती हैं और बैठे-ठाले मुख्यमंत्री अपनी जवाबदेही से बचते हैं, तो यह सब कानून-व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर ‘बड़े भले’ के लिए ही किया जाता है।

‘इसे मार डालो-मार डालो’: महाराष्ट्र के अहिल्यानगर में हिंदू युवक की लिंचिंग के बाद बिगड़ा माहौल, सिराज-सैयद-मुस्तकीम-युनूस गिरफ्तार; पढ़िए ऑपइंडिया को FIR में क्या मिला

महाराष्ट्र के अहिल्यानगर शहर में इंसानियत को झकझोर देने वाली एक बेहद दर्दनाक घटना सामने आई। 7 अगस्त 2026 को मुकुंदनगर के दर्गादायरा कब्रिस्तान के पास नगर निगम के स्ट्रीट लाइट का काम कर रहे धीरज परदेशी पर कट्टरपंथियों की भीड़ ने हमला कर दिया था। वह गंभीर रूप से घायल हुए थे। तीन दिन तक अस्पताल में इलाज चला। लेकिन 9 अगस्त को उनकी मौत हो गई। आपको बता दें कि धीरज परदेशी पर भीड़ ने उस समय हमला किया था जब वह बिजली के खंभे और पैनल की मरम्मत का काम कर रहे थे।

शुरुआती मीडिया रिपोर्ट्स और सोशल मीडिया पर यह दावा किया जा रहा था कि धीरज ने माथे पर तिलक लगा रखा था और हाथ में कलावा पहना हुआ था, जिसके चलते मुस्लिमों ने सुनियोजित तरीके से उन्हें निशाना बनाया। इस वीभत्स घटना के बाद पूरे अहिल्यानगर में जबरदस्त तनाव फैल गया है और शहर पूरी तरह बंद है। हिंदुत्ववादी संगठनों और स्थानीय लोगों में आरोपितों के खिलाफ भारी आक्रोश देखने को मिल रहा है।

सोशल मीडिया पर होते दावे

पुलिस के मुताबिक इस मामले में कुल चार आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है। इनमें युनुस शेख पहले ही गिरफ्तार किया जा चुका था। बाद में मेहराज असलम सय्यद, सिराज असलम सय्यद और मुस्तकीम असलम सय्यद को हैदराबाद से गिरफ्तार किया गया।

पुलिस के अनुसार तीनों आरोपित संभाजीनगर से ट्रेन के जरिए हैदराबाद भागे थे। स्थानीय अपराध शाखा की टीम ने उन्हें गिरफ्तार किया। पुलिस ने बताया कि सभी मुख्य आरोपितो को पकड़ लिया गया है। मामले की जाँच भिंगार कैंप पुलिस कर रही है। FIR में जाँच अधिकारी के तौर पर पुलिस निरीक्षक तेजश्री विट्ठल थोरात का नाम दर्ज है।

क्या था पूरा मामला और कैसे भड़का शहर में तनाव?

यह पूरी घटना अहिल्यानगर के मुकुंदनगर इलाके की है, जहाँ पिछले कुछ दिनों से तनाव की सुगबुगाहट थी। हिंदू युवक धीरज परदेशी अपनी कंपनी की ओर से नगर निगम के स्ट्रीट लाइट मेंटेनेंस का काम संभाल रहे थे। घटना वाले दिन यानी 7 अगस्त 2026 की शाम को वे अपनी टीम के साथ मुकुंदनगर के दर्गादायरा कब्रिस्तान के पास बिजली सुधारने गए थे। स्थानीय लोगों और संगठनों का आरोप है कि माथे पर तिलक लगाने के कारण उपद्रवियों ने उन्हें घेर लिया था।

भीड़ ने लाठियों, डंडों और लोहे के पाइप से उनके सिर पर ताबड़तोड़ वार किए, जिससे वह गंभीर रूप से घायल होकर जमीन पर गिर पड़े। तीन दिनों तक निजी अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष करने के बाद रविवार (9 अगस्त) को धीरज की साँसें थम गईं। उनकी मौत की खबर मिलते ही पूरा शहर उबल पड़ा। सकल हिंदू समाज और विभिन्न हिंदुत्ववादी संगठनों ने अस्पताल के बाहर जमकर प्रदर्शन किया और तुरंत शहर बंद का आह्वान कर दिया। हालात इतने बेकाबू हो गए कि नगर निगम कर्मचारी संघ ने भी अनिश्चितकालीन हड़ताल की घोषणा कर दी और साफ कह दिया कि जब तक मुकुंदनगर इलाके में कर्मचारियों को पूरी सुरक्षा नहीं मिलती, तब तक वे काम पर नहीं लौटेंगे।

पुलिस कार्रवाई और जनता का उग्र आक्रोश

हिंदू युवक धीरज परदेशी की मौत के बाद अहिल्यानगर में पुलिस और प्रशासन के खिलाफ जनता का गुस्सा फूट पड़ा है। मृतक की पत्नी ने बेहद आक्रमक रुख अपनाते हुए माँग की है कि उनके पति को जिस जगह पर मारा गया है, अंतिम संस्कार भी उसी कब्रस्तान के पास किया जाएगा। उन्होंने साफ कहा कि उनके पति कट्टर हिंदू थे, जिसके द्वेष में यह प्रायोजित हत्या की गई है।

विधायक संग्राम जगताप ने भी पुलिस की थ्योरी पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उनका कहना है कि पुलिस इसे मामूली या पुराना विवाद बताकर मामले की दिशा भटकाने की कोशिश कर रही है, जबकि यह एक सोची-समझी साजिश के तहत की गई हत्या है। उन्होंने आरोप लगाया कि इस पूरी घटना के पीछे कोई बड़ा मास्टरमाइंड है, जिसे पुलिस को जल्द बेनकाब करना चाहिए। प्रदर्शनकारियों की माँग है कि सभी आरोपितों को फाँसी की सजा दी जाए और उनके घरों पर बुलडोझर चलाया जाए।

आरोपितों के घरों पर अतिक्रमण के नोटिस

धीरज परदेशी की मौत के बाद अहिल्यानगर में गुस्सा बढ़ गया है। इसी बीच हमले के तीन आरोपितों मुस्तकीम ख्वाजामिया सैयद, मेहराज इब्राहिम सैयद और सिराज इब्राहिम सैयद के नगरदेवला स्थित घरों को लेकर ग्राम पंचायत ने अतिक्रमण के नोटिस जारी किए हैं। नोटिस में इन निर्माणों को कथित तौर पर अनधिकृत बताया गया है। पंचायत ने संबंधित लोगों से निर्माण की अनुमति के दस्तावेज जमा करने को कहा है। ऐसा नहीं करने पर कानून के तहत कार्रवाई की चेतावनी दी गई है।

नोटिस में महाराष्ट्र ग्राम पंचायत अधिनियम, 1959 की धारा 52 और 53 का हवाला दिया गया है। ग्राम पंचायत की संपत्ति संख्या 2374 और 2517 से जुड़े निर्माण को हटाने की कार्रवाई की बात भी नोटिस में कही गई है। संबंधित पक्षों को अपना पक्ष और सबूत रखने का मौका दिया गया है। इसके बाद आगे की कार्रवाई होगी। हिंदू युवक धीरज परदेशी की मौत के बाद विधायक संग्राम जगताप और अक्षय करदिले ने आरोपितों के खिलाफ सख्त कार्रवाई और बुलडोजर चलाने की माँग की थी।

‘हमला किस तरह हुआ’, FIR में पढ़ें

ऑपइंडिया के पास इस मामले की एफआईआर (FIR) की कॉपी मौजूद है। FIR में दर्ज है कि हमला किस तरह हुआ। शिकायतकर्ता के मुताबिक, करीब 4 बजे धीरज, अक्षय और काव्य दर्गादायरा कब्रिस्तान पहुँचे। अक्षय एक बंगले के ऊपर चढ़कर स्ट्रीट लाइट की वायरिंग देख रहा था। काव्य मेन पैनल को बंद-चालू करने गया था।

करीब 4:10 बजे अक्षय को नीचे से जोर-जोर से चिल्लाने की आवाज सुनाई दी। उसने नीचे देखा तो धीरज पर हमला हो रहा था। FIR में साफ तौर पर चार नाम दर्ज हैं। इनमें मेहराज असलम सय्यद, सिराज असलम सय्यद, मुस्तकीम असलम सय्यद और युनुस शेख शामिल हैं। शिकायतकर्ता ने इसके अलावा 2 से 3 अज्ञात लोगों की भी बात कही है।

FIR के मुताबिक हमलावरों के हाथ में लकड़ी के बल्ले और लोहे के पाइप थे। शिकायतकर्ता का आरोप है कि धीरज को बेरहमी से पीटा जा रहा था। हमलावर कथित तौर पर कह रहे थे, “इसको मार डालो।”

धीरज ने मदद के लिए अक्षय को आवाज लगाते हुए कह रहा था, “अक्षय मुझे बचाओ।” अक्षय ने ऊपर से हमलावरों को रोकने की कोशिश की। उसने अपने हाथ में मौजूद स्ट्रीट लाइट उनकी तरफ फेंकी। काव्य ने भी धीरज को छोड़ने के लिए कहा। इसके बाद तीनों आरोपित एविएटर मोटरसाइकिल से भाग गए। बाकी लोग पैदल फरार हो गए। यह पूरा घटनाक्रम शिकायतकर्ता ने पुलिस को दिए बयान में दर्ज कराया है।

FIR की कॉपी की प्रति

हमला रुकने के बाद अक्षय नीचे आया। उसने धीरज को देखा। उनके सिर पर गंभीर चोट थी। खून बह रहा था। वह बेहोश पड़े थे। अक्षय ने अपने साथी गौरव बोरुडे को फोन किया। उसने पुलिस को लेकर मौके पर आने के लिए कहा। इसके बाद उसने सुपरवाइजर अक्षय बोरुडे को भी घटना की जानकारी दी।

अक्षय और काव्य ने धीरज को उठाकर कंपनी के टेम्पो में रखा। उन्हें पहले सिविल अस्पताल ले जाया गया। वहाँ डॉक्टरों ने उनकी हालत देखते हुए दूसरे अस्पताल ले जाने की सलाह दी। इसके बाद एंबुलेंस से उन्हें मैकेयर अस्पताल ले जाया गया। वहाँ इलाज शुरू हुआ। धीरज ने तीन दिन तक जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष किया। 9 अगस्त को दोपहर करीब 2 बजे इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई।

प्रशासन ने शांति की अपील की

धीरज की मौत के बाद शहर में तनाव को देखते हुए पुलिस बल तैनात किया गया है। पुलिस अधीक्षक मुम्मका सुदर्शन ने लोगों से शांति बनाए रखने की अपील की है। पुलिस का कहना है कि स्थिति नियंत्रण में है। मामले की जाँच तेजी से चल रही है। पुलिस ने कहा है कि घटना के पीछे की असली वजह सामने लाई जाएगी।

पुलिस ने लोगों को अफवाहों से बचने की भी चेतावनी दी है। कानून हाथ में लेने की कोशिश करने वालों पर कार्रवाई की बात कही गई है। धीरज के शव को पोस्टमार्टम के लिए छत्रपति संभाजीनगर के घाटी अस्पताल भेजा गया है।

FCRA संशोधन बिल से कैसे रुकेगी अवैध विदेशी फंडिंग: जानिए उन 13 संगठनों का बही-खाता, जिनके लाइसेंस सरकार ने किए रद्द

प्रस्तावित विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 ने एक बार फिर विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (FCRA) को चर्चा में ला दिया है। इन बदलावों का मकसद भारत में आने वाले विदेशी दान की पारदर्शिता और जवाबदेही को मजबूत करना है। जब विदेशी फंड के दुरुपयोग, पैसों की हेरफेर और तय उद्देश्यों से अलग गतिविधियों के मामले सामने आते हैं, तो ऐसे कानून की जरूरत और स्पष्ट हो जाती है।

भारत में स्वास्थ्य, शिक्षा, आपदा राहत और पर्यावरण संरक्षण जैसे कार्यों के लिए विदेशी फंडिंग अहम भूमिका निभाती है। हालाँकि, सीमा पार से आने वाले इस पैसे की सही निगरानी जरूरी है। गृह मंत्रालय द्वारा संचालित FCRA कानून विदेशी फंड को रोकता नहीं है, बल्कि उसके सही इस्तेमाल और रिपोर्टिंग के नियम तय करता है।

एफसीआरए (FCRA) वह कानूनी ढाँचा है जो भारतीय व्यक्तियों, संगठनों, गैर सरकारी संस्थाओं, ट्रस्टों और अन्य पात्र संस्थाओं को जो विदेशी फंडिंग प्राप्त होती है, उसके उपयोग करने के तरीके को नियंत्रित करता है। इसका प्रशासन गृह मंत्रालय (MHA) करता है। यह कानून विदेशी दान पर रोक नहीं लगाता है, बल्कि इस धन के मिलने, उपयोग करने और उसकी रिपोर्ट करने के लिए शर्तें निर्धारित करता है।

इसलिए प्रस्तावित एफसीआरए संशोधन विधेयक 2026, पारदर्शिता और जवाबदेही पर आधारित प्रणाली को और मजबूत करने का प्रयास करता है। हालाँकि हजारों संगठन वैध धर्मार्थ उद्देश्यों के लिए विदेशी योगदान का उपयोग करना जारी रखते हैं, कुछ संगठनों की जाँच से यह सवाल उठा है कि क्या विदेशी धन का उपयोग उन उद्देश्यों के लिए ही हो रहा था, जिसके लिए ये मिला है या अन्य उद्देश्यों के लिए किया जा रहा था।

मोदी सरकार ने 13 संगठनों के एफसीआरए लाइसेंस क्यों निलंबित या रद्द किए?

वित्तीय अनियमितताओं FCRA नियमों के उल्लंघन और तय उद्देश्यों से हटकर काम करने के आरोपों के कारण सरकार ने कई संगठनों पर कार्रवाई की

  1. सतत संपदा प्राइवेट लिमिटेड
    हाल के मामलों में एक दिल्ली-एनसीआर स्थित पर्यावरण और जलवायु संगठन सतत संपदा प्राइवेट लिमिटेड से संबंधित है, जिसका एफसीआरए लाइसेंस जनवरी 2026 में रद्द कर दिया गया था।

प्रवर्तन निदेशालय ने विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (FEMA) के प्रावधानों के तहत दिल्ली और गाजियाबाद में संगठन के कार्यालय परिसर, एक व्यापारिक दुकान और दो आवासों पर तलाशी ली । रिपोर्टों के अनुसार, एजेंसी विदेशी गैर सरकारी संगठनों और अन्य समूहों से प्राप्त विदेशी मुद्रा के इस्तेमाल की जाँच कर रही थी।

परामर्श शुल्क के नाम पर इस संगठन को रकम मिली थी। जाँचकर्ता इस बात की पड़ताल कर रहे थे कि क्या विदेशी धन का इस्तेमाल अंततः सरकारी नीतियों को प्रभावित करने के लिए किया जा रहा था। ये आरोप महत्वपूर्ण हैं क्योंकि विदेशी दान का उपयोग कानूनी उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है और उसका उचित लेखा-जोखा रखना अनिवार्य है।

यह मामला जलवायु, पर्यावरण और विकास जैसे संवेदनशील नीतिगत क्षेत्रों में काम करने वाले विदेशी फंडिंग वाले संगठनों के बारे में चिंता को भी उजागर करता है। मुद्दा यह नहीं है कि कोई संगठन ऐसे विषयों पर काम कर सकता है या नहीं, बल्कि यह है कि किसी उद्देश्य के लिए प्राप्त विदेशी धन का उपयोग पारदर्शी तरीके से और भारतीय कानून की सीमाओं के भीतर किया जा रहा है या नहीं।

  1. एडवांटेज इंडिया

एक दूसरा मामला एडवांटेज इंडिया से जुड़ा है, जो कॉरपोरेट लॉबिस्ट दीपक तलवार से जुड़ा एक गैर-लाभकारी संस्था है। सीबीआई ने तलवार और संस्था के खिलाफ एफसीआरए के उल्लंघन का आरोप लगाया है।

सीबीआई के अनुसार, एडवांटेज इंडिया को 2012 और 2016 के बीच विदेशी योगदान के रूप में लगभग 90.72 करोड़ रुपये प्राप्त हुए। संगठन को रक्षा कंपनियों एयरबस और एमबीडीए से भी दान प्राप्त हुआ।

जाँच में पता चला कि गैर-लाभकारी गतिविधियों के लिए आवंटित विदेशी चंदे का दुरुपयोग व्यक्तिगत और व्यावसायिक गतिविधियों में किया गया। जाँच में एक उदाहरण के तौर पर तलवार की विदेश यात्रा का खर्च बताया गया। संगठन ने मई 2015 से जनवरी 2016 के बीच उनकी विदेश यात्रा पर ₹30.37 लाख रुपए खर्च किए।

जाँचकर्ताओं ने यह भी बताया कि एडवांटेज इंडिया ने अपनी फिक्स्ड डिपॉजिट का इस्तेमाल वेव इम्पेक्स द्वारा प्राप्त ओवरड्राफ्ट सुविधाओं के लिए गिरवी के तौर पर किया था। वेव इम्पेक्स तलवार और उनके परिवार की कंपनी है। बाद में इस पैसे का इस्तेमाल व्यावसायिक कार्यों के लिए किया गया।

एक अन्य आरोप चिकित्सा शिविरों से संबंधित था। संगठन ने कथित तौर पर बिल पेश करते हुए दावा किया कि आस्था फार्मा और हिंद फार्मा से ₹26.97 करोड़ की दवाएँ खरीदी गई थीं। हालाँकि दोनों कंपनियों ने जाँचकर्ताओं को बताया कि उनका संगठन के साथ कोई लेन-देन नहीं हुआ था।

सीबीआई ने यह भी बताया कि एडवांटेज इंडिया तलवार के परिसर से संचालित होती थी और उसने 2012 से 2015 के बीच उन्हें किराए के रूप में 80 लाख रुपए का भुगतान किया था। एजेंसी ने इसे विदेशी योगदान का व्यक्तिगत लाभ के लिए उपयोग किए जाने का एक और उदाहरण माना।

  1. ऑपरेशन मोबिलाइजेशन इंडिया

ऑपरेशन मोबिलाइजेशन (ओएम) इंडिया समूह के चैरिटी संगठनों पर विदेशी चंदे से जुड़े आरोप भी लगे। तेलंगाना अपराध जाँच विभाग की आर्थिक अपराध शाखा ने समूह से जुड़े सात चैरिटी संगठनों के 26 बैंक खाते फ्रीज कर दिए।

ओएम इंडिया के चैरिटी समूह के पूर्व मुख्य वित्त अधिकारी अल्बर्ट लाएल की शिकायत के बाद जाँच शुरू हुई। ईसाई प्रचारक जोसेफ डिसूजा, उनके बेटे जोश डिसूजा और अन्य के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज किया गया।

आरोपों के अनुसार, इन संगठनों को धर्मार्थ गतिविधियों के लिए विदेशी दान की बड़ी रकम मिली थी। जाँचकर्ताओं ने पाया कि कुछ धनराशि का बाद में दुरुपयोग किया गया और हेराफेरी की गई।

जाँच जारी रहने के दौरान धन के आगे प्रवाह को रोकने के उद्देश्य से बैंक खातों को फ्रीज किया गया था। अधिकारी एफसीआरए के संभावित उल्लंघनों की भी जाँच कर रहे थे।

  1. न्यू होप फाउंडेशन

गृह मंत्रालय ने एफसीआरए के उल्लंघन के कारण तमिलनाडु के न्यू होप फाउंडेशन और कर्नाटक के होली स्पिरिट मिनिस्ट्रीज नामक दो ईसाई प्रचारक संगठनों का एफसीआरए पंजीकरण रद्द कर दिया।

दोनों संगठनों को गॉस्पेल फॉर एशिया और संबंधित संस्थाओं से विदेशी धनराशि प्राप्त हुई थी । न्यू होप फाउंडेशन को 2017-18 और 2019-20 के बीच विदेशी योगदान के रूप में 42 करोड़ रुपए से अधिक प्राप्त हुए, जबकि होली स्पिरिट मिनिस्ट्रीज को इसी अवधि के दौरान 49 करोड़ रुपए से अधिक मिले।

यह मामला गॉस्पेल फॉर एशिया की भारतीय शाखा और उससे जुड़ी संस्थाओं के खिलाफ एफसीआरए उल्लंघन के संबंध में पहले की गई कार्रवाई की पृष्ठभूमि में सामने आया है। इन संगठनों से जुड़े विदेशी दानदाताओं में अमेरिका, कनाडा, दक्षिण अफ्रीका और फिनलैंड स्थित संस्थाएँ शामिल थीं।

इस मामले ने इस बारे में सवाल उठाए कि धार्मिक और धर्मार्थ संगठनों को जो बड़े पैमाने पर विदेशी योगदान मिले, उसका उपयोग कैसे किया जा रहा था और क्या ये धनराशि अधिकारियों को घोषित गतिविधियों के दायरे में ही रही।

  1. इंडिया रूरल इवेंजेलिकल फेलोशिप

अगस्त 2025 में गृह मंत्रालय ने आंध्र प्रदेश में मौजूद चर्च से संबद्ध संगठन इंडिया रूरल इवेंजेलिकल फेलोशिप (आईआरईएफ) का एफसीआरए लाइसेंस निलंबित कर दिया।

आरोपों के अनुसार, आईआरईएफ को 2019 और 2024 के बीच अपनी अमेरिकी और यूके शाखाओं से लगभग ₹28.6 करोड़ प्राप्त हुए। जाँचकर्ताओं ने खुलासा किया कि कल्याणकारी गतिविधियों के लिए निर्धारित धन को व्यक्तिगत खातों में स्थानांतरित कर दिया गया था।

1972 में स्थापित इस संगठन ने अपने कार्यों में शिक्षा, बच्चों के छात्रावास, धर्म प्रचार और ईसाई साहित्य वितरण को शामिल बताया। हालाँकि गृह मंत्रालय को जबरन धर्म परिवर्तन, विदेशों में चंदा इकट्ठा करने के लिए बच्चों की तस्वीरों का दुरुपयोग और विदेशी मिशनरियों से जुड़े उल्लंघनों की शिकायतें मिली हैं।

आरोपों में राजनीतिक लामबंदी के लिए विदेशी धन के उपयोग का आरोप भी शामिल था। कानूनी अधिकार संरक्षण मंच ने गृह मंत्रालय को आरोपों से संबंधित दस्तावेजी और मल्टीमीडिया सामग्री सहित एक शिकायत सौंपी थी।

  1. हार्वेस्ट इंडिया

गृह मंत्रालय ने एफसीआरए के उल्लंघन के कारण मिशनरी संगठन हार्वेस्ट इंडिया का एफसीआरए पंजीकरण भी रद्द कर दिया।

कानूनी अधिकार संरक्षण मंच ने संगठन पर विदेशी निधियों का इस्तेमाल धर्म प्रचार गतिविधियों के लिए करने का आरोप लगाया है। आरोपों के अनुसार, हार्वेस्ट इंडिया को 2017-18 और 2019-20 के बीच लगभग ₹19.6 करोड़ का विदेशी योगदान प्राप्त हुआ था।

रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि संगठन के पास सामुदायिक केंद्रों और धर्म प्रचार गतिविधियों में शामिल पादरियों का एक बड़ा नेटवर्क था। शिकायत में पादरियों के वेतन, चर्च के रखरखाव और अन्य मिशनरी गतिविधियों के लिए विदेशी निधियों के उपयोग पर सवाल उठाए गए थे।

संगठन के प्रमुख पदाधिकारी सुरेश कुमार पर अमेरिका में एक सम्मेलन के दौरान राजनीतिक और हिंदू विरोधी टिप्पणी करने का भी आरोप लगा था। एक भाषण में उन्होंने कहा था, “अभी हम हिंदू शासन के अधीन हैं। हमारे प्रधानमंत्री बुरे आदमी हैं।”

उन्होंने चुनाव से पहले प्रार्थना करने की अपील करते हुए कहा, “मैं नहीं चाहता कि यह पार्टी दोबारा सत्ता में आए।”

इसलिए हार्वेस्ट इंडिया के खिलाफ आरोपों में न केवल वित्तीय प्रश्न शामिल थे, बल्कि धार्मिक और राजनीतिक उद्देश्यों के लिए विदेशी वित्त पोषित संगठनात्मक गतिविधियों का उपयोग भी शामिल था।

  1. समानता अध्ययन केंद्र (सीईएस)

मानवाधिकार कार्यकर्ता हर्ष मंदर से संबद्ध सेंटर फॉर इक्विटी स्टडीज (सीईएस) को भी सीईएस से जुड़े संगठनों के सहयोग से संचालित बाल गृहों के संबंध में लगे आरोपों के बाद जांच का सामना करना पड़ा।

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) ने अक्टूबर 2020 में दो गृहों, उम्मीद अमन होम फॉर बॉयज और खुशी रेनबो होम फॉर गर्ल्स का निरीक्षण किया।

रिपोर्ट के अनुसार, एनसीपीसीआर को यौन शोषण के आरोपों और ऐसी घटनाओं की रिपोर्ट न करने सहित कई गंभीर अनियमितताएं मिलीं। आयोग ने पाया कि ‘पीओसीएसओ अपराधों की रिपोर्ट न करना’ बच्चों के कल्याण को खतरे में डाल सकता है।

निरीक्षण में नागरिकता संशोधन अधिनियम के विरोध प्रदर्शनों में बच्चों को जबरन शामिल किए जाने पर भी चिंता जताई गई। आयोग ने घरों में स्वैच्छिक सेवाएँ प्रदान करने वाले विदेशी नागरिकों की उपस्थिति पर भी सवाल उठाए।

इसके बाद दिल्ली पुलिस ने वित्तीय अनियमितताओं और अन्य उल्लंघनों के आरोप में सीईएस अधिकारियों और अन्य लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की।

  1. सामाजिक कानूनी सूचना केंद्र (एसएलआईसी)

गृह मंत्रालय ने सामाजिक कानूनी सूचना केंद्र (एसएलआईसी) का एफसीआरए पंजीकरण भी रद्द कर दिया, जिसके अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति दीपक वर्मा थे।

एसएलआईसी मानवाधिकार कानून नेटवर्क (एचआरएलएन) की मूल संस्था है, जिसकी स्थापना वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंसाल्वेस ने की थी। यह संस्था अपने मिशन को न्याय व्यवस्था को ‘सुलभ, कुशल, जवाबदेह, किफायती और गरीब-समर्थक’ बनाने के रूप में वर्णित करती है।

यह जनहित याचिका, कानूनी जागरूकता और मानवाधिकार उल्लंघन की जाँच पर काम करता है।

हालाँकि संगठन और उसके संबद्ध नेटवर्क पर विदेशी वित्तपोषण और राजनीतिक रूप से संवेदनशील मुद्दों पर अभियानों में संलिप्तता के आरोप लगे हैं। इसलिए एसएलआईसी का एफसीआरए पंजीकरण रद्द होने से वकालत और मुकदमेबाजी में संलग्न संगठनों के लिए विदेशी फंडिंग नियमों का कड़ाई से पालन कराने की ओर ध्यान गया।

  1. सतत विकास के लिए केयर इंडिया समाधान

केयर इंडिया, जिसका कानूनी नाम केयर इंडिया सॉल्यूशंस फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट (सीआईएसएसडी) है, भी अपने विदेशी फंडिंग और गतिविधियों को लेकर जाँच के दायरे में आ गई।

संगठन को विदेशी सरकार से काफी योगदान मिला था । एफसीआरए के दस्तावेजों से पता चलता है कि संदर्भित सामग्री में उल्लिखित वित्तीय वर्ष के दौरान इसे 157 करोड़ रुपये से अधिक का विदेशी दान प्राप्त हुआ था, जिसमें प्रमुख दानदाताओं में विदेशों में स्थित केयर संगठन, यूएसएआईडी और अमेजन डेवलपमेंट सेंटर इंडिया शामिल थे।

संगठन पर सरकारी परियोजनाओं से अपने जुड़ाव का इस्तेमाल चंदा माँगने के लिए करने का भी आरोप लगाया गया था। इसके पदाधिकारी नीरा सग्गी आईएल एंड एफएस वित्तीय धोखाधड़ी के संबंध में अलग से जाँच के दायरे में आईं।

यह भी आरोप लगाया गया है कि केयर इंडिया ने इवेंजेलिकल सोशल एक्शन फोरम को धनराशि ट्रांसफर की, जिसने 2018-19 में केयर इंडिया से 52 लाख रुपए से अधिक की राशि प्राप्त की।

फिर सवाल उठता है कि जब संगठनों को बड़े पैमाने पर विदेशी योगदान मिलता है और वे सरकारी कार्यक्रमों को भी करते हैं, तो उनके वित्तीय लेन-देन पारदर्शी रहने चाहिए और उनके उद्देश्यों के अंतर्गत न आने वाली गतिविधियों से स्पष्ट रूप से अलग होने चाहिए।

  1. सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च (CPR)

दिल्ली स्थित इस थिंक-टैंक का लाइसेंस 2023 में निलंबित और बाद में रद्द कर दिया गया। विदेशी फंड को अन्य संस्थाओं में ट्रांसफर करने और गैर-निर्दिष्ट खातों के इस्तेमाल के आरोप लगे।

यह कार्रवाई सितंबर 2022 में आयकर विभाग द्वारा किए गए सर्वेक्षणों के बाद की गई। सरकार ने सीपीआर के विदेशी अंशदानों से संबंधित स्पष्टीकरण और दस्तावेज भी माँगे।

सीपीआर के दस्तावेजों से पता चला कि उसे अक्टूबर और दिसंबर 2022 के बीच बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन, पेन्सिलवेनिया विश्वविद्यालय, वर्ल्ड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट और ड्यूक विश्वविद्यालय सहित विदेशी स्रोतों से लगभग ₹10.1 करोड़ मिले।

सरकार द्वारा एफसीआरए के प्रावधानों का अनुपालन न करना, जिसमें विदेशी अंशदान को अन्य संस्थाओं में स्थानांतरित करने और गैर-निर्दिष्ट खातों के उपयोग से संबंधित चिंताएँ शामिल हैं।

बाद में सीपीआर ने इस कार्रवाई को चुनौती दी और कहा कि वह कानूनी विकल्पों पर विचार करेगी। उसका मामला यह दर्शाता है कि एफसीआरए का अनुपालन विदेशी निधि प्राप्त करने वाले थिंक टैंक और अनुसंधान संगठनों पर भी लागू होता है, विशेष रूप से जब उन निधियों का उपयोग नीति अनुसंधान और सार्वजनिक मामलों के लिए किया जाता है।

  1. ऑक्सफैम इंडिया

ऑक्सफैम इंडिया भी एक ऐसा संगठन है जिसके खिलाफ एफसीआरए के उल्लंघन के मामले में कार्रवाई की गई । गृह मंत्रालय ने विदेशी वित्तपोषण नियमों के उल्लंघन के मामले में संगठन की सीबीआई जाँच की सिफारिश की थी।

आरोपों के अनुसार, ऑक्सफैम इंडिया ने 2020 के उस संशोधन के बाद भी विदेशी अंशदान को अन्य संस्थाओं में स्थानांतरित करना जारी रखा, जिसमें इस तरह के हस्तांतरण पर रोक लगाई गई थी।

अधिकारियों ने यह भी बताया कि ऑक्सफैम इंडिया ने एफसीआरए में पंजीकृत अन्य संगठनों या लाभ कमाने वाली परामर्श संस्था के माध्यम से धनराशि भेजने की योजना बनाई थी। सरकार ने आगे खुलासा किया कि ऑक्सफैम इंडिया ने अपने सहयोगियों और कर्मचारियों के माध्यम से कमीशन के रूप में सीपीआर को धनराशि ट्रांसफर की। इसके अलावा, इसने लगभग ₹1.50 करोड़ सीधे अपने खाते में प्राप्त किए, न कि निर्धारित एफसीआरए खाते में।

संगठन का एफसीआरए पंजीकरण जनवरी 2022 में नवीनीकरण प्राप्त करने में विफल रहने के बाद समाप्त हो गया।

एक अन्य विवाद असम के चाय उद्योग पर एक रिपोर्ट से जुड़ा था। जाँचकर्ताओं ने कहा कि रिपोर्ट में स्वयंसेवकों ने जो आँकड़े उपलब्ध कराए, इसमें पर्याप्त जमीनी शोध या चाय बागान प्रबंधन, श्रमिक, संघों और राज्य सरकार के विचारों को शामिल नहीं किया गया था। बाद में इस रिपोर्ट का हवाला अमेरिकी श्रम विभाग की उस सूची के संदर्भ में दिया गया, जिसमें बाल श्रम या जबरन श्रम का उपयोग करके उत्पादित वस्तुओं का उल्लेख था।

इस मामले ने इस बात पर चिंता जताई कि क्या विदेशी वित्त पोषित वकालत और अनुसंधान संभावित रूप से भारत के आर्थिक हितों और निर्यात को प्रभावित कर सकते हैं।

  1. वन और पर्यावरण के लिए कानूनी पहल

पर्यावरण वकील रित्विक दत्ता से संबद्ध पर्यावरण संगठन लीगल इनिशिएटिव फॉर फॉरेस्ट एंड एनवायरनमेंट (LIFE ट्रस्ट) का FCRA पंजीकरण मार्च 2023 में निलंबित कर दिया गया था और फरवरी 2024 में रद्द कर दिया गया था।

सीबीआई ने आरोप लगाया है कि लाइफ संस्था को अमेरिका स्थित पर्यावरण कानून संगठन अर्थजस्टिस से विदेशी फंडिंग मिली थी। उसने इसका इस्तेमाल भारत में कोयला और दूसरे परियोजनाओं के खिलाफ कानूनी कार्रवाई के लिए किया।

जाँच के अनुसार, दत्ता को 2013-14 में अर्थजस्टिस से विदेशी योगदान के रूप में ₹41 लाख प्राप्त हुए, जबकि एक संबंधित स्वामित्व वाली कंपनी को 2016 और 2021 के बीच पेशेवर प्राप्तियों के रूप में लगभग ₹22 करोड़ प्राप्त हुए।

सरकार ने कहा कि विकास परियोजनाओं में देरी करने या उन्हें रोकने के उद्देश्य से दायर मुकदमों का समर्थन करने के लिए विदेशी धन का इस्तेमाल किया जा रहा था।

इस जाँच में राजस्थान, छत्तीसगढ़ और देश के अन्य हिस्सों में स्थित बिजली और कोयला परियोजनाओं से जुड़े मामलों का अध्ययन किया गया। सरकार ने तर्क दिया कि इस तरह की व्यवस्था भारत के ऊर्जा बुनियादी ढाँचा और आर्थिक हितों को प्रभावित कर सकती है।

हालाँकि, LIFE ने अपने काम को पर्यावरणीय लोकतंत्र और पर्यावरण संबंधी मामलों में सूचना, सार्वजनिक भागीदारी और न्याय तक पहुँच में सुधार लाने के उद्देश्य से किया गया बताया है।

  1. एनवायरनिक्स ट्रस्ट

आखिरी मामला एनवायरनिक्स ट्रस्ट का है, जिसका एफसीआरए पंजीकरण 4 मार्च 2024 को रद्द कर दिया गया था।

सीबीआई ने विदेशी फंडिंग लेनदेन से संबंधित उल्लंघनों के आरोप में संगठन और उसके अधिकारियों के खिलाफ आरोप पत्र दायर किया। एजेंसी ने यह भी खुलासा किया कि संगठन ने एफसीआरए रिटर्न में एमएए प्लास्टो नामक कंपनी के 6.50 लाख और 4 लाख रुपए के दो जाली चालानों का इस्तेमाल किया था।

आरोपों के अनुसार, कंपनी द्वारा इनवॉइस जारी नहीं किए गए थे, बल्कि विदेशी निधि के उपयोग के लिए दाखिल किए गए रिटर्न में इन्हें व्यय के रूप में दिखाया गया था।

संगठन की कोयला खनन और कोयला आधारित बिजली परियोजनाओं के खिलाफ चलाए गए अभियानों से संबंधित गतिविधियों की भी जाँच की गई। जाँचकर्ताओं ने पाया कि विकास परियोजनाओं के विरोध प्रदर्शनों को समर्थन देने के लिए विदेशी चंदे का इस्तेमाल किया गया था।

यह मामला एफसीआरए अनुपालन के एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू को उजागर करता है: संगठनों को वास्तविक रिकॉर्ड बनाए रखना चाहिए और यह बताना चाहिए कि विदेशी योगदान कैसे खर्च किए गए हैं।

एफसीआरए संशोधन की आवश्यकता क्यों है?

ये मामले एक-दूसरे से भिन्न हैं। कुछ मामलों में निजी या व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए धन का दुरुपयोग शामिल है, जबकि अन्य मामले राजनीतिक, धार्मिक, सामाजिक हितैषी या पर्यावरणीय गतिविधियों से संबंधित हैं। ये मामले दर्शाते हैं कि विदेशी योगदान के लिए एक नियामक ढाँचा क्यों आवश्यक है। विदेशी धन से वास्तविक सामाजिक कार्यों को समर्थन मिल सकता है, लेकिन जब धन को सीमाओं के पार ले जाया जाता है और ऐसे उद्देश्यों के लिए उपयोग किया जाता है जिनकी निगरानी करना मुश्किल है, तो इससे जवाबदेही संबंधी चुनौतियाँ भी उत्पन्न हो सकती हैं।

एफसीआरए संशोधन का उद्देश्य विदेशी दानकर्ता, दान लेने वाले संगठन और इस धन के अंतिम उपयोग की कड़ी को पता लगाना है। विदेशी योगदान प्राप्त करने वाले संगठनों को पंजीकरण कराना, निर्दिष्ट बैंकिंग व्यवस्था बनाए रखना, खाते रखना और रिटर्न जमा करना भी आवश्यक है।

इसलिए इस कानून का उद्देश्य वैध धर्मार्थ कार्यों को रोकना नहीं है। शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, आपदा राहत, गरीबी उन्मूलन, वैज्ञानिक अनुसंधान, पर्यावरण संरक्षण और मानवीय गतिविधियाँ विदेशी अनुदान के माध्यम से जारी रह सकती हैं, बशर्ते संगठन नियमों का पालन करें।

एफसीआरए के मुख्य उद्देश्य

मूल रूप से एफसीआरए के 5 मकसद हैं- पारदर्शिता, जवाबदेही, संप्रभुता की सुरक्षा, वास्तविक सामाजिक कार्य को सक्षम बनाना और जनता का विश्वास बनाए रखना।

पारदर्शिता का अर्थ है कि विदेशी योगदानों का उचित रिकॉर्ड रखा जाए और उनके स्रोत और उपयोग की पहचान की जा सके। जवाबदेही के लिए संगठनों को खाते बनाए रखने और विवरण देने की आवश्यकता होती है, ताकि अधिकारी यह जाँच कर सकें कि धन का उपयोग कैसे किया गया।

संप्रभुता का पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है। विदेशी योगदान जो भारत की संप्रभुता, सुरक्षा, लोकतांत्रिक संस्थाओं, चुनावी प्रक्रियाओं या सार्वजनिक व्यवस्था को प्रतिकूल रूप से प्रभावित कर सकते हैं, उन्हें विनियमित करना आवश्यक है। इसका यह अर्थ नहीं है कि हर विदेशी फंडिंग वाला संगठन खतरनाक है। इसका अर्थ यह है कि सरकार का यह दायित्व है कि वह यह सुनिश्चित करे कि विदेशी फंडिंग का असर राष्ट्रीय हितों पर न पड़े।

साथ ही विनियमन का उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय सहयोग में बाधा डालना नहीं होना चाहिए। हजारों संगठन वैध मानवीय और विकासात्मक कार्यों के लिए विदेशी रकम प्राप्त करना जारी रखे हुए हैं। कड़ी निगरानी वास्तव में स्वैच्छिक क्षेत्र में जनता का विश्वास बढ़ाकर ऐसे संगठनों की मदद कर सकती है।

ऊपर चर्चा किए गए मामले यह दर्शाते हैं कि प्रस्तावित एफसीआरए विधेयक 2026 को पारदर्शिता और जवाबदेही को मजबूत करने के उपाय के रूप में क्यों प्रस्तुत किया जा रहा है। विदेशी योगदान भारत के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है, लेकिन यह धन उन लोगों और उद्देश्यों तक पहुँचना चाहिए जिनके लिए यह दिया गया है।

अंत में, एफसीआरए की आवश्यकता विदेशी वित्तपोषण के अस्तित्व पर आधारित नहीं है। यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर आधारित है कि ऐसा वित्तपोषण पारदर्शी, पता लगाने योग्य और जवाबदेह बना रहे। एक मजबूत नियामक प्रणाली वैध गैर-सरकारी संगठनों की रक्षा कर सकती है, साथ ही संगठनों के लिए विदेशी धन का दुरुपयोग व्यक्तिगत लाभ, अनधिकृत गतिविधियों या अपने घोषित उद्देश्यों से परे उद्देश्यों के लिए करना कठिन बना सकती है।

इससे पहले ऑपइंडिया ने रिपोर्ट किया था कि प्रस्तावित FCRA संशोधन विधेयक ईसाई विरोधी उपाय नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य विदेशी योगदान के उपयोग में पारदर्शिता और जवाबदेही को मजबूत करना है।

भारत में ईसाइयों के साथ होने वाले व्यवहार पर अमेरिका ने चिंता जताई है, लेकिन यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि अमेरिका में भी विदेशी प्रभाव और वित्तपोषण को नियंत्रित करने वाले कानून मौजूद हैं। अमेरिका विदेशी एजेंट पंजीकरण अधिनियम (एफएआरए) को लागू करता है, जिसके तहत विदेशी हितों का प्रतिनिधित्व करने वाले कुछ व्यक्तियों और संगठनों को विदेशी प्रमुखों के साथ अपने संबंधों का खुलासा करना और अपनी गतिविधियों और वित्तपोषण के बारे में जानकारी प्रदान करना अनिवार्य है। पारदर्शिता का यही सिद्धांत भारत के एफसीआरए ढाँचे पर भी लागू होता है।

एफसीआरए (FCRA) कैसे अस्तित्व में आया?

ओपइंडिया ने इससे पहले भी एफसीआरए के इतिहास पर रिपोर्ट की थी और तर्क दिया था कि कॉन्ग्रेस पार्टी ने इस कानून को अस्तित्व में लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। हालाँकि अब मोदी सरकार के प्रस्तावित संशोधनों की आलोचना कर रही है।

विदेशी अंशदानों के नियमन का ढाँचा वर्तमान सरकार ने नहीं बनाया गया है। विदेशी अंशदानों का नियमन कई दशकों में क्रमिक कानूनों और संशोधनों के माध्यम से विकसित हुआ है। इससे निगरानी, ​​लेखापरीक्षा, निलंबन या रद्द करने के लिए सरकारें उपयोग करती हैं।

विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम, 1976 तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के नेतृत्व वाली कॉन्ग्रेस सरकार के दौरान लागू किया गया था। एफसीआरए की आधारशिला 1976 में आपातकाल के चरम पर रखी गई थी। इसका उद्देश्य विदेशी निधियों के प्रवाह और उपयोग को विनियमित करना था।

(यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

काँवड़ियों को धर्मशाला, गंगा कुंड, पार्क समेत मिलेंगी आधुनिक सुविधाएँ: योगी सरकार के धार्मिक कायाकल्प के बीच रामपुर का पातालेश्वर महादेव मंदिर लेगा नया रूप, ₹101 करोड़ से होगा जीर्णोद्धार

उत्तर प्रदेश के रामपुर जिले में स्थित श्री पातालेश्वर महादेव मंदिर केवल आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, महाभारत कालीन इतिहास की एक जीवंत मिसाल है। रामपुर शहर से लगभग पाँच किलोमीटर दूर भमरौआ गाँव में स्थित यह शिवालय सदियों से शिवभक्तों की अगाध श्रद्धा का केंद्र रहा है।

द्वापर युग की ऐतिहासिक जड़ों को अपने में समेटे यह मंदिर आज एक भव्य और आधुनिक स्वरूप लेने जा रहा है। स्थानीय शिवभक्तों के आपसी सहयोग और राज्य की उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार की जन कल्याणकारी योजनाओं के तालमेल से यह मंदिर देश के चुनिंदा भव्य धार्मिक स्थलों में शुमार होने की राह पर है।

सावन के पवित्र महीने में हर साल लाखों श्रद्धालु यहाँ भगवान भोलेनाथ का जलाभिषेक करने आते हैं। आज यह प्राचीन शिवालय अपनी पौराणिक पहचान को बनाए रखते हुए एक राष्ट्रीय स्तर के पर्यटन स्थल के रूप में विकसित हो रहा है।

महाभारत कालीन पौराणिक इतिहास और गजेटियर के प्रमाण

भमरौआ के पातालेश्वर महादेव मंदिर की मान्यता द्वापर युग यानी महाभारत काल से जुड़ी हुई है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस स्थान पर स्थापित शिवलिंग अत्यंत प्राचीन और स्वयं प्रकट हुआ यानी पाताल से निकला हुआ माना जाता है, इसी कारण इसे पातालेश्वर महादेव कहा जाता है। सदियों तक यह शिवालय एक छोटे से स्वरूप में लोक आस्था का केंद्र बना रहा।

इस ऐतिहासिक तथ्य की प्रामाणिकता तब और मजबूत हुई जब मुरादाबाद मंडल के गजेटियर भाग दो के प्रकाशन के सिलसिले में ऐतिहासिक दस्तावेजों की गहन खोजबीन की गई।

करीब तीन सौ साल पुराने नवाबों के शासनकाल के अभिलेखों और गजेटियर के शोध कार्यों से यह स्पष्ट रूप से प्रमाणित हुआ कि भमरौआ का यह मंदिर अति प्राचीन और महाभारत कालीन इतिहास से जुड़ा हुआ है।

मुरादाबाद के मंडलायुक्त आंजनेय कुमार सिंह के अनुसार, पुरातात्विक शोध और सरकारी गजेटियर में दर्ज अभिलेख इस बात की पुष्टि करते हैं कि प्राचीन काल में यह एक छोटा सा लेकिन अत्यंत प्रभावकारी और पवित्र शिवालय हुआ करता था, जो कालांतर में जन-जन की आस्था का विशाल केंद्र बन गया।

चमत्कारिक घटनाओं का भय और नवाब अहमद अली खान द्वारा मंदिर की नींव

पातालेश्वर शिव मंदिर का इतिहास एक बेहद अनोखी और ऐतिहासिक घटना से जुड़ा हुआ है। भमरौआ गाँव घनी मुस्लिम आबादी के बीच बसा हुआ था। समय के साथ जब मंदिर की सही पहचान और देखरेख में कमी आई, तो आसपास के लोग शिवलिंग के वास्तविक महत्व और उसकी पवित्रता से अनजान थे।

इस अज्ञानता के कारण कई ग्रामीण अनजाने में उस स्वयंभू शिवलिंग के पत्थर को अपने लोहे के औजारों में धार लगाने के लिए इस्तेमाल करने लगे थे। इस पावन शिवलिंग के साथ हुए इस व्यवहार के बाद क्षेत्र में कई तरह के भयंकर दुष्प्रभाव, अनहोनी घटनाएँ और रहस्यमयी हादसे देखने को मिलने लगे, जिससे स्थानीय लोगों में भारी खौफ पैदा हो गया।

जब क्षेत्र में घट रही इन भयानक घटनाओं, उनके दुष्प्रभावों और स्वयंभू शिवलिंग के चमत्कारिक अस्तित्व की जानकारी तत्कालीन रामपुर रियासत के शासक नवाब अहमद अली खान को हुई, तो वह भी इन अलौकिक घटनाओं से भयभीत हो गया।

नवाब ने ईश्वर के प्रकोप और घट रही अप्रिय घटनाओं से राहत पाने के लिए सन 1822 में स्वयं आगे बढ़कर इस मंदिर की औपचारिक बुनियाद रखवाई। इसके साथ ही उन्होंने मंदिर के सुचारू संचालन और भव्यता के लिए कई एकड़ उपजाऊ जमीन भी दान कर दी।

श्री पातालेश्वर शिवालय सेवा ट्रस्ट के सेवादार संदीप अग्रवाल भी बताते हैं कि भमरौआ में जिस स्थान पर श्री पातालेश्वर महादेव मंदिर है वहाँ पर जंगल हुआ करता था। एक दिन यहाँ पर ज्योर्तिलिंग प्रकट हुआ। जिसे कुछ लोगों द्वारा उसे उखाड़ने की कोशिश की गई और जब कामयाब नहीं हुए तो शिवलिंग को धारदार हथियारों से काटने की कोशिश की गई। 

संदीप अग्रवाल कहते हैं कि इस पर शिवलिंग से पहले दूध और बाद में रक्त बहने लगा। जो कि चर्चा का विषय बन गया। सूचना पर उस वक्त का शासक नवाब अहमद अली खाँ मौके पर पहुँचा और उस स्थान पर मंदिर निर्माण के लिए करीब 35 बीघा जमीन दान दी।

101 करोड़ का जनसहयोग और मंदिर का अत्याधुनिक जीर्णोद्धार

वर्तमान समय में श्री पातालेश्वर महादेव मंदिर का जीर्णोद्धार अत्यंत तेज गति से चल रहा है। सबसे खास बात यह है कि इस विशाल जीर्णोद्धार परियोजना की अनुमानित लागत लगभग 101 करोड़ रुपए है, जो शिवभक्तों और आम जनता के आपसी आर्थिक सहयोग से पूरी की जा रही है।

मंदिर के पुनरुद्धार के लिए ‘श्री पातालेश्वर सेवा ट्रस्ट’ का गठन किया गया है, जिसके सेवादार और स्थानीय जनप्रतिनिधि दिन-रात इस कार्य में जुटे हैं। जीर्णोद्धार के तहत प्राचीन मंदिर के मुख्य गर्भगृह को बढ़ाकर 1296 वर्ग फीट तक चौड़ा किया जा रहा है, जिससे हजारों श्रद्धालु एक साथ दर्शन कर सकें।

गर्भगृह का शिखर 151 फीट ऊँचा बनकर तैयार हो चुका है, जिस पर भव्य धर्म ध्वजा फहरा रही है। इस विशाल शिखर के ऊपर 11 फीट ऊँचा स्वर्ण कलश स्थापित किया गया है, जो दूर से ही श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करता है।

इसके अलावा श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए मंदिर परिसर में 11 हजार वर्ग फीट क्षेत्र में एक विशाल धर्मशाला का निर्माण पहले ही जन सहयोग से पूरा किया जा चुका है।

आधुनिक सुविधाएँ और भव्य कॉरिडोर की परिकल्पना

भमरौआ के इस शिवालय को देश के अग्रणी और आधुनिक मंदिरों की तर्ज पर विकसित किया जा रहा है। जीर्णोद्धार योजना के पूरा होने पर मंदिर में श्रद्धालुओं को अंतरराष्ट्रीय स्तर की सुविधाएँ मिलेंगी। मंदिर का मुख्य गर्भगृह पूरी तरह से वातानुकूलित होगा, जहाँ आरती और पूजन के समय श्रद्धालुओं के बैठने के लिए एक विशाल हॉल बनाया जा रहा है।

गर्भगृह के ठीक सामने एक सुंदर और पवित्र ‘शिव गंगा’ कुंड का निर्माण किया जा रहा है, जिसमें श्रद्धालु जलाभिषेक से पहले स्नान कर सकेंगे। दूर-दराज से आने वाले शिवभक्तों के ठहरने के लिए लिफ्ट की आधुनिक सुविधा से युक्त पाँच मंजिला पूरी तरह वातानुकूलित धर्मशाला बनाई जा रही है।

मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं को जलाभिषेक के लिए सीधे हरिद्वार से लाया गया गंगाजल उपलब्ध कराने की विशेष व्यवस्था की जा रही है। इसके साथ ही परिसर के बाहर सुंदर हरे-भरे पार्क, 25 फीट ऊँचे संगीतमय फव्वारे, आधुनिक कैंटीन, स्वच्छ पेयजल व्यवस्था और सुव्यवस्थित प्रसाद वितरण केंद्रों का निर्माण कराया जा रहा है।

मंदिर तक पहुँचने वाले यातायात को सुगम बनाने के लिए मुख्य मार्ग को 40 फीट चौड़ा किया जा रहा है और हाईवे के किनारे पनवड़िया नामक स्थान पर एक भव्य और नक्काशीदार मुख्य प्रवेश द्वार का निर्माण कराया जा रहा है।

योगी सरकार का विजन और राष्ट्रीय पर्यटन स्थल के रूप में विकास

उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार प्रदेश के पौराणिक और धार्मिक स्थलों के कायाकल्प और उन्हें पर्यटन मानचित्र पर स्थापित करने के लिए प्रतिबद्ध रही है। राज्य सरकार की धार्मिक पर्यटन नीति के तहत रामपुर के इस महाभारत कालीन पातालेश्वर महादेव मंदिर को एक राष्ट्रीय पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की दिशा में तेजी से काम किया जा रहा है।

नगर विधायक आकाश सक्सेना और स्थानीय प्रशासन के प्रयासों से मंदिर के आसपास के क्षेत्र को एक विशाल कॉरिडोर के रूप में ढाला जा रहा है। योजना के अनुसार, काशी विश्वनाथ और उज्जैन महाकाल कॉरिडोर की तर्ज पर भमरौआ में लगभग 100 बीघा जमीन पर भव्य ‘शिव कॉरिडोर’ तैयार करने की रूपरेखा बनाई गई है।

राज्य सरकार द्वारा क्षेत्र की सड़कों के चौड़ीकरण, इंफ्रास्ट्रक्चर, सुरक्षा और पर्यटकों की सहूलियत से जुड़ी बुनियादी सुविधाओं को दुरुस्त किया जा रहा है।

स्थानीय विधायक और सेवादारों का मानना है कि जब यह कॉरिडोर और जीर्णोद्धार का काम पूरी तरह संपन्न हो जाएगा, तो भमरौआ का यह पातालेश्वर शिवालय न केवल उत्तर प्रदेश बल्कि पूरे देश के प्रमुख धार्मिक और सांस्कृतिक पर्यटन केंद्रों में अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाएगा।

चीन में ‘टाइफून डॉल्फिन’ से मचा हाहाकार, 10 लाख लोग इधर-उधर भागे: पढ़ें- इस तूफान का भारत पर क्या पड़ सकता है असर?

चीन के पूर्वी तट पर ‘टाइफून डॉल्फिन’ नाम के खतरनाक तूफान ने भारी तबाही मचा दी है। इस साल चीन से टकराने वाला यह सबसे शक्तिशाली चक्रवात है। रविवार (9 अगस्त 2026) को इस तूफान ने झेजियांग प्रांत के युहुआन इलाके के पास जमीन पर दस्तक दी। इस दौरान हवा की रफ्तार करीब 151 किलोमीटर प्रति घंटा थी, जो बहुत खतरनाक मानी जाती है।

तूफान के आने के बाद से वहाँ लगातार मूसलाधार बारिश हो रही है और तेज हवाएँ चल रही हैं। इसकी वजह से कई इलाकों में बाढ़ और जमीन खिसकने का बड़ा खतरा पैदा हो गया है। लोगों की जान बचाने के लिए पूर्वी चीन में 10 लाख से ज्यादा लोगों को सुरक्षित जगहों पर शिफ्ट किया गया है।

हालात इतने खराब हैं कि अकेले शंघाई शहर में करीब 1500 फ्लाइट्स रद्द करनी पड़ीं। इसके अलावा झेजियांग के वेंझोउ शहर में 9 लाख से अधिक लोगों को सुरक्षित निकाला गया और उनके रहने के लिए एक हजार से ज्यादा राहत शिविर यानी शेल्टर खोले गए हैं।

टाइफून डॉल्फिन क्या है?

टाइफून डॉल्फिन कोई अलग तरह का तूफान नहीं है, बल्कि यह एक बहुत ताकतवर ट्रॉपिकल चक्रवात ही है। जब इस तरह का चक्रवात पश्चिमी प्रशांत महासागर में बनता है, तो इसे टाइफून कहते हैं। यही तूफान अगर अटलांटिक या पूर्वी प्रशांत महासागर में बने, तो इसे हरिकेन कहा जाता है। अलग-अलग जगहों पर इनके नाम भले ही अलग हों, लेकिन बनने का तरीका एक जैसा ही होता है। टाइफून डॉल्फिन को भी समुद्र के गर्म पानी से भारी ताकत और ऊर्जा मिलती है।

समुद्र का गर्म पानी बड़ी मात्रा में नमी को हवा में ऊपर भेजता है। यह नमी बादलों और गरज वाले तूफानों को और ज्यादा ताकतवर बना देती है। इसकी वजह से वहाँ हवा का कम दबाव बनता है और सिस्टम लगातार मजबूत होता जाता है। जैसे-जैसे यह सिस्टम ताकतवर होता है, हवाओं की रफ्तार बहुत तेज हो जाती है और एक बड़ा चक्रवात तैयार हो जाता है।

टाइफून डॉल्फिन ने समुद्र में करीब 6000 किलोमीटर की बहुत लंबी दूरी तय करने के बाद चीन की तरफ रुख किया था। चीन के सरकारी मीडिया के मुताबिक, इतनी लंबी दूरी तय करने की वजह से इस तूफान की उम्र सामान्य तूफानों के मुकाबले तीन गुना से भी ज्यादा लंबी रही। इसके अलावा इसका दायरा भी बहुत बड़ा था। यही मुख्य वजह थी कि इस तूफान का असर सिर्फ उसी जगह तक सीमित नहीं रहा जहाँ इसने जमीन पर दस्तक दी थी, बल्कि बहुत दूर-दूर तक इसका भयंकर प्रभाव देखने को मिला।

चीन में कब और कैसे टकराया खतरनाक टाइफून डॉल्फिन

रविवार (9 अगस्त) शाम करीब 5:30 बजे स्थानीय समय के अनुसार टाइफून डॉल्फिन ने झेजियांग प्रांत के युहुआन के पास चीन के पूर्वी तट पर पहली बार जमीन पर दस्तक दी। इसे मौसम विज्ञान की भाषा में लैंडफॉल कहा जाता है। इस दौरान तूफान के केंद्र के पास हवा की रफ्तार 151 किलोमीटर प्रति घंटा यानी करीब 42 मीटर प्रति सेकंड दर्ज की गई। इसके ठीक एक घंटे बाद इस खतरनाक तूफान ने वेंझोउ शहर के पास एक बार फिर दूसरा लैंडफॉल किया।

इस भारी खतरे को देखते हुए चीन के राष्ट्रीय मौसम विज्ञान केंद्र ने सबसे बड़ा यानी रेड अलर्ट जारी कर दिया था। चीन में टाइफून के खतरों को बताने के लिए चार स्तरों की चेतावनी प्रणाली होती है, जिसमें रेड अलर्ट सबसे गंभीर और डरावना स्तर माना जाता है। मौसम अधिकारियों ने साफ किया था कि इतनी सख्त चेतावनी सिर्फ तेज हवाओं के लिए नहीं थी, बल्कि इसके पीछे भारी बारिश, इसका बहुत बड़ा दायरा और लंबे समय तक टिके रहने का खतरा था।

जमीन पर टकराने के बाद टाइफून डॉल्फिन धीरे-धीरे पश्चिम और उत्तर-पश्चिम दिशा की तरफ आगे बढ़ने लगा। मौसम विभाग का अनुमान था कि आगे चलकर यह मध्य और दक्षिण-पश्चिमी चीन के ऊपर जाकर थोड़ा धीमा हो जाएगा और धीरे-धीरे कमजोर पड़ जाएगा। लेकिन वैज्ञानिकों की सबसे बड़ी चिंता यह थी कि तूफान कमजोर होने के बाद भी इसकी वजह से होने वाली भयंकर बारिश बहुत लंबे समय तक जारी रह सकती है।

टाइफून डॉल्फिन से चीन में क्यों मचा हाहाकार और कैसे की गई सुरक्षा की तैयारियाँ

टाइफून डॉल्फिन के आने से पहले ही चीन के तटीय इलाकों में बड़े पैमाने पर तैयारियाँ शुरू कर दी गई थीं। समंदर में काम करने वाले सभी कर्मचारियों को सुरक्षित जगहों पर भेज दिया गया था। सभी जहाजों को तुरंत बंदरगाह पर लौटने के सख्त आदेश दिए गए थे। इसके अलावा बांधों, पहाड़ी नालों, निर्माण स्थलों, घूमने वाली जगहों और जमीन खिसकने के खतरे वाले इलाकों पर विशेष नजर रखी जाने लगी थी।

इस भयानक तूफान की वजह से पूर्वी चीन में 10 लाख से ज्यादा लोगों को सुरक्षित जगहों पर शिफ्ट करना पड़ा। अकेले झेजियांग प्रांत के वेंझोउ शहर से 9 लाख से अधिक लोगों को हटाया गया और उनके रहने के लिए एक हजार से ज्यादा राहत शिविर यानी शेल्टर खोले गए।

इसी प्रांत के ताइझोउ शहर में करीब 3 लाख 90 हजार लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुँचाया गया। फुजियान प्रांत में लगभग 98 हजार 900 लोगों को खतरनाक इलाकों से बाहर निकाला गया। इसके अलावा शंघाई शहर से भी कम से कम 30 हजार 300 लोगों को सुरक्षित जगहों पर ले जाया गया ताकि किसी की जान खतरे में न पड़े।

चीन के जल संसाधन मंत्रालय ने पहले ही चेतावनी दे दी थी कि कियानतांग, योंग, जियाओ और शुइयांग नदियों में बहुत बड़ी बाढ़ आ सकती है। सबसे ज्यादा प्रभावित इलाकों में बहने वाली छोटी नदियों का पानी भी खतरे के निशान से ऊपर जाने का डर था।

झेजियांग के कुछ हिस्सों में पहाड़ी नालों से अचानक आने वाली बाढ़ और जमीन खिसकने का खतरा बहुत ज्यादा बढ़ गया था। हालात की गंभीरता को देखते हुए प्रशासन ने रेड अलर्ट वाले इलाकों में रहने वाले लोगों से अपील की थी कि वे स्थानीय अधिकारियों के निकलने के आदेशों का तुरंत पालन करें और सुरक्षित जगहों पर चले जाएँ।

भारी बारिश और बाढ़ का बड़ा खतरा

टाइफून डॉल्फिन से केवल तेज हवाओं का ही खतरा नहीं है, बल्कि इससे होने वाली भयंकर बारिश ने अधिकारियों की चिंता सबसे ज्यादा बढ़ा दी है। मौसम विभाग ने शंघाई, झेजियांग और फुजियान समेत कई बड़े इलाकों में बहुत भारी बारिश होने की चेतावनी दी है।

मध्य और पूर्वी झेजियांग के कुछ खास इलाकों में तो 250 से 500 मिलीमीटर तक बारिश होने की आशंका जताई गई है। इतनी ज्यादा बारिश जब कम समय में होती है, तो नदियों और नालों का पानी बहुत तेजी से ऊपर उठने लगता है। पहाड़ी इलाकों में इसकी वजह से जमीन खिसकने यानी भूस्खलन और अचानक बाढ़ आने का खतरा बहुत ज्यादा बढ़ जाता है।

राष्ट्रीय मौसम विज्ञान केंद्र के मुख्य वैज्ञानिक वांग हैपिंग ने बताया कि जमीन पर टकराने के बाद भी यह तूफान बहुत धीमी गति से आगे बढ़ रहा है। इसी वजह से बारिश का यह दौर बहुत लंबा चल सकता है। यही कारण है कि तूफान के कमजोर होने के बाद भी खतरा तुरंत टला नहीं है।

अधिकारियों ने साफ किया है कि किसी टाइफून के जमीन से टकरा जाने का यह मतलब बिल्कुल नहीं होता कि उसका असर खत्म हो गया है। जमीन के अंदर आने के बाद भी इसका बारिश वाला सिस्टम बहुत दूर-दूर तक भारी तबाही मचा सकता है।

मौसम का यह खतरनाक असर 12 अगस्त तक कई इलाकों में लगातार बने रहने की उम्मीद है। इसके बाद इस तूफान के कमजोर अवशेष उत्तर दिशा की तरफ आगे बढ़ सकते हैं। मौसम विभाग के अनुसार 13 से 16 अगस्त के बीच बीजिंग, तियानजिन, हेबेई, शानदोंग और लियाओनिंग जैसे इलाकों में भी भारी बारिश होने की पूरी संभावना है।

उड़ानें और ट्रेनें रद्द, बंदरगाह बंद; टाइफून डॉल्फिन से ठप पड़ी चीन की रफ्तार

चीन में आए इस खतरनाक टाइफून डॉल्फिन ने वहाँ के पूरे परिवहन सिस्टम को बुरी तरह से ठप कर दिया है। हालात इतने बिगड़ गए हैं कि शंघाई के दो बड़े एयरपोर्ट्स से लगभग 1500 फ्लाइट्स को रद्द करना पड़ा है। इसके अलावा हांगझोउ शहर में भी सैकड़ों उड़ानों पर इस तूफान का बुरा असर पड़ा है। लोगों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए कई जरूरी इलाकों में ट्रेन सेवाओं को भी पूरी तरह से रोक दिया गया है।

समुद्र के अंदर चलने वाली गतिविधियों और जहाजों को बचाने के लिए प्रशासन ने कड़े कदम उठाए हैं। शंघाई के यांगशान बंदरगाह पर खड़े बड़े जहाजों को वहाँ से हटाकर सुरक्षित जगहों पर भेजा गया है। इसके अलावा 500 से ज्यादा छोटे और मध्यम आकार के जहाजों को सुरक्षित राहत शिविरों या शेल्टर में पहुँचाया गया है। फुजियान प्रांत में समुद्र के रास्ते यात्रियों को ले जाने वाली 55 फेरी सेवाओं को पूरी तरह बंद कर दिया गया है। वहाँ चल रही 115 समुद्री निर्माण परियोजनाओं को भी रोक दिया गया है और काम में लगने वाले 290 निर्माण जहाजों को सुरक्षित पानी वाले इलाके में शिफ्ट कर दिया गया है।

प्रशासन ने आम लोगों की मदद के लिए कई सराहनीय कदम उठाए हैं। हांगझोउ शहर में सरकार ने सार्वजनिक पार्किंग स्थलों पर लगने वाला पार्किंग शुल्क पूरी तरह से माफ कर दिया है। ऐसा इसलिए किया गया ताकि लोग अपनी गाड़ियों को तेज हवाओं और बाढ़ के पानी से बचाकर किसी सुरक्षित बहुमंजिला पार्किंग या ऊंची जगह पर ले जा सकें। शहर की मशहूर वेस्ट लेक के पास बने डॉक्स और पर्यटकों के घूमने वाली नावों को भी पूरी तरह से बंद कर दिया गया है। शंघाई के कुछ निचले इलाकों में सड़कों पर पानी भर जाने की तस्वीरें सामने आई हैं, जहां लोगों को घुटनों तक पानी से गुजरते हुए देखा गया।

तूफान के खतरे को देखते हुए पर्यटकों की सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए हैं। डिज्नीलैंड और लेगोलैंड जैसे दुनिया भर में मशहूर मनोरंजन पार्कों के कुछ हिस्सों को एहतियात के तौर पर बंद रखा गया है। इसके अलावा शंघाई के बहुत प्रसिद्ध बुंड इलाके के व्यूइंग प्लेटफॉर्म को भी सैलानियों के लिए बंद कर दिया गया है ताकि कोई भी किसी बड़े हादसे का शिकार न हो सके।

चीन से पहले जापान और फिलीपींस पर भी पड़ा असर

चीन पहुँचने से पहले डॉल्फिन ने जापान के दक्षिणी ओकिनावा क्षेत्र को प्रभावित किया। तेज हवाओं के कारण वहाँ कम से कम छह लोग घायल हुए और 50000 से ज्यादा इमारतों की बिजली चली गई। कुछ बुजुर्ग लोग तेज हवा की चपेट में आकर गिर गए। इनमें 100 साल से ज्यादा उम्र का एक व्यक्ति भी शामिल था, जिसे गिरने के बाद सिर में चोट लगी।

डॉल्फिन का असर फिलीपींस तक भी पहुँचा। वहाँ तूफान और उससे जुड़ी मॉनसून बारिश ने बाढ़ और भूस्खलन की स्थिति पैदा की। फिलीपींस के अधिकारियों के मुताबिक भारी मॉनसून बारिश और सप्ताह की शुरुआत में आए दूसरे तूफानों से आठ लोगों की मौत हुई और 7000 से ज्यादा लोग राहत शिविरों में पहुँचे।

उत्तरी फिलीपींस के बागुइओ शहर में भूस्खलन से कई घर प्रभावित हुए। वहीं लूजोन के बड़े हिस्से में बाढ़ से 12000 से ज्यादा लोग विस्थापित हुए। उत्तरी ताइवान में भी डॉल्फ़िन पर बाहरी हवाओं और बारिश का असर देखा गया। दर्जनों फेरी सेवाएँ बंद हुईं और 180 से ज्यादा उड़ानें रद्द की गईं।

इस बीच हांगकांग में डॉल्फिन के कारण एक अलग तरह का मौसम देखने को मिला। तूफान के बाहरी हिस्से में हवा के नीचे की ओर आने से शहर में तापमान असामान्य रूप से बढ़ गया।

रविवार को हांगकांग वेधशाला के मुख्य केंद्र पर 36.9 डिग्री सेल्सियस तापमान दर्ज हुआ, जो 1884 में रिकॉर्ड शुरू होने के बाद वहाँ का सबसे अधिक तापमान बताया गया। उत्तरी हांगकांग के शेंग शुई इलाके में तापमान 39.8 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच गया।

क्या टाइफून डॉल्फिन का असर भारत के मानसून पर भी पड़ेगा?

चीन में तबाही मचाने वाला टाइफून डॉल्फिन सीधे भारत की तरफ नहीं आ रहा है, लेकिन इसके बावजूद यह सवाल उठ रहा है कि क्या इसका असर भारत के मानसून पर पड़ सकता है। मौसम विज्ञान के जानकारों का मानना है कि इतने बड़े और ताकतवर तूफानों का असर सिर्फ उसी जगह तक सीमित नहीं रहता जहाँ वे जमीन से टकराते हैं। इस तरह के चक्रवात पूरे एशियाई क्षेत्र के वातावरण, हवाओं के बहाव और नमी के पैटर्न को बड़े पैमाने पर बदल सकते हैं।

इस संबंध को समझने के लिए वैज्ञानिकों ने पहले भी कई रिसर्च किए हैं। साल 2022 में ‘जियोफिजिकल रिसर्च लेटर्स‘ में छपी एक रिसर्च रिपोर्ट में यह बात सामने आई थी कि पश्चिमी प्रशांत महासागर के तूफान और बंगाल की खाड़ी में बनने वाले कम दबाव के सिस्टम आपस में जुड़े हो सकते हैं। इस अध्ययन के मुताबिक, ऐसे तूफानों की वजह से वातावरण में जो बदलाव होते हैं, वे तरंगों के रूप में पश्चिम दिशा की तरफ आगे बढ़ते हैं। ये तरंगे आगे चलकर बंगाल की खाड़ी के ऊपर बारिश लाने वाले सिस्टम को ताकत दे सकती हैं।

इसके अलावा साल 2024 की एक अन्य रिसर्च में भी यह बात सामने आई थी कि पश्चिमी प्रशांत महासागर की मौसमी हलचल का असर भारत के गर्मियों वाले मानसून पर भी पड़ता है। हालांकि इसका सीधा यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि टाइफून डॉल्फिन की वजह से भारत में तुरंत तेज बारिश शुरू हो जाएगी या यहाँ का मानसून कमजोर पड़ जाएगा। अगर इसका कोई भी असर होगा, तो वह बहुत अप्रत्यक्ष रूप से और हवाओं के बड़े चक्र में होने वाले बदलावों के जरिए ही हो सकता है।

इस समय यह पक्के तौर पर कह पाना मुश्किल है कि डॉल्फिन की वजह से भारत के मौसम पर कोई बड़ा असर पड़ेगा या नहीं। इसके लिए हमारे देश के मौसम वैज्ञानिकों को आने वाले दिनों में बंगाल की खाड़ी, प्रशांत महासागर और पूरे एशियाई क्षेत्र के बादलों और हवाओं के पैटर्न पर बहुत बारीकी से नजर रखनी होगी।

क्या जलवायु परिवर्तन बना रहा है ऐसे तूफानों को ज्यादा खतरनाक?

वैज्ञानिकों का मानना है कि दुनिया का तापमान लगातार बढ़ने की वजह से खतरनाक मौसम और भयंकर तूफानों का खतरा तेजी से बढ़ रहा है। समुद्र का पानी जितना ज्यादा गर्म होगा, ट्रॉपिकल चक्रवातों को उतनी ही ज्यादा ऊर्जा मिलेगी। यही वजह है कि आज के समय में जलवायु परिवर्तन और इतने शक्तिशाली टाइफून के आपस में जुड़े होने को लेकर दुनिया भर के वैज्ञानिक लगातार बड़े अध्ययन कर रहे हैं।

हालाँकि सिर्फ किसी एक तूफान को देखकर यह कह देना सही नहीं होगा कि यह अकेले ग्लोबल वार्मिंग का नतीजा है। किसी भी तूफान के बहुत ज्यादा खतरनाक होने के पीछे समुद्र का तापमान, हवा की ऊंचाई, नमी, हवा का दबाव और उसकी दिशा जैसे कई सारे कारण एक साथ जिम्मेदार होते हैं। लेकिन वैज्ञानिकों का निचोड़ यही है कि गर्म होती हुई इस दुनिया में अत्यधिक शक्तिशाली तूफानों और भारी बारिश जैसी घटनाओं का खतरा आने वाले समय में और ज्यादा बढ़ सकता है।

टाइफून डॉल्फिन का मामला इसलिए भी बहुत अलग और हैरान करने वाला है क्योंकि इसने समुद्र में करीब 6000 किलोमीटर की बहुत लंबी यात्रा की है। इसने न केवल लंबे समय तक अपनी ताकत बनाए रखी, बल्कि इसका दायरा भी बहुत ज्यादा बड़ा था। चीन के लिए इस तूफान का खतरा सिर्फ 151 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार वाली हवाओं तक ही सीमित नहीं था। इसके पीछे की असली चुनौती लंबे समय तक लगातार होने वाली भारी बारिश, नदियों में भयंकर बाढ़, अचानक आने वाले सैलाब, जमीन खिसकने के खतरे और ठप पड़ी परिवहन व्यवस्था थी।

फिलहाल चीन के लिए सबसे बड़ी परेशानी यह बनी हुई है कि जमीन पर टकराने के बाद भले ही तूफान थोड़ा धीमा हो गया है, लेकिन इसका बारिश वाला सिस्टम आने वाले कई दिनों तक लगातार एक्टिव रह सकता है। चीन सरकार ने इस खतरे की गंभीरता को समझते हुए जिस तरह से लाखों लोगों को समय रहते सुरक्षित जगहों पर पहुंचाया, हजारों उड़ानों और ट्रेनों को रद्द किया और जहाजों को समंदर से बाहर निकाला, उससे साफ है कि इस तूफान को कितना खतरनाक माना गया था।

टाइफून डॉल्फिन ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि आधुनिक मौसम की चेतावनियों और बड़े पैमाने पर की जाने वाली तैयारियों के बाद भी एक शक्तिशाली तूफान कितने बड़े इलाके को अपने आगोश में ले सकता है। आने वाले दिनों में चीन के अलावा जापान, फिलीपींस, ताइवान और उसके आसपास के इलाकों में इस तूफान के बचे हुए असर पर कड़ी नजर रखी जाएगी। वहीं भारत के मामले में भी यह देखना जरूरी होगा कि पश्चिमी प्रशांत महासागर और बंगाल की खाड़ी के बीच का यह वायुमंडलीय रिश्ता आगे चलकर हमारे मौसम को कैसे प्रभावित करता है।

न्यूजलॉन्ड्री वाला अभिनंदन सेखरी करता है कर्मचारियों से दुर्व्यवहार: पूर्व इंटर्न ने बताई ‘ऑफिस के अंदर की बात’, सहकर्मी कहते थे ‘मीडिया में है ये सामान्य बात’

वामपंथी मीडिया न्यूजलॉन्ड्री के एक और पूर्व कर्मचारी ने कार्यस्थल पर कथित उत्पीड़न और नकारात्मक माहौल का खुलासा किया है। 10 अगस्त को पत्रकार सायंतन घोष ने न्यूजलॉन्ड्री में काम करने के अपने अनुभव को साझा करते हुए एक पोस्ट में बताया कि न्यूजलॉन्ड्री के सह-संस्थापक अभिनंदन सेखरी कर्मचारियों को अपमानित करते हैं।

सायंतन घोष ने लिखा, “…न्यूजलॉन्ड्री से जब मुझे प्रस्ताव मिला, तो लिखित में औपचारिक रूप से तो नहीं, लेकिन यह तय हुआ था कि मैं तीन-चार महीने ट्रेनी के रूप में काम करूँगी और अगर मेरा काम अच्छा रहा तो मुझे स्थायी नौकरी मिल जाएगी। इंटर्नशिप के लिए कोई पैसा नहीं मिलना था। मुझे इसपर कोई आपत्ति नहीं थी। मैं युवा थी, मेरा एक सपना था, और मैं पत्रकार बनना चाहती थी। मैं दिल्ली आ गई और काम शुरू कर दिया। वहाँ का माहौल, जैसा कि मैंने अनुभव किया, बेहद नकारात्मक था। अभिनंदन सेखरी कर्मचारियों के लिए जिस अभद्र भाषा का इस्तेमाल करते थे, वह मुझे बहुत आहत करती थी। मेरे आस-पास के लोगों ने मुझसे कहा कि मीडिया में यह ‘सामान्य’ बात है। न्यूजरूम इसी तरह काम करते हैं और किसी को भी इन सब बातों को सहने की आदत डालनी पड़ती है।”

घोष ने कहा कि न्यूजलॉन्ड्री में उनके आसपास के लोगों ने उन्हें बताया कि कर्मचारियों के प्रति इस तरह की अपमानजनक भाषा का प्रयोग मीडिया कार्यालयों में सामान्य बात है।

द टेलीग्राफ और द न्यू इंडियन एक्सप्रेस सहित मुख्यधारा के मीडिया न्यूज रूम में अपने अनुभव का हवाला देते हुए उन्होंने कहा, “मैंने न्यूजलॉन्ड्री में जिस तरह का दुर्व्यवहार देखा, वैसा मैंने कभी किसी संपादक को पत्रकारों या इंटर्न के साथ करते हुए नहीं सुना।”

घोष ने आगे कहा, “ इसलिए जब मुझे बताया गया कि मीडिया में ऐसा व्यवहार ‘सामान्य’ है, तो मैं इसे स्वीकार नहीं कर पाई। यह मेरे लिए सामान्य नहीं था। हर मामले में संबंधित व्यक्ति के साथ दुर्व्यवहार किया गया था। मैंने पहले कभी लोगों को अपने कर्मचारियों से इस तरह बात करते नहीं देखा था। लेकिन मुझे बार-बार यही कहा गया कि चीजें ऐसी ही होती हैं। इस घटना से मुझे इतना गहरा सदमा लगा कि ये घटनाएँ मुझे हमेशा याद रह गईं।”

सायंतन घोष ने आगे खुलासा किया कि न्यूजलॉन्ड्री के लिए धारा 66ए पर एक स्टोरी लिखने के बाद उन्हें इतनी गालियाँ दी गई कि वे कार्यालय छोड़कर भाग गए।

घटना को याद करते हुए घोष ने लिखा, “एक दिन, धारा 66ए पर एक स्टोरी लिखने के बाद, मुझे इतनी बुरी तरह से गालियाँ दी गईं कि मुझे याद है कि मैंने अपने रिपोर्टर से झूठ बोला और वहाँ से भाग गई। मैं एक और हफ्ते दिल्ली में रुकी रही, जब तक मेरे माता-पिता ने ट्रेन का टिकट नहीं करवा लिया और फिर मैं कोलकाता लौट आई। मैंने इस बारे में कई बार लिखने का सोचा, लेकिन कभी लिखा नहीं। मैं जानती थी कि लोगों को कैसे धमकाया और डराया जा सकता है और लंबे समय तक मुझे खुद पर शक होता रहा। मैंने खुद से सवाल किया कि क्या मैं बहुत ज्यादा संवेदनशील हो रही हूँ, क्या यह वाकई ‘सामान्य’ है, या क्या मैं मीडिया के काम करने के तरीके को ठीक से समझ नहीं पा रही हूँ। ”

उन्होंने देर से खुलासा करने को लेकर कहा, “मुझे पता है कि मुझे किस तरह की प्रतिक्रियाएँ मिलेंगी। मुझे पता है कि क्या कहा जाएगा और मुझे यह भी पता है कि कई लोग मुझसे सवाल कर सकते हैं। शायद मैं आज इसके लिए तैयार हूँ। लेकिन मुझे लगता है कि मुझे इस बारे में बहुत पहले ही बात कर लेनी चाहिए थी।”

गौरतलब है कि न्यूजलॉन्ड्री और इसके सह-संस्थापक अभिनंदन सेखरी को न केवल रेपिस्ट तरुण तेजपाल का बचाव करने के मामले में , बल्कि कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए भी लोगों के गुस्से का सामना करना पड़ रहा है।

इस विवाद के बीच, न्यूजलॉन्ड्री के कई पूर्व कर्मचारियों ने कार्यस्थल पर उत्पीड़न के अपने अनुभव साझा किए हैं। इस मामले को सबसे पहले पत्रकार साईकिरण कन्नन ने उठाया था। न्यूजलॉन्ड्री की पूर्व वरिष्ठ संवाददाता सुमेधा मित्तल ने ट्वीट किया, “ मुझे उम्मीद है कि वह दिन भी आएगा जब वे अपने ही न्यूज़ रूम में यौन उत्पीड़न की शिकायतों पर गंभीरता से विचार करेंगे। ”

न्यूजलॉन्ड्री की एक और पूर्व कर्मचारी प्रियंका ईश्वरी ने लिखा, “ मुझे उम्मीद है कि वे वरिष्ठ पत्रकारों को महिला संपादकों पर चिल्लाने और काम के दौरान फोन पर उन्हें ‘कब से देख रहा हूँ मैं तेरे को’ कहकर धमकाने से रोकने की ट्रेनिंग देंगे। पुरुष पत्रकारों को महिला सहकर्मियों के साथ पेशेवर तरीके से व्यवहार करना सिखाना और कार्यालय को लड़कों का अड्डा न बनाना समय की माँग है? ”

आर हसन नाम की एक महिला पत्रकार ने बताया कि कैसे 2005 में विक्रम ने उनके साथ ‘लगभग’ बलात्कार किया था। उन्होंने बताया, “ वह हिंसक हो गया—मेरे बाल खींचे, मेरी कलाई पकड़ी, मुझे दीवार से सटाकर रखा और फिर मुझे बिस्तर पर धकेल दिया। मैंने खुद को छुड़ाने की कोशिश की लेकिन नाकाम रही। मैं रोने लगी। उसने मुझे छोड़ दिया। बलात्कार से बाल-बाल बचने की यही मेरी सबसे भयानक घटना थी। ”

हिंदी मीडियम से पढ़ाई, रेत पर रिसर्च और मशहूर वैज्ञानिक संग काम: अब भारतीय प्रोफेसर दीपक धर को मिला वो डिराक मेडल, जिससे सम्मानित हुए थे स्टीफन हॉकिंग

भारत के जाने-माने सैद्धांतिक भौतिक विज्ञानी प्रोफेसर दीपक धर को 2026 का प्रतिष्ठित डिराक पदक देने का आधिकारिक ऐलान किया गया है। यह घोषणा इंटरनेशनल सेंटर फॉर थियोरेटिकल फिजिक्स यानी ICTP ने की है। दीपक धर को यह सम्मान स्टैटिस्टिकल मैकेनिक्स यानी सांख्यिकीय भौतिकी में उनके महत्वपूर्ण योगदान के लिए दिया गया है।

2026 में दीपक धर के साथ तीन और बड़े वैज्ञानिकों को भी इस सम्मान के लिए चुना गया है। इनमें बर्नार्ड डेरिडा, मार्क मेजार्ड और हाइम सोमपोलिंस्की शामिल हैं। चारों वैज्ञानिकों ने स्टैटिस्टिकल मैकेनिक्स और सैद्धांतिक भौतिकी के क्षेत्र में महत्वपूर्ण काम किया है।

आपको बता दें कि डिराक पदक सैद्धांतिक भौतिकी का एक बेहद प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय सम्मान है। इसकी शुरुआत 1985 में हुई थी। यह महान भौतिक विज्ञानी पॉल डिराक की याद में शुरू किया गया था। यह पदक हर साल उन वैज्ञानिकों को दिया जाता है, जिन्होंने सैद्धांतिक भौतिकी में महत्वपूर्ण योगदान दिया हो।

डिराक पदक पाने वाले वैज्ञानिकों में दुनिया के कई बड़े नाम शामिल रहे हैं। इनमें महान वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग भी शामिल हैं। इस सम्मान की प्रतिष्ठा का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि इसके कई विजेता बाद में नोबेल पुरस्कार जीत चुके हैं। ICTP के अनुसार, डिराक पदक सैद्धांतिक भौतिकी के क्षेत्र में दुनिया के प्रमुख सम्मानों में से एक है।

स्टैटिस्टिकल मैकेनिक्स का विज्ञान और प्रोफेसर दीपक धर का योगदान

प्रोफेसर दीपक धर को साल 2026 का डिराक पदक ‘स्टैटिस्टिकल मैकेनिक्स‘ के क्षेत्र में उनके काम के लिए मिला है। यह भौतिकी यानी फिजिक्स की एक बहुत ही खास और महत्वपूर्ण शाखा है। आसान शब्दों में कहें तो इसके जरिए बहुत सारे कणों या पार्टिकल्स के मिलने-जुले व्यवहार की पढ़ाई की जाती है। इसमें किसी एक अकेले कण को देखने के बजाय यह देखा जाता है कि जब करोड़ों कण आपस में मिलते हैं, तो पूरा सिस्टम मिलकर कैसे काम करता है।

यह विज्ञान केवल किताबों या थ्योरी तक ही सीमित नहीं है। आज के समय में इसके नियम इंटरनेट नेटवर्क, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI और शेयर बाजार जैसी जटिल चीजों को समझने में भी बहुत काम आ रहे हैं। प्रोफेसर दीपक धर ने ऐसी ही उलझी हुई और जटिल भौतिक प्रणालियों को सुलझाने में बहुत बड़ा काम किया है। उनके रिसर्च में यह देखा गया है कि कैसे छोटी-छोटी और सामान्य घटनाओं से अचानक बहुत बड़ी और जटिल चीजें पैदा हो जाती हैं। उनके शोध का एक बड़ा हिस्सा ‘सेल्फ-ऑर्गेनाइज्ड क्रिटिकलिटी’ और उससे जुड़े गणित के मॉडल्स पर रहा है, जो उन्हें दुनिया के सबसे बड़े वैज्ञानिकों की कतार में खड़ा करता है।

रेत के ढेर से दुनिया की बड़ी घटनाओं को समझने का अचूक तरीका

प्रोफेसर दीपक धर के सबसे बड़े वैज्ञानिक कामों में सैंडपाइल मॉडल और धर का बर्निंग एल्गोरिदम शामिल हैं। इसे बहुत ही आसान भाषा में रेत के ढेर के उदाहरण से समझा जा सकता है। जब आप किसी जगह पर रेत के ढेर पर लगातार एक-एक करके रेत के कण गिराते हैं, तो शुरुआत में कुछ खास नहीं बदलता है। कभी-कभार थोड़ा सा हिस्सा नीचे खिसक जाता है, लेकिन एक समय ऐसा आता है जब सिर्फ एक छोटा सा कण पूरे ढेर को हिला देता है और अचानक रेत का एक बहुत बड़ा हिस्सा ढह जाता है।

यही नियम प्रकृति और दुनिया की बड़ी जटिल व्यवस्थाओं में भी काम करता है। कई बार एक बहुत छोटा सा बदलाव पूरे सिस्टम में भारी उथल-पुथल या बहुत बड़ा बदलाव ला देता है। विज्ञान की भाषा में इस खास व्यवहार को सेल्फ-ऑर्गनाइज्ड क्रिटिकलिटी कहा जाता है। प्रोफेसर दीपक धर के सैंडपाइल मॉडल और उनके बर्निंग एल्गोरिदम ने ऐसी जटिल व्यवस्थाओं को गणित के जरिए समझना बहुत आसान बना दिया है। उनके इस शानदार मॉडल से हमें असल जिंदगी की कई घटनाओं को समझने में बहुत मदद मिलती है, जैसे अचानक आने वाले भूकंप, सड़कों पर लगने वाले भारी ट्रैफिक जाम और शेयर बाजार में होने वाले अचानक बड़े उतार-चढ़ाव।

बोल्ट्जमान मेडल जीतने वाले देश के पहले भारतीय वैज्ञानिक

साल 2026 का डिराक पदक प्रोफेसर दीपक धर के करियर का पहला बड़ा अंतरराष्ट्रीय सम्मान नहीं है। इससे पहले साल 2022 में उन्हें भौतिकी के एक और बहुत बड़े पुरस्कार ‘बोल्ट्जमान मेडल’ से नवाजा गया था। इस बड़ी उपलब्धि के साथ वह यह सम्मान पाने वाले इतिहास के पहले भारतीय वैज्ञानिक बने थे। सांख्यिकीय भौतिकी यानी स्टैटिस्टिकल फिजिक्स की दुनिया में बोल्ट्जमान मेडल को सबसे बड़ा और सर्वोच्च सम्मान माना जाता है।

जब उन्हें यह ऐतिहासिक सम्मान मिला था, तब प्रोफेसर दीपक धर ने बहुत ही विनम्र भाव से एक बात कही थी। उन्होंने कहा था कि वह भले ही इस मेडल को पाने वाले पहले भारतीय हैं, पर इसका मतलब यह नहीं है कि वे इस क्षेत्र में अच्छा काम करने वाले देश के पहले वैज्ञानिक हैं। उनके इस बयान से साफ झलकता था कि वे अपनी इस सफलता को भारत में विज्ञान और रिसर्च की पुरानी परंपरा का हिस्सा मानते थे, न कि केवल अपनी अकेली की उपलब्धि।

साल 2023 में मिला देश का तीसरा सबसे बड़ा नागरिक सम्मान ‘पद्म भूषण’

बोल्ट्जमान मेडल मिलने के ठीक अगले साल यानी 2023 में भारत सरकार ने प्रोफेसर दीपक धर को देश के तीसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान ‘पद्म भूषण’ से सम्मानित किया। यह सम्मान उनकी महान वैज्ञानिक सेवाओं के लिए दिया गया था।

2023 में मिला था पद्म भूषण फोटो साभार:IITK

प्रोफेसर धर को इससे पहले भी कई बड़े राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुके हैं। उन्हें साल 1983 में इंडियन नेशनल साइंस अकादमी का यंग साइंटिस्ट मेडल और साल 1991 में विज्ञान के क्षेत्र का मशहूर शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार मिला था। इसके बाद उन्हें साल 1993 में आईसीटीपी का जे रॉबर्ट श्रिफर प्राइज, साल 2001 में सत्येंद्रनाथ बोस मेडल और साल 2002 में थर्ड वर्ल्ड अकादमी ऑफ साइंसेज प्राइज भी मिल चुका है।

उनकी इन शानदार उपलब्धियों का सिलसिला यहीं नहीं थमा। उन्हें देश की कई प्रमुख वैज्ञानिक अकादमियों जैसे इंडियन अकादमी ऑफ साइंसेज, नेशनल अकादमी ऑफ साइंसेज और ट्वास (TWAS) का फेलो भी बनाया गया था। इसके अलावा उनके विज्ञान के क्षेत्र में बेहतरीन काम को देखते हुए उन्हें साल 2007 में प्रतिष्ठित जे सी बोस नेशनल फेलोशिप से भी नवाजा गया था।

उत्तर प्रदेश के एक छोटे शहर से शुरू हुआ था जीवन का सफर

प्रोफेसर दीपक धर की पूरी जीवन यात्रा बहुत प्रेरणा देने वाली है। उनके सफर की शुरुआत उत्तर प्रदेश के एक साधारण शहर और हिंदी-माध्यम के माहौल से हुई थी। उनका जन्म साल 1951 में उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में हुआ था। उस समय उनकी माँ चाहती थीं कि वह बड़े होकर एक IAS अधिकारी बनें, लेकिन उनके पिता ने हमेशा उनकी वैज्ञानिक सोच और सीखने की ललक को आगे बढ़ाया और सही रास्ता दिखाया।

प्रोफेसर धर के पिता उत्तर प्रदेश की न्यायिक सेवा में अधिकारी थे। सरकारी नौकरी में बार-बार तबादले होने के कारण उनके परिवार को हर कुछ साल में एक शहर से दूसरे शहर जाना पड़ता था। इसी वजह से उनका बचपन प्रतापगढ़ के अलावा आगरा, मुरादाबाद, मेरठ, गोंडा, बिजनौर, पीलीभीत और मुजफ्फरनगर जैसे कई शहरों में बीता। बाद में उनके पिता का तबादला वाराणसी हुआ और उनकी आगे की पढ़ाई का रास्ता इलाहाबाद विश्वविद्यालय तक पहुँच गया। उन्होंने IIT कानपुर को दिए एक इंटरव्यू में बताया था कि बार-बार शहर बदलने की वजह से उनका किसी एक जगह से बहुत गहरा भावनात्मक लगाव नहीं बन पाया था।

उनके पिता घर में विज्ञान से जुड़ी मैगजीन लेकर आते थे, जिनका उनके मन पर बहुत गहरा असर पड़ा। इनमें ‘अंडर्स्टैंडिंग साइंस’ नाम की मैगजीन ने उन पर एक खास छाप छोड़ी थी। धीरे-धीरे किताबों और पत्रिकाओं की वजह से फिजिक्स में उनकी रुचि लगातार बढ़ती चली गई। स्कूल के दिनों में महान वैज्ञानिक आइजक न्यूटन उन्हें बहुत जादुई और असरदार लगते थे। जब वे दसवीं कक्षा के आसपास पहुँचे, तब उन्होंने गैलीलियो, मैरी क्यूरी, अल्बर्ट आइंस्टीन और बर्ट्रेंड रसेल जैसे महान वैज्ञानिकों की कई लोकप्रिय किताबें पढ़ ली थीं।

विज्ञान में हमेशा अच्छे नंबर आने की वजह से उनका पढ़ाई का रिकॉर्ड बहुत शानदार रहा, जिससे उन्हें आईआईटी कानपुर और अमेरिका के कैलटेक में एडमिशन मिलने का रास्ता आसान हो गया। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से शुरुआती उच्च शिक्षा पूरी की और साल 1972 में आईआईटी कानपुर से फिजिक्स में एमएससी की डिग्री हासिल कर ली।

अमेरिका के कैलटेक में महान वैज्ञानिक रिचर्ड फेनमैन के साथ किया काम

आईआईटी कानपुर से मास्टर्स की पढ़ाई पूरी करने के बाद प्रोफेसर दीपक धर आगे की पढ़ाई और रिसर्च के लिए अमेरिका चले गए। वे कैलिफोर्निया इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी यानी कैलटेक पहुँचे। उस महान संस्थान में पहुँचने पर उन्हें प्रतिष्ठित रिचर्ड फेनमैन फेलोशिप से सम्मानित किया गया। रिचर्ड फेनमैन का नाम दुनिया के सबसे बड़े और दिग्गज भौतिक वैज्ञानिकों में गिना जाता है।

दीपक धर ने कैलटेक में उन महान वैज्ञानिक रिचर्ड फेनमैन के साथ बहुत करीब रहकर काम किया। उन्होंने फेनमैन के टीचिंग असिस्टेंट के रूप में भी अपनी जिम्मेदारी निभाई थी। उसी दौरान उन्होंने अपनी PHd की पढ़ाई पूरी की और साल 1978 में अपनी डॉक्टोरल डिग्री हासिल कर ली। उनके वैज्ञानिक करियर के लिए यह समय बहुत बड़ा और अहम मोड़ था। उस दौर में उनके पास अमेरिका में ही रुककर एक शानदार करियर बनाने के कई आसान मौके मौजूद थे।

अमेरिका में रुकने के बजाय देश लौटे और TIFR से जुड़े

कैलटेक से अपनी PHd पूरी करने के बाद ज्यादातर युवा वैज्ञानिक अमेरिका में ही रुक जाते हैं। लेकिन प्रोफेसर दीपक धर ने वहाँ रहने के बजाय अपने देश भारत लौटने का बड़ा और हिम्मत भरा फैसला किया। साल 1978 में ही वे वापस भारत आ गए और मुंबई के मशहूर संस्थान टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च यानी टीआईएफआर से एक रिसर्च फेलो के तौर पर जुड़ गए।

आगे चलकर वे इसी संस्थान में प्रोफेसर के पद पर भी काम करने लगे। टीआईएफआर के शुरुआती दिनों को याद करते हुए उन्होंने बताया था कि तब उनके पास कोई औपचारिक मेंटर या मार्गदर्शक नहीं था। फिर भी वहाँ मौजूद भौतिक वैज्ञानिकों की मजबूत और मददगार कम्युनिटी से उन्हें हर कदम पर पूरा सहयोग मिला। इसके बाद उन्होंने लगभग चालीस सालों तक स्टैटिस्टिकल फिजिक्स और जटिल भौतिक प्रणालियों से जुड़े पेचीदा सवालों पर लगातार रिसर्च की।

प्रोफेसर दीपक धर का यह शानदार सफर सिर्फ टीआईएफआर तक ही सीमित नहीं रहा। वे देश के दूसरे बड़े संस्थान आईआईएसईआर पुणे से भी लंबे समय तक जुड़े रहे। वहाँ उन्होंने साल 2016 से 2024 तक डिस्टिंग्विश्ड विजिटिंग फैकल्टी के रूप में अपनी सेवाएँ दीं और सैकड़ों छात्रों को पढ़ाया। इसके अलावा वे बेंगलुरु के इंटरनेशनल सेंटर फॉर थियोरेटिकल साइंसेज यानी आईसीटीएस-टीआईएफआर से भी लंबे समय से जुड़े हैं और वर्तमान में वहाँ डिस्टिंग्विश्ड प्रोफेसर के रूप में जाने जाते हैं।

फिजिक्स के प्रति अटूट प्यार और महान वैज्ञानिकों की लिस्ट में नाम

प्रोफेसर दीपक धर ने अपनी उच्च स्तरीय रिसर्च के साथ-साथ देश में फिजिक्स की शिक्षा को बढ़ाने में भी बहुत बड़ा योगदान दिया है। उन्होंने कई युवा छात्रों और रिसर्चर्स को थियोरेटिकल फिजिक्स के क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए हमेशा प्रेरित किया है। थियोरेटिकल फिजिक्स के प्रति उनका प्यार इतना गहरा था कि उन्होंने कभी भी किसी प्राइवेट कंपनी या कॉर्पोरेट सेक्टर में नौकरी करने के बारे में नहीं सोचा। हालाँकि, अपनी पीएचडी पूरी करने के तुरंत बाद उन्होंने एक बार बेल लैब्स में एक जॉब सेमिनार जरूर दिया था, लेकिन तब उनका चयन वहाँ नहीं हो पाया था।

उनके अनुसार थियोरेटिकल फिजिक्स की खासियत ही ऐसी होती है कि इसके हर शोध या खोज का तुरंत कोई बिजनेस या प्रैक्टिकल इस्तेमाल सामने नहीं आता है। इसके बावजूद यह विषय उन्हें और दुनिया भर के वैज्ञानिकों को अपनी ओर गहराई से खींचता रहता है। डिराक पदक का नाम महान भौतिक विज्ञानी पॉल डिराक के नाम पर रखा गया है और इसकी शुरुआत साल 1985 में हुई थी। यह पुरस्कार हमेशा से थ्योरिटिकल फिजिक्स और गणित के क्षेत्र में किए गए असाधारण कामों के लिए ही दिया जाता रहा है।

पिछले कई दशकों में यह सम्मान दुनिया के चुनिंदा और सबसे बड़े वैज्ञानिकों को ही मिला है, जिनमें महान विज्ञानी स्टीफन हॉकिंग का नाम भी शामिल रहा है। इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि प्रोफेसर दीपक धर और स्टीफन हॉकिंग ने एक ही विषय पर काम किया हो या एक जैसी खोज की हो। यहाँ स्टीफन हॉकिंग का नाम केवल इसलिए जुड़ा है क्योंकि वे भी पुराने समय में इस डिराक पदक को पा चुके हैं। अब प्रोफेसर दीपक धर भी दुनिया के उन्हीं चुनिंदा और दिग्गज वैज्ञानिकों की खास सूची में शामिल हो गए हैं।

छोटे शहर के साधारण छात्र से लेकर दुनिया के महान वैज्ञानिक बनने तक का सफर

प्रोफेसर दीपक धर की पूरी जीवन यात्रा देश के हर युवा के लिए एक बहुत बड़ी प्रेरणा है। उनके सफर की शुरुआत उत्तर प्रदेश के एक छोटे से शहर और हिंदी माध्यम के स्कूल से हुई थी। घर में आने वाली विज्ञान की मैगजीन को पढ़कर वह विज्ञान की दुनिया के दीवाने हो गए थे। इसके बाद उन्होंने इलाहाबाद यूनिवर्सिटी और IIT कानपुर से पढ़ाई की। फिर वह अमेरिका की मशहूर कैलटेक यूनिवर्सिटी पहुंचे और वहाँ महान वैज्ञानिक रिचर्ड फेनमैन के साथ मिलकर काम किया। साल 1978 में अपनी पीएचडी पूरी करने के बाद उनके पास अमेरिका में ही रहकर एक बहुत आरामदायक जिंदगी बिताने का पूरा मौका था। लेकिन उन्होंने विदेश में रहने के बजाय अपने देश भारत वापस लौटने का फैसला किया।

भारत आकर उन्होंने टीआईएफआर (TIFR) जैसे बड़े संस्थान में दशकों तक थ्योरिटिकल फिजिक्स पर कड़ी मेहनत की। बाद में उन्होंने आईआईएसईआर पुणे और आईसीटीएस बेंगलुरु जैसे संस्थानों के जरिए देश में विज्ञान की नींव को और मजबूत बनाया। उनकी यह पूरी वैज्ञानिक यात्रा केवल उनकी अपनी सफलता की कहानी नहीं है। इस सफर ने भारत में फिजिक्स की पढ़ाई और रिसर्च को दुनिया भर में एक नई पहचान दी है।

साल 2026 का यह प्रतिष्ठित डिराक पदक उनकी इसी लंबी और गौरवशाली यात्रा में एक और नया सोने का पन्ना जोड़ता है। उत्तर प्रदेश के एक छोटे शहर से निकलकर साइंस मैगजीन से विज्ञान सीखने वाला वह छात्र, कैलटेक में रिचर्ड फेनमैन का साथी बनने वाला रिसर्चर, अमेरिका की सुख-सुविधा छोड़कर देश लौटने वाला विज्ञानी और सांख्यिकीय भौतिकी में भारत का नाम पूरी दुनिया में रोशन करने वाला यह महान भौतिक विज्ञानी आज हर देशवासी के लिए गर्व बन चुका है।