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जर्मनी में चीनी ड्रग-रेप और टेलीग्राम गैंग का भंडाफोड़, लेकिन DW ने घुसाया एंटी-इंडिया प्रोपेगेंडा: समझें- पाकिस्तानी ग्रूमिंग जिहादियों को छोड़ क्यों घसीटा कुंभ का नाम

जर्मनी की राजधानी बर्लिन सहित कई शहरों में चीनी मूल के नागरिकों द्वारा संचालित ‘जर्मन ड्राइविंग स्कूल’ नामक टेलीग्राम गैंग का भंडाफोड़ हुआ है। यह गैंग चीनी छात्राओं को नशीला पदार्थ देकर उनका यौन शोषण करता था और वीडियो बनाकर ब्लैकमेल करता था। अदालत ने मुख्य आरोपित टोंग जेड को 5 साल 9 महीने और एडमिन दापेंग जेड को 14 साल की सजा सुनाई है

इस चीनी गैंग के अलावा जर्मनी में सीरियाई और पाकिस्तानी प्रवासियों के खतरनाक ग्रूमिंग गैंग भी सक्रिय हैं, जो नाबालिग लड़कियों को निशाना बना रहे हैं। यह बिल्कुल ब्रिटेन के उस कुख्यात पाकिस्तानी ग्रूमिंग गैंग जैसा है जिसने दशकों तक हजारों गैर-मुस्लिम बच्चियों का बर्बर उत्पीड़न किया था।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, जर्मनी से लड़कियों के सुनियोजित यौन शोषण, ड्रग्स देने और उनके वीडियो बनाकर शेयर करने वाले खतरनाक गैंग्स के मामले सामने आए हैं। जिसमें एक चीनी टेलीग्राम गैंग ‘जर्मन ड्राइविंग स्कूल’ का भी भंडाफोड़ हुआ है। इस गैंग ने ड्रग्स और बलात्कार के जरिए आतंक मचा रखा था। लेकिन जर्मन सरकारी ब्रॉडकास्टर डॉयचे वेले (DW) का ध्यान इन गंभीर और वीभत्स मामलों से हटकर भारत को बदनाम करने पर केंद्रित है।

DW हिंदी की वीडियो रिपोर्ट इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। DW ने अपनी इस रिपोर्ट में यूके के पाकिस्तानी अपराधियों का नाम तक नहीं लिया और नैरेटिव को भटकाने के लिए जबरन भारत का नाम घसीटकर एंटी-हिंदू प्रोपेगेंडा चलाया। पश्चिमी मीडिया का यह रवैया उसकी स्थापित ‘व्हाटअबाउटरी’ और टूलकिट का हिस्सा है।

जर्मनी का चीनी ‘ड्रग रेप’ टेलीग्राम गैंग, जो दिन में ‘गॉड’ और रात में ‘डेविल’ बन जाते

जर्मनी की राजधानी बर्लिन और अन्य शहरों को दहला देने वाले एक मामले में ‘जर्मन ड्राइविंग स्कूल’ नाम के एक टेलीग्राम ग्रुप का पर्दाफाश हुआ है। इस ग्रुप में चीनी मूल के पुरुष शामिल थे, जो जर्मनी में पढ़ रहे थे या काम कर रहे थे। इस गैंग का मुख्य तौर-तरीका अपनी ही पहचान की चीनी और एशियाई मूल की छात्राओं और महिलाओं को निशाना बनाना, उन्हें नशीला पदार्थ (ड्रग्स) देना और फिर बेहोशी की हालत में उनका बलात्कार कर वीडियो बनाना था।

अदालती दस्तावेजों के अनुसार, इस गैंग के एक मुख्य अपराधी 26 वर्षीय टोंग जेड (Tong Z) को बर्लिन की अदालत ने गंभीर बलात्कार, खतरनाक शारीरिक नुकसान और व्यक्तिगत गोपनीयता के उल्लंघन के लिए 5 साल और 9 महीने की जेल की सजा सुनाई है। टोंग जेड टेलीग्राम पर “God by day, devil by night” (दिन में भगवान, रात में शैतान) नाम से सक्रिय था।

टोंद जेड बाहर से तो बेहद सभ्य, मददगार और अच्छा खाना पकाने वाला लड़का दिखता था, लेकिन पीठ पीछे वह एक दरिंदा था। उसने 2019 से 2024 के बीच जर्मनी, पोलैंड, डेनमार्क और चीन की यात्राओं के दौरान कम से कम 11 महिलाओं का यौन शोषण किया। उसने अपनी एक पड़ोसी के बाथरूम में मास्टर की (स्पेयर चाबी) से घुसकर हिडन कैमरा तक लगा दिया था।

टोंग जेड ने 2024 में एक ऐसी महिला के साथ बलात्कार किया और उसका वीडियो बनाया जो शारीरिक और मानसिक रूप से आंशिक रूप से अपंग थी। उसने महिला को भारी मात्रा में नशीला पेय पिलाया था। जब पुलिस ने टोंग जेड के ठिकाने पर छापा मारा, तो वहाँ से कंडोम, महिलाओं के अंतर्वस्त्र, सीरिंज, नशीली दवाएँ और 2 टेराबाइट (2TB) से अधिक डेटा वाले हार्ड ड्राइव मिले, जिनमें हर पीड़ित महिला के नाम का एक अलग फोल्डर बना हुआ था। वह इन वीडियो के जरिए महिलाओं को ब्लैकमेल करता था और कोर्ट में स्वीकार किया कि महिलाओं का रोना और भीख माँगना उसे और अधिक उत्तेजित करता था।

इस गैंग का एडमिन 44 वर्षीय आईटी इंजीनियर दापेंग जेड (Dapeng Z) था, जिसे जर्मन अदालत ने गंभीर बलात्कार और हत्या के प्रयास के लिए 14 साल की जेल की सजा सुनाई है। वहीं, एक अन्य चीनी छात्र झोंगयी जे (Zhongyi J) को 11 साल से अधिक की सजा मिली है। कोर्ट ने माना कि इन लोगों ने पीड़ितों को जानलेवा मात्रा में ड्रग्स दिए थे। टेलीग्राम ग्रुप पर ये अपराधी कोडवर्ड का इस्तेमाल करते थे, जिसमे नशीली दवाओं और एनेस्थेटिक्स के लिए ‘फ्यूल’ (ईंधन) और अपने टारगेट (शिकार) के लिए ‘कार’ नाम का कोडवर्ड।

यह मामला ब्रिटेन में 2025 में पकड़े गए चीनी सीरियल रेपिस्ट झेनहाओ जोउ (Zhenhao Zou) जैसा ही था, जिसने ब्रिटेन और चीन में 10 महिलाओं को ड्रग देकर बलात्कार किया था और उसे उम्रकैद की सजा मिली थी।

जर्मनी में सीरियाई और पाकिस्तानी ग्रूमिंग गैंग भी सक्रिय

चीनी गैंग के अलावा जर्मनी में यूके की तर्ज पर ही पाकिस्तानी और सीरियाई मूल के प्रवासियों के ग्रूमिंग गैंग भी सक्रिय हैं। जर्मनी के विभिन्न शहरों में नाबालिग लड़कियों को निशाना बनाने, उन्हें ड्रग्स की लत लगाने और फिर उनका यौन शोषण करने के आरोप में 6 सीरियाई और पाकिस्तानी नागरिकों को गिरफ्तार किया गया है।

ये गैंग्स वहाँ की सामाजिक व्यवस्था के लिए एक बड़ा खतरा बन चुके हैं, जो ठीक उसी ढर्रे पर काम कर रहे हैं जो ब्रिटेन के मैनचेस्टर, रोदरहैम और टेलफोर्ड में देखा गया था।

ब्रिटेन के पाकिस्तानी ग्रूमिंग जिहाद गैंग ने पार कर दी थी टॉर्चर और बर्बरता की हर लकीर

अगर जर्मनी के चीनी गैंग के कारनामे घिनौने हैं, तो ब्रिटेन में पाकिस्तानी ग्रूमिंग गैंग्स का इतिहास रोंगटे खड़े करने वाला है। ब्रिटेन के विभिन्न शहरों जैसे टेलफोर्ड, रोदरहैम, रोशडेल और वेस्ट लंदन में पाकिस्तानी मूल के मुस्लिम पुरुषों ने दशकों तक श्वेत और सिख लड़कियों को निशाना बनाया।

एक पीड़ित लड़की ने जीबी न्यूज (GB News) की डॉक्यूमेंट्री में खुलासा किया कि टेलफोर्ड में पाकिस्तानी ग्रूमिंग गैंग ने उसका 1000 से अधिक बार बलात्कार किया।

ब्रिटिश सांसद रूपर्ट लोव ने संसद और सार्वजनिक मंचों पर इन मुस्लिम ग्रूमिंग गैंग्स की बर्बरता को याद करते हुए बताया कि ये अपराधी पीड़ितों के निजी अंगों में काँच की बोतलें डाल देते थे, उनके चेहरों पर जलती हुई सिगरेट बुझाते थे और ईसाई लड़कियों को प्रताड़ित करने के लिए उनके सामने क्रॉस (क्रिश्चियन प्रतीक) का अपमान करते थे।

ब्रिटेन की एक 219 पन्नों की डिटेल्ड इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट के मुताबिक, देश के 149 शहरों में फैले इस नेटवर्क के कारण 2.5 लाख से अधिक लड़कियाँ और बच्चे बलात्कार और यौन शोषण का शिकार हुए।

चौंकाने वाली बात यह है कि इसमें 87 प्रतिशत से अधिक आरोपित मुस्लिम (मुख्य रूप से पाकिस्तानी मूल के) थे। वेस्ट लंदन में एक 14 वर्षीय सिख लड़की के गैंगरेप के बाद सिख समुदाय में भारी आक्रोश फैल गया था।

इसके बावजूद लंदन के मेयर सादिक खान और मेट्रोपॉलिटन पुलिस पर राजनीतिक शुद्धता (Political Correctness) और ‘इस्लामोफोबिया’ के डर से इस पूरे स्कैंडल को दबाने और छिपाने के आरोप लगे।

ब्रिटिश मीडिया और प्रशासन इन अपराधियों को ‘पाकिस्तानी’ कहने के बजाय ‘एशियन’ कहकर सच्चाई पर पर्दा डालते रहे, ताकि मुस्लिम तुष्टिकरण बना रहे।

जबकि एलन मस्क तक ने रोदरहैम सेक्स स्कैंडल पर ट्वीट कर इस भयावहता की ओर दुनिया का ध्यान खींचा था, जहाँ प्रशासन की लापरवाही के कारण हजारों लड़कियों का जीवन बर्बाद हो गया।

DW ने अपने वीडियो में भारत को जबरन खींच कर घुसेड़ा एंटी हिंदू प्रोपेगेंडा

अब आते हैं डॉयचे वेले (DW) हिंदी की उस रिपोर्ट पर, जिसने जर्मनी और यूरोप में प्रवासियों और चीनी गैंग्स द्वारा किए जा रहे इन जघन्य अपराधों पर पर्दा डालने के लिए भारत विरोधी एजेंडा चलाया। DW की रीतिका द्वारा एंकर किए गए वीडियो में रेफरेंस के तौर पर दो मामलों का जिक्र किया गया है।

पहला मामला भारत के कुंभ मेले का बताया गया, जिसमें आरोप लगाया गया कि कुछ असामाजिक तत्वों (जिन्हें रिपोर्ट में मुस्लिम जिहादी बताने के बजाय सामान्यीकृत किया गया) ने हिंदू महिलाओं और लड़कियों के नहाने और कपड़े बदलने के वीडियो ग्रुप में शेयर किए। दूसरा मामला दक्षिण कोरिया की स्कूली लड़कियों को टेलीग्राम के जरिए डीपफेक या वीडियो में टारगेट करने का था।

सोचने वाली बात यह है कि जर्मनी के भीतर हो रहे ड्रग रैकेट, गैंग रेप, बेहोश करके वीडियो बनाने और ब्लैकमेल करने जैसे जघन्य अंतरराष्ट्रीय अपराधों की तुलना भारत के कुंभ मेले के एक स्थानीय मामले से क्यों की गई? खास बात ये है कि इस मामले में भी जिहादी एंगल सामने आया था, जिसमें कामरान नाम का कथित पत्रकार गिरफ्तार हुआ था। लेकिन यहाँ ड्रग्स देकर रेप और रेप का वीडियो बनाने जैसा कोई मामला था क्या?

कुंभ मेले या दक्षिण कोरिया के मामले निश्चित रूप से कानूनी और नैतिक रूप से गलत हैं, लेकिन वे उस अंतरराष्ट्रीय ‘ड्रग एंड रेप’ सिंडिकेट, सिस्टेमिक ग्रूमिंग जिहाद और टॉर्चर से कहीं हल्के हैं जो जर्मनी और यूके में चल रहा है।

DW ने चालाकी से यूके के पाकिस्तानी ग्रूमिंग गैंग्स का नाम तक नहीं लिया, जिसके कारण ब्रिटेन की राजनीति में भूचाल आ गया, कई जाँच बैठानी पड़ीं और सादिक खान जैसे नेताओं पर उंगलियाँ उठीं। DW का पूरा फोकस जर्मनी के अपराधियों के नेटवर्क को उजागर करने के बजाय नैरेटिव को डायवर्ट करके भारत का नाम जोड़ने पर था।

ऑपइंडिया अपनी रिपोर्ट में पहले ही खुलासा कर चुका है कि कैसे डॉयचे वेले (DW) जर्मन सरकार के इशारे पर एक प्रोपेगेंडा मशीन की तरह काम करता है। यह चैनल ध्रुव राठी जैसे यूट्यूबर्स और विभिन्न वामपंथी एनजीओ (NGOs) और कार्यकर्ताओं के माध्यम से भारत के खिलाफ एक वैचारिक युद्ध (Ideological War) चलाता है। राहुल गाँधी की हर्टी स्कूल (Hertie School) की यात्रा और जर्मनी के विभिन्न थिंक-टैंकों की भारत में सक्रियता इसी टूलकिट का हिस्सा है।

वेस्टर्न मीडिया का भारत-विरोधी टूलकिट क्यों हर मामले में ढूँढता है भारत का नाम?

डॉयचे वेले (DW) का यह रवैया कोई अपवाद नहीं है, बल्कि यह पूरी वेस्टर्न मीडिया (पश्चिमी मीडिया) की उस स्थापित कार्यप्रणाली का हिस्सा है, जो भारत के खिलाफ प्रोपेगेंडा चलाने का कोई भी मौका नहीं छोड़ती। भले ही किसी वैश्विक या स्थानीय अपराध का भारत से दूर-दूर तक कोई लेना-देना न हो, पश्चिमी पत्रकार और संस्थान किसी न किसी तरह भारत का नाम उसमें घसीट ही लाते हैं। इसके पीछे का मुख्य उद्देश्य वैश्विक मंच पर भारत की बढ़ती छवि, उसकी सांस्कृतिक पहचान और उसकी संप्रभुता को धूमिल करना है।

जब पश्चिमी देशों में नस्लवाद, प्रवासियों द्वारा किए जा रहे अपराध या आंतरिक कानून-व्यवस्था पूरी तरह चरमरा जाती है, तो वहाँ की सरकारें और उनके पोषित मीडिया संस्थान अपने नागरिकों का ध्यान भटकाने के लिए भारत जैसे विकासशील और मजबूत होते देश को सॉफ्ट टारगेट बनाते हैं। जर्मनी में चीनी गैंग्स और सीरियाई-पाकिस्तानी अपराधियों द्वारा फैलाई जा रही असुरक्षा को छिपाने के लिए DW ने कुंभ मेले का उदाहरण दिया, ताकि पश्चिमी दर्शकों को यह संदेश दिया जा सके कि “देखिए, यह समस्या केवल हमारे यहाँ नहीं है, भारत में भी ऐसा ही होता है।” यह ‘व्हाटअबाउटरी’ (Whataboutism) का सबसे घटिया रूप है।

इसके अतिरिक्त इस प्रोपेगेंडा के पीछे एक गहरी हिंदू-विरोधी और भारत-विरोधी मानसिकता काम करती है। कुंभ मेला हिंदुओं का सबसे पवित्र और बड़ा सांस्कृतिक समागम है। उस समागम का नाम एक अंतरराष्ट्रीय बलात्कार और ड्रग्स नेटवर्क की रिपोर्ट में जोड़कर वेस्टर्न मीडिया सीधे तौर पर भारत की सांस्कृतिक धरोहर और बहुसंख्यक समाज की छवि को वैश्विक स्तर पर विकृत (Dehumanize) करने का प्रयास करता है। वे यूके के ‘पाकिस्तानी’ गैंग को ‘एशियन’ कहकर छुपाते हैं, लेकिन भारत के किसी भी मामले में देश और संस्कृति की पहचान को उछालने में एक सेकंड की भी देरी नहीं करते।

यहाँ आपका ये समझना जरूरी है कि यह पूरी कवायद वैश्विक नैरेटिव कंट्रोल (Global Narrative Control) की जंग है। पश्चिमी देश और उनका मीडिया यह बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं कि भारत आज अपनी स्वतंत्र विदेश नीति, मजबूत आर्थिक प्रगति और सांस्कृतिक पुनरुत्थान के साथ आगे बढ़ रहा है।

यही कारण है कि न्यूयॉर्क टाइम्स, बीबीसी से लेकर डॉयचे वेले या फिर विकीपीडिया सभी एक ही टूलकिट पर काम करते हैं। जर्मनी के खुद के घर में आग लगी है, उनकी बेटियाँ सुरक्षित नहीं हैं, लेकिन उनकी सरकारी मीडिया मशीनरी भारत में कमियाँ ढूँढने का एजेंडा चला रही है। समय आ गया है कि इस डबल स्टैंडर्ड वाले घटिया प्रोपेगेंडा मशीनरी को पूरी तरह से बेनकाब किया जाए, ताकि आम लोग इनकी हकीकत को जान सकें और इनके झाँसे में न आए।

बिना कानून बाजार पर हलाल सर्टिफिकेट का कब्जा: केन्या में कोर्ट तक पहुँची सर्टिफिकेशन की लड़ाई, समझें- कैसे पिस रहे व्यापारी

केन्या में हलाल सर्टिफिकेशन को लेकर कानूनी विवाद चल रहा है। 16 अप्रैल 2026 को डेनिस नथुम्बी, डेनिस ओवुओर ओचांडा और हेनरी बरासा टॉम ने नैरोबी हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की। उनका आरोप है कि हलाल सर्टिफिकेशन जैसी निजी व्यवस्थाएँ किसी स्पष्ट कानून के बिना ही खाद्य और मांस उद्योग में बाजार तक पहुँचने, सरकारी खरीद में भाग लेने और व्यापार करने की व्यावहारिक शर्त बनती जा रही हैं। याचिकाकर्ताओं ने अदालत से सरकारी संस्थाओं को किसी निजी सर्टिफिकेट को लाइसेंस, व्यापार या सार्वजनिक खरीद की अनिवार्य शर्त मानने से रोकने की माँग की है।

जून 2026 में केन्या हलाल सर्टिफिकेशन ब्यूरो (KBHC) ने इस मुकदमे में पक्षकार बनाए जाने की माँग की। संस्था का तर्क है कि मुस्लिम उपभोक्ताओं को यह जानने का संवैधानिक अधिकार है कि कोई खाद्य पदार्थ उनकी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार तैयार किया गया है या नहीं।

याचिकाकर्ताओं की मुख्य आपत्ति क्या है?

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि वे मुसलमानों के हलाल भोजन खाने के अधिकार का विरोध नहीं कर रहे हैं। उनका सवाल केवल इतना है कि हलाल सर्टिफिकेशन जैसी एक निजी मजहबी व्यवस्था धीरे-धीरे खाने-पीने की चीजों के उत्पादन, बिक्री और सप्लाई की पूरी प्रक्रिया में जरूरी शर्त कैसे बन गई।

उनका कहना है कि बूचड़खानों से लेकर सुपरमार्केट और सरकारी खरीद तक, हलाल सर्टिफिकेट ही व्यवसाय की स्वीकार्यता निर्धारित करने लगा है। सर्टिफिकेट न लेने वाला कारोबारी कुछ आपूर्ति शृंखलाओं, ठेकों और बाजारों से बाहर हो जाता है। इस स्थिति में कागज पर स्वैच्छिक दिखने वाला सर्टिफिकेशन व्यवहार में अनिवार्य बन जा रहा है।

दूसरी आपत्ति प्रमाणन शुल्क को लेकर है। याचिका में दावा किया गया है कि निजी संस्थाओं को दिया जाने वाला शुल्क अंततः वस्तु की कीमत में जोड़कर उपभोक्ता से वसूला जा सकता है जबकि अधिकांश खरीदारों को न प्रमाणन की प्रक्रिया पता होती है, न उसकी कीमत।

केन्या के कानून में टकराव कहाँ है?

याचिका में केन्या के संविधान के अनुच्छेद 43, 46 और 47 का उल्लेख किया गया है। अनुच्छेद 43 स्वास्थ्य और स्वीकार्य गुणवत्ता वाले भोजन जैसे सामाजिक-आर्थिक अधिकारों से जुड़ा है। अनुच्छेद 46 उपभोक्ताओं को उचित गुणवत्ता, आवश्यक जानकारी और उनके स्वास्थ्य, सुरक्षा तथा आर्थिक हितों की रक्षा का अधिकार देता है। अनुच्छेद 47 सरकारी प्रशासनिक कार्रवाई को वैध, तर्कसंगत और प्रक्रियात्मक रूप से निष्पक्ष बनाने की माँग करता है।

केन्या के मांस नियंत्रण नियम में पशु और मांस की जाँच का अधिकार सरकारी पशु चिकित्सकों, स्वास्थ्य निरीक्षकों और अधिकृत अधिकारियों को दिया गया है। पशु को काटने से पहले और मांस को बाजार में भेजने से पहले सरकारी निरीक्षण आवश्यक है। इसलिए धार्मिक प्रमाणन सार्वजनिक स्वास्थ्य की वैधानिक जाँच का स्थान नहीं ले सकता है।

हलाल वास्तव में क्या है?

हलाल अरबी शब्द है, जिसका अर्थ है इस्लामी कानून के अनुसार जायज। यह केवल जानवर काटने की पद्धति नहीं है। किसी उत्पाद में सूअर, रक्त, शराब या अन्य निषिद्ध सामग्री न हो, उसके निर्माण, प्रसंस्करण, भंडारण और परिवहन के दौरान वह गैर-हलाल पदार्थों के संपर्क में न आया हो ये सभी शर्तें हलाल व्यवस्था का हिस्सा हो सकती हैं।

FAO और WHO की Codex Alimentarius Guidelines के अनुसार, हलाल पशु का वध एक मानसिक रूप से स्वस्थ और इस्लामी प्रक्रिया से परिचित मुस्लिम द्वारा किया जाना चाहिए। प्रत्येक पशु को काटने से ठीक पहले ‘बिस्मिल्लाह’ कहा जाना चाहिए, पशु जीवित होना चाहिए, उपकरण तेज होना चाहिए और गर्दन की श्वासनली, भोजन नली तथा मुख्य रक्त वाहिकाएँ काटी जानी चाहिए। Codex यह भी स्वीकार करता है कि विभिन्न इस्लामी मतों और देशों के बीच हलाल की व्याख्या में अंतर हो सकता है।

इसी Codex में यह चेतावनी भी दी गई है कि हलाल लेबल का प्रयोग इस तरह नहीं होना चाहिए जिससे दूसरे खाद्य पदार्थों की सुरक्षा पर संदेह पैदा हो या यह दावा किया जाए कि हलाल भोजन स्वभावतः अधिक पौष्टिक या स्वास्थ्यवर्धक है। इससे साफ जाहिर होता है कि हलाल एक धार्मिक अनुरूपता का दावा है, सरकारी खाद्य-सुरक्षा प्रमाणपत्र नहीं है।

हलाल मांस को लेकर सबसे तीखा विवाद जानवर को काटने से पहले बेहोश करने पर होता है। सभी हलाल व्यवस्थाएँ एक जैसी नहीं हैं। कई मुस्लिम प्रमाणन संस्थाएँ reversible stunning स्वीकार करती हैं, जिसमें जानवर मरे बिना अस्थायी रूप से बेहोश होता है। कुछ संस्थाएँ बिना stunning किए वध को ही स्वीकार करती हैं।

Codex के अनुसार हलाल करने वाला व्यक्ति मुस्लिम होना चाहिए। व्यक्तिगत मजहबी उपभोग के संदर्भ में यह इस्लामी प्रक्रिया का हिस्सा है। लेकिन यदि किसी देश का पूरा मांस बाजार हलाल व्यवस्था पर निर्भर हो जाए तो पशु काटने का एक विशेष काम गैर-मुस्लिम कर्मचारियों के लिए व्यावहारिक रूप से बंद हो सकता है।

अधिकार की रक्षा हो, लेकिन छिपी अनिवार्यता नहीं: क्यों मुसीबत में व्यापारी

किसी भी मुस्लिम व्यक्ति को हलाल खाना खरीदने, उसकी पहचान करने और उसका सर्टिफिकेट माँगने का पूरा अधिकार है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि पूरे देश का खाद्य उद्योग हलाल व्यवस्था को ही सामान्य नियम मान ले। यह भी जरूरी नहीं कि गैर-मुस्लिम ग्राहक और व्यापारी किसी मजहबी सर्टिफिकेट का खर्च उठाएँ या उसके नियम मानने के लिए मजबूर हों।

इसका सही रास्ता न तो हलाल सर्टिफिकेशन पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाना है और न ही उसे हर जगह अनिवार्य बनाना। हलाल सर्टिफिकेशन लोगों और कारोबारियों की इच्छा पर निर्भर होना चाहिए। सर्टिफिकेट देने वाली संस्था और उसकी फीस की जानकारी सार्वजनिक होनी चाहिए। खाने के पैकेट पर साफ लिखा होना चाहिए कि वह हलाल प्रमाणित है या नहीं। बाजार में गैर-हलाल विकल्प भी आसानी से उपलब्ध रहने चाहिए। सरकारी खाद्य-सुरक्षा जाँच को किसी मजहबी प्रमाणपत्र से नहीं जोड़ा जाना चाहिए।

सरकारी खरीद में भी हलाल सर्टिफिकेट की शर्त केवल तभी लगनी चाहिए, जब भोजन खास तौर पर उन लोगों के लिए खरीदा जा रहा हो जिन्हें हलाल खाना चाहिए। इसके लिए भी स्पष्ट कानून या सरकारी नियम होना जरूरी है।

केन्या का यह मामला इसलिए अहम है क्योंकि अदालत को यह तय नहीं करना है कि हलाल सही है या गलत। अदालत को यह तय करना है कि किसी निजी मजहबी संस्था को बाजार और कारोबार पर कितनी ताकत दी जा सकती है। मजहबी स्वतंत्रता का मतलब लोगों को विकल्प देना है। लेकिन बिना किसी कानून के उसी विकल्प को व्यापार करने की जरूरी शर्त बना देना स्वतंत्रता नहीं बल्कि बाजार पर निजी नियंत्रण बन सकता है।

FIFA World Cup: मिकेल मेरीनो का गोल, नैनीताल की बारिश और फुटबॉल का उत्सव

एक-एक कर हम स्कूली ट्रक से उतरे; नीली कमीज, काली निकर और चेहरों पर उतना ही आत्मविश्वास, जितना किसी छोटे कस्बे के लड़के पहली बार किसी बड़े युद्धक्षेत्र में लेकर आते हैं। सामने फैला था पत्थरों से अटा विशाल मैदान, जहाँ कुछ ही देर में हमारा सामना सेंट जौसेफ की टीम से होना था।

मैदान की चारदीवारी के इर्द-गिर्द उनका पूरा कुनबा जमा था, घुटनों तक स्कर्ट पहने अंग्रेजीदां तरुणियाँ और ऐसे लड़के, जिनके चेहरे बता रहे थे कि वे हमें हराने से पहले हमारा मजाक उड़ाने आए हैं। उनकी आवाजें लगातार अंग्रेजी में गूँज रही थीं। वे अपनी टीम के लिए नारे लगा रहे थे या हमारा उपहास कर रहे थे, इसका फैसला हम नहीं कर सकते थे; अंग्रेजी हमारे लिए तब तक बस एक ऐसी भाषा थी, जिसमें डाँट भी कविता जैसी लगती थी। एक पल को तो सचमुच लगा कि शायद हमारे स्वागत में कोई सामूहिक गीत गाया जा रहा है।

मैच शुरू होने में अब बस कुछ ही मिनट बाकी थे। उधर कोच साहब पूरी गंभीरता से रणनीति समझा रहे थे; किसे कहाँ दौड़ना है, किसे किसे मार्क करना है। मगर हमारी निगाहें फुटबॉल पर कम और स्टैंड्स में बैठे उस अनजान संसार पर ज्यादा थीं, जहाँ अंग्रेजी बोलना भी किसी अलग ही खेल का हिस्सा लगता था।

पथरीले मैदान के ठीक सामने एक बेहद खूबसूरत झील थी जिसने बादलों की नर्म ऊनी मफलर ओढ़ रखी थी। उस झील के एक तरफ थी मॉल रोड और दूसरी ओर, ठंडी सड़क की तरफ, नैना मंदिर से लगकर था भूटिया बाजार; जहाँ के गर्म थुक्पा-मोमो की खुश्बू हमें अपनी ओर बुला रही थी। झील में रंगबिरंगी पालों वाली कई नन्हीं नावें दिख रही थीं। परसों ही यहाँ खूब बर्फबारी हुई थी। झील के दोनों ओर किसी बुजुर्ग की भांति झील का हाथ थामे खड़े पहाड़ों पर थोड़ी बहुत बर्फ अब भी दिख रही थी।

टिफिन टॉप की दिशा से आती सूरज की मद्धम किरणों से सारी मॉल रोड जगमगाने लगी थी। यह सारा दृश्य किसी फिल्म का सीन सा लग रहा था। एकाएक लगा कि नीली कमीज व काली शॉर्ट्स पहने हम पंद्रह बच्चे किसी फिल्मी सेट पर पहुँच गए हैं। सब इतना खूबसूरत था कि आज भी शब्दों में नहीं बांधा जा सकता।

खैर, हमारा मैच बस शुरू ही होने को था। एकाएक बारिश होने लगी थी। घनघोर बारिश के बावजूद तमाम भूटिया व कुमाऊंनी समाज के लोग मूंगफली लिए झील किनारे स्थित मैदान में होने जा रहे हमारे मैच को देखने पहुँच चुके थे। मैदान के चारों ओर से वह अपनी पसंदीदा टीम के नारे लगा रहे थे। अथाह शोर के मध्य मैच शुरू हो जाता है।

यहाँ थकने पर भी तुम रुक नहीं सकते थे। क्यूंकि बाहर खड़े तुम्हारे समर्थकों द्वारा तुम्हें ऐसे ऐसे अपशब्द सुनने पड़ते की हालत पतली हो जाती। मगर यही भीड़, अपने नायक पर, अपार स्नेह भी लुटाती थी। जैसे ही कोई नन्हां खिलाड़ी इनकी पसंदीदा टीम के लिए गोल दागता या अहम बचाव करता, यह भीड़ उस खिलाड़ी को कंधों पर उठा लेती। जीतने वाली टीम को कोई मोमोज खिला रहा होता तो कोई थुक्पा परोस रहा होता। हारने वाली टीम को भी लोग पूरा सम्मान दिया करते। फुटबॉल, सदैव, यहाँ किसी उत्सव सा रहा है। जिसे लोग पूरी जिंदादिली से मनाते हैं।

यह नैनीताल से हमारा पहला राब्ता था। तब कहाँ मालूम था कि यह जादूई शहर जिंदगी भर के लिए हमारी खुशियों का खजाना बन जाएगा। आज फिर नैनीताल में बारिश हो रही है। जुलाई की इन सुबहों में नैनीताल और वहाँ होने वाले फुटबॉल टूर्नामेंट बड़े याद आते हैं।

खैर, अब बात करते हैं फीफा विश्व कप के क्वार्टर फाइनल मुकाबलों की।

बीती रात बेहतरीन फॉर्म में चल रही बेल्जियम की टीम की टक्कर 2010 विश्व कप की विजेता स्पेन से थी। इस मुकाबले का विजेता पिछले संस्करण की उपविजेता व इस विश्व कप में अबतक सबसे घातक लग रही फ्रांस की टीम के खिलाफ सेमीफाइनल में जगह पक्की कर लेता।

लॉस एंजेलिस स्टेडियम में होने जा रहे इस मैच में एक ओर बेल्जियम थी जो, धीमी शुरुआत के बाद, अपने पिछले तीन मैचों में बारह गोल दाग चुकी थी। चार्ल्स डि किटिलीरी, कप्तान यूरी टीलमान्स व लियान्द्रो ट्रोसार्ड अबतक दो दो गोल दाग चुके थे। वहीं, लुकाकू बेंच से आने के बावजूद अबतक तीन गोल स्कोर कर चुके थे। चार्ल्स डि किटिलीरी खासकर एक युवा खिलाड़ी हैं जिन्होंने इस टूर्नामेंट में बेल्जियम के लिए अबतक काफी बेहतर खेल दिखाया है।

वहीं, दूसरी ओर थी स्पेन की टीम जिन्होंने अबतक इस विश्व कप के अपने पांच मैचों में विरोधी टीमों को अपने खिलाफ एक भी गोल नहीं दागने दिया है। स्पेन के कोच लुई डे ला फुएन्ते के लिए चिंता का विषय यह होने जा रहा था कि उनकी फॉरवर्ड लाइन के खिलाड़ी टीम के लिए गोल स्कोर करने में असमर्थ रहे हैं। वहीं, रेड डेविल्स की खासियत यह है कि उनके बेंच पर बैठे खिलाड़ी भी मैदान पर आकर गोल दागने की काबिलियत रखते हैं।

आज एक बेहतरीन डिफेंस का सामना एक घातक अटैकिंग टीम से होने वाला था। यह निश्चित रूप से एक बेहतरीन मैच होने जा रहा था।

दोनों ही टीमें 4-2-3-1 की फॉर्मेशन के संग मैदान पर उतरती हैं। मैच की शुरुआत होती है। स्पेन के लिए आज पेड्री को बेंच पर बैठाया गया था। उनकी जगह फाबियान रुइज़ मैदान पर उतारे गए थे।

स्पेन मैच के शुरू होते ही गजब अंदाज में खेलती नजर आती है। गेंद ज्यादातर समय उनके खिलाड़ियों के ही पास रहती दिख रही थी। बेल्जियम को गेंद पाने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ रहा था। खासकर अटैकिंग मिडफील्डर दानी ओल्मो लगातार बेल्जियम के लिए खतरे पैदा करते जा रहे थे। युवा सनसनी लामीन यमाल को सदैव दो से तीन बेल्जियम के खिलाड़ी घेरे हुए थे। फिर भी वो मौका मिलते ही दाईं छोर से अटैक किए जा रहे थे।

शुरुआती बीस मिनट में ही स्पेनिश टीम विपक्षी गोलपोस्ट पर कई हमले कर चुकी थी। मगर फिलहाल गोल स्कोर करने में उन्हें सफलता नहीं मिल सकी थी। स्कोर था 0-0।

पहला हाइड्रेशन ब्रेक होता है। उसके पश्चात खेल फिर आगे बढ़ता है। मैच के तीसवें मिनट में स्पेन बांई छोर से अटैक करती है। एक बेहतरीन क्रॉस बेल्जियम के बॉक्स में डाला जाता है। शानदार खेल दिखा रहे दानी ओल्मो अपने लिए खाली स्थान बनाते हुए जोर से गोलपोस्ट की ओर शॉट लगाते हैं। गेंद गोलकीपर थिब्वा कुर्त्वा से छिटक जाती है। स्पेनिश मिडफील्डर फाबियान रुइज़ तुरंत वहां पहुंच कर गेंद को गोलपोस्ट के भीतर भेज देते हैं। स्पेन इस गोल के साथ मैच में अहम बढ़त ले लेता है।

विशालकाय लॉस एंजेलिस स्टेडियम में आज साढ़े चौहत्तर हजार दर्शक मौजूद थे। इनमें ज्यादातर दर्शकों का समर्थन स्पेन को प्राप्त था। फाबियान रुइज़ के इस गोल ने अपने इन तमाम समर्थकों को खुशी से झूमने का मौका दे दिया था।

मगर, उनकी यह खुशी ज्यादा देर टिक नहीं सकी। राइट बैक टिमोथी कास्ताग्ने स्पेनिश बॉक्स के बाहर से, मैदान की दाईं ओर से, एक सटीक क्रॉस अंदर डालते हैं। चार्ल्स डि किटिलीरी उन्हें मार्क कर रहे डिफेंडर को चकमा देकर एक शानदार हेडर लगाते हैं। गेंद स्पेनिश गोलकीपर ऊनाई सिमॉन को पीछे छोड़ गोलपोस्ट के भीतर जा चुकी थी। मात्र ग्यारह मिनट के भीतर ही बेल्जियम मैच में वापसी कर लेती है। स्कोर 1-1 से बराबर हो चुका था।

दूसरे हाफ का खेल शुरू होता है। स्पेन फिर लगातार आक्रमण का सिलसिला जारी रखती है। बेल्जियम भी जानती थी कि अगर वो कैसे भी एक गोल दाग दे तो स्पेन को दबाव में ला सकती है। दोनों ही टीमें प्रयास करती रहती हैं कि एक गोल दाग कर अहम बढ़त हासिल कर ली जाए। मगर कोई भी टीम इस मकसद में सफल नहीं हो पा रही थी।

मैच के इकहत्तरवें मिनट में बेल्जियम की टीम को तब सदमा लगता है जब उनके स्टार गोलकीपर थिब्वा कुर्त्वा हैमस्ट्रिंग में खिंचाव महसूस करते हैं। यूं चोटिल होने के चलते नम आंखों के साथ उन्हें मैदान छोड़ना पड़ता है। मैनचेस्टर यूनाइटेड के लिए खेलने वाले युवा गोलकीपर लामेन्स मैदान में थिब्वा कुर्त्वा का स्थान लेते हैं। खेल आगे बढ़ता है।

पिचहतर मिनट का खेल हो चुका था। दोनों ही टीमें कई आक्रामक परिवर्तन करती हैं। खेल जैसे जैसे आगे बढ़ रहा था, लग रहा था शायद मैच का फैसला एक्स्ट्रा टाइम में होगा। दर्शकों को भी इंतजार था एक गोल का। दोनों ही टीमों के समर्थकों ने अपनी अपनी टीम की हौसला-अफजाई में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। दोनों ही टीमें एक गोल मारने के लिए प्रयासरत रहती हैं मगर दोनों ही तरफ से अच्छा रक्षण भी देखने को मिलता है। स्पेनिश गोलकीपर ऊनाई सिमॉन आज कई बेजा गलतियां करते दिखे। कई दफा अपनी ग़लती के चलते वह बेल्जियम की अटैकिंग लाइन को गोल मारने का मौका प्रदान कर दे रहे थे। भला हो उनकी रक्षापंक्ति का जिसने दो बार गोल लाइन क्लियरैंस कर के, स्पेन को मैच में बनाए रखा था।

छियासीवें मिनट में स्पेनिश कोच लुई डे ला फुएन्ते अपना सबसे घातक हथियार निकालते हैं। वह मिडफील्ड में बेहद शानदार प्रदर्शन कर रहे दानी ओल्मो के स्थान पर मिकेल मेरीनो को मैदान में भेजते हैं। यह फैसला इसलिए भी लिया गया क्योंकि कोच जानते थे कि अगर यह मैच एक्स्ट्रा-टाइम में जाता है तो मैच काफी कश्मकश भरा रहेगा और लगातार काफी तनाव भी बना रहेगा।

मिकेल राउंड ऑफ 16 में पुर्तगाल के खिलाफ अंतिम क्षणों में गोल दागते हुए स्पेन को टूर्नामेंट में जिंदा रखे हुए थे। यह उनका ही गोल था जिसके चलते इकतालीस वर्षीय क्रिस्टियानो रोनाल्डो बिना विश्व कप का खिताब जीते घर लौटने के लिए मजबूर हो गए थे।

अठ्ठासीवें मिनट में गोलपोस्ट से यही कोई 35 मीटर की दूरी से मौका मिलते ही उन्नीस वर्षीय स्टार स्पेनिश डिफेंडर पाउ कुबार्सी गोल की दिशा में, अपने दाएं पांव से, भीषण टंकार करते हुए एक बेहद जोरदार किक लगाते हैं। गोलकीपर लामेन्स गेंद को अपने कब्जे में लेने के लिए आगे बढ़ते हैं। पाउ कुबार्सी का प्रहार इतना तीव्र था कि गेंद गोलकीपर लामेन्स से छिटक जाती है। हमेशा की भांति एक बार फिर सही वक्त पर सही जगह पर मिकेल मेरीनो आ धमकते हैं। मिकेल गेंद को बिना कोई ग़लती किए बेहतरीन तरीके से जाल के भीतर पहुंचा देते हैं। एक बार फिर, मिकेल मेरीनो के गोल के चलते, स्पेन बिल्कुल अंतिम क्षणों में मैच में बढ़त बना चुकी थी।

अंतिम क्षणों में स्पेन उनके इस गोल के दम पर करो या मरो वाले इस मैच में बेल्जियम की मजबूत टीम के विरुद्ध अहम बढ़त ले लेती है। नब्बे मिनट का खेल पूर्ण होने पर सात मिनट का इंजरी टाइम मिलता है। बेल्जियम गोल करने हेतु जद्दोजहद करती रहती है परन्तु उन्हें सफलता नहीं मिलती।

कुछ ही पलों में मैच समाप्त हो जाता है। स्पेन 2-1 से यह मुकाबला जीत कर सेमीफाइनल में जगह बना लेती है। केविन डि ब्रुएना का विश्व कप जीतने का ख्वाब टूट जाता है। पूरा स्टेडियम लाल रंग के लहराते झंडों से पट जाता है। एस्पाना-एस्पाना के नारे लगाते स्पेनिश समर्थकों की खुशी में सारा लॉस एंजेलिस स्टेडियम डूब गया था। मिकेल मेरीनो द्वारा अंतिम क्षणों में दागा गया यह गोल एकदफा फिर उन्हें स्पेन का संकटमोचक साबित कर चुका था।

एक मिडफील्डर होने के बावजूद मिकेल मेरीनो ने यूरो कप व यूएफा नेशन्स लीग के सेमीफाइनल मुकाबलों में भी स्पेन के लिए गोल स्कोर किए थे। और, आज तो उनके इस खास गोल के चलते ही ला रोजा बेल्जियम को घर की राह दिखा कर सेमीफाइनल में अपनी जगह पक्की कर चुकी थी। वह हमेशा ही एक बेहद क्लच खिलाड़ी रहे हैं जो बेंच से आकर भी स्पेन के लिए मैच बदल देते हैं।

सेमीफाइनल में स्पेन का सामना गत उपविजेता व टूर्नामेंट में सभी की फेवरेट फ्रेंच टीम से होना है। कोच लुई डे ला फुएन्ते ने मैच पश्चात साक्षात्कार में कहा कि यह दो जाएंट्स की क्लैश होने जा रही है। स्पेनिश रक्षापंक्ति ने अबतक के अपने सफर में मात्र एक गोल खाया है। वहीं, दूसरी ओर फ्रांस होगी, जो किसी बवंडर के भांति तबाही करती नजर आती है।

खैर, अब, आगे, देर रात ढाई बजे, टूर्नामेंट के तीसरे क्वार्टर फाइनल मुकाबले में, नॉर्वे के वाइकिंग्स इंग्लैंड की टीम के विरुद्ध मैदान में उतरेंगे। अर्लिंग हालांड के नेतृत्व में नॉर्वे एक बड़ा उलटफेर करने के इरादे से मैदान में उतरेगी। वहीं, कप्तान हैरी केन व साथी खिलाड़ियों के शानदार फॉर्म के दम पर इंग्लैंड इस मैच को जीत कर विश्व कप जीतने के ख्वाब को सच करने की दिशा में बड़ा कदम लेना चाहेंगे।

थ्री लाएंस, जो कि मेक्सिको के खिलाफ हुए एक हाई वोल्टेज मुकाबले में जीत दर्ज कर चुकी है, इस मैच में कोई भी कोताही नहीं बरतना चाहेगी। वहीं, नॉर्वे हर जीत के साथ अपने देश के लिए नया इतिहास लिखते जा रहे हैं। वह ब्राजील के खिलाफ किए शानदार प्रदर्शन को दुबारा दोहराना चाहेंगे।

इसके पश्चात, कल सुबह साढ़े छह बजे, कन्सास सिटी स्टेडियम में कतर विश्व कप के विजेता, अर्जेंटीना, के समक्ष स्विट्जरलैंड के लड़ाके खड़े होंगे। अर्जेंटीना ने पिछले मैच में अंतिम बारह मिनटों में करिश्माई खेल दिखाते हुए, मैच में 2-0 से पिछड़ने के बावजूद, 3-2 से मिस्र के खिलाफ अपना मैच जीता था। वहीं, स्विट्जरलैंड की टीम अपना पिछला मैच जीतने के बाद से ही इस मुकाबले के लिए जोरदार तैयारी में लगी हुई है।

खबरें हैं कि गोलकीपर कोबेल नित्य गोलकीपिंग कोच के साथ दो-तीन घंटे पेनाल्टी सेव्स की तैयारी कर रहे हैं व संपूर्ण टीम नौ/आठ खिलाड़ी बनाम ग्यारह खिलाड़ी की ट्रेनिंग ड्रिल्स कर रही है। चौंकिएगा नहीं अगर वह कल सुबह कुछ बड़ा कर दिखाएँ।

हालाँकि, जब तक 39 लियोनेल मेस्सी एक बीस वर्षीय मेस्सी के जज्बे के साथ खेलते रहेंगे, अर्जेंटीना को हराना एक टेढ़ी खीर होगा। अल्बीसेलेस्त के कोच लियोनेल स्कालोनी जरूर काफी चिंताओं से घिरे हुए हैं। उनकी परेशानी का कारण है कि वह अपने अनुभवी खिलाड़ियों के साथ आगे बढ़ें या फिर बेंच पर मौजूद खुद को साबित करने के लिए भूखे युवा खिलाड़ियों जैसे वैलेंटीन बार्को, नीको पाज़ व सीमिओनी को मैदान पर उतारें।

दोनों ही मैचों में नॉर्वे व स्विट्जरलैंड के रूप में एक-एक अंडरडॉग है जो बड़े शिकार के लिए लालायित है। दोनों ही मुकाबले मजेदार रहने वाले हैं। आप को यह मैच जरूर देखने चाहिए।

फुटबॉल की खबरें जारी रहेंगी। बने रहिएगा साथ।

बांग्लादेशी डिप्लोमैट ने J&K को पाकिस्तान में दिखाया, पूजा झा ने प्रेजेंटेशन रोक वहीं कर दी फजीहत: जानिए- कौन हैं भारत की बेबाक युवा राजनयिक

भारत अपनी संप्रभुता और अखंडता के साथ कभी समझौता नहीं करता, यह बात एक बार फिर साबित हुई है। पड़ोसी देश बांग्लादेश की राजधानी ढाका में आयोजित एक हाई-प्रोफाइल विदेश नीति सेमिनार के दौरान उस समय तीखी बहस और खलबली देखने को मिली। जब नक्शे में भारत के अभिन्न हिस्से जम्मू-कश्मीर को पाकिस्तान का भाग दिखा दिया गया। इसे वहाँ मौजूद भारतीय उच्चायोग की एक युवा राजनयिक ने तुरंत पकड़ लिया।

जैसे ही यह गलत नक्शा स्क्रीन पर फ्लैश हुआ, ढाका स्थित भारतीय उच्चायोग की सेकंड सेक्रेटरी पूजा कुमारी झा ने बिना एक पल की देरी किए कार्यक्रम को बीच में ही रोक दिया और पूरी मुखरता के साथ इस पर कड़ी आपत्ति दर्ज कराई। उन्होंने साफ और कड़े शब्दों में दुनिया के सामने संदेश दिया कि पूरा जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न और अविभाज्य अंग है।

सेमिनार का विषय और विवाद की शुरुआत

यह पूरा वाकया ढाका में ‘बांग्लादेश इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल एंड स्ट्रेटेजिक स्टडीज’ (BIISS) द्वारा आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय सेमिनार का है। इस सेमिनार का विषय बेहद महत्वपूर्ण था “विश्वास बहाल करना और क्षेत्रीय एकता को नया रूप देना: SAARC को फिर से जीवित करने के रास्ते।”

इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम में कई देशों के राजनयिक, बड़े-बड़े प्रोफेसर, शिक्षाविद और विदेशी मामलों के जानकार मौजूद थे। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में बांग्लादेश की विदेश राज्य मंत्री शमा ओबेद भी मंच पर मौजूद थीं।

इसी दौरान भारत में बांग्लादेश के पूर्व उच्चायुक्त और वरिष्ठ राजनयिक अहमद तारिक करीम मंच पर अपना प्रेजेंटेशन दे रहे थे। जैसे ही उनकी प्रेजेंटेशन की एक स्लाइड में दक्षिण एशिया का नक्शा सामने आया, उसमें जम्मू-कश्मीर को पाकिस्तान का हिस्सा दिखा दिया गया था।

बीच प्रेजेंटेशन में टोका: भारतीय राजनयिक और पूर्व राजदूत के बीच तीखी बहस

इस पर भारतीय राजनयिक पूजा कुमारी झा सीधे ही आयोजकों पर भड़क गईं। उन्होंने अहमद तारिक को टोकते हुए कहा कि यह तथ्यात्मक रूप से पूरी तरह गलत है।

पूजा कुमारी झा ने कहा “सर, यहाँ दिखाया गया भारत का नक्शा गलत है। जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और मुझे लगता है कि यहाँ दिखाया गया नक्शा सही नहीं है। यह भारत की संप्रभुता के खिलाफ है।”

भारतीय राजनयिक के इस कड़े और स्पष्ट तेवर को देखकर सेमिनार के आयोजकों में खलबली मच गई। अपनी स्थिति को संभालते हुए और स्पष्टीकरण देते हुए पूर्व राजदूत तारिक ए करीम ने मंच से सफाई दी।

उन्होंने कहा कि इस नक्शे का इस्तेमाल केवल ‘सांकेतिक और प्रतीकात्मक उद्देश्यों’ के लिए किया गया था और इसका इरादा किसी देश की वास्तविक सीमाओं या राजनीतिक दावों को दर्शाना या ठेस पहुँचाना नहीं था।

हालाँकि, भारतीय राजनयिक इस जवाब से संतुष्ट नहीं हुईं और अपने रुख पर पूरी अडिग रहीं। पूजा झा ने दोबारा जवाब दिया “मैं आपकी बात समझती हूँ सर, लेकिन जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और यहाँ इसे गलत तरीके से दिखाया गया है। इसलिए मैं बस इस बात की ओर ध्यान दिलाना चाहती थी और अपनी आपत्ति दर्ज कराना चाहती थी।”

इसके बाद राजदूत करीम ने उनसे पूछा कि क्या वह भारत से हैं? इसके जवाब में उन्होंने अपना पूरा परिचय दिया और बताया कि वह भारतीय उच्चायोग की अधिकारी हैं। इसके बाद तारिक करीम भी उनकी बात से सहमत दिखे और कहा, “आपकी बात नोट कर ली गई है” और इसके बाद उन्होंने अपना प्रेजेंटेशन आगे जारी रखा।

कौन हैं पूजा कुमारी झा?

इस घटना के बाद हर कोई यह जानना चाहता है कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर इतनी बेबाकी से भारत का पक्ष रखने वाली यह युवा अधिकारी कौन हैं। पूजा कुमारी झा साल 2022 बैच की भारतीय विदेश सेवा (IFS) अधिकारी हैं।

वह मात्र 25 साल की उम्र में इस प्रतिष्ठित सेवा का हिस्सा बनीं। वर्तमान में वह बांग्लादेश के ढाका स्थित भारतीय उच्चायोग में सेकंड सेक्रेटरी (पॉलिटिकल और इन्फॉर्मेशन) के तौर पर तैनात हैं।

ढाका में उनकी पहली पोस्टिंग होने से पहले, उनकी राजनयिक ट्रेनिंग ताइवान में हुई थी। पूजा झा मूल रूप से बिहार के सीतामढ़ी जिले के पुरनहिया गाँव की रहने वाली हैं। हालाँकि उनका परिवार दिल्ली में रहता है।

उन्होंने साल 2021 की UPSC सिविल सेवा परीक्षा में अपने पहले ही प्रयास में ऑल इंडिया रैंक (AIR) 82 हासिल की थी, जिसके बाद उन्हें देश सेवा के लिए भारतीय विदेश सेवा (IFS) का विकल्प मिला।

पिता ने कहा था – बड़े सपने मत देखो

एक साधारण मध्यमवर्गीय परिवार से आने वाली पूजा का सफर बेहद प्रेरणादायक रहा है। जब उन्होंने UPSC पास की, तो एक इंटरव्यू में अपने संघर्षों को साझा करते हुए बताया था, “मैं जिस जगह और समाज से आती हूँ, वहाँ इस प्रतिष्ठित परीक्षा को पास करने का सपना देखना भी बहुत बड़ी बात मानी जाती है।”

उनके पिता पिछले लगभग 40 सालों से गुरुग्राम की एक प्राइवेट कंपनी में एक मामूली ‘ऑफिस हेल्पर’ के तौर पर काम कर रहे हैं और उनकी माँ गृहिणी हैं। पूजा ने बताया कि बड़े सपने देखने पर उनके पिता अक्सर उनसे मजाकिया या डरे हुए लहजे में कहते थे, “तुम बॉलीवुड एक्टर, एस्ट्रोनॉमर और IAS ऑफिसर के अलावा कुछ भी बन सकती हो।”

क्योंकि उन्हें लगता था कि इतने बड़े पदों तक पहुँचना उनके जैसे गरीब परिवार के लिए नामुमकिन है। पूजा अपने भाई-बहनों में दूसरी सबसे छोटी और अपने माता-पिता की पाँचवीं बेटी हैं। उनके बाद उनका एक छोटा भाई है।

पूजा ने बताया, “मेरे परिवार की बेटे की चाहत छोटे भाई के जन्म के साथ पूरी हो गई। मैं जिस समुदाय से आती हूँ, वहाँ बेटे के जन्म को बहुत ज्यादा अहमियत दी जाती है। लड़की के जन्म पर कोई जश्न नहीं होता, जबकि लड़के के जन्म पर धूमधाम होती है। यह सोच इतनी गहरी थी कि इससे लड़ने और लोगों की मानसिकता बदलने में मुझे कई साल लग गए।”

इस सामाजिक असमानता के माहौल ने पूजा और उनकी बहनों को आपस में बहुत मजबूती से जोड़ दिया। वे बहनें आपस में इस भेदभाव पर लंबी बातचीत करती थीं और इसी ने पूजा के भीतर समाज में बदलाव लाने और अपनी एक अलग पहचान बनाने का संकल्प पैदा किया।

हक पाने के लिए की पढ़ाई

पूजा ने बताया कि परिवार की आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण उन सभी भाई-बहनों को प्राइवेट स्कूलों से निकालकर सरकारी और दिल्ली नगर निगम (MCD) के स्कूलों में डाल दिया गया था। सीमित संसाधनों के बावजूद उनसे पढ़ाई में बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद की जाती थी।

पूजा के लिए पढ़ाई ही समाज और घर में सम्मान पाने का जरिया बनी। उन्होंने बताया, “जब भी मैं स्कूल या परीक्षाओं में अच्छा स्कोर करती थी, तो मेरे माता-पिता बहुत खुश होते थे। वे दिन ऐसे होते थे जब मुझे मेरे भाई से भी ज्यादा प्यार और तवज्जो मिलती थी। मैं बस माता-पिता के उस प्यार और खुशी के पलों को पाने के लिए और बेहतर करने की जिद में जुट जाती थी।” आज उसी जिद और संघर्ष की बदौलत वह एक फाइटर बनकर उभरी हैं।

बांग्लादेशी मंत्री ने की गहरे क्षेत्रीय सहयोग की वकालत

इस विवाद के बीच, सेमिनार को संबोधित करते हुए मुख्य अतिथि और बांग्लादेश की विदेश राज्य मंत्री शमा ओबेद ने दक्षिण एशिया में गहरे क्षेत्रीय सहयोग के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने सार्क (SAARC) संगठन की मौजूदा स्थिति पर बात करते हुए कहा कि हमें इसकी क्षमता और वास्तविक प्रदर्शन के बीच के अंतर को पाटने की जरूरत है।

संगठन को फिर से जीवित करने के कदमों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, “सार्क संगठन को बेहतर ढंग से काम करने की क्षमता, ज्यादा आर्थिक मजबूती, ज्यादा असरदार व्यावहारिक तरीकों और काम को आगे बढ़ाने के लिए एक मजबूत फॉलो-अप कल्चर की जरूरत है।”

उन्होंने यह भी संकेत दिया कि बांग्लादेश आने वाले महीनों में सार्क देशों के बीच आपसी विश्वास बढ़ाने के लिए कुछ ठोस कदम उठाने पर विचार कर रहा है, जिसमें ढाका में मौजूद सार्क देशों के राजदूतों से बातचीत और काठमांडू स्थित सार्क सचिवालय से संपर्क साधना शामिल हो सकता है।

संप्रभुता पर भारत का रुख हमेशा से स्पष्ट

यह कोई पहला मौका नहीं है जब भारतीय राजनयिकों ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत के खिलाफ गलत प्रस्तुतियों या विवादित नक्शों को तुरंत चुनौती दी हो। भारत सरकार का इस मामले पर हमेशा से बिल्कुल साफ और कड़ा रुख रहा है कि पूरा जम्मू-कश्मीर और लद्दाख भारत का अटूट और अविभाज्य हिस्सा है।

हाल ही में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की वार्षिक रिपोर्ट पर बहस के दौरान भी जब पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर का मुद्दा उठाया था, तो संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि पी हरीश ने ‘राइट टू रिप्लाई’ (जवाब देने के अधिकार) का इस्तेमाल करते हुए पाकिस्तान को करारा जवाब दिया था।

पाकिस्तानी फौज ने लगाई आग, हफ्ते भर जलता रहा भगवान जगन्नाथ का रथ: पढ़े- 500 साल पुरानी धमराई की ऐतिहासिक यात्रा की कहानी, बांग्लादेश में अब भी जीवित है परंपरा

आगामी 16 जुलाई से देशभर में भगवान जगन्नाथ की प्रसिद्ध भव्य रथ यात्रा शुरू होने जा रही है। पुरी, अहमदाबाद और देश के कई शहरों में लाखों श्रद्धालु भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के दर्शन के लिए तैयारियों में जुटे हैं।

लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि आज के बांग्लादेश में भी कभी ऐसी ही एक भव्य रथ यात्रा निकाली जाती थी, जिसका रथ पुरी के रथ से भी बड़ा और ऊँचा माना जाता था। यह थी धमराई की ऐतिहासिक रथ यात्रा।

इस रथ यात्रा की पहचान केवल उसकी भव्यता नहीं थी, बल्कि यह पूर्वी बंगाल की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक भी थी। लेकिन 1971 में पाकिस्तान फौज के ‘ऑपरेशन सर्चलाइट’ के दौरान इस परंपरा पर ऐसा हमला हुआ कि सालों पुरानी भव्यता हमेशा के लिए टूट गई। रथ को आग के हवाले कर दिया गया और वो करीब एक सप्ताह तक जलता रहा।

500 साल पुरानी परंपरा, जहाँ महीनों पहले शुरू हो जाती थीं तैयारियाँ

धमराई जो आज बांग्लादेश की राजधानी ढाका से करीब 40 किलोमीटर दूर स्थित है, वहाँ भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा की परंपरा लगभग 500 वर्ष पुरानी मानी जाती है। इतिहासकारों के अनुसार, 17वीं शताब्दी तक इस रथ यात्रा का स्पष्ट उल्लेख मिलता है और 1672 के आसपास भी इसके आयोजन के प्रमाण दर्ज हैं।

यह केवल एक दिन का धार्मिक आयोजन नहीं था। पूरे क्षेत्र में लगभग एक महीने तक मेले, धार्मिक अनुष्ठान, सांस्कृतिक कार्यक्रम और भजन-कीर्तन चलते थे। बंगाल, ओडिशा, असम और नेपाल तक से श्रद्धालु यहाँ पहुँचते थे। उस समय धमराई की रथ यात्रा को पूर्वी भारत के सबसे बड़े धार्मिक आयोजनों में गिना जाता था।

पुरी के रथ से भी ऊँचा था धमराई का रथ

19वीं शताब्दी में स्थानीय जमींदारों ने एक नया और पहले से अधिक विशाल रथ बनवाने का निर्णय लिया। आसपास के इलाकों से कारीगर बुलाए गए और लगभग एक साल की मेहनत के बाद तैयार हुआ यह रथ अपनी भव्यता के कारण दूर-दूर तक प्रसिद्ध हो गया।

बताया जाता है कि इस रथ की ऊँचाई लगभग 60 फीट थी, जबकि वर्तमान में पुरी की रथ यात्रा में भगवान जगन्नाथ का नंदीघोष रथ लगभग 44-45 फीट ऊँचा होता है। धमराई का रथ 45×45 फीट के विशाल आधार पर बनाया गया था और इसमें 32 बड़े पहिए लगे थे।

रथ के आगे लकड़ी के घोड़े लगाए जाते थे और करीब एक हजार किलोग्राम वजनी मोटी रस्सियों से हजारों श्रद्धालु इसे खींचते थे। यात्रा जसोमाधव मंदिर से शुरू होकर करीब आधा किलोमीटर दूर गोपीनगर मंदिर तक पहुँचती थी। रास्ते भर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती थी।

विभाजन के बाद भी बची रही परंपरा, लेकिन बदल गया पूरा माहौल

1947 में भारत के विभाजन के बाद यह इलाका पूर्वी पाकिस्तान का हिस्सा बन गया। 1950 में जमींदारी व्यवस्था खत्म होने के बाद इस रथ यात्रा के सामने आर्थिक संकट खड़ा हो गया।

इसी समय उद्योगपति और समाजसेवी राय बहादुर रणदा प्रसाद साहा आगे आए। उन्होंने न केवल रथ के रखरखाव की जिम्मेदारी संभाली बल्कि हर साल आषाढ़ मास में होने वाली इस ऐतिहासिक रथ यात्रा के आयोजन का पूरा खर्च भी उठाया।

रणदा प्रसाद साहा शिक्षा, स्वास्थ्य और समाजसेवा के क्षेत्र में भी बड़े योगदान के लिए जाने जाते थे और उन्होंने पूर्वी बंगाल में कई संस्थानों की स्थापना की थी।

ऑपरेशन सर्चलाइट क्या था?

25 मार्च 1971 को पाकिस्तानी फौज ने तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान में ‘ऑपरेशन सर्चलाइट‘ शुरू किया था। इस अभियान का उद्देश्य बंगाली राष्ट्रवादी आंदोलन को दबाना बताया गया था, लेकिन इस दौरान बड़े पैमाने पर आम नागरिकों पर कार्रवाई हुई।

1971 के युद्ध में मारे गए लोगों की संख्या को लेकर अलग-अलग अनुमान हैं। बांग्लादेश सरकार लगभग 30 लाख लोगों के मारे जाने का दावा करती है, लेकिन अलग-अलग अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों, शोधों और मानवाधिकार रिपोर्टों के अनुसार इस अभियान में बड़े पैमाने पर नागरिकों की हत्या हुई और विशेष रूप से बंगाली हिंदुओं को निशाना बनाया गया।

इसी दौर में रणदा प्रसाद साहा और उनके बेटे भवानी प्रसाद साहा को पाकिस्तानी फौज ने हिरासत में लिया। उन्हें एक बार छोड़ा गया, लेकिन अगले ही दिन दोबारा उठा लिया गया। इसके बाद दोनों कभी वापस नहीं लौटे। आज तक उनके साथ क्या हुआ, इसका कोई आधिकारिक जवाब नहीं मिल सका।

इन घटनाओं ने आखिरकार बांग्लादेश मुक्ति संग्राम को तेज किया और दिसंबर 1971 में पाकिस्तानी फौज के आत्मसमर्पण के साथ बांग्लादेश एक स्वतंत्र राष्ट्र बना।

रथ यात्रा से पहले भगवान के रथ को लगा दी गई आग

रणदा प्रसाद साहा के लापता होने के कुछ समय बाद धमराई की सबसे बड़ी पहचान रहे विशाल रथ को भी पाकिस्तानी फौज ने आग के हवाले कर दिया। स्थानीय इतिहास और मंदिर से जुड़े विवरणों के अनुसार, यह घटना जून 1971 में हुई।

उस समय रथ यात्रा में केवल कुछ दिन बाकी थे। लकड़ी से बने विशाल रथ में लगी आग इतनी भीषण थी कि उसे पूरी तरह राख होने में लगभग एक सप्ताह का समय लग गया। जिस रथ को बनाने में एक साल का समय लगा था।

जिसे हजारों श्रद्धालु भगवान का वाहन मानते थे और जो पूर्वी बंगाल की धार्मिक पहचान बन चुका था, वह कुछ ही दिनों में राख का ढेर बन गया। उसी साल रथ यात्रा नहीं हो सकी और अगले साल भी यह परंपरा पूरी भव्यता के साथ वापस नहीं लौट सकी।

दो साल बाद लौटी यात्रा, लेकिन खो गई पुरानी पहचान

1973 में दो सालों के अंतराल के बाद धमराई में फिर से रथ यात्रा निकाली गई। हालाँकि, तब तक पुराना विशाल रथ पूरी तरह नष्ट हो चुका था। बाद में नया रथ बनाया गया लेकिन उसकी भव्यता पहले जैसी नहीं रही।

साल 2009 में भारत सरकार की सहायता से जसोमाधव मंदिर समिति और भारतीय उच्चायोग के सहयोग से एक नए रथ के निर्माण का कार्य शुरू हुआ। 2010 में नया तीन मंजिला रथ तैयार हुआ जिसकी ऊँचाई करीब 40 फीट और 16 पहिए हैं।

आज धमराई की रथ यात्रा इसी रथ के साथ आयोजित होती है लेकिन पुराने समय जैसा महीनों तक चलने वाला विशाल आयोजन अब देखने को नहीं मिलता।

आज भी निकलती है रथ यात्रा, लेकिन इतिहास की पीड़ा चलती है साथ

यूँ तो आज भी धमराई में भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा निकाली जाती है। श्रद्धालु भी जुटते हैं और धार्मिक परंपरा भी जीवित है, लेकिन इतिहास के उस दर्दनाक अध्याय को वहाँ के लोग आज भी नहीं भूल पाए हैं।

जिस रथ को कभी पूर्वी बंगाल की सबसे बड़ी धार्मिक धरोहर माना जाता था, वह अब इतिहास का हिस्सा बन चुका है। पाकिस्तानी फौज की कार्रवाई ने केवल एक विशाल रथ को नहीं जलाया बल्कि सदियों पुरानी धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत को भी भारी नुकसान पहुँचाया।

मिडिल ईस्ट फिर बना वॉर जोन, क्या इस बार तैयार हैं हम?: जानें- भारत के सामने खड़ी हैं कैसी चुनौतियाँ, अग्निपरीक्षा की इस घड़ी में देश को आर्थिक मार से कैसे बचाएगी मोदी सरकार

ईरान पर अमेरिकी हमले और अमेरिका के साथ उसके सहयोगियों पर ईरान के हमलों के बाद से पश्चिम एशिया का इलाका एक बार फिर बारूद के ढेर पर बैठ गया है। ईरान और उसके विरोधियों के बीच छिड़ी इस नई जंग ने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को हिलाकर रख दिया है। ऐसे में हर भारतीय के मन में यही सवाल उठ रहा है कि ईरान फिर से बना वॉर जोन, क्या हिंदुस्तान है तैयार? भारत के सामने कौन सी चुनौतियाँ हैं और कितनी तैयार है मोदी सरकार?

यह सवाल इसलिए भी बेहद गंभीर है क्योंकि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बहुत हद तक खाड़ी देशों पर निर्भर है। जब भी इस क्षेत्र में तनाव बढ़ता है, तो उसकी सीधी आँच भारतीय रसोई से लेकर देश के राजकोष तक पहुँचती है। मोदी सरकार के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती देश की आर्थिक रफ्तार को थामे रखने और घरेलू बाजार में तेल-गैस की कीमतों को नियंत्रण में रखने की है। अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का मानना है कि इस बार का संकट पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा जटिल है क्योंकि यह सीधे तौर पर दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्ग को प्रभावित कर रहा है।

भारत के लिए यह परीक्षा की घड़ी इसलिए भी है क्योंकि वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बदल रही हैं। जब मार्च के शुरुआती हफ्ते में तनाव बढ़ा, तो ब्रेंट क्रूड की कीमतें देखते ही देखते 120 डॉलर प्रति बैरल के पार चली गईं। अभी ये दाम कर हैं, लेकिन हॉर्मुज के बंद होने के बाद कीमते फिर से तेजी से बढ़ रही हैं। हालाँकि मोदी सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में अपनी ऊर्जा नीति में जो रणनीतिक बदलाव किए हैं, उनकी वजह से भारत इस झटके को झेलने में काफी हद तक सफल रहा है। सरकार ने न केवल तेल के आयात स्रोतों को बदला है, बल्कि देश के भीतर भी आपातकालीन स्थितियों से निपटने के लिए मजबूत इंतजाम किए हैं।

फिर भी चुनौती छोटी नहीं है क्योंकि कच्चे तेल के साथ-साथ एलएनजी और एलपीजी की आपूर्ति को बनाए रखना एक बेहद मुश्किल काम बन गया है। इस पूरे संकट के बीच भारतीय कूटनीति और आर्थिक प्रबंधन की असली परीक्षा होनी बाकी है।

स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज की नाकाबंदी और भारत का क्रूड-एलएनजी संकट

इस पूरे युद्ध का सबसे खतरनाक पहलू स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज यानी हॉर्मुज जलडमरूमध्य का आंशिक या पूर्ण रूप से बंद होना रहा है। दुनिया का लगभग 20 प्रतिशत कच्चा तेल और लिक्विफाइड नेचुरल गैस (एलएनजी) इसी संकरे रास्ते से होकर गुजरती है। भारत की बात करें तो हम अपनी जरूरत का लगभग 88 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से आयात करते हैं और इस आयात का एक बहुत बड़ा हिस्सा यानी करीब आधा भाग इसी रास्ते से होकर हमारे देश पहुँचता है।

इससे भी बड़ी चिंता एलपीजी को लेकर है, जिसका 60 से 65 प्रतिशत आयात इसी हॉर्मुज के रास्ते होता है। जैसे ही ईरान ने इस मार्ग पर प्रतिबंध लगाए या युद्ध के कारण यहाँ जहाजों की आवाजाही बाधित हुई, वैसे ही भारत के सामने ऊर्जा का एक बड़ा संकट खड़ा हो गया। कतर जैसे बड़े गैस उत्पादक देश ने भारत को होने वाली अपनी आपूर्ति पर अस्थाई रोक लगा दी, जिससे हमारी गैस पाइपलाइनों में दबाव कम होने का खतरा पैदा हो गया।

इस अप्रत्याशित संकट के बीच भारत को अपनी रणनीति में बहुत तेजी से बदलाव करना पड़ा।

एनर्जी डेटा पर नजर रखने वाली संस्था केपलर के रिसर्च गेट में छपे लेख के आँकड़ों के अनुसार, मार्च से मई के बीच जहाँ कतर से भारत का एलएनजी आयात घटकर महज शून्य दशमलव एक मिलियन टन रह गया, वहीं भारत ने अमेरिकी बाजार की तरफ रुख किया। इसी अवधि में अमेरिका भारत को एलएनजी सप्लाई करने वाला सबसे बड़ा देश बनकर उभरा और उसने करीब डेढ़ मिलियन टन गैस की आपूर्ति की।

इसके अलावा भारत ने ओमान, नाइजीरिया और अंगोला जैसे देशों से भी अतिरिक्त गैस के सौदे किए। कच्चे तेल के मोर्चे पर भी रूस से आने वाले तेल ने भारत के लिए एक बड़े सुरक्षा कवच का काम किया। रूस से मिलने वाले डिस्काउंटेड तेल की वजह से भारतीय रिफाइनरियों को लगातार कच्चा तेल मिलता रहा, जिससे देश के भीतर पेट्रोल और डीजल की भारी किल्लत होने से बच गई। हालाँकि ये बात सर्वविदित है कि यह केवल तात्कालिक राहत है और अगर यह नाकाबंदी लंबे समय तक खिंचती है, तो वैकल्पिक रास्तों से माल मँगाने का खर्च भारत के व्यापार घाटे को बहुत ज्यादा बढ़ा सकता है।

मोदी सरकार की संकट प्रबंधन रणनीति और आवश्यक वस्तु अधिनियम

अंतरराष्ट्रीय बाजार में मचे इस हाहाकार का सीधा असर भारत के आम नागरिकों पर न पड़े, इसके लिए मोदी सरकार ने घरेलू मोर्चे पर बेहद कड़े और अनुशासनबद्ध कदम उठाए हैं। वैश्विक स्तर पर तेल और गैस की कमी को देखते हुए केंद्र सरकार ने तुरंत हरकत में आते हुए आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 को लागू कर दिया।

इस कानून के तहत सरकार ने देश के भीतर उपलब्ध एलपीजी और प्राकृतिक गैस के वितरण को पूरी तरह से अपने नियंत्रण में ले लिया। सरकार की पहली प्राथमिकता देश के करोड़ों घरों की रसोइयों को बचाना था। इसलिए रणनीतिक तौर पर यह तय किया गया कि गैस की पहली आपूर्ति घरेलू एलपीजी सिलेंडरों और घरों में आने वाली पाइप्ड नेचुरल गैस यानी पीएनजी को की जाएगी।

सके बाद बची हुई गैस को सीएनजी यानी पब्लिक ट्रांसपोर्ट और सबसे महत्वपूर्ण रूप से देश के खाद कारखानों को दिया गया ताकि किसानों को यूरिया और अन्य खादों की कमी का सामना न करना पड़े। हालाँकि मौजूदा समय में भारत सरकार ने आंतरिक तौर पर लागू पाबंदियों को हटा लिया है, लेकिन युद्ध के फिर से छिड़ने से एक बार फिर ये समस्या खड़ी हो सकती है।

इस सख्त कदम का असर यह हुआ कि बड़े उद्योगों और निजी रिफाइनरियों के लिए गैस की आपूर्ति में थोड़ी कटौती जरूर हुई, लेकिन आम जनता को ईंधन के लिए लाइनों में नहीं लगना पड़ा। हालाँकि इस संकट के कारण घरेलू बाजार में एलपीजी सिलेंडर की कीमतों में कुछ बढ़ोतरी दर्ज की गई, जिसने आम मध्यमवर्गीय परिवारों के बजट पर थोड़ा दबाव जरूर डाला, लेकिन स्थिति को नियंत्रण से बाहर नहीं जाने दिया गया।

इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, इस वैश्विक तूफान के बावजूद भारत का घरेलू बाजार काफी मजबूत बना हुआ है। जून के महीने में देश के भीतर गाड़ियों की बिक्री में रिकॉर्ड बढ़ोतरी देखी गई, जो यह दर्शाती है कि आम जनता का भारतीय अर्थव्यवस्था और अपनी आय पर भरोसा डिगा नहीं है। उपभोक्ता टिकाऊ वस्तुओं यानी फ्रिज, एसी जैसी चीजों की माँग भी घरेलू बाजार में बहुत तेज रही, जिसने वैश्विक मंदी के असर को भारत के भीतर हावी नहीं होने दिया।

रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार का विस्तार और ओएनजीसी का बड़ा कदम

किसी भी देश के लिए युद्ध जैसी स्थिति में सबसे बड़ा सहारा उसका अपना जमा किया हुआ तेल भंडार होता है, जिसे स्ट्रेटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व कहा जाता है। भारत के पास इस समय लगभग 74 दिनों की खपत के बराबर कच्चे तेल और एलपीजी का आपातकालीन भंडार मौजूद है। लेकिन इस संकट ने यह साबित कर दिया कि भारत जैसे विशाल देश के लिए यह भंडार आने वाले समय में नाकाफी साबित हो सकता है।

इसी बात को ध्यान में रखते हुए मोदी सरकार ने देश के भीतर तेल भंडारण की क्षमता को युद्धस्तर पर बढ़ाने का फैसला किया है। अभी 9 जुलाई 2026 को देश की दिग्गज सरकारी तेल कंपनी ओएनजीसी ने घोषणा की कि वह मंगलुरु में भारत के मौजूदा रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार में एक दशमलव 7.5 मिलियन टन यानी करीब पौने दो करोड़ बैरल अतिरिक्त तेल भंडारण की क्षमता जोड़ने जा रही है। वहीं, ओएनजीसी लगातार भारतीय जल क्षेत्र में ड्रिंलिंग कर कच्चे तेल की खोज कर रही है, जिसमें उसे सफलता भी मिल रही है। अंडमान के इलाके में भारत को बड़ी सफलताएँ भी इसी मुश्किल दौर में मिली हैं।

यह कदम भारत की दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा के लिए बेहद मील का पत्थर साबित होने वाला है क्योंकि अभी तक इस तरह के भूमिगत गुफाओं वाले भंडारों का निर्माण केवल सरकार सीधे तौर पर करती थी, लेकिन अब ओएनजीसी जैसी कंपनियाँ इसमें अपनी पूँजी लगा रही हैं।

इसके साथ ही संयुक्त अरब अमीरात की सरकारी तेल कंपनी एडनॉक भी भारत में अपनी भंडारण क्षमता को दोगुना करके चार मिलियन टन करने की योजना पर काम कर रही है।

सरकार की कोशिश है कि भारत के पास कम से कम इतने दिनों का तेल और गैस रिजर्व होना चाहिए कि अगर खाड़ी देशों में दो-तीन महीने तक पूरी तरह से कामकाज ठप भी रहे, तो भी भारत के उद्योग और गाड़ियाँ बिना रुके चलती रहें। बुनियादी ढाँचे में किए जा रहे ये सुधार ही भविष्य में भारत को किसी भी वैश्विक भू-राजनीतिक झटके से पूरी तरह सुरक्षित बना पाएँगे।

क्या अमेरिका-ईरान की यह जंग सिर्फ 60 दिनों का दबाव बनाने का खेल है?

इस युद्ध के पीछे की कूटनीति को समझने वाले अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का एक धड़ा यह भी मान रहा है कि ईरान और अमेरिका के बीच चल रही यह सीमित जंग दरअसल कोई पूर्ण युद्ध नहीं, बल्कि एक-दूसरे पर दबाव बनाने की सोची-समझी रणनीति है। इस कूटनीतिक खेल का मकसद दोनों पक्षों को एक ऐसी स्थिति में लाना है जहां वे आगामी 60 दिनों के भीतर किसी बड़े और नए समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर हो जाएँ।

इतिहास गवाह है कि जब भी दो देश किसी समझौते की मेज पर बैठना चाहते हैं, तो उससे ठीक पहले वे अपनी सैन्य ताकत का प्रदर्शन करके अपनी शर्तों को मनवाने का प्रयास करते हैं। ईरान ने हॉर्मुज को आंशिक रूप से बंद करके यह दिखा दिया कि वह वैश्विक अर्थव्यवस्था की नस दबा सकता है, वहीं अमेरिका ने प्रतिबंधों और सैन्य तैनाती से ईरान की आर्थिक रीढ़ को निशाना बनाया है।

साउथ-ईस्ट एशिया पर बड़ा प्रभाव, वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी मंदी का साया

ईरान के इस वॉर जोन में बदलने का खामियाजा सिर्फ भारत को ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया और खासकर एशियाई देशों को भुगतना पड़ रहा है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने इस साल की वैश्विक विकास दर के अनुमान को घटाकर तीन प्रतिशत कर दिया है और इसके पीछे मुख्य वजह इसी युद्ध के कारण लगा ऊर्जा का बड़ा झटका है।

खाड़ी देशों से निकलने वाले तेल और गैस का लगभग 75 प्रतिशत हिस्सा एशिया के चार बड़े देशों चीन, भारत, जापान और दक्षिण कोरिया में आता है। इसलिए इस मार्ग में होने वाली किसी भी रुकावट का सबसे पहला और सबसे बुरा असर दक्षिण-पूर्वी और पूर्वी एशियाई देशों पर पड़ता है। वियतनाम, थाईलैंड, फिलीपींस और इंडोनेशिया जैसे देश, जो अपनी मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्री के लिए पूरी तरह से आयातित ईंधन पर निर्भर हैं, वहाँ कारखानों की लागत बहुत तेजी से बढ़ी है।

इन देशों की सरकारों के सामने संकट यह है कि वे अपने नागरिकों को महँगी दरों पर ईंधन नहीं दे सकते क्योंकि इससे घरेलू विद्रोह का खतरा बढ़ जाता है, और अगर वे सब्सिडी देते हैं तो उनका खजाना खाली होने लगता है। चीन ने हालाँकि अपने विशाल रणनीतिक भंडार (जो करीब चौदह सौ मिलियन बैरल का है) के दम पर खुद को इस संकट से कुछ हद तक बचा लिया है, लेकिन उसने भी अपने देश से रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात पर पूरी तरह रोक लगा दी है ताकि उसके अपने घरेलू बाजार में कोई किल्लत न हो।

चीन के इस कदम से दक्षिण-पूर्वी एशिया के उन छोटे देशों की मुश्किलें और बढ़ गई हैं जो चीनी रिफाइनरियों से पेट्रोल-डीजल खरीदते थे। इन परिस्थितियों ने पूरे क्षेत्र में एक ऐसी आर्थिक अनिश्चितता पैदा कर दी है जिससे बाहर निकलने में इन विकासशील देशों को लंबा समय लग सकता है।

पाकिस्तान की खोखली कूटनीति और आर्थिक बर्बादी का नया अध्याय

इस पूरे संकट में अगर किसी देश की हालत सबसे ज्यादा दयनीय और हास्यास्पद बनी हुई है, तो वह है हमारा पड़ोसी देश पाकिस्तान। कुछ समय पहले तक पाकिस्तान के हुक्मरान और राजनयिक अपनी पीठ थपथपा रहे थे कि उन्होंने अमेरिका की सरपरस्ती हासिल कर ली है और वे अमेरिकी प्रभाव का इस्तेमाल करके अपने लिए सस्ता तेल और वित्तीय मदद का रास्ता साफ कर चुके हैं।

पाकिस्तान में इस बात का ढिंढोरा पीटा जा रहा था कि उनकी ‘अमेरिकी चटाई’ वाली डिप्लोमेसी देश की बहुत बड़ी उपलब्धि है। लेकिन जैसे ही ईरान युद्ध की आग भड़की, पाकिस्तान के कूटनीतिक दावों की हवा निकल गई। पाकिस्तान की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि भारत या चीन की तरह उसके पास कोई रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार नहीं है जो संकट के दिनों में देश का पहिया चला सके।

वैश्विक बाजार में तेल की कीमतें बढ़ते ही पाकिस्तान का विदेशी मुद्रा भंडार लगभग खत्म होने की कगार पर पहुँच गया है। जो तेल उन्हें कुछ राहत दे रहा था, उसकी आपूर्ति बाधित होते ही वहाँ पेट्रोल-डीजल की भयंकर राशनिंग शुरू हो गई है। पाकिस्तान के भीतर महँगाई की दर आसमान छू रही है और बिजली ग्रिड पूरी तरह चरमरा गए हैं क्योंकि उनके पास बिजली बनाने के लिए तेल या गैस खरीदने के पैसे नहीं बचे हैं।

अटलांटिक काउंसिल के दक्षिण एशिया विशेषज्ञ माइकल कुगेलमैन का कहना है कि पाकिस्तान इस समय बेहद डरा हुआ है क्योंकि ईरान के साथ उसकी एक लंबी जमीनी सीमा लगती है। अगर यह युद्ध और भड़कता है, तो पाकिस्तान के भीतर न सिर्फ आर्थिक बल्कि सुरक्षा का भी एक ऐसा संकट पैदा हो जाएगा जिसे संभालना उसके बस की बात नहीं होगी। उनकी तथाकथित अमेरिकी डिप्लोमेसी इस समय उनके किसी काम नहीं आ रही है क्योंकि अमेरिका खुद इस युद्ध में सीधे तौर पर उलझा हुआ है।

कूटनीतिक स्वायत्तता और हरित ऊर्जा की ओर तेजी से बढ़े कदमों से संभल रहा भारत

इंस्टीट्यूट फॉर एनर्जी इकोनॉमिक्स एंड फाइनेंशियल एनालिसिस (IEEFA) की विशेषज्ञ विभूति गर्ग और पूर्वा जैन के अनुसार, इस पूरे संकट ने भारत को एक बहुत बड़ा सबक दिया है। भारत ने अपनी कूटनीतिक स्वायत्तता के दम पर रूस और अमेरिका दोनों से अपने संबंध संतुलित रखते हुए तात्कालिक तौर पर खुद को बचा जरूर लिया है, लेकिन यह संकट इस बात का सबसे बड़ा सबूत है कि जीवाश्म ईंधन पर अत्यधिक निर्भरता देश की संप्रभुता के लिए कभी भी खतरा बन सकती है।

विशेषज्ञों का कहना है कि मोदी सरकार को इस संकट को एक अवसर या उत्प्रेरक के रूप में देखना चाहिए और देश के भीतर स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण यानी क्लीन एनर्जी ट्रांजिशन की रफ्तार को दोगुना कर देना चाहिए।

भारत को सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, बैटरी स्टोरेज तकनीक और इलेक्ट्रिक वाहनों के घरेलू विनिर्माण को इतनी तेजी से बढ़ाना होगा कि खाड़ी देशों में होने वाले किसी भी धमाके की गूंज भारत के बाजारों में सुनाई न दे। सरकार ने इस दिशा में कदम बढ़ाए भी हैं और देश के भीतर रिन्यूएबल एनर्जी की क्षमता लगातार बढ़ रही है।

बहरहाल, कुल मिलाकर देखें तो ईरानी इलाके का फिर से वॉर जोन बनना भारत के लिए एक चेतावनी की तरह है कि दुनिया कभी भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं रहने वाली है। मोदी सरकार ने इस संकट के दौरान जो प्रशासनिक दृढ़ता, रणनीतिक दूरदर्शिता और त्वरित आर्थिक प्रबंधन दिखाया है, उसने देश को एक बड़ी आपदा से तो निकाल लिया है, लेकिन आत्मनिर्भरता की असली मंजिल अभी थोड़ी दूर है।

मेरठ में दलित छात्रा की हत्या के नाम पर क्यों खराब किया गया माहौल? SSP अविनाश पांडे के नेतृत्व में कैसे UP पुलिस ने अपराधियों का किया पर्दाफाश: समझें- ललिता हत्याकांड की आड़ में हो रही कैसी राजनीति

उत्तर प्रदेश में मेरठ के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) अविनाश पांडेय का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। इस वीडियो में अविनाश पांडेय सड़क पर इकट्ठा हुए दलितों को डाँटकर हटा रहे हैं और फिर पुलिस वैन में बंद एक दलित शख्स पर थप्पड़ बरसा रहे हैं। बताया गया कि ये लोग प्रदर्शनकारी थे, जो मई 2026 में ललिता गौतम की हत्या के विरोध में सड़क पर जमा हुए थे।

इस वीडियो को हथियार की तरह इस्तेमाल कर समाजवादी पार्टी (सपा), कॉन्ग्रेस जैसे विरोधी दलों से लेकर ‘एक्स’ पर समाज का उद्धार करने का ढोंग करने वाले वामपंथियों और लिबरलों ने भी उत्तर प्रदेश की पुलिस और सरकार को जमकर घेरा। हवा उड़ाई गई कि उत्तर प्रदेश में दलितों की आवाज दबाई जा रही है, ऐसे में चंद्रशेखर आजाद ‘रावण’ जैसे दलित नेता भी खुलकर विरोध में उतर गए।

लेकिन इस वीडियो के पीछे की कहानी क्या है? या SSP ने ऐसा बर्ताव क्यों किया? यह किसी ने जानने की कोशिश नहीं की है। उल्टा लोगों ने इसे सिर्फ ‘ब्राह्मण SSP का दलितों पर अत्याचार’ की तरह पेश किया। पर हम आपको हकीकत बताएँगे। बताएँगे कि SSP के इस रिएक्शन की वजह क्या रही और यह भी कि आखिर इन लोगों की माँगे क्या थीं और कैसे यह ‘प्रदर्शन’ एक सोची-समझी साजिश थी।

अखिलेश यादव से लेकर चंद्रशेखर आजाद ने की राजनीति, एक्स का समाज-सुधारक गैंग हुआ एक्टिव

इससे पहले वीडियो पर विपक्ष की राजनीति और वामपंथियों की ‘चिंता’ पर नजर डाल लेते हैं।

सबसे पहले उत्तर प्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष अखिलेश यादव ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए मेरठ SSP की कार्रवाई को निंदनीय बता दिया। इसी के साथ उन्होंने इस घटना के संदर्भ में सीधे सीएम योगी ने निशाना बनाते हुए कहा, “जब प्रदेश-प्रमुख ही सरेआम एक मृतक की माँ के साथ असंवेदनशील होने का उदाहरण प्रस्तुत करेंगे तो उनकी पुलिस से कोई उम्मीद करना बेमानी है। घोर निंदनीय।”

कॉन्ग्रेस ने भी इस वीडियो को शेयर करते हुए कॉन्ग्रेस ने बीजेपी की डबल इंजन सरकार में सुरक्षा पर सवाल उठाते हुए कहा, “मेरठ की दलित छात्रा ललिता गौतम की निर्मम हत्या ने फिर से भाजपा की डबल इंजन सरकार के महिला और दलित सुरक्षा के दावों की पोल खोल दी है। पीड़ित परिवार न्याय की गुहार लगा रहा है, लेकिन सरकार इंसाफ देने के बजाय आवाज उठाने वालों पर ही लाठी-थप्पड़ बरसा रही है।”

और जहाँ दलित के नाम पर सरकार को घेरने की बात हो तो आजाद समाज पार्टी के चंद्रशेखर आजाद का नाम तो सामने आना अनिवार्य है ही। चाहे चंद्रशेखर ने दलित युवती की हत्या के बाद परिजनों को संवेदनाएँ न दी हों, लेकिन जब दलित युवती के नाम पर सरकार और प्रशासन के खिलाफ बोलने की आई तो चंद्रशेखर आजाद आगे आ गए।

अब चंद्रशेखर को अपने ‘भाइयों’ की याद आ गई है और वीडियो रिलीज कर बीजेपी सरकार को धमकी दे रहे हैं- “मेरे लोग इसका जवाब वोट से देंगे और इतने धीरे से देंगे की ऐसी चोट लगेगी आपको कि चोट के निशान भी बहुत दूर से लगेंगे।” यही नहीं अब मामला तूल पकड़ने के बाद चंद्रशेखर आजाद मेरठ में ललिता गौतम के परिवार से मिलने भी रवाना हो चुके हैं।

लेकिन रास्ते में जब पुलिस अधिकारियों ने उनकी गाड़ी को रोका, तब जो धमकी चंद्रशेखर ने पुलिस को दी उसे लेकर कोई आपत्ति नहीं उठा रहा है। बल्कि चंद्रशेखर के फेसबुक पर पिछले घंटों में शेयर किए गए एक वीडियो में थ्री स्टार पुलिस अधिकारी हाथ जोड़ते दिख रहा है और चंद्रशेखर सीधा उनका नाम लेकर उन्हें उंगली दिखाकर धमका रहे हैं। इस वीडियो को चंद्रशेखर के समर्थक छाती चौड़ी कर शेयर कर रहे हैं और पुलिस को ‘कमजोर’ के रूप में पेश कर रहे हैं।

उधर, राष्ट्रीय जनता दल (RJD) की प्रवक्ता प्रियंका भारती ने कहा कि पीड़ित और न्याय माँगने वाले दोनों ही दलित समाज से हैं इसीलिए प्रशासन ने अन्याय किया। भारती ने कहा, “जब तक दलित, पिछड़े और आदिवासियों को उनकी आबादी के हिसाब से भागीदारी नहीं होगी, उनका प्रतिनिधित्व नहीं होगा, तब तक ऐसे SSP आते रहेंगे और वंचित दोहरे अन्याय का शिकार होते रहेंगे!”

मेरठ SSP की कार्रवाई पर सिर्फ राजनीति ही नहीं हुई, बल्कि ‘एक्स’ का समाज-सुधारक गैंग भी एक्टिव हो गया। एक ओर यह गैंग खुलेआम जातिवाद फैलाने लगा कि ब्राह्मण को दलित पर हाथ नहीं उठाना चाहिए था, वहीं कुछ लोगों ने ललिता गौतम केस को बिना जाने पुलिस के दमनकारी रवैये और लोकतंत्र में आवाज उठाने पर रोक को लेकर रोना रोया।

इसमें कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के मुख्य प्रवक्ता सौरव दास ने भी टिप्पणी की और वीडियो का विश्लेषण करते हुए मेरठ SSP अविनाश पांडेय को ‘पागल’ बता डाला और उन्हें सस्पेंड करने की माँग की। सौरव ने कहा, “जैसा कि इस वीडियो से साफ है, IPS अफसर अविनाश पांडेय मानसिक रूप से बीमार हैं। उन्हें मदद की जरूरत है। इलाज चलने तक उन्हें सस्पेंड कर देना चाहिए। वरना, वे समाज और कानून-व्यवस्था के लिए खतरा बने रहेंगे।”

वहीं एक्स पर ‘समाजवादी’ लक्ष्मण यादव लिखते हैं, “वर्दी जनता की सुरक्षा और न्याय के लिए मिली है, उसकी आवाज़ कुचलने के लिए नहीं। योगी सरकार बताए – न्याय माँगने वालों पर डंडा क्यों?”

आखिर इतना हौआ बन क्यों रहा है? क्या SSP को सुरक्षा व्यवस्था संभालने की इजाजत नहीं है या उनके गुस्से भरे अंदाज से लोगों को परेशानी है? और जातिवाद की राजनीति करने वाले भी पीछे नहीं हटे। इसे जानने के लिए सबसे जरूरी है पूरा मामला जानना और उससे भी जरूरी है दूसरा पक्ष यानी पुलिस का पक्ष सुनना।

क्या है ललिता गौतम की हत्या का पूरा मामला?

सबसे पहले जानते हैं कि आखिर जिस मामले को लेकर इतना हौआ बन रहा है, वह आखिर है क्या? तो बता दें कि यह मामला दो महीने पुराना है। जब 15 मई 2026 को मेरठ के टीपी नगर थाना क्षेत्र के गंगा एन्क्लेव की रहने वाली बीए फाइनल ईयर की छात्रा ललिता गौतम कॉलेज में परीक्षा देने के लिए घर से निकली थी, लेकिन देर शाम तक वापस नहीं लौटी।

परिजनों ने अपने स्तर पर खोजबीन करने के बाद अगले दिन 16 मई 2026 को टीपी नगर थाने में उसकी गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई। पुलिस ने तलाश की तो मेरठ के ही रोहटा थाना क्षेत्र के उपसिया गाँव के पास एक गन्ने के खेत में ललिता का शव अर्धनग्न और क्षत-विक्षत हालत में बरामद हुआ।

अब पुलिस ने हत्या के पीछे की वजह और आरोपितों की खोज के लिए इलाके के सीसीटीवी खंगाले, जिसें ललिता को आखिरी बार अंकुश नाम के युवक के साथ बाइक पर जाते देखा गया। पुलिस ने अंकुश को हिरासत में लेकर पूछताछ की, जिसके बाद पुलिस ने केस का खुलासा कर दिया।

पुलिस ने पुख्ता सबूतों और पूछताछ के आधार पर बताया कि अंकुश और ललिता के बीच पिछले 3 साल से प्रेम संबंध थे। पुलिस के मुताबिक, घटना वाले दिन भी दोनों साथ ही थे। हत्या के पीछे की वजह बताते हुए पुलिस ने कहा कि अंकुश ने ललिता के मोबाइल में दूसरे लड़के के साथ चैट और फोटो देखे थे, जिसके बाद दोनों के बीच खूब झगड़ा भी हुआ था। इसी लड़ाई पर अंकुश ने गुस्से में आकर ललिता की गला घोंटकर हत्या कर दी और शव को खेत में फेंक दिया।

पुलिस ने अंकुश को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। इसके अलावा सबूत मिटाने में मदद करने के आरोप में निशांत और अंकित नाम के दो और युवकों को गिरफ्तार किया गया। यहाँ तक मामले में पुलिस की कार्रवाई से ललिता गौतम का परिवार संतुष्ट था।

परिवार को भड़काने और प्रदर्शन की साजिश

लेकिन पुलिस का कहना है कि कुछ ‘अराजक तत्वों’, जिनमें अमरोहा के दिग्विजय सिंह और रवि गौतम, ने मृतका के परिजनों को भड़काया। इसके बाद परिवार माँग करने लगा कि ललिता गौतम की हत्या की दूसरे पहलुओं से भी जाँच होनी चाहिए। मृतका के पिता ने तर्क दिया कि कोई भी अकेला व्यक्ति इतनी बड़ी वारदात को अंजाम नहीं दे सकता, इसमें कोई और लोग शामिल हैं जिन्हें पुलिस बचा रही है।

अब इन्हीं आरोपों को लेकर 08 जुलाई 2026 को मृतका के परिजनों और भारी संख्या में भीड़ कलेक्ट्रेट के बाहर सड़क पर जमा हो गई। पुलिस ने कहा कि मृतका के परिजनों को ज्ञापन सौंपने के बहाने भीड़ जुटाई गई थी और उस भीड़ ने सड़क को जाम कर दिया। पुलिस और प्रशासन के समझाने के बावजूद प्रदर्शनकारी हटने को राजी नहीं हुए और उल्टा अराजकता फैलानी शुरू कर दी। इस पर SSP अविनाश पांडेय पुलिस फोर्स के साथ मौके पर पहुँचे और भीड़ को खदेड़ दिया।

पुलिस के इसी लाठीचार्ज की वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुईं और सुरक्षा व्यवस्था संभालने की इस कार्रवाई को ‘अत्याचार’ का नाम दिया गया। बाद में SSP अविनाश पांडेय ने इस पूरे प्रदर्शन की जाँच कर खुलासा किया कि इस हंगामे के पीछे न्याय की माँग नहीं थी, बल्कि माहौल बिगाड़ने की साजिश थी। पुलिस ने साजिशकर्ताओं के नामों का भी खुलासा कर दिया है।

पुलिस वैन में मेरठ SSP ने शख्स पर क्यों बरसाए थप्पड़ और वह कौन था?

अब प्रदर्शन में पुलिस के लाठीचार्ज की वीडियो तो पूरे सोशल मीडिया पर वायरल हो गई और प्रोपेगेंडा गढ़ने वाले लोगों ने इससे अपना कंटेन्ट भी बना लिया। इन्हीं वायरल वीडियो में एक वीडियो मेरठ SSP अविनाश पांडेय की पुलिस वैन में घुसकर एक शख्स पर थप्पड़ बरसाने की भी थी। इस वीडियो की भी खूब आलोचना की गई। लेकिन उस वीडियो पर किसी ने बात नहीं की जिसमें वही शख्स पुलिस वैन में फाँसी का फंदा बनाकर पुलिस को आत्महत्या करने की धमकी दे रहा है।

वीडियो में दिख रहा शख्स रवि गौतम है। वह पुलिसवालों को धमकी दे रहा है, “मैं वकील हूँ। मैं मरूँगा।” इसी धमकी के बाद पुलिसवालों ने बल प्रयोग का इस्तेमाल किया था। SSP अविनाश पांडेय ने बताया कि पुलिस वैन में रवि गौतम के फंदा लगाने के बाद स्थिति को संभालने के लिए बल प्रयोग किया गया। तभी उन्होंने तीखे तेवर में प्रदर्शनकारियों को चेतावनी देते हुए कहा था कि सड़क किसी के पिताजी की नहीं है और विरोध का तरीका बिल्कुल गलत है।

बात करें रवि गौतम की, तो यह नोएडा का रहने वाला है, जो अपनी राजनीति चमकाने मेरठ तक पहुँच गया। यह ‘युवा शक्ति दल’ नाम के संगठन का राष्ट्रीय अध्यक्ष है। यह भी बताया जा रहा है कि रवि गौतम पहले आजाद समाज पार्टी के चंद्रशेखर आजाद का साथी हुआ करता था, लेकिन बाद में दोनों के रास्ते अलग हो गए। अब दोनों अलग-अलग पार्टी बनाकर दलितों के नाम पर राजनीति करते हैं। यही वजह है कि हंगामा होने के बाद मेरठ पहुँचे चंद्रशेखर आजाद ने मृतका के परिवार से मिलने की तो इच्छा जताई लेकिन रवि गौतम की गिरफ्तारी पर कुछ नहीं बोले।

वहीं SSP अविनाश पांडेय ने भी रवि गौतम की आपराधिक कुंडली सबके सामने लाकर रख दी है। उन्होंने बताया कि रवि गौतम के खिलाफ गाजियाबाद में तीन और गौतमबुद्ध नगर में कुल चार मुकदमे दर्ज हैं।

मेरठ पुलिस ने प्रदर्शन में हंगामे को बताया ‘सोची-समझी साजिश’

08 जुलाई 2026 को कलेक्ट्रेट पर हुए हंगामे में मेरठ पुलिस ने रवि गौतम समेत 7 लोगों को गिरफ्तार किया था। इनमें गढ़मुक्तेश्वर का अंकित कुमार, नोएडा का अरविंद कुमार, मेरठ का ऋतिक कुमार, मुरादाबाद का नवनीत कुमार, मेरठ का हिमांशु सिद्धार्थ और परीक्षितगढ़ का लवि उर्फ शवि शामिल हैं।

इसी के साथ पुलिस ने 13 नामजद समेत 50 लोगों के खिलाफ भी मुकदमा दर्ज किया था। नामजद आरोपितों में रवि गौतम, सुशील गौतम, हिमांशु सिसोदिया, सागर लिसाड़ी, लवी प्रधान, बिजेंद्र गौतम, रितिक जाटव, मोहित जाटव, हेमंत प्रधान, संजय, विजेंद्र सूद, दिग्विजय भाटी और अजय कुमार शामिल हैं।

वहीं SSP अविनाश पांडेय ने हंगामे की पुलिस, LIU और अन्य एजेंसियों से विस्तृत जाँच भी करवाई। जाँच में मिले ऑडियो, वीडियो, सीसीटवी फुटेज और सोशल मीडिया क्लिप के आधार पर पुलिस के हाथ कई सुराग लगे। पुलिस ने बताया कि कुछ अराजक तत्व भीड़ को लगातार उकसाने और प्रदर्शन को उग्र बनाने की रणनीति पर काम कर रहे थे।

पुलिस ने साजिशकर्ताओं में रवि गौतम और दिग्विजय भाटी का नाम लिया। दिग्विजय भाटी अमरोहा का रहने वाला है, जिसके खिलाफ SC/ST एक्ट समेत 9 आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं। SSP अविनाश पांडेय ने बताया कि दिग्विजय भाटी अमरोहा से जिला बदर है।

मेरठ SSP अविनाश पांडेय की आलोचना नहीं, तारीफ होनी चाहिए

तो अब समझ आ गया होगा कि मेरठ SSP अविनाश पांडेय ने प्रदर्शनकारियों पर तीखे तेवर क्यों अपनाए और पुलिस वैन में घुसकर थप्पड़ क्यों बरसाए। रवि गौतम ने खुदकुशी करने का ढोंग कर प्रदर्शन को उग्र बनाने की कोशिश की, लेकिन मेरठ पुलिस ने तुरंत कार्रवाई करते हुए उसे रोक दिया। अगर ऐसा नहीं होता, तो इस प्रदर्शन का अंजाम बहुत बुरा हो सकता था। ठीक वैसा ही, जैसा इसकी साजिश रची गई थी। लेकिन मेरठ पुलिस की सजगता और सक्रियता ने मेरठ की कानून-व्यवस्था को संभाले रखा।

सोशल मीडिया पर मेरठ SSP अविनाश पांडेय को कोसते और उनके गुस्से की आलोचना करते हुए आपको कई लोग मिल जाएँगे, लेकिन उनकी अगुवाई में मेरठ की सुरक्षा व्यवस्था की तारीफ करते आपको शायद ही कोई मिलेगा। उन्होंने पूरी जिम्मेदारी के साथ अपना काम किया, प्रदर्शन के पीछे छिपे अराजक तत्वों की पहचान की और उन्हें उनकी सही जगह, यानी जेल, भेज दिया। ऐसे में अविनाश पांडेय की तारीफ होनी भी चाहिए।

कुल मिलाकर, यह पूरा प्रकरण प्रदर्शन के नाम पर राजनीति चमकाने वाले नेताओं का उदाहरण था और उदाहरण उत्तर प्रदेश की सुदृढ़ सुरक्षा व्यवस्था का भी। प्रदर्शन का उद्देश्य अपनी माँगें रखना होता है, न कि लोगों को भड़काकर सड़कें जाम करना और न ही खुदकुशी करने का ढोंग कर पुलिस पर दबाव बनाना। ये सभी चीजें किसी भी प्रदर्शन को हिंसा में तब्दील कर सकती हैं। मेरठ पुलिस ने समय रहते इसे रोक दिया, क्योंकि पहले भी देखा गया है कि दिल्ली दंगे हों या किसान आंदोलन, हर जगह इसी तरह के पैतरों का इस्तेमाल कर हिंसा भड़काने की कोशिश की गई थी।

‘बस नाम रहेगा अल्लाह का…’ CJP के प्रोटेस्ट में वामपंथन नंदिता नारायण ने गाई फैज की ‘हम देखेंगे’, क्रांति को रोमांटिसाइज करने वाली इस नज्म का असल मकसद ‘गजवा-ए-हिंद’

NEET के पेपर लीक को लेकर जंतर-मंतर पर जमीन घेरने वाली कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का प्रदर्शन अब असली रंग दिखाने लगा है। हाल में वहाँ डीयू की नंदिता नारायण ने माइक लेकर मंच से पाकिस्तानी शायर फैज अहमद फैज की नज्म ‘हम देखेंगे’ को गाया और ये समझाते हुए दिखीं कि दक्षिणपंथियों ने कैसे ‘सिर्फ नाम रहेगा अल्लाह का’ को गलत समझ लिया है जबकि हकीकत तो ये है अल्लाह हम सब में है।

ये तर्क बिलकुल वही था जो वामपंथी, हिंदुओं का ब्रेनवाश करने से पहले उन्हें देते हैं। नंदिता नारायण ने मंच से खड़े होकर इस नज्म को गाने ने साफ कर दिया कि CJP का छात्र कल्याण वाला मुखौटा उतर चुका है और मकसद अब ‘गजवा-ए-हिंद’ का सपना देखने वालों को मुख्यधारा में लाने का है। इस बात को सामान्य बनाने का है कि अल्लाह ही है जो हम सब के अंदर है और बुत उठवाना सामान्य बात है।

फैज अहमद फैज की नज्म ‘हम देखेंगे’ को भारत में अक्सर ‘क्रांति’, ‘प्रतिरोध’ और ‘लोकतंत्र बचाने’ की भाषा में पेश किया जाता है। लेकिन इस नज्म को लेकर विवाद सिर्फ इतना नहीं है कि यह सत्ता-विरोधी कविता है। सवाल यह है कि जब किसी भी राजनीतिक प्रदर्शन, छात्र आंदोलन या नागरिकता कानून विरोध तक में बात बार-बार ‘हम देखेंगे’ तक पहुँचा दी जाती है तो उसके पीछे सिर्फ कला और कविता है या एक खास वैचारिक एजेंडा भी काम करता है।

यह सवाल इसलिए गंभीर है क्योंकि इस नज्म की सबसे विवादित पंक्तियाँ ‘सब बुत उठवाए जाएँगे’ और ‘बस नाम रहेगा अल्लाह का’ किसी सामान्य लोकतांत्रिक विरोध की भाषा नहीं लगतीं बल्कि इस्लामी प्रतीकों और गजवा-ए-हिंद की कल्पना से भरी हुई हैं। Rekhta पर उपलब्ध नज्म में साफ लिखा है ‘जब अर्द-ए-खुदा के काबे से, सब बुत उठवाए जाएँगे’ और आगे ‘बस नाम रहेगा अल्लाह का’ आता है।

फोटो साभार: Rekhta

भारत जैसे देश में जहाँ हिंदू परंपरा में मूर्ति-पूजा आस्था का केंद्र है, वहाँ ‘सब बुत उठवाए जाएँगे’ और ‘बस नाम रहेगा अल्लाह का’ को केवल लोकतांत्रिक विरोध की भाषा बताना असल में भोला बनने वाली बात है। ऐसा लगता है कि इसे गाने वाला हर शख्स एक खास प्रोपेगेंडा के साथ काम कर रहा है। इस्लामी, वामपंथी-लिबरल मंच इस्लामी प्रतीकों वाली इस नज्म को बार-बार विरोध का प्रतीक बनाकर एक खास मानसिक जमीन तैयार करते हैं।

‘व-यब्का-वज्ह-ओ-रब्बिक’: सैन्य शासन के खिलाफ नहीं, इस्लामी क्रांति से प्रेरित

इस नज्म की पृष्ठभूमि भी विवाद को और गहरा करती है। आम तौर पर कहा जाता है कि फैज ने इसे पाकिस्तान के सैन्य तानाशाह जनरल जिया-उल-हक के खिलाफ लिखा था लेकिन पाकिस्तानी अखबार ‘डॉन’ में रऊफ पारेख ने लिखा कि यह आम धारणा गलत है।

उनके मुताबिक, फैज जिया के विरोधी जरूर थे और नज्म जिया के दौर में लिखी गई लेकिन यह मूल रूप से ईरानी क्रांति से प्रेरित थी और फैज ने इसमें उस जनता को सलाम किया था जिसने व्यवस्था को पलट दिया था। डॉन में यह भी लिखा है कि नज्म का वास्तविक शीर्षक ‘हम देखेंगे’ नहीं बल्कि कुरान की सूरह रहमान की आयत से लिया गया ‘व-यब्का-वज्ह-ओ-रब्बिक’ है।

यही बात इस पूरी बहस को और गंभीर बना देती है। अगर यह नज्म ईरान की इस्लामी क्रांति से प्रेरित थी तो फिर इसे भारत में हर विरोध-प्रदर्शन का मासूम लोकतांत्रिक गीत बताना साफ तौर पर आधा सच परोसना है।

ईरान की क्रांति कोई सामान्य जनांदोलन नहीं थी। उसके बाद वहाँ लोकतंत्र नहीं बल्कि इस्लामी शासन व्यवस्था कायम हुई। इसलिए जब उसी पृष्ठभूमि से निकली पंक्तियाँ भारत के विश्वविद्यालयों, सड़कों और प्रदर्शन स्थलों पर नारे की तरह गूँजती हैं तो यह सवाल और गंभीर हो जाता है कि इसका मकसद क्या है? तब यह केवल अन्याय के खिलाफ आवाज नहीं नजर आती बल्कि गजवा-ए-हिंद स्थापित करने का एक प्लान लगती है।

CAA से लेकर शरजील इमाम तक: फैज की ‘इस्लामिक क्रांति’ की गूँज

CAA विरोध प्रदर्शनों में इस नज्म को सबसे ज्यादा राजनीतिक तौर पर इस्तेमाल किया गया। 2019-20 में जब देशभर में नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ आंदोलन चल रहे थे, तब ‘हम देखेंगे’ को मंचों, नारों, पोस्टरों और गीतों में बदला गया। जामिया मिल्लिया इस्लामिया से लेकर शाहीन बाग तक, JNU से लेकर IIT कानपुर तक इस नज्म को बार-बार गाया गया। इसे आंदोलन की आवाज बताया गया जबकि इसके शब्दों में साफ-साफ दिखता है कि यह इस्लामी सत्ता के लिए राह बनाने की कोशिश है। जिस आंदोलन को नागरिकता और संविधान की भाषा में बेचा जा रहा था, उसके केंद्र में एक ऐसी नज्म रखी गई जो ‘गजवा-ए-हिंद’ के विचार से भरी हुई है।

इन कार्यक्रमों में फैज की इस नज्म को गाने वाले लोग यह मनगढ़ंत दावा करते हैं कि भई फैज तो वामपंथी थे, वो तो अल्लाह में नहीं मानते थे तो यह इस्लामी शासन की प्रतीक कैसे हो सकती है? वामपंथियों के पोस्ट बॉय शरजील इमाम से जब फैज को समझने की कोशिश करते हैं तो यह साफ नजर आता है कि उसने फैज को केवल वामपंथी या सेक्युलर कवि मानने से इनकार किया था। उसने साफ लिखा था कि फैज की कविता इस्लामी प्रतीकों और मुस्लिम क्रांतिकारी विचार से भरी हुई है।

2017 में Sabrang India पर शरजील इमाम और साकिब सलीम ने ‘Faiz Ahmad Faiz and the de-Islamisation of a Muslim revolutionary’ शीर्षक से लेख लिखा। इस लेख में उन्होंने कहा कि वामपंथी हलकों ने फैज को कम्युनिस्ट कवि के रूप में पेश किया और उनकी इस्लामी पहचान को या तो अप्रासंगिक या संयोग बताया। शरजील और सलीम ने ‘हम देखेंगे’ की पंक्तियों को कुरानिक प्रतीकों से जोड़ते हुए लिखा कि ‘लौह-ए-अजल’, कयामत, काबा, बुतों का हटना और ‘बस नाम रहेगा अल्लाह का’ जैसे प्रतीक इस्लामी विचार से आते हैं।

इसी लेख में शरजील-सलीम लिखते हैं कि फैज ने खुद को मुस्लिम कवि घोषित किया था। इस लेख में लिखा गया है, “फैज के साथी मेजर इशाक बताते हैं कि जब वे दोनों एक साथ जेल में थे, तो फैज ने हैदराबाद जेल में कैदियों को कुरान और हदीस पढ़ाया था। फैज खुद बताते हैं कि एक कर्नल ने उनसे स्पष्ट रूप से पूछा था कि जब वे नास्तिक हैं तो कुरान क्यों पढ़ा रहे हैं। जब फैज ने स्पष्ट किया कि वे मुसलमान हैं।” यानी फैज के सेक्युलर होने की जो घुट्टी पिलाई जाती है, वो बस आँखों में धूल झोंकने की एक कोशिश है।

सेक्युलर क्रांति का नारा नहीं, इस्लामिक प्रभुत्व की घोषणा है ‘हम देखेंगे’

लेफ्ट-लिबरल जमात का यही खेल है। वे सीधे इस्लामी राजनीतिक नारे नहीं लगाते बल्कि उन्हें कविता, कला, प्रतिरोध और संस्कृति की भाषा में पैक कर देते हैं। ‘हम देखेंगे’ इसी पैकेजिंग का सफल उदाहरण है। यह नज्म मंच पर क्रांति लगती है, पोस्टर पर कला लगती है, विश्वविद्यालय में प्रतिरोध लगती है लेकिन इसकी जड़ में इस्लामी गजवा-ए-हिंद की कल्पना है, जो हर तरफ बस इस्लामी शासन चाहती है।

यह इस्लामी सत्ता की कल्पना या यूँ कहें कि चाहत से भरी नज्म है। इसका बार-बार भारतीय विरोध प्रदर्शनों में इस्तेमाल इस्लामी प्रतीकों को सामान्य बनाने की कोशिश है। ‘सिर्फ नाम रहेगा अल्लाह का’ किसी सेक्युलर क्रांति का नारा नहीं हो सकता। यह इस्लामी प्रभुत्व की घोषणा है। इसका राजनीतिक इस्तेमाल साफ बताता है कि ‘हम देखेंगे’ भारत में सांस्कृतिक प्रतिरोध नहीं बल्कि इस्लामी राजनीतिक जमीन तैयार करने वाला वैचारिक हथियार बन चुकी है।

कौन हैं CJP के प्रदर्शन में ‘हम देखेंगे’ पढ़ने वाली नंदिता नारायण?

इस सब उदाहरणों से स्पष्ट है ना कि तो फैज कोई बहुत सेकुलर आदमी हैं और ना ही यह नज्म कोई सत्ता विरोधी क्रांति का प्रतीक है फिर भी नंदिता नारायण जैसे लोग इसे अपने मन से क्रांति का प्रतीक बनाकर पेश करते हैं। नंदिता ने CJP के प्रोटेस्ट में ना केवल यह नज्म पढ़ी बल्कि इस बात के लिए भी दक्षिणपंथी लोगों को जिम्मेदार बताया कि वे इससे दुखी हो जाते हैं।

नंदिता नारायण CJP के प्रोटेस्ट में जब यह नज्म गा रही थीं तो अल्लाह को अपनी तरह से परिभाषा कर रही थीं। ‘बस नाम रहेगा अल्लाह का’ गाते हुए उन्होंने कहा कि इससे ही दक्षिणपंथी लोगों को दिक्कत होती है और इससे भी एक कदम आगे बढ़कर उन्होंने कहा, “अल्लाह सर्वोच्च ‘वेदांत’ है, अल्लाह का मतलब वो शक्ति जो हम सबमें है।”

नंदिता नारायण दिल्ली विश्वविद्यालय की उन चर्चित शिक्षक-कार्यकर्ताओं में रही हैं जिनके लिए कक्षा से अधिक महत्वपूर्ण अक्सर आंदोलन, धरना, प्रशासन-विरोध और वामपंथी राजनीति दिखाई दी। सेंट स्टीफेंस कॉलेज में 42 वर्षों तक गणित पढ़ाने वाली नंदिता नारायण ने अपने लंबे अकादमिक करियर के समानांतर दिल्ली विश्वविद्यालय की शिक्षक राजनीति में खुद को एक मजबूत वामपंथी चेहरे के तौर पर तैयार किया है। DUTA, FEDCUTA और Democratic Teachers Front जैसे संगठनों से जुड़कर उन्होंने खुद को शिक्षक नेता से अधिक एक वैचारिक कार्यकर्ता के रूप में स्थापित किया।

नंदिता नारायण का वैचारिक झुकाव कभी छिपा हुआ नहीं रहा। लोकतंत्र, सेकुलरिज्म, सार्वजनिक शिक्षा और सामाजिक न्याय जैसे आकर्षक शब्दों की आड़ में उनकी राजनीति लगातार वामपंथी संगठनों और सरकार-विरोधी मंचों के साथ खड़ी रही है। फीस वृद्धि, स्वायत्तता, नई शिक्षा नीति, प्रवेश परीक्षा और प्रशासनिक बदलाव हर मुद्दे को नियो-लिबरल हमला बताकर आंदोलन खड़ा करना उनकी सक्रियता का स्थायी तरीका रहा।

नंदिता नारायण की सक्रियता लंबे समय तक विवादों से घिरी रही। दिल्ली विश्वविद्यालय और सेंट स्टीफेंस कॉलेज प्रशासन की ओर से उनके आचरण, अन्य कॉलेजों के मामलों में दखल, कथित अपमानजनक टिप्पणियों और प्रशासनिक अधिकारियों के खिलाफ सार्वजनिक अभियान को लेकर शिकायतें सामने आईं। उनके खिलाफ तथ्य-जाँच समितियाँ गठित की गईं और कई मामलों में विवाद अदालत तक पहुँचा। नंदिता नारायण और उनके समर्थकों ने इसे प्रताड़ना और असहमति दबाने की कोशिश बताते रहे हैं।

रिटायरमेंट के बाद भी उनका राजनीतिक अभियान समाप्त नहीं हुआ। वे भारत के धर्मनिरपेक्ष बदलाव के लिए लोकतांत्रिक जन-संपर्क (Democratic Outreach for Secular Transformation of India) और शिक्षा आंदोलन के लिए संयुक्त मंच (Joint Forum for Movement on Education) जैसी पहलों से जुड़ी रहीं। वर्ष 2026 में कॉकरोच जनता पार्टी के जंतर-मंतर प्रदर्शन में उनकी मौजूदगी ने साफ कर दिया कि उनका उद्देश्य केवल शिक्षक अधिकारों तक सीमित नहीं है।

BSNL ने लॉन्च किया ₹1.34 लाख का सैटेलाइट फोन, बिना मोबाइल नेटवर्क के भी होगी कॉल: जानें- क्या हैं इसकी खूबियाँ और क्या इसे हर कोई खरीद सकता है?

कल्पना कीजिए कि आप किसी ऊँचे पहाड़, घने जंगल, समुद्र के बीच या ऐसी जगह पर हैं, जहाँ मोबाइल नेटवर्क का नामोनिशान तक नहीं है। ऐसे में अगर किसी से संपर्क करना हो या अचानक कोई आपात स्थिति आ जाए तो क्या होगा? इसी समस्या का समाधान लेकर सरकारी टेलीकॉम कंपनी BSNL ने भारत में अपना नया सैटेलाइट फोन लॉन्च किया है।

यह फोन सामान्य स्मार्टफोन की तरह मोबाइल टावर पर निर्भर नहीं रहता, बल्कि सीधे सैटेलाइट के जरिए काम करता है। इसकी कीमत 1,34,166 रुपए (टैक्स सहित) रखी गई है और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसे कोई भी व्यक्ति सीधे खरीदकर इस्तेमाल नहीं कर सकता। बल्कि इसके लिए भी कुछ शर्तें हैं।

क्या है BSNL का नया सैटेलाइट फोन?

BSNL का यह नया फोन खास तौर पर उन लोगों और संस्थाओं के लिए तैयार किया गया है, जिन्हें ऐसे इलाकों में काम करना पड़ता है जहाँ मोबाइल नेटवर्क नहीं होता। यह डिवाइस ग्लोबल सैटेलाइट कम्युनिकेशन कंपनी इनमारसैट की मदद से बनाया गया है।

जब कोई यूजर इस फोन से कॉल करता है तो सिग्नल पहले सीधे सैटेलाइट तक पहुँचता है। इसके बाद सैटेलाइट उस सिग्नल को ग्राउंड स्टेशन के जरिए टेलीकॉम नेटवर्क तक भेजता है। यही वजह है कि यह फोन बिना मोबाइल टावर के भी काम करता है।

आखिर यह फोन किन लोगों के लिए है?

BSNL का यह सैटेलाइट फोन आम स्मार्टफोन यूजर्स के लिए नहीं बनाया गया है। इसका इस्तेमाल मुख्य रूप से उन क्षेत्रों में किया जाएगा, जहाँ सामान्य मोबाइल नेटवर्क मौजूद नहीं होता।

यह फोन रक्षा सेवाओं, समुद्री क्षेत्र में काम करने वालों, आपदा राहत टीमों, खनन परियोजनाओं, दूर-दराज के इलाकों में काम करने वाली कंपनियों, तीर्थयात्रियों और एडवेंचर ट्रैवल करने वालों के लिए काफी उपयोगी माना जा रहा है। प्राकृतिक आपदाओं जैसे बाढ़, भूकंप या चक्रवात के दौरान जब मोबाइल टावर बंद हो जाते हैं, तब भी यह फोन संपर्क बनाए रखने में मदद कर सकता है।

खरीदने से पहले जान लें सबसे जरूरी नियम

अगर आप सोच रहे हैं कि इसे किसी मोबाइल शॉप या ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से खरीद सकते हैं, तो ऐसा संभव नहीं है। भारत में सैटेलाइट फोन को लेकर सुरक्षा कारणों से कड़े नियम बनाए गए हैं।

कोई भी व्यक्ति या संस्था इस फोन को तभी खरीद या इस्तेमाल कर सकती है, जब उसे दूरसंचार विभाग (DoT) से अनुमति या ऑथराइजेशन मिल जाए। बिना सरकारी मंजूरी के सैटेलाइट फोन रखना या उसका इस्तेमाल करना कानूनी कार्रवाई का कारण बन सकता है। यही वजह है कि यह डिवाइस आम स्मार्टफोन की तरह खुले बाजार में नहीं मिलता है।

फोन की खासियतें क्या हैं?

BSNL ने इस सैटेलाइट फोन को कठिन परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए डिजाइन किया है। इसमें मजबूत और टिकाऊ बॉडी दी गई है, जिससे यह धूल, पानी और खराब मौसम में भी बेहतर तरीके से काम कर सके।

फोन में लंबी बैटरी दी गई है, जिससे ऐसे इलाकों में भी लंबे समय तक इस्तेमाल किया जा सकता है, जहाँ बिजली की सुविधा नहीं होती। इसके अलावा इसमें SOS यानी इमरजेंसी अलर्ट फीचर भी दिया गया है, जिससे संकट की स्थिति में तुरंत मदद के लिए सिग्नल भेजा जा सकता है। साफ आवाज में वॉयस कॉलिंग भी इसकी प्रमुख विशेषताओं में शामिल है।

कीमत कितनी है और कौन-कौन से प्लान मिलेंगे?

BSNL ने इस सैटेलाइट फोन की कीमत 1,34,166 रुपए (टैक्स के साथ) तय की है। कंपनी के मुताबिक अधिक जानकारी के लिए ग्राहक अपने नजदीकी BSNL कार्यालय से संपर्क कर सकते हैं या दिए गए हेल्पलाइन नंबर (+91 94651 01323) पर जानकारी मिल सकती हैं।

फोन के साथ सरकारी और कमर्शियल दोनों तरह के यूजर्स के लिए अलग-अलग पोस्टपेड और प्रीपेड प्लान भी उपलब्ध हैं। पोस्टपेड प्लान 3500 रुपए प्रति माह से शुरू होते हैं, जबकि कमर्शियल प्लान की शुरुआती कीमत 5835 रुपए और उससे अधिक है।

फ्री मिनट या SMS खत्म होने के बाद अलग से प्रति मिनट और प्रति SMS शुल्क देना होगा। प्रीपेड ग्राहकों के लिए टॉप-अप रिचार्ज की सुविधा भी उपलब्ध रहेगी।

क्या यह स्मार्टफोन की जगह ले सकता है?

इस सवाल का जवाब है, नहीं। BSNL का सैटेलाइट फोन सामान्य स्मार्टफोन का विकल्प नहीं है। इसका उद्देश्य सोशल मीडिया चलाना या रोजमर्रा की मोबाइल जरूरतों को पूरा करना नहीं बल्कि उन परिस्थितियों में भरोसेमंद संचार उपलब्ध कराना है जहाँ मोबाइल नेटवर्क पूरी तरह नाकाम हो जाता है।

यही वजह है कि यह डिवाइस मिशन-क्रिटिकल कम्युनिकेशन के लिए तैयार किया गया है। रक्षा सेवाएँ, राहत एवं बचाव अभियान, समुद्री ऑपरेशन और दूरदराज के क्षेत्रों में काम करने वाली एजेंसियाँ इसका सबसे अधिक लाभ उठा सकती हैं। आम लोगों के लिए यह फोन न तो आसानी से उपलब्ध होगा और न ही बिना सरकारी अनुमति इसका इस्तेमाल किया जा सकेगा।

भारत-ऑस्ट्रेलिया के बीच ऐतिहासिक यूरेनियम डील, शांतिपूर्ण कार्यों के लिए होगी ईंधन की आपूर्ति: जानिए साल 2047 तक कैसे पूरा होगा 100 गीगावाट न्यूक्लियर एनर्जी का टारगेट

वैश्विक मंच पर ऊर्जा सुरक्षा और स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों की खोज आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत बन चुकी है। इस दिशा में भारत ने एक ऐतिहासिक और रणनीतिक कदम आगे बढ़ाया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ऑस्ट्रेलिया यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच गुरुवार (09 जुलाई 2026) को यूरेनियम आपूर्ति से जुड़ा एक अत्यंत महत्वपूर्ण समझौता संपन्न हुआ है।

यह समझौता न केवल भारत की भविष्य की ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए एक मील का पत्थर साबित होगा, बल्कि यह दोनों देशों के बीच मजबूत होते रणनीतिक और कूटनीतिक संबंधों का भी प्रतीक है।

भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच हुए इस समझौते ने उन कानूनी और राजनीतिक बाधाओं को पूरी तरह से समाप्त कर दिया है, जो दशकों से दोनों देशों के बीच परमाणु सहयोग में रोड़ा बनी हुई थीं।

यह डील भारत को एक ऐसा विश्वसनीय ईंधन स्रोत प्रदान करेगी, जो उसकी गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित बिजली उत्पादन क्षमता को बढ़ाने और पर्यावरण अनुकूल लक्ष्यों को प्राप्त करने में केंद्रीय भूमिका निभाएगा।

भारत-ऑस्ट्रेलिया यूरेनियम डील: दशकों पुराना गतिरोध कैसे खत्म हुआ?

भारत और ऑस्ट्रेलिया के संबंध हमेशा से इतने सहज और मजबूत नहीं रहे हैं, जितने आज दिखाई देते हैं। यदि इतिहास के पन्नों को पलटें, तो साल 1974 में जब भारत ने ‘पोखरण-1’ के माध्यम से अपना पहला परमाणु परीक्षण किया था, तब ऑस्ट्रेलिया सहित कई पश्चिमी देशों ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई थी।

इसके बाद साल 1998 में किए गए दूसरे परमाणु परीक्षण के बाद भारत पर कड़े अंतर्राष्ट्रीय तकनीकी प्रतिबंध लगा दिए गए और यूरेनियम व्यापार पर पूरी तरह रोक लगा दी गई। 1978 में ऑस्ट्रेलिया ने एक बेहद सख्त नीति अपनाई थी, जिसके तहत वह केवल उन्हीं देशों को यूरेनियम का निर्यात कर सकता था जिन्होंने परमाणु अप्रसार संधि (NPT) पर हस्ताक्षर किए हों।

चूँकि भारत इस संधि को भेदभावपूर्ण मानता आया है, इसलिए उसने इस पर हस्ताक्षर नहीं किए। इसी वजह से ऑस्ट्रेलिया ने लंबे समय तक भारत को यूरेनियम देने से साफ तौर पर इनकार कर दिया था। इस गतिरोध में पहला महत्वपूर्ण मोड़ साल 2007 में आया, जब तत्कालीन ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री जॉन हावर्ड ने भारत को यूरेनियम बेचने की मंजूरी दी।

हालाँकि उसी वर्ष के अंत में ऑस्ट्रेलिया में सत्ता परिवर्तन हो गया और केविन रड के नेतृत्व वाली लेबर पार्टी की सरकार ने इस फैसले को पलटते हुए फिर से NPT की शर्त सामने रख दी।

ऑस्ट्रेलिया को हमेशा यह डर सताता था कि भारत इस यूरेनियम का उपयोग बिजली बनाने के बजाय परमाणु हथियार विकसित करने में कर सकता है। लेकिन साल 2008 में हुए भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु समझौते के बाद वैश्विक परिदृश्य बदला। न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप (NSG) ने भारत को यूरेनियम खरीदने की छूट दे दी।

भारत के बेदाग ट्रैक रिकॉर्ड और ‘पहले परमाणु हमला न करने’ की नीति को देखते हुए साल 2011 में ऑस्ट्रेलिया ने अपनी नीति बदली और 2012 में प्रतिबंध को आधिकारिक रूप से समाप्त कर दिया। इसके बाद 2014 में तत्कालीन ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री टोनी एबॉट की भारत यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक नागरिक परमाणु सहयोग समझौता हुआ।

इसने यूरेनियम आपूर्ति की कानूनी राह खोली। वर्तमान में सुरक्षा गारंटियों और परमाणु दायित्व कानून जैसी तमाम तकनीकी और प्रशासनिक बारीकियों को अंतिम रूप देकर इस व्यवस्था को पूरी तरह सक्रिय कर दिया गया है।

IAEA की निगरानी में केवल शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए होगा ईंधन का उपयोग

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके ऑस्ट्रेलियाई समकक्ष एंथनी अल्बनीज के बीच हुए इस हालिया समझौते के तहत ऑस्ट्रेलिया से भारत को दीर्घकालिक यूरेनियम निर्यात का रास्ता पूरी तरह साफ हो गया है। इस समझौते की सबसे महत्वपूर्ण शर्त यह है कि इस ईंधन का उपयोग सिर्फ और सिर्फ शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए किया जाएगा।

दोनों देशों द्वारा जारी संयुक्त बयान में स्पष्ट किया गया है कि यूरेनियम का यह पूरा निर्यात अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के कड़े सुरक्षा प्रावधानों और निगरानी मानकों के दायरे में होगा। इसका सीधा अर्थ यह है कि आपूर्ति किए गए यूरेनियम की हर मात्रा का हिसाब रखा जाएगा ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि इसका उपयोग केवल नागरिक परमाणु ऊर्जा उत्पादन में ही हो रहा है।

ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज ने इस व्यवस्था की सराहना करते हुए कहा कि यह निर्यात भारत को अपनी गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित बिजली क्षमता को तेजी से बढ़ाने में सक्षम बनाएगा। दिलचस्प बात यह है कि ऑस्ट्रेलिया के पास दुनिया का लगभग 28 से 32 प्रतिशत यूरेनियम का विशाल भंडार है, लेकिन वह खुद अपने देश में परमाणु ऊर्जा का उपयोग नहीं करता और न ही परमाणु हथियार बनाता है।

वह अपने पूरे यूरेनियम को निर्यात कर देता है। ऑस्ट्रेलिया अब तक चीन, जापान, ताइवान और अमेरिका जैसे देशों को यूरेनियम की आपूर्ति करता रहा था, लेकिन अब इस सूची में भारत का शामिल होना एक बड़ी रणनीतिक जीत है। दोनों देशों ने इस बात की पुष्टि की है कि ‘ऑस्ट्रेलिया-भारत परमाणु सहयोग समझौते (2015)’ के तहत सभी आवश्यक प्रशासनिक प्रबंध पूरे कर लिए गए हैं।

भारत ने 2047 तक 100 गीगावॉट न्यूक्लियर एनर्जी का रखा है महत्वाकांक्षी लक्ष्य

भारत की आबादी और उसकी तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था को देखते हुए देश में बिजली की माँग लगातार बढ़ रही है। विज्ञान मामलों के जानकार पल्लव बागला के अनुसार, वर्तमान समय में भारत की कुल परमाणु ऊर्जा उत्पादन क्षमता लगभग 8 गीगा वाट (या वर्तमान में सक्रिय रिएक्टरों के आधार पर करीब 8.78 गीगा वाट) है, जो देश के कुल बिजली उत्पादन का महज 3 प्रतिशत ही है।

परमाणु ऊर्जा की इस कम हिस्सेदारी का सबसे बड़ा कारण देश में यूरेनियम ईंधन की भारी कमी रहा है। यद्यपि भारत घरेलू स्तर पर झारखंड और आंध्र प्रदेश की खदानों से यूरेनियम का उत्खनन करता है, लेकिन यह घरेलू उत्पादन प्रति वर्ष केवल 400 से 500 टन ही है, जो देश की कुल जरूरतों का मुश्किल से 20% से 25% ही पूरा कर पाता है।

शेष आवश्यकता के लिए भारत पूरी तरह आयात पर निर्भर है। संसद में दी गई आधिकारिक जानकारी के अनुसार, वित्त वर्ष 2008-09 से 2024-25 तक भारत ने IAEA की निगरानी वाले रिएक्टरों के लिए कुल 18,842.60 मीट्रिक टन यूरेनियम का आयात किया है, जिसमें यूरेनियम अयस्क, प्राकृतिक यूरेनियम डाईऑक्साइड, पेलेट्स और समृद्ध पेलेट्स शामिल हैं।

भारत सरकार ने साल 2047 तक देश की परमाणु ऊर्जा क्षमता को बढ़ाकर 100 गीगा वाट करने का एक बेहद महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किया है, ताकि लगभग 6 करोड़ भारतीय घरों को निर्बाध बिजली प्रदान की जा सके। इस विशाल लक्ष्य को प्राप्त करने के चरणबद्ध तरीके भी तय किए गए हैं।

इसके तहत वर्तमान क्षमता को साल 2031-32 तक बढ़ाकर लगभग 22 गीगा वाट किया जाएगा और इसके बाद 2032 से 2047 के बीच NPCIL द्वारा 32 गीगा वाट की अतिरिक्त क्षमता स्थापित की जाएगी। जानकारों का कहना है कि वर्तमान में रिएक्टरों को सालाना करीब 2,000 टन यूरेनियम की जरूरत होती है।

हालाँकि जब भारत 100 गीगा वाट के लक्ष्य तक पहुँचेगा, तब यह सालाना जरूरत बढ़कर 23,000 टन तक पहुँच सकती है। चूँकि भारत के पास परमाणु बम बनाने के लिए पर्याप्त मात्रा में अपना यूरेनियम मौजूद है, इसलिए उसे बाहरी देशों से यूरेनियम की आवश्यकता केवल और केवल असैन्य ऊर्जा प्रोग्राम को चलाने के लिए है, जिसमें ऑस्ट्रेलिया का उच्च गुणवत्ता वाला यूरेनियम बेहद मददगार साबित होगा।

SHANTI विधेयक और निजी क्षेत्र की बढ़ती भागीदारी

भारत ने अपनी परमाणु ऊर्जा उत्पादन प्रणाली में आमूलचूल बदलाव लाने और 2047 के 100 गीगा वाट के लक्ष्य को समय पर हासिल करने के लिए विधायी स्तर पर भी बड़े कदम उठाए हैं। इसी क्रम में भारतीय संसद द्वारा दिसंबर 2025 में एक ऐतिहासिक कानून पास किया गया, जिसका नाम ‘सस्टेनेबल हार्नेसिंग एंड एडवांसमेंट ऑफ न्यूक्लियर एनर्जी फॉर ट्रांस्फ़ॉर्मिंग इंडिया’ यानी ‘शांति’ (SHANTI) विधेयक है।

यह नया कानून भारत के परमाणु क्षेत्र में एक नए युग की शुरुआत करता है, क्योंकि यह देश के परमाणु ऊर्जा इतिहास में पहली बार निजी कंपनियों को बड़े स्तर पर भागीदारी की अनुमति देता है।

इस विधेयक के प्रावधानों के तहत अब देश की निजी कंपनियों को भी परमाणु बिजलीघर या परमाणु रिएक्टर बनाने, उनका मालिकाना हक रखने, उन्हें संचालित करने और आवश्यकता पड़ने पर उन्हें बंद करने (डीकमिशन करने) के लाइसेंस दिए जा सकेंगे।

इतना ही नहीं यह कानून निजी कंपनियों को परमाणु ईंधन बनाने की भी अनुमति प्रदान करता है, जिसमें यूरेनियम-235 का रूपांतरण, उसका शोधन और एक निर्धारित सुरक्षित सीमा तक उसका संवर्धन (एनरिचमेंट) शामिल है।

इसके अतिरिक्त केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित किए जाने वाले अन्य परमाणु पदार्थों का उत्पादन, उपयोग, प्रसंस्करण और उनका सुरक्षित निपटान भी अब निजी क्षेत्र की कंपनियाँ कर सकेंगी। सरकार का मानना है कि इस कानून के जरिए निजी पूंजी और उन्नत तकनीकों का समावेश होगा, जिससे परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के निर्माण में तेजी आएगी और देश ईंधन के मामले में आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ेगा।

यूरेनियम का विज्ञान: प्रकृति और ऊर्जा क्षमता

यूरेनियम क्या है और यह इतना महत्वपूर्ण क्यों है, इसे समझने के लिए इसके वैज्ञानिक और प्राकृतिक पहलुओं को जानना आवश्यक है। यूरेनियम एक बेहद भारी और उच्च घनत्व वाली धातु है, जिसका गलनांक (मेल्टिंग पॉइंट) 1132 डिग्री सेल्सियस होता है।

इसका उपयोग पिछले 60 से अधिक वर्षों से ऊर्जा के एक अत्यंत सघन और शक्तिशाली स्रोत के रूप में किया जा रहा है। वर्ल्ड न्यूक्लियर एसोसिएशन के आँकड़ों के अनुसार, यूरेनियम पृथ्वी की ऊपरी परत में पाया जाने वाला एक सामान्य तत्व है, जो टिन, टंगस्टन और मोलिब्डेनम जितना ही आम है।

यह ज्यादातर चट्टानों में 2 से 4 पार्ट्स प्रति मिलियन (यानी 20 से 40 लाखवें हिस्से) की सूक्ष्म मात्रा में मौजूद होता है। इसके अलावा, यूरेनियम समुद्री पानी में भी घुली हुई अवस्था में प्रचुर मात्रा में मौजूद है, जहाँ से इसे उन्नत तकनीकों के जरिए निकाला जा सकता है।

ऐतिहासिक रूप से, यूरेनियम की खोज साल 1789 में जर्मन रसायन वैज्ञानिक मार्टिन क्लापरोथ ने ‘पिचब्लेंड’ नामक एक खनिज में की थी। उन्होंने इसका नाम उस समय से आठ साल पहले खोजे गए सौर मंडल के ‘यूरेनस’ ग्रह के नाम पर रखा था।

वैज्ञानिकों का मानना है कि यूरेनियम का निर्माण आज से लगभग 6.6 अरब साल पहले अंतरिक्ष में हुए भीषण सुपरनोवा विस्फोटों के दौरान हुआ था। यद्यपि यह पूरे सौर मंडल में बहुत अधिक मात्रा में उपलब्ध नहीं है, लेकिन पृथ्वी के भीतर इसका धीमा रेडियोधर्मी क्षय (रेडियोएक्टिव डिके) आज भी हमारे ग्रह के आंतरिक हिस्से में गर्मी का मुख्य स्रोत है।

इसी आंतरिक ऊष्मा के कारण ही पृथ्वी के भीतर महाद्वीपों का खिसकना, जिसे ‘कॉन्टिनेंटल ड्रिफ्ट’ कहा जाता है, संभव हो पाता है। अपने अत्यधिक घनत्व के कारण, परमाणु ऊर्जा के अलावा इसका उपयोग विमानों के नियंत्रण तंत्र (कंट्रोल सिस्टम) में और खतरनाक रेडिएशन से सुरक्षा के लिए शील्डिंग सामग्री के रूप में भी बड़े पैमाने पर किया जाता है।

वैश्विक साझेदारी और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बदलते रणनीतिक समीकरण

भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच हुआ यह ऊर्जा समझौता केवल एक व्यापारिक सौदा नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरे भू-राजनीतिक और रणनीतिक कारण भी छिपे हैं। दोनों देश ‘व्यापक रणनीतिक साझेदार’ (कॉम्प्रिहेंसिव स्ट्रेटेजिक पार्टनर्स) हैं और एक स्वतंत्र, खुले, सुरक्षित और समृद्ध हिंद-प्रशांत (इंडो-पैसिफिक) क्षेत्र का साझा दृष्टिकोण रखते हैं।

हाल के वर्षों में दोनों देशों के रिश्तों में जो अभूतपूर्व करीबी आई है, उसकी एक बड़ी वजह चीन की बढ़ती सैन्य महत्वाकांक्षाओं पर नजर बनाए रखना और वैश्विक व्यापार को किसी एक देश पर निर्भर रहने से बचाकर नए मजबूत साझेदार विकसित करना भी है।

दोनों देशों ने ऊर्जा सुरक्षा पर एक संयुक्त वक्तव्य जारी कर वैश्विक स्तर पर चल रहे व्यवधानों, विशेषकर मध्य पूर्व की स्थिति और उसके कारण ऊर्जा, संसाधनों तथा अन्य महत्वपूर्ण वस्तुओं की आपूर्ति श्रृंखलाओं और कीमतों पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभावों पर गहरी चिंता जताई है।

इस व्यवधान के बीच दोनों देशों ने खुले बाजारों और नियम-आधारित व्यापार के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है, जो उनकी आर्थिक सुरक्षा का मूल आधार है। भारत ने इसके पूर्व फ्रांस, रूस और कजाकिस्तान जैसे देशों से भी परमाणु ईंधन आयात के समझौते कर रखे हैं और अब ऑस्ट्रेलिया इस कड़ी में एक सबसे मजबूत और दीर्घकालिक स्तंभ बनकर उभरा है।

इस यात्रा के दौरान दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों के बीच आपसी कूटनीतिक गर्मजोशी भी साफ देखी गई, जहाँ दोनों नेताओं ने एक खुशनुमा सेल्फी ली। ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज ने प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व की भी खुलकर सराहना की।

इस मजबूत रिश्ते का एक सामाजिक आधार ऑस्ट्रेलिया में तेजी से बढ़ता भारतीय प्रवासी समुदाय भी है। वर्ष 2026 के आँकड़ों के अनुसार, इतिहास में पहली बार ऑस्ट्रेलिया में विदेश में जन्मे प्रवासियों का सबसे बड़ा समूह भारत में जन्मे लोगों का हो गया है, जिसने लंबे समय से चले आ रहे ब्रिटिश मूल के समुदाय को भी पीछे छोड़ दिया है।

इस रणनीतिक साझेदारी को और विस्तार देते हुए दोनों देशों ने हिंद महासागर में स्थित ऑस्ट्रेलिया के कोकोस (कीलिंग) द्वीपसमूह पर एक ‘अस्थायी अंतरिक्ष ट्रैकिंग टर्मिनल’ स्थापित करने पर भी सहमति जताई है, जो भारत के भविष्य के अंतरिक्ष उड़ान प्रोजेक्ट्स को महत्वपूर्ण सहयोग प्रदान करेगा।

इसके अलावा, दोनों देशों ने महत्वपूर्ण खनिजों (क्रिटिकल मिनरल्स) की सप्लाई चेन को मजबूत करने, लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG), कोयला, डीजल और कम कार्बन वाले ईंधनों के द्विपक्षीय व्यापार को बढ़ावा देने का संकल्प लिया है, जिसमें ऑस्ट्रेलिया ने भारत की ‘ग्लोबल बायोफ्यूल्स एलायंस’ (GBA) पहल का भी स्वागत किया है।

यह समग्र साझेदारी भारत की दीर्घकालिक ऊर्जा आत्मनिर्भरता और वैश्विक पटल पर उसके बढ़ते प्रभाव को एक नई और सुरक्षित दिशा प्रदान करती है।